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वृत्ति से निवृत्ति


 

बिना अध्यास के कोई कार्य नही होता और ये अध्यास जब तक बना रहता है तब तक सत्य का बोध नही होता। सत्य का साक्षात्कार नही होता और सत्य का साक्षात्कार जब तक नही होता तब तक जीव घटि यंत्र की नाई घूमता रहता है। ॐ ॐ ॐ ॐ

पचास साल संसार में भटके पूछो क्या मिला ?.. कि इतना धन मिला, इतना पुत्र मिला इतना ये मिला वो मिला लेकिन ये अहं का अध्यास है। धन बँक में पड़ा है चित्त में अध्यास है, मकान जमीन पर खड़ा है अध्यास है ,पुत्र पाँच भूतों में है और वहीं से आया है अध्यास है कि मिला। मृत्यु का झटका लग जाता है , सब मिला मिलाया जो है भ्रमणा टूट जाती है, फिर दूसरे जन्म में जाता है और फिर अध्यास करता है कि ये मेरी माँ है, ये मेरा बाप है, ये मेरे को मिला, ये मेरे को बिछड़ा ..यही तो होता है और क्या है ? तो हर जन्म में ये जीव बेचारा मजूरी करते-करते मर जाता है। ये मेरी पत्नी है, ये मेरा पुत्र है, ये मेरा घर है ,ये मेरा कर्तव्य है,.ये मेरा पुण्य है, ये मेरा पाप है, ये सब अध्यास पर ही आरोपित है। तो ये अध्यास जबतक बना रहे तबतक कोई भगत बन जाए, कोई योगी बन जाए, कोई तपस्वी बन जाए ,कोई त्यागी बन जाए, कोई कुछ बन जाए लेकिन ये बनना सब अध्यास में होता है। ये अध्यास जबतक नही मिटता तबतक इसको परमपद की प्राप्ति नही होती। जबतक परमपद की प्राप्ति नही होती तबतक जैसे चाय उबालते हैं, दाल उबालते हैं , फुरफुराते रहते हैं दाल के दाने, ऐसे ही उस चेतन की सत्ता से अंतःकरण में “मैं मैं मैं” फुरफुराता रहता है। मैं में अध्यास लगता जाता है..मैं ये हूँ, मैं वो हूँ, मेरा ये है …ॐ ॐ ॐ

भगत का कर्तव्य है कि वृत्ति को भगवत्ताकार रखें, कृष्णाकार रखें। वृत्ति भगवत्ताकार, कृष्णाकार, इष्टाकार रहेगी तबतक भक्त मजे में..वृत्ति टूटेगी तो भक्त को अच्छा नही लगेगा। भोगी की वृत्ति भोगाकार होती है , त्यागी की वृत्ति त्यागाकार होती है, तपस्वी की वृत्ति तपस्याकार होती है । तो वृत्ति उठती है अंतःकरण में तो जो जैसा है उसकी वृत्ति उस आकार की होगी तो अपने को सुखी मानेगा। तो वृत्ति की आदत पड़ जाती है और आदत के अनुसार जो होता है उसको सुख मान लेता है। जैसे ऐसा खाना ,ऐसा रहना, ऐसा करना है ये आदत पड़ गई है न ? ऐसा मिलता है तो अपनेको सुखी मानता है और उससे विपरीत वृत्ति होती है तो अपनेको दुःखी मानता है। जैसे कामी को काम के साधन मिलते है तो अपने को सुखी मानता है , तपस्या के जगह पर आता है तो अपने को परेशान मानता है। लोभी को लोभ के अनुकूल माल मिलता है तो अपने को  सुखी मानता है, ठीक है न ? और कलह वाले को कलह में सफल मिलता है तो अपनेको सुखी मानता है, तो ये सब अध्यास में उलझे हुए लोग है ।

भक्त को भगवताकार वृत्ति बनाने में ठीक रहता है वो अच्छा है लेकिन सत्य का साक्षात्कार तो वेदांत तो उसपर भी चोट करता है..भगवत्ताकार वृत्ति बनी, व्यवहाराकार वृत्ति बनी लेकिन ये वृत्ति है ! इस वृत्ति से निवृत्त होना  है ! इस वृत्ति के साथ जुड़ोगे तो वृत्ति सदा एक जैसी नही बनती। अमुक प्रकार की वृत्ति बनी तो सुख हुआ, अमुक प्रकार की वृत्ति हुई तो फिर सुख गायब हो जाएगा। हजारों-हजारों वृत्तियाँ बदलती रहती है और जो वृत्ति के अनुसार सुखी होने में लगे हैं वो लगे ही हैं, उनके दुःख का अंत नही आता ! वृत्ति के अनुसार जो सुखी होने में लगे हैं वो लगे ही रहेंगे , उसके दुःख का अंत नही आता। ये जीवन तो पूरा हो जाता है, दूसरा जीवन मिलता है तभी भी ऐसे ही करोड़ों-करोड़ों  जीवन मिल जाते हैं ,करोड़ों-करोड़ों शरीर मिल जाते हैं, जन्म मिल जाते हैं लेकिन वो वृत्ति के साथ लगा हुआ आदमी का अंत नही आता भटकने का ! इसीलिए वेदांत चोट करता है वृत्ति से निवृत्त होने को। वृत्ति से निवृत्त हो गया तो वृत्ति चाहे कैसी आए .. भगवत्ताकार आए वृत्ति, शांतिकार वृति आई, कभी क्रोधाकार आ गई .. हम जुड़ जाते है क्रोध से इसीलिए जलन पैदा होती है, हम जुड़ जाते हैं काम से इसीलिए ह्रास हो जाता है, हम जुड़ जाते हैं लोभाकार वृत्ति से इसीलिए दुःख होता है..तो ये अध्यास है । बड़ा भारी तपस्वी हो, बड़ा भारी भक्त हो, बड़ा भारी जोगी हो ,बड़ा भारी उद्योगपति हो, बड़ा भारी दुनिया का प्रसिद्ध व्यक्ति हो, लेकिन उसको सुख तब होगा जब अपनी वृत्ति के अनुकूल होगा ! अपनी वृत्ति के अनुकूल होगा तब सुख होगा, अपनी वृत्ति के प्रतिकूल होगा तब दुःख होगा। और वृत्ति सदा एक जैसी नही होती और वृत्ति के अनुकूल बाहर सदा एक जैसी घटना नही घटेगी। अपनी वृत्ति के अनुरूप ही घटना घटे ये संभव नही ! और अपनी वृत्ति एक जैसी बनी रहे ये संभव नही ! तो फिर क्या होना चाहिए ? तो वृत्ति एक जैसी बनी रहे ये भी संभव नही, वृत्ति के अनुरूप ही घटना घटती रहे ये भी संभव नही ! इसीलिए सब लोग दुःखी मिलेंगे ! छोटा तो क्या बड़ा क्या ! कोई स्त्री के लिए दुःखी तो कोई स्त्री से दुःखी, कोई धन के लिए दुःखी तो कोई धन से दुःखी, कोई बदली के लिए दुःखी तो कोई बदली से दुःखी…सब चिंता रूपी चिता में झुलसते रहते हैं । फिर थोड़ी वृत्ति में मिलता है..अब दो उंगली देखना है तो दो के बीच अंतर होगा तब तो दिखेगी.. ठीक है न ? ऐसे ही सुख देखना है तो सुख के बीच अंतर आता है दुःख आता है फिर सुख लगता है ! अगर एक रस हो तो सुख भी नही लगेगा ! दो उंगली के बीच अंतर होता है न तब दिखती है ।

तो सुखाकार वृत्ति या दुःखाकार वृत्ति, अनुकूलता, प्रतिकूलता ये वृत्ति हैं ..और वृत्ति के साथ जबतक जुड़े रहेंगे तबतक जन्म मरण की निवृत्ति नही होगी।

और ये अध्यास होता है.. हकीकत में हैं हम कुछ लेकिन अध्यास हो गया ! अन्योन्य अध्यास होता है, संसर्ग अध्यास होता है ..अन्योन्य अध्यास  कैसे ? .. कि जैसे हैं तो गोविंद लेकिन अपने को केशव मान रहा है, हैं तो मोहन अपने को सोहन मान लिया .. सोहन के कपडे पहन लिए “मैं सोहन हूँ”..है मोहन, मान लिया सोहन..ये अन्योन्य अध्यास हो गया। ऐसे ही | है तो वृत्तिओं का अधिष्ठान शुद्ध बुद्ध लेकिन मान लिया अपने को अंतःकरण और शरीर की वृत्तिओं के साथ !

दूसरा होता है संसर्ग अध्यास..जैसे आईने में नगर दिखा ..आईना बड़ा कर दे तो ये पूरा दिखेगा उसमें..हकीकत में आईने में वो है नही लेकिन भास रहा है । ऐसे ही अपने में ये वृत्तिओं का और जगत का कोई गंध मात्र भी नही लेकिन भास रहा है अपने में..कि ये मेरा कर्तव्य है, ये मेरा प्राप्तव्य है ,ये मेरे को पाना है, ये पकड़ना है, ये छोड़ना है , ये सारी मुसीबत दिख रही है ..आईने में कुछ घुसा नही लेकिन फिर भी आईने में दिख रहा है सब । ये वृत्तिओं के कारण आप में कोई गुण नही ,कोई दोष नही ,कोई जन्म नहीं ,कोई मृत्यु नहीं , कोई सुख नहीं , कोई दुःख नहीं ..वो तो सदा शुद्ध , अचिंत्य, चिद्घन स्वरूप है अपना, उसमें आ आ के सब चला जाता है..जैसे कार में आईना लगा होता है ना, तो कार होती है तो उसमें साईड दिखती जाती है फटाफट आ आ के चली जाती है ..कार चलाते हैं न साईड में ग्लास होता है आईना, तो जैसी कार चलती है तो आईने में आजू-बाजू की साईडे दिखती है ..नहीं समझे ? साइडें दिखती है कि नही दिखती ? वो आ-आकर चली जाती हैं | ऐसे ही तुम्हारे अंतःकरण रूपी आईनें में परिस्थितियों की साइडें आती हैं । अब वो ड्राइवर आईने में जो आए उसके पीछे लग जाए तो गाड़ी का क्या हाल होगा ? गाड़ी चल रही है और वो ग्लास में जो दिखे उसको ही पकड़ने लग जाए तो क्या हाल होगा ड्राइवर का ? गाड़ी रमण-भमण हो जाएगी क्या ? ऐसे ही ये ड्राइवर का हाल हो गया , ये गाड़ी रमण-भमण हो जाती है और समझते हैं अपने को सब चतुर आदमी । कोई अपने को मूर्ख स्वीकार नही करेगा। लेकिन बिना मूर्खता के कोई जन्म मरण में जा ही नहीं सकता ! कोई दुःखी हो ही नही सकता ! पहले बेवकूफी होती है तब भय होता है ,पहले बेवकूफी होती है तब दुःख होता है। बेवकूफी क्या है ?..कि अध्यास की ! अन्योन्य अध्यास.. है तो कुछ लेकिन मान लेते हैं कुछ… अपने में नही बैठ पाते ! जो कुछ करके, कहीं जाकर, कुछ पाकर अपने को सुखी करने में लगा है वो बस लगा ही है, उसके सुख का छेड़ा नही आएगा। कश्मीर जाकर सुखी..थक के आ जाएँगे! अच्छा, ज्यादा सुख मिला अच्छा है तो फिर दुबारा जाएगा !  कहीं जाकर सुख मिला तो बार-बार वहाँ जाना पड़ेगा ! जिस समय सुख मिला उस समय की वृत्ति और वातावरण और दुबारा जाएगा तो उस समय की वृत्ति और वातावरण ऐसा नही होगा। तो जैसे कश्मीर से ऊब के गया तो फिर सालभर के बाद दूसरी जगह जाएगा , तीसरी जगह जाएगा ! ऐसे आयुष्य पूरा हो जाएगा लेकिन जाने की आदत नही मिटेगी ! समझ रहे हैं ? जबतक ऐसा बना है तो ये अध्यास हो गया संसर्ग का अध्यास ! उनके साथ जुड़ने का, वृत्ति के साथ ।

जिनको वेदांत के अमृत का अनुभव हो जाता है वे इस भाव से बच जाते हैं । बाकी तो संसार रूपी गगरी की नाई घूमते रहते हैं । वृत्तिओं के अनुकूल सुखी होने में तो पशु-पक्षी जीव-जंतु से लेकर बड़े-बड़े बुद्धिमान दिखनेवाले भोगी जुड़े है।

सड़क पर बंगला है , कभी बरात जाएगी कभी शमशान यात्रा भी जाएगी, कभी ऑटो जाएगी तो कभी कार जाएगी, कभी घोड़ा गाड़ी जाएगी तो कभी साइकल वाले जाएँगे । अब सड़क पर बंगला जो है ..अपने घर में न बैठकर बारात आए तो बारातियों के साथ हो गए, शमशान यात्रा वाले आए तो उसके साथ हो गए, साइकिल वाले आये तो साइकल वालों के साथ हो गए, घोड़े सवार आए तो उसके साथ सड़क से जो गुजरे उसके साथ जुड़ता गया तो अपने घर में कब बैठेगा ? फिर उसका घर होते हुए भी उसका नही है ! उसको तो फुर्सत ही नहीं मिलेगी ! फुर्सत नहीं मिलेगी उसको तो, धीरे धीरे भूल  ही जाएगा कि ये मेरा घर है ! जब सड़क से गुजरनेवाले ट्रैफिक के साथ ही होता रहेगा तो थोड़े ही दिन में भूल जाएगा कि यहाँ मेरा घर था ! वो तो ट्रैफिक हो जाएगा | ऐसे ही अपन लोग ट्रैफिक हो गए | इसीलिए जन्मते मरते रहते हैं,घूमते रहते हैं । अपने घर में नहीं बैठते, अपने स्वरूप में नहीं बैठते!

तो,बोले-ज्ञानी को दुःख होता है?..ज्ञानी बोलता है-दुःख आता है तो आओ, सुख आता है तो आओ, अपमान आता है तो आओ,मान आता है तो आओ..नर्तकी कैसा भी नृत्य करती है, दर्शक देखके मजा ले..ऐसे ही चित्त की वृत्तिओं में चाहे कुछ हो ,चाहे कुछ आए, उसके साथ अपना सबंध न जोड़ें तो वृत्तिओं को सत्ता नही मिलेगी तो वो आपको दबाएगी नहीं |

लाइन में कितनी भी बढ़िया केबल हो लेकिन बीच में से फ्यूज निकाल दो तो क्या आपको तकलीफ करेगी क्या ? तो पावरहाउस से कनेक्ट जो लाइन है  वही तो शॉक लगा सकता है । ऐसे ही अपने मैं को वृत्तिओं से मिलाते है तभी दुःख होता है, तभी वासना प्रबल हो जाती है। और वासना अंतःकरण में होती है और जुड़ जाता है मैं-में। वासना-अवासना, अनुकूलता- प्रतिकूलता ये सारा का सारा खेल अंतःकरण में होता है। तो जो वासना के बहाव में बहते हैं उनकी  अपेक्षा जो धरम के अनुकूल रहते है उनकी वासना नियंत्रित रहती है। लेकिन वो भी धार्मिक आदमी भी पूर्ण संतुष्ट नही मिलेंगे, पूर्ण स्वतंत्र नहीं मिलेंगे, पूर्ण संतुष्ट नही मिलेंगे। तो धरम से वृत्तियाँ नियंत्रित होती है , अच्छा करना और बुरे से बचने के लिए धरम है । उपासना से वृत्ति रसमय होती है और योग से वृत्ति एकाग्र होती है, विक्षेप बंद हो जाता है। लेकिन फिर भी वृत्तिओं के साथ का सबंध बना रहता है। इसीलिए कई ऐसे योगी रोते मिलेंगे कि पहले समाधि लगती थी अब नही लगती, पहले भक्ति बहुत होती थी अब नही होती। पहले धन बहुत था, भोग बहुत था अब नही है अथवा पहले कुछ नही था अभी इतना सारा है। तो सब ऐसे ही झुलसते रहते है। पहले नही था अभी है तो अहंकार में आए और पहले था अब नही है तो विषाद में आए। ठीक है ? पहले समाधि नही थी अब है तो अहं आ गया, पहले समाधि थी और अब नही है तो फिर विषाद हो गया !  लेकिन जो समाधि के पहले था,समाधि के बाद भी है, समाधि के वक्त भीहै वो ज्यों का त्यों है! उसको “मैं” रूप में जान लेना ये वेदांत का लक्ष्य है !

Sindhi

लेकिन जब गाते थे तब भी जो था , पेटी कमजोर हो गई तब भी जो है उसमें कोई फर्क नही पड़ा ! जिसमें कोई फर्क नही पड़ा वो मैं हूँ । और जिसमें फर्क पड़ा वो मैं नहीं ! जिसमें फर्क पड़ा वो मैं नही..वृत्ति में फर्क पड़ा, शरीर में फर्क पड़ा, सबंधों में फर्क पड़ा, मान्यताओं में फर्क पड़ा, लेकिन सब से परे जो है जिसमें कोई फर्क नही पड़ता वो चैतन्यघन आत्मा है। उस आत्मा को मैं मानना समझो पूरे खजाने को प्राप्त करना है। और उस आत्मा को मैं न मानकर ..शरीर को मैं मानना, जाती पाती को मैं मानना समझो कि बस चिता में अपनेको फेंकना है ! चिता तो मुर्दे को जलाती है, चिंता जीते को जलाती है ! और चिंता होती है वृत्तिओं के कारण ! गहरी नींद में चले गए , वृत्ति दब गई तो कोई चिंता नही, समाधि में वृत्ति निरुद्ध हो गई तो कोई चिंता नही, भजन में भगवताकार वृत्ति हो गई तो कोई चिंता नहीं लेकिन वो वृत्ति समाधि से, मूर्छा से, भगवद भाव से वृत्ति उतर के आती है..लेकिन अपना स्वरूप उतरके और चढ़के नही आता । जो उतरता चढ़ता नही है उसमें बैठने का अभ्यास करो एकांत में! एकांत में वो उरतने चढ़ने से परे है उसका अभ्यास हो गया फिर व्यवहार में भी चलता रहेगा ! वृत्तिओं को देखो, विचारों को देखो ..देखोगे तो सबंध विच्छेद हो जाएगा । इतना योग से,तप से, यज्ञ से, होम से, दान से उतना शीघ्र फायदा नही होता जितना इनसे सबंध विच्छेद करने से !

यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।

यज्ञ, दान, तप करनेसे बुद्धि पवित्र होती है , लाभ तो होता है लेकिन ये तत्वज्ञान ..तत्वज्ञान तो महाराज बुद्धि पवित्र होती है तो भी होता है और गुरु का उपदेश सुनकर इनके साथ के सबंध को कट आउट कर दे तो भी लाभ हो जाता है । फिर आसक्ति नहीं रहेगी ,जब कट आउट हो गया तो फिर किसीकी आसक्ति नहीं रहेगी। न धन की आसक्ति रहेगी , न भोग की आसक्ति रहेगी न जोग की रहेगी न त्याग की रहेगी..एकदम स्वतंत्र, परम् स्वतंत्र !

फिर ये आत्मा ब्रम्हरूप है इस बात को जान लें । ये कैसे ? ..कि जो देश के परिच्छेद से रहित, काल के परिच्छेद से रहित, और वस्तु के परिच्छेद से रहित है ..देश से, काल से और वस्तु के परिच्छेद से जो रहित है उसको ब्रम्ह बोलते है, आत्मा बोलते है, परमात्मा बोलते है..देश के काल के और वस्तु के परिच्छेद से  रहित है..देश कितना भी हो लेकिन उसकी भी सीमा रहेगी परिच्छेद रहेगा ! इतना इतना इतना इतना लेकिन आखिर में पॉइंट आ जाएगी । काल..साल , दो साल, दस साल, सौ साल, हजार साल, लाख साल..अरे करोड़ साल ..उसके पहले और उसके बाद सीमा हो गई क्या ? वस्तु… बड़ा बड़ा बड़ा बड़ा इतना बड़ा कि इतना बड़ा इतना बड़ा लेकिन फिर भी बाउंडरी ! जहाँ कोई बाउंडरी नही देश की, काल की, वस्तु की उस वस्तु का नाम ब्रम्ह है । तो हकीकत में ये आत्मा ब्रह्म है, तुम ब्रह्म हो..वृत्तिओं से तुम्हारा कोई सबंध नही है।शरीर के मरने से तुम नही मरते । वृत्तियों  के मरने से तुम नही मरते । वृत्तियों के मरने से अगर तुम मरते तो वृत्तियाँ कईं मर गई ! मर गई ना ! दुःखाकार आई वृत्ति, सुखाकार आई , चिंताकार वृत्ति आई मर गई ! चली गई ! तुम तो नही मरे ! ऐसे ही वृत्तियाँ जिस अंतःकरण में आई ऐसे अंतःकरण भी, ऐसे शरीर भी बदलते गए , अंतःकरण के भाव भी बदलते गए लेकिन तुम नही बदले ! ठीक है क्या ? तो जो नही बदलता है उसमें आ जाओ ! नहीं तो राम राम राम राम रटने से सत्वगुण बढ़ता है, सत्वगुण बढ़ता है तो हृदय का संकल्प सफल होता है । हृदय का संकल्प सफल हुआ..महाराज ! सिद्ध हो गए..लोगों ने पूजा..लेकिन जो संकल्प सफल होता है वो कभी कभी संकल्प असफल भी होता है । संकल्प सफल होने की भी सीमा होती है..हुआ है न..करने से हुआ है न ! करने से हुआ है करना बंद कर दो तो होना बंद हो जाएगा ! करना बंद कर दो तो होना बंद हो जाएगा अभी धंधा किया,कमाया है  तो कमाने के बल से, धन के बल से खर्चा कर सकते है । आवक बंद हो जाए और खर्च चालू रखो तो कितना टिकेगा ? ऐसे ही भजन के बल से , जप के बल से , योग के बल से, ये कर दिया बभूत अभिमंत्रित करके मुर्दे जिंदे कर दिए ..लेकिन जो देश से, काल से, वस्तु के परिच्छेद से रहित है उस तत्व का बोध नही हुआ तो इस अनंत काल की धारा में सौ , दो सौ मिट्टी के पुतले , हजार,दस लाख मिट्टी के पुतले जिंदे हो गए तो क्या ? ऐसे ही सब मिट्टी के पुतले करोड़ों जिंदे हो गए ! मिट्टी में से ही तो बने हैं सब ! अभी भी तो मिट्टी के पुतले साढ़े तीन सौ करोड़ है पृथ्वी पे!

तो अपने स्वरूप को देश से, काल से, वस्तु के परिच्छेद से रहित ऐसा जान लिया तो मुर्दे को जिंदा करने का सामर्थ्य योग में है अच्छा है ..भक्ति की भावना से सूखे पेड़ हरे हो जाते है ये अच्छी भावना है अच्छा है सुंदर है..लेकिन भक्त को , योगी को अथवा साधक को देशातीत , कालातीत , गुणातीत अवस्था में जाना चाहिए । इसीलिए अर्जुन को श्रीकृष्ण ने कहा

त्रयगुणः विषयः वेदः

जो वेद है बहुत पवित्र है , वेद में जो ज्ञान है अद्भुत ज्ञान है । सारे विश्व में ऊँचे से ऊँचा ज्ञान वेद का वेदांत का..जहाँ सारे ज्ञानों का समापन हो जाता है और सारे ज्ञान जहाँ से निकलते है और फिर भी एक है उस तत्व का बोध कराना वेदांत है ! तो ये वेद भी माया में है , तीन गुणों में है ।

त्रयगुणः विषयः वेदः | निस्त्रयगुणा भवर्जूनः ||

वेद का ज्ञान भी गुणों में आयेंगे, सत्वगुण में आयेंगे, रजोगुण में आयेंगे, तब सीखेंगे, करेंगे, संभालेंगे , रखेंगे..लेकिन ये गुण भी अंतःकरण में आते है..अंतःकरण से परे ! ऐसे देखा जाए तो बहुत कठिन है और वैसे देखा जाए तो बहुत सरल ! जहाँ से खोज होती है शुरू वहीं वो है ! जहाँ से तुम चलते हो वहाँ मंजिल है | बहुत सरल है ! और चलते चलते दूर निकल जाते हो तो बड़ा कठिन लगता है और फिर मुड़ के देखते हो तो दूर जाने पर भी वहीं मिलता है क्योंकि उसकी तो कोई सीमा नहीं .. देश, काल, वस्तु के परिच्छेद से रहित है ! जहाँ मुड़त वहीं ठिकाना मिलता है। इसीलिए करोड़ों जन्म से वृत्तियों के आधीन चलते आए हैं, बहिर्मुख होते आए हैं ! लेकिन जब वृत्ति से निवृत्त होने की टेक्नीक मिल जाती है तो लगता है कि यहीं है !

कीड़ी अपने घर से निकली और चलती ही रही ..अब उसको जमीन देखना हो तो कहाँ मिलेगी ? तरंग सागर से उठी और भागती ही रही ,खूब भागी ..150 माइल की स्पीड से तूफान चला और तरंग भागी बड़ी-बड़ी ..भागी तो बहुत लेकिन उसको पानी से मिलना है तो ? जहाँ से उठी थी उसी पर दौड़ रही है और अभी वही रूप है !

ऐसे ही अपनी वृत्ति करोड़ों वर्षों से संसार सागर में भटक रही है, दुःख भोग रहे हैं | ये हो जाए, वो हो जाए, वो हो जाए, समझ रहे हैं सब ? ये दिमाग में बिठाने की बात है | कौन क्या कर रहे है, क्या देख रहे है उसको मत देखो..क्या हमको करना है वो देखो ! तो ये वृत्ति हजारों, लाखों, करोड़ों वर्ष से..कईं जन्म में ..कीड़ा बन गए तो भी दौड़ा , मकोड़ा बन गया तो भी सुख के लिए दौड़ा , घोडा बन गया तो भी सुख के लिए दौड़ा…फिर भले चाबूक खाए ! मक्खी बन गया तो भी क्या कर रहे है ? वृत्ति के कारण ही दौड़ रहे है क्या ? तो दौड़  तो करोड़ों जन्म से चालू है ..लेकिन उस देश से, काल से, वस्तु के परिच्छेद से जो रहित है, जिसकी देश करके , काल करके , वस्तु करके कोई सीमा नही ..वो जो अपना आपा है वो तो जब देखो वही का वही ! तरंग कितना ही दौड़े ..

 

फूँक मारके इच्छा शक्ति से पहुँच जाओ कहीं लोक लोकांतर में..दुःख का अंत नही आएगा , मुसीबतों का अंत नही आएगा। ऐसे भी लोग हैं..संकल्प करें ..विमान में बैठे, जहाँ चाहे वहाँ पहुँच गए ! गन्धर्व लोक ये वो सब ऐसे ही हैं ! फिर भी वो भी दुःखी हैं बेचारे |

Sindhi में है

जैसे स्वप्ने में आप पहुँच जाते हैं ऐसा सुविधा उनके पास ! फिर भी वो वृत्ति के साथ जुड़कर भोग रहे है न ! इसीलिए उनका पतन होता रहता है ।

जैसे अरद के डिब्बे होते हैं ऊपर नीचे चढ़ते रहते हैं..ऐसे ही लोग पुण्य करके गंधर्व लोक में , स्वर्ग लोक में जाते हैं, भोग भोगते हैं फिर पुण्य खत्म होता है फिर गिरते हैं, माता के गर्भ में आते हैं , लटकते हैं ऊँधे , पिता की शिश्ना से पसार होते हैं , माता के एम सी का ब्लड पीकर शरीर बनाते हैं फिर दूध पीते हैं , थपेड़े खाते हैं, फिर पढ़ने जाते हैं , फिर नपास पास होते हैं, फिर पास होते हैं, फिर परीक्षा में होते हैं, फिर धंधा करते है, धंधा सीखते है, फिर धंधे की चिंता रखते हैं , फिर पत्नी की चिंता , बच्चों की चिंता, पत्नी का स्वभाव, बच्चों का स्वभाव , सबकी वृत्तियाँ अलग-अलग होती है..ऐसा करते करते, झुलसते झुलसते

Sindhi

थोड़ा हशश करा अंदर में..हाय रे ..इधर तो हशश करा, बाहर से अहं को संतोष हुआ..फिर शरीर की पीड़ा , हाय रे ! वो झुलसा.. अंत में सब जो बनाया सारी जिंदगी मजूरी किया , मृत्यु का एक झटका लगा सब छोड़के चला गया! और फिर गया भटका !  यही तो कर रहे हैं और क्या कर रहे हैं ?

Sindhi

ये जो वृत्तियों में भर दि सूचनायें उसको ज्ञान समझ बैठे । एम ए पढ़ा हूँ, बी ए पढ़ा हूँ, पी एच डी पढ़ा हूँ ..लेकिन अपना ज्ञान है ? बोले , “हाँ.. मैं फलाना भाई हूँ”…खाक है तेरा अपना ज्ञान | अपना ज्ञान होता तो जीवनभर ये कर कराके मृत्यु के झटके में सब खो नही देता ! अपना ज्ञान है तो एक शरीर तो क्या अनंत अनंत शरीर पैदा हो होके लीन हो जाते हैं |

अनंत ब्रह्मांड पैदा हो होके लीन हो जाते है , फिर भी अपने आप में कोई फर्क नही पड़ता ऐसा अपना आपा है ! अपना ज्ञान हो जाए तो ब्रम्हा ,विष्णु, महेश का पद भी तुमको छोटा लगेगा !

अपना ज्ञान हो जाए तो चन्द्रमा भी अग्नि जैसा लगेगा ..अभी तो शीतल लगता है लेकिन अपने आप की जो शीतलता है उसके आगे चंद्रमा की शीतलता भी अंगारों जैसी ! उसकी शीतलता के लिए तो आँख खोलनी पड़ती है न..अपनी शीतलता के लिए आँख भी खोलने की जरूरत नही पड़ती..चंद्रमा को शीतलता भी अपने चैतन्य वपु से मिलती है ! वो अपना स्वरूप का ज्ञान है।

Sindhi

हर जन्म में होते हैं मगज के टुकड़े..तो अभी ज्ञान से टुकड़े हो जाए तो बस हो गया, फिर टुकड़े होना ही बंद हो जाएगा। ऐसा चीज पा लेना चाहिए कि फिर कुछ न पाना पड़े! ऐसा जान लेना चाहिए कि फिर कुछ जानने की जरूरत नही,जिसको पाकर फिर उससे बड़ा कोई लाभ नही! जिसमे स्थिर होने के बाद बड़े भारी दुःख से भी वो चलित नही होता, फिर हवाएँ उसके अनुरूप हो जाती है । देवी देवता यक्ष गंधर्व किन्नर सब उसीके गीत गाते है । सब सुख के लिए भटक रहे हैं..वो स्वयं सुखस्वरूप होता है ! उसकी एक निगाह मात्र से फिजा में खुशियाँ छा जाती है इतना वो महान हो जाता है ! ऐसा नहीं है कि उसके शब्दों से ही लोगों को सुख मिलता है..शब्दों के पीछे उसकी अपनी स्वानुभूति की किरणें होती है न ! निगाहों के पीछे उसकी अपनी रौनक होती है न !

भांग का ग्लास भर के कान पर लगाया एक मवाली ने..पूछता है कि अरे भांग तुझमें इतना नशा कहाँ से आया ? भांग बोलती है कि मावली मुझमें नशा होता तो ग्लास भी नाचता!  और छानने वाला कपड़ा भी नशे में चूर हो जाता , और जिससे घोटा वो डंडा भी नाचने लगता। मुझमें नशा नही, नशा तो तेरा है , तू ही मेरे को नशा दे रहा है !

एक आदमी

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पीठावाला माना दारू जो बेचते थे न उसको  पीठावाला बोलते थे। समझा क्या?

Sindhi

एक दारू का पीठावाला था उसके पास एक पैसा ले गया..कि शराब दे दे। पीठावाला ने देखा कि

एक पैसे में शराब | बोला- “अरे क्यों एक पैसे का खून करता है ?” एक पैसे की हत्या क्यों करता है ? संभाल के रख !

एक पैसे का शराब लेकर एक पैसे का घात क्यों करता है,संभाल के रख जेब में ! बोले नही, घात नही करता एक पैसे की शराब चाहिए।

बोले, एक पैसे की शराब से नशा तो नही चढ़ेगा !

उसने बोला मेरे को नशा थोड़े ही चढ़ाना है, खाली मूछों को लगा दूँगा, लोगों को आएगी गंध, नशा तो हमारा अपना है ! नशे की आँखे बना लूँगा, नशा तो अपना है ! शराब में नशा थोड़े ही है, नशा तो अपना है ! शराब में नशा होता तो बोतल को भी चढ़ता ! शराब में नशा नहीं, नशा अपना है ! अपनी चेतना का नशा है न ! मुर्दे के मुँह में डाल दो शराब तो क्या नशा चढ़ेगा ? पुतले के पेट में भर दो शराब तो क्या नशा चढ़ेगा ? शराब को नशा देने वाले भी तो हम हैं ! शराब को बनाने वाले भी तो हम हैं | तू एक पैसे की दे दे हम मूछों को लगा देंगे । बस ! अपना कलेजा क्यों खराब करे ? जब शराबियों की महफ़िल में जाना है तो बोलेंगे हम तो यार पीके आये हैं फूल हैं |

मजा आ गया क्या ? या आपकी वृत्ति को मजा आया ! जय जय ! शराबी की वृत्ति आपको जरा जँच गई तो उसकी वृत्ति आपकी वृत्ति एक हो गई…मजा आया ! तो मजा कहाँ से आया ? मजा आपको अपना आया ! जय जय ! तो तुम जहाँ जहाँ सहमत हो जाते हो वहाँ किरण भेज देते हो और बोलते हो अहाहाहा

Sindhi ये बात में मजा आया

किरण जहाँ से स्फुरित होती है उसमें बैठने की तरकीब नहीं !

Sindhi

पुजारी तो केशुभाई से पगार चाहता है।

पगार तो ट्रस्टीओं की तरफ से मिलता है

Sindhi

 

ईसा, मूसा को मानो ईसा को मानो..अरे ! ईसा क्रॉस पे चढ़ा था, एक लाख आदमी उसको देख रहा था  जिंदा जी ईसा को ..तभी भी उनका वैर, लोभ, क्रोध नही मिटा, दुःख नही मिटा, क्रूरता नही मिटी .. मोह,लोभ नही मिटा तो अभी ईसा को मानके क्या झक मरेगा ? राम जिसकी गोद में खेले है ऐसे कौशल्या और दशरथ को ,कैकई को, मंथरा को …मंथरा ने राम को देखा है, कौशल्या ने गोद में खिलाया है..फिर भी कौशल्या के दुःख का अंत नही दुःखी है..राम बनवास होता है तो दुःख है।दशरथ को काम दुःखी कर रहा है ,कैकेई को क्रोध दुःखी कर रहा है, मंथरा को कपट दुःखी कर रहा है..रामजी के तो दीदार थे ही ! लेकिन श्रीराम तत्व का दीदार नही था ! राम ब्रह्म परमारथ रूपा…

ये नही जानते थे ! कृष्ण को तो कंस ने भी सुना था , कंस का तो भांजा था श्रीकृष्ण। फिर भी शोषण वृत्ति नही गई कंस की ! कृष्ण के प्रागट्य के बाद भी कंस टैक्स डालने में तो लगा ही था ! ये वृत्तियों के ..वृत्तियों से जो चीज मिलती है उसके अनुरूप वृत्ति बन जाती है तो उसी का लोभ बन जाता है। यश वाले को यश  की भूख बनी रहती है, धन वाले को धन की भूख बनी रहती है, सत्ता वाले को सत्ता की भूख बनी रहती है, और छूट न जाए वो भय भी बना रहता है। और नही मिली तो आकांक्षा भी बनी रहती है। तो लोभ,भय और आकांक्षा जिसके पास मौजूद है वो निर्दुख कैसे ? निश्चिंत कैसे ? निर्द्वंद्व कैसे? मौत जिसके सिर पर नाँच रही है ..वृत्तियों का मजा लेगा तो शरीर में बैठ के रहेगा ..शरीर कोई अमर नही है! वृत्तियों का मजा लेना है तो इंद्रियों से ..वृत्ति इन्द्रियों के द्वारा बाहर आएगी और पकड़ेगी तब..तो पकड़ने का साधन तो सदा रहेगा नही ! सत्ता को पकड़े रखो

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छुटा है, छुटे हुए भी पकड़ा है । सब छोड़ दिया फिर भी सबको सत्ता तुमही दे रहे हो। सबको पकड़ा है फिर भी अंदर से किसी में आसक्ति नही..ऐसा दिव्य ज्ञान पा लो ! निश्चिंत, निर्द्वंद्व , निरालंब …

अष्टावक्र ने कहा –

निरालंब शोभते बुद्ध…

बुद्ध पुरुष जो है वो  निरालंब है, उसको कोई अवलंबन नहीं । इसलिए वो शोभता है। अपनी वृत्ति को अवलंबन चाहिए

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कुछ न करो तो सो जाओ, सोने के लिए भी नींद का अवलंबन चाहिए । मित्र का अवलंबन चाहिए, आइसक्रीम का अवलंबन चाहिए, कुछ न कुछ अवलंबन चाहिए । ज्ञानी होता है उसको कुछ वस्तु के अवलंबन की जरूरत नहीं । निरालंब शोभते बुद्धा…

अष्टावक्र गीता में आता है…बिना अवलंबन के शोभता है , निर्वासनिक,निर्द्वंद्व..और ये कठिन भी नही है , सरल भी नही है ! स्थूल वृत्ति वाले के लिए सरल भी नहीं है। और जिसको सद्गुरु की कृपा मिल रही है और बुद्धिमान है, श्रद्धालू है उसके लिए कठिन भी नहीं !

जैसा वृत्ति बन जाती है उसीके अनुरूप मजा तो आता है ..भजन

वर्तमान में टिको


 

मोह आगे और पीछे धकेल देता है।लेकिन विवेक वर्तमान में ,अपने साक्षी में, अपने अंतर्यामी प्रभु में.. विवेक अपने परमात्मतत्व की स्मृति कराने में सहाय् देता है। ध्यान करते समय भी ऐसा कभी न सोचें कि मेरा भविष्य में ये होगा अथवा भूतकाल में ये हो गया..नहीं ! अगड़म-बगड़म स्वाहा !..इधर उधर की बात स्वाहा ! “अभी मैं मेरे राम में आराम चाहता  हूँ ! अभी मेरे चैतन्य स्वरूप में, सोहं स्वरूप में, निज आत्मा में मैं परितृप्त हो रहा हूँ ! मैं शांत चेतसा हूँ ! “

ऐसी प्रज्ञा अपने शांत स्वरूप की, अपने आत्म स्वरूप की स्मृति जगानी होती है। सुनसान बैठना नहीं होता है अथवा भूत और भविष्य की जाल बुनने में समय खराब नही करना होता है। वर्तमान में स्थित होने के लिए वर्तमान तत्व में, वर्तमान देव में , अंतर्यामी  में, अपनेआप मे जगना है । जो भूत की और भविष्य की कल्पना करता है , चिंतन करता है उसे अपनी स्मृति आ जाए तो भूत और भविष्य की मुसीबत पैदा करने वाली जो कलना है वह शांत हो जाए। हे रामजी ! इस जीव को एक महा व्याधि लगी है..कलना, फुरणा, अविद्या, माया ये महारोग लगे है। और उसी फुरणे का ही नाम है.. भूत और भविष्य के फुरणे का नाम ही कलना है। ज्यों ज्यों कलना शांत होती है, त्यों त्यों जीव निष्कलंक होता है । ज्यों-ज्यों कलना शांत होती है, त्यों-त्यों वो अपनेआप में ओज, बल, तेज पाता है। ज्यों ज्यों कलना में बहता है त्यों-त्यों अपने को पापी,अपने को दीन हीन, दुःखी, लाचार, मोहताज महसूस करता है। ज्यों-ज्यों  कलना शांत होती है और अपने निष्कलंक वर्तमान आत्मा में जगता है,त्यों त्यों अपने को प्रसन्न, सुखद, बलवान और स्वावलंबी बनाता जाता है।

भूतकाल की व्यक्तियों, वस्तुओं, पदार्थों के चिंतन की धारा या भविष्य में मिलने की कुछ आकांक्षा अभी वर्तमान में कंगाल बना देती है। तुम अभी वर्तमान में शहंशाह हो जाओ तुम्हारा भविष्य मधुर हो जाएगा। भूतकाल बीत गया उसमे कलना की धारा में बह मत जाओ। कलना को कलना समझकर निष्कलंक आत्मा का चिंतन करते ओमकार की पावन गूँजन करते रामनाम का पवित्र स्मरण करते, सोहम् शब्द का अनुसंधान करते, अजपा गायत्री विकार दण्डोदेय अजपा जाप तुम्हारे जीवन के विकारों को हरने का सामर्थ्य रखता है। शासोश्वास को कभी निहारा.. वर्तमान में ..तो विकारी आकर्षण दूर हो जाता है, विकारों के बीच रहते हुए भी निर्विकारी आत्मा में प्रीति होने लग जाए तो बेड़ा पार हो जाता है, कल्याण हो जाता है !

सूर्योदय के बाद सोने वाला अथवा सूर्य अस्त के समय सोने वाला अथवा दिन को नींद निकालने वाला व्यक्ति अपनी आयुष्य नाश करता है। ऐसे ही सूर्योदय के पहले उठने वाला और रात्रि को दूसरे प्रहर आराम करनेवाला, तीसरे प्रहर आराम करनेवाला और चौथे प्रहर अपने वर्तमान देव में जगनेवाला व्यक्ति अपनी दीर्घ आयुष्य भोगता है । गीले पैर भोजन करनेवाला व्यक्ति अपनी दीर्घ आयुष्य भोगता है । लेकिन गीले पैर सोना नही चाहिए, झूठे मुँह सोना नही चाहिए, मलीन होकर नही सोना चाहिए । हाथ पैर धोकर, पोंछकर, शुद्ध होकर सोना चाहिए। जैसे नींद लेनी है तो शरीर की शुद्धि की जरूरत है ऐसे ही समाधि सुख लेना है तो हल्के विचारों को हटाकर दिव्य विचारों से अपने चित्त को स्नान करा लो तब तुम ध्यान में, साधना में जप में शीघ्रता से सफलता को पाओगे । तुम स्नेह करते जाओ, तुम्हारी वर्तमान स्मृति को जगाते जाओ , देखो मन कहाँ जा रहा है ..या तो भूतकाल के चिंतन में होगा या तो भविष्य की कल्पना जाल बुनेगा। उसको देखो और कह दो कि अब मैं तेरी चोरी जान गया हूँ ौ।

हजारों तीर्थ कर लें, सैंकड़ों मंदिर, मस्जिद , गिरजाघर भेठ ले लेकिन जबतक वर्तमान देव में नही जगेगा, भूत और भविष्य की धारा में बहता रहेगा तबतक उसके जीवन की आध्यात्मिक वीणा नही बज सकती। आध्यात्मिक वीणा, जीवन की वीणा सुननी हो , तो जीवन के होते सुनी जाती है। वीणा सुननी हो तो भविष्य पर नहीं है, भूत पर नहीं है, वीणा अभी बज सकती है…सोहम् की वीणा सतत बज रही है, साक्षित्व की वीणा सतत बज रही है, प्रेम प्रसाद की वीणा सतत बज रही है, तुम्हारे राम की वीणा सतत बज रही है और उसीकी सत्ता लेकर तुम्हारी दिल की धड़कने चल रही है ! तुम्हारा देव आकाश, पाताल में नही …

प्रेम पपीहा तब लिखूँ जब पिया हो परदेस  

तन में,मन में, जन में ताको क्या संदेश ?

बिछडे हैं जो प्यारे से दरबदर भटकते फिरते है

जिसका आनंद , जिसका सुख बाहर है …

कुछ खाकर, कुछ देखकर कुछ भोगकर सुखी होने की जिसके जीवन में गलती घुसी है वो भले ही दरबदर लोक लोकांतर में कभी स्वर्ग में तो कभी बिस्त में, कभी पाताल में तो कभी रसातल में तो कभी तलातल में, कभी इन्द्रियों के दिखावटी सुख में तो कभी मन के हवाई किल्लों के शेखचिल्ली किल्लों में उलझने के उन टकरावों में आदमी टक्कर  खाते खाते थक जाता है और पाता है कि मैं चल नहीं सकता ..मेरा काम नही ईश्वर की तरफ चलना !..अरे ! मनुष्य जन्म मिला है , ईश्वर शांति पाना तुम्हारा जन्म सिद्ध अधिकार है , ईश्वर की तरफ चलने के लिए ही तुम्हारा अवतार हुआ है , ईश्वर तत्व का सुख पाने के लिए ही तुम्हारे पास बुद्धि और श्रध्दा है ! नही कैसे चल सकते ? असंभव नही.. यही काम आप कर सकते है ! दूसरे काम में तो सदा के लिए आप सफल हो भी नही सकते ! संसार में हर क्षेत्र में सदा सफल होना कठिन है लेकिन ये जो  सदा तत्व है उसमें एक बार ठीक से जम गई बात तो फिर सदा सफल ही सफल है !तो सावधान रहें…भूत और भविष्य की कल्पनाओं में अपने को न बहने दे ! भजन करते है भगवान का..भगवान आ जाए, और पूछे -बोलो…बोले-महाराज, पत्नी बीमार है ठीक हो जाए ..अथवा ये हुआ तो ये हो जाए । आपने भगवान से लेना कुछ तरकीब नही सीखा। तुम अगर भगवान तत्व में विश्रांती पाए हुए हो तो ये छोटी छोटी बातें… तो तुम्हारी बुद्धि तेजस्वी होने से उसका सोलुशन अपनेआप निकलेगा ! छोटे छोटे प्रोब्लेम तो अपनेआप समेटते जाएँगे, विदा होते जाएँगे.. तुम वर्तमान में टिकते जाओ तो !

पति कहने में चले , पत्नी कहने में चले , छोरा कहने में चले , शरीर मे रोग न हो, भोग मिलते रहे ये जो कल्पनाएँ है वो तुम्हारे वर्तमान के खजाने को लूट लेती है और कंगाल बना देती है। अभी इतना है, यहाँ हूँ और फिर इतना पाऊँगा और वहाँ पहुँचूँगा तब सुख होगा…नहीं ! जो जहाँ है, जिस समय है, वहाँ अपने सुखस्वरूप को स्मरण कर ले.. बेड़ा पार हो जाएगा! जो वस्त्र घर में मिले स्वाभाविक पहन लो, जो भोजन बने सादा सुदा वो खा लो,जहाँ नींद आए सो जाओ । ऊँचे महलों की कल्पना न करो और सुहावने बिस्तर सजाने की जरूरत मत बनाओ जरूरत बनानी है तो भूत और भविष्य की चिंतन की धारा को तोड़कर निश्चिंत तत्व में आराम पाना और जितने निश्चिंत.. एक विचार उठा.. भूत का या भविष्य का ..दूसरा उठेगा उसके बीच की अवस्था वो परमात्म अवस्था है, वो चैतन्य अवस्था है, वो साक्षात्कारी घड़ियाँ है। उसमें जो सदा जगे है वो भगवान है,जो जगने का प्रयत्न करते है वो साधक है और उसका जिनको पता ही नहीं है, वे सरकती हुई चीजों में उलझने वाले संसारी है।फिर चाहे वो संसार की चीज इस पृथ्वी की हो चाहे किसी लोक लोकांतर की हो , लेकिन है सब संसार ! जो सरकता है उसको संसार बोलते है । और देखो जरा सावधानी से देखो  प्रारम्भ में थोडा सा ही कठिन लगेगा लेकिन फिर बहुत आसान हो जाएगा और सारी कुंजियाँ तुम्हारे हाथ लग जाएगी। देखो मन भूत में जा रहा है कि भविष्य में जा रहा है..जरा बारीकी से देखो ..अभी क्या है ? जाने को सोचता है तो भावी में जा रहा है कि भूत में जा रहा है..कल ऐसा ऐसा था-कि भूत में जा रहा है, पहले ऐसा ऐसा था-कि भूत में जा रहा है, अभी ऐसा ऐसा होगा, भूत में जा रहा है …उसको देखो की ..ऐ ! भूत में जाने वाले, ऐ भविष्य में गिरने वाले ! अभी वर्तमान में जरा … । तो भविष्य में और भूत में जो कल्पनाएँ गिरती है आप अपनी स्मृति जगाइए ! स्मृति जग गई प्रभु मिल गए ! स्मृति जग गई प्रभु मिल गए ! भूत भविष्य का तो चिंतन होता है ..चिंतन उस वस्तु का होता है जो तुम्हारे पास नही है! जो अभी नही है अथवा तुम्हारे से दूर है उसका चिंतन होता है। चिंतन उसका होता है जो तुम नही हो ! ध्यान दें…जो तुम नहीं हो उसका चिंतन होता है! जो तुम हो उसकी स्मृति होगी ..तुम नहीं हो उसका चिंतन होता है..ध्यान से सुने ,आँखे खोलकर सुने…जो तुम नही हो उसका चिंतन होता है, जो तुम्हारा नही है उसका चिंतन होता है। शरीर की वस्तुओं का चिंतन होगा लेकिन तुम्हारा जो प्रियतम है उसका चिंतन नहीं होता। जो लोग भगवान के विषय में दयालू है ..भगवान ऐसे है,भगवान चतुर्भुजी है ,खुदा ऐसा ऐसा ऐसा…धरम के नाते भगवान की, बिस्त की, इसकी उसकी महिमा करते है वे लोग भी तुम्हारे चित्त में कामनाओं का भूत सँवार कर देते है। जरा बात कड़क लगेगी ..वो कामनाओं का भूत सँवार होते ही आप अपने अच्युत पद की स्मृति की योग्यता खोने लग जाते है । और यही कारण है कि लाखों लाखों लोग धार्मिक है .. लाखों लाखों लोग किसी न किसी भगवान को, देव को, इष्ट को , गुरु को मानते है लेकिन चित्त की विश्रांती पाए हुए लोग, परमात्म प्रसाद को पाए हुए लोग कोई विरले जिज्ञासु ही मिल पाते है दूसरे नही।

कल हम लोगों ने सुना कि शिष्य के चार लक्षण है। शरणागत हो.. माना गुरुतत्व के , गुरुदेव के विचारों के अनुगामी होकर  ,गुरु के अनुभव का अनुगामी होकर शरणागत होना माना उनके पीछे पीछे चलना । और श्रोत्रिय ब्रम्हवेत्ता सच्चे गुरुओं को तुम्हारे बाह्य वस्तुओं की इतनी आवश्यकता नही होती तुम्हारे बाह्य प्रणाम और पूजा और सत्कार और वस्तुएँ उन्हें वो प्रसन्नता नही देगी जितनी प्रसन्नता…और ब्रम्हवेत्ता की प्रसन्नता प्राप्त करना बहुत जरूरी है ..गुरु की प्रसन्नता हासिल करना समझो ईश्वर के राज्य में जाने का पासपोर्ट और टिकट प्राप्त करना है!

तो वो महापुरुष कैसे प्रसन्न होते है ? कि महापुरुषों को अपना अनुभवगम्य जो सिद्धान्त जितना प्यारा होता है वैसा तो अपना देह भी प्यारा नही होता है। अपने सिद्धांत के लिए सुकरात ने देह बली दे दी। जीजस ने आपने देह की  बली दे दी, मंसूर ने अपने देह की बली दे दी सिद्धांत के लिए। तो सिद्धांत जितना महापुरुषों को अपना प्यारा होता है उतना शरीर भी प्यारा नही होता है। तो महापुरुष जो निर्देश करते है अपने सिद्धांत अपने परमात्मतत्व में वर्तमान में ठहरने को कहते है। आप अगर ठहरने को तत्पर है तो आप ठीक उनको प्रसन्न कर लेंगे।आप उनके बताए हुए नुस्ख़े आजमाकर अपने को ऊँचा उठा लेंगे तो वो आपको सदा प्रसन्न मिलेंगे ! लेकिन आप जान बूझकर भी अपनी पुरानी आदत की धारा में बह जाएँगे उस वक्त गुरु, गुरु मंत्र और गुरु तत्व तुम्हारे हृदय में होता है वो तुम्हे थामता है, रोकता है, संकेत करता  है ! जबतक तुम तुम्हारे गुरु बनकर सच्चाईयों से निकालने को नही डँटते हो तबतक जीवन का दिया जगमगाता नही और ज्यों ज्यों तुम्हारी कमजोरियों को निकालकर तुम आगे बढ़ते हो त्यों त्यों गुरु तुम्हें तुम्हारे इर्द गिर्द विस्तृत मिलेंगे !

मैंने सुना किसी ग्रन्थ में कि कोई भूल हो जाती है तो प्रायश्चित करना पड़ता है । ग्लानि नही…हाय हाय ..पश्चाताप करके ग्लानि नही …लेकिन स्नान ,संध्या, प्राणायाम आदि करके जप अनुष्ठान करके उस पाप का निवारण किया जाता है। जहाँ जहाँ पे ग्लानि या खिन्नता या चित्त मलीन हो ऐसी जब घटनाएँ ,ऐसा वातावरण हो जैसे रस्ते पे जाते है कोई गंदी वस्तु दिखी, चित्त मलीन होता है, उस वक्त सुर्यनारायण का दर्शन , गुरु मंत्र का जाप ,भगवद दर्शन, अग्नि दर्शन ये उस रास्ते की ..कहीं केय पड़ी है, कहीं मरा ढोर का कुछ चमड़ा वमडा पड़ा है, कहीं कुछ पड़ा है गंदी वस्तु, तो चित्त तुम्हारा थोडा उद्विग्न होता है । तो उस वक्त उद्विग्नता का भाव तुम्हारे चित्त में आते ही तुम्हारी इन्द्रियों पर, तुम्हारे मन पर बुरा असर न पड़ जाय इसलिए वहाँ ऐसी स्मृति करनी पड़ती है देव की, गुरुमंत्र की । और जो प्रायश्चित है वो मंत्र जाप करनेसे प्रायश्चित हो जाता है , गुरुमंत्र का जाप करनेसे प्रायश्चित हो जाता है । लेकिन गुरुमंत्र के त्याग के पाप का कोई प्रायश्चित नही ! गुरुमंत्र के त्याग का प्रायश्चित  नही ऐसा मैंने कथा शास्त्र में सुना।

दूसरा-आत्म प्रशंसा

अपने व्यक्तित्व, अपने देहाध्यास की , अपने स्वरूप की प्रशंसा ..जैसे वशिष्ठ बोलते है – मैं समर्थ गुरु हूँ…हे रामजी शिष्य में जो सद्गुण चाहिए वो तुम्हारे में है और गुरु में जो अनुभूति चाहिए वो मेरे में है।

श्रीकृष्ण बोलते है सब कर्मों को छोड़ मेरे शरण आ जा ,मैं सब पापों से तुझे मुक्त कर दूँगा।

ये प्रशंसा वो क्षुद्र “मैं ” नही है , ये तो वास्तविक स्मृति है अपने स्वरूप की ! ये देह का चिंतन होकर नही बोला जा रहा है , अपने स्वरूप की स्मृति जग रही है ये अनुभूति बोली जा रही है !

हम जब बोलते है अहं ब्रम्हास्मि – मैं ब्रम्ह हूँ.. तो मैं अहं पर जोर है कि ब्रम्ह पर जोर है ? देह की अहं को लेकर बोलते है कि वास्तविक “मैं” को जानकर बोलते है?  वास्तविक “मैं” को जानना होगा तो भूत और भविष्य की धाराएँ जहाँ से बिखरती है आगे और पीछे उस वर्तमान में उस “मैं” को अपना स्वरूप मानकर “अहं ब्रम्हास्मि” होता है !

तो और पापों का तो प्रायश्चित है लेकिन गुरुमंत्र के त्याग का जो पाप है उसका प्रायश्चित नही है !

सुना है महाभारत का कोई प्रसंग …श्रीकृष्ण और अर्जुन कहीं चले गए थे अश्वथामा आदि  को पकड़ने के लिए कैसा भी कुछ निमित्त से और युधिष्ठिर महाराज को बड़ा श्रम पड़ा युद्ध में । अर्जुन के न होनेसे उनको खूब सहना पड़ा । संध्या हुई जब युद्ध बंद हुआ तो विश्रांती लेने के लिए खूब दूर रथ खड़ा कर दिया अपना एकांत में। अर्जुन और कृष्ण आए देखा कि नियत जगह पर रोज की जगह पर भाई का रथ नही, चिंतित हुए इधर उधर खूब निहारा तब दिखाई पड़ा और पहुँच गए । थके थे जरा खिन्नमना हो गए थे । तो युधिष्ठिर महाराज ने अर्जुन को देखकर ही अपना थोड़ा कोप – धिक्कार है  अर्जुन ! तेरे गांडीव धनुष को ..तेरे होते हुए इतना मेरे को इतना सहना पडे और इतना लाचारी की अवस्था गुजरना पड़े ..जैसे छोटा भाई कहीं जाए और देर करे और बड़ा भाई डाँट दे तो युधिष्ठिर ने डाँट दिया .. धिक्कार है तेरे गांडीव धारण को । महाराज, अर्जुन ने अपना बाण चलाया गांडीव धनुष्य पर। कृष्ण बोलते है कोई शत्रु तो है नही बाण किस लिए चलाता है?

बोले-जिस भाई को मैं पूजता आ रहा था, जिसको पिता तुल्य मान देता था,देव तुल्य निहारता था विवश होकर आज मुझे उनकी हत्या करनी पड़ेगी क्योंकि मैंने कसम उठाई थी कि मेरे गांडीव की कोई निंदा करेगा तो मैं उसका शिरच्छेद कर दूँगा, मेरा प्रण था !

कृष्ण कहते है कैसी बेवकूफी की बात करता है ! युधिष्ठिर जैसे धर्मात्मा भ्राता का तुम ?… 

अर्जुन-“हालाकि ये मेरे भाई है और मै नतमस्तक हूँ इनके आगे ..और ये गुण की खान हैं। ये तो मेरे भाई नहीं मेरे पिता हैं , माता हैं, देव हैं, सर्वस्व हैं लेकिन अब गांडीव धनुष की निंदा किये हैं अब और कोई उपाय बताइये ।”

कृष्ण ने कहा -“प्रतिष्ठित व्यक्ति, श्रेष्ठ व्यक्ति का अपमान भी उसकी मृत्यु है। युधिष्ठिर को तुम तु-कारक बात कर लो तो मानो तुमने उनकी हत्या कर ली ! “

अर्जुन ने कहा (युधिष्ठिर को) -” तेरे को बोला था हम जा रहे हैं अब तू धीरज नही धारा !”

कृष्ण ने कहा बस हो गया ! तूने भाई की मौत कर दी !

आदरणीय व्यक्ति का अनादर करना ये उसकी मौत कर दी। अर्जुन विषाद की खाई में गिरा । फिर उठाया बाण चढ़ाया धनुष पर, (कृष्ण) बोले – अब क्या है.. कौन तीसरा तो कोई दिखता नही ! युधिष्ठिर ही है अकेले आप हम है ..अब क्या ख्याल है ? इधर को लाना है ?

बोले- “नही “

अर्जुन-“जो छोटा भाई होकर बड़े भाई की हत्या कर दे, भ्राता हत्यारा उसको क्या दंड होना चाहिए ?

(कृष्ण)- उसको मृत्यु दंड होना चाहिए

तो मृत्यु दंड का प्रायश्चित्त वहाँ (मरने के बाद) जाकर करे और मरे.. वहाँ यमराज के वहाँ भोगे ?.. उससे मैं अपने आप का मृत्यु कर देता हूँ , मृत्यु दंड भोग लेता हूँ, अपने आप की हत्या कर देता हूँ , अपने आप को बाण लगा देता हूँ । “

कृष्ण ने फिर समझाया – जो भूत और भविष्य की कल्पनाओं में उलझते है …और वर्तमान में जो व्यक्ति जगे हैं, जगे हुए व्यक्तियों के लिए बड़ा श्रम पड़ता है कि अज्ञानियों के बीच उनको ज्ञान कराने में न जाने वो कहाँ कहाँ धक्केलेगा ! अर्जुन जैसा व्यक्ति जब कभी इधर जाता है तो कभी उधर जाता है ,कृष्ण पकड़कर मैदान में लाते है , वो फिर भविष्य में जाता है। पहले अर्जुन भूत में गया – मेरी शपथ..मेरे गांडीव का कोई अनादर करेगा उसका शिरोच्छेद करुँगा.. पहले की मेरी शपथ ..और फिर ..फिर मरने के बाद  प्रायश्चित करना पड़े ? अभी अपने को दे !

अज्ञान जबतक है तबतक आदमी वर्तमान में आने को ही..उसको टाइम ही नही मिलता बेचारे को !

ज्यों अपने को मारने को तत्पर हुआ त्यों फिर श्रीकृष्ण ने उपदेश दिया, समझाया, डाँटा । तो बोले- नहीं कोई उपाय बताओ इस प्रायश्चित्त का !

बोले-अपनी प्रशंसा खुद कर ले..आत्म श्लाघा कर ले.. इसका कोई प्रायश्चित्त नही ! वो आत्महत्या का पाप ही लगता है !

मैं ऐसा मैं ऐसा,  मैं ऐसा….मैं ऐसा मैं ऐसा का देहाध्यास से जो मैंने ये किया, मैंने वो किया,मैं ऐसा हूँ ऐसा जो अहंकार है वो सचमुच में आत्महत्या कर देता है ! अपने आत्म भाव को जगाने पर तो पर्दे डाल देता है ! “मैंने ये किया” ..क्या किया? तो आप दो हाथ पैर वाले हो गए ! ..”मेरा ये है,मेरा वो है ,मैंने इतना किया,मैंने ये किया “..तो ये जब गहराई से आप सोचते है,बोलते है तो ये आत्महत्या करते हैं !

इसीलिए कृपानाथ जब ऐसा बोलने का मौका मिले, सोचने का अवसर आए तो उस समय तुम अपनी स्मृति भी याद रखना कि मैं मैं मैं ने अपने सोहं स्वरूप को तो जाना नही ..किया सब इसने !..इसने माना देह ने, इन्द्रियों ने, मन ने किया .. देह से बॉडी से हुआ, इन्द्रियों से हुआ ..मुझ चैतन्य में करना धरना नही ! सोहम् ! …आप आत्महत्या के पाप से बच जाएँगे ! आत्मश्लाघा के पाप से बच जाएँगे और आप सचमुच में निष्पाप होने लगेंगे ! जिसने अपने आत्मा की हत्या, अपने शुद्ध स्वरूप का अनादर किया ..रामतीर्थ बोलते है कि शास्त्रों में कईं प्रकार के पापों का वर्णन आता है कि ये पाप है तो उसका प्रायश्चित्त ये है । कोई मातृ हत्यारा है , कोई बिल्ली मार लिया ,किसीने  कुत्ता मार दिया, किसीने घोड़ा मार दिया किसीने गधा मार दिया किसीने कीड़ी मार दिया किसीने कुछ मार दिया या हत्या किया उनको तो हम पापी मानते है लेकिन जो अपनेआप चैतन्य परमात्म स्वरूप की स्मृति न करके वो ईश्वर हत्या करने का जिसने पाप किया उसने और कौनसा पाप नही किया ? अपने ईश्वरत्व भाव को जो मार बैठा है उसने और क्या नही मारा ?

और जिसने अपने ईश्वरत्व भाव को जगा दिया उसके द्वारा त्रिलोकी युद्ध में खत्म भी हो जाए तो उसे पाप नही लगता ! उस ज्ञानी को कोई पाप बाँध नही सकता ! और कोई पुण्य ऊपर नही उठा सकता वो ऐसी ऊँचाई को छू लेता है ! और ऐसी ऊँचाई कहीं स्वर्ग में या उधर नही है, ऐसी ऊँचाई यह है कि भूतकाल और भविष्यकाल में जो चिंतन की धारा जाती है वो निश्चिन्त तत्व से उठती है । निश्चिन्त तत्व की स्मृति करना और भूत और भविष्य का प्रभाव अपने ऊपर से हटाना समझ लो कि सब साधनाओं का मूल पाना है ! सारी सफलताओं का मूल पाना है ! केवल ये नुख्सा भी आ जाए और आजमाएँ तो काम बन जाए !  हम माला करते है कभी भी देखो कि या तो भूत पर है ..आशा किये है कि माला करेंगे अनुष्ठान सिद्ध होंगे कोई आएगा !..होता है न ? कुछ धड़ाखा- भड़ाखा होगा , कुछ होगा !.. नही ! कुछ होनेवाला नही है और जो होगा वो होकर खत्म हो जाएगा ! माला भी करे तो स्मृति जगाने के लिए ! वर्तमान में टिकने के लिए माला हो जाए !तो बेड़ा पार हो जाएगा !

मैंने कहा था कल कि कोई कपड़े ऐसे होते है कि जिनको खूब सोडा, खार, साबुन और धमाधम की जरूरत होती है। कोई वस्त्र तो ऐसे कि पानी मे से डुबोकर निकाल दो बस ! जैसे शुद्ध वस्त्र है ,रात भर सोए है..चलो तमस के परमाणु हैं , दौड़ के सुखा दो हो गया ठीक ! ऐसे ही थोड़ा बहुत जिनको अज्ञान है , थोडा  बहुत ये है उनको तो जरा सा गुरु कृपा और जरासा उपदेश दो और पार हो जाते है! उत्तम प्रकार का जो शिष्य है, जिज्ञासु है वो तो उपदेश मात्र से तर जाता है ! उपदेश मात्र से जग जाता है ! मध्यम प्रकार का है.. वो मनन और निदिध्यासन से..जो उपदेश सुना है उसका बार बार मनन करे और मनन में से तन्मय होता जाए ..निदिध्यासन..तो वो आनंद, वो शांति उसकी प्रगट होगी और प्रगाढ़ होगी तो साक्षात्कार हो जाएगा ! और जो कनिष्ठ है  वो तर्क वितर्क करके भी उपासनाएँ वुपासनाएँ करके और शम दम करके और फिर कहीं कभी जगता है ।

सनातन धर्म में, सनातन साहित्य में वेदांत फिलोसोफी ये आखिरी है ! और सब अपनी अपनी जगह पर कर्मकांड देवी-देवता ये सब ठीक है लेकिन हृदयस्थ के देव को जो जानने की विद्या है वो वेदांत विद्या है ! दूसरे मजहब और मत पंथों में प्रश्न उत्तर को स्वीकार नही ! क्यों?..कि शिष्य प्रश्न करे उत्तर देने की …बौद्धिक क्षमता की कसौटी पर  दूसरे जो ग्रन्थ बने है धार्मिक , बौद्धिक कसौटी की क्षमता पर वो नही उतर सकते लेकिन वेदांत ये कहता है कि शिष्य को अधिकार देता है ..

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ..

शिष्य का अगर महत्वपूर्ण अधिकार है साधक का तो वेदांत जगत में है !…बाकी तो तुम मान लो …खुदा है ..तुम मान लो !…वैकुंठ में भगवान बैठे है तुम मान लो !…सातवे अरब पर खुदा बैठे है ..अरे जरा तो ख्याल करो सातवे अरब पर बेचारे को ठंडी नही लग जाएगी ?  अब तो उसको उतारो अपने हृदय में जगाओ यार ! और अपना जो अहम है उसको सातवें अरब में भेज दो ! तुम ऐसा करो ऐसा करो इतना दान पुण्य इतना नमाज वमाज पढ़ो ,इतने अच्छे आदमी हो जाओ तुम्हें बिस्त मिलेगा ! उसमें में संदेह ना करो , मान लो ! बिस्त में क्या है कि हूरे  हैं, शराब के चश्मे है ..मान लो !..अब शराब के चश्मे उधर ? जय जय !

तो ये उपासनाएँ तो मान्यता से चल जाती है ..अभी थोड़ा संयम कर लिया..ये दुकानदारी है !….अभी इतना इतना दे दो फिर इतना इतना इतना सारा मिल जाएगा ! वेदांत दुकानदारी को नही मानता ! स्वार्थी जीवन की…स्वार्थ की बात नही ..प्रलोभन की बात नही !..वो तो तुम्हें जगा देता है कि तुम अपनी महिमा को जान लो ,तुम अपनी मैं को जान लो ! जो यह है उसको यह रहने दो और “मैं” को ठीक से जान लो !  शरीर “मैं” में आ जाता है गलती से..हकीकत में “यह” है। मेरा हाथ ..तो “मैं” हाथ नही हुआ । यह बाल है । यह क्या है ? बोले मैं हूँ..नही, ये बाल है। तो यह क्या है ? कि ये नाक है। तो यह क्या है ? कि ये हाथ है। तो यह क्या है ? ये पैर है।

ये क्या है ? कि ये पेट है ।यह क्या है ? कि यह कमर है। तो “यह” हो गया कि नही ? यह कमर है ! …फिर संकल्प विकल्प होते है …वो क्या है ? ये क्या है ? कि ये मन है ..मेरा मन ..तो मैं मन नही..मेरा मन..मेरा मन खिन्न है …मेरे मन में ये चिंता हो गई  …अरे मेरे मन में ये चिंता हो गई ऐसा जानकर ही तू निश्चिंत हो जा यार अभी चुटका बजा ले!

मुझे प्रॉब्लम हो गया ..तुझे कभी कोई प्रॉब्लेम छू नही सकता ! जब प्रॉब्लम होता है तो तेरे भूत और भविष्य के चिंतन में ही प्रॉब्लम होता है ! और आप नही चाहते तभी भी ये चिंतन होता रहता है ।क्योंकि आदत पुरानी है और मन का स्वभाव भी है ! तो चिंतन होता रहता है इसलिए चिंतन में धाराएँ बढ़ जाती है तो स्मृति नही जगती !

योग, शास्त्र, प्राणायाम आदि ध्यान आदि कराके पूर्व और भूत और भविष्य के चिंतन से हटाकर वर्तमान में ठहराता है। कर्मकांड मलीन चिंतन और मलीन क्रिया से बचाकर फिर सात्विक में लगाता है। धर्म तुम्हारी वृत्ति को सात्विक बनाता है।उपासना तुम्हारी वृत्ति को सात्विक बनाती है। लेकिन जो वेदांत ज्ञान है वो तुम्हारी वृत्ति को उद्गम स्थान का बोध कराके तुम्हें वृत्ति के पार अपने स्वरूप में जगा देता है। इसीलिए

शावक गर्जन्ति शस्त्राणि जम्बुका विपनेय

न गर्जन्ति महाशक्ति वेदांते ????

बाकी के सियार और पशु, वन प्राणी तबतक जोर मारते है वट दिखाते है जबतक कि सिंह नही गरजा और सिंह की गर्जना होते ही सब पूँछ दबा के    कहाँ चले गए पता नही ! ऐसे ही जीवन में आत्मज्ञान के विचार आने के बाद सारे इधर उधर के विचार कहाँ चले गए, आकर्षण और दबाव कहीं पता नही चला ! इसीलिए जीवन में शेर के विचार लाओ, वेदांतिक विचार लाओ । जब भूतकाल की चिंतन धारा हो ,भविष्य की चिंतन धारा हो .. वर्तमान में क्या है ? अभी तो यार मजे से बैठ कल की बात कल ! आनेवाले कल की बात आनेवाले कल पर !

तो उसका मतलब ये नही कि तुम्हारा व्यवहार, व्यवहार उच्छलंक कर दो बसआलसी हो जाओ.. नहीं… तुम अपने चित्त को वर्तमान में डंटाए रखो और बाकी स्वाभाविक प्रवृत्ति होगी। एक बात और ध्यान देने योग्य है। तुम्हारे काम में वर्तमान की व्यक्तियाँ आती है। तुम्हारे काम में वर्तमान की वस्तुएँ आती है । न भविष्य की वस्तु तुम्हारे काम में अभी आती है ..न भविष्य में होनेवाले व्यक्तियों के..और अपने पुत्र परिवार वाले । भविष्य में होनेवाले भी तुम्हारे काम में नहीं आते और भविष्यवाले भी तुम्हारे काम नहीं आते और भूतवाले भी तुम्हारे अभी काम में नहीं आते । तो जब-जब तुम्हें काम लेना होता है तुम्हारे काम हमेशा वर्तमान की वस्तुएँ आती हैं, वर्तमान के व्यक्ति आते हैं, वर्तमान के ही साधन तुम्हारे काम आते हैं कि भूतकाल के आते है ? नही ! अभी जो तुम्हारे पास है वोही तो काम आएँगे ! भविष्य में जो बनेंगे वो अभी तो काम नहीं आएँगे । तो हमेशा आपको काम तो वर्तमान की वस्तुयें आती हैं, काम तो वर्तमान के व्यक्ति आते हैं , काम तो वर्तमान ही आता है। उसके बिना तो काम चल नही सकता, तो जो वर्तमान में तुम्हारे काम आता है उसका तुम सदुपयोग करो तो भविष्य का टेंशन … क्या करें लड़की बड़ी है इसीलिए टेंशन करना पड़ता है.. लड़की सोचती है मेरी उम्र हो गयी इसलिए टेंशन.. अच्छा टेंशन से अगर काम बन जाता तो सारे टेंशनवाले आदमी आपके काम के हो जाते ! नही ..वर्तमान में जो ठीक है उसकी सूझ बूझ ठीक होती है तो उसका भविष्य भी आता है तो वर्तमान होके आता है ।भविष्य भी आएगा..कल जो आएगा वो भी आज होके आएगा न ! आज शनि है कल रवि है, लेकिन रवि को जब होंगे तो वो रवि कल रहेगा क्या ? रवि भी आज होकर आएगा।तो आज होके जो आना है उसको आज में जीने की कला सीख ले !ऐसे ही ध्यान भजन में बैठते है न तो ये मिलेगा ये होगा,ये करूँगा,ये किया है ऐसे विचार उठे तो अगड़म दगड़म स्वाहा ! ऐसा किया, आप फिर ठहर जाएँगे वर्तमान में ठहरेंगे लेकिन टिकेंगे नही ,आदत है ! फिर इधर उधर आ जाए ..इसका थोडा सा बारीकी से आप विचार करेंगे अनुसंधान करेंगे न तो आपकी वो जो गैप है धारा थोडी बढ़ जाएगी ! एक संकल्प उठा दूसरा उठने को है उसके बीच की जगह बढ़ जायेगी वो बढ जाना ही परमात्मा में स्थित होना है ! और वो अगर 3 मिनट रह जाए तो महाराज निर्विकल्प समाधि हो जाएगी ! केवल 3 मिनट, खाली 3 मिनट ! साक्षात्कार हो जाएगा ! जो ईश्वर का अनुभव है वो तुम्हारा अनुभव हो जाएगा , जो कबीर का अनुभव वो तुम्हारा अनुभव जो समर्थ रामदास का अनुभव वो तुम्हारा अनुभव ! जितने ज्यादा उसमें टिके उतना सामर्थ्य बढ़ जाएगा !

 

साँप मर गया, नेवला वहीं रह गया !


आत्मा पर आवरण क्या है ? असलियत यह है कि आत्मा पर कोई आवरण नहीं है। वह तो नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त ब्रह्म ही है। परंतु बहुत सारी बातें आपके मन में बिना सोचे-समझे बिठा दी गयी है, साँप को भगाने के लिए आपके मन में नेवला को लाकर बैठा दिया गया है।

पंचतंत्र की यह कहानी आपने सुनी होगी। एक पेड़ पर बहुत सी चिड़ियाँ रहती थीं। उस पेड़ के नीचे एक साँप रहता था। वह चिड़ियों के अंडे-बच्चे खा जाता था। चिड़ियों की पंचायत हुई। उन्होंने तय किया कि ‘साँप को मारने के लिए नेवला बुलाया जाय।’ नेवला आ गया। नेवले को देखकर साँप तो भाग गया किंतु नेवला वहीं रह गया। अब वही नेवला चिड़ियों के अंडे-बच्चों को खाने लगा। भक्षितोऽपि लशुने न शान्तो व्याधिः। एक तो लहसुन खाया और रोग भी नहीं मिटा ! नेवला तो आ गया पर अंडे-बच्चे बचे नहीं। इसी प्रकार देहाभिमान को छुड़ाने के लिए शास्त्रों ने बहुत सारे उपाय बताये परंतु एक गया, दूसरा आता रहा। रोग बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की !

श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई।

छूट न अधिक अधिक अरुझाई।। (श्रीरामचरित. उ.कां. 116.3)

आपको चाहिए था सुख। किसी ने कह दिया कि ‘विषय-उपार्जन करो तो भोग-सुख मिलेगा।’ अब विषयों का उपार्जन किया, भोग सुख तो मिला किंतु ‘मैं विषयी और विषयों का भोग करके सुखी होऊँगा’ यह संस्कार शेष रह गया। अब भोग सुख में भी होड़ लगी। प्रजा के भोग से कम सुखी, राजा के भोग से अधिक सुखी, इन्द्र के भोग से और अधिक सुखी ! न जाने किस अशुभ मुहूर्त में हमें भोक्ता बनाया गया और हम भोक्ता बन गये। इसी का नाम ‘पाप’ है। गाली देने का, किसी को मारने का, किसी का माल लेने का नाम ‘पाप’ है, यह तो आप जानते हो परंतु ‘हम भोगी हैं’ ऐसा अपने को मानने का नाम भी ‘पाप’ है – यह आपके दिमाग से निकल गया। ‘हम भोक्ता हैं’ – यह पराधीनता का पाप ही हमारा आवरण बन गया।

हमें नहीं मालूम कब अनजाने में हमने अपने-आपको कर्ता मान लिया। हम कर्म के पराधीन हो गये। ‘कर्म नहीं करेंगे तो हम बंधन से नहीं छूटेंगे’ – यह ग्रंथि बन गयी। और ज्यों-ज्यों बंधन से छूटने के लिए कर्म करते गये, त्यों-त्यों रेशम के कीड़े की तरह फँसते चले गये। यह अपने को कर्ता मानना ‘पाप’ है।

कर्तापन-भोक्तापन पाप है। अपने को जन्मने-मरने वाला मानना पाप है, जन्म-जन्मांतर में लोक-लोकांतर में भटकने वाला मानना पाप है। ‘यह पाप है, वह पाप है’ यह तो आपको सिखाया गया परंतु ‘मैं पापी हूँ।’ – यह मानना भी पाप है, यह नहीं सिखाया गया। पर्दे-पर-पर्दे पड़ते गये।

एक नासमझीरूपी सर्प को भगाने के लिए समझरूपी दूसरे नेवले को लाया गया, दूसरी नासमझी को हटाने के लिए तीसरी समझ और तीसरे सर्प को हटाने के लिए तीसरी समझ और तीसरे सर्प को हटाने के लिए चौथा नेवला आया परंतु हर बार साँप मर गया, नेवला वहीं रह गया। अरे ! आप न कर्ता हैं न भोक्ता हैं, न संसारी हैं न परिच्छिन्न हैं। आप टुकड़े नहीं हैं, कतरा नहीं हैं दरिया हैं, बिंदु नहीं हैं सिंधु हैं-

बिंदु में सिंधु समाहिं सुनि कोविद1 रचना करें।

हेरनहार2 हिरान3, रहिमन आपुनि आपमें4 ।।

1 विद्वान 2 खोजने वाला 3 खो गया 4 अपने-आप में।

आप कोई साधारण वस्तु नहीं हैं। परंतु आपने इस अपने-आपको परमानंदरुपी खजाने पर से अपना हक छोड़ दिया ! बड़ों (महापुरुषों) पर विश्वास नहीं किया, ज्ञान के लिए प्रयत्न नहीं किया, आवरण का भंग नहीं किया, इसको (परमानंदरूपी खजाने को) अपना-आपा नहीं समझा। केवल मुक्ति की चर्चा करने से मुक्ति नहीं मिलती।

आत्म-तत्त्व को समझाने के लिए कुछ अध्यारोप (वस्तु यानी ब्रह्म में अवस्तु यानी जड़ समूह (देह, मन आदि) का आरोप करना ‘अध्यारोप’ कहलाता है।) किये शास्त्र ने। उसी शास्त्र को हमने सच्चा समझ लिया। तब उसके अपवाद (अपवाद यानि अध्यारोप का निराकरण। जैसे – रस्सी में सर्प का ज्ञान यह अध्यारोप है और रस्सी के वास्तविक ज्ञान से उसका जो निराकरण हुआ यह अपवाद है।) के लिए शास्त्र बने। जितना-जितना अध्यारोप बढ़ता गया, अपवाद के शास्त्रों की संख्या भी बढ़ती गयी। परंतु ब्रह्मज्ञान में समझना यह है कि समस्त अध्यारोपों और उनके अपवादों का जो साक्षी-अधिष्ठान है, वह स्वयं ही है। इसलिए आप अपने पूरे सामर्थ्य, विवेक और बल का प्रयोग करके अपने इस अज्ञान-शत्रु का नाश कर डालिये।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2018, पृष्ठ संख्या 25,26 अंक 311

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