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सामान्य ज्ञान और विशेष ज्ञान


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

ज्ञान नित्य है, अनादि है और अनंत है। ज्ञान का न जन्म होता है न मृत्यु।

ज्ञान दो प्रकार का होता है – एक होता है सामान्य सत्ता का ज्ञान और दूसरा होता है करणजन्य ज्ञान।

सामान्य सत्ता का ज्ञान नित्य है। करणजन्य विशेष ज्ञान सापेक्ष है। वह देश, काल और वस्तु के इर्द-गिर्द मंडराता है। सामान्य सत्ता के ज्ञान से ही करणजन्य विशेष ज्ञान होता है। जैसे सूर्य का प्रकाश सामान्य सत्ता के रूप में है। दर्पण लिया और विशेष दिखा तो यह विशेष की विशेषता सामान्य के आश्रय से ही है।

सामान्य सत्ता का ज्ञान परमात्मा है और करण कहा जाता है इन्द्रियों को। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार – ये अंदर की इन्द्रियाँ हैं, उन्हें अंतःकरण कहा जाता है।  आँख, नाक, कान आदि इंद्रियाँ बहिःकरण कहलाती है।। इनसे (करण विशेष से) जो ज्ञान होता है वह परमात्मा (सामान्य सत्ता के कारण ही होता है।

इन इन्द्रियों के कारण जगत में भिन्नता दिखती है किन्तु जिस सामान्य सत्ता से दिखती है, वह सदा एकरस है तथा उसी का ज्ञान पाना मानव-जीवन का परम लक्ष्य है।

जिस ज्ञान की मौत नहीं होती, जिस ज्ञान का जन्म नहीं होता, वही हमारी आत्मा है और वही परमात्मा है। जब तक उसका ज्ञान नहीं होता तब तक लगता है कि ‘परमात्मा मरने के बाद मिलेंगे… वैकुण्ठ में जायेंगे तब मिलेंगे… गुरु कृपा करेंगे फिर मिलेंगे….।’ परन्तु जब गुरुकृपा हुई और ठीक से जान लिया तो लगेगा कि उसे पाना कितना सरल है !

इतना सरल कि अर्जुन को युद्ध के मैदान में मिल गया, राजा जनक को घोड़े की रकाब में पैर डालते-डालते मिल गया, राजा खट्वांग को दो मुहूर्त में मिल गया और राजा परीक्षित को सात दिन में कथा सुनते-सुनते मिल गया।!

परमात्मा को पाना सरल भी है और कठिन भी। तीव्र, तीव्रतर अथवा तीव्रतम जिज्ञासा तथा छटपटाहट हो व पवित्रता हो और सदगुरु मिल जायें तो बड़ा सरल हो जाता है।

एक छोटा सा विनोदी दृष्टांत है-

बुद्धुसिंह की बड़े घर में शादी हो गयी। उसे दहेज भी खूब मिला। यहाँ तक की सूई भई सोने की मिली। बुद्धुसिंह उस सूई से कढ़ाई करने लगा। कढ़ाई करते-करते सुई हाथ से गिर गयी। संध्या का समय था। वह भागा और बाहर सड़क के किनारे बिजली के खंभे की रोशनी में सूई ढूँढने लगा।

सड़क पर चलते लोगों ने पूछाः

“भाई ! क्या कर रहे हो ?”

बुद्धुसिंह- “क्या बताऊँ ? अभी फुर्सत नहीं है, बाद में बताऊँगा।”

लोगों ने फिर पूछा- “आखिर बात क्या है ?”

बुद्धुसिंहः “मेरी सोने की सूई खो गयी है। मैं किसी साधारण सूई के लिए मेहनत नहीं कर रहा हूँ।”

लोगः “सोने की सूई है तो खोजनी ही पड़ेगी लेकिन यहाँ कैसे गिरी ?”

बुद्धुसिंहः “गिरी तो घर में थी किन्तु उधर दीया जलाना पड़ता, इसलिए इधर ढूँढ रहा हूँ।”

अब यह बुद्धुसिंह की चतुराई है या बेवकूफी कि घर में कौन दीया जलाये ? इससे तो अच्छा है बाहर रोशनी में ही ढूँढ लें।

ऐसे ही हम भी जहाँ आनन्द का खजाना छुपा है, जहाँ सुख का सागर लहरा रहा है तथा जहाँ सब दुःखों के अंत की कुंजी पड़ी है, उस अंतर्यामी आत्मदेव में गोता नहीं मारते और सुख के लिए बाहर भटकते रहते हैं।

उस बुद्धुसिंह ने तो 2-4 घंटे गँवाये होंगे परन्तु हम तो कई सदियों से, कई जन्मों से संसार की मजदूरी में समय गँवाते आ रहे हैं। सुख को बाहर खोजते आ रहे हैं कि सर्टिफिकेट मिल जाय तो सुखी हो जाऊँ…. नौकरी मिल जाय तो सुखी हो जाऊँ… शादी हो जाय तो सुखी हो जाऊँ… दुश्मन मर जाय तो सुखी हो जाऊँ…

यह सब हो जाय तब भी हम पूर्ण सुखी तो होते नहीं केवल कुछ समय के लिए सुखाभास होता है। फिर भी इन बाह्य सुखों के पीछे ही अपनी जिंदगी बरबाद किये जा रहे हैं और यह केवल एक-दो लोगों की बात नहीं है। गोरखनाथ जी कहते हैं-

एक भूला दूजा भूला, भूला सब संसार।

बिन भूल्या एक गोरखा, जाके गुरु का आधार।।

सारा संसार यही भूल कर रहा है। सभी बाह्य सुखों में उलझ रहे हैं। इससे तो केवल वही बच पाता है जिसको सदगुरु का आधार है।

आप जो मेहनत कर रहे हैं वह किसलिये कर रहे हैं ? दुःखों का अंत हो और सुखों की प्राप्ति हो इसीलिए मेहनत कर रहे हैं। सारी जिंदगी बीत जाती है फिर भी दुःखों का अंत नहीं होता है। कुछ न कुछ दुःख बना ही रहता है और जो सुख मिलते हैं वे भी स्थायी नहीं होते हैं क्योंकि खोज होती है बाहर….।

कभी न छूटे पिंड दुःखों से, जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं।

मूल है सामान्य ज्ञान, उसके आश्रय से वृत्तियाँ उठती हैं और विशेष-विशेष में भटकाती हैं, सामान्य में नहीं आती हैं। सोकर जब प्रभात में उठते हैं तब ‘मैं हूँ’ यह खबर सामान्य ज्ञान से आती है, फिर विशेष ज्ञान चालू हो जाता है कि ‘मैं मोहन हूँ…. मैं सोहन हूँ… मैं कमला हूँ।’

सामान्य ज्ञान नित्य है। सृष्टि से पहले भी ज्ञान है। सृष्टि हुई तब भी ज्ञान रहता है और सृष्टि का प्रलय हो जाता है तब भी ज्ञान रहता है। प्रलय हो जाता है, कुछ नहीं रहता तब भी उस प्रलय को देखने वाला रहता है।

एक व्यक्ति ने महल बनवाया। बड़ा आलीशान महल था। वह व्यक्ति मेहमानों को महल दिखाने ले गया। महल देखकर लौटते समय उसने अपने पुत्र से कहाः “जाओ, अन्दर देखकर आओ कि कोई रह तो नहीं गया ?”

बेटा गया और महल के ऊपर की छत से बोलाः “पिता जी ! यहाँ कोई नहीं है।”

पिताजी मुख्य द्वार को ताला लगाने लगे। बेटे ने पूछाः “पिता जी ! ताला क्यों लगा रहे हैं ?”

पिताः “तुमने ही तो कहा कि कोई नहीं है। इसीलिए ताला लगा रहा हूँ।”

पुत्रः “पिता जी ! ‘कोई नहीं है’ – ऐसा बोलने वाला मैं तो हूँ।”

‘कोई नहीं है।’ कहने वाला तो कोई है। इसी प्रकार महाप्रलय हो जाता है, कुछ भी नहीं रहता है, ब्रह्मा, विष्णु और शिव के लोक भी महाप्रलय में लीन हो जाते हैं, उसकी भी खबर नित्य ज्ञान देता है। ‘रात्रि में बड़ी अच्छी नींद आयी, कुछ नहीं दिखा।’ तो अच्छी नींद आयी, कुछ नहीं दिखा… इसको तो कोई देख रहा है। इसको जो देख रहा है वही प्रलय का ज्ञान भी दे रहा है। दोनों एक ही हैं।

यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे… जो पिंड में है वही ब्रह्मांड में है। जो पानी की बूँद में है वही सागर में है। जो श्वास तुम्हारे नाक के द्वारा जाता है वह विराट के वायुतत्त्व के साथ जुड़ा है, जो जलतत्त्व तुम्हारे भीतर है वह व्यापक जलतत्त्व से जुड़ा है। इसी प्रकार अन्य तत्त्व भी जुड़े हुए हैं।

अगर सूर्य ठंडा हो जाय तो वैज्ञानिक कहने को भी नहीं रहेंगे कि तुम प्रकाश की कुछ व्यवस्था करो। जिस समय सूर्य ठंडा हो गया उस समय आप भी नहीं रहेंगे। जैसे सूर्य से आपका ताप जुड़ा है, वैसे ही सामान्य ज्ञान के साथ विशेष ज्ञान जुड़ा है और उसी विशेष ज्ञान में उलझकर हम मर रहे हैं।

‘हमें यह मिले…. यह मिले…’ में ही जीवन पूरा हो जाता है। जो अपनी इच्छा के अनुसार जगत की चीजें पाता है, उसे संदेह और डर बना ही रहता है। ‘पत्नी तो सुंदर होनी चाहिए….’ अगर सुंदर मिल गयी तो शंका के शिकार हो जाते हैं कि ‘बड़ी सुंदर है, पड़ोसी देखते होंगे, फलाना देखता होगा।’ तो गया मजा।

ऐसे ही धन मिला तो फिर उसको रखने की चिंता रहती है और धन चला न जाय इसका भय रहता है। धन आया है तो चला जायेगा – यह बात पक्की है। या तो धन चला जायेगा या धन को सँभालने वाला चला जायेगा।

ऐसा कोई सुखभोग नहीं, जिसके पीछे भय, दुःख, रोग नहीं।

ऐसा कोई संयोग नहीं, जिसका कभी वियोग न हो।।

भोगी होकर सब पछताते हैं…

हमें सुख लेने के लिए जो मजदूरी करते हैं वही हमारे दुःख का कारण बन जाता है। इससे तो अच्छा है कि सुख बाँटो और अपने आत्मविश्रांति के सच्चे सुख से एकाकार हो। सुख-भोग की वासना को हटाओ। जो सुख के दाता बनते हैं वे कभी दुःखी नहीं हो सकते। जो यश के दाता बनते हैं उन्हें यश की कमी नहीं होती। अतः सुख के भोक्ता मत बनो, यश के भोक्ता मत बनो।

मिलता है विशेष, सामान्य नहीं। सामान्य तो सदा मौजूद रहता है। विशेष मिलता है तो बिछुड़ भी जाता है। जो मिलता है वह बिछुड़ता है, ऐसा समझकर उसका उपयोग कर लो और सामान्य में विश्रांति पाओ।

अगर सामान्य सत्ता में आ गये तो आप सारी विशेषताओं के स्वामी हो गये। अपने घड़े का पानी सरोवर में डाल दिया तो घड़े का सारा पानी सरोवर हो गया।

जल में कुंभ कुंभ में जल बाहर भीतर पानी ।

फूटा कुंभ जल जले समाना यह अचरज है ज्ञानी।।

अपना घड़ा आप सरोवर में डालते हैं और भरकर उठाते हैं तब भारी लगता है परन्तु सरोवर में रहता है तब भारी नहीं लगता। अगर घड़ा फूट गया तो सरोवर का पानी और घड़े का पानी एक हो जाता है।

ऐसे ही आप मन-बुद्धि में आये हुए ‘मैं-मेरे’ को छोड़ दो और अपने सामान्य ज्ञान में आ जाओ तो सारा जगत आपका अपना-आपा हो जायेगा, सारा विश्व आपकी विहार वाटिका हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2002, पृष्ठ संख्या 2-4, अंक 112

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सत्यं ब्रूयात्….


सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् असत्यमप्रियम्।

सत्य बोलो, प्रिय बोलो किन्तु अप्रिय (अकल्याणकारी), असत्य मत बोलो।

जो व्यक्ति झूठ बोलता है, उसकी वाणी का प्रभाव कम हो जाता है, उसके दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं और जो सत्य बोलता है, मधुर बोलता है, उसकी हिम्मत बढ़ जाती है। जो किसी की निंदा करता है, चुगली करता है उसको डर लगता है कि कहीं मेरी बात खुल न जाय ! जो निंदा नहीं करता, चुगली नहीं करता, उसको डर भी नहीं रहता। वह निर्भय रहता है, निश्चिन्त रहता है। अतः सदैव ऐसा ही बोलें जो सत्य हो, प्रिय हो और हितकर हो।

बादशाह अकबर के नौ रत्नों में एक रत्न बनारसी दास भी थे। वे सदैव सत्य ही बोला करते थे। एक दिन अकबर ने सोचा किः ‘आज बनारसी दास को झूठ बोलने वाला साबित करना है।’ उसने एक जीवित पक्षी लिया और उसे कपड़े से ढाँककर ले गया राजदरबार में। वहाँ अकबर ने बनारसी दास से पूछाः

“यह पक्षी जिंदा है कि मरा हुआ ?”

बनारसी दास अकबर की चाल समझ गये कि ‘आज बादशाह मुझे झूठा साबित करना चाहते हैं। यदि मैं कहूँगा कि पक्षी जिंदा है तो उसकी गरदन दबोच देंगे और अगर कहूँगा कि मरा हुआ है तो उसे जीवित उड़ा देंगे।’

सत्य तो बोलना चाहिए परन्तु सत्य से किसी की हानि न होती हो, किसी के साथ अन्याय न होता हो ऐसा सत्य बोलना चाहिए। यह सोचकर बनारसीदास न कहाः

“जहाँपनाह ! यह पक्षी तो मर गया है फिर भी आप चाहें उसे जीवित कर सकते हैं।”

अकबर उनका उत्तर सुनकर आश्चर्यचकित हो उठा और उसने उस पक्षी को उड़ा दिया। फिर बनारसीदास से कहाः

“तुमने सत्य भी कहा और झूठ भी। ऐसा क्यों ?”

बनारसीदासः “जहाँपनाह ! यदि मैं कहता कि पक्षी जीवित है तो आप उसकी गरदन दबा देते और अगर मैं कहता कि पक्षी मर गया है तो आप उसे जीवित निकाल देते। मैं सत्य बोलता कि पक्षी जीवित है तो एक निर्दोष पक्षी की हत्या हो जाती इसलिए एक निर्दोष पक्षी की जान बचाने के लिए मुझे झूठ बोलना पड़ा तो कोई हर्ज नहीं है।”

वचन सत्य तो हो किन्तु उस सत्य से किसी की हिंसा न हो, किसी का अहित न हो यह भी ध्यान में रखना चाहिए।

सत्य बोलो, प्रिय बोलो और हितकर बोलो। कभी-कभी हितकर बोलने में वाणी की प्रियता और सत्यता कम भी होती है। जैसे, माँ बच्चे को बोलती हैः ‘दवा पी ले…. मीठी है।’ यहाँ ‘दवा मीठी है’ यह बात सरासर झूठ है लेकिन माँ का प्रयोजन हितकर है इसलिए झूठ बोलती है। बालक नहीं पीता है तो डाँटती भी है। यह डाँट अप्रिय है किन्तु हितकर है। माँ झूठ बोलती है, अप्रिय भी बोलती है परन्तु उसके मूल में बालक के हित की भावना है। अतः उसे झूठ बोलने का पाप नहीं लगता।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2002, पृष्ठ संख्या 13,14 अंक 112

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संतों की हनुमत-उपासना


हनुमान जयंतीः 27 अप्रैल 2002

हनुमान जी का जीवन पुरुषार्थ और साहस की प्रेरणा देता है, संयम एवं सदाचार की प्रेरणा देता है, निष्काम सेवा की प्रेरणा देता हैः राम काज बिनु कहाँ  विश्रामा…

मनोजवं मारूततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमताम् वरिष्ठम्।

वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शिरसा नमामि।।

‘जिनकी मन के समान गति और वायु के समान वेग है, जो परम जितेन्द्रिय और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, उन व वायु पुत्र वानराग्रगण्य श्रीरामदूत को मैं प्रणाम करता हूँ।’

मुझे किसी ने पत्र द्वारा बतायाः “एक कान्वेंट स्कूल में मास्टर ने ब्लैकबोर्ड पर एक तरफ गधा एवं दूसरी तरफ एक बंदर का चित्र बनाया। फिर बच्चों से पूछाः

‘यह पूँछवाला कौन है ?’

बच्चों ने कहाः ‘गधा’।

मास्टरः ‘यह दूसरा पूँछवाला कौन है ?’

बच्चेः ‘बंदर’।

मास्टरः ‘दोनों पशु हैं न ?’

बच्चेः ‘हाँ।’

मास्टरः तुम्हारे हिन्दुस्तानी लोग पूँछवाले पशु बंदर को भगवान के रूप में पूजते हैं कितने बेवकूफ हैं ?’

ऐसा करके वे बच्चों की आस्था डिगाते हैं एवं अपने ईसाई धर्म की महिमा सुनाते हैं। बापू जी ! ये कान्वेंट स्कूल शिक्षा के केन्द्र हैं या धर्मांतरण के अड्डे ? हमारे मासूम बच्चों के दिलों में हिन्दू धर्म एवं संस्कृति के प्रति नफरत पैदा करने का यह कैसा षड्यंत्र है ? बापू जी ! अब हमसे सहा नहीं जाता है।….”

मेरा किसी मिशनरी से, किसी धर्म से कोई विरोध नहीं है। मैं तो साँपों के बीच रहा लेकिन साँपों ने मुझे नहीं काटा। एक बार एक साँप पर मेरा पैर पड़ गया था फिर भी उसने मुझे नहीं काटा। मेरे हृदय में गुरु का ज्ञान है कि साँप में भी अपना ही प्यारा है तो मैं किसी संप्रदाय, किसी जाति से क्यों नफरत करूँगा ? फिर भी कोई गड़बड़ करता है तो कहना पड़ता है कि भैया ! भारत में ऐसा न करो। भगवान तुमको सद्बुद्धि दें…. जो लोग हनुमान जी को बंदर कहते हैं भगवान उनकी बुद्धि को प्रकाश दें और हम क्या कह सकते हैं ?

मुट्ठी भर लोगों को लेकर शिवाजी ने औरंगजेब की नाक में दम कर दिया था। ऐसे शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास हनुमान जी के भक्त थे। वे हनुमान जी से बातचीत करते थे।

उन्होंने तो महाराष्ट्र में कई हनुमान मंदिरों की स्थापना की जिनमें से 11 मंदिर आज भी बड़े प्रसिद्ध हैं। उन मंदिरों में जाने वालों में श्रद्धा, साहस, पौरूष आदि सदगुणों का संचार होता है, लोगों की मनोकामना पूर्ण होती है।

गोस्वामी तुलसी दास जी को भी हनुमान जी के दर्शन हुए एवं उनसे तुलसीदास जी को मार्गदर्शन मिला था – यह तो सभी जानते हैं।

मेरे एक परिचित संत हैं श्री लाल जी महाराज। उनकी उम्र 87 साल के करीब है। उनके पिता अमथारामजी पर किसी ने मूठ (मारण क्रिया) मारी थी, जिससे उनका देहावसान हो गया था। जिसके लिए मूठ मारी जाती है वह कहीं का नहीं रहता है, कोई हकीम, डॉक्टर अथवा झाड़ फूँक करने वाला उसे ठीक नहीं कर सकता। लेकिन लाल जी महाराज हनुमान जी के भक्त हैं। जब उन पर मूठ मारी गयी तो हनुमान जी एक नन्हें मुन्ने बालक का रूप लेकर आये और लाल जी महाराज उनके साथ सूक्ष्म शरीर से उड़ते-उड़ते इस पृथ्वीलोक से परे किसी दिव्य वन में जा पहुँचे। वहाँ एक ऋषि विराजमान थे।

उस नन्हें से बालक के रूप में विराजमान हनुमान जी ने इशारा किया कि ‘यह मेरा भक्त है। इस पर मारणप्रयोग किया गया है। इसको ठीक कर दो।’ उस ऋषि ने किसी वनस्पति की पतली डाली से उतारा करके फेंका तो वह डाली जल गयी ! फिर उन ऋषि ने कहाः

“तुम्हारे इष्ट हनुमान जी तुम्हारे रक्षक हैं। इसीलिए तुम्हारी मृत्यु टल सकी है। तुम्हारा मंगल होगा।”

लाल जी महाराज अभी भी मालसर (गुजरात) में विद्यमान हैं। उन्होंने बाद में श्रीरामजी के दर्शन भी किये और माँ गायत्री के भी दर्शन किये।

मैं घर छोड़कर साधना हेतु उधर गया तब मेरी साधना देखकर वे मेरे मित्र बन गये। ऐसे अनेक लोगों से परिचय हुआ है जिन्होंने हनुमान जी की कृपा को पाया है फिर भी जो लोग कहते हैं कि ‘हिन्दुस्तानी एक बन्दर की पूजा करते हैं, वे मूर्ख हैं।’ ऐसा कहने वालों के लिए इतना ही कहना है कि हनुमान जी के उपासकों को मूर्ख कहने वाले उन महामूर्खों पर भगवान कृपा करें और समाज सतर्क रहे।

रामकृष्ण परमहंस ने भी हनुमान जी की उपासना की थी। वे कहते थेः

“मैं माँ काली की उपासना के बाद अपने कुलदेवता, इष्टदेवता श्रीराम की उपासना की। जब श्री राम की उपासना की तो उनके प्रिय सेवक हनुमान जी का भी चिंतन होता था। हनुमान जी जाग्रत देव हैं। हनुमान जी, नारदजी, अश्वत्थामा आदि चिरंजीवी हैं। उन चिरंजीवी हनुमान जी की उपासना के काल में मुझे कुछ विलक्षण अनुभव होने लगे।

मैं उपासना करते-करते चीखने लगता, कभी पेड़ पर चढ़ जाता, कमर पर कपड़ा बाँधकर पूँछ की नाईं लटका देता और कोई फल खाने को मिलता तो बिना छिलके उतारे खा जाता था। मेरे मेरुदंड का अंतिम भाग एक इंच जितना बाहर भी निकल आया था। उपासना का प्रभाव मेरे मन के साथ तन पर भी पड़ा।”

शिष्यों ने पूछाः “मेरुदंड का अंतिम भाग का जो एक इंच बाहर निकल आया था उसका क्या हुआ ?”

श्री रामकृष्ण ने कहाः “उपासना छोड़ने के बाद धीरे-धीरे वह पूर्ववत् हो गया।”

मैंने भी अपने साधनाकाल में हनुमान जी की उपासना की थी। मुझे भी हनुमान जी की उपासना करने से, जप करने से बहुत अनुभव हुए। उपासना काल में मैं काफी बल का एहसास करता था। मैंने हनुमान जी की उपासना थोड़ी बहुत की थी, किन्तु मेरी दिशा ब्रह्मज्ञान प्राप्ति की होने के कारण यह साधना मैं पूरी न कर पाया। फिर मैंने वही मंत्र एक साधक को दिया तो उसे भी स्वप्न में हनुमान जी के दर्शन हुए। हनुमानजी ने उससे कहाः

“बेटा ! कलियुग में ये उपासनाएँ जल्दी नहीं फलती हैं, तुम इसे छोड़ दो।”

ऐसे हनुमान जी को हम अस्वीकार करें ? ऐसी दुर्मति हमारे पास नहीं है।

हनुमान जी जाग्रत देव हैं, चिरंजीवी हैं, संयम शिरोमणि हैं, ज्ञानियों में अग्रगण्य हैं, भक्तों के रक्षक हैं। ऐसे हनुमान जी के श्रीचरणों में हम प्रणाम करते हैं। आप सभी को हनुमान जयंती की खूब-खूब बधाई…

जय जय जय हनुमान गोसाईं।

कृपा करो गुरुदेव की नाईं।।

हनुमान जी को पूँछवाला बन्दर कह कर धर्मांतरण करने वाले ऐसे स्वार्थी धर्मांध व्यक्तियों को अपनी दुर्बुद्धि त्यागकर हनुमान जी की उपासना का फायदा उठाना चाहिए। हिन्दुस्तान में रहकर हिन्दू बच्चों की श्रद्धा पर कुठाराघात करके, धर्मांतरण कराके देश को और भारतीय संस्कृति को कमजोर बनाने के पास से बचना चाहिए।

हिन्दुओं को साहसी एवं निडर बनना चाहिए। ऐसे दुर्बुद्धि लोगों को सबक सिखाना चाहिए। उन लोगों को एवं संगठनों को हम धन्यवाद देते हैं जो उनकी पोलपट्टी खोलकर देश की, संस्कृति की अस्मिता की रक्षा करते हैं। भगवान उनको सद्बुद्धि, साहस, सुन्दर सूझबूझ दें। हिन्दुओं की अतिसहिष्णुता का दुरुपयोग करने वाले लोगों की बुद्धि कैसी है ? कैसा पढ़ाते होंगे बच्चों को ? कोमल हृदय के बच्चों पर स्कूलों में पढ़ाई के नाम पर विष से भरी तथा हिन्दू धर्म के देवी देवताओं एवं संतों के प्रति द्वेषपूर्ण हरकतें करने वाले लोग अपने इन कार्यों से बाज आ जायें। बच्चों के माता-पिता सावधान रहें। अपने ही बच्चे अपनी संस्कृति के व अपने दुश्मन हो जायें ऐसे मिशनरी स्कूलों से बचो और दूसरों को बचाओ। अपनी मानवमात्र का मंगल चाहने वाली भारतीय संस्कृति की गरिमा समझाने वाले स्कूलों में ही बच्चों को पढ़ायें नहीं तो कबीर जी की कहावत याद रखें-

भलो भयो गँवार, जाही न व्यापी विषमयी माया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2002, पृष्ठ संख्या 23,24 अंक 112

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