संतों की हनुमत-उपासना

संतों की हनुमत-उपासना


हनुमान जयंतीः 27 अप्रैल 2002

हनुमान जी का जीवन पुरुषार्थ और साहस की प्रेरणा देता है, संयम एवं सदाचार की प्रेरणा देता है, निष्काम सेवा की प्रेरणा देता हैः राम काज बिनु कहाँ  विश्रामा…

मनोजवं मारूततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमताम् वरिष्ठम्।

वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शिरसा नमामि।।

‘जिनकी मन के समान गति और वायु के समान वेग है, जो परम जितेन्द्रिय और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, उन व वायु पुत्र वानराग्रगण्य श्रीरामदूत को मैं प्रणाम करता हूँ।’

मुझे किसी ने पत्र द्वारा बतायाः “एक कान्वेंट स्कूल में मास्टर ने ब्लैकबोर्ड पर एक तरफ गधा एवं दूसरी तरफ एक बंदर का चित्र बनाया। फिर बच्चों से पूछाः

‘यह पूँछवाला कौन है ?’

बच्चों ने कहाः ‘गधा’।

मास्टरः ‘यह दूसरा पूँछवाला कौन है ?’

बच्चेः ‘बंदर’।

मास्टरः ‘दोनों पशु हैं न ?’

बच्चेः ‘हाँ।’

मास्टरः तुम्हारे हिन्दुस्तानी लोग पूँछवाले पशु बंदर को भगवान के रूप में पूजते हैं कितने बेवकूफ हैं ?’

ऐसा करके वे बच्चों की आस्था डिगाते हैं एवं अपने ईसाई धर्म की महिमा सुनाते हैं। बापू जी ! ये कान्वेंट स्कूल शिक्षा के केन्द्र हैं या धर्मांतरण के अड्डे ? हमारे मासूम बच्चों के दिलों में हिन्दू धर्म एवं संस्कृति के प्रति नफरत पैदा करने का यह कैसा षड्यंत्र है ? बापू जी ! अब हमसे सहा नहीं जाता है।….”

मेरा किसी मिशनरी से, किसी धर्म से कोई विरोध नहीं है। मैं तो साँपों के बीच रहा लेकिन साँपों ने मुझे नहीं काटा। एक बार एक साँप पर मेरा पैर पड़ गया था फिर भी उसने मुझे नहीं काटा। मेरे हृदय में गुरु का ज्ञान है कि साँप में भी अपना ही प्यारा है तो मैं किसी संप्रदाय, किसी जाति से क्यों नफरत करूँगा ? फिर भी कोई गड़बड़ करता है तो कहना पड़ता है कि भैया ! भारत में ऐसा न करो। भगवान तुमको सद्बुद्धि दें…. जो लोग हनुमान जी को बंदर कहते हैं भगवान उनकी बुद्धि को प्रकाश दें और हम क्या कह सकते हैं ?

मुट्ठी भर लोगों को लेकर शिवाजी ने औरंगजेब की नाक में दम कर दिया था। ऐसे शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास हनुमान जी के भक्त थे। वे हनुमान जी से बातचीत करते थे।

उन्होंने तो महाराष्ट्र में कई हनुमान मंदिरों की स्थापना की जिनमें से 11 मंदिर आज भी बड़े प्रसिद्ध हैं। उन मंदिरों में जाने वालों में श्रद्धा, साहस, पौरूष आदि सदगुणों का संचार होता है, लोगों की मनोकामना पूर्ण होती है।

गोस्वामी तुलसी दास जी को भी हनुमान जी के दर्शन हुए एवं उनसे तुलसीदास जी को मार्गदर्शन मिला था – यह तो सभी जानते हैं।

मेरे एक परिचित संत हैं श्री लाल जी महाराज। उनकी उम्र 87 साल के करीब है। उनके पिता अमथारामजी पर किसी ने मूठ (मारण क्रिया) मारी थी, जिससे उनका देहावसान हो गया था। जिसके लिए मूठ मारी जाती है वह कहीं का नहीं रहता है, कोई हकीम, डॉक्टर अथवा झाड़ फूँक करने वाला उसे ठीक नहीं कर सकता। लेकिन लाल जी महाराज हनुमान जी के भक्त हैं। जब उन पर मूठ मारी गयी तो हनुमान जी एक नन्हें मुन्ने बालक का रूप लेकर आये और लाल जी महाराज उनके साथ सूक्ष्म शरीर से उड़ते-उड़ते इस पृथ्वीलोक से परे किसी दिव्य वन में जा पहुँचे। वहाँ एक ऋषि विराजमान थे।

उस नन्हें से बालक के रूप में विराजमान हनुमान जी ने इशारा किया कि ‘यह मेरा भक्त है। इस पर मारणप्रयोग किया गया है। इसको ठीक कर दो।’ उस ऋषि ने किसी वनस्पति की पतली डाली से उतारा करके फेंका तो वह डाली जल गयी ! फिर उन ऋषि ने कहाः

“तुम्हारे इष्ट हनुमान जी तुम्हारे रक्षक हैं। इसीलिए तुम्हारी मृत्यु टल सकी है। तुम्हारा मंगल होगा।”

लाल जी महाराज अभी भी मालसर (गुजरात) में विद्यमान हैं। उन्होंने बाद में श्रीरामजी के दर्शन भी किये और माँ गायत्री के भी दर्शन किये।

मैं घर छोड़कर साधना हेतु उधर गया तब मेरी साधना देखकर वे मेरे मित्र बन गये। ऐसे अनेक लोगों से परिचय हुआ है जिन्होंने हनुमान जी की कृपा को पाया है फिर भी जो लोग कहते हैं कि ‘हिन्दुस्तानी एक बन्दर की पूजा करते हैं, वे मूर्ख हैं।’ ऐसा कहने वालों के लिए इतना ही कहना है कि हनुमान जी के उपासकों को मूर्ख कहने वाले उन महामूर्खों पर भगवान कृपा करें और समाज सतर्क रहे।

रामकृष्ण परमहंस ने भी हनुमान जी की उपासना की थी। वे कहते थेः

“मैं माँ काली की उपासना के बाद अपने कुलदेवता, इष्टदेवता श्रीराम की उपासना की। जब श्री राम की उपासना की तो उनके प्रिय सेवक हनुमान जी का भी चिंतन होता था। हनुमान जी जाग्रत देव हैं। हनुमान जी, नारदजी, अश्वत्थामा आदि चिरंजीवी हैं। उन चिरंजीवी हनुमान जी की उपासना के काल में मुझे कुछ विलक्षण अनुभव होने लगे।

मैं उपासना करते-करते चीखने लगता, कभी पेड़ पर चढ़ जाता, कमर पर कपड़ा बाँधकर पूँछ की नाईं लटका देता और कोई फल खाने को मिलता तो बिना छिलके उतारे खा जाता था। मेरे मेरुदंड का अंतिम भाग एक इंच जितना बाहर भी निकल आया था। उपासना का प्रभाव मेरे मन के साथ तन पर भी पड़ा।”

शिष्यों ने पूछाः “मेरुदंड का अंतिम भाग का जो एक इंच बाहर निकल आया था उसका क्या हुआ ?”

श्री रामकृष्ण ने कहाः “उपासना छोड़ने के बाद धीरे-धीरे वह पूर्ववत् हो गया।”

मैंने भी अपने साधनाकाल में हनुमान जी की उपासना की थी। मुझे भी हनुमान जी की उपासना करने से, जप करने से बहुत अनुभव हुए। उपासना काल में मैं काफी बल का एहसास करता था। मैंने हनुमान जी की उपासना थोड़ी बहुत की थी, किन्तु मेरी दिशा ब्रह्मज्ञान प्राप्ति की होने के कारण यह साधना मैं पूरी न कर पाया। फिर मैंने वही मंत्र एक साधक को दिया तो उसे भी स्वप्न में हनुमान जी के दर्शन हुए। हनुमानजी ने उससे कहाः

“बेटा ! कलियुग में ये उपासनाएँ जल्दी नहीं फलती हैं, तुम इसे छोड़ दो।”

ऐसे हनुमान जी को हम अस्वीकार करें ? ऐसी दुर्मति हमारे पास नहीं है।

हनुमान जी जाग्रत देव हैं, चिरंजीवी हैं, संयम शिरोमणि हैं, ज्ञानियों में अग्रगण्य हैं, भक्तों के रक्षक हैं। ऐसे हनुमान जी के श्रीचरणों में हम प्रणाम करते हैं। आप सभी को हनुमान जयंती की खूब-खूब बधाई…

जय जय जय हनुमान गोसाईं।

कृपा करो गुरुदेव की नाईं।।

हनुमान जी को पूँछवाला बन्दर कह कर धर्मांतरण करने वाले ऐसे स्वार्थी धर्मांध व्यक्तियों को अपनी दुर्बुद्धि त्यागकर हनुमान जी की उपासना का फायदा उठाना चाहिए। हिन्दुस्तान में रहकर हिन्दू बच्चों की श्रद्धा पर कुठाराघात करके, धर्मांतरण कराके देश को और भारतीय संस्कृति को कमजोर बनाने के पास से बचना चाहिए।

हिन्दुओं को साहसी एवं निडर बनना चाहिए। ऐसे दुर्बुद्धि लोगों को सबक सिखाना चाहिए। उन लोगों को एवं संगठनों को हम धन्यवाद देते हैं जो उनकी पोलपट्टी खोलकर देश की, संस्कृति की अस्मिता की रक्षा करते हैं। भगवान उनको सद्बुद्धि, साहस, सुन्दर सूझबूझ दें। हिन्दुओं की अतिसहिष्णुता का दुरुपयोग करने वाले लोगों की बुद्धि कैसी है ? कैसा पढ़ाते होंगे बच्चों को ? कोमल हृदय के बच्चों पर स्कूलों में पढ़ाई के नाम पर विष से भरी तथा हिन्दू धर्म के देवी देवताओं एवं संतों के प्रति द्वेषपूर्ण हरकतें करने वाले लोग अपने इन कार्यों से बाज आ जायें। बच्चों के माता-पिता सावधान रहें। अपने ही बच्चे अपनी संस्कृति के व अपने दुश्मन हो जायें ऐसे मिशनरी स्कूलों से बचो और दूसरों को बचाओ। अपनी मानवमात्र का मंगल चाहने वाली भारतीय संस्कृति की गरिमा समझाने वाले स्कूलों में ही बच्चों को पढ़ायें नहीं तो कबीर जी की कहावत याद रखें-

भलो भयो गँवार, जाही न व्यापी विषमयी माया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2002, पृष्ठ संख्या 23,24 अंक 112

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