Monthly Archives: May 2009

ज्ञानमयी दृष्टि


पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

जगत कैसा है ? पहले देखो, आपके मन का भाव कैसा है ? जैसा आपका भाव होता है, जगत वैसा ही भासित होता है । सुर (देवत्व का) का भाव होता है तो आप सज्जनता का, सदगुण का नजरिया ले लेते हैं और आसुरी भाव होता है तो आप दोषारोपण का नजरिया ले लेते हैं । जिस एंगल से फोटो लो वैसा दिखता है । जगत में न सुख है न दुःख है, न अपना है न पराया है । आप राग से लेते हैं, द्वेष से लेते हैं कि तटस्थता से लेते है । आप जैसा लेते हैं ऐसा ही जगत दिखने लगता है ।

कोई भी जगत का व्यवहार किया जाता है तो उसे सच्चा समझकर चित्त को उससे विह्वल न करो, नहीं तो आसुरी वृत्ति हो जायेगी, शोक हो जायेगा, दुःख हो जायेगा । अच्छा होता है तो उसका अहंकार न करो । हो-हो के बदलने वाला जगत है, यह द्वैतमात्र है – या तो सुख या तो दुःख । इन दोनों के बीच का तीसरा नेत्र खोलो ज्ञान का । आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा है ज्ञानमयी दृष्टि करना – सुख में भी न उलझना, दुःख मं भी न उलझना ।

न खुशी अच्छी है, न मलाल अच्छा है ।

यार तू अपने-आपको दिखा दे, बस वो हाल अच्छा है ।।

प्रभु ! तू अपनी चेतनता, अपनी सत्यता, अपनी मधुरता दे ।

दायाँ-बायाँ पैर पगडण्डी पर, सीढ़ियों पर रखते-रखते दे के मंदिर में पहुँचते हैं, ऐसे ही सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीवन-मृत्यु इनको पैरों तले कुचलते-कुचलते जीवनदाता के स्वरूप का ज्ञान पाना चाहिए, उसी में विश्रांति पानी चाहिए, उसी में प्रीति होनी चाहिए ।

जो कल नहीं आये थे वे हाथ ऊपर करो ।

(कुछ लोग हाथ ऊपर करते हैं ।)

जो आज नहीं आये हैं वे हाथ ऊपर करो ।

देखो, कोई नहीं करता ।

यह किसके द्वारा आता है ? ज्ञान के द्वारा । तो इस ज्ञान का स्रोत क्या है ?

इन्द्रियों का ज्ञान । इन्द्रियों की गहराई में मन का ज्ञान । मन की गहराई में बुद्धि का ज्ञान । लेकिन इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि में ज्ञान कहाँ से आता है ? ‘मैं’ से । ‘मैं’ माना वही चैतन्य, जहाँ से ‘मैं’ उठता है उस चैतन्य का सुख चाहिए । है न !

कोई बोलता हः “मैं हूँ, तुम नहीं हो ।” तो क्या आप मानोगे ?

आप बोलोगेः “मैं भी हूँ । मैं कैसे नहीं हूँ ? मैं हूँ तभी तुम हो । मैं हूँ तभी तुम दिखते हो ।”

‘मैं’ ही मेरे में तृप्त है । मैं, मैं, मैं, मैं…. ये आकृतियाँ अनेक हैं, अंतःकरण अऩेक हैं लेकिन मैं की सत्ता एक है । उसी मैं में आराम पाओ । गहरी नींद में आप अपने मैं में ही तो जाते हो, और क्या है ?

उस मूल ज्ञान को मैं के रूप में जान लिया तो आपका तो काम हो गया, देवत्व प्रकट हो गया लेकिन आपकी वाणी सुनने वाले को भी महापुण्य होगा ।

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध ।

तुलसी संगत साध की, हरे कोटि अपराध ।।

सुख देवें दुःख को हरें, करें पाप का अंत ।

कह कबीर वे कब मिलें, परम सनेही संत ।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2009, पृष्ठ संख्या 7 अंक 197

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ऐसा साधक जल्दी सफल हो जाता है – पूज्य बापू जी


तुम ईश्वर के रास्ते चलते हो और अनुकूलता आने लग जाय तो यह तो थोड़ी-बहुत सफलता हुई लेकिन अगर प्रतिकूलता आती है तो समझो कि ईश्वर के रास्ते तुम्हारी यात्रा तेजी से होने वाली है ।

जिसको वो इश्क करता है, उसी को आजमाता है ।

खजाने रहमत के, इसी बहाने लुटाता है ।।

जिस साधक, भक्त को सताने वाला, तंग करने वाला कोई कुटुम्बी मिल जाता है, समझो उसका बड़ा भाग्य है । मीरा को सताने वाले, तंग करने वाले नहीं मिलते तो शायद मीरा की इतनी दृढ़ता नहीं होती । प्रह्लाद को सताने वाला, तंग करने वाला हिण्यकशिपु न होता तो शायद प्रह्लाद की इतनी दृढ़ भक्ति न भी होती । एकनाथ जी को सताने वाले लोग न मिलते तो शायद एकनाथ जी को भी इतना धैर्य और इतनी प्रशांति में स्थिति न भी होती । अगर विघ्न-बाधा आती है तो समझ लो कि भगवान हमें अपने प्रशांत स्वभाव में तेजी से लाना चाहते हैं और सुख-सुविधा आ जाती है तो समझ लो भगवान हमारी कमजोरी समझते हैं कि हम सुख के भगत हैं, इसलिए खिलौने दे दिये । इन खिलौनों का उपयोग करना । ये खिलौने हैं, इनमें जीवन नहीं गँवाना है । उन सुखद अवस्थाओं को भगवान का प्रसाद समझकर जैसे भगवान के आगे थाली धऱते हैं, भोग लगाते हैं तो फिर वह अकेले नहीं खाया जाता बाँट के खाया जाता है, ऐसे ही योग्यता और सहूलियतें आ जायें तो भगवत्कार्य में उनका सदुपयोग करे और विघ्न-बाधा आ जाय तो छलाँग मार के अपने को प्रशांति में पहुँचा दे  तो वह साधक जल्दी सफल हो जाता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2009, पृष्ठ संख्या 6 अंक 197

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अब तुम भी थोड़ा पुरुषार्थ करो


पूज्य बापू जी के सत्संग प्रवचन से

कई लोग फरियाद करते हैं कि ध्यान नहीं लगता । क्यों नहीं लगता ? क्योंकि हम संसार में रहकर, संसार के होकर भगवान का ध्यान करना चाहते हैं । हकीकत में हम भगवान के होकर और भगवान में ही बैठकर भगवान का ध्यान करें तो भगवान का ध्यान टूट नहीं सकता है । सुबह साधन-भजन करते समय लम्बे-लम्बे चार-पाँच श्वास ले लो । श्वास लो तो ईश्वर की कृपा भरो और श्वास छोड़ो तो ऐसी भावना करो कि ‘हमने चंचलता छोड़ दी है । अब जो कुछ हमारे मन में आयेगा वह प्रभु का हो होगा । ईश्वर के सिवाय और कुछ हमारे मन में अब आ नहीं सकता । हम अब भगवान की सेवा कर रहे हैं, इस समय भगवान के सिवाय हमारे मन में कोई बात नहीं आयेगी ।

हम विचार हटाने में लगते हैं तब भी ध्यान नहीं लगता और उस विचार में खो जाते हैं तब भी नहीं लगता लेकिन उस समय जो भी विचार आये उसे महत्त्व न दे तो उन विचारों का महत्त्व घट जायेगा ।

इस तरह महापुरुषों ने चित्त को उस परमात्म-प्रसाद की प्राप्ति कराने के लिए न जाने क्या-क्या नुस्खे आजमाये लेकिन जिनको लगन लगी है वे ही करते हैं । करोड़ों मनुष्य तुच्छ चीजों में संतुष्ट हो जाते हैं, कोई-कोई भगवान के रास्ते चलते हैं तो थोड़ा-बहुत चलके तुष्टी आ जाती है । थोड़ी वाहवाही होने लगती है, थोड़ा यश मिलने लगता है या थोड़ी वस्तुएँ मिलने लगती हैं तो उसमें रुक जाते हैं । जब उससे आगे बढ़ते हैं तो अपयश, विरोध होने लगता है तो उससे भाग के भगवान का रास्ता छोड़ देते है । उससे कोई आगे निकलता है तो ऋद्धि-सिद्धि आने लगती है, उसमें फँस जाते हैं । उससे भी कोई आगे निकलता है तब चित्त के पूर्ण प्रसाद परमात्मा का साक्षात्कार होता है ।

संत कबीर जी कहते हैं-

चलो चलो सब कोई कहै, पहुँचें विरला कोय ।

एक कनक अरु कामिनी, दुर्गम घाटी दोय ।।

माया तजना सहज है, सहज नारी का नेह ।

मान बड़ाई ईर्ष्या, दुर्लभ तजना ऐह ।।

घर-बार छोड़ दिया, हो गये फक्कड़, हो गये त्यागी बाबा लेकिन अंदर में त्यागीपने का भी भाव न रहे यह सावधानी रखनी चाहिए । माया भी छूट जाय….. पत्नी छूट जाय, ब्रह्मचारी भी हो जाय फिर भी गहराई में मान-बड़ाई और ईर्ष्या रहती है ।

श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि ‘साधक से लिए, साधु के लिए लोकैषणा – यह आखिरी विघ्न है ।’

सब हमारे लिए अच्छा-अच्छा बोलें, सब हमारी प्रशंसा करें, हमारी निंदा न हो, हम दुनिया में अपना कुछ नाम करके जायें – यह बहुत सूक्ष्म विघ्न होता है । इसलिए भगवान को कहो कि ‘प्रभु ! मेरा मुझमें कुछ नहीं…’ अपने ‘मैं’ को हटा दो और ईश्वर को साक्षी रखो तो फिर ईश्वर की मदद मिलेगी ।

हमारा चालबाज मन हमें युगों से धोखा दे रहा है, हम अकेले पुरुषार्थ करेंगे तो थक जायेंगे । इसलिए बार-बार ईश्वर की सहायता लो, बार-बार अंतर्यामी परमात्मा को प्रार्थना करो । इस तरह आप लग पड़ो तो पुरुषार्थ करना छोड़ना नहीं क्योंकि लाखों वर्षों का, लाखों जन्मों का अभ्यास है फिसलने का, तो एक जन्म में दो पाँच बार फिस भी जाओ तो चिंता नहीं करना ।

फिसलना या गिरना कोई पाप नहीं है । यह असावधानी तो है लेकिन फिसल के फिर न चलना यह प्रमाद है, यह पाप है । कभी-कभी साधकों के जीवन में लिया हुआ नियम पूरा नहीं होता इसलिए वे दुःखी हो जाते हैं और अपने को अयोग्य मानने लगते हैं । कभी-कभी न चाहते हुए काम-क्रोध के आवेग में बह जाते हैं तो अपने को कामी, क्रोधी, लाचार तथा अनाधिकारी मानकर उत्साहहीन हो जाते हैं । लेकिन उन साधकों को ध्यान रखना चाहिए कि अपने अंदर जो गलतियाँ दिख रही हैं – काम की, क्रोध की, लोभ की, चिंता की, आलस्य की, उन गलतियों को देखकर निराश नहीं हों क्योंकि यह तो खुशखबरी है कि अपनी गलती तो दिखती है न ! गलती करना तो भूल है पर अपनी गलती न देखना और बड़ी भूल है । कोई गलती दिखाये और उसे न मानना यह तो भूल की पराकाष्ठा है ।

जो पापी है, अपराधी हैं उनको अपना अपराध जल्दी से नहीं दिखता है । वे बोलेंगेः ‘सिनेमा देखा तो क्या हो गया यार ! जेब काटी तो क्या है इसमें ? अपना धंधा करते हैं, कोई भीख तो नहीं माँगते !’ तो जो गलती से भरे हुए हैं उनको ये दुष्कृत्य गलती नहीं दिखेंगे । साधक को, भक्त को, शुद्ध हृदयवाले को अपनी गलतियाँ दिखती हैं । आँख में काजल लगाते हैं तो वह आँख को नहीं दिखता है, आँख से दूर होता है तब दिखता है, ऐसे ही गलती अगर आपके साथ मिली हुई होती तो आपको नहीं दिखती । अब गलतियाँ दिखती हैं तो साधक एक गलती और कर लेता है कि अपने को अयोग्य मान लेता है । यह बड़ी गलती है । अपने को अयोग्य मानने से अपनी योग्यता क्षीण हो जाती है । गलतियाँ दिखें तो भगवान को धन्यवाद दो कि ‘प्रभु ! तुम्हारी कृपा से गलतियाँ दिख रही हैं । ये मेरे में नहीं हैं, मन में हैं । मन में है इसलिए दिख रही हैं । मेरा मन शुद्ध हो रहा है । तेरी कृपा है । वाह ! प्रभु वाह !’ प्रभु को वाह-वाह करो तो तुम्हारा मन शुद्ध होने लगेगा । इसका मतलब यह नहीं गलतियाँ करते जाओ । नहीं, हताशा और निराशा के विचार नहीं आने देना और ‘अपना अधिकार नहीं है, अपन गृहस्थी हैं, अपना दम नहीं है भाई भगवान के रास्ते चलने का ।….’ ऐसा सोचकर रास्ता छोड़ नहीं देना ।

मनुष्यमात्र को मुक्त होने का अधिकार है । अरे, प्रधानमंत्री खुश हो जाय, एकदम बरस पड़े तो भी अपने चपरासी को जिलाधीश नहीं बना सकता क्योंकि जिलाधीश बनने के लिए उसमें आई.ए.एस. अफसर होने की योग्यता होनी चाहिए । प्रधानमंत्री भी ऐसी गलती नहीं करता तो भगवान कैसे करेंगे ? मनुष्य जन्म मोक्ष के अधिकारी को ही मिलता है – साधन धाम मोच्छ कर द्वारा । फिर अगर भगवान ने मनुष्य जन्म दिया है तो हमें निराशा के विचार नहीं करने चाहिए ।

यह तन कर फल बिषय न भाई ।

इस शरीर का फल यह नहीं है कि विषय विलास करके, हा हा…. हू हू… करके दुःखी-सुखी होके जिंदगी बर्बाद कर लें । नहीं, इस देहप्राप्ति का फल विषय भोग नहीं है, यह मनुष्य-जन्म मुक्ति के लिए ही है । तो भगवान ने तो हमको मुक्ति का अधिकारी बना दिया, अब आप भी तो थोड़ा पुरुषार्थ करो भैया ! पुरुषार्थ भी यही करना है कि बस, बार-बार ईश्वर की सहाय लो, उसे प्रार्थना करो, अपने आत्म-ईश्वर के विषय में सुनो, ईश्वर का ज्ञान पा लो । ‘श्री विष्णुसहस्रनाम’ और श्री नारायण स्तुति में भगवान के स्वभाव का वर्णन है । भगवान के स्वभाव को जिसने जाना, वह भगवान का भजन किये बिना रह नहीं सकता ।

भगवान शिवजी कहते हैं-

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना ।

ताहि भजनु तजि भाव न आना ।। (श्रीरामचरित. सुं.कां. 33.2)

श्री नारायण स्तुति पढ़ो और नारायण के ज्ञान, माधुर्य में प्रवेश करो । इससे मन-बुद्धि भी विलक्षण-अदभुत लक्षणों से सम्पन्न हो जायेंगे ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2009, पृष्ठ संख्या 4-6 अंक 197

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