ऐसे थे भगवान श्रीराम !

ऐसे थे भगवान श्रीराम !


(श्रीरामनवमीः 1 अप्रैल)

(पूज्य बापू जी की पावन अमृतवाणी)

देवताओं ने देखा कि रावण के उपद्रव से प्रजा बहुत दुःखी है, त्राहिमाम् पुकार रही है। यज्ञ आदि पुण्यकर्म नहीं हो रहे हैं। देवताओं की, पितरों की तृप्ति का कार्य भी रावन नहीं करने देता है। इसलिए देवताओं ने ब्रह्माजी की आराधना की। ब्रह्माजी प्रकट हुए तो देवताओं ने लोगों की व्यथा सुनायी कि ʹरावण अपने अहं की प्रधानता से सर्वेसर्वा होकर बैठा है।ʹ

ब्रह्मा जी ने कहाः ʹʹरावण तो शिवभक्त है। उसे तो शिवजी का आशीर्वाद है। अतः उनके पास चलो।”

शिवजी के पास गये, स्तुति की। शिवजी प्रसन्न हुए। ब्रह्माजी की आगेवानी में देवताओं ने प्रार्थना कीः “हे देव ! कुछ कृपा कीजिये। रावण की उद्दण्डता से प्रजा पीड़िता है, त्राहिमाम् पुकार रही है।” रावण शिवजी का तो भक्त था लेकिन मूल में भगवान नारायण का खास पार्षद था। शिवजी ने सोचा कि ʹनारायण के पार्षद को मैंने ही वरदान दिये हैं। अब मैं ही उससे भिड़ूँ यह ठीक नहीं है। जिनका पार्षद है, वे ही निर्णय करें।ʹ पहले से ही नियति थी उनकी तो शिवजी ने कहाः “आप यहीं भगवान नारायण की स्तुति करके उनका आवाहन करो। भगवान नारायण ही रास्ता निकालेंगे।”

छोटी-मोटी समस्या होती है तो ब्रह्माजी हल कर देते हैं, बीच की होती है तो शिवजी बोल देते हैं लेकिन यह बड़ी समस्या थी क्योंकि रावण कोई साधारण व्यक्ति नहीं था, बहुत सारी योग्यताएँ थीं उसमें। शिवभक्त था, यश, गन्धर्व, राक्षस सब उससे काँपते थे। सभी मनुष्य स्वर्ग जा सकें ऐसी सीढ़ी बनाने की उसकी योजना थी। अग्नि की धुआँरहित तथा समुद्र को मीठा बनाने की भी उसकी योजनाएँ थीं। भगवान विष्णु की स्तुति, आराधना की तो वे प्रकट हुए। देवताओं ने कहाः “प्रभु ! आप ही हमारी रक्षा करो।”

रावण क्या है ?

मोहरूपी रावण है। जो हम नहीं हैं उसको ʹमैंʹ मानना, इसी को बोलते हैं ʹमोहʹ। बहुत सूक्ष्म, समझने योग्य बात है।

मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला।

तिन्ह से पुनि उपजहिं बहु सूला।।

श्रीरामचरित उ.कां. 120.15

मोह सारी व्याधियों का मूल है, उससे जन्म-मरण का, भव का शूल पैदा होता है।

मोहरूपी रावण को अहंकार हुआ है कि ʹमैं लंकापति रावण हूँ।ʹ अहंकार से वासनाएँ उभरीं। वासनापूर्ति के लिए दम्भ करता है और दम्भ में विघ्न आने से हिंसा होती है।

देवताओं ने कहाः “रावण के द्वारा किसी की शारीरिक हिंसा, किसी की वाचिक, किसी की मानसिक तो किसी की सैद्धान्तिक हिंसा….. हिंसा-ही-हिंसा हो रही है।”

भगवान ने कहाः “अच्छा ! तो मुझे ही आना पड़ेगा। देवताओ ! तुम निश्चिंत रहो, ब्रह्मा जी जो कहें उसके अनुसार अपने-अपने काम में लगो।”

नारायण तो चले गये। ब्रह्मा जी ने वायुदेव, वरूणदेव, कुबेर आदि को कहाः “तुम लोग भी भगवान नारायण की सहायता के लिए अलग-अलग रूप में पृथ्वी पर जन्म लो।”

पवनदेव हनुमान के रूप में आये। वरूण किसी रूप में आये, कोई जामवंत के रूप में आये, बाकी के देव भी विभिन्न वानरों के रूप में आ गये। मनुष्यरूप में आते तो उनके रहने-खाने की बहुत ज्यादा व्यवस्था, सुविधा करनी पड़ती। बंदर हैं तो चलो, पेड़ों पर रह लेंगे, पत्ते भी खा लेंगे।

मेघनाद और लक्ष्मण का युद्ध हुआ। लक्ष्मण की पत्नी थी उर्मिला और मेघनाद की पत्नी थी सुलोचना। दोनों पतिव्रताएँ थीं। अब दोनों के पातिव्रत्य जबरदस्त ! तो दोनों में से कोई योद्धा मरता नहीं, मूर्च्छित हो जाते हैं। आखिर में लक्ष्मण जी ने रामजी का ध्यान किया और दृढ़ संकल्प करके बाण मारा तो मेघनाद का हाथ कटकर सुलोचना के आँगन में जा गिरा।

सुलोचना बोलीः “मैं जीवित हूँ और मेरे पति का हाथ ! अगर मैंने पातिव्रत-धर्म का पालन किया हो तो यह हाथ मुझे लिखकर बताये कि युद्धभूमि में क्या घटित हुआ है।” हाथ में लिखा तो वह विलाप करने लगी।

रावण को समाचार मिला कि मेघनाद मर गया है तो वह शोकातुर हो गया कि ʹमेरा प्राणप्रिय आज्ञाकारी पुत्र नहीं रहा।ʹ पुत्र जितना वफादार होता है, पिता को उतना ही दुःख होता है। रोती हुई सुलोचना शोकागार में रावण के पास आयी तो रावण क्या कहता हैः “बेटी ! तेरा शोक, तेरा दुःख मैं जानता हूँ लेकिन तेरा ससुर तेरा दुःख-निवारण नहीं कर सकेगा। तू श्रीरामजी के पास जा, तेरा शोक श्रीरामचन्द्रजी मिटायेंगे।”

रावण कितना बुद्धिमान है ! साधारण हस्ती नहीं था। वह जानता था कि जो महापुरुष रामतत्त्व में जगे हैं वे ही निर्दुःख कर सकते हैं। देखो, रावण के पास सूझबूझ कितनी है ! अपनी बहू को अपने बेटे की हत्या करने वाले लक्ष्मण के भाई रामजी के पास भेजता है क्योंकि वह जानता है रामजी कौन हैं। रामजी को शत्रु मानता है पर रामजी की महिमा जानता है।

राम जी कहते हैं- “सुलोचना ! यह लक्ष्मण और मेघनाद का युद्ध नहीं था। बेटी ! तुम्हारे और उर्मिला के बीच का युद्ध था। तुम पतिव्रताओं में शिरोमणि हो और उर्मिला भी ऐसी है।” देखो, ध्यान देना रामजी की वाणी पर। ʹतुमत पतिव्रताओं में शिरोमणि हो, पतिव्रताओं में श्रेष्ठ हो और उर्मिला भी पतिव्रता है।ʹ रामजी मनोवैज्ञानिक ढंग से कितनी दूर का सोचकर एक-एक शब्द बोलते हैं।

“सुलोचना ! मेघनाद मारा गया, इसमें तुम्हारे पातिव्रत्य में कोई कमी नहीं है लेकिन मेघनाद ने मोह, अहंकार, वासना, दम्भ, हिंसा के प्राधान्य को मदद की थी। मेघनाद ने मोहरूपी रावण की मदद की थी। तुम्हारा पातिव्रत्य का बल अधर्म के पक्ष में खड़ा रहा और उर्मिला का पातिव्रत-बल लक्ष्मण के, धर्म के पक्ष में खड़ा रहा। मोह नहीं, यथार्थ वस्तु को जानना…. अहंकार नहीं, स्वस्वरूप में विश्रान्ति….. वासना नहीं, निर्वासना…. लक्ष्मण ब्रह्म के पक्ष में और मेघनाद मोह के पक्ष में था।

मोह सकल ब्याधिन्ह का मूला।

सुलोचना ! यह मोह की हार हुई है। मेघनाद की हार नहीं है, सुलोचना की हार नहीं है। यह मोह की हार है, अहंकार की हार है। यह सब लीला है।”

सुलोचना को समझ आ गयी तो संतुष्ट हो गयी। शोकातुर सुलोचना आत्मज्ञान में जग गयी। शत्रुपक्ष की बहूरानी को आत्मरस से तृप्त करना यह राम जी का ही तो काम है, दूसरे किसकी ताकत है ? रामजी में द्वेष नहीं है, मोह नहीं है, शोक नहीं है। सुलोचना का शोक चला गया। मोह से यह सारा संसार दुःखी होता है और मोह के जाने से यह सब खेल लगता है।

युद्ध पूरा हुआ तो इन्द्रदेव आये, बोलेः “प्रभुजी ! देवताओं का मनोरथ पूरा हुआ। रावण युद्ध में मारा गया। मेरे लिए क्या आज्ञा है ?”

बोलेः “आप अमृत की वृष्टि कर दो।”

अमृतवृष्टि हुई तो सब वानर जीवित हो गये पर राक्षस जीवित नहीं हुए। ʹअमृत सब पर गिरा था तो राक्षस जीवित क्यों नहीं हुए?ʹ – यह सवाल उठता है।

राक्षस लोग राम जी को अपना विरोधी मान कर लड़ रहे थे तो राम जी का चिंतन करते-करते मरे इसलिए वे रामजी के धाम में चले गये और जीवित नहीं हुए। यह है भगवान के चिंतन का प्रभाव !

रावण ने सोचा कि ʹहमारा शरीर राक्षसी-तामसी है, इससे भगवान की भक्ति तो कर नहीं पायेंगे। हम वैर से भी भगवान को याद करेंगे तो भी तर जायेंगे। मैं तो अपने लंकावासियों को वैकुंठ भेजना चाहता हूँ।ʹ अब रावण जैसा आज का कोई नेता हो तो मुझे बताओ तो मैं उसका सत्कार करूँगा। जीते जी तो प्रजा को सुवर्ण के घरों में रखता है, मरने के बाद वैकुंठ दिलाता है ! आज के नेता तो देश-परदेश में करोड़ों-अरबों खरबों जमा करके मर जाते हैं।

जब रामजी के साथ रावण का युद्ध हुआ तो रावण का सिर कटता और फिर लग जाता। हाथ कटे तो फिर से लग जाय क्योंकि शिवजी का वरदान था। रामजी चकित हो गये तो विभीषण ने कहा कि ʹइसकी नाभि में अमृत है इसलिए यह नहीं मरता है। इसकी वासना है कि मैं जीवित रहूँ।ʹ दृढ़ वासना का केन्द्र स्वाधिष्ठान केन्द्र होता है। यह केन्द्र रूपांतरित हो तब रावण मरता है। अमृत अर्थात् न मरने की जो पकड़ है वह नाभि में है। जब वहाँ बाण मारा तब रावण गिरा।

श्रीरामजी ने लक्ष्मण से कहाः “आज धरती से एक महायोद्धा, महाबुद्धिमान, महाप्रजापालक जा रहा है। जाओ, उनसे कुछ ज्ञान ले लो।”

देखो कितना आदर है ज्ञान का ! शत्रु से भी ज्ञान लेने को भेज रहे हैं। यह काम रामजी के अलावा कौन कर सकता है ! पर रामजी के मन में शत्रुभाव नहीं है, द्वेषभाव नहीं है।

लक्ष्मण को यह बात विचित्र लगी, बोलेः “माँ सीता का धोखे से अपहरण करके जो राक्षस ले आया, उसके लिए आप ʹमहान…. महान….ʹ बोलते हैं प्रभु ! मुझे यह समझ में नहीं आता।”

“लक्ष्मण ! सीता-अपहरण के जघन्य अपराध को छोड़ दो तो उनमें बहुत सारी योग्यताएँ थीं। जाओ, उनसे उपदेश लो।”

लक्ष्मण गये और वापस लौटकर आ गये, उपदेश नहीं मिला। रामजी ने पूछाः “उपदेश माँगने के लिए गये थे तो कहाँ खड़े थे ?”

बोलेः “उसके सिर के नजदीक।”

सिर पर चढ़कर कोई ज्ञान लिया जाता है क्या ! चरणों में बैठकर ज्ञान लिया जाता है।

उनके चरणों की तरफ खड़े रहकर विनम्र वाणी से प्रार्थना करना। चलो, मैं भी साथ में चलता हूँ।”

लक्ष्मण ने जाकर विनम्र वाणी से प्रार्थना की, तब लंकेश ने उठने की असमर्थता के कारण मन-ही-मन भक्तिभावपूर्वक राम जी को प्रणाम किया और कहाः “हे रघुनाथ ! मेरे पास समुद्र को खारेपन से रहित तथा चन्द्रमा को निष्कलंक बनाने की योजनाएँ थीं। अग्नि कहीं भी जले धुआँ न हो, धूम्र बिना की अग्नि और स्वर्ग तक की सीढियाँ मैं बनाना चाहता था ताकि सामान्य आदमी भी स्वर्ग का रहस्य जान सके और स्वर्ग का यात्रा करके आ सके। मुझे प्रजा के लिए यह सब करना था लेकिन सोचा, ʹयह बाद में करेंगे।ʹ मैंने विषय-सुख में, जरा नाच में, जरा सुंदरी के साथ वार्ता में, वाहवाही में….. पाँचों विषयों में जरा-जरा करके समय गँवा दिया। जो करने थे वे काम मेरे रह गये। इसलिए हे रामजी ! मेरे जीवन का सार यह है कि मनुष्य को अच्छे काम में देर नही करनी चाहिए और विषय-विकारों की बात को टालकर उनसे बचते हुए निर्विषय नारायण के सुख में जाना चाहिए, अन्यथा वह मारा जाता है। मेरे जैसे लंकेश की दुर्दशा होती है तो सामान्य आदमी की बात क्या करना !”

मरते समय रावण कहता हैः “हे रामचन्द्रजी ! आप तो महान हैं, आपके चरणों में मेरे प्रणाम हैं।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2012, पृष्ठ संख्या 13,14,15 अंक 231

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