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संत श्री आशारामजी बापू के सामूहिक होली कार्यक्रम से पानी की बरबादी नहीं, राष्ट्र की आर्थिक समृद्धि


पूज्य संत श्री आशारामजी बापू के कारण देशभर में कैमिकल रंगों के स्थान पर प्राकृतिक रंगों से होली खेलने का रूझान हर  वर्ष बढ़ रहा है। इससे विदेशी केमिकल कम्पनियों के माध्यम से हो रही अरबों रूपयों की लूट में बाधा पैदा हुई। पूज्य बापू जी ने यह तथ्य नागपुर में विशेष रूप से उजागर किया और नागपुर के अखबारों में छपा। फिर क्या था, जो शिवरात्रि पर शिवजी को अभिषेक पानी की बरबादी है ऐसा दुष्प्रचार करते हैं, दीपावली पर दीये जलाना तेल की बरबादी है, ऐसी बकबास करते हैं, उन्होंने निशाना बनाया होली को।

सामूहिक प्राकृतिक होलीः पानी की महाबचत

आयुर्वेद के ग्रंथों के पलाश-पुष्पों के गुणों का वर्णन है। इनके रंग से आँखों की जलन, शरीर-दाह, पित्त की तकलीफें, एलर्जी, अनिद्रा, खिन्नता, उद्वेग, अवसाद (डिप्रैशन), त्वचारोग जैसे रोगों और कालसर्प योग जैसी दुःसाध्य समस्याओं से रक्षा होती है। स्वास्थ्य, सुहृदता, शरीर की सप्तधातुओं एवं सप्त रंगों का संतुलन आदि विलक्षण लाभ होते हैं।

केमिकल रंगों से होली खेलने में प्रति व्यक्ति 35 से 300 लीटर पानी खर्च होता है। केवल मुँह का रंग निकालने में ही कितना पानी खर्च होता है ! जबकि प्राकृतिक रंगों से होली खेलने पर इसका 10वाँ हिस्सा भी खर्च नहीं होता। और देश की जल-सम्पदा की सुरक्षा हेतु लोकसंत पूज्य बापू जी ने जल की इससे भी अधिक अर्थात् हजारों गुना बचत करना चाहा और देश में प्रति व्यक्ति 30 से 60 मि.ली. से भी कम पानी से सामूहिक प्राकृतिक होली मनाने का अभियान शुरु किया, जिससे आयुर्वेद एवं ज्योतिषशास्त्र में निर्देशित पलाश-पुष्पों के रंग के उपरोक्त अक्सीर औषधीय एवं अलौकिक गुणों का लाभ सभी को मिले। सूखे रंगों से होली खेलने वाली भी रंगों को धोने के लिए इससे ज्यादा पानी खर्च करते हैं।

महाराष्ट्र के नागपुर एवं ऐरोली (नवी मुंबई) में प्रति कार्यक्रम मात्र आधे टैंकर से भी कम (साढ़े तीन हजार लीटर) पानी द्वारा री होली खेली गयी। साजिशकर्ताओं ने पानी की इस परम बचत को भी ʹलाखों लीटर पानी की बरबादीʹ के रूप में दुष्प्रचारित कर देश की जनभावना के साथ खिलवाड़ किया है। इतने बड़े जनसमूह में प्रति व्यक्ति मात्र 30 से 60 मि.ली. (आधे गिलास से भी कम) पानी इस्तेमाल हुआ। इस प्रकार सामूहिक होली के एक कार्यक्रम द्वारा एक करोड़ लीटर से भी अधिक पानी की बचत होती है।

प्राकृतिक होली से कपड़ों की सफाई के लिए जरूरी साबुन, वॉशिंग पाउडर की बचत होती है और कपड़ों की भी बचत होती है। इस प्रकार पूज्य बापू जी के प्राकृतिक होली प्रकल्प से करोड़ों-अरबों रूपये की स्वास्थ्य-सुरक्षा हो जाती है, साथ ही यह करोड़ों रूपयों की आर्थिक सम्पदा को बढ़ाने वाला सिद्ध होता है। उसे पानी के बिगाड़ के नाम से कुप्रचारित करने वाले कौन हैं, सब समझते हैं। यह सब किसके इशारे पर हो रहा है और कौन करवा रहा है, सब समझते हैं।

कैसे किया गया गुमराह ?

ऐरोली (नवी मुंबई) व सूरत कार्यक्रमों के दिन देशवासियों को महाराष्ट्र के बीड़, जालना, सांगली, उस्मानाबाद इत्यादि उन स्थानों के अकालग्रस्तों के इन्टरव्यू दिखाये गये जहाँ होली कार्यक्रम हुआ ही नहीं था। वेटिकन फंड से चलने वाला मीडिया के तबके ने खाली मटके दिखा-दिखाकर, एक परोपकारी महापुरुष के पानी की बचत के इस अभियान से समाज को दूर करने का भरसक प्रयास किया। परंतु इस देश की जागृत जनता पर उसका असर क्या रहा यह इसी पत्रिका के रंगीन मुखपृष्ठों पर देखा जा सकता है।

यह कैसा न्याय है ?

प्रचारित किया गया कि ऐरोली कार्यक्रम में सत्संगियों ने पत्रकारों के साथ मारपीट की। साजिशकर्ता दल के लोगों से जब पूछा गया कि ʹकितनों को मारा ?ʹ तो बोलेः ʹएक को।ʹ

ʹवह तो घूम रहा है। मारने का नाटक करने वाला तुम्हारे ही दल का आदमी था। बापू के भक्त मारेंगे तो एक को ही क्यों मारेंगे ? यह तो तुम्हारी सोची-समझी साजिश थी।ʹ

तो चुप हो गये लेकिन बाद में कुच्रक चलाया गया। कुछ पुलिसवाले सिविल ड्रेस में आकर सत्संग सुन रहे निर्दोष सत्संगियों को ʹसाहब बुला रहे हैं, थोड़ा हमारे साथ चलियेʹ ऐसा झूठ बोलकर धोखे से एक-एक करके ले गये और पुलिस वैन से ले जाकर लॉकअप में बंद कर दिया। एक चैनल के कैमरामैन द्वारा दर्ज मामले में अलग-अलग अनेका धाराएँ लगाकर कुल 25 निर्दोष सत्संगियों व आयोजकों को दो दिन लॉकअप में व एक दिन जेल में बंद रखा गया। कुछ पत्रकारों ने पुलिसवालों को बताया कि ʹये-ये भाई तो हमें बचा रहे थेʹ तो भी उऩ्हें छोड़ा नहीं गया। 25 निर्दोषों को गुनहगारों के बीच जेल में रखा गया। मूल अपराधियों को खोजने की कोई भी कोशिश नहीं की गयी। सम्भव है कि पुलिसवाले उनसे साजिश में मिले जुले हों। इस प्रकार समाज के रक्षक के रूप में तैनात पुलिस ने ही निर्दोष लोगों के भक्षक बनकर भगवान को चाहने वाले भगवान के प्यारों पर जुल्म किया, यह कैसा न्याय है ? समाज की सेवा में तन-मन-धन अर्पित करने वाले परोपकारी पुण्यात्माओं पर अत्याचार का कहर बरसाया गया, यह कहाँ की नीति है ?

देशभर की समितियों और साधकों में बड़ा रोष है। पुलिस अधिकारी नासिर पठान साहब और तुच्छ चैनलों ने हिन्दू समाज की भावनाओं पर भाला घोंपने के कितने पैसे ऐंठे हैं ? सरकार में सच्चाई है तो इस विषय की गहराई से सीबीआई जाँच क्यों नहीं करवाती ? निर्दोषों को फँसाने में सीबीआई का उपयोग होता है। विश्व के करोड़ों हिन्दूओं की भावनाओं पर भाला घोंपनेवालों पर सीबीआई क्यों नहीं बिठाते ? स्वामी रामदेव जैसे संत पर तो सीबीआई बिठा दी, मिला कुछ नहीं। इन मानवताद्रोहियों पर सीबीआई क्यों नहीं बिठाते ? हिन्दू समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले ऐसे अभागे चैनलों पर कार्यवाही और पुलिस अधिकारी नासिर पठान के निलम्बित क्यों नहीं करते ? उऩकी सीबीआई जाँच क्यों नहीं कराते ? क्या सीबीआई हिन्दू संतों को सताने के लिए रखी गयी है ?

पानी का सदुपयोग करने वाले निर्दोष 25 लोगों को जेल में डाला गया। क्या इन सत्संगियों के पक्ष में कोई वकील, न्यायाधीश, राजनेता मानवता की महत्ता दिखा सकता है ? अपना सज्जनता भरा सलाह-मशविरा दे सकता है, आवाज उठा सकता है ? निर्दोषों के साथ जुल्म करने वालों को निलम्बित करा सकता है ? मीडिया और नासिर पठान जैसे पुलिस अधिकारी ऐसे अत्याचार कब तक  करते रहेंगे ?

उल्हासनगर में उल्हास नदी और मुंबई में समुद्र है। मुंबई में इतने बड़े भक्त-समुदाय के लिए होली हेतु केवल साढ़े तीन हजार लीटर पानी इस्तेमाल हुआ, जो कि आधा टैंकर भी नहीं होता। फिर भी 25 निर्दोष आदमियों को घूस खाये हुए पुलिस अधिकारी पठान साहब के कुचक्र से हिरासत में ले लिया गया, झूठा केस कर दिया गया। उनका दोष यही था कि वे होली-कार्यक्रम की सेवा में आये थे। इतना जुल्म हिन्दुस्तान कब तक सहता रहेगा ?

यह है हकीकत !

ʹऐसोसियेटिड चैंबर ऑफ कामर्स एंड इन्डस्ट्रीज ऑफ इंडियाʹ के सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में गत वर्षों में होली के रंगों तथा पिचकारी, गुब्बारे एवं खिलौनों के 15000 करोड़ रूपये के व्यापार के अधिकांश हिस्से पर चीन अधिकार जमा चुका है। उदाहरण के तौर पर पिचकारियों के व्यापार में चीन का 95 प्रतिशत कब्जा है। इस कारण भारत में लघु व मध्यम उद्योगों के क्षेत्र में 75 प्रतिशत लोगों की रोजी रोटी छिन गयी है। लाखों लोग बेरोजगार हुए हैं और अधिकांश पैसा चीन जा रहा है। जबकि प्राकृतिक होली के द्वारा पलाश के फूल इकट्ठे करने वाले देश के असंख्य गरीबों, वनवासियों एवं आदिवासियों को रोजगार मिल रहा है। भारत के लघु एवं मध्यम उद्योगों को पुनर्जीवन मिल रहा है। रोगहारी ब्रह्मवृक्ष पलाश के फूलों से बना शरबत अनकों सत्संगों में करोड़ों लोग अभी तक पी चुके हैं ! पूज्य बापू की प्रेरणा से आश्रम व समितियों द्वारा स्वास्थ्यप्रद पेय जल गर्मी से तप्त भारत के अऩेक क्षेत्रों में पलाश, आँवला या गुलाब शरबत वितरण केन्द्रों तथा छाछ व जल की प्याउओं के माध्यम से कई वर्षों से निःशुल्क बाँटा गया है। ये सुंदर सेवाकार्य क्यों नहीं दिखाते ? यदि धर्मांतरणवालों के होते तो बढ़ा-चढ़ा कर दिखाते।

पानी की बरबादी किसे कहते हैं ? और वह कहाँ हो रही है ?

महाराष्ट्र के केवल एक देवनगर कत्लखाने में प्रतिदिन 18 लाख लीटर पीने का पानी बरबाद होता है। पानी को बरबाद करने वाले ऐसे अनेकों वैध-अवैध कत्लखाने हैं। 1 लीटर कोल्डड्रिंक बनाने में 55 लीटर पानी बरबाद होता है। देश में सॉफ्टड्रिंक्स बनाने वाली कई विदेशी  कम्पनियाँ हैं। अकेली पेप्सीको कम्पनी प्रतिवर्ष 5 अरब 16 करोड़ 80 लाख लीटर से ज्यादा पानी का दुरुपयोग करती है। देश के 8 सूखाग्रस्त इलाकों में उनके कारखाने चलते हैं, जो स्थानिक लोगों की जल-समस्या का संकट बढ़ाते हैं, विशेषतः ग्रीष्म ऋतु में जब उनका उत्पादन बढ़ जाता है। फाइव स्टार होटलों के आलीशान स्विमिंग टैंक्स व रिसॉर्टस के ʹरेन डान्सʹ, ʹपूल पार्टियोंʹ लाखों लीटर पानी की बरबादी की जाती है। आईपीएल क्रिकेट मैचों हेतु एक मैदान के रख-रखाव के लिए प्रतिदिन 60 हजार लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। यदि 36 दिन में तक आईपीएल मैच चलेंगे तो 21 लाख 60 हजार लीटर पानी प्रत्येक मैदान में खर्च किया जायेगा। तीन मैदानों के लिए कुल 64 लाख 80 हजार लीटर पानी बरबाद होगा। महाराष्ट्र विधान परिषद में विपक्ष के नेता श्री विनोद तावडे ने ये तथ्य उजागर किये हैं। उन्होंने ही राज्य में बियर बनाने के लिए उपलब्ध कराये जा रहे पानी के आँकड़े पेश किये, जो बहुत ही चौंकाने वाले हैं।

दुरुपयोग के लिए छूट

मिलेनियम बियर इंडिया लिमिटेड को 1288 करोड़ लीटर से दुगना करके 2014 लीटर करोड़ लीटर पानी दिया जा रहा है।

फॉस्टर्स इंडिया लिमिटेड को 888.7 करोड़ लीटर से बढ़ाकर 1000.7 करोड़ लीटर।

इंडो-यूरोपियन बीवरेजस को 242.1 करोड़ लीटर से बढ़ाकर 470.1 करोड़ लीटर।

औरंगाबाद ब्रिवरी को 1400.3 करोड़ लीटर से बढ़ाकर 1462.1 करोड़ लीटर।

महाराष्ट्र में शराब बनाने के 90 कारखाने हैं। जिन क्षेत्रों में ये कारखाने हैं, उन्हीं क्षेत्रों में अकाल विकराल रूप धारण करता जा रहा है। इस प्रकार जनता के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य को नष्ट करने वाले शराब व कोल्डड्रिंक्स के कारखानों एवं कत्लखानों में प्रतिदिन करोड़ों लीटर पानी बरबाद होता है।

नागपुर, अमरावती व मुंबई क्षेत्र के समाचार पत्रों के अनुसार वहाँ लाखों लीटर पानी पाइपलाइन लीकेज, टूटे नल आदि के कारण बरबाद हो रहा है। कुछ दिन पहले पिम्परी (पुणे) में एक मुख्य पाइपलाइन टूट जाने से लाखों लीटर पानी बरबाद हो गया। यह जो पानी बहता है, सीधा नालियों में जाता है। होली का पलाश-रंग शरीरों पर गिरता है, जो कि निरोगता, स्वास्थ्य, प्रसन्नता तथा सुहृदता प्रदान करता है।

….तो किसानों को आत्महत्या करने की नौबत नहीं आती !

ʹदिव्य भास्करʹ समाचार पत्र

ʹदिव्य भास्करʹ समाचार पत्र ने सवाल उठाया है कि ʹनागपुर में संत आशारामजी बापू द्वारा जितना पानी उपयोग किया गया, उससे एक लाख गुना ज्यादा पानी सूखाग्रस्त अमरावती स्थित इंडिया बुल्स कम्पनी में उपयोग किया जाता है, फिर भी महाराष्ट्र सरकार के पेट का पानी नहीं हिलता ! अगर यही पानी सिंचाई के लिए किसानों को दिया जाता तो यह पानी 25000 किसानों की खेतों में पहुँचता और किसानों को आत्महत्या करने की नौबत नहीं आती ! महाराष्ट्र सरकार चाहे तो इस पानी के द्वारा अकाल का मुकाबला कर सकती है।ʹ

देश की जनता का सवाल

हिन्दुओं के होली त्यौहार का विरोध करने वाला वह देशद्रोही संगठन शराब, कोल्डड्रिंक्स, गोहत्या आदि के लिए अरबों लीटर पानी की बरबादी की वजह से पानी के अभाव में किसानों की आत्महत्याएँ देखकर भी क्यों अपनी लोभी आँखें मूँदकर बगुले की तरह बैठा है ? हिन्दुओं का साढ़े तीन हजार लीटर पलाश का स्वास्थ्यवर्धक रंग उसे देश के पानी की बरबादी लगती है तो लम्बे समय से हो रही यह अरबों लीटर पानी की बरबादी देखकर भी उसका तथाकथित देशप्रेम कौन-सी हड्डी चबाने चला जाता है ? यह देश की जनता का सवाल है।

जिस दिन वह देशद्रोही अंध संगठन व वेटिकन मीडिया नागपुर में आधे टैंकर से भी कम पानी के लिए अकाल का नाम लेकर हिन्दुओं के होली त्यौहार का विरोध कर रहे थे, उसी दिन महाराष्ट्र के एक मंत्री सूखाग्रस्त इलाकों का दौरा करने अहमदनगर आये थे और उनके हैलिकॉप्टर की धूल न उड़े इसलिए 41 टैंकर (लाखों लीटर) पानी का छिड़काव किया गया। तब ये कहाँ गये थे ? यह वहाँ की जनता का सवाल है।

कुछ देशद्रोही, विदेशी पैसों पर पलने वाले एनजीओ (गैर-सरकारी संगठन) और इनका साथ देने वाली वेटिकन मीडिया लॉबी भारतीय त्यौहारों पर प्रहार कर हमारी सांस्कृतिक विरासत को मिटाने का कुप्रयास कर रहे हैं। अंधश्रद्धा-उन्मूलन के नाम पर सनातन धर्म को नष्ट करने का प्रयास करने वाले कुतर्कवादियों से बड़ा अंधश्रद्धालु मिलना मुश्किल है। अब उनका ही उन्मूलन करना पड़ेगा। ऐसे पाखंडी, छद्म समाजसेवकों से समाज सावधान हो जाये तथा ऐसे बिकाऊ वेटिकन चैनलों को न देखकर इनका बहिष्कार करे क्योंकि धर्मो रक्षति रक्षितः। ʹधर्म उसी की रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करता है।ʹ

श्री केशव सेन, मुख्य सम्पादक, न्यूज पोस्ट, समाचार पत्र

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स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2013, पृष्ठ संख्या 4-7, अंक 244

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मदर टेरेसाः कर्म से नहीं, मीडिया से बनी संत


कनाडा की मोंट्रियाल यूनिवर्सिटी के सर्ज लैरिवी, जेनेवीव चेनचार्ड तथा ओटावा यूनिवर्सिटी के कैरोल सेनेवाल इन शोधकर्ताओं ने मदर टैरेसा पर किये गये शोध के द्वारा ईसाई सेवाभाव के खोखलेपन को उजागर किया है। रिपोर्ट में, जिसके मुख्य निष्कर्ष विश्वभर के समाचार पत्रों में छपे हैं, कहा गया है कि मदर टेरेसा ʹसंतʹ नहीं थी।

शोध टीम का नेतृत्व कर रहे प्रो. लिरवी ने कहाः “नैतिकता पर होने वाली एक विचारगोष्ठी के लिए परोपकारिता के उदाहरणों की खोज करते हुए हमारी नजर कैथोलिक चर्च की उस महिला के जीवन व क्रियाकलापों पर पड़ी, जो मदर टेरेसा के नाम से जानी जाती हैं और जिनका वास्तविक नाम एग्नेस गोंक्सहा था। हमारी उत्सुकता बढ़ गयी तथा हम और अधिक अनुसंधान करने के लिए प्रेरित हुए।”

तथ्यों ने किया मदर टेरेसा की झूठी महिमा का पर्दाफाश

मदर टेरेसा के बारे में पूर्व-प्रकाशित लगभग सम्पूर्ण (96 प्रतिशत) साहित्य का अध्ययन करने के पश्चात् शोधकर्ताओं ने पाया कि तथ्यों से मदर टेरेसा की झूठी महिमा की पोल खुल जाती है। मदर टेरेसा की छवि असरदार मीडिया-प्रचार के कारण थी, न कि किसी अन्य कारण से। वेटिकन चर्च ने मदर टेरेसा को ʹधन्यʹ (beatified) घोषित किया वह खाली होती हुई चर्चों की ओर लोगों को आकर्षित करने के लिए कहा था। वेटिकन चर्च ने मदर टेरेसा को ʹधन्यʹ घोषित करते समय रोगियों की सेवा के उनके संदेहास्पद ढंग, रोगियों की पीड़ा कम करने के स्थान पर उस पर गौरव अनुभव करने की विचित्र प्रवृत्ति, उनके संदिग्ध प्रकार के राजनेताओं से संबंध और उनके द्वारा एकत्रित प्रचुर धनराशि के संश्यास्पद उपयोग-इन सभी तथ्यों को नजर अंदाज किया।

किसी मिशनरी को ʹधन्यʹ घोषित करने के लिए उसके निधन के बाद एक चमत्कार का होना आवश्यक माना जाता है। मदर टेरेसा के चमत्कार का पर्दाफाश करते हुए साइंस एंड रेशनलिस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया के जनरल सेक्रेटरी श्री प्रबीर घोष ने कहा कि ʹएक आदिवासी महिला मोनिका बेसरा को पेट में टी.बी. का टयूमर था और उसने मदर की प्रार्थना की और मदर का फोटो पेट पर रखा, जिससे वह स्वस्थ हो गयी यह बात  बकवाद है। उस महिला के चिकित्सक डॉक्टर तरूण कुमार बिस्वास और डॉक्टर रंजन मुस्ताफी ने कहा कि उसने 9 महीने तक टीबी का उपचार किया था, जिससे वह महिला स्वस्थ हुई थी।ʹ

वित्तिय अपारदर्शिता व सिद्धान्तहीनता

मदर टेरेसा पीड़ितों के लिए प्रार्थना करने में उदार किन्तु उऩके नाम पर एकत्रित अरबों रूपयों को खर्च करने में कंजूस थीं। अनेक बार आयी बाढ़ जैसी आपदाओं तथा ʹभोपाल गैस त्रासदीʹ के समय उन्होंने प्रार्थनाएँ तो बहुत कीं लेकिन अपनी फाऊँडेशन से कोई आर्थिक सहायता प्रदान नहीं की। उनके द्वारा चलाये जा रहे अस्पतालों की हालत दयनीय पायी ।

मदर टेरेसा के 100 से अधिक देशों 517 मिशन यानी ʹमरणासन्न व्यक्तियों के घरʹ (Homes for the dying) थे। गरीब रोगी इन मिशनों में आते थे। कोलकाता में इऩ मिशनों की जाँच करने वाले डॉक्टरों ने पाया कि उन रोगियों मे दो तिहाई की ही डॉक्टरी इलाज मिलने की आशा पूर्ण हो पाती थी, शेष एक तिहाई इलाज के अभाव में मृत्यु का ही इंतजार करते थे। डॉक्टरों ने पाया कि इन मिशनों में सफाई का अभाव, यहाँ तक कि गँदगी थी, सेवा-शुश्रुषा, भोजन तथा दर्दनाशक दवाइयों का अभाव था। पूर्व में भी चिकित्सा-जगत के सुप्रतिष्ठित जर्नलों (पत्रिकाओं) – ʹब्रिटिश मेडिकल जर्नलʹ व ʹलैन्सेटʹ ने इन मरणासन्न व्यक्तियों के घरों की दुर्दशा को उजागर किया था। ʹलैन्सेटʹ ने सम्पादकीय में यहाँ तक कहा कि ʹठीक हो सकने वाले रोगियों को भी लाइलाज रोगियों के साथ रखा जाता था और वे संक्रमण तथा इलाज न होने से मर जाते थे।ʹ

इन सब के लिए धन का अभाव जैसा कोई कारण नहीं था। प्रो. लिरवी कहते हैं कि  ʹअरबों रूपये ʹमिशनरीज ऑफ चैरिटीʹ के अनेकों बैंक खातों में जमा किये जाते थे किंतु अधिकांश खाते गुप्त रखे जाते थे। ….जैसी कृपणता से मदर टेरेसा द्वारा स्थापित कार्य चलाये गये, सवाल उठता है कि गरीबों के लिए इकट्ठा किये गये करोड़ों डॉलर गये कहाँ ?ʹ पत्रकार क्रिस्टोफर हिचेंस के अनुसार धन का उपयोग मिशनरी गतिविधियों के लिए होता था।

शोधकर्ताओं के अनुसार धन कहीं से भी आये, टेरेसा उसका स्वागत करती थीं। हैती () देश की भ्रष्ट व तानाशाह सरकार से प्रशस्ति-पत्र तथा धन प्राप्त करने में उन्हें कोई संकोच नहीं हुआ। मदर टेरेसा ने चार्ल्स कीटिंग नामक व्यक्ति से, जो कि ʹकीटिंग फाइव स्कैंडलʹ नाम से जानी जाने वाली धोखाधड़ी में लिप्त था, जिसमें गरीबी लोगों को लूटा गया था, 12.50 लाख डॉलर (6.75 करोड़ रूपये) लिए और उसके गिरफ्तार होने से पूर्व तथा उसके बाद उसको समर्थन दिया।

क्रॉस पर चढ़े जीसस की तरह बीमार भी सहे पीड़ा – मदर टेरेसा

जो लोग मदर टेरेसा को निर्धनों का मसीहा, गरीबों की मददगार, दया-करूणा की प्रतिमूर्ति कहते हैं, वे मदर टेरेसा का यह असली चेहरा देखकर तो सहम ही जायेंगे – शोधकर्ताओं के अनुसार मदर टेरेसा को गरीब-पीड़ितों को तड़पते देखकर सुंदर लगता था। क्रिस्टोफर हिचेंस की आलोचना के प्रत्युत्तर में मदर टेरेसा ने कहा थाः “निर्धन लोगों को अपने दुर्भाग्य को स्वीकार कर ईसा मसीह के समान पीड़ा सहन करने में एक सुंदरता है। इनके पीड़ा सहन करने से विश्व को लाभ होता है।”

हिचेंस बताते हैं कि एक इंटरव्यू में मंद मुस्कान के साथ मदर टेरेसा कैमरे के सामने कहती हैं कि “मैंने उस रोगी से कहाः तुम क्रॉस पर चढ़े जीसस की तरह पीड़ा सह रही हो, इसलिए जीसस जरूर तुम्हें चुंबन कर रहे होंगे।” टेरेसा की इस मानसिकता का  प्रत्यक्ष परिणाम दर्शाने वाला तथ्य पेश करते हुए रेशनेलिस्ट इंटरनेशनल के अध्यक्ष सनल एडामारूकु लिखते हैं- “वहाँ रोगियों को दवा के अभाव में खुले घावों में रेंगते कीड़ों से होने वाली पीड़ा से चीखते हुए सुना जा सकता था।ʹ

शोधकर्ताओं के अनुसार जब खुद मदर टेरेसा के इलाज की बारी आयी तो टेरेसा ने अपना इलाज आधुनिकतम अमेरिकी अस्पताल में करवाया।

इस प्रकार ईसाई मिशनरियों के सेवाभाव के खोखलेपन के साथ उनके वैचारिक दोमुँहेपन एवं विकृत अंधश्रद्धा को भी शोधकर्ताओं ने दुनिया के सामने रख दिया है।

ईसाई धर्म में जीवित अवस्था में किसी को संत नहीं माना जाता। प्रारम्भ में तो अन्य धर्म के साथ युद्ध में जो शहीद हो गये थे, उनको ईसाई लोग संत मानते थे। बाद में अन्य विशिष्ट मिशनरियों एवं अन्य कार्यकर्ताओं को पोप के द्वारा उनके देहांत के बाद उनके ईश्वरीय प्रेम की प्राप्ति का दावा किसी बिशप के द्वारा करने पर और उस पर विवाद करने के बाद कम से कम एक चमत्कार के आधार पर संत घोषित करने की प्रथा चल पड़ी। इसलिए ईसाई संतों को कोई आध्यात्मिक महापुरुष नहीं मान सकते। जिनको ईश्वर प्राप्त नहीं हुआ है ऐसे पोप के द्वारा जिसे संत घोषित किया जाता हो वह महापुरुष नहीं हो सकता। इस प्रकार सनातन धर्म के संतों में और ईसाई संतों में बड़ा अंतर है। फिर भी भारत के मीडिया द्वारा विधर्मी पाखंडियों को आदरणीय संत के रूप में प्रचारित करने और लोक कल्याण में रत भारत के महान संतों को आपराधिक प्रवृत्तियों में संलग्न बताकर बदनाम करने का एकमात्र कारण यह है कि अधिकांश भारतीय मीडिया ईसाई मिशनरियों के हाथ में है और वे लाखों करोड़ों डॉलर लुटाकर भी हिन्दू धर्म को बदनाम करते हैं।

संदर्भः DNA, Times of India, www.wsfa.com etc.

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2013, पृष्ठ संख्या 20,21, अंक 244

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गुरु कृपा से मिला नया जीवन


मैं ग्वालियर आश्रम में सत्साहित्य सेवा केन्द्र में सेवा करता हूँ। 2 फरवरी 2013 को दोपहर 2.30 बजे फाइलें लेकर हिसाब कर रहा था तभी अचानक मैं कुर्सी से गिर गया। मेरा शरीर अकड़ने लगा, मुँह से झाग निकलने लगी और मैं बेहोश हो गया।

मुझे बाद में बताया गया कि आश्रम के साधकों ने मेरी हालत देखकर मुझे तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया। जाँच के बाद डॉक्टर ने कहा कि “मलेरिया का बुखार दिमाग पर चढ़ गया है और कुछ भी हो सकता है। अतः इसके घरवालों को सूचित कर शीघ्र बुला लें।”

ऐसी विकट परिस्थिति में तुरंत पूज्य बापू जी तक खबर पहुँचायी गयी। करूणासिंधु बापू जी ने कहा कि “उसे सुबह-शाम तुलसी का रस दो और सतराम को कहना कि बापू जी ने कहा है कि तू ठीक हो जायेगा।” साथ ही होश में आने पर आरोग्य मंत्र का जप करने का भी निर्देश दिया। बापू जी तक खबर का पहुँचना और मेरी स्थिति में सुधार होना – ये एक ही समय हुई दो घटनाएँ मेरे गुरुभाइयों ने प्रत्यक्ष देखीं। 2-3 घंटों में ही मैं पूरी तरह होश में आ गया।

कैसी है गुरुदेव की करूणा-कृपा, जो अपने भक्तों की पुकार सुनते ही उनकी तुरंत सँभाल करते हैं। 3-4 दिनों में ही मैं स्वस्थ हो आश्रम आ गया। लौटते समय डॉक्टर ने कहा कि “आपका बहुत बुरा समय था जो कि टल गया।”

आश्चर्य की बात एक और भी है, 30 जनवरी को मेरे लिए पूज्यश्री से प्रयाग कुम्भ के सत्संग में जाने की आज्ञा माँगी गयी थी परंतु अंतर्यामी गुरुदेव मेरा नाम सुनकर मौन हो गये थे। जो उस अकाल पुरुष परमात्मा में एकाकार हुए हों, उन्हें तीनों कालों का पता चल जाये तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है ! अगर मैं आज्ञा बिना चला जाता तो पता नहीं क्या दुर्गति होती ! आज्ञा न मिलने पर रूका रहा तो सुरक्षा हो गयी, जीवनदान मिल गया।

गुरु की सेवा साधु जाने। गुरूसेवा क्या मूढ़ पिछाने।।

मैं तो इसमें जोडना चाहूँगा-

गुरुआज्ञा फल साधक जाने। गुरुआज्ञा क्या मूढ़ पिछाने।।

ऐसे अंतर्यामी, परम सुहृद पूज्य बापू जी के श्रीचरणों में शत-शत प्रणाम।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2013, पृष्ठ संख्या 31, अंक 244

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