शरद पूनम की रात दिलाये आत्मशांति, स्वास्थ्यलाभ – पूज्य बापू जी

शरद पूनम की रात दिलाये आत्मशांति, स्वास्थ्यलाभ – पूज्य बापू जी


(शरद पूर्णिमाः 7 अक्तूबर 2014)

आश्विन पूर्णिमा को ‘शरद पूर्णिमा’ बोलते हैं। इस दिन रास-उत्सव और कोजगर व्रत किया जाता है। प्रेमभाव में रमण करने वाली गोपियों को शरद पूर्णिमा की रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण ने बंसी बजाकर अपने पास बुलाया और ईश्वरीय अमृत का पान कराया था। अतः शरद पूर्णिमा की रात्रि का विशेष महत्व है। इस रात को चन्द्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ पृथ्वी पर शीतलता, पोषक शक्ति एवं शांतिरूपी अमृतवर्षा करता है।

शरद पूनम की रात को क्या करें, क्या न करें ?

दशहरे से शरद पूनम तक चन्द्रमा की चाँदनी में विशेष हितकारी रस, हितकारी किरणें होती हैं। इन दिनों चन्द्रमा की चाँदनी का लाभ उठाना, जिससे वर्षभर आप स्वस्थ और प्रसन्न रहें। नेत्रज्योति बढ़ाने के लिए दशहरे से शरद पूर्णिमा तक प्रतिदिन रात्रि में 15 से 20 मिनट तक चन्द्रमा के ऊपर त्राटक करें।

अश्विनी कुमार देवताओं के वैद्य हैं। जो भी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयी हों, उनको पुष्ट करने के लिए चन्द्रमा की चाँदनी में खीर रखना और भगवान को भोग लगाकर अश्विनी कुमारों से प्रार्थना करना कि ‘हमारी इन्द्रियों का बल-ओज बढ़ायें।’ फिर वह खीर खा लेना।

इस रात सूई में धागा पिरोने का अभ्यास करने से नेत्रज्योति बढ़ती है।

शरद पूनम दमे की बीमारीवालों के लिए वरदान का दिन है। अपने सभी आश्रमों में निःशुल्क औषधि मिलती है, वह चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर में मिलाकर खा लेना और रात को सोना नहीं। दमे का दम निकल जायेगा।

चन्द्रमा की चाँदनी गर्भवती महिला की नाभि पर पड़े तो गर्भ पुष्ट होता है। शरद पूनम की चाँदनी का अपना महत्व है लेकिन बारहों महीने चन्द्रमा की चाँदनी गर्भ को और औषधियों को पुष्ट करती है।

अमावस्या और पूर्णिमा को चन्द्रमा के विशेष प्रभाव से समुद्र में ज्वार-भाटा आता है। जब चन्द्रमा इतने बड़े दिगम्बर समुद्र में उथल-पुथल कर विशेष कम्पायमान कर देता है तो हमारे शरीर में जो जलीय अंश है, सप्तधातुएँ हैं, सप्त रंग हैं, उन पर भी चन्द्रमा का प्रभाव पड़ता है। इन दिनों में अगर काम-विकार भोगा तो विकलांग संतान अथवा जानलेवा बीमारी हो जाती है और यदि उपवास, व्रत तथा सत्संग किया तो तन तंदरुस्त, मन प्रसन्न और बुद्धि में बुद्धिदाता का  प्रकाश आता है।

खीर को बनायें अमृतमय प्रसाद

खीर को रसराज कहते हैं। सीता जी को अशोक वाटिका में रखा गया था। रावण के घर का क्या खायेंगी सीता जी ! तो इन्द्रदेव उन्हें खीर भेजते थे।

खीर बनाते समय चाँदी का गिलास आदि जो बर्तन हो, आजकल जो मेटल (धातु) का बनाकर चाँदी के नाम से देते हैं वह नहीं, असली चाँदी के बर्तन अथवा असली सोना धो-धा के खीर में डाल दो तो उसमें रजतक्षार या सुवर्णक्षार आयेंगे। लोहे की कड़ाही अथवा पतीली में खीर बनाओ तो लौह तत्व भी उसमें आ जायेगा। इलायची, खजूर या छुहारा डाल सकते हो लेकिन बादाम, काजू, पिस्ता, चारोली ये रात को पचने में भारी पड़ेंगे। रात्रि 8 बजे महीन कपड़े से ढँककर चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर 11 बजे के आसपास भगवान को भोग लगा के प्रसादरूप में खा लेनी चाहिए। लेकिन देर रात को खाते हैं इसलिए थोड़ी कम खाना और खाने से पहले एकाध चम्मच मेरे हवाले भी कर देना। मुँह अपना खोलना और भाव करनाः ‘लो महाराज ! आप भी लगाओ भोग।’ और थोड़ी बच जाये तो फ्रिज में रख देना। सुबह गर्म करके खा सकते हो।

(खीर दूध, चावल, मिश्री, चाँदी, चन्द्रमा की चाँदनी – इन पंचश्वेतों से युक्त होती हैं, अतः सुबह बासी नहीं मानी जाती।)

शरदपूनम का कल्याणकारी संदेश

रासलीला इन्द्रियों और मन में विचरण करने वालों के लिए अत्यंत उपयोगी है लेकिन राग, ताल, भजन का फल है भगवान में विश्रांति। रासलीला के बाद गोपियों को भी भगवान ने विश्रांति में पहुँचाया था। श्रीकृष्ण भी इसी विश्रांति में तृप्त रहने की कला जानते थे। संतुष्टि और तृप्ति सभी की माँग है। चन्द्रमा की चाँदनी में खीर पड़ी-पड़ी पुष्ट हो और आप परमात्म-चाँदनी में विश्रांति पाओ।

चन्द्रमा के दर्शन करते जाना और भावना करना कि ‘चन्द्रमा के रूप में साक्षात् परब्रह्म-परमात्मा की रसमय, पुष्टिदायक रश्मियाँ आ रही हैं। हम उसमें विश्रांति पा रहे हैं। पावन हो रहा है। मन, पुष्ट हो रहा है तन, ॐ शांति… ॐ आनंद…’ पहले होंठों से, फिर हृदय से जप और शांति…. निःसंकल्प नारायण में विश्रांति, परमात्म-ज्ञान के बिना भौतिक सुख-सुविधाएँ कितनी भी मिल जायें लेकिन जीवात्मा की प्यास नहीं बुझेगी, तपन नहीं मिटेगी।

देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ।

(रामायण)

श्रीकृष्ण गोपियों से कहते हैं कि “तुम प्रेम करते-करते बाहर ही बाहर रूक न जाओ बल्कि भीतरी विश्रांति द्वारा मुझ अपने अंतरात्मा प्रेमास्पद को भी मिलो, जहाँ तुम्हारी और हमारी दूरी खत्म हो जाती है। मैं ईश्वर नहीं, तुम जीव नहीं, हम सब ब्रह्म हैं – वह अवस्था आ जाय।” श्रीकृष्ण जो कहते हैं, उसको कुछ अंश में समझकर हम स्वीकार कर लें, बस हो गया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2014, पृष्ठ संख्या 14,15 अंक 261

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