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गुरुभक्त भाई मुंज


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नारायण, नारायण…

जिसके जीवन में सतगुरु का ज्ञान नहीं है, ज्ञान के मुताबिक आचरण नहीं है, उसका जीवन चाहे बाहर से कितना भी सुखी और स्वतंत्र दिखे, लेकिन वो मक्खी और कौवे-कुत्ते भी सुखी, स्वतंत्र दिखते हैं लेकिन दिखने भर को हैं, दुर्गति ही है उनकी..  ऐसे ही हमारा मन तितली की नाईं, मुर्गे, मच्छर की नाईं मनमुख होकर जीवन बर्बाद हो गया, इसकी अपेक्षा हरगोविंद का शिष्य मुंज, बड़ा भारी जमींदार था ।

 

देखा कि आयुष बीत रही है । अर्जुन देव का, आयुष बीत रही है । कुलदेवी की उपासना तो बहुत की ।  बापदादों ने भी कुलदेवी को माना, पूजा किया लेकिन ये मानी हुई पूजा, ये तो बहुत हो गया, जाना हुआ रब को पहचाना जरूरी है ।

 

गुरु अर्जुन देव के पास आया भाई मुंज । गुरु महाराज मेरे को अपना शिष्य बनाओ ।

बोले – क्या करते हो ?

बोले मैं बड़ा जमींदार हूँ, मेरे पास ऐसा-ऐसा भी है और कुल खानदान का मंदिर बनाया हुआ है ।  हमारे कुलदेवी का । और भी बहुत लोग दर्शन करने भी आते हैं, यहाँ ।

तो बोले – अभी तो जा फिर मंदिर के देवता को रिझाता फिरो ।

बोले – नहीं देव आप का शिष्य बनना चाहता हूँ ।

तो बोले – जाओ वो मंदिर-वन्दिर हटवा दो पहले ।

कुल परम्परा से मानते हैं बोले देवता के मंदिर को हटवा दो, तुड़वा दो । मंदिर तुड़वा के आ गया ।

कैसा ?

बोले – समाज ने बहुत विरोध किया तो मेरे को गिरा हुआ आदमी मानते हैं । लेकिन मैं आपका हूँ, आपके चरणों में ही गिरा हूँ तो ठीक है ।

गुरु ने कहा – ठीक ।

अब क्या हुआ, समाज विरुद्ध हो गया । तो जो कुछ लेना-देना करने वाले थे देने वालों ने पैसा देने से इंकार कर दिया, लेने वाले एक साथ आकर जम गये । पूरा समाज एंटी हो गया ना । जिसको पैसे दिए हुए थे, व्यवहार में अपना, उन्होंने बोला हम नहीं देंगें । मंदिर भी तुड़वा दिया, हम नहीं देंगें, जो करना है, करो । और लेने वालों ने बोला अभी रखो । तो सारी जमीन गिरवी रख दी । लेनदारों को पैसे दे दिए । अब वो जमाने में जमीन गिरवी रख दे, तो जिसको जमीन गिरवी रखे वो तो खेड़े । पैसे दे तब कब्जा मिले । और ब्याज चालू १२ टका । रूपये पर दो आना ब्याज, १२% ब्याज । और जो जमींदार की जमीन तो पूरी हो गयी साल-दो साल में तो । वो उस गाँव से रवाना हुआ । किसी दूसरे गाँव में परिवार को बसाया और घास काटते, मजूरी करके घास लेकर बाजार में बेचने जाते ।

गुरु ने देखा कि अभी भी श्रद्धा टिकी है, मेरा शिष्य बनने को अभी भी मन तो करता है, चलो, ठीक है, लेकिन देखें कितना पक्का है ।

गुरु ने एक चिट्ठी भेजी और सेवक को बोला कि जब बीस रुपय दे तब देना चिट्ठी ।

वो जमाने के बीस रूपये.. उस जमाने में बीस रूपये में आधा पोना तोला सोना मिल जावे । तो बोले बीस रुपया लेके फिर चिट्ठी देना ।

अब बीस रुपया कहाँ से लाये ? चूड़ियाँ थी, दो चूड़ियाँ और जो कुछ था मंगलसुत्र वो बेच के बीस रूपये गुरूजी को दिए और चिट्ठी लिया ।

गुरूजी के आदमी से बीस रूपये देकर चिट्ठी लिया । गुरूजी ने जो सत्संग के दो शब्द लिखा के चिट्ठी भेजी, गुरूजी की चिट्ठी है, दक्षिणा में बीस रूपये दोगे तो चिट्ठी मिलेगी नहीं तो मैं वापस ले जाता हूँ । तो पत्नी की दो चूड़ी और मंगलसुत्र बेचकर बीस रूपये दे दिए, चिट्ठी ले ली ।

अर्जुन देव को बीस रूपये पहुँच गये, उनको बीस रूपये क्या करने थे ? देखें कितना खजाना ये हजम कर सकता है , कितना शिष्य पक्का है । जमीन चली गयी, घसियारा बन गया, मंदिर टूट गया, अपमान हो गया, समाज से अलग-थलग हो गया । फिर भी मेरे को गुरु मानता है और पत्नी के गहने बेचकर २० रुपया दिया और चिट्ठी लिया । ठीक है अभी और देखेंगें ।

कुछ महीने बीते तो एक चिट्ठी और लिख दी और सेवक को बोला अभी पच्‍चीस रूपये मांगो तब देना चिट्ठी नहीं तो देना नहीं । अब २५ पैसे भी तो थे नहीं । गुरु की आई हुई चिट्ठी, संदेशा वापस कैसे जाने दूँ ! बोले बैठ । वो गाँव का एक व्यक्ति था, बहुत छोटी जाति का था । बोले मेरी जरूरत है, पहले तो तुम, जो भी बात हुई, कुल-मिला के अपनी कन्या, २५ रुपया हमको मदद करो, मैं तुम्हारे बेटे को कन्यादान करता हूँ ।

हालाँकि मुंज की जाति बहुत ऊँची थी और उसकी छोटी थी । २५ रूपये लिए, कन्यादान की मंगनी कर दी । वो २५ रूपये दे दिए । गुरु की चिट्ठी पढ़ने के लिए ।

उन्होंने देखा ये बहुत मजबूत है । फिर संदेशा भेजा के अब उधर क्या करते ? आश्रम में आओ और रसोड़े की सेवा करो । रसोई घर संभालो । भोजन बनाओ, सिरा मंगाओ ये सब करो । आश्रम के रसोइये का विभाग संभालो । विभाग संभालने लगे ।

कुछ दिन बीते फिर पूछा तुम लंगर तो अच्छा बनाते हो लेकिन, भोजन तो अच्छा बनाते हो तुम लोग, तुम कहाँ खाते हो ?

बोले सबको खिलाते हैं, लंगर में, बाद में हम लोग खा लेते हैं ।

तो बोले ये तो तुम नौकरी कर रहे हो । ये तो निष्काम सेवा नहीं हुई । खाना खाना और लंगर करना ये तो सारी दुनिया खाती है और काम करती है । तो गुरु की सेवा क्या किया ।

बोले गुरूजी ठीक है, लंगर की सेवा करेंगें, रसोई बनायेंगें सबको खिलायेंगें । हम यहाँ नहीं खायेंगें, हमारा हक नहीं बनता ।

तो क्या करे, सबको खिला के जाए और फिर जंगल में से लकड़ियाँ करके आये । वो बेचे फटाफट, सीध वीधा लेके, उसका टिकड़-विकड बना के खाए फिर शाम को लंगर में हाजिर । तो ये शरीर कमजोर हो गया । लंगर की लकड़ियाँ, खुट गयी, लंगर माना रसोड़ा । लकड़ियाँ खुट गयी, अब लकडहार खुद भी था । चलो तो ले आऊ । वो लकड़ी का भारा ले आ रहा था । आँधी-तूफान लगा और कमजोरी थी । पेड़ के नीचे आराम करना चाहता था, रुकना चाहता था, लेकिन पेड़ के पास में एक कुवाँ था । धडाक-धूम गठ्ठर सहित कुँवे में ।

गुरूजी ने पूछा कहाँ गया, कहाँ गया तो अभी आया नहीं, जाँच किया । रस्सा-व्स्सा ले गये । कुछ अजनबी आदमियों को भेजा के तू कैसे गुरु के चक्कर में है ? उसकी श्रद्धा तोड़ने वाले कुछ नये आदमियों को भेजा । कि  हम रस्सा भेजते हैं लेकिन ऐसे गुरु का त्याग कर दो और ठीक से जीवन अपना खुशहाली का जियो । क्या गुरु मंत्र और ईश्वर प्राप्ति, प्रभु ज्ञान प्राप्ति के चक्कर में अपना सर्व खो दिया । अभी तक कुछ मिला तो नहीं । मिली भूख, मिली बदनामी, अपना कुलदेवी का मंदिर तोड़ दिया । हम तुमको सब मदद करेंगें । और नीच जाति में अपनी कन्या दे दी । अभी भी तुम पर गुरु खुश नहीं हुए । ईश्वर की प्राप्ति नहीं हुई तो क्या हो जायेगा ? जो भी कुछ कहना था, टेड़ा-मेडा कहा । हम तुमको बाहर निकालते हैं ये लो रस्से के साथ तख्ता है उसको पकड़ना, बैठना उसपर  हम खींचेंगें ।

बोले नहीं मैं तुम्हारे तख्ते पे नहीं बैठूँगा, नहीं खींचो । गुरु के निंदक हो । निंदकों के साथ मुझे अमर होना कबूल नहीं है । गुरु का शिष्य होकर कुंवे में मर जाना कबूल है । गुरु का होकर मरूँगा ना, निंदकों का होकर मुझे अमर नहीं होना है । गुरु का होकर मुझे मरना है ।

तो बोले अच्छा अब छोड़ो भाई, अब तू नहीं मानता है तो आ, जा निकल जा । बोले मैं पहले नहीं निकलूँगा, पहले ये लडकियाँ खींचो और गुरु के द्वार पहुँचाना  । यहाँ मैं पहले आ जाऊ तो लकड़ी भीग जाएगी । मैंने इनको संभाल के रखा है ऊपर । पानी घुटने भर का है । लकड़ियाँ पहले भेजी, गुरु का लंगर का काम हो ।

फिर बाद में बाहर आये तो देखा के गुरूजी छुपे खड़े थे ।

गुरु के चरणों में जा गिरा – अर्जुन देव के । गुरु ने पीठ थपथपाई के शाबाश है, बहादुर है, बोई । मुंज प्यारा गुरु का, गुरु मुंज प्यारा । तू मुंज प्यारा है गुरु का और गुरु तेरे प्यारे, तू गुरु का प्यारा । मुंज गुरु का बोईथा, बोईथा माना जहाज, जग लाँघनहारा ।

अब तो मुंज के संपर्क में दूसरे लोग भी पार हो जायेंगें । चेला क्या बनाये अब सीधा गुरु बना दिया । बोलो कॉपोरेट क्या बनाये, पूरा एम्.पी. बना दिया, एम्.एल.ऐ. बना दिया । तो खुश होते हैं । लेकिन एम्.एल.ऐ., एम्.पी. तो बेचारे हार जाते हैं । यहाँ तो हार का मुँह ही नहीं देखना पड़े एक बार ब्रह्मज्ञान हो गया तो हो गया बस । कई जमींदार हो गये, कई कंगाल हो गये, मर गये, बीमार हो गये लेकिन मुंज तो अमर हो गया । नहीं हुआ ? गुरु की आज्ञा मानना ही गुरु की सेवा है । गुरु का खजाना उसी को मिलता है । मुंज जैसो को, नरेंद्र जैसो को, र्हिदास जैसो को, कबीर जैसों को गुरु का खजाना मिलता है । मनमुख लोगों को गुरु के खजाने की महिमा पता नहीं होती ना ।

अपने रक्षक आप


 

नाम नामी से बड़ा होता है | नामी श्री राम ने तो अहिल्या को तारा | शबरी को तारा, गिनेगिनायों को तारा | लेकिन राम के नाम ने तो बहुतों को तारा | राम नाम गुण कोई न गाई सके | नाम महाराज की कितनी महिमा है, वो राम महाराज भी नहीं गा सकते |   सेतुबंध रामेश्वर का काम हो रहा था तो राम नाम लिखकर पत्थर तैराए जाते थे | रामजी को आश्चर्य हुआ के मेरे नाम से पत्थर तैरते हैं ये बात सुनता हूँ कैसी है ! एक बार चुपके से चले गये दरिया किनारे | देखा तो रामजी दरिया किनारे गये चुप-चाप, अकेले | सब अपने-अपने शिविर में थे, अपनी-अपनी कुटियाओं में | हनुमानजी सतर्क थे सेवा में स्वामी की वो बॉडी गार्ड की सेवा भी कर लेते थे कहे बिना | देखा के प्रभु ऐसे ही अकारण कहीं जायेंगें नहीं | कहाँ जाते हैं, क्या है ? और अकेले स्वामी को छोड़ना ठीक नहीं है | तो धीरे-धीरे, छुपके-छुपके गये तो रामजी दरिया किनारे गये | फिर उधर देखा कोई है तो नहीं | उठा के पत्थर दरिया में डाला – ट्राये करते है कैसे पत्थर दरिया में तरता है | पत्थर डाला तो डूब गया | रामजी बोलते हैं हत तेरे की ! मैंने तो डाला तो डूब गया | रामजी थोड़े विस्मय में हुए | हनुमान पीछे था बॉडी गार्ड | जय श्री राम | हनुमान तू यहाँ कहाँ से ! बोले मैं आपकी सेवा में था | अच्छा, अच्छा चलो | हनुमान कहता है के प्रभु ! आप इस समय | बोले हाँ | हनुमान समझ गये के प्रभु ने पत्थर फेंका, डूब गया, प्रभु को हुआ के मेरे नाम से पत्थर तरते हैं ये बात कैसे हो सकती है | हनुमानजी समझ गये | प्रभु, क्या, आप किस बात की चिंता में हैं | बोले हनुमान तुम लोग बोलते हो के आपका नाम लिखकर पत्थर पानी मे  डाल देते हैं और पत्थर तर जाते हैं | मेरे को संदेह हुआ, देखने को आया | तो मैंने तो डाला तो डूब गया | बोले प्रभु ये तो सीधी बात है | जिसको राम फेंके उसको कौन तारे ? जिसको राम फेंके उसको कौन तारे ? राम के नाम से | जिसको राम चाहे उसको तारे, राम जिसको फेंके उसको कौन तारे ! समाधान कर दिया | रामजी बोलते हैं बड़े चतुर हो हनुमान |

कहने का तात्पर्य है, तुलसीदासजी ने कहा राम न सके नाम गुण गाई | रामजी भी नाम की महिमा पूरी नहीं वर्णन कर सकते | नाम में वो शक्ति है | नाम छोटा सा होता है | और पूरा नामी और नामी का लोक, नामी और नामी का सामर्थ्य, नामी और नामी का संबध उससे जुड़ा है | जैसे कह दो गोविन्द | गोविन्द नाम आप कह दो, रमेश भाई कह दो | तो रमेश तो इतना सा नाम है, पूरा रमेश उससे जुड़ा है | और रमेश का जो भी रिश्ता-नाता उससे जुड़ा है | रमेश की मिलकत, प्रॉपर्टी जुडी है | ऐसे ही अगर रमेश ब्रह्म्वेता है, रमेश ज्ञानी है, ब्रह्म्वेता है तो पूरा ब्रह्मलोक रमेश से जुड़ा है | नहीं समझे ! नाम तो जरा सा है लेकिन नाम kii महिमा बहुत है | शंकरजी भी जपते हैं तो और लोग भी जपते हैं | राम भगत जग चारू प्रकारा, सुकृति नु चारू अनघ उधारा | सब सुकुर्त हैं, अनघ हैं | अघ माना पाप, निष्पाप हैं – नाम जपने वाले | राम भगत जग चारू प्रकारा, सुकृति नु चारू अनघ उधारा | अनघ हैं, उधार हैं क्योंकी जपते समय अपना देह अभिमान, अपना टाईटल, अपना कौन क्या |

इसमें सावधान रहना चाहिए, समूह कीर्तन में, के स्त्री का आकर्षण पुरुष की तरफ होता है ये नैसर्गिक है | स्वभाविक है, नीचे के केंद्रों में गिरना ये जीव का स्वभाव है | गिरना स्वभाव है, चढ़ना पुरुषार्थ है | पानी का नीचे बहना ये स्वभाव है | लेकिन तीसरी मंजिल पे चढ़ना ये पानी का स्वभाव नहीं, मोटर की जरूरत है | दूसरी मंजिल पे अथवा तो तुम्हारे मटके तक पहुँचना ये पानी का स्वभाव नहीं है | नीचे गिरना पानी का स्वभाव है | मटके में लाना है तो तुम को झुक के भरना पड़ेगा नल के नीचे और बराबर मटके में पानी आएगा तो मटका भरेगा | नहीं तो तुम लापरवाही करोगे तो मटके का थोडा सा मुँह इधर होगा तो पानी नीचे बह जायेगा | पानी का स्वभाव है नीचे बहना ऐसे ही, इंद्रियों का स्वभाव है नीचे के तरफ जाना | तो हर जन्म में ऐसा करते आये | बंदर बने थे तो बंद्रियों के गुलाम, कुत्ते बने थे तो कुत्ति के पीछे पूंछ हिलाते थे | एक कुत्ति और ४-४ कुत्ते पीछे होते | और महाराज चीथड़े उतर जाते उनकी मारा-मारी करके | और घड़ी भर के बाद तो बेचारे पड़े रहते हैं मुर्दे होकर सुन्न | फिर भी पीछे जाते हैं | पतन – एक मरा, दो मरा, पाँच मरे फिर भी तडप-तडप के मरने जा रहे हैं दिये की तरफ | क्यों – की उनको रूप में आसक्ति होती है | पतंग को देखने की आसक्ति होती है – तडप-तडप के मरता है | हाथी को टच करने की आसक्ति विशेष होती है | तो हाथिन बनाई जाती है, और उसको जाता है स्पर्श करने को | हाथिन होती है नकली घास-फूस की और खड्ढे से, वो हाथी खड्ढे में गिर जाता है | घास-फूस से खड्धा ढका हुआ होता है, उसमें हाथिनी खड़ी कर दी जाती है | और हाथी देखता है मिसिज बैठी है और जाता है नजिक तो गिर जाता है, निकल नहीं सकता है | तो हाथी स्पर्श के सुख से, पतंग रूप के सुख से, भँवरा स्वाद के सुख से कमल में जाता है | भँवरे में वो ताकत है के बाँस को भी छेद करके निकल जाए | लकड़े में भी घर बना देता है भँवरा काला वाला भू-भू करता | कमल में जाकर रहता है सुगंध आती है | संध्या हो जाती है उसको पता चलता है, जीवों को, के अब यहाँ से जाना चाहिए | फिर बोलता है कोई बात नहीं, अभी जाऊँगा, अभी जाऊँगा | फिर रात हो जाती है, बोले यहीं पड़े रहो, क्या फर्क पड़ता है ? सुबह हाथी आते हैं, या जंगली पशु आते हैं कमल को पकड़ के खा जाते हैं या चबा देते हैं भँवरा मर जाता है | कहाँ तो लकड तोड़ के जाने की ताकत और कहाँ कोमल पत्ते कमल के, उससे पार नहीं होता है और प्राण दे देता है | उसको तुलसीदासजी की भाषा में अली कहते हैं, अली भँवरे को | मछली को कितना भी चतुराई से हाथ से पकड़ने जाओ तो नहीं आएगा | लेकिन कुंडी में खाने का कुछ डाल दो तो धडप से, से ले लेगी, चटक से ले लेगी तो फटक से पकड़ी जाती है | ये मछुये क्या करते हैं ? कुछ ना कुछ कुंडियों में रखते हैं | जब वो खाने को आती है तो उसके गले में वो कुण्डी, आकड़ी फसा दी जाती है | तडप-तडप के प्राण देती है | नहीं तो बड़ी स्वतंत्र थी | लेकिन स्वाद के पीछे मरी | तो एक-एक जीव को एक-एक स्वाद के बदले में अपना सत्यानाश मौल लेना पड़ता है | एक जीव में एक पतन का केवल आकर्षण है | हाथी को स्पर्श का आकर्षण है | भँवरे को सुगंध का आकर्षण है | और हिरण को सुनने का आकर्षण है | ओ महाराज, कुछ ऐसा, साँप को सुनने का आकर्षण है | उसी से वो मदारी हाथ पकड़ा जाता है और जिंदगी भर गुलामी करता है | करंडी में पड़ा रहता है | रेवा-रेवा के बेचारे की जिंदगी होती है | तो ये जीव को हर जन्म में कभी पतंग बने होंगें तो कभी महाराज हाथी बने होंगें तो कभी बकरा बने होंगें | तो बकरे को भी सेक्सुँल आकर्षण ज्यादा होता है | भुंड को भी काम विकार ज्यादा होता है | तो ये जो आकर्षण हैं ये हमारे चित में बहुत पुराने पड़े हैं | मनुष्य जन्म है, इन आकर्षणों को एकदम अगर नहीं मिटा पाता है तो शादी करके नियंत्रित जीवन बिता के | आकर्षण को मिटाने के लिए शादी का विधान है | तो शादी करे तो कैसे ? आज अमावस है, आज फलाना है, एक ही दिन बच जाता है शायद कभी महीने में संसार भोग का | और उससे गर्भ रह जाए तो जिंदगी भर उसको खिलाओ-पिलाओ और बच्ची बड़ी हो जाये तो जमाई खोजो और नाक रगड़ते रहो | फिर लगे के संसार में कोई सार नहीं है | जब बुड्ढा होये ना तो पता चले के काय ना थी | तो ये आकर्षण का बदला चुकाते-चुकाते वैराग्य आ जाये और जीव ईश्वर की तरफ चले इसलिए शादी की व्यवस्था है | जो सीधा बुद्धिमान हो जाये, अक्ल आ जाये, और विरक्त हो जाये | शादी की तैयारी और घर छोड़कर भागने लग जाये, तो महाराज उसके लिए महेनत कम हो जाती है | जिसकी गहराई में आकर्षण पड़ा है उसके लिए तो साधन भजन की तीव्रता, विवेक की तीव्रता, वैराग्य की तीव्रता चाहिए | तो ये साधन-भजन करते हैं उसमें भी सावधान रहें के कहीं आकर्षण में गिरते तो नहीं | जैसे गिदुमल के वहाँ लड़के-लड़कियाँ कीर्तन, ध्यान-भजन, धुन करते थे | और उसमें एक दुसरे को देख देख के फस गये, तो वो लडकी बेचारी गर्भवती हो गयी | वो लड़का इज्जत का मारा भाग गया | तो ये पूरा बोझा गिदुमल को सहना पड़ा और पूरा समाज में, भक्ति में लांछन लग गया | ये तो ऐसा हुआ, ऐसा हुआ | तो वहाँ से उनको आश्रम बंद करना पड़ा गिदुमल को | फिर कुवारी लडकी की इज्जत बचाने के लिए गिदुमल ने घोषणा किया के ये मेरे साथ इसका व्यवहार हुआ है | हम शादी करते हैं | १७ साल उसके साथ रहे | लडकी जब मर रही थी तो माँ को बोले मेरे साथ शादी तो किया है इन्होंने | मेरी इज्जत बचाने के लिए, दो प्राणियों की रक्षा करने के लिए | मेरे पेट में जो बच्चा था उसकी और मेरी रक्षा करने के लिए ये गिदुमल सेशन जज ने ये बदनामी मोल ली | लेकिन शादी के बाद हम घर में रहे हैं तो पिता और पुत्री की नाई | अब मुझे कैंसर है, असाध्य रोग है, जा रही हूँ | लेकिन माँ तुझे बोलती हूँ के ये तेरा जमाई नहीं है तेरा-मेरा और सबका पिता है | वो तब कहा जब कहा, समाज में तो, अखबारों में, इधर-उधर तो भक्ति करें वालों का, कीर्तन करने वालों का तो नाक कट गया | एक लडके ने वो किया और फिर दुसरे के तो बधाये ये बात छे, जरुर छे, आ तो साला आं छे | तो पूरी मुंबई में, उन इलाकों में, उनकी बदनामी हो गयी | क्यों हो गयी के लडके-लडकी साथ में कीर्तन करते हैं | और उसमें, कोई एक फल गंदा होता है ना तो पूरा टोकरा गंदा हो जाता है | तो एक आदमी गलती करता है तो पुरे मंडल का नाक कट जाता है | तो ये काम तो कीर्तन का तो बहुत बढ़िया है, लेकिन उसमें ख़ास सावधानी ये रखनी है की हजारों जन्मों के पुराने संस्कार हैं और एक दुसरे की उम्र है तो कहीं राम नाम जपते-जपते वो काम तो जोर नहीं मारता है | कहीं आकर्षण जोर तो नहीं मारता | इसीलिए बहनों का झुंड अलग होना चाहिए, बच्चों का झुंड अलग होना चाहिये | उसमें भी लोग जो समझदार हैं, बुजुर्ग हैं, जमाने के खाए-पिए हैं वो कीर्तन करते करते भी मंडल में नजर रखें कहीं ऐसी गलती होने की सम्भावना तो नहीं हो रही है |

पाप पहले आँख से घुसता है फिर वाणी से पुष्ट होता है फिर बार-बार देखने से और रस्सी मजबूत होती है | फिर कहे मेरे को कोई वांदा नहीं | बड़े-बड़े ऐसे फिसल जाते हैं | बड़े-बड़े, अच्छे-अच्छे कहलाने वाले | इसीलिए कीर्तन बहुत हितकर है, प्रभात फेरी बड़ा मंगलकारी है |  सावधान ना रहे और कोई फिसल जाए तो ये उसकी तो बर्बादी होगी ही लेकिन दुसरे का नाम बिगड़ जाता है और भक्ति के ऊपर भट्टा लगता है | दूसरी बात खतरे की ये है के धर्म को जो लोग धंधा बनाते हैं वे लोग धर्म का नाश करते हैं | धर्म धंधा नहीं है | धर्म तो धर्म ही है | धर्म पावडीयां लेकर, गुरु की पावडी लेकर गये किसी के घर कीर्तन भजन किया तो अच्छा है | फिर उसके द्वारा आमदनी करना, थोडा कोई बोले गुरूजी के चरणों में पहुँचाना ताकि हजारों की सेवा में लग जाए | और वो रकम, वो पैसा रख लेना, उस आदमी का क्या होगा भगवान जाने | उस आदमी को बेचारे को कितना सहन करना पड़ेगा | धर्म को जो धंधा बनाते हैं उनकी तो बड़ी दुर्गति होती है | पुण्याई है तब तक पता नहीं चलता | जब ऐसा करने से पुण्याई क्षीण होने लगती है तो फिर वो आदमी बेचारे फेंके जाते हैं | आपको कोई मान देता है तो समझो भगवान और गुरु की प्रसादी को मान दे रहा है | उस प्रसादी का मिसयूज करते ही वो प्रसादी वापस खेंज ली जाती है | फिर जो आपको हजार-हजार आदमी मान देते थे वो हजार में से ५००, ५०० में से २००, २०० में से १० और १० में से २ हो जायेंगें | और २ भी तुम्हारे अंदर से तो दुश्मन हो जायेंगें |

तो अपने हृदय में जितनी ईश्वर के प्रति सच्चाई है, धर्म के प्रति सच्चाई और वफादारी है, उतनी ही अपनी उन्नति होती है | धर्म के नाम पर या ईश्वर के नाम पर अगर धंधा करते हैं तो ईश्वर तो सर्वनियन्ता है, अन्तर्यामी है, सब देखता है | हम किससे छुपायेंगें | एक पादरी ने थिएटर के मैनेजर को चिट्ठी लिखा, प्राइवेट आदमी के हाथ भेजी | के आपके थिएटर में जो फिल्म चल रही है, उस फिल्म की बड़ी प्रसिद्धि हुई | मैं फिल्म देखना चाहता हूँ लेकिन मैं पादरी होने के नाते आम पब्लिक जिस डोर से आती है उस डोर से, उस दरवाजे से नहीं आ सकता | अगर आप कोई प्राइवेट डोर हो चाहे कितना मैं उसके बदले में आपको पेमेंट कर दूँगा | लेकिन ऐसा कोई गोपनीय डोर हो जो मैं फिल्म देख सकूं | ख़ैर डोर तो होते ही हैं ऊपर से चला जाये आदमी | मैनेजर बड़ा बुद्धिमान था, बड़ा सच्चा था | उसने चिट्ठी लिखा उस प्रसिद्ध पादरी को, अभागे को | जो समाज में धर्म का लिबास पहन के बैठे हैं, और छुपकर फिल्म देखना है तो ये समाज के साथ धोखा नहीं है | ईश्वर के साथ धोखा नहीं है | उस मैनेजर ने लिखा के बड़े दुःख की बात है की हमारे थिएटर में या आज तक किसी भी थिएटर में ऐसा डोर बना ही नहीं जो परमात्मा उसको ना देखता हो | परमात्मा से छुपाकर आज तक कोई डोर बना ही नहीं सका है | इसीलिए बड़े दुःख की बात है लेकिन मैं आपको अपने थिएटर में अलाओ नहीं कर सकता हूँ | ऐसा कोई डोर ही नहीं, ऐसा कोई दरवाजा ही नहीं जो ईश्वर से छुपा के रख दिया जाए | बड़ी शर्म की बात है के मुझे ये चिट्ठी लिखनी पडती है | नाक काट दिया उसका, आज तक तो उसके लिए बड़ा आदर था | विशेष पादरी था | लोगों को भगवान की तरफ लगाता है, धर्म वताल प्रवृति का रहा था | जो धर्म वताल प्रवृति करता है वो खुद भी तो वताल गया | बड़ा इमानदार मैनेजर था वो | क्योंकी वो जानता है ईश्वर, परमात्मा रोम-रोम में रम रहा है | राम कहते हैं जो रोम-रोम में रम रहा है | कृष्ण कहते हैं जो आनंद स्वरूप है, सबको आकर्षित करता है | वो तो आत्मा सबके हृदय में है | वो वेदांत का सत्संग सुना हुआ मैनेजर था | वो क्यों आता है द्तिंग के चक्कर में | तो महाराज अपने तो बचे लेकिन कोई अपने द्वारा पाप कराये तो उसको भी कहें के  भई मैं लाचार हूँ, इस बात में सहयोग नहीं कर सकता | ये बात छुपा नहीं सकता हूँ मैं तो भगवान को प्रार्थना करूँगा के तेरी बुद्धि सुधरे | और गुरूजी को मैं तो खत लिख दूँगा के इसकी आँख में गडबड है | ऐसा रखे तो वो एक दुसरे का हितेषी है | गिर जाय पतन हो जाय, फिर गुरुजी उसको निकाल दे, धकेल दे, रिजेक्ट कर दे |

मोहम्मद साहब ने कहा के एक बार स्त्री को तुमने देख लिया तुम्हें क्षमा है | दुबारा देखा तो अपराध है और तीसरी बार उसी को देखा तो फिर सजा है | चौथी बार फिर देखा तो हत्या का पाप | तो इस तरह से आदमी, एक बार अगर अनजाने में चली जाती है नजर, ठीक है | फिर बार-बार उधर नजर जाती है और अपना साक्षी आप है | के हमारी नजर किस हिसाब से जा रही है | बोले जरा सा देखा तो क्या बिगड़ता है | बिगड़ता ऐसा है महाराज फिर सुधारने वाले थक जाते हैं, ऐसा बिगड़ जाता है | इसीलिए नाम संकीर्तन हो या और कोई प्रवृति हो बड़े में बड़ा खतरा है स्त्रियों को पुरुषों के सानिध्य से | बड़े में बड़ा खतरा है पुरुषों को स्त्रियों के सानिध्य से | इसीलिए स्त्री, स्त्री अगर पुरुष को देखे तो पुरुष उस भाव को या तो जगदम्बा का भाव को लाये | या तो फिर दो उबी हड्डियाँ हैं, और आड़ी हड्डियाँ, भागवत का प्रसंग है | गोकर्ण कहता है अपने पिता आत्मदेव ब्राह्मण को | मास के लोचे हैं रगों से बंधे हैं | ऊपर चमड़ा है | नाक में लीद भरी है, मुँह में थूक है और पेट में मल-मूत्र है | फिर भी ये शरीर अच्छा लगता है तो उस प्यारे की अच्छाई है | वो प्यारा तो मेरे हृदय में ज्यों का त्यों है, मैं उसका अपमान क्यों करूं ? अगर पुरुष को स्त्री के प्रति आकर्षण होता है तो ऐसा विचार कर लें | और अगर स्त्री को पुरुष की तरफ आकर्षण होता है तो पुरुष में भी वही मसाला भरा है | २ उबी हड्डियाँ और दूसरी आड़ी हड्डियाँ, मास का लोचा, रगों से, नसों से, नाड़ियों से लिपटा हुआ | बाकी की जगह में विष्टा होगा, मल होगा, थूक होगी, लिट होगी, कफ होगा, ऐसा पुरुष का शरीर फिर भी प्यारा लगता है तो उस मेरे चैतन्य परमात्मा की चेतना है | मुर्दा हो जाये तो कौन पूछता है ? तो मुर्दे शरीर में आकर्षण नहीं, मुर्दे शरीर को जो चेतन दे रहा है उस चैतन्य परमेश्वर में आकर्षण | स्त्री को अगर आकर्षण हो तो सीताजी को याद करे के माँ सीते, जगदम्बा माँ तू मेरी रक्षा कर | मेरे रामजी, राम, राम, राम तू रक्षा कर | और पुरुष को हो तो सीताजी को याद करे, रामजी को याद करे | सीताजी के पास इतने प्रलोभन फिर भी सीताजी का मन एक तिनखा भर भी फिसला नहीं | रामजी के आगे सूर्पनखा क्या-क्या वेश ले आई | रामजी का चित भ्रमित नहीं हुआ | ऐसे ही हमारा चित बच जाये |

तो साधन थोडा होगा तो भी हरकत नहीं, लेकिन असाधन में गिरे नहीं | साधना थोड़ी हो तो कोई हरकत नहीं है | बहुत साधना करे और बहुत गलती करे, तो तो विनाश कर लेगा अपना | थोडा साधन करे और गलती ना करे तो अपनी रक्षा कर लेगा | साधन भजन खूब करे, एक माली ने खूब लंबा-चौड़ा बगीचा बनाया | खूब फुल खिलते हैं, उसका अत्र निकाल के नाली में फेंक देता है | वो बड़ा बगीचा किस काम का | ऐसे ही आप जो खाते हैं उस अन्न में से रस बनता है | रस में से फिर वो रक्त, धातु, ऐसे करते सप्त धातु में परिवर्तित होकर उर्जा बनती है, वीर्य बनता है | जिसको पुरुष का पुरुषत्व है, स्त्री में स्त्रीत्व है | वो अगर ४० दिन आप भोजन करें तो सवा तोला वीर्य बनता है | और ऐसे आकर्षण से सपनदोष के द्वारा और विकारों के द्वारा नाश हो जाये | ४० दिन खुराक खता है उससे जो रस बनता है, कन्वर्ट होते, होते, होते सवा तोला बनता है | माली बगीचा सींचे और सवा तोला अत्र निकले और नाली में डाल दे तो उस माली को क्या कहोगे बेवकूफ, गधा | ऐसे ही हम खाते-पिते हैं तो चालीस तोला माना सवा सेर कच्चा | लगभग सवा ५, साढ़े ५०० ग्राम होता होगा ४० तोला | इतना खुराक रोज खाओ अच्छी तरह से पुष्टि वाला ४० दिन खाओ तब सवा तोला वीर्य बनता है | और इन आकर्षणों के द्वारा वो नाश हो जाता है | इसीलिए भक्ति में, ज्ञान में बरकत नहीं आती | अगर वीर्य मजबूत हो जाये तो बैठे और समाधि लग जाये, ध्यान लग जाये | जितने अंश में वीर्य है शरीर में, उतने अंश में प्रसन्नता होगी, बुद्धि की तीव्रता होगी, अच्छे -अच्छे विचार आयेंगें | वीर्य नाश सर्व नाश | इसीलिए जितना आदमी ऊपर उठता है उतनी ही उसकी सुरक्षा की जरूरत पडती है | आप पैदल चलते-चलते गिर जाएँ तो ज्यादा नहीं लगता | साइकल से गिर जाएँ तो और ज्यादा लगता है |स्कूटर से एक्सीडेंट हो तो और ज्यादा लगता है | और महाराज हेलिकॉप्टर से गिर जाएँ तो फिर तो और जेट विमान से गिरे फिर तो हड्डियाँ एकत्रित करने वाले का दम निकल जायेगा | जेट विमान से गिर जाएँ तो आप जहाँ गिरेंगें तो हड्डियाँ अलग-अलग छोटी-छोटी हो जाएँगी | ऐसे ही जितना आपका ऊँचा साधन है ईश्वर प्राप्ति का, अपना कल्याण करने का उसमें जितना आप लापरवाही करेंगें तो खतरा भी उतना हो सकता है | इसीलिए खूब सावधान रहना चाहिए, सतर्क रहना चाहिए | आप तो रहें लेकिन आप जिसको प्यार करते हैं ना उसकी आप निगरानी करो, आपकी वो निगरानी करे | एक दुसरे को बचाव एक दुसरे की गलती को पोषण मत दो, सहयोग मत दो | एक दुसरे की गलती को निकालने की कोशिश करो | सच्चा मित्र वो है जो अपने मित्र की गलती उसके मुँह पे कह दे | और

उसको गलतियों से बचाए, वो सच्चा मित्र है | जो गलतियों में सहयोग करता है वो तो गुंडा है, बदमाश

 

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है | वो तो शरबत के गिलास में जहर डालकर देने वाला, शाकुनी जैसा आदमी है वो तो | शाकुनी अपने उस सेनापति को जहर दे देता है | कसूर शाकुनी का है, सेनापति का नहीं है |

तो महाराज मित्र का धर्म निभाना चाहिए | मित्र के रुपय बिगड़ते हों तो कोई बड़ी बात नहीं | मित्र का मकान, दूकान गिर जाता हो तो कोई इतना खतरा नहीं जितना मित्र का चरित्र गिरने से मित्र को खतरा होगा | इसीलिए एक दुसरे की रक्षा करें | सहेली सहेलियों की रक्षा करे | साधक साधकों की रक्षा करे | साध्वी साध्वियों की रक्षा करे | इतना काम तुम कर लो बाकी का जो भी प्रॉब्लम होगा रिधि-सिद्धियों का आकर्षण, दूसरा देव-दानव का शुक्ष्म अटैक वो सब हम बैठे हैं | इतना तुम करो, तुम्हारे जिम्मे जो आये तुम करो, गुरु के जिम्मे आये वो गुरु ना करे तो गुरु को छोड़ देना | ईश्वर के जिम्मे जो आता है ईश्वर ना करे तो ईश्वर को छोड़ दो | लेकिन ईश्वर कभी ऐसा नहीं करते | ईश्वर के जिम्मे जो आता है वो बिलकुल पहले से कर देता है | हम लोगों ने जन्म लिया, माता की गोद आये तो क्या हमारे बाप ने, या हमारे दादा ने या हमारे दोस्त ने व्यस्था किया के माँ के स्थन में दूध आ जाये | ईश्वर को जो करना है वो पहले कर रखा है, बाद में हमारा जन्म हुआ है | बिलकुल सीधी बात है, परमात्मा को जो करना चाहिए वो आपसे पूछ के नहीं करेगा, आप के आने के पहले तैयार रखेगा | हम घर छोड़ के भागे और हमारे को जब भोजन की जरूरत पड़ी तो मेरे को भूख लगने वाली है उसके पहले तो भोजन लेकर लोगों को रवाना कर दिया | और मैंने सोचा अब कहीं नहीं जाउँगा यहीं बैठ के खाऊंगा तो वो आ गये महाराज हम आपकी सेवा में | ईश्वर कितनी रक्षा करता है, ये बिलकुल प्रत्यक्ष हुआ | ऐसी-ऐसी जगह पे गये के जहाँ कोई परिचय नहीं और माँगना नहीं है | आखिर सेवा करने वाले आ गये | ऐसी जगह पे गये जहाँ शराबी हों, गुंडागर्दी हो, सबमें मैं हूँ तो चलो फिर, उस इलाके में गये | शाह्दी मिले नदी के उस बनास नदी के भेट में दारू की भट्टी चलती थी वहाँ | रात के समय गुजरे तो ऐ बाबा का बच्चा साधुड़ा इधर आओ | हम गये और लंबा, बढ़िया धारिया बड़ा |   कुछ एक छोटे होते हैं, कुछ बड़े और बड़ा, ऐसा  बड़िया (फस क्लास) धारिया वो चम चमाहट | वो शराबी ने धारिया उठाया ऐ बाबा का बच्चा इधर आ, आ गये | मेरे कंधे पे धारिया रख दिया गर्दन काटने की सेटिंग कर दी उसने, बोले खेंचू ! तेरी मर्जी ! उसके साथ दूसरा शराबी था | गाली बके, मैंने कहा बकने वाले की गहराई में भी तो तू है | धारिया खींचने, जरा सा भी गलती से भी यों खिंच देते तो कम से कम १०-५ टाँके आते | ऐसा धारिया रख दिया मेरे गले पर | बिलकुल घटित घटना बता रहा हूँ, दिसा की बात है, जब मैं अज्ञात रहता था | धारिया खींचने वाले को सत्ता तो मैं ही दे रहा हूँ, मेरा चेतन ही दे रहा है | बोले तेरी मर्जी खिंच क्या फर्क पड़ता है | हाथ काँपने लग गये, धारिया हाथ से गिर गया, पैरों पे पड़ गये | उसको जो ईश्वर को करना चाहिए वो बिल्कुल कर लेता है | उस वक्त हम घबरते के भाई आऊ ना कर, माफ़ी माँग, कुछ कर, बाबा ना बच्चा मुफ्त नु खाईने | दारू ना पियुजे हाऊ बोलू छे, आम करा छे, मफत नु खायु छे, ऐसा करके घसीट देता | हमको जो करना चाहिए, दारू से बचना चाहिए, ऐसा हम मानते हैं तो हम तो अडिग रहे उस पर | उसको खींचने का विचार हुआ गर्दन | हालांकि उसको तो हमने कुछ कहा नहीं था | उनको ऐसा पता होगा के साधू बाबा दारू छुड़ाते हैं | दारुयिदों को जरा ठपका देते हैं | तो साधू बाबा मिल गये तो जरा अपना रोष निकाला | किसी साधू ने कहा होगा उसको | नहीं कहा होगा भगवान जाने लेकिन उसको साधुओं के प्रति बड़ी नफरत थी, शराबी को | और शराबी को तो होता ही है | उसकी दुनिया अलग होती है | तो वो नफरत हमारे से कसर निकालना चाहता था | हम बोले ठीक है | ^^^^^^^^^^^^^

भगवान ऐसा नहीं के श्री कृष्ण दीखते हैं तभी वो भगवान हैं | नहीं वही कृष्ण अपना आत्मा है, वही  राम अपना आत्मा है | भगवान हैं बोलते हैं तभी भी भगवान की सत्ता से, भगवान नहीं हैं बोलते हैं तभी भी भगवान की सत्ता से |कोई कह दे मेरे मुँह में जीभ है, तो भी जीभ से बोलता है | कोई कह दे मेरे मुँह में जीभ नहीं है मैं कसम खा के बोलता हूँ | मेरी कसम खा के बोलता हूँ जीभ, वीभ जैसी कोई चीज ही नहीं है | ऐसे ही कोई बोलेगा कसम खा के बोलता हूँ भगवान-वगवान जैसी कोई चीज ही नहीं है | फिर भी तू उसी की सत्ता से बोल रहा है | वो ऐसा है | सो साहेब सद सदा हजुरे, अँधा जाने ताको दुरे | वो तो हाजरा हजूर है | तुम सत्यव्रत करते हो तो वो तुम्हारी बुद्धि को उचित प्रेरणा देकर तुमको अपने नजिक लाता है | और तुम दुश्चरित्र होते हो, तो तुम्हारी बुद्धि को छुट दे देता है जा तेरी मर्जी | तो फिर वो बुद्धि विनाश की तरफ ले जाती है | विनाश काले विपरीत बुद्धि |

लालजी महाराज के पास एक युवक संयासी आया | लालजी महाराज प्रति दिन मूर्ति रामजी की, सीताजी की, राम दरबार की जो मूर्ति थी, राज्यभिषेक की, उसकी पूजा करते थे | अपना मंदिर बनाया था उन्होंने अपने कमरे में | पूजा के बाद कोई भी दर्शन करने जाता था, कोरल की बात है | एक संयासी उनके पास महेमान हुआ, युवान था, बड़ा तेजस्वी था | संयासी बैठा था, ९-१० बजे होंगें | कोई नई शादी की हुई लड़की लालजी महाराज को प्रणाम करने आई और मंदिर में अंदर कमरे में दर्शन करने गयी | तो वो, उस युवक साधू की आँखें उस पर टिक गयी | वो दर्शन कर रही है, उसके सामने तो भगवान है, इस कमबख्त के सामने युवती का रूप है | इसके आगे चमड़ा सार है | उसके आगे भगवान, प्रतिमा में भगवान देखती है वो | और ये जिसमें भगवान छुपा है उसमें काम देख रहा है | लालजी महाराज देखते हैं, के उसकी आँख से पता चल जाता है के आँख पाप से आकर्षित है क्या | पिता देखता है अपनी दुल्हन बेटी को तो, आलिंगन भी करता है विदाई के समय लेकिन पिता की आँख और पिता के आलिंगन में भाव है | और मिस्टर  या दुसरे दूर-दूर से देखते हैं उनकी आँख में और उनके हृदय में कुछ और कचरा होता है | कईयों के हृदय में पवित्र भाव भी होते हैं | तो महाराज, लालजी महाराज भाँप गये उसको के ऐसा जरा आँख ठीक नहीं थी | वो लडकी तो चली गयी, बोले महाराज ऐसा घुर-घुर के युवतियों को देखना साधुओं के लिए तो पाप माना गया है | वो साधू था, लाल कपड़े पहने थे तो उसको अपना घमंड था संयास का  | संयास लेना अच्छा लेकिन ये घमंड खतरा करता है | पहले तो मैं गृहस्थी हूँ, संसारी हूँ, ऐसा करके थोडा नम्र था | अब मैं साधू हूँ, भिक्षा माँग के खाना, मुफ्त का खाना मेरा हक है | अरे मफत का खाना तेरा हक है तो तपस्या करना, समाधि करना, ये किसका हक है ? आँख को संयत करना ये किसका हक है ? किसका जिम्मा है ? संयासी युवक को जरा लालजी महाराज ने टोक दिया | तो गुस्से हो गया के भगवान ने आँख दिया है तो देखने के लिए और उसको रूप दिया है तो दिखाने के लिए | उसका रूप दिखाने के लिए और हम लोगों की आँख देखने के लिए | उस अभागे युवक ने तर्क लगाके संत की बात काट डाली | संत तो चुप हो गये, लालजी महाराज, बोले अच्छा महाराज | आँख देखने के लिए दी है तो खूब देखो | ६ महीने के बाद वो युवक संयासी भटकता-भटकता लालजी महाराज के द्वार आया | आँखे अंदर, चहेरे में खड्डे पड़ गये | बिल्कुल घटित घटना कह रहा हूँ | मैं अंदर आ सकता हूँ स्वामीजी | बोले आप कौन हो ? बोले स्वामीजी मेरे को जानते नहीं ! मैं फलाना स्वामी, ६ महीने पहले आप के पास आया था | अरे तुम वो स्वामीजी, ऐसे बुड्ढ़े कैसे हो गये ? बोले ऐसे ही, जरा तबीयत ऐसा ही रहता है | बोले आओ, आओ, कोई बात नहीं | बोले मेरे साथ ३ मूर्ति और भी हैं | बोले बुलाइये | वो ३ मूर्ति में १ युवती संयासी और २ बच्चे, तीनों को लाल कपड़े, साधू के कपड़े | संत आदमी लालजी महाराज ने भोजन कराया, फिर वो जब स्नान करने को नर्बदा किनारे गया, तब उस युवती से पूछा क्या बात है ? बोले मेरा पति गुजर गया था | ये बाबजी आये और फिर हमारा संबध हो गया | अब हमारा पति-पत्नी का संबध है लेकिन कमाने में जोर आता है इसीलिए हमको भी ये संयास के कपड़े दे दिए | दो बेटों को भी दे दिए, और स्वभाव बड़ा तीखा है | भीख माँग के तो खिलाता है और मारता खूब है | उस संयासी को अकेले में ले गये के स्वामीजी ये क्या हाल है ? क्या बात है ? ये ३ मूर्ति कौन हैं ? बोले स्वामीजी साधू तो दयालु होते हैं | ये विधवा माई थी, इसका कोई नहीं था | इसके बच्चों के जीवन का प्रश्न था तो मैंने कहा मैं पढ़ा-लिखा साधू हूँ, इनके बच्चों को पढ़ाऊंगा और माई का कोई गुजारा था नहीं | तो मैंने कहा इसको संयास लेकर भगवान के रास्ते लगाऊंगा, ये मेरी शिष्या है और ये बच्चे हैं, मेरे शिष्य हैं | महाराज इनकी भलाई के लिए मैंने इनको साथ रखा है | लालजी महाराज ने तो पहले ही, फोटो से ही जान लिया था, उसके चहेरे से ही जान लिया था | फिर माई ने भी सच्ची हकीकत बता दी | लेकिन वो बेईमान अभी तक ये नहीं मानता है के देखने का परिणाम हुआ है |

तो कबीरजी ने ठीक कहा, चलो-चलो सबको कहे, चलो उन्नति करो, चलो ईश्वर के रास्ते चलो, लेकिन कोई विरला पहुँचता है | चलो-चलो सबको कहे, विरला पहुँचे कोई | माया,कामिनी बीचे घाटी दोई | या   तो धन-दौलत में, फसेगा या कामिनी में, फसेगा  | मंडल ने कीर्तन किया, भजन किया, दक्षिणा आई, वो दक्षिणा हड़प कर लिया | माया के चक्कर में पड़ गया | ये माया, से भजन नाश हो गया | भजन बेच दिया | चलो, चलो सब को कहे विरला पहुँचे कोई | माया, कामिनी | या तो माया और  पैसा संग्रह में पड़ जायेगा | उसकी भक्ति नाश कर देगा उसका पैसा संग्रह में | या तो फिर महाराज कहीं आँख लड़ा के फस जायेगा | इससे भी कोई बच जाये, उसको धन्यवाद, लेकिन फिर मान की इच्छा, बढ़ाई की इच्छा और दुसरे का मान होता है उसको देखकर जेलसी पैदा हो | ये उसके अंतरकर्ण को गिरा देती है | चलो-चलो सबको कहे, विरला पहुँचे कोई | माया, कामिनी बीचे घाटी दोई | ये बड़ी घाटियाँ हैं | हो गये साधू और ईमानदारी से गुरु के चरणों में रहे, गुरु की निगाह में रहे तो माया से भी बचे और कामिनी से भी बचे | क्यों ? की गुरु का प्रभाव ही कुछ ऐसा होता है के तुम्हारा मन कुछ भी गलत सोचे तुरंत गुरु की याद आते ही मन वापिस आता है | जिसको जल्दी उन्नति करनी हो वो गुरुओं की निगाह में रहे ताकि मन उनको दगा ना दे | जैसे गुरु के सामने बैठे हो तो इधर-उधर देखने की इच्छा होती भी नहीं, देखोगे भी नहीं | अरे पानी पीने की इच्छा होते हुए भी आप जल्दी से नहीं उठोगे, चंचलता करके | अपने आप इंद्रियाँ नियंत्रित होने लगती हैं | अपने आप मन नियंत्रित होने लगता है | अपने आप बुद्धि ज्ञान की तरफ श्रवण के तरफ लगने लगती है | उनकी हाजरी मात्र से | ये बड़ा लाभ होता है | नहीं तो इन्द्रियों को लगाना पड़ता है, मन को लगाना पड़ता है | तो अपने से ऊँचे पुरुष हैं, महापुरुष हैं, उनके अनुशासन में रहने से हमारी इंद्रियाँ, हमारा मन, सहेज में अनुशासित होता है | जिसके साथ १२-१२ वर्ष युद्ध करने के बाद भी शायद अनुशासित हो, ऐसी मन-इंद्रियाँ उन महापुरुषों की सानिध्य मात्र से, स्वभाविक ही नियंत्रित होती हैं |

कबीर जी ने कहा माया तजना सहेज है, माया तज दी, गुरु की छाया में आ गया | सहेज नारी का नेह, हो गया संयासी और स्त्रियों की तरफ आकर्षण भी नहीं है | धन्यवाद है उस सन्यासी को, शाबास है | वो तो सन्यास धर्म का यश उज्ज्वल करता है | माया तजना सहेज है, सहेज नारी का नेह, मान-बढ़ाई-इर्षा दुर्लभ तजना ऐह | गुरु की छाया मिली, इंद्रिय संयम हो गया | महाराज इधर-उधर देखने का या विकारी जीवन जीने का दुर्भाग्य नहीं प्राप्त हुआ | फिर भी गुरु किसी को ज्यादा प्यार करते हैं, मेरे को कम करते हैं | उसको ज्यादा अधिकार हैं, मेरे को कम अधिकार हैं | इस प्रकार की आदत साधक साधक के प्रति की अंदर की इर्षा ******| हे भगवान मैं स्त्री हो जाऊं तो फलानी मेरी प्रतिस्पर्धी स्त्री की पिटाई कर दूँ | हे भगवान मैं लड़का हो जाऊं तो फलाने लडके की पिटाई कर दूँ | ऐसी दुर्वासना भी आ सकती है | ये इर्षा है, जेलसी है | किसी के प्रति इर्षा करने से अपनी प्राण शक्ति, मनः शक्ति का ह्रास होता है | तो मान, बढ़ाई, इर्षा, दुर्लभ तजना ऐह | मान की इच्छा, बढ़ाई की इच्छा, अपने को बड़ा मान लेना, कुछ गुण आ गया, कुछ संयम आ गया, कुछ त्याग में सफल हो गये | तो मैं त्यागी हूँ, मैं कुछ नहीं रखता, मैं फकड़ हूँ | मैं दे देता हूँ अपना चोला उतार के भी दान कर देता हूँ | ये शुक्ष्म अहंकार घुस जाता है | तो माया और कामिनी ये पहली दो घाटियाँ हैं | मान, बढ़ाई और इर्षा ये दूसरी घाटियाँ हैं | इनसे जो पार हो गया, इतना हमारे जिम्मे आता है | इतना हम कर डालें तो ईश्वर को उसी समय प्रकट होने में देर नहीं | वो तो सदा प्रकट है, अगर हमारी आँख खुल जाए | इन घाटियों में से आँख निकल आये, बच जाए तो आँख खुल जाएगी | ईश्वर को प्रकट होने में देर नहीं, वो तो सदा प्रकट है | सो साहेब सद सदा हजुरे, अँधा जानत ताको दुरे | जिसको आँख नहीं है उसको दूर दीखता है | आद सत, जूगात सत, है भी सत, नानक  होसे भी सत | आदि में सत था, अभी है युगों से सत  है | आँख का पल्काड़ा गिरने में समय हो सकता है लेकिन ईश्वर को प्रकट होने में उतना समय नहीं |

आपकी वृति में तत्वज्ञान है, संयम है, तो वृति में आरुड़ जो चैतन्य है वो वृति का अज्ञान मिटाकर साक्षात्कार हो जाता है | तत्वज्ञान सुनने से साक्षात्कार नहीं होता है | भगवान के श्री विग्रह के दर्शन करने से भावनाएँ पवित्र होती हैं | भगवान साकार प्रकट हो जाएँ, तो आनंद आता है, रोमांचित होता है आदमी, लेकिन साक्षात्कार के लिए तो ये अंतरयामी ईश्वर, हृदय में जो बैठा है, वो ही तुम्हारी वृति में आरुड़ होकर अज्ञान को हटाकर अनुभव करा देता है | ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देये अर्जुन तिष्ठति | भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारुढानि || सब यंत्र की नाई, माया के यंत्र की नाई भ्रमित हो रहे हैं | है तो हृदय में ही, सुख स्वरूप है, आनंद स्वरूप है, प्रेम स्वरूप है, जब देखने की इच्छा हो तो उसी को याद करो के जिससे दिखने वाली चीजें प्यारी हैं, उसकी गहराई में तो तू ही है | अब मुझे पता चला ये बाहर की आकृति माया है | आकृति का आधार मेरा आत्मा महेश्वर है  सो-हम | आपका देखने का आकर्षण घट जायेगा | जिससे देखा जाता है उसी में आने का यत्न करो | सुनने की भी इच्छा हो, ये क्या बाहर का ताकड़-धिना-धिन सुनना ! जिससे सुना जाता है और मधुर लगता है वो कितना मधुर होगा ! ऐसे ही स्पर्श करने की इच्छा हो, तो स्पर्श इंद्रियाँ हैं | इंद्रियों को सत्ता मन देता है, मन को सत्ता वृति देती है, वृति में जो चैतन्य की सत्ता है उसी की तो सत्ता से सब देखा, सुना, स्पर्श किया जाता है | जय हो मेरे चैतन्य राम, प्रभु, गुरुदेव | जो भी नाम उसका रख दो, है वो एक का एक | इस प्रकार जब विकार आये, तो विकारों से युद्ध मत करो और विकारों को सहयोग देकर अपना सत्यानाश मत करो | विकारों को युद्ध भी नहीं करना है | और विकारों के साथ देखने में क्या जाता है, सुनने में क्या जाता है | जरा ये कर लिया क्या जाता है | अरे जरा-जरा में तो महाराज सब चला जाता है, गडबड हो जाता है | मैंने सुनाया था ना कल चूहा पेट पे से पसार हो गया तो रोने लगा, कभी तो साँप भी आ सकता है चूहे के पीछे | ये मेरी असावधानी है | तो जरा सी सेवा ले लिया तो क्या ? जरा सी सेवा लेते लेते लेते लेते आलसी हो जायेगा आदमी |

रामतीर्थ जब प्रोफेसर थे जवान थे, किसी लडकी को, अब कॉलेज में पड़ते हैं तो भई होता ही है, इन्द्रियों का स्वभाव है | लडकी को देखा और मन में उसके लिए खोटा भाव आ गया | तीर्थराम ने क्या करा, ले गया अपने को जल्दी से किसी बाबुल के काटों में, बड़े-बड़े बाबुल | अभी तो सब नहीं होते इतने पॉवरफुल, जंगली  बाबुल | वो बाबुल के काँटों की बाड़ किया हुआ था, उसमें अपने को, जैसे आप पपैये की छाल को फेंकते हैं एथिझूठी, ऐसे अपने आप को, उस बाबुल की बाड़ में फेंक दिया के ले कर स्पर्श | कितना सुंदर, वो भी ५ भुत, ये भी ५ भुत, वो भी माया, ये भी माया | ले आलिंगन कर | अपने शरीर को बाबुल की बाड़ में फेंक दिया तीर्थराम ने | ले मजा ले, कर स्पर्श, ये भी तो उसी माया का है | वहाँ भी खड्डे थे, यहाँ भी खड्डे हैं | उसकी हड्डी पे चमड़ा है तो इसकी हड्डी पर पत्तियाँ हैं और क्या है, तो ले | महाराज सुबह को कॉलेज से छुट के गये तो रात तक वहीँ पड़े रहे | दुसरे दिन सुबह हुआ | मन उनके आगे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया के दूसरी बार नहीं देखूँगा | मेरी हार हो गयी, आपकी जीत हो गयी | तीरथराम मेरी हार हो गयी, तुम्हारी जीत | तीर्थराम बोलते हैं अब तीर्थराम नहीं अब तो रामतीर्थ, जहाँ पैर रखूँगा वो भूमि तीर्थ होगी | हे विकार तुमने मेरी सत्यानाश किया था | हे मलिन दृष्टि तुम्हीं मेरे को जन्म-मरण के चक्कर में ला रही थी | अपने आप को बाड़ में फेंक दिया, फिर मन ने धोखा नहीं किया | हम जब मन को बेईमानी करने में सहयोग देते हैं, ऐसा नहीं कहता हूँ के तुम सहयोग देते हो | मैं भी तुम्हारी लाइन में हूँ | हम लोग माना मैं भी आ गया | जब मन को बेईमानी करने में हम लोग सहयोग देते हैं तो विकार हावी हो जाते हैं | और मन की बेईमानी मिटाने में हम जब कड़क होते हैं तो वही मन हमारा मित्र हो जाता है | वही मन परमात्मा के रस से पूर्ण हो जाता है और आप भी धन्य हो जाता है, हमारा भी बेडा पार हो जाता है | ये हम किताब पढ़ कर तुमको नहीं सुना रहे | तुम को किसी विषय पर बोलने के विचार से हम नहीं आये थे | हम तो आये थे बस आये थे | कैसे चल पड़ी गाड़ी वो वही जाने | मुझे लगता है हम लोगों के लिए ऐसा सत्संग भी कभी-कभी बहुत रक्षा दाई होता है | सुरक्षा के लिए बहुत अच्छा है | हम लोगों को ऐसे विचार बार-बार सुनने चाहिए और इन विचारों पर अपने मन को लगाना चाहिए |

राजा भरतरी पुरे राज-पाठ का त्याग कर दिए थे | गोरखनाथ के चरणों में दीक्षित हो गये थे | लंगोटी मात्र और वल्कल, लाज ढकने के लिए वल्कल के वस्त्र | इतना त्याग था | माया, कामिनी तो छोड़ दी थी | फिर भी मन कब धोखा दे कोई पता नहीं | इसीलिए सावधान रहना चाहिए जबतक साक्षात्कार नहीं होता है | ये मेरी प्रार्थना है, मेरा आदेश नहीं है | राजा भरतरी कहीं से गुजरे गाँव से, वहाँ हलवाई की दूकान पे गर्मा-गर्म जलेबियाँ उतर रही थी | भूतपूर्व सम्राट को हुआ के आहा ये जलेबियाँ गर्मा-गर्म कितनी अच्छी लगती थी | दूकान पे खड़ा हो गया के थोड़ी जलेबी दे दो खाने को | दुकानदार ने कहा अरे साधू बना है, मुफ्त का खाने के लिए | सुबह-सुबह बोनी नहीं की है और तेरे को मुफ्तिये को दे दूँ तो सारा दिन मेरे पास मुफ्तिये आयेंगें | मुफ्त का माल है ? जरा काम-धंधा करो | बोले काम-धंधा क्या करूं ? बोले वहाँ तलाब खुद रहा है वहाँ जा के खोदो | काम करोगे तो टका मिल जायेगा, टका माना २ पैसे | मजे से लो खाओ, मुफ्त की खायेगा | भरतरी दुष्काल राहत कार्य के मजूरी करने गये | दिन भर फावड़ा चलाया, कुदाली चलाई, टोपले भरे, तलाब खोदा और महाराज टका मिल गया और वो टके की जलेबी ले आये | और टके की जलेबी २ सेर, वो जमाने की | टका माना आज का २५ रुपया समझो | दाढ़ी, जलेबी ले आये, जलेबी लेकर, पुरे टके की ले ली और कहा के देख, दिन भर महेनत किया और आज खा ले भर पेट | उससे पूछा के भई नदी-वदी इस गाँव में | बोले नदी नहीं, एक बड़ा तालाब है उस तरफ, जहाँ खोदेंगें उसकी दूसरी दिशा में | भरतरी वहां गये हाथ में भिक्षा पात्र था | रास्ते में से गोबर भर लिया | अब वो तालाब किनारे बैठे हाथ में जलेबियाँ लेकर | बोले देख गर्मा-गर्म जलेबी के लिए मर रहा था | दिन भर पावड़ा चलाया अब उसका फल ले खा | होंठों तक जलेबी लाये दायें हाथ से होंठों तक जलेबी लाये और बाएँ हाथ से गोबर का कौर भर के मुँह में धर दिया और वो जलेबी पानी में फेंक दी | फिर दूसरी उठाई के ले-ले खा | ले, राज छोड़ा, पाठ छोड़ा, सब छोड़ा फिर भी अभी स्वाद नहीं गया | अभी मछली जैसा, मछली का विकार अभी जीभ में पड़ा है | देखने का गया, स्पर्श का गया लेकिन अभी स्वाद लेने की अभी आकर्षण है | ले, ले खा, जलेबी दे तालाब में | और मुँह में गोबर तो थू-थू-थू-थू, कहें खा-खा, ये भी तो ५ भूत है, ये भी तो जलेबी है | गाय ने जब ये खाया था चारा तो उसको ये जलेबी लग रही थी | वही तो चारा घूम-फिर के गोबर हुआ है | ले, ले, खा, खा | एक कौर मुँह में डाले गोबर का और वो हाथ की जलेबी फेंके | ऐसे करते-करते महाराज सारी जलेबियाँ चली गयी | आखरी जलेबी थी | मन ने कहा देखो इतना मेरे को सताया, दिन भर महेनत की, थका हुआ हूँ, चलना मुश्किल हो रहा है | अब ये एक जलेबी तो कुल्ला करके खाने दो | बोले अच्छा तो मतलब तू मेरा स्वामी ही बना रहेगा | फडाक से वो जलेबी फेंक दी | डाल दिया कौर आ गयी वमन | के अब दूसरी भी जलेबी कल दिलाऊंगा | मन हाथ जोड़ता है, कल मजूरी नहीं करूँगा, नहीं खानी, अब कभी खाने की लालच नहीं करूंगा |जैसा कहोगे वैसा ही करूंगा | मन आ गया नियन्त्र में, नौकर हो गया |

एक पाश्चात जगत में बड़े अनुभवी गुरु हो गये | शायद गुरु जीएफ होंगें, जहाँ तक मैंने सुना | तो अपने शिष्यों को कोई साधन की विधि नहीं बताते थे | कोई साधन-भजन नहीं | आश्रम में रहो, जब गुरु की निगाह पड़ जाए, मौज आ जाये, गुरु कह दे, स्टॉप | स्टॉप माना रुक जाओ | तो आप सिर खुजलाते हो तो सिर पर ही हाथ रह जायेगा | और चल रहे हैं, लेफ्ट-राईट हो रहा है, तो राईट हैण्ड है तो राईट ही रहेगा, लेफ्ट हो गया तो लेफ्ट ही रहेगा | मतलब जैसे फोटो खींच लेते हैं और पड़ा रहता है ना मूर्ति में, कैमरा में कैसा वही चित्र, ऐसे रहना है | स्टॉप माना स्टॉप, फिर हिलना-डुलना नहीं | एक दिन में कह दें, दिन में १० बार कह दें, ५० बार कह दें, ५० दिन में कह दें, कोई पता नहीं | जब भी कह दें, केवल आपके कान पर आवाज आ गयी, आप स्टॉप हो गये | ये ही उनकी साधना की पद्दति थी और बड़ी जोरों की पद्दति है ये, बढिया है | महाराज स्टॉप – स्टॉप, ऐसे करते कई लोग तो कंटाल गये | यहाँ तो कुछ करना नहीं खाली गुरूजी जब कह दें स्टॉप फिर पड़े रहना, एक-एक घंटा खड़े रहना | अपने तो भाग जाते कई लोग कच्चे-कच्चे | जो महत्व समझते थे जीवन को उन्नत करने का, वो कुछ गिने-गिनाय लोग, रहे | और उन लोगों को १२ वर्ष के प्रयोगों के बाद उन लोगों को गुरू जीएफ ले गये वन विहार करने को | टेंट लग गये | एक सुखी नहेर थी, उसके इर्द-गिर्द छावडी जैसा हो गया | उन शिष्यों को अब परीक्षा से उतीर्ण करना था | आखरी परीक्षा थी | जो छ्टे हुए थे ५०-६० ले गये | १ दिन, २ दिन, ४ दिन बीते | सुबह मोर्निंग वाक करने जाते | जो साधना के लिए गुरु के द्वार जाते हैं, वो तो संयमी जीते हैं, तंदुरुस्त जीते है, प्रातःकाल की हवा खाते हैं, टहलते हैं खुली हवाओं में | तो वो खुली हवा में टहलने गये | ३ शिष्य जा रहे थे नहेर के बीच, सुखी नहेर के बीच | नहेर तो समझते हैं ना पानी की, और गुरु जीएफ टेंट में बैठे-बैठे आवाज मारा, स्टॉप | रुक जाओ | तीनों के तीनों रुक गये | अब दूसरी आज्ञा जब तक नहीं आती तब तक रुके रहना है | स्टॉप के बाद दूसरी आज्ञा नहीं आती, दक्ष तो दक्ष, आरंभ नहीं होता है तो फिर नहीं हिला जाता | वाम व्रत, तो वाम व्रत हो गया | दक्षिण व्रत किये बिना थोड़े ही सिपाही घूमेगा | ऐसे ही स्टॉप माना स्टॉप | फ्री तो फ्री, फ्री अभी आवाज नहीं आया तो स्टॉप में हैं एक दम ब्रेक | नहेर में से पानी शुरू हुआ | पानी घुटनों तक हुआ, हालांकि वो पानी खुलवाया गया था, पूर्वयोजन था | अब सोचते हैं जब स्टॉप किया तब तो सुखा था, ये पानी आ गया, अब क्या करें | स्टॉप ईज स्टॉप | थड तक आया मंझे हुए ५० साधकों में से ३ और ३ में से भी १ का मन हुआ के भई स्टॉप कहा था तब पानी नहीं था अब ये है | ये तो ठंड लग रही है | मन ने इधर-उधर किया फिर गुरु की आज्ञा | एक तरफ मन बोलता है की ऐसा, ऐसा | एक विचार नहीं तो दूसरा, दूसरा नहीं तो तीसरा | मन कच्चाई का कुछ ना कुछ खोज लेता है | लेकिन श्रद्धा बोलती है नहीं स्टॉप ईज स्टॉप | कमर तक पानी आ गया | अब तो पानी का धक्का लगने लगा | एक ने कहा हम तो भई जाते, अब चलो | दुसरे पक्के रहे, एक निकल गया | बोले तंदुरुस्त होंगें, शरीर होगा तो साधना करेंगें | शरीर नहीं होगा तो क्या साधना करेंगें | बीमार पड़ेंगें तो क्या स्टॉप होगा | ऐसा मन के धोखे में वो आ गया, निकल गया | दुसरे के कमर तक पानी आ गया महाराज, कमर से ऊपर उठा, छाती तक आया तब दुसरे के मन ने जाल बुना और वो निकल गया | गुरूजी ने उसको डांटा कुछ नहीं | शायद ऐसे ही होगा | सूखे में ही होगा | अब अपन ने इतना तो सहा | गुरूजी भी जानते हैं २ घंटे बैठे रहे हैं स्टॉप में रहे | अब क्या करें, अब तो गिर रहे हैं | महाराज, दुसरे के मन ने भी हाँ-ना किया | कभी तो गुरु की आज्ञा दिखे, तो रुकना है और मन का कुछ ना कुछ लडावे | तो मन में संघर्ष हुआ | मन में दो धारी तलवार होती है | एक तरफ तो अच्छी बढिया बात होती है, दूसरी तरफ तो अपना करवाता है के चलो जरा | दूसरा भी कुछ समय में निकल गया | तीसरे का पानी कंधे तक आया महाराज | पानी दाढ़ी को छुए जा रहा है | शांत था पानी, ज्यादा तेज बहाव ना था और आगे को उसको बंद करवा दिया गया था | भरना था पानी उस नाल में, परीक्षा करनी थी | पूरी व्यवस्था थी, पूर्व आयोजन था | महाराज वो दाढ़ी तक पानी आया | अब मन कहता है के होंठों को छु रहा है | अगर अब रुके रहे तो मर जायेंगें फिर भी, मर जायेंगें तो मर जायेंगें | गुरु की आज्ञा में मर जायेंगें तो भी घाटा क्या पड़ेगा, स्टॉप ईज स्टॉप, नो आर्गुमेंट | फिर मन आर्गुमेंट करता है | बोला नो आर्गुमेंट, स्टॉप ईज स्टॉप, नो आर्गुमेंट | महाराज वो होंठों तक पानी छु के जा रहा है | करीब-करीब कभी पानी की लहर हल्की सी नाक को छूती है | स्वास लेने की अब तंगी हो रही है | अच्छा और नहीं तो हटें नहीं, कम से कम स्वास लेने के लिए सिर तो ऊँचा कर लें | फिर कहता है नहीं, आर्डर ईज आर्डर, नो आर्गुमेंट | व्हाट यू थिंकिंग माय माइंड | गुरु आर्डर ईज फाइनल आर्डर | अब पानी नाक को छु रहा है लेकिन भीतर से आर्डर ईज फाइनल आर्डर | महाराज वो ऐसा कुछ झटका लगा के उसका मन और प्राण चटाक से तीसरे नेत्र में ऐसे फुर से पहुँच गये दृढ़ता से | तीसरी आँख खुल गयी | तो शिष्य को कुछ दुर्लभ चीज मिलती है तो गुरु को उसी समय पता चलता है | भागते आया, ओ गुड, गुड, गुड | आर्डर ईज आर्डर, आर्डर ईज आर्डर, शाबाश बेटे | अब तो ये जल पर आर्डर करेगा तो ये जल रुक जायेगा, थल को आर्डर करेगा तो थल और नक्षत्र को आर्डर करेगा तो नक्षत्र रुक जायेगा | क्यों – के तेरा मन पर नियन्त्रण हो गया | जिसका मन पर जितने अंश में नियन्त्रण है, उतना और चीजों पर नियन्त्रण होता है | अब इस जल को कहे के रुक जा, थम जा, आलोप हो जा तो हो जायेगा | क्योंकी ये स्थूल ही, तेरा मन शुक्ष्म, परम शुक्ष्मता में गया है | ये हुई साधना | इसीलिए कबीर जी ने ठीक ही कहा है आज्ञा नहीं सम साहेब सेवा | गुरूजी ने कह दिया के बेटा जाओ पानी का गिलास भर के ले आओ, मुझे बहुत प्यास लगी है | चेला भरने गया, भर के ला रहा है | गुरूजी बोलते हैं बेटा  डोल दे | गुरूजी आपको बहुत प्यास लगी है | आप पी लो दूसरा डोल दूँगा | अरे मुर्ख ये क्या किया तू ने | मेरे गुरूजी प्यासे रह जायेंगें, ये मेरे से नहीं सहन होगा | अरे गुरुजी के मुँह पे तो जूता मारता है और पैरों पे दंडवत करता है | गुरूजी ने कह दिया | बोले के गुरूजी की पहली आज्ञा मानूँगा, पहले गुरूजी को पिलाऊं फिर दूसरा डोलूँगा | ये होते हैं मन के हटी, दुराग्रही | गुरु ने कहा के ये करना है | फिर दूसरी आर्डर दे दिया के ये नहीं ये करना है | तो क्या घड़ी मा आम कहे छे न घड़ी मा आम कहे छे | ना तो तुम मन के गुलाम हो | गुरु को क्या पसंद है, क्या संकेत है, उसकी खबर शिष्य को पड़ जाना चाहिए | और उसके अनुसार अगर ढलने लग जाए, उसके अनुसार करने लग जाय, तो ये माया तजना सहेज हो जायेगा | नारी का नेह तजना सहेज हो गया | मान, बढ़ाई, इर्षा से बचना सहेज हो जायेगा |

पूज्य बापूजी के सद्भावना-वचन : जोधपुर से एतिहासिक सत्संग


 

 

पूज्य बापूजी ने हमेशा कानून-व्यवस्था को सहयोग दिया है एवं अपने साधकों को भी धैर्य व शांति बनाये रखने का संदेश समय-समय पर देते रहे हैं । जोधपुर कोर्ट का निर्णय आने के परिप्रेक्ष्य में पुलिस प्रशासन को सहयोग हो इसलिए पूज्य बापूजी ने पहले ही सभी साधकों को संदेश दिया था कि ‘25 अप्रैल को जोधपुर आना पैसे, श्रम, स्वास्थ्य और समय की बरबादी है ।’ विपरीत निर्णय आने के बावजूद सभीने समता, धैर्य एवं शांति का परिचय दिया । इस पर पूज्यश्री ने कहा है कि ‘मैं सभीको हृदयपूर्वक शाबाशी, धन्यवाद देता हूँ कि जोधपुर न आने की बात मान ली । मेरे उन माई के लालों को, उनके माता-पिताओं को धन्यवाद है । ‘चलो, जोधपुर पहुँचो । यह करो, वह करो…’ – सोशल मीडिया पर क्या-क्या डाल देते हैं । लेकिन सबने ऐसी अफवाहों को मटियामेट कर दिया और नहीं आये इससे मुझे बड़ी संतुष्टि है । पुलिस विभाग तथा और भी सब संतुष्ट हैं । जो जोधपुर नहीं आये, आज्ञा मानी उनकी गुरुभक्ति फली । पहले जो आ गये थे उनकी तपस्या फली, मान-अपमान सहा ।’
पूज्यश्री ने आश्रम के नाम पर फैलायी जानेवाली अफवाहों से सावधान किया है कि ‘कोई ऐसे भी लोग पैदा हो गये हैं कि आश्रम के लेटर पैड की नकल करके उसके द्वारा ‘फलानी पार्टी के विरुद्ध हमारे साधक यह करेंगे, वह करेंगे… हम इतने करोड़ साधक हैं… मैं फलाना संचालक हूँ ।’ यह सब नकली धौंस देते हैं पार्टियों को । हस्ताक्षर करके सोशल मीडिया पर डाल देते हैं अथवा और कुछ कर देते हैं । हमारे साधक ऐसी धौंस नहीं देते । यह हमारे शिष्यों की भाषा ही नहीं है । ऐसा कोई व्यक्ति फर्जी संचालक बन जाता है और साधकों को बदनाम करने के लिए प्रशासन या पुलिस से भिड़ाने की कोशिश करता है तो मेरे साधक भिड़ने की बेवकूफी नहीं करेंगे ।
‘बापू का वीर’ कहला के  कुछ-का-कुछ  बोल देते हैं, ऐसे लोगों की बातों में नहीं आओ । सबका भला हो । कोई गड़बड़ संदेश डालें तो उनसे सावधान तो रहना ही पड़ेगा । भ्रामक प्रचार में नहीं पड़ो, मेरे सिद्धांत पर ही चलो ।
उपद्रवियों एवं भड़कानेवालों से बचो । अहिंसा परमो धर्मः । हमारा किसी भी पार्टी, व्यक्ति या पब्लिसिटी चाहनेवालों से विरोध नहीं है ।
अब कोई बोलते हैं, ‘आश्रमवालों पर दबाव बनाओ । लीगलवाले ऐसे हैं – वैसे हैं…’ तो यह भड़काऊ लोगों का काम है । न लीगलवालों का कोई कसूर है न आश्रमवालों का, ये परिस्थितियाँ आती रहती हैं । आश्रमवाले बुरे नहीं हैं, सब हमारे प्यारे हैं, बच्चे हैं । जो अवसरवादी हैं वे आश्रमवालों को बदनाम करके खुद आश्रम के संचालक बनना चाहते हैं लेकिन उनको पता नहीं है कि हमारे भक्त जानते हैं कि आश्रमवाले बापू को चाहते हैं, बच्चे-बच्चियाँ – सभी चाहते हैं ।
जो लोग बाहर से नहीं चाहते हैं वे भी सत्संग सुनते हैं और भीतर से तो ‘वाह ! वाह !’ करते हैं । जेल में 1500 भाई रहते हैं, कोई भी मेरे प्रति नाराज नहीं है । बस, उछालनेवालों ने तो उछाल दिया कि ‘कैदियों ने थालियाँ बजायीं…’ नहीं, उन  बेचारों ने  तो खाना  छोड़ दिया । ‘बापू फफक-फफक के रोये…’ बापू ऐसे नहीं हैं । ‘बापू को यह हो गया – वह हो गया’ – ऐसी बातों में नहीं आना । बापू के बच्चे, नहीं रहेंगे कच्चे !
जो दुःखी हो गये थे, मेरे को प्रसन्न देखकर उनका दुःख भी मिट जाता है । बापू मौज में हैं क्योंकि बापू ने बड़े बापू (साँईं लीलाशाहजी महाराज) की बात मान ली । आप भी मेरी बात मान लो । परिस्थितियाँ व आँधी-तूफान आते हैं परंतु बाद में मौसम बड़ा सुखदायी हो जाता है । बढ़िया, सुखदायी परिस्थितियाँ आयेंगी ।
हमारे साधकों पर राजनीति का कीचड़ मत उछालो । किसी पार्टी को बदनाम करने की कोशिश न करो । भगवान सबका भला करे । हम किसीको क्यों कोसें ?’
बापूजी ने धैर्य एवं उमंग बनाये रखने की हिदायत भी दी है कि ‘बड़े मनवाले बनो । जितनी बड़ी गाज गिरती है उतने बड़े रास्ते भी बन जाते हैं । तो ऐसा नहीं है कि जो हो गया वह सब आखिरी है । ऊपर और भी न्यायालय हैं, कहीं गलती होती है तो दूसरा ऊपर का न्यायालय सुधार लेता है । तो बड़े मनवाले भी बनो और धैर्यवान भी बनो !

महामनाः स्यात्, तद् व्रतम् । 
तपन्तं न निन्देत्, वर्षन्तं न निन्देत्, ऋतून् न निन्देत्, लोकान् न निन्देत्, पशून् न निन्देत्, मज्ज्ञो नाश्नीयात्, तद् व्रतम् ।

बड़े मनवाले बनो, उदार हृदयवाले बनो, यह व्रत है । गर्मी बढ़ गयी, निंदा न करें । बरसते हुए मेघ की भी निंदा न करें । और भी ऋतुएँ आयेंगी, उनकी निंदा न करें । लोगों की निंदा न करें, पशुओं की निंदा न करें । मांस, मछली आदि न खायें । उपद्रव न करें न करवायें । यह व्रत है । – यह उपनिषद् का वचन मैंने आत्मसात् किया है तो मैं तो मौज में ही रहता हूँ । फिर आप क्यों दुःखी होंगे ! यही तो जीवन का फल है ।’
हर परिस्थिति में सम रहने की सीख देते हुए बापूजी ने कहा है कि ‘जरा-सा डंडा देखकर पूँछ दब जाय (डर जायें), जरा-सा ब्रेड (अनुकूलता) देख के पूँछ हिलने लग जाय (खुश हो जायें) तो कुत्ते में और मनुष्य में क्या फर्क है ? जरा-सा दुःख आ जाय और दुःखी हो जायें, जरा-सा सुख आ जाय तो छाती फुला लें… नहीं, श्रीकृष्ण कहते हैं :

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ।।
 (गीता : 6.32)

सुखद परिस्थिति आ जाय चाहे दुःखद आ जाय… आयी है वह जायेगी । तो अभी ऐसी परिस्थिति आयी है वह भी जायेगी, क्या फर्क पड़ता है ! तुम नित्य रहनेवाले हो और शरीर व परिस्थितियाँ अनित्य हैं । अपने-आपको याद करो, ‘मैं अमर हूँ, चैतन्य हूँ… ।’ लीलाशाह भगवान ने मुझे जो सिखाया वही मैं तुम्हें सिखा रहा हूँ । सीख लो, बस ।
न बेवकूफ बनो न बेवकूफ बनाओ । न दुःखी रहो न दुःखी बनाओ । दुःखाकार और सुखाकार वृत्तियाँ आती हैं, चली जाती हैं । तुम दोनों के साक्षी हो । अपने-आपमें रहो । दुःख आया, सुख आया तो उनसे प्रभावित न होओ । सत्संग होता रहे, सत्कर्म होते रहें ।

बहुत गयी थोड़ी रही, व्याकुल मन मत हो ।
धीरज सबका मित्र है, करी कमाई मत खो ।।

सुख के बड़े प्रलोभन आयें या दुःख के बड़े पहाड़ गिरें, बिजलियाँ चमकें तो घबराना नहीं, मजे में रहना ।

रात अँधियारी हो, घिरी घटाएँ काली हों ।
रास्ता सुनसान हो, आँधी और तूफान हों ।
मंजिल तेरी दूर हो, पाँव तेरे मजबूर हों ।
तो क्या करोगे ? डर जाओगे ?   ना…
रुक जाओगे ?   ना…   तो क्या करोगे ?

बं बं ॐ ॐ, हर हर ॐ ॐ, हर हर ॐ ॐ…

हास्य-प्रयोग करके चिंता, भ्रम और मायूसी को भगा दोगे तो मैं समझूँगा कि तुमने मेरी खूब आरतियाँ कर दीं ।
किसी प्रसिद्ध अखबार ने लिखा है कि ‘बापू के भक्त बोलते हैं कि ‘‘हम किसी मीडिया की बातों से या किसीकी मान्यता से बापू के शिष्य नहीं बने हैं ।’’ वे तो अभी भी इतनी श्रद्धा रखते हैं, यह गजब की बात है !’ मैं ऐसे मीडियावालों को भी धन्यवाद देता हूँ जो हमारे साधकों की सज्जनता को भी प्रकाशित करते हैं । और जिन्होंने नहीं किया वे भी करें । इलाहाबाद के प्रसिद्ध अखबारों ने किया है तो और मीडियावाले भी करें । और नहीं भी करें तब भी हम तो उनके लिए धन्यवाद ही देते हैं । जो नकारात्मक भी प्रचार करते हैं, उनको भी भगवान सद्बुद्धि दें ! जो भी, जैसा भी हो, सबका मंगल, सबका भला । 
भगवान आपकी कैसी साधना कराना चाहते हैं और मेरी परिपक्वता साधकों को कैसे दिखाना चाहते हैं, वह भगवान जो जानते हैं, वह तुम नहीं जानते हो । ऐसी परिस्थिति में भी बापू निर्लेप, निर्दुःख ! फिर तुम तो बापू के बच्चे हो, तुम काहे को दुःखी और परेशान होओगे ? सब बीत जायेगा ।
सत्संग करनेवाले सत्संग करते रहें, बाल संस्कार केन्द्र चलानेवाले बाल संस्कार केन्द्र चलाते रहें – जिसकी जो सेवा है, अपनी-अपनी जगह पर करते रहें ।

खून पसीना बहाता जा, तान के चादर सोता जा ।
ये किश्ती तो हिलती जायेगी,
तू हँसता जा या रोता जा ।।

अरे ! ऐसा हो गया – वैसा हो गया… इसमें क्या है, हो-हो के बदल जाता है ।’
पूज्य बापूजी ने यह भी कहा है कि ‘नारायण साँईं, भारती, भारती की माँ – इतना ही मेरा परिवार नहीं है, मेरे सारे साधक मेरा ही परिवार हैं । और जो साधकों के सम्पर्क में हैं या साधकों को भला-बुरा मानते हैं वे भी मेरा ही परिवार हैं । इस बहाने भी तो वे साधकों का चिंतन करते हैं ! देर-सवेर वे भी प्यारे हो जायेंगे ।
कोई कहते हों, ‘तुम्हारे बापू ऐसे हैं – वैसे हैं…’ तो मैं पूछता हूँ कि हैदराबाद से ‘बायो मेडिकल इंजीनियरिंग’ और अमेरिका से एम.एस. की डिग्री प्राप्त किया हुआ शरद और साइकोलॉजी में एम.ए. की हुई शिल्पी – ये सज्जन माता-पिता के सज्जन बच्चे किसी बीमार लड़की को मेरे पास भेजें और बापू उससे छेड़छाड़ करें – ऐसा ये कर सकते हैं क्या ? और हम ऐसा कर सकते हैं क्या ? जो समय बताते हैं, उस समय में तो हम 9 से 11.15 बजे तक सत्संग व मँगनी के कार्यक्रम में थे । (उसके बाद वहाँ आये हुए भक्तों से बापूजी की कुछ समय तक बातचीत भी चली ।) तो यह सच्ची बात लोग देखते नहीं । जो कुछ आ गया, बोलते रहते हैं । हमको तो भरोसा है कि

साँच को आँच नहीं, झूठ को पैर नहीं ।

बाकी झूठा कितना भी प्रचार-प्रसार हो, कितने भी आरोप लग जायें तो क्या होगा ? मुझे तो गुरुओं के वचन याद हैं : बद होना बुरा, बदकर्म बुरा है लेकिन बदनाम होना बहुत बढ़िया है ।
मेरे बच्चे-बच्चियाँ भी बदनाम हो रहे हैं और मैं भी बदनाम हो रहा हूँ, ये तो बड़ी तपस्या के दिन आ गये ! वाह भाई वाह ! वाह, वाह !!’
पूज्यश्री ने कहा है कि ‘अलग-अलग गौशालाओं में जो 8500 गायें हैं, उनकी भी सेवा होती रहे । जो वृद्ध अथवा गरीब हैं, उनके लिए जो ‘भजन करो, भोजन करो, पैसा पाओ’ योजना चलती है, वह भी चलती रहे । गायों और गरीबों की सेवा चलती रहे सभी जगहों पर ।’