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रामायण तात्विक अर्थ


Audio : http://www.hariomgroup.info/hariomaudio_satsang/Ramayan-Tatvik-Arth.mp3

 

 

पाप का फल ही दुख नहीं है । पुण्यमिश्रित फल भी विघ्न है । ऐसा कौन सा इंसान है जिसको  संसार में विघ्न नहीं है।  तो भगवान महा पापी होंगे इसलिए उनको दुख आया होगा,  14 साल वन में गए।  यदि पाप का फल ही दुख होता तो राज्यगद्दी की तैयारिया हो रही है और तुरिया बज रही है नगाड़े गुनगुना रहे है और राज्याभिषेक की जगह पर अब कैकेयी का मंथरा  की चाबी  चली और रामजी को बोलते है वनवास । एक तरफ तो राज्याभिषेक की तैयारी और दूसरी तरफ वनवास का सुनकर जिनके चेहरे पर जरा करचली नहीं पड़ती,  जिनके चित्त में जरा क्षोभ नहीं होता, राज्याभिषेक को सुनकर जिनके चित्त में हर्ष नहीं होता और वनवास सुनकर जिनके चित्त में शोक नहीं होता,  ऐसे जो अपने आप मे  ठहरे है वे ही तो रामस्वरूप है ।  ऐसे राम को हजार हजार प्रणाम । ॐ…  ॐ….  ॐ…  ॐ…  ॐ…  ।

दस इन्द्रियों के बीच रमण  करने वाला दशरथ (जीव) कहता है कि अब इस हृदय गादी पर जीव का राज्य नहीं, राम का राज्य होना चाहिए और गुरु बोलते है कि हाँ ! करो । गुरु जब राम राज्य का हुंकारा भरता है तो दशरथ को खुशी होती है लेकिन राम राज्य होने के पहले दशरथ, कैकेयी की मुलाक़ात मे आ जाता है । दशरथ की तीन  रानिया बताई, कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी । सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण । जब  सत्वगुण में से,  रजो गुण मे से हटकर दशरथ (जीव),  तमोगुण में, जाता है, रजोगुण में, तमोगुण में, फँसता है, तमस मिश्रित रजस में फँसता है, कैकेयी अर्थात कीर्ति में, वासना में फँसता है तो रामराज्य होने के बदले में  राम वनवास हो जाता है।  राम का राज्य नहीं,  राम वनवास ! ओर सब है राम ही जा रहे है । फिर रामायण के आध्यात्मिक कथा का अर्थ लगाने वाले महापुरुष लोग, आध्यात्मिक रामायण का अर्थ बताने वाले संत लोग कहते है, दशरथ छटपटाता है । राम वनवास होता है तो दशरथ भी चैन से नहीं जी सकता है और समाज में देखो !  कोई दशरथ चैन से नहीं है, सब बेचैन है । ज्यादा धन वाला-कम धन वाला, ज्यादा पढ़ा- कम पढ़ा,  अधिक मित्रों वाला- कम मित्रोंवाला, मोटा अथवा पतला, नेता अथवा जनता,  देखो !  सब बेचैन है ।  क्यों ? कि  राम वनवास है । कथा का दूसरा पॉइंट यह बता रहा है कि रामजी के साथ सीताजी थी । लक्ष्मण जी थे । राम माने ब्रह्म, सीता माने वृत्ति । राधा माने धारा, श्याम माने ब्रह्म । राधेश्याम….  सीताराम….. ।  

सीता माने वृत्ति, राम के करीब है लेकिन सीता की नजर स्वर्ण के मृग पर जाती है और राम को बोलती है ला दो । जब सोने के मृग पर तुम्हारी सीता जाती है तो उसे राम का वियोग हो जाता है । सोने के मृग पर, धन दौलत पर जब हमारा चित्त जाता है तो अंदर आत्माराम से हम विमुख हो जाते है, फिर लंका मिलती है, स्वर्ण मिलता है, लेकिन शांति नहीं मिलती । उसी वृत्ति को यदि राम की मुलाक़ात करानी हो तो बीच मे हनुमानजी चाहिए । सौ  वर्ष आयुष वाला जीवन, उस जीवन को परमात्मा के लिए छलांग मार दे,  उस जीवन के भोग विलास से छ्लांग मार दे ।  जामवंत को बुलाया, उसको बुलाया, उसको बुलाया । कोई बोलता है एक  योजन कूदूंगा, कोई बोलता है दो योजन । हनुमानजी सौ योजन समुद्र कूद गए । माप करेंगे तो भारत के किनारे से लंका सौ योजन नहीं है लेकिन शास्त्र की कुछ गूढ़ बाते है । जीवन जो सौ वर्ष वाला है उस जीवन के रहस्य को पाने के लिए, छलांग मारने का अभ्यास और वैराग्य हो । हनुमानजी को अभ्यास और वैराग्य का प्रतीक कहा , जो  सीताजी को रामजी से मिला देगा । रामजी उत्तर भारत मे हुए और रावण दक्षिण  की तरफ । उत्तर ऊँचाई है और दक्षिण नीचाई है । ऐसे ही हमारी वृत्तियाँ शरीर के नीचे हिस्से मे रहती है । और जब हम काम से घिर  जाते  है तो हमारी आँख की पुतली नीचे आ जाती है । जब हम क्रोध से भर जाते है तो हमारी सीता नीचे आ जाती है और सीता जब रावण के करीब  होती है तो बेचैन होती है, ज्यादा समय  रावण के वहाँ ठहर नहीं सकती । काम के करीब हमारी सीता ज्यादा समय ठहर नहीं सकती । चित्त मे काम आ जाता है, बेचैनी आ जाती है और लेकिन  चित्त में राम आ जाता है तो आनंद आनंद आ जाता है । रावण की अशोक वाटिका मे सीताजी नजर कैद है लेकिन सीता में यदि निष्ठा है तो रावण अपना मनमाना कुछ कर नहीं सकता है। ऐसे ही हमारी वृत्ति मे यदि दृढ़ता है राम के प्रति पूर्ण आदर है तो काम हमे नचा नहीं सकता । उस दृढ़ता के लिए साधन और भजन है।  चित्तवृति को दृढ़ बनाने के लिए, सीता के संकल्प को मजबूत बनाने के लिए तप चाहिए ,जप चाहिए, स्वाध्याय चाहिए, सुमिरन चाहिए ।  

जब कामनाएँ सताने लगे, नरसिंह भगवान ने जैसे कामना के पुतले को फाड़ दिया ऐसे ही काम को चीर दे, नरसिंह अवतार का चिंतन करने से फायदा होता है । इस कथा की आध्यात्मिक शैली को जानने वाले संतों का ये भी मानना है कि रावण मर नहीं रहा था और विभीषण से पूछा कि कैसे मरेगा ? बोले डुंटी  (नाभि ) में आपका बाण जब तक नहीं लगेगा तब तक वो रावण नहीं मरेगा अर्थात कामनाए नाभि केंद्र मे रहती है । योगी जब कुण्डलिनि योग करते है तो मूलाधार चक्र मे जंपिंग होता है और फिर स्वाधीस्थान चक्र मे खिंचाव होता है, पेट अंदर आता है बाहर जाता है, साधक लोग, तुम लोगो को भी अनुभव है । वो जन्म जन्मांतरों को कामनाए है, वासनाए है, उनको धकेलने के लिए हमारी चित्तवृत्ति हमारी जो सीता माता है, उस काम को धकेलने के लिए डांटती फटकरती है और जब डांट फटकार चालू होती है तो साधक के  शरीर मे क्रियाए होने लगती है। देखो समन्वय हो रहा है कथा का और कुण्डलिनि योग का । कभी कभी तो रावण का प्रभाव दिखता है और कभी कभी सीताजी का प्रभाव दिखता है । दोनों की लड़ाई चल रही है है । कभी कभी तो साधक के जीवन मे कामनाओं का प्रभाव दिखता है और कभी कभी तो सद्विचारों का प्रभाव दिखता है। अयोध्या को कहा कि नौ द्वार थे  । ऐसे ही तुम्हारा शरीर रूपी अयोध्या है, इसमे भी नौ द्वार है और नौ द्वार में जीने वाला ये जीव जो दशरथ है, राम को वनवास कर दिया कैकेयी के कारण, छटपटा के प्राण त्याग कर देता है । राम राम कही राम  हाय राम …. तव विरह में तन तजी राज=हू गयो सुरधाम । जब सीताजी को राम के करीब लाना है तो बंदर भी साथ देते है । रीछ भी साथ देते है । और तो क्या भी खिचकुलिया भी साथ देने लगी कण कण उठा कर रेती का और समुद्र मे डालने लगी तुम यदि रामजी और सीता की मुलाक़ात के रास्ते चलते हो, तुम्हारी वृत्ति को परमात्मा की ओर लगाते हो तो पृकृति और वातावरण तुम्हें अनुकूलता भी देता है, सहयोग भी देता है और तुम  यदि भोग कि तरफ होते हो तो वातावरण तुम्हें नोच भी लेता है ।

अयोध्या सुनी सुनी थी तब तक, जब तक राम नहीं आए जब राम आ रहे है, ऐसे खबर सुनी अयोध्या वासियो ने तो नगर को सजाया और नगरवासियों ने साफ सफाई की । राम आने को है, राम आने को होते है तो साफ सफाई पहले हो जाती है ऐसे ही तुम्हारा चित्त रूपी नगर अथवा देह रूपी नगर, जब परमात्म साक्षात्कार होता हो तो कल्मष तुम्हारे पहले कट जाते है। तुम्हारे पाप तुम्हारा मल, विक्षेप हट जाता है। तुम स्वच्छ पवित्र हो जाते हो  और राम जब नगर मे प्रवेश करते है वो दिन दीवाली का दिन माना जाता है। लौकिक दीवाली व्यापारी पूजते है लेकिन साधक की दिवाली तब है जब हृदया मे छुपे हुए राम जो है न,  काम के करीब गए है सीता को छुड़ाने के लिए,  वो राम जब अपने सिंहासन पर आ जाए और अपने स्वरूप मे जाग्रत हो जाए उस दिन साधक की दिवाली। बड़ा दिन तो वह है कि बड़े मे बड़ा जब परमात्वतत्व का ज्ञान हो  उससे बड़ा दिन कोई नहीं । लब पर किसी का नाम लूँ तो तेरा नाम आए । ॐ …. ॐ  

वृत्ति मीमांसा


 

वृत्ति मीमांसा

संसार में जो भी दुःख सुख है वे सब वृत्ति का विलास मात्र है.. वृत्ति माना क्या?उसको कोई लोग सुरता भी कहते है ,कोई फुरना भी कहते है…आप तो समझ गए होंगे ..पास में कौन है जबतक तुम्हारी वृत्ति नही गयीं तबतक तुम्हें पता नही चलता इसका नाम वृत्ति है।तो,संसार का व्यवहार ,सुख-दुःख, आकर्षण-विकर्षण ,भोग,त्याग ये सब वृत्ति का ही तो विस्तार है।पंडित,साधु,मूर्ख ये सब वृत्ति का विस्तार है।वो वृत्तियाँ हृदय से निकलती है,उस वृत्तियों को कल्पना भी कहा जा सकता है।वो यदि दुःख में सुख की कल्पना करती है तो वृत्ति को दुःख सुख भासता है।विष में अमृत की भावना दृढ़ करती है तो विष भी उसे अमृत के जैसा लगता है,ये वृत्ति का चमत्कार है।आकाश में हाथी और रथ की भावना करती है वृत्ति तो उस बादलों में  हाथी, रथ,घोड़े आदि भासते है।ठूँठे में चोर की भावना करती है तो ठूँठा चोर हो भासता है और ठूँठे में यदि साधु  की भावना करती है तो ठूँठा साधु भासता है ।सिंपि में रुपे की भावना करती है तो सिंपी रूपा रूप भासती है और रस्सी में साँप की भावना करती है तो रस्सी साँप हो भासती है ।ऐसे ही वृत्ति इस नश्वर देह में सुखबुद्धि करती है तो देह के संयोग से इसे सुख भासता है।और यही वृत्ति जब परमात्मा में सुखबुद्धि करें तो परमात्मा का तो वास्तविक सुख है वो परमसुख को उपलब्ध हो जाती है।

है सारा वृत्ति का खिलवाड़ ! है तो कुछ नही ,फ़िल्म का पर्दा है और युवक बेचारे पढ़े लिखे कईं लोग जाते है ,पर्दे पर जो दिख रही है अभिनेत्री या अभिनेता या और कुछ वो सारा हमारी वृत्तियों को छन्छेडकर और नीचे के केंद्रों में लाने का सामान है।तो,फ़िल्म में जो हमने भवन,भूमि, मकान,रूप,सौंदर्य ,पति ,पत्नी का प्यार आदि जो देखा वो तो हमको उपलब्ध नही होगा!लेकिन हमारी वृत्ति ऐसा प्राप्त करने के लिए प्रवृत्त हो जाएगी!देखा है फ़िल्म में लेकिन वृत्ति नीचे के केंद्रों में आ गई ,वासनाओं के केंद्रों में और विकसित हो गयी ,अपने मूल हाल का रूपांतर तो हुआ नही!तो क्या है कि कईं जवानों को मैंने उनके चेहरे देखे ।यहाँ न आनेवाले लोग भी कईं बार मिलते हैं सड़कों पर कईं बार बाजार में,कईं बार इधर जहाँ कहीं नजर पड़ जाय लोग तो मिलेंगे ही..तो,उनके चेहरे से खबर आती है कि इन्होंने अपने जीवन की शक्ति का बुरी तरह विनाश कर दिया ।कैसे किया?फ़िल्म देखकर उनकी वृत्ति रात्रि को फ़िल्म की जो प्रेयसी दिखी ,जो चित्र देखे उस चित्रों के साथ वो अपने विकारों को उत्तेजित हो जाते है और शरीर उनका धुल जाता है ये भी तो वृत्ति का प्रभाव है..ये कल्पना है!तो,कल्पना -कल्पना में आदमी का विनाश भी हो जाता है और कल्पना -कल्पना में आदमी का रक्षण भी हो जाता है।है तो कल्पना!स्त्री नही है,अभिनेत्री नही है,लेकिन उसका चित्र देखा उसके हास्य विलास को देखा है फ़िल्म में और रात्रि को उसी के साथ अपना हास्य विलास करके शरीर को नाश कर देता है।ऐसा भी हुआ करता है!है तो कल्पना !तो कल्पना होती है प्रारंभ में कल्पना लेकिन वो कल्पना स्थूल शरीर पर बुरा असर भी डालती है।ऐसे ही कल्पना शुरू में करो औऱ वो स्थूल शरीर पर अच्छा असर भी डालती है।ये दोनों माया के अंतर्गत है,संसार के अंतर्गत है,चढ़ाव उतार संसार के अंतर्गत है।

साधक की बुद्धि का विकास होता है ध्यान भजन,जप तप,सेवा करके उसकी वृत्ति की मलिनता घटती जाती है ।अब उसे उस तुच्छ भोगों में तुच्छ आकर्षणों में ,पर्दे के तो क्या वास्तविक भी जो भोग है उसको विष समझता है।उतना उसको विवेक आ गया है।लेकिन कईं जन्मों की  इस प्रकार की जो वृत्तियाँ है ,इस प्रकार का जो आकर्षण है, भोग की जो गरेड पड़ गई है, जो चीला पड़ गया है,जो एक लकीर गहरी हो गई है उस लकीर में से वो बाहर निकल नही सकता औऱ उस लकीर के परिणाम को समझता भी है।अच्छा भी नही लगता ,भोग में फिसल जाना अच्छा भी नही लगता लेकिन पुरानी जो आदतें है ,संस्कार है उसके अनुसार वो गिरता जाता है ,फिर संभलता है,फिर गिरता है,फिर संभलता है।अब उसे अच्छा भी नही लगता लेकिन पुराने संस्कार उसे घसीट जाते हैं वासना के।जय जय..ध्यान से सुनेंगे सब लोग…तो पुराने संस्कार वासना जो है हमें घसीटती है ।

एक तरफ जिसको विवेक मिला उसको सबकुछ मिल गया।और विवेक इनकार करता है..वासना घसीटती है..अब  विवेक कभी कभी तो जीत लेता है,ज्यादा समय हार लेता है।तो क्या है कि विवेक दुर्बल हो जाता है कि आपणु काम नही! और मिलते भी ऐसा कि भाई ये तो संसार है ,इन्द्रियों को कबतक रोकोगे,क्या करोगे ,संभोग से समाधि फलाना आदि आदि सुने है ….
कि और स्पीड में आ गए..लेकिन उनमेंसे चुने हुए जो समझू लोग है वो वासनाओं को रोकने का प्रयास करते है ,वासना नही रुकती तो दुःखी होते है और रुकती है तो कभी कभी हिम्मत आती है लेकिन कभी हिम्मत आई कभी हिम्मत हार गए..कभी हिम्मत आई कभी हिम्मत हार गए इसमें भी जीवन पूरा हो सकता है।ये उपाय तो है बचने का ,ठीक है लेकिन वेदांत के तत्व को जानने वाले आत्मवेत्ता आत्मरामी महापुरुष कहते हैं इससे हम बढ़िया साधन तुमको बताए ।तुम्हारी वृत्ति विषय विकार में फँसकर सुख चाहती है ,क्षणिक सुख मिलता है बाद में विषाद होता है,भोक्ता थक जाता है।ऐसा कोई भोग नही कि भोक्ता को थकाये नही ,ऐसा कोई भोग नही कि भोक्ता के मन को दुर्बल न करे,ऐसा कोई भोग नही कि भोगने के बाद विषाद पैदा ना हो ,घृणा या ग्लानि पैदा न हो।घृणा, ग्लानि ,विषाद पैदा होने के बावजूद  भी ..अनुभव है 15 दिन पहले का ,अनुभव है 4दिन पहले का ,अनुभव है 10 दिन पहले का कि कोई सार नही!और कईं ऐसे ही सप्ताह आता है उसका एक गया दूसरा गया देखते है कोई सार नही !जीते  है तो भी जैसे  जुआरी होते है न ..सिंधी जगत के बुजुर्ग लोग कहते है कि हारे जुआरी का आधा मुँह काला और जीते जुआरी का पूरा मुँह काला..ऐसी कहावत है।हार गया है जुआरी तो अब उसके पास तो अपनी तुच्छ वृत्तियों को पोसने के साधन नही है इसलिए उसका आधा अकल्याण है लेकिन जिसने जुगार मे जीत लिया है मुफ्त का तो उसकी तो वासना और भड़केगी! उसका पूरा सत्यानाश है! ऐसे ही हमने कावे दावे से जो भी कुर्सियाँ वुर्सियाँ जो कुछ पा लिया है ,तो बाहर से तो हम समझते है कि हम है या हमने पा लिया है या ये हो लिया है लेकिन यदि हम सावधान न रहे तो हमारी वासनाएँ हमारा पूरा बर्बादी कर देगी।जय जय….तो अब समझना ये है कि है सारा वृत्तियों का खिलवाड़…अब वृत्तियों को…आप बिना सुख की इच्छा के रह नही सकते और संसार का ऐसा कोई सुख नही कि आपके पास टिक जाय ! यदि टिक गया होता तो हजारों जन्म से तुम सुख लेते आये हो ,एक एक अंश मात्र भी टिकता तो अभी सुख के गोदाम होते हमारे पास ! इस जन्म का भी यदि सुख टिक जाता तो एक एक मूँग जितना क्या एक एक राई के दाने जितना सुख लिया जो दिन में कईं ऐसे राई के दाने इकट्ठे हो गए,साल में कितने हो गए ,अभी इस उम्र में हमारे पास कुछ तो पोटला होना चाहिए ! ये सुख टिकता नही क्योंकि वृत्तियाँ बदलती रहती है !

अब साधक के जीवन में और बुद्धू के जीवन मे …अब यहाँ तीन प्रकार के वृत्ति के लोग रहे ..एक बुद्धू की वृत्ति, दूसरी साधक की वृत्ति और तीसरी सिद्ध की वृत्ति।बुद्धू की वृत्ति इतनी प्रगाढ़ हो गई है, इतनी जाड़ी हो गई है कि उसको विवेक करने का मौका ही नही,खाया पिया ,रहा,जिया,बस्स… पशु जैसा जीवन।साधक सोचता है कि आखिर कब तक? इतना खाया फिर क्या?इतना लिया फिर क्या?राज्य मिला फिर क्या? हो गए धनवान फिर क्या? हो गए सत्तावान फिर क्या? हो गए रूपवान आखिर क्या? ततः किम?हम चल रहे है ,मखमल बिछ रहा है,सुंदरियाँ हीरे जड़ित कंगन पहनकर चमर डुला रही है, राजाधिराज महाराज छड़ी पुकारे जा रहे है लेकिन ऐसे लोग भी मिट्टी में मिल गए जमीनदोस्त हो गए ,ततः किम? आखिर कब तक?आखिर क्या ? ये साधक की वृत्ति है।तो देखता है कोई सार नही…कोई सार नही दिखता है फिर भी बेचारा वहीं बह जाता है ,क्यों?कि वो संस्कार और वासनाएँ पुरानी है ।तो, अत्यंत मूर्ख है उसको तो पता ही नही,इसलिए वो उसीमें अपने को सुखी मान लेता है।अ

त्यंत जो समझू है वो अपने सत्य स्वरूप परमात्मा के सुख में मस्त है लेकिन हम लोग जो है बीच के त्रिशंकु की नाई झूले खाते है।जब मिल गए मूढ़ों का संग तो हमको लगा कि …जब मूर्खों के संग में गए,जब उसी वृत्ति में बहने वाले …मूढ़ उसको नही कहते कि जो अनपढ़ है..जय जय…मूढ़ उसको नही कहते कि जो मजदूरी कर रहा है…मूढ़ उसे कहते कि जो संसार को सत्य मानकर संसार की नश्वर चीजों से अपने को सदा सुखी रखने की कोशिश में लगा है उसको मूढ़ कहा जाता है।तुम पत्थर को मूढ़ नही कहते,पत्थर को बेवकूफ नही कहते,क्यों? उसमें कुछ है ही नही तो  बेवकूफ कैसे कहे? वृक्ष को तुम बेवकूफ नही कहते..मूढ़ का मतलब है कि कुछ जाने और कुछ न जाने …लड़के को कहा कि जा चाय में खांड डाल दे ,लड़के ने खांड के बदले नमक डाल दिया..अरे छोरा तू तो मूर्ख है मूढ़ है !..तो चाय की तपेली को तो जानता है।वचन को भी तो सुनता है लेकिन खांड के बदले नमक डाल दिया।जहाँ दाल में  नमक   डालते  है तो खांड डाल दिया ,रसोइया कहे कि ए तू तो रसोइया मूर्ख है ।तो मूढ़ उसे कहा जाता है कि जो समझना चाहिए वो न समझे, जो पाना चाहिए वो न पाए,जो करना चाहिए वो न करें और जो न करना चाहिए वो उस वक्त करें।समझ गए न मूढ़ की परिभाषा?तो श्रीकृष्ण ऐसे लोगों को कहते है- विमूढा नानुपश्यंति पश्यंति ज्ञान चक्षुशः

मूढ़ लोग उस मैं तत्व को अपने निजस्वरूप को नही देख सकते,ज्ञान की आँख से देखा जाता है।तो मूढ़ता भी तो वृत्ति का खेल है।साधन भजन से ये वृत्तियों को शुद्ध करके मूढ़ता हटाकर आदमी विवेक जगाता है।लेकिन विवेक होगा तभी तो साधन में जायेगा ! जय जय..विवेक होगा तभी तो साधना की तरफ जाएगा और साधना करेगा तभी विवेक जगेगा।तो मानना पड़ेगा कि सत्संग से विवेक जाग्रत होता है। विवेक से साधना बनती है,साधना से..जैसे नाविक नाव को ले जाता है ,नाव नाविक को ले जाती है ऐसे  सापेक्ष है एक दूसरे के पोषक है।साधक के लिए वेदांत की दृष्टि से देखा जाय तो वो बॉर्डर पे खड़ा है मूढ़ों का संग मिलता है तो एक पुराना अपनी वासना और आदत और दूसरा वही मिला ! विवेकानंद कहते थे कि अभी तक तुम सावधान रहना कि तुम्हारा घड़ा भी रुंझाया नही है उसको खुजलाना मत ।जबतक सत्य का साक्षात्कार नही हुआ तब तक फिर पुरानी जो वासनाएँ हैं उसको जाग्रत मत होने देना।जाग्रत होने देना तो हम नही चाहते है ,हो जाती है क्या करे?हम नही चाहते है कि हम गिरे ,फिसले..साधक है फिसल जाते है.. कि संस्कार पुराने है!पुराने है इसलिए गिरते रहे  ऐसा भी नही ..और पुराने है इसलिए हम घबरा जाए ऐसा भी नही ,पुराने है नही छूटेंगे ऐसा करके हार जाए ऐसी बात भी नही।प्रयत्नशील रहे और प्रयत्न कईं प्रकार के है ।भोगियों के संग से ,स्त्रियों के संग से कामविकार की वासना पुरानी जग जाती है ।भोगियों के संग से पुरानी भोग वासना जग जाती है ।इसलिए कुछ समय निकालकर हम इन्द्रियों को आकर्षित करने वाले पदार्थों से बचाये अपनेको।इसलिए आद्य शंकराचार्य ने कहा – एकांतवसौ लघु भोजनादौ मौनं निराशा कर्णावरोधः
कभी एकांतवास का उपयोग करो।आप लोग तो वही के वही है लेकिन आठ दिन मौन मंदिर में रहते हैं तो आपकी विचार धारा एकदम भिन्न हो जाती है,बड़े दिव्य अनुभव होते है सूक्ष्म जगत के अनुभव होते है ,किसी को कुछ अनुभव होते है ।है तो आप वही के वही ! इन्द्रियों की पुरानी जो घरेड पड़ी है उस घरेड से बचकर जब आप आ जाते है कुछ सात्विक वातावरण में तो आपकी ऊँचाई भी तो आपकी ऊँचाई भी तो आप अनुभव करते है।

इसीलिए जिसको इसी जन्म में मोक्ष चाहिए, जिसको इसी जन्म में अपना कल्याण चाहिए भले बाबाजी न बने ,साधु न बने,जंगलों में न जाये ,कन्दरों में न जाये, गुंफाओं में न जाये फिर भी वर्ष में 10-15 दिन, पाँच दिन ,पंद्रह दिन जितना जिसकी हिम्मत हो कपैसिटी हो उतना कभी कभी किसी से परिचय न हो एकांत में चला जाय और अपने साधना के रास्ते पर कदम रखें।किसी से परिचय न हो इसका मतलब ये भी नही की आदमी से भी परिचय न हो…परिचय का मतलब है कि वासना भड़काने के वातावरण में नही रोज के वातावरण से कुछ अलग निकलके अपनी भीतर की यात्रा करें…तो उसकी वृत्तियों में शुद्धि बढ़ जाएगी ,और हिम्मत आ जाएगी । फिर भी ये कोई पराकाष्ठा नही है… ऐसा करते करते उसकी वृत्ति जब आज्ञा चक्र तक पहुँच गयी या विशुद्ध चक्र तक पहुँच गयी वो आंनदित हो जाएगा ,सामर्थ्य बहुत आ जाएगा …फिर भी पुरानी घरेड है अथवा प्रकृति को उससे कुछ कराना है तो हो सकता है कि वो घर मे आये ,बच्चे को जन्म दे,हो सकता है कि घर में नही आए और जगह कहीं बच्चे को जन्म दे दे ऐसा भी हो सकता है…

यदि तर तीव्र प्रारब्ध है तो ,उसका दृष्टांत क्या ?पराशर ऋषि किश्ती में बैठकर पार कर रहे थे नदी।मत्स्यगंधा नाम की लड़की,युवती ..उसका बाप चला गया था, शाम का टाइम होगा कि दोपहर का टाइम होगा …पराशर को हुआ कि…पराशर ने उस लड़की को देखा और कहा कि मेरे साथ तू संसार व्यवहार में उतर…उसने कहा ये कैसे हो सकता है? मैं मच्छीमार की लड़की हुँ,.. मेरे शरीर से मच्छी की गंध आती  है..   मस्तयगन्धा…मच्छी के मुँह से मैं निकली हुँ,मच्छी के पेट से निकली हुँ।ये कैसे हो सकता है?कोई देखेगा तो?….”कोई नही देखेगा,तू चिंता मत कर,मैं कोहरा कर देता हुँ।”…कोहरा कर दिया,अंधा धुंधी कर दी …बोली ” अब कोई देखेगा तो नही?अंधा धुंधी तो हो गयी …लेकिन मेरे को क्या लाभ?” ..बोले…”अभी तेरे शरीर से मच्छी की गंध निकलती है ,बाद में तेरे से सुगंध..अभी दुर्गंध निकलती है …सुगंध निकलेगी..योजनगंधा तेरा नाम पड़ेगा”…”योजनगंधा तो पड़ेगा लेकिन फिर  कुछ संतति हो जाय तो फिर समाज में हमारे लिए तो मुसीबत”….बोले “नही,संतति  हो भी जाएगी वो जन्मकर चला जाएगा तू कुँआरी की कुँआरी रहेगी।” …और वही पराशर के द्वारा उस अनंत ब्रम्हांड को संचालन करने वाले परमात्मा ने प्रकृति की ऐसी लीला को घटाकर पराशर द्वारा वेद व्यास जी  को जन्म दे दिया।तो हम देखेंगे कि पराशर जैसे व्यक्ति का पतन हो गया? नही ! उत्थान हुआ? नही ! जबतक शरीर है ,अन्तःकरण है तभी इन केंद्रों से चढ़ना उतरना हो सकता है लेकिन जिसके केंद्रों का रूपांतर नही हुआ उनका गिरना ही गिरना हुआ,जिनका रूपांतर हो गया उनका शरीर परमात्मा का साधन बन गया।जैसे कबीर को पुत्र है, पुत्री है,वसिष्ठ को पुत्र है, थे …लेकिन फिर फर्क क्या होता है कि हम लोग मेरा पुत्र करके ,मेरा परिवार करके हमारी वृत्तियाँ वहीं घूमती रहती है और उन पुरुषों का मेरा पुत्र मेरा परिवार बोलते समय भी वो ऐसी जगह पे होते है कि वो समझते है कि ये सब वृत्तियों का खिलवाड़ है,ये कल्पना मात्र है..ये लोग असंग हो गए !

तो,साधक हो,बुद्धू हो चाहे सिद्ध हो ,जब शरीर है तो सब अपनी इच्छा के अनुसार घटनाएँ नही घटती। और सब दिन एक जैसे भी नही होते।सब अवस्थाएँ एक जैसी नही होती..किसी  की भी।तो मूढ़ क्या है कि अवस्थाओं को एक जैसी करने में लगा है और नही हो रही है इसीलिए परेशान है।साधक अवस्थाओं को भी एक जैसा रखना चाहता है और नही हो रही है, वृत्तियों को एक जैसा रखना चाहता है इसीलिए वो परेशान है। भोगी सतत भोग में सुख ढूँढता है और सतत भोग बने रहे  और  सतत भोग भी नही और सतत भोग की वृत्ति भी सुखाकार नही रहती इसीलिए वो दुःखी है।त्यागी हमारी वृत्ति में त्याग ,प्रभु की याद बनी रहे  ,ये बनी रहे ..तो सतत प्रभु की याद नही बनती है अथवा बनती है  तो प्रभु के स्वरूप का पता नही चलता ।तो इस प्रकार वो भी दुःखी,वो भी दुःखी ,क्यों? क्योंकि जबतक वृत्तियों में हमलोग रहते है तबतक वृत्तियाँ कभी सुखाकार होगी कभी दुखाकार होगी,कभी वृत्ति के अनुकूल होगा कभी वृत्ति के प्रतिकूल होगा । श्रीकृष्ण जैसे  ..जो पूतना को छठे दिन की उम्र में पूतना को आकाश विहार कराते कराते पहुँचा दिया।श्रीकृष्ण के जीवन मे पद पद पे चमत्कार दिखे, अद्भुत लीलाएँ दिखी ।श्रीकृष्ण के होते होते श्रीकृष्ण के बच्चे दारू पीकर,आपस में लड़ मरे ये शास्त्र लिखनेवाले की कितनी सच्चाई और कितनी उदारता है! ये समझना होगा कि श्रीकृष्ण परब्रम्ह परमात्मा कहो जो कहो कम है, तो उनके होते हुए उनके बच्चे भगवान राम के होते हुए दशरथ राजा चल बसे और भगवान राम की माँ विधवा,शास्त्र कह रहे है ! तो ये जो बहाय्य जगत की लीलाएँ है,खिलवाड़ है …वे आदमी ज्यादा दुखी होते है जो चाहते है कि …आम केम ना थयूं…जो आदमी अपने को कर्ता मानता है वो कृष्ण को भी कर्ता मान लेगा , वो पराशर को भी कर्ता मान लेगा,परब्रम्ह परमात्मा को भी कर्ता मान लेगा। लेकिन जो अपने को द्रष्टा मानता है वो कृष्ण को भी द्रष्टा मानेगा…अथवा जो कृष्ण को द्रष्टा माने वो अपने को भी द्रष्टा मानेगा…अब फिर दूसरे ढंग से विचारे…भोगी वृत्तियों को भोग से सुखद बनाना चाहता है इसीलिए वो हताश हो जाता है,खिन्न हो जाता है ,अंत में बुरी तरह हार के जाता है।

भक्त वृत्ति में स्मृति भरना चाहता है।योगी वृत्ति को एकाग्र करना चाहता है।लेकिन ज्ञानी समझता है कि एकाग्र करके भी उस वृत्ति से जबतक मैं निवृत्त नही हुआ,वो एकाग्र वृत्ति फिर चंचल हो सकती है, वो ऊपर की वृत्ति फिर नीचे के केंद्रों में आ सकती है और अपने को  जबतक कर्ता मानूँगा तबतक सुख दुःख ,लाभ हानि ,पुण्य पाप ,जन्म मरण चालू रहेंगे।इसीलिए ज्ञानी वृत्ति को बाधित कर देता है।ज्ञानी वृत्ति जिस अन्तःकरण से निकलती है वो अन्तःकरण और अन्तःकरण की वृत्ति और वृत्तियों के द्वारा इन्द्रियों की प्रवृत्ति इन सब को अपनेसे पृथक जानकर जैसे आप अपनी गाड़ी अपनेसे पृथक जानकर उसको ड्राइव करते है,अपना स्कूटर अपनेसे पृथक जानकर  ड्राइव करते है  …आप तो कर्ता है…सच पूछो तो करता वरता क्या?हो रहा है!आदमी आ गया तो ब्रेक लग जाती है।कहीं ,कोई सामने ट्रैफिक है तो हॉर्न पे हाथ चला जाता है ये सब सिस्टमेटिक होता रहता है लेकिन हम मानते हैं कि मैंने ब्रेक लगाया ,लगनी ही  है ,पैर पहुँच ही जाते है।भूख लगी तो रोटी की तरफ मनीराम चला ही जाता है,प्यास लगी तो पानी की तरफ पहुँच ही जाता है।एक ऐसी मशीनरी मोटर फिट की है कि नाक में सनसनाहट हुई तो छींक हो ही जाता है, कोई प्लान बनाते हो?छींक देने की कोई कोशिश करते हो? छींक आ जाती है लेकिन तुम कहते हो कि मैंने दी, बगासा आ जाता है, कि मैं बगासा खांदू…ऐसे ही संसार का जो कुछ व्यवहार है प्रारब्ध वेग से हो जाता है ऐसा समझ कर ज्ञानी अपने वर्तमान प्रारब्ध में कुछ हस्तक्षेप नही करते।

ऐसा नही है कि साक्षात्कार कर लोगे तो सब तुम्हारी इच्छा के अनुसार होने लग जायेगा ! और यदि  इच्छा के अनुसार होने लग भी जाये समझो कुछ तो फिर इच्छाएँ बढ़ती चली जाएगी।जय जय…तो न तुम्हारी इच्छा के अनुसार सब होना संभव है और सब इच्छाएँ तुम्हारी फेल होना भी संभव नही! लेकिन इच्छा मात्र ये जो वृत्ति है और वृत्ति से जबतक निवृत्ति नही हुई तबतक महाराज ऊपर नीचे, सुखद दुःखद ये प्रवृत्ति बनी रहती है। बापजी ये वेदांत की दृष्टि सौ टका ऊँची है?हाँ!ऊँची तो है ,लेकिन इसमें वैराग्य की जरूरत है।विवेक और वैराग्य की जरूरत है। ये सब उसमें होता है ऐसा कर के तुम ..जैसे पराशर उतर आए संसार मे लेकिन उतरने के बाद फिर ऐसे चले गए कि दिखे भी नही!जय जय!श्रीकृष्ण संसार में तमाम लीला,क्रीड़ा ..बंसी बजाना, ये करना,9 वर्ष की उम्र में…अद्भुत लीलाएँ हुई..द्वारका में परिवार था ऐसा वैसा तुम हम सुनते हैं लेकिन देखो कि पुत्र और द्वारका समाप्त हो रही है तो श्रीकृष्ण को खेद नही होता और विस्तार हो रहा है तो श्रीकृष्ण को उसमें अहं नही ।ऐसी तुम्हारी वृत्ति ..तुम समझो ये वृत्ति का खिलवाड़ है ऐसी यदि पक्की हो जाये तुम्हारी समझ तो फिर तुमको दुःख के समय दुःख डिगा नही सकेगा और सुख तुम्हें बाँध नही सकेगा।और दुःख सुख दोनो जिसको बाँध नही सकते वो तो मुक्त है ही है!

सच पूछो तो तुम्हारे असली स्वरूप को सुख और दुःख ने कभी बाँधा ही नही है!तुम्हारे वास्तविक स्वरूप को,तुम्हारे आत्मा को आजतक सुख ने और दुःख ने किसीने बाँधा नही…लेकिन तुम जानते नही वास्तविक स्वरूप को इसीलिए शरीर को मान लेते है मैं! बंगाली महात्मा की मैंने तुमको बात बताई थी कुछ समय पहले ..वो बंगाली महात्मा महात्मा कैसे बने कि वो जज थे ,न्यायाधीश थे,जूरी में बैठे थे,किसी अपराधी को फाँसी लगने वाली थी ,ब्रिटिश गवर्नमेंट के जमाने की बात है 1942,44,45 के इर्द गिर्द की होगी …तो पाँच जज न्यायाधीश बैठते थे फाँसी के केस में …तो उसको 5बजे शाम को फाँसी लगनी है.. ये आकर  कुर्सी पर बैठे ,उसको सामने देखा मुजरिम को.. जज ने बोला कि” ये अपराधी तो नही है इसको फाँसी कैसे दी जाए?”…
“सेशन कोर्ट का आर्डर है, हाय कोर्ट का आर्डर है उसमें हम तुम क्या कर सकते हैं?हमें तो खाली बैठना है”…
बोले “नही!ये निरपराध है!”
आपस में वो उनका चल पड़ा कुछ ,ऐसा करते करते कलह में थोड़ा समय बीत गया ,5बजकर कुछ देर भी हो गई.. आर्डर नही दे पाए ..अब तो वो बच गया!समय बीतने के बाद फिर फाँसी नही देते।फिर देरी से तार आई ब्रिटिश गवर्नमेंट के वहाँ से कि वो अपराधी को फाँसी न लगे..तार आने में कुछ लेट हुई..तब जज को लगा कि जिस परमात्मा ने मेरे को ये सत्प्रेरणा  इनको हम फाँसी दिलवा देते है तो फिर इसको तो हम जिंदा नही कर सकते थे !

तो जिस अन्याय को बचाने के लिए परमात्मा ने न्याय की वृत्ति पैदा की उस परमात्मा को मैं खोजूँगा! वो रिजाइन करके चल दिए, प्रमोशन का प्रलोभन मिला,ये मिला,वो मिला लेकिन विवेक पक्का था वैराग्य मजबूत हो गया था ,चल पड़े..खोज में किसी गुरु महाराज के..गए हरिद्वार, गए हृषिकेश,गए काशी मथुरा खोजा  लेकिन देखा तो कही छोटी दुकान कहीं बड़ी दुकान,कोई एक हजार आठ तो कोई जगत का गुरु लेकिन अपने मन का गुरु कोई दिखा नही उनको।कोई विश्व के गुरु कोई जगत के गुरु ,किसीका बोर्ड और लम्बा , किसीका कम ,किसीकी छोटी गादी ,किसीकी बड़ी,गादियाँ मिली कोई गुरु नही मिला! श्रीराम! न्यायाधीश थे,निर्णय शक्ति तो अच्छी थी ही और साधक भी थे साधन भजन करते थे ।तो,अपनेसे बड़ी शक्ति के बिना सिर झुकता नही।तो,  कहीं भी जाए तो…हाँ अच्छा!आप न्यायाधीश थे, बैठिए  बैठिए…ये वो..खम्मा खम्मा खम्मा खम्मा…बोले,ये मेरे से इम्प्रेस हो गए ! खम्मा खम्मा करे ये मेरा घर तो क्या करेंगे ?….खूब भटके बेचारे लेकिन इनको कोई ऊपर उठा सके ऐसा इनको कोई दिखा नही।आखिर परेशान हो गए ।

रात्रि के मध्यान वक्त कमर में पत्थर बाँधकर गंगा किनारे खड़े हुए और कूद के अपघात कर ले ..इस जीवन से भी क्या एक तरफ तो ये भोग घसीटते है और असत्य में सार नही ,जीकर भी क्या करना?त्रिशंकु होकर क्या करना?इससे तो मर जाना अच्छा।तो रात्रि के समय हृषिकेश में गहरे पानी की जगह पर जो जम्प मारने की तैयारी की,कि बस अब कूद मरुँ, अपघात करू,अपघात माना देह घात नही शरीर घात करूँ..बस उठे कि बस जम्प लगाने की तैयारी पंजों के बल शरीर उठ चुका था ,बस गंगे हर कह रहे थे मन में कि  एकाएक किसी अजनबी चेतना ने अजनबी आदमी ने आकर हाथ पकड़ लिया! ए, मूर्ख कहीं का! अपघात करता है, अहं घात नही करता ? गुरु नही मिलते?जा मैं तेरा गुरु हुँ!जा नारायण नारायण जा!
“प्रभु,हे भगवान ,हे गुरुजी आप कहाँसे आये?”
“ये मत पूछ!जा,मैं तेरा गुरु हुँ!जा नारायण नारायण जा!”

वो योगी अदृश्य हो गए।वे बंगाली जज साधु वेश धारण करते नारायण नारायण करते घूमते घामते चारूदकरनाली है इधर बड़ौदा के पास..किसी पेड़ के नीचे बैठ गए और वो धूणी दुखाई उन्होने अपनी  , नारायण नारायण जप करते करते वैखरी वाला फिर मध्यमा में आया  ,फिर पश्यंति में आया…उनका थोड़ा सामर्थ्य प्रभाव बढ़ने लगा..फिर क्या हुआ कि लोग उनको बोलते  बाबाजी हमारे घर भिक्षा लो  हमारे घर भिक्षा लो..उन्होंने कहा कि जो अडोस पड़ोस के लोग मिलकर आये और  कीर्तन करते करते मेरे पास आए और मुझे ले चले भिक्षा के लिए मैं उसकी लूँगा! ताकि भीड़ घट जाए,आग्रह घट जाए और लोग भगवान के रस्ते लगे।तो लोग ऐसा करने भी लग गए।वो बाबाजी भिक्षा ले आते ,नर्मदाजी में खारा खट्टा अर्पण करके बाकी निःस्वाद लेके भोजन करते और वो अपना पेड़ के नीचे मानसिक साधना करते रहते।

 

उनकी वृत्ति इतनी एकाग्र हुई और अनजाने में लोग बोले कि बाबाजी भगवान आके करते थे ऐसी बात नही है…छुपा हुआ परमात्मा …यदि तुम्हारी वृत्तियाँ ,कल्पना कम हो जाती है तो तुम्हारी वृत्ति में इतना संकल्प की तीव्रता हो जाती है कि बहाय्य स्थूल जगत पर भी उसका प्रभाव पड़ जाता है।कोई बाबाजी ने गाड़ी रोक दी,कोई बाबाजी ने बरसात कर दी कोई ने कुछ कर दिया…कोई बाबाजी यूँ करता है कि हे भगवान दया कर,अब तू बादलों को इधर से भेज इधर से धक्का मुक्की कर…नही!उनके संकल्प मात्र से वातावरण में हो जाता है चेंज..जैसे मेरा संकल्प तो सूक्ष्म है। है तो सूक्ष्म…अथवा ये माइक वाले संचालन जो कर रहे है  …इनका है तो संकल्प..मैं इनको इशारा यूँ करता हुँ और ये तुरंत सब लाइटे बंद कर देते है।है तो संकल्प..लाइट बन्द करना दिखा कि ओहोहोहो एक एक गोला में जाके क्या किया होगा?जो नितांत गामडिया है उसको आश्चर्य लगेगा लेकिन तुम ने समझा कि ये तो सिस्टमैटिक है कोई बड़ी बात नही…लेकिन योग की दृष्टि में हम गामडिया इसलिए बोलते है कि ….फिर बाबाजी चले गए वहाँ से,भीड़ होने लगी…आयी मौज फकीर की दिया झोपड़ा फूँक… बद्रीनाथ गए..अब भक्तों को तो श्रध्दा थी ,कोई चमत्कार घट जाते थे..भक्तों को श्रध्दा बढ़ गई… भोजन करो भोजन करो….कि “भगवान को लगाओ पहले ठाकुरजी को भोग लगाओ …बद्री विशाल के धाम में है तो प्रभु खाए फिर खाना चाहिए अपन को” ..भोजन वोजन बनाया …लगाया तो भगवान को तो जैसे पंडी लगाते है और ले आते है…बाबा ने कहा “नही ,भगवान खायेंगे तब खाएंगे अपन “..तो मैने सुना है बहुत लोगों के मुँह से की भोग लगवाया और जैसे कोई बड़ा आदमी खा लेता है,थोड़ी दाल खा लेता है, थोड़ा कुछ उठा लिया थोड़ा खा लिया ..उसकी खाई हुई थाली दिखे ऐसे वहाँ भगवान के लगाया भोग देखा कि भगवान ने स्वीकार किया ,बाद में बाँटा। ये तो खैर वो न्यायाधीश थे,नर्मदा किनारे आके जमे थे,तप किया था,वैखरी मध्यमा परा में पहुँचे थे उनके संकल्प में बल था।

 

कभी कभी तो तुम्हारी जो कल्पनाएँ हैं वो कल्पनाएँ श्रद्धा का रूप ले लेती है तो उसमें बड़ा समर्थ आ जाता है जैसे धन्ना जाट आदि की कथाएँ तुमने सुनी होगी । धन्ना जाट की कथा क्या कहती है …किसी गाँव मे पंडित आया कथा करने भागवत आदि की । कथा करके पंडित जब रवाना होता है तो 7 दिन कथा सुनकर उनका दिल भर गया धन्ना जाट का ,लड़के का..और पंडितजी घोड़े पर सवार होकर जा रहे थे , पैर पकड़ लिया कि गुरु महाराज आपको पहले नही जाने दूँगा ।आप बोलते है कि ठाकुरजी की सेवा करो, ठाकुरजी की सेवा करो ..मेरे पास ठाकुरजी नही आप ठाकुरजी दो…बोले ले लेना कही से…बोले नही आप ठाकुरजी के लिए सुनाते है तो आपके पास ही होंगे ठाकुरजी। उस बेचारे को पता नही!…पंडित ने पिंड छुड़ाने के  लिए काफी किया लेकिन धन्ना जाट की जो कल्पना है वो विश्वास में बदल गई।   भोले आदमी की कभी कभी कल्पनाएँ  विश्वास का रूप तेज ले लेती है।

पंडित ने सोचा अब इसको कैसे छुड़ाउँ ? पंडित भांगेडी थे, भांग घोंट के पीते थे रोज , तो भांग घोंटने का जो सिलबट्टा था वो पकड़ा दिया बोले ये ठाकुरजी है ! बोले क्या करना कि नहा के नहलय्यो, खिलाकर ख़य्यो , बस यही आज्ञा मान लेना। नहा के सिलबट्टे को नहला दिया । अब भोजन एक रोटी रोज मिलती थी । क्योंकि खेत था थोड़ासा छोटासा पौना एकर..माँ और बेटा थे  रोटी ,सब्जी या चटनी रख दी भगवान के आगे …खा ले…खा ले…आधी तू खा ले फिर मैं खाऊँगा। गुरुमहाराज ने कहा है नहा के नहलय्यो, खिलाकर ख़य्यो…अब तू खाएगा तभी तो मैं खाऊँगा ..खा ले ठाकूर,खा ले ठाकूर,खा ले ठाकूर… लेकिन ठाकुर..इसके मन में ये नही कि सिलबट्टा है  …ये तो बस पंडितजी ने कहा गुरुमहाराज ने …ठाकूर खा ले,खा ले,खा ले ..उसकी जो और वृत्तियाँ थी वो वृत्तियाँ सब  कट आउट हो गयी और तदाकार की गरेड पड़ गई!  लेकिन अभी उतनी नही पड़ी जितनी घटना में चाहिए …एक दिन हुआ ,ठाकुरजी ने नही खाया, भूखे रहे !..दूसरे दिन,तीसरे दिन ,चौथे दिन, और दिन दिन भूख-प्यास-तड़प बढ़ती रही.. महणे भी मारने लगे कि तुम तो अमीरों के हो
!तुम तो पढ़े लिखे को,हमारे जैसे गरीब की रोटी तुमको अच्छी नही लगती ,पंडित तो तुम्हें मलाई खिलाते होंगे..पंडित तो तुम्हें रबड़ी खिलाते होंगे! अब मैं कहाँ से लाऊँ?खा ले !कभी मालदार हो जाऊँगा तो रबड़ी भी खिलाऊँगा अभी रोटी तो खा लें!क्या तेरे को भूख नही लगती?वो अपनी जैसी जैसी उसकी भावनाएँ कल्पनाएँ थी वो बेचारा बड़बड़ाता रहा। लेकिन उसकी बुद्धि सत्य बुद्धि थी कि ठाकुरजी खाएँगे !कथा कहती है कि सातवा दिन हो गया ! अब भूख ने तंग किया ! आदमी भोजन करता है तो उसकी चेतना भोजन पकाने में पेट के करीब होती है। और भोजन आदि नही करता तो उसकी प्राण शक्ति ऊपर चढ़ जाती है। अब आ गए  जिद पर ! और स्त्रियाँ भी जब रोटी नही खाती है न तो जिद बढ़ जाती है उनका और …और दारू काम करावे न..सत्याग्रह वत्याग्रह क्या है? रोटी नही खाया तो फिर जिद पकड़ जो हैं बढ़ जाती है और सामने वाले की पकड़ रोटी खा रहा है तो उसकी पकड़ कम हो जाएगी और हम रोटी खा रहा है तो ज्यादा हो जाएगी।

और कईं बार सत्याग्रह..अब फाफड़ा खाकर सत्याग्रह करते है उनको दम नही होता..ॐ ॐ ॐ..वृत्ति अंदर खटकती है न! …वृत्ति में दृढ़ता हो तो सामनेवाले के …  सारी दुनिया संकल्पों की वृत्तियों की है! जिसकी वृत्ति दृढ़ है उसकी जीत होती है और जिसकी वृत्ति थोड़ी  हिल गई उनकी हार होती है। जैसे दोमल ..जिसमे बल ज्यादा ,युक्ति ज्यादा , ऐसे ही ये सारा दुनिया वृत्तियों का खिलवाड़ है! निदान, आखिर धन्ना जाट आया अपनी जटेती  पर कि..” तू खाता नही! तेरे को  पंडितजी के सिवाय अच्छा नही लगता तो मेरे को तेरे सिवाय भी जीना क्या? …. कि तू नही खाता है तो मैं नही हो जाता हुँ, भूखे मर मर के   मर जाऊँ ,इससे तो ऐसे ही मर जाऊँ  तेरे आगे बलिदान होकर!  गुरुमहाराज ने कहा कि नहा के नहलय्यो, खिलाकर ख़य्यो, तू खाता नही ? तू नही खाता तो मेरा रहना,जीना किस काम का? गुरुमहाराज बेचारे अच्छे थे, दे ही नही रहे थे! मैंने जबरन  माँगा और मैं तेरे को भूखे मारूँ ? तू मेरे पास आता भी नही ? सुना था कि ठाकुरजी दयालु होते है लेकिन ये पत्थर दिल ! सचमुच तुम पत्थर जैसे हो ! जैसे बाहर से दिखते हो ऐसे ही भीतर हो ! हमने सोचा कि बाहर से पत्थर जैसे दिखते है ,भीतर कोई दिल  होगा, लेकिन तुम्हारा दिल नही? अब मैं जाता हुँ ! “….लेकिन वो जाने का तुम मत करना हं !…क्योंकि उसमें तीव्रता चाहिए ! उठाया छरा और ज्यों पेट में भोंक मारने की तैयारी की ,ठाकुरजी वहाँ प्रगट हो गए! हाथ पकड़ा कि “धन्ना ! माफ करना मुझे माफ़ करना देरी हो गई !” झट झट झट झट रोटी खाने लग गए ! धन्ना क्या कहता है…”ठहर जा ! आधी मेरे लिए रख, मैं भूखा हुँ!क्या करता है तू?”

तो धन्ना के अंदर ही वो चैतन्य आत्मा था जिसने सिलबट्टे से प्रभु को भोजन कर्ता कर दिया ऐसी बात नही..वही का वही ,वैसे का वैसा, पूरे का पूरा हमारे पास है, लेकिन हमारी वृत्ति में विश्वास कहाँ?हमारी वृत्ति में ऐसी एकाग्रता कहाँ?हमारी वृत्ति में ऐसी गहरी दृढ़ता कहाँ?इतना हो भी जाए.. सिलबट्टे से ठाकुरजी निकल आए और ठाकुरजी तुम्हारे खेत में काम करे …अथवा वो पंडितजी का वो लंबा कथा है,हम सार समझ रहे है इसका,थोड़ा हिस्सा… फिर भी धन्ना जाट की ये पूर्णता है ऐसी वेदांत को जानने वाले महापुरुष नही स्विकार करेंगे! वृत्ति में विश्वास हुआ ,लेकिन है वृत्ति !तो ठाकुरजी भी कबतक रोटी खाएँगे और तू खोलनेवाला भी कबतक रहेगा? तू ठाकुरजी के स्वरूप को और अपने स्वरूप को नही पहचानेगा तबतक ये मध्यम भक्ति हुई ! ईश्वर के रास्ते जाने वालों के..बहुत लोग हैं लेकिन इनके तीन भेद होते है.. शुरुआत ये होती है कि “वो” है! भले अपने को दिखता नही है, लेकिन “वो” है!  …”वो” है! ईश्वर है! आगे आदमी बढ़ता है तो ऐसा महसूस होता है कि “वो” मेरा है ! “भगवान” मेरा है ! और आगे साधना में बढ़ता है तो फिर अपने को हटा देता है  …वो मेरा नही ,न मेरा न तेरा ,हम न तुम दप्तर गुम..वो स्वयं मेरा हो जाता है!  …तस्यवाहं,तवैवाहं,सुवहं…मैं उसका हुँ! फिर बोलता है मैं तेरा हुँ! फिर आगे बढ़ जाता है “मैं” तू हुँ तू मैं है! एक ही  है…

एकमेवाद्वितीय ! “मैं उसका हुँ ” दूरी है, “मैं तेरा हुँ” थोड़ी नजदीकी है , लेकिन “मैं” हुँ ही नही “तू” है अथवा तू नही मैं दोनो एक हो गए ! ये साधना की पराकाष्ठा हो गयी !तो वृत्ति में विश्वास आए अच्छा है लेकिन वही वृत्ति का जो विश्वास है उस विश्वास से भी एक कदम आगे चला जाए तो विश्वास भी वृत्ति का है , अंतःकरण का है, अंतःकरण को सत्ता  देने वाला “मैं चैतन्य ” अनन्त अनन्त ब्रम्हांडों फैल रहा हुँ ! जैसे लाइट है न हीटर में आ जाती है तो गर्मी देती है ,फ्रिज में आ जाती है तो ठंडक दे देती है ऐसे ही  मुझ चैतन्य का स्वभाव है …सूर्य में आकर तपन देता हुँ ,  चाँद में आकर शीतलता देता हुँ, अंतःकरण सात्विक में आकर प्रेम और आनंद छलकाता हुँ, तामस और राजस में आकर इच्छाएँ ,वासनाओं को सत्ता देता हुँ… मेरे अनेक रूप है…ऐसा जो अनुभव करने लग जाए उसके लिए फिर   न मृत्यु न जन्म ..चिदानन्द रूपं शिवोहं  शिवोहं….न में जाति भेद…जाति का भेद नही,वर्ण का भेद नही,गुरु और   शिष्य का भेद नही…चिदानन्द रूपं शिवोहं  शिवोहं..

तुमको क्या करना कि मैं कहूँ कि तुम ये करो ऐसी बात नही है, तुम इन कथाओं से ये समझ लो कि तुम कहाँ हो और तम्हारे चित्त की सेटिंग कहाँ अच्छी तरह से होती है!  तुम्हे ज्ञान मार्ग में गति करने की हिम्मत है तो उस जैसा कोई रास्ता नही! यदि ज्ञान मार्ग में गति करने की हिम्मत नही और फिसल फिसल जाते है तो फिर यम -नियम का थोड़ा अवलंबन लेकर …जनरल में तो ये कहना होगा कि तुम प्रति दिन थोड़ा बहुत  सत्संग चाहिए ! काम करने के बाद ,कार्य पूरा होने के बाद ,अथवा कार्य के बीच आप देखो कि ये काम मन ने, इन्द्रियों ने  ,वृत्तियों ने किया, इसको सत्ता देनेवाला मैं वृत्तियों का साक्षी चैतन्य ! ॐ शिवोहं सद्चिदानंदोहं शांतोहं ! एकाध घण्टा बीत गया फिर आप 2 मिनट ब्रेक मार दी..एकाध घण्टा काम किया फिर एकाध मिनट आपने अपने चित्त को ,चित्त की वृत्तियों को ,प्रवृत्तियों को देखा..एक उपाय ये भी सुगम है। दूसरा – आप 2-3 महीने के लिए प्रयोग करें चलते-फिरते कि ये सब स्वप्ना है! लेकिन  बड़ा कुशल,सतर्क और स्फूर्ति दाई जीवन होता है ज्ञानी का! मिथ्या मिथ्या करके आलस्य ,प्रमादी …जैसे कोई लोग सत्संग थोड़ा बहुत वेदांत का  सुन लेते है फिर तो नींद में और गपशप में जीवन गवाँते है ! नही ! जीवन तुम्हारा ऐसा होना चाहिए कि आप सुख के दाता बन जाओ ! देहाध्यास घटाने के लिए सुगम उपाय है कर्मयोग। कर्मयोग का मतलब ये कि अपनेसे हो सके उतना दूसरों को सुख दो! जो दुसरों को सुख देने की आदत पड़ जाएगी तो अपने सुख की परवाह नही होगी, अपना सुख दूसरों को सुख देते समय अपनेआप ऑटोमैटिक भीतर से शुरू हो जाएगा, बाहर के सुख की जरूरत नही पड़ेगी, बाहर के सुख की गुलामी नही करनी पड़ेगी !

जितना हो सके दूसरों को सुख पहुँचाओ । दूसरों को बाबाजी फ़िल्म की टिकट लेके देवे वो सुखी हो जाएँगे ! इसमें फिर कैसे सुख पहुँचाए वो ढूँढना पड़ेगा। और सच्चा सुख पहुँचाना है तो दूसरों को हरि चर्चा में ,दूसरों को सत्संग में,सत्य साधना में …तो सजातीय  प्रवृत्ति में यदि दूसरोंको सुख पहुँचाओगे तो वो बहुत तीव्र,बढ़िया साधना होगी नही तो फिर दूसरे जिस ढंग से भी थोडा बहुत दूसरों को सुख पहुँचाओ,दूसरों की सेवा की तरफ समय जाए,शक्ति जाए तो ये कर्मयोग उसका नाम बन जाता है। कर्म तो करें लेकिन इस कर्म से वासना बढ़े नही लेकिन हमारे चित्त में भूख की वासना घट कर हमारा अपने साथ मिलाप होता जाए,योग होता जाए। ये संसार जीवन मे जीने वाले संसारी लोगों के लिए बड़ा उपयोगी है। ये कर्मयोग करोगे तो वाहवाही हो जाएगी,थोड़ा यश हो जाएगा और फिर समझोगे कि बस! तो फिर सत्ता या सत्ता वाले बोलेंगे लेओ टिकट आप ही लड़ो !  हम बैठा छे !

इसलिए सत्संग को न छोड़े! सत्संग को न छोड़े और अपने को ऊँची दृष्टि रखें कि हमारा लक्ष्य क्या है? प्राप्तं राज्यं.. राज्य प्राप्त भी हो गया , ततः किम ? चक्रवर्ती सम्राट भी हो गए ,ततः किम ? नगरसेठ हो गए, ततः किम ? पहलवान हो गए , आखिर कब तक ? उससे क्या ? सबकुछ हो गया फिर भी एक दिन सब न होने में बदल जाएगा।
जब  न होने में बदल जाएगा तो अभी से समझ लो नही है ! और नही के तरफ ही तो जा रहा है! जो कल दिन था आज वो नही है ! जितना कल  उम्र था आज वो नही है ! शरीर में कल अन्न,जल था वो आज उस रूप का नही है। सब नही में जा रहा है। जो सब नही में जा रहा है तो नही है ! ऐसा करके देह अध्यास को गलाने का प्रयत्न करो । देह को गलाने का नही..देखना गलती न हो! Gujarati text
नही,नही…देह में अध्यास..जो अहं प्रत्यय है उसको गला ले। कभी नदी किनारे चले गए,सरोवर किनारे चले गए, नदी की बहती धारा को देखा कि यह धारा बह रही है  ….बहती हुई धारा…आँखों की पुतलियों को एकाग्र कर दिया, मन एकाग्र हो गया ..देखो की नदी की धारा बह रही है, पानी बह रहा है, बहता पानी देखनेवाला मैं हुँ ऐसे ही बहती वृत्तियों को देखने वाला “मैं” वृत्तियों से परे ,वृत्तियों का साक्षी ! वाह वाह !ॐ आनंद ॐ शांति ॐ… कभी छत पर चले गए  , तारे टिमटिमा रहे हैं , अंधेरी रात है, उनके   तरफ देखते देखते देखते  चित्त एकाग्र कर लिया …फिर..कहीं तारे होकर मैं टिमटिमा रहा हुँ  ,कहीं चाँद होकर  चमक रहा हुँ… कभी चले गए पूर्णिमा की  रात है या और कोई चाँदनी का अच्छा वातावरण है , चाँद की तरफ देखा, आँखों को खोला ,बंद किया,खोला ,बंद किया..1-2 मिनट.. इससे आँखों की रोशनी भी थोड़ी बढ़ती है। फिर एकटक चाँद को देखते देखते.. हाय! चाँद तू मेरी चेतना से  चमकता है, तू मैं है, मैं तू हुँ! वाह वाह वाह ! कभी ऐसे खुले आकाश में निहारा…दृष्टि एकाग्र करके निहारा तो दूर तक दृष्टि जाएगी तो आँखों की कसरत हो जाती है और आँखों की थोड़ी सुरक्षा भी होती है। जितना दूर साफ दिखाई दे उतना दूर तक  सीधाई में देखनेसे आँखों के लिए  हितावह है। सीधाई में देखते देखते फिर दृष्टि को फैलाया , दृष्टि को फैलाते फैलाते अपने को फैला दिया जैसे जहाँ तक नजर जाती है वहाँ तक अपने मन को फैला दिया कि सब मैं मैं मैं ! ये अच्छा और ये बुरा ये दोनों गल जाएगा। अशुभ करने की अपेक्षा शुभ करना अच्छा है, ठीक है न ! वृत्ति में पाप होने की बजा वृत्ति से पुण्य होना अच्छा है। वृत्ति से पुण्य होने की बजा वृत्ति के द्वारा परमात्मा देखना अच्छा है! परमात्मा देखने की अपेक्षा सबको परमात्म तत्व मानना अच्छा है ! और सबको परमात्म तत्व मानने की अपेक्षा भी अपने सहित सब परब्रम्ह है ऐसा जानना सर्वोपरी है ! ॐ ॐ ॐ ! 3 महीना तुम्हारे आगे बहुत कुछ अनुभूतियाँ आ जाएगी ! हो सकता है कि आँख खुल जाए, हो सकता है कि आपको साक्षात्कार हो जाए !

उठें सुबह 4 बजे के करीब, नहा धो के बैठ सके तो बहुत अच्छा है नही तो फिर ऐसे ही बैठ गए..वृत्तियों को देखा, फिर श्वासों श्वास को देखा , मैं देखनेवाला हुँ, ये सब दिखनेवाला है…थोड़ा ये अभ्यास किया फिर गहरा पूछा “मैं कौन हुँ वास्तव में?”  दिखनेवाला तो हुँ लेकिन कौन हुँ? “मैं कौन हूँ ”  “मैं कौन हूँ”  ऐसा दोहराते दोहराते जाओगे न  तो आपका स्वरूप कोई आकार नही है कि ऐसा होगा ..आपका स्वरूप तो जो हैं शांत,शुद्ध ,निःसंकल्प…कोई संकल्प नही उठे ..बड़ी शांति लगेगी …फिर मन इधर उधर जाएगा …कि मन तू इधर उधर जाता है तो जा ! मैं तेरे को देखता हुँ !…मन को तो देखनेवाला हुँ लेकिन हूँ  कौन? इस प्रकार का थोड़ा अभ्यास करोगे , कुछ ही दिनों में आपको लगेगा कि अरे ! असीम शांति का दर्या  ! आपकी योग्यता बढ़ जायेगी। बुद्धि की शक्तियाँ विकसित होने लगेगी।

मजूरी कर कर के जो रॉकेट वाले नही समझ पाए वो लीलाशाह बापू पाटण-मैंसाणा लोकल,चालू लोकल में , शटल…
पाटण-मैंसाणा शटल होय छे न…शटल में उसने पढ़ के दिखाया कि बापू …आजसे 12-13 साल पहले की बात होगी 14 साल …बापू ऐसा है,बापू ऐसा है, अब वो ऐसी संभावना है  अखबार में आया था बड़ी फोटो वोटो …बापू ने यूँ करके..अरे !बोले…कुछ नही ये तो खाली..कुछ नही होगा …घड़ीभर में!..लेकिन बापू से पूछो कि आपकी ये तो बड़ी उपलब्धि है ..हम लोगों की नजर में तो बड़ी उपलब्धि है, लेकिन उन्होंने जो स्वरूप का साक्षात्कार किया उसके आगे कुछ नही!  आत्मसाक्षात्कार के आगे ये गरिमा, या ये ज्ञान , या ये देश देशांतर का पता या भविष्य का पता या ख्याल आ जाना…अच्छा, तो ये ख्याल कैसे आता है ? कि दिखता है ? नही ! ज्ञानी के आगे चाहे अज्ञानी के आगे , आँखों के आगे जो चीज आएगी उतनीही वैसी दिखेगी लेकिन ज्ञानी को जो दिखता है उसकी वृत्ति इतनी सूक्ष्म हो जाती है ,ब्रम्हतत्व , ब्रम्हाकार  वृत्ति उनकी इतनी सूक्ष्म हो जाती है कि अनंत अनंत ब्रम्हांडों में फैली हुई  । जैसे आकाश आपका इस ब्रम्हांड को फैला हुआ है ऐसे अनंत ब्रम्हांड है दूसरे …इस ब्रम्हांड को इस आकाश ने घेरा है। ऐसे अनंत ब्रम्हांड है! वो चैतन्य परमात्मा इतना सूक्ष्म है कि जिसका वाणी के द्वारा बयान नही..ये छठे  केंद्र का तो थोड़ा हम कल्पना संकल्प करके थोड़ा हिम्मत करके समझा भी सकते है, लेकिन जब आखरी तत्वज्ञान की बात आती है न तो वहाँ वाणी अवाच्यपद हो जाती है ! जितना भी कहेंगे उसमे से कुछ न कुछ प्रतियोगी शब्द आ जाएगा। जो भी कुछ कहेंगे  उसको काँटने का शब्द दूसरा भी आ सकता है।

पूरा सत्य कहने का विषय नही होता है..उसके इशारे हो सकते है, संकेत हो सकते है…   संकेत हो सकते है. ..संकेतमात्र…कैसे संकेत कैसे ? आ रहा था साधु, पकड़े पैर..बाबाजी गृहस्थी हुँ, चार बच्चियाँ है ,  शादी करानी है,पैसा नही है…संध्या के समय आपके दर्शन हो गए।अभी आठ ही बजे है ।दिए जले थे तबसे बैठा हुँ ,बाबाजी कोई संत आए …  आप आए दया करो…बाबा ने कहा दया वया क्या , मैं आ रहा था तो कोई  कहीं मणि पड़ी थी,कोई हीरा पड़ा था । तो ठीकरा था न उसको मैंने मणी के ऊपर रख दिया …तो यहाँ से आधा मील जाना फिर दाहे थोडासा मुडना ,एक झाड़ है , पेड़ है पीपल का उसके पास में वो पड़ा है घड़ा।  अब क्या है कि अंधेरी रात है ,घड़ा  के द्वारा  घड़ा से मणि ढका हुआ है। उसने  उठाया फानस , हाथ में लिया डण्डा , चला…चला तो जो चिन्ह मिले थे पहुँच गया। जबतक वहाँ नही पहुँचा था तबतक तो उसको फानस काम मे आया ।अब वहाँ पहुँचा और देखा कि वो घड़ा से ढका हुआ कुछ है, उठाए क्या? साँप हो, कुछ हो क्या पता !कोई घुस गया हो तो…मार दिया जोरसे डंडा। डंडा मार दिया तो वो जो मणि है न प्रकाश मय ! तअब मणि को देखने के लिए क्या वो फानस की बात ऊपर करेगा ? नही ! मणि स्वयं प्रकाश है !

ऐसे ही तुम्हारी बुद्धि रूपी लालटेन कबतक कहाँ तक जाती है ?जहाँ तक वो मणि ढकी हुई है !  मणि खुल गई तो तुम्हारी मणि का प्रकाश उसमें मिल जाता है! फिर उसका बयान नही हो सकता ! और वह मणि बाबाजी ने बताई थी आधा मील दूर ,लेकिन कृष्ण जो मणि बता रहे है,वेद   जो मणि बता रहे है,  संतपुरुष जो मणि बता रहे है वो आधा इंच भी दूर नही है ! पाव इंच भी दूर नही है ! इतनी वो नजदीक है और आजतक पाया नही! क्योंकि बहुत नजदीक होता है न उस वस्तू का खयाल ही नही होता! जो अत्यंत निकट है न उसका खयाल नही होता ! दूर की चीजें दिखती है लेकिन आँख का निकट का हिस्सा नही दिखता। आँख दूर दूर देखती है लेकिन ये हिस्सा नही देखती ! इसको देखने के लिए फिर आईना लाओ ..तो आईना में ऊँधा दिखेगा …  मैं दिख रहा हुँ.. मुँह है पूरब को तो दिखेगा पश्चिम में….ऊँधा दिखेगा…
इसीलिए हम संसार की बुद्धि से देखते है तो वो सत्य हमको ऊँधा दिखता है ,जगत होके भासता है ।जय जय ! और ये ऊँधा दिखता है ऐसा समझ आये तो उसको सीधा कर ले! ॐ ॐ ॐ ॐ !
तो 3 महिने प्रयोग करके देखो कि ये मिथ्या है,ये मिथ्या है,ये मिथ्या है,ये स्वप्न है,ये स्वप्न है…जो दिखे  , खाओ तो भी स्वप्न , ये खा रहा है..पिओ तोभी  “ये पी रहा है”, बोलो तोभी “ये बोल रहा है” और वृत्ति में चिंता है कि वृत्ति को चिंता है ? ठीक है तू कर चिंता ! देखो उसी समय चिंता भागती है कि नही भागती!जय जय! डर भी…चित्त को डराया क्योंकि पुराने संस्कार है, क्रोध आया…पुराने संस्कार है, चित्त के है !मेरे नही है ! आपका इतना बचाव होगा कि जो लोग उपवास कर रहे है , खड़े सूर्य होके तप कर रहे है उससे बैठे में हजार गुना फायदा हो जाएगा ! ॐ ॐ ….

 

यस्य ज्ञानमयं तपः  … ग्राहक को लो,दो,बात करो ,लेकिन ऐसा व्यवहार करो कि वो ग्राहक के रूप में मैं ही आया हुँ !  फिर देखो कर्मयोग बन जाता है! जहाँ जहाँ नजर जाए पहले तो उसको अपना स्वरूप समझो  अथवा तो इस  देह को उस देह को खिलौना समझो …बाकी दोनों देहों के अंदर जो चमक रहा है वो विदेही चैतन्य का विलास..ये घड़ा वो को घड़ा दिखता है,दोनों के अंदर आकाश एक!ऐसा भाव..चलते फिरते घूमते ..अभ्यास किया जाय..सब मिथ्या, सब स्वप्ना.. अथवा तो दूसरा रास्ता है.. सब मैं ही हुँ!…वो भी ठीक है।…सब मिथ्या है, जो आकृति में दिखता है मिथ्या है लेकिन आकृति को जो सत्ता दे रहा है वो सब मैं ही हुँ ! ये जो चिंतन है न.. सतत तुम ध्यान भी नही कर सकोगे, सतत तुम जप में माला लेके  बैठो तो भी नही होगा..स्मृति होगी और स्मृति में भी थोड़ी ..स्मृति भी हटाओगे तभी तो खाना पीना होगा ।लेकिन स्मृति तीव्र होगी तो खाने पीने के ,और वृत्तियों का प्रभाव नही होगा । तो
अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँति।
सब तजि भजनु करौं दिन राती
स्मृति भरना चाहते है हम ,ठीक है!

स्मृति भी होगी तब आनंद और स्मृति से कुछ विपरीत हो गया तो? स्मृति तो हो अच्छा ही है लेकिन स्मृति कितनी हुई कि भगवान के भक्त बन गए और भगवान विष्णु के हम गरुड़ बन गए । गरुड़ के जीवन की एक कथा है कि राम अवतार में  मेघनाथ के साथ भगवान राम की जब युद्ध हुई तो मेघनाथ ने देखा कि ये कुछ हमारा असर नही होता इनपर ,कल तक मैं कल शाम तक इनको कुछ कर दिखाऊँगा। उन्होंने क्या किया कि मेघनाथ ने अपना नाग पाश फेंका और प्रभुजी बंध गए! प्रभुजी बंध गए, नारद ने देखा कि ठाकुरजी बंध गए क्या किया जाय? गए गरुड़ के पास।भगवान बंध गए हैं, चलो अब तुम्हारे सिवा नागपाश से छूटना उनका मुश्किल है।नारद जी ने कहा गुरुड़ तैयार हो गए। गरुड़ जी ऐसे तैसे नही थे, वो जब उड़ान लेते थे तो उनके पाखों से सामवेद की संदे निकलती थी।ऐसे थे वो! हाय, साँपों को निगला,वो प्रभु नागपाश से मुक्त हो गए। गरुड़ के मन में आया अगर मैं नही आता तो इनका क्या हाल होता! देखो वृत्ति कैसा धोखा दे देती है। वृत्तियों में जी रहे  है न हम लोग! अब इनका क्या होता? तो जिनमे श्रद्धा थी उनकी स्मृति से रस आ था । अब  श्रद्धा डाउन हो गई तो स्मृति से रस आना बंद हो गया,  जो रस आने का जो रस था वो  बंद हो गया तो विरसता उनको खटकने लगी, विक्षिप्त हो गए । खटकने लगी, विक्षिप्त हुए ,गए भगवान शंकर के पास ऐसी कथा है । ये कथाएँ सब महापुरुषों ने जिन्होंने बनाई बड़ी करुणा की। सत्य को समझाने के लिए  न जाने क्या क्या उन्होंने तैयार किया ! गए शिवजी के पास… अब अशांति हो गई..कारण क्या है ..बोले कारण तो और कुछ नही है, नागपाश से प्रभु को छुडाया उसके बाद अशांति हुई ।प्रभु को नागपाश से छुड़ाने से अशांति नही हुई लेकिन स्मृति में जो श्रद्धा थी उसके कारण जो स्मृति थी,श्रध्दा दान हुई  तो स्मृति में गड़बड़ हुई ।आप किसीके प्रति श्रध्दा करते है और उसका स्मरण करते हैं तो रस आएगा।

और उसीके बारे में  कोई आदमी आपको इधर उधर बता दे,आप न माने और श्रद्धा बनाए रखें ..फिर भी उसकी सुनी हुई बात कभी कभी खटकाव देगी तो आपको लगेगा कि  फलाना आदमी की बात तो मैं नही मानता हुँ लेकिन वो अभागा निंदक जबसे मिला है न तबसे साँई पहले जैसा मजा नही आता है।हो जाएगा! ठाकुरजी में, भगवान में, गुरु में, कृष्ण में,राम में,रहमान में,किसीमें! तो ये स्मृति का सुख हुआ वृत्ति में ,स्मृति का सुख..शिवजी ने कहा कि तू इष्ट का निंदक?तेरे को कथा हम नही सुनाते! तेरे आगे राम की चर्चा हम नही करते ! जा खग की भाषा खग ही जाने….पक्षी की भाषा पक्षी जाने, तुलसीदास जी ने कहा…खग की भाषा खग ही जाने..गरुड़ को भेज दिया काकभूषण के पास। काकभूषण के इलाके में जाने मात्र से उसका जो सन्देह था भगवान राम के प्रति ..नर है, ऐसा है,क्या होता है,ये…वो निवृत्त हो गया ! स्मृति बनी, फिर सत्संग सुनकर वृत्ति तदाकार हुई । तब काकभूषण की कृपा से गरुड़ को आनंद हुआ। निज स्वरूप कि झलकें आई। तो गरुड़ जैसे व्यक्ति की अवस्था वृत्तियों में रहते है तो एक जैसी नही रहती है तो हम लोग तभी दुःखी रहते है कि हमारी वृत्तियाँ हम चाहते है कि एक जैसी रहे ! हमारी अवस्था एक जैसी रहे ,हमारी परिस्थितियाँ एक जैसी रहे !
खून पसीना बहाता जा
तान के चादर सोता जा
ये किश्ती तो हिलती जाएगी
तू हँसता जा या रोता जा

तो ये किश्ती हिल रही है , किश्ती में बैठा हुआ किश्ती कार भी हिल रहा है लेकिन वो अपनेको …शरीर को, किश्ती को हिलता हुआ देखकर ज्ञान तो नही  हिल रहा है! किश्ती शांत थी तब भी तू था ,किश्ती हिल रही है तब भी तू था, किश्ती में बैठा  तब भी तू है, किश्ती से बाहर आ गया तब भी तू है, तू तो ज्यूँ का त्युं है ! ज्ञान ज्यूँ का त्युं है ! अंतःकरण बदलता रहता है! इन्द्रियाँ बदलती रहती है। उनको देखनेवाला, देखने के साधन अनेक लेकिन देखनेवाला मैं एक, सुनने  के साधन अनेक,चीजे अनेक,सुनने के विषय अनेक लेकिन उसका ज्ञान एक!चखने के विषय अनेक,रस के विषय अनेक लेकिन उसका ज्ञान एक!मन के संकल्प और वृत्तियाँ अनेक लेकिन उनको देखनेवाला मैं एक! बुद्धि के निर्णय अनेक  उनको देखनेवाला मैं एक! तो ज्ञान तो एक ही है! और जो यहाँ एक ज्ञान है वही का वही सब मे है ! ये बात समझ मे आए तो अभी के अभी मुक्ति हो सकती है बाबा !  देर नही ! फिर ये केंद्र वेंद्र की भी कोई परवाह नही !

लेकिन ये ज्ञान समझ में …सुन लेते है…समझ मे आने को भी राजी है ज्ञान, लेकिन हमको उस ज्ञान की तड़प नही ,प्यास नही है ! क्यों ? कि संस्कार है वृत्तियों को बहलाने का! भगवद प्राप्ति की तड़प हो  तो श्रवण मात्र से साक्षात्कार हो सकता है!  No doubt in it ! कुछ क़रने की जरूरत नही है।और कुछ करनेसे भगवान मिलता भी नही ! जो करनेसे मिलता है वो न करनेसे चला जाएगा ।जय जय!उसका मतलब ये भी नही कि चलो करनेसे भगवान नही मिलता तो अपने तो पिच्चर देखो, खाओ, पिओ..तो फिर अनर्थ कर लोगे अपने साथ।ये तो एकदम टॉप की बात है, कर कर के जब  ऊँचाई पे आ जाते है न  तब पता चलता है करने से कुछ नही मिलता….तो शांत होके..  भोग की वृत्ति चली गई ,तो अब त्याग की वृत्ति भी नही रही और वृत्तियों से निवृत्त तत्व का साक्षात्कार हो गया, फिर उसके लिए …जब ऊँचाई का बोलते है न तो कभी कभी खतरा भी पैदा हो जाता है! समझने वाले बहुत नीचे खड़े है और बोलनेवाले एकदम टॉप की बात बता देते है तो फिर वो समझने वाले नरक का रास्ता ले लेते है।

हे रामजी जिनकी समझ का विकास नही होता और उनको यदि कहा जाए सब ब्रम्ह है , तो मानो वो वक्ता श्रोताओं को सीधा नरक में भेजता है।जय जय…मुझे हमारे श्रोताओं पर विश्वास है कि मेरे उपदेश का सही अर्थ लेंगे । सब ब्रह्म  है …ले कि दे धमाधम ,सम्भोग से समाधि, दे धमाधम!..नही,नही!बाबा मेरा कहने का तातपर्य ये नही…तात्पर्य  ये है कि अंदर में समझ तुम्हारी ऐसी रखो कि जिस वक्त दुःख आए ,भोग तुम्हें आकर्षित करे तो बहो मत ! समझो कि भोग का आवेग आ गया सदा नही रहेगा, घड़ी भर आप मन को दूसरे में बहला दो,भोग की वृत्ति खत्म हो जाएगी। क्रोध आया, ये आदमी बुरा है, लेकिन वो सदा बुरा नही दिखेगा ,तुम्हारी वृत्ति क्रोधाकार आयी है, वो टिकेगी नही, वृत्ति निवृत्त हो गयी तो वो क्रोध करने के और डाँटने के काबिल लगता है फिर तुमको प्यार करने के काबिल दिखेगा।जय जय…तो उस बहाव में तुम बहो मत ! समझ गए न कहने का तात्पर्य ! कि बाबाजी बह भी गए तो क्या फर्क पड़ता है? पराशर बह गए तो…ओहो यार ! फिर गलती करते है! बह जाने के बाद वो खटकता है,पंच होता है ! वह अभी तो हम हुए नही, स्वरूप में पहुँचे फिर तो बहना गिराना कोई प्रश्न नही…उसके पहले यदि हम बहे तो फिर खटकता है, अभी नही तो देर सवेर  …औरंगजेब जा रहे थे।कोई नग्न  ,नँग धिडंग, दिगम्बर अवस्था में साधु बैठा था । लोग राजाधिराज महाराज…  साधु टांग पे टांग चढ़ाए , एकदम दिगम्बर…औरंगजेब ने आकर घोड़ा रोका। बोला , माना तू फकीर हो गया , मेरे जैसा सम्राट निकल रहा है, कंबल पड़ा है , ओढ़ लेता तो तेरा क्या बिगड़ता?
हमको अच्छा नही लगता !
बोले, तेरेको अच्छा नही लगता तो तू ओढा दे मेरे को!  मैं नँगा बैठा हुँ तेरे को अच्छा नही लगता है तू ओढा दे।

वो फकीर को उठाकर कंबल ओढ़ाने को गए तो देखा कि 2-3 मुंडीयाँ अंदर,मस्तक पड़े है। और वही मस्तक पड़े है जिनको औरंगजेब ने अपने हाथों से विछेद कर दिया था और सज्जन लोग थे। घबराया की ये मेरे दुश्मन इधर? ये कैसे? फकीर ने कहा कि कंबल एक है, बोल तेरे पाप ढाँकू या अपना शरीर ढाँकू? मरते समय इतना पंच हुआ कि पिता को जेल में डालने का और उस साधु का अपमान करके अपने अहं पोशने का मरते समय बड़ा पश्चात्ताप करते करते मारा । तो अहं में आवेश में आकर आदमी कुछ कर ले तो ऐसा नही कि छूट जाता है। करने में भी तो वृत्ति थी ,और पश्चात्ताप करने में भी तो  वृत्ति थी। तो ये वृत्ति को वृत्ति देख लिया न बड़ा मजा आ जायेगा ! ऐसा भी अभ्यास आपका चलते फिरते हो सकता है कि ये वृत्ति है ।ये सब वृत्ति का खिलवाड़ भी दिख जाए तो भी आप समझेंगे कि ये संसार है, ये माया है, खेल है।

 

युक्ति से मुक्ति


 

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते।।

कर्मयोगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवद प्राप्ति रूप शांति को प्राप्त होता है और सकाम पुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बंध जाता है । अब भगवान संसार मे रहकर संसार से पार के अनुभव …
शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्…….अयुक्तःकामकारेण फले सक्तो निबध्यते… बड़ा सरल, सहज और व्यवहार में काम लेने जैसा श्लोक है । इस श्लोक से तो ऐसा लगता है कि बड़ा आसान और बड़ा सहज जीवन जीने की कला मिलती है । साधु बनकर, तपस्वी होकर , सन्यासी होकर, परमात्मा को पाना तो जरा जन साधारण के लिए कठिण है लेकिन ये श्लोक तो ऐसा है कि तुम जहाँ हो जैसे हो , तुम्हारे पास जो भी है – चाहे ज्यादा धन है चाहे कम धन  है, ज्यादा पढ़ाई है कम पढ़ाई है, ज्यादा विस्तार है चाहे कम विस्तार है | तुम जहाँ हो वहीं से ईश्वर प्राप्ति तुम्हारे लिए सुगम हो सकती है । बड़ा सहज में है.. युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्… योगी शांति पाते है एकांत गुफा में लेकिन उस एकांत गुंफा की शांति में भी कृष्ण राजी नहीं हो रहे है । कृष्ण कहते है नैष्ठिकीम् शांति …युद्ध चल रहा हो.. मार, काठ, हाथी… घोड़े चींखते हो हाथी चिंखारते हो घोड़े हुँकारते हो ..मल्ल और योद्धे मूछे ऐंठते और तलवार और भालों की नोक सजाते हो.. उस समय भी तुम शांत रह सको, उस समय भी तुम्हारे जीवन की दिशा सही हो सके, उस समय भी तुम्हारी बंसी बज सके, भीतर के गीत गूंज सके, युद्ध के मैदान में कृष्ण जैसे निश्चिंत है ऐसे ही संसार के इस राग द्वेष के, काम क्रोध के, मेरे तेरे के,  चहो ओर से अशांत युग मे भी तुम्हारे दिल की बंसी बजती रहे ऐसा दिलबर कृष्ण तुम्हें समझाना चाहते है ।

मंदिर में जाकर पूजा करना ठीक है लेकिन तुम जहाँ खड़े हो वहीं मंदिर खड़ा हो जाए ये कृष्ण कला बता रहे है । यज्ञ की वेदी पर धर्म सम्पन्न करना ये अच्छा है सुंदर है लेकिन  तुम जो कुछ कर्म करते हो वो ही योग सिद्धि का मोक्ष द्वार खोल दे ये कृष्ण का संकेत है । तुम गिरी गुंफा में जाकर समाधि करो और योग सामर्थ्य, योग सिद्धि पाओ ये अच्छा है सुंदर है लेकिन जो तुम करते हो वो ही योग सिद्धि का मोक्ष द्वार खोल दे ये कृष्ण का संकेत है । तुम सत्पुरुषों को खोजकर गिरी गुफाओं में महापुरुषों के चरणों मे बारह, बारह  वर्ष झाड़ू बुहारी करके अन्तःकरण शुद्ध करो फिर तत्ववेत्ता महापुरुष को खोजो.. और तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः॥.. ऐसे तत्वदर्शी ज्ञानी को खोजकर आत्मज्ञान पाकर मुक्त हो जाओ ये तो अच्छा है लेकिन तुम जहाँ हो वहीँ मुक्ति के गीत गूँजने लगे ये कृष्ण बता रहे है । युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्.. ध्यान द्वारा जो शांति है वो.. नाम जप करते है ज्योत निरंजन, ओंकार अथवा भूर्भुवःसवः अथवा और कोई.. वातावरण अनुकूल होता है तो शांति आ गयी लेकिन बच्चा जरा मैं- चें पुकार देता है शांति चली जाती है । कभी कभी ध्यान भजन करते हो वातावरण शुद्ध होता है,  सुबह की सुंदर मधुर हवाएँ होती है, कुछ प्राणायाम आदि किये, मन और प्राण स्वच्छ हुए, थोड़ी शांति मिली लेकिन ये शांति एक दिन मिली दूसरे दिन उतनी की उतनी मिले ये जरूरी नही दूसरे दिन गड़बड़ भी हो सकती है, और थोड़ी ज्यादा भी मिल सकती है और तीसरे दिन फिर शांति ठनठन पाल हो जाती है । वो नैष्ठिकीम् शांति नही है, वो साधन के आधीन शांति है । योग के आधीन शांति भोगी की अपेक्षा हजार हजार गुना अच्छी है लेकिन कृष्ण तो एक ऐसा योग बताते है कि भोगी और योगी को जो सुख है उससे भी  ऊँचा योग, ऊँचा भोग ऐसा है कि तुम संसार का भोग भी भोगते रहो, काम धंधा आदि भी करते रहो, और लेन देन का ठीक से व्यवहार भी करते रहो फिर भी तुम्हारे अन्तःकरण में ऐसी नैष्टिक शांति हो कि..

उठत बैठत ओई उटाने,
कहत कबीर हम उसी ठिकाने।
एक फकीर ने कहा कि नजरें बदली तो नजारें बदल गए… नजर बदलने को कृष्ण कह रहे है ।
नजरें बदली तो नजारे बदल गए ,
किश्ती ने रुख बदला तो किनारे बदल गए

तुम्हारे अंदर सचमुच में ऐसी अद्भुत चेतना है, तुम्हारे में ऐसी अद्भुत क्षमताएँ है, तुम्हारे में एक ऐसा अद्भुत स्वत्व है कि एक प्रलय तो क्या, एक युद्ध तो क्या एक हजार युद्ध तो क्या, महा महामारियाँ करोड़ करोड़ हो जाय फिर भी तुम्हारा बाल बाँका नही होता ऐसे तुम अमर आत्मा हो । ऐसी तुम्हारी अमरता की शांति पाने को कृष्ण संकेत कर रहे है, और वो भी अर्जुन, प्यारे अर्जुन को.. शिष्य को गुरु उपदेश दे एकांत अरण्य में वो अलग बात है लेकिन कृष्ण तो मित्र भाव से.. चल यार ! दोस्त सुन, जिगरी दोस्त, ऐ सखा !… अर्जुन को कभी सखा कहते है तो कभी अनघ कहते है.. अनघ पहले अध्याय में नही कहा,  दूसरे में नही कहा, तीसरे अध्याय में अनघ कहा ..अनघ माना निष्पाप.. जो निष्पाप होता है वो ही तत्वज्ञान को समझ सकता है और जो तत्वज्ञान को समझता है वो ही निष्पाप कहा जाता है । पहले अध्याय में विषाद है अर्जुन को .. इसलिए अनघ नही है.. विषाद है.. अघ का फल है, मोह का फल है विषाद-दुःख ..दूसरे अध्याय में आत्मज्ञान सुनकर अर्जुन को जिज्ञासा हुई है, पाप जल गए है, निष्पाप हुआ है इसलिए तीसरे अध्याय में कृष्ण अर्जुन को अनघ करके पुकारते है.. अनघ माना निष्पाप । हमलोग सत्संग करते है उसके पहले हरि नाम का ध्वनि करते है ध्यान करते ताकि हमारा अन्तःकरण निष्पाप हो जाए और निष्पाप हो तो हम अनघ हो जाएँगे जैसे अर्जुन अनघ हुआ और कृष्ण के गीता को युद्ध के मैदान में सुनकर साक्षात्कार कर लिया ऐसे ही इस मैदान में गीता के ज्ञान का साक्षात्कार हो जाए । तो आज का ये श्लोक हमें कहता है कि –

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते।।

कर्मयोगी कर्म के फल का त्याग करके भगवद प्राप्ति रूप शांति को प्राप्त होता है और सकाम पुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बंध जाता है । भोजन तो कर्मयोगी भी करता है और कर्मभोगी भी करता है । कपड़े तो कर्मयोगी भी पहनता है और भोगी भी पहनता है । तो कृष्ण बोलते है जब खाना है, पीना है, रहना है, जीना है, लेकिन खाना, पीना, जीना अशांति के लिए, दुःख के लिए तो करते नही, तुम सब सुख के लिए करते तो आओ मेरे मित्र, आओ मेरे भैया, तुमको सुख कहाँ है वो जरा गुंफा का द्वार दिखा दे! तुम कर्म करो लेकिन कर्म में योग को मिला दो तो कर्म तुम्हारे सुंदर होंगे । कर्म में जब फल की लोलुपता मिला देता है आदमी तो क्या होता है कि कर्म करने की जो योग्यता है, उत्साह है, आनन्द है, क्षमता है वो कुंठित हो जाती है । कर्म में जब फल की आसक्ति होती है तो फल की चिंता भी होती है और फल मिलेगा, कैसा मिलेगा, कब मिलेगा  उसकी विव्हलता होती है इसलिए कर्म इतना सुसज्ज नही होता है । और कर्म में जब फल की आसक्ति हट जाती है तो कर्म करने का अपना रस आता है, मजा आता है… रामतीर्थ बोलते है मूर्ख लोग कर्म के फल की इंतजारी में मर जाते है लेकिन उनको पता नही कि कर्म करते समय जो आनन्द रूपी फल प्रगट होता है वो मिलने वाले फल से भी ऊँचा है और मिलनेवाले फल तो तुम्हारे पीछे पीछे घूमेंगे! जब पाप कर्म का फल हम नही चाहते तभी भी सजा तो  मिलती है, तो पुण्य का फल तो मजा तो मिलती मिलती और यार मिलती  है! तो नाहक क्यों अपनी बेइज्जती करना? मैंने सुनी एक भागवतकार की कथा कि – राजा मंदिर में जा रहे थे तो दोनों किनारे मालन फूलों की माला लेकर खडी थी  । दोनों ने राजासाहब को पुष्पों की माला दी। राजासाहब मंदिर में  भगवान को चढ़ाकर जब लौटे.. पूछा कितने पैसे तो एक ने चार आने माँगे, तो वो हार तो दो आने का था लेकिन राजासाहब!.. चवन्नी उनके लिए कोई भारी नही पड़े.. चार आने माँगे.. दे डाले.. दूसरी से पूछा तो उस मालन ने कहा कि “आप हमारे माय बाप है, आप से हम पैसे कैसे ले? ये हार जिस जमीन से आया उस जमीन के आप महीपति  है, ये आप ही का है, हम भी आप ही के है “। राजा ने उस वक्त कुछ भी नही दिया लेकिन मीठी मुस्कान दी और दरबार मे जाकर मंत्री को कहा कि वो मालन कहाँ रहती है क्या करती है, उसके नाम थोड़ी जमीन जागीर और कर दो, बड़ी सज्जन मालिन है । उसने तो चवन्नी में हार बेचा लेकिन इस मालन को तो बेमाप मिला! ऐसे ही तुम चवन्नी में जिंदगी मत बेचो, राजाओं का राजा जो परमात्मा है वो तुम्हें बेमाप दे सकता है भैय्या!  ये शुखर कर के वो तेरे दर पे अपना भाग्य खाते हैं | कोई अतिथि आ जाए तो उसके आदर सत्कार से अन्न, वस्त्र, भोजन आदि की व्यवस्था करके तुम उसके हृदय को संतुष्ट करते हो, अतिथि पाँच पच्चीस का ले गया लेकिन उसके हृदय में जो हृदयेश्वर बैठा है वो न जाने तुमको किसके द्वारा क्या दे दें उसका हिसाब लगाना मेरे बस की बात नही! मैंने ऐसे लोगों को देखा जिन्होंने सन्तों के पास जाकर थोडा सा मार्गदर्शन लिया, उनको शांति मिली या थोडा लाभ हुआ.. संतों का तो पाँच मिनट गया लेकिन उनको जो लाभ हुआ वो  जिंदगी भर संतों के गीत गाते रहे और अपना पूरा जीवन संतों की सेवा में लगाकर धनभागी हो गए! नही तो पाँच मिनट की फी संत लेते तो क्या पाँच रूपये होते, दो रुपये होते और क्या होता! पच्चीस रुपये होते ! वकीलों के लिए हमारे हृदय में इतना आदर नही होता है और  फी लेने वाले डॉक्टरों लिए हमारे हृदय में इतना आदर नही होता है जितना किसी महापुरुष ने निष्काम भाव से कोई प्रयोग बता दिया, कोई जरा मन्त्र बता दिया, कोई औषधि बता दी या जरा आशीर्वाद कर दिया, उनके लिए.. निष्काम कर्म करते है उन महापुरुषों के लिए  हमारे हृदय में जो जगह होती है वो जगह न वकील भर सकता है न डॉक्टर भर सकता है न सिपाही भर सकता है न  सेठ भर सकता है.. कभी कभी तो माँ भी नही भर सकती और बाप भी नही भर सकता ऐसा वो बापजी ह्रदय की जगह है! और बापजी क्यों होते है? बापजी होते है इस बापजी की बात पर अमल करने से! बापजी का बापजी कन्हैय्या है, उसकी बात पर जो अमल करते है वो बापजी हो जाते है।नारायण, नारायण ….. | आज का श्लोक तुम्हे बापजी बनाने की कोशिश करेगा.. जय रामजी बोल दो ! … और ये जरूरी नही कि लोग तुम्हें बापजी कहे.. ऐसे तो लोग तो भिखारी को भी कहते है कि बापजी माफ करो जाओ.. ऐसा बापजी नही, जो सचमुच में बापजी है ऐसा हृदय तुम्हारा बनाने का कोशिश करेगा आज का श्लोक-
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।

नैष्ठिक शांति.. जैसे नैष्ठिक ब्रम्हचारी होता है, नैष्ठिक सदाचारी होता है.. प्राण जाए पर वचन न जाए ऐसी
नैष्ठिक शांति… जैसे पतिव्रता स्त्री पति का त्याग किसी अवस्था मे नही करती.. चाहे  वो दरिद्र है, चाहे कंगाल है, चाहे सज्जन है, चाहे वो दुर्जन है लेकिन पतिव्रता स्त्री पति का त्याग नही करती । ऐसे ही शांति तुम्हारा त्याग नही करेगी और विश्व में नैष्ठिक शांति से बढ़कर और कोई  उपलब्धि नहीं हो सकती। नैष्ठिक शांति की उपलब्धि के आगे विश्व मे और कोई उपलब्धि हो नही सकती! बोले महाराज, भगवान मिल जाये.. नही नही! उससे भी ऊँची चीज! …महाराज, श्रीकृष्ण मिल जाये… श्रीराम मिल जाये… बुद्ध मिल जाये.. कुछ मिल जाये… नैष्ठिक शांति कुछ निराली होती है! बुद्ध ने आनन्द को कहा कि मैं अब जा रहा हुँ.. आखरी घड़ियाँ है मेरी, संसार से विदा हो रहा हुँ… ये बात सुनकर आनन्द रोने लगा । लेकिन सुबुद्धि के चित्त में कोई क्षोभ नही हुआ । आनन्द ने कहा कि पागल, शास्ता जा रहा है सदा सदा के लिए, प्रकाश देनेवाले बुद्ध जा रहे है सदा सदा के लिए, शांति दाता जा रहा है.. तुझे रोना नही आता ? तब सुबुद्धि ने कहा कि मैने उनको ऐसा पाया कि वो मेरे से दूर कभी जा नही सकते.. मैने उनको ऐसा निकट से देखा है, ऐसा मैं उनमें घुलमिल गया हुँ कि वो मुझे छोड़कर कभी जा ही नही सकते! इसलिए मुझे रोना नही आता । आनन्द चकित हुआ, बुद्ध के पास गया, भन्ते “मैं चालीस साल तुम्हारी सेवा में हाजरी में रहा और अभी आप विदा होते हो मुझे दुःख हो रहा है, अभी भी मुझे दुःख और सुख की चोटें लग रही है.. और वो सुभूति बोलता है कि बुद्ध कभी मेरी यहाँ से जा नही सकते । बुद्ध ने कहा, सुभूति मुझे ठीक से समझा । तूने अभी मेरे को नही समझा, तू मेरे निकट नही रहा, मेरे शरीर के निकट रहा… मेरे निकट रहता तो तेरा भी रोना धोना बंद हो जाता.. उसने नैष्ठिक शांति पाई है लेकिन तूने थोड़ी व्यवहारिक शांति पाई है.. अब मैं जा रहा हूँ तो मेरा क्या होगा उस चिंता में तेरी शांति खो गयी लेकिन सुभूति की शांति खो जाए ऐसी शांति नही उसने बिल्कुल मेरे को ठीक से पाया है, ठीक से देखा है, ठीक से समझा है… यूँ कहूँ कि वो मेरे मय हो गया है और मैं उस मय हो गया हूँ, मेरा शरीर मिटेगा, मैं नही मिटता हुँ.. ऐसे ही मेरी विदा ,उसके शरीर से मेरी विदा होगी लेकिन उससे मेरी विदा नही होगी.. नैष्ठिक शांति ये है! ये नैष्ठिक शांति भगवान तुम्हारे संसार के गुड़ गोबर व्यवहार में रहकर  पाने का रास्ता बता रही हैं। कह देते कि.. सब छोड़ के जंगल मे जाओ समाधि करो! ..उपदेश वही दिया जाता है जो सामनेवाले झेल सके और कहा वही जाता है जो सामनेवाला कर सके.. तुम कर न सको हम कहें तो ये बेवकूफी है। और हम कहें और उसमें कोई सार न हो तो भी बेवकूफी है। हम कहे उसमें सार हो और सार ऐसा हो कि तुम कर भी सको और सार भी मिले.. तो श्रीकृष्ण ऐसा कह रहे है कि सामनेवाले कर भी सकते है और उनमें सारों का सार संसार के पार का  परमात्मा अपने हृदय में..जीते जी..मरने के बाद नही ये स्वर्ग का सुख !…मरने के बाद वैकुंठ की सांत्वना नही!जीते जी वैकुण्ठों का वैकुंठ और स्वर्गों का स्वर्ग आत्मदेव का साक्षात्कार कराने की बात श्रीकृष्ण कह रहे है। शांति..नैष्ठिक शांति…उस शांति के आगे जगत की कोई उपलब्धि ठहर नही सकती..स्वर्ग सुख उसके सामने सर ऊँचा नही कर सकता। ऐसी वो शांति है! लब्ध्वा ज्ञानं परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति… जिस समय वह आत्मदेव का ज्ञान होता है, परमशांति होती है, नैष्ठिक शान्ति होती है! और उसी समय मुक्ति! ऐसा नही कि अभी शांति मिली और भविष्य में मुक्ति होगी ..नही! जीते जी मुक्ति !चार प्रकार की मुक्तियॉं मरने के बाद होती है। वे सामान्य मुक्तियाँ है। लेकिन जो सुपर मुक्ति है ..सर्वोपरि मुक्ति है वो मरने के बाद का इंतजार नही करती ,वो जीते जी मुक्ति! एक होती है स्वर्गीय मुक्ति.. अगर थोडा सा विस्तार करें तो पाँच प्रकार की मुक्ति मरने के बाद होती है। जैसे यहाँ कर्ज है, चिंता है, झोपड़पट्टी में रहते हैं, इधर रहते है, उधर रहते है.. लेकिन कुछ अच्छे कर्म है.. मर गया आदमी..  गया स्वर्ग में.. शांति! नो इनकम टैक्स ,नो सेल टैक्स ,नो प्रॉब्लम ..ये स्वर्गीय शांति है। अच्छा है, दूसरी चार प्रकार की शांति होती है, इष्टदेव के लोक में जाने से.. जैसे भगवान कृष्ण, राम, नारायण के अवतारों का भजन स्मरण चिंतन करते है .. अथवा शिव, शाक आदि जो जिसकी उपासना पूजा करता है ..तो मरने के बाद उसके लोक में जाता है। अगर पूजा ठीक ठीक  है तो सायुज्य मुक्ति होती है। उससे कुछ बढिया है तो सामिप्य मुक्ति होती है। और.. सालूकय,सायुज्य, सामिप्य, सारूप्य.. चार प्रकार की मुक्ति.. जैसे राजा के गाँव में रहना, राजा के राज्य में रहना ये सालुक्य है… राजा का  कुछ खास आदमी होकर रहना जैसे कारकून आदि या कोई सलाहकार आदि होकर रहना .. सालुक्य मुक्ति इष्ट के, जैसे ब्रम्ह का चिंतन करते है, ब्रम्हलोक में गए, भगवान नारायण का चिंतन करते है नारायण लोक में गए.. शिव का चिंतन करते है, शिवलोक में गए, सतलोक में गए, जनलोक में गए, तपलोक में गए, सात ऊपर के लोकों में कहीं भी गए अपने अपने कर्म के अनुसार ..तो सालुक्य, सामिप्य, सायुज्य, और सारूप्य … तो सालुक्य माना उसी लोक में, सामिप्य माना उनके निकट, सारूप्य माना उनके करीब करीब के, सायुज्य माना जैसे विशेष मंत्री हो राजा के निकट रहनेवाला हो अथवा राजा का छोटा भाई हो, बिल्कुल नजिक रहते है.. सारूप्य माना उनकी बराबरी जैसा .. उतपत्ति, स्थिति, प्रलय करने का सामर्थ्य नही बाकी  का उपभोग और जीने का ढंग, उनके इष्ट के बराबरी की व्यवस्था.. जैसे नजिक का आदमी सेठ के साथ ही रहता है बंगले का, कार का और साधनों का वैसा ही उपयोग करता है जो खास-विशेष होता है, इस प्रकार की पाँच प्रकार की मुक्तियाँ तो मरने के बाद होती है, एक स्वर्गीय मुक्ति, दूसरी सालुक्य, सामिप्य, सारूज्य और सायुज्य, ये चार मुक्तियाँ और पाँचवी स्वर्ग की….ये पाँचो मुक्तियाँ मरने के बाद होती है। कृष्ण जो मुक्ति बता रहे है उसको कैवल्य मुक्ति बोलते है, सुपर मुक्ति! कैवल्य मुक्ति मरने के बाद किसी लोक लोकांतर में अन्तवाहक शरीर से जाकर फिर वहाँ भोगमय शरीर  पैदा करके पंच भौतिक से रहित शरीर पैदा करके है वहाँ का भोग भोगकर फिर गिरने वाली मुक्ति नही बता रहे है.. लब्ध्वा ज्ञानं परां शांति….ऐसा कि परम् शांति! नैष्ठिकम शांति! फिर वहाँ से पतन नही होता!

यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।

यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम…जहाँ सूरज और चंद्रमा का प्रकाश नही, सूरज और चन्द्र भी जहाँ से, अग्नि भी जहाँ से तेज और प्रकाश लाती है वो परम प्रकाश स्वरूप जो आत्मदेव है उसका साक्षात्कार नैष्ठिक शांति दिलाता है। उसके साक्षात्कार में जो रुकावटे आती है वो कर्म के फल की लिप्सा है। कर्म के फल की लिप्सा से आदमी की योग्यताएं कुंठित हो जाती है । आज का श्लोक बताता है कि –

अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते
जो आयुक्त है, जिसको कर्म करने की युक्ति नही है, जिसको कैवल्य मुक्ति पाने की युक्ति नही है, वो कर्म के करने में बंध जाता है और जिसको कर्म करने की युक्ति है वो कैवल्य मुक्ति का अनुभव कर लेता है, कर्म करते हुए भी छूट जाता है। मैंने कई बार ये कहानी सुनाई …कहानी कभी कल्पित भी होती है, कभी दंतकथा भी होती है, कभी घटित घटना भी होती है । कहानी इसलिए कहता हुँ कि मैंने सुनी हुई बात है ,शास्त्रों में नही,किसी के द्वारा सुनी.. कि जंगलों में प्राचीन काल में शिकारी लोग बंदर फँसाते थे छोटे सिकुड़े मुँह के बर्तनों में बंदर देखे जंगलों में,बंदर देखे ऐसे सिकुड़े मुँह के बर्तन पहले जंगल में गाड़ देते फिर बंदर देखे उस ढंग से अक्रोड डाल देते है, छुहारे डाल देते है, गुड़ के टुकड़े डाल देते है और फिर शिकारी छुप जाते है, बंदर नीचे उतरते है और डालते है सिकुड़े मुँह के बर्तन में हाथ !…हाथ डालते है तो महाराज, माल भर लेते! माल भर लेते तो हाथ फिट हो जाता!.. हाथ फिट हो जाता तो वो दूसरे हाथ से दम पछाड़ करते,पूछ हिलाते,  तीन पैर पटकते लेकिन वो मुट्ठी खोलते नही! बाकी का सब करते.. यहाँ तक कि पूँछ पटक-पटक के ,सिर धूम धूम के खूब चीखते… और तो क्या महाराज,  सिंगल और  डबल दोनों कर लेते! फिर भी वो मुट्ठी नही खोलते थे! होता क्या था कि शिकारी आकर उनके गले में फाँसा बाँध देता ,पट्टा,रस्सी..और बादमे उनके हाथ पर जोर से डण्डा मार देता, डण्डा मारने पर हाथ खुल जाता …हाथ यूँ खाली आ जाता! लेकिन खाली हाथ आने के पहले  मुक्ति होने के पहले गले मे फाँसा मिलता और पेट भूखा और शरीर थका रह जाता और जिंदगी भर  वो बंदर फिर  उठ बैठ करते रहते है …बाबू साहब को सलाम भरते रहते है! अगर उनमे युक्ति होती तो भले सकडे मुँह का बर्तन है..एक गुड़ का टुकड़ा उठाया दो उंगली से,खा लिया, माल उठा के.. वो सब माल उठा सकते थे.. तृप्त हो सकते थे और निर्बंध हो सकते थे…ऐसे ही हमारा मन रूपी बंदर संसार मे यूँ मुट्ठी बाँधता है और छोड़ना तो जरूर पड़ता है, मौत आकर फाँसा डालती है और डाँड़ मरती है आसक्ति पर तो राम बोलो भाई राम झख मार के सब  छोड़ के जाना पड़ता है और और संसार का मजा कुछ नही मिलता है मजूरी मजूरी हाथ लगती है… तो हम उसी बंदर के पड़ोसी ही है बिल्कुल ! उसी के  बिल्कुल साथ में  रहने वाला हमारा मन है… तो कृष्ण हमको ऐसा बन  देखकर दया करके हमें उस भाव से हटाकर हमें वो युक्त बताते है… युक्ति से मुक्ति!…कर्म तो करो लेकिन मुट्ठी बाँधकर फल में लगो मत नही तो ..छोड़ना तो पड़ेगा..जो भी फल मिला है छोड़ना पड़ेगा …डाँड़ पड़ेगी ,फाँसा लगेगा तब छोड़ना पड़ेगा !उसके पहले तुम पकड़ो ऐसा क्यों कि उसमें ही फ़ँस मरो? पकड़ो ही मत कि छोडना पड़े ऐसा मुसीबत! उयोग करो लेकिन पकड़ो मत! शरीर का उपयोग कर लो,धन का उपयोग कर लो लेकिन ये धन मेरा है ,शरीर मेरा है बेटा मेरा है ,पत्नी पर मेरा अधिकार है ,पति पर पर मेरा अधिकार है …अरे भैय्या!तेरा तो तेरे मन पर अधिकार नही तो तेरे शरीर पर भी तेरा अधिकार नही! शरीर का छपरा जब सफेद होता है तो तू उसको सफेद होने से रोक नही सकता! काला छपरा…काले बाल में से सफेद होता है तो तू रोक नही सकता है और जवान में से बुढ्ढा होता है तो तू रोक नही सकता है और चिकने चपाटे चेहरे पर झुरियाँ पड़ने लगती है बुढ़ापे की तो रोक नही सकता है,अंत में मर जाता है तो तू उसको अमर नही बना सकता है! जब शरीर  तेरा नही तो शरीर के सबंध तेरे कब तक? लेकिन न शरीर तेरा है न शरीर के सबंध तेरे पक्के है लेकिन जिसकी सत्ता से तेरा और मेरा दिख रहा है वो वृत्ति.. उस वृत्ति को  जहाँ से प्रगट होते देखता है उस को देख ले तो तेरा बेड़ा पार हो जाएगा! कितना सहज है, कितना सरल है! अगर सहज औऱ सरल नही होता तो युद्ध के मैदान में अर्जुन …ऐसा नही कि साक्षात्कार करने के लिए आया था… वो तो विषाद योग में था बेचारा और गले तक डूबा था प्रॉब्लम… गले तक प्रॉब्लम में डूबा हुआ अर्जुन जब गीता सुनकर मुक्ति का अनुभव करता है और संसार में भी सफल हो सकता है तो तुम गले तक संसार में डूबे हो और गीता अगर अमल में आ जाय तो तुम्हारा बेड़ा पार हो जाय इसमें क्या आश्चर्य है भाई? पहले के जमाने में राजा लोगों के पास ऐसी सुविधा नही थी जैसी आज के नेताओं के पास है।  टेलीफोन,टेलीविज़न,  अखबारें,ये वो…और सिस्टेमैटिक काम होता है सचिव हैं, कलेक्टर है, नायब कलेक्टर है फिर मामलेदार है फिर उसके नीचे और ऑफिसर है, साहब को तो केवल सिग्नेचर करना होता है।पहले के जमाने में तो राजे महाराजे इतना इतना ध्यान देते थे और इतने इतने उनके पास साधन सीमित होते थे छोटे मोटे साधन, कोई संदेशा भेजना है तो घुड़सवार को भेजो… टीपू सुल्तान का संदेशा ले जाना है तो  घुड़सवार को भेजो ,फलाने का संदेशा ले जाना है तो फलाने को भेजो और संदेश वाहक मर गया तो उसको पता चलते चलते तो कई दिन बीत जाते …लेकिन आज का आदमी तो हाय! दिल्ली में क्या हुआ दो घण्टे बाद में पता चल जाता है …अरे दस मिनट के बाद में ही सी एमों को पता चल जाता है कि दिल्ली में विशेष बात क्या हुई ,उसी समय भी पता चल जाता है । अभी अभी दूरदर्शन को खबर मिली और पूरे भारत में फैल जाती है। तो इस प्रकार के साधन सुविधाएँ है फिर भी आज के आदमी को रुचि नही है आत्म ज्ञान को पाने की इसलिए उसके लिए कठिण लग रहा है। उस जमाने के राजाओं के पास साधन सामग्री नही होने के बाद भी छोटे छोटे जासूस के साथ व्यक्तिगत मिलते थे। रामचन्द्रजी एक छोटे जासूस के साथ व्यक्तिगत मिलते थे। छोटे छोटे सीआईडी के साथ व्यक्तिगत मिलते थे  और छोटे छोटे प्रॉब्लम को व्यक्तिगत सुनना पड़ता है। न्यायखाता भी अपने हाथ मे तो  भरण पोषण खाता भी अपने हाथ मे ,फौजी  खाता भी अपने हाथ मे ..सारे खाताओं का बोजा सिर पे होता था और  उन खताओं का दुरुपयोग नही करना, धर्म के अनुकूल चलना और धर्म संकट आ जाय तो महापुरुषों के चरणों में जाना, महापुरुषों की आश्रम की सेवा, शुश्रुषा करना और महापुरुषों के चित्त को प्रसन्न रखकर दुआ माँगते रहना कि  इहलोक भी सुधरे और परलोक भी और महापुरुषों के पास समय निकालकर स्वयं भी जाते तो अपनी पत्नियों को भी ले जाते थे सत्संग सुनने, ऐसा नही कि चुनाव के दिन में कि बापजी..

और आ गए महाराज हो गए,तो फुर्सत मिलेगी तो बापजी का दर्शन करने जाऊँगा… ऐसा नही..वो तो  चुनाव वुनाव होता नही था और इतने डूबे हुए संसार के व्यवहार में फिर भी उन महान बुद्धिमान राजाओं ने ऐहिक व्यवहार करते हुए समाज को और अपने को आत्मअनुभूति के ऊँचे शिखर पर पाया। राजा जनक ने ऐहिक व्यवहार करते हुए आत्मसाक्षात्कार कर लिया । राजा सत्यव्रत ने, राजा अश्वपति ने…और कईं हो गए! ईश्वाकु कुल का राजा..देखा कि  सुबह से शाम, शाम से सुबह… जीवन की शाम हो जाती है औऱ जीवनदाता मिले कब? ईश्वाकु कुल का राजा सत्यव्रत देखता है कि संसार के भोग भोगते भोगते तो जीवन समापन हो जाएगा। राज पाट यथा- योग्य व्यक्तियों को संभालने के लिए देकर एकांत में तप करने को जाता है। सात्यायन मुनि पधारे.. मुनि ने कहा कि  ” राजन तुम तप कर रहे हो मैं बड़ा प्रसन्न हुँ। इतना राज वैभव ,सुख छोड़कर तुम ध्यान भजन में ईश्वर को पाने को कटिबद्ध हुए हो तुम वरदान माँग लो । जो तुम्हें कमी हो वो माँग लो । तुम्हारे राज्य में जो असुविधा हो वो चीज माँग लो, सुविधा आने का आशीर्वाद है।”….”महाराज ये सब तो ठीक है …कितनी भी सुविधा मिलेगी, कितनी भी असुविधा मिलेगी, आखिर सुविधा और असुविधा आकर चली जाएगी असुविधा आकर चली जाएगी और तन पर सुविधा असुविधा आकर चली जाएगी वो तन भी सदा नही रहेगा ,जल जाएगा! महाराज ये शरीर जल जाए उसके पहले मेरी आसक्ति जल जाय और मुझे मालिक परमात्मा का साक्षात्कार  हो जाय ऐसी कृपा करें। सत्यायनमुनि कहते है कि “देखिए तुम ब्रह्मज्ञान माँग रहे हो । ब्रह्मज्ञान.. ऐसी दुर्लभ चीज है ।…

 

“स्वर्गीय मुक्ति माँग लो, सायुज्य मुक्ति का रास्ता माँग लो, सारूप्य मुक्ति का रास्ता माँग लो, सामीप्य मुक्ति का रास्ता माँग लो, और कुछ माँग लो लेकिन कैवल्य मुक्ति की बात …नही! “महाराज ये सब माँग लूँ तो आपके आशीर्वाद से रास्ता मिल जाएगा ये वस्तु मिल जाएगी | लेकिन अंत तो फिर मुझे फिर भी शीर्षासन करना पडेगा, किसी माता के गर्भ में लटकना पड़ेगा किसी पिता के शरीर से पटका जाना पड़ेगा । इसीलिए हे भगवन, हे प्रभु सुन ले मेरा तो यही प्रार्थना है कि मुझे ऐसा उपदेश दीजिए और मुझे ऐसा प्रसाद दीजिए कि जिस प्रसाद से सारे दुःख सदा के लिए निवृत्त हो जाए… टेम्पररी नही! दो दिन ,10 दिन, 25 दिन, पचास दिन.. वो तो बच्चा राजी हो जाता है 4 पैसे की लॉलीपॉप से अथवा जहाँ 4 रुपए की प्रोमोशन हो जाती है तो साधारण आदमी खुशहाल हो जाता है कि बापू तुम्हारी दया से प्रमोशन हो गया , हमारी दया से प्रमोशन हो गया ये बहुत छोटी सी बात  है, हमारी दया से तो  यार वो साक्षात्कार हो जाना चाहिए कि जहाँ पूरा जगत छोटा दिख जाए ये हमारी दया नहीं, ये होगी कोई हमारे पास आनेवाले साधक की दया होगी,  की दया होगी…. नारायण नारायण…

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।

कर्म के फल की लिप्सा जो छोड़ते है उनको नैष्ठिक शांति मिलती है और कर्म का फल का रस भी आता है और जो लिप्सा रखते है  आसक्ति रखते है उनको कर्म के फल का स्वाद नही आता बोझा ही बोझा मिलता है । अच्छा, कर्म  फल का त्याग करके जो नैष्ठिक शांति का रास्ता चाहते है उनमें पाँच गुण अवश्य होने चाहिए । और ये पाँच बाते आ जाए तो उनका व्यवहार बंदगी हो जाता है और प्रारब्ध में तो जितना होगा उतना मिलके ही रहता हैं। बेईमानी करें तो भी उतना ही  टिकेगा, उतना ही मिलेगा । ईमानदारी करें तो पहले जरा कठिन सा  लगेगा लेकिन उतना मिलेगा,  कि मिलेगा तो रसमय मिलेगा, आनन्द मय  मिलेगा । उसका मतलब ये नही कि प्रारब्ध पर बैठ जाए हाथ पैर नही चलाए…  बिना काम किये तो तुम एक क्षण भी नही रह सकते हो.. फिर चाहे चिंतन का काम करो, चाहे शरीर का करो, युक्त करो चाहे अयुक्त करो… प्रवृत्ति तो करनी ही पड़ती है.. अयुक्त आदमी अयुक्त प्रवृत्ति कर के  फँस मरता है और युक्त आदमी युक्त प्रवृत्ति करके मुक्त हो जाता है.. अयुक्त माना अयोग्यता से किए हुए कर्म, अज्ञान से किये हुए कर्म बंधनकारी हो जाते है .. जैसे मुट्ठी भर ली और दम पछाड़ करता है, पूँछ हिलाता है बंदर, हाथ हिलाता है, सिर पटकता है, चीखता है, 1-2 सब कर डालता है लेकिन उसका इतना करने पर भी बंधन नही जाता और दूसरा है जो आराम से एक एक लेकर  युक्ति से खाता है और अड़ोसी-पड़ोसी को भी बाँट देता है । ऐसे ही जो युक्ति युक्त कर्म करता है वो अपने सम्पर्क में आनेवाले को सुख शांति और आनन्द के गुड़ की बांगडे  बाँटता भी है स्वयं भी खाता है । और जो अयुक्त होता है वो न स्वयं खाता है न दूसरों को खिलाने का  सौभाग्य प्राप्त करता है और फ़ँस मरता है जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि में ।

काशी नरेश राज्य तो करते थे लेकिन थोड़े युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा के रास्ते पर थे । गीता उन्हें बहुत प्यारी थी । गीता का पाठ करते । गीता का पाठ करते समय इतने तन्मय हो जाते कि.. गीता के श्लोकों को अर्थ समझते समझते कि .. उनको बहाय्य जगत का आकर्षण विकर्षण खींच नही सकता था । काशी नरेश को अपेंडिक्स हो गया और अपेंडिक्स तो महाराज ऐसा रोग है उसमें तो बदबू की सूँघाई जाती है शीशी ! उस समय की शीशी क्या थी ? एनेस्थेशिया… डॉक्टरों ने कहा आपको एनेस्थेशिया दिया जाएगा बाद में आपरेशन होगा । काशी नरेश ने कहा कोई जरूरत नही है मुझे, कुछ सूँघने की जरूरत नही है.. मुझे भगवद्गीता दे दो और तुम अपेंडिक्स का ऑपरेशन कर लो । भगवद्गीता पढ़ते रहे, अपेंडिक्स का ऑपरेशन क़रने के लिए बड़ी  मुश्किल से डॉक्टर लोग सहमत हुए कि बिना एनेस्थेशिया.. वो दवाई सूँघने के ऑपरेशन करना.. बोले तुम कर लो… अगर मैं चीखूँगा तो तुम कर लेना कुछ.. अगर मैं चीखता नही तो तुम अपना काम करते रहना । उनका ऑपरेशन का काम पूरा हो गया .. अपेंडिक्स का जो कुछ करना था वो पूरा हो गया, टाँके वाके आ गए । डॉक्टरों ने कहा “नरेश,  काम पूरा हो गया!” बोले – “अच्छा, पूरा हो गया!” डॉक्टर  चकित हो गए कि ये क्या नरेश को अभी तक कोई पीड़ा का असर नही !  बोले- पीड़ा होती है शरीर को और मन शरीर से जुड़ता हैं तब पीड़ा की संवेदना ज्यादा लेता है और मन जब गीता में जुड़ जाता है या किसी बात में जुड़ जाता है तो उस समय सुख दुःख का अनुभव नही होता, कम होता है.. जैसे एनेस्थेशिया  से  मन को मुर्छित कर देते हो… मन को मुर्छित करके  दुःख को भूलना एक बात है लेकिन मन को मालिक से मिलाकर दुःख से लापरवाह होना ये योगयुक्त होना है, कर्मफल त्यक्त्वा जो अदमी है वो सफलता और असफलताओं के बीच भी अपने चित्त में शांति और आनन्द का अनुभव कर सकता है ।

मन और प्राण ऊँचे केन्द्रों में आते है, चित्त प्रसन्न होता है और योग्यता बढ़ती है तो संसारी फल पाने के लिए अगर योग्यता को हम खत्म करते हैं तो बंध जाते है और उसी योग्यता को बढ़ाते बढ़ाते संसार का कर्म तो ठीक से करते है लेकिन संसार की चीजों को पाकर, पकड़कर सुखी होने की बेवकूफी छोड़ देते है तो फिर वो हमारे योग की सामर्थ्य, ध्यान की सामर्थ्य, सेवा की सामर्थ्य सत्य स्वरूप ईश्वर को पाने में काम आ जाती है । उसमें पाँच बातों पर ध्यान रखना पड़ता है। एक तो अपने व्यवहार में स्वार्थ का त्याग हो भीतर से । जितने अंश में स्वार्थ का त्याग होगा उतने अंश में तुम्हारा चित्त सुयोग्य होता जाएगा। दूसरी बात.. अहंकार का त्याग.. किसी मित्र से मिलते हो या किसी से बात करते हो तो अपना अहं बढाने के लिए नही अहंकार मिटाने के लिए ! श्री रामचन्द्र जी जब बात करते तो सामने वाले को मान देते और आप अमानी रहते । जो व्यवहार में अपना अहंकार दिखाने की कोशिश करता है उसका मान नही रहता है  …सुनने वाला हाँ हाँ वाह वाह कर लेता है, अंदर से अपने को तोल के रख देता है कोने में । लेकिन अहंकार निर्मूल जो है वो आदमी जब बात करेगा तो उसकी बात में  सार भी होगा और सामने वाले के चित्त में उसकी गहरी असर भी होगी । तो एक पहली बात है कि व्यवहार में स्वार्थ का त्याग, दूसरी बात है अहंकार का त्याग.. और तीसरी बात सत्य का आचरण करें । झूठ, कपट, बेईमानी से थोड़ी देर  के लिए दिखता है लाभ लेकिन अंत तो गत्वा  दुःख ही दुःख होता है, अशांति ही अशांति होती है । क्योंकी कोई भी चीज तुम पाते हो तो  जिसका कारण अशुभ है उस अशुभ कारण से शुभ कार्य हो नही सकता । जैसे तांबे की तारों से बुनी  हुई जाल तांबे की होगी, मिट्टी के लगदे से मिट्टी के ही बर्तन बनेंगे और स्वर्ण से सोने के ही गहने होंगे ऐसे ही जो तुम कर्म करते हो तो  तुम्हारा कार्य अगर अशुद्ध है तो फल तुम्हारे को शुद्ध शांति वाला, सुख वाला नहीं मिलेगा,  दिखाऊ भले थोड़ी देर के लिए लाभ हो जाए लेकिन घर में कोई बीमारी, कोई मुसीबत अथवा बुद्धि में कोई उल्टा निर्णय करके तुम्हारे धन को,  तुम्हारे सत्ता को,  तुम्हारे अधिकारों को तितर बितर कराने के दिन जल्दी आ जाते है । इसीलिए आप स्वार्थ त्याग और अहंकार त्याग ये दो बाते आ जाए तो सत्य आचरण करने पर दृष्टि रखे । जितना हो सके मन से, कर्म से,  वचन से अपने चित्त में, अपने अन्तःकरण में, अपने व्यवहार में  कपट न आए तो आपका अन्तःकरण थोड़े ही दिन में पावन हो जाएगा, और आप पर लोग भरोसा करने लगेंगे और आप के संपर्क में आकर आपकी तो उन्नति होती ही है इससे आपके संपर्क में आने वालों की भी उन्नति होगी और सत्य आचरण से भगवान जल्दी रीझते है,  भक्ति, ज्ञानयोग में बरकत आती है और गीता में एक जगह आया है कि जो भक्ति का प्रचार करता है ,गीता के ज्ञान का प्रचार करता है वो मुझे प्राणों से भी प्यारा है आप भगवान के अतिप्रिय हो जाएँगे । जो भगवद चर्चा सुनते है, सुनाते है वो भगवान के अति निकटवर्ती हो जाते है उनका अन्तःकरण जल्दी भगवद रस से,  भगवद भाव से पावन हो जाता है । तुलसीदास ने कहा . .
जिन हरि कथा सुनी नही काना । श्रवण रन्ध्र अहि भवन समाना ।।
जिन्होंने अपने कानों के द्वारा हरि कथा नही सुनी तो फिर उनके कान है भृंग के भवन जैसे, सांप के बिल जैसे उनके कान है । जिनकी जिव्हा से हरि नाम नही उच्चारा गया उनकी जिव्हा दादर की जिव्हा के समान है । तो तुम्हारा सत्य आचरण और भगवद चिंतन से तुम्हारी जिव्हा पवित्र होगी और सत्य आचरण से तुम्हारा अन्तःकरण शुद्ध और पावन होगा । तो शुद्ध वातावरण में से शुद्ध और अशुध्द सब चीज को आप खिंच सकते है । जैसे गुलाब अपना कुछ ले लेता है और मोतिया अपना ले लेता है गंध पृथ्वी में से, और चंम्पा अपनी गंध ले लेता है । ऐसे ही तुम्हारा अन्तःकरण जैसा होगा  विशाल वातावरण में से वैसी चीज तुम्हारी ओर आकर्षित होकर आएगी । तुम्हारे अन्तःकरण में सच्चाई और स्नेह है तो अन्तःकरण में जो सत्पुरुष है और स्नेह से पूर्ण है, परमात्मा को पाए हुए सत्पुरुषों के आंदोलन तुम्हारे अन्तःकरण को और उन्नत करेंगे और तुम्हारे जीवन में अगर पाप ताप दगा बेईमानी हैं तो आसुरी आंदोलन तुम्हारे अन्तःकरण में सेट होते जाएँगे । तो तुम जैसा व्यवहार करते हो वैसा ही वातावरण तुम्हारे अंतःकरण में आमंत्रित होता जाता है। जैसे आदमी पानी पीता है निकालता है, पीता है निकालता है, थोड़ी असावधानी रहती है तो पानी मे भी क्षार तत्व पत्थरी हो जाती है, कुछ स्टोरेज हो जाता है और ठीक से गाड़ी चलती है तो पत्थरी आदि नही होती है ऐसे ही तुम्हारे कर्म करने की गति ठीक होती है तो कर्मों के बंधन की पत्थरी  नही बनती है और अगर ठीक व्यवहार नही होते है तो कर्मों के बंधन की पत्थरी  बन जाती है ,जो पीड़ा देती है। ये पत्थरी  तो ओपेराशन करके निकाली जाती है लेकिन वो पत्थरी  के  ओपेराशन के लिए 84-84 लाख बार जन्मना और मरना पड़ता है। इसलिए अपने अल्प जीवन में आदमी ऐसा काम करे कि 84-84 लाख जन्मों के बंधन कट जाए। और अल्प जीवन में ऐसा काम न करे कि हजारों हजारों जन्म तक भटकता रहे, दुःखी होता रहे ।

तो यहाँ भगवान कहते है कि जिसको युक्त कर्मफलं त्यक्तवा बनना है उसको पाँच बातें ध्यान में लेनी चाहिए , एक तो उत्तम व्यवहार स्वार्थ त्याग का.. दूसरा अहंकार.. महमान को खिलाओ पिलाओ ,किसीसे मिलो लेकिन ये भाई साहब काम में आएँगे , ये साहब काम में आएँगे इस भाव से मत मिलो। इस भाव से मिलोगे तो फिर वो मिलने मे …वो काम मे आएँगे उतना नही आएँगे जितना निस्वार्थ भाव से मिलोगे तो काम मे आएँगे। तो स्वार्थ रखकर  तुम जब  गिड़गिड़  गिड़गिड़  करते हो तो अंदर से छोटे हो जाते हो और तुम्हारा फायदा दूसरे स्वार्थी लोग उठा लेते है। तुम जब निस्वार्थ होकर मिलते और व्यवहार करते हो तो वो  सामनेवाले के ह्रदय में  जो हृदयेश्वर बैठा है वो तुम्हारे लिए ठीक उसको मदद करने को प्रेरित कर देगा। तो ये साहब काम में आएँगे, ये साहब काम में आएँगे, फलाना काम में आएगा, डिंगना काम में आएगा, इस प्रकार का आकर्षण, अंतःकरण मलीन करके जब व्यवहार किया जाता है तब उस व्यवहार का फल मधुर नही होता है, व्यवहार  फल उत्तम ढंग से स्वार्थ त्याग करके स्नेह से  …  दूसरी बात अहंकार का त्याग.. तीसरी बात सत्य  आचरण… औऱ चौथी बात है तुम्हारे व्यवहार में विनय हो ! विनय युक्त जो व्यवहार है वो शत्रु को भी अपना बना लेता है, तो मित्र को अपना बनाने में देर कितनी? और मित्रों का मित्र परमात्मा ! उसको अपना बनाने में देर कितनी भैया ? तो अपने व्यवहार में विनय हो! वाणी में विनय हो | और पाँचवी बात तुम्हारे जीवन में प्रेम हो ! जहाँ प्रेम होता है न वहाँ परिश्रम का ख्याल नही होता | जैसे बच्ची अपने भाई को प्यार करती है नन्हे मुन्ने आठ साल की बच्ची अपने भाई को चार मंजिल तक ऊपर ले जाती है | अरे दस मिनट पहले तो बोलती थी कि 1 लीटर दूध लाना मेरे से नही उठेगा | ये 6-7 किलो का भाई को लेकर ऊपर जाती | बोले नही नही इसमें कोई वजन नही क्योंकि भैय्या में प्रेम है ! जहाँ प्रेम होता है वहाँ बोझा नही लगता और जहाँ प्रेम नही है वहाँ थोडासा काम भी बोझा हो जाता है । तो मोह से बच्चों को पालना,मोह से परिवार को पालना, पति की सेवा करना या पत्नी को खुश रखना ,स्वार्थ से या मोह से तो पति पत्नी एक दूसरे के शत्रु हो जाते है लेकिन परमात्मा को प्रसन्न करने के नाते पति की सेवा करना और परमात्मा को प्रसन्न करने की खातिर पत्नी का पोषण करना और बच्चों में जो परमात्मा है उसकी सेवा की खातिर, ऎसा नही कि बच्चे बड़े होंगे फिर हमारा सेवा करेंगे ,हम बुड्ढे होंगे बच्चे हमको कमा के खिलाएँगे इस भाव  से भी पोषता हैं न तो उनके बच्चे बड़े होके उनको ऐसा दुःख देते है कि  बूढ़े ताकते रह जाते है कि …gujrati text…. जो प्रेम परमात्मा से करना चाहिए था, जो कर्म ईश्वर के नाते करने चाहिए थे, वो कर्म तुमने अपने स्वार्थ के नाते किए इसलिए बुढापे में रोना पड़ता है । जो भरोसा परमेश्वर पर रखना चाहिए था वो भरोसा अगर पुत्रों पे रखा तो वो भरोसा जरूर गड़बड़ कर देगा । तो, तुम भरोसा तो भगवान पे रखो और कर्म संसार मे करो, कर्म क़रने में ये पाँच बातों की सावधानी रखो | एक तो – उत्तम व्यवहार.. कनिष्ठ नही , पापाचार नही, अच्छा व्यवहार ,सुंदर पवित्र व्यवहार |

दूसरा- उस व्यवहार में स्वार्थ का त्याग …सेल्समन  भी अच्छी मीठी बातें करता हैं ,लेकिन स्वार्थ होता है और ये जरूरी नही कि सेल्समन मीठी बातें करता है तो वो सदा के लिए सुखी हो जाता है…नही! सदा के लिए सेल्समेनी करो ,मीठी बातें करो ,लेकिन उसमें स्वार्थ न रखो तो सेल्समेनी तो चलेगी ….एक दुकान है गोधरा बस स्टैंड के सामने ,वो साधक यहाँ आता है, छोटीसी दुकान है । और स्टार्ट किया उसने  हजार दो हजार का माल है, और उसका व्यवहार ऐसा कि बस गुजारे भर का मिल जाये, स्वार्थ नही | एक रुपए छः आने का पॉपलीन का डेढ़ रुपया लेता था। तो पहले तो ऐसी आदत थी… Gujrati text…. तो सब दुकानदार तीन गुना भाव बताते थे , वो ही पॉपलीन बताते थे 2.50 रुपया, 2.50  रुपया वाली खेंच तान के पौने दो रुपया बिकती और ये जो डेढ़ रुपये बोलते थे तो ग्राहक चले जाते थे। लेकिन उन्होंने देखा कि मेरे को स्वार्थ त्याग करके जीवन दिव्य करना है। डेढ़ रुपया बोले ग्राहक लेवे नही, घूम फिर के 2.50, 2.25 , 3 सुन सुन के फिर आकर डेढ़ रुपया में ले जावे.. फिर दूसरी बार कभी भाव पूछे नही… क्या Gujrati text… वो छोटीसी दुकान में से 30 तो छोटे मोटे लड़कों को छोटे मोटे धंदे रोजगारी की लाईन मिल गई, और अब बड़ी दुकान है दयाल वस्त्र भंडार और होलसेल रिटेल चल रहा है।तो स्वार्थ त्याग में शुरुआत में आदमी ऐसा मूर्ख जैसा लगता है, भोला भाला लगता है, वो स्वार्थी कपटी लोगों की जो पूरी बाजार में कपटी लोग भरे हैं सब जगह उसमें एक सज्जन और स्वार्थ त्यागी आदमी दुकान लेके बैठे और पैसा इतना नही… एक बार तो पैसा भरना था दो हजार रुपया | रोकड़ा हुआ नही, इज्जत जाती है | तो अंजान आदमी सुबह सुबह आकर 2500 रुपया दे गया ! कहाँ से आये? बोले हम कहीं से भी आए हो तुम ले लो हमको जरूरत पड़ेगी तो हम ले जाएँगे। खुदा खैर करे बंदा लहर करे ! और जब जरूरत पड़ेगी तब लेने को आए,उसके पहले तो हालाकि वो था तो यवन और यह भाई तो हिंदू था फिर भी भगवान  न जाने किस वक्त किसके द्वारा तुम्हारी किश्ती को चलाने के लिए सहयोग दे दे ,दिला दे! तो तुम्हारे जब रुख बदलते हैं न तो नजारे भी बदलते है ! नजरे बदली तो नजारे बदलेंगे, किश्ती रुख बदलेगी तो किनारे बदलेंगे । तो हमारी जो स्वार्थमई बुद्धि वृत्ति है उसमें निःस्वार्थता आ जाए | किश्ती रुख बदलेगी तो नजारे बदल जाएँगे। जो दुःख ,पीड़ा, अशांति, प्रोब्लेम और टेंशन में हम मरे जा रहे है वो सुख,शांति,निर्भिकता, आनंद , और यहाँ भी सुखी ,परलोक में भी सुखी ये मार्ग मिल जाएगा। तो ये पाँच बातें फिर से कहता हुँ- उत्तम व्यवहार-स्वार्थ त्याग , दूसरी बात- अहंता का त्याग , तीसरी बात – सत्य आचरण, चौथी बात- विनय , और पाँचवी बात – प्रेम । तुलसीदास जी ने कहा –
परहित सरिस धर्म नहीं भाई’
पर पीडन सम नहिं अधमाई
परहित बस जिन्ह के मन माहीं।
तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥
जिनके चित्त में दूसरों की भलाई  छिपी है , जो दूसरों की भलाई के लिए काम करते है उनके लिए जगत में दुर्लभ कुछ भी नही होता, ऐहिक चीजे भी दुर्लभ नही होती और भगवान भी उनके लिए दुर्लभ नही होता है …
पीछे पीछे हरि फिरे कहत कबीर कबीर…
कबीरा मन निर्मल भयो, जैसे गंगा नीर |
पीछे पीछे हरी फिरे, कहत “कबीर, कबीर” ||
कबीर ने कहा…
यह तन विष की बेलरी ,गुरु अमृत की खान |
सिर दीजिए सतगुरु मिले ,तो भी सस्ता जान ||
वो सद्गुरु तत्व आत्मदेव आपको मिल सकता है चालू व्यवहार में ! जैसे तुलाधार को हो गया । तो चालू व्यवहार में  ये पाँच बातें आ जाए तो अंतःकरण शुद्ध होगा, शुद्ध अंतःकरण वाला बैठेगा तो ध्यान जल्दी लगेगा , ज्ञान की बात जल्दी समझ में आएगी, महापुरुषों को पहचानने की बुद्धि मिल जाएगी, महापुरुषों के उपदेश को झेलने की बुद्धि मिल जाएगी । बुद्ध के साथ आनंद भी रहता था और सुबुद्धि भी रहता लेकिन सुबुद्धि को बुद्ध इतने सारे मिल गए कि सुबुद्धि बुद्ध के विदाई का भी सुबुद्धि को भय नही है, खतरा नही है क्योंकि बुद्ध को ऐसे पा लिया कि बुद्ध कभी जा नही सकते | लेकिन आंनद ने ऐसा नही पाया कि बुद्ध कभी जा नही सकते | आनंद ने बाहर बाहर से पाया था और सुबुद्धि ने बुद्ध को बाहर और भीतर दोनो ढंग से, अच्छी ढंग से पाया था । तो आप परमात्मा को बाहर बाहर से तो मंदिर में पाते हो , बाहर बाहर से तो आरती के वक्त भगवान के निकट होते हो लेकिन भीतर से भगवान के निकट अगर एक बार हो जाओ तो फिर वियोग नही होता है। बाहर से हजार बार भगवान के साथ मिलो.. शाकुनी मिलता था श्रीकृष्ण को , दुर्योधन मिलता था श्रीकृष्ण को, और ग्वाला कहके पुकारता था, रामजी को सूर्पनखा भी मिली थी | तो मैंने अर्ज किया था कि ये जो शाश्वत शांति है, नैष्ठिकम शांति है वो भगवद दर्शन तो पाप आत्माओं को भी हो जाता है अनजाने में, जैसे शाकुनी को भगवद दर्शन हुआ था, दुर्योधन को हुआ था, लेकिन ये पाँच बातों से अपने व्यवहार को सजाया नही तो वैसे के वैसे रह गए ! और जिन्होंने
पाँच बातों से अपने व्यवहार को अनजाने में भी व्यवहार में थी उन्होंने भगवान के दर्शन से बहुत कुछ पा लिया ।

शबरी में प्रेम था, भगवान के दीदार से शबरी ने ऐसी यात्रा की कि सारी यात्रओं का फल मिल गया। मतंग ऋषि के आश्रम में रहने वाली वो अबला भीलण , उसके व्यवहार में निष्कामता थी ,उसके व्यवहार में  प्रेम था, उसके व्यवहार में विनय था और रामजी एक बार मिले | सूर्पनखा को भी रामजी मिले और शबरी को भी रामजी मिले | बताओ सूर्पनखा ने कुछ नही पाया, नाक कान कटाकर नककट्टी हो गयी औऱ शबरी ने ऐसा पाया कि साधु संतों की जिव्हा पर शबरी का नाम आदर से लिया जाता है ! सरोवर कांठे शबरी बैठी ,सरोवर कांठे ओली भीलण बैठी ,करे राम नू ध्यान, राम राम रटता शबरी बैठी….

जिसका व्यवहार शुध्द होता है न उसको  सत्संग में रुचि होती है। जिसका पुण्य जोर होता है व्यवहार शुद्ध होता है, व्यवहार में ये पाँच बातें होती है वो सत्संग के बिना रह नही सकेगा। सत्पुरुषों का आदर किये  बिना रह नही जाएगा उससे ! जैसे सती सावित्री ..बाप ने तो क्रुद्ध होकर एक भील के साथ ब्याह दी .. और भील वास में रहती थी झोंपडी में.. देवर्षि नारद पसार हुए तो कईं भीलण ऐ बाबा आए, बाबा आए .. ऐसा करके मस्करी करती थी लेकिन सावित्री तो आदर से नारद जी को प्रणाम करती और नारद जी पूछते  कि भीलण तेरा व्यवहार तो कुछ बड़े घराने की बुद्दिमान महिला जैसा है । बातचीत करते हुए पता चला कि पिता ने गुस्से गुस्से में लकड़हार के साथ शादी करा दी। नारदजी ने देखा लकड़हार कौन है.. की सत्यवान.. और सावित्री को मंत्र दिया! भील वास में रहनेवाले और लड़की काँटकर गुजारा करनेवाला  वो बचपन से भीलों के वातावरण में पलनेवाला सत्यवान .. समय पाकर ऐसा जीवन चमका कि अभी सती सावित्री होकर अभी सुप्रसिद्ध है। तो आपके व्यवहार से ही आपका भविष्य बनता है और  व्यवहार  करने के पहले … मशीन को काम दिया जाता है, मनुष्य को ज्ञान दिया जाता है।

व्यवहार के पहले अगर गीता का ज्ञान मिल जाए और फिर व्यवहार में लगे तो बेड़ा पार हो जाता है … अर्जुन को गीता का ज्ञान मिला और बाद में युद्ध में लगा है .. तो युद्ध जैसे घोर कर्म में भी अर्जुन सफल हुआ है और आदरणीय हो गया। नही तो जो युद्ध करे लड़ाई करें अपने कुटुम्बियों को बड़े बड़ों को जिनकी गोद में खेला है, जिनसे सीखा है, पढ़ा है उनकी हत्या करनी पड़ती है ! लेकिन अर्जुन विवश है.. धर्म युद्ध करना पड़ता है , फल आसक्ति नही है… त्यक्त्वा कर्मफल … कर्मफल को छोड़ दिया है … जो होगा !… निष्काम भाव से युद्ध ! निष्काम भाव से जब युद्ध हो सकता है तो निष्काम भाव से तुम्हारी नौकरी क्यों नही हो सकती ? की बाबाजी नौकरी करेंगे तो पगार तो लेंगे ! पगार तो जरूर लो लेकिन ये पगार लेकर मेरे को मजा नही लेना है.. पगार लेकर ये जो मेरे इर्द गिर्द भगवान ने जबाबदारी सौंपी है उसको निभाना है ! जिनको खिलाना वो बड़े होकर मेरे को खिलाए , जिनको पोशणा वो मेरे को पोशे इस स्वार्थ से नही ! और कभी कभी पड़ोसी का बच्चा अपने बच्चे से जरा ज्यादा जरूरतमंद है तो वहाँ भी हाथ चला जाएगा सेवा के लिए !  तो हृदय में जो आनंद आएगा, शांति आएगी वो कुटुम्बियों के मोह माया से आक्रांत जीवन से वो आनंद नही आएगा जितना हृदय विशाल करके आनंद पा सकोगे! जितना जितना व्यवहार में स्वार्थ त्याग होगा ,हृदय की विशालता होगी उतना उतना अंतःकरण शुद्ध होगा  और परमात्म रस से पूर्ण होने लगेगा।

एक पुरुषोत्तम नाम के भगवान के भक्त हो गए। हकीकत में वो पुरुषोत्तम दास जी साधारण कुटुंब में जन्मे थे और बचपन में माँ बाप विदा हो गए थे । गंगा तट पर गाँव देवपुरी उसमें पुरुषोत्तम दास जी महाराज एक बहुत उच्च कोटी के संत हो गए। उनका बाल्यकाल तो महाराज ऐसा गुजरा कि थोड़ी 3-4 वर्ष की उम्र में पिता चले गए,  छठी वर्ष की  में माँ चली गयी.. अब दीदी ने उनको पाला-पोशा । दीदी भगवान की भक्त थी, और सत्संग में जाया करती थी । तो उस बालक पुरुषोत्तम को सत्संग में ले गए। और सत्संग का रंग बचपन मे जब लग जाता है न  बड़ी गहरी असर करता है। तो दीदी ने उनको राम नाम में प्रीति सिखा दी और व्यवहार की शुद्धि, इन पाँच बातों के छोटे मोटे संस्कार डाल दिए। महाराज वो पुरुषोत्तम बच्चे पुरुषोत्तम में तो भक्ति का कुछ ऐसा रंग जमा कि 5 वर्ष.. 6 वर्ष की उम्र में माँ- बाप तो चले गए लेकिन ऐसे माँ- बाप का शरण मिल गया जो कभी न जाए । तो  उनको नौ रस फीके हो गए .. नौ रस कौन से है ? कि श्रृंगार रस, हास्य रस, करुण रस, वीर रस, रौद्र रस , भयानक रस, बिबित्स् रस, अद्भुत रस और सांसारिक शांति का रस .. ये सारे नौ के  नौ रस उनके लिए फीके हो गए.. षडरस , नौ रस दोनों फीके हो गए … षडरस कौनसे होते है?  कि कटु, तीक्ष्ण, मधुर, काषाय, आम्ल, और लवण .. इस प्रकार के नौ और छः पंद्रह के पंद्रह जगत के रस फीके हो गए ऐसा उनके चित्त में रामरस प्रगट होने लगा और इस प्रकार रामरस में वो जीते थे, धंदा व्यवहार जो कुछ छोटा मोटा आता था काम तो करते थे लेकिन चित्त  रामरस से भरा रहता था । बारह वर्ष इसप्रकार  उनका चित्त रहा महाराज फिर तो वो देह अध्यास से पार हो गए, बाहर का काम धंदा छूट गया ! जो  आत्म तृप्त  होते है.. तस्य कार्य न विद्यते, आत्मरति एवच…जिसको आत्मरति होती है ,आत्मप्रीति होती है उसके लिए  संसार का कार्य करें न करे, संसार का बोझा अपने आप छूट जाता है। ऐसे ही इस संत के जीवन में संसार जीवन जीने वाले पुरुषोत्तम दास महाराज हो गए , दीदी के संग से गंगा तट पर उस गाँव में लोगों को जब पता चला कि इनका मधुर व्यवहार और इनका सानिद्वय से इतना सुख  शांति मिलता है तो लोग धीरे धीरे उनके पास कथा श्रवण को आते थे। रामायण लेकर बैठ गए, कभी कोई संत महापुरुष का पुस्तक लेकर बैठ गए .. तो पुस्तक या ग्रन्थ तो कोई होता था धार्मिक लेकिन धर्म अंदर से प्रगट होता था । धर्म अंदर से जब प्रगट होता है न तो उसमें बड़ी मधुरता होती है।

 

धर्म क्या है ? कि जिससे अपना और दूसरे का इस लोक में और परलोक में श्रेय हो वही धर्म है। अपना और दूसरों का इस लोक  और परलोक में कल्याण हो वह धर्म है। ऐसा  धर्मआचरण पुरुषोत्तम दास  के व्यवहार में और वाणी में था । धीरे धीरे लोग उनके पाँच पच्चीस से ,पचास सौ दो सौ ऐसे बढ़ते गए .. देर सवेर वो  पुरुषोत्तम दास  महाराज एक संत के नाम से सुप्रसिद्ध हुए । पुरुषोत्तम दास  महाराज 5 वर्ष तक लोक सम्पर्क में रहे और  फिर अंत में देखा कि ये प्राण पखेरू उड़ने वाले है उस समय उन्होंने प्राणायाम करके परमात्मा ध्यान किया और उनकी तालू में से प्राण पखेरू ईश्वर तत्व में समा गए । उनका नाम नश्वर शरीर संसार में जैसी विधि होती है ऐसा हो गया और शाश्वत उनका अंतवाहक शरीर परमात्मा में मिल गया । कहने का तातपर्य यह है कि जिसके जीवन में ये पाँच बातें आ जाती है अथवा जिसके जीवन में भगवद रस आने लगता है … तो  ये पाँच बातें  अपने आप उनके व्यवहार से टपकने लगती है, वो आदमी संसार का व्यवहार करते हुए भी परमपद को पा लेता है । उत्तम मनुष्य वह है कि उत्तम व्यवहार और उत्तम विचार और उत्तम  संग करके जीवन का निर्वाह करते है । उत्तम मनुष्यों का काम है कि कोई  काम करते है न तो आगे पीछे विचार करके हाथ में लेते है और फिर प्राण जाए लेकिन उस कर्म को छोड़ते नही जबतक उस कर्म में पूर्णता न आए । मध्यम आदमी ऐसे होते है कि अच्छा काम लेते तो है   थोड़ा विघ्न आ जाए तो ध्यान भजन छोड़ दिया … थोड़ा कुछ प्रॉब्लम आया तो सत्संग वत्संग छोड़ दिया.. और कनिष्ठ- अधम आदमी ऐसे होते है कि अच्छे काम की तरफ चलते ही नही ! और चलते है तो दिखावे भर को चलते है । तो अधम आदमी उस रास्ते चलता नही, चलता है तो दिखावे भर का है । मध्यम आदमी चलता है और विघ्न आता है तो भाग खड़ा होता है । लेकिन उत्तम आदमी हजार हजार विघ्न आ जाए फिर भी नही छोड़ता और अंत तो गत्वा उत्तम पद को पा लेता है ! तो उत्तम में उत्तम पद है शाश्वत शांति,  नैष्ठिकम शांति | तो तुम जो कुछ करो … तो काम करने के पहले आराम होता है , काम करने के  बाद भी आराम होता है .. तो काम ऐसा करो कि तुम्हारे   चित्त में राम का आराम प्रगट होने लग जाए !  चित्त को जाँचो ! अपने चित्त में अशांति तो नही आ रही है ? भय तो नही आ रहा है ? क्रोध तो नही आ रहा है ? और जब क्रोध भय अशांति आए तो देख लेना कहीं ना कहीं गड़बड़ है, कहीं ना कहीं स्वार्थ है.. हरिकथा मीठी नही लगती, सत्संग मीठा नही लगता है  तो कहीं ना कहीं स्वार्थ खटपट कर रहा है , कहीं ना कहीं पुण्यों की कमी है इसलिए कूड़ाकरकट आ गया है । तो अपने मन को अपने बुद्धि को जाँचते रहेंगे तो जल्दी स्वच्छ होंगे और संसार मे और ईश्वर के रास्ते दोनों रास्ते आदमी सफल होता है। कभी कभी तो कोई आदमी दोनों हाथ से सिर खुजलाते है .. दोनों हाथ से सिर नही खुजलाना चाहिए और झुठे हाथ से तो सिर को कभी स्पर्श नही करना चाहिए नही तो बुद्धि मंद होती है । झुठे हाथ से बच्चे अपने सिर को हाथ न लगाए ऐसी सीख देनी चाहिए उनको ।

नारायण नारायण…