ब्रह्मज्ञान के अतिरिक्त साधन

ब्रह्मज्ञान के अतिरिक्त साधन


शुद्ध अंतःकरण वाले मुमुक्षु के लिए ब्रह्मनिष्ठ सदगुरु के सान्निध्य में ब्रह्मविचार ही मोक्षप्राप्ति का साधन बताया गया है । अंतःकरण को शुद्ध करने के लिए सेवा-सत्कर्म महत्वपूर्ण साधन है । गुरुसेवा से अंतःकरण को शुद्ध किये बिना कितना भी ब्रह्मविचार कर ले, वह मोक्षप्राप्ति तो दूर, सामान्य दुःख-निवृत्ति के भी काम नहीं आता । अतः सेवा और ब्रह्मविचार अर्थात् सत्कर्म और सद्ज्ञान इन दोनों पंखों से ही परमानंदस्वरूप परम पद के महाकाश में उड़ान भरी जा सकती है ऐसा शास्त्रों का निर्णय है । इसलिए वेदांत में ब्रह्मज्ञान के अतिरिक्त साधनों की चार कक्षाएँ स्वीकार की गयी हैं-

  1. हमारे कर्मों का प्रभाव हमारे अंतःकरण पर पड़ता है । अतः कुछ साधन कर्म की शुद्धि के लिए हैं । उनको कर्म-शोधक साधन कहते हैं ।
  2. कुछ साधन पूर्वकृत कर्मों से उत्पन्न अंतःकरण में पड़े हुए राग-द्वेष की निवृत्ति के लिए होते हैं । इसलिए इन साधनों को करण-शोधक साधन कहते हैं ।
  3. वासना की न्यूनता अथवा शुद्धि होने पर भी बुद्धि में जो अपने, जगत के और ब्रह्म के बारे में अज्ञान, संशय और विपरीत ज्ञान भरा है, उसके शोधन हेतु हो साधन हैं वे पदार्थ-शोधक साधन कहलाते हैं ।
  4. अंत में पद-पदार्थ (महावाक्य के पद एवं उन पदों के अर्थ) का यथार्थ बोध होने पर भी जब तक अपनी पूर्णता के बोधक ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्यजन्य अखंडार्थ-धी (आत्मा और ब्रह्म की एकता का बोध कराने वाली वृत्ति) का उदय नहीं होता, तब तक ब्रह्मात्मैक्य-बोध नहीं होता । अतः इस ब्रह्मात्मैक्य-बोधिनी वृत्ति को वेदांत में साक्षात् साधन कहा गया है ।

इसे आप बंदूक के दृष्टांत से समझ सकते हैं । नियम यह है कि ठीक निशाना लगाने के लिए चार बातें आवश्यक हैं- 1. बंदूक की नली साफ हो । 2. बंदूक में गोली भरी हो । 3. आँख, नली और लक्ष्य – तीनों एक सीध में कर लिये गये हों तथा उँगली बंदूक के घोड़े पर हो । 4. अंत में घोड़ा दबा दिया जाय । यहाँ बंदूक की नली साफ करना कर्म-शोधक साधन है, गोली भरना करण-शोधक साधन है, लक्ष्य की एकता करना पदार्थ-शोधक साधन है तथा घोड़ा दबा देना साक्षात् साधन है ।

इन चार साधनों के दूसरे नाम अधिक प्रचलित हैं । कर्म-शोधक साधन ‘परम्परा साधन’ कहलाते हैं, करण-शोधक साधन ‘बहिरंग-साधन’ कहलाते हैं और पदार्थ-शोधक साधन ‘अंतरंग-साधन’ कहलाते हैं । साक्षात् साधन तो साक्षात् हैं ही, वैसे कोई-कोई उसे ‘परम अंतरंग साधन’ भी कहते हैं । अब इनके बारे में थोड़ा-थोड़ा विचार करें ।

  1. परम्परा साधन (कर्म-शोधक साधन)- वस्तु और क्रिया के अऩुचित संबंध से होने वाले जो असाधन जीवन में आते हैं, जैसे चोरी, व्यभिचार, अनाचार आदि, उनकी निवृत्ति के लिए जो साधन परम्परा से चले आ रहे हैं, जैसे – अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि, वे परम्परा साधन कहलाते हैं । धर्म, उपासना और योग परम्परा साधन हैं ।

शारीरिक और ऐन्द्रियक संयम तथा यज्ञ-यागादिक कर्म धर्म कहलाते हैं । कर्तव्य-कर्म का नाम  धर्म है । परंतु धर्म का आधार एकमात्र शास्त्र ही है । शास्त्रविहित कर्म का नाम धर्म है और शस्त्र से अविहित (निषिद्ध, अनुचित) कर्म का नाम अधर्म है । धर्म का पालन अधर्म का नाशक है । धर्म हमारे कर्मों का नियंता है । वह हमारे जीवन को वासना-पथ से हटाकर मर्यादित भोग और संवैधानिक, सभ्य-सामाजिक आचरण के पथ पर आरूढ़ करता है । प्रत्येक समाज में प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक अवश्य करणीय धर्म होता है । इस प्रकार अधर्म से निवृत्त करने के कारण और कर्म का शोधक होने के कारण धर्म वेदांत का परम्परा साधन है ।

धर्म के अंतर्गत उपासना सहकारी साधन भी है और स्वतंत्र परम्परा साधन भी है । उपासना से धर्म वृद्धि को प्राप्त होता है और धार्मिक व्यक्ति की उपासना में सहज रूचि होती है । उपासना से अंतःकरण में सत्त्वगुणी वासनाओं की वृद्धि होती है है तथा तमोगुणी-रजोगुणी वासनाओं में कमी होती है । वासनाओं की शुद्धि से कर्म भी सहज शुद्ध होता है । इसलिए धर्म के साथ उपासना भी वेदांत का परम्परा साधन है । किंतु धर्म की अपेक्षा उपासना अंतरंग है क्योंकि धर्म का आधार शरीर है तो उपासना का आधार मन है । योग (अष्टांग योगः यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) भी एक विशिष्ट उपासना है अतः योग भी वेदांत का परम्परा साधन है । उपासना वासना को बाँधती है तो योग मन की चंचलता को दूर करता है किंतु उपासना की अपेक्षा योग अंतरंग है ।

धर्म में बहिर्मुख प्रवृत्ति, उपासना में अंतर्मुख प्रवृत्ति और योग में निवृत्ति रहती है । धर्म में स्पष्ट कर्ता, उपासना में गौण कर्ता और योग में अज्ञात कर्ता रहता है । अतः धर्म, उपासना और योग कर्तृसाध्य हैं तथा इनसे उत्पन्न होने वाला साध्य या स्थिति कर्मजन्य ही है, इसलिए उस साध्य या स्थिति का टूटना अनिवार्य है । अतः ब्रह्मज्ञान में धर्म, उपासना और योग केवल कर्म-शोधक साधन माने गये हैं । ये क्रियारूप होने से स्वयं बाहर होते हैं किंतु इनका फल भीतर अंतःकरण में होता है। (क्रमशः)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2018, पृष्ठ संख्या 22,23 अंक 312

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ब्रह्मज्ञान के अतिरिक्त साधन

(गतांक से आगे)

(2) बहिरंग साधन (करण-शोधक साधन)– विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति (शम, दम, तितिक्षा, उपरति, श्रद्धा तथा समाधान अर्थात् अपनी बुद्धि को समस्त बाह्य पदार्थों एवं विषयों से हटाकर केवल ब्रह्म में ही स्थिर करना ।) और मुमुक्षा – ये जो साधन चतुष्टय हैं वे बहिरंग साधन कहलाते हैं । परम्परा साधनों से तो ये अंतरंग हैं परंतु श्रवण-मनन-निदिध्यासन की अपेक्षा ये बहिरंग हैं। अतः इनकी गिनती बहिरंग साधनों में ही है । अंतःकरण में स्थित अविवेक, भोगासक्ति आदि दोषों को नष्ट करने के कारण साधन-चतुष्टय को करण-शोधक साधन माना जाता है । दोष जिस अंतःकरण में निवास करते हैं उस अंतःकरण की सफाई के लिए ही उसी में ये साधन होते हैं । इनमें बाह्य पदार्थ, क्रिया अथवा भावना नहीं है । ये निवृत्तिरूप हैं । निवृत्ति अपने अधिकरण (आश्रय) से भिन्न नहीं होती । फिर भी ये केवल अंतःकरण के ही शोधक हैं, सद्वस्तु अर्थात् ब्रह्म-तत्त्व के बोधक नहीं हैं । इसीलिए इनका नाम बहिरंग साधन है (आत्म से बाहरी) ।

  1. अंतरंग साधन (पदार्थ शोधक साधन)– वेदांत का गुरुमुख से श्रवण, तदनंतर उसका मनन और निदिध्यासन – ये अंतरंग साधन कहलाते हैं । ये ब्रह्म के स्वरूप को लक्ष्य करते हैं । वेदांत में पद के अर्थ का नाम पदार्थ है । जैसे ‘तत्त्वमसि’ एक वेदांत वाक्य है, जिसका अर्थ है ‘वह तू है ।’ इसमें तत् और त्वम् ये दो पद हैं । इनमें तत्-पदार्थ हैं जगत्कारण ईश्वर और त्वं पदार्थ है कर्ता, भोक्ता, संसारी परिच्छिन्न जीव । ‘असि’ पद इन दोनों पदार्थों की एकता को सूचित करता है । इस प्रकार गुरुमुख से प्रवाहित अमृतवाणी में, वेदांतों में जो उपर्युक्त दो पदार्थों की एकता का निश्चय है, उसे सुनना श्रवण कहलाता है । फिर जैसा सुना है उसके द्वारा अभेद-साधक और भेद-बाधक युक्तियों से ब्रह्म का चिंतन करना ‘मनन’ है । तदनंतर बुद्धिवृत्ति का निश्चय किये हुए अद्वैतार्थ में प्रवाह तथा विजातीय वृत्तियों का तिरस्कार, यह निदिध्यासन की परिपक्व अवस्था ही वेदांत की समाधि है । योग की समाधि या तो परम्परा साधन है अथवा षट्सम्पत्ति के अंतर्गत ‘समाधान’ की कक्षा में होने से बहिरंग साधन के अंतर्गत है ।

श्रवण, मनन और निदिध्यासन ज्ञान के साक्षात् साधन नहीं हैं । परंत ब्रह्म का लक्ष्य कराने के कारण ये अंतरंग साधन कहलाते हैं । ‘वेद का तात्पर्य अभेद ब्रह्म के प्रतिपादन में है या भेद के प्रतिपादन में ?’ – यह जो प्रमाण (वेद) के संबंध में संशय है वह श्रवण से दूर हो जाता है । ‘ब्रह्म का हमारे साथ जो संबंध है वह भेद का ही है, अभेद का नहीं हो सकता’ – यह जो बुद्धि में असम्भावना है, वह मनन से दूर होती है । वेद प्रमाण है ब्रह्म के विषय में । इसलिए वेद प्रमाण है और ब्रह्मात्मैक्य-बोध प्रमेय है । तो प्रमाणगत संशय श्रवण से दूर होता है और प्रमेयगत संशय मनन से दूर होता है । किंतु प्रमाणगत संशय और प्रमेयगत असम्भावना दूर हो जाने पर भी पूर्व-पूर्व के (अविद्याकालीन) अभ्यास के कारण देहादि जागतिक पदार्थों की सत्यता और ब्रह्म की अन्यता का भ्रम पुनः पुनः उपस्थित हो जाता है । इसको ‘विपर्यय’ या ‘विपरीत बुद्धि’ कहते हैं । बुद्धि का यह विपर्यय-दोष निदिध्यासन से दूर होता है । प्रतिबंधरहित साधक श्रवणमात्र से कृतकृत्य हो जाता है क्योंकि जहाँ वस्तु अपरोक्ष होती है वहाँ श्रवणमात्र से अपरोक्ष ज्ञान ही होता है । और जहाँ वस्तु परोक्ष होती है वहाँ श्रवण से परोक्ष ज्ञान ही होता है तथा वस्तु को प्राप्त करने के लिए अन्य साधन अपेक्षित होता है । ब्रह्म सदा अपरोक्ष है क्योंकि वह अपना आत्मा ही है । उसमें अविद्या न कभी थी, न है और न होगी । श्रवण से केवल प्रातीतिक अविद्या की निवृत्ति हो जाती है । हाँ, जिन साधकों में संशय-विपर्ययरूप प्रतिबंध शेष हैं उन्हें श्रवणमात्र से ज्ञान नहीं होता । उन्हें संशय की निवृत्ति के लिए मनन और विपर्यय की निवृत्ति के लिए निदिध्यासन की आवश्यकता रहती है । (क्रमशः)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2109, पृष्ठ संख्या 22,23 अंक 313

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