वृत्ति से निवृत्ति

वृत्ति से निवृत्ति


बिना अध्यास के कोई कार्य नही होता और ये अध्यास जब तक बना रहता है तब तक सत्य का बोध नही होता। सत्य का साक्षात्कार नही होता और सत्य का साक्षात्कार जब तक नही होता तब तक जीव घटि यंत्र की नाई घूमता रहता है। ॐ ॐ ॐ ॐ

पचास साल संसार में भटके पूछो क्या मिला ?.. कि इतना धन मिला, इतना पुत्र मिला इतना ये मिला वो मिला लेकिन ये अहं का अध्यास है। धन बँक में पड़ा है चित्त में अध्यास है, मकान जमीन पर खड़ा है अध्यास है ,पुत्र पाँच भूतों में है और वहीं से आया है अध्यास है कि मिला। मृत्यु का झटका लग जाता है , सब मिला मिलाया जो है भ्रमणा टूट जाती है, फिर दूसरे जन्म में जाता है और फिर अध्यास करता है कि ये मेरी माँ है, ये मेरा बाप है, ये मेरे को मिला, ये मेरे को बिछड़ा ..यही तो होता है और क्या है ? तो हर जन्म में ये जीव बेचारा मजूरी करते-करते मर जाता है। ये मेरी पत्नी है, ये मेरा पुत्र है, ये मेरा घर है ,ये मेरा कर्तव्य है,.ये मेरा पुण्य है, ये मेरा पाप है, ये सब अध्यास पर ही आरोपित है। तो ये अध्यास जबतक बना रहे तबतक कोई भगत बन जाए, कोई योगी बन जाए, कोई तपस्वी बन जाए ,कोई त्यागी बन जाए, कोई कुछ बन जाए लेकिन ये बनना सब अध्यास में होता है। ये अध्यास जबतक नही मिटता तबतक इसको परमपद की प्राप्ति नही होती। जबतक परमपद की प्राप्ति नही होती तबतक जैसे चाय उबालते हैं, दाल उबालते हैं , फुरफुराते रहते हैं दाल के दाने, ऐसे ही उस चेतन की सत्ता से अंतःकरण में “मैं मैं मैं” फुरफुराता रहता है। मैं में अध्यास लगता जाता है..मैं ये हूँ, मैं वो हूँ, मेरा ये है …ॐ ॐ ॐ

भगत का कर्तव्य है कि वृत्ति को भगवत्ताकार रखें, कृष्णाकार रखें। वृत्ति भगवत्ताकार, कृष्णाकार, इष्टाकार रहेगी तबतक भक्त मजे में..वृत्ति टूटेगी तो भक्त को अच्छा नही लगेगा। भोगी की वृत्ति भोगाकार होती है , त्यागी की वृत्ति त्यागाकार होती है, तपस्वी की वृत्ति तपस्याकार होती है । तो वृत्ति उठती है अंतःकरण में तो जो जैसा है उसकी वृत्ति उस आकार की होगी तो अपने को सुखी मानेगा। तो वृत्ति की आदत पड़ जाती है और आदत के अनुसार जो होता है उसको सुख मान लेता है। जैसे ऐसा खाना ,ऐसा रहना, ऐसा करना है ये आदत पड़ गई है न ? ऐसा मिलता है तो अपनेको सुखी मानता है और उससे विपरीत वृत्ति होती है तो अपनेको दुःखी मानता है। जैसे कामी को काम के साधन मिलते है तो अपने को सुखी मानता है , तपस्या के जगह पर आता है तो अपने को परेशान मानता है। लोभी को लोभ के अनुकूल माल मिलता है तो अपने को  सुखी मानता है, ठीक है न ? और कलह वाले को कलह में सफल मिलता है तो अपनेको सुखी मानता है, तो ये सब अध्यास में उलझे हुए लोग है ।

भक्त को भगवताकार वृत्ति बनाने में ठीक रहता है वो अच्छा है लेकिन सत्य का साक्षात्कार तो वेदांत तो उसपर भी चोट करता है..भगवत्ताकार वृत्ति बनी, व्यवहाराकार वृत्ति बनी लेकिन ये वृत्ति है ! इस वृत्ति से निवृत्त होना  है ! इस वृत्ति के साथ जुड़ोगे तो वृत्ति सदा एक जैसी नही बनती। अमुक प्रकार की वृत्ति बनी तो सुख हुआ, अमुक प्रकार की वृत्ति हुई तो फिर सुख गायब हो जाएगा। हजारों-हजारों वृत्तियाँ बदलती रहती है और जो वृत्ति के अनुसार सुखी होने में लगे हैं वो लगे ही हैं, उनके दुःख का अंत नही आता ! वृत्ति के अनुसार जो सुखी होने में लगे हैं वो लगे ही रहेंगे , उसके दुःख का अंत नही आता। ये जीवन तो पूरा हो जाता है, दूसरा जीवन मिलता है तभी भी ऐसे ही करोड़ों-करोड़ों  जीवन मिल जाते हैं ,करोड़ों-करोड़ों शरीर मिल जाते हैं, जन्म मिल जाते हैं लेकिन वो वृत्ति के साथ लगा हुआ आदमी का अंत नही आता भटकने का ! इसीलिए वेदांत चोट करता है वृत्ति से निवृत्त होने को। वृत्ति से निवृत्त हो गया तो वृत्ति चाहे कैसी आए .. भगवत्ताकार आए वृत्ति, शांतिकार वृति आई, कभी क्रोधाकार आ गई .. हम जुड़ जाते है क्रोध से इसीलिए जलन पैदा होती है, हम जुड़ जाते हैं काम से इसीलिए ह्रास हो जाता है, हम जुड़ जाते हैं लोभाकार वृत्ति से इसीलिए दुःख होता है..तो ये अध्यास है । बड़ा भारी तपस्वी हो, बड़ा भारी भक्त हो, बड़ा भारी जोगी हो ,बड़ा भारी उद्योगपति हो, बड़ा भारी दुनिया का प्रसिद्ध व्यक्ति हो, लेकिन उसको सुख तब होगा जब अपनी वृत्ति के अनुकूल होगा ! अपनी वृत्ति के अनुकूल होगा तब सुख होगा, अपनी वृत्ति के प्रतिकूल होगा तब दुःख होगा। और वृत्ति सदा एक जैसी नही होती और वृत्ति के अनुकूल बाहर सदा एक जैसी घटना नही घटेगी। अपनी वृत्ति के अनुरूप ही घटना घटे ये संभव नही ! और अपनी वृत्ति एक जैसी बनी रहे ये संभव नही ! तो फिर क्या होना चाहिए ? तो वृत्ति एक जैसी बनी रहे ये भी संभव नही, वृत्ति के अनुरूप ही घटना घटती रहे ये भी संभव नही ! इसीलिए सब लोग दुःखी मिलेंगे ! छोटा तो क्या बड़ा क्या ! कोई स्त्री के लिए दुःखी तो कोई स्त्री से दुःखी, कोई धन के लिए दुःखी तो कोई धन से दुःखी, कोई बदली के लिए दुःखी तो कोई बदली से दुःखी…सब चिंता रूपी चिता में झुलसते रहते हैं । फिर थोड़ी वृत्ति में मिलता है..अब दो उंगली देखना है तो दो के बीच अंतर होगा तब तो दिखेगी.. ठीक है न ? ऐसे ही सुख देखना है तो सुख के बीच अंतर आता है दुःख आता है फिर सुख लगता है ! अगर एक रस हो तो सुख भी नही लगेगा ! दो उंगली के बीच अंतर होता है न तब दिखती है ।

तो सुखाकार वृत्ति या दुःखाकार वृत्ति, अनुकूलता, प्रतिकूलता ये वृत्ति हैं ..और वृत्ति के साथ जबतक जुड़े रहेंगे तबतक जन्म मरण की निवृत्ति नही होगी।

और ये अध्यास होता है.. हकीकत में हैं हम कुछ लेकिन अध्यास हो गया ! अन्योन्य अध्यास होता है, संसर्ग अध्यास होता है ..अन्योन्य अध्यास  कैसे ? .. कि जैसे हैं तो गोविंद लेकिन अपने को केशव मान रहा है, हैं तो मोहन अपने को सोहन मान लिया .. सोहन के कपडे पहन लिए “मैं सोहन हूँ”..है मोहन, मान लिया सोहन..ये अन्योन्य अध्यास हो गया। ऐसे ही | है तो वृत्तिओं का अधिष्ठान शुद्ध बुद्ध लेकिन मान लिया अपने को अंतःकरण और शरीर की वृत्तिओं के साथ !

दूसरा होता है संसर्ग अध्यास..जैसे आईने में नगर दिखा ..आईना बड़ा कर दे तो ये पूरा दिखेगा उसमें..हकीकत में आईने में वो है नही लेकिन भास रहा है । ऐसे ही अपने में ये वृत्तिओं का और जगत का कोई गंध मात्र भी नही लेकिन भास रहा है अपने में..कि ये मेरा कर्तव्य है, ये मेरा प्राप्तव्य है ,ये मेरे को पाना है, ये पकड़ना है, ये छोड़ना है , ये सारी मुसीबत दिख रही है ..आईने में कुछ घुसा नही लेकिन फिर भी आईने में दिख रहा है सब । ये वृत्तिओं के कारण आप में कोई गुण नही ,कोई दोष नही ,कोई जन्म नहीं ,कोई मृत्यु नहीं , कोई सुख नहीं , कोई दुःख नहीं ..वो तो सदा शुद्ध , अचिंत्य, चिद्घन स्वरूप है अपना, उसमें आ आ के सब चला जाता है..जैसे कार में आईना लगा होता है ना, तो कार होती है तो उसमें साईड दिखती जाती है फटाफट आ आ के चली जाती है ..कार चलाते हैं न साईड में ग्लास होता है आईना, तो जैसी कार चलती है तो आईने में आजू-बाजू की साईडे दिखती है ..नहीं समझे ? साइडें दिखती है कि नही दिखती ? वो आ-आकर चली जाती हैं | ऐसे ही तुम्हारे अंतःकरण रूपी आईनें में परिस्थितियों की साइडें आती हैं । अब वो ड्राइवर आईने में जो आए उसके पीछे लग जाए तो गाड़ी का क्या हाल होगा ? गाड़ी चल रही है और वो ग्लास में जो दिखे उसको ही पकड़ने लग जाए तो क्या हाल होगा ड्राइवर का ? गाड़ी रमण-भमण हो जाएगी क्या ? ऐसे ही ये ड्राइवर का हाल हो गया , ये गाड़ी रमण-भमण हो जाती है और समझते हैं अपने को सब चतुर आदमी । कोई अपने को मूर्ख स्वीकार नही करेगा। लेकिन बिना मूर्खता के कोई जन्म मरण में जा ही नहीं सकता ! कोई दुःखी हो ही नही सकता ! पहले बेवकूफी होती है तब भय होता है ,पहले बेवकूफी होती है तब दुःख होता है। बेवकूफी क्या है ?..कि अध्यास की ! अन्योन्य अध्यास.. है तो कुछ लेकिन मान लेते हैं कुछ… अपने में नही बैठ पाते ! जो कुछ करके, कहीं जाकर, कुछ पाकर अपने को सुखी करने में लगा है वो बस लगा ही है, उसके सुख का छेड़ा नही आएगा। कश्मीर जाकर सुखी..थक के आ जाएँगे! अच्छा, ज्यादा सुख मिला अच्छा है तो फिर दुबारा जाएगा !  कहीं जाकर सुख मिला तो बार-बार वहाँ जाना पड़ेगा ! जिस समय सुख मिला उस समय की वृत्ति और वातावरण और दुबारा जाएगा तो उस समय की वृत्ति और वातावरण ऐसा नही होगा। तो जैसे कश्मीर से ऊब के गया तो फिर सालभर के बाद दूसरी जगह जाएगा , तीसरी जगह जाएगा ! ऐसे आयुष्य पूरा हो जाएगा लेकिन जाने की आदत नही मिटेगी ! समझ रहे हैं ? जबतक ऐसा बना है तो ये अध्यास हो गया संसर्ग का अध्यास ! उनके साथ जुड़ने का, वृत्ति के साथ ।

जिनको वेदांत के अमृत का अनुभव हो जाता है वे इस भाव से बच जाते हैं । बाकी तो संसार रूपी गगरी की नाई घूमते रहते हैं । वृत्तिओं के अनुकूल सुखी होने में तो पशु-पक्षी जीव-जंतु से लेकर बड़े-बड़े बुद्धिमान दिखनेवाले भोगी जुड़े है।

सड़क पर बंगला है , कभी बरात जाएगी कभी शमशान यात्रा भी जाएगी, कभी ऑटो जाएगी तो कभी कार जाएगी, कभी घोड़ा गाड़ी जाएगी तो कभी साइकल वाले जाएँगे । अब सड़क पर बंगला जो है ..अपने घर में न बैठकर बारात आए तो बारातियों के साथ हो गए, शमशान यात्रा वाले आए तो उसके साथ हो गए, साइकिल वाले आये तो साइकल वालों के साथ हो गए, घोड़े सवार आए तो उसके साथ सड़क से जो गुजरे उसके साथ जुड़ता गया तो अपने घर में कब बैठेगा ? फिर उसका घर होते हुए भी उसका नही है ! उसको तो फुर्सत ही नहीं मिलेगी ! फुर्सत नहीं मिलेगी उसको तो, धीरे धीरे भूल  ही जाएगा कि ये मेरा घर है ! जब सड़क से गुजरनेवाले ट्रैफिक के साथ ही होता रहेगा तो थोड़े ही दिन में भूल जाएगा कि यहाँ मेरा घर था ! वो तो ट्रैफिक हो जाएगा | ऐसे ही अपन लोग ट्रैफिक हो गए | इसीलिए जन्मते मरते रहते हैं,घूमते रहते हैं । अपने घर में नहीं बैठते, अपने स्वरूप में नहीं बैठते!

तो,बोले-ज्ञानी को दुःख होता है?..ज्ञानी बोलता है-दुःख आता है तो आओ, सुख आता है तो आओ, अपमान आता है तो आओ,मान आता है तो आओ..नर्तकी कैसा भी नृत्य करती है, दर्शक देखके मजा ले..ऐसे ही चित्त की वृत्तिओं में चाहे कुछ हो ,चाहे कुछ आए, उसके साथ अपना सबंध न जोड़ें तो वृत्तिओं को सत्ता नही मिलेगी तो वो आपको दबाएगी नहीं |

लाइन में कितनी भी बढ़िया केबल हो लेकिन बीच में से फ्यूज निकाल दो तो क्या आपको तकलीफ करेगी क्या ? तो पावरहाउस से कनेक्ट जो लाइन है  वही तो शॉक लगा सकता है । ऐसे ही अपने मैं को वृत्तिओं से मिलाते है तभी दुःख होता है, तभी वासना प्रबल हो जाती है। और वासना अंतःकरण में होती है और जुड़ जाता है मैं-में। वासना-अवासना, अनुकूलता- प्रतिकूलता ये सारा का सारा खेल अंतःकरण में होता है। तो जो वासना के बहाव में बहते हैं उनकी  अपेक्षा जो धरम के अनुकूल रहते है उनकी वासना नियंत्रित रहती है। लेकिन वो भी धार्मिक आदमी भी पूर्ण संतुष्ट नही मिलेंगे, पूर्ण स्वतंत्र नहीं मिलेंगे, पूर्ण संतुष्ट नही मिलेंगे। तो धरम से वृत्तियाँ नियंत्रित होती है , अच्छा करना और बुरे से बचने के लिए धरम है । उपासना से वृत्ति रसमय होती है और योग से वृत्ति एकाग्र होती है, विक्षेप बंद हो जाता है। लेकिन फिर भी वृत्तिओं के साथ का सबंध बना रहता है। इसीलिए कई ऐसे योगी रोते मिलेंगे कि पहले समाधि लगती थी अब नही लगती, पहले भक्ति बहुत होती थी अब नही होती। पहले धन बहुत था, भोग बहुत था अब नही है अथवा पहले कुछ नही था अभी इतना सारा है। तो सब ऐसे ही झुलसते रहते है। पहले नही था अभी है तो अहंकार में आए और पहले था अब नही है तो विषाद में आए। ठीक है ? पहले समाधि नही थी अब है तो अहं आ गया, पहले समाधि थी और अब नही है तो फिर विषाद हो गया !  लेकिन जो समाधि के पहले था,समाधि के बाद भी है, समाधि के वक्त भीहै वो ज्यों का त्यों है! उसको “मैं” रूप में जान लेना ये वेदांत का लक्ष्य है !

Sindhi

लेकिन जब गाते थे तब भी जो था , पेटी कमजोर हो गई तब भी जो है उसमें कोई फर्क नही पड़ा ! जिसमें कोई फर्क नही पड़ा वो मैं हूँ । और जिसमें फर्क पड़ा वो मैं नहीं ! जिसमें फर्क पड़ा वो मैं नही..वृत्ति में फर्क पड़ा, शरीर में फर्क पड़ा, सबंधों में फर्क पड़ा, मान्यताओं में फर्क पड़ा, लेकिन सब से परे जो है जिसमें कोई फर्क नही पड़ता वो चैतन्यघन आत्मा है। उस आत्मा को मैं मानना समझो पूरे खजाने को प्राप्त करना है। और उस आत्मा को मैं न मानकर ..शरीर को मैं मानना, जाती पाती को मैं मानना समझो कि बस चिता में अपनेको फेंकना है ! चिता तो मुर्दे को जलाती है, चिंता जीते को जलाती है ! और चिंता होती है वृत्तिओं के कारण ! गहरी नींद में चले गए , वृत्ति दब गई तो कोई चिंता नही, समाधि में वृत्ति निरुद्ध हो गई तो कोई चिंता नही, भजन में भगवताकार वृत्ति हो गई तो कोई चिंता नहीं लेकिन वो वृत्ति समाधि से, मूर्छा से, भगवद भाव से वृत्ति उतर के आती है..लेकिन अपना स्वरूप उतरके और चढ़के नही आता । जो उतरता चढ़ता नही है उसमें बैठने का अभ्यास करो एकांत में! एकांत में वो उरतने चढ़ने से परे है उसका अभ्यास हो गया फिर व्यवहार में भी चलता रहेगा ! वृत्तिओं को देखो, विचारों को देखो ..देखोगे तो सबंध विच्छेद हो जाएगा । इतना योग से,तप से, यज्ञ से, होम से, दान से उतना शीघ्र फायदा नही होता जितना इनसे सबंध विच्छेद करने से !

यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।

यज्ञ, दान, तप करनेसे बुद्धि पवित्र होती है , लाभ तो होता है लेकिन ये तत्वज्ञान ..तत्वज्ञान तो महाराज बुद्धि पवित्र होती है तो भी होता है और गुरु का उपदेश सुनकर इनके साथ के सबंध को कट आउट कर दे तो भी लाभ हो जाता है । फिर आसक्ति नहीं रहेगी ,जब कट आउट हो गया तो फिर किसीकी आसक्ति नहीं रहेगी। न धन की आसक्ति रहेगी , न भोग की आसक्ति रहेगी न जोग की रहेगी न त्याग की रहेगी..एकदम स्वतंत्र, परम् स्वतंत्र !

फिर ये आत्मा ब्रम्हरूप है इस बात को जान लें । ये कैसे ? ..कि जो देश के परिच्छेद से रहित, काल के परिच्छेद से रहित, और वस्तु के परिच्छेद से रहित है ..देश से, काल से और वस्तु के परिच्छेद से जो रहित है उसको ब्रम्ह बोलते है, आत्मा बोलते है, परमात्मा बोलते है..देश के काल के और वस्तु के परिच्छेद से  रहित है..देश कितना भी हो लेकिन उसकी भी सीमा रहेगी परिच्छेद रहेगा ! इतना इतना इतना इतना लेकिन आखिर में पॉइंट आ जाएगी । काल..साल , दो साल, दस साल, सौ साल, हजार साल, लाख साल..अरे करोड़ साल ..उसके पहले और उसके बाद सीमा हो गई क्या ? वस्तु… बड़ा बड़ा बड़ा बड़ा इतना बड़ा कि इतना बड़ा इतना बड़ा लेकिन फिर भी बाउंडरी ! जहाँ कोई बाउंडरी नही देश की, काल की, वस्तु की उस वस्तु का नाम ब्रम्ह है । तो हकीकत में ये आत्मा ब्रह्म है, तुम ब्रह्म हो..वृत्तिओं से तुम्हारा कोई सबंध नही है।शरीर के मरने से तुम नही मरते । वृत्तियों  के मरने से तुम नही मरते । वृत्तियों के मरने से अगर तुम मरते तो वृत्तियाँ कईं मर गई ! मर गई ना ! दुःखाकार आई वृत्ति, सुखाकार आई , चिंताकार वृत्ति आई मर गई ! चली गई ! तुम तो नही मरे ! ऐसे ही वृत्तियाँ जिस अंतःकरण में आई ऐसे अंतःकरण भी, ऐसे शरीर भी बदलते गए , अंतःकरण के भाव भी बदलते गए लेकिन तुम नही बदले ! ठीक है क्या ? तो जो नही बदलता है उसमें आ जाओ ! नहीं तो राम राम राम राम रटने से सत्वगुण बढ़ता है, सत्वगुण बढ़ता है तो हृदय का संकल्प सफल होता है । हृदय का संकल्प सफल हुआ..महाराज ! सिद्ध हो गए..लोगों ने पूजा..लेकिन जो संकल्प सफल होता है वो कभी कभी संकल्प असफल भी होता है । संकल्प सफल होने की भी सीमा होती है..हुआ है न..करने से हुआ है न ! करने से हुआ है करना बंद कर दो तो होना बंद हो जाएगा ! करना बंद कर दो तो होना बंद हो जाएगा अभी धंधा किया,कमाया है  तो कमाने के बल से, धन के बल से खर्चा कर सकते है । आवक बंद हो जाए और खर्च चालू रखो तो कितना टिकेगा ? ऐसे ही भजन के बल से , जप के बल से , योग के बल से, ये कर दिया बभूत अभिमंत्रित करके मुर्दे जिंदे कर दिए ..लेकिन जो देश से, काल से, वस्तु के परिच्छेद से रहित है उस तत्व का बोध नही हुआ तो इस अनंत काल की धारा में सौ , दो सौ मिट्टी के पुतले , हजार,दस लाख मिट्टी के पुतले जिंदे हो गए तो क्या ? ऐसे ही सब मिट्टी के पुतले करोड़ों जिंदे हो गए ! मिट्टी में से ही तो बने हैं सब ! अभी भी तो मिट्टी के पुतले साढ़े तीन सौ करोड़ है पृथ्वी पे!

तो अपने स्वरूप को देश से, काल से, वस्तु के परिच्छेद से रहित ऐसा जान लिया तो मुर्दे को जिंदा करने का सामर्थ्य योग में है अच्छा है ..भक्ति की भावना से सूखे पेड़ हरे हो जाते है ये अच्छी भावना है अच्छा है सुंदर है..लेकिन भक्त को , योगी को अथवा साधक को देशातीत , कालातीत , गुणातीत अवस्था में जाना चाहिए । इसीलिए अर्जुन को श्रीकृष्ण ने कहा

त्रयगुणः विषयः वेदः

जो वेद है बहुत पवित्र है , वेद में जो ज्ञान है अद्भुत ज्ञान है । सारे विश्व में ऊँचे से ऊँचा ज्ञान वेद का वेदांत का..जहाँ सारे ज्ञानों का समापन हो जाता है और सारे ज्ञान जहाँ से निकलते है और फिर भी एक है उस तत्व का बोध कराना वेदांत है ! तो ये वेद भी माया में है , तीन गुणों में है ।

त्रयगुणः विषयः वेदः | निस्त्रयगुणा भवर्जूनः ||

वेद का ज्ञान भी गुणों में आयेंगे, सत्वगुण में आयेंगे, रजोगुण में आयेंगे, तब सीखेंगे, करेंगे, संभालेंगे , रखेंगे..लेकिन ये गुण भी अंतःकरण में आते है..अंतःकरण से परे ! ऐसे देखा जाए तो बहुत कठिन है और वैसे देखा जाए तो बहुत सरल ! जहाँ से खोज होती है शुरू वहीं वो है ! जहाँ से तुम चलते हो वहाँ मंजिल है | बहुत सरल है ! और चलते चलते दूर निकल जाते हो तो बड़ा कठिन लगता है और फिर मुड़ के देखते हो तो दूर जाने पर भी वहीं मिलता है क्योंकि उसकी तो कोई सीमा नहीं .. देश, काल, वस्तु के परिच्छेद से रहित है ! जहाँ मुड़त वहीं ठिकाना मिलता है। इसीलिए करोड़ों जन्म से वृत्तियों के आधीन चलते आए हैं, बहिर्मुख होते आए हैं ! लेकिन जब वृत्ति से निवृत्त होने की टेक्नीक मिल जाती है तो लगता है कि यहीं है !

कीड़ी अपने घर से निकली और चलती ही रही ..अब उसको जमीन देखना हो तो कहाँ मिलेगी ? तरंग सागर से उठी और भागती ही रही ,खूब भागी ..150 माइल की स्पीड से तूफान चला और तरंग भागी बड़ी-बड़ी ..भागी तो बहुत लेकिन उसको पानी से मिलना है तो ? जहाँ से उठी थी उसी पर दौड़ रही है और अभी वही रूप है !

ऐसे ही अपनी वृत्ति करोड़ों वर्षों से संसार सागर में भटक रही है, दुःख भोग रहे हैं | ये हो जाए, वो हो जाए, वो हो जाए, समझ रहे हैं सब ? ये दिमाग में बिठाने की बात है | कौन क्या कर रहे है, क्या देख रहे है उसको मत देखो..क्या हमको करना है वो देखो ! तो ये वृत्ति हजारों, लाखों, करोड़ों वर्ष से..कईं जन्म में ..कीड़ा बन गए तो भी दौड़ा , मकोड़ा बन गया तो भी सुख के लिए दौड़ा , घोडा बन गया तो भी सुख के लिए दौड़ा…फिर भले चाबूक खाए ! मक्खी बन गया तो भी क्या कर रहे है ? वृत्ति के कारण ही दौड़ रहे है क्या ? तो दौड़  तो करोड़ों जन्म से चालू है ..लेकिन उस देश से, काल से, वस्तु के परिच्छेद से जो रहित है, जिसकी देश करके , काल करके , वस्तु करके कोई सीमा नही ..वो जो अपना आपा है वो तो जब देखो वही का वही ! तरंग कितना ही दौड़े ..

 

फूँक मारके इच्छा शक्ति से पहुँच जाओ कहीं लोक लोकांतर में..दुःख का अंत नही आएगा , मुसीबतों का अंत नही आएगा। ऐसे भी लोग हैं..संकल्प करें ..विमान में बैठे, जहाँ चाहे वहाँ पहुँच गए ! गन्धर्व लोक ये वो सब ऐसे ही हैं ! फिर भी वो भी दुःखी हैं बेचारे |

Sindhi में है

जैसे स्वप्ने में आप पहुँच जाते हैं ऐसा सुविधा उनके पास ! फिर भी वो वृत्ति के साथ जुड़कर भोग रहे है न ! इसीलिए उनका पतन होता रहता है ।

जैसे अरद के डिब्बे होते हैं ऊपर नीचे चढ़ते रहते हैं..ऐसे ही लोग पुण्य करके गंधर्व लोक में , स्वर्ग लोक में जाते हैं, भोग भोगते हैं फिर पुण्य खत्म होता है फिर गिरते हैं, माता के गर्भ में आते हैं , लटकते हैं ऊँधे , पिता की शिश्ना से पसार होते हैं , माता के एम सी का ब्लड पीकर शरीर बनाते हैं फिर दूध पीते हैं , थपेड़े खाते हैं, फिर पढ़ने जाते हैं , फिर नपास पास होते हैं, फिर पास होते हैं, फिर परीक्षा में होते हैं, फिर धंधा करते है, धंधा सीखते है, फिर धंधे की चिंता रखते हैं , फिर पत्नी की चिंता , बच्चों की चिंता, पत्नी का स्वभाव, बच्चों का स्वभाव , सबकी वृत्तियाँ अलग-अलग होती है..ऐसा करते करते, झुलसते झुलसते

Sindhi

थोड़ा हशश करा अंदर में..हाय रे ..इधर तो हशश करा, बाहर से अहं को संतोष हुआ..फिर शरीर की पीड़ा , हाय रे ! वो झुलसा.. अंत में सब जो बनाया सारी जिंदगी मजूरी किया , मृत्यु का एक झटका लगा सब छोड़के चला गया! और फिर गया भटका !  यही तो कर रहे हैं और क्या कर रहे हैं ?

Sindhi

ये जो वृत्तियों में भर दि सूचनायें उसको ज्ञान समझ बैठे । एम ए पढ़ा हूँ, बी ए पढ़ा हूँ, पी एच डी पढ़ा हूँ ..लेकिन अपना ज्ञान है ? बोले , “हाँ.. मैं फलाना भाई हूँ”…खाक है तेरा अपना ज्ञान | अपना ज्ञान होता तो जीवनभर ये कर कराके मृत्यु के झटके में सब खो नही देता ! अपना ज्ञान है तो एक शरीर तो क्या अनंत अनंत शरीर पैदा हो होके लीन हो जाते हैं |

अनंत ब्रह्मांड पैदा हो होके लीन हो जाते है , फिर भी अपने आप में कोई फर्क नही पड़ता ऐसा अपना आपा है ! अपना ज्ञान हो जाए तो ब्रम्हा ,विष्णु, महेश का पद भी तुमको छोटा लगेगा !

अपना ज्ञान हो जाए तो चन्द्रमा भी अग्नि जैसा लगेगा ..अभी तो शीतल लगता है लेकिन अपने आप की जो शीतलता है उसके आगे चंद्रमा की शीतलता भी अंगारों जैसी ! उसकी शीतलता के लिए तो आँख खोलनी पड़ती है न..अपनी शीतलता के लिए आँख भी खोलने की जरूरत नही पड़ती..चंद्रमा को शीतलता भी अपने चैतन्य वपु से मिलती है ! वो अपना स्वरूप का ज्ञान है।

Sindhi

हर जन्म में होते हैं मगज के टुकड़े..तो अभी ज्ञान से टुकड़े हो जाए तो बस हो गया, फिर टुकड़े होना ही बंद हो जाएगा। ऐसा चीज पा लेना चाहिए कि फिर कुछ न पाना पड़े! ऐसा जान लेना चाहिए कि फिर कुछ जानने की जरूरत नही,जिसको पाकर फिर उससे बड़ा कोई लाभ नही! जिसमे स्थिर होने के बाद बड़े भारी दुःख से भी वो चलित नही होता, फिर हवाएँ उसके अनुरूप हो जाती है । देवी देवता यक्ष गंधर्व किन्नर सब उसीके गीत गाते है । सब सुख के लिए भटक रहे हैं..वो स्वयं सुखस्वरूप होता है ! उसकी एक निगाह मात्र से फिजा में खुशियाँ छा जाती है इतना वो महान हो जाता है ! ऐसा नहीं है कि उसके शब्दों से ही लोगों को सुख मिलता है..शब्दों के पीछे उसकी अपनी स्वानुभूति की किरणें होती है न ! निगाहों के पीछे उसकी अपनी रौनक होती है न !

भांग का ग्लास भर के कान पर लगाया एक मवाली ने..पूछता है कि अरे भांग तुझमें इतना नशा कहाँ से आया ? भांग बोलती है कि मावली मुझमें नशा होता तो ग्लास भी नाचता!  और छानने वाला कपड़ा भी नशे में चूर हो जाता , और जिससे घोटा वो डंडा भी नाचने लगता। मुझमें नशा नही, नशा तो तेरा है , तू ही मेरे को नशा दे रहा है !

एक आदमी

Sindhi

पीठावाला माना दारू जो बेचते थे न उसको  पीठावाला बोलते थे। समझा क्या?

Sindhi

एक दारू का पीठावाला था उसके पास एक पैसा ले गया..कि शराब दे दे। पीठावाला ने देखा कि

एक पैसे में शराब | बोला- “अरे क्यों एक पैसे का खून करता है ?” एक पैसे की हत्या क्यों करता है ? संभाल के रख !

एक पैसे का शराब लेकर एक पैसे का घात क्यों करता है,संभाल के रख जेब में ! बोले नही, घात नही करता एक पैसे की शराब चाहिए।

बोले, एक पैसे की शराब से नशा तो नही चढ़ेगा !

उसने बोला मेरे को नशा थोड़े ही चढ़ाना है, खाली मूछों को लगा दूँगा, लोगों को आएगी गंध, नशा तो हमारा अपना है ! नशे की आँखे बना लूँगा, नशा तो अपना है ! शराब में नशा थोड़े ही है, नशा तो अपना है ! शराब में नशा होता तो बोतल को भी चढ़ता ! शराब में नशा नहीं, नशा अपना है ! अपनी चेतना का नशा है न ! मुर्दे के मुँह में डाल दो शराब तो क्या नशा चढ़ेगा ? पुतले के पेट में भर दो शराब तो क्या नशा चढ़ेगा ? शराब को नशा देने वाले भी तो हम हैं ! शराब को बनाने वाले भी तो हम हैं | तू एक पैसे की दे दे हम मूछों को लगा देंगे । बस ! अपना कलेजा क्यों खराब करे ? जब शराबियों की महफ़िल में जाना है तो बोलेंगे हम तो यार पीके आये हैं फूल हैं |

मजा आ गया क्या ? या आपकी वृत्ति को मजा आया ! जय जय ! शराबी की वृत्ति आपको जरा जँच गई तो उसकी वृत्ति आपकी वृत्ति एक हो गई…मजा आया ! तो मजा कहाँ से आया ? मजा आपको अपना आया ! जय जय ! तो तुम जहाँ जहाँ सहमत हो जाते हो वहाँ किरण भेज देते हो और बोलते हो अहाहाहा

Sindhi ये बात में मजा आया

किरण जहाँ से स्फुरित होती है उसमें बैठने की तरकीब नहीं !

Sindhi

पुजारी तो केशुभाई से पगार चाहता है।

पगार तो ट्रस्टीओं की तरफ से मिलता है

Sindhi

 

ईसा, मूसा को मानो ईसा को मानो..अरे ! ईसा क्रॉस पे चढ़ा था, एक लाख आदमी उसको देख रहा था  जिंदा जी ईसा को ..तभी भी उनका वैर, लोभ, क्रोध नही मिटा, दुःख नही मिटा, क्रूरता नही मिटी .. मोह,लोभ नही मिटा तो अभी ईसा को मानके क्या झक मरेगा ? राम जिसकी गोद में खेले है ऐसे कौशल्या और दशरथ को ,कैकई को, मंथरा को …मंथरा ने राम को देखा है, कौशल्या ने गोद में खिलाया है..फिर भी कौशल्या के दुःख का अंत नही दुःखी है..राम बनवास होता है तो दुःख है।दशरथ को काम दुःखी कर रहा है ,कैकेई को क्रोध दुःखी कर रहा है, मंथरा को कपट दुःखी कर रहा है..रामजी के तो दीदार थे ही ! लेकिन श्रीराम तत्व का दीदार नही था ! राम ब्रह्म परमारथ रूपा…

ये नही जानते थे ! कृष्ण को तो कंस ने भी सुना था , कंस का तो भांजा था श्रीकृष्ण। फिर भी शोषण वृत्ति नही गई कंस की ! कृष्ण के प्रागट्य के बाद भी कंस टैक्स डालने में तो लगा ही था ! ये वृत्तियों के ..वृत्तियों से जो चीज मिलती है उसके अनुरूप वृत्ति बन जाती है तो उसी का लोभ बन जाता है। यश वाले को यश  की भूख बनी रहती है, धन वाले को धन की भूख बनी रहती है, सत्ता वाले को सत्ता की भूख बनी रहती है, और छूट न जाए वो भय भी बना रहता है। और नही मिली तो आकांक्षा भी बनी रहती है। तो लोभ,भय और आकांक्षा जिसके पास मौजूद है वो निर्दुख कैसे ? निश्चिंत कैसे ? निर्द्वंद्व कैसे? मौत जिसके सिर पर नाँच रही है ..वृत्तियों का मजा लेगा तो शरीर में बैठ के रहेगा ..शरीर कोई अमर नही है! वृत्तियों का मजा लेना है तो इंद्रियों से ..वृत्ति इन्द्रियों के द्वारा बाहर आएगी और पकड़ेगी तब..तो पकड़ने का साधन तो सदा रहेगा नही ! सत्ता को पकड़े रखो

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छुटा है, छुटे हुए भी पकड़ा है । सब छोड़ दिया फिर भी सबको सत्ता तुमही दे रहे हो। सबको पकड़ा है फिर भी अंदर से किसी में आसक्ति नही..ऐसा दिव्य ज्ञान पा लो ! निश्चिंत, निर्द्वंद्व , निरालंब …

अष्टावक्र ने कहा –

निरालंब शोभते बुद्ध…

बुद्ध पुरुष जो है वो  निरालंब है, उसको कोई अवलंबन नहीं । इसलिए वो शोभता है। अपनी वृत्ति को अवलंबन चाहिए

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कुछ न करो तो सो जाओ, सोने के लिए भी नींद का अवलंबन चाहिए । मित्र का अवलंबन चाहिए, आइसक्रीम का अवलंबन चाहिए, कुछ न कुछ अवलंबन चाहिए । ज्ञानी होता है उसको कुछ वस्तु के अवलंबन की जरूरत नहीं । निरालंब शोभते बुद्धा…

अष्टावक्र गीता में आता है…बिना अवलंबन के शोभता है , निर्वासनिक,निर्द्वंद्व..और ये कठिन भी नही है , सरल भी नही है ! स्थूल वृत्ति वाले के लिए सरल भी नहीं है। और जिसको सद्गुरु की कृपा मिल रही है और बुद्धिमान है, श्रद्धालू है उसके लिए कठिन भी नहीं !

जैसा वृत्ति बन जाती है उसीके अनुरूप मजा तो आता है ..भजन

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