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सब कामों को छोड़ दो


भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का श्लोक है
विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्प्रहः।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति।।
जो पुरुष संपूर्ण कामनाओं को त्यागकर ममता रहित , अहंकार रहित और स्पृहा रहित होकर विचरता है वही शांति को प्राप्त होता है।


अष्टावक्र जनक को कहते है, श्रीकृष्ण अर्जुन को कह रहे है।अष्टावक्र कहते है – ममता रहित निर्द्वंद्व हो ,
भ्रम भेद सारे दे हटा
मत राग कर मत द्वेष कर
सब दोष मन के दे मिटा
निर्मूल कर दे वासना
निज आत्म का कल्याण कर
भांडा दुई का फोड़ दे
सर्वात्म अनुसंधान कर


दुई के चिंतन से ही राग- द्वेष, भय -शोक, चिंता ,ग्लानी, स्पृहा, ममता, अहंकार ये सब दोष पैदा होते है।अष्टावक्र कहते है भांडा दुई का फोड़ दे , सर्वात्म अनुसंधान कर। जैसे क्षीरसागर में भगवान विष्णु आराम कर रहे है ऐसे ही तू आत्मसगर में विश्रांति को पा!
विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्प्रहः ….कामनाओं को छोड़। ऐसा सुख तो स्वर्ग में नही होता जितना सुख कामना के त्याग से होता है। इतना दुःख तो नरक में भी नही होता जितना कामना वान के ह्रदय में होता है।
विहाय कामान् यः … जो पुरूष संपूर्ण कामनाओं का त्याग कर ममतारहित होता है..विषय भोग की कामना न करें, प्रारब्ध वेग से शरीर का पोषण होता ही जा रहा है।
मिले हुए पदार्थों में ममता न करे क्योंकि बहनेवाले है। बहनेवाले को देखकर बहने का मजा लो और रहनेवाले को देखकर रहने का मजा लो। संसार,सबंध, विषय और भाव सब बहनेवाले है। इनको बहता जानकर तुम तृप्त रहो। और इन सबका जो साक्षी परमात्मा है वह रहनेवाला है। उसके रहने की गरिमा को जानकर तुम वही हो जाओ, तुम बहने का भी मजा लो और रहने का भी मजा लो। बहाव में बहो नही और रहनेवाले को पीठ दो मत।
टूटे-फूटे भाग्य को संत देत है जोड़
संत बेचारा क्या करें
हम ही लेत है मुख मोड़।
टूटे-फूटे भाग्य को संत देत है जोड़,संत बेचारे क्या करें खुद ही लेत है मुख मोड़! हम अपने मुख को न मोड़े। हम अपनी महिमा से अपने मुख को न मोड़े। हमारा कितना भी टूटा-फूटा भाग्य होगा, जुड़ जाएगा। सदियों का अँधेरा जाने में देर नही लगती, सदियों की भटकान …लेकिन मुलाकात के बाद वो कोई महत्व नही रखती। युगों से कई गर्भों में हम भटकते आए है। इस इच्छा और वासना, ममता
और स्पृहा के कारण हे ममता तुझे नमस्कार है, हे अहंकार तुझे अलविदा है, हे कामना तू किनारे हट…जो-जो चित्त में कामना उठती हो उसको बोलो अभी तेरा यहाँ समय नही! हे कामना तूने हमें कई युगों से भटकाया है, हे स्पृहा तूने हमें कई
युगों से भटकाया है, हे ममता तूने कईं जन्मों तक हमें मारा है, हे अहंकार कईं युगों से तू हमें अकेला पछाड़ता आया है!


अब तो हम कृष्ण के वचनों को अपने वचन बना लेंगे। श्रीकृष्ण के वचनों को, श्रीकृष्ण के अनुभव को हम अपना अनुभव मान लेंगे, श्रीकृष्ण के ज्ञान को हम अपना ज्ञान बना लेंगे, श्रीकृष्ण के उपदेश को हम जीवन में ढाल देंगे, अष्टावक्र के आदेश को हम जीवन में ढाल देंगे।
ममता रहित निर्द्वंद्व हो ,
भ्रम भेद सारे दे हटा
मत राग कर मत द्वेष कर
सब दोष मन के दे मिटा
निर्मूल कर दे वासना
निज आत्म का कल्याण कर
भांडा दुई का फोड़ दे
सर्वात्म अनुसंधान कर…


ए मेरे मन तू सर्वात्म अनुसंधान कर,द्वैत भावनाओं को अलविदा कर,ममता और स्पृहा को अलविदा कर मेरे मन ! महात्मा लोग कहते है-हे ममता और अहंता किसे कहा जाता है? इच्छा किसे कहा जाता है? मुझे कुछ मिले ये इच्छा है, मैं कुछ करके, कुछ पाकर सुखी होऊँ, कुछ देखकर सुखी होऊँ ये इच्छाएँ है और इन इच्छाओं से हम युगों तक भटकते आए है।लवलेश भी सुख हमें मिला नही,टिका नही। यदि वो सुख हमें मिलता और टिकता तो अभी गोदाम भर जाते। लवलेश का मतकब है कि सुई की नोक पर.. गैलन के गैलन पानी डालो तुम, टैंकर के टैंकर खाली कर दो..सुई की नोक पर जितना पानी टिक जाए उतना भी यदि हमारा सुख टिकता आता तो दिन में ऐसा सुख कईं बार लिया और एक जनम में ही लवलेश-लवलेश लेते-लेते अभी हमारे पास सुख का गोदाम होता। लेकिन कामनाएँ करने से और संसार के सुखों को भोगने से वो सुख टिके नही, आजतक हम वही के वही रहे। इसीलिए श्रीकृष्ण कहते है …
विहाय कामान् यः सर्वान् …
जिसने सर्व कामनाओं को छोड़ दिया है,
पुमांश्चरति निःस्प्रहः


पुमां माना पुरुषार्थ करने की जिसमें हिम्मत हो। भोग भोगने की हिम्मत हो और छोड़ दिया हो , बदला लेने की ताकत हो शत्रु से लेकिन क्षमा कर दी हो, वो पुमां है!
इन्द्रियों के विषय भोगने की शक्ति हो लेकिन पुरुषार्थ करके भोग को छोड़कर जो आत्मा के तरफ आता है वो पुमांश्च है!
जो पुरूष संपूर्ण कामनाओं का त्याग कर ममता रहित, अहंकार रहित होता है …किसीने पाँच रुपए दिए ,मेरे पास बने रहे ये कामना है, इन पाँच रुपयों से मेरे को सुख मिले ये स्पृहा है, ये पाँच रुपए मेरे है ये अहंकार है! ऐसे ही ये कर्म मेरे है, ये पुत्र मेरे है, ये जात- पात मेरे है, ये पुण्य -पाप मेरे है!
कामना छोड़ो लेकिन कामना के बाद स्पृहा को भी छोड़ो। स्पृहा छोड़ दी,कामना छोड़ दी लेकिन फिर ममता बच जाती है। कृष्ण कहते है वो ममता भी तुम्हें दुःख देती है। ममता को छोड़ो..तो मैंने ममता छोड़ दिया ,मैंने कामना छोड़ दिया, मैंने स्पृहा छोड़ दिया , उस छोड़ने का अहंकार रह जाता है। उस अहंकार को भी छोड़ दो, अहंकार दो प्रकार का होता है… एक प्राकृतिक अहंकार होता है और एक अविद्या अंतर्गत अहंकार होता है। प्राकृतिक अहंकार देह में रहता है, देह में मय कराता है.…मैं मनुष्य हूँ ,मुझे भोजन इस प्रकार करना चाहिए।

प्राकृत अहंकार शरीर की संभाल रखवाता है। चलते-चलते ट्रैफिक आई, कोई गाड़ी मोटर आई तो वो बचाता है शरीर को,भूख लगी तो अन्न जल की जगह पर पहुँचाता है, थकान आई तो बिस्तर पर ले जाता है, उबान आई तो मनोरंजन की तरफ ले जाता है। ये प्राकृतिक अहंकार इतना दुःखदाई नही होता है जितना अविद्या का बेटा अहंकार दुःख देता है। अविद्या का बेटा जो अहंकार है वो दुःख देता है…अविद्यमान पदार्थों में अहं करना …ये मकान मेरा है, ये इतना धन मेरा है, इतनी भूमी मेरी है, इतने मित्र मेरे है…ये मकान, ये भवन,ये भूमी,ये मित्र मेरे है ऐसा कहकर कईं लोग चले गए, ये जमीन मेरी है ऐसा कहकर इस जमीन पर से हजारों लोग गुजर गए होंगे जहाँ हम बैठे है। ये जगह हमारी है ऐसा कहकर हजारों लोग चले गए होंगे, ये मकान हमारा है ऐसा कहकर हजारों लोग चले गए होंगे और मकान भी हजारों बार गिर पड़े होंगे।ये अविद्यमान पदार्थों को अपना मानने का जो अहंकार है अप्राकृतिक है। प्राकृतिक अहंकार शरीर की परिछिन्नता तक रहता है और अप्राकृतिक अहंकार अंतःकरण की अशुद्धि तक रहता है। अंतःकरण अशुद्ध होता है तो अप्राकृतिक अहंकार होता है। ज्यों-ज्यों अंतःकरण शुद्ध होता चला जाता है त्यों-त्यों अप्राकृतिक अहंकार विलय होता जाता है।


पहले बोलते थे कि ‘मकान मेरा है’, अब बोलते है कि भगवान का है! पहले बोलते थे ‘ये जमीन -जागीर,रुपए हमारे है’, अब बोलते है ‘सब परमात्मा की लीला है!’
ज्यों-ज्यों अंतःकरण शुद्ध होता है त्यों-त्यों अप्राकृतिक अहंकार गलता जाता है। लेकिन अंत में प्राकृतिक अहंकार भी दुःख देता है।
‘ये भगवान को सौंप दिया, ये भगवान का, ये भगवान का, मैं भगवान का भक्त हूँ ‘ ये अप्राकृतिक अहंकार है, अच्छा है..लेकिन अंत में “मैं भगवान का भक्त हूँ” – भगवान को अपनेसे अलग मानने का अहंकार बचा रहता है!


भगवान से अपने को अलग रखने का जो अहं है वो तो भक्त जीवन में, साधक और जिज्ञासू के जीवन में भी रहता है। वो इतना दुःख नही देता फिर भी वो अहंकार अप्राकृतिक अहंकार को कभी ला सकता है! वो अहंकार अविद्या के अहंकार को ला सकता है!
जैसे गरुड़ भगवान की सेवा में थे..सबकुछ भगवान का है फिर भी भगवान नागपाश में बंध गए। गरुड़ को नारदजी ने बुलाया।गरुड़ ने नागों को स्वाहा किया और मन में अहंकार आ गया कि “मैं न होता तो ठाकुरजी का क्या हाल होता” …अशांत हो गए…शिवजी के पास गए और शिवजी ने काकभूषण के पास भेजा और वहाँ तत्वज्ञान की कथा सुनी तब उन्हें शांति प्राप्त हुई।


जैसे जय-विजय भगवान विष्णु के पार्षद थे, प्राकृतिक अहंकार था-भूमि,भवन, मकान हमारा नही लेकिन भगवान हमारे है और हम उनके पार्षद है! एक बार सनकादि ऋषि वैकुंठ जा रहे थे ,अंदर प्रवेश न दिया, उनका अपमान कर दिया, शापित हुए और तीन जन्म लेने पड़े! इसीलिए श्रीकृष्ण ने कहा-
विहाय कामान् यः सर्वान्
सब कामनाओं को छोड़ो..एक-दो कामना को नही! भोग भोगने की कामना को तो छोड़ो लेकिन त्याग होने का अहंकार भी छोड़ो! प्राकृतिक अहंकार भी छोड़ो और
अप्राकृतिक अहंकार छोड़ो। जो दोनों का त्याग करता है वो – शांति निर्वाणं पदि गच्छयती… वो शांति पाता है और निर्वाण को पाता है।
जन्म का हेतू वासना है , जन्म का हेतू स्पृहा है, जन्म का हेतू ममता है, जन्म का हेतू अहंकार है। इन चार को यदि छोड़ दिया तो फिर जीते जी वो आदमी मुक्त हो जाता है!


योगवसिष्ठ में वसिष्ठ महराज कहते है रामजी को कि – मनु महाराज ईश्वाकु राजा को उपदेश है- “हे रामजी”…मनु महाराज ने ईश्वाकु राजा को कहा कि -“तू इच्छाओं का त्याग कर,अपने सत्ता समान में रह। हे राजन जो सत्ता समान में रहता है वो ज्ञानवान वो जिस भूमि पर पैर रखता है.. जिस ईंट पर , वो ईंट पूजने के काबिल हो जाती है। वह ज्ञानवान जिसपर दृष्टि डालता है वह व्यक्ति भी पवित्र होने लगता है।वह ज्ञानवान जिस वस्तू को छूता है वह वस्तू भी पवित्र हो जाती है।वह ज्ञानवान जिस वाणी से बोलता है वह जिव्हा भी पवित्र हो जाती है” ये बात नानक भी कहते है…प्रभजी बसें साधजी रसना!…
मन मेरो पंछी भयो उड़न लाग्यो आकाश
स्वर्गलोक खाली पड्यो साहिब संतन के पास!
साहिब केवल संतों के पास ही है ऐसी बात नही है, जरा समझ लेना…साहिब तो सब जगह है लेकिन जहाँ प्रगट होता है वहाँ उसकी महिमा है! कबीर इसी बात को अपनी महिमा में कहते है-
सब घट मेरा साईयाँ
खाली घट न कोई
बलिहारी वा घट की
जा घट प्रगट होई!


अहंता, वासना, स्पृहा से रहित जो होता है वो महात्मा बनता है । व्यवहार में वो महात्मा है और तत्व से वो परमात्मा है। जिसमें ममता, स्पृहा ,वासना, अहंकार नही है वह महात्मा है..महान आत्मा है।ऐसे तो खटमल में भी आत्मा है ,कीट-पतंग और गधे कुत्ते चूहे बिल्लों में भी आत्मा ही तो है, चेतना तो है लेकिन वो बेचारे मूढ योनी को प्राप्त है। मनुष्य की योनी मूढ़ता से पार होने के लिए है।मूढ़ उसे नहीँ कहा जाता है जिसको कुछ ज्ञान न हो… पत्थर को हम मूढ़ नही कहते है , चट्टान को हम मूढ़ नही कहते है..मूढ़ उसे कहते है कि कुछ तो जानता है और कुछ नही जानता है, जो जानना चाहिए वो नही जानता और वो जो नही जानना चाहिए उसी को सच्चा मानता है उसको मूढ़ कहा जाता है।सत्य को सत्य नही जानता और मिथ्या को सत्य समझता है उसको मूढ़ कहते है। श्रीकृष्ण ने कहा-
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः।।15.10।।


दिल लगाने से काम नही चलता, संसार में ऐसी कोई वस्तू नही जिससे तुम दिल लगाओ और सदा सुखी रहो , संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नही जिससे तुम दिल लगाओ और सदा सुखी रहो, संसार में ऐसी कोई अवस्था ही नही जिससे तुम दिल लगाओ और सदा सुखी रहो। दिल लगाने से दिल रहता नही,पदार्थ रहते नही। समुद्र की लहरियाँ उठती है न तो किनारे टिकते नही,ऐसेही समय की लहरियाँ आती है न तो फिर कल्पनाएँ टिकती नही है।


मथुरा में एक वेश्या थी।रूप,लावण्य,सौंदर्य से इतनी वो बढ़ी चढ़ी थी कि ईसा के जमाने में वेश्या थी मेगानीलीन उसकी खबरें वो देती थी। बड़े-बड़े राजे सम्राट उस
के द्वार से कभी वापस आ जाते थे। आजसे ढाई हजार वर्ष पूर्व की बात है- सम्राट अशोक का जो गुरु हुआ बाद में वह फकीर जा रहा था,वह भिक्षुक जा रहा था। भिक्षुक का रूप,सौन्दर्य देखकर वेश्या ठगी सी रह गई। जितना तेजी से उतरना चाहिए ,जितना तेजी से उतर सकती थी उतना वो तेजी से अपने महल से उतरी और भिक्षुक को बुलाया कि -“हे भिक्षुक, हे भंते! आओ जरा इधर देखो!” भिक्षुक सड़क से जा रहा था रास्ते से…आए,भिक्षा पात्र लंबा किया। वो वेश्या कहती है कि “मैं, मेरा रूप,लावण्य, सौंदर्य और ये सब धन, दौलत ,गहने, हीरे, जवाहरात सबके सब तुमको समर्पित है! मुझे तुम अपनी बना लो! तुम मेरे पास ही रहो। मेरे पास ही आ जाओ, मेरे ही हो जाओ!” भिक्षुक ने सिर उठाकर निहारा पैर से चेहरे तक, फिर भिक्षुक चलते-चलते कह गया कि “मैं आऊँगा जरूर लेकिन अभी समय नही है।”


वेश्या चिल्लाई “कब आओगे फिर? प्राणप्रिय !कैसे जाते हो मेरे को छोड़कर?”…
“आऊँगा जरूर लेकिन अभी समय नही है!”…चले गए! दिन गुजरे , रात गुजरी, सुबह गुजरी, श्याम गुजरी , सप्ताह गुजरे, महीने गुजरे, वर्ष गुजर गए बात को …ऐसी घड़ियाँ आई, ऐसे दिन आए -यमुना के किनारे पर वही वेश्या एक भिखारण के वेष में ,बुढिया हुई है, दाँत टूट गए हैं , आँखे अंदर पड़ गई हैं, धन -माल मिलकत तो छूट गया लेकिन अब शरीर भी साथ नही देता है। शरीर में घाँव लगे है उसे कोई मलम लगाने वाला नही मिला। शरीर पुराने फ़टे बर्तनों जैसा,नस- नाड़ियाँ हो गई है ,वही मल-मूत्र त्याग करती, मक्खियाँ भन-भनाती हुई , शरीर से बदबू आ रही है
पसार होते तो मुँह घुमा लेते, नाक सिकुड़ लेते।
भिक्षुक आया घूमता-घामता उस जगह पर , बैठा उसके नजीक , उसके घाँव साफ कर रहा है, मलम लगा रहा है। उसमें थोड़ी चेतना आई ,आँख उठाकर देखा । वो वेश्या कहती है “भिक्षुक! अब तुम आए हो?इस समय तुम मेरे पास आए हो? जब मेरे पास सौंदर्य था, रूप था,लावण्य था , धन था , ओज था , बड़े-बड़े सम्राट मेरे पास चापलूसी करते थे, मेरी एक नजर की भीख माँगते थे, मेरी एक मुस्कान की भीख माँगते थे। उस समय मैंने तुमको सर्वस्व सौंपने का कहा था और तुमने कहा -अभी नही समा होगा तभी आऊँगा.. अभी आए हो?”


भिक्षुक कहता है कि – “हे देवी! अभी हमारे आने का समय है। अभी ही तुझे ज्ञान और वैराग्य का पता चलेगा कि कितना इसका मूल्य है। वासनाओं से जीवन जीने का कितना दुष्परिणाम आता है वो अभी तू प्रत्यक्ष देख रही है! स्पृहाएँ कितना पतन करती है वो तू प्रत्यक्ष महसूस करती है। बाहर के सहारे तेरा कबतक सहारा करते है इसका तुझे प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है। अभी हमारे जैसों के आने का समय हुआ है! लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि तू अब समझ न पाएगी! दिन बीत गए ! मैं ने तुझे कहा था मैं आऊँगा जरूर! तू उसी मद में थी, उसी रूप में थी, उसी लावण्य में थी उसी रंग और उसी चमड़े को संभालने में थी, अपने को टाटाई में दिखाने में थी। उस समय मैं आता तो मेरा भी पतन होता और तेरा तो हो ही गया। हमारे आने का यही समय है!”
वही भिक्षुक बाद में सम्राट अशोक के गुरु हुए।

अपनी पकड़ ही दुःख देती है


जैसे एक आदमी स्वप्न देखता है तो उसके स्वप्ने में दूसरा आदमी प्रविष्ट नही होता है।उसके स्वप्ने में दूसरा आदमी तब प्रविष्ट होता है जब दोनों के सुने हुए संस्कार एक जैसे हो। ठीक,मूर्ख आदमियों के साथ हम लोग जीते है, संसार के दल-दल में फँसे हुए पैसों के गुलाम,इन्द्रियों के गुलाम…लोगों के बीच यदि साधक भी जाता है तो साधक भी सोचता है कि चलो थोड़ी ???      कर ही ले,थोड़ी थप्पी तो बना ही ले !Sindhiतो मोह के दल-दल में आदमी फँस जाता है। कीचड़ में फँसे हुए व्यक्ति के साथ यदि तुम तादात्म्य करते हो तो तुम्हारा …तुम क्या…’ये डूबे हुए है,अपने नही डूबेंगे!’… अपने नही डूबेंगे कहते भी जाते है और डूबते भी जाते है।क्योंकि बुद्धि में एक ऐसा विचित्र भ्रम हो जाता है…ऐसा भ्रम जैसे तैसे साधक को तो नही अर्जुन जैसे को हो गया। अर्जुन को साक्षात्कार नही हुआ और अर्जुन बोलता है कि भगवान तुम्हारे प्रसाद से मैं अब ठीक हो गया हूँ, मैं सब समझ गया हूँ। कृष्ण बोलते है-“अच्छा ठीक है, समझ रहा है तभी भी दुःखी-सुखी होता है, मोह ममता है!” ११वे अध्याय में कहा अर्जुन ने कि मेरे को ज्ञान हो गया है।११वे अध्याय में उसको महसूस हुआ कि मैं सब समझ गया!अब मेरा मोह नष्ट हो गया। फिर होते-होते ७अध्याय और चले। उसको पता ही नही कि साक्षात्कार क्या होता है!तो एक तुष्टि नाम की भूमिका आती है जो जीव का स्वभाव होता है। जीव में थोडासा शांति, थोडासा हर्ष,थोडासा सामर्थ्य आ जाता है तो समझ लेता है कि मैंने बहुत कुछ पा लिया है।जरासा आभास होता है, झलक आती है उसीको लोग साक्षात्कार मान लेते है।बुद्धिव्र्यति-तरिष्यति तदा गतासि निर्वेदंश्रुतव्यस्य  श्रुतव्यस्य च…जब मोह शरीर को बुद्धि पार हो जाएगी तब तुमने सुना हुआ और देखा हुआ उस सबसे तुम्हारा वैराग्य हो जाएगा। इंद्र आकर हाथ जोड़कर खड़ा हो जाए, कुबेर तुम्हारे लिए खजाने की चाबियाँ हाथ में लिए खड़ा हो,ब्रम्हाजी करमण्डल हाथ में लिए खड़ा होके कहे’ चलिए ब्रह्मपुरी का सुख भोगिए’, फिर भी तुम्हारे चित्त में उन पदार्थों का आकर्षण नही होगा तब समझ लेना कि साक्षात्कार हो गया!बच का खेल नही मैदान-ए-महोब्बत…किसी सूफी फकीर का वचन है…बच का खेल नही मैदान-ए-महोब्बतयहाँ जो भी आया सिर पे कफ़न बाँधकर आया!

जीव का स्वभाव है भोग, शिव का स्वभाव भोग नही है। जीव का स्वभाव है भोग,जीव का स्वभाव है वासना,जीव का स्वभाव है सुख के लिए दौड़ना। ब्रह्माजी आएँगे तो सुख देने की तो बात करेंगे न!तो सुख के लिए यदि आप भागते है तो पता चल गया कि सुख का दर्या अभी तुम्हारे हृदय में पूरा उमड़ा नही है!सुख की कमी होगी तभी आप कहीं सुख लेने को जाएँगे। तो सुख लेना जीव का स्वभाव होता है। साक्षात्कार के बाद जीव बाधित हो जाता है,जीव नही रहता है, जीव का जीवपना उड़ जाता है और वो शिवत्व में प्रगट होता है। जैसे कामदेव कितने भी नखरे करने लगा रति के साथ, शिवजी को प्रभावित न कर सका। क्योंकि शिव इतने आत्मरामी है,शिव के अंदर इतना आत्मानंद है कि काम का सुख अति तुच्छ है,अति नीचा है। तो शिव इम्प्रेस नही हुए,शिव प्रभावित नही हुए! योगी लोग,संत लोग जब साधना करते है तो अप्सराएँ आती है, नखरे करती है। तो जो अप्सराओं के नखरों में आक्रांत हो जाते है वे आत्मनिष्ठा नही पा सकते है,वे आत्मा के खजाने को नही पा सकते। इसीलिए साधकों को चेतावनी दी जाती है कि किसी रिद्धि-सिद्धि में ,किसी प्रलोभन में मत फँसना।

आप मन का और इन्द्रियों का थोड़ा संयम करेंगे तो तुम्हारी वाणी में सामर्थ्य आ जाएगा, तुम्हारे संकल्प में बल आ जाएगा, तुम्हारे द्वारा चमत्कार होने लगेंगे। लेकिन चमत्कार होना ये साक्षात्कार नही है। चमत्कार होना शरीर और इंद्रियों के संयम का फल है। साक्षात्कारवाले के द्वारा भी चमत्कार हो जाते है लेकिन साक्षात्कारवाले महापुरुष चमत्कार करते नही है हो जाते है!और हो भी गए तो उनको कोई बड़ी बात नही लगती! जैसे कबीर के द्वारा कुछ हो गया, नानक के द्वारा कुछ हो गया, शंकराचार्य के द्वारा कुछ हो गया,लीलाशाहबापू के द्वारा कुछ हो गया,कोई बड़ी बात नही! हम लोग बड़े प्रभावित हो जाते थे कि बापू ने ऐसा कर दिया,बापू ने ऐसा कर दिया! और होता था कि हम ऐसे कैसे बनेंगे?जैसा बापू में सामर्थ्य है ऐसा हम में कब आएगा? बाद में पता चला कि अरे!ये सामर्थ्य भी इच्छा शक्ति का एक हिस्सा ही है। जो तुम संकल्प करते हो उस संकल्प को तुम डंटे रहो। जो तुम एक विचार करते हो उस विचार को कांटने का विचार न उठने दो तो तुम्हारे विचार में बल आ जाएगा।

तुम्हारा विचार हुआ, अब अमुक आदमी के बारे में तुमने सुना कि फलाना मित्र बीमार है…अब तुम्हारा अंतःकरण शुद्ध है…तुम्हारा अंतःकरण शुद्ध दो किसम से होता है- शरीर को, इंद्रियों को संयत करके तुमने जप,तप,मौन, एकाग्रता की तो तुम्हारा अंतःकरण शुद्ध हुआ। लेकिन ये आखिरी नही है।शुद्ध अंतःकरण अशुद्ध भी हो सकता है। हृदय आपका स्थिर है तो दूसरे की चित्त वृत्तिओं के साथ तादात्म्य हो जाता है। ये कोई बडी बात नही है। अपन लोगों को चमत्कार लगता है। संतों को कोई चमत्कार नही लगता है।तुम्हारा बुद्धि स्थिर है तो दूसरे के जो आंदोलन है,दूसरे के जो श्वास है…जैसे तुम्हारे मशीन के नंबर ठीक है तो टी.व्ही. के वेव्ज झेल लेगी, तुम्हारे रेडियो के बैंड अनुकूल है तो वेव्ज का पता चल जाता है और गाना सब सुनाई पड़ता है। ऐसे ही तुम्हारा अंतःकरण यदि शांत होता है,बुद्धि स्थिर होती है तो घटित घटना या घट रही है वो घटना या घटनेवाली घटना का पता चल जाता है। यही कारण है कि वाल्मिकी ऋषि ने सौ साल पहले रामायण रच लिया..कोई राम को या विष्णु को पूछने नही गए थे तुम क्या क्या करोगे! अथवा किसी ज्योतिष का हिसाब लगाने को नही गए थे! उनकी बुद्धि इतनी शुद्ध होती है कि भूत और भावी दोनों कल्पनाओं में नही रहती, वर्तमान में..और ज्ञानी के लिए सदा वर्तमान रहता है इसलिए भूत भविष्य की खबर उनको पड़ जाती है, बुद्धि उनकी विचलित नही होती, चलित नही होती ।

तो एकाग्रता सब तपस्याओं का माय-बाप है।भक्त परंपरा के पूज्यपाद माधवाचार्य भक्त परंपरा में प्रसिद्ध संत हो गए, आचार्य  हो गए। माधवाचार्य ने कहा कि ‘हे प्रभु! हम तेरे प्यार में अब इतने मौन हो गए है कि अब हमसे न यज्ञ होता है , न तीर्थ होता है, न तर्पण होती है, न संध्या होती है, न मृगशाला दिखती है, न माला घूमती है! अब तो हम तेरे प्यार में ही बिक गए!’जब प्रेमा-भक्ति प्रगट होने लगती है और संसार का मोह, कुटुंबियों का,समाज का      मोह तो हट जाता है लेकिन फिर ये कर्मकांड का मोह भी टूट जाता है। कर्मकांड का मोह तबतक है जबतक देह में आत्मबुद्धि है, जबतक संसार में आसक्ति है तबतक कर्मकांड में प्रीति है। संसार की आसक्ति हट जाए, कृष्ण में प्रेम हो जाए… कृष्ण का अर्थ है आत्मा,राम का अर्थ है जो रम रहा है सबमें चैतन्य…उस परमात्मा में यदि प्रेम हो जाए तो फिर कर्मकांड की नीची साधना करने को जी नही करता है।एकाग्रता तो ठीक है लेकिन एकाग्रता का उपयोग यदि संसार है, एकाग्रता का उपयोग यदि भोग है ,तो वह एकाग्रता मार डालती है। एकाग्रता का उपयोग ‘परमात्मा एक है’ उसमें होना चाहिए। रुपया तो है, रुपया कोई पाप नही ,लेकिन रुपयों से भोग भोगना पाप है। सत्ता कोई पाप नही लेकिन सत्ता से अहंकार बढ़ाना पाप है। अकल होना कोई पाप नही लेकिन अकल से दूसरों को गिराना और अपने को अहंकार से पोषित करना ये पाप है। जो कुछ चीजें है..कईं लोग परेशान है और धार्मिक लोग तो दुःखी रहते हैं , मूढ़ लोग पामर लोग परेशान है कोई आश्चर्य नही लेकिन भगत भी परेशान है! भगत को ऐसा है कि मेरा मन शांत हो जाए,मेरी इन्द्रियाँ स्थिर हो जाए ! भैया! मन शांत हो जाएगा, इंद्रियाँ स्थिर हो जाएगी तो राम राम सत ही हो जाएगा! मन और तन का तो स्वभाव है हरकत करना …मन और तन का स्वभाव है,इंद्रियों का स्वभाव है चेष्टा करना ! लेकिन सुयोग्य चेष्टा हो। मन का स्वभाव है संकल्प-विकल्प करना लेकिन संकल्प ऐसे करे कि जिन संकल्पों से इसके बंधन कटे! बुद्धि का स्वभाव है निर्णय-अनिर्णय करना ..लोग बोलते है-मैं शांत हो जाऊँ, पत्थर की तरह मेरा ध्यान लग जाए, समाधि लग जाए। जिनका ध्यान लगता है वे भी परेशान है और जिनका ध्यान नही लगता है वे भी परेशान है!जो ध्यान के रास्ते पर नही आए वो तो परेशान है कि उनकी पल-पल में वृत्तियाँ उद्विग्न होती है, रजो-तमो गुण बढ़ जाता है। जिनको थोड़ा बहुत ध्यान में रुचि है और ध्यान नही लगता वो परेशान है और जिनका थोड़ा बहुत लगता है वे भी परेशान है कि ज्यादा लगे। ज्यादा लगने को वो ऐसा समझते है कि ऐसा ध्यान लगे कि बस अपने बैठे रहे ,कोई पता न चले ! योग में बताया गया है – चित्त की अवस्था होती है..क्षिप्त, विक्षिप्त, मूढ़, निरुद्ध और एकाग्र। तो सदा एकाग्र चित्त नही रह सकता क्योंकि चित्त भी प्रकृति का बना है। सदा निरुद्ध भी नही रह सकता है, सदा मूढ़ भी नही रह सकता है, सदा विक्षिप्त भी नही रह सकता, सदा एकाग्र भी नही रह सकता, और सदा चंचल भी नही रह सकता है.. कितना भी चंचल व्यक्ति रात को देखो शांत हो जाएगा, कितना भी शांत व्यक्ति देखो तो उसे चेष्टा करेगी!  भगवान शंकर जैसी समाधि तो किसीकी लगी नही!  फिर भी शंकर उठते है तो डमरू लेके नाँचते है। इतने दिन जो बैठे थे तो नही हिले-चिले थे वो सब कसर निकाल देते है!इतने दिन समाधि में थे नही हिले-जुले थे तो डमरू लेके नाँचे और सब बैठने के दिन बीत गए उनकी कसर निकाल ली! तो शरीर,मन और संसार ये सब चीजें बदलने वाली है, एक जैसी नही रहेगी।

तो जो-जो आदमी ध्यान में, समाधि में एक जैसा रहना चाहता है अथवा जो दुःख में या सुख में पकड़ जिसकी है ..तो दुःख में तो पकड़ ज्यादा नही होती सुख में पकड़ होती है। इसीलिए पकड़ होती है कि बुद्धि का मोह नही गया। तो सुख में यदि पकड़ है, धन में यदि पकड़ है, स्वर्ग में यदि पकड़ है, तो समझो कि बुद्धि का मोह चालू है। ज्ञानी की पकड़ कहीं नही होती इसलिए भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में कृष्ण कहते है- यदाते मोहकलिल बुद्धिव्यतिरिष्यति…मोहकलिल दलदल हैं। दलदल में आदमी थोडासा फँसता है, फिर थोड़ा,-थोड़ा-थोड़ा करते-करते पूरा नाश हो जाता है। पित्वा मोहमय मदिरा संसार भूत्वा उन्मदःतो कहने का तात्पर्य यह है कि दुर्जन तो दुःखी होते ही है लेकिन सज्जन लोग भी परेशान रहते है। एक पिता फर्याद करता है -मैं सवेरे उठता हूँ,मेरे कुटुंब के लोग सवेरे उठते है लेकिन नौ जवान लड़का जो बड़ा है मेरा वो दुष्ट है, वो सवेरे नही उठता है। तो ये मोह है कि मेरा बेटा है इसलिए सवेरे उठे , कईयों के बेटे नही उठते तो दुःख नही होता लेकिन मेरा बेटा है तो मैं जैसा धार्मिक हूँ ऐसा बेटा धार्मिक होना चाहिए। तो अपने बेटे में इतनी ममता होने के कारण ही तो दुःख होता है। तो भगवान के जो प्यारे भक्त है, जो भगवान तत्व कुछ समझ बैठे है उनको कोई  आग्रह नही होता है। वो बड़े बेटे को जल्दी उठाने में प्रयत्न तो करते है लेकिन नही उठता है तो चित्त में विक्षिप्त नही होते। Gujaratiकिसीका विरक्तता का प्रधानता का प्रारब्ध होता है, किसीका धन प्रधान प्रारब्ध होता है, किसीका व्यवहार प्रधान प्रारब्ध होता है, किसीका मौन प्रधान प्रारब्ध होता है। तो ज्ञान होने के बाद कोई ध्यान करता है तो Gujaratiलेकिन धार्मिक लोगों को ये चिंता-परेशानी रहती है कि अरे! शुकदेव जी को तो लंगोटी का पता नही चलता था , अब हमारा ध्यान लगता है तो हमारे को तो ऐसा होता है, शुकदेवजी जैसा ध्यान लगे! लेकिन हजारों वर्ष पहले का मनुष्य, हजारों वर्ष पहले का वातावरण और कईं जन्मों के संस्कार थे..उनका ऐसा हुआ..अब उनको लक्ष्य बनाकर तुम चलते तो जाओगे लेकिन अंदर से विक्षिप्त नही होना …नही होता है तो नही होता है लेकिन चित्त को तुम प्रसाद से पूर्ण रखो, हो गया तो भी स्वप्ना और न हुआ तो भी स्वप्ना! जिस परमात्मा में शुकदेवजी होके चले गए, वसिष्ठ होकर चले गए,राम आकर चले गए वो परमात्मा अभी तुम्हारा आत्मा है! इस प्रकार का ज्ञान जबतक नही होता तबतक मोह नही जाता है। 

गुरु में स्थिति करो


चरणदास गुरुकृपा केणी उलट गई मेरी नैन पुतरिया… गुरु की कृपा हुई मेरे नैन, देखने की दृष्टि बदल गई! तन सुकाय पिंजर किये…तुलसीदास ने कहा…धरे रैन दिन ध्यान। तुलसी मिटे न वासना बिना विचारे ज्ञान ॥तो ज्ञानी गुरु में स्थिती किए बिना , ज्ञानतत्व का विचार किए बिना चाहे सौ साल की समाधि लगा दो…समाधि लगाना अच्छा है, ध्यान करना बहुत अच्छा है बहुत जरूरी है लेकिन ध्यान के साथ अगर स्थिती की तरफ , अविद्या मिटाने की तरफ  दृष्टि महि रही तो वो हाल हो जाएँगे

वसिष्ठ जी बताते हैं कि-एक बहुरूपिया आया राजा दिलीप के पास ..रामजी प्राचीन इतिहास कहता हूँ… इस अयोध्या के प्राचीन काल में तुम्हारे काल के जो दिलीप राजा राज्य करते थे रघुकुल के , दिलीप राजा के पास बहुरूपिया आया। उसने ऐसा रूप बनाया कि दिलीप राजा खुश हो गए,इनाम देना चाहा तो कहने लगा तुम जो देते हो वो इनाम नही जो मुझे चाहिए वो दीजिए….आपकी जो तेज भगनेवाली घोड़ी है न वो मुझे इनाम में दीजिए। अब वो प्यारी घोड़ी थी दिलीप की , दिलीप ने कहा’ये तो नही दूँगा!’ बहुरूपिया ने कहा ‘देखो, फिर मैं दूसरा तुमको एक खेल दिखाता हूँ । तुम मुझे लोहे की संदूक में डाल दो और संदूक को जमीन खोदकर अंदर डाल दो। और मैं समाधि करके बैठूँगा , ६ महीने के बाद तुम जमीन खुदवाना और वो बैग खुदवाना। अगर मैं तुम्हें ६ महीने बिना अन्न जल के एक ही पद्मासन पर बैठा हुआ मिलूँ फिर यो तुम इतना इनाम दे दोगे न? फिर तो घोड़ी दोगे? दिलीप को आश्चर्य हुआ कि ६ महीना बिना अन्न जल और बिना श्वास लिए हुए धरती में गड़ा हुआ आदमी फिर जीवित रहेगा ? बोले- “हाँ!”ऐसा ही किया गया।

६ महीने पूरे हुए। मंत्रीयों ने कहा कि “राजन ! ६ महीने तो हो गए पूरे। उसको निकाला जाए।”बोले-“निकलेंगे..जीवित होगा तो घोड़ी माँगेगा ! वो मुझे देनी नही है ! और मर गया तो फिर से गाड़ना पड़ेगा !अगर मरा मिला तो फिरसे खोद के डालना पड़ेगा! इससे भले रहा!”समय बीतता गया। रघु राजा का राज्य समाप्त हुआ। दूसरे राजाओं का राज्य समाप्त हुआ। रामजी! अब दशरथ नंदन ! अब देखो तुम्हारा राज्य है और वो अब भी वहाँ गड़ा हुआ है। चलो देखते है उसको। खुदवाया..और वो निकाला..तो उसकी जिव्हा तो तालू में थी,प्राण दसवे द्वार चढ़े हुए थे। वसिष्ठ ने सर पे धीरे धीरे थपलियाँ मारी और जीभ नीचे उतारी , तो उसने आँख खोली और पहला उसका वचन था – “लाओ घोड़ी! घोड़ी दे दो, अब तो घोड़ी दे दो! “हे रामजी! वासना लेकर जो बैठा समाधि में, अज्ञान ,अविद्या लेकर…समाधि उठी तो वही अविद्या और वही अज्ञान निकला! गुरुतत्व में स्थिति नही किया न! मैं एकांत में जाकर तप करूँगा…बहुत अच्छी बात है सुंदर बात है लेकिन तप करते हो स्थिती करने के लिए, तप करते हो कुछ बनने के लिए ….कुछ बनने के लिए तप किया तो बिगड़ना भी पड़ेगा! क्योंकि तप का फल जो मिला वो फिर नष्ट हो जाएगा। लेकिन गुरु में स्थिती की तो वो नष्ट होनेवाली चीज नही मिलती! कुर्सी की सत्ता भी नष्ट हो जाती है, शरीर का सौंदर्य भी नष्ट हो जाता है,पति पत्नी का सबंध भी नष्ट हो जाता है,सेठ नौकर का  सबंध भी नष्ट हो जाता है, और तो क्या कहे भैया! अष्ट सिद्धियों का सामर्थ्य भी नष्ट हो जाता है! इसलिए बुद्धिमान हनुमान जी के अष्ट सिद्धियाँ थी उसमे रुके नही, रामजी की शरण गए और रामजी तत्व में उन्होंने स्थिती की और हनुमानजी धन्य-धन्य हो गए! अष्ट सिद्धि नौ निधियों के धनी, संयम की मूर्ति, बुद्धिमानों में अग्र ! फिर भी जबतक श्रीराम तत्व में, गुरुतत्व में स्थिती नही हुई तबतक वो दास है, सेवक है! तो हमारा लक्ष्य ये होना चाहिए -अपना दोष निकालने में तत्पर,दूसरी बात ..अच्छा! दोष निकालने में एक युक्ति और बता देता हूँ..अपना दोष मैं निकाल रहा हूँ ऐसा करके निकालोगे तो बहुत देर लगेगी और मेहनत होगी और फिर खतरा भी होगा।

देखो सत्संग में कितना आसानी से रस्ता मिल जाता है! अनुभव से जो लोग गुजरे है न बड़े-बुजुर्गों का अनुभव बड़ा काम आता है। अपना दोष निकालने को आप निकालोगे तो देर लगेगी ,अपना दोष समझ के निकालोगे तो देर लगेगी और निकलेगा तब भी खतरा हो सकता है और नही निकलेगा तब भी खतरा हो सकता है!  मेरे में फलाना दोष है और मैं निकाल रहा हूँ ..अगर निकालते-निकालते दोष निकल गया तो “मैं इस बात में निर्दोष हूँ”…ये लोग दारू पीते हैं मैंने छोड़ रखा ह! ये लोग बड़े लोभी है मैंने धन को छूना छोड़ दिया है! ये लोग गृहस्थी कीड़े है, ग्रहस्थ में मर रहे हैं!… हमने तो शादी की और घर छोड़ के चले गए सात साल बाद में थोड़ा बहुत संसार में आए अब फिर हम बिल्कुल .…अगर दोष निकल गया काम दोष,क्रोध दोष , लोभ दोष, शराब का दोष, कोई दोष निकल गया अपने पुरुषार्थ से तो “मैं इस बात में निर्दोष हूँ ” ऐसे लोग मिलेंगे तो अंदर से अहं स्फुरेगा कि ये लोग तो पी रहे है मैंने छोड़ दिया और वो दोष निकालने में महनत होगी। दोष निकालते तभी भी महनत होगी और निकला तभी भी खतरा होगा अहं का! तो महाराज क्या करे दोष पड़ा रहे? ना, कभी नही! दोष निकालेंगे जरूर! लेकिन निकालने की युक्ति समझ लो- ‘दोष मुझमें है ऐसा न सोचो..दोष शरीर में है,दोष बुद्धि में है,दोष मन में है, दोष मेरे संस्कारों में है …इन संस्कारों का दोष निकल रहा है, मैं तो चैतन्य निर्दोष नारायण का सद्गुरु का सनातन पुत्र हूँ!’तो दोष निकालने का अहंकार नही चोटेगा और दोष निकालने में आसानी होगी। नही तो क्या ? नही निकाल सकेंगे तो विषाद होगा और निकल गया तो अहंकार होगा। विफलता में विषाद और सफलता में अहंकार …लेकिन दोष को जहाँ है दोष वहाँ जानना और आपको अपने ईश्वर में अथवा गुरुतत्व में स्थिती करके दोष निकालना बड़ा आसान हो जाएगा। जैसे दूसरे का दोष जल्दी दिखता है, अपना दोष नही दिखता। दूसरे के दोष निकालने के लिए अकल जल्दी काम करती है और अपने दोष निकालने के लिए डबला छाप हो जाती है अकल! वकीलों से पूछ के देखो! अपना नीजी केस वकील नही लड़ेंगे , दूसरा वकील रखेंगे। डॉक्टरों से पूछो- अपना निजी ..कुटुंब की अथवा अपनी नीजी ट्रीटमेंट नही करेंगे, इलाज नही करेंगे, दूसरे से कराएँगे। तो ऐसे ही दोष को मेरे में दोष है समझ के नही ,मन में दोष है ,बुद्धि में दोष है या आदतों में दोष है और उनको निकालो.. अपने को गुरुतत्व में, आत्मतत्त्व में स्थिती कराओ तो दोष निकलने में सफलता हो जाएगी और सफलता का अहंकार नही आएगा! और  कभी थोडी देर के लिए विफलता रही तो आप हार कर , थक कर दीन नही होंगे।ये दोष निकालने की तरकीब सुबह, दोपहर, श्याम जब भी मौका मिले तब अपने दोषों को चुन-चुन के …जैसे पैर में काँटा घुसा है तो निकालते हैं युक्ति से ..दबा के निकालो, सुई से निकालो नही तो फिर छोटे मोटे चिमटे से निकालो..अगर नही निकलता तो गुड़ और नमक या हल्दी मिलाकर उसकी पोटिस बनाकर बांधो, फूलेगा फिर निकलेगा। ऐसे ही फिर कोई नियम की ,व्रत की पोटिस बाँधकर दोष निकालने की  कोशिश करो निकलेगा! तो दोष निकालने में तत्पर! बैठे है…मानो गुरुजी हजार माईल दूर है लेकिन ध्यान के प्रभाव से वो हजार माईल की दूरी नही रहेगी। श्रीकृष्ण को पाँच हजार वर्ष बीत गए लेकिन मीरा इतना तदाकार होती कि पाँच हजार वर्ष की दूरी मीरा के आगे नही रहती! मीरा के आगे तो कृष्ण नाँच रहे है, कृष्ण बंसी बजा रहे है, कृष्ण भोजन कर रहे है! कृष्ण अर्जुन को गीता सुना रहे है! कृष्ण आए तो मीरा हर्षित हो जाती है और आ नही रहे है तो मीरा समझती है- क्या कारण है? मीरा रो रही है! रोना विरह भक्ति होती है और आना हो तो मीरा का प्रसन्नता से मुखड़ा खिलता है तो कभी विरह अग्नि से मीरा का ह्रदय शुद्ध होता है!  आपके पास दो बड़ी भारी योग्यताएँ है.. एक योग्यता है हर्ष और दूसरी योग्यता है विषाद। ईश्वर की स्थिति में, गुरु की स्थिति में अगर स्थिति हो रही है तो हर्ष  करते- करते आनंद उत्सव ..भगवान को गुरुदेव को…मैंने तो गुरुदेव को स्नेह करते हुए बहुत पाया ! गुरुदेव को स्नेह करते- करते मन ही मन गुरुदेव से बात करते- करते हृदय पुलकित होता है, हर्षित होता है और गुरुतत्व की जो प्रेरणा होती है गजब का लाभ होता है! तो हर्ष की सरिता बहाकर आपके कर्मों को और पाप-ताप को, बेवकूफी को बहा दो अथवा तो कभी-कभी विरह की अग्नि जलाकर आपके जीवत्व को अथवा आपके संस्कारों को जल जाने दो। विरह अग्नि से भी तुम्हारे पुराने संस्कार जलते जाएँगे, सिकते जाएँगे…सिकते जाएँगे मतलब जैसे मूँगफली सेंक दी खारी सिंग बन गई, अब वो सिंग खा सकते हो, देख सकते हो , बेच सकते हो लेकिन उसको बो नही सकते, उसकी परंपरा नही बढ़ा सकते..ऐसे ही तुम्हारे जो भी जन्म-जन्मांतर के संस्कार है वो अगर विरह अग्नि में सेंक लिए जाए तो वे संस्कार फिर सत्य बुद्धि से तुम्हारे पास रहेंगे नही और वो दूसरे जन्मों का कारण नही बनेंगे! जैसे सेंका हुआ अनाज नही उगता है ऐसे ही विरह अग्नि में सेंका हुआ चित्त, उसके अंदर पड़े हुए संस्कार वे जन्मों का कारण नही बनते है ! तो गुरु में स्थिति करने से , भगवदतत्व में स्थिति करने से अंतःकरण सिक जाएगा, विरह अग्नि में बाधित हो जाएगा !