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What is the purpose of the service?


What is the purpose of the service? Your heart is cleansed by the service. Egoism, hatred, jealousy, high feelings of emotions and all sorts of such bad feelings are destroyed and qualities like humility, pure love, empathy, tolerance and compassion develop. Selfishness vanishes from service, duality is weak, life’s approach becomes vast and generous. Unity begins to feel, speed progresses in enlightenment.The feeling of ‘one in all, one in everybody’ starts to feel. That is why unlimited happiness is attained.

What is the society? There is only a group of different individuals or units. The world is nothing but the manifest form of God. The service is worship only. The service and the wisdom of the wise men and women of great goodness is fulfilled.Like the Hanuman ji service and the teachings of Sita and Shriram ji, Brahmmanutti was completed.

Discrimination-sense is fatal, so it should be eradicated. To eradicate it, the need for Spirit-Spirit, the development of unity of Caitanya and selfless service. Differentiation is an illusion created by ignorance or illusion.

Source: Rishi Prasad, September 2018, page number 17 issue 309

आदित्यहृदय स्तोत्र


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आदित्यहृदय स्तोत्र

विनियोग

ॐ अस्य आदित्य हृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टुपछन्दः, आदित्येहृदयभूतो

भगवान ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।

ऋष्यादिन्यास

ॐ अगस्त्यऋषये नमः, शिरसि। अनुष्टुपछन्दसे नमः, मुखे। आदित्यहृदयभूतब्रह्मदेवतायै नमः हृदि।

ॐ बीजाय नमः, गुह्यो। रश्मिमते शक्तये नमः, पादयो। ॐ तत्सवितुरित्यादिगायत्रीकीलकाय नमः नाभौ।

करन्यास

ॐ रश्मिमते अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ समुद्यते तर्जनीभ्यां नमः।

ॐ देवासुरनमस्कृताय मध्यमाभ्यां नमः। ॐ विवरवते अनामिकाभ्यां नमः।

ॐ भास्कराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ भुवनेश्वराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।

हृदयादि अंगन्यास

ॐ रश्मिमते हृदयाय नमः। ॐ समुद्यते शिरसे स्वाहा। ॐ देवासुरनमस्कृताय शिखायै वषट्।

ॐ विवस्वते कवचाय हुम्। ॐ भास्कराय नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ भुवनेश्वराय अस्त्राय फट्।

इस प्रकार न्यास करके निम्नांकित मंत्र से भगवान सूर्य का ध्यान एवं नमस्कार करना चाहिए-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

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आदित्यहृदय स्तोत्र

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।

रावणं चाग्रतो दृष्टवा युद्धाय समुपस्थितम्।।1।।

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।

उपगम्याब्रवीद् राममगरत्यो भगवांस्तदा।।2।।

उधर श्री रामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिन्ता करते हुए रणभूमि में खड़े थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख भगवान अगस्त्य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले।

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्यं सनातनम्।

येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे।।3।।

सबके हृदय में रमण करने वाले महाबाहो राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे।

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।

जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्।।4।।

सर्वमंगलमांगल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।

चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वधैनमुत्तमम्।।5।।

इस गोपनीय स्तोत्र का नाम है आदित्यहृदय। यह परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय की प्राप्ति होती है। यह नित्य अक्ष्य और परम कल्याणमय स्तोत्र है। सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है। इससे सब पापों का नाश हो जाता है। यह चिन्ता और शोक को मिटाने तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।

पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्।।6।।

भगवान सूर्य अपनी अनन्त किरणों से सुशोभित (रश्मिमान्) हैं। ये नित्य उदय होने वाले (समुद्यन्), देवता और असुरों से नमस्कृत, विवस्वान् नाम से प्रसिद्ध, प्रभा का विस्तार करने वाले (भास्कर) और संसार के स्वामी (भुवनेश्वर) हैं। तुम इनका (रश्मिमते नमः, समुद्यते नमः, देवासुरनमस्कताय नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराय नमः इन नाम मंत्रों के द्वारा) पूजन करो।

सर्वदेवतामको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।

एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः।।7।।

सम्पूर्ण देवता इन्हीं के स्वरूप हैं। ये तेज की राशि तथा अपनी किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं। ये ही अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित सम्पूर्ण लोकों का पालन करते हैं।

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।

महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः।।8।।

पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः।

वायुर्वन्हिः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः।।9।।

ये ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरूण, पितर, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले तथा प्रभा के पुंज हैं।

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गर्भास्तिमान्।

सुवर्णसदृशो भानुहिरण्यरेता दिवाकरः।।10।।

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्।

तिमिरोन्मथनः शम्भूस्त्ष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्।।11।।

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोऽहरकरो रविः।

अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शंखः शिशिरनाशनः।।12।।

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋम्यजुःसामपारगः।

घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः।।13।।

आतपी मण्डली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः।

कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोदभवः।।14।।

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः।

तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते।।15।।

इन्हीं के नाम आदित्य (अदितिपुत्र), सविता (जगत को उत्पन्न करने वाले), सूर्य (सर्वव्यापक), खग (आकाश में विचरने वाले), पूषा (पोषण करने वाले), गभस्तिमान् (प्रकाशमान), सुर्वणसदृश, भानु (प्रकाशक), हिरण्यरेता (ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बीज), दिवाकर (रात्रि का अन्धकार दूर करके दिन का प्रकाश फैलाने वाले), हरिदश्व (दिशाओं में व्यापक अथवा हरे रंग के घोड़े वाले), सहस्रार्चि (हजारों किरणों से सुशोभित), तिमिरोन्मथन (अन्धकार का नाश करने वाले), शम्भू (कल्याण के उदगमस्थान), त्वष्टा (भक्तों का दुःख दूर करने अथवा जगत का संहार करने वाले), अंशुमान (किरण धारण करने वाले), हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शिशिर (स्वभाव से ही सुख देने वाले), तपन (गर्मी पैदा करने वाले), अहरकर (दिनकर), रवि (सबकी स्तुति के पात्र), अग्निगर्भ (अग्नि को गर्भ में धारण करने वाले), अदितिपुत्र, शंख (आनन्दस्वरूप एवं व्यापक), शिशिरनाशन (शीत का नाश करने वाले), व्योमनाथ (आकाश के स्वामी), तमोभेदी (अन्धकार को नष्ट करने वाले), ऋग, यजुः और सामवेद के पारगामी, घनवृष्टि (घनी वृष्टि के कारण), अपां मित्र (जल को उत्पन्न करने वाले), विन्ध्यीथीप्लवंगम (आकाश में तीव्रवेग से चलने वाले), आतपी (घाम उत्पन्न करने वाले), मण्डली (किरणसमूह को धारण करने वाले), मृत्यु (मौत के कारण), पिंगल (भूरे रंग वाले), सर्वतापन (सबको ताप देने वाले), कवि (त्रिकालदर्शी), विश्व (सर्वस्वरूप), महातेजस्वी, रक्त (लाल रंगवाले), सर्वभवोदभव (सबकी उत्पत्ति के कारण), नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्वामी, विश्वभावन (जगत की रक्षा करने वाले), तेजस्वियों में भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा (बारह स्वरूपों में अभिव्यक्त) हैं। (इन सभी नामों से प्रसिद्ध सूर्यदेव !) आपको नमस्कार है।

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।

ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः।।16।।

पूर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरि अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है। ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है।

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।

नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः।।17।।

आप जय स्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता है। आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान सूर्य ! आपको बारंबार प्रणाम है। आप अदिति के पुत्र होने  के कारण आदित्य नाम से प्रसिद्ध है, आपको नमस्कार है।

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः।

नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते।।18।।

‘(परात्पर रूप में) आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी हैं। सूर आपकी संज्ञा हैं, यह सूर्यमण्डल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देने वाला अग्नि आपका ही स्वरूप है, आप रौद्ररूप धारण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है।

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।

कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः।।20।।

आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक, जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले हैं, आपका स्वरूप अप्रमेय है। आप कृतघ्नों का नाश करने वाले, सम्पूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है।

तप्तचामीकराभाय हस्ये विश्वकर्मणे।

नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे।।21।।

आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के समान है, आप हरि (अज्ञान का हरण करने वाले) और विश्वकर्मा (संसार की सृष्टि करने वाले) हैं, तम के नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत के साक्षी हैं, आपको नमस्कार है।

नाशयत्येष वै भूतं तमेव सृजति प्रभुः।

पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः।।22।।

रघुनन्दन ! ये भगवान सूर्य ही सम्पूर्ण भूतों का संहार, सृष्टि और पालन करते हैं। ये ही अपनी किरणों से गर्मी पहुँचाते और वर्षा करते हैं।

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।

एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्।।23।।

ये सब भूतों में अन्तर्यामीरूप से स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं। ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषों को मिलने वाले फल हैं।

देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।

यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभुः।।24।।

‘(यज्ञ में भाग ग्रहण करने वाले) देवता, यज्ञ और यज्ञों के फल भी ये ही हैं। सम्पूर्ण लोकों में जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ हैं।

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।

कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव।।25।।

राघव ! विपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्यदेव का कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता।

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।

एतत् त्रिगुणितं जप्तवा युद्धेषु विजयिष्ति।।26।।

इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर की पूजा करो। इस आदित्य हृदय का तीन बार जप करने से तुम युद्ध में विजय पाओगे।

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि।

एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्।।27।।

महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावण का वध कर सकोगे। यह कहकर अगस्त्य जी जैसे आये थे, उसी प्रकार चले गये।

एतच्छ्रुत्वा महातेजा, नष्टशोकोऽभवत् तदा।

धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्।।28।।

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्।

त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्।।29।।

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थे समुपागमत्।

सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्।।30।।

उनका उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी का शोक दूर हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्धचित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान सूर्य की ओर देखते हुए इसका तीन बार जप किया। इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। फिर परम पराक्रमी रघुनाथजी ने धनुष उठाकर रावण की ओर देखा और उत्साहपूर्वक विजय पाने के लिए वे आगे बढ़े। उन्होंने पूरा प्रयत्न करके रावण के वध का निश्चय किया।

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितनाः परमं प्रहृष्यमाणः।

निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति।।31।।

उस समय देवताओं के मध्य में खड़े हुए भगवान सूर्य ने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी की ओर देखा और निशाचराज रावण के विनाश का समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा रघुनन्दन ! अब जल्दी करो

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पंचाधिकशततमः सर्गः।

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कर्मों से मुक्ति


 

 

 

 

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचरः।।

 

यज्ञ के निमित्त किये जानेवाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्म में लगा हुआ यही प्राणी, ये मनुष्य समुदाय कर्मों से बँधता है। इसलिए हे अर्जुन तू आसक्ति से रहित होकर यज्ञ के निमित्त ही भलीभांति कर्तव्य कर्म कर.. भगवदगीता तीसरे अध्याय का नौवा श्लोक है।

कर्म तो करे लेकिन कर्मों को बंधन करनेवाला न बनाए, कर्म करके अगले जन्मों के बंधन को काटने के लिए कर्म करे । जैसे काँटे से काँटा निकलता है ऐसे ही कर्मों से कर्मों का बंधन कटता है। कर्मों से कर्मों का बंधन काटने का प्रयास नहीं करता है जो मनुष्य वो मनुष्य शरीर पाकर मूढ़ता को पा लेता है।कर्म से कर्म काटा भी जाता है और कर्म से कर्म बनाया भी जाता है। काँटे से काँटा निकाला भी जाता है और काँटे से काँटा और परेशानी पैदा किए जानेवाला भी किया जा सकता है। तो प्रकृति में देखा जाए तो नित्य कर्म है । हमारे शरीर में नित्य कर्म हो रहे है ,सूरज नित्य कर्म कर रहा है  लेकिन वो यज्ञार्थ कर्म कर रहे है अर्थात कर्तव्य कर्म कर रहे है, फल की आकांक्षा और अहंकार नहीं करते । प्रकृति में कर्तव्य कर्म हो रहा है, हमारे शरीर में कर्तव्य कर्म हो रहा है लेकिन ये यज्ञार्थ हो रहा है, ईश्वर की पूजा के लिए, ईश्वर सृष्टि में साझीदार होने के लिए जो कर्म है वो यज्ञार्थ कर्म है और अपना अहंकार पोषने के लिए, अपना स्वार्थ  पोषने के लिए जो कर्म है वो कर्म बंधनकर्ता हो जाते है।

जैसे एक सेठ रास्ते में घूमने गया । किसी बीमार पीड़ित अपाहिज को देखा। उसके मन में  दया आ गई – “भाई तू इतना दुःखी क्यों फुटपाथ पर?”

उसने कहा “मेरा भाई कोई नहीं सेठजी, भगवान के सिवाय !”

सेठ का मन पिघला कि भगवान के सिवा इसका कोई नहीं तो भगवान ने मेरे को सम्पत्ति दी है, बुद्धि दी है और शरीर दिया है, क्यों न इसकी सेवा करके भगवान को संतोष कर लूँ?
ये सेठ के मन में जो भाव आया ये सात्विक भाव है, ये यज्ञार्थ भाव है ।

मान लो वह सेठ उसको अपने घर  ले आया ,उसकी थोड़ी सेवा चाकरी कर ली। सेठ के मन में आया कि मैं इसको यहाँ नहीं लाता तो कितना बुरा हाल हो जाता इसका ।  अब वो सात्विक भाव में से थोड़ा नीचे आया , राजसी भाव में आ गया, यज्ञार्थ से थोड़ा राजसी में आ गया।

वो बीमार आदमी कहीं खाँसा, थूंका, गंदगी की। सेठ ने कान पकड़ के उसको बाहर निकाल दिया “तू इस महल में रहने के काबिल नहीं नालायक कहीं का!” फुटपाथ पर रख दिया । ये तमस कर्म हो गया । वाहवाही के लिए कर्म करे तो रजस कर्म है । दूसरे को सताने के लिए या अपने स्वार्थ को पोषने के लिए कर्म करे, स्वार्थ को पोषने के लिए कर्म करता है तो कर्मों का बंधन बढ़ता है। दूसरे को सताने के लिए कर्म करता है तो कर्मों का जंजाल और प्रगाढ़ गूंधा जाता है लेकिन भगवान की प्रसन्नता के लिए जो काम किये जाते है उसको यज्ञार्थ कर्म बोलते है ।

तो भगवान कहते है … यज्ञार्थ कर्म कौंतेय अन्यत्र लोकोअयम् कर्मबन्धनः 

जो यज्ञार्थ कर्म करते है वो तो बंधन से मुक्त होते है लेकिन जो स्वार्थपरायण होकर कर्म करना पड़े तो कर्म के जाल में फँस जाते है । तो बुद्धिमान वह है कि कर्म से कर्म को काटे ! कैंची है न ..तो कैंची है तो जाल काटने के लिए है ,कैंची अपने को खोंसने के लिए नहीं ! उल्टे विचार करके आदमी दुःखी होते है, “मैं तो आत्महत्या कर लूँ, मैं तो दुःखी हूँ, मैं तो परेशान”  लेकिन सही ढंग से सोचे तो मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि भगवान ने मेरे को ऐसा अवसर दिया ! ईश्वर की कितनी कृपा है कि मुझे कर्म करने का अवसर दिया, भक्ति  करने का अवसर दिया, शांति पाने का का अवसर दिया, ज्ञान पाने का अवसर दिया !

तो विचार से विचार को काटना चाहिए लेकिन विचार से विचार को ऐसे बढ़ा दे कि अपने को फँसा दे , अशांति पैदा कर दे ऐसा विचार करना कर्म बंधन है ! और शांति पैदा कर दे ये कर्मों से विचारों से.. विचार उन्नत करने का । तो कभी कर्म बाँधने वाले होते है, विचार बाँधने वाले होते है और कभी विचार मुक्त करने वाले होते है ।

मैंने बचपन में पाठ्य पुस्तक में पढ़ा था तीसरी क्लास में जब पढ़ता था तब की बात है .. जय रामजी की ! एक सदा सुखी और दूसरा सदा दुःखी ..दो मित्र थे । सदा सुखी वाला हमेशा हँसता रहता था, जो हुआ अच्छा हुआ भला हुआ, अच्छा हुआ भला हुआ,मेरा सौभाग्य ! और सदा दुःखी वाला सदा सिर कूटता रहता .. हाय रे मैं तो आत्महत्या कर लूंगा, अब मेरे से नहीं जीया जायेगा !  हाय रे मैं दुःखी हूँ, हाय रे  हाय,हाय रे  हाय!

दोनों क्लासफेलो थे, दोनों पढ़े और समय पाकर एक रेलवे का ड्राइवर हुआ और दूसरा दुकानदार बना। ड्राइवर सदा सुखी रहने के विचार करता था और दुकानदार सदा दुःखी रहने का विचार करता था । दुकानदार की दुकान तो अच्छी थी उसके बाप-दादों की दी हुई, ठंडी ठंडी हवाएँ खाता था ,धंधा करता था लेकिन सिर कूटता रहता था क्या करे !

पड़ोसी की ग्राहकी ज्यादा है क्या करे ! उघराणी नहीं आती,  क्या करे ?
लोग तो करोड़पति है और हमारे पास तो खाली 2-4 लाख है, क्या करे! ऐसे क्या करे,क्या करे करके रोता था और अपने मित्र के पास जाता कभी कभी…

बोले, “दुनिया बड़ी खराब है ! कुछ अच्छा नहीं…मैं तो आत्महत्या करके मर जाऊँगा ,अब मुझे बड़ी अशांति है …मैं तो नहीं जी सकता !”

मित्र बोलता है “अरे, तू बढ़िया विचार कर , तेरा तो सौभाग्य है ऐसा क्यों ?”

बोले , ” क्या सौभाग्य ? तुम्हारी भी देखो क्या जिंदगी है ,तुम रेलवे के ड्राइवर !छी !सारा दिन कोलसों के बीच ! गरम गरम बॉयलर के सामने ! क्या तुम्हारी जिंदगी है ! तुम भी  दुःखी हो यार !”

उसने कहा “मैं तो सदा सुखी हूँ ! अभी इंजन में कोलसे हेल्पर ने डाल दिया , हम ने जरा यूँ किया.. इंजन चालू.. दस मिनट में दूसरा स्टेशन, पचास मिनट में तीसरा स्टेशन.. बिना खर्चे बिना पैसे एक से एक स्टेशन घूमते जाते, ताजी हवा खाते जाते और ऊपर से पगार मिलता है! दौड़ती गाड़ी और लोग बोलते है ड्राइवर साहब गाड़ी ले आया .. हकीकत में तो ड्राइवर को गाड़ी ले जाती है लेकिन वो तो ड्राइवर गाड़ी ले आया !.. हमारा नाम हो रहा है ! जय रामजी की ! मुझे तो मौज ही मौज है ! ”

तो जब भी वो दुःख की बात करे तो वो सुख बनानेवाला सुख की ही बात करे !

एक दिन सुख बनानेवाले के जीवन में बड़ा भारी दुःख आ गया, फिर भी वो दुःखी नहीं हुआ । रेलवे इंजिन ड्राइवर था, कहीं पटरीयाँ क्रॉस कर रहा था, किसी कारण से उसका पैर कट गया इंजिन के नीचे ।  लंगड़ा हो गया ।

अस्‍पताल में पहुँचा तब वो दुःखी रहने वाला पूछा “लो ! अब तो सुखी हो तुम ? बोलते हो  सदा सुखी  सदा सुखी ..अब क्या सुख मिला ? पैर कट गया !”

बोले – ” पैर कट गया तो क्या हो गया ? दो पैर में से एक ही कटा है, एक तो भगवान ने रखा है !”  जय रामजी की! ”

और घर में रहता था इतवार के दिन, दो पैर होते तो कुटुंबी बोलते- आटा पीसा के लाओ, सब्जी ले आओ साईकल चला के ! अब तो वो ही आटा पिसाते, वो ही सब्जी लाते है.. मैं तो आराम से भोजन करता हूँ ! और देख दो पैर थे तो दो जूते पहनने पड़ते थे । अभी तो एक ही में ही काम चल रहा है !”

उसने अपने दुःख को बढ़ाया नहीं, बेवकूफी करके “हाय रे हाय पैर कट गया मैं आत्महत्या कर लूँगा! हाय रे हाय ये हो गया “…नहीं !..उसने तो उसको भी संतोष दिया जो दुःखी रहता था उसको भी दुःख में सुखी रहने का उपदेश दिया !

तो पाठ्य पुस्तक में ऊपर से हेडलाईन में था-

पग  जेवो  पग गयो, हवे तू लंगड़ो थयो,   हवे कहे छे के हूं सुखी छूं

पग जैसा पग गया ,पैर जैसा पैर कटा है,तू लंगडा हुआ फिर भी तू बोलता है सुखी ?

ऐसा करके पाठ का क्रम चलता है।

विचारों से आदमी मित्र बना लेता है , विचारों से ही शत्रु बना लेता है, विचारों से ही सुख बना लेता है, विचारों से ही दुःख बना लेता है, विचारों से ही पाप बना लेता है, विचारों से ही पुण्य बना लेता है.. और सत्संग के विचार करके अपने हृदय को ऐसा लायक बना दे कि अपने को परमात्मा बना दे, अपने आप को महान बना ले! ऐसे ही कर्मों से आदमी बंधन बनाता है, कर्मों से ही दुःख बनाता है ,कर्मों से ही चिंता बनाता है, कर्मों से ही शत्रु बनाता है, कर्मों से ही परेशानी बनाता है और कर्म जब बढ़िया करता है तो कर्मों से अपने आप को भगवान को पाने वाला बना देता है !

प्रहलाद छोटा था लेकिन ऐसा कर्म करता,ऐसा विचार करता कि पहलाद को भगवान की प्राप्ति हो गई। उसका बाप उसको रोकता है, टोकता है, डाँटता है लेकिन वो गुरु की बात याद रखता है पक्की !

ध्रुव को उसके कुटुंबी उसका बाप थप्पड़ मारता है,सौतेली माँ उसको थप्पड़ मारती है, बाप आँखे दिखता है फिर भी ध्रुव डटा रहा ,ऐसा कर्म किया तो भगवान प्रगट हो गया !
तो मनुष्य में ये ताकत है कि वो सुख बनाए, दुःख बनाए ,पुण्य बनाए ,पाप बनाए ,मित्र बनाए, शत्रु बनाए कि सारी सृष्टि को बनाने वाले को अपने हृदय में लाये, उसके हाथ की बात है । तो यहाँ भगवान कहते है –

 यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचरः।।

यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ यह ही मनुष्य समुदाय कर्मों से बंधता है । इसलिए हे अर्जुन तू आसक्ति से रहित होकर यज्ञ के निमित्त ही भलीभाँति कर्तव्य कर्म कर।

आँख को दूसरे के प्रति ईर्ष्या न करने देना, ये आँख की सेवा है,ये यज्ञार्थ कर्म है । जीभ को चाडी-चुगली में न लगाना ..एक को एक बोले, दूसरे को दूसरी बोले, आपस में लड़ावे झगड़ा करावे.. तो ये हो गया बंधन । लेकिन दो लड़ रहे है तो एक को अच्छी बात करे,  अच्छी बात करके दोनों का मेल करा दे , हो गया यज्ञार्थ कर्म!

अपनी जीभ का सतउपयोग किया, किसी की श्रद्धा टूट रही है तो उसको सत्संग की बातें बताकर ,भगवान की महिमा बताकर भगवान में मन लगाना ये यज्ञार्थ कर्म है !

“हाँ जी  ये तो  ऐसा है,क्या पता भगवान मिलेंगे कि नहीं मिलेंगे ,ऐसा वैसा, अरे अपने तो चलो खाओ पीओ ,पान मसाला खाओ मजा लो” तो ये जीभ का अन्यत्र कर्म हुआ। जो अन्यत्र कर्म है वो बंधन करता है और यज्ञार्थ कर्म है वो मुक्ति देनेवाला है ! जीभ है तो भगवन नाम जप किया, जीभ है तो सुंदर वाणी बोले, जीभ है तो परोपकार के दो वचन बोले, तो ये यज्ञार्थ कर्म हो गया। आपने जीभ का कर्म करने का कर्म यज्ञ के निमित्त किया।

ऐसे ही कान के द्वारा तुमने निंदा सुनी किसी की चुगली सुनी किसी की  बुरी बात सुनी तो तुमने ये अन्यत्र कर्म किया लेकिन कान के द्वारा तुमने सत्संग सुना ,कान के द्वारा तुमने भगवान का नाम सुना, जिह्वा के द्वारा तुमने भगवान का नाम लिया ,हाथों के द्वारा तुमने भगवान के नाम की ताली बजाई ,ये तो यज्ञार्थ कर्म हो गया ! ईश्वर की प्रीति वाला कर्म हो गया ! ऐसी बुद्धि दिया भगवान ने  और तुम न्यायाधीश हो.. ये न्यायाधीश बैठे है प्रतापपूर के जज.. बुद्धि दी और तुमने न्याय किया किसी के दबाव में नहीं आए, प्रलोभन में नहीं आए, प्रमोशन की लालच में नहीं आए और ठीक से तुमने न्याय दिया तो तुम्हारी बुद्धि का तुमने यज्ञार्थ कर्म किया ! और दूसरे किसी जज ने पैसे लेकर फैसला गलत दिया तो उसने अन्यत्र कर्म किया.. यहाँ तो उसको थोड़ा लाभ हो गया लेकिन अपने लिए उसने बंधन बना लिया, दूसरे जन्म में ऐसी बुद्धि मिलेगी कि पशु की नाईं घसीटता रहे सारी गाड़ियाँ ! जय रामजी बोलना पड़ेगा भानजे …

कर्म प्रधान विश्व करि राखा
जो जस करे तैसा फल चाखा

 

ये धरती कर्म की प्रधानता है ,स्वर्ग में पुण्य का कर्म भोगा जाता है और नरक में पाप का फल भोगा जाता है और धरती पर तो कर्म करने की प्रधानता है ।

कर्म ऐसा करे कि बंधन काटने वाला कर्म हो । तुम्हारा मन है.. मन से तुमने किसी का बुरा सोचा, अशांति  सोची, गाली गलोच सोचा या बोला तो तुम्हारा मन अशांत होगा और जिसने सुना  भी अशांति होगी। तो विश्व सृष्टि के तालबद्धता में तुमने डिस्टर्ब  कर्म, अन्यत्र कर्म करने का पाप उठा लिया  । तुम्हारा मन तो दुःखी रहेगा और तुमने दुःख फैलाया ! तो सृष्टि कर्ता के सौंदर्य में तुमने बढोतरी नहीं की,तुमने गड़बड़ पैदा की तो तुम्हारे चित्त में गड़बड़ हो जाएगी और गड़बड़ का बदला देर सवेर गड़बड़वाला शरीर मिल जाएगा .. भों भों करता रहेगा, भोंकता रहेगा कुत्ता होकर, पेड़ पौधा होकर एक जगह चिपका रहेगा !

तो कर्म तो करें लेकिन किसी के काम आए ! ईश्वर सृष्टि के सौंदर्य के काम आए, ईश्वर के संकल्प में हम काम आए.. ईश्वर और महापुरुष के दैवी कार्य में हमारा कर्म अगर काम आता है ..हमारी आँख, हमारे कान, हमारा नाक, हमारा मन ,हमारी बुद्धि, हमारा चित्त, हमारा धन, हमारा तन-मन जब ईश्वर प्रीति के लिए काम आता है तो यज्ञार्थ कर्म हो गया ! अगर अहंकार पोषने में लगाते है या किसी को सताने में लगाते है तो ये अन्यत्र कर्म हो गया। अन्यत्र कर्म अन्यत्र योनियों में ले जाएगा और ईश्वर अर्थ कर्म, यज्ञार्थ कर्म यज्ञ पुरुष तक पहुँचा देगा ।

राम में और रावण में ये फर्क है ,कृष्ण में और कंस में ये फर्क है। कंस अहंकार पोषित कर्म करता है, रावण अहंकार को पोषने के लिए ,विषय-विलास को पोषने के लिए कर्म करता है और रामचन्द्रजी अहंकार  पोषने के लिए कर्म नहीं करते है ..लोगों के दुःख दूर करके लोगों को आत्म संतोष हो ,लोगों की बुद्धि धर्म में लगे ऐसे कर्म रामजी करते है। लोगों की बुद्धि भगवान में लगे, लोगों की बुद्धि माता पिता गुरुजनों में लगे इसलिए भगवान सुबह उठकर गुरुजी को प्रणाम करते है-

प्रातःकाल उठ रघुनाथा
मात-पिता -गुरु  नावईं माथा
गुरुसे पहले जगपति जागे..

जगत का स्वामी है लेकिन गुरु जगे उसके पहले वो जग जाते है। तो ये कर्म यज्ञार्थ हो गए!

तो कृष्ण कहते है… यज्ञार्थ कर्म कौंतेय
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचरः।।


यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त जो दूसरे कर्म में लगा हुआ ही ये मनुष्य समुदाय है कर्मों से बंधता है इसलिए हे अर्जुन तू आसक्ति से रहित होकर यज्ञ के निमित्त ही भली भाँति कर्तव्य कर्म करो।

महिला अपने गर्भ धारण करती है ,बच्चे को गर्भ में रखती है, शास्त्र बोलते है ये यज्ञार्थ कर्म है.. आप खारा खट्टा नहीं खाती और आप गर्मी सर्दी सहकर भी कठिनाई सहकर भी आए हुए पेट में बालक की रक्षा करती है तो यज्ञार्थ  कर्म है। बालक को जन्म देती है,अपने शरीर का रक्त, अपने शरीर का सत्व उस बालक को दूध के रूप में पिलाती है ये यज्ञार्थ कर्म है …आप गर्मी सर्दी सहकर आप अपना वस्त्र से भी   बच्चे की रक्षा करती है  ये यज्ञार्थ कर्म है.. अपने पेट से  बचाकर भी बालक को पोसती है, ये यज्ञार्थ कर्म है।

अब बच्चा बड़ा करती है तो यज्ञार्थ कर्म है लेकिन वो बच्चा बड़ा होगा और… मेरा बेटा है, वो ऐसा है, फलाना ऐसा है, ये ऐसा है उसको लड़ना झगड़ना सिखाती है तो ये अन्यत्र कर्म हो गया। बच्चा बड़ा हुआ.. ये बड़ा होगा, बहु लाएगा, कमा के खिलाएगा, मेरे को सुख देगा ये अन्यत्र कर्म हो गया, यज्ञार्थ नहीं हुआ। तो जो अन्यत्र कर्म होते है वो सुख के बदले दुःख देते है ।
ऐसे ही जिस योगिनी ने शादी नहीं की, संयमी रही.. महिला, लड़की, लड़का.. तो संयमी रहे और उस संयम से सत्संग किया, सत्संग का प्रचार प्रसार किया ,उसका वो यज्ञार्थ कर्म ! लेकिन शादी तो नहीं किया इधर झाँका उधर झाँका …ओ फ़िल्म गया,सिगरेट पिया उसका अन्यत्र कर्म हो गया ! चाहे ब्रह्मचारी हो चाहे गृहस्थी हो ,चाहे स्त्री हो चाहे पुरुष हो ,चाहे बालक हो चाहे बूढ़ा हो ..जो ईश्वर प्राप्ति के लिए,ईश्वर संतोष के लिए तत्परता से काम करता है वो कर्म यज्ञार्थ हो गए।और जो स्वार्थ पोशने के लिए ,अहंकार बढ़ाने के लिए ,दूसरे को नीचा दिखाने के लिए,दूसरे को दुःख देने के लिए –  “ऐ,क्या करता है?ठीक से कथा सुन ! उधर क्या देखता है ? ”
है तो डाँट ! है तो कठोर कर्म ! लेकिन सामने वाले को नींद का झोंका आया उससे बचाकर उसके हृदय में भगवान की भक्ति भरना है तो डाँटना भी यज्ञार्थ कर्म हो गया !
मेरे को बिल्कुल याद है मेरे गुरुदेव कभी कभार जैसे मैं पंचेड़ आ जाता हूँ वैसे ही मेरे गुरुदेव किसी सेठ ने बना रखा था बंगला गणेशपुरी, बम्बई के पास गणेशपुरी में एकांत में उसने फार्म हाउस जैसा कोई बंगला बना रखा था।  गुरुजी बारिशों के इन दिनों में वहीं जाकर एकांत में रहते । वो सेठ का नाम था नारायणदास सेठ, उसके बेटे बड़े बड़े थे, बेटों के घर बेटे थे, ऐसा सेठ था वो  । तो बापूजी को ले गया अपने बंगले में , व्यवस्था कर दी, पूरा बंगला बापूजी के लिए था ,आस पास बगीचा ये सब.. सारी सेवा व्यवस्था वो करता था । अब बापूजी ने किसी को पुस्तक दिया बोले तू पढ़, सेठ को बोले “सुनो सत्संग”… तो बापूजी थे, दूसरे दो चार थे.. तो सत्संग कर रहे है ,तो इससे सेठ का भी भला हो ,जो आए आदमी दो चार दर्शन करने के लिए फालतू बात न करे, सत्संग के कुछ संस्कार पड़ेंगे उनका भला होगा.. बापूजी कर रहे है यज्ञार्थ कर्म ! और सेठ ने 1, 2 झोंका खाया, तीसरा झोंका खाते.. बूढ़ा आदमी नाक से सांस लेता है मुँह से फूँकता है  ये बूढ़ापे की निशानी समझो अथवा थकान होती है तभी भी ऐसा होता है.. गुरुजी ने ऐसा डाँटा ,ऐसा डाँटा कि वो नारायणदास सेठ.. बड़ा सेठ था, फाइनांस का बिज़नेस चलता था उसका, दूसरों को ब्याज पर  पैसे देता था 10-10 लाख ,5-5 लाख ऐसा सेठ था …ऐसा डाँटा ऐसा डाँटा कि वो सेठ की सफारी का  हिस्सा नीचे का जो था वो आगे भी भीग गया और पीछे भी रंगीन हो गया.. बात तुम समझ गए होंगे !

वो सेठ हाथ जोड़ के बोला” साँई जरा मैं आता हूँ “..

“कहाँ जाता है फिर?”

बोले,”नहीं अभी आता हूँ 5मिनट में आता हूँ कपड़ा बदल के आता हूँ।”

तो बाहर से तो वो सेवा करनेवाला व्यक्ति था और ऊपर से डाँट दिया !क्योंकि सेठ को लगा कि मैं सेवा कर लेता हूँ बहुत हो गया …नहीं!  सेवा के साथ-साथ सत्संग होगा तो सेवा में सत्वगुण खिलेगा नहीं तो सेवा के बहाने भी राजकारण घुस  जाएगा !जय रामजी की !
तो ये डाँटना भी उसकी भलाई के लिए तो यज्ञार्थ कर्म है !और सेठ सेवा करता है ..वाह भाई ये सेठ बहुत बड़ा अच्छा है, इतना बंगला मेरे लिए बना रखा है सेवा करता है,वाह सेठ अच्छा है.. ऐसा करके सेठ की खुशामद तो हजारों लोग कर सकते है लेकिन महापुरुष खुशामद नहीं अनुशासन करते है ! यज्ञार्थ कर्म करवाते है ! रावण का घमंड उतारने के लिए हनुमानजी ने लंका तक जला दिया लेकिन हनुमानजी को पाप नहीं लगा क्योंकि यज्ञार्थ कर्म है !

अंगद को पकड़ के ले गए रावण के सामने, तो अंगद बोलता है मेरे लिए गादी कहाँ है?

बोले, अरे बंदर तू तो नीचे बैठ..

बोले, अरे नीचे कैसे बैठूँगा ? मैं तो राम का दूत हूँ !! अपने स्वामी की इज्जत बढ़ाना तो सेवक का कर्तव्य है ! तू गादी नहीं देता कोई बात नहीं अपनी पूँछ लम्बी की….डूं डूं डूं डूं डूं डूं….लंबी निकलती गई पूँछ, अब पूँछ को  ???????
बनाकर  गोल गोल “जय श्रीराम !” करके ऊँची गादी पे बैठ गया!

बाहर से तो लगता है कि अहंकार है लेकिन अपना अहंकार नहीं स्वामी का यश बढ़ाना है  यज्ञार्थ कर्म हो गया !

गहनों कर्मणा गतिः
कर्म की गति बडी गहन है! वही कर्म दुःखदाई हो जाता है,वही कर्म सुखदाई हो जाता है, वही कर्म एक व्यक्ति के लिए पाप हो जाता है, दूसरे व्यक्ति के लिए पुण्य हो जाता है । घरबार छोड़कर विरक्त हो गया.. नारायण हरि ! सीताराम.. भिक्षाम देही,  माई देनेवाले का भला ना देनेवाले का भला  …रोटी  माँग के खाता है सन्यासी ।  उसके लिए वो यज्ञ है, मधुकरी यज्ञ है । लेकिन जो विषय विलासी लंपटू है,अपने पैसे बचाकर गृहस्थी है और बाहर से भिक्षा माँग कर खाता है तो उसके लिए वो पाप का अन्न हो गया, हराम का, मुफ्त का खाना सत्यानाश जाना । घर में तो पैसे पड़े है और बाहर भीख माँगकर खा रहा है…नहीं!

सन्यासी है और भिक्षा ले के खाता है तो  पुण्य हो गया उसके लिए ।  राजा भ़ृतहरि साधु बन गए भिक्षा माँग के खाते है.. अच्छी बात है, लेकिन राजदरबार में भी बैठे है और फिर भिक्षा ले के खा रहे है पब्लिक का खा रहे है और कर्म नहीं कर रहे है तो बंधन हो जाएगा ।
ऐसे ही संत है,सत्संग कर रहे है,किसीकी गलती है तो उसको डाँटते है तो यज्ञार्थ कर्म है ..और बोले अपना क्या है ये मरेगा! तो ये बंधन हो गया !अपना जो कर्तव्य है वो कर्तव्य  पाले ईश्वर की प्रीति के लिए और दूसरे का तन तंदुरुस्त रहे मन प्रसन्न रहे बुद्धि भगवान में लगे ऐसा भगवान के नाते जो भी कर्म है वो यज्ञार्थ कर्म है।
बाहर से किसीने घूस दे दी 500,1000,2000….
और हमने उसके फेवर में फैसला कर दिया,बाहर से तो  2000 का लाभ हुआ लेकिन हमें आत्म संतोष नहीं मिलेगा !हमने 2-5 हजार की लालच को ठोकर मार दी लेकिन ईश्वर को साक्षी रखकर न्याय युक्त उसको जजमेंट दे दिया तो हमारा आत्म संतोष  होगा, ये यज्ञार्थ कर्म होगा ! तो यज्ञपुरुष परमात्मा को पाने वाले संतों के पास जाने की रुचि हो जाएगी । तभी तो जज आकर बैठे है ! अगर यज्ञार्थ कर्म नहीं होता तो सत्संग में आने की रुचि नहीं होती है, गुरु से दीक्षा लेने की रुचि नहीं होती है, भगवान का ध्यान करने की रुचि नहीं होती है, कथा सुनने की रुचि नहीं होती है !

तुलसी पूर्व के पाप से हरी चर्चा न सुहाय
जैसे ज्वर के जोर से भूख विदा हो जाय।।

 

कोई आदमी जा रहे है .. कबीर ने बुलाया ..

“बैठो,चेहरा उतरा हुआ है,क्या बात है?”

बोले “महाराज! आज मजूरी नहीं मिली ”

“चिंता न करो,लो ये माला.. अब भोजन बन रहा है, भोजन कर लेना । फिर सूरज डूबते डूबते.. अभी दोपहर तो हो गया है सूरज डूबने से पहले ही तुम्हारा पूरे दिन की मजूरी हम दे देंगे ! दिहाडी दे देंगे तुमको , भजन करो !

तो भगवान का भजन करेंगे तो इनका भी मन पवित्र होगा और जिसका अन्न खिलाते है उसको भी पुण्य होगा।

वो लोग तो खुश हो गए कि अरे आधा दिन में भोजन भी मिले और दिनभर की दिहाडी भी मिले,वाह! …भोजन-वोजन करा थोड़ा माला घुमाया, एक-दो माला घुमाया… झोंका आ रहा है ..झोंका आ रहा है ..कैसे भी करके आज तो मुश्किल से दिन नहीं डूब रहा है !
आज डाडो मोटो किकर ।
आज सूरज डूबतो नहीं काय बात है? ..उनके लिए तो दिन बड़ा हो गया ! बड़ी मुश्किल से शाम हुई  ।कबीर ने उन्हें दाड़ी के पैसे दे दियें ,बोले कल मजूरी मिले उधर ढूँढने जाओ मिले न मिले कल  दोपहर को इधर 12 बजे भी आ जाओगे तो कोई बात नहीं।भोजन भी कर लेना 12-12.30 बजे और फिर माला लेके जप करना ,दिनभर का तुम्हारेको मजूरी दे देंगे।
बोले-“महाराज ,ये आशिर्वाद नहीं करो। हम तो भाटा तोड़ेंगे ,खेतों में मजूरी कर लेंगे लेकिन भजन करना मुश्किल है !”

तो सत्संग के बहाने तो ऐसे ही लोग भजन करते है और ऐसे ही भजन करने वाले लोगों की सेवा करने का निमित्त मिल गया ,तो ये यज्ञार्थ कर्म है इससे भगवान संतुष्ट होता है! यज्ञ पुरुष -परमात्मा संतुष्ट होता है!

पुत्र को जन्म दिया लेकिन पुत्र मेरे को सुख दे तो अन्यत्र कर्म है लेकिन पुत्र को जन्म दिया तो पाला-पोसा ,समाज से कुछ … मेरा बेटा जज बन गया तो तूने अकेले ने जज नहीं बनाया है ,उसको जज बनने में कईयों के सहयोग की जरूरत पड़ी, प्रोफेसरों का सहयोग रहा ,मकान बनाने वाले कारीगरों का सहयोग रहा तभी वो कॉलेज बना तो तुम्हारा बेटा पढ़ा, सुथारों का सहयोग रहा तभी वो बेंच बना होगा तभी बेटा पढ़ा होगा ,पुस्तक छापने वाले का सहयोग रहा होगा,परीक्षा लेने वालों का सहयोग रहा होगा,परीक्षा पेपर बनाने वालों का सहयोग रहा होगा,और बेटा घर से कॉलेज गया तो बस वालों का,कंडक्टरों का कईं मनुष्यों का सहयोग लेकर तुम्हारा बेटा वकील बना है, कईंयों का सहयोग लेकर तुम्हारा बेटा जज बना है, कईंयों का सहयोग लेकर तुम्हारा बेटा डॉक्टर बना है या उद्योगपति बना है तो फिर कईयों की सेवा करके तुम्हारा बेटा परमात्मा का बेटा हो जाय, ऐसा उसमें ज्ञान भरना यज्ञार्थ कर्म है ! और बेटा तू तो थारे कमा, मैं तो तीन लाख खर्चो कीदो । तू तो दस लाख कमा ने, मु तो गाडी में फरूं ने तू करो, लीलो लेहर.. आहा…
नहीं! गड़बड़ हो जाएगा!

ब्राम्हण ने दो बच्चों को बुलाया, बोले “ले दो लड्डू, यज्ञ है ,अब तुम यज्ञार्थ कर्म तो नहीं जानते लेकिन ये लड्डू है न वो यज्ञ में डालकर बोलो स्वाहा, इन्द्राय स्वाहा, कुबेराय स्वाहा… वो लड़के जरा ऐसे ही थे.. उन्होंने लड्डू लेके अपना मुँह खोल दिया, मुँह में लड्डू डाल के बोलते है – आहा !!

पुजारी बोलता है ये काय करो रे छोरा? मैं तो कह रहा यज्ञ में डालो बोलो स्वाहा”
बोले-“यज्ञ में डालेंगे ,तो यज्ञ भगवान है वहाँ स्वाहा होगा तो यहाँ पेट में भी तो जठरा भगवान है कि –आहा…    तो आहा करके जो मजा लेते है वो मजा टेम्पररी है,लेकिन ईश्वर की प्रीति के लिए जो कर्म करते है वो यज्ञार्थ कर्म है । ऐसा कर्म कर्मबंधन से आदमी को मुक्त करता है।

एक शाम के समय युधिष्ठिर महाराज पर्वतों की लंबी कतार देखकर बड़े आनंदित प्रसन्न हो रहे थे ,एक टक नजर दूर तक डालते हुए श्वासों-श्वास में अजपा जाप जपते हुए मस्ती से बैठे हुए थे । द्रौपदी ने कहा कि अपने तो धर्म-कर्म में जीते है, भगवान को मानते है, संतों को मानते है फिर भी अपने तो दुःखी है, दरदर की ठोकरें खा रहे है, वन वन भटक रहे है…

और जो शाकुनी का सहारा लेकर क्रूर कपट करता है,  शतरंज खेलकर सब कुछ लूट लिया तुम्हारा,  लाक्षागृह में पांडवों को जलाने का प्लान  किया,  ऐसा दुष्ट दुर्योधन मजा कर रहा है और हम लोग दुःख भोग रहे है! तो भगवान को इतना तो कहो कि हम इतना भजन कर रहे है तो हमारे लिए जरा अच्छा कर दे और दुष्ट को सजा दे दे।

यधिष्ठिर ने सुंदर जवाब दिया,  युधिष्ठिर बोलता है कि किसी को सजा दे ये भगवान को हम क्यों कहे ? वो तो उनके कर्म ही उनको सजा देंगे ! और हमारे दुःख मिटा दे ये हम उसको क्यों कहे? हमारा प्रारब्ध दुःख का है तो दुःख बीत रहा है ! हम दुःख मिटाने के लिए भजन नही करते,  दूसरे को सजा दिलाने के लिए भजन नही करते,  लेकिन भगवान भजन करने योग्य है,  भजन से हमें आनंद आता है,  दुःख सुख का प्रभाव छूट जाता है इसलिए हम भजन करते है,  भजन करना अच्छा है।

“अरे काय करां मैं तो कथा में गया , और मेरे को बेटा  हुआ 5 साल हो गया! अरे काय करां मैं तो कथा में गया,  मेरा छोरा को अभी तक शादी  हुई ! अरे मैं तो मंदिर में जाता हूँ मेरी नौकरी  लगी ..तो तेरे को भगवान में प्रीति नही नौकरी में प्रीति है, छोरे-छोरी में प्रीति है लेकिन कुछ समय तो ऐसा भी लगाना चाहिए कि भगवान के लिए कर्म करे ! अपने स्वार्थ के लिए कुत्ता भी पूँछडी हिलाता है,  काय बात है!..तो मनुष्य जन्म स्वार्थ स्वार्थ स्वार्थ से गंदा हो गया ! कुटुंब में झगड़ा क्यों होता है? कि यज्ञार्थ कर्म नही करते , अन्यत्र कर्म करते , स्वार्थ से करते तो कुटुंब में कलह होता है। बड़ा भाई छोटे भाई को नही पूछेगा अगर स्वार्थ का अंधा घोड़े पे बैठा है तो । यज्ञार्थ कर्म करेगा तो बड़ा समझेगा कि छोटा है,  मेरा भाई है उसका भरण पोषण करना उसका मन लेना, ये वो करना..परदेस में धन वैभव तो है लेकिन यज्ञार्थ कर्म की बहुत कमी है,  लोग बड़े अशांत है , दुःखी है ! और यहाँ भी जो स्वार्थी है वे लोग अशांत है,  दुःखी है ! लेकिन ये जो यज्ञार्थ कर्म करते है थोड़े में से थोड़ा , टुकड़े में से टुकड़ा कुटुंब में बाँट के खाते है,  समाज में बाँट के खाते है उनके हृदय में जो सुख -शांति और चैन है वो अरबोपतियों के हृदय में नही मिलता है !जय रामजी की !

तो भगवान कहते है कि जो यज्ञार्थ कर्म करते है वो तो बंधन से मुक्त होते है ! लेकिन जो अन्यत्र कर्म करते है वे बंधन में आ जाते है ! जो कर्म छोड़के आलसी होके बैठे है , खाया पिया और सोए रहे , गप्पे लगाते रहे,  समय बर्बाद करते रहे वे दूसरे जन्म में पेड़-पाषाण आदि हल्की योनियों में चले जाते है फिर जबरन कुदरत उनसे कर्म करवाती है! रात को कैसे आँधी तूफान के साथ बरसाती बौछार हुई ! कितना सहन करना पड़ा पेड़ों को ! हईशा.. धमा धम!..झकझोर दिया तूफान ने !कभी तूफान झकझोर देता है तो कभी ताप उनको तपा देता है तो  कभी अति वृष्टि उनको अजीर्ण कर देती है तो कभी अनावृष्टि उनको भूखा मार देती  है!  तो ये वे ही लोग होते है जिन्होंने यज्ञार्थ कर्म नही किया , मनुष्य जन्म   स्वार्थ में लगा दिया तो दूसरे जन्म में बन जाओगे पेड़ पौधे लता और वृक्ष ! जबरन कष्ट सहो ! और फिर अपने लिए कुछ न रखो !.. फूल भी दूसरों के लिए,  फल भी दूसरों के लिए ,  टहनी भी दूसरों के लिए ,  थड़ भी दूसरों के लिए!..क्योंकि तुमने पाया है! ग्लास अगर कह देता  कि मैं लोगों की प्यास बुझा  देता हूँ तो पागल है!… ग्लास अगर कह दे कि  मैं लोगों की प्यास बुझा  देता हूँ तो वो पागल है! दीया अगर कह दे कि  मैं लोगों का अधःकार मिटाता हूँ तो वो पागल है! दीया अंधकार अपनी ओर से नही मिटाता है, तेल मिलता है  तभी वो अधः कार मिटाता है! ग्लास अपनी ओर से प्यास नही बुझाता है, वो पानी आता है तभी वो प्यास बुझाता है! ऐसे ही आप कह दो मैं दुःख मिटाता हूँ तो दुःखहारी श्रीहरि की सत्ता तुमको मिली,  दुःखहारी श्रीहरि की बुद्धि तुमको  मिली,  दुःखहारी श्रीहरि का सूरज का यूटिलाइज तुम करते हो , दुःखहारी श्रीहरि की धरती तुमको रहने को मिली,  दुःखहारी श्रीहरि की हवाएँ तुम लेते हो तभी तुम दूसरों के दुःख दूर करने में निमित्त बनते हो तो अपने को खुशहाल मानो कि भगवान ने हमको अवसर दिया!
तो उन्होंने मौन मंदिर बनाया… गुरुवार को उद्घाटन था मौन मंदिर का.. दानमल हो गए थे । तो उनके साथी बोलते है दानमल या हम लोग एक मौन मंदिर तो क्या सौ मौन मंदिर बनाके आश्रम को अर्पण कर दे  फिर भी हम बदला नही चुका सकते आश्रम की तरफ से जो हमको शांति मिली , सत्संग मिला, नया जीवन मिला! ..तो ये उत्तम कर्ता है ! और नही तो बोले-“हमने मौन मंदिर बनाया है,  हमारा नाम लगना चाहिए तख्ती पे , दुनिया में नाम होना चाहिए “..तो ये राजसी कर्म है! तो राजसी कर्म से सात्विक कर्म ज्यादा फलदाई होता है, ज्यादा सुखदाई होता है।दिखावटी भी अच्छा काम करे तो अच्छा ही है ! तख्ती लगाके भी जो ..बिल्कुल नही करते वो तख्ती के बहाने भी कंबख्त करते है तो अच्छा है !जय रामजी की! लेकिन – तख्ती-वख्‍ती  की परवाह नही  है भगवान तो देखने आएँगे! छुपके भी पाप कर्म करते है तो उसका फल मिलता है तो छुपके पुण्य कर्म करेंगे तो उसका भी फल मिलेगा! भगवान को, और गुरु को रिझाया, राजी कर दिया ,  और गुरु ने- भगवान ने अपना मानकर हमको डाँटा …तो अगर सात्विक आदमी है कि- देखो,  गुरु ने हमको अपना तो माना! हम बड़े भाग्यशाली है!
अगर राजसी है बोले-  हम तो इतनी इतनी सेवा करें और गुरु ने डाँटा कांय करें ! ठीक है, अपना भाग्य फूटा !और तामसी है तो गुरु की निंदा करने लगेगा! तो जो थोड़ा बहुत पुण्य होगा उसका नष्ट हो जाएगा !

हरि-गुरु निंदा सुनहि जे काना ,
होवई पाप गौ घात समाना।
हरि गुरु निंदक दादुर होवई।

हरि की और गुरु की निंदा जो सुनता है जिस कानों से उसको गौ हत्या करने का पाप लगता है!जो निंदा करता है वो मेंढक बनता है ,  टैं टैं  करता रहेगा फिर ! …..चलो हम नही जानते भगवान को,  गुरु को.. उनकी महिमा वो जाने !  भगवान करे अच्छा!चलो जो हो गई जो बीत गई । ……तो जो अपने जीवन में निःस्वार्थ कर्म नही करता वो मनुष्य जन्म पाकर बरबादी के रास्ते जाता है ! स्वार्थ रहित कर्म नही करेगा  तो योग्यता डेवलप नही होगी, विकसित नही होगी ! अपने स्वार्थ के लिए तो कुत्ता भी पूँछ हिला देता है ,  अपने दो बेटी बेटों को तो कुत्ती भी पाल लेती है  क्या बड़ी बात हुई ? कुत्ता भी पाल लेता है! लेकिन ईश्वर प्रीति के लिए जो कर्म करे उसको बोलते है यज्ञार्थ कर्म! तो यहाँ गीता के तीसरे अध्याय के नौवें श्लोक में  भगवान बोलते है…तुम
फिरसे उच्चारण करो….

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।

तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर।।

यज्ञ के निमित्त किए जानेवाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ  ही यह मनुष्य समुदाय कर्मों से बंधता है। इसलिए हे अर्जुन तू आसक्ति से रहित होकर यज्ञ के निमित्त ही भली भाँति कर्तव्य कर्म कर,  परोपकार कर्म करके अपने हृदय को परमात्मा के रंग से रंग डाल ।

वैष्णव जन तो तेने कहिये,  पीर पराई जाणे रे ।

पर दुःखे उपकार करे तो मन अभिमान न आणे रे।

वह वैष्णव  है, वह भगवान का है जो दूसरों के दुःख दूर करने के लिए है  और बड़े में बड़ा दुःख है जन्म मरण !  बड़े में बड़ा दुःख है भगवान से विमुख ! जो भगवान से विमुख लोग है उनको भगवान के सन्मुख करना ये बहुत ऊँचा कर्म है ! जो ईश्वर से विमुख है उसको  ईश्वर से सन्मुख करना यह बहुत बड़ा काम है! इस काम में भागीदार होना ये भी पुण्य है।

आचार्य विनोबा भावे ..उसके पास एक आदमी आया बोले- “बापजी मैंने घोड़ा खरीदा है । वो घोड़ा मेरे को बैठने ही नही देता! बहुत अच्छा घोड़ा है,  मेरे नौकर को बैठने देता है । वो तो आया बस उसको लेके हवा हो जाता है ! मैं जाता हूँ वो मेरे को लातें मारता है !

बापजी ने एक मिनट शांत होकर अपने आत्मा में डुबकी मारी  , बोले -“तुमने घोड़ा लिया है, घोडे को अपने हाथ से कभी दाना खिलाया?

बोले -”  नौकर चाकर खिला देते है !

“नौकर चाकर खिलाते तो नौकर को बैठने देगा ! अपने हाथ से तू उसको दाना खिला , फिर अपने हाथ से जरा तू उसको प्यार कर, पुचकार कर तो उसको पता चले कि ये मेरे को स्नेह करता है , मेरे को खिलाता है , तो उसके हृदय में भी तेरे लिए  भाव होगा …और तू ले जाएगा चाबुक तो उठाएगा लात!
आय शाउट यू शाउट हू विल कैरी डर्ट आउट ? मैं भी रानी तू भी रानी कौन भरेगा घर का पानी!
तू नौकर के हाथ से भेज देता है न..अपने हाथ से खिला !

वो आदमी ने 8 दिन तक दाना-पानी घोड़े को खिलाया  और उसी घोड़े पर सवार होकर बाबाजी के दर्शन करने आया।

बाबाजी ने पूछा क्यों कैसे?

बोले – “महाराज ये तो जादू हो गया ! आपने कौनसा मंत्र कर दिया?”

बोले-“मंत्र ये है -जो देता है वो पाता है, जैसा करता है वो भरता है!”

तो यज्ञार्थ कर्म, सत्कर्म, निष्काम कर्म करने से बुद्धि का विकास होता है, अन्तःकरण में शांति, सुख आता है, चैन की नींद मिलती है। और जो स्वार्थ से कर्म करते है , दूसरों को लड़ाते भिड़ाते है और अपना उल्लू सीधा करते है ऐसे उल्लुओं को तो महाराज यहाँ भी सुख नही , परलोक में भी सुख नही !

राजा की सवारी जा रही थी । एक लड़का अपनी माँ की उंगली पकड़ कर.. किशोर अवस्था था, भीड़ में कहीं गुम न हो जाए इसलिए माँ की उंगली पकड़ कर देख रहा है राजा की सवारी । किशोर अवस्था करीब  पार कर चुका था अभी जवानी आने की तैयारी थी।

“माँ,  माँ मुझे राजा से मिलना है!”

माँ ने कहा बेटा तेरा पिता स्वर्गवास हो गया । एकलौता मेरा लाल, हम गरीब भी है,  तू खास पढा लिखा भी नही और तू राजा से कैसे मिल सकता है? और मिलेगा तो राजा तेरे को क्या देगा या क्या ?”

“नही माँ मेरे को राजा से मिलना है ।”

बोले “तू राजा से मिल, मिलना चाहे तो मिल ! लेकिन मैं मिलने का तरीका बताती हूँ । तो तू ऐसा मिलेगा की राजा तेरे से अलग नही होगा !

बोला-“माँ ऐसा कौनसा तरीका है?”

बोली-“तू यज्ञार्थ कर्म कर! राजा को खुश करने के लिए कर्म कर,  ईश्वर को खुश करने के लिए कर्म कर !राजा का महल बन रहा है। वहाँ जाकर तू काम में लग जा । आलस्य मत करना , कामचोरी मत करना । और 8-8 दिन में ..जो दिहाडी का काम करते है उनको 8-8 दिन में पगार मिलता है.. 2-3 रोटी भी मिलती है और पगार भी मिलता है फिर 8 दिन में”… जो कुछ रुपया उसका होता होगा उस समय। …”जो पगार बाँटने आए मंत्री तो पगार मत लेना , बोलना कि राजा साहब का महल है इसमें क्या पगार लूँ? मेरे को तो सेवा मिल रही है भाग्य है मेरा ! ऐसे करके तू पगार मत लेना और सेवा ततपरता से करना , दूसरे करें उससे सवाई सेवा करना लेकिन बदला कुछ नही चाहना !तो तेरे कर्म यज्ञार्थ हो जाएँगे ! राजा तो खुश हो जाएगा, महाराज भी खुश हो जाएँगे परमात्मा भी !”

महल बन रहा था, काम में लग गया ।एक हफ्ता हुआ सबको मिला पेमेंट उसने नही लिया! दूसरा हफ्ता हुआ उसने बोला मेरे को नही चाहिए !तीसरा हफ्ता हुआ मंत्री को इन्कार कर दिया !

महाराज , उसका तो बड़ा प्रभाव पड़ा मंत्री पर ! मंत्री ने जाकर राजा को सुनाया ।

ईश्वर, गुरु और समाज का विरोधी कर्म न हो । अब बाहर से तो सेवा है लेकिन ये सेवा में  गिना जाएगा । ड्राइवर हो तुम्हारा…ड्राइवर,   सेवक तो हो लेकिन गाड़ी चलाके खड्डे में डाले तो सेवा हुई कि बदमाशी हुई? जय रामजी की ! रसोईया तुम्हारा सेवक तो हो लेकिन शक्कर की जगह पर नमक डाल दे खीर में तो सेवा हुई कि बदमाशी हुई? बेवकूफी हुई ? तुम्हारा दोस्त , तुम्हारा सेवक तो हो , तुमको प्यार करते करते तुम्हारी आँख में उंगली घुसेड़ दे तो सेवा है कि बदमाशी है? तो सेवा का भाव के साथ-साथ सेवा का ज्ञान भी होना चाहिए ! जय रामजी की !सेवा के भाव के साथ-साथ सेवा का ज्ञान भी होना चाहिए। सेवा में तत्‍परता भी होनी चाहिए । तो कर्म ऐसे करे कि अपना कर्म पूजा बन जाए , अपना कर्म बंदगी हो जाए!

उस लड़के ने तीसरा हफ्ता का  पगार  आया वो भी नही लिया ।

मंत्री बड़ा प्रभावित हुआ..राजा को जाके कहा -लड़का है जवान तो अभी जवानी उसकी आ रही है लेकिन महाराज इस उम्र में उसके जीवन में जो तत्‍परता है,  काम करने का हौसला है वो तो गजब का है ! बदला कुछ नही चाहता है,  बड़ा निःस्वार्थी लड़का है! ऐसा करके मंत्री ने प्रशंसा की।
निःस्वार्थ काम करने से आदमी का चेहरा खिला रहता है,  बुद्धि बलवान हो जाती है,  मन प्रसन्न रहता है और हृदय में सिंह जैसा बल आ जाता है निःस्वार्थ कर्म करने से! अकल से करें.. ऐसा नही कि इधर कथा चल रही है उधर ठां ठक ठां ठक …कांय करो ?.. के मैं निःस्वार्थ कर्म कर रहा हूँ …डंडा लेके पानी कूट रहा है..क्या कर रहा है?..बोले मैं निःस्वार्थ कर्म कर रहा हूँ…अरे बेवकूफ ये तो पानी कूट रहा है क्या निःस्वार्थ? लोग बैठे है कथा में और लोगों के स्कूटर या मोटर सायकल की सीट पर वो  ब्लेड घुमा रहा है ..बोले क्या कर रहा है?..बोले मेरे को तो कोई मतलब नही है निःस्वार्थ कर्म कर रहा हूँ..ये तो बदमाशी के कर्म हुए ! निष्‍प्रयोजन कर्म ..पानी कूटना निष्‍प्रयोजन कर्म  है। अब किसी की गाड़ी वाड़ी.. अपने को कोई स्वार्थ नही लेकिन ऐसे ही बैठे है किसीकी चीज  खराब कर रहे है तो बदमाशी का कर्म है ।  न बदमाशी के कर्म हो न निष्‍प्रयोजन कर्म हो न अंधे स्वार्थ से प्रेरित कर्म हो..कुशलता से कर्म हो, निःस्वार्थ कर्म हो, ईश्वर के प्रीति के लिए कर्म हो और बात को हजम करने की ताकत हो ! जय रामजी की !

लड़के में ये सद्गुण थे। उस सद्गुणों के कारण लड़का राजा के आगे पसंद पड़ गया ।

राजा ने कहा अब ये महल चुनाई करने वालों के लेबर के, कारीगरों के साथ लेबर का काम करे…नही ! इस लड़के को मेरी पर्सनल सेवा में रखूँगा ! वो राजा से मिलना चाहता है… अब राजा उससे मिल रहा है ! जय रामजी की ! पर्सनल सेवा में..और जो पर्सनल सेवा में रहा तो महाराज!.. उभरता छलकता खून था.. किशोर अवस्था में जो बालक जैसा बनना चाहे उतना बड़ा महान हो सकता है ! राजा विक्रमादित्य किशोरों को भर्ती करते थे,  अपने अंगरक्षक किशोर रखते थे 14 साल के लड़के…छोटी छोटी तलवार देकर बॉडीगार्ड तरह के लड़कों को रखते थे राजा विक्रमादित्य । किशोरों में बड़ा अदम्य उत्साह होता है और सच्चे भी होते है । फिर ज्यों ज्यों बड़े होते है और बेईमानों का संग होता है तभी कपटी बेईमान होते है! तो महाराज!..वो बड़े राजा की इत्मीनान से सेवा करने लगा । देखते-देखते राजा और रानी का मन जीत लिया …निष्काम व्यक्ति तो मन जीत लेता है! और निष्काम कर्म करनेसे हृदय पुलकित होता है। निष्काम कर्म करनेसे बुद्धि खिलती है , निष्काम कर्म करने से आत्मबल बढ़ जाता है।

दिखावटी की सेवा में और सच्ची सेवा में जमीन आसमान का फर्क है ! जो सच्ची सेवा करता है वो नही चाहेगा कि मेरा नाम अखबार में आए अथवा मेरी सेवा कोई देखे । कोई भी नही देखे फिर भी अंतर्यामी परमात्मा तो देख रहा है! मेरा गुरुदेव तो देख रहे है !  गुरुमंत्र मिला तबसे मेरा गुरु मेरे साथ है! तो वो निष्काम सेवा का फल उनके हृदय में पनपता है।

महाराज ! उसने ऐसी सेवा की कि राजा रानी दोनों प्रसन्न रहते उस पर । और  राजा का अंगद सेवा से,  राजा की अंगद पर्सनल बातें , ये वो हिल चाल देखकर सारा योग्यता आने लगी ! एक दिन राजा ने रानी को कहा कि अपने पास कोई संतान नही है,  अब उमर भी हो गई… भतीजा-वतीजा तो लोफर जैसा है.. क्यों न इस लड़के को ही गोद में ले ले तो कैसा रहेगा? भले गरीब माई का है लेकिन हृदय का गरीब नही ! सेवा का धन है इसके पास, तत्‍परता का धन है इसके पास, सहनशक्ति का धन है इसके पास, सदाचार का धन है इसके पास, ये बड़ा धनवान है! ये दिल का राजा है ! इतना कुछ करता , कुछ भी नही लेता है !दिल का राजा है ! तो क्यों न अपन इसको गोद ले ले ?  रानी बोलती है “ये तो मेरे मन की बात कही आपने !मेरे मन में तो हो रहा था लेकिन संकोच के मारे नही कह रही थी!”

समय आया… उसको गोद ले लिया…कुछ ही दिनों में युवराज के पद पर उसका राज्याभिषेक हुआ। रथ में बैठकर नगर यात्रा निकाली। तो उस भीड़ में वो बुढ़िया हाथ में छड़ी लेकर ताकती रही कौन राजकुमार है और राजा की जगह पर आएगा। तो उस बुढ़िया ने देखा ये तो मेरा पुत्र है! और पुत्र ने देखा ये मेरी माँ ! राजा को कहता है कि राजन जिस माँ के थोडेसे उपदेश से मैं यहाँ तक पहुँचा और  आज राजा साहब बना हूँ उस माँ के चरण छूने जाना है मुझे , माँ को प्रणाम करने जाना है !

राजा ने कहा – “जिस माँ ने ऐसा निष्काम कर्मयोगी को अवतार जन्म दिया है उस माँ के चरण छूने तू अकेला क्यों जाएगा? मैं भी साथ मे चलता हूँ ।” उस बुढिया के पास राजा और राजकुमार दोनों प्रणाम करने गए!
राम लक्ष्मण जानकी जय बोलो हनुमान की ! हनुमान जी की जय क्यों है?..कि सेवा है हनुमान जी के पास !

तो भगवान कृष्ण कहते है जो स्वार्थ के कर्म  है वो अन्यत्र  योनियों में ले जानेवाले भटकाने वाले है।लेकिन जो परमार्थ के कर्म है, निष्काम कर्म है, यज्ञार्थ कर्म है, ईश्वर की प्रीति के लिए कर्म है वो आदमी को मुक्त कर देते है! सुखस्वरूप ईश्वर से मिला देते है !

यज्ञार्थ कर्म…कर्म से कर्म को काटे …जेसे काँटे से काँटा निकलता है ऐसे ही कर्मों से कर्म बन्धन कटता है। ईश्वर सृष्टि में सहायक होने के लिए कर्म करें। शास्त्र तो यहाँ तक कहता है कि स्त्री जो गर्भ धारण करती है वो भी यज्ञार्थ है। पीड़ा सहती है,  कठिनाई सहती है,  सृष्टि की परंपरा चलाने में साझेदार होती है। दुःख और कष्ट सहके बच्चे को पालती पोषती है ये यज्ञार्थ कर्म है। लेकिन  जब चाहती है कि बच्चा मुझे सुख दे तो ये अन्यत्र कर्म हो जाता है । ये बच्चा मेरे को सुख दे मौज मजा कराए तो ये कर्म अन्यत्र हो जाता है,  बंधन कर्ता हो जाता है।
सृष्टि की गहराई में देखा जाए तो सारे कर्म यज्ञार्थ हो रहे है,  सेवा भाव से हो रहे है। सूर्य प्रकाश देता है,  बदले में क्या लेता है? हवाएँ चल रही है,  बदले में क्या लेती है? धरती इतना इतना कुछ फल, फूल, अन्न, धान्य आदि दे रही है ये उसका यज्ञार्थ कर्म है। ऐसे ही चंद्रमा वस्तुओं को , फल-फूलों को, अन्न को, औषध को पुष्ट करता है यज्ञार्थ कर्म है।

तो यज्ञार्थ कर्म करनेसे आदमी कर्म बंधन से छूटता है। यज्ञार्थ कर्म करने से आदमी में कर्म करने की योग्यता विकसित होती है। यज्ञार्थ कर्म करने से आदमी का मन प्रसन्न होता है और मति में, बुद्धि में विलक्षण शक्ति आ जाती है । जितना-जितना संकीर्ण जीवन है, संकुचित जीवन है उतना-उतना अन्यत्र कर्म है। और जितना-जितना विशाल जीवन है , उदार जीवन है उतना-उतना वो यज्ञार्थ कर्म करता है और जितना-जितना यज्ञार्थ कर्म करता है उतना-उतना उदार होता जाएगा , महान होता जाएगा !
मोहनलाल करमचंद गांधी एक व्यक्ति थे लेकिन यज्ञार्थ कर्म करने लगे तो वो राष्ट्रपिता माने जाते है,  एक बड़े व्यक्ति माने जाते है, बड़े महात्मा माने जाते है।
हृदय में निःस्वार्थता है तो आप बात करते है तो आपकी बात में कुछ स्वाभाविक आनंद ,  पॉवर,  प्रभाव  रहता है।और हृदय में अति स्वार्थ भरके बात करते है तो हृदय की धड़कने ढीली लगेगी।

यज्ञार्थ कर्म…गीता के तीसरे अध्याय का नौवां श्लोक चला था सुबह…  यज्ञार्थ कर्म अर्थात निष्काम भाव से किए हुए सतकर्म करते रहे …तो बाबाजी हम खाएँगे – पिएँगे क्या?

तो कथा सुनाई थी कि एक राजा की सवारी देखकर एक लड़के ने माँ से कहा  मुझे राजा से मिलना है।तो माँ ने कहा उसका महल बन रहा है , तू काम करना, कुछ लेना मत,  दो टाइम रोटी तो देंगे ही,  बाकी जो पैसे लेने मत.. लिए नही तो धीरे धीरे मंत्री तक बात पहुँची,  मंत्री ने राजा को बताया और राजा ने उस लड़के को अपना पर्सनल सेवक रख दिया! तो उसके रहने की , खाने की,  व्यवस्था तो हो गई ओढ़ने, बिछाने की ! आगे चलकर वो ही लड़का राजकुमार पदवी पे बैठा और वोही राजा बन गया !
तो ज्यों ज्यों निःस्वार्थता आती है त्यों त्यों आदमी की क्षमताएँ विकसित होती है।

डॉक्टर राजेन्द्र बाबू वकालत करते थे। एक भाई ले आया उनके पास केस। तो मुकदमा ऐसा था कि जिस आदमी ने पैसे लिए थे वो मर गया था। उसकी जमीन गिरवी थी, जमीन और मकान गिरवी रखा था,  और वो आदमी मर गया। अब उसकी पत्नी से अंगूठे-वंगुठे करवा रखे थे, उस आदमी से भी साइन ले रखा था…और एक और बिंदी बढ़ा दी ! दस हजार का जो गया लाख ! तो राजेन्द्र बाबू ने देखा कि तुम्हारे डॉक्यूमेंट तो ऐसे है कि मैं तुमको सम्पत्ति दिला सकता हूँ लेकिन इसमें कुछ गड़बड़ है!वो आदमी मर गया और उसकी विधवा पत्नी और बच्चा वो बेचारे दर दर की ठोकर खाएँगे और तुम्हारे बच्चों को अधिक पैसे मिलेंगे तो उनकी बुद्धि बरबाद होगी ! मैं ये केस लूँ तो तुम मुझे दो पाँच हजार फी दे दोगे और मेरा नाम भी होगा कि केस जीत के दिया लेकिन ये कर्म जो है बंधन कर्ता है,  वो पैसा मुझे भी दुःख देगा और तुम्हारे घर में आएगा तुम्हें भी दुःख देगा! मैं ये केस नही लड़ूँगा ! जिस माई के खिलाफ तुम मुकदमा दर्ज कराके डिक्री कुर्की लेना चाहते हो उस माई के एड्रेस,  मैं तुम्हारे कागजों  से ले लेता हूँ ..अगर तुमने उसको तंग किया तो मैं उसकी तरफ से फ्री में लड़ूँगा और उसकी तरफ से जो कुछ पैसा देना होगा मैं दूँगा ! उचित तो ये है कि तुम ये कागज फाड़ डालो। उसको क्षमा कर दो। दस हजार रुपये का तुम लाख ले रहे हो मैं तो कहता हूँ दस हजार भी छोड़ दो । राजेन्द्र बाबू की निष्काम भावना की ऐसी असर पड़ी कि उस आदमी ने जो फर्जी कागजात बनाये थे ये वो सब फाड़ दिए।

लोक व्यवहार में देखा जाए तो ये कैसा वकील? कि अपने असिल का भी घाटा कर दिया और अपना भी घाटा कर दिया । लेकिन बदले में कुदरत ने देखो भारत का प्रथम राष्ट्रपति उसीको बनाया !

इब्राहिम लिंकन बड़ा गरीब लड़का था । पढ़ने जाता तो पैरों में चप्पल नही टाट  का टुकड़ा लपेट के सुतली से सी के जाता । कई मील दूर बर्फीला रास्ता तय करके स्कूल में जाता पढ़ने को । कठिनाई से परीक्षाएँ पास की फिर वक़ीलात की लेकिन वक़ीलात करनी है तो सच्चाई से करूँगा..अब सच्चाई से वक़ीलात की तो महाराज फेल हो गए! वकील को तो झूठ बोलना है न,  तो झूठ नही बोले तो वो केस जमे नही ! फिर किसीसे पार्टनरशिप में धंदा किया ,  तो ये सच्चे आदमी और दूसरा आदमी चलता पुर घाटा पड़ गया ! फिर चुनाव लड़ा तो चुनाव में भी सच्चा सच्‍चा बोले।तो चुनाव लड़े तो एक बार हार गया ,  दुसरीं बार हार गया,  तीसरी बार हार गया, चौथी बार हार गया, पाँचवी बार हार गया,  किसी 12-15 साल की लड़की ने इब्राहम लिंकन को लिखा तुम चुनाव लड़ते हो तो चुनाव लड़ने के पहले तुम दाढ़ी रखो तो लेडीज भी तुमको वोट देंगी क्योंकि लेडीज को दाढ़ी बहुत अच्छी लगती है !  मैं ने सुना है ऐसा !…

उसने दाढ़ी भी रखी और अपना पुरुषार्थ भी था.. खैर.. दाढ़ी रखने से सब प्राइम मिनिस्टर नही हो जाते ! दाढ़ी तो कईं भिखमंगे लोग भी रख लेते है। तो उसने दाढ़ी रखी और वो जीत गया ! जीत गया तो अमेरिका का राष्ट्रपति और  छोटे से गाँव में उस नन्ही मुन्नी बालिका को मिलने गया। तो वक़ीलात में,  बिज़नेस में तो वो असफल सा रहा लेकिन उसके जीवन में जो सच्चाई थी परोपकार था उसने इब्राहिम लिंकन को अमर कर दिया । राष्ट्रपति बना दिया अमेरिका का।

तो जो कर्म निस्वार्थ भाव से है , ईश्वर की प्रसन्नता के लिए है , परोपकार के लिए है वो कर्म यज्ञार्थ हो जाते है। यज्ञार्थ कर्म करने से आदमी कर्मबंधन से छूट जाता है और खुशी से जीवन जीता है। मनु महाराज ने कहा कमाई का दसवा हिस्सा सत्कर्म में लगाना चाहिए । जो कमाई का कुछ हिस्सा सत्कर्म में नही लगाते उनका तो कोर्ट कचहरी में जाता है,  झगड़े बाजी में जाता है, बीमारी में जाता है, और कुछ गड़बड़ में जाता है। ऐसे ही मैं कहता हूँ कमाई का दसवां हिस्सा सत्‍कर्म में लगाना चाहिए लेकिन समय का दसवां हिस्सा अच्छे में अच्छा जो परमात्मा है उसकी प्रसन्नता के लिए सत्‍कर्म में और ध्यान में लगाना चाहिए !अपने पेट के लिए अपने बच्चे और पुत्र परिवार के लिए तो कुत्ता भी पूँछ हिला लेता है क्या बड़ी बात है?

अपने दुःख में रोने वाले तू मुस्कराना सीख ले ,

औरों के दुःख दर्द में तू आँसू बहाना सीख ले । 

आप खाने में मजा नही जो औरों को खिलाने में ,  

जिंदगी है चार दिन की तू किसी के काम आना सीख ले

तन की शोभा है कि परहित के लिए इसका उपयोग हो । मन की शोभा है कि परमात्मा का चिंतन करे । धन की शोभा है कि परमात्मा के दैवी कार्य मे काम आ जाए और बुद्धि की शोभा है कि परमात्‍वतत्व का साक्षात्कार कर ले ! जो लोग अपनी बुद्धि को दूसरों  को लड़ाने झगडाने में लगाते है,  मन को दूसरे की निंदा चुगली  में लगाते है ,  शरीर को भोग भोगने में संसारी विषय विलास में लगाते है वे लोग अन्यत्र कर्म करते है !तो अन्यत्र योनि में जाना पड़ता है!