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ज्ञान के चार प्रकारों को जानो – पूज्य बापू जी


ज्ञान चार प्रकार का होता हैः 1 प्रत्यक्ष 2 परोक्ष 3 अपरोक्ष 4 साक्षात् अपरोक्ष ।

जो इन्द्रियों के सम्मुख है, जो चीज वस्तु आदि इन्द्रियों से अनुभव किये जाते हैं उनको बोलते हैं प्रत्यक्ष । जो अप्रत्यक्ष हो अर्थात् वर्तमान में इन्द्रियों से जिसका अनुभव नहीं होता परंतु जिसके होने में अन्य प्रमाण हो, जैसे कोई दूरस्थ अप्रत्यक्ष स्थान, वस्तु, स्वर्ग आदि लोक, उसको बोलते हैं परोक्ष ।

सूर्य निकली हो, बत्ती जलती हो, सब हो लेकिन उसको देखने के लिए आँख चाहिए । आँख नहीं होगी तो बत्तियाँ और सूरज नहीं दिखेंगे । आँख को देखने के लिए मन चाहिए । मन सो गया हो आँख नहीं दिखेगी । मन को देखने-जानने के लिए बुद्धि चाहिए । बुद्धि से ही जाना जायेगा कि ‘हाँ, आँख देखती है, मन ठीक सोचता है ।’ मन बोलता है, ‘ठूँठा है’ तब बुद्धि निर्णय करेगी कि ठूँठा है कि चोर है । लेकिन मन और बुद्धि में उठने वाले सुख-दुःख आदि भाव, काम-क्रोधादि विकार एवं अनुभव में आने वाली जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्थाएँ – ये प्रत्यक्ष नहीं हैं, परोक्ष नहीं हैं बल्कि अपरोक्ष कहलाते हैं । मन के भाव, विकार, अवस्थाएँ एवं बुद्धि के अनुभव, ज्ञानेन्द्रियाँ – ये सब सामने पड़ी वस्तु की तरह प्रत्यक्ष नहीं हैं और स्वर्ग, नरक, वैकुंठ आदि की तरह परोक्ष भी नहीं हैं अपितु ये मन या बुद्धि द्वारा भीतर अऩुभव किये जाते हैं अतः अपरोक्ष कहलाते हैं । इन मन, बुद्धि को देखने के लिए स्व यानी चैतन्य आत्मा चाहिए । स्व को अर्थात् अपने मैं को देखने के लिए न सूर्य-चन्द्र का प्रकाश चाहिए, न आँख आदि कोई इन्द्रिय चाहिए, न मन-बुद्धि चाहिए, न अन्य कुछ चाहिए और न ही अपना मैं सुख-दुःख, काम-क्रोध, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति – इन सबकी तरह आता-जाता है । इसीलिए अपना आत्मा ‘साक्षात् अपरोक्ष’ है । यह जो साक्षात् अपरोक्ष है इसी को अपने मैं के रूप में जानना इसको बोलते हैं आत्मसाक्षात्कार !

जो अपरोक्ष है परंतु जब तक वृत्ति रहती है तभी तक रहता है वह केवल अपरोक्ष कहलाता है और वृत्ति के अभाव में भी उस अभाव के साक्षी के रूप भी जो विद्यमान रहता है वह साक्षात् अपरोक्ष कहलाता है । साक्षात् अपरोक्ष हम स्वयं अनुभवस्वरूप आत्मा है और हमें संकुचित करने वाला कोई नहीं है, इसलिए हम ब्रह्म हैं ।

अमेरिका हमारे लिए परोक्ष है किंतु वहाँ जाकर उसे देख लें तो वह प्रत्यक्ष हो गया । इस प्रकार जगत की चीजें प्रत्यक्ष और परोक्ष होती हैं, वृत्ति से हुई अनुभूतियाँ अपरोक्ष होती हैं परंतु अपना-आपा साक्षात् अपरोक्ष है । जगत की चीजें मिलती और बिछुड़ती रहती हैं, मन-बुद्धि की अनुभूतियाँ बदलती रहती हैं परंतु अपना-आपा कभी बिछुड़ता ही नहीं, सदा मिला-मिलाया है तथा बदलता भी नहीं, सदा अबदल है । अपना-आपा तो सदा मौजूद है, साक्षात् अपरोक्ष है फिर भी अज्ञान के आवरण से ढका रहता है । पर्दा हटता है तो मिला-सा लगता है जबकि वह हमसे कभी अलग था ही नहीं ।

जो चीज अप्राप्त होती है फिर मिलती है तो उसकी उपलब्धि मानी जाती है । जो चीज प्राप्त है फिर भी वह न दिखकर कुछ और हो के दिखती है तो उसकी भ्रांति मानी जाती है ।

एक महिला अनाज पीस रही थी । अनाज पीसते-पीसते उसके गले का हार (लॉकेट ) पीठ की ओर चला गया, जिसका उसे पता न चला । अनाज पीसने के बाद वह अपना हार ढूँढने लगी । उसने अपनी तिजोरी और थैलियाँ तलाशीं किंतु हार न मिला । इतने में एक समझदार वृद्धा आयी, जिसे महिला ने यह बात बतायी । उस वृद्धा ने देखा कि हार तो इसके गले में ही है परंतु पीछे चला गया है । वृद्धा ने हार को आगे करके कहाः “यह रहा तेरा हार !”

वृद्धा हार कहीं से लायी नहीं थी, वह कहीं गया ही नहीं था, केवल खो जाने की भ्रांति हो गयी थी । वृद्धा ने जब दिखाया तो प्राप्त हार की ही प्राप्ति हुई, अप्राप्त हार की नहीं ।

वेदांत दर्शन में ईश्वर की प्राप्ति नहीं मानी गयी है । ईश्वर किसी को प्राप्त नहीं होता, ब्रह्म किसी को प्राप्त नहीं होता बल्कि प्राप्त हुआ सा लगता है । वह भी किसको ? जिसको नहीं मिला उसको लगता है कि ‘फलाने को मिला’ किंतु जिनको परमात्मानुभव हो गया है उनको नहीं लगता कि उन्हें कुछ मिला है ।

पाया कहे सो बाँवरा, खोया कहे सो कूर ।

पाया खोया कुछ नहीं, ज्यों-का-त्यों भरपूर ।।

परमात्मा कहाँ है, उसे कैसे पायें ?

परमात्मा को पाने वाले को पता नहीं चलता कि मैंने पा लिया है । कोई पूछता हैः ‘महाराज ! पाने वाले को भी पता नहीं चलता ?’ जिसने ठीक से परमात्मा को पाया है वह ऐसा नहीं कहेगा कि ‘मैंने पाया है ।’ पाया किसे जाता है ? जो बिछुड़ा हो, किन्तु कोई अपने-आपसे कैसे बिछुड़ सकता है ? इसीलिए ऐसा नहीं कहा जाता है कि ‘पा लिया’ क्योंकि परमात्मा सदा प्राप्त है ।1

1 कहीं महापुरुष ‘मैंने पाया है’ ऐसा कह भी दें तो यह लौकिक दृष्टि से एवं गौण अर्थ में कहा गया है ऐसा समझना चाहिए, वास्तविक दृष्टि से एवं मुख्य अर्थ में भीतर से वे जानते हैं कि परमात्मा न तो पाया जाता है और न ही खोया जाता है ।

जिन महापुरुषों ने परमात्मा का अनुभव कर लिया है, उनके सत्संग का श्रवण-मनन-निदिध्यासन करे और उसी में स्थिति कर लें तो आपको भी परमात्मा का अनुभव हो सकता है । ….और यह कार्य कठिन नहीं है परंतु विजातीय संस्कारों को हटाना कठिन लगता है ।

विजातीय संस्कारों को कैसे हटायें ?

विजातीय संस्कारों को हटाने का एक तरीका तो यह है कि जैसे एक लोटे में पानी भरा है उसमें आप दूध भरना चाहते हो लेकिन पानी निकालना नहीं चाहते हो तो उसमें दूध भरते जाओ । प्रारम्भ में दूध व पानी दोनों बहेंगे पर एक समय ऐसा आयेगा कि उसमें केवल दूध का ही प्रमाण रह जायेगा । अर्थात् महापुरुषों के पास, उनके सत्संग में आते जाते रहो । ध्यान, जप, सत्संग, कीर्तन आदि करते रहो । धीरे-धीरे विजातीय संस्कार निकलते जायेंगे एवं परमात्मा प्राप्ति के प्रति रूचि बढ़ती जायेगी ।

दूसरा तरीका है कि लोटा पूरा खाली कर दो और उसमें दूध भर दो अर्थात् वैराग्य जाग जाय और आप मकान-दुकान, पुत्र-परिवार – सब छोड़-छाड़कर पहुँच जाओ किन्हीं आत्मानुभवी महापुरुष के आश्रय में । अपने सारे-के-सारे विजातीय संस्कारों को आप उलटे कर दो अर्थात् जगत के संस्कार धुल जायें और फिर आत्मानुभवी महापुरुष के वेदांती अनुभव को अपने में भरते जाओ तो ब्रह्मज्ञान हो जायेगा ।

अर्थात् हम स्वयं में यदि विजातीय संस्कार न भरें तो परमात्मज्ञान होना कठिन नहीं है, आत्मसाक्षातकार होना असम्भव नहीं है । यही कारण है कि जब राजा परीक्षित को श्राप मिला कि ‘सात दिन में मर जाओगे ।’ तब वे जागतिक संस्कारों को उँडेलकर बैठ गये शुकदेव जी महाराज के श्रीचरणों में तो 7 दिन में ही उन्हें ज्ञान हो गया । उनके साथ दूसरे लोग भी सत्संग में बैठे थे लेकिन उनको पूर्ण ज्ञान नहीं हुआ जबकि राजा परीक्षित को हो गया । क्यों ? क्योंकि और सब लोग विजातीय संस्कारों का लोटा भरकर बैठे थे जबकि परीक्षित लोटा खाली करके बैठे थे । ऐसे ही खट्वांग राजा को एक मुहूर्त में ज्ञान हो गया । राजा जनक को घोड़े की रकाब में पैर डालते-डालते ज्ञान हो गया । इस प्रकार जितनी जल्दी विजातीय संस्कार हट जाते हैं, उतनी ही जल्दी परमात्मज्ञान हो जाता है । यह भी कहना पड़ता है कि ‘ब्रह्म का ज्ञान होगा ।’ वास्तव में ब्रह्म का ज्ञान नहीं होता, तत्त्वज्ञान ही ब्रह्म है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2019, पृष्ठ संख्या 5,6 अंक 317

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हे मनुष्य ! तू ईश्वरीय वचन को स्वीकार कर


अपक्रामन् पौरूषेयाद् वृणानो दैव्यं वचः ।

प्रणीतीरभ्यावर्तस्व विश्वेभिः सखिभिः सह ।।

‘हे मनुष्य ! पुरुषों की, मनुष्यकृत बातों से हटता हुआ देव-संबंधी, ईश्वरीय वचन को श्रेष्ठ मान के स्वीकार करता हुआ तू इन दैवी उत्तम नीतियों का, सुशिक्षाओं का अपने सब साथी मित्रों सहित सब प्रकार से आचरण कर ।’ (अथर्ववेदः कोड 7 सूक्त 105, मंत्र 1)

सामान्य मनुष्य दिन का काफी समय क्या सुनता है ? दुनियावी खबरें, जगत की वस्तुओं की प्रशंसा या घटनाओं के वर्णन, दूसरों की निंदा-स्तुति की बातें, मिथ्या जगत में सत्यबुद्धि बढ़ाने वाली बातें, मनोरंजन की बातें आदि-आदि ।

ब्रह्मवेत्ता संत श्रीमद् आद्य शंकराचार्य जी के चित्त में जब यह प्रश्न उठा कि ‘श्राव्यं सदा किम् ? अर्थात् सदा सुनने योग्य क्या है ?’ तब उन्होंने अपने आत्मा की गहराई में गोता लगाया और उन्हें उत्तर मिला ‘गुरुवेदवाक्यम्’ अर्थात् सद्गुरु और वेद के वचन । ये सदा सुनने योग्य क्यों कहे गये हैं ? इसे जानने के लिए हम भी थोड़ा गहराई में जाँचें ।

चार प्रकार के प्रमाण

प्रमाकरणं प्रमाणम् । ‘प्रमा’ पाने सत्य ज्ञान और ‘करण’ याने साधन । सत्य ज्ञान की प्राप्ति के  साधन ‘प्रमाण’ कहलाते हैं । न्यायसूत्र (1.1.3) के अनुसार ये चार प्रकार के हैं – प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द प्रमाण ।

जो इन्द्रियों के सम्मुख है वह प्रत्यक्ष प्रमाण है । जिसके द्वारा अऩुमान करके किसी दूसरी वस्तु का ज्ञान पाया जाता है वह अनुमान प्रमाण है । किसी जानी हुई वस्तु की समरूपता से न जानी हुई वस्तु का ज्ञान जिस प्रमाण से होता है वह उपमान प्रमाण है । चौथा है शब्द प्रमाण ।

क्या है ‘शब्द प्रमाण’ ?

शब्द प्रमाण में एक तो आते हैं वेद-वचन और दूसरे हैं आप्तपुरुषों के वचन ।

‘न्याय दर्शन’ के प्रणेता महर्षि गौतम ने न्यायसूत्र (1.1.7) में  ‘शब्द प्रमाण किसे कहते हैं यह स्पष्ट करते हुए लिखा है कि ‘आप्तोपदेशः शब्दः ।’ अर्थात् आप्तपुरुष का वाक्य शास्त्र प्रमाण है । जिन्होंने स्वयं का, वेदनिर्दिष्ट अपने ब्रह्मस्वरूप का अनुभव किया हो ऐसे महापुरुष के वचन परम विश्वसनीय होते हैं और वे ब्रह्मवेत्ता महापुरुष ‘आप्तपुरुष’ कहे जाते हैं । आप्तपुरुष ही वस्तु के यथार्थ स्वरूप को जानते हैं । इसलिए उनके उपदेश को ‘शब्द प्रमाण’ कहा गया है । उपदेश में कल्याण का भाव निहित होता है । आप्तपुरुष सबका मंगल, सबका भला हो इस मंगल भाव से भरकर सबको सच्चा ज्ञान देते हैं, कल्याण का मार्ग दिखाते हैं, उस पर चलने की प्रेरणा, शक्ति देते हैं ।

वेदों, उपनिषदों के ज्ञान का अपने आत्मरूप में अनुभव करके लोगों को समझाने की शक्ति, भाषा-शैली व युग के अनुरूप दृष्टांतों आदि के माध्यम से जब वही अपौरूषेय वैदिक ज्ञान वेदांतवेत्ता, ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों के श्रीमुख से वचनों के रूप प्रवाहित होता है तब वे वचन भी शब्द प्रमाण माने जाते हैं और उन वचनों से ब्रह्मप्राप्ति होती है । ब्रह्मनिष्ठ महापुरुषों का जीवन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है । श्री योगवासिष्ठ महारामायण, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भगवदगीता, विचारसागर तथा और भी जो वेदांत के सद्ग्रंथ हैं, पूज्य बापू जी जैसे वेदांतवेत्ता आत्मानुभवी महापुरुष के जो अमृतवचन हैं, जिन्हें ‘ऋषि दर्शन’, ‘ऋषि प्रसाद’, ‘लोक कल्याण सेतु’ एवं सत्साहित्य, डी.वी.डी., एम. पी. थ्री आदि के माध्यम से घर पर बैठे समाज प्राप्त कर रहा है वे भी शब्द प्रमाण है । सत्संग-अमृत के साथ इन आप्तपुरुष के प्रत्यक्ष सान्निध्य-दर्शन का भी लाभ मिले तो व्यक्ति, परिवार और समाज का कितना कल्याण होता है और हो सकता है यह असंख्य लोगों ने देखा है, जानते-मानते हैं ।

मानवी मति माया-अंतर्गत होने से सीमित है अतः उससे जो बातें उपजती हैं वे भी सीमित, काल्पनिक और सांसारिक व्यक्ति वस्तु-परिस्थितियों से संबंधित होती हैं । किंतु ब्रह्मनिष्ठ महापुरुषों के वचन मति से नहीं बल्कि ऋतम्भरा प्रज्ञा से प्रस्फुटित होते हैं । मति जब यह अनुभव कर लेती है कि उसका ‘मति’ रूप काल्पनिक है, वास्तव में अखंड, अद्वैत, एकरस परमात्मा ही है, अन्य कुछ नहीं है तब वह ‘ऋत’ माने सत्य से ओतप्रोत प्रज्ञा (मति) ‘ऋतम्भरा प्रज्ञा’ कहलाती है । अतः उससे स्फुरित विचार या शब्द जब महापुरुषों के श्रीमुख से प्रवाहित होते हैं तब वे ‘शब्दब्रह्म’ कहलाते हैं एवं अपौरूषेय वेद-वाणी, ईश्वरीय वचन के रूप में विश्वपूजित होते हैं तथा उनका आदरपूर्वक श्रवण-मनन करके आत्मकल्याण किया जाता है ।

संत तुकाराम जी कहते हैं- “तुका तरी सहज बोले वाणी । त्याचें घरीं वेदांत वाहे पाणी ।।

अर्थात् तुकाराम वाणी से सहज वचन बोलते हैं, वेदांत उनके घर पानी भरता है ।” तात्पर्य ,ब्रह्मवेत्ता महापुरुष द्वारा सहज में निकली हुई वाणी भी वेदांत के रहस्यों का उद्घाटन करती है ।

ब्रह्मवेत्ता संत निलोबाजी कहते हैं- “संतों के श्रीमुख से निकलने वाले सहज वचन भी वेद वचन ही होते हैं क्योंकि वे अखंडरूप से वेदों का ही चिंतन करते हैं, जिससे उनके मुख से वेद ही बहते हैं ।”

सद्गुरु की आवश्यकता क्यों ?

अपौरूषेय वेद-ज्ञान गूढ़ और समझने में कठिन है । ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु के मार्गदर्शन बिना अपने ही मन से कोई वेदों, उपनिषदों का अध्ययन करके उनका अर्थ समझने की कोशिश करे तो उसे अपनी कल्पना, अपनी मति के अनुरूप थोड़ी-बहुत समझ मिल सकती है, थोड़ा-बहुत सुख-शांति का आभास हो सकता है प उन सद्ग्रंथों के वचनों का जो लक्ष्यार्थ है, जहाँ वे वचन दिशा-निर्देश करके अपने-आपको भी हटा लेते हैं अर्थात् उस आत्मा-परमात्मा को वाणी या शब्दों से परे ‘वर्णनातीत’ बता देते हैं, वह जो लक्षित आत्मस्वरूप है उसे तो उस निःशब्द स्वरूप के अनुभवी महापुरुषों के बिना जाना ही कैसे जा सकता है ?

स्वामी शिवानंद जी द्वारा विरचित ‘गुरुभक्तियोग’ सत्शास्त्र में स्पष्ट शब्दों में कहा गया हैः ‘साधक कितना भी बुद्धिमान हो फिर भी सद्गुरु अथवा आध्यात्मिक आचार्य की सहाय के बिना वेदों की गहनता प्राप्त करना या उनका अभ्यास करना उसके लिए सम्भव नहीं है ।’

इसलिए वेदों को सागर की तरह बताया गया है और ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों को मेघ की तरह । सागर का पानी सीधे न तो पीने के काम आता है और न ही उससे भोजन बनाया जा सकता है लेकिन जैसे सागर के पानी को सूर्य की किरणें उठाती हैं एवं वही पानी जब मेघ के रूप में बरसता है तो अमृत के समान मधुर हो जाता है । ऐसे ही वेदरूपी सागर से उपनिषदों का मधुर, सुपाच्य, सारभूत ज्ञानामृत ब्रह्मवेत्ता संत उठाते हैं और फिर जब सबका मंगल, सबका भला हो इस कारूण्यभाव से भरकर बरसाते हैं तो हमारे लिए वह सत्संग-अमृत बन जाता है ।

श्री गुरुग्रंथ साहिब में आता हैः

वाणी गुरु गुरु है वाणी, विचि1 वाणी अंम्रितु2 सारे ।

1 भीतर 2 अमृत

पूज्य बापू जी के सत्संग में आता हैः “वेद पढ़ने से किसी को आत्मसाक्षात्कार हो जाय, इसका कोई भरोसा नहीं है किंतु ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु के वचनों से आत्मसाक्षात्कार कइयों के जीवन में हुआ है ।”

संत कबीर जी ने कहा हैः

गुरु बिन ज्ञान न उपजे, गुरु बिन मिटे न भेद ।

गुरु बिन संशय ना मिटे, जय जय जय गुरुदेव ।।

श्रेष्ठ सुनीति, सुशिक्षा हैं ये वचन

श्रोत्रिय ब्रह्मवेत्ता महापुरुष या सद्गुरु के आत्मानुभव-सम्पन्न वचन श्रेष्ठ सुनीति, सुशिक्षा हैं और वे वचन हमें दुःख, बाधा, अशांति, कष्ट, उद्वेग आदि से परे ले जाकर अपने अखंडस्वरूप परमात्मदेव का प्रसाद हमारे हृदय में प्रकटाने की क्षमता रखते हैं । अतः अपने मित्रों, साथियों सहित स्वयं उन्हीं वचनों को सर्व प्रकार से स्वीकार कर आचरण में लाने की शिक्षा वेद भगवान दे रहे हैं । मनुष्यकृत वचन जगत की सत्यता बढ़ाते हैं जबकि सद्गुरु के मुख से प्रवाहित वैदिक ज्ञान-गंगा जगत की सत्यता को मिटा के आत्मा-परमात्मा की सत्यता हमारे हृदय में दृढ़ करती है । ईश्वर की सत्यता माने अपने अमिट आनंदस्वरूप की सत्यता, अपने वास्तविक मैं की सत्यता । सद्गुरुवचन के श्रवण, मनन और निदिध्यासन मात्र से अपने-आप में ही आनंद और सुख-शांति की प्राप्ति होती है यह अनेक साधकों और वेदांत के जिज्ञासुओं का अनुभव है । अतः वेद भगवान के ये वचन बड़ा ज्ञानांजन प्रदान करने वाले हैं ।

अपौरूषेय वेद-ज्ञान को हर व्यक्ति को नहीं समझ सकता लेकिन गुरुसेवा, गुरु-शरणागति और गुरु की एकनिष्ठ भक्ति की ऐसी भारी महिमा है कि इनके द्वारा सत्यकाम जाबाल, तोटकाचार्य, पूरणपोड़ा, शबरी भीलन, बहिणाबाई जैसे अशिक्षित शिष्य, भक्त भी भगवद्-तत्त्व का साक्षात्कार कर पार हुए हैं । इसलिए भगवान शिवजी ने कहा हैः

ज्ञानं विना मुक्तिपदं लभ्यते गुरुभक्तितः ।

गुरोः समानतो नान्यत् साधनं गुरुमार्गिणाम् ।।

‘गुरुदेव के प्रति (अनन्य) भक्ति से ज्ञान के बिना भी मोक्षपद मिलता है । गुरु के मार्ग पर चलने वालों के लिए गुरुदेव के समान अन्य कोई साधन नहीं है ।’ इसलिए गुरुभक्तियोग को ‘सलामत योग’ भी कहा गया है ।

आज प्रचार-प्रसार के आधुनिक साधन तो बहुत हो गये किंतु इनसे जगत की सत्यता बढ़ाने वाली बातों का ही प्रचार अधिक बढ़ा है । साधन बुरे नहीं हैं लेकिन उनका दुरुपयोग होना बुरा है । अतः बड़ा उपकार है पूज्य बापू जी जैसे वेदांतवेत्ता, ब्रह्मनिष्ठ महापुरुषों का, जिन्होंने इन्हीं आधुनिक साधनों का सदुपयोग करके विश्वभर में वेदांत-ज्ञान, ब्रह्मज्ञान का प्रचार कराया है और धनभागी हैं वे शिष्य, भक्त एवं सज्जन, जो इस दिव्य ज्ञान को व्यापक समाज तक पहुँचाने के दैवी कार्य में सहभागी बनते हैं ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2019, पृष्ठ संख्या 2, 28,29 अंक 317

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मूर्ख शिरोमणियों की खोज


एक राजा ने अपने महामंत्री को आदेश दियाः “जाओ, अपनी जनता में जो दो सबसे बड़े मूर्ख हों, उन्हें दरबार में लाओ । उन मूर्खों को ‘मूर्ख शिरोमणि’ की उपाधि देंगे ।”

मंत्री महामूर्खों की तलाश में लग गया । कुछ दिन बाद वह दरबार में आया । उसको अकेले देखकर राजा ने पूछाः “मंत्री ! तुम्हारे साथ कोई मूर्ख नहीं दिख रहे हैं । क्या तुम उन्हें ढूँढने में असफल रहे ?”

“नहीं राजन् ! मैं सफल रहा पर उन्हें पहचानने में देर हुई । वे दोनों महामूर्ख तो अपने दरबार में ही हैं । अभयदान मिले तो बताऊँ ।”

“मेरे प्राणप्रिय मंत्री ! तुम्हें प्राणों की चिंता ! हिचको मत, दे दिया तुम्हें अभयदान ।”

“राजन् ! बुरा न मानें । राज्य का दूसरा सबसे बड़ा मूर्ख…. आप ही हैं !”

“मैं…. ! अरे महामूर्ख ! निर्लज्ज ! अब मैं अभयदान से बँधा हूँ वरना… बता मैं दूसरा महामूर्ख कैसे ?”

“साफ है नरेश ! जो राजा अपने राज्य में निवास करने वाले संतों-महापुरुषों एवं धर्मज्ञ सात्त्विक विद्वानों की खोज न कराके मूर्खों की खोज कराये, संतों का आदर न करके मूर्खों को सम्मानित कराये, वह मूर्ख नहीं तो और क्या है !”

“यदि मैं दूसरा हूँ तो मूर्खों में प्रथम कौन है ?”

“वह तो मैं ही हूँ । एक आत्मानुभवी जागृत महापुरुष के सत्संग में जाने से अब मेरा विवेक जागृत हुआ है कि आप तो ज्यादा सोचे-समझे बगैर जैसा मन में फुरना आया वैसा आदेश दे के किनारे हो गये लेकिन मैं तो थोड़ा-सा वेतन कमाने के लिए आपके ऐसे बेतुके आदेशों पर अमल करने में अपना अनमोल मनुष्य जीवन नष्ट कर रहा हूँ ।

सम्राट के साथ राज्य करना भी बुरा है, न जाने कब रुला दे !

सद्गुरु के साथ भीख माँगकर रहना भी अच्छा है, न जाने कब मिला दें !

आज मैं अपनी मूर्खता को छोड़ रहा हूँ । मैं मंत्री पद का त्याग कर रहा हूँ ।”

“मंत्री ! मुझे क्षमा करो । तुम्हारा यही निर्णय है तो मैं भी इसी समय अपनी मूर्खता छोड़ने का संकल्प कर रहा हूँ । तुम मुझे भी उन जागृत महापुरुष के सत्संग में ले चलो जिनके सत्संग में जाने से तुम्हारा यह विवेक जगा । तुम्हारा यह राजा अब जनता के दिलों पर राज करने वाले उन ‘महाराज’ के दर्शन-सत्संग से अपनी सूझबूझ बढ़ाना चाहता है । उनका सम्मान-सत्कार कर अपनी महामूर्खता का मार्जन (शुद्धीकरण) करना चाहता है ।”

“अवश्य ! अवश्य चलिये महाराज !”

मंत्री अपना पद छोड़ के उन आत्मपद में जगह हुए संत से शिक्षा-दीक्षा पा के ईश्वरप्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर हुआ और राजा ने भी उनसे दीक्षा ले के उनके मार्गदर्शन में अपना शासन ‘कर्मयोग’ में  परिणत कर लिया ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2019, पृष्ठ संख्या 24 अंक 316

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