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योगस्थः कुरु कर्माणि…..


अक्ष्युपनिषद् में भगवान सूर्यनारायण सांकृति मुनि से कहते हैं- “असंवेदन अर्थात् आत्मा-परमात्मा के अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तु का भान न  हो – ऐसी स्थिति को ही योग मानते हैं, यही वास्तविक चित्तक्षय है । अतएव योगस्थ होकर कर्मों को करो, नीरस अर्थात् विरक्त हो के मत करो ।”

इसी सिद्धान्त को सरल शब्दों में समझाते हुए भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज कहते हैं- “परमात्मा के अतिरिक्त पदार्थों की सत्ता है ही नहीं । जब हम उस सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करके उसकी ओर चलते हैं तो हमारे पास उपलब्ध पदार्थों का उपयोग भी उसी सत्कार्य में होता है । अतः उनकी शोभा बढ़ती है परंतु जब हम उस ‘एक’ का अस्तित्व भुला बैठते हैं तो हमारे पास शून्यरूपी वस्तुएँ कितनी भी क्यों न हों, वे दुःखदायी ही होती हैं तथा पापकर्म और जन्म-मरण का कारण बनती हैं । दुःख संसार में है परंतु आत्मा में तो संसार है ही नहीं और वह आत्मा हमारी जान है । यदि उस आत्मा को पाने का यत्न करोगे तो तुम्हें आनंद और सुख के अतिरिक्त कुछ दिखेगा ही नहीं ।”

अतः कर्म करने का ढंग यही है कि योगस्थः कुरु कर्माणि…. योग में स्थित हुआ कर्तव्य-कर्मों को कर ।’ (गीताः 2.48)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2019, पृष्ठ संख्या 17 अंक 315

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अपने में हनुमान जी के गुण धारण करो


श्री हनुमान जयंतीः 19 अप्रैल 2019

कर्म को, भक्ति को योग बनाने की कला तथा ज्ञान में भगवद्योग मिलाने की कला हनुमान जी से सीख लो, हनुमान जी आचार्य हैं । लेकिन जिसके पास भक्ति, कर्म या योग करने का सामर्थ्य नहीं है, बिल्कुल हताश-निराश है तो…. ? ‘मैं भगवान का हूँ, भगवान की शरण हूँ….’ ऐसी शरणागति योग की कला भी हनुमान जी के पास है । हनुमान जी राम जी की तो सेवा करते हैं लेकिन रामभक्तों की भी समस्याओं का हल करने के लिए उनके सपने में जा-जाकर उनका मार्गदर्शन करते हैं । कई ऐसे भक्त हैं जो बताते हैं कि ‘हनुमान जी सपने में आये, बोलेः बापू से दीक्षा ले लो ।’

वायुपुत्र हनुमान जी, वायु देवता, अंतरात्मा देवता हमारा मंगल चाहते हैं । हम भी सभी का मंगल चाहें तो भगवान के स्वभाव से हमारे स्वभाव का मूल एकत्व हमें समझ में आने लगेगा । ऐसी कोई तरंग नहीं जो पानी न हो । ऐसा कोई घड़े का आकाश नहीं जो महाकाश से अलग हो । ऐसा कोई जीवात्मा नहीं जो परमात्मा से अलग हो । लेकिन काम, क्रोध, वासना, कर्तृत्व-अभिमान ने जीवन को भुलावे में डाल दिया ।

सेवक हो तो ऐसा

वाणी के मौन से शक्ति का संचार होता है, मन के मौन से सिद्धियों का प्रादुर्भाव होता है और बुद्धि के मौन से आत्मा-परमात्मा के ज्ञान का साक्षात्कार होता है । हनुमान जी कम बोलते थे, सारगर्भित बोलते थे । आप अमानी रहते थे, दूसरों को मान देते । यश मिले तो प्रभु जी के हवाले करते, कहीं गलती हो जाय तो गम्भीर भी इतने की सिर झुकाकर राम जी के आगे बैठते थे । प्रेमी भी इतने कि जो भरत कर सके, लक्ष्मण न कह सकें वह खारी, खट्टी-मीठी बात हनुमान जी कह देते थे ।

यदि भरत राम जी से बोलें कि “आप मेरे कंधे पर बैठिये ।” तो राम जी नहीं बैठेंगे । लक्ष्मण जी कहें कि “आपके कोमल चरण धरती पर…. एड़ियाँ फट गयीं, पैरों में काँटे चुभ रहे हैं…. आप मेरे कंधे पर बैठिये ।” तो राम जी नहीं बैठेंगे । लेकिन हनुमान जी कहते हैं कि “प्रभु जी ! आपके कोमल चरण कठोर, पथरीली धरती पर…. मैं तो पशु हूँ । आइये, आप और लक्ष्मण जी – दोनों मेरे कंधे पर बैठिये ।”

दोनों भाई बैठ गये और हनुमान जी ‘जय श्री राम !’ कह के उड़ान भरते हैं ।

हनुमान जयंती पर हनुमान जी की उपासना व स्मृति बुद्धि, बल, कीर्ति और धीरता देने वाली है । निर्भीकता, आरोग्य, सुदृढ़ता और वाक्पटुता चाहने वाले लोग भी हनुमान जयंती के दिन हनुमान जी की गुणगाथा सुनकर अपने में वे गुण धारण करने का मन बना लेंगे तो उनका संकल्प भी देर-सवेर फल दे सकता है ।

आम आदमी मन चाहे देवी देवता, भगवान की भक्ति में लगते हैं और वही भक्ति का फल उन्हें आत्मसाक्षात्कारी महापुरुषों तक पहुँचा देता है । सुयोग्य साधक के लिए तो

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम् ।

मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ।।

राजकुमार प्रचेताओं ने ऐसी तो साधना की कि शिवजी प्रकट हो गये व शिवजी से विष्णु जी के दर्शन का विष्णु-स्तवन का साधन, मंत्र लिया ।

विष्णु जी प्रसन्न हुए, प्रकट होकर बोलेः “तुम्हें देवर्षि नारदजी का सत्संग मिलेगा ।” देवर्षि नारदजी ने उन्हें फिर आत्मसाक्षात्कार करा दिया । रामकृष्णदेव को माँ काली ने तोतापुरी गुरु के पास पहुँचाया और गुरु ने उन्हें साकार के मूल निराकार तत्त्व में, जीव-ब्रह्म के एकत्व में पूर्णता दिलायी । हमने भी बाल्यकाल से देवी-देवता, श्रीकृष्ण, हनुमान जी आदि की साधना-उपासना की । ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज  मिले तो ‘ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः’ गुरुकृपा का लाभ लिया ।

गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई ।

जौं बिरंचि1 संकर2 सम होई ।। (रामायण)

सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ।। (गीताः 4.33)

सारी साधनाओं व पूजा का फल यह है कि ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु मिले । रामकृष्णदेव आत्मसिद्धि को प्राप्त हुए तोतापुरी गुरु की कृपा से । प्रचेता नारदजी की, छत्रपति शिवाजी समर्थ रामदास जी की, नामदेव जी विसोबा खेचर की कृपा से और हम ‘ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः’ अपने गुरुदेव से….।

1 ब्रह्मा जी 2 शंकर जी

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2019, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 315

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रामराज्य की स्थापना कैसे हो ?


श्री राम नवमीः 13 व 14 अप्रैल 2019

रामायण का आध्यात्मिक अर्थ बताने वाले संत कहते हैं कि दस इन्द्रियों में रमण करने वाला जो दशरथ ‘जीव’ है, वह कहता है कि “अब इस हृदय-गादी पर जीव का नहीं, राम का राज्य होना चाहिए ।” गुरु बोलते हैं कि “हाँ, करो !” गुरु जब रामराज्य की हामी भरते हैं तो दशरथ को खुशी होती है लेकिन रामराज्य होने के पहले दशरथ कैकेयी की बातों में आ जाते हैं ।

दशरथ की 3 रानियाँ बतायी गयी हैं – कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी अर्थात् सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण । जब रजोगुण और सत्वगुण में से हटकर दशरथरूपी जीव तमोगुण में फँसता है, कैकेयी अर्थात् कीर्ति में, वासना में फँसता है तो रामराज्य के बदले राम-वनवास होता है तो दशरथ भी चैन से नहीं जी सकता है । और समाज में देखो, कोई दशरथ चैन से नहीं है । ज्यादा या कम धनवाला, ज्यादा या कम पढ़ा, मोटा अथवा पतला, नेता या जनता…. सब बेचैन हैं । क्यों ? कि राम-वनवास है ।

आत्माराम से मुलाकात हेतु….

राम जी के साथ सीता जी थीं । ‘राम’ माने ‘ब्रह्म’ और ‘सीता’ माने ‘वृत्ति’ । राम के करीब हैं सीता किन्तु उनकी नज़र स्वर्ण-मृग पर जाती है । राम को बोलती हैं- “मुझे वह मृग ला दो !” जब सोने के मृग पर तुम्हारी वृत्तिरूपी सीता जाती है तो उसका राम से वियोग हो जाता है । सोने के मृग अर्थात् धन-दौलत पर जब व्यक्ति का चित्त जाता है तब वह आत्माराम से विमुख हो जाता है । फिर लंका अर्थात् स्वर्ण मिलता है लेकिन शांति नहीं मिलती है । उसी वृत्ति को यदि राम जी का मिलन कराना हो तो बीच में हनुमानजी चाहिए ।

जाम्बवंत को बुलाया, इसको बुलाया, उसको बुलाया… कोई बोलता है, ‘एक योजन कूदूँगा’, कोई दो योजन कहता है…. हनुमान जी 100 योजन समुद्र कूद गया । नापा जाय तो दक्षिण भारत के सागर-किनारे से लंका 100 योजन नहीं है परंतु शास्त्र की बातें गूढ़ हैं । जीवन जो 100 वर्षों वाला है, उसके रहस्य को पाने के लिए छलाँग मारने का अभ्यास और वैराग्य हो । हनुमान जी को अभ्यास व वैराग्य का प्रतीक कहा गया है । हनुमान जी सीता जी को राम जी से मिला देंगे अर्थात् अभ्यास और वैराग्य – ये वृत्ति को ब्रह्म में विलीन कर देंगे ।

वृत्ति को मजबूत बनाने के लिए….

राम जी उत्तर में हुए और रावण दक्षिण की तरफ । उत्तर ऊँचाई है और दक्षिण निचाई है । इसका तात्त्विक अर्थ है कि मनुष्य की वृत्तियाँ शरीर के निचले हिस्से में रहती हैं । जब वह काम से घिर जाता है, क्रोध से भर जाता है तो सीता अर्थात् उसकी वृत्ति नीचे आ जाती है । सीता जब रावण के करीब होती है तो ज्यादा बेचैन होती है । वह ज्यादा समय वहाँ ठहर नहीं सकती है । काम के करीब व्यक्ति की सीतारूपी वृत्ति ज्यादा समय ठहर नहीं सकती है । चित्त में काम आ जाता है तो बेचैनी आ जाती है, जब ‘राम’ आ जाता है तो आनंद-आनंद हो जाता है । रावण की अशोक वाटिका में सीता जी नजरकैद हैं लेकिन सीता में निष्ठा है तो रावण अपना मनमाना कुछ कर नहीं पाता है । ऐसे ही वृत्ति में यदि दृढ़ता है, आत्माराम के प्रति पूर्ण आदर है तो काम व्यक्ति को नचा नहीं सकता है । जैसे सीता के संकल्प को मजबूत बनाने के लिए जप, तप, स्वाध्याय, सुमिरन चाहिए ऐसे ही इन चित्तवृत्ति को दृढ़ बनाने के लिए साधन-भजन चाहिए ।

रावण कैसे मरेगा ?

रावण मर नहीं रहा था । विभीषण से पूछा गया कि “कैसे मरेगा ?”

बोलेः “जब तक आपका बाण रावण की नाभि में नहीं लगेगा तब तक वह नहीं मरेगा ।” अर्थात् कामनाएँ नाभिकेन्द्र में रहती हैं । योगी जब कुंडलिनी योग करते हैं तो मूलाधार चक्र में स्पंदन होता है, फिर स्वाधिष्ठान चक्र में खिंचाव होता है । जन्म जन्मांतरों की जो वासनाएँ, कामनाएँ हैं उनको धकेलने के लिए चित्तवृत्ति अर्थात् जो सीता माता है वह डाँटती-फटकारती है । जब डाँट-फटकार चालू होती है तो साधक के शरीर में क्रियाएँ होने लगती हैं । कभी रावण का प्रभाव दिखता है तो कभी सीता का । साधक के जीवन में कभी कामनाओं का तो कभी सद्विचारों का प्रभाव दिखता है ।

सीता जी को राम के करीब लाना है तो बंदर, रीछ – सभी साथ देते हैं । गिलहरियाँ भी साथ देने लगीं, रेती के कण उठाकर समुद्र में डालने लगीं । तुम यदि अपनी वृत्ति को परमात्मा के रास्ते लगाते हो तो प्रकृति और वातावरण तुम्हें अनुकूलता व सहयोग भी देते हैं । तुम यदि भोग की तरफ होते हो तो वातावरण तुम्हें नोच भी लेता है ।

उससे बड़ा दिन कोई नहीं !

जब तक राम नहीं आये थे तब तक अयोध्या सूनी थी । ‘राम जी आ रहे हैं’ – ऐसी सूचना जब अयोध्यावासियों ने सुनी तो नगर को सजाया है, साफ-सफाई की है । राम आने को होते हैं तो साफ-सफाई पहले हो जाती है । ऐसे ही जब परमात्म-साक्षात्कार होता है तो तुम्हारे चित्तरूपी, देहरूपी नगर के कल्मष पहले कट जाते हैं, पाप, मल1, विक्षेप2 – सब हट जाते हैं । तुम स्वच्छ, पवित्र हो जाते हो । राम जब नगर में प्रवेश करते हैं वह दिन दीपावली का दिन माना जाता है । लौकिक दीवाली व्यापारी पूजते हैं लेकिन साधक की दीवाली तो तब है जब हृदय छुपे हुए जो आत्माराम ‘काम’ के करीब गये हैं वृत्तिरूपी सीता को छुड़ाने के लिए, वे अपने सिंहासन पर आ जायें, अपने स्वरूप में जागृत हो जायें । बड़ा दिन तो वह है जब बड़े-में-बड़े परमात्म-तत्त्व का ज्ञान हो, उससे बड़ा दिन कोई नहीं ।

1 चित्त की मलिनता, जो कि काम, क्रोध, लोभ आदि विकारों आती है ।

2 चित्त की चंचलता ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2019, पृष्ठ संख्या 11,12 अंक 315

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