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समय रहते उनसे जगदीश्वर की मुलाकात का पाठ पढ़ लें-पूज्य बापू जी


एक बार सूफी संत मौलाना जलालुद्दीन अपने शिष्यों के बीच बैठे थे । सब कीर्तन ध्यान की मस्ती में मस्त थे । किसी कॉलेज के प्रोफेसर अपने मित्रों के साथ घूमते-घामते वहाँ आ पहुँचे । उन्होंने सुना था कि ‘यहाँ ध्यान, साधना कराने वाले और आत्मविद्या का प्रसाद बाँटने वाले एक अलमस्त फकीर और उनके शिष्य रहते हैं ।’ वे लोग कुतूहलवश ही  वहाँ जा पहुँचे ।

देखा कि मौलाना 50-60 साल की उम्र के लगते हैं और अपने शिष्यों को आत्ममस्ती में मस्त बना रहे हैं । कोई नाच रहा है, कोई हँस रहा है, कोई काँप रहा है, कोई घूम रहा है, कोई चुप होकर बैठा है ।

यह सब देखकर उन्होंने अपनी मति से संत को और उनके व्यवहार को तौलना शुरु किया ।

एक ने कहाः “अजीब फकीर हैं ये ! किस ढंग से सबको मस्त बना रहे हैं !”

दूसरे ने कहाः “अरे ! यह आदमी खतरनाक मालूम होता है । सबको पागल बना रहा है ।”

तीसरे ने कहाः “यह कोई ध्यान है ? ध्यान में कभी हिलचाल होती है ? नाचना-गाना होता है ? ध्यान तो चुपचाप बैठकर किया जाता है ।”

चौथे ने कहाः “कुछ भी हो लेकिन ये लोग मस्ती तो ले रहे हैं । ध्यान कैसा होता है, यह तो हमें पता नहीं पर ये लोग कुछ अजीब मस्ती में मस्त हैं । इनका रोम-रोम खुशी की खबरें दे रहा है ।”

तब किसी ने कहाः “जिस विषय का पता न हो उस विषय में बोलना बेवकूफी है । चलो, बेकार में समय मत गँवाओ ।”

उस वक्त वे मूर्ख लोग अपना-अपना अभिप्राय देकर चलते बने । फिर कुछ महीनों के बाद स्कूल-कॉलेज की छुट्टियाँ आयीं । तब उनको हुआः ‘चलो, वहीं चलें ।’ वे लोग फिर से गये पर शिष्य होकर नहीं, साधक हो के नहीं, केवल दर्शक हो के गये ।

जो लोग दर्शक होकर महापुरुषों के द्वार पर जाते हैं, उनकी जैसी-जैसी मान्यताएँ होती हैं वैसा-वैसा अर्थ वे निकालते हैं । वे लोग संत-दर्शन का या संत के ज्ञान का कुछ फायदा नहीं ले पाते हैं । जो लोग प्यास लेकर जाते हैं, जिज्ञासा ले के जाते हैं उनमें कुछ सात्त्विकता होती है जिससे ऐसे लोगों को लाभ भी होता है ।

प्रोफेसर और उनके साथी विद्वता का भूत अपनी खोपड़ी में रखकर संत के पास पहुँचे । इस बार उन्होंने देखा कि संत के सामने लोग बड़ी शांति से बैठे हैं । न कोई नाच रहा है, न गा रहा है, न हँस रहा है, न रो रहा है, न काँप रहा है, न चिल्ला रहा है । जलालुद्दीन भी मौन हैं, शांत हैं ।

तब उस टुकड़ी के मूर्खों ने अपना अभिप्राय देना शुरु कर दियाः “हाँ, अब ये लोग ध्यान में हैं । अब जलालुद्दीन और उनके शिष्यों को कुछ अक्ल आयी । पहले तो ये बिगड़े हुए थे, अब सुधर गये हैं ।

जो लोग खुद बिगड़े हुए हैं उनको ही साधक लोग, भक्त लोग बिगड़े हुए दिखते हैं । ऐसे लोग ‘रॉक एंड रोल’ में नाचेंगे, फिल्म की पट्टिया  देखकर तो हँसेगे-रोयेंगे लेकिन भगवान के लिए भाव में आकर न हँसेंगे, न रोयेंगे, न नाचेंगे । वहाँ अपने को सभ्य समझेंगे और भगवान के लिए हँसना, रोना, नाचना असभ्यता मानेंगे । वे बेचारे अंदर की मस्ती लेने की कला ही नहीं जानते हैं ।

ऐसे ही प्रोफेसर और उनके साथियों ने, बेचारों ने अपना मत दियाः “हाँ, अब ठीक है । अब चुप होकर बैठे हैं । महाराज भी चुप हैं, लोग भी चुप हैं, अच्छा है । अब ये लोग सुधर गये हैं । अब साधना करते रहेंगे, ध्यान करते रहेंगे तो कभी-न-कभी परमात्मा को पा लेंगे ।”

तब किसी ने कहाः “वह ठीक था या यह ठीक है, ऐसा कहना ही ठीक नहीं है । वैसे ही पहले से अपने पाप ज्यादां कि हम इन लोगों की तरह मस्ती में मस्त नहीं हो पाते हैं, ऊपर से संतों और साधकों के संबंध में अभिप्राय देकर पाप का बोझ बढ़ाना उचित नहीं है । हमें चुप रहना चाहिए ।”

किसी ने कहाः “चलो, बेकार की बातों में समय मत गँवाओ ।” उस वक्त भी वे चले गये पर मौका मिला तो आये बिना नहीं रह पाये । अब की बार देखा तो जलालुद्दीन अकेले हैं । आकाश की ओर उनकी निगाहें हैं । उनके रोम-रोम से चैतन्य की मस्ती बिखर रही है । उनके अस्तित्व से मौन (शांति) और आनंद की खबरें मिल रही हैं ।

…..उसे फिर कुछ सीखना नहीं पड़ता

प्रोफेसर उनके सामने आकर बैठे । उन्होंने मौलाना से पूछाः “बाबा जी ! सब कहाँ गये ? आपके भक्त और शिष्य, जो आपके साथ रहते थे, वे सब चले गये क्या ?”

जलालुद्दीन बोलेः “हाँ, मुझे जो देना था, वह मैंने दे दिया । उन्हें जो पाना था, वह उन्होंने पा लिया । मुझे जो पाठ पढ़ाना था, पढ़ा दिया । हमारे कॉलेज के दिन पूरे हो गये । अब छुट्टियाँ चल रही हैं ।”

“अभी हमारे कॉलेज की छुट्टियाँ तो पड़ी नहीं हैं ।”

“तुम्हारे अज्ञानियों के स्कूल-कॉलेज में तुम 15 साल तक विद्यार्थियों की खोपड़ी में कचरा भरते रहते हो, उन्हें हर साल छुट्टियाँ देते हो फिर भी उनकी छुट्टी नहीं होती है । वे कहीं-न-कहीं बँधे रहते हैं । परंतु यहाँ जो आता है और यहाँ के पाठ ठीक से पढ़ लेता है उसकी तो सदा के लिए छुट्टी हो जाती है, साथ ही उसे जन्म-मरण के चक्कर से भी छुट्टी मिल जाती है । हमारा ज्ञान ऐसा है ! विद्यार्थी तुम्हारे पाठ तो हजार जन्म पढ़ता रहे फिर भी उसकी बेड़ियाँ नहीं टूटतीं । हमारा पाठ जो एक बार सीख ले उसे फिर कुछ सीखना नहीं पड़ता । अँगूठाछाप व्यक्ति भी हमारा पाठ पढ़े तो अच्छे-अच्छे, तुम जैसे पढ़े हुए लोगों को भी पढ़ाने की योग्यता पा लेता है । वह चाहे निर्धन दिखे पर कइयों को धनवान बनाने का सामर्थ्य रखता है ।”

प्रोफेसर एकटक जलालुद्दीन की ओर निहार रहे थे । जलालुद्दीन जो बोल रहे थे वह केवल भाषा नहीं थी, भाषा के पीछे कुछ सत्य था, तत्त्व का अनुभव था ।

लोग समझते हैं कि पैसे हों, सत्ता हो या लोगों में प्रतिष्ठा हो तो ही सुखी जीवन गुजारा जा सकता है । पैसे के बिना सुख नहीं मिल सकता, सुधार नहीं हो सकता, सेवा भी नहीं हो सकती । लेकिन वे लोग भ्रांत मनोदशा में जी रहे हैं ।

जलालुद्दीन ने प्रोफेसर को कहाः “मेरा पाठ पढ़ने वाला व्यक्ति जहाँ कहीं जायेगा, जो कुछ करेगा उसके लिए शुभ हो जायेगा । जिन वस्तुओं को देखेगा वे प्रसाद हो जायेंगी । वह जितने दिन जियेगा उतने दिन उसके लिए मानो हर दिन दीवाली और हर रात पूनम हो जायेगी । ऐसा पाठ पढ़ाकर अब मैं विश्रांति ले रहा हूँ ।”

अगर सोचने में रह गये तो चूक गये…..

वे प्रोफेसर तो पढ़े-लिखे व्यक्ति थे । कुछ सोचकर वे नम्रता से बोलेः “महाराज ! हम भी आपसे पढ़ना चाहते हैं । हमें भी आप पाठ पढ़ाइये ।”

जलालुद्दीन बोलेः “अब मेरे पास समय नहीं है । तुम कई बार यहाँ आते रहे….. सब देखते रहे । परंतु तब मेरे पाठ पढ़ने की तुम लोगों में कोई उत्सुकता नहीं थी । अब मैंने अपना काम निपटा लिया है । अब मैं आखिरी क्षणों के इंतजार में कुछ दिन बिता दूँगा । फिर इस संसार के शरीररूपी चोले को छोड़कर अपने आत्मा में लीन हो जाऊँगा । वक्त यूँ ही चला गया, तुम समझ नहीं  पाये । जगत की विद्या पढ़ाने वाले प्रोफेसर तो लाखों-लाखों मिल जायेंगे किंतु जगदीश्वर की मुलाकात का पाठ पढ़ाने वाले मुर्शिद (सद्गुरु) तो कभी-कभी, कोई-कोई विरले ही समाज के बीच आते हैं । वे जब आते हैं तो श्रद्धा-भक्तिवाले कुछ लोग उनसे जितनी जिसकी श्रद्धा-निष्ठा होती है उतना-उतना पा लेते हैं और बाकी के वैसे ही रह जाते हैं ।”

आप स्टेशन पर पहुँचे हो और रेलगाड़ी भी उस समय खड़ी हो…. अगर आप कहीं जाना चाहते हो तो समय रहते ही, रेलगाड़ी जब खड़ी हो तब उसमें बैठ जाना चाहिए । अगर सोचने में रह गये तो चूक गये । रेलगाड़ी रवाना होने की तैयारी में हो तब तक भी बैठ सकते हो । तुम जहाँ कहीं जाना चाहते हो वहाँ पहुँच सकते हो परंतु रेलगाड़ी चली जाय उसके बाद तो फिर सिर कूटना ही रहेगा ।

ऐसे ही प्रोफेसर बेचारे सोचने में ही रह गये । आये तो सही संत के पास….. दो बार, तीन बार, चार बार…. पर ऐसे-के-ऐसे ही रह गये । सब आपस में एक-दूसरे को दोष देने लगेः ‘तूने ऐसा कहा…. तूने वैसा कहा….।’ जब संत के पास समय नहीं रहा तब आये तो फिर उनके हाथ सिर कूटना ही रहा । ऐसे लोगों के लिए कहावत सार्थक होती है कि अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत ।

उस समय तो दर्शक बनकर आये थे । अगर साधक बन के, जिज्ञासु बन के आते, भगवद्ध्यान, सत्संग और भगवन्नाम रूपी गाड़ी में बैठ जाते तो भवसागर से पार हो जाते । भवसागर से पार नहीं भी होते तो भवसागर से पार होने की कुछ कला ही सीख लेते । इतना भी नहीं होता तो सत्संगियों के बीच बैठकर सत्संग-कथा सुनते तो कुछ समझ का विकास होता, कुछ पाप मिटा सकते थे । पर जो लोग अपने को समझदार मानते हैं वे सत्संग में नहीं बैठ सकते । जो लोग जानते हैं कि अपनी समझ से भी अधिक समझ है, अपने सुख से भी विशेष सुख है और उसे पाने में अपने समय का सदुपयोग कर लेना चाहिए-ऐसी जिनकी सन्मति होती है, वे ही लोग ब्रह्मवेत्ता संतों के सान्निध्य में शांति और आनंद का अनुभव कर सकते हैं । वे ही संतों के सान्निध्य का लाभ लेकर परमात्मप्राप्ति की चल पड़ते हैं और अपने मनुष्य-जन्म को सार्थक कर लेते हैं ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2019, पृष्ठ संख्या 4-6 अंक 322

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अंतरात्मा में सुखी रहो और सुखस्वरूप हरि का प्रसाद बाँटो-पूज्य बापू जी


भारतीय संस्कृति कहती हैः

सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु । सर्वः सद्बुद्धिमाप्नोतु सर्वः सर्वत्र नन्दतु ।।

सर्वस्तरतु दुर्गाणि…. हम सब अपने दुर्ग से, अपने-अपने कल्पित दायरों से, मान्यताओं ते तर जायें । सर्वो भद्राणि पश्यतु… हम सब मंगलमय देखें । सर्वः सद्बुद्धिमाप्नोतु…. हम सबको सदबुद्धि प्राप्त हो । बुद्धि तो सबके पास है । पेट भरने की, बच्चे पैदा करने की, समस्या आये तो भाग जाने की, सुविधा आये तो डेरा जमाने की बुद्धि…. इतनी बुद्धि तो मच्छर में भी है, कुत्ता, घोड़ा, गधा, मनुष्य – सभी में है लेकिन हमारी संस्कृति ने कितनी सुंदर बात कही ! हम सबको सद्बुद्धि प्राप्त हो ताकि सत्य (सत्यस्वरूप परमात्मा ) में विश्रांति कर सकें । सर्वः सर्वत्र नन्दतु…. सभी हर जगह आनंद से रहें । हम सब एक दूसरे को मददरूप हों ।

तो उत्तम साधक को उचित है कि अपने से जो छोटा साधक है उसको आध्यात्मिक रास्ते में चलने में मदद करे और छोटे साधक का कर्तव्य है कि उत्तम साधक, ऊँचे साधक का सहयोग करे । जो ज्ञान-ध्यान में छोटा है वह साधक सहयोग क्या करेगा ? जैसे सद्गुरु ज्ञान-ध्यान में आगे हैं और शिष्य छोटा साधक है । वह सद्गुरु की सेवा कर लेता है…. अपने गुरु मतंग ऋषि के आश्रम में शबरी बुहारी कर देती है तो मतंग ऋषि का उतना काम बंट जाता है और वे आध्यात्मिकता का प्रसाद ज्यादा बाँटते हैं… तो सद्गुरु की सेवा करने वाले शिष्य भी पुण्य के भागी बनते हैं । इस प्रकार छोटे साधक सेवाकार्य को और आगे बढ़ाने में ऊँचे साधकों को मददरूप बनें ।

जो सेवा में  रुचि रखता है उसी का विकास होता है । आप अपना व्यवहार ऐसा रखो कि आपका व्यवहार तो हो एक-दो-चार दिन का लेकिन मिलने वाला कई वर्षों तक आपके व्यवहार को सराहे, आपके लिए उसके हृदय से दुआएँ निकलती रहें । स्वयं रसमय बनो, औरों को भी रसमय करो । स्वयं अंतरात्मा में सुखी रहो और दूसरों के लिए सुखस्वरूप हरि के द्वारा खोलने का पुरुषार्थ करो । स्वयं दुःखी मत रहो, दूसरों के लिए दुःख के निमित्त मत  बनो । न फूटिये न फूट डालिये । न लड़िये न लड़ाइये, (अंतरात्मा परमात्मा से) मिलिये और मिलाइये (औरों को मिलाने में सहायक बनिये) ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2019, पृष्ठ संख्या 2, अंक 322

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निरावरण तत्त्व की महिमा – पूज्य बापू जी


तत्त्वदृष्टि से जीव और ईश्वर एक ही हैं, फिर भी भिन्नता दिखती है । क्यों ? क्योंकि जब शुद्ध चैतन्य में स्फुरण हुआ तब अपने स्वरूप को भूलकर जो स्फुरण के साथ एक हो गया, वह जीव हो गया परंतु स्फुरण होते हुए भी जो अपने स्वरूप को नहीं भूले, अपने को स्फुरण से अलग जानकर अपने स्वभाव में डटे रहे, वे ईश्वर कोटि के हो गये । जैसे – ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं, श्रीराम हैं, जगदम्बा हैं…. ।

उन्हें निरावरण भी कहते हैं । जो स्फुरण के साथ बह गये, अपने को भूलकर लड़खड़ाने लगे वे जीव हो गये, उन्हें सावरण (आवरणसहित) कहते हैं । जो निरावरण हैं वे माया को वश में करके जीते हं । माया को वश करके जीने वाले चैतन्य को ‘ईश्वर’ कहते हैं । अविद्या के वश होकर जीने वाले चैतन्य को ‘जीव’ कहते हैं, कारण कि उसे जीने की इच्छा हुई और देह को मैं मानने लगा ।

ईश्वर का चिन्मय वपु वास्तविक ‘मैं’ होता है । जहाँ से स्फुरण उठता है वह वास्तविक मैं है । जितने भी उच्च कोटि के महापुरुष हो गये, वे भी जन्म लेते हैं तब तो सावरण होते हैं लेकिन स्फुरण का ज्ञान पा के अपने चिन्मय वपु में ‘मैं’ पना दृढ़ कर लेते हैं तो निरावरण हो जाते हैं, ब्रह्म्स्वरूप हो जाते हैं । ऐसे ब्रह्मस्वरूप महापुरुष हमें युक्ति-प्रयुक्ति से, विधि-विधान से निरावरण होने का उपाय बताते हैं, ज्ञान देते हैं । सद्गुरु के रूप में हम उनकी पूजा करते हैं । यदि ईश्वर और सद्गुरु दोनों आकर खड़े हो जायें तो….. संत कबीर जी कहते हैं –

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय ।

बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय ।।

हम पहले सद्गुरु को पूजेंगे क्योंकि सद्गुरु ने ही हमें अपने निरावरण तत्त्व का ज्ञान दिया है ।

ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्तिभेदविभागिने ।

ईश्वर और गुरु की आकृतियाँ दो दिखती हैं, वास्तव में दोनों अलग नहीं हैं ।

जो महापुरुष निरावरण पद को प्राप्त हो जाते हैं वे ईश्वर कोटि के हो जाते हैं । वे मौज में आकर कह दें कि ‘ऐसा हो जायेगा’ तो वह हो जाता है । यह निरावरण तत्त्व में स्थिति का सामर्थ्य है ।

जैसे बिजली घर द्वारा बिजली की आपूर्ति तो वही की वही है लेकिन उसका उपयोग जहाँ होता है वह साधन जिस किस्म का होगा, परिणाम भी उसी किस्म का होगा, जैसे गीजर, फ्रिज, मोटर आदि में एक ही विद्युत-शक्ति कार्य करती है लेकिन परिणाम साधन अनुरूप होते हैं । ईश्वर का संकल्प जहाँ से स्फुरित होता है वही चैतन्य आपका भी है । आपका संकल्प भी वहीं से स्फुरित होता है । ईश्वर के साधन बढ़िया हैं और आपके अंतःकरण और इन्द्रियाँ रूपी साधन घटिया हैं । है तो वही चैतन्य फिर भी उसका सामर्थ्य आपके साधनों द्वारा सीमित प्रभाव दिखाता है । जब आपकी निरावरण स्वरूप में स्थिति हो जाती है, तब आप उसके सत्ता-सामर्थ्य को जान पाते हैं क्योंकि आप भी वही चैतन्यस्वरूप हो जाते हैं । अब भी आपका स्वरूप वही है मगर जानते नहीं हैं न ! नश्वर संसार के नाम और रूप में आसक्त होकर उसमें ही उलझ गये हैं । नाम और रूप का आधार तो एक ही है । तत्त्वज्ञान के अभाव में भेद दिखता है । वास्तव में भेद नहीं है । जीव और ईश्वर भी कहने भर को दो हैं, वास्तव में दो नहीं हैं वेदांत की दृष्टि से ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2019, पृष्ठ संख्या 4 अंक 321

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