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Avataran Divas

दिव्यता की ओर ले जाने वाला पर्व अवतरण दिवस


पूज्य बापू जी का अवतरण दिवसः 17 अप्रैल 2017

यह वर्षगाँठ नहीं है…..

स्थूल शरीर व सूक्ष्म शरीर के मेल को जन्म बोलते हैं और इनके वियोग को मृत्यु बोलते हैं। तो स्थूल सूक्ष्म शरीरों का संयोग होकर जन्म ले के जीव इस पृथ्वी पर आया तो उसका है जन्मदिन। वह तिथि, तारीख, दिन, घड़ियाँ, मिनट, सेकंड देखकर कुंडली बनायी जाती है और उसके मुताबिक कहा जाता है कि आज 20वीं वर्षगाँठ है, 25वीं वर्षगाँठ है, 50वीं है…. फलाना आदमी 70 वर्ष का हो गया, 70 वर्ष जिया…. लेकिन हकीकत में उनका वह जीना जीना नहीं है, उनकी वह वर्षगाँठ वर्षगाँठ नहीं है जो देह के जन्म को मेरा जन्म मानते हैं। जो देह को मैं मानकर जी रहे हैं वे तो मर रहे हैं ! ऐसे लोगों के लिए संतों ने कहा कि उन्हें हर वर्षगाँठ को, हर जन्मदिन को रोना चाहिए कि ‘अरे, 22 साल मर गये, 23वाँ साल मरने को शुरु हुआ है। हर रोज एक-एक मिनट मर रहे हैं।’

‘मेरा जन्मदिवस है, मिठाई बाँटता हूँ…..’ नहीं, रोओ कि ‘अभी तक प्यारे को नहीं देखा। अभी तक ज्ञान नहीं हुआ कि मेरा कभी जन्म ही नहीं, मैं अजर-अमर आत्मा हूँ। अभी तक दिल में छुपे हुए दिलबर का ज्ञान नहीं हुआ, आत्मसाक्षात्कार नहीं हुआ।’ जिस दिन ज्ञान हो जाय उस दिन तुम्हें पता चलेगा कि

जन्म मृत्यु मेरा धर्म नहीं है,

पाप पुण्य कछु कर्म नहीं है।

मैं अज निर्लेपी रूप, कोई कोई जाने रे।।

तुम्हें जब परमात्मा का साक्षात्कार हो जायेगा तब लोग तुम्हारा नाम लेकर अथवा तुम्हारा जन्मदिन मना के आनंद ले लेंगे, मजा ले लेंगे, पुण्यकर्म करेंगे। तुमको रोना नहीं आयेगा, तुम भी मजा लोगे। उनका जन्म सार्थक हो गया जिन्होंने परमात्मा को जान लिया। उनको देह के जन्मों का फल मिल गया जिन्होंने अपने अजन्मा स्वरूप को जान लिया और जिन्होंने जान लिया, जिनका काम बन गया वे तो खुश रहते ही हैं। ऐसे मनुष्य जन्म का काम बन गया कि परमात्मा में विश्रांति मिल गयी तो फिर रोना बंद हो जाता है।

अपना जन्म दिव्यता की ओर ले चलो

जो जन्म दिवस मनाते हैं उन्हें यह श्लोक सुना दोः

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।। (गीताः 4.9)

हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं, इस प्रकार मेरे जन्म और कर्म को जो मनुष्य तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर का त्याग करने के बाद पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, भगवद तत्त्व को प्राप्त हो जाता है।

आप जिसका जन्मदिवस मनाने को जाते हैं अथवा जो अपना जन्मदिवस मनाते हैं, उन्हें इस बात का स्मरण रखना चाहिए कि वास्तव में उस दिन उनका जन्म नहीं हुआ, उनके साधन का जन्म हुआ है। उस साधन को 50 साल गुजर गये, उसका सदुपयोग कर  लो। बाकी के जो कुछ दिन बचे हैं उनमें ‘सत्’ के लिए उस साधन का उपयोग कर लो। करने की शक्ति का आप सदुपयोग कर लो, ‘सत्’ को रब, अकाल पुरुष को जानने के उद्देश्य से सत्कर्म करने में इसका उपयोग कर लो। आपमें मानने की शक्ति है तो आप अपनी अमरता को मान लो। जानने की शक्ति है तो आप अपने ज्योतिस्वरूप को जान लो। सूर्य और चन्द्र एक ज्योति है लेकिन उनको देखने के लिए नेत्रज्योति चाहिए। नेत्रज्योति ठीक देखती है कि नहीं इसको देखने के लिए मनःज्योति चाहिए। मन हमारा ठीक है कि नहीं इसे देखने के लिए मतिरूपी ज्योति चाहिए और हमारी मति गड़बड़ है कि ठीक है इसको देखने के लिए जीवरूपी ज्योति चाहिए। हमारे जीव को चैन है कि बेचैनी है, मेरी जी घबरा रहा है कि संतुष्ट है, इसको देखने के लिए आत्मज्योति, अकाल पुरुष की ज्योति चाहिए।

मन तू ज्योतिस्वरूप, अपना मूल पिछान।

साध जना मिल हर जस गाइये।

उन संतों के साथ मिलकर हरि का यश गाइये और अपने जन्म दिवस को जरा समझ पाइये तो आपका जन्म दिव्य हो जायेगा, आपका कर्म दिव्य हो जायेगा। जब शरीर को ‘मैं’ मानते हैं तो आपका जन्म और कर्म तुच्छ हो जाते हैं। जब आप अपने आत्मा को अमर व अपने इस ज्योतिस्वरूप को ‘मैं’ मानते हैं और ‘शरीर अपना साधन है और वस्तु तथा शरीर संसार का है। संसार की वस्तु और शरीर संसार के स्वामी की प्रसन्नता के लिए उपयोग करने भर को ही मिले हैं।’ ऐसा मानते हैं तो आपका कर्म दिव्य हो जाता है, आपका जन्म दिव्यता की तरफ यात्रा करने लगता है।

….तो ईश्वरप्राप्ति पक्की बात है !

श्रीकृष्ण का कैसा दिव्य जन्म है ! कैसे दिव्य कर्म हैं ! ऐसे ही राम जी का जन्म-कर्म, भगवत्पाद लीलाशाह जी बापू का, संत एकनाथ जी, संत तुकाराम महाराज, संत कबीर जी आदि और भी नामी-अनामी संतों के जन्म कर्म दिव्य हो गये श्रीकृष्ण की नाईं। तो जब वे महापुरुष जैसे आप पैदा हुए ऐसे ही पैदा हुए तो जो उन्होंने पाया वह आप क्यों नहीं पा सकते ? उधर नज़र नहीं जाती। नश्वर की तरफ इतना आकर्षण है कि शाश्वत में विश्रांति में जो खजाना है वह पता ही नहीं चलता। स्वार्थ में माहौल इतना अंधा हो गया कि निःस्वार्थ कर्म करने से बदले में भगवान मिलते हैं इस बात को मानने की भी योग्यता चली गयी। सचमुच, निष्काम कर्म करो तो ईश्वरप्राप्ति पक्की बात है। ईश्वर के लिए तड़प हो तो ईश्वरप्राप्ति पक्की बात है। ईश्वरप्राप्त महापुरुष को प्रसन्न कर लिया तो ईश्वरप्राप्ति पक्की बात है। जिनको परमात्मा मिले हैं उनको प्रसन्न कर लिया…. देखो बस ! मस्का मार के प्रसन्न करने से वह प्रसन्नता नहीं रहती। वे जिस ज्ञान से, जिस भाव से प्रसन्न रहें आचरण करो बस !

डूब जाओ, तड़पो तो प्रकट हो जायेगा !

एक होता है जाया, दूसरा होता है जनक। एक होता है पैदा हुआ और दूसरा होता है पैदा करने वाला। तो पैदा होने वाला पैदा करने वाले को जान नहीं सकता। मान सकते हैं कि ‘यह मेरी माँ है, यह मेरे पिता हैं।’

तो सृष्टि की चीजों से या मन-बुद्धि से हम ईश्वर को जान नहीं सकते, मान लेते हैं। और मानेंगे तो महाराज ! ईश्वर व ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु की बात भी मानेंगे और उनकी बात मानेंगे तो वे प्रसन्न होकर स्वयं अपना अनुभव करा देंगे।

सोइ जानइ जेही देहु जनाई।

जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।। (श्री रामचरित. अयो.कां. 126.2)

बापू का 81वाँ जन्मदिवस है तो शरीर के जन्म के पहले हम (पूज्य श्री) नहीं थे क्या ?

तो मानना पड़ेगा कि ‘शरीर का जन्मदिवस है, मेरा नहीं है।’ ऐसा मान के फिर आप लोग अपना जन्मदिवस मनाते हो तो मेरी मना नहीं है लेकिन ‘शरीर का जन्म मेरा जन्म है।’ ऐसा मानने की गलती मत करना। ‘शरीर की बीमारी मेरी बीमारी है, शरीर का बुढ़ापा मेरा बुढ़ापा है, शरीर का गोरापन-कालापन मेरा गोरा-कालापन है…..’ यह मानने की गलती मत करना।

मनोबुद्धयहंकारीचित्तानी नाहं….

शरीर भी मैं नहीं हूँ और मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त भी मैं नहीं हूँ। तो फिर क्या हूँ ? बस डूब जाओ, तड़पो तो प्रकट हो जायेगा ! असली जन्मदिवस तो तब है जब –

देखा अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया।

न छेड़ो मुझे यारों मैं खुद पे मस्ताना हो गया।।

तभी तो जन्मदिवस का फल है। मरने वाले शरीर का जन्मदिवस…. जन्मदिवस तो मनाओ पर उसी निमित्त मनाओ जिससे सत्कर्म हो जायें, सद्बुद्धि का विकास हो जाय, अपने सतस्वभाव को जानने की ललक जग जाय….

ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः। अपने आत्मदेव को जानने वाले शोक, भय, जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि – सब बंधनों से मुक्त होता है।

मुझ चिदाकाश को ये सब छू नहीं सकते, प्रतीतिमात्र है, वास्तव में हैं नहीं। जैसे स्वप्न व उसकी वस्तुएँ, दुःख, शोक प्रतीतिमात्र हैं। प्रभु जी = साधक जी ! आप भी वही हैं। ये सब गड़बड़ें मरने मिटने वाले तन-मन में प्रतीत होती हैं। आप न मरते हैं न जन्मते हैं, न सुखी-दुःखी होते हैं। आप इन सबको जानने वाले हैं, नित्य शुद्ध बुद्ध, विभु-व्यापक चिदानंद चैतन्य हैं।

चांदणा कुल जहान का तू

तेरे आसरे होय व्यवहार सारा।

तू सब दी आँख में चमकदा है,

हाय चांदणा तुझे सूझता अँधियारा।।

जागना सोना नित ख्वाब तीनों,

होवे तेरे आगे कई बारह।

बुल्लाशाह प्रकाशस्वरूप है,

इक तेरा घट वध न होवे यारा।।

तुम ज्योतियों की ज्योति हो, प्रकाशकों के प्रकाशक हो। द्रष्टा हो मन-बुद्धि के और ब्रह्माँडों के अधिष्ठान हो। ॐ आनंद… ॐ अद्वैतं ब्रह्मास्मि। द्वितयाद्वै भयं भवति। द्वैत की प्रतीति है, लीला है। अद्वैत ब्रह्म सत्य….।

ऋषि प्रसाद, मार्च 2017, पृष्ठ संख्या 5-7, अंक 291

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ईश्वर प्राप्ति की योजना बनाने का अवसर है वर्षगाँठ


(पूज्य बापू जी का 79वाँ अवतरण दिवसः 28 अप्रैल 2016)

पिछला वर्ष बीत गया, नया आने को है, उसके बीच खड़े रहने का नाम है वर्षगाँठ। इस दिन हिसाब कर लेना चाहिए कि ‘गत वर्ष में हमने कितना जप किया ? उससे ज्यादा कर सकते थे कि नहीं ? हमसे क्या-क्या गलतियाँ हो गयीं ? हमने कर्ताभाव में आकर क्या-क्या किया और अकर्ताभाव में आकर क्या होने दिया ?’ वर्षभर में जिन गलतियों से हम अपने ईश्वरीय स्वभाव से,  आत्मस्वभाव से अथवा साधक स्वभाव से नीचे आये, जिन गलतियों के कारण हम ईश्वर की या अपनी नजर में गिर गये वे गलतियाँ जिन कारणों से हुईं उनका विचार करके अब न करने का संकल्प करना – यह वर्षगाँठ है।

दूसरी बात, आने वाले वर्ष के लिए योजना बना लेना। योजना बनानी है कि ‘हम सम रहेंगे। सम रहने के लिए, आत्मनिष्ठा, ज्ञाननिष्ठा, भक्तिनिष्ठा, प्रेमनिष्ठा, सेवानिष्ठा को जीवन में महत्व देंगे।’ जिस वस्तु में महत्त्वबुद्धि होती है, उसमें पहुँचने का मन होता है। ईश्वर में, आत्मज्ञान में, गुरु में महत्त्वबुद्धि होने से हम उधर पहुँचते हैं। धन में महत्त्वबुद्धि होने से लोग छल-कपट करके भी धन कमाने लग जाते हैं। पद में महत्त्वबुद्धि होने से न जाने कितने-कितने दाँव-पेच करके भी पद पर पहुँच जाते हैं। अगर आत्मज्ञान में महत्त्वबुद्धि आ जाय तो बेड़ा पार हो जाये। तो वर्षगाँठ के दिन नये वर्ष की योजना बनानी चाहिए कि ‘हमें जितना प्रयत्न करना चाहिए उतना करेंगे, जितना होगा उतना नहीं। रेलगाड़ी या गाड़ी में बैठते हैं तो जितना किराया हम दे सकते हैं उतना देने से टिकट नहीं  मिलता बल्कि जितना किराया देना चाहिए उतना ही देना पड़ता है, ऐसे ही जितना यत्न करना चाहिए उतना यत्न करके आने वाले वर्ष में हम परमात्मनिष्ठा, परमात्मज्ञान, परमात्ममस्ती, परमात्मप्रेम, परमात्मरस में, परमात्म-स्थिति में रहेंगे।’

अंदर का रस प्रकट करो

शरीर के जन्मदिन को भी वर्षगाँठ बोलते हैं और गुरुदीक्षा जिस दिन मिली उस दिन से भी उम्र गिनी जाती है अथवा भगवान के जन्म दिन या गुरु के जन्म दिन से भी सेवाकार्य करने का संकल्प लेकर साधक लोग वर्षगाँठ मनाते हैं। गुरु व भगवान को मेवा-मिठाई, फूल-फलादि भेंट करते है लेकिन गुरु और भगवान तो इन चीजों की अपेक्षा जिन कार्यों से तुम्हारी उन्नति होती है उनसे ज्यादा प्रसन्न होते हैं।

तो वर्षगाँठ के दिन हम लोग यह संकल्प कर लें कि बापू जी की वर्षगाँठ से लेकर गुरुपूनम तक हम इतने दिन मौन रखेंगे, 15 दिन में एक दिन उपवास रखेंगे।’ 15 दिन में एकाध उपवास से शरीर की शुद्धि होती है और ध्यान भजन में उन्नति होती है। ध्यान के द्वारा अदभुत शक्ति प्राप्त होती है। एकाग्रता से जो सत्संग सुनते हैं, उनमें मननशक्ति का प्राकट्य होता है, उनको निदिध्यासन शक्ति का लाभ मिलता है। उनकी भावनाएँ एवं ज्ञान विकसित होते हैं। उनके संकल्प में दृढ़ता, सत्यता व चित्त में प्रसन्नता आती है और उनकी बुद्धि में सत्संग के वचनों का अर्थ प्रकट होने लगता है। अपनी शक्तियाँ विकसित करने के लिए एकाग्रचित्त होकर सत्संग सुनना, मनन करना भी साधना है। हरिनाम लेकर नृत्य करना भी साधना है। हो सके तो रोज 5-15 मिनट कमरा बंद करके नाचो। जैसा भी नाचना आये नाचो। ‘हरि हरि बोल’ करके नाचो,  ‘राम राम करके नाचो, तबीयत ठीक होगी, अंदर का रस प्रकट होगा।

सुबह उठो तो मन-ही-मन भगवान या गुरु से या तो दोनों से हाथ मिलाओ। भावना करो कि ‘हम ठाकुर जी से हाथ मिला रहे हैं’ और हाथ ऐसा जोरों का दबाया है कि ‘आहाहा !….’ थोड़ी देर ‘हा हा…..’ करके उछलो-कूदो। तुम्हारे छुपे हुए ज्ञान को, प्रेम को, रस को प्रकटाओ।

आपकी दृष्टि कैसी है ?

साधक दृष्टिः यह है कि ‘जो बीत गया उसमें जो गलतियाँ हो गयीं, ऐसी गलतियाँ आने वाले वर्ष में न करेंगे’ और जो हो गयीं उनके लिए थोड़ा पश्चात्ताप व प्रायश्चित्त करके उनको भूल जायें और जो अच्छा हो गया उसको याद न करें।

भक्त दृष्टि है कि ‘जो अच्छा हो गया, भगवान की कृपा से हुआ और जो बुरा हुआ, मेरी गलती है। हे भगवान ! अब मैं गलतियों से बचूँ ऐसी कृपा करना।’

सिद्ध की दृष्टि है कि ‘जो कुछ हो गया वह प्रकृति में, माया में हो गया, मुझ नित्य शुद्ध-बुद्ध-निरंजन नारायणस्वरूप में कभी कुछ होता नहीं।’ असङ्गोह्यं पुरुषः…. नित्योऽहम्… शुद्धोऽहम्…. बुद्धोऽहम्…. करके अपने स्वभाव में रहते हैं सिद्ध पुरुष। कर्ता, भोक्ता भाव से बिल्कुल ऊपर उठे रहते हैं।

अगर आप सिद्ध पुरुष हैं, ब्रह्मज्ञानी हैं तो आप ऐसा सोचिये जैसा श्रीकृष्ण सोचते थे, जैसा जीवन्मुक्त सोचते हैं। अगर साधक हैं तो साधक के ढंग का सोचिये। कर्मी हैं तो कर्मी के ढंग का सोचिये कि ‘सालभर में इतने-इतने अच्छे कर्म किये। इनसे ज्यादा अच्छे कर्म कर सकता था कि नहीं ?’ जो बुरे कर्म हुए उनके लिए पश्चात्ताप कर लो और जो अच्छे हुए वे भगवान के चरणों में सौंप दो। इससे तुम्हारा अंतःकरण शुद्ध, सुखद होने लगेगा।

अवतरण दिवस का संदेश

वर्षगाँठ के दिन वर्षभर में जो आपने भले कार्य किये वे भूल जाओ, उनका ब्याज या बदला न चाहो, उन पर पोता फेर दो। जो बुरे कार्य किये, उनके लिए क्षमा माँग लो, आप ताजे-तवाने हो जाओगे। किसी ने बुराई की है तो उस पर पोता फेर दो। तुमने किसी से बुरा किया है तो वर्षगाँठ के दिन उस बुराई के आघात को प्रभावहीन करने के लिए जिससे बुरा किया है उसको जरा आश्वासन, स्नेह दे के, यथायोग्य करके उससे माफी करवा लो, छूटछाट करवा लो तो अंतःकरण निर्मल हो जायेगा, ज्ञान प्रकट होने लगेगा, प्रेम छलकने लगेगा, भाव रस निखरने लगेगा और भक्ति का संगीत तुम्हारी जिह्वा के द्वारा छिड़ जायेगा।

कोई भी कार्य करो तो उत्साह से करो, श्रद्धापूर्वक करो, अडिग धैर्य व तत्परता से करो, सफलता मिलेगी, मिलेगी और मिलेगी ! और आप अपने को अकेला, दुःखी, परिस्थितियों का गुलाम मत मानो। विघ्नबाधाएँ तुम्हारी छुपी हुई शक्तियाँ जगाने के लिए आती हैं। विरोध तुम्हारा विश्वास जगाने के लिए आता है।

जो बेचारे कमजोर हैं, हार गये हैं, थक गये हैं  बीमारी से या इससे कि ‘कोई नहीं हमारा….’, वे लोग वर्षगाँठ के दिन सुबह उठ के जोर से बोलें कि ‘मैं अकेला नहीं हूँ, मैं कमजोर या बीमार नहीं हूँ। हरि ॐ ॐ ॐ …..’ इससे भी शक्ति बढ़ेगी।

आप जैसा सोचते हैं वैसे बन जाते हैं। अपने भाग्य के आप विधाता हैं। तो अपने जन्मदिन पर यह संकल्प करना चाहिए कि मुझे मनुष्य जन्म मिला है, मैं हर परिस्थिति में सम रहूँगा, मैं सुख-दुःख को खिलवाड़ समझकर अपने जीवनदाता की तरफ यात्रा करता जाऊँगा-यह पक्की बात है ! हमारे अंदर आत्मा-परमात्मा का असीम बल व योग्यता छिपी है।’

ऐसा करके आगे बढ़ो। सफल हो जाओ तो अभिमान के ऊपर पोता फेर दो और विफल हो जाओ तो विषाद के ऊपर पोता फेर दो। तुम अपना हृदयपटल कोरा रखो और उस पर भगवान के, गुरु के धन्यवाद के हस्ताक्षर हो जाने दो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2016, पृष्ठ संख्या 12, 13, 15 अंक 280

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प्राणिमात्र के कल्याण का हेतु होता है संत अवतरण – पूज्य बापू जी


पूज्य बापू जी का 75वाँ अवतरण दिवसः 10 अप्रैल
संतों को नित्य अवतार माना गया है। कभी-न-कभी, कहीं-न-कहीं संत होंगे और उनके हृदय में भगवान अवतरित होकर समाज में सही ज्ञान व सही आनंद का प्रकाश फैलाते हैं। उनके नाम पर, धर्म के नाम पर कहीं कितना भी, कुछ भी चलता रहता है फिर भी संत-अवतरण के कारण समाज में भगवत्सत्ता, भगवत्प्रीति, भगवद्ज्ञान, भगवद्-अर्पण बुद्धि के कर्मों का सिलसिला भगवान चलवाते रहते हैं।
तो आपके कर्म भी दिव्य हो जायेंगेः
साधारण आदमी अपने स्वार्थ से काम करता है, भगवान और महात्मा परहित के लिए काम करते हैं। महात्माओं का जन्मदिवस मनाने वाले साधक भी परहित के लिए काम कर रहे हैं तो साधकों के भी कर्म दिव्य हो गये।
इस दिवस पर जो भी सेवाकार्य करते हैं, वे करने का राग मिटाते हैं, भोगने का लालच मिटाते हैं और भगवान व गुरु के नाते परहित करते हैं। उन साधकों को जो आनंद आता होगा, जो कीर्तन में मस्ती आती होगी या गरीबों को भोजन कराने में जो संतोष का अनुभव होता होगा, विद्यार्थियों को नोटबुक बाँटने में तथा भिन्न-भिन्न सेवाकार्यों में जो आनंद आता होगा, वह सब दिव्य होगा। इस दिन के निमित्त प्रतिवर्ष गरीबों में लाखों टोपियाँ बँटती हैं, लाखों बच्चों को भोजन मिलता है और लाखों-लाखों कापियाँ बँटती हैं। औषधालयों में, अस्पतालों में, और जगहों पर – जिसको जहाँ भी सेवा मिलती है, वे सेवा ढूँढ लेते हैं। अपने स्वार्थ के लिए कर्म करते हैं तो उससे कर्मबंधन हो जाता है और परहित के लिए कर्म करते हैं तो कर्म दिव्य हो जाता है।
आपको जगाने के लिए क्या-क्या कर्म करते हैं
आप जिसका जन्मदिवस मना रहे हैं, वास्तव में वह मैं हूँ नहीं, था नहीं। फिर भी आप जन्म दिवस मना रहे हैं तो मैं इन्कार भी नहीं करता हूँ। आपने मुकुट पहना दिया तो पहन लिया, फूलों की चादर ओढ़ा दी तो ओढ़ ली। इस बहाने भी आपका जन्म-कर्म दिव्य हो जाये। वे महापुरुष हमें जगाने की न जाने क्या-क्या कलाएँ, क्या-क्या लीलाएँ करते रहते हैं ! नहीं तो ये टॉफी बाँटना, रंग छिड़कना, प्रसाद लेना-बाँटना – ये हमारी दुनिया के आगे बहुत-बहुत छोटी बात है। लेकिन करें तो करें क्या ? आध्यात्मिकता में जिनकी बचकानी समझ है, एक दो की नहीं लगभग सभी की है, उन्हें उठाना-जगाना है। यह अपने-आप में बहुत भारी तपस्या है। एकाग्रता के तप से भी ऊँचा तप है। वे महापुरुष नित्य नवीन रस अद्वैत ब्रह्म में हैं लेकिन नित्य द्वैत के व्यवहार में उतरते हुए हमको ऊपर उठाते हैं।
यह जो कुछ आँखों से दिखता है, जीभ से चखने में आता है, नाक से सूँघने में आता है, मन और बुद्धि से सोचने में आता है – ये सब वास्तव में हैं ही नहीं। जैसे स्वप्न में सब चीजें सच्ची लगती हैं, आँख खोली तो वास्तविकता में नहीं हैं, ऐसे ही ये सब सचमुच में, वास्तविकता में नहीं है।
आप भी इसका मजा लो
वास्तव में प्रकृति और चैतन्य परमात्मा है, बाकी कुछ भी ठोस नहीं है। सिर्फ लगता है यह ठोस है। 10 मिनट हररोज भावना करो कि ‘यह सब स्वप्न है, परिवर्तनशील है। इन सबके पीछे एक सूत्रधार चैतन्य है और अष्टधा प्रकृति है।’ यह याद रखो और स्वप्न का मजा लो तो उसकी गंदगी अथवा विशेषता से आप बंधायमान नहीं होंगे।
भगवान व गुरु भक्त का पक्ष लेते हैं
भगवान और गुरु के साथ एकतानता हो जाय तो भगवान और गुरु का अनुभव एक ही होता है। ब्रह्म-परमात्मा तटस्थ हैं, गुरु और भगवान पक्षपाती हैं। ब्रह्म-परमात्मा प्रकाश देते हैं, चेतना देते हैं, कोई कुछ भी करे …. लेकिन भगवान और गुरु भक्त का पक्ष लेते हैं। भक्त अच्छा करेगा तो प्रोत्साहित करेंगे, बुरा करेगा तो डाँटेंगे, बुराई से बचने में मदद करेंगे, भक्त की रक्षा करेंगे। ‘चतुर्भुजी नारायण भगवान नन्हें हो जाओ’ तो माता की प्रार्थना पर ‘उवाँ…..उवाँ……’ करते हुए रामजी बन गये, श्रीकृष्ण बन गये। भक्त के पश्र में वराह अवतार, मत्स्य अवतार, अंतर्यामी अवतार, प्रेरक अवतार ले लेते हैं।
जन्मदिवस मनाने का उद्देश्य क्या ?
यह जन्म दिवस मनाने के पीछे भी एक ऊँचा उद्देश्य है। ‘मैं कौन हूँ ?….. ‘ – ‘मैं फलाना हूँ….’ पर यह तो शरीर है, इसको जानने वाला मन है, निर्णय करने वाली बुद्धि है। ये सब तो बदलते हैं फिर भी जो नहीं बदलता है, वह मैं कौन हूँ ?’ – ऐसा खोजते-खोजते गुरु के संकेत से सदाचारी जीवन जिये तो ‘मैं कौन हूँ ?’ इसको जान लेना और जन्म दिव्य हो जायेगा। जन्म दिव्य होते ही कर्म दिव्य हो जायेंगे क्योंकि सुख पाने की लालसा नहीं है, दुःख से बचने का भय नहीं है और ‘जो है, बना रहे’ ऐसी उसकी नासमझी नहीं है।
मरने वाले शरीर का जन्मदिवस तो मनाओ पर उसी निमित्त मनाओ, जिससे सत्कर्म हो जायें, सदबुद्धि का विकास हो जाये। इस उत्सव में नाच कूद के बाहर की आपाधापी मिटाकर सदभाव जगा के फिर शांत हो जायें। श्रीमद् आद्यशंकराचार्यजी ने कहा हैः
मनोबुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहं….
‘मैं शरीर भी नहीं हूँ, मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त भी नहीं हूँ। तो फिर क्या हूँ?’ बस, डूब, जाओ, तड़पो….. प्रकट हो जायेगा।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2015, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 267
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