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हे साधक ! तुरीयावस्था में जाग


(संत श्री आशारामजी बापू के सत्संग प्रवचन से)

देव-असुरों, शैव-शाक्तों, सौर्य और वैष्णवों द्वारा पूजित, विद्या के आरंभ में, विवाह में, शुभ कार्यों में, जप-तप-ध्यानादि में सर्वप्रथम जिनकी पूजा होती है, जो गणों के अधिपति है, इन्द्रियों के स्वामी है, सवके कारण है उन गणपतिजी का पर्व है ‘गणेश चतुर्थी’|

जाग्रतावस्था आयी और गयी, स्वप्नावस्था आई और गयी, प्रगाढ़ निद्रा (सुषुप्ति) आयी और गयी – इन तीनों अवस्थाओं को स्वप्न जानकर हे साधक ! तू चतुर्थी अर्थात तुरीयावस्था (ब्राम्ही स्थिति) में जाग |

तुरीयावस्था तक पहुँचने के लिए तेरे रास्ते में अनेक विघ्न-बाधाएँ आयेगी | तू तब चतुर्थी के देव, विघ्नहर्ता गणपतिजी को सहायता हेतु पुकारना और उनके दण्ड का स्मरण करते हुए अपने आत्मबल से विघ्न-बाधाओं को दूर भगा देना |

बाधाएँ कब बाँध सकी हे पथ पे चलनेवालों को |
विपदाएँ कब रोक सकी है आगे बध्नेवालों की ||


हे साधक ! तू लम्बोदर का चिंतन करना और उनकी तरह बड़ा उदर रखना अर्थात छोटी-छोटी बाते को तू अपने पेट में समां लेना, भूल जाना | बारंबार उनका चिंतन कर अपना समय नहीं बिघड़ना |

बीत गयी सो बीत गयी, तक़दीर का शिकवा कौन करे |
जो तीर कमान से निकल गया, उस तीर का पीछा कौन करे ||

तुझसे जो भूल हो गयी हो उसका निरिक्षण करना, उसे सुधार लेना | दूसरों की गलती याद करके उसका दिल मत खराब करना | तू अब ऐसा दिव्य चिंतन करना की भूल का चिंतन तुच्छ हो जाय | तू गणपतिजी का स्मरण से अपना जीवन संयमी बनाना | भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, भगवान गणपति, मीराबाई, शबरी आदि ने तीनों अवस्थाओं को पार कर अपनी चौथी अवस्था-निज स्वरुप में प्रवेश किया और आज के दिन वे तुम्हे ‘चतुर्थी ’की याद दिला रहे है कि ‘हे साधक ! तू अपनी चौथी अवस्था में जागने के लिए आया है | चौथ का चाँद की तरह कलंक लगाये ऐसे संसार के व्यवहार में तू नहीं भटकना | आज की संध्या के चन्द्र को तू निहारना नहीं |

आज की चतुर्थी तुन्हें यह संदेश देती है कि संसार में थोडा प्रकाश तो दिखता है परंतु इसमें चन्द्रमा कि नाई कलंक है |यदि तुम इस प्रकाश में बह गये, बाहर के व्यव्हार में बह गये तो तुम्हे कलंक लग जायेगा | धन-पद-प्रतिष्ठा के बल से तुम अपने को बड़ा बनाने जाओंगे तो तुम्हे कलंक लगेगा, परंतु यदि तुम चौथी अवस्था में पहुँच गये तो बेडा पार हो जायेगा |
जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने गोपी-गोपियों को दृष्टि से निहारकर अपनी संप्रेषण-शक्ति से अधरामृत का पान कराया ऐसे ही मोरया बाप्पा (गणपतिजी ) भी तुम्हे अधरामृत पान करा दे ऐसे समर्थ है ! वे आपको अभय देनेवाले, उनके दुःख और  दरिद्रता को दूर करनेवाले तथा  संतों एवं गुरुओ के द्वारा तत्वज्ञान करानेवाले है |

वे चतुर्थी के देव संतों का हर कार्य करने में तत्पर रहते है । वेदव्यासजी महाराज लोकमांगल्य हेतु ध्यानस्थ ‘महाभारत’ कि रचना कर रहे थे और गणपतिजी लगातार उनके बोले श्लोक लिख रहे थे | गणपतिजी की  कलम  कभी रुकी नहीं और सहयोग करने का कर्तुत्व-अकर्तुत्व में जरा भी नहीं आया क्योंकि कर्तुत्व-अकर्तुत्व जीव में  होता है | जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति ये अवस्थाएँ जीव की है और तुरीयावस्था गणपति-तत्व की है | भगवान गणपति अपने प्यारों को तुरीय में पहुँचाना चाहते इसलिए उन्होंने चतुर्थी तिथि पसंद की है |

गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन |
बिनु हरि कृपा न होई सो गावहिं बेड पुरान ||

(श्रीरामचरित.उ.कां.:१२५ ख)

भगवान सदाशिव ने तुलसीदासजी से कहलवाया है कि संत-सान्निध्य के सामान जगत में और कोई लाभ नहीं | साहब या शेठ की कृपा हो तो धन बढाता है, सुविधा बढती है; मित्रों की कृपा हो तो वाहवाही बढती है परंतु भगवान की कृपा तो संत-समागम होता है | जब सच्चे संतों का समागम प्राप्त हो जाय तो तुम पक्का समझना कि भगवान पूर्णरूप से तुम पर प्रसन्न है, गणपति बाप्पा तुम पर प्रसन्न है तभी तुम सत्संग में आ सके हो |

सत्संग जीवन की अनिवार्य माँग है | जो सत्संग नहीं करता वह कुसंग जरूर करता है | जो आत्मरस नहीं लेता, रामरस की तरफ नहीं बढता बह काम के गड्डे में जरुर गिरता है | तुम रामरस की तरफ कदम बढ़ाते रहना, सत्संग की तरफ अहोंभाव से बढते रहना, सत्कार्यों में उत्साह से लगे रहना फिर तुम्हारी वह चतुर्थी दूर नही| जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति जिसकी सत्ता से आती और जाती है, पसार होती है फिर भी जो द्रष्टा ज्यों-का-त्यों है, वह तुम्हारा परमात्मास्वरुप प्रकट हो जायेगा | फिर एक ही साथ भगवान सदाशिव, भगवान गणपति, माँ उमा, भगवान ब्रम्हा, भगवान विष्णु और ब्रम्हांड के सारे पूजनीय-वंदनीय देवों के आत्मा तुम हो जाओंगे और सब देव तुम्हारा आत्मा जो जायेंगे | उनमें और तुममें भेद मिटकर एक अखंड तत्व, अखंड सत्य का साक्षात्कार हो जायेगा और यही तो चतुर्थी का लक्ष्य है |

विघ्नविनाशक भगवान श्री गणपतिजी


(गणेश चतुर्थी:)

जिस प्रकार अधिकांश वैदिक मंत्रों के आरम्भ में ‘ॐ’ लगाना आवश्यक माना गया है, वेदपाठ के आरम्भ में ‘हरि ॐ’ का उच्चारण अनिवार्य माना जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक शुभ अवसर पर श्री गणपतिजी का पूजन अनिवार्य है । उपनयन, विवाह आदि सम्पूर्ण मांगलिक कार्यों के आरम्भ में जो श्री गणपतिजी का पूजन  करता है, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है ।

गणेश चतुर्थी के दिन गणेश उपासना का विशेष महत्त्व है । इस दिन गणेशजी की प्रसन्नता के लिए इस ‘गणेश गायत्री’ मंत्र का जप करना चाहिए :

महाकर्णाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ।

श्रीगणेशजी का अन्य मंत्र, जो समस्त कामनापूर्ति करनेवाला एवं सर्व सिद्धिप्रद है :

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गणेश्वराय ब्रह्मस्वरूपाय चारवे ।

सर्वसिद्धिप्रदेशाय विघ्नेशाय नमो नमः ।।

(ब्रह्मवैवर्त पुराण, गणपति खंड : 13.34)

गणेशजी बुद्धि के देवता हैं । विद्यार्थियों को प्रतिदिन अपना अध्ययन-कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व भगवान गणपति, माँ सरस्वती एवं सद्गुरुदेव का स्मरण करना चाहिए । इससे बुद्धि शुद्ध और निर्मल होती है ।

विघ्न निवारण हेतु

गणेश चतुर्थी के दिन ‘ॐ गं गणपतये नमः ।’ का जप करने और गुड़मिश्रित जल से गणेशजी को स्नान कराने एवं दूर्वा व सिंदूर की आहुति देने से विघ्नों का निवारण होता है तथा मेधाशक्ति बढ़ती है ।

भूलकर भी न करें…

गणेश चतुर्थी के दिन चाँद का दर्शन करने से कलंक लगता है ।  चन्द्रास्त का समय आश्रम के कैलेंडर में देखें   । इस समय तक चन्द्रदर्शन निषिद्ध है ।

भूल से चन्द्रमा दिख जाने पर ‘श्रीमद् भागवत’ के 10वें स्कंध के 56-57वें अध्याय में दी गयी ‘स्यमंतक मणि की चोरी’ की कथा का आदरपूर्वक पठन-श्रवण करना चाहिए । भाद्रपद शुक्ल तृतीया या पंचमी के चन्द्रमा का दर्शन करना चाहिए, इससे चौथ को दर्शन हो गये हों तो उसका ज्यादा दुष्प्रभाव नहीं होगा ।

निम्न मंत्र का 21, 54 या 108 बार जप करके पवित्र किया हुआ जल पीने से कलंक का प्रभाव कम होता है । मंत्र इस प्रकार है :

सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः ।

सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ।।

‘सुंदर, सलोने कुमार ! इस मणि के लिए सिंह ने प्रसेन को मारा है और जाम्बवान ने उस सिंह का संहार किया है, अतः तुम रोओ मत । अब इस स्यमंतक मणि पर तुम्हारा ही अधिकार है ।’

(ब्रह्मवैवर्त पुराण, अध्याय : 78)

गणेश जी श्रीविग्रह देता सुन्दर प्रेरणाएँ – पूज्य बापू जी


भगवान शिव ने की सर्जरी

जो इन्द्रिय-गणों का, मन बुद्धि गणों का स्वामी है, उस अंतर्यामी विभु का ही वाचक है ʹगणेशʹ शब्द। ʹगणानां पतिः इति गणपतिः।ʹ उस निराकार परब्रह्म को समझाने के लिए ऋषियों ने और भगवान ने क्या लीला की है ! कथा आती है, शिवजी कहीं गये थे। पार्वती जी ने अपने योगबल से एक बालक पैदा कर उसे चौकीदारी करने रखा। शिवजी जब प्रवेश कर रहे थे तो वह बालक रास्ता रोककर खड़ा हो गया और शिवजी से कहाः “आप अन्दर नहीं जा सकते।”

शिवजी ने त्रिशूल से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। पार्वती जी ने सारी घटना बतायी। शिवजी बोलेः “अच्छा-अच्छा, यह तुम्हारा मानस-पुत्र है तो हम भी इसमें अपने मानसिक बल की लीला दिखा देते हैं।” शिवजी ने अपने गणों से कहाः “जाओ, जो भी प्राणी मिले उसका सिर ले आओ।” गण हाथी का सिर ले आये और शिवजी ने उसे बालक के धड़ पर लगा दिया। सर्जरी की कितनी ऊँची घटना है ! बोले, ʹमेरी नाक सर्जरी से बदल दी, मेरा फलाना बदल दिया….ʹ अरे, सिर बदल दिया तुम्हारे भोले बाबा ने ! कैसी सर्जरी है !
और फिर इस सर्जरी से लोगों को कितना समझने को मिला !

समाज को अनोखी प्रेरणा

गणेश जी के कान बड़े सूप जैसे हैं। वे यह प्रेरणा देते हैं कि जो कुटुम्ब का बड़ा हो, समाज का बड़ा हो उसमें बड़ी खबरदारी होनी चाहिए। सूपे में अन्न-धान में से कंकड़-पत्थर निकल जाते हैं। असार निकल जाता है, सार रह जाता है। ऐसे ही सुनो लेकिन सार-सार ले लो। जो सुनो वह सब सच्चा न मानो, सब झूठा न मानो, सार-सार लो। यह गणेश जी के बाह्य विग्रह से प्रेरणा मिलती है।

गणेश जी की सूँड लम्बी है अर्थात् वे दूर की वस्तु की भी गंध लेते हैं। ऐसे ही कुटुम्ब का जो अगुआ है, उसको कौन, कहाँ, क्या कर रहा है या क्या होने वाला है इसकी गंध आनी चाहिए।

हाथी के शरीर की अपेक्षा उसकी आँखें बहुत छोटी हैं लेकिन सुई को भी उठा लेता है हाथी। ऐसे ही समाज का, कुटुम्ब का अगुआ सूक्ष्म दृष्टिवाला होना चाहिए। किसको अभी कहने से क्या होगा ? थोड़ी देर के बाद कहने से क्या होगा ? तोल-मोल के बोले, तोल-मोल के निर्णय करे।

भगवान गणेश जी की सवारी क्या है ? चूहा ! इतने बड़े गणपति चूहे पर कैसे जाते होंगे ? यह प्रतीक है समझाने के लिए कि छोटे-से-छोटे आदमी को भी अपनी सेवा में रखो। बड़ा आदमी तो खबर आदि नहीं लायेगा लेकिन चूहा किसी के भी घर में घुस जायेगा। ऐसे छोटे से छोटे आदमी से भी कोई न कोई सेवा लेकर आप दूर तक की जानकारी रखो और अपना संदेश, अपना सिद्धान्त दूर तक पहुँचाओ। ऐसा नहीं कि चूहे पर गणपति बैठते हैं और घर घर जाते हैं। यह संकेत है आध्यात्मिक ज्ञान के जगत में प्रवेश पाने का

गणेश-विसर्जन का आत्मोन्नतिकारक संदेश

गणेशजी की मूर्ति तो बनी, नाचते-गाते विसर्जित भी की, निराकार प्रभु को साकार रूप में मानकर फिर साकार आकृति भी विसर्जित हुई लेकिन इस भगवद्-उत्सव में नाचना-कूदना झूमना तुम्हारे दिल में कुछ दे जाता है। रॉक और पॉप म्यूजिक पर जो नाचते-कूदते हैं, उनको भी कुछ दे जाता है जैसे – सेक्सुअल आकर्षण, चिड़चिड़ा स्वभाव, जीवनशक्ति का ह्रास…. लेकिन गजानन के निमित्त जो नाचते-गाते झूमते हैं, उन्हें यह उत्सव सूझबूझ दे जाता है कि सुनो सब लेकिन छान-छानकर सार-सार ही मन में रखो। दूर की भी गंध तुम्हारे पास होनी चाहिए। छोटे-से-छोटे आदमी का भी उपयोग करके अपना दैवी कार्य करो।

गणेश विसर्जन कार्यक्रम आपको अहंकार के विसर्जन, आकृति में सत्यता के विसर्जन, राग-द्वेष के विसर्जन का संदेश देता है। बीते हुए का शोक न करो। जो चला गया वह चला गया। जो चीज-वस्तु बदलती है उसका शोक न करो। आने वाले का भय न करो। वर्तमान में अहंकार की, नासमझी की दलदल में न गिरो। तुम बुद्धिमत्ता बढ़ाने के लिए ʹ गं गं गं गणपतये नमःʹ का जप किया करो और बच्चों को भी सिखाओ। बिल्कुल सुंदर व्यवस्था हो जायेगी !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2013, पृष्ठ संख्या 8,9 अंक 248

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