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सेवा ही भक्ति


और अपनी सेवा वही है कि अपने को परस्थितियों का गुलाम ना बनाये । परिस्थितियों की दासता से मुक्त करे । वही स्वतंत्र व्यक्ति है और जो स्वतंत्र है वही सेवा कर सकता है । पद और कुर्सी मिलने से सेवा होगी और बिना कुर्सी के सेवा नहीं होगी ये नासमझी है । जो अपनी सेवा कर सकता है वह विश्व की सेवा कर सकता है । चाहे उसके पास रुपया पैसा नहीं हो, फिर भी वह सेवा कर सकता है । किसी को रोटी खिलाना, वस्त्र देना इतना ही सेवा नहीं है, किसी को दो मीठे शब्द बोलना, उसके दुःख को हरना, यह बड़ी सेवा है। निगुरे को गुरु के द्वार पर पहुँचाना, ये बड़ी सेवा है। असाधक को साधक बनाना ये भी सेवा है । अनजान को जानकारी देना, ये भी सेवा है। भूखे को अन्न देना यह सेवा है। प्यासे को पानी देना यह सेवा है। अभक्त को भक्त बनाना यह सेवा है। उलझे हुए की उलझने मिटाना यह सेवा है और जो देता है, वो पाता है । जो दूसरों को कुछ न कुछ देता है और नहीं तो दो मीठे शब्द ही सही और नहीं तो दो भगवान की बात ही सही। और सेवा में जो बदला चाहता है वह सेवा के धन को कीचड़ में डाल देता है। सेवा करे और बदला कुछ मिले, हमारा यश हो, हमें पद मिले, हमें मान मिले, तो वह सेवक व्यक्तित्व बनाना चाहता है और व्यक्तित्व हमेशा सत्य से विरोध में खड़ा रहेगा। व्यक्तित्व सत्य से विरोध में खड़ा रहेगा तो सत्यस्वरुप से सेवा नहीं करने देगा।  जो सच्चाई से सेवा नहीं करने देगा तो सच्चाई से मुक्ति भी नहीं पाने देगा।  सच्चाई तो ये है कि सेवा के बदले कुछ न चाहना। जब कुछ न चाहेंगे तो जिसका सब कुछ है वो संतुष्ट होगा अपना अंतरात्मा तृप्त होगा खुश होगा। जब अंतरात्मा खुश होगा तृप्त होगा तो सब कुछ न चाहनेवालो को तो सब कुछ मिलता है। जो किसी-किसी को प्रेम करता है वो किसी को द्वेष करेगा। जो कुछ चाहता है वो कुछ गँवाता है। लेकिन जो कुछ नहीं चाहता वह कुछ नहीं गँवाता है। और जो किसी को प्रेम नहीं करता वो सबको प्रेम करता है और जो सबको प्रेम करता वो किसी व्यक्तित्व में परिस्थितित्व में बंधता नहीं है और वो निर्बंध हो जाता है । जो निर्बंध हो जाता है तो दूसरों को भी निर्बंध बनाने का सामर्थ्य उसका निखरता है। जो निर्दुःख हो जाता है वो दूसरों के दुःख दूर करने में सक्षम हो जाता है। जो निरहंकार हो जाता है वो सच्ची सेवा में सफल हो जाता है। औरों को निरहंकार होने के रास्ते पे ले जाता है। तो सच्ची सेवा का उदय उसी दिन से होता है कि सेवक प्रण कर ले कि मुझे इस मिटनेवाले नश्वर शरीर को, कब छूट जाये कोई पता नहीं । इस नश्वर शरीर इस नश्वर तन से अगर हो सके तो, शारीरिक क्षमता हो तो तन से सेवा करुँ। और भाव सब के लिए अच्छा रखूं ये मन से सेवा करुँ। और लक्ष्य सब का ईश्वरीय सुख बनाऊंगा ये बुद्धि से सेवा करने का निर्णय कर ले और बदले में मेरे को कुछ नहीं चाहिए । बदले में मुझे कुछ नहीं चाहिए क्योंकि शरीर प्रकृति का है मन प्रकृति का है बुद्धि प्रकृति की है । और जहाँ सेवा कर रहे है वह संसार प्रकृति का है। संसार के लोग प्रकृति के है। संसार की परस्थिति प्रकृति की है । तो प्रकृति  की चीजे प्रकृति में अर्पण कर देने से आप प्रकृति के दबाव से और प्रकृति के आकर्षण से मुक्त हो जाते है। जब प्रकृति के दबाव से और प्रकृति के आकर्षण से आप मुक्त हुए तो आप परमात्मा में टिक गए।

वो आपका स्वतः स्वाभाव था आप उसमे टिक गए। उसके आनंद में आप आ गए। ये एक दिन की बात नहीं है धीरे-धीरे होगा लेकिन रोज ये मन को ये बताएं कि हमको तो सेवा करनी है। सेवा लेनेवाला गुलाम रहता है और सेवा करनेवाला स्वामी हो जाता है। सेवक न आये तो स्वामी लाचार होता है कि  ‘अरे आज फलाना नहीं आया’ लेकिन जो सेवा करता है स्वामी आये न आये सेवक तो अपना उनकी पराधीनता महसूस नहीं करता। नौकरानी की याद में सेठानी दुःखी होती है लेकिन सेठानी की याद में नौकरानी दुःखी नहीं होती नौकरानी तो रुपये की याद में दुःखी हो सकती है, सेठानी की याद में नौकरानी दुःखी नहीं होती।  सेवा लेनेवाला भले सेवक को याद करे लेकिन सेवा करनेवाले की गाडी तो ऐसे ही चल जाती है। तो ईश्वर के नाते सेवा करे और उस सेवा में और सुगन्धि लाये कि ईश्वर की नाते सेवा करे और जिसकी भी सेवा करते है वो सब ईश्वर की भिन्न-भिन्न अभिव्यक्तियाँ है। आप जिस किसी व्यक्ति को नीचा दिखाना चाहते होतो समझो कि उसके अन्दर बैठे हुए ईश्वर को आप नीचा दिखाना चाहते हो। जिस किसी व्यक्ति की इर्ष्या करते होतो समझो कि व्यापक ईश्वर सब में बैठा है तो ईश्वर की उस अंग की, उस खंड की आप इर्ष्या करते हो।  तो हमारे चित्त में अपना अहंकार पोसने की और दूसरों को नीचा दिखाने की और सेवा का प्रदर्शन करने की, जो आदत है या कमजोरी है उसको निकालने से हमारी सेवा सेव्य को प्रगट कर देगी। निष्कामकर्मयोग अपना स्वतंत्र योग है। जैसे तत्त्वज्ञान, ज्ञानयोग, सांख्ययोग मुक्ति देने में स्वतंत्र है। वैसे ही भक्तिध्यानयोग भी मुक्ति देने में स्वतंत्र माना गया है, ठीक ऐसा ही दर्जा है निष्कामकर्मयोग का। निष्कामकर्मयोग भी स्वतंत्र है। मुक्ति देने में स्वतंत्र है। अपने स्वार्थ को पोसने का, अहंकार को पोसने का, दूषित वासनाओ को पोसने का, जो भी कोने-खाचरे में वासनाये या बेवकूफियां भाव है उसको उखाड़ के फेंक दे। बड़े-बड़े जोगियों को समाधी करने में जो सुख मिलता है वो सुख सतियों को अपने घर में ही मिला। बड़ा-बड़ा सामर्थ्य जिन योगियों के जीवन में सुना जाता है उससे भी बढ़ा-चढ़ा सामर्थ्य सतियों के जीवन में सुना गया। सतियों ने क्या किया सतियों ने अपनी इच्छा छोड़ दी, पति की इच्छा में अपनी इच्छा मिला ली, पति की इच्छा में पति की ख़ुशी में,  पति के संतोष में अपनी ख़ुशी को रख लिया। पति की…..बस मेरी इच्छा नहीं। पति की इच्छा में अपनी इच्छा मिलाने से उनकी अपनी इच्छा हटती गयी, अपनी इच्छा हटती गयी और उनकी सेवा चमकती गयी और वो सतिया इतनी महान हो गयी कि सूर्य की गति को थाम लिया। शांडिल्य का रूप, लावण्य, सौंदर्य देखकर ग़ालब ऋषि और गरुड़जी मोहित हो गए कि ऐसी तेजस्विनी, ऐसी सुंदरी इस धरती पर और तपस्या कर रही है। नहीं नहीं तू तो भगवान विष्णु की भार्या होने के योग्य है। विष्णु भगवान से तेरा विवाह करेंगे।  शांडिल्य ने कहा ‘नहीं नहीं मुझे तो ब्रह्मचर्यव्रत पलना है’।  शांडिल्य तपस्या में लग गयी, ध्यान भजन में लग गयी। अपने शुद्ध-बुद्धस्वरुप की तरफ यात्रा करने लग गयी। गरुड़ और ग़ालब को हुआ कि इतनी सुंदरी ! मानो अप्सरओं को भी मात दे, ये धरती की युवती, कही तपस्या-वपस्या में जोगन बन जाएगी तो बात मानेगी नहीं, इसको उठा ले जाये और जबरन भगवान विष्णु के पास पहुंचा दे और शादी करा दे। एक प्रभात को ग़ालब और गरुड़ आये, शांडिल्य को उठा के ले जाने के लिए और शांडिल्य की दृष्टि पड़ी कि इनकी अपने लिए नहीं लेकिन अपनी मनमानी इच्छा पूरी करने के लिए इनकी नियत बुरी हुई है। जब मेरे में इच्छा नहीं तो मैं किसी की इच्छा से क्यों दबू?  मुझे तो ब्रह्मचर्यव्रत पालना है और ये मुझे जबरन गृहस्थ में घसीटते है, विष्णु की पत्नी !  मुझे पत्नी नहीं होना है, मुझे तो अपने स:स्वभाव को पाना है,  पत्नी शब्द प्रकृति है, मुझे तो प्रकृति में जन्मना-मरना नहीं है मुझे तो प्रकृति के आधार को जानना पहचानना है और ये क्या कर रहे है मुझे निराधार बनाने के लिए। शांडिल्य ने, गरुड़ तो बलवान था और ग़ालब भी कम नहीं थे, लेकिन शांडिल्य की निस्वार्थ सेवा, निस्वार्थ परमात्मा में विश्रांति की यात्रा ने ऐसा तो भर दिया था कि शांडिल्य ने देखते-देखते उन पर पानी का छींटा मारा ‘ग़ालब तुम गल जाओ और ग़ालब को सहयोग देने वाले गरुड़ तुम भी गल जाओ’ उन दोनों के शरीर महसूस हुआ की उनकी शक्ति क्षीण हो गयी, मानो वो गल ही रहे है भीतर-भीतर से… बड़ा प्रायश्चित किया, क्षमा-याचना की, तब कही उस भारत की कन्या ने उनको माफ़ किया और जैसे थे वैसे बना दिया और अपनी शक्ति बचाकर भागे। जिसमे निस्वार्थतता होती है और ब्रह्मचर्य संयम होता है उसके आगे प्रकृति के नियम भी बदलने को राजी हो जाते है। जो रुग्न मन का अनुसन्धान करके मनोवैज्ञानिक बोलतेहै कि काम आये तो कोई बात नहीं रोको मत, सम्भोग से समाधी की ओर जाओ तो उन बिचारे वैज्ञानिको की जो किताब है और आचार्य और विद्वानियों ने पढ़े तो वैज्ञानिकों का अन्वेषण था कि रुग्न मनो का अध्ययन करके। तीन प्रकार के रुग्ण मन होते है और दो प्रकार के स्वस्थ मन होते है। क्षिप्त, विक्षिप्त और मूढ़ ये रुग्न मन होते है और आम आदमी के रुग्न मन होते ही है। निरुद्ध और एकाग्र ये स्वस्थ मन होते है। स्वस्थ मन था अर्जुन का, अप्सराऐ गिडगिडायी उर्वशी, लेकिन अर्जुन ने कमर नहीं तोड़ी अपनी। स्वस्थ मन था युधिष्ठिर का, कई परस्थितिया आई, लेकिन युधिष्ठिर मन अडिग रहा। स्वस्थ मन था जनक का कई विक्षेप आये,  भोग-वासना में गिरने का अवसर आया लेकिन जनक भोगवासना में रहते भी योगवासना में रहे, ये स्वस्थ मन है। तो स्वस्थ मन का अनुसन्धान करके,  अध्ययन करके वैज्ञानिक अगर अविष्कार करते,  घोषणा करते तो वो ये नहीं कह सकते कि काम न रोको, क्रोध न रोको, आवेग है उनको गुजर ने दो, आने दो ऐसा नहीं कहते, अपितु ये कहते कि काम को रोको, क्रोध को रोको, युक्ति से रोको। लेकिन उनको अगर ओर कोई सतगुरु मिल जाये तो वो सज्जन भी कह देंगे कि काम को रोकना पर्याप्त नहीं है, काम की जगह पर राम को प्रकट करो। क्रोध की जगह पर क्षमा और सहानभूति को प्रगटाओ, यही तुम्हारे में विशेष क्षमताएँ है। झूठ न बोलो ये तो ठीक है, सत्य बोलो ये भी ठीक है, लेकिन स्नेह भरा बोलो। चोरी न करो ये तो ठीक है लेकिन जहाँ चोरी करने की आदत है वहाँ दान करों। उदार बनो  “ दो”  आपके पास शारीरिक बल हो, मानसिक बल हो, बौद्धिक बल हो, जितना हो चाहे मुट्ठी भर हो , जितना भी हो उसे आप ईश्वर की विराट सृष्टि में, ईश्वर के लिए, ईश्वर की प्रसन्नता के लिए उसका सदुपयोग करो। सदुपयोग मतलब सेवा करो। आपके पास जितना, थोड़े से थोड़ा भी है उसको ईमानदारी से सेवा के लिए लगाओ, तो आप पाओगे, ज्यों-ज्यों आप अपनी योग्यताएं सेवा में लगा रहे है और बदले में कुछ नहीं चाहते, त्यों-त्यों आपकी योग्यताएं जादुई ढंग से बढ़ती जाएगी। देखे बढ़ती है कि नहीं ऐसा अधेर्य मत करो। बढ़े न बढ़े हमें कोई जरूरत नहीं। हमारे पास जो योग्यता है देनेवाले की है और देनेवाले की सृष्टि सवारने के लिए है। देनेवाले की सृष्टि की सेवा करने के लिए है। न सेवा का बदला चाहो और न सेवा का प्रचार चाहो, न सेवा का दिखावा चाहो । आपके हृदय की शांति और समझ सूझ-बूझ बढ़ती जाएगी और आदर्श सेवक हनुमान हो गए। इसी ढंग से अपने को देखने की इच्छा करो। सेवक और मान चाहे,  सेवा के बदले में मान चाहे, सेवा को बेच रहा है फेंक रहा है। शरीर का अहंकार पोसने के लिए सेवा को नष्ट कर रहा है। सेवक और मान की इच्छा?  सेवा करोगे लोग मान देंगे लेकिन आपको उस मान से कोई फायदा नहीं होता अपितु अहंकार जगने का अवसर आता है। सेवा के बदले में मान न चाहो। सेवा के बदले में भोग न चाहो। सेवा के बदले में दूसरों को दबाने की क्षमता ना चाहो। सेवा करते जाओ जो तुम्हारा हरीफ़ है उसका ह्रदय भी जीतो। हरीफ़ जिस कारण दुखी है उसे हटते जाओ। तुम्हारा दुश्मन जिन कारणों से दुखी है वे कारण आप हटाते जाओ। दुश्मन की भी सेवा करो। फिर देखो उस दुश्मन पर आपकी कैसे विजय होती है। दुश्मन को मार देना ये दुश्मन पर विजय नहीं है। दुश्मन का गला दबा देना या नीचे गिरा देना, यह दुश्मन की विजय नहीं है, इसमें दुश्मनी तो बनी रहेगी। दुश्मन को अगर जीतना है तो दुश्मन जिन कारणों से दुःखी है वे कारण हटाना शुरू करो। ये ऎसी सेवा है महाराज! गजब कर देगी ! आपको स्वामी पद पे बिठा देगी। आप विश्वजीत हो जायेंगे। दुर्योधन युधिष्ठिर को दुश्मन मानते थे लेकिन दुर्योधन कहते थे कि युधिष्ठिर…नहीं…युधिष्ठिर झूठ नहीं बोलेंगे। अगर फंस जाते दुर्योधन, कोई निर्णय नहीं कर पाते तो युधिष्ठिर से निर्णय करवाते। दुर्योधन युधिष्ठिर का भगत था भीतर से। जयरामजी की। ऐसा कह लो कि दुर्योधन युधिष्ठिर का शिष्य हो गया था भीतर से। शकुनि युधिष्ठिर का शिष्य हो गया था भीतर से।

रावण रामजी का विरोधी था, लेकिन रामजी यथायोग्य रावण की खिदमत करते है। उसको स्वधाम पहुँचाना, यह भी रामजी के चित्त में द्वेष नहीं है, खिदमत का भाव है। नहीं तो हार्ट अटैक कर देते ओर उपाय ऐसे बुरी तरह मारते, नहीं,मौका दिया अवसर दिया। तो अगर जरूरत पड़ती है किसी को कुछ करने की तो अंदर में द्वेष रखकर नहीं, जैसे रामजी उसकी खिदमत की भावना से युद्ध करके उसे स्वधाम भेज देते है। तो सेवक को जो विघ्न बाधा आये और जो तत्त्व विघ्न बाधा डालते है। तो उन तत्वों की बुराई नहीं लेकिन उन तत्वों का जिसमें भला हो, ऐसी कोशिश करे। उनकी वासना और उनका अहंकार घटे ऐसी कोशिश करे। खिदमत भाव से उन तत्वों को,  उन विरोधो को हटाये, तो वो सेवक….वो सेवक सेव्य पद को पा लेगा। गुरुलोग शिष्य को डांटते है, गुरुलोग शिष्य को निकाल देते है। गुरुलोग शिष्य को भर सभा में उठ-बैठ कराते है ऐसा आपने देखा है, हमनें भी देखा है। हमनें हमारे गुरुदेव के चरणो में देखा है और आपने मेरे संपर्क में देखा है। लेकिन मेरे ह्रदय में उनको खुलेआम उठ-बैठ कराना या डांटना द्वेष बुद्धि नहीं है अपितु उनमें जो दुर्गुण है, जो उनको ऊपर उठाने से रोकते है, खुलेआम उनको वाहवाही मिलती है तो फिर अकेले में कहते है तो अहंकार में परिवर्तन नहीं होता, इसलिए खुले में उनको उठ-बैठ कराते थे ताकि उनका खुलेआम अहंकार विदा हो जाये। मेरे गुरुदेव अपने एकदम निकटवर्ती सेवक को खुलेआम उठ-बैठ कराते। एकबार सेवक ने पूछा की ‘स्वामीजी! आप कृपालु तो है ये तो हम अनुभव करते है,लेकिन आप जब नाराज़ होते है तो छक्के छुड़ा देते है। आप अगर डांटे और कुछ हमारी गलती बताये तो एकांत में कह दे। दिनभर आपकी सेवा करते है, सभा भरती है सत्संग होता है और आपके हाथ में माइक आता है तभी आप हम को बोलते हो। बिना माइक के कह दिया करो गुरुदेव ! सहा नहीं जाता ! कहाँ तो इतने लोग हमको पूजते है, जानते है और इतने लोगो के बीच आप हमको माइक…गुरुदेव ने फिर करुणा की डांट बरसते हुए कहाँ  ‘ बेवक़ूफ़ ! गधा ! पता नहीं है तेरे को वीरभान का बच्चा! वाहवाही लोगों के बीच होती है। फुगा लोगों के बीच भरता है तो हवा लोगों के बीच क्यों नहीं निकलेगी? यही तरीका है बेटा तेरे को पता नहीं है। ‘ वो जो वीरभान लड़का था, वो सब्जी बेचने की लारी चलता था और खूब सुलखे पीता था। वो तो खुद बोलता था कि ‘ मैं छटांग-छटांग अफीम उड़ा देता था। चरस गांजा जो भी बोलते है। मैं ऐसा था और देखो धीरे-धीरे स्वामीजी के पास आया हूँ और स्वामीजी का अंगद सेवक हो गया हूँ.. .देखो ! संत कितने दयालु है’ वो ऐसी प्रशंसा भी करता था। और कभी-कभी ऐसा जुनून चढ़ जाता था कि उठा के बिस्तर बोरी की’ नहीं नहीं रहना है … दस साल में क्या मिला है तुम्हारे पास? हम जाते है। तो स्वामीजी बोलते थे कि ‘ले जाओ साले को उठाके, एक मिनट मत रखो, निकालो आश्रम से इसको ‘वो आश्रम से निकल के बोरी-बिस्तर बांधकर रवाना होता तो बोलते थे की ‘अकेला जायेगा फिर लौट के आएगा हरामी! जाओ! ये पैसे लो इसे बस स्टैंड पे जाके बस में धक्का मारके घुसेड़ के फिर आना। और साइड में उसको समझाते गए कि सचमुच जाता है न, तो धीरे-धीरे समझा के ले आना। सचमुच चला जाये तो फिर चरस अफीम पीयेगा, लॉरी चलाएगा, बर्बाद हो जायेगा। अगर अहंकार मिटाने के लिए अपन ये करते है तो देखो, ध्यान रखना अगर सचमुच जाये तो समझा के ले आना।  अब देखो ! बाहर से कितने कठोर! और अंदर से कितने करुणामय! ऐसे स्वामी की विजय हुयी और ऐसा सेवक सफल जीवन बीता गया। अब जैसे साधुओं की पूजा होती है ऐसे ही सब्जी चलानेवाले, गांजा चरस फूकनेवाले व्यक्ति की पूजा आदिपुर में होती है। जो लोग लीलाशाह का दर्शन करते वो लीलाशाह के हनुमान का भी दर्शन करते, माथा टेकते। ये स्वामियों ने स्वामी बना दिया महाराज!  नारायण हरी। नारायण हरी। नारायण हरी।

श्री कृष्ण कहते है’ अनाश्रित: कर्मफलं। कार्यं कर्म करोति य:। स सन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय:

जो आसक्ति रहित होकर, करने योग्य कर्म करता है, फल की आकांक्षा नहीं। सेवा करता है लेकिन वाहवाही की आकांक्षा नहीं। सेवा करता है लेकिन दिखावे की आकांक्षा नहीं। सेवा करता है पर बदले में सेवा चाहता नहीं। सेवा करता है और बदले में मान चाहता नहीं। सेवा करता है पर दूसरों को हीन दिखाकर आप श्रेष्ठ होने की बेवकूफी करता नहीं। ऐसा जो सेवक है उसे तुम संन्यासी समझो। उसे तुम अर्जुन योगी समझो।  ‘अनाश्रित: कर्मफलं ‘  कर्म के फल की आशा न रखे। ‘कार्यं कर्म करोति य:’ करने योग्य।  ऐसा नहीं की सेवा का मतलब है कोई चाहते है कि भाई हमें पिक्चर में जाना है और आप जरा लिफ्ट दे दीजिये। तो उसको पिक्चर में न जाये उस का भला हो तो कोई लिफ्ट दे उस को वहाँ रोकना ये भी सेवा है। जयरामजी की। मेरे को जरा फलानि पार्टी में जाना है और पैसे नहीं है तो आप जरा थोड़ा ,  आप तो जाने माने हो , स्वामीजी के शिष्य हो, जरा थोड़ा मेरे को २०० रुपये दो न , फलानि पार्टी अटेंड करनी है, तो आप तो नहीं लेकिन कोई दूसरा देता होतो बोलना  ‘भाई ये पार्टी अटेंड कर रहा है वो भी चिकन की ! इसमें उनका अहित है ! कृपा करके आप उन को न दे तो अच्छा है।’ ये भी सेवा है। उसको पतन करने में आप विघ्न डाले ये भी सेवा है  और ईश्वर के रास्ते में जाने में वो न भी मांगे फिर भी आप सहयोग करे ये भी एक सेवा है। सामने वाले व्यक्ति की उन्नति किसमे होगी, ये ख्याल करके जो कुछ चेष्ठा करनी है और बदले न चाहना इसका नाम सेवा है। भले उस वक़्त वो आदमी आपको शत्रु मानेगा लेकिन देर सबेर आपका जो शुद्धभाव है वो आपका ही हो जायेगा। मेरे अपने आपके कितने हो गए। क्या मैंने जादू मारा या क्या मेरे पास कोई कुर्सी है या मेरे पास कोई बाहर का प्रलोभन है। नहीं, मेरे पास वह है कि मेरे पास जो आता है उसका कैसे मंगल हो ये भाव मेरे मन में उठते रहते है। लाइन में आते है दर्शन के बहाने तभी भी में देखता हूँ किसी को साखर बूटी की जरूरत ,है किसी को पुस्तक की जरूरत है, किसी को खाली मुस्कान की जरूरत है, और किसी को डांट की जरूरत है, जिसकी जो जरूरत है भगवन उनका करता है मेरा इसमें क्या होता है?

‘देनेवाला दे रहा है दिन और रैन। लोक मुझे दानी कहे उस लिए नीचे नैन’ ऐसा एक दाता ने कहाँ है वो बात भी हमें याद रहती है। तो देनेवाला परमात्मा ही दे रहा है दिन रैन दे रहा है। मति को शक्ति वो ही दे रहा है। मन को प्रसन्नता वो ही परमात्मा दे रहा है। शरीर को सामर्थ्य उसी की सृष्टि से आ रहा है। इसमें अपना क्या है? बस अपना कर्ज चुकाओ बस! ऋण मुक्त हो जाओ, ऋणमुक्त हो गए तो जन्म-मरण मुक्त हो गया। विवेकानंद बोलते थे कि तुम सेवा करते तो ये न सोचो कि ये तो दीन-हीन है, मैं न होता तो इस बिचारे का क्या होता? नहीं नहीं यह तो ईश्वर की कृपा है और सेवा लेनेवाले की, सेवा लेनेवाले की भी कृपा है कि हमें अवसर दे रहा है ऐसा मानो। ईश्वर ने हमें क्षमता ये दी उसकी ईश्वर कृपा है और ईश्वर ने हमें सेवा करने की क्षमता ये दी वो ईश्वर की कृपा है। और कोई हमारी सचमुच में सेवा ले रहा है सतमार्ग में तो उसको भी धन्यवाद है। नहीं तो गाड़ी में लोक नहीं बैठे तो गाडी किस काम की ? सड़क पर लोग नहीं चले तो सड़क किस काम का? ऐसे ही हमारी वस्तुओं का और योग्यताओं का लोगों के लिए उपयोग न होवे तो वस्तु और योग्यताएं किस काम की? अपनी वासनाएं बढ़ने के लिए वस्तु और वासनाएं का उपयोग होता है तो हम बर्बाद हो गए। अपना अहंकार बढ़ने में वस्तु और योग्यताओ का उपयोग होता है तो बर्बाद हो गए। हमें तो आत्मिक आबादी चाहिए। तो हिटलर, सिकंदर जैसे-तैसे आदमी नहीं थे, अच्छे थे, लेकिन सेवा के बदले वस्तु और योग्यताओं को अहंकार बढ़ाने में थोडी-सी गलती की, उन्होंने और इससे बड़ी गलती कोई होती नहीं है। रावण और कंस क्यों विफल गए? और क्यों अभी तक फटकार पाते है कि  उनमें योग्यताएं बहुत सारी थी, वस्तुएँ बहुत सारी थी लेकिन अहंकार विसर्जन करने में, सेवा में नहीं लगाकर, अहंकार को पुष्ट करने में और वासनाओ को भड़काने में लगाई। इसीलिए वे विफल है। रामजी के पास और कृष्णजी के पास जो वस्तु और योग्यताएं थी वो सेवा में लगा दी, रामजी और कृष्णजी अभी तक भारत के हर दिल पर राज्य कर रहे है। धरती पर कई राजा आये और कई चले गए, लेकिन दो राजाओ का नाम अभी भी भारतवासियों के हृदय पर है वह राजारामचन्द्र और राजा कृष्णचन्द्र उन का राज्य है क्योंकि वो भलाई ही अपनी योग्यता और वस्तु का सदुपयोग करने की कला थी उनमें। ऐसे ही जनक राजा का और महात्माओं का भारतवासियों पर राज्य है। गांधीनगर की कुर्सियों पर चाहे किसी का राज्य हो, भोपाल की कुर्सी पर, दिल्ली की कुर्सी पर, चाहे किसी का भी राज्य हो लेकिन भारत के दिल की कुर्सियों पर अभी भी निष्कामकर्म प्रेमी संतों का ही राज्य हो रहा है। बस यह प्रत्यक्ष प्रमाण को देखकर आप जीवन में जो सेवा करते है वो भाग्यशाली तो है लेकिन असावधान न रहे सावधान रहे की सेवा का बदला अगर लिया तो सेवा, सेवा ही नहीं रही। सेवा से अगर दूसरा हमारी सेवा चाहे तो ये दुकानदारी हो गयी। और सेवक के अंतकरण में ईर्ष्या नहीं होती। सिंधी संत हो गए। स्वामीसाब उनका नाम था। उन्होंने श्लोक बनाये उस ग्रन्थ का नाम है ‘स्वामी जा श्लोक ‘ स्वामी के श्लोक  ग्रन्थ का नाम है। उन्होंने लिखा है

‘सेवा सच्ची उस ग्रन्थ में “सेवा सच्ची माँ जिन लधो। लधोलाल आणमुलोम से स्वामी सच्ची सिक सा सदा सेवा कन। लता मुका मोचड़ा सदा सिर सहन रतारंग रहन अठे पहर अजीब रे।‘

सच्ची से सेवा जिन्होंने जो पाया वो लाल अनमोल लाल पाया। आत्मा लाल पाया। आत्मसंतोष पाया। वे तो सदा सच्चाई से सेवा करते है। सेवा के बदले में कभी किसी के गुरु की या माता-पिता की लात सेह लेते है। तो कभी कोई खट्टी बात भी सह लेते है फिर भी हँसते-हँसते सेवा करते रहते है जिन्होंने सेवा का मूल्य जाना है। जो सेवा के द्वारा कुछ चाहता है वो तो सेवा के नाम को कलंकित करता है और जो सेवक होकर सुख चाहता है वो भी सेवा के महत्त्व को।

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गुरुदेव दया कर दो मुझ पर …. सिर पर छाया घोर अँधेरा हो,,,, सिर पर छाया घोर अँधेरा हो

सेवक चही ही सुख लाही।

नहीं, नहीं सुख की अभिलाषा सेवक नहीं करता। मान की अभिलाषा सेवक नहीं करता। जब सुख और मान की अभिलाषा को हटाने के लिए सेवक सेवा करता है तो सुख और मान पे उसका अधिकार हो जाता है। वो अंदर से ही सुख और अंदर से ही सन्मानित जीवन उसका प्रगट होने लगता है । नारायण हरी। नारायण हरी। नारायण हरी।

कुछ लोग सेवा से मुकरने की आदत रखते है।  ‘अच्छा ये तू कर ले, अरविन्द आ तू करी ले, फलाना भाई ! आ तू वे करी ले, अला अति नै करू तू तया आ लया जाओ तू करू, करू आ करो, आ करो’ ।  ऐसे सेवक विफल हो जाते सेवा में। दो भाई थे। एक बड़ा एक छोटा। दोनों को बराबर संपत्ति मिली। कुछ वर्षो बाद बड़े भाई ने मुक़दमा कर दिया छोटे भाई पर। न्यायलय में खटला गया। न्यायाधीश ने केस चलाया, चेम्बर में बुलाया, बड़े भाई को, छोटे भाई को। बोले बड़े तुम कंगाल कैसे रह गए और तुम छोटे इतने अमीर कैसे हो गए ?  जब तुम बोलते हो कि हमने भले लिखा-पढ़ी नहीं की, लेकिन आधी-आधी संपत्ति मिली थी। तो बराबर की संपत्ति मिलने पर, एक कंगाल और एक अमीर कैसे हुए? तो छोटे ने कहा ‘मेरे बड़े भाई क्या करते थे कि जाओ-जाओ ये कर लो!  अरे, तेरे को बोला ये कर तूने नहीं किया अभी तक?  अरे, ये कर ले , वो कर ले, जाओ जाओ, ये करो, जाओ जाओ तो इन का सब कुछ चला गया और मैं मित्रो से, साथियों से, नौकरों से, मुनिमों से मिलकर कहता था कि ‘आओ ! अपन ये करे, आओ ये कर लेंगे, आओ ये कर लेंगे, । मैंने आओ-आओ सूत्र रखा और उसने जाओ-जाओ रखा इसीलिए उसका सब कुछ चला गया और मेरे पास सब कुछ आ गया। तो अच्छा उद्योगपति होना हो, अच्छा सेवक होना हो, अच्छा सेठ होना हो, अच्छा संत होना हो, अच्छा नेता होना हो तो ‘जाओ’ ये कर दो नहीं, ‘आओ’ ये करें। आओ ये करें। आओ, आओ जाओ नहीं। अटलु करी दे तू आम ख़रीदे अपडा ऊ करी दे। भले आपके पास समय नहीं, आपका डिपार्टमेंट नहीं फिर भी चलो, अपन ये कर ले। अपन ये कर ले, जिससे करवाते उसको विश्वास में लेकर फिर शुरू करो। तो उसको अपना लगे काम। जिससे काम करवाते उसको आपका काम अपना लगे। ऐसा नहीं की उसको ऐसा लगे कि ये तो इनका सौंपा हुआ काम है, ये इनका सौंपा हुआ बोझा है। नहीं जो सेवक दूसरों से सेवा लेकर सेवाकार्य को बढ़ाना चाहता है वो उनसे ऐसा पेश आये, ऐसी बातचीत करे कि ‘ देखो ! अपना ये कर्तव्य है’। अपन लोगो को ये ऐसा करना चाहिए, ऐसा मेरा विचार है, आपका क्या विचार है ? अच्छा विचार होगा, तो मानेगा क्या? तो अपन कैसे करे?’

उसी को ही दूल्हा का बाप बनाओ। एन जवर्णो बाप बनाओ। तमारा सेवाना निर्णयों ऐना मोडेतीच कढ़ाओ। आणि पछि हडी मली ने कर्म करी छे सेवानु कार्य चालू करे न तमे खसी जाओ ओ पाछे बीजे सुरु कराओ। जय श्रीकृष्ण। एम ने के तमे खसकी गया न ज्ञानयश मळेते अरे हागळ आगळ आया। ह ने सेवा करवानु आते बीजा लोकों करते सेवा में भली वार निने तमार ह्रदय साचा सुख भली वरी ने।

जो बेईमानी से सेवा का यश लेना चाहते उन बेईमानो को सच्चा सुख मिलता भी नहीं है। काम तो कोई करे और यश का अवसर आये तो खुद हार पहनाने को खड़े हो गए। क्योंकि हार बदले में गले में पड़े । अरे ! हार तो हार ही है भाई ! जयरामजी की। अगर ईमानदारी से सच्चाई से सेवा करते तो अहंकार को हरा दे। अगर बेईमानी से तुम
फूल-हार चाहते हो तो खुद को ही हरा रहे हो। सत्यम शिवम सुन्दरम। और जो सत्य है वही शिव कल्याणकारी है और वही सुन्दर है तो ह्रदय को सुन्दर बनाने के लिए सच्चाई से सेवा करे। सच्चाई से ईश्वर के हो और सच्चाई से गुरु के हो। सच्चाई से समाज के हो। समाज का, गुरु का, ईश्वर का विश्वास संपादन कर लेता है सेवक। गुरु कहेगा कि मेरा सेवक है ये ऐसा भद्दा काम नहीं कर सकता है। ये मेरा सेवक है। गुरु को संतोष होना चाहिए कि ये मेरा सेवक है। ईश्वर को संतोष होना चाहिए कि ये मेरा जीव है इतना घटिया काम नहीं कर सकता है। समाज को विश्वास होना चाहिए कि ‘फलानो भाई ! ना ना वो न हुअ बिदु झूठु छे ‘ सेवक पर आरोप भी आएंगे। सेवक यशस्वी होगा, उन्नत होगा, उसे देखकर लोग ईर्ष्या भी करेंगे, दाह भी करेगे, आरोप भी करेंगे और विघ्न भी आएंगे। लेकिन ये विघ्न,  ये आरोप, ये दाह सेवक की क्षमता विकसित करने के लिए आते है ऐसा सेवक को सदैव याद रखना चाहिए। और फिर सेवक को सुबह उठकर अपना आत्मबल बढ़ाना चाहिए। लम्बे श्वास ले, प्राणशक्ति को बढ़ाएं, भावशक्ति को बढ़ाएं, क्रियाशक्ति को बढ़ाएं, ऎसा ध्यान सीख लेना चाहिए। ऐसा ध्यान करना चाहिए। तो और सेवा में चार चाँद लग जायेंगे। हरीॐ। हरीॐ।

बुद्धि से तत्त्वनिष्ठ हो। मुक्त अवस्था को इस जनम में ही पाओ। आत्मबल जगाओ। सेवक को सुन्दर बनाने का संकल्प बढ़ाओ। सच्चा सेवक दुःख मिटाने की चिंता नहीं करता, वो तो सुख बांटने में लग जाता है, तो दुःख अपनेआप भाग जाता है लोगों का। सुख बांटने की कोशिश करनेवाला सेवक सुखी होता जाता है। दुःख मिटाना ही सेवा नहीं सुख बांटना सच्ची सेवा है। जब सुख बांटे तो दुःख रहेगा कहाँ? और सुख बांटोगे तो सुख खुटेगा क्यों? जिनके जीवन में सेवा का सदगुण नहीं। जिनके पास संपत्ति है, जिनके पास शक्ति है, जिनके पास योग्यता होते हुए भी सेवा नहीं करते, वे आलसी है। वे प्रमादी है। वे सुख के आसक्त है। वे अहंकार भोगी है। वे अहम पोषक है। जिनके पास शक्ति, संपत्ति, योग्यता, मति-गति है अगर वे लोग उसका सदुपयोग सेवा में नहीं करते तो वे चीज़े उनको संसार के जनम-मरण में बांधती रहती है। सेवा चाहता वे दुःखी? ना ना सेवा चाहनेवाला दु:खी नहीं होता है सेवा लेनेवाला दु:खी रहता है। जो सेवा चाहता है, सेवा करना चाहता है, वो सुखी होता है, लेकिन जो सेवा का लाभ लेना ही चाहता है या बदला चाहता है वो दु:खी रहता है। जो सेवा चाहता है, सत्कर्म चाहता है, दूसरों की सेवा करना चाहता है वो सुखी रहता है। चाहे बाहर से उसके पास साधन कम हो फिर भी अंतकरण से वो सुखी रहता है, राजा रहता है।

हमेशा के लिए रहना नहीं इस धारे फानी में। कुछ अच्छा काम कर लो चार दिन की जिंदगानी में।

तन से सेवा करो जगत की, मन से प्रभु के हो जाओ। शुद्ध बुद्धि से तत्वनिष्ठ हो जाओ, मुक्त अवस्था को तुम पाओ।

निस्वार्थ सेवा हो, सदा मन मलिन होता स्वार्थ से। जब तक रहेगा मन मलिन नहीं भेट होगी परमार्थ से।

द्वेष को, कपट को, अहंकार को त्याग कर संघटित होकर सेवा करो ऐसा स्वामी विवेकानंद बोला करते थे। समाज को आध्यात्मिकता की आवश्यकता है। समाज को स्नेह की आवश्यकता है। समाज को स्वास्थ्य की आवश्यकता है। समाज को अच्छे संस्कार पोषने की आवश्यकता है और समाज को अच्छे में अच्छे पिया के प्रेम बांटनेवालों की सेवको की आवश्यकता है। और यही उम्मीद आशाराम अपने साधकों से करेगा। हरीओम ओओम ओम। राम

ऐसी शक्ति देना ओ मेरे ओलिया ! कि मैं दुनिया में दिलबहार करता रहूँ। जो मुझसे मिले मैं निहाल करता रहूँ। ऐसी शक्ति मुझे देना मेरे ओलिया ! राम

हे आनंददाता तेरी जय हो

हे सुखदाता तेरी जय हो

हे प्रेमदाता तेरी जय हो

हे परमेश्वर तेरी जय हो

म्हारा वाळूड़ा तेरी जय हो

म्हारा गुरुदेव तुम्हारो जय हो

म्हारा लीलाशाह बापा तुम्हारो जय हो

म्हारा सदगुरु ना सदगुरु तुम्हारो जय हो

हरीओम ओओओम

“भारतीन जो भलोकर शाद ते आबाद रख। अनाथ नाथ तू मेहर कर हाण सब खे

“भारतीन जो भलोकर शाद ते आबाद रख। अनाथ नाथ प्रभू मेहर कर हाण तु

‘ ये मेरे गुरुदेव गया करते थे।

“लीलेश के लालन हण रख जाई सांण तू। “भारतीन जो भलोकर शाद ते आबाद रख। अनाथ नाथ प्रभु मेहर कर हाण सब तु  ।

सब जा सतार साईं वाली सारे जग जा लीले के लालन हण रख जई सांण तू। भारतीन जो भलोकर … डाडाडाडाडाडाडा कैसा है? “ऐसा बोलते थे और सदा मस्त रहते थे।

मस्ती बांटनेवाले उस दाता की जय हो। मेरे सदगुरुदेव तुम्हारी जय हो। हरी हरीओम ओओम ओओम ओओओओओम।

पुस्तको की गठरी उठा कर जाते थे नैनीताल के गाँवों में। एक पहाड़ से उतरके दूसरे पहाड़ पर। गाँव बसा है वहां जा रहे। गाँव के लोगों को एकठ्ठा करते। उनको प्रसाद देते। काजू किशमिश जैसा प्रसाद ले जाते थे और कोई प्रसाद तो वजन उठाना पड़ता और एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ जाने में कितना श्रम होता है वो तो जो जाते है वही जानते है। अस्सी साल की उम्र में मैंने उनको देखा और पच्चासी साल की उम्र में भी उनको ये सेवा करते देखा कि गठरी बांधकर पुस्तको की अपने आश्रम से दूसरे गाँव जाते तो आश्रम जो पहाड़ी पर था। पहाड़ी पे तो और कुछ भी नहीं था। तो सामने नीचे तलेहठी में भी गाँव था और पहाड़ियों पे भी गाँव। कभी किसी गाँव में जाते। सौ दो सौ के छपड़े के गाँव थे। कभी किसी गाँववालों को एकठ्ठा करते, प्रसाद देते सत्संग सुनाते फिर उनको पुस्तक दे आते। नारी है तो ‘नारीधर्म’ जैसी पुस्तके। और युवान है तो ‘यौवन सुरक्षा’ जैसी पुस्तके। और कोई साधक भक्त है तो ‘ईश्वर की और’ जैसी पुस्तकें। भक्तों के और साधकों के अनुभव ‘योगयात्रा’ जैसी पुस्तके और उसी जैसी कोई और पुस्तकें। भक्तों की चर्चा पढ़ते-पढ़ते लोगों में भक्ति आ जाये। संयम की चर्चा पढ़ते-पढ़ते लोगों में संयम आ जाये। और कहते की ‘देखिये! ये पुस्तक तो आपको दे जाता हूँ। आज गुरुवार है अगले गुरुवार फिर आऊंगा। तबतक ये पुस्तक अच्छी तरह से पढ़ना पांच बार पढ़ लो तो अच्छी तरह से तो बहुत अच्छा, चार बार पढ़ लेंना तो अच्छा लेकिन पढ़ लेना कृपा करके, जो अच्छा लगे वो याद रखना और लिख लेना, हो सकता है कि मैं कभी कुछ पूछ लूँ तो मेरे को बताना। तो फिर ये पुस्तक में तुम्हारे से ले जाऊँगा और फिर दूसरी दे जाऊंगा। ऐसे करके वो मोबाइल लाइब्रेरी चलाते थे अपने सिर पर। अस्सी साल की उम्र में भारत के लीलाशाह बापू गाँवों-गाँवों जाके पुस्तक बांटते और उनकी ही निष्काम सेवा आज गाँव-गाँव ‘ऋषिप्रसाद’ रूप में साधकों के द्वारा हो रही है ये उन्ही का तो सनातन बीज है। उन्ही की ही तो प्रेरणा है कि हम लोग भी सेवा का लाभ उठाके अपना जीवन धन्य कर रहे है। वो धन भागी है सेवक जो स्वामी के दैवी कार्य में अपने को लगा देते है।  वही दैवी अनुभव में मस्त हो जाते है। तो क्या करेंगे ?  हरी हरीओम ओओओम

यह तन काचा कुम्भ है फुटत न लागे बाट। फटका लागे फूटी पड़े गर्व करे वे गवार।।

पानी केरा बुलबुला यह मानव की जात।  देखत ही छुप जात है जो तारा प्रभात।।

तो क्या करोगे ? हरी हरीओम ओओओओओमओम ओम । राम

कभी रोग का चिंतन न करो।  कभी शत्रु का चिंतन न करो।  कभी द्वेष के विचार को न आने दो। शत्रु की गहराई में छिपा मित्र ऐसा चिंतन करके शत्रु से यथायोग्य सावधानी से जीना पड़ता है। युक्ति से, लेकिन उसका बुरा न चाहो, फिर देखो शत्रु तुम्हारे देर सबेर या तो तुम्हारे मित्र हो जायेंगे या प्रकृति उनको घुमा-घुमाकर देगी। दे धमाधम करके देगी। ये ईश्वर का दैवी विधान है।  हरीओम ओओमओओमओओओओओम

“गीतगोविन्द” के कर्ता जयदेवजी ने कथा की और दक्षिणा मिली।  दक्षिणा लेके गए रास्ते में डाकू ने छीन लिया और “गीतगोविन्द” के कर्ता जयदेव को कुँए में फेक दिया उंगलिया काटकर।  जयदेव वहां भी “गीतगोविन्द” के गा रहा है। राजा घूमने निकला और राजा ने आवाज सुना कि ‘ये जयदेवजी प्रभु है खुद’।  कुँए के नजदीक आये और जयदेव को आदमियों द्वारा निकलवाया जयदेवजी को और ऐसी स्थिति किसने की ऐसा पूछा।  बहुत पूछने पर भी जयदेव ने नहीं बताया तो राजा की बड़ी श्रद्धा हो गयी। राजा अपने राजमहल के सात्विक खंड में जयदेव को रखता और सेवा सुश्रा करके जयदेव को स्वस्थ कर दिया। जयदेव की अध्यक्षता में राजा ने एक यज्ञ का आयोजन किया और उस यज्ञ में सत्संग हो, भजन हो, कीर्तन हो, होम-हवन हो आदि और पूर्णाहुति जयदेव के हाथ से हो और साधुसंत को दक्षिणा भी जयदेव की प्रेरणा से बंटेगी। जब साधुसंतों को दक्षिणा बांटने का दिन आया तो वो जो चार डाकू थे, चोर थे, वे भी साधुओं का वेश लेकर आये। दक्षिणा लेने की लाइन में। नजदीक आकर देखते कि अरे ! ‘ये तो जयदेव जिसको हमने पैसे छीन के कुएँ में फेंका था’। जयदेव की नजर उन पर पड़ी और उनकी नजर जयदेव पर पड़ी। “गीतगोविन्द” के कर्ता जयदेव बड़े प्रसिद्ध पुरुष हुए। अब उनको कही सुकड़न न हो, कही दुखी न हो, ऐसा समझकर जयदेव ने अपनी और से ही बुला के कि ‘राजन ! ये मेरे चार मित्र है’।  वो डकैतों ने समझा कि ‘ये अभी हमारा पोल खोलेगा’। लेकिन जयदेव ने पोल नहीं खोला और मित्र की अदा से ही सारा व्यवहार किया। उनको दान-दक्षिणा खूब दिलाई। राजा ने देखा कि जयदेव के मित्र है और साधु है, तो हो सकता है कि आपको दक्षिणा दिया था और आपको लूट लिया, तो इन साधु बाबाओं को ना कोई लूट ले, इसलिए मैं सिपाहियों की एक टुकड़ी भेजता हूँ।  ये जहाँ से आये उनको पहुंचा दे। सिपाहियों की टुकड़ी लेकर सिपाहियों का अगवा।  उन लूटेरों को साधुवेश में आये थे, साधु समझकर पहुँचाने गए थे, तो रस्ते में पूछा कि ‘जयदेव तुम्हारा इतना सत्कार क्यों करता है’ ? तो उन बदमाशो ने कहा कि ‘जयदेव कि हम पोलपट्टी जानते है। जयदेव हमारे गाँव का है और उसने बड़ी चोरी की थी, तो उसको राजा ने उसे मार-काट के कुएँ में फेंकने का आदेश दिया था, लेकिन हमने उसको बचाया इसलिए हमारा कही पोल न खोले, जयदेव ऐसा सोचते इसलिए हमारा अगता-स्वागता करते’। ऐसा झूठ बोला। जयदेव ने सज्जनता की, लेकिन दुर्ज्जन का स्वभाव तो फिर सांप का स्वाभाव है कि विष बनाना दुर्ज्जन ने तो दुर्ज्जनता बनायीं। जयदेव को तो पता नहीं लेकिन जो सबके दिल का पता रखता है, उस दिलबर से सहा नहीं गया।  सृष्टिकर्ता से सहा नहीं गया। जहाँ वो बोलकर वाकिया पूरा करते है, जयदेव की ग्लानि करते, निंदा करते, वहां चलते-चलते वो धरती वहां से फटी और चारों के चारों बदमाश, जो साधु का वेश बना के ईर्ष्या करते थे, वे चारों बदमाश वहां रीवा-रीवा के मर गए। टुकड़ी वापस आई और राजा तक बात पहुंची, राजा ने जयदेव के पैर पकड़े की  ‘महाराज! हकीकत क्या है ? ‘ महाराज ने कहा कि “मैंने समझा कि इन्होने लूटा है, तो इनको जरूरत होगी तो दे दे, फिर आये तो उनको सुकड़न न हो, इनका मंगल हो भला हो, इसीलिए इनका सत्कार भी किया और दक्षिणा भी दिलाई ताकि ये सुधर जाये।  लेकिन महाराज उस ढंग से नहीं सुधरे तो प्रकृति ने दंड के ढंग से उनको सुधारने का ही काम किया है ईश्वर ने”। तो सेवक में इतनी शक्ति होती है कि सेवक अपनी सेवा में विफल होता है।  ईमानदारी से सेवा करता है और विफल होता है तो स्वामी परमात्मा फिर उसको सहाय करता है।  जहाँ दंड की जरूरत है वहां दंड भेज देता है और जहाँ पुरस्कार की जरूरत है वहां पुरस्कार भेज देता है। सृष्टिकर्ता के ह्रदय में सबका मंगल छुपा है।  ऐसे ही सेवक के ह्रदय में सबका मंगल छिपेगा, मंगल छुपा रहेगा सबक तो सृष्टिकर्ता के साथ अपने स्वाभाव का तालमेल करके बहुत सुखी और उंचाईओं का अनुभव कर सकता है। तो अभी क्या करेंगे? हरी हीओमओओमओओमओओओओओम।

रामराम

निस्वार्थ सेवा हो सदा। मन मलिन होता स्वार्थ से। जब तक रहेगा मन मलिन नहीं भेट होगी परमार्थ से।

हमेशा के लिए रहना नहीं इस धारे पानी में। कुछ अच्छा काम कर लो इस चार दिन की ज़िंदगानी में।

शक्ति, संपत्ति और योग्यता होने पर भी जो सेवा नहीं करते वे आलसी प्रमादी है। सुख आसक्त है और भाग्यहीन है। जो मनुष्य जनम पाके सेवा का भाग्य नहीं पाते, वे भाग्यहीन है। किसी के दुःख मिटने के बदले उसको सुखी करने का पौरुष करने वाला सेवक ज्यादा सफल होता है। और जो सुख देने की भावना से सेवा करता है तो दुःख तो मिटा ही देगा। दुःख मिटा ना पर्याप्त नहीं उसे सुखी करना उसे प्रसन्न करना और सच्चे सुख की राह पे लगा देना ये बहुत-बहुत ऊँची सेवा है। सेवा चाहो मत सेवा करो उत्साह से। सेवा का फल चाहना सेवा धर्म को भ्रष्ट करना है। सेवा के फल को तुच्छ करना है। हमें तो कुछ नहीं चाहिए। जिसको कुछ नहीं चाहिए उसको सब कुछ जिसका है वो खुद मिल जाता है। बलि देता ही जाता है कुछ नहीं चाहता है तो सब कुछ जिसका है वही वामन होके आता है। उससे भी कुछ नहीं चाहता है तो वामन उनका द्वारपाल हो जाता है। भगवान वामन बलि राजा का द्वारपाल हो जाता है। जिसका द्वारपाल भगवान है उसको कमी ही क्या रहेगी? शत्रु उनका क्या बिगाड़ेंगे? ऐसे ही तुम्हारे इन्द्रियों के द्वारपाल श्रीहरी को कर दो। हे मेरे परमात्मा ! तुम ही रक्षक रहिये। तुम ही प्रेरक और पोषक रहिये। हे मेरे नाथ ! मेरे गुरु,  मेरे हरी, मेरे इष्टदेव! प्रभु तेरी जय हो !हरीओओम ओओओओओम। रामराम। खूब आनंद !  मधुर आनंद ! आत्मिक आनंद परमेश्वरिय आनंद का भाव करो। मस्ती….  माधुर्य …. विश्रांति

मैं सदा स्वस्थ हूँ। क्योंकि बीमारी मुझ तक कभी आती ही नहीं मैं वो चैतन्य आत्मा हूँ। मैं सदा सुखी हूँ क्योंकि दुःख मेरे तक कभी पहुँचता नहीं है। दुःख कभी-कभी मन को होता मुझको कभी नहीं छूता। मैं अमर हूँ। मौत शरीर तक आती है मुझ तक मौत की दाल नहीं गलती। मैं ईश्वर का ईश्वर मेरे ! मैं गुरु का गुरु मेरे। ईश्वर और गुरु सद्चिदानन्दस्वरुप है तो मैं भी उन्ही का चिंतन, अनुसरण और उनकी प्रसन्नता से मैं भी वही हुए जा रहा हूँ। खूब आनंद, मधुर आनंद, सद्चिदानन्दमय का आनंद। वाहमौला! तेरी जय हो! प्रभु तेरी जय हो।

मधुरं मधुरे भ्योपि मंगले भ्योपि मंगलम।

पावनं पावने भ्योपि हरे नामैव केवलम।

हरी हरीओम ओओओओओओम। रामराम

मधुर शांति अथवा तो मधुर शांति में शांत होते जाओ नहीं तो श्वासो श्वास को गिनाते जाओ अथवा तो मन के विचारों को देखते जाओ नहीं तो जो सत्संग सुना है उसी को अपना बनाते जाओ।

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नारायण नारायण नारायण !!

 

छठे अध्याय का पहला श्लोक में

अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः,

स सन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चक्रिय: ||

 

जो आसक्ति रहित होकर अपना नित्य कर्म, नैमेतिक कर्म करता है| संध्या, वंदन आदि नित्य कर्म है| दानपुण्य, सेवा, पूजा आदि नित्य कर्म है और किसी नीमित से जो कर्म मिल जाते है उसको नैमितिक कर्म बोलते है।  नित्य कर्म और नैमेतिक कर्म जो करता है लेकिन फल की आकांक्षा नहीं रखता। जैसे नित्य रात को नींद करते है, तो सुबह संध्या करने में फल की इच्छा न रखे। रात को सोये तो सुबह स्नान कर लिया इसमें फल की इच्छा क्या रखें? तो रात की नींद का तमस दूर करना है तो सुबह का स्नान चाहिए। ऐसे ही मन का तमस दूर करना है तो संध्या प्राणायाम चाहिए। रात्रि में जो श्वासोश्वास में जो जीवाणु मरे, सुबह की संध्या प्राणायाम से वो पातक नष्ट हो गये।  ह्रदय स्वच्छ हो गया, शुद्ध हो गया तन और मन। सुबह से दोपहर तक जो कुछ खाने पीने में, हिल चाल में जो कुछ वातावरण में जीव जंतु को हानि हो गया अंजाने में, फिर दोपहर की संध्या करके स्वच्छ हो गए। फिर शाम की संध्या करके स्वच्छ हो गए। संध्या करके स्वच्छ हो गए, ध्यान और जप करके थोड़े ऊपर उठे। ये है नित्य कर्म।

 

पंचयज्ञ है नित्यकर्म।  गौ को, ब्राह्मण को, जीव जंतु को, अतिथि को कुछ न कुछ देना करना ये पाँच यज्ञ नित्य कर्म। दूसरे होते है नैमेतिक कर्म। पर्वीय कर्म उत्तरायण पर्व आया, चेटीचंड  का पर्व आया, शिवरात्रि का पर्व आया ,गुढी पर्व आया, उन पर्व के निमित् जो कर्म करे। तो नित्य कर्म, नैमेतिक कर्म करे।

 

तीसरे होते है ईश्वर प्रीत्यर्थे कर्म। नित्य नैमेतिक कर्म से तन मन स्वस्थ रहेगा| स्वर्ग तक की यात्रा कर लेंगे। कुछ और शुभ कर्म स्वर्ग की इच्छा करेंगे तो स्वर्ग तक की यात्रा कर लेंगे नहीं तो यहाँ स्वर्गीय जीवन जीयेंगे। पैसे से अगर स्वर्गीय जीवन मिल जाता तो धनाढ्य लोग टेंशन में नहीं होते। टेंशन नरक है। डर और टेंशन नरक है।

 

क्योंकि नित्य कर्म और नैमेतिक कर्म छूट गए। इसलिए तन की और मन की सात्विकता कम हो गयी। तनाव और टेंशन दो कौड़ी  बिमारी का शिकार हो गए। चौथा होते है “काम्य कर्म” काम धंधा रोजी-रोटी  पेट की कामना से जो कुछ किया वो होते है काम्य कर्म । काम्य कर्म का कुछ अंश निष्काम कर्म।  ईश्वर प्रीत्यर्थे कर्म करे।   ईश्वर प्रीत्यर्थ कर्म करने को श्रीकृष्ण ने कहा “अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः, स सन्यासी च योगी च ” वह सन्यासी है वह योगी है जो आसक्ति, फल की आकांक्षा रहित सत्कर्म कर लेता है।

 

सेवा चाहे और सेवा के बदले में नाम चाहे तो सेवा के कर्म में आसक्ति हो गयी।  यश चाहे, पद चाहे एक दूसरे का टाटिया खींचना चाहे और आप बड़ा बनना चाहे तो वे आदमी आध्यात्मिक जगत में विफल होते है और व्यवहारिक जगत में लम्बा समय सुखी नहीं रहते।  बिल्कुल पक्की सच्ची बात।  सुख के लिए फिर उनको दुराचार करना पड़ेगा। शराब, कबाब, हस्तमैथुन ये सब इसी का फल है कि कर्म में निष्कामता नहीं। काम्य कर्म, नित्य कर्म और नैमेतिक कर्म। नित्य और नैमेतिक सतकर्म तो छूट गए काम्य कर्म में हम लोग सब लगे हुए है। कामनाएं बढती जाती है और हल्की कामनाएं घुसती जाती है। जीवन में चारो तरफ दुःख ही दुःख। इसी कामनाओं को निकलने के लिए निष्कामता चाहिए। कांटे से कांटा निकलेगा। तो निष्काम कर्म करनेवालों को ही योग में वास्तविक प्रवेश मिलेगा, टिकेगा मन ।

दूसरे तीसरे श्लोक में भगवन कहते है

पहिले श्लोक है छठे अध्याय का

आरुक्षोमुनेयोर्गम ” कर्म  कारणमुच्यते |

अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः,

स सन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चक्रिय:

 

अग्नि का त्याग कर दिया, क्रिया का त्याग कर दिया और सन्यासी हो गया | उसका सन्यास योग फला नहीं अभी। लेकिन कर्म तो कर रहा है काम्य कर्म नित्य नैमितिक कर्म तो करता है उसमे फल की इच्छा का सवाल ही नहीं होता।  स्नान करना उसमे फल की इच्छा क्या है? श्वास ले रहे छोड़ रहे, उसमे फल की इच्छा क्या करोगे ? भोजन कर रहे हो भूख मिट रही है | उसमें फल की इच्छा क्या करोगे ? तो फल की इच्छा रहित नित्य नैमितिक कर्म तो करे लेकिन काम्य  कर्म, जो जीवन खाने पीने के लिए है,रहने के लिए , जो कामना वाले कर्म है, उसमें से भी समय बचाकर निष्काम कर्म करें।

 

ईश्वर प्रीत्यर्थ कर्म करें। बोले मैंने स्नान कर लिया निष्काम भाव से तो बड़ा काम कर लिया।  मैंने रोटी खाली निष्काम भाव से, तो ये तो हँसी का विषय है। मैंने पानी पी लिया निष्काम भाव से। ऐसे ही संध्या, प्राणायाम और कमाई का कुछ हिस्सा, ये जो सत्कर्म है निष्काम भाव से किया ये तो भाई कर्त्तव्य है ! नित्य कर्त्तव्य ! नैमितिक कर्त्तव्य ! तो निष्काम कर्म, नित्य कर्म, नैमितिक कर्म , काम्य कर्म कामना वाले कर्म और फिर ऊँचा दर्जा आता है।  निष्काम कर्म !

 

हाथी बाबा से किसी ने पूछा की भजन करे तो क्या फायदा होगा ? तो रोने लग गए। बोले ‘महाराज में कोई बुरा तो नहीं किया ? ‘ बोले ‘मेरा कौनसा दुर्भाग्य है? की जरा जरा बात में क्या लाभ होगा ऐसे बनिये, स्वार्थी टट्टू का दर्शन हुआ सुबह सुबह ! जरा जरा बात में क्या लाभ होगा? क्या लाभ होगा? मेरा मन ख़राब होगा तुम्हारे जैसे व्यक्ति के बीच में मैं  रहूँगा तो। ‘ सब काम केवल बाह्य  लाभ देख कर नहीं किये जाते। कोई लाभ की जरूरत ही नहीं है।  मेरा स्वाभाव है सत्कर्म करना। नित्य कर्म, नैमेंतिक कर्म तो करता है, काम्य कर्म भी करता है लेकिन वो कुछ ऐसा भी समय निकाले की कोई बाह्य लाभ की जरूरत ही नहीं।

 

द्रौपदी ने पूछा की “आप तो संध्या करते, ध्यान करते, घंटो भर बैठे युधिष्ठिर जी ! और हम लोग इतने दुखी है और वो दुष्ट राज्य का मौज लेता है तो क्या भगवन से या अपने आप से आत्मा से ये संकल्प नहीं कर सकते की हम इतने दुखी क्यों है ?” युधिष्ठिर ने कहा की “मैं दुःख मिटाने के लिए भजन नहीं कर रहा हूँ। लेकिन भजन करने से सुख मिल रहा है। आनंद मिल रहा है और मेरा कर्त्तव्य है, स्वाभाव है इसलिए मैं भजन कर रहा हूँ।“

 

गुरुओ ने वहां झाडू लगवाएं, बुहारी करवाई। निष्कामता होते होते योग्यता आई तब गुरु ने दिया तो पचा, नहीं तो नहीं पचता।  राजा की सवारी जा रही थी, बड़ा यशोगान हो रहा था। बचपन में ही बाप छोड़ कर रवाना हो गया, ऐसा बालक अपनी विधवा माँ को बोलता है कि “ माँ ! ये राजा साहब देखो  हाथी पे जा रहे है …. रथ पे जा रहे है …मुझे इस राजा से मिलना है।’ ‘माँ ने कहा बेटा राजा से मिलना है तो एक ही उपाय है।  कि राजा का नया महल बन रहा है। वहां जाके काम कर। हफ्ते हफ्ते में पगार देते  है।  तू लेना कुछ मत। आपने आप राजा मिल जायेगा तुझे।’

लड़के ने काम शुरू किया और हफ्ते हफ्ते की जो खर्ची मिलती थी उसे एक बार लेना है तो बोले नहीं लेना है।  पैसा नहीं ,लेता पैसा नहीं लेता और काम कर रहा है। और  दिल लगाके कर रहा है।  इसकी खबर ऊँचे अधिकारी को पहुंची। फिर ऊँचे को पहुंची।  यहाँ तक वजीर तक पहुंच गयी  और वजीर उस लड़के को देखने आया और वजीर ने जाके राजा को कहाँ की एक लड़का है। अभी जवां है और जवानी उभर रही है और काम खूब करता है। और पैसा नहीं ले रहा है। बोले ये कैसे? बोले क्या पता?

जाँच करो !! वजीर ने जाँच किया कि

” क्यों नहीं पैसा ले रहा?

“नहीं ! राजा साहब का महल है।  इतनी तो सेवा हमें मिल जाये। ”

“तो तेरे को पैसे की जरूरत नहीं है ?”

“जरूरत नहीं है ऐसी बात नहीं है।  मेरी माँ विधवा है। पिता मर गए। खेत में तो बहुत थोड़ा सा आता है। लेकन गुजारा हो जाता है।  मैं सेवा कर रहा हूँ ”

 

राजा तक खबर गयी।  राजा ने देखा की ‘नपातुला है,बचपन में पिता छोड़कर मर गए। विधवा माता है। डेढ़ एकड़ का खेत है उससे गुजारा कैसे होता? और काम कर रहा है दिल लगा के और कुछ  नहीं लेता है। उसको जरा बुलाओ। राजा ने अपने महल में बुलाया। और कुछ नहीं लेता है तो उसको भोजन-वोजन कराया और बड़ा मान दिया। और राजा उस पर बड़ा खुश हो गया। ‘अच्छा ! तूने इतने दिन तक मेहनताना नहीं लिया। तो अब क्या करो दस-पांच हजार रूपया तुमको दे देते है ‘वैसे तो दो सौ –चार सौ होता था, अब दस-पांच हजार आ रहा  है। बोले ‘ नहीं ! नहीं ! दस-पांच हजार क्या करना है ? मेरा तो ये भावना था कि में राजा साहब से मिलु ,तो माता ने कहा कुछ मत लेना।  सेवा करना।  सेवा से तुम्हारा जो भी संकल्प हो फलेगा।  तो मुझे आप मिल गए बस ! अब मुझे और  कुछ नहीं चाहिए।

राजा कहता है की ‘ मैं तो तुझे मिल गया लेकिन मुझे तेरे जैसा निष्कामी पुत्र मिल गया अब तू मेरा बेटा है। ‘  कुछ दिन आता जाता रहा तो रानी साहिबा ने भी उसके स्वभाव को परख लिया, राजा ने उसकी निष्कामता को परख लिया कह दिया की तू मेरा बेटा है।

कथा तो बड़ी रसप्रद  है लेकिन राजा ने उसको बेटा बनाकर राजतिलक कर दिया।  जब शोभायात्रा निकली तो पिता और पुत्र…नूतन राजा…..और पास में भूतपूर्व राजा बैठे….नगर में यात्रा निकली तो वो माँ राजा की सवारी देखने को निकली। राजा को बताया नूतन राजा ने की वो मेरी माता है। बोले

 

“वो तेरी माता नहीं मेरी भी माता है।  जय हो तेरे जैसे निष्कामी को जन्मा दिया। तू तो रथ से उतर कर प्रणाम करने जाता है ,लेकिन मैं भी उस माता को प्रणाम करने चलता हूँ। उसके आगे तू भी बेटा  है मैं भी बेटा हूँ।”

 

महाराज निष्काम में इतनी शक्ति है लेकिन अंधे लोग जानते नहीं। जिसके पास धन है, बुद्धि है, स्वास्थय  है , योग्यता है अगर वो सत्कर्म नहीं करता है ईश्वर प्रीत्यर्थ कर्म नहीं करता है तो वो स्वार्थी है। विषयलम्पट्टू है, वो दण्ड का पात्र है, अशांति का पात्र है, विनाश का पात्र है ऐसा शास्त्र कहते है।

 

ये हमारा कर्तव्य हो जाता है सेवा कार्य करना। अपनी भलाई के लिए हमारा कर्त्तव्य हो जाता है। और जिनको सेवा मिलती है वो लोग टालते रहते है या छटकबारी करते दूसरे के कंधे बन्दुक रखते है उनकी खोपड़ी में ही बन्दुक जैसी अशांति हो जाती है। अपना कार्य तो तत्परता से हम करे  लेकिन दूसरे के कार्य में भी हाथ बटायें।

 

एक फौजी आता था। छ: -आठ साल पहले की बात है। एम.ए. पढ़ा था। गुजर जाति का  था सरदार था। तो बड़ी श्रद्धा उसकी आँखों में। मैं कभी घूमने गया तो हाथ जोड़ कर पीछे चलता था सरदार।  मैंने कहा “तुम कहाँ से आते हो?”

बोले “स्वामीजी ! मैं इतवार – बुधवार को आपकी कथा होती है  एक बार आ गया था। फिर मेरे को अच्छा लगा में आता रहा। स्वामीजी अब तो मेरी बदली हो रही है। लेकिन मैं बहुत बहुत  आभारी हूँ। कि में यहाँ आया मेरी शराब छूट गयी।  मेरे हिस्से का शराब दूसरों को दे देता था। नहीं तो मैं शराब के लिए लड़ मरता था। मेरा मांस खाना छूट गया, आपने तो छुड़वाया नहीं। केवल इस रेंज में आया तो छूट गया। और स्वामीजी ! पहले में अपना काम टालम -टोल करता था अभी मैं मेरे ऑफिस का,ये हनुमान कैंप में जो ऑफिस ,ये अपना आश्रम के सामने वो नदी के उस किनारे जो है।  नदी के एक किनारे अपना आश्रम और दूसरे किनारे फौजियों का डेरे है। स्वामीजी! मैं वहां काम करता हूँ।  फ़ौज में हूँ।  पहले तो मैं अपना काम भी असिस्टेंट या दुसरे में दे देता था। लेकिन अब अपना भी कर लेता हूँ बॉस का भी कर लेता हूँ।  अपना कोई साथी है उनका भी कर लेता  हूँ। काम करने में भी मजा आ रहा है महाराज ! ध्यान में थोड़ा सा मजा आया तो अब पता चलता है कि  सेवा में कितना मजा है महाराज ! मैं तो ढूंढ लेता हूँ सेवा ”

 

इह मुखा कोन पुजिंदो  इ जबाबदारी हूँ नहीं लउ इ टेंशन हूँ नई लउ पण म्हारा शेर ऐसी हजार पीना न सचु सचु तो मरी जाऊ जाये इको नाना खड़ा मातु

 

निष्काम कर्म के बिना जीवन निखरेगा नहीं। ईश्वर प्रीति अर्थ के बिना जीवन का विकास होगा ही नहीं। कुछ लोग करते थोड़ा काम तो फिर अधिकार के लिए झपट झपट के मर रहे है। पद और प्रतिष्ठा के लिए मर रहे है।  अपनी योग्यता को उसी में मार रहे है।

आचार्य विनोबा भावे के यहाँ कोई समिति वाले ने आखरी राम राम किया

“महाराज ! की हम आश्रम में से जायेंगे। हमको यहाँ का वातावरण सूट नहीं होता।”

बोले  “क्यों?” बोले  “नए संचालक आ गए। उनके कहने के अनुसार थोड़ा थोड़ा बात भी उनके कहने के अनुसार करनी पड़ती है। हम करेंगे ये सेवा भूदान यज्ञ की लेकिन स्वतंत्र होकर करेंगे।”

विनोबा ने कहा “स्वतंत्र स्व के तंत्र को जाना है। स्व तो आत्मा है उसको तो जाना नहीं है बेटा ! मतलब तेरे मन में जैसे आयेगा वैसी सेवा करेगा। “”हाँ ” “मन तो अपना नौकर है। मतलब गुरुभाई की या गुरु सिद्धांतों की बात नहीं मानूंगा। जैसा मेरा नौकर कहेगा ऐसा ही करूँगा यही हुआ ना तेरा ?”

 

जैसा मेरा नौकर कहेगा वैसा करूँगा। शास्त्र कहते है जो गुरुकहे , गुरुभाई कहे वैसा में नहीं करूंगा जैसा मेरा मन करे ऐसा करूंगा यही तेरी बात हुई।

उस युवक की थोड़ी बहुत सेवा थी तुरंत लाइट हुयी और चरणों पे गिर की नहीं ये द्वार छोड़ कर कही नहीं जाऊँगा। करूँगा सेवा अभी।

 

 

मेरे गुरुदेव किताबों की गठरी बांधकर गांव गांव जाते।  नैनीताल के पहाड़ से हनुमान गढ़ी के पास में एक पहाड़ है सीतला मंदिर आश्रम का । उस पहाड़ से उतरते ही नीचे गांव फिर दूसरे पहाड़ पे चढ़ते ही छोटा सा गांव। सिर पर गठरी बांध के किताबों की अस्सी साल की उम्र में साईं लीलाशाह जी महाराज। अस्सी साल की उम्र में सिर पर गठरी किताबों बांधके की पहाड़ उतरते। गावों में किताबें बांटते । यौवन सुरक्षा जैसी पुस्तक , नारी धर्म जैसी पुस्तक स्त्रियों को, छोकरों को योगासन और  योगयात्रा जैसी  पुस्तके….योगयात्रा उस समय नहीं थी लेकिन उसी प्रकार की पुस्तकें दे आते और प्रसाद भी दे आते। फल फ्रूट ले जाये तो वेट बढ़ जायेगा इसलिए काजू और किशमिश खरीद लेते थे। और वो सबको इकठ्ठा करके दो दो दाने देके, यथायोग्य देके,थोड़ा सत्संग सुनकर एक एक किताब देकर ये सुनाते ये कहते  “आज शुक्रवार है तो अगले शुक्रवार को इस गावों में आऊंगा। और ये जो किताब दी है वो आप पढ़ लेना अच्छा लगे वो याद करना और लिख लेना और पूरी किताब दो-तीन-चार बार जरूर पढ़ना। और हो सकता है कि मैं कुछ पूछूँ भी इसीलिए तैयार रहना। और अगले शुक्रवार को आऊंगा। ये किताबें वापस ले जाऊँगा दूसरी किताबें दे जाऊँगा ”

जिस महापुरुष के संकल्प मात्र से पेड़ चल पड़ा है, जिस महात्मा को बीस-बाईस साल की उम्र में परमात्मा का साक्षात्कार हुआ है। वो महापुरुष अस्सी साल की उम्र में सर पे गठरी बांध के किताब को गांव गांव पहुंचाता है, क्या उनके पास कोई फालतू समय था? अगर वो ऐसा नहीं करते, गांव गांव नहीं घूमते और घूमते-घामते गोधरा नहीं आते तो मेरे को उनका दर्शन भी नहीं होता। और मेरे वैराग्य को पुष्टि भी नहीं मिलती। मैंने एक बार दूर से दर्शन किया, उनके दर्शन मात्र से मेरा जो सोया हुआ वैराग्य जगा और फिर सब कुछ छोड़कर उनके चरणों तक पहुँचने की हिम्मत भी आ गयी। ये उन महापुरुषों के निष्काम कर्म योग का फल हम लाखों लोगों को मिल रहा है। उन्होंने तो ये नहीं कहा की जय लीलाशाह   ‘जय जय लीलाशाह बोलना। नहीं….लेकिन उनकी जय किये बिना रहा नहीं जायेगा। मुर्ख लोग समझते है की जरा सा काम करे तो ‘ओहो !पद अधिकारी बन जाये ‘

हमारा नाम अख़बारों में आ जाये। हमें सब मिल जाये।

 

हिरन की चोरी करे सुई का करे दान। झाकता रहे आकाश में की कब आवे विमान। ” ऐसे निष्काम कर्म करने वाले लोगों को लोग राजनेता बोलते। जय राम जी की।

 

किसी को आज के ज़माने में बड़ी गाली देनी हो तो  बोल दो या तो राजकारणी छ्हे। ए ये तो राजकारणी छे, पति गयो। जय श्री कृष्णा।

 

अर्थात निष्काम की जगह पर कामना आ गयी तो उनके नाम पर भी बट्टा लग गया।  राजनीती कोई बुरी नहीं वो नीतियों की राजा है लेकिन वो निष्कामता की जगह कामना आ गयी तो क्रोध भी आएगा, द्वेष भी आएगा, इर्ष्या भी आएगा, कपट भी आएगा, बईमानी भी आएगी ,अंदर न जाने क्या क्या होता है। दुर्गुणों को निकालने के लिए सदगुण चाहिए और सद्गुण ईश्वर की प्रीति अर्थ कर्म करने से ही आएंगे दूसरा कोई उपाय नहीं है। मुर्ख लोग काम टालते है।  वो उसपे टालेगा, वो उसपे टालेगा। और जब यश और सफलता होगी तो छाती फुलाके आगे आएगा। और विफलता होगी तो ‘वु तो कहतो तो के। वु तो कहतो तो के। नौकर बुजे हाणी यां करी पहला यां करी’

अथवा तो काम बिगड़ गया तो बोले ईश्वर की मर्ज़ी। अच्छा काम करता है तो बोले हमने किया हमने किया और जो बिगड़ा है वो ईश्वर की मर्ज़ी। इसका मतलब बिगड़ने के काम सब ईश्वर करता है और बढ़िया काम तू ही कर रहा है। ऐसी मति अंध हो जाती है स्वार्थ से। और सेवा से मति हो जाती है शुद्ध।

बढ़िया काम होता है तो बोले ईश्वर की कृपा थी। महापुरुषों का प्रसाद था। शास्त्रों का प्रसाद था। मेरे कार्य के पीछे ईश्वर का हाथ था। गाँधी कहते

गुरूजी कहा करते थे जुदा जुदा जगह पर काम करने वाली  कोई महान शक्ति है।  लोग बोलते है लीला ने किया, लीला ने किया, लीला नहीं करता है।

नाम तो लीलाशाहजी है।  लेकिन अपने आप को वो ‘लीला नहीं ! कुछ नहीं किया ? जुदा जुदा जगह पर काम करने वाली  कोई महान शक्ति है। हम लोग तो निमित्तमात्र है ‘

और कही गलती हो गयी तो भाई ! क्या करू? हम तो पढ़े लिखे नहीं है ? हमारी गलती हो तो आप क्षमा कर देना। कितनी नम्रता है उन महापुरुषों में। निष्कामता आएगी तो नम्रता आएगी और नम्रता आएगी तो जैसे सागर में बिन-बिलाए नदियां चली जाती है वैसे यश, धन, ऐश्वर्या, प्रसन्नता, ख़ुशी ये सब सदगुण आपने आप आ जायेंगे। गंगा-यमुना जैसे सागर में बिन बुलाए भागती जाती है ऐसे ही सदगुण बिना बुलाए आ जायेंगे। नम्रता और निष्कामता से।  और जहाँ नम्रता और निष्कामता अहंकार फाका आया तो फटकार और विफलता बिन बुलाए आएगी। जीवन जीने का ढंग, हम बेसिक बात भूल जाते है इसीलिए विश्व भर में अशांति दुःख।  और फिर दूसरों को दबोच के दुनिया की चीज़े इक्कठी करते मुर्ख लोग सुखी होना चाहते। उनसे भी सुख नहीं तो बिचारे वाइन पीकर सुखी होना चाहते। उससे भी सुख नहीं लेडी बदल के सुखी होना चाहते।उससे भी सुख नहीं हवा बदलके सुखी होना चाहते। उससे भी सुख नहीं हवा बदल, लेडी बदल, लेडे बदल जब तक तू समझ  नहीं बदलेगा तो बदल बदल के चौरासी लाख जन्म बदलता रहेगा।

चौरासी लाख जन्म बदलता रहेगा।  चौरासी लाख शरीर बदलता रहेगा। कभी न छूटे पिंड दुखों से जिसे निष्कामता का ज्ञान नहीं ब्रह्म का ज्ञान नहीं। ज्यों ज्यों चित्त  निष्काम कर्म करेगा त्यों त्यों उसकी क्षमताएँ बढ़ेगी। कामना से आपकी क्षमताएं और योग्यताएं कुंठित हो जाती है। और जो जो निस्वार्थ एक आदमी डंडा लेके पानी कूट रहा है।  अरे क्या करता है ? बोले में निष्काम कर्म करता हूँ। कुछ भी मिलाने वाला नहीं फिर भी कूट रहा हूँ। अरे मुर्ख! ये निष्काम नहीं ये निष्प्रयोजन प्रवृत्ति है।

निष्प्रयोजन प्रवृत्ति न करे। निष्काम प्रवृत्ति करे। दूसरे का दुःख मिटाना तो ठीक है लेकिन दुःख मिटने पर भी इतनी दृष्टी जोरदार न रखे जितनी रखेगी उतना सुख मिले।

जब सुख मिलेगा तो दुःख के सिर पर पैर रख देगा वो तो। और सुख तुम कहाँ से लाओगे तुम्हारे पास फैक्ट्री है क्या ?सुख तुम लाओगे महाराज! जितने जितने तुम निष्कामी होंगे उतना उतना आपका अंतकरण सुखी होगा और दूसरों को सुखी करने के विचार भी उसी में उठेंगे। भक्तियोग है, ज्ञानयोग है ऐसे कर्मयोग है। ये तीनो योग स्वतंत्र है मुक्ति देने में। निष्काम कर्म योग से कई लोग सफल हो गए। कही भक्तियोग से सिद्ध हो गए, कई ज्ञानयोग से सिद्ध हो गए। और किसीने भक्ति और ज्ञान साथ में रखा, तो किसीने निष्कामता और ज्ञान को साथ में रखा। अपन तो तीनो  ले चलते है भाई ! थोड़ा थोड़ा सब हो कोई बात नहीं। रोटी भी चाहिए, सब्जी भी चाहिए, छाछ   का कटोरा है तो घाटा क्या पड़ता है ?चलो! वो भी रखो थोड़ा साथ में। समिति के भाइयों के मन में विचार उठा के ‘सेवा करने के लिए जैसे दो दिये. अकेला होता है तो दिए के निचे अँधेरा होता है और दो दिए रख दो आमने सामने तो एक दूसरे का अधिकार मिटा देता है। प्रकाश ही प्रकाश होता है। इसीलिए अपने अपने अकेले ढंग से आदमी करता रहता है तो कुछ गलती हो सकती है।  जब समिति बन तो एक दूसरे से विचार विमर्श करके गलतियाँ,अँधेरा हटता जायेगा। फिर वो समितियां तो बनीं…जिन्होंने बनायीं धन्यवाद ….ये समिति सब मिलकर अगर विचार-विमर्श करे तो और योग्यताएं और क्षमताएं बढ़ेंगे। ओर कमिया निकलेंगी।  और जितना जितना कमिया निकलेंगी उतना उतना समाज की कमियां निकलने में हम लोग सफल हो जायेंगे। इसीलिए सम्मति मांगी थी यहाँ समिति ने कि अखिल भारतीय समितियों की मीटिंग करा दे। तो तीसरी तारीख बापू थोड़ा समय दे। मैं क्या ‘अच्छी बात है।  हम तीसरी तारीख को होंगे इस समय।’

‘तो आपका दर्शन हो गया। हमारे लायक कोई सेवा होतो बिना संकोच बताईयेगा। हमारे जिम्मे कोई काम आ सकता हो तो संकोच न करे | तन से, मन से, धन से ,वचन से  जैसे भी हो हम हाज़िर है। ‘ नारायण हरी।  नारायण हरी।  नारायण हरी।

 

वो दे तो प्रसन्न काहे का?  वो प्रसन्न हो चाहे न हो हमारे को क्या हुआ? उसकी प्रसन्नता तो कुछ न कुछ दे। फूल दे या फूल की पखड़ी दे नहीं तो कम से कम शुभ कामना और मीठी मुस्कान तो दे। मौजी प्रसन्न हो तो कुछ न कुछ देगा दाता प्रसन्न हो दिए बिना रहेगा नहीं।

 

नारायण हरी। नारायण हरी।  नारायण हरी।

 

जो जवाबदारियों से भागते रहते अपनी योग्यता कुंठित कर देते। और जो निष्काम कर् योग की जगह पर एक दूसरे का टाटिया खींचते वो अपने आप को खींच के गटर में ले जाते। ये जो आपके यहाँ ऐसा है ऐसा मेरे कहने का तात्पर्य नहीं। सब जगह ऐसा दिख रहा है मुझे। जहाँ देखो छोटे मोटे घर में, छोटे मोटे समाज में, छोटे मोटे संगठन में, छोटे मोटे कही भी वो चाहे दूध की डेरिया हो चाहे नगर पंचायत हो चाहे ग्रामपंचायत हो।  ये समिति वाले भी गांव से समाज से ही आये है। बोले ‘बापू! फलाना आदमी ऐसा है देखो! समिति में रेहके भी उसने ऐसा कर दिया। मैं क्या समिति में रेहके ऐसा बन गया तो समिति ने आदमी बनाया तो नहीं , मैन्युफैक्चरिंग तो नहीं किया। वो आया था तो तुम्हारे गांव से और सचमुच में समिति में रहकर नहीं किया, समिति में घुसके ऐसा किया। ऋषिप्रसाद की एक बुक ले गया। कैसे भी चुराके। और सब बना बना के पैसे अपनी जेब में ऐठ लिए।  आप सब बिचारे चिल्लाते रहे ‘ऋषिप्रसाद की वो है। ‘

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लेकिन वो दान के और हराम  के पैसे ने उसको ऐसा परेशान किया कि वो पकड़ा भी गया, आया भी, माफ़ी-वाफी भी मांगी और बाद में दूंगा। वो जब दे तब दे , लेकिन जिनके पास से आश्रम के नाम से उगाये उन बेचारे के विश्वास का घात  हो जायेगा। भाई ! उनको भेजो।

 

दिल्ली में एक ठग ऐसे कुछ किताबें लेकर घर घर पहुँच गया कि “भाई ! लीजिए पढ़िए किताब हम लोग समिति में है। आयोजन करा रहे है आप पढ़िए। ”

“भाई ! कितने पैसे किताब के ?”

“किताब के नहीं आपको जो डोनेशन देना हो दे दीजिये। ”

अब किताब आगे तो लिखा हुआ है दो रूपया-तीन रूपया क्या करे? और डोनेशन क्या तीन  रूपया थोड़े देता है? कोई पचास देगा, कोई सौ देगा, कोई पांच सौ देगा। ऐसे किसी ठग ने उगाना शुरू कर दिया। उस ठग को हमने भी नहीं पकड़ा, समिति वालों ने भी नहीं पकड़ा, लेकिन उस ठग को  किसी अंजान व्यक्ति ने पकड़ा और फिर सीबीआई वालों को पकड़ा दिया। वो ठग तो वाकर गया कि कैसा  काम हो जाता है कि अपने ह्रदय में तो निष्कामता है तो कोई बेईमानी करता है तो बेईमान ऐसे ही पकड़ा जाता है, फिर बोर्ड लगाने पड़ते है कि आश्रम के नाम पर, समिति के नाम पर अथवा कभी कभी कैसेट में बोलना पड़ता है | ऐसा कोई ठग न घुस जाए इसकी भी सावधानी रखना।

 

ऐसा कोई एडजस्टमेंट वाला भी कोई न घुस जाये, उसकी भी सावधानी रखना। जय राम जी की।

साहब एडजस्टमेंट कर दिया।  पंचेड़ में एक ऐसा घुस गया था ,पंचेड़ समिति में ।  अभी मैं उसका अभी तक नाम नहीं लिया, ना लूंगा ।  मेरे ह्रदय में हुआ की पंचेड़ आश्रम है तो आश्रम की समिति के आदमियों में खजांची कैसा है तो उसका कभी कभी तो देखना पड़ता है ध्यान कर । मेरे ह्रदय बोलता था कि आदमी तो बाहर से तो बड़ा दिखता है, अच्छा दिखता है लेकिन मेरा ह्रदय अंदर पुकारता है कुछ। अब पंचेड़ जाऊँगा तो बुला लूँगा। क्या करूंगा? इधर बुलाऊंगा आये न आये। बेचारा बिजी होगा। पंचेड़ गया तो समितियों के आदमियों से वो मैंने कहा ‘ खजांची कौन है? ‘ ‘बापू मैं हूँ ‘ मैंने कहा ‘मेरे पीछे पीछे आ। ‘

मैं घूमने गया पीछे पीछे। मैंने कहा ‘अपनी समिति में पैसे… आपकी समिति में कुछ गड़बड़ होते है।  बोले ‘बापू! ऐसा तो नहीं है यहाँ तो बहुत खबरदारी से काम करते है।  ऐसा तो कोई नहीं है। मैंने कहा  ‘कोई नहीं है ये तुम कहते हो लेकिन मेरा ह्रदय बोलता है कि पैसे कही गड़बड़ होते है दान के।’ बोले ‘अच्छा बापू ! ध्यान रखेंगे ! ‘

उसने नाम दान भी ले रखा था दिखाने के लिए। जय राम जी की।  और समिति में खजांची बन गया था। मैंने कहा ‘ तुम जाओ! सोचो ! अगर ऐसा कोई है तो मेरे को बताना। ये दान का पैसा है उस कमबख्त को तो पता नहीं चलेगा लेकिन उसकी सात पीढ़ियां बेहिमाल हो जाएगी। इसीलिए तुम ध्यान रखो कल मुझे बताना। चौबीस घंटे की तुमको मोहलत देता हूँ। तभी उसको लाइट नहीं हुई। फिर आया।  फिर मैं वो पंचेड़ आश्रम की कच्ची सड़क में घूमने निकला।  पीछे पीछे आया। मैंने कहा  ‘ऐसा कोई है ?’ ‘नहीं बापू! इसमें तो फलाना है फलाना है।  और मैं आपका दास भी हूँ। ‘ वो बोलता जा रहा मैं  सुनता चला जा रहा।

फिर मैंने मुड़के उसको कहाँ ‘तुम्हारे ध्यान में नहीं आये तो नहीं आये, लेकिन दान का पैसा जो खाएगा साला ! बर्बाद हो जायेगा। ‘

उसकी नजर मेरे आँखों पर पड़ी।  थोड़ा आवाज में कडकाई थी। वो लम्बा पड़ गया। ‘बापू! मैं जरूर ध्यान रखूंगा। अच्छा मैं जाऊ’ हाँ मैंने कहा  ‘जाओ !’

रात भर उसको नींद नहीं आई । दूसरे दिन फूटफूट के रोया और चिट्ठी लिखी की समिति में जो दस हजार इतने रुपये है मेरे लेने निकलते है। वो आप कृपा करके स्वीकार कर ले समिति और जो कुछ भी है मैं आपके शरण में हूँ। जो कुछ लम्बी चौड़ी चिट्ठी लिखी।  मैंने कहा अच्छा  जाओ! नाम तो उसका मैंने जाहिर नहीं किया पर जितना पैसा लिया है  पैसा उसका और ढंग से गया।  उसके पहले दूसरा आदमी था उसमे ।  उसने भी कुछ इधर उधर किया तो इतना खर्चा हुआ की मगज कटाना पड़ा और बांछे माछे घूम गए। ऐसे दूसरी जगह भी एक दो है। मैं नाम लेकर किसी को बदनाम नहीं करना चाहता हूँ।  ये धर्मदेय का पैसा ऐसा खतरनाक है महाराज!

‘तोबा करो आरती कराई फाके पहिन्जा पैसा वठी वियो पर उनेह्मा  हेड़ा हुडडा थीयो त हरि नास थी वेन्धो ‘

उस धर्मदेय के पैसे में गड़बड़ होती है तो अपनी बुद्धि में गड़बड़ हो जाती है। मुफत का खाना सत्यानाश जाना। तो आपकी समितियों को ये ध्यान रखना होगा। वो पहेले समय था कि  कम समितियों में कभी कभी किसका देखते है , अभी देखने का भी टाइम नहीं रहता।  सच्ची बात है। और ये एक एक का बैठके ध्यान लगाए ये अब मेरे बस का नहीं। इसीलिए भी ये जो तुम्हारा आयोजन हुआ अच्छा है ताकि मेरी बात सब तक पहुँच जाएगी और  सावधान रहना। खजांची बनकर लाख- दो लाख – पांच लाख चुराएँगा लेकिन ये भी मुश्किल है कि खजांची पांच लाख समिति का  बनकर चुरा ले। देर सबेर तो बात आ ही जाती है महाराज! उसका पोल खुल ही जाता है। और कोई नहीं खोले तो उसका अंतरात्मा तो उसको डंखता है कि किसीको पता न चलें। चेहरे पर गड़बड़ हो जाती है। लेकिन तुम्हारे जीवन में पांच लाख क्या होता है? पच्चीस लाख क्या होता है ? तुम तो सत्कर्म करके सत्य स्वरुप ईश्वर के सुख सामर्थ्य को पाओ , ऐसा तुम्हारे को मिल रहा है।

 

दूसरी बात भी ये कहनी थी, कि जहाँ जहाँ समिति के भाई है वहां वहां जो सफ़ेद पोशाख वाले है, गरीबों को, आदिवासियों को तो देते है,सेवा करते है वो ठीक है लेकिन कुछ ऐसे जो आदिवासियों से भी आदिवासी है।  ऐसे लोग भी है।  कपडे तो अच्छे है लेकिन आदिवासियों से भी ज्यादा उनकी स्थिति दयाजनक है। पच्चीस रूपया दिन में कमाएंगे और छ: आदमी होते घर में, पांच आदमी होते, बूढ़ी माँ होती है, बाप होता है, छोरे को पच्चीस रुपये मिलते है। तो ऐसे लोगों को भी अगर तुम्हारे नजर में हो तो थोड़ी लिस्ट बनाकर, छोटा मोठा राशन कार्ड बना कर या कुछ और बनाकर उनको भी थोड़ी बहुत मदद दे सको तो देना। और तुम देवो थोड़ा यहां से अहमदाबाद  समिति से। अहमदाबाद समिति नहीं तो फिर अपना गुरु समिति से, थोडा मिल-जुल कर सेवा कर ले।

नारायण हरी।  नारायण हरी।

अहमदाबाद समिति की भी कोई लिमिट है तो थोड़ा वह समिति थोडा वो समिति।  सत्कर्म होते रहे। लेके तो हमारा बाप नहीं गया रोटी तो उसके बाप को देनी है फिर संग्रह आदि अच्छा नहीं ये मोक्ष पथ में आड़ है।

कैसे भला तू भाग सके। सिरपर पे लदा जवाब है।

और समितियों के ये भी एक सेवा का अवसर मिल सकता है कि महीने में एक दिन ऐसा रखें कि  जहाँ रहते है उस इलाके के अस्पताल में मरीजों का दर्शन करने चले जाएँ। दो दो फल,पांच पांच फल चार चार फल और कोई निर्भीकता जैसे ‘जीवन रसायन’ पुस्तक दे उनको। ये कार्य भी समितियां कर सकती है। जो दर्दी है, बीमार लोग है उनसे भी महीने में एक बार, दो महीने में एक बार, तीन महीने में एक बार, पन्द्रह दिन में….. जैसे आप लोगों की सुविधा।  घूमना भी हो गया थोड़ा और लोगों को देख कर कहो कि  शरीर की ये हालत! अपना वैराग्य भी बढ़ेगा। और कभी कभी समिति अपने अपने शमशान के इलाके में जाके बैठोगे कि ‘ले भाई ! आखरी एड्रेस है। देखो! पहले से आगे, ये होना है।’ ये भी एक रख दो आप।

हम तो भाई हमारे पिताजी को जब छोड़ने गए थे ग्यारह साल, दस-ग्यारह साल की उम्र थी। और पिताजी की भभुक भभुक अर्थी जलती देखी और हमारा सोया हुआ वैराग्य जागा। फिर उसी शमशान में हम कई बार गए लेकिन हम मरेंगे तो हमको तो यहाँ नहीं लाएंगे। गाढ देंगे इस उम्र में तो जहाँ बच्चों को गाढ देते है। आठ दस ग्यारह  साल के उम्र के बच्चों को गाढ  देते है। वो पास में ही शमशान था केलिकोमित। फिर वहां जाके बैठते थे बच्चे गढे हुए शमशान में। ‘देख ! ये है ! कल भी मर सकते है और परसो भी, ऐसे सो सकते। इसीलिए चेत जाओ भैया ! तो आप भी समिति, समिति नहीं तो समिति के कोई कोई मेंबर शमशान में जाएँ। कलजुग में शमशान को वरदान है कि वहां ज्ञान और वैराग्य मुफत में मिलेगा। ज्ञान, वैराग्य नहीं है तो भक्ति बेचारी रोती रहती है।  ज्ञान, वैराग्य मूर्छित है तो भक्ति बेचारी रोती रहेगी।

 

किसलिए वस्तु मिली है ?? वस्तु का सदुपयोग करने की जिम्मेदारी आई अपने पास। समय का सदुपयोग करने की जिम्मेदारी आई हमारे पास। तो हम उस जिम्मेदारी को अच्छी तरह से निभाएं। महात्मा गांधी जेल में थे।  जेलर के साथ  किसी गम्भीर विषय में जेलर से बात कर रहे थे। जाड़ों के दिन थे। स्नान के लिए गरम पानी रखा था। उनसे बातचीत का सिलसिला एकाएक बंद करके, वो सिगड़ी में जो कोलसा था वो निकालकर वो अर्धजला कोलसा बुझाकर फिर जेलर से बातचीत में बैठे।  जेलर समझ गया की गांधीजी आधा कोलसा बचाने के लिए बात का सिलसिला बंद करके गए। वो बोल ‘मिस्टर मोहनलाल में एक बैग भेज देता हूँ कोलसे की। कोलसे बहुत पड़े जेल में।

बोले ‘ पड़े है तो क्या है तेरे बाप के थोड़े है ? है सरकार के और सरकार तो पब्लिक के खून में से तो उसके तिजोरी में आता है।  उपयोग तो करुं जरूरत पड़ने पर बिगाड़ने का मेरा अधिकार नहीं है इसीलिए मैंने बुझाया। तू क्या दे देगा ? ‘

 

तो समिति वालों को ये भी ध्यान रखना चाहिए की बिगड़ न हो हमारी समितियों में।

बक्शीश लाख की हिसाब पाई का कौड़ी का।  सदुपयोग होता हो तो एक लाख नहीं दस लाख खर्च करो, पचास लाख खर्च करो, पचास करोड़ खर्च करो, आते जायेंगे कमी नहीं रहेंगी।

लेकिन जब चोरी या बिगाड़ होगा तो फिर अपनी सेवा ही बिगड़ी समझो। और भी महाराज ! आपको क्या क्या बताऊँ ? ऐसे भी लोग थे, चौदह सौ रुपये समिति में से खाली हड़प किया।  पूरा का पूरा तेजुमल का खानदान कुटुम्ब दुखी हो गया।  वो तो मर गए लेकिन वो चौदह सौ रूपया अभी भी बदला ले रहे है। डीसा की बात है। ये कलयुग नहीं करजुग है।  देर सबेर तो परिणाम तो आता है। तो समिति की भाई बहने ये भी ध्यान रखेंगे और| दो सिद्धांत सामने रखे एक सिद्धांत लीलाशाह बापू गठरी लेकर गांव गांव प्रचार करते।  सेवा का कितना महत्व है।  हनुमान जी कितनी सेवा करते। सेवा नहीं मिली तो चुटकी बजाने की सेवा खोज ली। ‘राम काज बिन कहाँ विश्रामा ‘

दूसरी बात की समिति में स्नेह और सच्चाई बनी रहें। कभी गलती किसी की होगी, कभी उपाध्यक्ष की होगी, कभी खजांजी की होगी ,कभी मेंबर की होगी एक दूसरे को ठीक करने के लिए एक दूसरे पर हावी होने के बजाय, एक दूसरे के आगे नम्रता से पेश आये। तो संघर्ष की जगह पर स्नेह पैदा हो जायेगा। विरोध की जगह पर शक्ति का संचार हो जायेगा। ‘अजी ये ऐसा है, अजी वो ऐसा है। रामतीर्थ कहते की सेवा करते उन मूर्खो को पता भी नहीं की सेवक को कितना बड़ा दिल रखना चाहिए।

‘अजी फलाना ऐसा है ये आदमी ठीक नहीं ! ये आदमी ठीक नहीं ! गाय ठीक नहीं क्योंकि सवारी के काम नहीं आती और घोडा ठीक नहीं क्योंकि दूध नहीं देता बेकार है क्या रखें? और हाथी ! अरे ! हाथी खाता खूब है चौकी नहीं करता कमबख्त ! और कुत्ता ! बोले चौकी तो करता है पर सवारी के काम नहीं आता क्या करे उसको ? तू तो बेकार हो गया। तेरे लिए सब चीज़ बेकार हो गयी मुर्ख !  अरे ! बड़ा काम है तो बड़ा दिल रखना पड़ेगा।  जिसमें जो क्षमता है, योग्यता है उसका उपयोग करते करते उसकी योग्यता बढे, ऐसा करके गाड़ी चलाना होगा।

 

चीजे लाकर कतार कर दी और बच्चों को बाँट दी। दूसरे महीने में लाहोर कॉलेज में पगार हुआ सौ रूपया, बाँट दिया।  तीसरे महीने में भी यही किया। घर में बच्चों का हाथ टाइट हो गया। पत्नी वही अपना ठीकड़ा लगाके पेन रखां। ठीकड़ा लगा हुआ है।  और प्रोफेसर सोच कर हैरान हो गए की ये प्रोफेसर के बेटे है कि किसी भिखमंगे के बेटे है ? जाके रामतीर्थ को डांटा कि ‘आप कैसे हो मिस्टर ? एम.ए . पढ़े हो। अपने बच्चों की हालत तो तुम किसके लिए कमाते हो ?बच्चों के लिए कमाते हो।  रामतीर्थ ने कहाँ, तीर्थराम  नाम था,

“हाँ ! बच्चों के लिए कमाता हूँ।”

“तो फिर बच्चों को दो न तुम।”

” हाँ ! बच्चों को दे रहा हूँ”

“क्या ख़ाक बच्चों को दे रहे हो ? सौ रूपया पगार है।  पेन ले लेते हो, कॉपियां ले लेते हो ,पेन्सिलें ले लेते हो, चने ले लेते हो ,सिंग ले लेते हो, सामग्री ले लेते हो और लम्बी कतार कर देते हो भिखमंगो की और उनको दे देते हो ”

बोले “वो भी तो मेरे ही बच्चे है ”

“तो तुम्हारे घर बैठे है उनका क्या?

बोले” उनको भी कतार में लगा दो उनको भी दे दूंगा।  क्या है ? ” हां बडो !

“लाओ उनको  लाइन में! ”

“ये क्या कह रहे हो ?”

बोले ” क्या? ये दो ही बेटे मेरे है? जिसका मैं हूँ उसके वो है।  वो अनन्त संभालेगा जब मैं उसीके उनको संभल रहा हूँ तो इन्ही के उनको वो नहीं संभालेगा ? ”

 

दूसरे प्रोफेसर जो चतुर थे कमा कमा कर बेटों को दिए की बेटे तो कोई मास्टर बना, कोई क्लर्क बना, तो कोई महाराज ! छोटा-मोटा धंधेवाला बना।  कोई कोई विरला प्रोफेसर बना लेकिन रामतीर्थ के दोनों बेटे एक चीफ जस्टिस बन और दूसरा  चीफ इंजीनियर बना।  ले ! ऐसा मैंने सुना है।

जितना आप बहुजन हिताय बहुजन सुखाय करते उतना आपका आपके बेटे बेटियों का सब अच्छा होने लगता है। उत्तम राजा, उत्तम सेवक अपने विषय में अपने लिए नहीं सोचता है, मिली हुई  सामग्री , मिली हुयी योग्यता  बहुजन हिताय के लिए सोचता है तो उसके लिए उसके परिवार के लिए अनन्त अपने आप कर लेता है।

‘सु करू? म्हारी डिक्री मटे अटला राखूं म्हारे डिक्रे मटे तो अटला करूँ ‘ ऐसा कर कर के मर गए कई डिक्रे डिक्री करके और वही डिक्रे या डिक्री बुढ़ापे में थूकते भी नहीं।

‘पूछवाई नथिया औता छी अकनि नथी लेवा औता काका नी’ एक काका नहीं सब लोग आप काका बनेंगे।

‘जिन लाहे सुर सठा सु से कांधी  किन थिया  ‘ जिन के लिए सारी जिंदगी निचोड़ निचोड़ दिया वो मोह में स्वार्थ में एक आदमी मर गया। बोले “क्या दान पुन किया?” चित्रगुप्त ने पूछा।  बोले मैंने तो सब दान कर दिया। मेरी दो फैक्ट्री थी। दोनों बेटे को दे दी। और जो बैंक बैलेंस था उसमें आधा हिस्सा लड़कियों को दे दिया और आधा हिस्सा पोतो के नाम कर दिया।  और ज्वेलरी थी वो मिसेस के नाम पे है वो थोड़ा करके आये।मैं सब दान करके आया। बोले ‘डाल दो इसको नरक में ! अरे अपने धातु से, अपने पेशाब के बूँद से जो पैदा हुए उनको दे देके वो तुमने, वो तो तुम्हारा काम का विकार, वही कामना कामना में दिया। जिससे तुम्हारा कोई ब्लड रिलेशन नहीं है और ईश्वर के नाते उनको कितना दिया, वो दान में माना जायेगा। ये दान थोड़े है ये तो मोह है। कपट करके कमाया और मोह करके दे दिया। तो दोनों तरफ से बंधे हो। डाल दो इसको नरक में। धकेले लेई जाओ बांध के।’

नारायण हरी।  नारायण हरी।

एक आदमी को गाड़ियां थी दो तीन। ट्रांसपोर्ट का करता था। किसीने कहाँ की ‘भाई ! गाड़ी चाहिए ‘ बोले  ‘ गाड़ी तो साहब ! आठ दिन के लिए हम नहीं दे सकते। बुक है आठ दिन का माल।’ बोले ‘दूसरी कोई ट्रांसपोर्ट बताओ।’ ‘हमारे गांव में तो एक ही ट्रांसपोर्ट है हमारे यहाँ।  आप तो जानते है दूसरी कहाँ से ?”

बोले ‘दूसरी किसी की गाड़ी मिल जाएँ।’

‘देखूँगा ! मैं जाँच करूंगा लेकिन आज कल सिजन चल रही है गाड़ी पर। मिलना मुश्किल है ‘

‘क्यों? क्या चाहिए है ?’

‘अरे वो सत्संग होने वाला है और उसी लिए हम ‘

‘किसका सत्संग?’

‘बापूजी का’

‘अरे यार पहले क्यों नहीं कहता।  ले आ ! ऐ छोकरा ! वो माल बाद में भेज ये गाड़ी दे दो ‘

बोले ‘पिताजी! ये पन्द्रह सौ की कमाई की ‘

बोले ‘पन्द्रह सौ साले! कहाँ रहेंगे? ये कमाई ऐसी करेगी तू भी खायेगा तेरा बेटा भी खायेगा फिर भी नहीं खुटेगी,ये पुण्य कमाई हो रही है। गाड़ी भेज सत्संग में। ‘

‘गाड़ी भेज सत्संग में। तेरा करेगी। बाबाजी आ रहे है।  संत का दर्शन करने लोग जायेंगे।  उनकी सामग्री लाएगी करेगी।  गाड़ी रख दो सत्संग में।  चार दिन सत्संग चलेगा पांच दिन गाड़ी रख दो। ट्रांसपोर्ट की ऐसी तैसी ‘

 

वो मोची ! बम्बई का सेठ जूता सिलाता है। मोची पूछता है ‘सेठजी ! कैसे आये इस गांव में ? आप कहाँ के हो ? ‘बोले ‘मैं बम्बई से आया हूँ। बम्बई के बोरोवाली के पास में फलानि जगह पे मेरा अपना है सब कुछ।  इस गांव में आया हूँ बाबाजी का सत्संग सुनने।’ मोची के आँखों से टप टप आंसू बहते है।  बोले ‘क्यों भाई? ‘ बोले ‘सेठजी! मैंने भी विचारा था में भी जाऊँगा कथा सुनने में लेकिन मैं अभागा नहीं जा सकता हूँ। मैं तो उपवास कर सकता हूँ।  मेरी पत्नी उपवास कर सकती है। मेरे बेटे पानी पी कर सो सकते है। लेकिन जो बूढी दादी माँ है और मेरे जो पिताजी है वे भूख नहीं निकाल सकेंगे।  अगर में कथा में जाता हूँ तो एक दिन मुझे ये फुटपाथ की दुकान बंद रखनी पड़ेगी। इसलिए में कथा सुनने नहीं जा सकता हूँ सेठ! मैं अभागा हूँ। ‘

मोची की आँखों से पानी की बूंदे गिरी। चप्पल सी लिया सेठ की।  सेठ ने दस की नोट मोची के आगे रखी ‘भाई ! ले ले ! ‘ मोची कहता है ‘भाई ! क्या कर रहे हो ? बोले दस रूपया रख ले। छुट्टा वापस नहीं चाहिए। ‘ बोले ‘दस रुपये तो क्या में आपके दस पैसे भी नहीं लूँगा। आप संत के दर्शन करने आये।  सत्संग सुनाने आये। कम से कम इतनी सेवा तो मेरे को दे दो। सेठ बोलता है कि तेरे मोची के पचास पैसे रखकर मैं क्या अमीर होऊंगा। मेरे पास तो चालीस चालीस हजार रुपये पगार लेने वाले सीए नौकरी करते। पानी भरते मेरे यहाँ।  में फाइनेंस का भी करता हूँ। मोजी जेठ मार्केट में मेरी दो दुकाने है भाई ! अस्सी अस्सी लाख जैसी दुकाने है अभी डेड करोड़ भी मिलाता है। मेरे पास कितना पैसा है मेरे को ये भी गिनने में देर लगेगी और तेरे पचास पैसे में क्यों लूँगा? ले रख ले दस रूपया।’ मोची बोलता है की ‘सेठ ! दस पैसा भी नहीं लूँगा। ‘

अब सेठ और मोची का तो युद्ध हो गया। मोची कहता है कि नहीं लूँगा और सेठ कहता है कि  मैं  नहीं लूंगा।  तेरा मोची का पचास पैसा ! आखिर महाराज! दोनों का मधुर युद्ध चला।  त्यागमय युद्ध चला। मोची ने हाथ जोड़े के पैर पकडे के ‘ओर तो कुछ नहीं काम से काम इतनी सेवा तो मुझे करने दो। आप बम्बई छोड़कर संत के दर्शन करने आये। ‘

बोले ‘अरे ! मैं तो खुली हवा,शुद्ध पानी , शुद्ध गांव में दूध मिलेगा और कभी बापूजी फ्री होंगे तो थोड़ा दर्शन और बातचीत का अवसर मिल जायेगा।  इसीलिए में बम्बई से आया हूँ। तेरे पास से चप्पल सिलाने थोड़े आया हूँ भाई ! वो तो जहाँ ठहरा हूँ गेस्ट हाउस से इधर आने में पैदल आना पड़ा तो चप्पल टूट गयी। तू ले ले दस रूपया , पांच रूपया ले ले चल ! दो रूपया ले ले। ‘ बोले ‘ सेठजी ! दो पैसा भी नहीं लूंगा। अरे भाई चप्पल सिया है तेरा अपना ले ले ना ! ‘

बोले ‘ नहीं सेठजी ! देता है न भगवान तो। आज खाने भर को है। इधर के लिए तो ज़िन्दगी भर करते उधर के लिए थोड़ा सा तो मेरे को करने दो सेठजी !’

आखिर मोची की जीत हुयी और सेठ ने हार  मान ली।

 

गुरु गोविन्द सिंह के पास ऐसा कोई प्रोजेक्ट आया के लोग दबे जा रहे है और कुछ सैन्य -वैन्य पैसा चाहिए। गुरूजी ने कहाँ ‘किसी को भी, जो भी कुछ चाहिए फल फूल प्रसाद नहीं लाओ। रोकड़ रकम ले आओ। सैन्य के लिए चाहिए। किसीने सौ दिए, किसीने पांच सौ, किसीने हजार , किसीने पांच हजार।  एक माई चवन्नी ले आई। गोविन्द सिंह ने उसकी  चवन्नी  लेकर आँखों पर रखी। चुम्बन किया। ह्रदय से लगाया। उस चवन्नी को एक हाथ से दूसरे हाथ, एक हाथ से दूसरे हाथ किया।  और जो दान दक्षिणा रखी उनको बोला ‘सम्भाल लेना।’

चेलों ने पूछा ‘ये चवन्नी  में क्या जादू है गुरूजी ? आँखों पे चढ़ा रहे हो। चुम्बन कर रहे हो क्या बात है ? ‘

बोले ‘ ये माई कथा में बैठी थी बुढ़िया और इसका इकलौता बेटा वो भी अलग हो गया। और पति तो चल गए। तो इसके पास हसिया था। हसियां से घास काटती थी। घास बेचती थी उसी से गुजारा करती थी। लेकिन इसने देखा की गुरु को कुछ देना है तो अपना हसिया बेचके पूरी की पूरी प्रॉपर्टी दे रही है। हंड्रेड पर्सेंट दे रही है प्रॉपर्टी। कल क्या खायेगी उसकी फ़िक्र नहीं कर रही। तो ये चवन्नी क्या है ये तो खजाना है भाई ! हंड्रेड पर्सेंट डोनेट कर रही है। उसके आगे जयपुर के बिल्डिंग का बीस लाख का हॉल क्या होता? हंड्रेड पर्सेंट नहीं है।  टेन पर्सेंट भी नहीं है। ५ पर्सेंट भी नहीं है। तो हमने दस्तावेज को चुंबन थोड़े किया रख दिया उस पर।

नारायण हरी ।  नारायण हरी ।नारायण हरी ।नारायण हरी ।

फिर में अपना विचार बता दूँ समिति का।  मेरे मन में भी ऐसा कई दिनों से आ रहा है कि समिति के लोग भी बुड्ढे होंगे और एक दिन मरेंगे भी जरूर। तो घर में मरे, गृहस्थी  में फिर भटके , इससे तो एक ऐसा आश्रम बनाए की समिति के कार्यकर्ता है ,रिटायरमेंट लाइफ कभी थोड़ी थोड़ी गुजरे ऐसा एक विशाल जगह में आश्रम बनाए।  स्विमिंग पूल हो, आयुर्वेदिक हॉस्पिटल हो , कुछ कीर्तन का हो ,कोई प्यरामेड हो ,कुछ दो पांच करोड़ की संस्था बना ले। सारे समिति वाले और बन्दे  जो है रिटायर लाइफ , हम भी तो रिटायर लाइफ गुजारने की तयारी कर रहे है, तो ये भी तो गुजारेंगे। संसार में बहोत हो गया प्रचार प्रसार तो ऐसा विचार भी आ रहा है। तो देखे ! कहाँ अन्न जल भूमि कौनसी ? जो हरी इच्छा होगी बिचार चल रहा है अभी तो। बनना चाहेंगे तो किसी चीज़ की कमी नहीं रहेंगी। पावर ये वो कमी भी नहीं रहेंगी लेकिन आया, मीटिंग में तो विचार रखना है तो मैंने अपना रख दिया। आपने भी रख दिया मैंने भी रख दिया। नारायण हरी। नारायण हरी।

 

गुरु की सेवा साधु जाने गुरु सेवा का मूल पहचाने  ।

गुरु की सेवा साधु जाने।।गुरुसेवा का मूल पहचाने।

गुरु सेवा सब गुण पर भारी। समझ करो सोई नर नारी।

गुरु सेवा सब गुण पर भारी। समझ करो सोई नर नारी।

गुरु सेवा सौ विघ्न विनाशे ।  दुर्मति भाजे पातक नाशे।

गुरु सेवा सौ विघ्न विनाशे ।  दुर्मति भाजे पातक नाशे।

गुरु सेवा चौरासी छूटे।  धावक मन का डोरा टूटे।

गुरु सेवा चौरासी छूटे।  धावक मन का डोरा टूटे।

गुरु की सेवा साधु जाने।।गुरुसेवा का मूल पहचाने।

 

गुरु सेवा यम कंदन लागे। ममता मरे भक्ति में जागे।

गुरु सेवा यम कंदन लागे। ममता मरे भक्ति में जागे।

गुरु सेवा सो प्रेम प्रकाशे। उन्मत्त होइ मिटे जग आशे।

गुरु सेवा सो प्रेम प्रकाशे। उन्मत्त होइ मिटे जग आशे।

गुरु की सेवा साधु जाने।।गुरुसेवा का मूल पहचाने।

 

गुरु सेवा परमात्मा दर्शे। त्रिगुण तजि चौथा पद स्पर्शे।

गुरु सेवा परमात्मा दर्शे। त्रिगुण तजि चौथा पद स्पर्शे

श्री शुकदेव देव बताये भेला। चरण दास करे गुरु की सेवा

श्री शुकदेव देव बताये भेला। चरण दास करे गुरु की सेवा

गुरु की सेवा साधु जाने।।गुरुसेवा का मूल पहचाने।

गुरु सेवा सब गुण पर भारी। समझ करो सोई नर नारी।

 

जगने दो तुम्हारे सृषुप्त शक्तियों को। जगने दो तुम्हारे प्राण कल को। चित्ती को। चेतना को।

ये केवल मजा लेना नहीं है। परम मजे के द्वार खोलने की भी एक कला है।  एक प्रयोग है।

हर रोज ख़ुशी…….हर दम ख़ुशी  ……. हर हाल ख़ुशी

 

कर्मों से मुक्ति


 

 

 

 

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचरः।।

 

यज्ञ के निमित्त किये जानेवाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्म में लगा हुआ यही प्राणी, ये मनुष्य समुदाय कर्मों से बँधता है। इसलिए हे अर्जुन तू आसक्ति से रहित होकर यज्ञ के निमित्त ही भलीभांति कर्तव्य कर्म कर.. भगवदगीता तीसरे अध्याय का नौवा श्लोक है।

कर्म तो करे लेकिन कर्मों को बंधन करनेवाला न बनाए, कर्म करके अगले जन्मों के बंधन को काटने के लिए कर्म करे । जैसे काँटे से काँटा निकलता है ऐसे ही कर्मों से कर्मों का बंधन कटता है। कर्मों से कर्मों का बंधन काटने का प्रयास नहीं करता है जो मनुष्य वो मनुष्य शरीर पाकर मूढ़ता को पा लेता है।कर्म से कर्म काटा भी जाता है और कर्म से कर्म बनाया भी जाता है। काँटे से काँटा निकाला भी जाता है और काँटे से काँटा और परेशानी पैदा किए जानेवाला भी किया जा सकता है। तो प्रकृति में देखा जाए तो नित्य कर्म है । हमारे शरीर में नित्य कर्म हो रहे है ,सूरज नित्य कर्म कर रहा है  लेकिन वो यज्ञार्थ कर्म कर रहे है अर्थात कर्तव्य कर्म कर रहे है, फल की आकांक्षा और अहंकार नहीं करते । प्रकृति में कर्तव्य कर्म हो रहा है, हमारे शरीर में कर्तव्य कर्म हो रहा है लेकिन ये यज्ञार्थ हो रहा है, ईश्वर की पूजा के लिए, ईश्वर सृष्टि में साझीदार होने के लिए जो कर्म है वो यज्ञार्थ कर्म है और अपना अहंकार पोषने के लिए, अपना स्वार्थ  पोषने के लिए जो कर्म है वो कर्म बंधनकर्ता हो जाते है।

जैसे एक सेठ रास्ते में घूमने गया । किसी बीमार पीड़ित अपाहिज को देखा। उसके मन में  दया आ गई – “भाई तू इतना दुःखी क्यों फुटपाथ पर?”

उसने कहा “मेरा भाई कोई नहीं सेठजी, भगवान के सिवाय !”

सेठ का मन पिघला कि भगवान के सिवा इसका कोई नहीं तो भगवान ने मेरे को सम्पत्ति दी है, बुद्धि दी है और शरीर दिया है, क्यों न इसकी सेवा करके भगवान को संतोष कर लूँ?
ये सेठ के मन में जो भाव आया ये सात्विक भाव है, ये यज्ञार्थ भाव है ।

मान लो वह सेठ उसको अपने घर  ले आया ,उसकी थोड़ी सेवा चाकरी कर ली। सेठ के मन में आया कि मैं इसको यहाँ नहीं लाता तो कितना बुरा हाल हो जाता इसका ।  अब वो सात्विक भाव में से थोड़ा नीचे आया , राजसी भाव में आ गया, यज्ञार्थ से थोड़ा राजसी में आ गया।

वो बीमार आदमी कहीं खाँसा, थूंका, गंदगी की। सेठ ने कान पकड़ के उसको बाहर निकाल दिया “तू इस महल में रहने के काबिल नहीं नालायक कहीं का!” फुटपाथ पर रख दिया । ये तमस कर्म हो गया । वाहवाही के लिए कर्म करे तो रजस कर्म है । दूसरे को सताने के लिए या अपने स्वार्थ को पोषने के लिए कर्म करे, स्वार्थ को पोषने के लिए कर्म करता है तो कर्मों का बंधन बढ़ता है। दूसरे को सताने के लिए कर्म करता है तो कर्मों का जंजाल और प्रगाढ़ गूंधा जाता है लेकिन भगवान की प्रसन्नता के लिए जो काम किये जाते है उसको यज्ञार्थ कर्म बोलते है ।

तो भगवान कहते है … यज्ञार्थ कर्म कौंतेय अन्यत्र लोकोअयम् कर्मबन्धनः 

जो यज्ञार्थ कर्म करते है वो तो बंधन से मुक्त होते है लेकिन जो स्वार्थपरायण होकर कर्म करना पड़े तो कर्म के जाल में फँस जाते है । तो बुद्धिमान वह है कि कर्म से कर्म को काटे ! कैंची है न ..तो कैंची है तो जाल काटने के लिए है ,कैंची अपने को खोंसने के लिए नहीं ! उल्टे विचार करके आदमी दुःखी होते है, “मैं तो आत्महत्या कर लूँ, मैं तो दुःखी हूँ, मैं तो परेशान”  लेकिन सही ढंग से सोचे तो मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि भगवान ने मेरे को ऐसा अवसर दिया ! ईश्वर की कितनी कृपा है कि मुझे कर्म करने का अवसर दिया, भक्ति  करने का अवसर दिया, शांति पाने का का अवसर दिया, ज्ञान पाने का अवसर दिया !

तो विचार से विचार को काटना चाहिए लेकिन विचार से विचार को ऐसे बढ़ा दे कि अपने को फँसा दे , अशांति पैदा कर दे ऐसा विचार करना कर्म बंधन है ! और शांति पैदा कर दे ये कर्मों से विचारों से.. विचार उन्नत करने का । तो कभी कर्म बाँधने वाले होते है, विचार बाँधने वाले होते है और कभी विचार मुक्त करने वाले होते है ।

मैंने बचपन में पाठ्य पुस्तक में पढ़ा था तीसरी क्लास में जब पढ़ता था तब की बात है .. जय रामजी की ! एक सदा सुखी और दूसरा सदा दुःखी ..दो मित्र थे । सदा सुखी वाला हमेशा हँसता रहता था, जो हुआ अच्छा हुआ भला हुआ, अच्छा हुआ भला हुआ,मेरा सौभाग्य ! और सदा दुःखी वाला सदा सिर कूटता रहता .. हाय रे मैं तो आत्महत्या कर लूंगा, अब मेरे से नहीं जीया जायेगा !  हाय रे मैं दुःखी हूँ, हाय रे  हाय,हाय रे  हाय!

दोनों क्लासफेलो थे, दोनों पढ़े और समय पाकर एक रेलवे का ड्राइवर हुआ और दूसरा दुकानदार बना। ड्राइवर सदा सुखी रहने के विचार करता था और दुकानदार सदा दुःखी रहने का विचार करता था । दुकानदार की दुकान तो अच्छी थी उसके बाप-दादों की दी हुई, ठंडी ठंडी हवाएँ खाता था ,धंधा करता था लेकिन सिर कूटता रहता था क्या करे !

पड़ोसी की ग्राहकी ज्यादा है क्या करे ! उघराणी नहीं आती,  क्या करे ?
लोग तो करोड़पति है और हमारे पास तो खाली 2-4 लाख है, क्या करे! ऐसे क्या करे,क्या करे करके रोता था और अपने मित्र के पास जाता कभी कभी…

बोले, “दुनिया बड़ी खराब है ! कुछ अच्छा नहीं…मैं तो आत्महत्या करके मर जाऊँगा ,अब मुझे बड़ी अशांति है …मैं तो नहीं जी सकता !”

मित्र बोलता है “अरे, तू बढ़िया विचार कर , तेरा तो सौभाग्य है ऐसा क्यों ?”

बोले , ” क्या सौभाग्य ? तुम्हारी भी देखो क्या जिंदगी है ,तुम रेलवे के ड्राइवर !छी !सारा दिन कोलसों के बीच ! गरम गरम बॉयलर के सामने ! क्या तुम्हारी जिंदगी है ! तुम भी  दुःखी हो यार !”

उसने कहा “मैं तो सदा सुखी हूँ ! अभी इंजन में कोलसे हेल्पर ने डाल दिया , हम ने जरा यूँ किया.. इंजन चालू.. दस मिनट में दूसरा स्टेशन, पचास मिनट में तीसरा स्टेशन.. बिना खर्चे बिना पैसे एक से एक स्टेशन घूमते जाते, ताजी हवा खाते जाते और ऊपर से पगार मिलता है! दौड़ती गाड़ी और लोग बोलते है ड्राइवर साहब गाड़ी ले आया .. हकीकत में तो ड्राइवर को गाड़ी ले जाती है लेकिन वो तो ड्राइवर गाड़ी ले आया !.. हमारा नाम हो रहा है ! जय रामजी की ! मुझे तो मौज ही मौज है ! ”

तो जब भी वो दुःख की बात करे तो वो सुख बनानेवाला सुख की ही बात करे !

एक दिन सुख बनानेवाले के जीवन में बड़ा भारी दुःख आ गया, फिर भी वो दुःखी नहीं हुआ । रेलवे इंजिन ड्राइवर था, कहीं पटरीयाँ क्रॉस कर रहा था, किसी कारण से उसका पैर कट गया इंजिन के नीचे ।  लंगड़ा हो गया ।

अस्‍पताल में पहुँचा तब वो दुःखी रहने वाला पूछा “लो ! अब तो सुखी हो तुम ? बोलते हो  सदा सुखी  सदा सुखी ..अब क्या सुख मिला ? पैर कट गया !”

बोले – ” पैर कट गया तो क्या हो गया ? दो पैर में से एक ही कटा है, एक तो भगवान ने रखा है !”  जय रामजी की! ”

और घर में रहता था इतवार के दिन, दो पैर होते तो कुटुंबी बोलते- आटा पीसा के लाओ, सब्जी ले आओ साईकल चला के ! अब तो वो ही आटा पिसाते, वो ही सब्जी लाते है.. मैं तो आराम से भोजन करता हूँ ! और देख दो पैर थे तो दो जूते पहनने पड़ते थे । अभी तो एक ही में ही काम चल रहा है !”

उसने अपने दुःख को बढ़ाया नहीं, बेवकूफी करके “हाय रे हाय पैर कट गया मैं आत्महत्या कर लूँगा! हाय रे हाय ये हो गया “…नहीं !..उसने तो उसको भी संतोष दिया जो दुःखी रहता था उसको भी दुःख में सुखी रहने का उपदेश दिया !

तो पाठ्य पुस्तक में ऊपर से हेडलाईन में था-

पग  जेवो  पग गयो, हवे तू लंगड़ो थयो,   हवे कहे छे के हूं सुखी छूं

पग जैसा पग गया ,पैर जैसा पैर कटा है,तू लंगडा हुआ फिर भी तू बोलता है सुखी ?

ऐसा करके पाठ का क्रम चलता है।

विचारों से आदमी मित्र बना लेता है , विचारों से ही शत्रु बना लेता है, विचारों से ही सुख बना लेता है, विचारों से ही दुःख बना लेता है, विचारों से ही पाप बना लेता है, विचारों से ही पुण्य बना लेता है.. और सत्संग के विचार करके अपने हृदय को ऐसा लायक बना दे कि अपने को परमात्मा बना दे, अपने आप को महान बना ले! ऐसे ही कर्मों से आदमी बंधन बनाता है, कर्मों से ही दुःख बनाता है ,कर्मों से ही चिंता बनाता है, कर्मों से ही शत्रु बनाता है, कर्मों से ही परेशानी बनाता है और कर्म जब बढ़िया करता है तो कर्मों से अपने आप को भगवान को पाने वाला बना देता है !

प्रहलाद छोटा था लेकिन ऐसा कर्म करता,ऐसा विचार करता कि पहलाद को भगवान की प्राप्ति हो गई। उसका बाप उसको रोकता है, टोकता है, डाँटता है लेकिन वो गुरु की बात याद रखता है पक्की !

ध्रुव को उसके कुटुंबी उसका बाप थप्पड़ मारता है,सौतेली माँ उसको थप्पड़ मारती है, बाप आँखे दिखता है फिर भी ध्रुव डटा रहा ,ऐसा कर्म किया तो भगवान प्रगट हो गया !
तो मनुष्य में ये ताकत है कि वो सुख बनाए, दुःख बनाए ,पुण्य बनाए ,पाप बनाए ,मित्र बनाए, शत्रु बनाए कि सारी सृष्टि को बनाने वाले को अपने हृदय में लाये, उसके हाथ की बात है । तो यहाँ भगवान कहते है –

 यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचरः।।

यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ यह ही मनुष्य समुदाय कर्मों से बंधता है । इसलिए हे अर्जुन तू आसक्ति से रहित होकर यज्ञ के निमित्त ही भलीभाँति कर्तव्य कर्म कर।

आँख को दूसरे के प्रति ईर्ष्या न करने देना, ये आँख की सेवा है,ये यज्ञार्थ कर्म है । जीभ को चाडी-चुगली में न लगाना ..एक को एक बोले, दूसरे को दूसरी बोले, आपस में लड़ावे झगड़ा करावे.. तो ये हो गया बंधन । लेकिन दो लड़ रहे है तो एक को अच्छी बात करे,  अच्छी बात करके दोनों का मेल करा दे , हो गया यज्ञार्थ कर्म!

अपनी जीभ का सतउपयोग किया, किसी की श्रद्धा टूट रही है तो उसको सत्संग की बातें बताकर ,भगवान की महिमा बताकर भगवान में मन लगाना ये यज्ञार्थ कर्म है !

“हाँ जी  ये तो  ऐसा है,क्या पता भगवान मिलेंगे कि नहीं मिलेंगे ,ऐसा वैसा, अरे अपने तो चलो खाओ पीओ ,पान मसाला खाओ मजा लो” तो ये जीभ का अन्यत्र कर्म हुआ। जो अन्यत्र कर्म है वो बंधन करता है और यज्ञार्थ कर्म है वो मुक्ति देनेवाला है ! जीभ है तो भगवन नाम जप किया, जीभ है तो सुंदर वाणी बोले, जीभ है तो परोपकार के दो वचन बोले, तो ये यज्ञार्थ कर्म हो गया। आपने जीभ का कर्म करने का कर्म यज्ञ के निमित्त किया।

ऐसे ही कान के द्वारा तुमने निंदा सुनी किसी की चुगली सुनी किसी की  बुरी बात सुनी तो तुमने ये अन्यत्र कर्म किया लेकिन कान के द्वारा तुमने सत्संग सुना ,कान के द्वारा तुमने भगवान का नाम सुना, जिह्वा के द्वारा तुमने भगवान का नाम लिया ,हाथों के द्वारा तुमने भगवान के नाम की ताली बजाई ,ये तो यज्ञार्थ कर्म हो गया ! ईश्वर की प्रीति वाला कर्म हो गया ! ऐसी बुद्धि दिया भगवान ने  और तुम न्यायाधीश हो.. ये न्यायाधीश बैठे है प्रतापपूर के जज.. बुद्धि दी और तुमने न्याय किया किसी के दबाव में नहीं आए, प्रलोभन में नहीं आए, प्रमोशन की लालच में नहीं आए और ठीक से तुमने न्याय दिया तो तुम्हारी बुद्धि का तुमने यज्ञार्थ कर्म किया ! और दूसरे किसी जज ने पैसे लेकर फैसला गलत दिया तो उसने अन्यत्र कर्म किया.. यहाँ तो उसको थोड़ा लाभ हो गया लेकिन अपने लिए उसने बंधन बना लिया, दूसरे जन्म में ऐसी बुद्धि मिलेगी कि पशु की नाईं घसीटता रहे सारी गाड़ियाँ ! जय रामजी बोलना पड़ेगा भानजे …

कर्म प्रधान विश्व करि राखा
जो जस करे तैसा फल चाखा

 

ये धरती कर्म की प्रधानता है ,स्वर्ग में पुण्य का कर्म भोगा जाता है और नरक में पाप का फल भोगा जाता है और धरती पर तो कर्म करने की प्रधानता है ।

कर्म ऐसा करे कि बंधन काटने वाला कर्म हो । तुम्हारा मन है.. मन से तुमने किसी का बुरा सोचा, अशांति  सोची, गाली गलोच सोचा या बोला तो तुम्हारा मन अशांत होगा और जिसने सुना  भी अशांति होगी। तो विश्व सृष्टि के तालबद्धता में तुमने डिस्टर्ब  कर्म, अन्यत्र कर्म करने का पाप उठा लिया  । तुम्हारा मन तो दुःखी रहेगा और तुमने दुःख फैलाया ! तो सृष्टि कर्ता के सौंदर्य में तुमने बढोतरी नहीं की,तुमने गड़बड़ पैदा की तो तुम्हारे चित्त में गड़बड़ हो जाएगी और गड़बड़ का बदला देर सवेर गड़बड़वाला शरीर मिल जाएगा .. भों भों करता रहेगा, भोंकता रहेगा कुत्ता होकर, पेड़ पौधा होकर एक जगह चिपका रहेगा !

तो कर्म तो करें लेकिन किसी के काम आए ! ईश्वर सृष्टि के सौंदर्य के काम आए, ईश्वर के संकल्प में हम काम आए.. ईश्वर और महापुरुष के दैवी कार्य में हमारा कर्म अगर काम आता है ..हमारी आँख, हमारे कान, हमारा नाक, हमारा मन ,हमारी बुद्धि, हमारा चित्त, हमारा धन, हमारा तन-मन जब ईश्वर प्रीति के लिए काम आता है तो यज्ञार्थ कर्म हो गया ! अगर अहंकार पोषने में लगाते है या किसी को सताने में लगाते है तो ये अन्यत्र कर्म हो गया। अन्यत्र कर्म अन्यत्र योनियों में ले जाएगा और ईश्वर अर्थ कर्म, यज्ञार्थ कर्म यज्ञ पुरुष तक पहुँचा देगा ।

राम में और रावण में ये फर्क है ,कृष्ण में और कंस में ये फर्क है। कंस अहंकार पोषित कर्म करता है, रावण अहंकार को पोषने के लिए ,विषय-विलास को पोषने के लिए कर्म करता है और रामचन्द्रजी अहंकार  पोषने के लिए कर्म नहीं करते है ..लोगों के दुःख दूर करके लोगों को आत्म संतोष हो ,लोगों की बुद्धि धर्म में लगे ऐसे कर्म रामजी करते है। लोगों की बुद्धि भगवान में लगे, लोगों की बुद्धि माता पिता गुरुजनों में लगे इसलिए भगवान सुबह उठकर गुरुजी को प्रणाम करते है-

प्रातःकाल उठ रघुनाथा
मात-पिता -गुरु  नावईं माथा
गुरुसे पहले जगपति जागे..

जगत का स्वामी है लेकिन गुरु जगे उसके पहले वो जग जाते है। तो ये कर्म यज्ञार्थ हो गए!

तो कृष्ण कहते है… यज्ञार्थ कर्म कौंतेय
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचरः।।


यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त जो दूसरे कर्म में लगा हुआ ही ये मनुष्य समुदाय है कर्मों से बंधता है इसलिए हे अर्जुन तू आसक्ति से रहित होकर यज्ञ के निमित्त ही भली भाँति कर्तव्य कर्म करो।

महिला अपने गर्भ धारण करती है ,बच्चे को गर्भ में रखती है, शास्त्र बोलते है ये यज्ञार्थ कर्म है.. आप खारा खट्टा नहीं खाती और आप गर्मी सर्दी सहकर भी कठिनाई सहकर भी आए हुए पेट में बालक की रक्षा करती है तो यज्ञार्थ  कर्म है। बालक को जन्म देती है,अपने शरीर का रक्त, अपने शरीर का सत्व उस बालक को दूध के रूप में पिलाती है ये यज्ञार्थ कर्म है …आप गर्मी सर्दी सहकर आप अपना वस्त्र से भी   बच्चे की रक्षा करती है  ये यज्ञार्थ कर्म है.. अपने पेट से  बचाकर भी बालक को पोसती है, ये यज्ञार्थ कर्म है।

अब बच्चा बड़ा करती है तो यज्ञार्थ कर्म है लेकिन वो बच्चा बड़ा होगा और… मेरा बेटा है, वो ऐसा है, फलाना ऐसा है, ये ऐसा है उसको लड़ना झगड़ना सिखाती है तो ये अन्यत्र कर्म हो गया। बच्चा बड़ा हुआ.. ये बड़ा होगा, बहु लाएगा, कमा के खिलाएगा, मेरे को सुख देगा ये अन्यत्र कर्म हो गया, यज्ञार्थ नहीं हुआ। तो जो अन्यत्र कर्म होते है वो सुख के बदले दुःख देते है ।
ऐसे ही जिस योगिनी ने शादी नहीं की, संयमी रही.. महिला, लड़की, लड़का.. तो संयमी रहे और उस संयम से सत्संग किया, सत्संग का प्रचार प्रसार किया ,उसका वो यज्ञार्थ कर्म ! लेकिन शादी तो नहीं किया इधर झाँका उधर झाँका …ओ फ़िल्म गया,सिगरेट पिया उसका अन्यत्र कर्म हो गया ! चाहे ब्रह्मचारी हो चाहे गृहस्थी हो ,चाहे स्त्री हो चाहे पुरुष हो ,चाहे बालक हो चाहे बूढ़ा हो ..जो ईश्वर प्राप्ति के लिए,ईश्वर संतोष के लिए तत्परता से काम करता है वो कर्म यज्ञार्थ हो गए।और जो स्वार्थ पोशने के लिए ,अहंकार बढ़ाने के लिए ,दूसरे को नीचा दिखाने के लिए,दूसरे को दुःख देने के लिए –  “ऐ,क्या करता है?ठीक से कथा सुन ! उधर क्या देखता है ? ”
है तो डाँट ! है तो कठोर कर्म ! लेकिन सामने वाले को नींद का झोंका आया उससे बचाकर उसके हृदय में भगवान की भक्ति भरना है तो डाँटना भी यज्ञार्थ कर्म हो गया !
मेरे को बिल्कुल याद है मेरे गुरुदेव कभी कभार जैसे मैं पंचेड़ आ जाता हूँ वैसे ही मेरे गुरुदेव किसी सेठ ने बना रखा था बंगला गणेशपुरी, बम्बई के पास गणेशपुरी में एकांत में उसने फार्म हाउस जैसा कोई बंगला बना रखा था।  गुरुजी बारिशों के इन दिनों में वहीं जाकर एकांत में रहते । वो सेठ का नाम था नारायणदास सेठ, उसके बेटे बड़े बड़े थे, बेटों के घर बेटे थे, ऐसा सेठ था वो  । तो बापूजी को ले गया अपने बंगले में , व्यवस्था कर दी, पूरा बंगला बापूजी के लिए था ,आस पास बगीचा ये सब.. सारी सेवा व्यवस्था वो करता था । अब बापूजी ने किसी को पुस्तक दिया बोले तू पढ़, सेठ को बोले “सुनो सत्संग”… तो बापूजी थे, दूसरे दो चार थे.. तो सत्संग कर रहे है ,तो इससे सेठ का भी भला हो ,जो आए आदमी दो चार दर्शन करने के लिए फालतू बात न करे, सत्संग के कुछ संस्कार पड़ेंगे उनका भला होगा.. बापूजी कर रहे है यज्ञार्थ कर्म ! और सेठ ने 1, 2 झोंका खाया, तीसरा झोंका खाते.. बूढ़ा आदमी नाक से सांस लेता है मुँह से फूँकता है  ये बूढ़ापे की निशानी समझो अथवा थकान होती है तभी भी ऐसा होता है.. गुरुजी ने ऐसा डाँटा ,ऐसा डाँटा कि वो नारायणदास सेठ.. बड़ा सेठ था, फाइनांस का बिज़नेस चलता था उसका, दूसरों को ब्याज पर  पैसे देता था 10-10 लाख ,5-5 लाख ऐसा सेठ था …ऐसा डाँटा ऐसा डाँटा कि वो सेठ की सफारी का  हिस्सा नीचे का जो था वो आगे भी भीग गया और पीछे भी रंगीन हो गया.. बात तुम समझ गए होंगे !

वो सेठ हाथ जोड़ के बोला” साँई जरा मैं आता हूँ “..

“कहाँ जाता है फिर?”

बोले,”नहीं अभी आता हूँ 5मिनट में आता हूँ कपड़ा बदल के आता हूँ।”

तो बाहर से तो वो सेवा करनेवाला व्यक्ति था और ऊपर से डाँट दिया !क्योंकि सेठ को लगा कि मैं सेवा कर लेता हूँ बहुत हो गया …नहीं!  सेवा के साथ-साथ सत्संग होगा तो सेवा में सत्वगुण खिलेगा नहीं तो सेवा के बहाने भी राजकारण घुस  जाएगा !जय रामजी की !
तो ये डाँटना भी उसकी भलाई के लिए तो यज्ञार्थ कर्म है !और सेठ सेवा करता है ..वाह भाई ये सेठ बहुत बड़ा अच्छा है, इतना बंगला मेरे लिए बना रखा है सेवा करता है,वाह सेठ अच्छा है.. ऐसा करके सेठ की खुशामद तो हजारों लोग कर सकते है लेकिन महापुरुष खुशामद नहीं अनुशासन करते है ! यज्ञार्थ कर्म करवाते है ! रावण का घमंड उतारने के लिए हनुमानजी ने लंका तक जला दिया लेकिन हनुमानजी को पाप नहीं लगा क्योंकि यज्ञार्थ कर्म है !

अंगद को पकड़ के ले गए रावण के सामने, तो अंगद बोलता है मेरे लिए गादी कहाँ है?

बोले, अरे बंदर तू तो नीचे बैठ..

बोले, अरे नीचे कैसे बैठूँगा ? मैं तो राम का दूत हूँ !! अपने स्वामी की इज्जत बढ़ाना तो सेवक का कर्तव्य है ! तू गादी नहीं देता कोई बात नहीं अपनी पूँछ लम्बी की….डूं डूं डूं डूं डूं डूं….लंबी निकलती गई पूँछ, अब पूँछ को  ???????
बनाकर  गोल गोल “जय श्रीराम !” करके ऊँची गादी पे बैठ गया!

बाहर से तो लगता है कि अहंकार है लेकिन अपना अहंकार नहीं स्वामी का यश बढ़ाना है  यज्ञार्थ कर्म हो गया !

गहनों कर्मणा गतिः
कर्म की गति बडी गहन है! वही कर्म दुःखदाई हो जाता है,वही कर्म सुखदाई हो जाता है, वही कर्म एक व्यक्ति के लिए पाप हो जाता है, दूसरे व्यक्ति के लिए पुण्य हो जाता है । घरबार छोड़कर विरक्त हो गया.. नारायण हरि ! सीताराम.. भिक्षाम देही,  माई देनेवाले का भला ना देनेवाले का भला  …रोटी  माँग के खाता है सन्यासी ।  उसके लिए वो यज्ञ है, मधुकरी यज्ञ है । लेकिन जो विषय विलासी लंपटू है,अपने पैसे बचाकर गृहस्थी है और बाहर से भिक्षा माँग कर खाता है तो उसके लिए वो पाप का अन्न हो गया, हराम का, मुफ्त का खाना सत्यानाश जाना । घर में तो पैसे पड़े है और बाहर भीख माँगकर खा रहा है…नहीं!

सन्यासी है और भिक्षा ले के खाता है तो  पुण्य हो गया उसके लिए ।  राजा भ़ृतहरि साधु बन गए भिक्षा माँग के खाते है.. अच्छी बात है, लेकिन राजदरबार में भी बैठे है और फिर भिक्षा ले के खा रहे है पब्लिक का खा रहे है और कर्म नहीं कर रहे है तो बंधन हो जाएगा ।
ऐसे ही संत है,सत्संग कर रहे है,किसीकी गलती है तो उसको डाँटते है तो यज्ञार्थ कर्म है ..और बोले अपना क्या है ये मरेगा! तो ये बंधन हो गया !अपना जो कर्तव्य है वो कर्तव्य  पाले ईश्वर की प्रीति के लिए और दूसरे का तन तंदुरुस्त रहे मन प्रसन्न रहे बुद्धि भगवान में लगे ऐसा भगवान के नाते जो भी कर्म है वो यज्ञार्थ कर्म है।
बाहर से किसीने घूस दे दी 500,1000,2000….
और हमने उसके फेवर में फैसला कर दिया,बाहर से तो  2000 का लाभ हुआ लेकिन हमें आत्म संतोष नहीं मिलेगा !हमने 2-5 हजार की लालच को ठोकर मार दी लेकिन ईश्वर को साक्षी रखकर न्याय युक्त उसको जजमेंट दे दिया तो हमारा आत्म संतोष  होगा, ये यज्ञार्थ कर्म होगा ! तो यज्ञपुरुष परमात्मा को पाने वाले संतों के पास जाने की रुचि हो जाएगी । तभी तो जज आकर बैठे है ! अगर यज्ञार्थ कर्म नहीं होता तो सत्संग में आने की रुचि नहीं होती है, गुरु से दीक्षा लेने की रुचि नहीं होती है, भगवान का ध्यान करने की रुचि नहीं होती है, कथा सुनने की रुचि नहीं होती है !

तुलसी पूर्व के पाप से हरी चर्चा न सुहाय
जैसे ज्वर के जोर से भूख विदा हो जाय।।

 

कोई आदमी जा रहे है .. कबीर ने बुलाया ..

“बैठो,चेहरा उतरा हुआ है,क्या बात है?”

बोले “महाराज! आज मजूरी नहीं मिली ”

“चिंता न करो,लो ये माला.. अब भोजन बन रहा है, भोजन कर लेना । फिर सूरज डूबते डूबते.. अभी दोपहर तो हो गया है सूरज डूबने से पहले ही तुम्हारा पूरे दिन की मजूरी हम दे देंगे ! दिहाडी दे देंगे तुमको , भजन करो !

तो भगवान का भजन करेंगे तो इनका भी मन पवित्र होगा और जिसका अन्न खिलाते है उसको भी पुण्य होगा।

वो लोग तो खुश हो गए कि अरे आधा दिन में भोजन भी मिले और दिनभर की दिहाडी भी मिले,वाह! …भोजन-वोजन करा थोड़ा माला घुमाया, एक-दो माला घुमाया… झोंका आ रहा है ..झोंका आ रहा है ..कैसे भी करके आज तो मुश्किल से दिन नहीं डूब रहा है !
आज डाडो मोटो किकर ।
आज सूरज डूबतो नहीं काय बात है? ..उनके लिए तो दिन बड़ा हो गया ! बड़ी मुश्किल से शाम हुई  ।कबीर ने उन्हें दाड़ी के पैसे दे दियें ,बोले कल मजूरी मिले उधर ढूँढने जाओ मिले न मिले कल  दोपहर को इधर 12 बजे भी आ जाओगे तो कोई बात नहीं।भोजन भी कर लेना 12-12.30 बजे और फिर माला लेके जप करना ,दिनभर का तुम्हारेको मजूरी दे देंगे।
बोले-“महाराज ,ये आशिर्वाद नहीं करो। हम तो भाटा तोड़ेंगे ,खेतों में मजूरी कर लेंगे लेकिन भजन करना मुश्किल है !”

तो सत्संग के बहाने तो ऐसे ही लोग भजन करते है और ऐसे ही भजन करने वाले लोगों की सेवा करने का निमित्त मिल गया ,तो ये यज्ञार्थ कर्म है इससे भगवान संतुष्ट होता है! यज्ञ पुरुष -परमात्मा संतुष्ट होता है!

पुत्र को जन्म दिया लेकिन पुत्र मेरे को सुख दे तो अन्यत्र कर्म है लेकिन पुत्र को जन्म दिया तो पाला-पोसा ,समाज से कुछ … मेरा बेटा जज बन गया तो तूने अकेले ने जज नहीं बनाया है ,उसको जज बनने में कईयों के सहयोग की जरूरत पड़ी, प्रोफेसरों का सहयोग रहा ,मकान बनाने वाले कारीगरों का सहयोग रहा तभी वो कॉलेज बना तो तुम्हारा बेटा पढ़ा, सुथारों का सहयोग रहा तभी वो बेंच बना होगा तभी बेटा पढ़ा होगा ,पुस्तक छापने वाले का सहयोग रहा होगा,परीक्षा लेने वालों का सहयोग रहा होगा,परीक्षा पेपर बनाने वालों का सहयोग रहा होगा,और बेटा घर से कॉलेज गया तो बस वालों का,कंडक्टरों का कईं मनुष्यों का सहयोग लेकर तुम्हारा बेटा वकील बना है, कईंयों का सहयोग लेकर तुम्हारा बेटा जज बना है, कईंयों का सहयोग लेकर तुम्हारा बेटा डॉक्टर बना है या उद्योगपति बना है तो फिर कईयों की सेवा करके तुम्हारा बेटा परमात्मा का बेटा हो जाय, ऐसा उसमें ज्ञान भरना यज्ञार्थ कर्म है ! और बेटा तू तो थारे कमा, मैं तो तीन लाख खर्चो कीदो । तू तो दस लाख कमा ने, मु तो गाडी में फरूं ने तू करो, लीलो लेहर.. आहा…
नहीं! गड़बड़ हो जाएगा!

ब्राम्हण ने दो बच्चों को बुलाया, बोले “ले दो लड्डू, यज्ञ है ,अब तुम यज्ञार्थ कर्म तो नहीं जानते लेकिन ये लड्डू है न वो यज्ञ में डालकर बोलो स्वाहा, इन्द्राय स्वाहा, कुबेराय स्वाहा… वो लड़के जरा ऐसे ही थे.. उन्होंने लड्डू लेके अपना मुँह खोल दिया, मुँह में लड्डू डाल के बोलते है – आहा !!

पुजारी बोलता है ये काय करो रे छोरा? मैं तो कह रहा यज्ञ में डालो बोलो स्वाहा”
बोले-“यज्ञ में डालेंगे ,तो यज्ञ भगवान है वहाँ स्वाहा होगा तो यहाँ पेट में भी तो जठरा भगवान है कि –आहा…    तो आहा करके जो मजा लेते है वो मजा टेम्पररी है,लेकिन ईश्वर की प्रीति के लिए जो कर्म करते है वो यज्ञार्थ कर्म है । ऐसा कर्म कर्मबंधन से आदमी को मुक्त करता है।

एक शाम के समय युधिष्ठिर महाराज पर्वतों की लंबी कतार देखकर बड़े आनंदित प्रसन्न हो रहे थे ,एक टक नजर दूर तक डालते हुए श्वासों-श्वास में अजपा जाप जपते हुए मस्ती से बैठे हुए थे । द्रौपदी ने कहा कि अपने तो धर्म-कर्म में जीते है, भगवान को मानते है, संतों को मानते है फिर भी अपने तो दुःखी है, दरदर की ठोकरें खा रहे है, वन वन भटक रहे है…

और जो शाकुनी का सहारा लेकर क्रूर कपट करता है,  शतरंज खेलकर सब कुछ लूट लिया तुम्हारा,  लाक्षागृह में पांडवों को जलाने का प्लान  किया,  ऐसा दुष्ट दुर्योधन मजा कर रहा है और हम लोग दुःख भोग रहे है! तो भगवान को इतना तो कहो कि हम इतना भजन कर रहे है तो हमारे लिए जरा अच्छा कर दे और दुष्ट को सजा दे दे।

यधिष्ठिर ने सुंदर जवाब दिया,  युधिष्ठिर बोलता है कि किसी को सजा दे ये भगवान को हम क्यों कहे ? वो तो उनके कर्म ही उनको सजा देंगे ! और हमारे दुःख मिटा दे ये हम उसको क्यों कहे? हमारा प्रारब्ध दुःख का है तो दुःख बीत रहा है ! हम दुःख मिटाने के लिए भजन नही करते,  दूसरे को सजा दिलाने के लिए भजन नही करते,  लेकिन भगवान भजन करने योग्य है,  भजन से हमें आनंद आता है,  दुःख सुख का प्रभाव छूट जाता है इसलिए हम भजन करते है,  भजन करना अच्छा है।

“अरे काय करां मैं तो कथा में गया , और मेरे को बेटा  हुआ 5 साल हो गया! अरे काय करां मैं तो कथा में गया,  मेरा छोरा को अभी तक शादी  हुई ! अरे मैं तो मंदिर में जाता हूँ मेरी नौकरी  लगी ..तो तेरे को भगवान में प्रीति नही नौकरी में प्रीति है, छोरे-छोरी में प्रीति है लेकिन कुछ समय तो ऐसा भी लगाना चाहिए कि भगवान के लिए कर्म करे ! अपने स्वार्थ के लिए कुत्ता भी पूँछडी हिलाता है,  काय बात है!..तो मनुष्य जन्म स्वार्थ स्वार्थ स्वार्थ से गंदा हो गया ! कुटुंब में झगड़ा क्यों होता है? कि यज्ञार्थ कर्म नही करते , अन्यत्र कर्म करते , स्वार्थ से करते तो कुटुंब में कलह होता है। बड़ा भाई छोटे भाई को नही पूछेगा अगर स्वार्थ का अंधा घोड़े पे बैठा है तो । यज्ञार्थ कर्म करेगा तो बड़ा समझेगा कि छोटा है,  मेरा भाई है उसका भरण पोषण करना उसका मन लेना, ये वो करना..परदेस में धन वैभव तो है लेकिन यज्ञार्थ कर्म की बहुत कमी है,  लोग बड़े अशांत है , दुःखी है ! और यहाँ भी जो स्वार्थी है वे लोग अशांत है,  दुःखी है ! लेकिन ये जो यज्ञार्थ कर्म करते है थोड़े में से थोड़ा , टुकड़े में से टुकड़ा कुटुंब में बाँट के खाते है,  समाज में बाँट के खाते है उनके हृदय में जो सुख -शांति और चैन है वो अरबोपतियों के हृदय में नही मिलता है !जय रामजी की !

तो भगवान कहते है कि जो यज्ञार्थ कर्म करते है वो तो बंधन से मुक्त होते है ! लेकिन जो अन्यत्र कर्म करते है वे बंधन में आ जाते है ! जो कर्म छोड़के आलसी होके बैठे है , खाया पिया और सोए रहे , गप्पे लगाते रहे,  समय बर्बाद करते रहे वे दूसरे जन्म में पेड़-पाषाण आदि हल्की योनियों में चले जाते है फिर जबरन कुदरत उनसे कर्म करवाती है! रात को कैसे आँधी तूफान के साथ बरसाती बौछार हुई ! कितना सहन करना पड़ा पेड़ों को ! हईशा.. धमा धम!..झकझोर दिया तूफान ने !कभी तूफान झकझोर देता है तो कभी ताप उनको तपा देता है तो  कभी अति वृष्टि उनको अजीर्ण कर देती है तो कभी अनावृष्टि उनको भूखा मार देती  है!  तो ये वे ही लोग होते है जिन्होंने यज्ञार्थ कर्म नही किया , मनुष्य जन्म   स्वार्थ में लगा दिया तो दूसरे जन्म में बन जाओगे पेड़ पौधे लता और वृक्ष ! जबरन कष्ट सहो ! और फिर अपने लिए कुछ न रखो !.. फूल भी दूसरों के लिए,  फल भी दूसरों के लिए ,  टहनी भी दूसरों के लिए ,  थड़ भी दूसरों के लिए!..क्योंकि तुमने पाया है! ग्लास अगर कह देता  कि मैं लोगों की प्यास बुझा  देता हूँ तो पागल है!… ग्लास अगर कह दे कि  मैं लोगों की प्यास बुझा  देता हूँ तो वो पागल है! दीया अगर कह दे कि  मैं लोगों का अधःकार मिटाता हूँ तो वो पागल है! दीया अंधकार अपनी ओर से नही मिटाता है, तेल मिलता है  तभी वो अधः कार मिटाता है! ग्लास अपनी ओर से प्यास नही बुझाता है, वो पानी आता है तभी वो प्यास बुझाता है! ऐसे ही आप कह दो मैं दुःख मिटाता हूँ तो दुःखहारी श्रीहरि की सत्ता तुमको मिली,  दुःखहारी श्रीहरि की बुद्धि तुमको  मिली,  दुःखहारी श्रीहरि का सूरज का यूटिलाइज तुम करते हो , दुःखहारी श्रीहरि की धरती तुमको रहने को मिली,  दुःखहारी श्रीहरि की हवाएँ तुम लेते हो तभी तुम दूसरों के दुःख दूर करने में निमित्त बनते हो तो अपने को खुशहाल मानो कि भगवान ने हमको अवसर दिया!
तो उन्होंने मौन मंदिर बनाया… गुरुवार को उद्घाटन था मौन मंदिर का.. दानमल हो गए थे । तो उनके साथी बोलते है दानमल या हम लोग एक मौन मंदिर तो क्या सौ मौन मंदिर बनाके आश्रम को अर्पण कर दे  फिर भी हम बदला नही चुका सकते आश्रम की तरफ से जो हमको शांति मिली , सत्संग मिला, नया जीवन मिला! ..तो ये उत्तम कर्ता है ! और नही तो बोले-“हमने मौन मंदिर बनाया है,  हमारा नाम लगना चाहिए तख्ती पे , दुनिया में नाम होना चाहिए “..तो ये राजसी कर्म है! तो राजसी कर्म से सात्विक कर्म ज्यादा फलदाई होता है, ज्यादा सुखदाई होता है।दिखावटी भी अच्छा काम करे तो अच्छा ही है ! तख्ती लगाके भी जो ..बिल्कुल नही करते वो तख्ती के बहाने भी कंबख्त करते है तो अच्छा है !जय रामजी की! लेकिन – तख्ती-वख्‍ती  की परवाह नही  है भगवान तो देखने आएँगे! छुपके भी पाप कर्म करते है तो उसका फल मिलता है तो छुपके पुण्य कर्म करेंगे तो उसका भी फल मिलेगा! भगवान को, और गुरु को रिझाया, राजी कर दिया ,  और गुरु ने- भगवान ने अपना मानकर हमको डाँटा …तो अगर सात्विक आदमी है कि- देखो,  गुरु ने हमको अपना तो माना! हम बड़े भाग्यशाली है!
अगर राजसी है बोले-  हम तो इतनी इतनी सेवा करें और गुरु ने डाँटा कांय करें ! ठीक है, अपना भाग्य फूटा !और तामसी है तो गुरु की निंदा करने लगेगा! तो जो थोड़ा बहुत पुण्य होगा उसका नष्ट हो जाएगा !

हरि-गुरु निंदा सुनहि जे काना ,
होवई पाप गौ घात समाना।
हरि गुरु निंदक दादुर होवई।

हरि की और गुरु की निंदा जो सुनता है जिस कानों से उसको गौ हत्या करने का पाप लगता है!जो निंदा करता है वो मेंढक बनता है ,  टैं टैं  करता रहेगा फिर ! …..चलो हम नही जानते भगवान को,  गुरु को.. उनकी महिमा वो जाने !  भगवान करे अच्छा!चलो जो हो गई जो बीत गई । ……तो जो अपने जीवन में निःस्वार्थ कर्म नही करता वो मनुष्य जन्म पाकर बरबादी के रास्ते जाता है ! स्वार्थ रहित कर्म नही करेगा  तो योग्यता डेवलप नही होगी, विकसित नही होगी ! अपने स्वार्थ के लिए तो कुत्ता भी पूँछ हिला देता है ,  अपने दो बेटी बेटों को तो कुत्ती भी पाल लेती है  क्या बड़ी बात हुई ? कुत्ता भी पाल लेता है! लेकिन ईश्वर प्रीति के लिए जो कर्म करे उसको बोलते है यज्ञार्थ कर्म! तो यहाँ गीता के तीसरे अध्याय के नौवें श्लोक में  भगवान बोलते है…तुम
फिरसे उच्चारण करो….

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।

तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर।।

यज्ञ के निमित्त किए जानेवाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ  ही यह मनुष्य समुदाय कर्मों से बंधता है। इसलिए हे अर्जुन तू आसक्ति से रहित होकर यज्ञ के निमित्त ही भली भाँति कर्तव्य कर्म कर,  परोपकार कर्म करके अपने हृदय को परमात्मा के रंग से रंग डाल ।

वैष्णव जन तो तेने कहिये,  पीर पराई जाणे रे ।

पर दुःखे उपकार करे तो मन अभिमान न आणे रे।

वह वैष्णव  है, वह भगवान का है जो दूसरों के दुःख दूर करने के लिए है  और बड़े में बड़ा दुःख है जन्म मरण !  बड़े में बड़ा दुःख है भगवान से विमुख ! जो भगवान से विमुख लोग है उनको भगवान के सन्मुख करना ये बहुत ऊँचा कर्म है ! जो ईश्वर से विमुख है उसको  ईश्वर से सन्मुख करना यह बहुत बड़ा काम है! इस काम में भागीदार होना ये भी पुण्य है।

आचार्य विनोबा भावे ..उसके पास एक आदमी आया बोले- “बापजी मैंने घोड़ा खरीदा है । वो घोड़ा मेरे को बैठने ही नही देता! बहुत अच्छा घोड़ा है,  मेरे नौकर को बैठने देता है । वो तो आया बस उसको लेके हवा हो जाता है ! मैं जाता हूँ वो मेरे को लातें मारता है !

बापजी ने एक मिनट शांत होकर अपने आत्मा में डुबकी मारी  , बोले -“तुमने घोड़ा लिया है, घोडे को अपने हाथ से कभी दाना खिलाया?

बोले -”  नौकर चाकर खिला देते है !

“नौकर चाकर खिलाते तो नौकर को बैठने देगा ! अपने हाथ से तू उसको दाना खिला , फिर अपने हाथ से जरा तू उसको प्यार कर, पुचकार कर तो उसको पता चले कि ये मेरे को स्नेह करता है , मेरे को खिलाता है , तो उसके हृदय में भी तेरे लिए  भाव होगा …और तू ले जाएगा चाबुक तो उठाएगा लात!
आय शाउट यू शाउट हू विल कैरी डर्ट आउट ? मैं भी रानी तू भी रानी कौन भरेगा घर का पानी!
तू नौकर के हाथ से भेज देता है न..अपने हाथ से खिला !

वो आदमी ने 8 दिन तक दाना-पानी घोड़े को खिलाया  और उसी घोड़े पर सवार होकर बाबाजी के दर्शन करने आया।

बाबाजी ने पूछा क्यों कैसे?

बोले – “महाराज ये तो जादू हो गया ! आपने कौनसा मंत्र कर दिया?”

बोले-“मंत्र ये है -जो देता है वो पाता है, जैसा करता है वो भरता है!”

तो यज्ञार्थ कर्म, सत्कर्म, निष्काम कर्म करने से बुद्धि का विकास होता है, अन्तःकरण में शांति, सुख आता है, चैन की नींद मिलती है। और जो स्वार्थ से कर्म करते है , दूसरों को लड़ाते भिड़ाते है और अपना उल्लू सीधा करते है ऐसे उल्लुओं को तो महाराज यहाँ भी सुख नही , परलोक में भी सुख नही !

राजा की सवारी जा रही थी । एक लड़का अपनी माँ की उंगली पकड़ कर.. किशोर अवस्था था, भीड़ में कहीं गुम न हो जाए इसलिए माँ की उंगली पकड़ कर देख रहा है राजा की सवारी । किशोर अवस्था करीब  पार कर चुका था अभी जवानी आने की तैयारी थी।

“माँ,  माँ मुझे राजा से मिलना है!”

माँ ने कहा बेटा तेरा पिता स्वर्गवास हो गया । एकलौता मेरा लाल, हम गरीब भी है,  तू खास पढा लिखा भी नही और तू राजा से कैसे मिल सकता है? और मिलेगा तो राजा तेरे को क्या देगा या क्या ?”

“नही माँ मेरे को राजा से मिलना है ।”

बोले “तू राजा से मिल, मिलना चाहे तो मिल ! लेकिन मैं मिलने का तरीका बताती हूँ । तो तू ऐसा मिलेगा की राजा तेरे से अलग नही होगा !

बोला-“माँ ऐसा कौनसा तरीका है?”

बोली-“तू यज्ञार्थ कर्म कर! राजा को खुश करने के लिए कर्म कर,  ईश्वर को खुश करने के लिए कर्म कर !राजा का महल बन रहा है। वहाँ जाकर तू काम में लग जा । आलस्य मत करना , कामचोरी मत करना । और 8-8 दिन में ..जो दिहाडी का काम करते है उनको 8-8 दिन में पगार मिलता है.. 2-3 रोटी भी मिलती है और पगार भी मिलता है फिर 8 दिन में”… जो कुछ रुपया उसका होता होगा उस समय। …”जो पगार बाँटने आए मंत्री तो पगार मत लेना , बोलना कि राजा साहब का महल है इसमें क्या पगार लूँ? मेरे को तो सेवा मिल रही है भाग्य है मेरा ! ऐसे करके तू पगार मत लेना और सेवा ततपरता से करना , दूसरे करें उससे सवाई सेवा करना लेकिन बदला कुछ नही चाहना !तो तेरे कर्म यज्ञार्थ हो जाएँगे ! राजा तो खुश हो जाएगा, महाराज भी खुश हो जाएँगे परमात्मा भी !”

महल बन रहा था, काम में लग गया ।एक हफ्ता हुआ सबको मिला पेमेंट उसने नही लिया! दूसरा हफ्ता हुआ उसने बोला मेरे को नही चाहिए !तीसरा हफ्ता हुआ मंत्री को इन्कार कर दिया !

महाराज , उसका तो बड़ा प्रभाव पड़ा मंत्री पर ! मंत्री ने जाकर राजा को सुनाया ।

ईश्वर, गुरु और समाज का विरोधी कर्म न हो । अब बाहर से तो सेवा है लेकिन ये सेवा में  गिना जाएगा । ड्राइवर हो तुम्हारा…ड्राइवर,   सेवक तो हो लेकिन गाड़ी चलाके खड्डे में डाले तो सेवा हुई कि बदमाशी हुई? जय रामजी की ! रसोईया तुम्हारा सेवक तो हो लेकिन शक्कर की जगह पर नमक डाल दे खीर में तो सेवा हुई कि बदमाशी हुई? बेवकूफी हुई ? तुम्हारा दोस्त , तुम्हारा सेवक तो हो , तुमको प्यार करते करते तुम्हारी आँख में उंगली घुसेड़ दे तो सेवा है कि बदमाशी है? तो सेवा का भाव के साथ-साथ सेवा का ज्ञान भी होना चाहिए ! जय रामजी की !सेवा के भाव के साथ-साथ सेवा का ज्ञान भी होना चाहिए। सेवा में तत्‍परता भी होनी चाहिए । तो कर्म ऐसे करे कि अपना कर्म पूजा बन जाए , अपना कर्म बंदगी हो जाए!

उस लड़के ने तीसरा हफ्ता का  पगार  आया वो भी नही लिया ।

मंत्री बड़ा प्रभावित हुआ..राजा को जाके कहा -लड़का है जवान तो अभी जवानी उसकी आ रही है लेकिन महाराज इस उम्र में उसके जीवन में जो तत्‍परता है,  काम करने का हौसला है वो तो गजब का है ! बदला कुछ नही चाहता है,  बड़ा निःस्वार्थी लड़का है! ऐसा करके मंत्री ने प्रशंसा की।
निःस्वार्थ काम करने से आदमी का चेहरा खिला रहता है,  बुद्धि बलवान हो जाती है,  मन प्रसन्न रहता है और हृदय में सिंह जैसा बल आ जाता है निःस्वार्थ कर्म करने से! अकल से करें.. ऐसा नही कि इधर कथा चल रही है उधर ठां ठक ठां ठक …कांय करो ?.. के मैं निःस्वार्थ कर्म कर रहा हूँ …डंडा लेके पानी कूट रहा है..क्या कर रहा है?..बोले मैं निःस्वार्थ कर्म कर रहा हूँ…अरे बेवकूफ ये तो पानी कूट रहा है क्या निःस्वार्थ? लोग बैठे है कथा में और लोगों के स्कूटर या मोटर सायकल की सीट पर वो  ब्लेड घुमा रहा है ..बोले क्या कर रहा है?..बोले मेरे को तो कोई मतलब नही है निःस्वार्थ कर्म कर रहा हूँ..ये तो बदमाशी के कर्म हुए ! निष्‍प्रयोजन कर्म ..पानी कूटना निष्‍प्रयोजन कर्म  है। अब किसी की गाड़ी वाड़ी.. अपने को कोई स्वार्थ नही लेकिन ऐसे ही बैठे है किसीकी चीज  खराब कर रहे है तो बदमाशी का कर्म है ।  न बदमाशी के कर्म हो न निष्‍प्रयोजन कर्म हो न अंधे स्वार्थ से प्रेरित कर्म हो..कुशलता से कर्म हो, निःस्वार्थ कर्म हो, ईश्वर के प्रीति के लिए कर्म हो और बात को हजम करने की ताकत हो ! जय रामजी की !

लड़के में ये सद्गुण थे। उस सद्गुणों के कारण लड़का राजा के आगे पसंद पड़ गया ।

राजा ने कहा अब ये महल चुनाई करने वालों के लेबर के, कारीगरों के साथ लेबर का काम करे…नही ! इस लड़के को मेरी पर्सनल सेवा में रखूँगा ! वो राजा से मिलना चाहता है… अब राजा उससे मिल रहा है ! जय रामजी की ! पर्सनल सेवा में..और जो पर्सनल सेवा में रहा तो महाराज!.. उभरता छलकता खून था.. किशोर अवस्था में जो बालक जैसा बनना चाहे उतना बड़ा महान हो सकता है ! राजा विक्रमादित्य किशोरों को भर्ती करते थे,  अपने अंगरक्षक किशोर रखते थे 14 साल के लड़के…छोटी छोटी तलवार देकर बॉडीगार्ड तरह के लड़कों को रखते थे राजा विक्रमादित्य । किशोरों में बड़ा अदम्य उत्साह होता है और सच्चे भी होते है । फिर ज्यों ज्यों बड़े होते है और बेईमानों का संग होता है तभी कपटी बेईमान होते है! तो महाराज!..वो बड़े राजा की इत्मीनान से सेवा करने लगा । देखते-देखते राजा और रानी का मन जीत लिया …निष्काम व्यक्ति तो मन जीत लेता है! और निष्काम कर्म करनेसे हृदय पुलकित होता है। निष्काम कर्म करनेसे बुद्धि खिलती है , निष्काम कर्म करने से आत्मबल बढ़ जाता है।

दिखावटी की सेवा में और सच्ची सेवा में जमीन आसमान का फर्क है ! जो सच्ची सेवा करता है वो नही चाहेगा कि मेरा नाम अखबार में आए अथवा मेरी सेवा कोई देखे । कोई भी नही देखे फिर भी अंतर्यामी परमात्मा तो देख रहा है! मेरा गुरुदेव तो देख रहे है !  गुरुमंत्र मिला तबसे मेरा गुरु मेरे साथ है! तो वो निष्काम सेवा का फल उनके हृदय में पनपता है।

महाराज ! उसने ऐसी सेवा की कि राजा रानी दोनों प्रसन्न रहते उस पर । और  राजा का अंगद सेवा से,  राजा की अंगद पर्सनल बातें , ये वो हिल चाल देखकर सारा योग्यता आने लगी ! एक दिन राजा ने रानी को कहा कि अपने पास कोई संतान नही है,  अब उमर भी हो गई… भतीजा-वतीजा तो लोफर जैसा है.. क्यों न इस लड़के को ही गोद में ले ले तो कैसा रहेगा? भले गरीब माई का है लेकिन हृदय का गरीब नही ! सेवा का धन है इसके पास, तत्‍परता का धन है इसके पास, सहनशक्ति का धन है इसके पास, सदाचार का धन है इसके पास, ये बड़ा धनवान है! ये दिल का राजा है ! इतना कुछ करता , कुछ भी नही लेता है !दिल का राजा है ! तो क्यों न अपन इसको गोद ले ले ?  रानी बोलती है “ये तो मेरे मन की बात कही आपने !मेरे मन में तो हो रहा था लेकिन संकोच के मारे नही कह रही थी!”

समय आया… उसको गोद ले लिया…कुछ ही दिनों में युवराज के पद पर उसका राज्याभिषेक हुआ। रथ में बैठकर नगर यात्रा निकाली। तो उस भीड़ में वो बुढ़िया हाथ में छड़ी लेकर ताकती रही कौन राजकुमार है और राजा की जगह पर आएगा। तो उस बुढ़िया ने देखा ये तो मेरा पुत्र है! और पुत्र ने देखा ये मेरी माँ ! राजा को कहता है कि राजन जिस माँ के थोडेसे उपदेश से मैं यहाँ तक पहुँचा और  आज राजा साहब बना हूँ उस माँ के चरण छूने जाना है मुझे , माँ को प्रणाम करने जाना है !

राजा ने कहा – “जिस माँ ने ऐसा निष्काम कर्मयोगी को अवतार जन्म दिया है उस माँ के चरण छूने तू अकेला क्यों जाएगा? मैं भी साथ मे चलता हूँ ।” उस बुढिया के पास राजा और राजकुमार दोनों प्रणाम करने गए!
राम लक्ष्मण जानकी जय बोलो हनुमान की ! हनुमान जी की जय क्यों है?..कि सेवा है हनुमान जी के पास !

तो भगवान कृष्ण कहते है जो स्वार्थ के कर्म  है वो अन्यत्र  योनियों में ले जानेवाले भटकाने वाले है।लेकिन जो परमार्थ के कर्म है, निष्काम कर्म है, यज्ञार्थ कर्म है, ईश्वर की प्रीति के लिए कर्म है वो आदमी को मुक्त कर देते है! सुखस्वरूप ईश्वर से मिला देते है !

यज्ञार्थ कर्म…कर्म से कर्म को काटे …जेसे काँटे से काँटा निकलता है ऐसे ही कर्मों से कर्म बन्धन कटता है। ईश्वर सृष्टि में सहायक होने के लिए कर्म करें। शास्त्र तो यहाँ तक कहता है कि स्त्री जो गर्भ धारण करती है वो भी यज्ञार्थ है। पीड़ा सहती है,  कठिनाई सहती है,  सृष्टि की परंपरा चलाने में साझेदार होती है। दुःख और कष्ट सहके बच्चे को पालती पोषती है ये यज्ञार्थ कर्म है। लेकिन  जब चाहती है कि बच्चा मुझे सुख दे तो ये अन्यत्र कर्म हो जाता है । ये बच्चा मेरे को सुख दे मौज मजा कराए तो ये कर्म अन्यत्र हो जाता है,  बंधन कर्ता हो जाता है।
सृष्टि की गहराई में देखा जाए तो सारे कर्म यज्ञार्थ हो रहे है,  सेवा भाव से हो रहे है। सूर्य प्रकाश देता है,  बदले में क्या लेता है? हवाएँ चल रही है,  बदले में क्या लेती है? धरती इतना इतना कुछ फल, फूल, अन्न, धान्य आदि दे रही है ये उसका यज्ञार्थ कर्म है। ऐसे ही चंद्रमा वस्तुओं को , फल-फूलों को, अन्न को, औषध को पुष्ट करता है यज्ञार्थ कर्म है।

तो यज्ञार्थ कर्म करनेसे आदमी कर्म बंधन से छूटता है। यज्ञार्थ कर्म करने से आदमी में कर्म करने की योग्यता विकसित होती है। यज्ञार्थ कर्म करने से आदमी का मन प्रसन्न होता है और मति में, बुद्धि में विलक्षण शक्ति आ जाती है । जितना-जितना संकीर्ण जीवन है, संकुचित जीवन है उतना-उतना अन्यत्र कर्म है। और जितना-जितना विशाल जीवन है , उदार जीवन है उतना-उतना वो यज्ञार्थ कर्म करता है और जितना-जितना यज्ञार्थ कर्म करता है उतना-उतना उदार होता जाएगा , महान होता जाएगा !
मोहनलाल करमचंद गांधी एक व्यक्ति थे लेकिन यज्ञार्थ कर्म करने लगे तो वो राष्ट्रपिता माने जाते है,  एक बड़े व्यक्ति माने जाते है, बड़े महात्मा माने जाते है।
हृदय में निःस्वार्थता है तो आप बात करते है तो आपकी बात में कुछ स्वाभाविक आनंद ,  पॉवर,  प्रभाव  रहता है।और हृदय में अति स्वार्थ भरके बात करते है तो हृदय की धड़कने ढीली लगेगी।

यज्ञार्थ कर्म…गीता के तीसरे अध्याय का नौवां श्लोक चला था सुबह…  यज्ञार्थ कर्म अर्थात निष्काम भाव से किए हुए सतकर्म करते रहे …तो बाबाजी हम खाएँगे – पिएँगे क्या?

तो कथा सुनाई थी कि एक राजा की सवारी देखकर एक लड़के ने माँ से कहा  मुझे राजा से मिलना है।तो माँ ने कहा उसका महल बन रहा है , तू काम करना, कुछ लेना मत,  दो टाइम रोटी तो देंगे ही,  बाकी जो पैसे लेने मत.. लिए नही तो धीरे धीरे मंत्री तक बात पहुँची,  मंत्री ने राजा को बताया और राजा ने उस लड़के को अपना पर्सनल सेवक रख दिया! तो उसके रहने की , खाने की,  व्यवस्था तो हो गई ओढ़ने, बिछाने की ! आगे चलकर वो ही लड़का राजकुमार पदवी पे बैठा और वोही राजा बन गया !
तो ज्यों ज्यों निःस्वार्थता आती है त्यों त्यों आदमी की क्षमताएँ विकसित होती है।

डॉक्टर राजेन्द्र बाबू वकालत करते थे। एक भाई ले आया उनके पास केस। तो मुकदमा ऐसा था कि जिस आदमी ने पैसे लिए थे वो मर गया था। उसकी जमीन गिरवी थी, जमीन और मकान गिरवी रखा था,  और वो आदमी मर गया। अब उसकी पत्नी से अंगूठे-वंगुठे करवा रखे थे, उस आदमी से भी साइन ले रखा था…और एक और बिंदी बढ़ा दी ! दस हजार का जो गया लाख ! तो राजेन्द्र बाबू ने देखा कि तुम्हारे डॉक्यूमेंट तो ऐसे है कि मैं तुमको सम्पत्ति दिला सकता हूँ लेकिन इसमें कुछ गड़बड़ है!वो आदमी मर गया और उसकी विधवा पत्नी और बच्चा वो बेचारे दर दर की ठोकर खाएँगे और तुम्हारे बच्चों को अधिक पैसे मिलेंगे तो उनकी बुद्धि बरबाद होगी ! मैं ये केस लूँ तो तुम मुझे दो पाँच हजार फी दे दोगे और मेरा नाम भी होगा कि केस जीत के दिया लेकिन ये कर्म जो है बंधन कर्ता है,  वो पैसा मुझे भी दुःख देगा और तुम्हारे घर में आएगा तुम्हें भी दुःख देगा! मैं ये केस नही लड़ूँगा ! जिस माई के खिलाफ तुम मुकदमा दर्ज कराके डिक्री कुर्की लेना चाहते हो उस माई के एड्रेस,  मैं तुम्हारे कागजों  से ले लेता हूँ ..अगर तुमने उसको तंग किया तो मैं उसकी तरफ से फ्री में लड़ूँगा और उसकी तरफ से जो कुछ पैसा देना होगा मैं दूँगा ! उचित तो ये है कि तुम ये कागज फाड़ डालो। उसको क्षमा कर दो। दस हजार रुपये का तुम लाख ले रहे हो मैं तो कहता हूँ दस हजार भी छोड़ दो । राजेन्द्र बाबू की निष्काम भावना की ऐसी असर पड़ी कि उस आदमी ने जो फर्जी कागजात बनाये थे ये वो सब फाड़ दिए।

लोक व्यवहार में देखा जाए तो ये कैसा वकील? कि अपने असिल का भी घाटा कर दिया और अपना भी घाटा कर दिया । लेकिन बदले में कुदरत ने देखो भारत का प्रथम राष्ट्रपति उसीको बनाया !

इब्राहिम लिंकन बड़ा गरीब लड़का था । पढ़ने जाता तो पैरों में चप्पल नही टाट  का टुकड़ा लपेट के सुतली से सी के जाता । कई मील दूर बर्फीला रास्ता तय करके स्कूल में जाता पढ़ने को । कठिनाई से परीक्षाएँ पास की फिर वक़ीलात की लेकिन वक़ीलात करनी है तो सच्चाई से करूँगा..अब सच्चाई से वक़ीलात की तो महाराज फेल हो गए! वकील को तो झूठ बोलना है न,  तो झूठ नही बोले तो वो केस जमे नही ! फिर किसीसे पार्टनरशिप में धंदा किया ,  तो ये सच्चे आदमी और दूसरा आदमी चलता पुर घाटा पड़ गया ! फिर चुनाव लड़ा तो चुनाव में भी सच्चा सच्‍चा बोले।तो चुनाव लड़े तो एक बार हार गया ,  दुसरीं बार हार गया,  तीसरी बार हार गया, चौथी बार हार गया, पाँचवी बार हार गया,  किसी 12-15 साल की लड़की ने इब्राहम लिंकन को लिखा तुम चुनाव लड़ते हो तो चुनाव लड़ने के पहले तुम दाढ़ी रखो तो लेडीज भी तुमको वोट देंगी क्योंकि लेडीज को दाढ़ी बहुत अच्छी लगती है !  मैं ने सुना है ऐसा !…

उसने दाढ़ी भी रखी और अपना पुरुषार्थ भी था.. खैर.. दाढ़ी रखने से सब प्राइम मिनिस्टर नही हो जाते ! दाढ़ी तो कईं भिखमंगे लोग भी रख लेते है। तो उसने दाढ़ी रखी और वो जीत गया ! जीत गया तो अमेरिका का राष्ट्रपति और  छोटे से गाँव में उस नन्ही मुन्नी बालिका को मिलने गया। तो वक़ीलात में,  बिज़नेस में तो वो असफल सा रहा लेकिन उसके जीवन में जो सच्चाई थी परोपकार था उसने इब्राहिम लिंकन को अमर कर दिया । राष्ट्रपति बना दिया अमेरिका का।

तो जो कर्म निस्वार्थ भाव से है , ईश्वर की प्रसन्नता के लिए है , परोपकार के लिए है वो कर्म यज्ञार्थ हो जाते है। यज्ञार्थ कर्म करने से आदमी कर्मबंधन से छूट जाता है और खुशी से जीवन जीता है। मनु महाराज ने कहा कमाई का दसवा हिस्सा सत्कर्म में लगाना चाहिए । जो कमाई का कुछ हिस्सा सत्कर्म में नही लगाते उनका तो कोर्ट कचहरी में जाता है,  झगड़े बाजी में जाता है, बीमारी में जाता है, और कुछ गड़बड़ में जाता है। ऐसे ही मैं कहता हूँ कमाई का दसवां हिस्सा सत्‍कर्म में लगाना चाहिए लेकिन समय का दसवां हिस्सा अच्छे में अच्छा जो परमात्मा है उसकी प्रसन्नता के लिए सत्‍कर्म में और ध्यान में लगाना चाहिए !अपने पेट के लिए अपने बच्चे और पुत्र परिवार के लिए तो कुत्ता भी पूँछ हिला लेता है क्या बड़ी बात है?

अपने दुःख में रोने वाले तू मुस्कराना सीख ले ,

औरों के दुःख दर्द में तू आँसू बहाना सीख ले । 

आप खाने में मजा नही जो औरों को खिलाने में ,  

जिंदगी है चार दिन की तू किसी के काम आना सीख ले

तन की शोभा है कि परहित के लिए इसका उपयोग हो । मन की शोभा है कि परमात्मा का चिंतन करे । धन की शोभा है कि परमात्मा के दैवी कार्य मे काम आ जाए और बुद्धि की शोभा है कि परमात्‍वतत्व का साक्षात्कार कर ले ! जो लोग अपनी बुद्धि को दूसरों  को लड़ाने झगडाने में लगाते है,  मन को दूसरे की निंदा चुगली  में लगाते है ,  शरीर को भोग भोगने में संसारी विषय विलास में लगाते है वे लोग अन्यत्र कर्म करते है !तो अन्यत्र योनि में जाना पड़ता है!

 

ईश्वर व गुरु के कार्य में मतभेदों को आग लगाओ


पूज्य बापू जी

अगर चित्र में संदेह होगा तो गुरुकृपा के प्रभाव का तुम पूरा फायदा नहीं उठा पाओगे। तुम्हें भले चारों तरफ से असफलता लगती हो लेकिन गुरु ने कहा कि ‘जाओ, हो जायेगा’ तो यह असफलता सफलता में बदल जायेगी। तुम्हारे हृदय से हुंकार आता है कि ‘मैं सफल हो ही जाऊँगा !’ तो भले तुम्हारे सामने बड़े-बड़े पहाड़ दिखते हों लेकिन उनमें से रास्ता निकल आयेगा। पहाड़ों को हटना पड़ेगा अगर तुम्हारे में अटूट श्रद्धा है। विघ्नों को हट जाना पड़ेगा अगर तुम्हारा निश्चय पक्का है। डगमगाहट नहीं…. ‘हम नहीं कर सकते, अनाथ हैं, हम गरीब हैं, अनपढ़ हैं, कम पढ़े हैं, अयोग्य हैं…. क्या करें ?’ अरे, तीसरी से भी कम पढ़े हो क्या ? मन-इन्द्रियों में घूमने वाले लोगों का संकल्प साधक के संकल्प के आगे क्या मायना रखता है ! ‘यह काम मुश्किल है, यह मुश्किल है….’ मुश्किल कुछ नहीं है। जगत नियंता का सामर्थ्य तुम्हारे साथ है, परमात्मा तुम्हारे साथ है। मुश्किल को मुश्किल में डाल दो कि वह आये ही नहीं तुम्हारे पास ! Nothing is impossible, everything is possible, असम्भव कुछ भी नहीं है, सब सम्भव है।

जा के मन में खटक है, वही अटक रहा। जा के मन में खटक नहीं, वा को अटक कहाँ।।

विश्वासो फलदायकः। इसलिए अपना विश्वास गलित नहीं करना चाहिए। अपने विश्वास में अश्रद्धा, अविश्वास का घुन नहीं लगाना चाहिए। ‘क्या करें, हम नहीं कर सकते, हमारे से नहीं हो सकता है…’ ‘नहीं कैसे ? गोरखनाथ जी जैसे योगियों के संकल्प से मिट्टी के पुतलों में प्राणों का संचार होकर सेना खड़ी होना यह भी तो अंतःकरण का संकल्प है ! तो तुम्हारे पास अंतःकरण और परमात्मा उतने का उतना है। नहीं कैसे हो सकता ? एक में एक मिलाने पर दुगनी नहीं ग्यारह गुनी शक्ति होती है। तीन एक मिलते हैं तो 111 हो जाता है, बल बढ़ जाता है। ऐसे ही दो-तीन-चार व्यक्ति संस्था में मजबूत होते हैं सजातीय विचार के, तो संस्था की कितनी शक्ति होती है ! देश के बिखरे-बिखरे लोग 125 करोड़ हैं लेकिन मुट्ठीभर लोग एक पार्टी के झंडे के नीचे एक सिद्धांत पर आ जाते हैं तो 125 करोड़ लोगों के अगुआ, मुखिया हो जाते हैं, हुकूमत चलाते हैं। एकदम सीधी बात है। साधक-साधक सजातीय विचार के हों, ‘यह ऐसा, वह ऐसा…..’ नहीं। भगवान के रास्ते का, ईश्वर की तरफ ले जाने वाले रास्ते का स्वयं फायदा ले के लोगों तक भी यह पहुँचाना है तो एकत्र हो गये। वे बिल्कुल नासमझ हैं जो आपसी मतभेद के कारण व्यर्थ में ही एक दूसरे की टाँग खींचकर सेवाकार्य में बाधा डालने का पाप करते हैं। कितने भी आपस में मतभेद हों लेकिन ईश्वरीय कार्य में, गुरु के कार्य में मतभेदों को आग लगाओ, आपका बल बढ़ जायेगा, शक्ति बढ़ जायेगी, समाज-सेवा की क्षमताएँ बढ़ जायेंगी। ॐ….ॐ…ॐ…

स्रोत ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2018, पृष्ठ संख्या 2, अंक 310

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