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What is the purpose of the service?


What is the purpose of the service? Your heart is cleansed by the service. Egoism, hatred, jealousy, high feelings of emotions and all sorts of such bad feelings are destroyed and qualities like humility, pure love, empathy, tolerance and compassion develop. Selfishness vanishes from service, duality is weak, life’s approach becomes vast and generous. Unity begins to feel, speed progresses in enlightenment.The feeling of ‘one in all, one in everybody’ starts to feel. That is why unlimited happiness is attained.

What is the society? There is only a group of different individuals or units. The world is nothing but the manifest form of God. The service is worship only. The service and the wisdom of the wise men and women of great goodness is fulfilled.Like the Hanuman ji service and the teachings of Sita and Shriram ji, Brahmmanutti was completed.

Discrimination-sense is fatal, so it should be eradicated. To eradicate it, the need for Spirit-Spirit, the development of unity of Caitanya and selfless service. Differentiation is an illusion created by ignorance or illusion.

Source: Rishi Prasad, September 2018, page number 17 issue 309

गुरुसेवा क्या है एवं क्यों व कैसे करें ?


ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु व्यापक ब्रह्मस्वरूप होते हैं । उनकी सेवा क्या है, कैसे करें व उसका क्या माहात्म्य है ? आइये जानते हां शास्त्रों व महापुरुषों के वचनों में-

ऐसी है गुरुसेवा की महिमा !

भगवान ब्रह्मा जी देवर्षि नारद जी से कहते हैं-

गुरुशुश्रुषया सर्व प्राप्नोति ऋषिसत्तम ।।

‘उत्तम ऋषि ! गुरुसेवा से मनुष्य सब कुछ प्राप्त करता है ।’ (स्कन्द पुराण, वैष्णव खंड, का. मा. 2.2)

स पण्डितः स च ज्ञानी स क्षेमी स च पुण्यवान् । गुरोर्वचनस्करो यो हि क्षेमं तस्य पदे पदे ।।

ब्रह्मवैवर्त पुराण (1.12.7) में आता है कि ‘वही पण्डित, ज्ञानी, कल्याण का अधिकारी और पुण्यवान है जो गुरु की आज्ञा का पालन करता है । पग-पग पर उसका कल्याण होता है ।’

संत ज्ञानेश्वर जी ने कहाः “गुरुसेवा समस्त भाग्यों की जन्मभूमि है क्योंकि गुरुसेवा ही शोकग्रस्त जीव को ब्रह्मस्वरूप बनाती है ।”

श्री उड़िया बाबा जी कहते हैं- “आत्मविचार की उत्पत्ति गुरुसेवा से होती है । जैसे भृंगी का ध्यान करते-करते कीड़ा तद्रूप हो जाता है, इसी प्रकार गुरु की सेवा में तत्पर रहने से शिष्य में गुरु के गुण आ जाते हैं ।”

शास्त्रों में आता है कि ‘गया तीर्थ में श्राद्ध करने से पितरों की सद्गति होती है ।’

पर भगवान शिवजी बताते हैं कि ‘गुरुसेवा गया प्रोक्ता…’ गुरुदेव की सेवा ही तीर्थराज गया है ।

अतः नित्य गुरुसेवा करने वाले को गया तीर्थ का फल ऐसे ही प्राप्त हो जाता है । उसके पितरों की सद्गति में तो शंका ही नहीं है ।

स्वामी मुक्तानंद जी कहते हैं- “शास्त्रमार्ग पर चलने वाला तो कोई विरला ही तरता है परंतु गुरुमार्ग से जाने वाले सब के सब तर जाते हैं । जो भगवान को ढूँढने जाता है, वह भगवान को ढूँढता ही रहता है पर जो गुरु की सेवा करता है, उसको भगवान ढूँढने आते हैं कि वह कहाँ सेवा कर रहा है ।

सुतीक्ष्ण बड़ा गुरुभक्त था । गुरुभक्ति की महिमा को समझ के राम जी सुतीक्ष्ण के गुरु के साथ उसकी कुटी में उससे मिलने आये । राम जी को देख के उसे कुछ विस्मय नहीं हुआ । सद्गुरु उसके लिए भगवान राम से भी बहुत ज्यादा बड़े थे । उसने पहले सद्गुरु को ही नमन किया, फिर राम जी को । राम जी उसे सच्चा गुरुभक्त जान के बड़े प्रसन्न हो गये ।”

गुरुसेवा का वास्तविक अर्थ

श्री आनंदमयी माँ से किसी भक्त ने पूछाः “माँ ! गुरुसेवा क्या है ?” तब उन्होंने गुरुसेवा की परिभाषा स्पष्ट बताते हुए कहाः “बिना विचारे गुरु के आदेश का पालन करना ।”

गुरुभक्तियोग का सिद्धान्त है कि सद्गुरु जो आज्ञा करें वह कार्य बिना विचारे हृदयपूर्वक करना चाहिए और जिस कार्य की मना करें वह कदापि नहीं करना चाहिए । अपनी अल्प मति के तर्क-कुतर्क का शिकार नहीं होना चाहिए ।

पूज्य बापू जी के सत्संग में आता है कि “जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चार पुरुषार्थों को पाना चाहता है वह आत्मज्ञानी संत महापुरुष की सेवा करे ।

सेवा क्या है ? बाबा जी के पैर दबायें यह सेवा है ? क्या पंखा हाँकें, चँवर डुलायें ?… नहीं-नहीं….. अग्या सम न सुसाहिब सेवा । वे जैसी आज्ञा करें, संकेत करें उसके अनुसार करना यह उनकी सेवा है ।

तो उनकी आज्ञा क्या है ? उनकी आज्ञा यही है, उनका संकेत यही है कि आप तरो, औरों को तारो । आप जपो, औरों को जपाओ । आप दुःखमुक्त हो जाओ, दूसरों को दुःखमुक्त करो । आप बेईमानी-मुक्त हो जाओ, दूसरों को बेईमानी-मुक्त होने में सहायता करो । आप चिंतारहित बनो, दूसरों को चिंतारहित करने में सहायक बनो । ब्रह्मवेत्ता महापुरुष जैसे भी संतुष्ट और प्रसन्न होते हैं वह सब कार्य करने में आप सफल होते हैं तो आपने दुनिया में बड़े-से-बड़ा, ऊँचे-से-ऊँचा सौदा पक्का कर लिया । ब्रह्मवेत्ता के हृदय को प्रसन्न करने के लिए आपने थोड़ा समय लगा दिया तो आपने बहुत लाभ पा लिया, आपने बहुत कमाई कर ली अपनी, और ऐसी कमाई का मेरा निजी अनुभव है इसलिए आपसे कहता हूँ ।

दुनियादारों को रिझाते-रिझाते बाल सफेद हो जाते हैं और खोपड़ी घिस जाती है फिर भी लोगों को वह लाभ नहीं होता जितना लाभ एक ब्रह्मवेत्ता श्री लीलाशाह जी भगवान को रिझाने से मुझे हुआ है, यह मुझे ज्ञात है । श्री रामकृष्ण को रिझाने से नरेन्द्र को, तोतापुरी जी को रिझाने से रामकृष्ण को, गुरु नानक जी को रिझाने से अंगददेव जी को, विसोबा खेचर जी को रिझाने से नामदेव जी को, इनायत शाह को रिझाने से बुल्लेशाह जी को, संत रैदास जी को रिझाने से मीराबाई को, गुरु रामानंद जी को रिझाने से कबीर जी आदि को जो लाभ हुआ उसका वर्णन कैसे किया जाय !”

गुरुसेवा है आत्मसेवा, कैसे ?

स्वामी अखंडानंद जी सरस्वती कहते हैं– “एक बार हमारे सेवक ने पूछा कि ‘स्वामी जी ! हम आपके साथ रहे न रहें तो आपका काम चल जायेगा ?’

असल में सेवा अपने कल्याण के लिए की जाती है, गुरु के कल्याण के लिए नहीं । उस सेवा से जो विशेषता उत्पन्न होती है, वह गुरु में उत्पन्न नहीं होती है, वह शिष्य के अंतःकरण में उत्पन्न होती है । तो यदि शिष्य द्वारा अपने अंतःकरण की शुद्धि की दृष्टि से सेवा की जाती है तो वह उसका कल्याण करती है और यदि गुरु का उपकार करने के लिए सेवा की जाती है तो वह शिष्य के अंतःकरण में अभिमान उत्पन्न करती है । तो सेवा अभिमान उत्पन्न न करे – इसके लिए सेवा करने के बाद अपनी एक आलोचना (समीक्षा) करो । तुम्हारे मन में क्या आया कि ‘हमने आज बड़ी सेवा की !….’ तो बोलें कि ‘नहीं जी, हमसे कितनी कम सेवा हुई !’ माने अपनी सेवा में जो न्यूनता है, उस पर जब दृष्टि जायेगी तब तुम्हारा कल्याण होगा और अपनी सेवा की अधिकता पर जब दृष्टि जायेगी तब तुम्हारा अमंगल होगा ।”

स्वामी शिवानंद जी महाराज ने ‘गुरुभक्तियोग’ में लिखा है कि ‘जो शिष्य गुरु की सेवा करता है वह वास्तव में अपने-आपकी ही सेवा करता है ।’

पूरणपोडा, संत एकनाथ जी, संत ज्ञानेश्वर जी, सहजोबाई, तोटकाचार्य, संत कबीर जी, भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज, पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू तथा और भी नामी-अनामी जो सत्शिष्य हो गये, उनके जीवन पर दृष्टिपात करते हैं तो पता चलता है कि उन्हें गुरुसेवा से किस अवर्णनीय लाभ, आत्मलाभ की प्राप्ति हुई है ।

आत्मलाभ पाकर शिष्य कृतकृत्य हो जाते हैं और जिन गुरुदेव की कृपा से उन्हें परम पद की प्राप्ति हुई है उनके प्रति उनका हृदय कृतज्ञता से भरा रहता है ।

गुरुभक्त सुतीक्ष्ण को जब आत्मज्ञान हो गया तब वे अपने गुरुदेव श्री अगस्त्य ऋषि से कहते हं- “भगवन् ! आपके असीम अनुग्रह से मैं ज्ञातव्य तत्त्व का भलीभाँति ज्ञान प्राप्त कर उसमें स्थित हूँ । हे गुरुवर ! मैं कृतार्थ हो गया हूँ, आपके सम्मुख भूमि पर दंडवत् पड़ा हूँ । शिष्य गुरु के उपकार (ऋण) से किस प्रत्युपकार द्वारा उऋण हो सकते हैं ? किसी से भी नहीं हो सकते । इसलिए शिष्यों को चाहिए कि मन, वचन और कर्म से गुरु के सम्मुख आत्मसमर्पण कर दें । वही उनका गुरु के उपकार से निस्तार है । अन्य किसी भी कर्म से गुरु जी के उपकार से निस्तार नहीं हो सकता ।” (श्री योगवासिष्ठ महारामायण, निर्वाण प्रकरण, सर्ग 216, श्लोक 21-23)

हम सभी साधक-भक्तों का परम सौभाग्य है कि इस कलिकाल में भी हमें ब्रह्मवेत्ता महापुरुष पूज्य बापू जी सद्गुरुरूप में प्राप्त हुए हैं और उनके दैवी कार्यों में सहभागी होने का हमें सुअवसर मिल रहा है । इस स्वर्णिम अवसर का सदुपयोग करके हम गुरुदेव के ज्ञान से, गुरु-तत्त्व से एकाकारता का अनुभव कर लें यही गुरुसेवा का परम फल है और यही पूर्ण आत्मसेवा है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2019, पृष्ठ संख्या 2, 28, 29 अंक 316

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असली जीत किनकी होती है ? – पूज्य बापू जी


प्रेम के बिना  वास्तविक जीवन की उपलब्धि नहीं होती और वास्तविक जीवन जीने वाला व्यक्ति न भी चाहे तब भी उसके द्वारा हजारों-लाखों लोगों का शुभ हो जाता है, मंगल हो जाता है, कल्याण हो जाता है । जो निष्काम सेवा करता है वह स्वयं तो रसमय जीवन बिताता ही है, औरों के लिए भी कोई-न-कोई पदचिह्न छोड़ जाता है । जो स्वार्थी है वह स्वयं भी अशांत और परेशान रहता है एवं दूसरों के लिए भी अशांति और परेशानी पैदा कर देता है । जिसके जीवन में निष्काम कर्मयोग नहीं है उसका जीवन भी वास्तविक जीवन नहीं है वरन् खोखला जीवन है ।

किसी सूफी शायर ने कहा हैः

मोहब्बत के लिए कुछ खास दिल मख्सूस1 होते हैं ।

यह वह नगमा2 है जो हर साज पे गाया नहीं जाता ।।

अहं में ये वाजिब3 है कि खुदा को जुदा कर दे ।

मोहब्बत में ये लाजिम4 है कि खुद को फिदा कर दे ।।

1 चुने 2 गीत 3 जरूरी, संगत 4 अपेक्षित, अनिवार्य

चाहे कोई भी मार्ग हो – भक्तिमार्ग हो, चाहे कर्मयोग हो, ज्ञानमार्ग हो चाहे योगमार्ग हो, किसी में भी व्यक्तित्व के सर्जन  बात नहीं आती । कोई यह न सोचे कि ‘मैं आश्रम जाऊँ, सेवा करूँ और अपनी इज्जत बढ़ाऊँ ।’ इज्जत बढ़ाने  के लिए अथवा व्यक्तित्व को सजाने  लिए आश्रम नहीं है वरन् व्यक्तित्व का विसर्जन करने के लिए आश्रम है । व्यक्तित्व का, अहं का विसर्जन करते-करते जब असली इज्जत जागती है तो उसकी चिंता नहीं करनी पड़ती है । व्यवहार में असली इज्जत तो दब जाती है और अहं की इज्जत बढ़ते-बढ़ते वह ठोस होता है जाता है और पद-पद पर मान-अपमान की चोटें लगती रहती हैं ।

वे हारते-हारते जीत जाते हैं

दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं- एक तो वे होते हैं जो जीवनभर जीतते जाते हैं । जैसे हिटलर, सिकंदर, रावण, कंस आदि चतुराई से जीतते गये, जीतते गये, जीतते गये लेकिन अंत में उन्हें क्या हाथ लगा ? कई लोग अहं के पोषण की वासना में युक्ति से गरीबों का शोषण करते गये लेकिन अंत में उन्हें ऐसा झटका लगा कि वे बुरी तरह हारे एवं चौरासी लाख जन्मों तक हारने की खाई में जा गिरे ।

दूसरे वे होते हैं जो मंदिर में जाते हैं, सद्गुरु के पास जाते हैं । हारना शुरु किया कि ‘मैं कुछ नहीं…. भगवान का सेवक हूँ…. सदगुरु की कृपा है है….’ ऐसा करके हारते जाते हैं । हारते-हारते अपना अहं मिटाकर आत्मस्वरूप को पा लेते हैं, ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का अनुभव कर लेते हैं, ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं, ईश्वर से एकाकार हो जाते हैं । असली जीत तो प्रभु प्रेमियों की होती है, निष्काम सेवकों की होती है, भक्तों, योगियों की होती है । दिखावटी जीत स्वार्थियों की होती है ।

स्वार्थी व्यक्ति के पास धन-दौलत, आडम्बर हो तो आप गलती से उसको सुखी मान लेते हो । वह अपने को सुखी मानता है तो उसकी गलती है लेकिन आप उसे सुखी मानते हो तो आपकी दुगुनी गलती है । बाहरी सुख-सुविधा से सुख-दुःख का कोई विशेष सम्बंध नहीं होता । सुख और दुःख का संबंध तो अंदर की वृत्ति के साथ होता है ।

मनुष्य जितना-जितना स्वार्थी-अहंकारी होता है उतना-उतना वह भीतर से दुःखी होता है और जितना-जितना उसका जीवन निष्काम होता है, निर्दोष होता है उतना-उतना वह सुखी होता है । शबरी भीलन को कोई दुःखी नहीं कह सकता । शुकदेव जी महाराज केवल कौपीन पहनते हैं, वनों में विचरण करते हैं फिर भी हम उनको दुःखी नहीं कह सकते हैं । इसका मतलब यह नहीं कि मकान-दुकान छोड़कर झोंपड़पट्टी में रहना शुरु कर दो । नहीं…. झोंपड़पट्टी में भी सुख नहीं है और मकान में भी सुख नहीं है । सुख तो है प्रभु-प्रेम में, निःस्वार्थता में और निष्कामता में ।

सेवा से होती महान पद की प्राप्ति

प्रभु-प्रेम और सेवा में माँग नहीं होती, स्वार्थ नहीं होता । सेवा स्नेही से जुड़ी होती है । सेवा करने वाले को अपने अधिकार की चिंता नहीं होती है, अपनी सुविधाओं की चिंता नहीं होती है । अगर प्रेम है, सेवा है तो अधिकार और सुविधाएँ दासी होकर रहती हैं । जैसे कोई सेवक अपने सेठ की सेवा प्रेम से करता है तो सेठ की सेवा के लिए उसको सेठ के बँगले में रहने को मिलता है, सेठ की गाड़ी में घूमने को मिलता है ।

सेवा करने वाले में स्वार्थ नहीं होता तो ऐसे सेवक से प्रीतिपूर्वक सेवा होती है और जिसके प्रति प्रीति होती है उसका कार्य करने में आनंद आता है । प्रीति का, प्रेम का साकार रूप है सेवा ।

जो तत्परता, ईमानदारी एवं सच्चाई पूर्वक सेवा करता है उससे सेवा करते समय यदि कोई भूल हो भी जाती है तो वह भूल उसे दिखती है, समझ में आती है । दुबारा वही भूल न हो इसके प्रति वह सावधान हो जाता है । शरीर में रहते हुए भी वह मन, इन्द्रियों एवं शरीर से पार हो जाता है । फिर चाहे आरूणि हो, उपमन्यु हो या संदीपक हो या शबरी भीलन क्यों न हो, ये सब सेवा से ही महान पद को प्राप्त हुए ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2019, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 316

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