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रामायण तात्विक अर्थ


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पाप का फल ही दुख नहीं है । पुण्यमिश्रित फल भी विघ्न है । ऐसा कौन सा इंसान है जिसको  संसार में विघ्न नहीं है।  तो भगवान महा पापी होंगे इसलिए उनको दुख आया होगा,  14 साल वन में गए।  यदि पाप का फल ही दुख होता तो राज्यगद्दी की तैयारिया हो रही है और तुरिया बज रही है नगाड़े गुनगुना रहे है और राज्याभिषेक की जगह पर अब कैकेयी का मंथरा  की चाबी  चली और रामजी को बोलते है वनवास । एक तरफ तो राज्याभिषेक की तैयारी और दूसरी तरफ वनवास का सुनकर जिनके चेहरे पर जरा करचली नहीं पड़ती,  जिनके चित्त में जरा क्षोभ नहीं होता, राज्याभिषेक को सुनकर जिनके चित्त में हर्ष नहीं होता और वनवास सुनकर जिनके चित्त में शोक नहीं होता,  ऐसे जो अपने आप मे  ठहरे है वे ही तो रामस्वरूप है ।  ऐसे राम को हजार हजार प्रणाम । ॐ…  ॐ….  ॐ…  ॐ…  ॐ…  ।

दस इन्द्रियों के बीच रमण  करने वाला दशरथ (जीव) कहता है कि अब इस हृदय गादी पर जीव का राज्य नहीं, राम का राज्य होना चाहिए और गुरु बोलते है कि हाँ ! करो । गुरु जब राम राज्य का हुंकारा भरता है तो दशरथ को खुशी होती है लेकिन राम राज्य होने के पहले दशरथ, कैकेयी की मुलाक़ात मे आ जाता है । दशरथ की तीन  रानिया बताई, कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी । सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण । जब  सत्वगुण में से,  रजो गुण मे से हटकर दशरथ (जीव),  तमोगुण में, जाता है, रजोगुण में, तमोगुण में, फँसता है, तमस मिश्रित रजस में फँसता है, कैकेयी अर्थात कीर्ति में, वासना में फँसता है तो रामराज्य होने के बदले में  राम वनवास हो जाता है।  राम का राज्य नहीं,  राम वनवास ! ओर सब है राम ही जा रहे है । फिर रामायण के आध्यात्मिक कथा का अर्थ लगाने वाले महापुरुष लोग, आध्यात्मिक रामायण का अर्थ बताने वाले संत लोग कहते है, दशरथ छटपटाता है । राम वनवास होता है तो दशरथ भी चैन से नहीं जी सकता है और समाज में देखो !  कोई दशरथ चैन से नहीं है, सब बेचैन है । ज्यादा धन वाला-कम धन वाला, ज्यादा पढ़ा- कम पढ़ा,  अधिक मित्रों वाला- कम मित्रोंवाला, मोटा अथवा पतला, नेता अथवा जनता,  देखो !  सब बेचैन है ।  क्यों ? कि  राम वनवास है । कथा का दूसरा पॉइंट यह बता रहा है कि रामजी के साथ सीताजी थी । लक्ष्मण जी थे । राम माने ब्रह्म, सीता माने वृत्ति । राधा माने धारा, श्याम माने ब्रह्म । राधेश्याम….  सीताराम….. ।  

सीता माने वृत्ति, राम के करीब है लेकिन सीता की नजर स्वर्ण के मृग पर जाती है और राम को बोलती है ला दो । जब सोने के मृग पर तुम्हारी सीता जाती है तो उसे राम का वियोग हो जाता है । सोने के मृग पर, धन दौलत पर जब हमारा चित्त जाता है तो अंदर आत्माराम से हम विमुख हो जाते है, फिर लंका मिलती है, स्वर्ण मिलता है, लेकिन शांति नहीं मिलती । उसी वृत्ति को यदि राम की मुलाक़ात करानी हो तो बीच मे हनुमानजी चाहिए । सौ  वर्ष आयुष वाला जीवन, उस जीवन को परमात्मा के लिए छलांग मार दे,  उस जीवन के भोग विलास से छ्लांग मार दे ।  जामवंत को बुलाया, उसको बुलाया, उसको बुलाया । कोई बोलता है एक  योजन कूदूंगा, कोई बोलता है दो योजन । हनुमानजी सौ योजन समुद्र कूद गए । माप करेंगे तो भारत के किनारे से लंका सौ योजन नहीं है लेकिन शास्त्र की कुछ गूढ़ बाते है । जीवन जो सौ वर्ष वाला है उस जीवन के रहस्य को पाने के लिए, छलांग मारने का अभ्यास और वैराग्य हो । हनुमानजी को अभ्यास और वैराग्य का प्रतीक कहा , जो  सीताजी को रामजी से मिला देगा । रामजी उत्तर भारत मे हुए और रावण दक्षिण  की तरफ । उत्तर ऊँचाई है और दक्षिण नीचाई है । ऐसे ही हमारी वृत्तियाँ शरीर के नीचे हिस्से मे रहती है । और जब हम काम से घिर  जाते  है तो हमारी आँख की पुतली नीचे आ जाती है । जब हम क्रोध से भर जाते है तो हमारी सीता नीचे आ जाती है और सीता जब रावण के करीब  होती है तो बेचैन होती है, ज्यादा समय  रावण के वहाँ ठहर नहीं सकती । काम के करीब हमारी सीता ज्यादा समय ठहर नहीं सकती । चित्त मे काम आ जाता है, बेचैनी आ जाती है और लेकिन  चित्त में राम आ जाता है तो आनंद आनंद आ जाता है । रावण की अशोक वाटिका मे सीताजी नजर कैद है लेकिन सीता में यदि निष्ठा है तो रावण अपना मनमाना कुछ कर नहीं सकता है। ऐसे ही हमारी वृत्ति मे यदि दृढ़ता है राम के प्रति पूर्ण आदर है तो काम हमे नचा नहीं सकता । उस दृढ़ता के लिए साधन और भजन है।  चित्तवृति को दृढ़ बनाने के लिए, सीता के संकल्प को मजबूत बनाने के लिए तप चाहिए ,जप चाहिए, स्वाध्याय चाहिए, सुमिरन चाहिए ।  

जब कामनाएँ सताने लगे, नरसिंह भगवान ने जैसे कामना के पुतले को फाड़ दिया ऐसे ही काम को चीर दे, नरसिंह अवतार का चिंतन करने से फायदा होता है । इस कथा की आध्यात्मिक शैली को जानने वाले संतों का ये भी मानना है कि रावण मर नहीं रहा था और विभीषण से पूछा कि कैसे मरेगा ? बोले डुंटी  (नाभि ) में आपका बाण जब तक नहीं लगेगा तब तक वो रावण नहीं मरेगा अर्थात कामनाए नाभि केंद्र मे रहती है । योगी जब कुण्डलिनि योग करते है तो मूलाधार चक्र मे जंपिंग होता है और फिर स्वाधीस्थान चक्र मे खिंचाव होता है, पेट अंदर आता है बाहर जाता है, साधक लोग, तुम लोगो को भी अनुभव है । वो जन्म जन्मांतरों को कामनाए है, वासनाए है, उनको धकेलने के लिए हमारी चित्तवृत्ति हमारी जो सीता माता है, उस काम को धकेलने के लिए डांटती फटकरती है और जब डांट फटकार चालू होती है तो साधक के  शरीर मे क्रियाए होने लगती है। देखो समन्वय हो रहा है कथा का और कुण्डलिनि योग का । कभी कभी तो रावण का प्रभाव दिखता है और कभी कभी सीताजी का प्रभाव दिखता है । दोनों की लड़ाई चल रही है है । कभी कभी तो साधक के जीवन मे कामनाओं का प्रभाव दिखता है और कभी कभी तो सद्विचारों का प्रभाव दिखता है। अयोध्या को कहा कि नौ द्वार थे  । ऐसे ही तुम्हारा शरीर रूपी अयोध्या है, इसमे भी नौ द्वार है और नौ द्वार में जीने वाला ये जीव जो दशरथ है, राम को वनवास कर दिया कैकेयी के कारण, छटपटा के प्राण त्याग कर देता है । राम राम कही राम  हाय राम …. तव विरह में तन तजी राज=हू गयो सुरधाम । जब सीताजी को राम के करीब लाना है तो बंदर भी साथ देते है । रीछ भी साथ देते है । और तो क्या भी खिचकुलिया भी साथ देने लगी कण कण उठा कर रेती का और समुद्र मे डालने लगी तुम यदि रामजी और सीता की मुलाक़ात के रास्ते चलते हो, तुम्हारी वृत्ति को परमात्मा की ओर लगाते हो तो पृकृति और वातावरण तुम्हें अनुकूलता भी देता है, सहयोग भी देता है और तुम  यदि भोग कि तरफ होते हो तो वातावरण तुम्हें नोच भी लेता है ।

अयोध्या सुनी सुनी थी तब तक, जब तक राम नहीं आए जब राम आ रहे है, ऐसे खबर सुनी अयोध्या वासियो ने तो नगर को सजाया और नगरवासियों ने साफ सफाई की । राम आने को है, राम आने को होते है तो साफ सफाई पहले हो जाती है ऐसे ही तुम्हारा चित्त रूपी नगर अथवा देह रूपी नगर, जब परमात्म साक्षात्कार होता हो तो कल्मष तुम्हारे पहले कट जाते है। तुम्हारे पाप तुम्हारा मल, विक्षेप हट जाता है। तुम स्वच्छ पवित्र हो जाते हो  और राम जब नगर मे प्रवेश करते है वो दिन दीवाली का दिन माना जाता है। लौकिक दीवाली व्यापारी पूजते है लेकिन साधक की दिवाली तब है जब हृदया मे छुपे हुए राम जो है न,  काम के करीब गए है सीता को छुड़ाने के लिए,  वो राम जब अपने सिंहासन पर आ जाए और अपने स्वरूप मे जाग्रत हो जाए उस दिन साधक की दिवाली। बड़ा दिन तो वह है कि बड़े मे बड़ा जब परमात्वतत्व का ज्ञान हो  उससे बड़ा दिन कोई नहीं । लब पर किसी का नाम लूँ तो तेरा नाम आए । ॐ …. ॐ  

सर्व सद्गुण सागर श्रीराम जी – पूज्य बापू जी


 

(श्री रामनवमीः 15 अप्रैल 2016)

श्रीरामचन्द्र जी परम ज्ञान में नित्य रमण करते थे। ऐसा ज्ञान जिनको उपलब्ध हो जाता है, वे आदर्श पुरुष हो जाते हैं। मित्र हो तो श्रीराम जैसा हो। उन्होंने सुग्रीव से मैत्री की और उसे किष्किंधा का राज्य दे दिया और लंका का राज्य विभीषण को दे दिया। कष्ट आप सहें और यश और भोग सामने वाले को दें, यह सिद्धान्त श्रीरामचन्द्रजी जानते हैं।

शत्रु हो तो रामजी जैसा हो। रावण जब वीरगति को प्राप्त हुआ तो श्रीराम कहते हैं- ‘हे विभीषण ! जाओ, पंडित, बुद्धिमान व वीर रावण की अग्नि संस्कार विधि सम्पन्न करो।”

विभीषणः “ऐसे पापी और दुराचारी का मैं अग्नि-संस्कार नहीं करता।”

‘रावण का अंतःकरण गया तो बस, मृत्यु हुई तो वैरभाव भूल जाना चाहिए। अभी जैसे बड़े भैया का, श्रेष्ठ राजा का राजोचित अग्नि-संस्कार किया जाता है ऐसे करो।”

बुद्धिमान महिलाएँ चाहती हैं कि ‘पति हो तो राम जी हो’ और प्रजा चाहती है, ‘राजा हो तो राम जी जैसा हो।’ पिता चाहते हैं कि ‘मेरा पुत्र हो तो राम जी के गुणों से सम्पन्न हो’ और भाई चाहते हैं कि ‘मेरा भैया हो तो राम जी जैसा हो।’ रामचन्द्र जी त्याग करने में आगे और भोग भोगने में पीछे। तुमने कभी सुना कि राम, लक्ष्मण, भरत शत्रुघ्न में, भाई-भाई में झगड़ा हुआ ? नहीं सुना।

श्रीराम जी का चित्त सर्वगुणसम्पन्न है। कोई भी परिस्थिति उनको द्वन्द्व या मोह में खींच नहीं सकती। वे द्वन्द्वातीत, गुणातीत, कालातीत स्वरूप में विचरण करते हैं।

भगवान राम जी में धैर्य ऐसा जैसे पृथ्वी का धैर्य और उदारता ऐसी क जैसे कुबेर भंडारी देने बैठे तो फिर लेने वाले को कही माँगना न पड़े, ऐसे राम जी उदार ! पैसा मिलना बड़ी बात नहीं है लेकिन पैसे का सदुपयोग करने की उदारता मिलना किसी-किसी के भाग्य में होती है। जितना-जितना तुम देते हो, उतना-उतना बंधन कम होता है, उन-उन वस्तुओं से, झंझटों से तुम मुक्त होते हो। देने वाला तो कलियुग में छूट जाता है लेकिन लेने वाला बँध जाता है। लेने वाला अगर सदुपयोग करता है तो ठीक है नहीं तो लेने वाले के ऊपर मुसीबतें पड़ती हैं।

मेरे को जो लोग प्रसाद या कुछ और देते हैं तो उस समय मेरे को बोझ लगता है। जब मैं प्रसाद बाँटता हूँ या जो भी कुछ चीज आती है, उसे किसी सत्कर्म में दोनों हाथों से लुटाता हूँ तो मेरे हृदय में आनंद, औदार्य का सुख महसूस होता है।

इस देश ने कृष्ण के उपदेश को अगर माना होता तो इस देश का नक्शा कुछ और होता। राम जी के आचरण की शरण ली होती तो इस देश में कई राम दिखते। श्रीरामचन्द्रजी का श्वासोच्छ्वास समाज के हित में खर्च होता था। उनका उपास्य देव आकाश-पाताल में दूसरा कोई नहीं था, उनका उपास्य देव जनता जनार्दन थी। ‘जनता कैसे सुखी रहे, संयमी रहे, जनता को सच्चरित्रता, सत्शिक्षण और सद्ज्ञान कैसे मिले ?’ ऐसा उनका प्रयत्न होता था।

श्रीरामचन्द्रजी बाल्यकाल में गुरु आश्रम में रहते हैं तो गुरुभाइयों के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं कि हर गुरुभाई महसूस करता है कि ‘राम जी हमारे हैं।’ श्रीराम जी का ऐसा लचीला स्वभाव है कि दूसरे के अनुकूल हो जाने की कला राम जी जानते हैं। कोई रामचन्द्र जी के आगे बात करता है तो वे उसकी बात तब तक सुनते रहेंगे, जब तक किसी की निंदा नहीं होती अथवा बोलने वाले के अहित की बात नहीं है और फिर उसकी बात बंद कराने के लिए रामजी सत्ता या बल का उपयोग नहीं करते हैं, विनम्रता और युक्ति का उपयोग करते हैं, उसकी बात को घुमा देते हैं। निंदा सुनने में रामचन्द्रजी का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाता, वे अपने समय का दुरुपयोग नहीं करते थे।

राम जी जब बोलते हैं तो सारगर्भित, सांत्वनाप्रद, मधुर, सत्य, प्रसंगोचित और सामने वाले को मान देने वाली वाणी बोलते हैं। श्रीराम जी में एक ऐसा अदभुत गुण है कि जिसको पूरे देश को धारण करना चाहिए। वह गुण है कि वे बोलकर मुकरते नहीं थे।

रघुकुल रीति सदा चलि आई।

प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई।। (श्रीरामचरित. अयो.कां. 27.2)

वचन के पक्के ! किसी को समय दो या वचन दो तो जरूर पूरा करो।

आज की राजनीति की इतनी दुर्दशा क्यों है ? क्योंकि राजनेता वचन का कोई ध्यान नहीं रखते। परहित का कोई पक्का ध्यान नहीं रखते इसलिए बेचारे राजनेताओं को प्रजा वह मान नहीं दे सकती जो पहले राजाओं को मिलता था। जितना-जितना आदमी धर्म के नियमों को पालता है, उतना-उतना वह राजकाज में, समाज में, कुटुम्ब-परिवार में, लोगों में और लोकेश्वर की दुनिया में उन्नत होता है।

उपदेशक हो तो राम जी जैसा हो और शिष्य हो तो भी राम जी जैसा हो। गुरु वसिष्ठ जी जब बोलते तो राम चन्द्र जी एकतान होकर सुनते हैं और सत्संग सुनते-सुनते सत्संग में समझने जैसे (गहन ज्ञानपूर्ण) जो बिंदु होते, उन्हें लिख लेते थे। रात्रि को शयन करते समय बीच में जागते हैं और मनन करते हैं कि ‘गुरु महाराज ने कहा कि जगत भावनामात्र है। तो भावना कहाँ से आती है ?’ समझ में जो आता है वह तो राम जी अपना बना लेते लेकिन जिसको समझना और जरूरी होता उसके लिए राम जी प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में जागकर उन प्रश्नों का मनन करते थे। और मनन करते-करते उसका रहस्य समझ जाते थे तथा कभी-कभी प्रजाजनों का ज्ञान बढ़ाने के लिए गुरु वसिष्ठ जी से ऐसे सुंदर प्रश्न करते कि दुनिया जानती है कि ‘योगवासिष्ठ महारामायण’ में कितना ज्ञान भर दिया राम जी ने। ऐसे-ऐसे प्रश्न किये राम जी ने कि आज का जिज्ञासु सही मार्गदर्शन पाकर मुक्ति का अनुभव कर सकता है ‘श्री योगवासिष्ठ महारामायण के सहारे।

कोई आदमी बढ़िया राज्य करता है तो श्री रामचन्द्र जी के राज्य की याद आ जाती है कि ‘अरे !…. अब तो रामराज्य जैसा हो रहा है।’ कोई फक्कड़ संत हैं और विरक्त हैं, बोले, ‘ये महात्मा तो रमते राम हैं।’ वहाँ राम जी का आदर्श रख देना पड़ता है। दुनिया से लेना-देना करके जिसकी चेतना पूरी हो गयी, अंतिम समय उस मुर्दे को भी सुनाया जाता है कि रामनाम संग है, सत्नाम संग है। राम बोलो भाई राम….. इसके  राम रम गये।’ चैतन्य राम के सिवाय शरीर की कोई कीमत नहीं। जैसे अवधपति राम के सिवाय इस नव-द्वारवाली अयोध्या में भी तो कुछ नहीं बचता है !

कोई आदमी गलत काम करता है, ठगी करता है, धर्म के पैसे खा जाता है तो बोले, ‘मुख में राम, बगल में छुरी।’ ऐसा करके भी राम जी की स्मृति इस भारतीय संस्कृति ने व्यवहार में रख दी है।

बोलेः ‘धंधे का क्या हाल है ?’

बोलेः राम जी की कृपा है, अर्थात् सब ठीक है, चित्त में कोई अशांति नहीं। भीतर में  हलचल नहीं है, द्वन्द्व, मोह नहीं है।

यह सत्संग तुम्हें याद दिलाता है कि मरते समय भी, जो रोम-रोम में रम रहा है  उस राम का सुमिरन हो। गुरुमंत्र हो, रामनाम का सुमिरन हो, जिसकी जो आदतें होती है बीमारी के समय या मरते समय भी उसके मुँह से वही निकलता है।

श्री राम चन्द्रजी प्रेम व पवित्रता की मूर्ति थे, प्रसन्नता के पुंज थे ऐसे प्रभु  राम का प्राकट्य दिन राम नवमी की आप सब को बधाई हो !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2016, पृष्ठ संख्या 24,25 अंक 279

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राम तत्त्व की महिमा


पूज्यपाद संत श्री आसाराम जी बापू

एक दिन पार्वती जी ने महादेव जी से पूछाः “आप हरदम क्या जपते रहते हैं ?”

उत्तर में महादेव जी विष्णुसहस्रनाम कह गये।

अन्त में पार्वती जी ने कहाः “ये तो आपने हजार नाम कह दिये। इतना सारा जपना तो सामान्य मनुष्य के लिए असंभव है। कोई एक नाम कहिए जो सहस्रों नामों के बराबर हो और उनके स्थान में जपा जाये।”

तब महादेव जी बोलेः

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।

सहस्रनामतत्तुल्यं रामनाम वरानने।।

ʹहे सुमखि ! रामनाम विष्णुसहस्रनाम के तुल्य है। मैं सर्वदा ʹराम….. राम….. राम…. ʹ इस प्रकार मनोरम राम-नाम में ही रमण करता हूँ।ʹ

ऐसी बात नहीं है कि अवधपुरी में राजा दशरथ के घर श्रीराम अवतरित हुए तब से ही लोग श्रीराम का भजन करते हैं। नहीं नहीं। दिलिप राजा, रघु राजा एवं दशरथ के पिता अज राजा भी श्रीराम का ही भजन करते थे क्योंकि श्रीराम केवल दशरथ के पुत्र ही नहीं हैं  बल्कि रोम-रोम में जो चेतना व्याप रही है, रोम-रोम में जो रम रहा है उसका ही नाम है राम।

रमन्ते योगीनः यस्मिन् स रामः।

जिसमें योगी लोगों का मन रमण करता है उसी को कहते हैं राम।

किसी महात्मा ने कहाः

एक राम घट-घट में बोले।

एक राम दशरथ घऱ डोले।

एक राम का सकल पसारा।

एक राम है सबसे न्यारा।।

तब शिष्य ने कहाः “गुरु जी ! आपके कथऩानुसार  चार राम हुए। ऐसा कैसे ?”

गुरुः “थोड़ी साधना कर, जप-ध्यानादि कर, फिर समझ में आ जायेगा।”

साधना करके शिष्य की बुद्धि सूक्ष्म हुई, तब गुरु ने कहाः

जीव राम घट-घट में बोले।

ईश राम दशरथ घर डोले।

बिंदु राम का सकल पसारा।

ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।

शिष्य बोलाः “गुरुदेव ! जीव, ईश, बिंदु और ब्रह्म इस प्रकार भी तो राम चार ही हुए न ?”

गुरु ने देखा कि साधनादि करके इसकी मति थोड़ी सूक्ष्म तो हुई है किन्तु अभी तक चार राम दिख रहे हैं। गुरु ने करूणा करके समझाया किः “वत्स ! देख। घड़े में आया हुआ आकाश, मठ में आया हुआ आकाश, मेघ में आया हुआ आकाश और उससे अलग व्यापक आकाश, ये चार दिखते हैं। अगर तीनों उपाधियों को, घट, मठ और मेघ को हटा दो तो चारों में आकाश तो एक का एक है। इसी प्रकार….

वही राम घट-घट में बोले।

वही राम दशरथ घर डोले।

उसी राम का सकल पसारा।

वही राम है सबसे न्यारा।।

रोम-रोम में रमने वाला चैतन्य तत्त्व वही का वही है और उसी का नाम है चैतन्य राम।”

वे ही श्रीराम जिस दिन दशरथ-कौशल्या के घर साकार रूप में अवतरित हुए उसी दिन को श्रीरामनवमी के पावनवर्ष के रूप में मनाते हैं भारतवासी।

कैसे हैं वे श्रीराम ? भगवान श्रीराम नित्य कैवल्य ज्ञान में विचरण करते थे। वे आदर्श पुत्र, आदर्श शिष्य, आदर्श राजा, आदर्श पति, आदर्श भ्राता, आदर्श मित्र एवं आदर्श शत्रु थे। आदर्श शत्रु ? हाँ, आदर्श शत्रु थे भी तो शत्रु भी उऩकी प्रशंसा किये बिना न रह सके।

ग्रंथों में कथा आती है कि लक्षमण के द्वारा मारे गये मेघनाद की दक्षिण भुजा सती सुलोचना के समीप जा गिरी और पतिव्रता का आदेश पाकर इस भुजा ने सारा वृत्तान्त लिखकर बता दिया। सुलोचना ने निश्चय किया कि मुझे अब सती हो जाना चाहिए। किन्तु पति का शव  राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती ? जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा तब रावण ने उत्तर दियाः “देवि ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। जिस समाज में बालब्रह्मचारी श्रीहनुमान, परम जितेन्द्रिय श्रीलक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।”

जब रावण सुलोचना से ये बातें कह रहा था उस समय कुछ मंत्री भी उसके पास बैठे थे। उन लोगों ने कहाः “जिनकी पत्नी को आपने बंदिनी बनाकर अशोक  वाटिका में रख छोड़ा है, उनके पास आपकी बहू का जाना कहाँ तक उचित है ? यदि यह गयी तो क्या सुरक्षित वापस लौट सकेगी ?”

यह सुनकर रावण बोलाः “मंत्रियो ! लगता है तुम्हारी बुद्धि विनष्ट हो गयी है। अरे ! यह तो रावण का काम है जो दूसरे की स्त्री को अपने घर में बंदिनी बनाकर रख सकता है, राम का नहीं।”

धन्य है श्रीराम का दिव्य चरित्र, जिसका विश्वास शत्रु भी करता है और प्रशंसा करते थकता नहीं ! प्रभु श्रीराम का पावन चरित्र दिव्य होते हुए इतना सहज-सरल है कि मनुष्य चाहे तो अपने जीवन में भी उसका अनुकरण कर सकता है।

श्रीरामनवमी के पावन पर्व पर उन्हीं पूर्णाभिराम श्रीराम के दिव्य गुणों को अपने जीवन में अपनाकर, श्रीरामतत्त्व की ओर प्रयाण करने के पथ पर अग्रसर हों, यही अभ्यर्थना… यही शुभकामना…..

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 1997, पृष्ठ संख्या 5,6 अंक 52

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