सफ़ेद झूठ का पर्दाफाश !
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भारत की धरती सदा ही इस बात की साक्षी रही है और रहेगी कि यहाँ कभी भी महापुरुषों का अकाल नहीं रहा। वर्तमान भारत की एक देदीप्यमान संपदा 'संत श्री आसारामजी बापू' पिछले 45 वर्षों से पूरे देश में घूम-घूमकर आध्यात्मिक जागृति पैदा कर रहे हैं। उनका जीवन करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणादायक रहा है। उनकी प्रेरणा से पूरे भारत में 1200 योग वेदान्त सेवा समितियाँ, 300 आश्रम, 18000 बाल संस्कार केन्द्र, गौ-सेवा केन्द्र, नशामुक्ति अभियान, जेल सुधार अभियान, आदिवासी निराश्रित आधार योजना (अन्न, वस्त्र वितरण कार्यक्रम) निर्बाध रूप से चल रहे हैं। आज देश-विदेश में बापूजी के शिष्यों की संख्या करोड़ों में है और उनके श्रोताओं की संख्या उससे भी कई गुणा अधिक। भारत की गुरु-शिष्य परम्परा के पुनर्स्थापन में भी उनका मुख्य योगदान रहा है। ऐसे महापुरुषों की गरिमा, ऊँचाई से कुछ लोगों का दुःखी होना कोई नई बात नहीं है। महापुरुषों पर आरोप कोई नयी बात नहीं है।
परम पूज्य बापू जी के बारे में झूठा प्रचार किया जा रहा है कि वे पूर्वजीवन में एक साइकिल मेकैनिक थे।
कुप्रचारों को झूठ को प्रसारित करने का कोई अधिकार नहीं है। सन् 1941 में जन्में पूज्य बापू जी का परिवार भारत विभाजन (सन् 1947) के बाद बेराणी गाँव (सिंध प्रांत) से अमदावाद आकर बस गया। अपनी छोटी उम्र में ही उनकी शिक्षा छूट गयी और केवल तीसरी कक्षा तक ही मणिनगर के स्कूल में पढ़ सके। कुछ समय तक उन्होंने अपने बड़े भाई जेठामल के साथ गुड़-शक्कर की दुकान पर काम किया और कुछ समय अपने रिश्तेदारों के यहाँ भी काम किया परंतु उनका मन ईश्वर, सत्य की खोज में खोया रहा। उनकी यात्रा माउंट आबू की नल गुफा, केदारनाथ, हरिद्वार, वृन्दावनधाम से होती हुई नैनीताल के जंगलों में श्री लीलाशाह जी के चरणों में जाकर पूरी हुई। सिद्धपुर में उनकी साधना की सिद्धियाँ प्रकाश में आने लगीं और लोग उनको मानने लगे। 22 वर्ष की आयु (सन् 1962) में उन्हें ईश्वर की प्राप्ति हुई, उस समय वे अपने सदगुरु के श्री चरणों में मुंबई से कुछ दूर वज्रेश्वरी में थे। अपने गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए उन्होंने सत्संग-प्रवचन के द्वारा लोगों को ईश्वरोन्मुख करने तथा उनके तन को तन्दुरुस्त, मन को प्रसन्न एवं उनकी बुद्धि में बुद्धिदाता का प्रकाश प्रकट करने को अपने जीवन का ध्येय बना लिया।
अज्ञानी, मूढ़ लोगों के द्वारा संतों की आपस में तुलना की जाती है। वे तुलना करते हैं कि किस संत के कितने आश्रम हैं, शिष्य हैं। आर्थिक तुलना करना, आर्थिक आकलन करना, उनकी आय के स्रोतों को ढूँढना निरी मूर्खता ही है।
यदि धर्मगुरुओं की सम्पत्ति की तुलना करनी हो तो सभी धर्मों के गुरुओं की तुलना क्यों नहीं करते ?
धार्मिक ट्रस्टों के पास संपत्ति न होगी तो उनके दैवी कार्यों के आवश्यक धन क्या उनको सरकार या आलोचक देंगे?
संसार से विरक्त ऐसे महापुरुषों के लिए, जिनके लिए सारा संसार ही उनका अपना है, इस प्रकार का आकलन कहाँ तक उचित है? जब-जब संत-महापुरुष, ईश्वर के अवतार इस भूमंडल पर अवतरित हुए हैं, उनकी मानव कल्याणार्थ वाणी को, उनके प्रवचनों को उनके अनुयायियों ने लीपिबद्ध किया है। पूज्य बापू जी की वाणी को भी करोड़ों लोगों तक पहुँचाने के लिए 'ऋषि प्रसाद', 'लोक कल्याण सेतु', सी.डी. एवं अन्य आध्यात्मिक साहित्य द्वारा, जिनकी कीमत बहुत कम होती है ताकि आम आदमी भी उसे ले सके, साधकों द्वारा संकलित किया जाता है। 'ऋषि प्रसाद' एवं 'लोक कल्याण सेतु' पूरी तरह आध्यात्मिक सत्साहित्य है, जिसमें मानवमात्र के कल्याण हेतु स्वस्थ, सुखी, सम्मानित जीवन एवं परमात्मप्राप्ति की साधना का भी ज्ञान होता है। इसमें भारत के महान ग्रन्थों – गीता, भागवत, वेदों एवं उपनिषदों के वचनों का समावेश होता है। यह किसी भी तरह व्यवसायिक नहीं है, इसमें कोई विज्ञापन या सहातयार्थ राशी नहीं होती। क्या यह मानवता की सेवा नहीं है? इस प्रकार के दैवी कार्य को बापू जी की सम्पत्ति एवं आय का स्रोत बताकर देश की धर्मप्रिय जनता का मखौल उड़ाना कहाँ तक उचित है?
अगर 'ऋषि प्रसाद', 'लोक कल्याण सेतु' के 16 लाख पाठक हैं तो इसमें किसी को क्या आपत्ति होनी चाहिए? और 5 रुपये की मासिकवाली 'ऋषि-प्रसाद' एवं 2 रुपये के 'लोक कल्याण सेतु' से 7.50 करोड़ की वार्षिक आय किस प्रकार हो सकती है?
वास्तव में समाज में नैतिक मूल्यों को स्थापित करना बहुत कठिन है और विरोध करना बहुत ही सरल, परंतु विरोध करना क्या चतुराई है? संत के दैवी कार्य की प्रशंसा करने की बजाये बेसिर-पैर की बातें करने वालों को भगवान सदबुद्धि दें।
आश्रम में बनने वाली आयुर्वैदिक दवाइयाँ, धूप अगरबत्ती, मुलतानी मिट्टीवाला साबुन आदि बहुत ही कम मूल्य पर साधक परिवार को उपलब्ध कराये जाते हैं, उनका कहीँ भी बाजार में विक्रय नहीं होता है। भारतीय संस्कृति की विरोधी पत्रिकाओं द्वारा यह भ्रम फैलाना और साधकों की श्रद्धा को तोड़ने का घिनौना कृत्य करना कि इससे बापूजी को करोड़ों की आमदनी होती है, पत्रकारिता की स्वतंत्रता का दुरुपयोग है जो कि रुकना चाहिए। इस प्रकार की पत्रिकाओं द्वारा यह भी फैलाना कि बापू जी को करोड़ों रुपये सत्संगों के आयोजनों एवं गुरुपूर्णिमा उत्सव से मिलते हैं, गुरु-शिष्य परम्परा एवं इसके महान पर्व गुरुपूर्णिमा का भी घोर अपमान है। पूज्य बापू जी देश के करोड़ों लोगों में भारतीय अध्यात्म का खजाना बाँट रहे हैं। उन्होंने कभी आध्यात्मिक योग, ज्ञान या शक्तिपात की कोई फीस नहीं रखी। फिर भी उनकी आय के बारे में सोचना महामूढ़ता का लक्षण है। वास्तव में पाश्चात्य बाजार संस्कृति की विकृत मानसिकता को भारत की धर्मप्रिय जनता कभी माफ नहीं करेगी।
3 जुलाई को रात के 8.30 बजे अमदावाद गुरुकुल से दो बच्चे भाग निकले और उनके साथ रहने वाले बच्चों से सुना गया कि 'वे कह रहे थेः हमें कार में माता-पिता लेने आने वाले हैं, हम घूमने जायेंगे। उसके एक-दो दिन पहले वे यह भी कह रहे थेः हम रथयात्रा देखने जाने वाले हैं।' तो गुरुकुल व्यवस्थापकों ने इधर-उधर खोजा नहीं मिले। 8.30 को भागे, 9.00 बजे पता चला और 9.15-9.30 बजे तक उनके परिजनों को पता कर दिया।
व्यवस्थापकों की सच्चाई पर, सज्जनता पर धन्यवाद देने के बदले उन्हें बदनाम किया जा रहा है। अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए मनगढ़ंत घिनौनी कल्पनाएँ, कहानियाँ बनाकर आश्रम को बदनाम करने की साजिश करना, अलग-अलग तरीकों से वाघेला परिवार को बहकाना, प्रजा के हितैषी संत और प्रजा के बीच खाई खोदना – इससे समाज कमजोर होगा, देश कमजोर होगा। साजिशकर्ताओं को यह पता नहीं कि इससे मानवता का, सज्जनता का कितना ह्रास हो रहा है। लाखों-लाखों, करोड़ों भक्तों की भावनाओं को ठेस पहुँच रही है।
महापुरुषों के जीवन में अनेक नाट्यमय मोड़ आते हैं। उनके हजारों अनुयायी बनते हैं और अपने-अपने कर्मों की गति से उन्हें छोड़ भी जाते हैं तो क्या इससे उन महापुरुषों का कुछ बिगड़ जाता है? बापू जी के भी अनेक शिष्य अपनी मति के अनुरूप आश्रम में आये और चले भी गये, अपने कर्मों से स्कूलों-कालेजों से भी कई विद्यार्थी अभ्यास छोड़कर चले जाते हैं। महापुरुष सदा ही मंगल चाहते हैं, वे किसी का बुरा नहीं चाहते। ऐसे आने और जाने वाले लोग महापुरुषों को पहचानने में चूक जाते हैं और जीवन के अंत में उनको पछताना पड़ता है। महापुरुषों से दूर जा वे उन पर अनेकों प्रकार के लाँछन, तोहमत लगाते हैं तो क्या महावीर स्वामी, महात्मा बुद्ध, मीराबाई, गुरु नानक जी, भगवान श्रीराम, भगवान श्री कृष्ण पर तोहमत लगाने वालों को इतिहास में कहीँ जगह मिली है? ऐसे लोग जन्मों तक भटकते रहते हैं।
कार्यालयों, कारखानों, आश्रमों, पार्टियों, संस्थानों में लोग आते हैं और चले जाते हैं, निकाले भी जाते हैं और निकले हुए लोग बगावत में कुछ भी कह दें या आरोप लगा दें तो क्या वे सब सच्चे हो जाते हैं?
जो कुछ आज बापू जी के पास है वह उनके ट्रस्टों की सम्पत्ति है, 'रजिस्टर्ड पब्लिक ट्रस्ट' की सम्पत्ति है, जिसके वार्षिक आय-व्यय का पूरा लेखा जोखा होता है, ऑडिट होता है। बापू जी के आश्रम द्वारा स्थापित आश्रमों का उचित प्रतिफल मूल्य दिया गया है और देश के कानून के मुताबिक उनका मालिकाना हक लिया गया है, मालिकाना हक ट्रस्ट का है। अतः बापूजी और उनके अनुयायों को जमीन हड़पनेवाला बताकर बार-बार टी.वी. चैनलों पर या समाचार पत्रों में दिखाकर क्यों डराने की भ्रामक कोशिश की जा रही है? बापूजी के अनुयायियों की सहिष्णुता की क्यों परीक्षा ली जा रही है? सहिष्णुता को क्यों उत्तेजित किया जा रहा है? दिल्ली अमदावाद, सूरत, पेढ़माला, पंचेड़ तथा अन्य आश्रमों का मूल्यांकन करना, उन्हें कई करोड़ों-अरबों का बताना, इससे क्या प्रयोजन सिद्ध होने वाला है? इस देश के हजारों ट्रस्टों में हजारों आश्रम, चिकित्सालय, स्कूल-कालेज, मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे समाज-सेवा के लिए चल रहे हैं तो बापू जी के करोड़ों साधकों के सत्य-संकल्पों से बनने वाले इन आश्रमों से, जहाँ पर लाखों को शांति, सकून, आश्रय, निर्भयता, परहित-परायणता के उत्तम विचार मिलते हैं, किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिए?
अमदावाद में गुरुपूर्णिमा के उत्सव पर जब प्रदर्शनकारी (षडयंत्रकारी), जिनमें समाज विरोधी तत्त्व भी शामिल हो गये थे, देश भर से आने वाले साधकों को पत्थरों, लाठियों द्वारा प्रताड़ित कर रहे थे, आश्रम तक जाने ही नहीं दे रहे थे, जबरन उन्हें नग्न कर रहे थे, उनके गाड़ी-वाहनों को जला रहे थे, साधिकाओं के साथ छेड़छाड़ कर रहे थे......
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तो क्या साधक मूक दर्शक बने रहते?
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और अगर भक्त आत्मरक्षार्थ खड़े हो गये तो क्या गुनाह हुआ?
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गुंडों से आत्मरक्षा करने वालों को गुंडा कहना कहाँ तक उचित है?
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मीडिया ने साधकों पर होने वाले अत्याचारों की भर्त्सना क्यों नहीं की?
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लाखों की भीड़ में से अगर कुछ ने अपने आपा खो दिया तो इसके लिए बापूजी और आश्रम को दोषी ठहराना कहाँ तक उचित है?
कोमलहृदय, सदा सबके मंगल की कामना करने वाले, लाखों लोग जिनके दर्शन के लिए घंटों पलकें बिछाये रहते हैं, उनके लिए डर, भय, हिंसा फैलाने वाला, तांत्रिक बताना, उनके लिए अनर्गल बेसिर-पैर की कहानियाँ बना-बनाकर बदनाम करना यह बापूजी के देश-विदेश में फैले करोड़ों साधकों का ही नहीं अपितु भारतीय संस्कृति का भी घोर अपमान है।
स्वामी श्री शिवानंद जी सरस्वती द्वारा लिखित 'गुरुभक्तियोग' जिसमें गुरु-शिष्य के संबंधों पर प्रकाश डाला गया है एवं 'पंचामृत' नामक ग्रंथ जो कि सनातन संस्कृति की महान पुस्तके हैं तथा वेदों-उपनिषदों की वाणी है, ऐसे पवित्र ग्रंथों के लिए व्यर्थ की टिप्पणी करने वाले अपनी तुच्छ मानसिकता का परिचय दे रहे हैं। किसी भी धर्मग्रंथ के लिए अंट-संट बोलना या लिखना उचित नहीं है। धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में प्रत्येक नागरिक को अपना धर्म पालने का मौलिक अधिकार है। अनंत काल से चल रही सनातन संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा एवं इनके संबंधों के अकाट्य तथ्यों पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लग सकता, जिसका दुस्साहस कुछ पत्रिकाओं एवं टी.वी. चैनलों द्वारा किया जा रहा है। इन अनमोल पुस्तकों को साधक का मस्तिष्क भ्रमित करने वाली बता कर भारतीय संस्कृति का घोर अपमान किया जा रहा है, प्रचार माध्यमों से इनका दुष्प्रचार किया जा रहा है, क्या यह साजिश नहीं है? जो कि निंदनीय है। संतों पर दोषारोपण करके कपोल-कल्पित आँकड़े लिखकर अपने को और समाज को पाप का भागीदार न बनायें।
कुप्रचार करने वाले जितना भी कुप्रचार करते हैं, उतने ही नये सत्संगी बनते हैं एवं दर्शनार्थी आते हैं। भगवान श्रीराम के गुरु वसिष्ठजी महाराज "श्रीयोगवासिष्ठ महारामायण' में कहते हैं कि 'संतों में यदि एक भी सदगुण हो तो उसे अंगीकार कीजिये।"