होली

गुरु के घर रंग बरसे ....

Holi

 

|| Pujya Bapuji's Holi Message ||

Holi is not merely a festival of burning a heap of dung cakes and wood. Rather it is a pious day for removing one's psychological weakness and burning the evil desires.

From this day, we should throw out our evil desires and cultivate in our life the divine virtues of love for God, goodwill, sympathy, faith in the chosen Divinity, fearlessness, steadfast adherence to Dharma, etc.

We should invoke in our lives the virtues of the great devotee - Prahlada, viz. a firm belief in God, tolerance, forgiveness, love for the Lord, compassion, benevolence, non-violence, etc.

The colours of Holi, colour only the body. Yoy should colour your heart with the Divine love. Holi is the festival of nature; it is the celebration of spring; it is a pious observance of the tradition of offering newly harvested grains to the Lord before using the same. One should stop taking dates from this day onwards.

Holi is the festival of burning down our vices, addictions and evil tendencies and of imbibing virtues. Holi is a life giving drug that rejuvenates our sadhana. It spreads the message of love in the society. Take constant care not to insult, slander or harm anybody by your impertinence or arrogance. Guard against circumstances that tend to colour you with poisonous hue of addictions. You should rather colour yourself only with colour of devotion to Lord........of Self bliss, in which Lord and His beloved saints abide......and colour yourself so fast that the colour should never fade away.

In ancient times, students going to Gurukuls for education (a place where a guru instructed his disciples) were given a stick of Palash to carry with them, as the Palash wood helps in bestowing mental equipoise. Holikotsava is indeed the festival of availing this quality of palash through its flowers and of rejoicing in the blissful atmosphere created by chanting the Lord's pious name! Celebration of Holi in this Vedic manner protects the health. In our culture, the Holi festival has been celebrated from time immemorial. It is not that this festival is celebrated only in India. Holi, an invaluable gift of Indian culture, is celebrated in many countries of the world, though by different names. Some whimsical people have started celebrating this pious health-giving festival in a distorted manner and the society, in general, has started blindly following them. The balance of the seven vital constituent elements (saptadhatu) and the seven colours (saptarang) of the body are disturbed by the chemical colours and the severe Sunrays. This imbalance results in mental dejection, skin diseases and eye disorders. One develops an irritable nature. To avert such ill-effects, people in olden times used to play Holi with colours prepared from palash flowers. The palash flowers have been found to possess characteristics that correct the imbalance of the Saptadhatus and the Saptarangs. The true sadhaks should follow the Vedic way of Celebrating Holi."

It is very harmful to play Holi with poisonous chemical colours. It is beneficial to play Holi with colours prepared from Palash flowers. This keeps the seven colours and dhatus of the body in equilibrium, protects the skin and increase the body's resistance power against heat. Holi Night is one of the 4 Maharaatri on which Japa-Dhyan is very very beneficial for sadhak, please take maximum benefit of it.

अद्वैत होली

होली जली तो क्या जली पापिन अविद्या नहीं जली।

आशा जली नहीं राक्षसी, तृष्णा पिशाची नहीं जली।।

झुलसा न मुख आसक्ति का, नहीं भस्म ईर्ष्या की हुई।

ममता न झोंकी अग्नि में, नहीं वासना फूँकी गई।।

न ही धूल डाली दम्भ पर, न ही दर्प में जूते दीये।

दुर्गति न की अभिमान की, न ही क्रोध में घूँसे पीये।।

अज्ञान को खर पर चढ़ा करमुख नहीं काला किया।

ताली न पीटी काम की, तो खेल होली क्या लिया।।

छाती मिलाते शत्रु से, सन्मित्र से मुख मोड़ते।

हितकारी ईश्वर छोड़ कर, नाता जगत से जोड़ते।।

होली भली है देश की अच्छी नहीं परदेस की।

सुनते हुए बहरे हुए, नहीं याद करते देश की।।

माजून खाई भंग की, बौछार कीन्हीं रंग की।

बाजार में जूता उछाला, या किसी से जंग की।।

गाना सुना या नाच देखा, ध्वनि सुनी मौचंग की।

सुध बुध भुलाई आपनी, बलिहारी ऐसे रंग की।।

होली अगर हो खेलनी, तो संत सम्मत खेलिये।

सन्तान शुभ ऋषि मुनिन की, मत संत आज्ञा पेलिये।।

सच को ग्रहण कर लीजिए, जो झूठ हो तज दीजिये।

सच झूठ के निर्णय बिना, नहीं काम कोई कीजिये।।

होली हुई तभ जानिये, संसार जलती आग हो।

सारे विषय फीके लगें, नहीं लेश उनमें राग हो।।

हो शांति कैसे प्राप्त निश दिन, एक यह ही ध्यान हो।

संसार दुःख कैसे मिटे, किस भाँति से कल्याण हो।।

होली हुई तब जानिये, पिचकारी सदगुरु की लगे।

सब रंग कच्चे जांय उड़, यक रंग पक्के में रंगे।।

नहीं रंग चढ़े फिर द्वैत का अद्वैत में रंग जाय मन।

है सेर जो चालीस सो ही जानियेगा एक मन।।

होली हुई तब जानिये, श्रुति वाक्य जल में स्नान हो।

विक्षेप मल सब जाय धुल, निश्चिन्त मन अम्लान हो।।

शोकाग्नि बुझ निर्मल हो, मति स्वस्थ निर्मल शांत हो।

शीतल हृदय आनन्दमय, तिहूँ पाप का पूर्णान्त हो।।

होली हुई तब जानिये, सब दृश्य जल कर छार हो।

अज्ञान की भस्मी उड़े, विज्ञानमय संसार हो।।

हो मांहि हो लवलीन सब, है अर्थ होली का यही।

बाकी बचे सो तत्त्व अपना, आप सबका है वही।।

भोला ! भली होली भयी, भ्रम भेद कूड़ा बह गया।

नहीं तू रहा नहीं मैं रहा, था आप सो ही रह गया।।

अद्वैत होली चित्त देकर, नित्य जो नर गायेगा।

निश्चय अमर हो जायेगा, नहीं गर्भ में फिर आयेगा।।

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Holi Tips

केसरिया रंगः पलाश के फूलों से यह रंग सरलता से तैयार किया जा सकता है। पलाश के फूलों को रात को पानी में भिगो दें। सुबह इस केसरिया रंग को ऐसे ही प्रयोग में लायें या उबालकर होली का आनंद उठायें। यह रंग होली खेलने के लिए सबसे बढ़िया है। शास्त्रों में भी पलाश के फूलों से होली खेलने का वर्णन आता है। इसमें औषधिय गुण होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह कफ, पित्त, कुष्ठ, दाह, मूत्रकृच्छ, वायु तथा रक्तदोष का नाश करता है। रक्तसंचार को नियमित व मांसपेशियों को स्वस्थ रखने के साथ ही यह मानसिक शक्ति तथा इच्छाशक्ति में भी वृद्धि करता है।

सूखा हरा रंगः मेंहदी या हिना का पाउडर तथा गेहूँ या अन्य अनाज के आटे को समान मात्रा में मिलाकर सूखा हरा रंग बनायें। आँवला चूर्ण व मेंहदी को मिलाने से भूरा रंग बनता है, जो त्वचा व बालों के लिए लाभदायी है।

सूखा पीला रंगः हल्दी व बेसन मिला के अथवा अमलतास व गेंदे के फूलों को छाया में सुखाकर पीस के पीला रंग प्राप्त कर सकते हैं।

गीला पीला रंगः एक चम्मच हल्दी दो लीटर पानी में उबालें या मिठाइयों में पड़ने वाले रंग जो खाने के काम आते हैं, उनका भी उपयोग कर सकते हैं। अमलतास या गेंदे के फूलों को रात को पानी भिगोकर रखें, सुबह उबालें।

लाल रंगःलाल चंदन (रक्त चंदन) पाउडर को सूखे लाल रंग के रूप में प्रयोग कर सकते हैं। यह त्वचा के लिए लाभदायक व सौंदर्यवर्धक है। दो चम्मच लाल चंदन एक लीटर पानी में डालकर उबालने से लाल रंग प्राप्त होता है, जिसमें आवश्यकतानुसार पानी मिलायें।

पीला गुलाल :१) ४ चम्मच बेसन में २ चम्मच हल्दी चूर्ण मिलायें | (२) अमलतास या गेंदा के फूलों के चूर्ण के साथ कोई भी आटा या मुलतानी मिट्टी मिला लें |

पीला रंग :(१) २ चम्मच हल्दी चूर्ण २ लीटर पानी में उबालें | (२) अमलतास, गेंदा के फूलों को रातभर भिगोकर उबाल लें |

जामुनी रंग :चुकंदर उबालकर पीस के पानी में मिला लें |

काला रंग :आँवला चूर्ण लोहे के बर्तन में रातभर भिगोयें |

लाल रंग :(१) आधे कप पानी में दो चम्मच हल्दी चूर्ण व चुटकीभर चुना मिलाकर १० लीटर पानी में डाल दे | (२) २ चम्मच लाल चंदन चूर्ण १ लीटर पानी में उबाले |

लाल गुलाल :सूखे लाल गुडहल के फूलों का चूर्ण उपयोग करें |

हरा रंग :(१) पालक, धनिया या पुदीने की पत्तियों के पेस्ट को पानी भिगोकर उपयोग करें | (२) गेहूँ की हरी बालियों को पीस लें |

हरा गुलाल :गुलमोहर अथवा रातरानी की पत्तियों को सुखाकर पीस लें |

भूरा हरा गुलाल : मेहँदी चूर्ण के साथ आँवला चूर्ण मिला लें |

How to prepare natural colours?

Bright saffron colour :1) Soak Palash flowers in water overnight and boil them in the morning. 2) Mix a pinch of sandalwood powder in one litre of water. Ayurveda has taken into account the significance of ‘Palash’(Butea frondosa) flowers. Its use helps in crqadicating disorders of Kapha and Pitta humbours, leprosy, fever, strangury, flatulence and blood disorders. This natural saffron colours increases the blood circulation. It not only keeps our muscles strong and robust but also helps in enhancing our willpower and mental faculties.

Yellow gulal : 1) Four spoonfuls of besan (gram flour) added to two spoonfuls of turmeric makes dry yellow colour. 2) Powder of dry yellow flowers of Amaltaas (the Indian Laburnum Cassia fistula) and Marigold overnight in water and boil the same in the morning to get liquid yellow colour.

Liquid yellow colour : 1) Two spoonfuls of turmeric powder boiled in two litre water makes very good yellow colour. 2) Soak yellow flowers of Amaltaas (the Indian Laburnum Cassia fistula) and Marigold overnight in water and boil the same in the morning to get liquid yellow colour.

Purple colour : The beet-root boiled in water makes good purple colour.

Black colour : Amla powder soaked overnight in an iron utensil gives good black colour.

Red colour : 1) Mix two teaspoonfuls turmeric powder and a pinch of limestone powder in half a cup of water and mix it with ten litres of water . 2) 2 spoonfuls red sandal powder boiled in one litre water gives beautiful red colour.

Red Gulal : Use powder of dry red Gudhal (shoe-flower).

Green colour : 1) Make a paste of leaves of spinach, coriander and mint and mix it with water. 2) Grind wheat grass.

Green gulal : Grind dried leaves of gulmohar (flamboyant) and raat ki raani (tuberose)

Brown green gulal : Mix menhdi powder with Amla powder.

Listen Audio

Rishi Prasad-March 2011 / 2013

घर में भूत प्रेत की बाधा हो, अथवा बच्चों पे भूत प्रेत की हवा लग जाती है तो उस भूत को और बाधा को मिटाने के लिए होली का उत्सव के दूसरे दिन (धुलेंडी) को होली की राख घर में रख दें । जिस बच्चे को ऊपर की हवा का डर हो उस की नाभि में और ललाट पर तिलक करो, तो भूत प्रेत का प्रभाव भी गायब हो जायेगा ।

Mumbai (Airoli) 14th March 2011

होली के बाद नीम की २० से २५ कोपलें २-३ काली मिर्च के साथ खूब चबा-चबाकर खानी चाहिये । यह प्रयोग २०-२५ दिन करने से वर्ष भर चर्म रोग , रक्त विकार और ज्वर आदि रोगों से रक्षा होती है तथा रोग प्रतिकारक शक्ति बनी रहती है । इसके अलावा कड़वे नीम के फूलों का रस सप्ताह या १५ दिन तक पीने से भी त्वचा रोग व मलेरिया से बचाव होता है । सप्ताह भर या १५ दिन तक बिना नमक का भोजन करने से आयु और प्रसन्नता में बढ़ोतरी होती है।

Lok Kalyan Setu -Feb 2011

१८ फरवरी से वसंत ऋतु शुरू होगी.......होली के बाद १५-२० दिन बिना नमक का भोजन करें और अर्ध सिंक हुआ अन्न खाने से वायु-कफ जनित रोग मिटते हैं l होली के बाद २०-२५ दिन तक २० से ३० नीम के कोमल पत्ते और १ काली मिर्च चबाकर खाने से रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ेगी ल होली के बाद खजूर नहीं खाना l होली के बाद के दिनों में रात में चन्द्रमा की चांदनी का सेवन बहुत लाभप्रद है l

Nasik 14.02.2010

  • होली के बाद खजूर नहीं खाना चाहिए, ये पचने में भारी होते है, इन दिनों में सर्दियों का जमा हुआ कफ पिघलता है और जठराग्नि कम करता है. इसलिए इन दिनों में हल्का भोजन करें, धाणी और चना खाएं, जिससे जमा हुआ कफ निकल जाये
  • इन दिनों में १५-२० दिन सुबह १५-२० नीम के पत्ते और काली मिर्च चबा-चबाकर खाने से चर्म रोग दूर होते हैं. भोजन में नीम का तेल उपयोग करने से भी लाभ होता है.
  • होली के दिनों में १५-२० दिन तक नमक न खाएं, अथवा कम कर दें, इससे वर्ष भर स्वास्थ्य में मदद मिलती है
  • इन दिनों में पलाश/केसुडे/गेंदे के फूलों के रंग से होली खेलने से शरीर के ७ धातु संतुलन में रहते हैं, इनसे होली खेलने से चमड़ी पर एक layer बन जाती है जो धूप की तीखी किरणों से रक्षा करती है.
  • होली के दिन १५-२० min. सूर्यस्नान बहुत लाभकारी होता है, जरुर करना चाहिए
  • होली की रात जप-ध्यान करने से अनंत्गुना फल होता है.

Holi tips

- One should never eat dates after Holi. They are heavy to digest. In these days, the accumulated cough in the body starts to melt and digestive power stays weak. So, on these days, one should follow light meals, eat coriander seeds and chana which aid removal of cough.

- On these days, one should chew 15-20grams of Neem leaves with black pepper in the morning for 15-20 days. It drives away any skin ailments. One may also use neem oil in meals alternately.

- In 15-20 days after Holi, do not take salt in your meals,or reduce them if you can. This will help maintain good health throughout the rest of the year.

- In these days, use palash/kesude/gende flower colours to play holi which helps stabilise the seven colours of our body. These form a layer over your body which protect the skin from the piercing rays of sun.

- On the day of Holi, sun bathing for 15-20 minutes is considered highly beneficial.

- The virtues of doing japa and meditation on the night of Holi is countless.

- Holi Satsang Surat

होली कैसे मनायें

होली भारतीय संस्कृति की पहचान का एक पुनीत पर्व है, भेदभाव मिटाकरपारस्परिक प्रेम व सदभाव प्रकट करने का एक अवसर है |अपने दुर्गुणों तथा कुसंस्कारोंकी आहुति देने का एक यज्ञ है तथा परस्पर छुपे हुए प्रभुत्व को, आनंद को, सहजता को, निरहंकारिता और सरल सहजता के सुख को उभारने का उत्सव है |

यह रंगोत्सव हमारेपूर्वजों की दूरदर्शिता है जो अनेक विषमताओं के बीच भी समाज में एकत्व कासंचार करता है | होली के रंग-बिरंगे रंगों की बौछार जहाँ मन में एक सुखद अनुभूति प्रकट कराती है वहीं यदि सावधानी, संयम तथा विवेक न रख जाये तो ये ही रंग दुखद भी जाते हैं | अतः इस पर्व पर कुछ सावधानियाँ रखना भी अत्यंत आवश्यक है |

प्राचीन समय में लोगपलाश के फूलों से बने रंग अथवा अबीर-गुलाल, कुमकुम- हल्दी से होली खेलते थे |किन्तु वर्त्तमान समय में रासायनिक तत्त्वों से बने रंगोंका उपयोग किया जाता है | ये रंग त्वचा पे चक्तों के रूप में जम जाते हैं | अतः ऐसे रंगों से बचना चाहिये | यदि किसि नेआप पर ऐसारंग लगा दिया हो तो तुरन्त ही बेसन, आटा, दूध, हल्दी व तेल के मिश्रण सेबना उब्टन रंगो हुए अंगों पर लगाकर रंग को धो डालना चाहिये |यदि उब्टन करने से पूर्व उस स्थान को निंबु से रगड़कर साफ कर लियाजाए तो रंग छुटने में और अधिकसुगमता आ जाती है |

रंग खेलने से पहले अपने शरीर को नारियल अथवा सरसों के तेल से अच्छी प्रकार लेना चाहिए | ताकि तेलयुक्त त्वचा पर रंग का दुष्प्रभाव न पड़े और साबुन लगाने मात्र से ही शरीर पर से रंग छुट जाये | रंग आंखों में या मुँह में न जाये इसकी विशेष सावधानी रखनी चाहिए | इससे आँखों तथा फेफड़ों को नुक्सान हो सकता है |

जो लोग कीचड़ व पशुओं के मलमूत्र से होली खेलते हैं वे स्वयं तो अपवित्र बनते ही हैं दूसरों को भी अपवित्र करने का पाप करते हैं | अतः ऐसे दुष्ट कार्य करने वालों से दूर हीरहें अच्छा |

वर्त्तमान समय में होली के दिन शराब अथवा भंग पीने कीकुप्रथा है | नशे से चूर व्यक्ति विवेकहीन होकर घटिया से घटिया कुकृत्य कर बैठते हैं | अतः नशीले पदार्थ से तथा नशा करने वाले व्यक्तियों से सावधान रहना चाहिये |आजकल सर्वत्र उन्न्मुक्तताकादौर चल पड़ा है | पाश्चात्य जगत के अंधानुकरण में भारतीयसमाज अपने भले बुरे का विवेक भी खोता चला जा रहा है | जो साधक है, संस्कृति काआदर करने वाले हैं, ईश्वर व गुरु में श्रद्धा रखते हैं ऐसे लोगो में शिष्टता व संयमविशेषरूप से होना चाहिये | पुरुष सिर्फ पुरुषोंसे तथास्त्रियाँ सिर्फ स्त्रियों के संग ही होली मनायें | स्त्रियाँ यदि अपने घर में ही होली मनायें तो अच्छा है ताकि दुष्ट प्रवृत्तिके लोगों कि कुदृष्टि से बच सकें|

होली मात्र लकड़ी के ढ़ेर जलाने त्योहारनहीँ है |यह तो चित्त की दुर्बलताओं को दूर करनेका, मन की मलिन वासनाओं को जलाने कापवित्र दिन है | अपने दुर्गुणों, व्यस्नों व बुराईओं को जलाने का पर्व है होली .......अच्छाईयाँ ग्रहण करने का पर्व है होली .........समाज में स्नेह कासंदेश फैलाने का पर्वहै होली..........

आज के दिन से विलासी वासनाओं का त्याग करके परमात्म प्रेम, सदभावना, सहानुभूति, इष्टनिष्ठा, जपनिष्ठा, स्मरणनिष्ठा, सत्संगनिष्ठा, स्वधर्म पालन , करुणा दया आदि दैवी गुणों का अपने जीवन में विकास करना चाहिये | भक्त प्रह्लादजैसी दृढ़ ईश्वर निष्ठा, प्रभुप्रेम, सहनशीलता, व समता का आहावन करना चाहिये |

सत्य, शान्ति, प्रेम, दृढ़ताकी विजय होती है इसकी याद दिलाता है आज का दिन | हिरण्यकश्यपु रूपी आसुरीवृत्ति तथा होलिका रूपी कपटकी पराजयका दिन है होली, यह पवित्र पर्व परमात्मा में दृढ़ निष्ठावान के आगे प्रकृति द्वारा अपने नियमों कोबदल देने की याद दिलाता है | मानव को भक्त प्रेह्लाद की तरह विघ्न बाधाओं के बीच भी भगवदनिष्ठा टिकाए रखकर संसार सागर से पार होने का संदेश देने वाला पर्व है 'होली' !

लोक कल्याण सेतु

(19मार्च से 17 अप्रिल 2000)

The Delightful Festival of Indian Culture

The festival of Holi is a pious representative of Indian culture. Holi signals the change of season marking the advent of spring. It is an occasion to forget all differences of caste and creed and share feelings of mutual love and goodwill? is also a message in itself for us to become engaged in spiritual practices and increase our devotion for the Lord.

This festival has brought cheers to many a desolate heart and smiles to many sad faces. Humanity has benefited immensely by the festival of Holi. People celebrate Holi by colouring others with the colours of their own choice and thus they bridge the differences of their hearts and become closer to one another.

Holi, a festival of joy and gaiety, brings vigour into life. This is a festival that inspires us to see divinity in each other. It is also an occasion to remove sensuous thoughts and kindle love for the passionless Lord.

The false colours of this transient world cover all senses, body and mind. With the passage of time they wither away as well. But even the slightest colour of devotion and enlightenment imbues one forever. Even death cannot remove it. It is this colour of devotion and enlightenment that we should inculcate in our life on the occasion of Holi. Holi is a festival of colours. It is an elixir that rejuvenates the spiritual and devotional pursuits of an aspirant. It also spreads the message of mutual love in society.

The pile of wood that we burn on the eve of Holi is symbolic of the weakness and passions that dominate our minds. On the pious occasion of Holi, we should take a vow to renounce lust and desires and to inculcate the divine virtues of love for God, goodwill, sympathy, faith in God, etc. At the same time we must perform japa of Lord's name, keep the Lord and satsang in mind, and practise devotion to duty, compassion, charity, etc. We should, just like the excellent devotee Prahlad, have firm devotion and love towards the Lord, apart from the virtuous traits of tolerance and equanimity.

The literal meaning of Holi is 'bygone'. This means the festival of Holi teaches us to let bygones be bygones. Whatever has happened is past? forget it. If you got praise, fine; if you got insults, fine; its all over now. Immerse yourself in Self-Bliss.

Today, let us bring about a new beginning in our lives. Let us extend a helping hand to those in the lowest rung of society, the unfortunate, the downtrodden, the uncared for, the distressed, the illiterate, etc. Life is too short to be wasted. Let us do something worthwhile to earn ourselves the blessings of thousands of hearts. Let us proceed on the path of spirituality that will lead us to the highest goal as attained by Prahlad.

The festival of Holi gives us the pious message that we too should face the obstacles coming our way with grit and determination. Whatever the odds against us may be, keeping Prahlad as our ideal, let us not allow our faith in God to waver.

Instead of throwing chemical colours on one another, let us immerse ourselves and others in the pious colour of the Lord's divine name. Let us forget the illusory differences of superiority and inferiority, of mine and yours and know the Lord to be the only entity, the sentient Truth that permeates all beings and every particle of the universe. This is the path to blessedness.

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