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Gurucharan Vandan
गुरु
स्तवन
गुरुर्ब्रह्मा
गुरुर्विष्णुः
गुरुर्देवो महेश्वरः |
गुरुर्साक्षात
परब्रह्म तस्मै
श्री गुरवे नमः
||
ध्यानमूलं
गुरुर्मूर्ति
पूजामूलं गुरोः
पदम् |
मंत्रमूलं
गुरोर्वाक्यं
मोक्षमूलं गुरोः
कृपा ||
अखंडमंडलाकारं
व्याप्तं येन
चराचरम् |
तत्पदं
दर्शितं येन तस्मै
श्री गुरवे नमः
||
त्वमेव माता च
पिता त्वमेव, त्वमेव
बंधुश्च सखा त्वमेव |
त्वमेव विद्या
द्रविणं त्वमेव,
त्वमेव सर्वं
मम देव देव ||
ब्रह्मानंदं
परम सुखदं केवलं
ज्ञानमूर्तिं |
द्वन्द्वातीतं
गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्षयम्
||
एकं
नित्यं विमलं
अचलं सर्वधीसाक्षीभूतम्
|
भावातीतं
त्रिगुणरहितं
सदगुरुं तं नमामि
||
ऐसे महिमावान
श्री सदगुरुदेव के पावन चरणकमलों
का षोड़शोपचार से पूजन करने
से साधक-शिष्य का हृदय शीघ्र
शुद्ध और उन्नत बन जाता है |
मानसपूजा इस प्रकार कर सकते
हैं |
मन ही मन
भावना करो कि हम गुरुदेव के
श्री चरण धो रहे हैं … सर्वतीर्थों
के जल से उनके पादारविन्द को
स्नान करा रहे हैं | खूब आदर
एवं कृतज्ञतापूर्वक उनके श्रीचरणों
में दृष्टि रखकर … श्रीचरणों
को प्यार करते हुए उनको नहला
रहे हैं … उनके तेजोमय ललाट
में शुद्ध चन्दन से तिलक कर
रहे हैं … अक्षत चढ़ा रहे हैं
… अपने हाथों से बनाई हुई गुलाब
के सुन्दर फूलों की सुहावनी
माला अर्पित करके अपने हाथ
पवित्र कर रहे हैं … पाँच कर्मेन्द्रियों
की, पाँच ज्ञानेन्द्रियों की
एवं ग्यारवें मन की चेष्टाएँ
गुरुदेव के श्री चरणों में
अर्पित कर रहे हैं …
कायेन
वाचा मनसेन्द्रियैवा
बुध्यात्मना वा
प्रकृतेः स्वभावात्
|
करोमि
यद् यद् सकलं परस्मै
नारायणायेति समर्पयामि
||
शरीर से,
वाणी से, मन से, इन्द्रियों से,
बुद्धि से अथवा प्रकृति के
स्वभाव से जो
जो करते करते हैं वह सब समर्पित
करते हैं | हमारे जो कुछ कर्म
हैं, हे गुरुदेव, वे सब आपके
श्री चरणों में समर्पित हैं
… हमारा कर्त्तापन का भाव, हमारा
भोक्तापन का भाव आपके श्रीचरणों
में समर्पित है |
इस प्रकार
ब्रह्मवेत्ता सदगुरु की कृपा
को, ज्ञान को, आत्मशान्ति को,
हृयद में भरते हुए, उनके अमृत
वचनों पर अडिग बनते हुए अन्तर्मुख
हो जाओ … आनन्दमय बनते जाओ …
ॐ आनंद ! ॐ आनंद ! ॐ आनंद !
Gurupoornima Greetings

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Uttarayan 2006-1-2
Vidyalaabh Yog On Vyaspoornima
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं वाग्वादिनि सरस्वति मम जिह्वाग्रे वद वद ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं नमः स्वाहा |
- इस मंत्र को आषाढ़ मास मे जब उत्तराषाढ़ा नक्षत्र हो तब अर्थात २५ जुलाई २०१० को रात्रि के समय सुबह ७ से ८ बजे के बीच १०८ बार जप लें |
- फिर इसी दिन की रात्रि ११ से १२ बजे के बीच जीभ पर सोने की सलाई से अथवा चांदी की सलाई से, लाल चंदन से ह्रीं लिख दे |
- जिसकी जीभ पर यह मंत्र इस विधि से लिखा जायेगा, उसे विद्या लाभ तथा विद्वत्ता की प्राप्ति होगी |
- बच्चे यदि छोटे है तो अभिभावक को चाहिये कि बच्चे को गोद मे लेकर बैठे , और १०८ बार इस मंत्र का जप करे | मंत्र बोलते समय मम के स्थान पर बच्चे के नाम का उच्चारण करे (नीचे उदाहरण देखे) | जप करने के पश्चात सोने की अथवा चांदी की सलाई से, लाल चंदन से बच्चे की जीभ पर ह्रीं लिखे |
- उदाहरणः जैसे मेरे पुत्र का नाम राकेश है, और मैं उसके लिये जप करना चाहता हूं | तो मै मंत्र बोलुंगाः "ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं वाग्वादिनि सरस्वति राकेशस्य जिह्वाग्रे वद वद ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं नमः स्वाहा |"
- सभी लोग इसका लाभ लें तथा दूसरो को दिलावें |
- पूज्य बापूजी