
'बाल
संस्कार
केन्द्र'
पाठ्यक्रम
जिस प्रकार
की नींव होती
है उसी के
अनुरूप उस पर
खड़े भवन की
मजबूती भी
होती है। यदि
नींव ही कमजोर
हो तो उस पर
भव्य भवन का
निर्माण कैसे हो
सकता है ? बच्चे
भावी समाज की
नींव होते
हैं। लेकिन आज
के दूषित
वातावरण में
बच्चों पर
ऐसे-ऐसे गलत
संस्कार पड़
रहे हैं कि उनका
जीवन पतन की
ओर जा रहा है।
बालकरूपी
नींव ही कच्ची
हो तो सुदृढ़
नागरिकों से
युक्त समाज कहाँ
से बनेगा ?
किसी भी परिवार, समाज अथवा राष्ट्र का भविष्य उसके बालकों पर निर्भर होता है। उज्जवल भविष्य के लिए हमें बालकों को सुसंस्कारित करना होगा। बालकों को भारतीय संस्कृति के अनुरूप शिक्षा देकर हम एक आदर्श राष्ट्र के निर्माण में सहभागी हो सकते हैं।
ब्रह्मनिष्ठ संत श्री आसारामजी बापू के मार्गदर्शन में हो रही बाल विकास की विभिन्न सेवा-प्रवृत्तियों द्वारा बच्चों को ओजस्वी, तेजस्वी, यशस्वी बनाने हेतु भारतीय संस्कृति की अनमोल कुंजियाँ प्रदान की जा रही हैं। इन्हीं सत्प्रवृत्तियों में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं देश में व्यापक स्तर पर चल रहे 'बाल संस्कार केन्द्र'।
इन केन्द्रों में विभिन्न महापुरूषों के जीवन चरित्र पर आधारित प्रसंगों के माध्यम से विद्यार्थियों में ससंस्कारों का सिंचन किया जाता है। उनमें हमारी दिव्य संस्कृति, जीवन जीने की उत्तम कला सिखाने वाले महापुरूषों तथा माता-पिता एवं गुरूजनों के प्रति श्रद्धाभाव जगे, ऐसे कथा-प्रसंग बताये जाते हैं।
बाल संस्कार केन्द्र संचालन निर्देशिका में दी हुई 2 घँटे की कार्यप्रणाली में से पर्व महिमा, ऋतुचर्या, कथा-प्रसंग एवं अन्य महत्त्वपूर्ण विषयों पर प्रति सप्ताह विस्तृत पाठ्यक्रम के रूप में यह पुस्तिका प्रस्तुत की जा रही है। देशभर में चल रहे सभी केन्द्रों में एकरूपता व सामंजस्यता स्थापित हो यह इस पुस्तिका के प्रकाशन का मुख्य उद्देश्य है।
बाल संस्कार केन्द्र संचालक इस बात ध्यान रखें कि जिस माह से वे इस पुस्तक के अनुसार पढ़ाना शुरू करें, उस माह के त्यौहार, जयंतियाँ, ऋतुचर्या कैलेण्डर में देखें। फिर इस पुस्तक की अनुक्रमणिका में उससे सम्बन्धित लेख देखकर उससे सम्बन्धित सत्र से पढ़ाना शुरू करें। पुस्तक में दिया हुआ पहला सत्र जनवरी के प्रथम सप्ताह में पढ़ाने के लिए है।
यह पाठ्यक्रम वर्ष भर में आने वाले व्रत, त्यौहार तथा महापुरूषों की जयंतियों आदि के आधार पर बनाया गया है। केन्द्र संचालकों से निवेदन है कि अन्य वर्षों में व्रत त्यौहार, महापुरूषों की जयंति-तिथियों, तारीखों के अनुसार विषयों को बदल कर पढ़ा सकते हैं।
सत्र 1 से 52 तक का अभिप्रायः वर्ष के 52 सप्ताहों से है। प्रत्येक वर्ष सत्र 1 जनवरी के प्रथम सप्ताह से शुरू होगा।
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माता-पिता-गुरू
की सेवा का महत्त्व
धर्म की वेदी
पर बलिदान देने
वाले चार अमर शहीद
तिलकः बुद्धिबल
एवं सत्त्वबलवर्धक
सबमें गुरू का
ही स्वरूप नजर
आता है
शरीर से हिन्दुस्तानी
परंतु दिमाग से
अंग्रेज
भारतीय संस्कृति
की गरिमा के रक्षकः
स्वामी विवेकानंद
'हाय-हेलो' से बड़ों का
अपमान न करें......
शिवजी का
अनोखा वेशः देता
है दिव्य संदेश
अपने नौ-जवानों
को बचाने का प्रयास
करें
भेद में अभेद
के दर्शन कराता
हैः होलिकोत्सव
वास्कोडिगामा
ने भारत खोजा नहीं
अपितु लूटा था
जरूरत है
लगन और दृढ़ता
की.......
विद्यार्थी
छुट्टियाँ कैसे
मनायें ?
बाल्यकाल
से ही भक्ति का
प्रारंभ
महापुरूषों
के मार्गदर्शन
से सँभल जाता है
जीवन
सात्त्विक,
राजसिक
तथा तामसिक भोजन
से होता है
तदनुसार स्वभाव
का निर्माण
सौन्दर्य
प्रसाधन हैं सौन्दर्य
के शत्रु
मम्मी डैडी
कहने से माता-पिता
का आदर या हत्या
?
ममी (Mummy) अर्थात्
वर्षों पुराना
शव
डैडी बनाम
डेड (Dead) अर्थात्
मृत व्यक्ति
गुरू तेग
बहादुरः धर्म की
रक्षा के लिए किया
प्राणों का बलिदान
हे विद्यार्थियो
! जिज्ञासु बनो
भगवद् आराधना,
नामसंकीर्तन
का फल
मनोनिग्रह
की अदभुत साधनाः
एकादशी व्रत
वर्षा ऋतु में
स्वास्थ्य-रक्षा
के कुछ आवश्यक
नियम
संत निंदा जिसके
घर, वह घर
नहीं, यम का दर
असीम करूणा के
धनीः संत एकनाथ
जी महाराज
नेता जी सुभाषचन्द्र
बोस की महानता
का रहस्य
भगवान स्वयं अवतार
क्यों लेते हैं
?
कितने सुरक्षित
हैं क्रीम तथा
टेलकम पाउडर ?
सौन्दर्य प्रसाधनों
में छिपी हैं कई
मूक चीखें
कैन्सर का
खतरा बढ़ा रहे
हैं झागवाले शैम्पू
धर्मांतरण
के विरूद्ध किया
उग्र आन्दोलन
पीनियल ग्रन्थि
(योग में-आज्ञाचक्र)
की क्रियाशीलता
का महत्त्व
शुभ संकल्पों
का पर्व रक्षाबंधन
प्रेमावतार
का प्रागट्य-दिवसः
जन्माष्टमी
अभ्यास में
रूचि क्यों नहीं
होती ?
आप चाकलेट
खा रहे हैं या निर्दोष
बछड़ों का मांस
?
असफल विद्यार्थियों
को सफल बनाने के
नुस्खे
गणपति जी
का श्रीविग्रहः
मुखिया का आदर्श
कोलस्टरोल
नियंत्रित करने
का आयुर्वैदिक
उपचार
मांसाहारः
गंभीर बीमारियों
को बुलावा
मांसाहारी
मांस खाता है परंतु मांस
उसकी हड्डियों
को ही खा जाता है
!
पौष्टिकता
की दृष्टि से शाकाहारी
सब्जियों से अण्डे
की तुलना
आध्यात्मिक
दृष्टि से मानव
जीवन पर अण्डा
सेवन का दुष्प्रभाव
कहीं आप भी
सॉफ्टड्रिंक पीकर
मांसाहार तो नहीं
कर रहे हैं ?
आरतीः मानव
जीवन को दिव्य
बनाने की वैज्ञानिक
परम्परा
आरती को कैसे
व कितनी बार घुमायें
?
नवरात्रि
में सारस्वत्य
मंत्र अनुष्ठान
से चमत्कारिक लाभ
सारस्वत्य
मंत्र का चमत्कारः
वैज्ञानिक भी चकित
विजयादशमीः
दसों इन्द्रियों
पर विजय
अधिकांश
टुथपेस्टों में
पाया जाने वाला
फ्लोराइड कैंसर
को आमंत्रण देता
है....
पेप्सोडेंट
के प्रयोग से सड़ने
लगे हैं दाँत
भारत का कुत्ता
भी भक्ति की प्रेरणा
देता है
गुटखा-पानमसाला
खाने वाले सावधान
!
गुटखा खाने
का शौक कितना महँगा
पड़ा !
मौत का दूसरा
नामः गुटखा-पान
मसाला
विविध रोगों
में आभूषण-चिकित्सा
स्वास्थ्य
के लिए हानिकारक
ऊँची एड़ी के सेंडिल
असाध्य बीमारियों
में औषध के साथ प्रार्थना
और ध्यान भी अत्यन्त
आवश्यक है
तेजस्वी
जीवन की कुंजीः
त्रिकाल-संध्या
मैदे से बनी
डबल रोटी (ब्रेड)
खाने वाले सावधान
!
टूथपेस्ट
करने वालों के
लिए दंतरोग विशेषज्ञों
की विशेष सलाह
भैंस के खून
से भी बनते हैं
टॉनिक
फास्ट फूड
खाने से रोग भी
फास्ट (जल्दी) होते
हैं
जागिये –
प्रातः
ब्राह्ममुहूर्त
में
दृढ़ संकल्प
सफलता का प्रथम
सोपान
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संचालक
पाठ्यक्रम
(सत्र 1)
युधिष्ठिर ने पूछाः "भारत ! धर्म का यह मार्ग बहुत बड़ा है तथा इसकी बहुत सी शाखाएँ हैं। इन धर्मों से आप किसको विशेष रूप से आचरण में लाने योग्य समझते हैं ? सब धर्मों में से आप किसको विशेष रूप से आचरण में लाने योग्य समझते हैं ? सब धर्मों में कौन-सा कार्य आपको श्रेष्ठ जान पड़ता है, जिसका अनुष्ठान करके मैं इहलोक और परलोक में भी परम धर्म का फल प्राप्त कर सकूँ ?"
भीष्म जी ने कहाः "राजन ! मुझे तो माता-पिता तथा गुरूजनों की पूजा ही अधिक महत्त्व की वस्तु जान पड़ती है। इस लोक में इस पुण्यकार्य में संलग्न होकर मनुष्य महान यश और श्रेष्ठ लोक पाता है।
तात् युधिष्ठिर ! भलिभाँति पूजित हुए वे माता-पिता और गुरूजन किस काम के लिए आज्ञा दें, उसका पालन करना ही चाहिए।
जो उनकी आज्ञा के पालन में संलग्न है, उसके लिए दूसरे किसी धर्म के आचरण की आवश्यकता नहीं है। जिस कार्य के लिए वे आज्ञा दें, वही धर्म है, ऐसा धर्मात्माओं का निश्चय है।
माता-पिता और गुरूजन ही तीनों लोक हैं, ये ही तीनों आश्रम हैं, ये ही तीनों वेद हैं तथा ये ही तीनों अग्नियाँ हैं।
पिता गार्हपत्य अग्नि हैं, माता दक्षिणाग्नि मानी गयी हैं और गुरू आहवनीय अग्नि का स्वरूप हैं। लौकिक अग्नियों की अपेक्षा माता-पिता आदि त्रिविध अग्नियों का गौरव अधिक है।
यदि तुम इन तीनों की सेवा में कोई भूल नहीं करोगे तो तीनों लोकों को जीत लोगे। पिता की सेवा से इस लोक को, माता की सेवा से परलोक को तथा नियमपूर्वक गुरू की सेवा से ब्रह्मलोक को भी लाँघ जाओगे।
भरतनन्दन ! इसलिए तुम त्रिविध लोकस्वरूप इन तीनों के प्रति उत्तम बर्ताव करो। तुम्हारा कल्याण हो। ऐसा करने से तुम्हें यश और महान फल देने वाले धर्म की प्राप्ति होगी।
इन तीनों की आज्ञा का कभी उल्लंघन न करना, इनको भोजन कराने के पहले स्वयं भोजन न करना, इन पर कोई दोषारोपण न करना और सदा इनकी सेवा में संलग्न रहना, यही सबसे उत्तम पुण्यकर्म है। नृपश्रेष्ठ ! इनकी सेवा से तुम कीर्ति, पवित्र यश और उत्तम लोक सब कुछ प्राप्त कर लोगे।
जिसने इन तीनों का आदर कर लिया, उसके द्वारा सम्पूर्ण लोकों का आदर हो गया और जिसने इनका अनादर कर दिया, उसके सम्पूर्ण शुभ कर्म निष्फल हो गये।
शत्रुओं को संताप देने वाले नरेश ! जिसने इन तीनों गुरूजनों का सदा अपमान ही किया है, उसके लिए न तो यह लोक सुखद है और न परलोक। न इस लोक में और न ही परलोक में ही उसका यश प्रकाशित होता है। परलोक में जो अन्य कल्याणमय सुख की प्राप्ति बतायी गयी है, वह भी उसे सुलभ नहीं होती है।
मैं तो सारा शुभ कर्म करके इन तीनों गुरूजनों को ही समर्पित कर देता था। इससे मेरे उन सभी शुभ कर्मों का पुण्य सौगुना और हजारगुना बढ़ गया है। युधिष्ठिर ! इसी से तीनों लोक मेरी दृष्टि के सामने प्रकाशित हो रहे हैं।
आचार्य यानी शास्त्रों के अनुसार आचरण बताने वाला सदा दस श्रोत्रियों यानी शास्त्रों की कथा करने वाले से बढ़कर है। उपाध्याय यानी विद्यागुरू दस आचार्यों से अधिक महत्त्व रखता है। पिता दस उपाध्यायों से बढ़कर है और माता का महत्त्व दस पिताओं से भी अधिक है। वह अकेली ही अपने गौरव के द्वारा सारी पृथ्वी को भी तिरस्कृत कर देती है। अतः माता के समान दूसरा कोई गुरू नहीं है।
......परंतु मेरा विश्वास यह है कि ब्रह्मवेत्ता सदगुरू का पद पिता और माता से भी बढ़कर है, क्योंकि माता-पिता तो केवल इस शरीर को जन्म देते हैं जबकि सदगुरू जीव के चिन्मय वपु को जन्म देते हैं।
भारत ! पिता और माता के द्वारा स्थूल शरीर का जन्म होता है परंतु सदगुरू का उपदेश प्राप्त करके जीव को जो द्वितीय जन्म उपलब्ध होता है, वह दिव्य है, अजर-अमर है।
माता-पिता यदि कोई अपराध करें तो भी वे सदा अवध्य ही हैं, क्योंकि पुत्र या शिष्य माता-पिता और गुरू के प्रति अपराध करके भी उनकी दृष्टि में दूषित नहीं होते हैं। वे गुरूजन पुत्र या शिष्य पर स्नेहवश दोषारोपण नहीं करते हैं बल्कि सदा उसे धर्म के मार्ग पर ही ले जाने का प्रयत्न करते हैं। ऐसे माता-पिता आदि गुरूजनों का महत्त्व महर्षियों सहित देवता ही जानते हैं।
जो सत्कर्म और यथार्थ उपदेश के द्वारा पुत्र या शिष्य को कवच की भाँति ढँक लेते हैं, सत्यस्वरूप वेद का उपदेश देते हैं और असत्य की रोक-थाम करते हैं, उन गुरू को ही पिता और माता समझें और उनके उपकार को जानकर कभी उनसे द्रोह न करें।
जो लोग विद्या पढ़कर गुरू का आदर नहीं करते, निकट रहकर मन, वाणी और क्रिया द्वारा गुरू की सेवा नहीं करते, उन्हें गर्भ के बालक की हत्या से भी बढ़कर पाप लगता है। संसार में उनसे बड़ा पापी दूसरा कोई नहीं है। जैसे, गुरूओं का कर्त्तव्य है शिष्य को आत्मोन्नति के पथ पर पहुँचाना, उसी तरह शिष्यों का धर्म है गुरूओं का पूजन करना।
अतः जो पुरातन धर्म का फल पाना चाहते हैं, उन्हें चाहिए की वे गुरूओं की पूजा-अर्चना करें और प्रयत्नपूर्वक उन्हें आवश्यक वस्तुएँ समर्पित करें।
मनुष्य जिस कर्म से पिता को प्रसन्न करता है, उसी के द्वारा प्रजापति ब्रह्माजी भी प्रसन्न होते हैं तथा जिस बर्ताव से वह माता को प्रसन्न कर लेता है, उसी के द्वारा समूची पृथ्वी की भी पूजा हो जाती है।
जिस कर्म से शिष्य गुरू को प्रसन्न करता है, उसी के द्वारा परब्रह्म परमात्मा की पूजा सम्पन्न हो जाती है। अतः माता-पिता से भी अधिक पूजनीय गुरू हैं।
गुरूओं के पूजित होने पर पितरों सहित देवता और ऋषि भी प्रसन्न होते हैं, इसलिए गुरू परम पूजनीय हैं।
किसी भी बर्ताव के कारण गुरू अपमान के योग्य नहीं होते। इसी तरह माता और पिता भी अनादर के योग्य नहीं हैं। जैसे, गुरू माननीय हैं वैसे ही माता-पिता भी माननीय हैं।
वे तीनों कदापि अपमान के योग्य नहीं है। उनके लिए किये हुए किसी भी कार्य की निन्दा नहीं करनी चाहिए। गुरूजनों के इस सत्कार को देवता और महर्षि भी अपना सत्कार मानते हैं।
गुरू, पिता और माता के प्रति जो मन, वाणी और क्रिया द्वारा द्रोह करते हैं, उन्हें भ्रूणहत्या से भी बढ़कर महान पाप लगता है। संसार में उनसे बढ़कर दूसरा कोई पापाचारी नहीं है।
जो पिता-माता का दत्तक पुत्र है, पाल पोसकर बड़ा कर दिया गया है, वह यदि अपने माता-पिता का भरण-पोषण नहीं करता है तो उसे भ्रूणहत्या से भी बढ़कर पाप लगता है और जगत में उससे बड़ा पापात्मा दूसरा कोई नहीं है।
मित्रद्रोही, कृतघ्न, स्त्रीहत्यारे और गुरूघाती, इन चारों के पाप का प्रायश्चित हमारे सुनने में नहीं आया है।
इस जगत में पुरूष के द्वारा जो पालनीय हैं, वे सारी बातें यहाँ विस्तार के साथ बतायी गयी हैं। यही कल्याणकारी मार्ग है। इससे बढ़कर दूसरा कोई कर्त्तव्य नहीं है। सम्पूर्ण धर्मों का अनुसरण करके यहाँ सबका सार बताया गया है।
(महाभारत शांतिपर्व)
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धर्म की पवित्र यज्ञवेदी में बलिदान देने वालों की परम्परा में गुरू गोविन्द सिंह के चार लाड़लों को, अमर शहीदों को भारत भुला सकता है ? नहीं, कदापि नहीं। अपने पितामह गुरूतेगबहादुर की कुर्बानी और भारत की स्वतन्त्रता के लिए संघर्षरत पिता गुरू गोविन्दसिंह ही उनके आदर्श थे। तभी तो इस नन्हीं सी 8-10 वर्ष की अवस्था में उन्होंने वीरता और धर्मपरायणता का जो प्रदर्शन किया उसे देखकर भारतवासी उनके लिये श्रद्धा से नतमस्तक हो उठते हैं।
गुरू गोविन्दसिंह की बढ़ती हुई शक्ति और शूरता को देखकर औरंगजेब झुंझलाया हुआ था। उसने शाही फरमान निकाला किः "पंजाब के सभी सूबों के हाकिम और सरदार तथा पहाड़ी क्षेत्रों के राजा मिलकर आनन्दपुर को बर्बाद कर डालो और गुरू गोविन्दसिंह को जिन्दा गिरफ्तार करो या उनका सिर काटकर शाही दरबार में हाजिर करो।"
बस, फिर क्या था ? मुगल सेना द्वारा आनंदपुर पर आक्रमण कर दिया गया। आनंदपुर किले में उपस्थित मुट्ठी भऱ सिक्ख सरदारों की सेना ने विशाल मुगल सेना को भी त्रस्त कर दिया। किन्तु धीरे-धीरे किले में रसद-सामान घटने लगा और सिक्ख सेना भूख से व्याकुल हो उठी। आखिरकार अपने साथियों की सलाह से बाध्य हो अनुकूल अवसर पाकर गुरू गोविन्द सिंह ने आधी रात में सपरिवार किला छोड़ दिया।
.....किन्तु न जाने कहाँ से यवनों को इसकी भनक लग गयी और दोनों सेनाओं में हलचल मच गयी। इसी भाग-दौड़ में गुरूगोविन्दसिंह के परिवार वाले अलग-अलग होकर भटक गये। गुरू गोविन्दसिंह की माता अपने दो छोटे-छोटे पौत्रों – जोरावरसिंह तथा फतेह सिंह के साथ दूसरी ओर निकल पड़ीं। उनके साथ रहने वाले रसोइये के विश्वासघात के कारण ये लोग विपक्षियों द्वारा गिरफ्तार किये गये और सरहिंद भेज दिये गये। सरहिंद सूबा के सरदार वजीद खाँ ने गुरू गोविन्दसिंह के हृदय को आघात पहुँचाने के ख्याल से उनके दोनों छोटे बच्चों को मुसलमान बनाने का निश्चय किया।
भरे दरबार में गुरू गोविन्दसिंह के इन दोनों पुत्रों से उसने पूछाः
"ऐ बच्चो ! तुम लोगों को इस्लाम धर्म की गोद में आना मंजूर है या कत्ल होना ?"
दो तीन बार पूछने पर जोरावरसिंह ने जवाब दियाः
"हमें कत्ल होना मंजूर है।"
कैसी दिलेरी है ! कितनी निर्भीकता ! जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते रहते हैं, उस नन्हीं सी सुकुमार अवस्था में भी धर्म के प्रति इन बालकों की कितनी निष्ठा है !"
वजीद खाँ बोलाः "बच्चों ! इस्लाम धर्म में आकर सुख से जीवन व्यतीत करो। अभी तो तुम्हारा फलने-फूलने का समय है। मृत्यु से भी इस्लाम धर्म को बुरा समझते हो ? जरा सोचो ! अपनी जिंदगी व्यर्थ क्यों गँवा रहे हो ?"
गुरू गोविन्दसिंह के लाड़ले वे वीर पुत्र..... मानों गीता के इस ज्ञान को उन्होंने पूरी तरह आत्मसात् कर लिया थाः स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावह। मरने से बढ़कर सुख देने वाला दुनिया में कोई काम नहीं। अपने धर्म की मर्यादा पर मिटना तो हमारे कुल की रीति है। हम लोग इस क्षणभंगुर जीवन की परवाह नहीं करते। मर-मिटकर भी धर्म की रक्षा करना ही हमारा अंतिम ध्येय है। चाहे तुम कत्ल करो या तुम्हारी जो इच्छा हो, करो।"
गुरू
गोविन्दसिंह
के पुत्र महान
न छोड़ा धर्म
हुए कुर्बान.......
इसी प्रकार फतेहसिंह ने भी बड़ी निर्भीकतापूर्वक धर्म को न त्यागकर मृत्यु का वरण श्रेयस्कर समझा। शाही दरबार आश्चर्यचकित हो उठा किः "इस नन्हीं-सी आयु में भी अपने धर्म के प्रति कितनी अडिगता है ! इन नन्हें-नन्हें सुकुमार बालकों में कितनी निर्भीकता है !" किन्तु अन्यायी शासक को भला यह कैसे सहन होता ? काजियों एवं मुल्लाओं की राय से इन्हें जीते जी दीवार में चिनवाने का फरमान जारी कर दिया गया।
कुछ ही दूरी पर दोनों भाई दीवार में चिने जाने लगे, तब धर्मांध सूबेदार ने कहाः
"ऐ बालकों ! अभी भी चाहो तो तुम्हारे प्राण बच सकते हैं। तुम लोग कलमा पढ़कर मुसलमान धर्म स्वीकार कर लो। मैं तुम्हें नेक सलाह देता हूँ।"
यह सुनकर वीर जोरावरसिंह गरज उठाः
"अरे अत्याचारी नराधम ! तू क्या बकता है ? मुझे तो खुशी है कि पंचम गुरू अर्जुनदेव और दादागुरू तेगबहादुर के आदर्शों को पूरा करने के लिए मैं अपनी कुर्बानी दे रहा हूँ। तेरे जैसे अत्याचारियों से यह धर्म मिटने वाला नहीं, बल्कि हमारे खून से वह सींचा जा रहा है और आत्मा तो अमर है, इसे कौन मार सकता है ?" दीवार शरीर को ढँकती हुई ऊपर बढ़ती जा रही थी। छोटे भाई फतेहसिंह की गर्दन तक दीवार आ गई थी। वह पहले ही आँखों से ओझल हो जाने वाला था। यह देखकर जोरावरसिंह की आँखों में आँसू आ गये। सूबेदार को लगा कि अब मुलजिम मृत्यु से भयभीत हो रहा है। अतः मन ही मन प्रसन्न होकर बोलाः "जोरावर ! अब भी बता दो तुम्हारी क्या इच्छा है ? रोने से क्या होगा ?"
जोरावरसिंहः "मैं बड़ा अभागा हूँ कि अपने छोटे भाई से पहले मैंने जन्म धारण किया, माता का दूध और जन्मभूमि का अन्न-जल ग्रहण किया, धर्म की शिक्षा पाई किन्तु धर्म के निमित्त जीवन-दान देने का सौभाग्य मेरे से पहले मेरे छोटे भाई फतेह को प्राप्त हो रहा है। इसीलिए मुझे आज खेद हो रहा है कि मुझसे पहले मेरा छोटा भाई कुर्बानी दे रहा है।"
लोग दंग रह गये कि कितने साहसी हैं ये बालक ! जो प्रलोभनों और जुल्मियों द्वारा अत्याचार किये जाने पर भी वीरतापूर्वक स्वधर्म में डटे रहे।
उधर गुरू गोविन्दसिंह की पूरी सेना युद्ध में काम आ गई। यह देखकर उनके बड़े पुत्र अजीतसिंह से नहीं रहा गया और वे पिता के पास आकर बोल उठेः
"पिता जी ! जीते जी बन्दी होना कायरता है, भागना बुजदिली है। इससे अच्छा है लड़कर मरना। आप आज्ञा करें, इन यवनों के छक्के छुड़ा दूँ या मृत्यु का आलिंगन करूँ।"
वीर पुत्र अजीतसिंह की बात सुनकर गुरू गोविन्दसिंह का हृदय प्रसन्न हो उठा और वे बोलेः
"शाबाश ! धन्य हो, पत्र ! जाओ, स्वदेश और स्वधर्म के निमित्त अपना कर्त्तव्यपालन करो। हिन्दू धर्म को तुम्हारे जैसे वीर बालकों की कुर्बानी की आवश्यकता है।
पिता की आज्ञा पाकर अत्यंत प्रसन्नता एवं जोश के साथ अजीतसिंह आठ-दस सिक्खों के साथ युद्ध-स्थल में जा धमका और देखते ही देखते यवन सेना के बड़े-बड़े सरदारों को मौत के घाट उतारते हुए खुद भी शहीद हो गया।
ऐसे वीर बालकों की गाथा से ही भारतीय इतिहास अमर हो रहा है।
अपने बड़े भाइयों को वीरगति प्राप्त करते देखकर उनसे छोटा भाई जुझारसिंह भला कैसे चुप बैठता ? वह भी अपने पिता गुरू गोविन्दसिंह के पास जा पहुँचा और बोलाः
"पिता जी ! बड़े भैया तो वीरगति को प्राप्त हो गये इसलिए मुझे भी भैया का अनुगामी बनने की आज्ञा दीजिए।" गुरू गोविन्दसिंह का हृदय भर आया और उन्होंने जुझार को गले लगा लिया। वे बोलेः "जाओ, बेटा ! तुम भी अमरपद प्राप्त करो, देवता तुम्हारा इन्तजार कर रहे हैं।"
धन्य है पुत्र की वीरता और धन्य है पिता की कुर्बानी ! अपने तीन पुत्रों की मृत्यु के पश्चात् स्वदेश एवं स्वधर्म-पालन के निमित्त अपने चौथे एवं अंतिम पुत्र को भी प्रसन्नता से धर्म एवं स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर चढ़ने के निमित्त स्वीकृति प्रदान कर दी !
वीर जुझारसिंह 'सत् श्री अकाल' कहकर उछल पड़ा। उसका रोम-रोम शत्रु को परास्त करने के लिए फड़काने लगा। स्वयं पिता ने उसे वीरों के वेश से सुसज्जित करके आशीर्वाद दिया और वीर जुझार पिता को प्रणाम करके अपने कुछ सरदार साथियों के साथ निकल पड़ा युद्धभूमि की ओर। जिस ओर जुझार गया उस ओर दुश्मनों का तीव्रता से सफाया होने लगा और ऐसा लगने लगा मानों महाकाल की लपलपाती जिह्वा सेनाओं को चाट रही है। देखते-देखते मैदान साफ हो गया। अंत में शत्रुओं से जूझते वह वीर बालक भी मृत्यु की भेंट चढ़ गया। देखने वाले दुश्मन भी उसकी प्रशंसा किये बिना न रह सके।
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सत्र 2
ललाट पर दोनों भौहों के बीच विचारशक्ति का केन्द्र है। योगी इसे आज्ञाचक्र कहते हैं। इसे शिवनेत्र अर्थात् कल्याणकारी विचारों का केन्द्र भी कहा जाता है।
यहाँ किया गया चन्दन अथवा सिन्दूर आदि का तिलक विचारशक्ति एवं आज्ञाशक्ति को विकसित करता है। इसलिए हिन्दू धर्म में कोई भी शुभ कार्य करते समय ललाट पर तिलक किया जाता है।
पूज्यपाद संत श्री आसाराम बापू को चन्दन का तिलक लगाकर सत्संग करते हुए लाखों-करोड़ों लोगों ने देखा है। वे लोगों को भी तिलक करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। भाव प्रधान, श्रद्धाप्रधान केन्द्रों में जीने वाली महिलाओं की समझ बढ़ाने के उद्देश्य से ऋषियों ने तिलक की परम्परा शुरू की। अधिकांश स्त्रियों का मन स्वाधिष्ठान एवं मणिपुर केन्द्र में ही रहता है। इन केन्द्रों में भय, भाव और कल्पना की अधिकता होती है। वे भावना एवं कल्पनाओं में बह न जायें, उनका शिवनेत्र, विचारशक्ति का केन्द्र विकसित होता हो इस उद्देश्य से ऋषियों ने स्त्रियों के लिए बिन्दी लगाने का विधान रखा है।
गार्गी, शाण्डिली, अनुसूया एवं अन्य कई महान नारियाँ इस हिन्दू धर्म में प्रगट हुई हैं। महान वीरों, महान पुरूषों, महान विचारकों तथा परमात्मा के दर्शन कराने का सामर्थ्य रखने वाले संतों को जन्म देने वाली मातृशक्ति को आज कई मिशनरी स्कूलों में तिलक करने से रोका जाता है। इस तरह का अत्याचार हिन्दुस्तानी कहाँ तक सहते रहेंगे ? मिशनरियों के षडयंत्रों का शिकार कब तक बनते रहेंगे ?
सरकार में घुसे मिशनरियों के दलाल, चमचे और धन लोलुप अखबार वाले जो ग्रीस व रोम की तरह इस भारत देश को तबाह करने पर उतारू हैं, उन धिक्कार के पात्रों को खुले आम सबक सिखाओ।
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जनवरी माह की 12 से 14 तारीख के बीच मकर सक्रान्ति का पर्व आता है। इस समय सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, इसीलिए इसे मकर सक्रान्ति कहते हैं। खगोलशास्त्रियों ने 14 जनवरी को मकर सक्रान्ति का दिवस तय कर लिया है। बाकी तो सूर्य का मकर राशि में प्रवेश कभी 12 से होता है, कभी 13 से तो कभी 14 तारीख से। ऐसा भी कहते हैं कि इस दिन से सूर्य का रथ उत्तर दिशा की ओर चलता है, अतः इसे उत्तरायण कहते हैं।
हमारे छः महीने बीतते है तब देवताओं की एक रात होती है और छः महीने का एक दिन। मकर सक्रान्ति के दिन देवता लोग भी जागते हैं। हम पर उन देवताओं की कृपा बरसे, इस भाव से भी यह पर्व मनाया जाता है। कहते हैं कि इस दिन यज्ञ में दिये गये द्रव्य को ग्रहण करने के लिए वसुंधरा पर देवता अवतरित होते हैं। इसी मार्ग से पुण्यात्मा पुरूष शरीर छोड़कर स्वर्गादिक लोकों में प्रवेश करते हैं, इसलिए यह आलोक का अवसर माना गया है। धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन पुण्य, दान, जप तथा धार्मिक अनुष्ठानों का अत्यंत महत्त्व है। इस अवसर पर दिया हुआ दान पुनर्जन्म होने पर सौ गुना होकर प्राप्त होता है।
यह प्राकृतिक उत्सव है, प्रकृति से तालमेल कराने वाला उत्सव है। दक्षिण भारत में तमिल वर्ष की शुरूआत इसी दिन से होती है। वहाँ यह पर्व 'थई पोंगल' के नाम से जाना जाता है। सिंधी लोग इस पर्व को 'तिरमौरी' कहते है। उत्तर भारत में यह पर्व 'मकर सक्रान्ति के नाम से और गुजरात में 'उत्तरायण' नाम से जाना जाता है।
आज का दिवस विशेष पुण्य अर्जित करने का दिवस है। आज के दिन शिवजी ने अपने साधकों पर, ऋषियों पर विशेष कृपा की थी। ऐसा भी माना जाता है आज के दिन भगवान शिव ने विष्णु जी को आत्मज्ञान का दान दिया था। तैत्तीरीय उपनिषद् में आता हैः एकं वा एतद् देवानाहंयत्संवत्सरः। देवों का संवत्सर गिनने का यह एक ही दिन है। विक्रम संवत्सर के पूर्व इसी दिन से संवत्सर की शुरूआत मानी जाती थी, ऐसा भी वर्णन आता है।
मकर सक्रान्ति के दिन किये गये सत्कर्म विशेष फल देते हैं। आज के दिन भगवान शिव को तिल-चावल अर्पण करने का विशेष महत्त्व माना गया है। तिल का उबटन, तिलमिश्रित जल से स्नान, तिलमिश्रित जल का पान, तिल-हवन, तिल-भोजन तथा तिल-दान सभी पापनाशक प्रयोग हैं। इसलिए इस दिन तिल और गुड़ या तिल और चीनी से बने लड्डू खाने तथा दान देने का अपार महत्त्व है। तिल के लड्डू खाने से मधुरता और स्निग्धता प्राप्त होती है तथा शरीर पुष्ट होता है। शीतकाल में इनका सेवन लाभप्रद है। महाराष्ट्र में आज के दिन एक-दूसरे को तिल-गुड़ देकर मधुरता का, सामर्थ्य का, परस्पर आंतरिक प्रेमवृद्धि का और आरोग्यता का संकल्प किया जाता है। वहाँ के लोग परस्पर तिल-गुड़ प्रदान करके कहते हैं- तिळ गुड़ घ्या गोड गोड बोला। अर्थात् तिल-गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो।
यह तो हुआ लौकिक रूप से संक्रांति मनाना किंतु मकर सक्रांति का आध्यात्मिक तात्पर्य है जीवन में सम्यक् क्रान्ति। अपने चित्त को विषय विकारों से हटाकर निर्विकारी नारायण में लगाने का और सम्यक् क्रांति का संकल्प करने का यह दिन है। अपने जीवन को परमात्म-ध्यान, परमात्म-ज्ञान और परमात्म प्राप्ति की ओर ले जाने संकल्प का बढ़िया से बढ़िया जो दिन है, वही संक्रांति का दिन है।
मानव सदा ही सुख का प्यासा रहा है। उसे सम्यक् सुख नहीं मिलता है तो अपने को असम्यक् सुख में खपा-खपा कर कई जन्मों तक जन्मता-मरता रहता है। अतः अपने जीवन में सम्यक् सुख पाने के लिए पुरूषार्थ करना चाहिए। वास्तविक सुख क्या है ? परमात्मा-प्राप्ति। अतः उस परमात्म-प्राप्ति का सुख पाने के लिए कटिबद्ध होने का दिवस ही है सक्रांति। संक्रांति का पर्व हमें सिखाता है कि हमारे जीवन में भी सम्यक् क्रान्ति आ जाये। हमारा जीवन निर्भयता और प्रेम से परिपूर्ण हो जाय। तिल-गुड़ का आदान-प्रदान परस्पर प्रेमवृद्धि का ही तो द्योतक है !
संक्रांति के दिन दान का विशेष महत्त्व है। अतः जितना संभव हो सके, उतना किसी गरीब को अन्नदान करें। तिल के लड्डू भी दान किये जाते हैं। आज के दिन सत्साहित्य के दान का भी सुअवसर प्राप्त किया जा सकता है। तुम यह सब न कर सको तो भी कोई हर्ज नहीं किन्तु हरिनाम का रस तो जरूर पिलाना। अच्छे में अच्छा तो परमात्मा है। उसका नाम लेते लेते यदि अपने अहं को सदगुरू के चरणों में, संतों के चरणों में अर्पित कर दो तो फायदा ही फायदा है।...... और अहंदान से बढ़कर तो कोई दान नहीं है। अगर अपना आपा संतों के चरणों में, सदगुरू के चरणों में दान कर दिया जाय तो फिर चौरासी का चक्कर सदा के लिए मिट जाय।
संक्रान्ति के दिन सूर्य का रथ उत्तर की ओर प्रयाण करता है। उसी तरह तुम भी इस मकर संक्रांति के पर्व पर संकल्प कर लो कि अब हम अपने जीवन को उत्तर की ओर अर्थात् उत्थान की ओर ले जायेंगे। अपने विचारों को उत्थान की तरफ मोड़ंगे। यदि ऐसा कर सको तो आज का दिन तुम्हारे लिए परम मांगलिक दिन हो जायेगा। पहले के जमाने में आज के दिन लोग अपने तुच्छ जीवन को बदलकर महान बनाने का संकल्प करते थे।
हे साधक ! तू भी आज संकल्प कर कि अपने जीवन में सम्यक् क्रान्ति-संक्रांति लाऊँगा। अपनी तुच्छ, गंदी आदतों को कुचल दूँगा और दिव्य जीवन बिताऊँगा। प्रतिदिन प्रार्थना करूँगा, जप ध्यान करूँगा, स्वाध्याय करूँगा और अपने जीवन को महान बनाकर ही रहूँगा। प्राणिमात्र के जो परम हितैषी हैं, उन परमात्मा की लीला में प्रसन्न रहूँगा। चाहे मान हो चाहे अपमान, चाहे सुख मिले चाहे दुःख, किंतु सबके पीछे देने वाले के करूणामय हाथों को ही देखूँगा। प्रत्येक परिस्थिति में सम रहकर अपने जीवन को तेजस्वी-ओजस्वी और दिव्य बनाने का प्रयास अवश्य करूँगा।
हरि
ॐ....ॐ......ॐ......ॐ......
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सत्र 3
शास्त्रों
में आता है कि
जिसने
माता-पिता तथा
गुरू का आदर
कर लिया उसके
द्वारा
संपूर्ण लोकों
का आदर हो गया
और जिसने इनका
अनादर कर दिया
उसके संपूर्ण
शुभ कर्म
निष्फल हो
गये। वे बड़े
ही भाग्यशाली
हैं,
जिन्होंने
माता-पिता और
गुरू की सेवा
के महत्त्व को
समझा तथा उनकी
सेवा में अपना
जीवन सफल
किया। ऐसा ही
एक भाग्यशाली
सपूत था - पुण्डलिक।
पुण्डलिक
अपनी
युवावस्था
में
तीर्थयात्रा करने
के लिए निकला।
यात्रा
करते-करते
काशी पहुँचा।
काशी में
भगवान
विश्वनाथ के दर्शन
करने के बाद
उसने लोगों से
पूछाः क्या यहाँ
कोई पहुँचे
हुए महात्मा
हैं, जिनके
दर्शन करने से
हृदय को शांति
मिले और ज्ञान
प्राप्त हो?
लोगों
ने कहाः हाँ
हैं। गंगापर
कुक्कुर मुनि का
आश्रम है। वे
पहुँचे हुए
आत्मज्ञान
संत हैं। वे
सदा परोपकार
में लगे रहते
हैं। वे इतनी
उँची कमाई के
धनी हैं कि
साक्षात माँ गंगा,
माँ यमुना और
माँ सरस्वती
उनके आश्रम में
रसोईघर की
सेवा के लिए
प्रस्तुत हो
जाती हैं। पुण्डलिक
के मन में
कुक्कुर मुनि
से मिलने की जिज्ञासा
तीव्र हो उठी।
पता
पूछते-पूछते
वह पहुँच गया
कुक्कुर मुनि
के आश्रम में।
मुनि के देखकर
पुण्डलिक ने
मन ही मन
प्रणाम किया
और सत्संग वचन
सुने। इसके
पश्चात पुण्डलिक
मौका पाकर
एकांत में
मुनि से मिलने
गया। मुनि ने
पूछाः वत्स!
तुम कहाँ से आ
रहे हो?
पुण्डलिकः
मैं पंढरपुर
(महाराष्ट्र)
से आया हूँ।
तुम्हारे
माता-पिता
जीवित हैं?
हाँ
हैं।
तुम्हारे
गुरू हैं?
हाँ,
हमारे गुरू
ब्रह्मज्ञानी
हैं।
कुक्कुर
मुनि रूष्ट
होकर बोलेः
पुण्डलिक! तू बड़ा
मूर्ख है।
माता-पिता
विद्यमान हैं,
ब्रह्मज्ञानी
गुरू हैं फिर
भी तीर्थ करने
के लिए भटक
रहा है? अरे
पुण्डलिक!
मैंने जो कथा
सुनी थी उससे
तो मेरा जीवन
बदल गया। मैं
तुझे वही कथा
सुनाता हूँ।
तू ध्यान से
सुन।
एक
बार भगवान
शंकर के यहाँ
उनके दोनों
पुत्रों में
होड़ लगी कि,
कौन बड़ा?
निर्णय
लेने के लिए
दोनों गय़े
शिव-पार्वती
के पास।
शिव-पार्वती
ने कहाः जो
संपूर्ण
पृथ्वी की
परिक्रमा
करके पहले
पहुँचेगा, उसी
का बड़प्पन
माना जाएगा।
कार्तिकेय
तुरन्त अपने
वाहन मयूर पर
निकल गये
पृथ्वी की
परिक्रमा
करने। गणपति
जी चुपके-से
एकांत में चले
गये। थोड़ी
देर शांत होकर
उपाय खोजा तो
झट से उन्हें
उपाय मिल गया।
जो ध्यान करते
हैं, शांत
बैठते हैं
उन्हें
अंतर्यामी परमात्मा
सत्प्रेरणा
देते हैं। अतः
किसी कठिनाई
के समय घबराना
नहीं चाहिए बल्कि
भगवान का
ध्यान करके
थोड़ी देर
शांत बैठो तो
आपको जल्द ही
उस समस्या का
समाधान मिल
जायेगा।
फिर
गणपति जी आये
शिव-पार्वती
के पास।
माता-पिता का
हाथ पकड़ कर
दोनों को ऊँचे
आसन पर बिठाया,
पत्र-पुष्प से
उनके
श्रीचरणों की
पूजा की और
प्रदक्षिणा
करने लगे। एक
चक्कर पूरा
हुआ तो प्रणाम
किया.... दूसरा
चक्कर लगाकर प्रणाम
किया.... इस
प्रकार
माता-पिता की
सात प्रदक्षिणा
कर ली।
शिव-पार्वती
ने पूछाः
वत्स! ये
प्रदक्षिणाएँ
क्यों की?
गणपतिजीः
सर्वतीर्थमयी
माता...
सर्वदेवमयो
पिता... सारी
पृथ्वी की
प्रदक्षिणा
करने से जो
पुण्य होता है,
वही पुण्य
माता की
प्रदक्षिणा
करने से हो जाता
है, यह
शास्त्रवचन
है। पिता का
पूजन करने से
सब देवताओं का
पूजन हो जाता
है। पिता देवस्वरूप
हैं। अतः आपकी
परिक्रमा
करके मैंने संपूर्ण
पृथ्वी की सात
परिक्रमाएँ
कर लीं हैं।
तब से गणपति
जी प्रथम
पूज्य हो गये।
शिव-पुराण
में आता हैः
पित्रोश्च
पूजनं कृत्वा
प्रक्रान्तिं
च करोति यः।
तस्य वै
पृथिवीजन्यफलं
भवति निश्चितम्।
अपहाय
गृहे यो वै
पितरौ
तीर्थमाव्रजेत्।
तस्य पापं तथा
प्रोक्तं
हनने च
तयोर्यथा।।
पुत्रस्य
च महत्तीर्थं
पित्रोश्चरणपंकजम्।
अन्यतीर्थं
तु दूरे वै
गत्वा सम्प्राप्यते
पुनः।।
इदं
संनिहितं
तीर्थं सुलभं
धर्मसाधनम्।
पुत्रस्य य
स्त्रियाश्चैव
तीर्थं गेहे
सुशोभनम्।।
जो
पुत्र
माता-पिता की
पूजा करके
उनकी प्रदक्षिणा
करता है, उसे
पृथ्वी-परिक्रमाजनित
फल सुलभ हो
जाता है। जो
माता-पिता को
घर पर छोड़ कर
तीर्थयात्रा
के लिए जाता
है, वह
माता-पिता की
हत्या से
मिलने वाले
पाप का भागी
होता है
क्योंकि
पुत्र के लिए
माता-पिता के
चरण-सरोज ही
महान तीर्थ
हैं। अन्य
तीर्थ तो दूर
जाने पर
प्राप्त होते
हैं परंतु
धर्म का
साधनभूत यह
तीर्थ तो पास
में ही सुलभ
है। पुत्र के
लिए
(माता-पिता) और
स्त्री के लिए
(पति) सुंदर
तीर्थ घर में
ही विद्यमान
हैं।
(शिव पुराण, रूद्र सं..
कु खं.. - 20)
पुण्डलिक
मैंने यह कथा
सुनी और अपने
माता-पिता की
आज्ञा का पालन
किया। यदि
मेरे
माता-पिता में
कभी कोई कमी
दिखती थी तो
मैं उस कमी को
अपने जीवन में
नहीं लाता था
और अपनी
श्रद्धा को भी
कम नहीं होने
देता था। मेरे
माता-पिता प्रसन्न
हुए। उनका
आशीर्वाद मुझ
पर बरसा। फिर
मुझ पर मेरे
गुरूदेव की
कृपा बरसी
इसीलिए मेरी
ब्रह्मज्ञा
में स्थिति
हुई और मुझे
योग में भी
सफलता मिली।
माता-पिता की
सेवा के कारण
मेरा हृदय
भक्तिभाव से
भरा है। मुझे
किसी अन्य
इष्टदेव की
भक्ति करने की
कोई मेहनत नहीं
करनी पड़ी।
मातृदेवो
भव। पितृदेवो
भव।
आचार्यदवो
भव।
मंदिर
में तो पत्थर
की मूर्ति में
भगवान की कामना
की जाती है
जबकि
माता-पिता तथा
गुरूदेव में
तो सचमुच
परमात्मदेव
हैं, ऐसा
मानकर मैंने
उनकी
प्रसन्नता
प्राप्त की।
फिर तो मुझे न
वर्षों तक तप
करना पड़ा, न
ही अन्य
विधि-विधानों
की कोई मेहनत
करनी पड़ी।
तुझे भी पता
है कि यहाँ के
रसोईघर में
स्वयं गंगा-यमुना-सरस्वती
आती हैं।
तीर्थ भी
ब्रह्मज्ञानी
के द्वार पर
पावन होने के
लिए आते हैं।
ऐसा
ब्रह्मज्ञान
माता-पिता की
सेवा और ब्रह्मज्ञानी
गुरू की कृपा
से मुझे मिला
है।
पुण्डलिक
तेरे
माता-पिता
जीवित हैं और
तू तीर्थों
में भटक रहा
है?
पुण्डलिक
को अपनी गल्ती
का एहसास हुआ।
उसने कुक्कुर
मुनि को
प्रणाम किया
और पंढरपुर
आकर माता-पिता
की सेवा में
लग गया।
माता-पिता
की सेवा ही
उसने प्रभु की
सेवा मान ली।
माता-पिता के
प्रति उसकी
सेवानिष्ठा
देखकर भगवान
नारायण बड़े
प्रसन्न हुए
और स्वयं उसके
समक्ष प्रकट
हुए।
पुण्डलिक उस
समय माता-पिता
की सेवा में
व्यस्त था।
उसने भगवान को
बैठने के लिए
एक ईंट दी।
अभी
भी पंढरपुर
में पुण्डलिक
की दी हुई ईंट
पर भगवान
विष्णु खड़े
हैं और
पुण्डलिक की
मातृ-पितृभक्ति
की खबर दे रहा
है पंढरपुर
तीर्थ।
यह
भी देखा गया
है कि
जिन्होंने
अपने माता-पिता
तथा
ब्रह्मज्ञानी
गुरू को रिझा
लिया है, वे भगवान
के तुल्य पूजे
जाते हैं।
उनको रिझाने के
लिए पूरी
दुनिया
लालायित रहती
है। वे
मातृ-पितृभक्ति
से और
गुरूभक्ति से
इतने महान हो
जाते हैं।
जो
माता-पिता,
स्वजन, पति
आदि सत्संग या
भगवान के
रास्ते, ईश्वर
के रास्ते
जाने से रोकते
हैं तो उनकी
बात नहीं
माननी चाहिए।
जैसे, मीरा ने पति
की बात ठुकरा
दी और
प्रह्लाद ने पिता
की।
गोस्वामी
जी के वचन हैं
किः
जाके
प्रिय न राम
बैदेही, तजिए
ताहि कोटि
बैरी सम, जद्यपि
परम सनेही।
भागवत
में भी कहा
हैः
गुरूर्न स
स्यात्स्वजनो
न स स्यात्
पिता न स स्याज्जननी
न सा स्यात्।
देवं न
तत्स्यान्न
पतिश्च स
स्यान्न
मोचयेद्यः
समुपेतमृत्युम्।।
'जो अपने
प्रिय
सम्बन्धी को
भगवद् भक्ति
का उपदेश देकर
मृत्यु की
फाँसी से नहीं
छुड़ाता, वह गुरू
नहीं है,
स्वजन स्वजन
नहीं है, पिता
पिता नहीं है,
माता माता
नहीं है,
इष्टदेव
इष्टदेव नहीं
है और पति पति
नहीं है।'
(श्रीमद्
भागवतः 5.5.18)
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
गुरू
गोविन्दसिंह
का शिष्य
कन्हैया
युद्ध के
मैदान में
पानी की प्याऊ
लगाकर सभी
सैनिकों को
पानी पिलाता
था। कभी-कभी
मुगलों के
सैनिक भी आ
जाते थे पानी
पीने के लिए।
यह देखकर
सिक्खों ने गुरू
गोविन्दसिंह
से कहाः "गुरूजी ! यह कन्हैया
अपने सैनिकों
को तो जल
पिलाता ही है
किन्तु
दुश्मन
सैनिकों को भी
पिलाता है। दुश्मनों
को तो तड़पने
देना चाहिए न ?"
गुरू
गोविन्दसिंह
ने कन्हैया को
बुलाकर पूछाः "क्यों भाई ! दुश्मनों
को भी पानी
पिलाता है ? अपनी ही फौज
को पानी
पिलाना चाहिए
न ?"
कन्हैयाः "गुरू जी ! जब से आपकी
कृपा हुई है
तब से मुझे
सबमें आपका ही
स्वरूप दिखता
है।
अपने-पराये
सबमें मुझे तो
गुरूदेव ही
लीला करते नजर
आते हैं। मैं
अपने गुरूदेव
को देखकर कैसे
इन्कार करूँ ?"
तब गुरू
गोविन्दसिंह
ने कहाः "सैनिकों ! कन्हैया ने
जितना मुझे
समझा है, इतना
मुझे किसी ने
नहीं समझा।
कन्हैया को
अपना काम करने
दो।"
जिन्हें
परमात्मतत्त्व
का,
गुरूतत्त्व
का बोध हो
जाता है, उनके
चित्त से
शत्रुता,
घृणा, ग्लानि,
भय, शोक,
प्रलोभन,
लोलुपता,
अपना-पराया आदि
की सत्यता, ये
सब विदा हो
जाते हैं।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
सत्र 4
वर्त्तमान
समय में
अंग्रेजी
भाषा का
प्रचलन इस कदर
हमारे बीच में
फैल गया कि
हमारी संस्कृति
का दम घुट रहा
है और हमें
पता ही नहीं
कि हमारे
बोलने से,
खाने पीने से,
उठने बैठने से
और परस्पर
व्यवहार से आज
अंग्रजीयत की
बू आती है। इसमें
अंग्रेजी
भाषा तो इस
प्रकार छा गई
है कि उसके
बिना कोई काम
ही नहीं होता ! पाश्चात्य
शिक्षा
पद्धति ने
हमको हमारी
भारतीय
संस्कृति से
कोसों दूर
लाकर खड़ा कर
दिया है। अंग्रेजों
के द्वारा
लायी गयी इस
शिक्षा पद्धति
के पीछे हमारा
कितना बड़ा
पतन छिपा है
इसको हमने
जानने की कभी
कोशिश ही नहीं
की।
अंग्रेजों
का 1858 में 'इंडियन
एजुकेशन एक्ट' बनाने के
पीछे लार्ड
मैकाले की
कितनी घिनौनी योजना
थी, उससे हम
अपरिचित तो
नहीं हैं, फिर
भी हमने कभी
इस ओर ध्यान
देने की जरूरत
ही नहीं समझी।
लार्ड मैकाले
कहा करता थाः 'यदि इस देश
को हमेशा के
लिए गुलाम
बनाना चाहते
हो तो
हिन्दुस्तान
की स्वदेशी
शिक्षा पद्धति
को समाप्त कर
उसके स्थान पर
अंग्रजी
शिक्षा पद्धति
लाओ। फिर इस
देश में शरीर
से तो हिन्दुस्तानी
लेकिन दिमाग
से अंग्रेज
पैदा होंगे।
जब वे लोग इस
देश के
विश्वविद्यालय
से निकलकर
शासन करेंगे
तो वह शासन
हमारे हित में
होगा।' यह थी लार्ड
मैकाले की
शिक्षा
पद्धति।
परंतु हम
समझते हैं कि
इसी पद्धति से
हम आगे बढ़े
हैं लेकिन
वास्तव में
आगे बढ़ने का
दिखावा मात्र करते
हुए आज हम
इतने पीछे चले
गये कि हम
कहाँ से चले
थे वह स्थान
ही भूल गये।
मैकाले का
वह घिनौना
षडयंत्र आज हम
सबके सामने
अपनी जड़ें
फैला रहा है
और हम उसे खाद
पानी देते जा
रहे हैं। आज
विद्यालयों
में फैल रही
अनैतिकता,
अपराधीकरण
तथा
विद्यार्थियों
के मानसिक असंतुलन
का कारण यही
लार्ड मैकाले
की शिक्षा पद्धति
है जिसने
हिन्दुस्तान
को काले
अंग्रेजों का
देश बनाने में
लगभग सफलता
हासिल कर ली
है। आज के
हिन्दुस्तान
को काले
अंग्रेजों का
देश बनाने में
लगभग सफलता
हासिल कर ली
है। आज के हिन्दुस्तान
को कोई देखे
तो यह अनुमान
नहीं लगा सकता
कि इस देश में
कभी
श्रीकृष्ण,
श्रीराम व
युधिष्ठिर
जैसे महान
राजाओं को
जन्म देने
वाली गुरूकुल
शिक्षा
पद्धति रही
होगी।
गाँधीजी व
स्वामी
विवेकानन्द
के जीवन को
अगर देखें तो
मैकाले
शिक्षा
पद्धति की
असलियत साफ
नजर आती है।
मैकाले
पद्धति से
ऊँची शिक्षा प्राप्त
करके भी जब
अपने जीवन को
नीरस जाना तो गाँधी
जी ने भारतीय
शास्त्रों व
विवेकानंदजी
ने सदगुरू की
शरण ली तथा
अंग्रेजों की
इस पद्धति का
जोरदार विरोध
किया और अपने
पूरे जीवन को
अंग्रजियत के
खिलाफ
संग्राम करने
में लगा दिया।
इन्डियन
ऐजुकेशन नाम
का यह एक्ट
जिसे हम अपनी
भारतीय
संस्कृति पर
बदनुमा दाग भी
कह सकते हैं
को 1858 में
अंग्रेजी
सरकार ने लागू
किया। इसके
बाद कलकत्ता,
मुंबई तथा
मद्रास विश्वविद्यालय
की स्थापना
हुई। इनमें जो
कानून 1858 में
चलता था वही
आज भी चलता
है। ये तीनों
विश्वविद्यालय
हमारी गुलामी
के प्रतीक के
रूप में इस
देश में खड़े
हैं और हमको
इन विश्वविद्यालयों
में पढ़ने का
अभिमान होता
है। कितनी
गुलामी भर गयी
है हमारे जीवन
में ! अगर अपने
जीवन को
टटोलकर देखें
तो हम आज भी वही
गुलामी की
जिन्दगी जी
रहे हैं जो 50
वर्ष पहले जी
रहे थे। हम
भले अपने आपको
कितना भी आगे
बढ़ा हुआ
समझने का ढोंग
करते हों
किन्तु यदि
ठीक से देखें,
स्वतंत्रता
की दृष्टि से
देखें तो हम
अब वहाँ भी
नहीं हैं जहाँ
हम पहले थे।
हम उससे भी
लाखों कोस
पीछे जा चुके
हैं। हम आज 50
वर्ष पुरानी
गुलामी से भी
बदतर गुलामी
का जीवन जी
रहे हैं।
क्योंकि 50
वर्ष पहले
अंग्रेजों ने
गोलियों के बल
से हमारे शरीर
को गुलाम
बनाया था
लेकिन आज हम
स्वेच्छा से
अपने मन व
सम्पूर्ण
जीवन को
अंग्रेजियत
का गुलाम बना
चुके हैं।
इस गंभीर
स्थिति में
हमें चाहिए कि
हम अपनी मधुर
व हितभरी
स्वदेशी भाषा
का इस्तेमाल
करें। अपने
गुरूओं के
द्वारा चलायी
गयी गुरूकुल
पद्धति
द्वारा
भारतीय संस्कृति
के उच्च
संस्कारों से
विद्यार्थी के
जीवन को
सिंचित कर उसे
महान एवं
तेजस्वी नागरिक
बनायें। उसे
गुलाम नहीं
वरन्
स्वतंत्र देश
का सम्मानीय
स्वतंत्र
पुरूष बनायें
जिससे हम अपने
देश के खोये
गौरव को पुनः
प्राप्त कर सकें।
हम अपने
बच्चों को
अपनी
राष्ट्रभाषा,
मातृभाषा का
प्रयोग
सिखाएँ।
उन्हें
पाश्चात्य
संस्कृति के
मोहजाल में
फँसने से
बचाएँ। उन्हें
कान्वेंट
स्कूलों में न
पढ़कर भारतीय पद्धति
के अनुसार
गुरूओं की
पद्धति
द्वारा जैसे
विवेकानन्द
महान बने उस
पद्धति
द्वारा संयम और
सदाचार का
जीवन जीना
सिखाएँ ताकि
उनके द्वारा
भी हमें
हजारों
विवेकानंद,
रामतीर्थ, रामकृष्ण,
गुरूनानक
जैसे रत्न
प्राप्त हो
सकें व अपनी
मातृभूमि के
गौरव को चार
चाँद लगा
सकें।
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आज से 104 वर्ष पूर्व सन् 1893 में शिकागो में जब विश्वधर्म परिषद (World Religious Parliament) का आयोजन हुआ था तब भारत के धर्मप्रतिनिधि के रूप में स्वामी विवेकानंद वहाँ गये थे। विश्वधर्म परिषद वाले मानते थे कि ये तो भारत के कोई मामूली साधू हैं। इन्हें तो प्रवचन के लिए पाँच मिनट भी देंगे तो भी शायद कुछ नहीं बोल पाएँगे....
उन्होंने स्वामी विवेकानंद के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया और उनका मखौल उड़ाते हुए कहाः "सब धर्मग्रन्थों में आपका ग्रंथ सबसे नीचे है, अतः आप शून्य पर बोलें।"
प्रवचन की शुरूआत में स्वामी विवेकानंद द्वारा किये गये उदबोधन 'मेरे प्यारे अमेरिका के भाइयों और बहनों !' को सुनते ही श्रोताओं में इतना उल्लास छा गया कि दो मिनट तक तो तालियों की गड़गड़ाहट ही गूँजती रही। तत्पश्चात स्वामी विवेकानंद ने मानो सिंहगर्जना करते हुए कहाः
"हमारा धर्मग्रंथ सबसे नीचे है। उसका अर्थ यह नहीं है कि वह सबसे छोटा है अपितु सबकी संस्कृति का मूलरूप, सब धर्मों का आधार हमारा धर्मग्रंथ ही है। यदि मैं उस धर्मग्रंथ को हटा लूँ तो आपके सभी ग्रंथ गिर जाएँगे। भारतीय संस्कृति ही महान है तथा सर्व संस्कृतियों का आधार है। नेति.... नेति.... करते हुए वेद जिसका वर्णन करने में अपनी असमर्थता प्रकट करते है उस चैतन्य तत्त्व का ज्ञान पाना यही भारत की आध्यात्मिक संस्कृति का बीज मंत्र है और इसीलिए भारतीय संस्कृति विश्व में सर्वोच्च है, सर्वोपरि है।"
हिंदू धर्म को ऊपर-ऊपर से देखकर टीका करने वालों के समक्ष गंभीरता एवं सामर्थ्य से सच्चाई पेश करने में उन्होंने कीर्ति-अपकीर्ति के प्रश्न की परवाह नहीं की। परिषद में अपने प्रवचन के दौरान उन्होंने सभा को ललकारते हुए कहाः
"जिन्होंने स्वयं हिंदू धर्म के शास्त्र पढ़कर, इस धर्म का ज्ञान प्राप्त किया हो – ऐसे लोग हाथ ऊपर उठायें।"
......और उस विशाल सभा में कितने हाथ ऊपर उठे ? बस, केवल तीन-चार। देश-विदेश के धर्माध्यक्ष एवं सरकारी पुरूषों की सभा में हिंदू धर्म का ज्ञान रखने वाले केवल तीन-चार व्यक्ति ही थे।
तत्त्पश्चात् सभाजनों पर मधुर कटाक्ष करते हुए विवेकानन्द ने कहाः
".....और इसके बावजूद भी आप हमारा मूल्यांकन करने की धृष्टता कर रहे हो ?"
उस धर्मपरिषद में विवेकानंद को प्रवचन के लिए पाँच मिनट देने में भी जिन्हें तकलीफ होती थी, वे ही आयोजक उनके प्रवचनों के लिए श्रोताओं की ओर से प्राप्त सम्मान को देखकर विमूढ़ हो रहे थे।
विश्वधर्मपरिषद के विज्ञान शाखा के ऑनरेबल मेरविन-मेरी-स्नेल ने लिखा हैः "धर्मपरिषद पर एवं अधिकांश अमेरिकन लोगों पर हिन्दू धर्म ने जितना प्रभाव अंकित किया उतना अन्य किसी धर्म ने अंकित नहीं किया।"
ऐसी महान संस्कृति एवं धर्म की सुरक्षा करने की बजाय हम पश्चिम की संस्कृति का अंधानुकरण करने से मुक्त नहीं हो रहे हैं यह हमारे समाज और देश के लिए कितनी शर्मजनक बात है !
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सत्र 5
मार्गरेट नोबल आयरलैण्ड की एक महिला थी जो बाद में स्वामी विवेकानन्द की शिष्या बनी और भगिनी निवेदिता के नाम से प्रसिद्ध हुई।
मिदनापुर में स्वामी जी का भाषण चल रहा था। सब मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे। कुछ युवकों ने हर्ष से 'हिप-हिप-हुर्रे.....' का उदघोष किया।
इस पर स्वामी जी ने भाषण बीच में रोककर उन्हें डाँटते हुए कहाः "चुप रहो। लज्जा आनी चाहिए तुम्हें। क्या तुम्हें अपनी भाषा का तनिक भी गर्व नहीं ? क्या तुम्हारे पिता अंग्रेज थे ? क्या तुम्हारी माँ गोरी चमड़ी की यूरोपियन थी ? अंग्रेजों की नकल क्या तुम्हें शोभा देती है ?"
यह सुनकर युवक स्तब्ध रह गये। सबके सिर झुक गये। फिर भगिनी निवेदिता ने कहा किः "भाषण की कोई बात अच्छी लगे तो स्वभाषा में बोला करो। सच्चिदानंद परमात्मा की जय..... भारत माता की जय.... सदगुरू की जय......" युवकों ने तत्काल उस निर्दश का पालन किया।
भारत में प्राचीन काल से ही प्रसन्नता के ऐसे अवसरों पर 'साधो-साधो' कहने की प्रथा थी जो पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण से लुप्त हो गयी। अंग्रेज तो चले गये, पर अंग्रेजी नहीं गई। अंग्रेजों की गुलामी से तो मुक्त हुए, पर अंग्रेजी के गुलाम हो गये।
अतः स्वतंत्र भारत के परतंत्र नागरिकों से निवेदन है कि वे भगिनी निवेदिता के वचनों को याद रखें, स्वभाषा का प्रयोग करें।
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हमारी सनातन संस्कृति में माता-पिता तथा गुरूजनों को नित्य चरणस्पर्श करके प्रणाम करने का विधान है। चरणस्पर्श करके प्रणाम न कर सकें तो दोनों हाथ जोड़कर ही नमस्कार करें। कन्याओं को तो किसी भी पुरूष के पैर छूकर प्रणाम करना ही नहीं चाहिए। शास्त्रों में आता हैः
अभिवादनशीलस्य
नित्यं
वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य
वर्द्धन्ते
आयुर्विद्या
यशो बलम्।।
'जो नम्रताशील हैं तथा नित्य बड़ों की सेवा करता है उसके आयु, विद्या, यश एवं बल ये चारों बढ़ते हैं।'
हमारी संस्कृति में अभिवादन करना 'गुड मार्निंग', 'गुड इवनिंग' अथवा 'हेलो-हाय' की भाँति एक निरर्थक व्यापार नहीं है जिसमें लाभ तो कुछ होता नहीं अपितु व्यर्थ की वाणी नष्ट होती है और चंचलता आती है। मनु आदि महर्षियों ने हमारी संस्कृति की अभिवादन पद्धति के चार लाभ बताये हैं – आयुवृद्धि, विद्यावृद्धि, यशवृद्धि एवं बलवृद्धि। यही चार वस्तुएँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिए आवश्यक हैं। अर्थात् बड़ों के चरणस्पर्श करने से पुरूषार्थ चातुष्टय साधने में सहायता मिलती है।
यह मात्र कल्पना नहीं अपितु एक ऐसा कठोर सत्य है जिसे स्वीकार करने के लिए आज का विज्ञान भी मजबूर हो गया है।
प्रत्येक मनुष्य के शरीर में धनात्मक एवं ऋणात्मक विद्युतधारायें सतत प्रवाहित होती रहती हैं। शरीर के दायें भाग में धनात्मक एवं बायें हिस्से में ऋणात्मक विद्युतधाराओं की अधिकता होती है।
इस सिद्धान्त को हम पक्षाघात रोग के द्वारा भी समझ सकते हैं। इस रोग में व्यक्ति के शरीर का एक हिस्सा जड़ हो जाता है जबकि दूसरा हिस्सा पूर्ववत् क्रियाशील बना रहता है। अतः मानव शरीर एक होने के बावजूद भी उसके दो हिस्सों में दो अलग-अलग प्रकार की विद्युतधारायें बहती रहती हैं।
जब हम माता-पिता तथा गुरूजनों को प्रणाम करते हैं तो स्वाभाविक रूप से हमारे दायें-बायें अंग उनके दायें-बायें अंगों से विपरीत होते हैं। जब हम अपनी ऋषिपरम्परा के अनुसार अपने हाथों से चौकड़ी (X) का चिन्ह बनाते हुए अपने दायें हाथ से उनका दायाँ चरण तथा बायें हाथ से बायाँ चरण छूते हैं तो हमारे तथा उनके शरीर की धनात्मक एवं ऋणात्मक विद्युतधाराएँ आपस में मिल जाती हैं जिसे वैज्ञानिक लोग औरा (Aura) बोलते हैं।
इसके बाद जब वे आदरणीय प्रणाम करने वाले के सिर, कंधों अथवा पीठ पर अपना हाथ रखते हैं तो इस स्थिति में दोनों शरीरों में बहने वाली विद्युत का एक आवर्त (वलय) बन जाता है। आज कल विशिष्ट प्रकार के कैमरा निकले हैं जो उस तेजोवलय का चित्र भी खींचते हैं।
यहाँ पर यह बताना भी आवश्यक होगा कि ये विद्युतधाराएँ मात्र शरीर में ही नहीं बहती हैं अपितु इनकी सूक्ष्म तरंगे शरीर के रोमकूपों तथा नुकीले मार्गों से बाहर भी निकलती हैं। इन्हीं तरंगों को हमारे ऋषियों ने 'तेजोवलय' का नाम दिया है।
शरीर द्वारा होने वाली चेष्टाओं का मूल केन्द्र मस्तिष्क है। किसी भी कार्य द्वारा निर्णय करने के पश्चात उसकी आज्ञानुसार शरीर के सभी अंग अपना-अपना कार्य करते हैं। मस्तिष्क के विचारों के पूरे शरीर तक पहुँचाने में इस विद्युतशक्ति का बड़ा योगदान होता है। नारी अपने मस्तक पर भ्रूमध्य में तिलक करे। कन्याओं के लिए भी तिलक आत्मबलवर्धक है।
मनोविज्ञान के अनुसार जब कोई व्यक्ति क्रोध अथवा किसी बुरे विचार से उद्विग्न होता है तो उसके शरीर से निकलने वाले विद्युत कणों के सम्पर्क में आने वाला दूसरा व्यक्ति भी उद्विग्न सा हो जाता है। वह उसके नजदीक नहीं रहना चाहता या अपनी सामान्य मनःस्थिति से विचलित हो जाता है।
कहने का तात्पर्य है कि हमारे मस्तिष्क के विचार विद्युतशक्ति के द्वारा शरीर में फैलते हैं तथा यही विद्युतशक्ति जब तेजोवलय के रूप में शरीर से बाहर निकलती है तो उसमें उन विचारों का समावेश भी होता है इसीलिए उसके तेजोवलय के सम्पर्क में आनेवाले व्यक्ति को भी उसके विचार प्रभावित कर देते हैं।
जब हम अपने आदरणीय जनों के चरण स्पर्श करते हैं तो हमारे मस्तिष्क में प्रसन्नता के साथ-साथ उनके प्रति आदर, सम्मान एवं कृतज्ञता के विचार उत्पन्न होते हैं। जब दोनों की विद्युतधाराएँ आपस में मिलती हैं तो दोनों में भावनाओं का आदान प्रदान होता है। इस प्रकार आदरणीयजनों की ऊँची भावनायें जब विद्युत तरंगों के माध्यम से हमारे मस्तिष्क तक पहुँचती है तो वह अपनी ग्रहणशील प्रकृति के अनुसार उन्हें संस्कारों के रूप में संचित कर लेता है। ये संस्कार ही मनुष्य को उत्थान अथवा पतन की ओर ले जाते हैं।
इस सिद्धान्त का एक व्यावहारिक उदाहरण है कि जब एक व्यक्ति परदेश से आकर अपने मित्रों से मिलता है तो वह प्रसन्न होकर हँसी-मजाक करता है। परन्तु जैसे ही वह अपने माता पिता एवं गुरूजनों को प्रणाम करता है उसके विचार स्वाभाविक ही गम्भीर हो जाते हैं। उसके मस्तिष्क में उन्नत होने के कुछ विचार उत्पन्न होते हैं।
जैसे जले हुए दीपक के संपर्क में आने पर दूसरा दीपक भी उसके प्रकाश आदि समस्त गुणों को ग्रहण कर लेता है परन्तु इससे उस जले हुए दीपक को कुछ हानि नहीं होती, इसी प्रकार गुरूजनों के दैवी गुण प्रणाम-पद्धति के अनुसार प्रणामकर्ता में आ जाते हैं परन्तु प्रणम्य गुरूजनों की शक्ति में इससे कोई कमी नहीं होती।
साधारण सी दिखने वाली हमारी अभिवादन-पद्धति में हमारे ऋषियों ने कितनी महान उन्नति संजोयी है परन्तु उन्हीं ऋषियों की हम सन्तानें पश्चिमवासियों का अंधानुकरण करके 'हाय-हेलो' कहकर अपने आदरणीयजनों की जीवनशैली एवं महान पूर्वजों का अपमान करते हैं।
जिससे हमारा जीवन ऊर्ध्वगामी एवं महान बने ऐसी सनातन अभिवादन पद्धति को छोड़कर 'गुड-मार्निंग' अथवा 'हाय-हेलो' कहना कौवे की काँव-काँव तथा तोते की टें-टें से किसी भी प्रकार भी बड़ा नहीं है।
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मतंग ऋषि अपनी एकाग्रता से, तप से, योग से, विद्या से, शास्त्रज्ञान से ऋषि-मुनियों के जगत में सुप्रसिद्ध थे। शबरी ने उन्हें गुरू मानकर उनके आश्रम में तप किया था। उनके आश्रम में दूर-दूर से भक्त आकर एकांतवास का लाभ लेते थे। मतंग ऋषि के आश्रम बारिश के आने से पहले ही इंधन एकत्रित कर दिया जाता था, परंतु एक वर्ष ऐसा आया कि इंधन एकत्रित करने वाले साधक नहीं आये और किसी को याद नहीं रहा। मतंग ऋषि को याद आया कि वह टुकड़ी तो नहीं आयी जो इंधन एकत्रित करती थी। मतंग ऋषि ने उठाया कुल्हाड़ा। कौन जाने कब बारिश आ जाये? वे लकड़ियाँ इकट्ठी करने के लिए जंगल की ओर चल पड़े। उनका कुल्हाड़ा उठाना था कि सब साधक अपना-अपना साधन छोड़कर गुरू के पीछे हो लिये। वे सब दोपहर तक लकड़ियाँ काटते रहे। अपने-अपने बल के अनुसार लकड़ियों का एक गट्ठर उठाया। साधकों ने भी अपने-अपने बल के अनुसार लकड़ियों के गट्ठर उठा लिये। नीचे धरती तवे जैसी तपी हुई थी और ऊपर भगवान भास्कर ! गर्मियों के आखिरी दिन थे, बारिश आने सा समय था, साधकों का शरीर पसीने से तरबतर हो रहा था। पसीने की बूँदें टपक टपककर जमीन पर गिर रही थीं। कैसे भी करके सब आश्रम में पहुँचे और स्नानादि करके अपना-अपना नित्य नियम किया।
चार-छः दिन बीते। मतंग ऋषि सरोवर पर स्नान करने गये तो देखा कि बड़ी सुगंध आ रही है! मगर सुगंध कहां से आ रही है?
"देखो जरा, हवा में ऐसी जोरदार सुगंध कहाँ से आ रही है?"
शिष्यों ने पता लगाकर बताया कि "चार-छः दिन पहले हम लकड़ियाँ लेकर जिस रास्ते से आ रहे थे, उस रास्ते पर जहाँ-जहाँ हमारे पसीने की बूँदे गिरीं, वहाँ-वहाँ फूलों के पौधे उग गये हैं और उन फूलों की महक पूरे वातावरण को महका रही है।
जब साधक के पसीने की बूँदें कहीं गिरती हैं तो वह पुष्पवाटिका बन जाती है तो ऐसा साधक अपनी योग्यता तुच्छ बातों में और राग-द्वेष के वातावरण में न खपाकर मेहनती हो जाय, एकाग्र हो जाय तो उसकी योग्यता और अधिक निखरती है। एकाग्रता के कई योग्यताएँ विकसित होती है। तुम्हारे उस सच्चिदानंदघन परब्रह्म परमात्मा में तो अनुपम रस से भरा है। तुम्हारे अंदर सबको रस देने वाला रसस्वरूप परमात्मा है, चित्त की विषमता के कारण उस रस देनेवाला रसस्वरूप परमात्मा है, चित्त की विषमता के कारण उस रस का अनुभव नहीं होता।
अतः विषमता मिटाने और समता के सिंहासन पर पहुँचाने वाले सत्संग साधन स्मरण में तत्परता से लग जायें।
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संतों ने ठीक ही कहा हैः
सत्य समान
तप नहीं, झूठ
समान नहीं
पाप। उसके
हिरदे साँच है, ताके हिरदे
आप।।
'सत्य के समान कोई तप नहीं है एवं झूठ के समान कोई पाप नहीं है। जिसके हृदय में सच्चाई है, उसके हृदय में स्वयं परमात्मा निवास करते हैं।'
गोस्वामी
तुलसीदास जी
ने भी कहा हैः धरम न
दूसरा सत्य
समाना।
सत्य के समान दूसरा कोई धर्म नहीं है।
मोहनदास कर्मचन्द गांधी ने अपने विद्यार्थी काल में सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र नामक नाटक देखा। उनके जीवन पर इसका इतना प्रभाव पड़ा कि उन्होंने दृढ़ निर्णय कर लियाः 'कुछ भी हो जाय, मैं सदैव सत्य ही बोलूँगा।
उन्होंने सत्य को ही अपना जीवनमंत्र बना लिया।
एक बार पाठशाला में खेलकूद का कार्यक्रम चल रहा था। उनकी खेलकूद में रूचि नहीं थी, अतः उपस्थिति देने के लिए वे जरा देर से आये। देर से आया देखकर शिक्षक ने पूछाः "इतनी देर से क्यों आये ?"
मोहनलालः "खेलकूद में मेरी रूचि नहीं है और घर पर थोड़ा काम भी था, इसलिए देर से आया।"
शिक्षकः "तुम्हें एक आने का अर्थदण्ड देना पड़ेगा।"
दण्ड सुनकर मोहनलाल रोने लगे। शिक्षक ने उन्हें रोते देखकर कहाः
"तुम्हारे पिता करमचंद गाँधी तो धनवान आदमी हैं। एक आना दण्ड के लिए क्यों रोते हो ?"
मोहनलालः "एक आने के लिए नहीं रोता किन्तु मैंने आपको सच-सच बता दिया, फिर भी आप मुझ पर विश्वास नहीं करते। मैंने बहाना नहीं बनाया है, फिर भी आपको मेरी बात पर विश्वास नहीं होता इसीलिए मुझे रोना आ गया।"
मोहनलाल की सच्चाई देखकर शिक्षक ने उन्हें माफ कर दिया। ये ही विद्यार्थी मोहन लाल आगे चलकर महात्मा गाँधी के रूप में करोड़ों-करोड़ों लोगों के दिलों-दिमाग पर छा गये।
एक बार स्कूल में विद्यार्थियों के अंग्रेजी ज्ञान की परीक्षा के लिए शिक्षा विभाग के कुछ अंग्रेज इन्सपैक्टर आये हुए थे। उन्होंने कक्षा के समस्त विद्यार्थियों को एक-एक कर पाँच शब्द लिखवाये। अचानक कक्षा के अध्यापक ने एक बालक की कापी देखी जिसमें एक शब्द गल्त लिखा था। अध्यापक ने उस बालक को अपना पैर छुआकर इशारा किया कि वह पास के लड़के की कापी से अपना गलत शब्द ठीक कर ले। ऐसे ही उन्होंने दूसरे बालकों को भी इशारा करके समझा दिया और सबने अपने शब्द ठीक कर लिये, पर उस बालक ने कुछ न किया।
इन्सपैक्टरों के चले जाने पर अध्यापक ने भरी कक्षा में उसे डाँटा और झिड़कते हुए कहा कि इशारा करने पर भी अपना शब्द ठीक नहीं किया ? कितना मूर्ख है !
इस पर बालक ने कहाः "अपने अज्ञान पर पर्दा डालकर दूसरे की नकल करना सच्चाई नहीं है।"
अध्यापकः "तुमने सत्य का व्रत कब लिया और कैसे लिया ?"
बालक ने उत्तर दियाः "राजा हरिश्चन्द्र के नाटक को देखकर, जिन्होंने सत्य की रक्षा के लिए अपनी पत्नी, पुत्र और स्वयं को बेचकर अपार कष्ट सहते हुए भी सत्य की रक्षा की थी।"
तब मित्रगण बोल उठेः "भाई ! नाटक तो नाटक होता है। उसमें प्रदर्शित किसी आदर्श से बँधकर उसे जीवन में घटाना ठीक नहीं।"
इस पर बालक ने कहाः "ऐसा न कहो मित्र ! पक्के इरादे से सब कुछ हो सकता है। मैंने उसी नाटक को देखकर जीवन में सत्य पर चलने का निश्चय किया है। अतः मैं सत्य की अपनी टेक कैसे छोड़ दूँ ?"
यह बालक कोई ओर नहीं बल्कि मोहनलाल करमचन्द गाँधी ही थे।
सत्य के आचरण से अंतर्यामी ईश्वर प्रसन्न होते हैं, सत्यनिष्ठा दृढ़ होती है एवं हृदय में ईश्वरीय शक्ति प्रगट हो जाती है। सत्यनिष्ठ व्यक्ति के सामने फिर चाहे कैसी भी विपत्ति आ जाय, वह सत्य का त्याग नहीं करता।
सब धर्म
अपने पूर्ण कर, छोटे-बड़े
से या बड़े।
मत सत्य से तू
डिग कभी, आपत्ति
कैसी ही पड़े ?
सत्य का
आचरण करने
वाला निर्भय
रहता है। उसका
आत्मबल बढ़ता
है। असत्य से
सत्य
अनंतगुना बलनान
है। जो बात
बात में झूठ
बोल देते है,
उनका विश्वास
कोई नहीं करता
है। फिर एक
झूठ को छिपाने
के लिए सौ बार
झूठ भी बोलना
पड़ता है। अतः
इन सब बातों
से बचने के
लिए पहले से
ही सत्य का
आचरण करना
चाहिए। सत्य
का आचरण करने
वाला सदैव
सबका प्रिय हो
जाता है। शास्त्रों
में भी आता
हैः सत्यं
वद। धर्में
चर।
सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। जीवन की वास्तिवक उन्नति सत्य में ही निहित है।
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सत्र 7
नरकेसरी वीर शिवाजी आजीवन अपनी मातृभूमि भारत की स्वतन्त्रता के लिए लड़ते रहे। वे न तो स्वयं कभी प्रमादी हुए और न ही उन्होंने दुश्मनों को चैन से सोने दिया। वे कुशल राजनीतिज्ञ तो थे ही साथ ही उनका बुद्धि चातुर्य भी अदभुत था। वीरता के साथ विद्वता का संगम यश देने वाला होता है।
शिवाजी के जीवन में कई ऐसे प्रसंग आये जिनमें उनके इन गुणों का संगम देखने को मिला। इसमें से एक मुख्य प्रसंग है – आदिलशाह के सेनापति अफजल खाँ के विनाश का।
शिवाजी के साथ युद्ध करके उन्हें जीवित पकड़ लेने के उद्देश्य से इस खान सरदार ने बहुत बड़ी सेना को साथ में लिया था। तीन साल चले इतनी युद्ध-सामग्री लेकर वह बीजापुर से निकला था। इतनी विशाल सेना के सामने टक्कर लेने हेतु शिवाजी के पास इतना बड़ा सैन्य बल न था।
शिवाजी ने खान के पास संदेश भिजवायाः
'मुझे आपके साथ नहीं लड़ना है। मेरे व्यवहार से आदिलशाह को बुरा लगा हो तो आप उनसे मुझे माफी दिलवा दीजिए। मैं आपका आभार मानूँगा और मेरे अधिकार में आनेवाला मुल्क भी मैं आदिलशाह को खुशी से सौंप दूँगा।'
अफजल खान समझ गया कि शिवाजी मेरी सेना देखकर ही डर गया है। उसने अपने वकील कृष्ण भास्कर को शिवाजी के साथ बातचीत करने के लिए भेजा। शिवाजी ने कृष्ण भास्कर का सत्कार किया और उसके द्वारा कहलवा भेजाः
'मुझे आपसे मिलने आना तो चाहिए लेकिन मुझे आपसे डर लगता है। इसलिए मैं नहीं आ सकता हूँ।'
इस संदेश को सुनकर कृष्ण भास्कर की सलाह से ही खान ने स्वयं शिवाजी से मिलने का विचार किया और इसके लिए शिवाजी के पास संदेश भी भिजवा दिया।
शिवाजी ने इस मुलाकात के लिए खान का आभार माना और उसके सत्कार के लिए बड़ी तैयारी की। जावली के किले के आस पास की झाड़ियाँ कटवाकर रास्ता बनाया तथा जगह-जगह पर मंडप बाँधे। अफजलखान जब अपने सरदारों के साथ आया तब शिवाजी ने पुनः कहला भेजाः
'मुझे अब भी भय लगता है। अपने साथ दो सेवक ही रखियेगा। नहीं तो आपसे मिलने की मेरी हिम्मत नहीं होगी।'
खान ने संदेश स्वीकार कर लिया और अपने साथ के सरदारों को दूर रखकर केवल दो तलवारधारी सेवकों के साथ मुलाकात के लिए बनाये गये तंबू में गया। शिवाजी को तो पहले से ही खान के कपट की गंध आ गयी थी, अतः अपनी स्वरक्षा के लिए उन्होंने अपने अँगरखे की दायीं तरफ खंजर छुपाकर रख लिया था और बायें हाथ में बाघनखा पहनकर मिलने के लिए तैयार खड़े रहे।
जैसेही खान दोनों हाथ लंबे करके शिवाजी को आलिंगन करने गया, त्यों ही उसने शिवाजी के मस्तक को बगल में दबा लिया। शिवाजी सावधान हो गये। उन्होंने तुरंत खान के पार्श्व में खंजर भोंक दिया और बाघनखे से पेट चीर डाला।
खान के दगा... दगा... की चीख सुनकर उसके सरदार तंबू में घुस आये। शिवाजी एवं उनके सेवकों ने उन्हें सँभाल लिया। फिर तो दोनों ओर से घमासान युद्ध छिड़ गया।
जब खान के शव को पालकी में लेकर उसके सैनिक जा रहे थे, तब उनके साथ लड़कर शिवाजी के सैनिकों ने मुर्दे का सिर काट लिया और धड़ को जाने दिया !
खान का पुत्र फाजल खान भी घायल हो गया। खान की सेवा की बड़ी बुरी हालत हो गयी एवं शिवाजी की सेना जीत गयी।
इस युद्ध में शिवाजी को करीब 75 हाथी, 7000 घोड़े, 1000-1200 के करीब ऊँट, बड़ा तोपखाना, 2-3 हजार बैल, 10-12 लाख सोने की मुहरें, 2000 गाड़ी भरकर कपड़े एवं तंबू वगैरह का सामान मिल गया था।
यह शिवाजी की वीरता एवं बुद्धिचातुर्य का ही परिणाम था। जो काम बल से असंभव था उसे उन्होंने युक्ति से कर लिया !
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मीन एवं मेष राशी के सूर्य का समय वसंत ऋतु कहा जा सकता है।
वसंत ऋतु की महिमा के विषय में कवियों ने खूब लिखा है। गुजराती कवि दलपतराम ने कहा हैः
रूड़ो
जुओ आ ऋतुराज
आव्यो। मुकाम
तेणे वनमां जमाव्यो।।
अर्थात्
देखो, सुंदर यह
ऋतुराज आया।
आवास उसने वन
को बनाया।।
वसंत का असली आनंद जब वन में से गुजरते हैं तब उठाया जा सकता है। रंग बिरंगे पुष्पों से आच्छादित वृक्ष.... मंद-मंद एवं शीतल बहती वायु..... प्रकृति मानो, पूरे बहार में होती है। ऐसे में सहज ही मे प्रभु का स्मरण हो जाता है, सहज ही में ध्यानावस्था में पहुँचा जा सकता है।
ऐसी सुंदर ऋतु में आयुर्वेद ने खान पान में संयम की बात कहकर व्यक्ति एवं समाज की नीरोगता का ध्यान रखा है। शीतऋतु में मेथीपाक, सूखे मेवे खाने से स्वाभाविक ही मधुर रसवाले तथा बल-पुष्टिवर्धक पदार्थ खाने के कारण शरीर में स्वाभाविक ही कफ का संचय हो जाता है। यह संचित कफ वसंत ऋतु में सूर्य किरणों के सीधे ही पड़ने के कारण पिघलने लगता है। इसके फलस्वरूप कफजन्य रोग जैसे कि सर्दी, खाँसी, बुखार, खसरा, चेचक, दस्त, उलटी, गले में खराश, टान्सिल्स का बढ़ना, सिर भारी-भारी लगना, सुस्ती, आलस्य वगैरह होने लगता है।
जिस प्रकार पानी अग्नि को बुझा देता है वैसे ही पिघला हुआ कफ जठराग्नि को मंद कर देता है। इसीलिए इस ऋतु में लाई, भूने हुए चने, ताजी हल्दी, ताजी मूली, अदरक, पुरानी जौ, पुराने गेहूँ की चीजें खाने के लिए कहा गया है। इसके अलावा मूँग बनाकर खाना भी उत्तम है।
देखो, आयुर्वेद विज्ञान की दृष्टि कितनी सूक्षम है ! मन को प्रसन्न करे एवं हृदय के लिए हितकारी हो ऐसे आसव, अरिष्ट जैसे कि मध्वारिष्ट, द्राक्षारिष्ट, गन्ने का रस, सिरका वगैरह पीना इस ऋतु में लाभदायक है।
नागरमोथ अथवा सौंठ का उबाला हुआ पानी पीने से कफ का नाश होता है।
वसंत ऋतु में आने वाला होली का त्योहार इस ओर संकेत करता है कि शरीर को थोड़ा सूखा सेंक देना चाहिए जिससे कफ पिघलकर बाहर निकल जाय। सुबह जल्दी उठकर थोड़ा व्यायाम करना, दौड़ना अथवा गुलाटियाँ खाने का अभ्यास लाभदायक होता है।
मालिश करके सूखे द्रव्य, आँवले, त्रिफला अथवा चने के आटे आदि का उबटन लगाकर गर्म पानी से स्नान करना हितकर है। आसन, प्राणायाम एवं टंकविद्या की मुद्रा विशेष रूप से करनी चाहिए।
दिन में सोना नहीं चाहिए। दिन में सोने से कफ कुपित होता है। जिन्हें रात्रि में जागना आवश्यक है वे थोड़ा सोयें तो ठीक है। इस ऋतु में रात्रि जागरण भी नहीं करना चाहिए।
वसंत ऋतु में सुबह खाली पेट हरड़े के चूर्ण को शहद के साथ सेवन करने से लाभ होता है। वसंत ऋतु में कड़वे नीम में नयी कोंपलें फूटती है। नीम की 15-20 कोंपलों को 2-3 काली मिर्च के साथ खूब चबाकर खाना चाहिए। 15-20 दिन यह प्रयोग करने से आरोग्यता की रक्षा होती है। इसके अलावा कड़वे नीम के फूलों का रस 7 से 15 दिन तक पीने से त्वचा के रोग एवं मलेरिया जैसे ज्वर से भी बचाव होता है।
मधुर रसवाले पौष्टिक पदार्थ एंव खट्टे-मीठे रसवाले फल वगैरह पदार्थ जो कि शीत ऋतु में खाये जाते हैं उन्हें खाना बंद कर देना चाहिए। वसंत ऋतु के कारण स्वाभाविक ही पाचन शक्ति कम हो जाती है अतः पचने में भारी पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। ठंडे पेय, आइसक्रीम, बर्फ के गोले, चाकलेट, मैदे की चीजें, खमीरवाली चीजें, दही वगैरह पदार्थ बिल्कुल त्याग देना चाहिए।
धार्मिक ग्रन्थों के वर्णनानुसार 'अलौने व्रत (बिना नमक के व्रत) चैत्र मास के दौरान करने से रोग-प्रतिकारक शक्ति बढ़ती है एवं त्वचा के रोग, हृदय के रोग, हाई.बी.पी., किडनी आदि के रोग नहीं होते हैं।
यदि कफ ज्यादा हो तो रोग होने से पूर्व 'वमन कर्म' द्वारा कफ को निकाल देना चाहिए किन्तु वमन कर्म किसी योग्य वैद्य की निगरानी में करना ही हितावह है। सामान्य उलटी करनी हो तो आश्रम से प्रकाशित योगासन पुस्तक में बतायी गयी विधि के अनुसार गजकरणी की जा सकती है। इससे अनेक रोगों से बचाव हो सकता है।
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सत्र 8
किसी ने कहा हैः
अगर तुम
ठान लो, तारे
गगन के तोड़
सकते हो। अगर
तुम ठान लो, तूफान का
मुख मोड़ सकते
हो।।
यह कहने का तात्पर्य यही है कि जीवन में ऐसा कोई कार्य नहीं जिसे मानव न कर सके। जीवन में ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका समाधान न हो।
जीवन में संयम, सदाचार, प्रेम, सहिष्णुता, निर्भयता, पवित्रता, दृढ़ आत्मविश्वास और उत्तम संग हो तो विद्यार्थी के लिए अपना लक्ष्य प्राप्त करना आसान हो जाता है।
यदि विद्यार्थी बौद्धिक-विकास के कुछ प्रयोगों को समझ लें, जैसे कि सूर्य को अर्घ्य देना, भ्रामरी प्राणायाम करना, तुलसी के पत्तों का सेवन, त्राटक करना, सारस्वत्य मंत्र का जप करना आदि तो परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होना विद्यार्थियों के लिए आसान हो जायगा।
विद्यार्थी को चाहिए कि रोज सुबह सूर्योदय से पहले उठकर सबसे पहले अपने इष्ट का, गुरू का स्मरण करे। फिर स्नानादि करके पूजा कक्ष में बैठकर गुरूमंत्र, इष्टमंत्र अथवा सारस्वत्य मंत्र का जाप करे। अपने गुरू या इष्ट की मूर्ति की ओर एकटक निहारते हुए त्राटक करे। अपने श्वासोच्छवास की गति पर ध्यान देते हुए मन को एकाग्र करे। भ्रामरी प्राणायाम करे जो विद्यार्थी तेजस्वी तालीम शिविर में सिखाया जाता है।
प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य दे एवं तुलसी के 5-7 पत्तों को चबाकर 2-4 घूँट पानी पिये।
रात को देर तक न पढ़े वरन् सुबह जल्दी उठकर उपरोक्त नियमों को करके अध्ययन करे तो इससे पढ़ा हुआ शीघ्र याद हो जाता है।
जब परीक्षा देने जाये तो तनाव चिन्ता से युक्त होकर नहीं वरन् इष्ट गुरू का स्मरण करके, प्रसन्न होकर जाये।
प्रश्न पत्र आने पर उसे एक बार पूरा पढ़ लेना चाहिए एवं जो प्रश्न आता है उसे पहले करे। ऐसा नहीं कि जो नहीं आता उसे देखकर घबरा जाये। घबराने से तो जो प्रश्न आता है वह भी भूल जायेगा।
जो प्रश्न आते हैं उन्हें हल करने के बाद जो नहीं आते उनकी ओर ध्यान दें। अंदर दृढ़ विश्वास रखे कि मुझे ये भी आ जायेंगे। अंदर से निर्भय रहे एवं भगवत्स्मरण करके एकाध मिनट शान्त हो जाये, फिर लिखना शुरू करे। धीरे-धीरे उन प्रश्नों के उत्तर भी मिल जायेंगे।
मुख्य बात यह है कि किसी भी कीमत पर धैर्य न खोये। निर्भयता एवं दृढ़ आत्मविश्वास बनाये रखें।
विद्यार्थियों को अपने जीवन को सदैव बुरे संग से बचाना चाहिए। न तो वह स्वयं धूम्रपानादि करे न ही ऐसे मित्रों का संग करे। व्यसनों से मनुष्य की स्मरणशक्ति पर बड़ा खराब प्रभाव पड़ता है।
व्यसन की तरह चलचित्र भी विद्यार्थी की जीवन शक्ति को क्षीण कर देते हैं। आँखों की रोशनी को कम करने के साथ ही मन एवं दिमाग को भी कुप्रभावित करने वाले चलचित्रों से विद्यार्थियों को सदैव सावधान रहना चाहिए। आँखों के द्वारा बुरे दृश्य अंदर घुस जाते हैं एवं वे मन को भी कुपथ पर ले जाते हैं। इसकी अपेक्षा तो सत्संग में जाना, सत्शास्त्रों का अध्ययन करना अनंतगुना हितकारी है। यदि विद्यार्थी ने अपना विद्यार्थी जीवन सँभाल लिया तो उसका भावी जीवन भी सँभल जाता है क्योंकि विद्यार्थी जीवन ही भावी जीवन की आधार शिला है। विद्यार्थी काल में वह जितना संयमी, सदाचारी, निर्भय एवं सहिष्णु होगा, बुरे संग एवं व्यसनों को त्याग कर सत्संग का आश्रय लेगा, प्राणायाम आसनादि को सुचारू रूप से करेगा उतना ही उसका जीवन समुन्नत होगा। यदि नींव सुदृढ़ होती है तो उस पर बना विशाल भवन भी दृढ़ एवं स्थायी होता है। विद्यार्थीकाल मानव-जीवन की नींव के समान है अतः उसको सुदृढ़ बनाना चाहिए।
इन बातों को समझकर उन पर अमल किया जाय तो केवल लौकिक शिक्षा में ही सफलता प्राप्त होगी ऐसी बात नहीं है वरन् जीवन की हर परीक्षा में विद्यार्थी सफल हो सकता है।
हे विद्यार्थी ! उठो....जागो..... कमर कसो। दृढ़ता एवं निर्भयता से जुट पड़ो। बुरे संग एवं व्यसनों को त्यागकर, संतों-सदगुरूओं के मार्गदर्शन के अनुसार चल पड़ो..... सफलता तुम्हारे चरण चूमेगी।
धन्य हैं वे लोग जिनमें ये छः गुण हैं ! अन्तर्यामी देव सदैव उनकी सहायता करते हैं।
उद्यमः
साहसं धैर्यं
बुद्धि शक्ति
पराक्रमः।
षडेते
यत्र
वर्तन्ते
तत्र देवः
सहायकृत्।।
'उद्योग, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम – ये छः गुण जिस व्यक्ति के जीवन में हैं, देव उसकी सहायता करते है।'
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कुछ मनचले छात्रों ने आपस में तय किया कि आज मास्टर को स्कूल से वापस करना है। जब वे कक्ष में आये, तब एक ने कहाः "सर ! आज आपकी आँखें थोड़ी अंदर धँस गयी हैं।"
दूसरे छात्र ने 'सर' की नाड़ी पकड़ी, फिर बोलाः "सर ! आपको रात को बुखार आया था क्या ? अभी भी शरीर थोड़ा गर्म है।"
सरः "नहीं तो !"
तीसरा छात्रः "सर ! आपको अपनी सेहत का कुछ पता नहीं है। आप काम में व्यस्त रहते हैं और अपने शरीर का बिल्कुल ख्याल नहीं रखते हैं। सचमुच ! आपको बुखार है।"
चौथा छात्रः "वाकई सर ! आपको बुखार है।"
पाँचवाँ छात्रः "सर ! यदि आप बुखार में काम करते रहेंगे तो हो सकता है ज्यादा बीमार पड़ जायें। अगर आपको न्यूमोनिया हो जायेगा तो ? कृपया, आराम करिये। आप थके हुए हैं और बुखार का असर भी है।"
छठवाँ छात्रः "अभी दो महीने बाद परीक्षाएँ भी होने वाली हैं। अगर आप जबरदस्ती पढ़ायेंगे तो हो सकता है परीक्षाओं के दिनों में आपको न्यूमोनिया हो जाये। क्षमा करें सर ! आप आराम करें।"
देखते ही देखते मास्टक का सिर दर्द से फटने लगा और पैर काँपने लगे। उनको बुखार आ गया। वे जल्दी-जल्दी घर पहुँचे एवं रजाई ओढ़कर सो गये।
.....तो मानना पड़ेगा कि मन का असर तन पर पड़े बिना नहीं रहता। आपके दो शरीर होते हैं – एक अन्नमय और दूसरा मनोमय। मनोमय शरीर जैसा सोचता और निर्णय करता है, अन्नमय शरीर में वैसे ही परिवर्तन होने लगते हैं।
मन जितना सूक्ष्म होता है, शरीर पर उसका प्रभाव उतना ही गहरा पड़ता है। केवल अपने शरीर पर प्रभाव पड़ता है ऐसी बात नहीं है बल्कि दूसरों के शरीर पर भी आपके सूक्ष्म मन का प्रभाव पड़ सकता है। संकल्प में इतनी शक्ति होती है !
एक घटित घटना हैः
एक लड़का भगवान शंकर का बड़ा भक्त था। नर्मदा किनारे रहता था एवं ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करता था। उसे सारा दिन शिवभक्ति करते देख उसके घरवाले परेशान रहते थे।
शिवरात्रि के दिन उसके बड़े भाई ने उसकी पिटाई की और उसे एक कमरे में बंद कर दिया। घर के लोग निश्चिन्त होकर सो गये किः अब कैसे जा पायेगा मंदिर में ?
......लेकिन भक्त को तो रात्रि जागरण करना था। उसने शिवभक्ति न छोड़ी। वह बन्द कमरे में ही शिवजी की मानसपूजा करते-करते इतना मग्न हो गया कि उसका शरीर मंदिर में पहुँच गया !
सुबह लोगों ने खिड़की से देखा तो लड़का कमरा में नहीं है और बाहर से ताला लगा है ! उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ ! जिस मंदिर में वह लड़का जाता था उसी मंदिर में जाकर उन लोगों ने देखा तो वह शिवजी का आलिंगन करके बैठा हुआ मिला। पूछाः "तू यहाँ कैसे आया ?"
लड़के ने कहाः "मुझे कुछ पता नहीं। शिवजी लाये होंगे तो आ गया।"
शिवजी उठाकर मंदिर में नहीं लाये होंगे। यह तो उसके तीव्र चिन्तन का प्रभाव था उसका तन भी शिवालय में पहुँच गया।
ऐसे ही दूसरी एक घटना हैः बड़ौदा के आगे ताजपुरा है। ताजपुरा में मेरे मित्र संत नारायण स्वामी रहते हैं। उनके आश्रम का नाम है नारायण धाम। जब नारायण धाम नहीं बना था और वे साधना करते थे तब वहाँ एक छोटा सा मंदिर था। उस मंदिर का पुजारी रजनी कला स्नातक था। उसने मुझसे कहाः
"बापू ! बापू (नारायण स्वामी) का तो कुछ कहा नहीं जा सकता।"
मैंने पूछाः "क्या हुआ ? जरा बताओ।"
पुजारीः "मैं एक दिन पूजा वगैरह करके शटर को दो ताले लगाकर घर चला गया क्योंकि जंगल का मामला था और तब आश्रम इतना विकसित नहीं था। सुबह जब शटर खोला तो देखा कि मंदिर के अंदर बापू (नारायण स्वामी) शिवलिंग को आलिंगन करके बैठे हुए थे ! मैं तो यह देखकर चकित रह गया कि बापू मंदिर के अंदर कैसे ? मैंने अंदर एक बिल्वपत्र और फूल तक नहीं रखा था। फिर बापू को अंदर बंद करके कैसे चला गया, मुझे कुछ पता नहीं है।"
मैंने कहाः "ऐसा नहीं होगा, कुछ राज होगा।"
पुजारीः "कुछ राज ही है। मैं तो मंदिर की सफाई करने के बाद ताला लगाकर घर चला गया था।"
वे तो मेरे मित्र संत हैं। मैंने उनसे पूछाः "यह सब कैसे हुआ था ? आप संकल्प करके शिवालय में पहुँचे थे कि आपने योग का उपयोग किया था ? आप ऋद्धि-सिद्धि के बल वहाँ पहुँचे थे या भगवान शंकर स्वयं आपको पकड़कर अंदर डाल गये थे ? सच बताओ।"
नारायण
स्वामी ने
कहाः "यह
तो मुझे पता
नहीं लेकिन
प्रभु का ऐसा
तीव्र चिन्तन
हुआ कि मैं
नहीं रहा। जब
सुबह हुई और
पुजारी ने
मंदिर खोला तब
मुझे भान हुआ
किः "मैं इधर
कैसे ?"
फिर तो मैं
प्रभु.....!
प्रभु....... !! करके एक
मील तक दौड़ता
चला गया।"
.....तो मानना पड़ेगा कि आपका मन जिसका तीव्रता से चिन्तन करता है वहीं आपका तन भी पहुँच जाता है। जब आपका मन किसी चीज का इतना तीव्र चिन्तन करता है कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, दर्प, अहंकार सब छूट जाते हैं तब आपका तन भी वहाँ प्रकट हो जाता है और अपने स्थान से गायब हो जाता है। यही बात 'श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण' वशिष्ठ जी महाराज भी कहते हैं किः "हे राम जी ! जीव का जो शरीर दिखता है वह वास्तविक नहीं है। वास्तविक शरीर तो मनोमय शरीर है। मनोमय शरीर का किया हुआ सब होता है।"
जैसे, कार दिखती है तो उसमें दो चीजें हैं- कार का बाह्य ढाँचा और अंदर का इंजन, गियर बाक्स आदि। कार भागती हुई दिखती है लेकिन उसका मूल कारण अंदर के पुर्जे हैं। कार आगे पीछे भी चलाई जाती है, धीरे भी चलती है, तेजी से भी चलती हुई दिखती है और चलाने वाला भी दिखता है। कार को ड्राइवर चलाता है और ड्राइवर को उसके अंदर का संकल्प चलाता है। कार और ड्राइवर दोनों का संचालन करने वाली सूक्ष्म सत्ताएँ हैं।
आपको गाड़ी दिखेगी, अंदर का गियर बाक्स नहीं दिखेगा। ऐसे ही ड्राइवर के हाथ दिखेंगे, उसके अंदर का संकल्प नहीं दिखेगा। जो दिखेगा उसकी स्वतंत्र सत्ता नहीं होती। चलाने वाली सत्ता कोई और होती है। उसी सत्ता के बल पर सब कार्य होते हैं। उस सत्ता के मूल को जान लो तो बेड़ा पार हो जाये। स्नेह सहित उस सत्ता के मूल का स्मरण और उस सत्ता के मूल में शांति व आनंद पाने में लग जाओ। सारी सत्ताओं का मूल है आत्मा-परमात्मा।
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सत्र 9
'शिव' अर्थात् कल्याण स्वरूप। भगवान शिव तो हैं ही प्राणिमात्र के परम हितैषी, परम कल्याण कारक लेकिन उनका बाह्य रूप भी मानवमात्र को एक मार्गदर्शन प्रदान करने वाला है।
शिवजी का निवास-स्थान है कैलास शिखर। ज्ञान हमेशा धवल शिखर पर रहता है अर्थात् ऊँचे केन्द्रों पर रहता है जबकि अज्ञान नीचे के केन्द्रों में रहता है। काम, क्रोध, भय आदि के समय मन प्राण नीचे के केन्द्र में, मूलाधार केन्द्र में रहते हैं। मन और प्राण अगर ऊपर के केन्द्रों में हों तो वहाँ काम टिक नहीं सकता। शिवजी को काम ने बाण मारा लेकिन शिवजी की निगाहमात्र से ही काम जलकर भस्म हो गया। आपके चित्त में भी यदि कभी काम आ जाये तो आप भी ऊँचे केन्द्रों में आ जाओ ताकि वहाँ काम की दाल न गल सके।
कैलास शिखर धवल है, हिमशिखर धवल है और वहाँ शिवजी निवास करते हैं। ऐसे ही जहाँ सत्त्वगुण की प्रधानता होती है, वहीं आत्मशिव रहता है।
शिवजी की जटाओं से गंगा जी निकलती हैं अर्थात् ज्ञानी के मस्तिष्क में से ज्ञानगंगा बहती है। उनमें तमाम प्रकार की ऐसी योग्यताएँ होती हैं कि जिनसे जटिल से जटिल समस्याओं का समाधान भी अत्यंत सरलता से हँसते-हँसते हो जाता है।
शिवजी के मस्तक पर द्वितीया का चाँद सुशोभित होता है अर्थात् जो ज्ञानी है वे दूसरों का नन्हा-सा प्रकाश, छोटा-सा गुण भी शिरोधार्य करते हैं। शिवजी ज्ञान के निधि हैं, भण्डार हैं, इसीलिए तो किसी के भी ज्ञान का अनादर नहीं करते हैं वरन् आदर ही करते हैं।
शिवजी ने गले में मुण्डों की माला धारण की है। कुछ विद्वानों का मत है कि ये मुण्ड किसी साधारण व्यक्ति के मुण्ड नहीं, वरन् ज्ञानवानों के मुण्ड हैं। जिनके मस्तिष्क में जीवनभर के ज्ञान के विचार ही रहे हैं, ऐसे ज्ञानवानों की स्मृति ताजी करने के लिए उन्होंने मुण्डमाला धारण की है। कुछ अन्य विद्वानों के मतानुसार शिवजी ने गले में मुण्डों की माला धारण करके हमें बताया है कि गरीब हो चाहे धनवान, पठित हो चाहे अपठित, माई हो चाहे भाई लेकिन अंत समय में सब खोपड़ी छोड़कर जाते हैं। आप अपनी खोपड़ी में चाहे कुछ भी भरो, आखिर वह यहीं रह जाती हैं।
भगवान शंकर देह पर भभूत रमाये हुए हैं क्योंकि वे शिव हैं, कल्याणस्वरूप हैं। लोगों को याद दिलाते हैं कि चाहे तुमने कितना ही पद प्रतिष्ठावाला, गर्व भरा जीवन बिताया हो, अंत में तुम्हारी देह का क्या होने वाला है, वह मेरी देह पर लगायी हुई भभूत बताती है। अतः इस चिताभस्म को याद करके आप भी मोह ममता और गर्व को छोड़कर अंतर्मुख हो जाया करो।
शिवजी के अन्य आभूषण हैं बड़े विकराल सर्प। अकेला सर्प होता है तो मारा जाता है लेकिन यदि वही सर्प शिवजी के गले में, उनते हाथ पर होता है तो पूजा जाता है। ऐसे ही आप संसार का व्यवहार केवल अकेले करोगे तो मारे जाओगे लेकिन शिवतत्त्व में डुबकी मारकर संसार का व्यवहार करोगे तो आपका व्यवहार भी आदर्श व्यवहार बन जायेगा।
शिवजी के हाथों में त्रिशूल एवं डमरू सुशोभित है। इसका तात्पर्य यह है कि वे सत्त्व, रज एवं तम – इन तीन गुणों के आधीन नहीं होते, वरन् उन्हें अपने आधीन रखते हैं और जब प्रसन्न होते हैं तब डमरू लेकर नाचते हैं।
कई लोग कहते हैं कि शिवजी को भाँग का व्यसन है। वास्तव में तो उन्हें भुवन भंग करने का यानी सृष्टि का संहार करने का व्यसन है, भाँग पीने का नहीं। किन्तु भँगेड़ियों ने 'भुवन भंग' में से अकेले 'भंग' शब्द का अर्थ 'भाँग' लगा लिया और भाँग पीने की छूट ले ली।
उत्तम माली वही है जो आवश्यकता के अनुसार बगीचे में काट-छाँट करता रहता है, तभी बगीचा सजा धजा रहता है। अगर वह बगीचे में काट छाँट न करे तो बगीचा जंगल में बदल जाये। ऐसे ही भगवान शिव इस संसार के उत्तम माली हैं, जिन्हें भुवनों को भंग करने का व्यसन है।
शिवजी के यहाँ बैल-सिंह, मोर-साँप-चूहा आदि परस्पर विपरीत स्वभाव के प्राणी भी मजे से एक साथ निर्विघ्न रह लेते हैं। क्यों ? शिवजी की समता के प्रभाव से। ऐसे ही जिसके जीवन में समता है वह विरोधी वातावरण में, विरोधी विचारों में भी बड़े मजे से जी लेता है।
जैसे, आपने देखा होगा कि गुलाब के फूल को देखकर बुद्धिमान व्यक्ति प्रसन्न होता है किः 'काँटों के बीच भी वह कैसे महक रहा है ! जबकि फरियादी व्यक्ति बोलता है किः 'एक फूल और इतने सारे काँटे ! क्या यही संसार है, कि जिसमें जरा सा सुख और कितने सारे दुःख !'
जो बुद्धिमान है, शिवतत्त्व का जानकार है, जिसके जीवन में समता है, वह सोचता है कि जिस सत्ता से फूल खिला है, उसी सत्ता ने काँटों को भी जन्म दिया है। जिस सत्ता ने सुख दिया है, उसी सत्ता ने दुःख को भी जन्म दिया है। सुख दुःख को देखकर जो उसके मूल में पहुँचता है, वह मूलों के मूल महादेव को भी पा लेता है।
इस प्रकार शिवतत्त्व में जो जगे हुए हैं उन महापुरूषों की तो बात ही निराली है लेकिन जो शिवजी के बाह्य रूप को ही निहारते हैं वे भी अपने जीवन में उपरोक्त दृष्टि ले आयें तो उनकी भी असली शिवरात्रि, कल्याणमयी रात्रि हो जाये.....
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फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी अर्थात् महाशिवरात्रि। पृथ्वी पर शिवलिंग के स्थापन का जो दिवस है, भगवान शिव के विवाह का जो दिवस है और प्राकृतिक नियम के अनुसार जीव-शिव के एकत्व में मदद करने वाले ग्रह-नक्षत्रों के योग का जो दिवस है – वही है महाशिवरात्रि का पावन दिवस। यह रात्रि-जागरण करने की रात्रि, सजाग रहने की रात्रि, ईश्वर की आराधना-उपासना करने की रात्रि है।
शिवजी की आराधना निष्काम भाव से कहीं भी की जा सकती है किंतु सकाम भाव से आराधना विधि-विधानपूर्वक की जाती है। जिन्हें संसार से सुख-वैभव प्राप्त करनी होती है, वे भी शिवजी की आराधना करते हैं।
शिवजी की पूजा का विधान यह है कि पहले जहाँ शिवजी की स्थापना की जाती है वहाँ से फिर उनका स्थानांतर नहीं होता, उनकी जगह नहीं बदली जाती। शिवजी की पूजा के निर्माल्य (पत्र-पुष्प, पंचामृतादि) का उल्लंघन नहीं किया जाता। इसीलिए शिवजी के मंदिर की पूरी प्रदक्षिणा नहीं होती क्योंकि पूरी प्रदक्षिणा करने से निर्माल्य उल्लंघित हो जाता है।
शिवलिंग विविध द्रव्यों से बनाये जाते हैं। अलग-अलग द्रव्यों से बने शिवलिंगों के पूजन के फल भी अलग-अलग प्रकार के होते हैं। जैसे, ताँबे के शिवलिंग के पूजन से आरोग्य-प्राप्ति होती है। पीतल के शिवलिंग के पूजन से यश, आरोग्य-प्राप्ति एवं शत्रुनाश होता है। चाँदी के शिवजी बनाकर उनकी पूजा करने से पितरों का कल्याण होता है। सुवर्ण के शिवजी बनाकर उनकी पूजा करने से तीन पीढ़ियों तक घर में धन-धान्य बना रहता है। मणि-माणेक का शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा करने से बुद्धि, आयुष्य, धन, ओज-तेज बढ़ता है लेकिन ब्रह्मचिंतन करने से, शिवतत्त्व का चिंतन करने से ये चीजें स्वाभाविक ही प्रगट होने लगती हैं। परमात्मतत्त्व में, शिवतत्त्व में डुबकी मारने से बुद्धि का प्रकाश बढ़ने लगता है, पितरों का उद्धार होने लगता है, चित्त की चंचलता मिटने लगती है, दिल की दरिद्रता दूर होने लगती है एवं मन में शांति आने लगती है। शिवपूजन का महा फल यही है कि मनुष्य शिवतत्त्व को प्राप्त हो जाये।
शिवरात्रि को भक्तिभाव से रात्रि-जागरण किया जाता है। जल, पंचामृत, फल-फूल एवं बिल्वपत्र से शिवजी का पूजन करते है। बिल्वपत्र में तीन पत्ते होते हैं जो सत्त्व, रज एवं तमोगुण के प्रतीक हैं। हम अपने ये तीनों गुण शिवार्पण करके गुणों से पार हो जायें, यही इसका हेतु है। पंचामृत-पूजा क्या है ? पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पाँचमहाभूतों का ही सारा भौतिक विलास है। इन पंचमहाभूतों का भौतिक विलास जिस चैतन्य की सत्ता से हो रहा है उस चैतन्यस्वरूप शिव में अपने अहं को अर्पित कर देना, यही पंचामृत-पूजा है। धूप और दीप द्वारा पूजा माने क्या ? धूप का तात्पर्य है अपने 'शिवोऽहम्' की सुवास 'आनन्दोऽहम्' की सुवास और दीप का तात्पर्य है आत्मज्ञान का प्रकाश।
चाहे जंगल या मरूभूमि में क्यों न हो, रेती या मिट्टी के शिवजी बना लिये, पानी के छींटे मार दिये, जंगली फूल तोड़कर धर दिये और मुँह से ही नाद बजा दिया तो शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं एवं भावना शुद्ध होने लगती है।
आशुतोष जो ठहरे ! जंगली फूल भी शुद्ध भाव से तोड़कर शिवलिंग पर चढ़ाओ तो शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं और यही फूल कामदेव ने शिवजी को मारे तो शिवजी नाराज हो गये। क्यों ? क्योंकि फूल फेंकने के पीछे कामदेव का भाव शुद्ध नहीं था इसीलिए शिवजी ने तीसरा नेत्र खोलकर उसे भस्म कर दिया। शिवपूजा में वस्तु का मूल्य नहीं, भाव का मूल्य है।
भावो
हि विद्यते
देवो......
आराधना का एक तरीका यह है कि पत्र, पुष्प, पंचामृत, बिल्वपत्रादि से चार प्रहर पूजा की जाये। दूसरा तरीका यह है कि मानसिक पूजा की जाये।
कभी-कभी योगी लोग इस रात्रि का सदुपयोग करने का आदेश देते हुए कहा है किः "आज की रात्रि तुम ऐसी जगह पसंद कर लो कि जहाँ तुम अकेले बैठ सको, अकेले टहल सको, अकेले घूम सको, अकेले जी सको। फिर तुम शिवजी की मानसिक पूजा करो और उसके बाद अपनी वृत्तियों को निहारों, अपने चित्त की दशा को निहारो। चित्त में जो-जो आ रहा है और जो जो जा रहा है उस आने और जाने को निहारते-निहारते आने जाने की मध्यावस्था को जान लो।
दूसरा तरीका यह है कि चित्त का एक संकल्प उठा और दूसरा उठने को है, उस शिवस्वरूप व आत्मस्वरूप मध्यावस्था को तुम मैं रूप में स्वीकार कर लो, उसमें टिक जाओ।
तीसरा तरीका यह भी है कि किसी नदी या जलाशय के किनारे बैठकर जल की लहरों को एकटक देखते जाओ अथवा तारों को निहारते-निहारते अपनी दृष्टि को उन पर केन्द्रित कर दो। दृष्टि बाहर की लहरों पर केन्द्रित है और वह दृष्टि केन्द्रित है कि नहीं, उसकी निगरानी मन करता है और मन निगरानी करता है कि नहीं करता है, उसको निहारने वाला मैं कौन हूँ ? गहराई से इसका चिन्तन करते-करते आप परम शांति में भी विश्रांति कर सकते हो।
चौथा तरीका यह है कि जीभ न ऊपर हो न नीचे हो बल्कि तालू के मध्य में हो और जिह्वा पर ही आपकी चित्तवृत्ति स्थिर हो। इससे भी मन शांत हो जायेगा और शांत मन में शांत शिवतत्त्व का साक्षात्कार करने की क्षमता प्रगट होने लगेगी।
साधक चाहे तो कोई भी एक तरीका अपनाकर शिवतत्त्व में जगने का यत्न कर सकता है। महाशिवरात्रि का यही उत्तम पूजन है।
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सत्र 10
वर्तमान समय में टी.वी. चैनलों, फिल्मों तथा पत्र-पत्रिकाओं में मनोरंजन के नाम देकर समाज के ऊपर जिसे थोपा जा रहा है, वह मनोरंजन के नाम पर विनाशक ही है।
पत्र-पत्रिकाओं के मुख-पृष्ठों तथा अन्दर के पृष्ठों पर अश्लील चित्रों की भरमार रहती है। इस दिशा में अपनी पत्रिकाओं में नई-नई कल्पनाओं को लाने के लिए पाश्चात्य पत्रिकाओं का अनुकरण किया जाता है।
फिल्मी जगत तथा टी.वी. चैनल तो मानों इस स्पर्धा के लिए ही आरक्षित हैं। हर बार नये-नये उत्तेजक तथा टी.वी. चैनल तो मानों इस स्पर्धा के लिए ही आरक्षित हैं। हर बार नये-नये उत्तेजक दृश्यों, अपराध की विधाओं, हिंसा के तरीकों का प्रदर्शन करना तो मानों इनका सिद्धान्त ही बन गया है।
वास्तव में मनोरंजन से तो मन हल्का होना चाहिए, चिंताओं का दबाव कम होना चाहिए परन्तु यहाँ तो सब कुछ उल्टा ही होता है। ऐसी पाशवी वृत्तियों को प्रोत्साहन मिलता है जिनकी नित्य जीवन की गतिविधियों में कोई गुंजाइश ही नहीं होती। मस्तिष्क की शिराओं पर दबाव, चित्रपट देखने के बाद मन में कोलाहल तथा प्रचंड उद्वेग। एक काल्पनिक कथा पर बनी फिल्म एक दूजे के लिए को देखकर सैंकड़ों युवक युवतियों द्वारा आत्महत्या जैसा पाप करना तथा शक्तिमान धारावाहिक में उड़ते हुए काल्पनिक व्यक्ति को देखकर कई मासूम बच्चों का छतों व खिड़कियों से कूदकर जान से हाथ धो बैठना, क्या यह विनाश की परिभाषा नहीं है ?
अहमदाबाद (गुज.) से 26 जनवरी 2000 को प्रकाशित एक समाचार पत्र का एक लेख छपा था। इस लेख का शीर्षक थाः टी.वी. चैनलों पर सुबह के कार्यक्रम में संतों की भीड़। इस लेख में वर्त्तमान समय में पतनोन्मुख समाज को आध्यात्मिक दिशा की ओर अग्रसर करने वाले संत समाज के ऊपर बड़ी आलोचनात्मक टिप्पणी की गई थी।
इसी
अर्द्धसाप्ताहिक
की पृष्ठ
संख्या दो पर एक
लेख छपा था।
इसका शीर्षक
था, युवती
के जीवन में
तीन पुरूष तो
हैं ही और चौथा
भी आयेगा क्या
?
यह लेख किसी सॉक्रेटीज के लिए एक पत्र है जिसमें सूरत (गुजरात) की सुरूपा नामक युवती (बी.काम. में अध्ययनरत) ने अपने जीवन के बारे में प्रश्न पूछा है।
इतिहास तो बताता है कि साक्रेटीज (सुकरात) आज से लगभग 2350 वर्ष पूर्व अपने शरीर को त्याग चुके हैं। अब यहाँ कौन से सुकरात पैदा हुए, यह तो भगवान ही जानें।
अपनी जीवनगाथा लिखते हुए वह युवती कहती है कि उसे अपने ही मुहल्ले का अभय नाम का युवक पसन्द आ गया और उसने उसके साथ शारीरिक संबंध बना लिया। उसके बाद उसे कॉलेज में पढ़ रहे निष्काम और शेखर के प्रति भी आकर्षण हो गया। अब वह सुरूपा घर में अभय, कालेज में निष्काम तथा रविवार को शेखर के लिए आरक्षित है। अप्रैल में उसकी परीक्षा पूरी होगी तथा उसके माता-पिता उसकी शादी कर देंगे।
अब वह युवती साक्रेटीज महोदय से प्रश्न करती है कि ऐसी स्थिति में मैं क्या करूँ ? क्योंकि मुझे तीनों लड़के पसंद हैं।
क्या उपरोक्त कहानी एक भारतीय कन्या के नाम पर बदनुमा दाग नहीं है ? हमारे शास्त्रों में आदर्श आर्यकन्या के रूप में सती सावित्री का नाम आता है जिसने सत्यवान को अपने पति के रूप में वरण किया था। जब सबको पता लगा कि सत्यवान अल्पायु है तो सभी ने सावित्री पर दबाव डाला कि वह किसी दूसरे युवक का वरण कर ले परन्तु भारत की वह कन्या अपने धर्म पर अडिग रहती है और उसकी इसी निष्ठा ने उसे यमराज के पास से उसके पति के प्राण वापस लाने में समर्थ बना दिया।
अब आप स्वयं विचार कीजिए कि भारत की कन्याओं के जीवन को महान बनाने के लिए 'संदेश' के प्रकाशन विभाग की सती सावित्री की कथा छापनी चाहिए या सुरूपा की ?
सुरूपा के बाद आइये सॉक्रेटीज महोदय के पास चलते हैं। देखिये कि वे सुरूपा के प्रश्न का कैसा जवाब देते हैं।
सॉक्रेटीज महोदय कहते हैं- "आपका कुछ नहीं होगा। आप चौथे को पसंद करोगी और शेष जीवन में संसार के तमाम सुख भोगोगी, यह बात मैं छाती ठोककर कहता हूँ। आपने तीन युवकों के साथ निकटता रखी और उनका भरपूर उपयोग किया, इस बात पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता। यह उमर ही ऐसी है। आपके इस अहोभाग्य से अन्य युवतियाँ ईर्ष्या भी कर सकती हैं।
इस प्रकार का एक लम्बा चौड़ा जवाब साक्रेटीज महोदय ने दिया है। आप जरा सोचिये कि संसार तथा शरीर को नश्वर समझने वाले आत्मनिष्ठा के धनी साक्रेटीज के पास यदि यह बात जाती तो क्या वह ऐसा जवाब देते ? यह तो समाज के साथ बहुत बड़ा धोखा हो रहा है। यह तो अखबार के नाम पर भारतीय सनातन संस्कृति को तोड़क भोगवादी संस्कृति का साम्राज्य फैलाने का एक घिनौना षडयंत्र है।
पाश्चात्य जगत का अंधानुकरण करके भारतीय समाज पहले ही पतन के बड़े गर्त में गिरा हुआ है। फैशनपरस्ती, भौतिकता तथा भोगवासना ने समाजोत्थान के मानदण्डों को ध्वस्त कर दिया है। युवा वर्ग व्यसनों तथा भोगवासना की दुष्प्रवृत्तियों का शिकार बन रहा है। ऐसी स्थिति में संतसमाज द्वारा ध्यान योग शिविरों, विद्यार्थी उत्थान शिविरों, रामायण तथा भागवत, गीता और उपनिषदों की कथा-सत्संगों के माध्यम से गिरते हुए मानव को अशांति, कलह तथा दुःखी जीवन से सुख, शांति एवं दिव्य जीवन की ओर अग्रसर करने के महत् कार्य किये जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों से लाखों-लाखों भटके हुए लोगों को सही राह मिल रही है। इसके कई उदाहरण हैं। यौवन सुरक्षा तथा महान नारी जैसी प्रेरणादायी पुस्तकों से तेजस्वी जीवन जीने की प्रेरणा व कला मिल रही है। यदि विवेक-बुद्धि से विचार किया जाय तो भारत का अन्न खानेवाले इन लोगों को अपनी सस्कृति के उत्थान के लिए सहयोग करना चाहिए परन्तु ये तो समाज की उन्नति में बाधा बनकर देशद्रोही की भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे लेख छापकर व्यभिचार और पाश्चात्य संस्कृति को बढ़ावा देने का कुकृत्य कर रहे हैं।
पाश्चात्य देशों के अधिकांश लोग अपनी संस्कृति छोड़कर, उच्छ्रंखलता से बाज आकर सनातनी संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं परन्तु सनातनी संस्कृति के कुछ लोग पश्चिम की भोगवादी संस्कृति को अपना रहे हैं और उसका बड़े जोर-शोर से प्रचार कर रहे हैं। यह कैसी मूर्खता है ?
जिनसे समाज की शांति, सत्प्रेरणा, उचित मार्गदर्शन तथा दिव्य जीवन जीने की कला मिल रही है, उनका तो विरोध होता है और जिनसे समाज में कुकर्म, व्यभिचार तथा चरित्रहनन जैसी कुचेष्टाओं को बढ़ावा मिले – ऐसे लेख प्रकाशित हो रहे हैं। अब आप स्वयं विचार कीजिए कि ऐसे लोग मानवता व संस्कृति के मित्र हैं या घोर शत्रु ?
मोहनदास करमचंद गाँधी ने बचपन में केवल एक बार सत्यवादी हरिश्चन्द्र नाटक देखा था। उस नाटक का उन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने आजीवन सत्यव्रत लेने का संकल्प ले लिया तथा इसी व्रत के प्रभाव से वे इतने महान हो गये।
एक चलचित्र का एक बालक के जीवन पर कितना गहरा प्रभाव पड़ता है, यह गाँधी जी के जीवन से स्पष्ट हो जाता है। अब जरा विचार कीजिए कि जो बच्चे टी.वी. के सामने बैठकर एक ही दिन में कितने ही हिंसा, बलात्कार और अश्लीलता के दृश्य देख रहे हैं वे आगे चलकर क्या बनेंगे ? सड़क चलते हुए हमारी बहन, बेटियों को छेड़ने वाले लोग कहाँ से पैदा हो रहे हैं ? उनमें बुराई कहाँ से पैदा होती है ? कौन हैं ये लोग जो 5 और 10 साल की बच्चियों को भी अपनी हवस का शिकार बना लेते हैं ? इनको यह सब कौन सिखाता है ? क्या ये किसी स्कूल से प्रशिक्षण लेते हैं ?
किसी भी स्कूल में ऐसा पाप करने का प्रशिक्षण नहीं मिलता। कोई भी माता-पिता अपने बच्चों से ऐसा पाप नहीं करवाते। इसके बावजूद भी ऐसे लोग समाज में हैं तो उसके कारण हैं टी.वी., सिनेमा तथा गन्दे पत्र-पत्रिकायें जिनके पृष्ठों पर अश्लील चित्र तथा सामग्रियाँ छापी जाती हैं।
कुछ समय पूर्व 'पाञ्चजन्य' में छपी एक खबर के अनुसार हैदराबाद के समीप चार युवकों ने रात के अँधेरे में राह चलती एक युवती को रोका तथा निकट के खेतों में ले जा कर उसके साथ बलात्कार किया। जब वे युवक पकड़े गये तो उन्होंने बताया कि वे उस समय सिनेमाघर से ठीक वैसा ही दृश्य ही देखकर आ रहे थे जिसका दुष्प्रभाव उनके मन पर बहुत गहरा उतर गया था।
जिस देश के ऋषियों ने कहाः यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता उसी देश की नारियों के लिए घर से बाहर निकलना भी असुरक्षित हो गया है। यह कैसा मनोरंजन है ? यह मनोरंजन नहीं है अपितु घर-घर में सुलगती वह आग है जो जब भड़केगी तो किसी से देखा भी नहीं जायेगा। जिस देश की संस्कृति में पति-पत्नी के लिए भी माता-पिता तथा बड़ों के सामने आपसी बातें करने की मर्यादा रखी गयी है, उसी देश के निवासी एक साथ बैठकर अश्लील दृश्य देखते हैं, अश्वलील गाने सुनते हैं। यह मनोरंजन के नाम पर विनाश नहीं तो और क्या हो रहा है ?
यदि आप अपनी बहन-बेटियों की सुरक्षा चाहते हैं, यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चा किसी गली का माफिया न बने, डॉन न बने अथवा तो बलात्कार जैसे दुष्कर्मों के कारण जेलों में न सड़े, यदि आप चाहते हैं कि आपके नौनिहाल संयमी, चरित्रवान तथा महान बनें तो आज से ही इन केबल कनेक्शनों, सिनेमाघरों तथा अश्लीलता का प्रचार करने वाले पत्र-पत्रिकाओं का बहिष्कार कीजिए। हमें नैतिक तथा मानसिक रूप से उन्नत करने वाली फिल्मों की आवश्यकता है। हमें ऐसे प्रसारण चाहिए, ऐसे दृश्य चाहिए जिनसे स्नेह, सदाचार, सहनशीलता, करूणाभाव, आत्मीयता, सेवा-साधना, सच्चाई, सच्चरित्रता तथा माता-पिता, गुरूजनों एवं अपनी संस्कृति के प्रति आदर का भाव प्रगट हो जिससे हमारा देश दिव्यगुण सम्पन्न हो, आध्यात्मिक क्षेत्र का सिरताज बने। इसके लिये जागृत होकर हम सबको मिलकर प्रयास करना चाहिए।
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टी.वी.
द्वारा पनपती
बुराइयों का
विरोध अत्यंत
आवश्यक
हिन्दुस्तान की मिट्टी में ऐसी खासियत है कि यहाँ कोई भगत सिंह हो जाता है, कोई दयानंद हो जाता है, कोई विवेकानंद हो जाता है। यह इस माटी की खासियत है कि यह माटी कभी वीरविहीन नहीं रही है। हजारों वर्षों से इस देश का यही इतिहास है। इससे पाश्चात्य देशों के लोगों को डर लगता है। उस डर को खत्म करने के लिए उन्होंने ने यह सूत्र अपनाया कि हिन्दुस्तान का कोई भी नौजवान स्वामी विवेकानन्द न होने पाय। हिन्दुस्तान का हर नौजवान माइकल जैक्सन हो जाय। इसकी तैयारी वे लोग कर रहे हैं। उनको पता है कि इस देश में माइकल जैक्सन हो जायेंगे तो चिन्ता की कोई बात नहीं क्योंकि वे इस देश को बेचने का ही काम करेंगे। भारतीय संस्कृति को ही बेचने का काम करेंगे। अगर कोई दूसरा विवेकानन्द खड़ा हो गया तो इस देश से बहुराष्ट्रीयवाद को मार-मारकर भगा देगा। इससे बचने के लिए उन्होंने एक घिनौना षडयंत्र रचा कि हिन्दुस्तान के नौजवानों का चरित्र खत्म करो और इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए वे लोग जी.टी.वी., स्टार टी.वी., प्राइम स्टार जैसे चौदह-पन्द्रह टेलिविजन चैनल इस देश में लाये और इन चैनलों पर रात दिन को कुछ दिखाया जाता है वह मनोरंजन नहीं बल्कि हमारे चरित्र को बर्बाद कर देने का एक साधन है। आज लोगों से पूछा जाता है कि आपके घर में एंटिना से डिश ऐंटिना कैसै लगा तो जवाब मिलता है मनोरंजन के लिये। तो क्या डिश ऐंटिना के बिना किसी का मनोरंजन नहीं होगा ? इस बात पर विचार करें। जिसके पास डिश ऐंटिना नहीं है उसने केबल कनेक्शन ले लिया इसका मतलब यही होता है कि बर्बादी का साधन ले लिया और वो भी मनोरंजन के नाम पर ! इस देश में धन्य तो वे लोग हैं जो डिश और केबल कनेक्शन देकर अपने घर और पड़ोसी के घर में भी आग लगा रहे हैं। जिस किसी घर में घुसो तो वहाँ टी.वी. चल रहा होता है। पूछो कि क्या कर रहे हैं ? तो जवाब मिलता है कि दिनभर काम से थक जाते हैं इसलिए कुछ तो मनोरंजन के लिए चाहिए न। छोटे-छोटे बच्चे, उनके माता-पिता और दादा-दादी तीन-तीन पीढ़ियाँ एक साथ बैठी हैं और देख क्या रही हैं ? ऐसे अश्लील दृश्य, गाने जो हम अपनी माताओं और बहनों के सामने गा नहीं सकते, सुन नहीं सकते ऐसे गीत अपने बच्चों को क्यों दिखाये और सुनाये जाते हैं ? गीत लिखने वालों ने तो अपना शरीर, अपनी कला, अपना ईमान यह सब कुछ बेच डाला है, जीवन बर्बाद कर डाला है। उससे भी बुरी बात दूसरी यह है कि घर-घर में जहाँ अभी भी भारतीय संस्कृति की बातें कहीं जाती हैं, जिस देश में बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि 'यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवता'. अभी उसी देश ये अश्लील दृश्य और गाने दिखाकर इस देश की संस्कृति का कबाड़ा नहीं तो और क्या कर रहे हैं ? वास्तव में इस देश के युवकों को गाना चाहिए 'मेरा रंग दे बसंती चोला, हम भारत देश के वासी हैं, हम ऋषियों की संतानें हैं, हम परमगुरू के बच्चे हैं' लेकिन इसकी जगह हम गा रहे हैं अश्लील गाने। यह संस्कृति का विनाश नहीं तो और क्या है ?
यह मनोरंजन नहीं है बल्कि घर-घर में सुलगती वह आग है जो जब भड़केगी तो आपसे देखा नहीं जायेगा कि आपके बच्चे क्या कर रहे हैं। टेलीविजन में जो फिल्में दिखाई जाती हैं वे अक्सर दो ही चीजें दिखाती हैं। एक तो अश्लीलता और दूसरी हिंसा। दोनों ही चीजें इतनी मात्रा में दिखायी जाती हैं कि आदमी के दिल-दिमाग पर ये चित्र छप जाते हैं। क्या आप जानते हैं कि आपके ये नौनिहाल बालक जिनको आप तो डॉक्टर, इन्जीनियर, शिक्षक बनाने का सपना देखते हैं लेकिन आप इन्हें खुद क्या दिखा रहे हैं ? सामान्यतः एक छोटा बच्चा एक दिन में पाँच घण्टे टी.वी. देखता है और होता क्या है कि स्कूल से आया, बस्ता फेंका और टी.वी. खोल कर बैठ गया। अब माँ बोलेगी कि बेटा ! गृहकार्य करो तो वह टी.वी. के सामने करेगा, भोजन भी टी.वी. के सामने करेगा। माँ बोलेगी कि बेटा ! खेलने जाओ तो बच्चा जवाब देता है कि फिल्म आ रही है, गाने आ रहे हैं। हम नहीं जाएँगे। गाने सुनेंगे, टी.वी. देखेंगे आदि। इससे बच्चों का आपस में खेलने से जो घुल मिल जाने का, प्रेमभाव का वातावरण जो उनके मस्तिष्क में बनना चाहिए वह न बनकर अब उसकी जगह अश्लीलता व हिंसा ने ले ली है और बच्चों को ही बात नहीं बड़ों को भी देखिये कि एक बार टी.वी. खोलकर बैठ गये और उन्हें लग भी रहा है कि यह दृश्य नहीं देखना चाहिए, फिर भी हमारा उसे बन्द करने का दृढ़ विवेक नहीं होता। हम इतने गुलाम हो गये हैं, कमजोर हो गये हैं, भ्रष्ट हो गये है। आपके बच्चे उन दृश्यों को कई-कई घंटे देखते रहते हैं। कुछ निकाले गये आँकड़ों के अनुसार एक 3 साल का बच्चा जब टी.वी. देखना शुरू करता है और उसके घर में यदि केबल कनेक्शन पर 12-13 चैनल उपलब्ध हैं तो प्रतिदिन 5 घंटे के हिसाब से वह बच्चा 20 साल की उम्र में जब पहुँचता है तो अपनी आँखों के सामने 33 हजार हत्याएँ देख चुकता है और लगभग 72 हजार बार वह बच्चा अश्लीलता व बलात्कार के दृश्य देखता है। यहाँ एक बात गम्भीरता से सोचने है कि मोहनदास करमचंद गाँधी नाम का एक छोटा सा बच्चा एक या दो बार हरिश्चन्द्र का नाटक देखने के बाद सत्यवादी हो गया और वही बच्चा महात्मा गाँधी के नाम से आज भी पूजा जा रहा है और पूजा जाता रहेगा। तो हरिश्चन्द्र का नाटक जब दिमाग पर इतना असर करता है कि जिन्दगीभर सत्य और अहिंसा का पालन करने वाला हो गया तो जो बच्चे 33 हजार बार हत्याएँ और 70-72 हजार बार बलात्कार के दृश्य देख रहे हैं वे क्या बनने वाले हैं ? आप भले झूठी उम्मीद करें कि आपका बच्चा बड़ा इंजीनियर बनेगा, वैज्ञानिक बनेगा, योग्य सज्जन बनेगा, महापुरूष बनेगा, लेकिन 72 हजार बलात्कार और 33 हजार हत्याएँ देखने वाला बच्चा क्या खाक बनेगा ? लेकिन यह बात सत्य है कि आपका बच्चा हो सकता है कि कहीं गली का माफिया बन जाय, डॉन बन जाय। यही बालक दिन रात टी.वी. पर बलात्कार और अश्लील दृश्य देखेगा तो आप देखेगा कि उम्र के एक दौर में पहुँचकर सड़क के किनारे खड़ा हो जायेगा और कोई भी बहन जायगी तो सीटी बजाएगा, टोंट कसेगा। आप जरा अपने आपसे तो पूछिये कि हमारी बहन-बेटियों को सड़क चलते छेड़ने वाले ये लोग कहाँ से पैदा हो रहे हैं ? उनमें बुराई कैसे फैलती है ? कौन हैं ये लोग ? इतनी हैवानियत और राक्षसी वृत्तिवाले व्यक्ति जो 5 और 10 साल की बच्चियों को भी नहीं छोड़ते और उन्हें अपनी अंधी हवस का शिकार बना लेते हैं ऐसे लोग कहाँ से आते हैं ? इनको ये सब कौन सिखाता है ? क्या किसी स्कूल में पढ़ाया जाता है या कहीं ऐसी ट्रेनिंग दी जाती है ? हिन्दुस्तान की कौन सी स्कूल और कौन सी किताब में यह सब पढ़ाया जाता है ? जब ये बुराई किसी स्कूल में नहीं पढ़ाई जाती, घर में भी नहीं सिखाई जाती उसके बावजूद भी ये बुरे लोग कहाँ से आ जाते हैं ? उसके दो ही कारण हैं या तो टी.वी. या फिर सिनेमा। इस हिंसा का असर इतना खतरनाक होता है कि जितनी बार आपका बच्चा मारामारी और हिंसक दृश्य देखता है उतनी बार उसके हृदय से दयाभाव, करूणाभाव व प्रेमभाव खत्म हो जाता है।
हमारे शास्त्रों में कहा गया है किः जब हमारे हृदय से दया ही खत्म हो जायगी तो फिर धर्म कहाँ से बचेगा ?
यह हिंसा हमें जानबूझकर दिखाई जा रही है। ऐसा नहीं है कि अच्छे कार्यक्रम दिखाने वाले लोग नहीं हैं। अच्छे कार्यक्रम बनाने वाले लोग भी हैं और दिखाने वाले लोग भी हैं लेकिन जानबूझकर वे सेक्स अथवा मारामारी ही तो दिखाते हैं। यह हिंसा, क्रूरता, छल-कपट, अश्लीलता के दृश्य देखते-देखते आज हम इतने संवेदनशून्य हो गये है कि 1984 में भोपाल में जब 10000 लोग मर गये तो किसी की आँखों में आँसू नहीं निकले। सिनेमा और टी.वी. पर मारामारी देखकर हमारे दिल की करूणा जो नितांत आवश्यक है वो आज बिल्कुल सूख चुकी है। हमारे सामने कत्ल हो जाता है और हम सामने से चुपचाप निकल जाते हैं। सारी इन्सानियत, सारी मानवीयता एक तरफ धरी रह जाती है। टी.वी. का असर इतना हावी होता है। इसलिए टी.वी. के इस आक्रमण को हम रोक लें नहीं तो हमारा घर भी नहीं बचेगा. देश बचेगा या समाज बचेगा यह तो दूर की बात है। हम सिर्फ अपना ही घर बचा लें तो बहुत है। हम घर को बचाने से समाज, देश व विश्व बच सकेगा हर माँ-बाप के लिए अपना बच्चा दुनिया में सबसे लाडला व्यक्ति होता है और उसी को हमने उन भेड़ियों के बीच झोंक दिया है जो यह तक नहीं जानते कि मानवीयता क्या होती है ? दया क्या होती है ? आज घर-घर में टी.वी. के लिए होड़ लग गई है। क्या आप जानते हैं कि यह आपको क्या सिखाता है ? घर की बढ़े शान, पड़ोसी की जले जान और नेवर्स एनवी ओनर्स प्राइड अर्थात् आपके घर की शान तब बढ़ेगी जब पड़ोसी की जान जलेगी। आपका धर्म कहता है 'वसुधैव कुटुम्बकम्' और टी.वी. कहता है कि पड़ोसी की जान जलाओ और हम अपने पड़ोसी की जान जलाने के लिए ओनिडा खरीद लाय और पड़ोसी हमारी जान जलाने के लिए ओनिडा खरीद लाय और दोनों पड़ोसी एक दूसरे की जान जलाने के लिए लगे हुए हैं। कब दोनों के घर जल जाएँगे किसी को नहीं मालूम। एक बात गंभीरता से सोचने की है कि जब किसी ईमानदार युवक के दिमाग में यह बात बैठ जायेगी कि घर की शान तब बढ़ेगी जब ओनिडा आयेगा लेकिन उसकी जेब में दस रूपया भी नहीं है और ओनिडा टी.वी. के लिए 17000 रूपये चाहिए तो रात दिन उसके दिमाग में यह धनचक्कर शुरू हो जाएगा और एक दिन ऐसा आयेगा कि 17000 रूपये के लिए वह अपने ईमान को, अपने देश को बेच देगा, क्योंकि ओनिडा जो लाना है। और यहीं से एक ईमानदार आदमी के बेईमान होने की कहानी शुरू हो जाती है। यही बात जब उसके पिता के मन में आती है तो वे कहते हैं कि लाओ, कहीं से रिश्वत क्योंकि इसके बिना घर की शान नहीं है और मान लीजिए कि यही बात अगर उसकी माँ के दिमाग में बैठ गई और वह कहीं नौकरी नहीं करती, गृहिणी है तो जानते हैं वह क्या कहेगी ? कहेगी के अब इस लड़के की जब शादी करेंगे तो दहेज में लेंगे। तो एक ईमानदार माँ बेईमान होगी। शादी के बाद पता चला कि घर में सारा सामान आ गया लेकिन एक टी.वी. नहीं आया तो आने वाली उस दुल्हन को हम दहेज के लिए जिन्दा जला देंगे। ऐसा भी इस देश में बहुत जगह होता है। एक टी.वी. के लिए हम एक जीती जागती महिला को जला देते हैं। इससे ज्यादा संस्कृति की निकृष्टता क्या हो सकती है कि हमारे समाज में एक जीती जागती बहन से ज्यादा कीमत टी.वी. की हो गई है और जबसे ऐसी कीमतें लगनी शुरू हो गई हैं तबसे आप देखिये अखबारों में कोई दिन बाकी नहीं जाता जब दहेज के लिए किसी की हत्या न होती हो।
तो इन सब तथ्यों को पढ़ जान लेने के बाद हमें चाहिए कि हम आज से ही वंश नाशनी, कुल कलंकनी चैनलों से अपने परिवार की रक्षा करें। काट दो कनेक्शनों को।
सभी देशवासी मिलकर कदम उठायें, कन्धे से कन्धा मिलाकर उन हिंसक, भ्रष्ट, दयाभाव से रहित, दुर्गुण अभिवर्धक चैनलों का कड़ा विरोध करें। हमें चाहिए समाजिक, नैतिक एवं मानसिक रूप से उन्नत करने वाली फिल्में जिससे हमारी संस्कृति सुरक्षित रह सके। हमारे जीवन का उत्थान करने हेतु उच्च गुण सम्पन्न कार्यक्रमों को चलाने की माँग की जाय जिससे बालकों, युवाओं में दुर्गुण, दुर्भाव न पनपकर स्नेह, सदाचार, सहनशीलता, करूणाभाव, आत्मीयता, सेवा-साधना, सच्चाई, ईश्वर-भक्ति, माता-पिता व गुरूजनों के प्रति आदरभाव जैसे महान गुण पनपें जिससे हमारा भारत देश दिव्य गुण सम्पन्न हो। आध्यात्मिक क्षेत्र में फिर से सिरताज बने। हमें इसके लिए जागृत होकर बुराई को हटाने का निर्भयता से पुरूषार्थ करना चाहिए। हम अपने भाग्य के विधाता स्वयं हैं।
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सत्र 11
फाल्गुन पूर्णिमा को मनाया जाने वाला पर्व 'होली' वर्ष का अंतिम पर्व है। यह ऐसा पर्व है जिसमें सभी वर्णों के लोग बिना किसी सदभाव के सम्मिलित होते हैं।
प्राचीन काल में होलिकोत्सव के अवसर पर वेद के रक्षोहणं बलगहणम्.... आदि राक्षस विनाशक मंत्रों से यज्ञ की अग्नि में हवन किया जाता था और इसी पूर्णिमा से प्रथम चतुर्मास सम्बन्धी वैश्वदेव नामक यज्ञ का आरंभ होता था, जिसमें लोग खेतों में तैयार की हुई नयी आषाढ़ी फसल के अन्न – गेहूँ, जौ, चना आदि की आहुति देकर उस अर्थात बचे हुए अन्न को यज्ञशेष प्रसाद के रूप में ग्रहण करते थे। यज्ञांत में लोग उस भस्म को सिर पर धारण करके वंदना किया करते थे, जिसका विकृत रूप आज राख को बलात् लोगों पर उड़ाने के रूप में रह गया है। उस समय का धूलिहारी शब्द ही आज ही विकृत होकर धुलैंडी बन गया है।
शब्दकोष ग्रन्थों के अनुसार भुने हुए अन्न को संस्कृत भाषा में होलका नाम से पुकारा जाता है। अतः इसी नाम पर होलिकोत्सव का प्रारंभ मानकर इस पर्व को हम वेदकालीन कह सकते हैं। आज भी होलिकादहन के समय डंडे पर बँधी गेहूँ-जौ की बालियों को भूनते हैं – यह प्राचीन होलिकोत्सव की ही स्मृति दिलाता है।
वैदिक काल में यज्ञ के रूप में मनाये जाने वाले पर्व होलिकोत्सव में समय के साथ अनेक ऐतिहासिक घटनाएँ जुड़ती गयीं। नारद पुराण के अनुसार यह पवित्र दिन परमभक्त प्रह्लाद की विजय और हिरण्यकशिपु की बहन होलिका के विनाश की स्मृति का दिन है।
भविष्य पुराण में इस पर्व से सम्बन्धित एक और घटना का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि महाराजा रघु के राज्यकाल में ढुण्ढा नामक राक्षसी के उपद्रवों से भयभीत प्रजाजनों ने महर्षि वशिष्ठ के आदेशानुसार बालकों को लकड़ी की तलवार ढाल आदि देकर हो हल्ला मचाते हुए (राक्षसी विनाशार्थ आचरण का अभिनय करते हुए) स्थान-स्थान पर अग्नि-प्रज्वलन तथा अग्नि-क्रीड़ा आदि का आयोजन किया था और इस प्रकार वह राक्षसी बाधा वहाँ सर्वथा शांत हो गयी थी। वर्त्तमान में होलिकोत्सव में बालकों का उपद्रव करना और हो हल्ला मचाना आदि बातें इसी घटना की देन कही जाती है।
मानव समाज के हित को ध्यान में रखते हुए हमारे अन्य पर्वों की भाँति होली के पीछे भी ऋषि-मुनियों का एक विशेष दृष्टिकोण रहा है। होली मनाने की रीति मानव-स्वास्थ्य पर बड़ा प्रभाव डालती है। देशभर में एक साथ एक रात में संपन्न होने वाला होलिकादहन शीत और ग्रीष्म ऋतु की संधि में होने वाली अनेक बीमारियों जैसे – खसरा, मलेरिया आदि से रक्षा करता है। जगह-जगह पर प्रज्वलित महाअग्नि की प्रदीप्त ज्वालाएँ आवश्यकता से अधिक ताप द्वारा समस्त वायुमंडल को उष्ण बनाकर जहाँ एक ओर रोग के कीटाणुओं को संहार कर देती हैं, वही दूसरी ओर प्रदक्षिणा के बहाने अग्नि की परिक्रमा करने से शरीरस्थ रोग के कीटाणु को भी नष्ट करने में समर्थ होती है।
इस ऋतु में शरीर के कफ के पिघलने के कारण स्वाभाविक ही आलस्य की वृद्धि होती है। महर्षि सुश्रुत ने वसंत को कफ-कोपक ऋतु माना हैः
कफश्चितो
हि शिशिरे
वसन्तेऽर्काशु
तापितः।
हत्वाग्रिं
कुरूते
रोगानतस्तं
त्वरया जयेत्।।
'शिशिर ऋतु में इकट्ठा हुआ कफ वसंत में पिघल-पिघलकर कुपित होकर जुकाम, खाँसी, श्वास, दमा आदि नाना प्रकार के रोगों की सृष्टि करता है।'
इसका शमन करने के लिए कहा गया हैः
तीक्ष्णैर्वमननस्याद्यैर्लघुरूक्षैश्च
भोजनै।
व्यायामोद्
वर्तघातैर्जित्वा
श्लेष्माणमुल्बणम्।।
'तीक्षण वमन, तीक्षण नस्य, लघु रूक्ष भोजन, व्यायाम, उद्वर्तन और आघात आदि का प्रयोग कफ को शांत करता है।'
होली के दिन किया जाने वाला गाना-बजाना, कूदना-फाँदना, भागना-दौड़ना आदि सब ऐसी ही क्रियाएँ हैं जिनसे कफ प्रकोप शांत हो जाता है और सहसा कोई कफजन्य रोग या अन्य बीमारी नहीं होती।
होली रंग का त्योहार है। इस पर्व पर जिस रंग के प्रयोग का विधान शास्त्रकारों ने किया है वह है पलाश अर्थात् ढाक के फूलों टेसुओं का रंग। हमारी संस्कृति में ढाक एक पुनीत वृक्ष माना जाता है। ब्रह्मचारी को उपनयन के समय ढाक का ही दंड धारण करवाया जाता है एवं सर्व साधारण के लिए यथार्थ समिधा भी ढाक की ही बतलायी गयी है।
ढाक के फूलों से तैयार किया गया रंग एक प्रकार से उसके फूलों का अर्क ही होता है। उस रंग में भीगा हुआ कपड़ा शरीर पर डाल दिया जाय तो रंग शरीर के रोमकूपों के द्वारा आभ्यान्तरिक स्नायु मंडल पर अपना प्रभाव डालता है और संक्रामक बीमारियों को शरीर के पास फटकने तक नहीं देता। यज्ञ मधुसूदन के अनुसारः
एतपुष्पं
कफं पित्तं
कुष्ठं दाहं
तृषामपि।
वातं
स्वेदं
रक्तदोषं
मूत्रकृच्छं
च नाशयेत्।।
'ढाक के फूल कुष्ठ, दाह, वात, पित्त, कफ, तृषा, रक्तदोष एवं मूत्रकृच्छ आदि रोगों का नाश करने में सहायक है।'
सिंघाड़े के आटे से तैयार किया गया गुलाल भी ऐसी ही पवित्र वस्तुओं में से है। प्राचीन भारत की होली में पलाश के पुष्पों का रंग, गुलाल, अबीर और चंदन का ही उपयोग किया जाता था। वर्त्तमान में जिन रंगों का प्रयोग किया जाता है उनका निर्माण विभिन्न रासायनिक (कैमिकल) तत्त्वों से होता है जो श्वास एवं रोमकूपों द्वारा शरीर को बड़ी हानि पहुँचाते हैं। अतः इन रासायनिक रंगों से सावधान रहें.....
जब वैदि ढंग से होली मनायी जाती थी, उस जमाने में मानसिक तनाव-खिंचाव आदि नहीं होते थे, किन्तु आज जहरीले रंगों के प्रयोग से, कीचड़ आदि उछालने से एवं शराब आदि पीने पिलाने से होली का रूप बड़ा विकृत हो गया है।
जहरीले रंगों की जगह पलाश के रंग का प्रयोग करें तो अच्छा है। इससे भी बढ़कर है कि परम पावन परमात्मा के नाम संकीर्तन में रंगे-रँगायें एवं छोटे बड़े, मेरे-तेरे के भेदभाव को भूलकर सभी में उसी एक सत्यस्वरूप, चैतन्यस्वरूप परमात्मा कि निहारें तथा अपना जीवन धन्य बनाने के मार्ग पर अग्रसर हों....
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मानव के सर्वांगीण विकास में उसका व्यक्तित्व एक अहम् भूमिका अदा करता है और उसके व्यक्तित्व के विकास में रंगों का अपना अलग महत्व है। यदि किसी व्यक्ति को पहचानना हो, उसके स्वभाव का आकलन करना हो, उसके व्यक्तित्व का अनुमान लगाना हो तो वह उसकी वेशभूषा और उसके द्वारा पसंद किये गये रंगों के आधार पर सहजता से लगाया जा सकता है।
एक सज्जन और शांत स्वभाव की महिला ने घर बदला और नये घर में डिजाइनयुक्त कलर करवाया... लाल, गुला कुछ दिनों के बाद उस महिला का स्वभाव बड़ा चिड़चिड़ा हो गया, खिन्न हो गया। इस बात की जाँच की गयी कि वह नये मकान में आकर चिड़चिड़े स्वभाव की क्यों हो गयी ? जाँच करते करते पता चला कि उसके निजी कक्ष की दीवारों के रंग का उसके मन पर असर हुआ है।
आपके मन पर रंगों का प्रभाव पड़ता है और आपके स्वभाव के अनुसार ही आपको कुछ विशेष रंग अच्छे लगते हैं। आपको किस रंग के वस्त्र पसंद हैं ? इसके आधार पर आपके स्वभाव को मापा जा सकता है। जैसे
भगवा रंगः जिसको गेरू रंग के वस्त्र (मिल के नहीं) पसंद हैं तो समझो कि वह व्यक्ति संयमप्रिय है, तपप्रिय है और भगवा रंग तप करने में मदद भी करता है। ऐसा व्यक्ति स्वच्छता पसंद करता है और उसके स्वभाव में सज्जनता का गुण प्रबल होता है यह भगवे रंग का प्रभाव है।
लाल रंगः अगर आपको लाल रंग पसंद है या आप लाल रंग के वस्त्र पहनते हैं तो यह मांगल्य का सूचक है। लाल रंग अर्थात् तिलक (कंकु) लगाने वाला या गुलालवाला लाल रंग गाढ़ा लाल नहीं। एकदम गाढ़ा लाल रंग तो कामुकता की खबर देता है,लेकिन कुमकुम, गुलाल आदि को मांगल्य माना जाता है, इसीलिए तिलक करने और पूजन में इनका प्रयोग किया जाता है। ऐसा रंग शौर्यप्रियता का प्रतीक है और विजयी होने की प्रेरणा भी देता है।
पीला रंगः पीला रंग ज्ञान, विद्या, सुख-शांतिमय स्वभाव और विद्वता का प्रतीक है। पीला अर्थात् हल्दीमय पीला।
हरा रंगः अगर आप हरा रंग पसंद करते हैं या हरी-भरी प्रकृति को पसंद करते हैं तो इससे सुंदरता, मन की शांति, हृदय की शीतलता तथा उद्योगी, चुस्त और आत्मविश्वासी चित्त की खबर आती है।
नीला रंगः अगर किसी को आसमानी नील रंग पसंद है तो इससे सिद्ध होता है कि उसके चित्त में औदार्य है, व्यापकता है। नीला रंग पसंद करने वाले व्यक्ति में पौरूष, धैर्य, सत्य और धर्मरक्षण की वृत्ति दृढ़ होती है।
एक संन्यासी एक प्रसिद्ध स्कूल में गये और उन्होंने बच्चों से पूछाः
"श्रीकृष्ण का वर्ण श्याम क्यों है ?"
सब बच्चे और शिक्षक ताकते रह गये, लेकिन कुछ देर बाद पूरे स्कूल की लाज रखने वाला एक विद्यार्थी उठा और बोलाः "भगवान श्रीकृष्ण का वर्ण श्याम इसलिए है कि श्रीकृष्ण व्यापक हैं।"
संन्यासीः "इस बात का क्या प्रमाण है ?"
विद्यार्थीः "जो वस्तु व्यापक होती है वह नील वर्ण की होती है। जैसे सागर और आकाश व्यापक हैं, अतः उनका रंग नीला है। ऐसे ही परमात्मा व्यापक हैं। उनकी व्यापकता को बताने के लिए उनके साकार श्रीविग्रह का रंग नील वर्ण बताया गया है।"
पूछने वाले संन्यासी थे स्वामी विवेकानंद और उत्तर देने वाला विद्यार्थी था मद्रास के होनहार मुख्यमंत्री राजगोपालाचार्य।
श्वेत रंगः इसमें सब रंगों का आंशिक समावेश पाया जाता है। यह रंग पवित्रता, शुद्धता, शांतिप्रियता और विद्याप्रियता का प्रतीक है।
काला रंगः काला रंग, शोक, दुःख, निराशा, पतन, पलायनवादिता और स्वार्थप्रियता को दर्शाता है।
मटमैला रंगः मटमैला रंग गंभीरता, विनम्रता, सौम्यता, लज्जा और कर्मठता का प्रतीक माना गया है।
इस प्रकार रंग मानव-स्वभाव का चित्रण करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
इन सब वस्त्रों के रंग तो ठीक हैं.....अच्छे हैं, लेकिन धोते-धोते फीके पड़ जाते हैं, जबकि आत्मरंग ऐसा रंग है जो कभी फीका नहीं पड़ता, बदरंग नहीं होता। श्री भोले बाबा कहते हैं-
सब का
रंग कच्चे
जांय उड़ यक
रंग पक्के में
रंगे।
और वह पक्का
रंग है – अद्वैत
आत्मतत्त्व
का रंग, परमात्म-रंग।
मीरा ने भी कहाः
श्याम
पिया मोरी रंग
दे चुनरिया, ऐसी रंग कि
रंग नाहीं
छूटे,
धोबी
धोये चाहे
सारी उमरिया.....
हमारी इन्द्रियों पर, हमारे मन पर संसार का रंग पड़ता है। रंग लगता भी है और बदलता भी रहता है, लेकिन भक्ति और ज्ञान का रंग यदि एक बार भी लग जाय तो मृत्यु के बाप की भी ताकत नहीं है कि उस भक्ति और ज्ञान के रंग को छुड़ा सके।
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सत्र 12
घटित घटना हैः प्रसिद्ध गामा पहलवान, जिसका मूल नाम गुलाम हुसैन था, से पत्रकार जैका फ्रेड ने पूछाः "आप एक हजार से भी ज्यादा कुश्तियाँ खेल चुके हैं। कसम खाने के लिए भी लोग दो-पाँच कुश्तियाँ हार जाते हैं। आपने हजारों कुश्तियों में विजय पायी है और आज तक हारे नहीं हैं। आपकी इस विजय का रहस्य क्या है ?"
गुलाम हुसैन (गामा पहलवान) ने कहाः "मैं किसी महिला की तरफ बुरी नजर से नहीं देखता हूँ। मैं जब कुश्ती में उतरता हूँ तो गीता नायक श्रीकृष्ण का ध्यान करता हूँ और बल की प्रार्थना करता हूँ। इसीलिए हजारों कुश्तियों में मैं एक कुश्ती भी हारा नहीं हूँ, यह संयम और श्रीकृष्ण की ध्यान की महिमा है।"
ब्रह्मचर्य का पालन एवं भगवान का ध्यान.... इन दोनों ने गामा पहलवान को विश्वविजयी बना दिया ! जिसके जीवन में संयम है, सदाचार है एवं ईश्वर-प्रीति है वह प्रत्येक क्षेत्र में सफल होता ही है इसमें सन्देह नहीं है।
युवानों को चाहिए की गामा पहलवान के जीवन से प्रेरणा लें एवं किसी भी स्त्री के प्रति कुदृष्टि न रखें। इसी प्रकार युवतियाँ भी किसी पुरूष के प्रति कुदृष्टि न रखें। यदि युवक-युवतियों ने इतना भी कर लिया तो पतन की खाई में गिरने से बच जायेंगे क्योंकि विकार पहले नेत्रों से ही घुसता है बाद में मन पर उसका प्रभाव पड़ता है। फिल्म के अश्लील दृश्य या उपन्यासों के अश्लील वाक्य मनुष्य के मन को विचलित कर देते हैं और वह भोगों में जा गिरता है। अतः सावधान !
मन को ऐसे ही दृश्य दिखायें कि मन भगवन्मय बने। ऐसा ही सत्साहित्य पढ़ें कि मन में ईश्वर-प्राप्ति के, ईश्वर-प्रीति के विचार आयें। किसी के भी प्रति कुदृष्टि न रखें। जैसे गामा पहलवान ने यह सूत्र अपनाया और सफल रहा वैसे ही यदि भारत का युवावर्ग यह सूत्र अपना ले तो हर क्षेत्र में सफल हो सकता है।
शाबाश, भारत के नौजवानो, शाबाश ! आगे बढ़ो..... संयमी व सदाचारी बनो.... भारत की गौरवमयी गरिमा को पुनः लौटा लाओ..... विश्व में पुनः भारत की दिव्य संस्कृति की पताका फहराने दो....
संयम-सदाचार व भगवद्प्रीति से परिपूर्ण जीवन तुम्हें तो उन्नति के शिखर पर आरूढ़ करेगा ही, तुम्हारे देश की आन-बान और शान की रक्षा में भी सहायक होगा ! करोगे न हिम्मत ! 'युवाधन सुरक्षा अभियान' के तहत भारत के युवा आप तो चेतेंगे ही, औरों को भी दलदल में गिरने से बचायें.... प्रयत्न करना कि भारत के हर युवक तक 'युवाधन सुरक्षा' की पुस्तकें (भाग 1 व 2) पहुँचे। सभी युवक-युवतियाँ ब्रह्मचर्य की महिमा को समझें, समझायें एवं जीवन को ओजस्वी-तेजस्वी बनायें।
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मौन का अर्थ है अपनी वाक् शक्ति का व्यय न करना। मनुष्य जैसे अन्य इन्द्रियों के प्रयोग से अपनी शक्ति खर्च करता है, वैसे ही बोलकर भी अपनी शक्ति का बहुत व्यय करता है। अन्य इन्द्रियों के माध्यम से अपनी शक्ति खर्च करने में मनुष्य, पशुओं एवं पक्षियों में समानता है परन्तु वाणी के प्रयोग के सम्बन्ध में मनुष्य की स्थिति अन्य प्राणियों से भिन्न है। मनुष्य वाणी के संयम द्वारा अपनी शक्ति का विकास कर सकता है। अतः अपनी शक्ति को अपने अन्दर संचित करने के लिए मौन धारण करने की आवश्यकता है।
मौन की महिमाः प्रायः देखा गया है कि मनुष्य अपनी बोलने की शक्ति का अपव्यय करता है, दुरूपयोग करता है। संसार में अधिकांशतः झगड़े वाणी के अनुचित प्रयोग के कारण ही होते हैं। यदि मनुष्य समय-समय पर मौन धारण करे अथवा कम बोलकर वाणी का सदुपयोग करे तो बहुत सारे झगड़े तो अपने आप ही मिट जावेंगे।
मौन आवश्यकः वास्तव में, मौन शीघ्र ही साधा जा सकता है परन्तु लोगों को बोलने की ऐसी आदत पड़ गई है कि सरलता से सधने वाला मौन भी उन्हें कठिन मालूम होता है। मन को स्थिर रखने में मौन बहुत ही सहायक होता है। स्थिर मन से मनुष्य में छिपी हुई आन्तरिक शक्तियों एवं सात्त्विक दैवी गुणों का विकास होता है। अतः सामर्थ्य की वृद्धि के लिए कम बोलना अथवा जितना सम्भव हो सके मौन धारण करना आवश्यक है।
व्यर्थ
वाद-विवाद
करने वाले के
शरीर को कई
रोग घेर लेते
हैं।
आयुर्वेद ग्रन्थ कश्यप-संहिता
कश्यप संहिता आयुर्वेदशास्त्र का उत्तम ग्रन्थ है। उसमें बोलने की प्रक्रिया बताते हुए कहा गया है कि अविसंवादि-पेशलम् अर्थात् बोलने में स्पष्टता होनी चाहिए लेकिन विसंवाद नहीं होना चाहिए। जिसको कहने से लोग वाद-विवाद करने लगें, ऐसी विवादास्पद बात को लोगों के सामने रखने की कोई आवश्यकता नहीं होती। जो लोग बात बढ़ाने वाली बात नहीं बोलते, उनके शरीर में रोग नहीं होते। यदि स्वस्थ रहना चाहते हो तो वाद विवाद बढ़ाने वाली बातें मुँह से मत बोलो। वाद-विवाद बढ़ाने वाली बातों से शरीर में कई प्रकार के रोगों का उदय हो जाता है। यह कश्यप-संहिता का मत है।
मौन का फलः तोता हरे रंग का होता है। अतः जब वह किसी हरे वृक्ष पर बैठा होता है तो चिड़ीमार को वह नहीं दिखता परन्तु जब वह टें-टें करता है तो चिड़ीमार उसे देख लेता है और बंदूक से निशाना लगाकर उसे मार गिराता है। जब तक तोता मौन था, तब तक आनंद में था परन्तु जब मुख से आवाज निकली तो गोली का शिकार हो गया। इसी प्रकार मनुष्य में भले ही हजारों दोष क्यों न हो, मौन अथवा शान्त होकर ईश्वर का नाम जपने से वे दोष दूर होने लगते हैं।
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सत्र 13
जमशेदपुर
(बिहार) में
आयोजित
सत्संग
समारोह में
विद्यार्थियों
के लिए रखे
गये विशेष
कार्यक्रम
में बालकों को
सम्बोधित
करते हुए पूज्य
बापू ने कहाः "इतिहास
हमें बहुत गलत
जानकारी दे
रहा है। इसमें
सुधार लाना
आवश्यक है।
इतिहासकार
लिखते हैं कि
कोलम्बस ने
अमेरिका तथा
वास्कोडिगामा
ने भारत की
खोज की थी
जबकि
वास्तविकता
यह है कि
दोनों लुटेरे
थे। एक ने
भारत को लूटा
और दूसरे ने
अमेरिका के
अस्सी हजार
मूल
निवासियों की
हत्या करके
लूट-पाट की।
ये दोनों गैंग
(गुट) बना कर
समुद्री
जहाजों में
सवार
व्यक्तियों को
लूटते थे। एक
बार दोनों
गुटों के बीच
झगड़ा हो गया।
झगड़ा
सुलझाने के
लिए वे पोप
जान पाल द्वितीय
के पास
पहुँचे। पोप
ने कोलम्बस को
पूर्वी तथा
वास्कोडिगामा
को पश्चिमी छोर
दे दिया।
जहाजों को
लूटते हुए
कोलम्बस अमेरिका
पहुँचा तथा
वहाँ 80 हजार
लोगों की
हत्या कर दी।
दूसरी ओर
वास्कोडिगामा
कालीकट
पहुँचा। हिन्दू-मुसलमान
मेहमानबाजी
में विश्वास
रखते हैं। उस
समय वहाँ के
शासक नवाब का
मेहमान बनकर-हम
आपके अतिथि
हैं, मेहमान
हैं – ऐसा
कहकर उन्हें
पटाया। अपने
पैर जमाये और
मौका पाकर
नवाब की हत्या
करवा दी। शासन
की बागडोर
वास्कोडिगामा
व उसके साथी
लुटेरों ने
हथिया ली। इसके
बाद उसने भारत
से सोने को
जहाजों में
भरकर ले जाना
शुरू कर दिया।
पहले सात, फिर ग्यारह
और उसके बाद
बीस जहाजों
में सोना भरकर
वह अपने देश
ले गया।"
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प्रत्येक मनुष्य को अपने धर्म के प्रति श्रद्धा एवं आदर होना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा हैः
श्रेयान्स्वधर्मो
विगुणः
परधर्मात्स्वनुष्ठतात्।
स्वधर्मे
निधनं श्रेयः
परधर्मों
भयावहः।।
"अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरे के धर्म के गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है।"
(गीताः 3.35)
जब भारत पर मुगलों का शासन था, तब की यह घटित घटना हैः
चौदह वर्षीय हकीकत राय विद्यालय में पढ़ने वाला सिंधी बालक था। एक दिन कुछ बच्चों ने मिलकर हकीकत राय को गालियाँ दीं। पहले तो वह चुप रहा। वैसे भी सहनशीलता तो हिन्दुओं का गुण है ही..... किन्तु जब उन उद्दण्ड बच्चों ने गुरूओं के नाम की और झूलेलाल व गुरू नानक के नाम की गालियाँ देना शुरू किया तब उस वीर बालक से अपने गुरू और धर्म का अपमान सहा नहीं गया।
हकीकत राय ने कहाः "अब हद हो गयी ! अपने लिये तो मैंने सहनशक्ति का उपयोग किया लेकिन मेरे धर्म, गुरू और भगवान के लिए एक भी शब्द बोलोगे तो यह मेरी सहनशक्ति से बाहर की बात है। मेरे पास भी जुबान है। मैं भी तुम्हें बोल सकता हूँ।"
उद्दण्ड बच्चों ने कहाः "बोलकर तो दिखा ! हम तेरी खबर लेंगे।"
हकीकत राय ने भी उनको दो चार कटु शब्द सुना दिये। बस, उन्हीं दो चार शब्दों को सुनकर मुल्ला मौलवियों का खून उबल पड़ा। वे हकीकत राय को ठीक करने का मौका ढूँढने लगे। सब लोग एक तरफ और हकीकतराय अकेला एक तरफ।
उस समय मुगलों का ही शासन था इसलिए हकीकत राय को जेल में कैद कर दिया गया।
मुगल शासकों की ओर से हकीकत राय को यह फरमान भेजा गया किः "अगर तुम कलमा पढ़ लो और मुसलमान बन जाओ तो तुम्हें अभी माफ कर दिया जायेगा और यदि तुम मुसलमान नहीं बनोगे तो तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दिया जायेगा।"
हकीकत राय के माता-पिता जेल के बाहर आँसू बहा रहे थे किः "बेटा ! तू मुसलमान बन जा। कम-से-कम हम तुम्हें जीवित तो देख सकेंगे !" ....लेकिन उस बुद्धिमान सिंधी बालक ने कहाः
"क्या मुसलमान बन जाने के बाद मेरी मृत्यु नहीं होगी ?"
माता-पिताः "मृत्यु तो होगी।"
हकीकत रायः "तो फिर मैं अपने धर्म में मरना पसंद करूँगा। मैं जीते-जीते जी दूसरों के धर्म में नहीं जाऊँगा।"
क्रूर शासकों ने हकीकत राय की दृढ़ता देखकर अनेकों धमकियाँ दीं लेकिन उस बहादुर किशोर पर उनकी धमकियों का जोर न चल सका। उसके दृढ़ निश्चय को पूरा राज्य-शासन भी न डिगा सका।
अंत में मुगल शासक ने उसे प्रलोभन देकर अपनी ओर खींचना चाहा लेकिन वह बुद्धिमान व वीर किशोर प्रलोभनों में भी नहीं फँसा।
आखिर क्रूर मुसलमान शासकों ने आदेश दिया किः "अमुक दिन बीच मैदान में हकीकत राय का शिरोच्छेद किया जायगा।"
उस वीर हकीकत राय ने गुरू का मंत्र ले रखा था। गुरूमंत्र जपते-जपते उसकी बुद्धि सूक्ष्म हो गयी थी। वह चौदह वर्षीय किशोर जल्लाद के हाथ में चमचमाती हुई तलवार देखकर जरा भी भयभीत न हुआ वरन् वह अपने गुरू के दिये हुए ज्ञान को याद करने लगा किः "यह तलवार किसको मारेगी ? मार-मारकर इस पंचभौतिक शरीर को ही तो मारेगी और ऐसे पंचभौतिक शरीर तो कई बार मिले और कई बार मर गये। ....तो क्या यह तलवार मुझे मारेगी ? नहीं। मैं तो अमर आत्मा हूँ.... परमात्मा का सनातन अंश हूँ। मुझे यह कैसे मार सकती है ? ॐ....ॐ.....ॐ......."
हकीकत राय गुरू के इस ज्ञान का चिंतन कर रहा था, तभी क्रूर काजियों ने जल्लाद को तलवार चलाने का आदेश दिया। जल्लाद ने तलवार उठायी लेकिन उस निर्दोष बालक को देखकर उसकी अंतरात्मा थरथरा उठी। उसके हाथों से तलवार गिर पड़ी और हाथ काँपने लगे।
काजी बोलेः "तुझे नौकरी करनी है कि नहीं ? यह तू क्या कर रहा है ?"
तब हकीकत राय ने अपने हाथों से तलवार उठायी और जल्लाद के हाथ में थमा दी। फिर वह किशोर हकीकत राय आँखें बंद करके परमात्मा का चिंतन करने लगाः "हे अकाल पुरूष ! जैसे सांप केंचुली का त्याग करता है वैसे ही मैं यह नश्वर देह छोड़ रहा हूँ। मुझे तेरे चरणों की प्रीति देना ताकि मैं तेरे चरणों में पहुँच जाऊँ.... फिर से मुझे वासना का पुतला बनकर इधर-उधर न भटकना पड़े.....अब तू मुझे अपनी ही शरण में रखना.... मैं तेरा हूँ..... तू मेरा है.....हे मेरे अकाल पुरूष !"
इतने में जल्लाद ने तलवार चलायी और हकीकत राय का सिर धड़ से अलग हो गया।
हकीकत राय ने 14 वर्ष की नन्हीं सी उम्र में धर्म के लिए अपनी कुर्बानी दे दी। उसने शरीर छोड़ दिया लेकिन धर्म न छोड़ा।
गुरूतेगबहादुर
बोलिया, सुनो
सिखों !
बड़भागिया,
धड़
दीजे धरम न
छोड़िये....
हकीकत राय ने अपने जीवन में यह चरितार्थ करके दिखा दिया।
हकीकत राय तो धर्म के लिए बलिवेदी पर चढ़ गया लेकिन उसकी कुर्बानी ने सिंधी समाज के हजारों लाखों जवानों में एक जोश भर दिया किः
"धर्म की खातिर प्राण देना पड़े तो देंगे लेकिन विधर्मियों के आगे कभी नहीं झुकेंगे। भले अपने धर्म में भूखे मरना पड़े तो स्वीकार है लेकिन परधर्म को कभी स्वीकार नहीं करेंगे।"
ऐसे वीरों के बलिदान के फलस्वरूप ही हमें आजादी प्राप्त हुई है और ऐसे लाखों-लाखों प्राणों की आहुति द्वारा प्राप्त की गयी इस आजादी को हम कहीं व्यसन, फैशन एवं चलचित्रों से प्रभावित होकर गँवा न दें ! अब देशवासियों को सावधान रहना होगा।
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सत्र 14
एक शिष्य ने अपने गुरू से कहाः "गुरू जी ! आपके पास रहते हुए मुझे 22 साल हो गये। मैं रोज नंगे पैर चलता हूँ, भिक्षा माँगकर खाता हूँ, संसार के आकर्षण से बचा हूँ फिर भी अभी तक मुझे कोई अनुभूति नहीं हुई, अभी तक साक्षात्कार नहीं हुआ ?"
गुरूजी ने चिट्ठी लिखकर कहाः
"तू राजा जनक के पास ज्ञान लेने के लिए जा।"
शिष्य चल पड़ा। जाते-जाते रास्ते में सोचने लगाः "गुरूजी ने राजा जनक के पास से ज्ञान लेने के लिए कहा है लेकिन राजा जनक तो राज्य कर रहे हैं, राज्य-सुख भोग रहे हैं वे मुझे आत्मसुख कैसे देंगे ?"
राजा जनक के दरबार में पहुँचने पर शिष्य ने देखा कि 'राजा जनक सिंहासन पर बैठे हैं, सुंदरियाँ चँवर डुला रही हैं, भाट-चारण जयघोष कर रहे हैं, सामने महफिल की तैयारी है। राजा जनक का अभिवादन करते हुए शिष्य ने कहाः
"गुरूजी ने मुझे आपके पा