प्रातः स्मरणीय परम
पूज्य
संत श्री आसारामजी बापू
के सत्संग प्रवचनों
में से नवनीत
जीवन-रसायन
इस पुस्तिका
का
एक-एक
वाक्य ऐसा स्फुलिंग
है कि वह हजार वर्षों
के घनघोर अंधकार
को एक पल में ही
घास की तरह जला
कर भस्म कर सकता
है | इसका
हर एक वचन आत्मज्ञानी
महापुरुषों के
अन्तस्तल से प्रकट
हुआ है |
सामान्य मनुष्य
को ऊपर उठाकर देवत्व
की उच्चतम भूमिका
में पहुँचाने का
सामर्थ्य इसमें
निहित है | प्राचीन
भारत की आध्यात्मिक
परम्परा में पोषित
महापुरुषों ने
समाधि द्वारा अपने
अस्तित्व की गहराईयों
में गोते लगाकर
जो अगम्य, अगोचर
अमृत का खजाना
पाया है, उस अमृत
के खजाने को इस
छोटी सी पुस्तिका
में भरने का प्रयास
किया गया है |
गागर
में सागर भरने
का यह एक नम्र प्रयास
है | उसके
एक-एक वचन को सोपान
बनाकर आप अपने
लक्ष्य तक पहुँच
सकते हैं |
इसके सेवन से
मुर्दे के दिल
में भी प्राण का
संचार हो सकता
है | हताश, निराश,
दुःखी, चिन्तित
होकर बैठे हुए
मनुष्य के लिये
यह पुस्तिका अमृत-संजीवनी
के समान है |
इस पुस्तिका
को दैनिक ‘टॉनिक’ समझकर
श्रद्धाभाव से,
धैर्य से इसका
पठन, चिन्तन
एवं मनन करने से
तो अवश्य लाभ होगा
ही, लेकिन किसी
आत्मवेत्ता महापुरुष
के श्रीचरणों में
रहकर इसका श्रवण-चिन्तन
एवं मनन करने का
सौभाग्य मिल जाये
तब तो पूछना( या कहना) ही क्या
?
दैनिक जीवन-व्यवहार
की थकान से विश्रांति
पाने के लिये, चालू
कार्य से दो मिनट
उपराम होकर इस
पुस्तिका की दो-चार
सुवर्ण-कणिकाएँ
पढ़कर आत्मस्वरूप
में गोता लगाओ,
तन-मन-जीवन को
आध्यात्मिक तरंगों
से झंकृत होने
दो, जीवन-सितार
के तार पर परमात्मा
को खेलने दो | आपके
शारीरिक, मानसिक
व आध्यात्मिक ताप-संताप
शांत होने लगेंगे
| जीवन
में परम तृप्ति
की तरंगें लहरा
उठेंगी |
‘जीवन
रसायन’ का यह दिव्य
कटोरा आत्मरस के
पिपासुओं के हाथ
में रखते हुए समिति
अत्यन्त आनन्द
का अनुभव करती
है |
विश्वास
है की अध्यात्म
के जिज्ञासुओं
के जीवन को दिव्यामृत
से सरोबार करने
में यह पुस्तिका
उपयोगी सिद्ध होगी
|
- श्री योग
वेदान्त सेवा समिति
अमदावाद आश्रम
1) जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता
है, उसे
एक ही जन्म में
हजारों वर्षों
का कम कर लेना होगा
| उसे
इस युग की रफ़्तार
से बहुत आगे निकलना
होगा |
जैसे
स्वप्न में मान-अपमान, मेरा-तेरा,
अच्छा-बुरा दिखता
है और जागने के
बाद उसकी सत्यता
नहीं रहती वैसे
ही इस जाग्रत जगत
में भी अनुभव करना
होगा | बस…हो गया
हजारों वर्षों
का काम पूरा | ज्ञान
की यह बात हृदय
में ठीक से जमा
देनेवाले कोई महापुरुष
मिल जायें तो हजारों
वर्षों के संस्कार, मेरे-तेरे
के भ्रम को दो पल
में ही निवृत कर
दें और कार्य पूरा
हो जाये |
2) यदि तू निज
स्वरूप का प्रेमी
बन जाये तो आजीविका
की चिन्ता, रमणियों, श्रवण-मनन
और शत्रुओं का
दुखद स्मरण यह
सब छूट जाये |
उदर-चिन्ता
प्रिय चर्चा
विरही को जैसे
खले |
निज स्वरूप
में निष्ठा हो
तो
ये सभी सहज टले
||
3) स्वयं को
अन्य लोगों की
आँखों से देखना, अपने
वास्तविक स्वरूप
को न देखकर अपना
निरीक्षण अन्य
लोगों की दृष्टि
से करना, यह
जो स्वभाव है वही
हमारे सब दुःखों
का कारण है | अन्य
लोगों की दृष्टि
में खूब अच्छा
दिखने की इच्छा
करना- यही हमारा
सामाजिक दोष है
|
4) लोग क्यों दुःखी हैं ? क्योंकि अज्ञान
के कारण वे अपने
सत्यस्वरूप को
भूल गये हैं और
अन्य लोग जैसा
कहते हैं वैसा
ही अपने को मान
बैठते हैं | यह दुःख
तब तक दूर नहीं
होगा जब तक मनुष्य
आत्म-साक्षात्कार
नहीं कर लेगा |
5) शारीरिक, मानसिक,
नैतिक व आध्यात्मिक
ये सब पीड़ाएँ वेदान्त
का अनुभव करने
से तुरंत दूर होती
हैं और…कोई आत्मनिष्ठ
महापुरुष का संग
मिल जाये तो वेदान्त
का अनुभव करना
कठिन कार्य नहीं
है |
6) अपने अन्दर के परमेश्वर को प्रसन्न
करने का प्रयास
करो |
जनता
एवं बहुमति को
आप किसी प्रकार
से संतुष्ट नहीं
कर सकते | जब आपके आत्मदेवता
प्रसन्न होंगे
तो जनता आपसे अवश्य
संतुष्ट होगी |
7) सब वस्तुओं
में ब्रह्मदर्शन
करने में यदि आप
सफल न हो सको तो
जिनको आप सबसे
अधिक प्रेम करते
हों ऐसे, कम-से-कम
एक व्यक्ति में
ब्रह्म परमात्मा
का दर्शन करने
का प्रयास करो
| ऐसे
किसी तत्वज्ञानी
महापुरुष की शरण
पा लो जिनमें ब्रह्मानंद
छलकता हो | उनका
दृष्टिपात होते
ही आपमें भी ब्रह्म
का प्रादुर्भाव
होने की सम्भावना
पनपेगी | जैसे एक्स-रे
मशीन की किरण कपड़े, चमड़ी,
मांस को चीरकर
हड्डियों का फोटो
खींच लाती है,
वैसे ही ज्ञानी
की दृष्टि आपके
चित्त में रहने
वाली देहाध्यास
की परतें चीरकर
आपमें ईश्वर को
निहारती है | उनकी
दृष्टि से चीरी
हुई परतों को चीरना
अपके लिये भी सरल
हो जायेगा | आप भी
स्वयं में ईश्वर
को देख सकेंगें
| अतः
अपने चित्त पर
ज्ञानी महापुरुष
की दृष्टि पड़ने
दो | पलकें
गिराये बिना, अहोभाव
से उनके समक्ष
बैठो तो आपके चित्त
पर उनकी दृष्टि
पड़ेगी |
8) जैसे मछलियाँ
जलनिधि में रहती
हैं, पक्षी वायुमंडल
में ही रहते हैं
वैसे आप भी ज्ञानरूप
प्रकाशपुंज में
ही रहो, प्रकाश
में चलो, प्रकाश
में विचरो, प्रकाश में ही
अपना अस्तित्व
रखो |
फिर
देखो खाने-पीने
का मजा, घूमने-फिरने
का मजा, जीने-मरने
का मजा |
9) ओ तूफान
! उठ ! जोर-शोर से आँधी
और पानी की वर्षा
कर दे |
ओ
आनन्द के महासागर
! पृथ्वी और आकाश
को तोड़ दे | ओ मानव
! गहरे से गहरा गोता
लगा जिससे विचार
एवं चिन्ताएँ छिन्न-भिन्न
हो जायें | आओ, अपने
हृदय से द्वैत
की भावना को चुन-चुनकर
बाहर निकाल दें, जिससे
आनन्द का महासागर
प्रत्यक्ष लहराने
लगे |
ओ प्रेम की मादकता
! तू जल्दी आ | ओ आत्मध्यान
की, आत्मरस की
मदिरा ! तू हम पर
जल्दी आच्छादित
हो जा | हमको तुरन्त
डुबो दे | विलम्ब करने
का क्या प्रयोजन
? मेरा मन अब एक
पल भी दुनियादारी
में फँसना नहीं
चाहता | अतः इस मन को प्यारे
प्रभु में डुबो
दे | ‘मैं
और मेरा …तू और तेरा’ के ढेर
को आग लगा दे | आशंका
और आशाओं के चीथड़ों
को उतार फेंक | टुकड़े-टुकड़े
करके पिघला दे
| द्वैत
की भावना को जड़
से उखाड़ दे | रोटी
नहीं मिलेगी ? कोई
परवाह नहीं | आश्रय
और विश्राम नहीं
मिलेगा ? कोई फिकर
नहीं | लेकिन मुझे चाहिये
प्रेम की, उस
दिव्य प्रेम की
प्यास और तड़प |
मुझे वेद पुराण
कुरान से क्या
?
मुझे सत्य का
पाठ पढ़ा दे कोई
||
मुझे मंदिर
मस्जिद जाना नहीं
|
मुझे प्रेम
का रंग चढ़ा दे कोई
||
जहाँ ऊँच या
नीच का भेद नहीं
|
जहाँ जात या
पाँत की बात नहीं
||
न हो मंदिर मस्जिद
चर्च जहाँ |
न हो पूजा नमाज़
में फर्क कहीं
||
जहाँ सत्य ही
सार हो जीवन का
|
रिधवार सिंगार
हो त्याग जहाँ
||
जहाँ प्रेम
ही प्रेम की सृष्टि
मिले |
चलो नाव को ले
चलें खे के वहाँ
||
10) स्वप्नावस्था
में दृष्टा स्वयं
अकेला ही होता
है | अपने
भीतर की कल्पना
के आधार पर सिंह, सियार,
भेड़, बकरी,
नदी, नगर,
बाग-बगीचे की
एक पूरी सृष्टि
का सर्जन कर लेता
है |
उस
सृष्टि में स्वयं
एक जीव बन जाता
है और अपने को सबसे
अलग मानकर भयभीत
होता है | खुद शेर है और
खुद ही बकरी है
| खुद
ही खुद को डराता
है | चालू
स्वप्न में सत्य
का भान न होने से
दुःखी होता है
| स्वप्न
से जाग जाये तो
पता चले कि स्वयं
के सिवाय और कोई
था ही नहीं | सारा
प्रपंच कल्पना
से रचा गया था | इसी प्रकार
यह जगत जाग्रत
के द्वारा कल्पित
है, वास्तविक
नहीं है | यदि जाग्रत
का दृष्टा अपने
आत्मस्वरूप में
जाग जाये तो उसके
तमाम दुःख-दारिद्रय
पल भर में अदृश्य
हो जायें |
11) स्वर्ग का साम्राज्य
आपके भीतर ही है
| पुस्तकों
में, मंदिरों में,
तीर्थों में,
पहाड़ों में,
जंगलों में आनंद
की खोज करना व्यर्थ
है |
खोज
करना ही हो तो उस
अन्तस्थ आत्मानंद
का खजाना खोल देनेवाले
किसी तत्ववेत्ता
महापुरुष की खोज
करो |
12) जब तक आप अपने
अंतःकरण के अन्धकार
को दूर करने के
लिए कटिबद्ध नहीं
होंगे तब तक तीन
सौ तैंतीस करोड़
कृष्ण अवतार ले
लें फिर भी आपको
परम लाभ नहीं होगा
|
13) शरीर अन्दर के
आत्मा का वस्त्र
है |
वस्त्र
को उसके पहनने
वाले से अधिक प्यार
मत करो |
14) जिस क्षण आप सांसारिक
पदार्थों में सुख
की खोज करना छोड़
देंगे और स्वाधीन
हो जायेंगे, अपने अन्दर की
वास्तविकता का
अनुभव करेंगे,
उसी क्षण आपको
ईश्वर के पास जाना
नहीं पड़ेगा | ईश्वर
स्वयं आपके पास
आयेंगे | यही दैवी विधान
है |
15) क्रोधी यदि आपको
शाप दे और आप समत्व
में स्थिर रहो,
कुछ न बोलो तो
उसका शाप आशीर्वाद
में बदल जायेगा
|
16) जब हम ईश्वर से
विमुख होते हैं
तब हमें कोई मार्ग
नहीं दिखता और
घोर दुःख सहना
पड़ता है | जब हम
ईश्वर में तन्मय
होते हैं तब योग्य
उपाय, योग्य प्रवृति,
योग्य प्रवाह
अपने-आप हमारे
हृदय में उठने
लगता है |
17) जब तक मनुष्य
चिन्ताओं से उद्विग्न
रहता है, इच्छा
एवं वासना का भूत
उसे बैठने नहीं
देता तब तक बुद्धि
का चमत्कार प्रकट
नहीं होता | जंजीरों
से जकड़ी हुई बुद्धि
हिलडुल नहीं सकती
| चिन्ताएँ, इच्छाएँ
और वासनाएँ शांत
होने से स्वतंत्र
वायुमंडल का अविर्भाव
होता है | उसमें
बुद्धि को विकसित
होने का अवकाश
मिलता है | पंचभौतिक
बन्धन कट जाते
हैं और शुद्ध आत्मा
अपने पूर्ण प्रकाश
में चमकने लगता
है |
18) ओ सज़ा के भय से
भयभीत होने वाले
अपराधी ! न्यायधीश
जब तेरी सज़ा का
हुक्म लिखने के
लिये कलम लेकर
तत्पर हो, उस
समय यदि एक पल भर
भी तू परमानन्द
में डूब जाये तो
न्यायधीश अपना
निर्णय भूले बिना
नहीं रह सकता | फ़िर उसकी
कलम से वही लिखा
जायेगा जो परमात्मा
के साथ, तेरी नूतन
स्थिति के अनुकूल
होगा |
19) पवित्रता और
सच्चाई, विश्वास
और भलाई से भरा
हुआ मनुष्य उन्नति
का झण्डा हाथ में
लेकर जब आगे बढ़ता
है तब किसकी मजाल
कि बीच में खड़ा
रहे ? यदि आपके
दिल में पवित्रता,
सच्चाई और विश्वास
है तो आपकी दृष्टि
लोहे के पर्दे
को भी चीर सकेगी
| आपके
विचारों की ठोकर
से पहाड़-के-पहाड़
भी चकनाचूर हो
सकेंगे | ओ जगत के बादशाहों
! आगे से हट जाओ | यह दिल
का बादशाह पधार
रहा है |
20) यदि आप संसार
के प्रलोभनों एवं
धमकियों से न हिलें
तो संसार को अवश्य
हिला देंगे | इसमें
जो सन्देह करता
है वह मंदमति है, मूर्ख
है |
21) वेदान्त
का यह सिद्धांत
है कि हम बद्ध नहीं
हैं बल्कि नित्य
मुक्त हैं | इतना
ही नहीं, ‘बद्ध
हैं’ यह
सोचना भी अनिष्टकारी
है, भ्रम है
| ज्यों
ही आपने सोचा कि
‘मैं
बद्ध हूँ…, दुर्बल
हूँ…,
असहाय
हूँ…’ त्यों
ही अपना दुर्भाग्य
शुरू हुआ समझो
| आपने
अपने पैरों में
एक जंजीर और बाँध
दी | अतः
सदा मुक्त होने
का विचार करो और
मुक्ति का अनुभव
करो |
22) रास्ते
चलते जब किसी प्रतिष्ठित
व्यक्ति को देखो, चाहे
वह इंग्लैंड़ का
सर्वाधीश हो,
चाहे अमेरिका
का ‘प्रेसिड़ेंट’ हो, रूस का सर्वेसर्वा
हो, चाहे चीन
का ‘ड़िक्टेटर’ हो- तब
अपने मन में किसी
प्रकार की ईर्ष्या या भय
के विचार मत आने
दो | उनकी
शाही नज़र को अपनी
ही नज़र समझकर मज़ा
लूटो कि ‘मैं ही वह हूँ
|’ जब
आप ऐसा अनुभव करने
की चेष्टा करेंगे
तब आपका अनुभव
ही सिद्ध कर देगा
कि सब एक ही है |
23) यदि हमारा
मन ईर्ष्या-द्वेष
से रहित बिल्कुल
शुद्ध हो तो जगत
की कोई वस्तु हमें
नुक्सान नहीं पहुँचा
सकती |
आनंद
और शांति से भरपूर
ऐसे महात्माओं
के पास क्रोध की
मूर्ति जैसा मनुष्य
भी पानी के समान
तरल हो जाता है
| ऐसे
महात्माओं को देख
कर जंगल के सिंह
और भेड़ भी प्रेमविह्वल
हो जाते हैं | सांप-बिच्छू
भी अपना दुष्ट
स्वभाव भूल जाते
हैं |
24) अविश्वास
और धोखे से भरा
संसार, वास्तव
में सदाचारी और
सत्यनिष्ठ साधक
का कुछ बिगाड़ नहीं
सकता |
25) ‘सम्पूर्ण विश्व मेरा शरीर है’ ऐसा जो कह सकता है वही आवागमन के चक्कर से मुक्त है | वह तो अनन्त है | फ़िर कहाँ से आयेगा और कहाँ जायेगा? सारा ब्रह्माण्ड़ उसी में है |
26) किसी भी प्रसंग को मन में लाकर हर्ष-शोक के वशीभूत नहीं होना | ‘मैं अजर हूँ…, अमर हूँ…, मेरा जन्म नहीं…, मेरी मृत्यु नहीं…, मैं निर्लिप्त आत्मा हूँ…,’ यह भाव दृढ़ता से हृदय में धारण करके जीवन जीयो | इसी भाव का निरन्तर सेवन करो | इसीमें सदा तल्लीन रहो |
27) बाह्य संदर्भों के बारे में सोचकर अपनी मानसिक शांति को भंग कभी न होने दो |
28) जब इन्द्रियाँ विषयों की ओर जाने के लिये जबरदस्ती करने लगें तब उन्हें लाल आँख दिखाकर चुप कर दो | जो आत्मानंद के आस्वादन की इच्छा से आत्मचिंतन में लगा रहे, वही सच्चा धीर है |
29) किसी भी चीज़ को ईश्वर से अधिक मूल्यवान मत समझो |
30) यदि हम देहाभिमान को त्यागकर साक्षात ईश्वर को अपने शरीर में कार्य करने दें तो भगवान बुद्ध या जीसस क्राईस्ट हो जाना इतना सरल है जितना निर्धन पाल (Poor Paul) होना |
31) मन को वश करने का उपाय : मन को अपना नौकर समझकर स्वयं को उसका प्रभु मानो | हम अपने नौकर मन की उपेक्षा करेंगे तो कुछ ही दिनों में वह हमारे वश में हो जायेगा | मन के चंचल भावों को ना देखकर अपने शान्त स्वरूप की ओर ध्यान देंगे तो कुछ ही दिनों में मन नष्ट होने लगेगा | इस प्रकार साधक अपने आनंदस्वरूप में मग्न हो सकता है |
32) समग्र संसार के तत्वज्ञान, विज्ञान, गणित, काव्य और कला आपकी आत्मा में से निकलते हैं और निकलते रहेंगे |
33) ओ खुदा को खोजनेवाले ! तुमने अपनी खोजबीन में खुदा को लुप्त कर दिया है | प्रयत्नरूपी तरंगों में अनंत सामर्थ्यरूपी समुद्र को छुपा दिया है |
34) परमात्मा की शान्ति को भंग करने का सामर्थ्य भला किसमें है ? यदि आप सचमुच परमात्म-शान्ति में स्थित हो जाओ तो समग्र संसार उलटा होकर टंग जाये फ़िर भी आपकी शान्ति भंग नहीं हो सकती |
35) महात्मा वही है जो चित्त को ड़ांवांड़ोल करनेवाले प्रसंग आयें फ़िर भी चित्त को वश में रखे, क्रोध और शोक को प्रविष्ट न होने दे |
36) वृति
यदि आत्मस्वरूप
में लीन होती है
तो उसे सत्संग, स्वाध्याय
या अन्य किसी भी
काम के लिये बाहर
नहीं लाना चहिये
|
37) सुदृढ़ अचल संकल्प शक्ति के आगे मुसीबतें इस प्रकार भागती हैं जैसे आँधी-तूफ़ान से बादल बिखर जाते हैं |
38) सुषुप्ति (गहरी नींद) आपको बलात अनुभव कराती है कि जाग्रत का जगत चाहे कितना ही प्यारा और सुंदर लगता हो, पर उसे भूले बिना शान्ति नहीं मिलती | सुषुप्ति में बलात विस्मरण हो, उसकी सत्यता भूल जाये तो छः घंटे निद्रा की शान्ति मिले | जाग्रत में उसकी सत्यता का अभाव लगने लगे तो परम शान्ति को प्राप्त प्राज्ञ पुरुष बन जाये | निद्रा रोज़ाना सीख देती है कि यह ठोस जगत जो आपके चित्त को भ्रमित कर रहा है, वह समय की धारा में सरकता जा रहा है | घबराओ नहीं, चिन्तित मत हो ! तुम बातों में चित्त को भ्रमित मत करो | सब कुछ स्वप्न में सरकता जा रहा है | जगत की सत्यता के भ्रम को भगा दो |
ओ शक्तिमान आत्मा ! अपने अंतरतम को निहार ! ॐ का गुंजन कर ! दुर्बल विचारों एवं चिंताओं को कुचल ड़ाल ! दुर्बल एवं तुच्छ विचारों तथा जगत को सत्य मानने के कारण तूने बहुत-बहुत सहन किया है | अब उसका अंत कर दे |
39) ज्ञान के कठिनमार्ग पर चलते वक्त आपके सामने जब भारी कष्ट एवं दुख आयें तब आप उसे सुख समझो क्योंकि इस मार्ग में कष्ट एवं दुख ही नित्यानंद प्राप्त करने में निमित्त बनते है | अतः उन कष्टों, दुखों और आघातों से किसी भी प्रकार साहसहीन मत बनो, निराश मत बनो | सदैव आगे बढ़ते रहो | जब तक अपने सत्यस्वरूप को यथार्थ रूप से न जान लो, तब तक रुको नहीं |
40) स्वपनावस्था में आप शेर को देखते हैं और ड़रते हैं कि वह आपको खा जायेगा | परंतु आप जिसको देखते हैं वह शेर नहीं, आप स्वयं हैं | शेर आपकी कल्पना के अतिरिक्त और कुछ नहीं | इस प्रकार जाग्रतावस्था में भी आपका घोर-से-घोर शत्रु भी स्वयं आप ही हैं, दूसरा कोई नहीं | प्रथकत्व, अलगाव के विचार को अपने हृदय से दूर हटा दो | आपसे भिन्न कोई मित्र या शत्रु होना केवल स्वप्न-भ्रम है |
41) अशुभ का विरोध मत करो | सदा शांत रहो | जो कुछ सामने आये उसका स्वागत करो, चाहे आपकी इच्छा की धारा से विपरीत भी हो | तब आप देखेंगे कि प्रत्यक्ष बुराई, भलाई में बदल जायेगी |
42) रात्रि में निद्राधीन होने से पहले बिस्तर पर सीधे, सुखपूर्वक बैठ जाओ | आँखें बंद करो | नाक से श्वास लेकर फ़ेफ़ड़ों को भरपूर भर दो | फ़िर उच्च स्वर से ‘ॐ…’ का लंबा उच्चारण करो | फ़िर से गहरा स्वास लेकर ‘ॐ…’ का लंबा उच्चारण करो | इस प्रकार दस मिनट तक करो | कुछ ही दिनों के नियमित प्रयोग के बाद इसके चमत्कार का अनुभव होगा | रात्रि की नींद साधना में परिणत हो जायेगी
| दिल-दिमाग में शांति एवं आनंद की वर्षा होगी | आपकी लौकिक निद्रा योगनिद्रा में बदल जयेगी |
43) हट जाओ, ओ संकल्प और इच्छाओं ! हट जाओ ! तुम संसार की क्षणभंगुर प्रशंसा एवं धन-सम्पत्ति के साथ सम्बंध रखती हो | शरीर चाहे कैसी भी दशा में रहे, उसके साथ मेरा कोई सरोकार नहीं
| सब शरीर मेरे ही हैं |
44) किसी भी तरह समय बिताने के लिये मज़दूर की भांति काम मत करो | आनंद के लिये, उपयोगी कसरत समझकर, सुख, क्रीड़ा या मनोरंजक खेल समझकर एक कुलीन राजकुमार की भांति काम करो | दबे हुए, कुचले हुए दिल से कभी कोई काम हाथ में मत लो |
45) समग्र संसार को जो अपना शरीर समझते हैं, प्रत्येक व्यक्ति को जो अपना आत्मस्वरूप समझते हैं, ऐसे ज्ञानी किससे अप्रसन्न होंगे ? उनके लिये विक्षेप कहाँ रहा ?
46) संसार की तमाम वस्तुऐं सुखद हों या भयानक, वास्तव में तो तुम्हारी प्रफ़ुलता और आनंद के लिये ही प्रकृति ने बनाई हैं | उनसे ड़रने से क्या लाभ ? तुम्हारी नादानी ही तुम्हें चक्कर में ड़ालती है | अन्यथा, तुम्हें नीचा दिखाने वाला कोई नहीं | पक्का निश्चय रखो कि यह जगत तुम्हारे किसी शत्रु ने नहीं बनाया | तुम्हारे ही आत्मदेव का यह सब विलास है |
47) महात्मा वे हैं जिनकी विशाल सहानुभूति एवं जिनका मातृवत हृदय सब पापियों को, दीन-दुखियों को प्रेम से अपनी गोद में स्थान देता है |
48) यह नियम है कि भयभीत प्राणी ही दूसरों को भयभीत करता है | भयरहित हुए बिना अभिन्नता आ नहीं सकती, अभिन्नता के बिना वासनाओं का अंत सम्भव नहीं है और निर्वासनिकता के बिना निर्वैरता, समता, मुदिता आदि दिव्य गुण प्रकट नहीं होते | जो बल दूसरों की दुर्बलता को दूर ना कर सके, वह वास्तव में बल नहीं |
49) ध्यान में बैठने से पहले अपना समग्र मानसिक चिंतन तथा बाहर की तमाम सम्पत्ति ईश्वर के या सदगुरु के चरणों में अर्पण करके शांत हो जाओ | इससे आपको कोई हानि नहीं होगी
| ईश्वर आपकी सम्पत्ति, देह, प्राण और मन की रक्षा करेंगे
| ईश्वर अर्पण बुद्धि से कभी हानि नहीं होती
| इतना ही नहीं, देह, प्राण में नवजीवन का सिंचन होता है | इससे आप शांति व आनंद का स्त्रोत बनकर जीवन को सार्थक कर सकेंगे
| आपकी और पूरे विश्व की वास्तविक उन्नति होगी
|
50) प्रकृति प्रसन्नचित्त एवं उद्योगी कार्यकर्ता को हर प्रकार से सहायता करती है |
51) प्रसन्नमुख रहना यह मोतियों का खज़ाना देने से भी उत्तम है |
52) चाहे करोड़ों सूर्य का प्रलय हो जाये, चाहे असंख्य चन्द्रमा पिघलकर नष्ट हो जायें परंतु ज्ञानी महापुरुष अटल एवं अचल रहते हैं |
53) भौतिक पदार्थों को सत्य समझना, उनमें आसक्ति रखना, दुख-दर्द व चिंताओं को आमंत्रण देने के समान है | अतः बाह्य नाम-रूप पर अपनी शक्ति व समय को नष्ट करना यह बड़ी गलती है |
54) जब आपने व्यक्तित्व विषयक विचारों का सर्वथा त्याग कर दिया जाता है तब उसके समान अन्य कोई सुख नहीं, उसके समान श्रेष्ठ अन्य कोई अवस्था नहीं
|
55) जो लोग आपको सबसे अधिक हानि पहुँचाने का प्रयास करते हैं, उन पर कृपापूर्ण होकर प्रेममय चिंतन करें
| वे आपके ही आत्मस्वरूप हैं |
56) संसार में केवल एक ही रोग है | ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या - इस वेदांतिक नियम का भंग ही सर्व व्याधियों का मूल है | वह कभी एक दुख का रूप लेता है तो कभी दूसरे दुख का | इन सर्व व्याधियों की एक ही दवा है : अपने वास्तविक स्वरूप ब्रह्मत्व में जाग जाना
|
57) बुद्ध ध्यानस्थ बैठे थे | पहाड़ पर से एक शिलाखंड़ लुढ़कता हुआ आ रहा था | बुद्ध पर गिरे इससे पहले ही वह एक दूसरे शिलाखंड़ के साथ टकराया
| भयंकर आवाज़ के साथ उसके दो भाग हो गये | उसने अपना मार्ग बदल लिया
| ध्यानस्थ बुद्ध की दोनों तरफ़ से दोनों भाग गुज़र गये | बुद्ध बच गये | केवल एक छोटा सा कंकड़ उनके पैर में लगा | पैर से थोड़ा खून बहा | बुद्ध स्वस्थता से उठ खड़े हुए और शिष्यों से कहा:
“भीक्षुओं ! सम्यक समाधि का यह ज्वलंत प्रमाण है | मैं यदि ध्यान-समाधि में ना होता तो शिलाखंड़ ने मुझे कुचल दिया होता
| लेकिन ऐसा ना होकर उसके दो भाग हो गये | उसमें से सिर्फ़ एक छोटा-सा कंकड़ ऊछलकर मेरे पैर में लगा | यह जो छोटा-सा ज़ख्म हुआ है वह ध्यान की पूर्णता में रही हुई कुछ न्यूनता का परिणाम है | यदि ध्यान पूर्ण होता तो इतना भी ना लगता |”
58) कहाँ है वह तलवार जो मुझे मार सके ? कहाँ है वह शस्त्र जो मुझे घायल कर सके ? कहाँ है वह विपत्ति जो मेरी प्रसन्नता को बिगाड़ सके ? कहाँ है वह दुख जो मेरे सुख में विघ्न ड़ाल सके ? मेरे सब भय भाग गये | सब संशय कट गये | मेरा विजय-प्राप्ति का दिन आ पहुँचा है | कोई संसारिक तरंग मेरे निश्छल चित्त को आंदोलित नहीं कर सकती
| इन तरंगों से मुझे ना कोई लाभ है ना हानि है | मुझे शत्रु से द्वेष नहीं, मित्र से राग नहीं
| मुझे मौत का भय नहीं, नाश का ड़र नहीं, जीने की वासना नहीं, सुख की इच्छा नहीं और दुख से द्वेष नहीं क्योंकि यह सब मन में रहता है और मन मिथ्या कल्पना है |
59) सम्पूर्ण स्वास्थय की अजीब युक्ति: रोज सुबह तुलसी के पाँच पत्ते चबाकर एक ग्लास बासी पानी पी लो | फ़िर जरा घूम लो, दौड़ लो या कमरे में ही पंजों के बल थोड़ा कूद लो | नहा-धोकर स्वस्थ, शान्त होकर एकांत में बैठ जाओ | दस बारह गहरे-गहरे श्वास लो | आगे-पीछे के कर्तव्यों से निश्चिंत हो जाओ | आरोग्यता, आनंद, सुख, शान्ति प्रदान करनेवाली विचारधारा को चित्त में बहने दो | बिमारी के विचार को हटाकर इस प्रकार की भावना पर मन को दृढ़ता से एकाग्र करो कि:
मेरे अंदर आरोग्यता व आनंद का अनंत स्त्रोत प्रवाहित हो रहा है… मेरे अंतराल में दिव्यामृत का महासागर लहरा रहा है | मैं अनुभव कर रहा हूँ कि समग्र सुख, आरोग्यता, शक्ति मेरे भीतर है | मेरे मन में अनन्त शक्ति और सामर्थ्य है | मैं स्वस्थ हूँ | पूर्ण प्रसन्न हूँ | मेरे अंदर-बाहर सर्वत्र परमात्मा का प्रकाश फ़ैला हुआ है | मैं विक्षेप रहित हूँ | सब द्वन्दों से मुक्त हूँ | स्वर्गीय सुख मेरे अंदर है | मेरा हृदय परमात्मा का गुप्त प्रदेश है | फ़िर रोग-शोक वहाँ कैसे रहे सकते हैं ? मैं दैवी ओज
के मंड़ल में प्रविष्ट हो चुका हूँ | वह मेरे स्वास्थ्य का प्रदेश है | मैं तेज का पुँज हूँ | आरोग्यता का अवतार हूँ |
याद रखो : आपके अंतःकरण में स्वास्थय, सुख, आनंद और शान्ति ईश्वरीय वरदान के रूप में विद्यमान है | अपने अंतःकरण की आवाज़ सुनकर निशंक जीवन व्यतीत करो | मन में से कल्पित रोग के विचारों को निकाल दो | प्रत्येक विचार, भाव, शब्द और कार्य को ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण रखो | ॐकार का सतत गुंजन करो |
सुबह-शाम उपरोक्त विचारों का चिंतन-मनन करने से विशेष लाभ होगा
| ॐ आनंद… ॐ शांति… पूर्ण स्वस्थ… पूर्ण प्रसन्न…
60) भय केवल अज्ञान की छाया है, दोषों की काया है, मनुष्य को धर्ममार्ग से गिराने वाली आसुरी माया है |
61) याद रखो: चाहे समग्र संसार के तमाम पत्रकार, निन्दक एकत्रित होकर आपके विरुध आलोचन करें फ़िर भी आपका कुछ बिगाड़ नहीं सकते | हे अमर आत्मा ! स्वस्थ रहो |
62) लोग प्रायः जिनसे घृणा करते हैं ऐसे निर्धन, रोगी इत्यादि को साक्षात् ईश्वर समझकर उनकी सेवा करना यह अनन्य भक्ति एवं आत्मज्ञान का वास्तविक स्वरूप है |
63) रोज प्रातः काल उठते ही ॐकार का गान करो | ऐसी भावना से चित्त को सराबोर कर दो कि : ‘मैं शरीर नहीं हूँ | सब प्राणी, कीट, पतंग, गन्धर्व में मेरा ही आत्मा विलास कर रहा है | अरे, उनके रूप में मैं ही विलास कर रहा हूँ | ’ भैया ! हर रोज ऐसा अभ्यास करने से यह सिद्धांत हृदय में स्थिर हो जायेगा |
64) प्रेमी आगे-पीछे का चिन्तन नहीं करता | वह न तो किसी आशंका से भयभीत होता है और न वर्त्तमान परिस्थिति में प्रेमास्पद में प्रीति के सिवाय अन्य कहीं आराम पाता है |
65) जैसे बालक प्रतिबिम्ब के आश्रयभूत दर्पण की ओर ध्यान न देकर प्रतिबिम्ब के साथ खेलता है, जैसे पामर लोग यह समग्र स्थूल प्रपंच के आश्रयभूत आकाश की ओर ध्यान न देकर केवल स्थूल प्रपंच की ओर ध्यान देते हैं, वैसे ही नाम-रूप के भक्त, स्थूल दृष्टि के लोग अपने दुर्भाग्य के कारण समग्र संसार के आश्रय सच्चिदानन्द परमात्मा का ध्यान न करके संसार के पीछे पागल होकर भटकते रहते हैं |
66) इस सम्पूर्ण जगत को पानी के बुलबुले की तरह क्षणभंगुर जानकर तुम आत्मा में स्थिर हो जाओ | तुम अद्वैत दृष्टिवाले को शोक और मोह कैसे ?
67) एक आदमी आपको दुर्जन कहकर परिच्छिन्न करता है तो दूसरा आपको सज्जन कहकर भी परिच्छिन्न ही करता है | कोई आपकी स्तुति करके फुला देता है तो कोई निन्दा करके सिकुड़ा देता है | ये दोनों आपको परिच्छिन्न बनाते हैं | भाग्यवान् तो वह पुरूष है जो तमाम बन्धनों के विरूद्ध खड़ा होकर अपने देवत्व की, अपने ईश्वरत्व की घोषणा करता है, अपने आत्मस्वरूप का अनुभव करता है | जो पुरुष ईश्वर के साथ अपनी अभेदता पहचान सकता है और अपने इर्दगिर्द के लोगों के समक्ष, समग्र संसार के समक्ष निडर होकर ईश्वरत्व का निरूपण कर सकता है, उस पुरूष को ईश्वर मानने के लिये सारा संसार बाध्य हो जाता है | पूरी सृष्टि उसे अवश्य परमात्मा मानती है |
68) यह स्थूल भौतिक पदार्थ इन्द्रियों की भ्रांति के सिवाय और कुछ नहीं हैं | जो नाम व रूप पर भरोसा रखता है, उसे सफलता नहीं मिलती | सूक्ष्म सिद्धांत अर्थात् सत्य आत्म-तत्व पर निर्भर रहना ही सफलता की कुंजी है | उसे ग्रहण करो, उसका मनन करो और व्यवहार करो | फिर नाम-रूप आपको खोजते फिरेंगे |
69) सुख का रहस्य यह है : आप ज्यों-ज्यों पदार्थों को खोजते-फिरते हो, त्यों-त्यों उनको खोते जाते हो | आप जितने कामना से परे होते हो, उतने आवश्यकताओं से भी परे हो जाते हो और पदार्थ भी आपका पीछा करते हुए आते हैं |
70) आनन्द से ही सबकी उत्पत्ति, आनन्द में ही सबकी स्थिति एवं आनन्द में ही सबकी लीनता देखने से आनन्द की पूर्णता का अनुभव होता है |
71) हम बोलना चहते हैं तभी शब्दोच्चारण होता है, बोलना न चाहें तो नहीं होता | हम देखना चाहें तभी बाहर का दृश्य दिखता है, नेत्र बंद कर लें तो नहीं दिखता | हम जानना चाहें तभी पदार्थ का ज्ञान होता है, जानना नहीं चाहें तो ज्ञान नहीं होता | अतः जो कोई पदार्थ देखने, सुनने या जानने में आता है उसको बाधित करके बाधित करनेवाली ज्ञानरूपी बुद्धि की वृत्ति को भी बाधित कर दो | उसके बाद जो शेष रहे वह ज्ञाता है | ज्ञातृत्व धर्मरहित शुद्धस्वरूप ज्ञाता ही नित्य सच्चिदानन्द ब्रह्म है | निरंतर ऐसा विवेक करते हुए ज्ञान व ज्ञेयरहित केवल चिन्मय, नित्य, विज्ञानानन्दघनरूप में स्थिर रहो |
72) यदि आप सर्वांगपूर्ण जीवन का आनन्द लेना चाहते हो तो कल की चिन्ता छोड़ो | अपने चारों ओर जीवन के बीज बोओ | भविष्य में सुनहरे स्वपन साकार होते देखने की आदत बनाओ | सदा के लिये मन में यह बात पक्की बैठा दो कि आपका आनेवाला कल अत्यन्त प्रकाशमय, आनन्दमय एवं मधुर होगा | कल आप अपने को आज से भी अधिक भाग्यवान् पायेंगे | आपका मन सर्जनात्मक शक्ति से भर जायेगा | जीवन ऐश्वर्यपूर्ण हो जायेगा | आपमें इतनी शक्ति है कि विघ्न आपसे भयभीत होकर भाग खड़े होंगे | ऐसी विचारधारा से निश्चित रूप से कल्याण होगा | आपके संशय मिट जायेंगे |
73) ओ मानव
! तू ही अपनी चेतना
से सब वस्तुओं
को आकर्षक बना
देता है | अपनी प्यार भरी
दृष्टि उन पर डालता
है, तब
तेरी ही चमक उन
पर चढ़ जाती है और…फिर तू
ही उनके प्यार
में फ़ँस जाता है
|
74) मैंने विचित्र
एवं अटपटे मार्गों
द्वारा ऐसे तत्वों
की खोज की जो मुझे
परमात्मा तक पहुँचा
सके |
लेकिन
मैं जिस-जिस नये
मार्ग पर चला उन
सब मार्गों से
पता चला कि मैं
परमात्मा से दूर
चला गया | फिर मैंने बुद्धिमत्ता
एवं विद्या से
परमात्मा की खोज
की फिर भी परमात्मा
से अलग रहा | ग्रन्थालयों
एवं विद्यालयों
ने मेरे विचारों
में उल्टी गड़बड़
कर दी |
मैं
थककर बैठ गया | निस्तब्ध
हो गया | संयोगवश अपने
भीतर ही झांका, ध्यान
किया तो उस अन्तर्दृष्टि
से मुझे सर्वस्व
मिला जिसकी खोज
मैं बाहर कर रहा
था |
मेरा
आत्मस्वरूप सर्वत्र
व्याप्त हो रहा
है |
75) जैसे सामान्य
मनुष्य को पत्थर,
गाय, भैंस
स्वाभाविक रीति
से दृष्टिगोचर
होते हैं, वैसे
ही ज्ञानी को निजानन्द
का स्वाभाविक अनुभव
होता है |
76) वेदान्त का यह
अनुभव है कि नीच,
नराधम, पिशाच,
शत्रु कोई है
ही नहीं | पवित्र
स्वरूप ही सर्व
रूपों में हर समय
शोभायमान है | अपने-आपका
कोई अनिष्ट नहीं
करता |
मेरे
सिवा और कुछ है
ही नहीं तो मेरा
अनिष्ट करने वाला
कौन है ? मुझे अपने-आपसे
भय कैसा ?
77) यह चराचर सृष्टिरूपी
द्वैत तब तक भासता
है जब तक उसे देखनेवाला
मन बैठा है | मन शांत
होते ही द्वैत
की गंध तक नहीं
रहती |
78) जिस प्रकार एक धागे में उत्तम, मध्यम
और कनिष्ठ फूल
पिरोये हुए हैं, उसी
प्रकार मेरे आत्मस्वरूप
में उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ
शरीर पिरोये हुए
हैं |
जैसे
फूलों की गुणवत्ता
का प्रभाव धागे
पर नहीं पड़ता, वैसे
ही शरीरों की गुणवत्ता
का प्रभाव मेरी
सर्वव्यापकता
नहीं पड़ता | जैसे सब फूलों
के विनाश से धागे
को कोई हानि नहीं, वैसे
शरीरों के विनाश
से मुझ सर्वगत
आत्मा को कोई हानि
नहीं होती |
79) मैं निर्मल,
निश्चल, अनन्त,
शुद्ध, अजर,
अमर हूँ | मैं असत्यस्वरूप
देह नहीं | सिद्ध
पुरुष इसीको ‘ज्ञान’ कहते
हैं |
80) मैं भी नहीं और
मुझसे अलग अन्य
भी कुछ नहीं | साक्षात्
आनन्द से परिपूर्ण, केवल,
निरन्तर और सर्वत्र
एक ब्रह्म ही है
| उद्वेग
छोड़कर केवल यही
उपासना सतत करते
रहो |
81) जब आप जान लेंगे
कि दूसरों का हित
अपना ही हित करने
के बराबर है और
दूसरों का अहित
करना अपना ही अहित
करने के बराबर
है, तब आपको
धर्म के स्वरूप
का साक्षत्कार
हो जायेगा |
82) आप आत्म-प्रतिष्ठा,
दलबन्दी और ईर्ष्या
को सदा के लिए छोड़
दो |
पृथ्वी
माता की तरह सहनशील
हो जाओ | संसार आपके कदमों
में न्योछावर होने
का इंतज़ार कर रहा
है |
83) मैं निर्गुण,
निष्क्रिय,
नित्य मुक्त
और अच्युत हूँ
| मैं
असत्यस्वरूप देह
नहीं हूँ | सिद्ध
पुरुष इसीको ‘ज्ञान’ कहते
हैं |
84) जो दूसरों का
सहारा खोजता है, वह
सत्यस्वरूप ईश्वर
की सेवा नहीं कर
सकता |
85) सत्यस्वरूप महापुरुष
का प्रेम सुख-दुःख
में समान रहता
है, सब अवस्थाओं
में हमारे अनुकूल
रहता है | हृदय
का एकमात्र विश्रामस्थल
वह प्रेम है | वृद्धावस्था
उस आत्मरस को सुखा
नहीं सकती | समय बदल
जाने से वह बदलता
नहीं |
कोई
विरला भाग्यवान
ही ऐसे दिव्य प्रेम
का भाजन बन सकता
है |
86) शोक और मोह का
कारण है प्राणियों
में विभिन्न भावों
का अध्यारोप करना
| मनुष्य
जब एक को सुख देनेवाला, प्यारा,
सुहृद समझता
है और दूसरे को
दुःख देनेवाला
शत्रु समझकर उससे
द्वेष करता है
तब उसके हृदय में
शोक और मोह का उदय
होना अनिवार्य
है |
वह
जब सर्व प्राणियों
में एक अखण्ड सत्ता
का अनुभव करने
लगेगा, प्राणिमात्र
को प्रभु का पुत्र
समझकर उसे आत्मभाव
से प्यार करेगा
तब उस साधक के हृदय
में शोक और मोह
का नामोनिशान नहीं
रह जायेगा | वह सदा
प्रसन्न रहेगा
| संसार
में उसके लिये
न ही कोई शत्रु
रहेगा और न ही कोई
मित्र | उसको कोई क्लेश
नहीं पहुँचायेगा
| उसके
सामने विषधर नाग
भी अपना स्वभाव
भूल जायेगा |
87) जिसको अपने प्राणों
की परवाह नहीं,
मृत्यु का नाम
सुनकर विचलित न
होकर उसका स्वागत
करने के लिए जो
सदा तत्पर है, उसके
लिए संसार में
कोई कार्य असाध्य
नहीं | उसे किसी बाह्य
शस्त्रों की जरूरत
नहीं, साहस ही उसका
शस्त्र है | उस शस्त्र
से वह अन्याय का
पक्ष लेनेवालों
को पराजित कर देता
है फिर भी उनके
लिए बुरे विचारों
का सेवन नहीं करता
|
88) चिन्ता ही आनन्द
व उल्लास का विध्वंस
करनेवाली राक्षसी
है |
89) कभी-कभी मध्यरात्रि
को जाग जाओ | उस समय
इन्द्रियाँ अपने
विषयों के प्रति
चंचल नहीं रहतीं
| बहिर्मुख
स्फुरण की गति
मन्द होती है | इस अवस्था
का लाभ लेकर इन्द्रियातीत
अपने चिदाकाश स्वरूप
का अनुभव करो | जगत, शरीर
व इन्द्रियों के
अभाव में भी अपने
अखण्ड अस्तित्व
को जानो |
90) दृश्य में प्रीति
नहीं रहना ही असली
वैराग्य है |
91) रोग हमें दबाना
चाहता है | उससे
हमारे विचार भी
मन्द हो जाते हैं
| अतः
रोग की निवृति
करनी चहिए | लेकिन
जो विचारवान् पुरुष
है, वह केवल रोगनिवृति
के पीछे ही नहीं
लग जाता | वह तो
यह निगरानी रखता
है कि भयंकर दुःख
के समय भी अपना
विचार छूट तो नहीं
गया ! ऐसा पुरुष
‘हाय-हाय’ करके
प्राण नहीं त्यागता
क्योंकि वह जानता
है कि रोग उसका
दास है | रोग कैसा भी भय
दिखाये लेकिन विचारवान्
पुरुष इससे प्रभावित
नहीं होता |
92) जिस साधक के पास
धारणा की दृढ़ता
एवं उद्येश्य की
पवित्रता, ये
दो गुण होंगे वह
अवश्य विजेता होगा
| इन दो
शास्त्रों से सुसज्जित
साधक समस्त विघ्न-बाधाओं
का सामना करके
आखिर में विजयपताका
फहरायेगा |
93) जब तक हमारे मन
में इस बात का पक्का
निश्चय नहीं होगा
कि सृष्टि शुभ
है तब तक मन एकाग्र
नहीं होगा | जब तक
हम समझते रहेंगे
कि सृष्टि बिगड़ी
हुई है तब तक मन
सशंक दृष्टि से
चारों ओर दौड़ता
रहेगा | सर्वत्र मंगलमय
दृष्टि रखने से
मन अपने-आप शांत
होने लगेगा |
94) आसन स्थिर
करने के लिए संकल्प
करें कि जैसे पृथ्वी
को धारण करते हुए
भी शेषजी बिल्कुल
अचल रहते हैं वैसे
मैं भी अचल रहूँगा
| मैं
शरीर और प्राण
का दृष्टा हूँ
|
95) ‘संसार
मिथ्या है’ - यह
मंद ज्ञानी की
धारणा है | ‘संसार
स्वप्नवत् है’ - यह
मध्यम ज्ञानी की
धारणा है | ‘संसार
का अत्यन्त अभाव
है, संसार की उत्पत्ति
कभी हुई ही नहीं’ - यह
उत्तम ज्ञानी की
धारणा है |
96) आप यदि भक्तिमार्ग
में हों तो सारी
सृष्टि भगवान की
है इसलिए किसीकी
भी निन्दा करना
ठीक नहीं | आप यदि
ज्ञानमार्ग में
हों तो यह सृष्टि
अपना ही स्वरूप
है | आप अपनी
ही निन्दा कैसे
कर सकते हैं ? इस
प्रकार दोंनो मार्गों
में परनिन्दा का
अवकाश ही नहीं
है |
97) दृश्य में दृष्टा
का भान एवं दृष्टा
में दृश्य का भान
हो रहा है | इस गड़बड़
का नाम ही अविवेक
या अज्ञान है | दृष्टा
को दृष्टा तथा
दृश्य को दृश्य
समझना ही विवेक
या ज्ञान है |
98) आसन व
प्राण स्थिर होने
से शरीर में विद्युत
पैदा होती है | शरीर
के द्वारा जब भी
क्रिया की जाती
है तब वह विद्युत
बाहर निकल जाती
है | इस विद्युत
को शरीर में रोक
लेने से शरीर निरोगी
बन जाता है |
99) स्वप्न की सृष्टि
अल्पकालीन और विचित्र
होती है | मनुष्य
जब जागता है तब
जानता है कि मैं
पलंग पर सोया हूँ
| मुझे
स्वप्न आया | स्वप्न
में पदार्थ, देश
काल, क्रिया
इत्यादि पूरी सृष्टि
का सर्जन हुआ | लेकिन
मेरे सिवाय और
कुछ भी न था | स्वप्न
की सृष्टि झूठी
थी | इसी
प्रकार तत्वज्ञानी
पुरूष अज्ञानरूपी
निद्रा से ज्ञानरूपी
जाग्रत अवस्था
को प्राप्त हुए
हैं |
वे
कहते हैं कि एक
ब्रह्म के सिवा
अन्य कुछ है ही
नहीं |
जैसे
स्वप्न से जागने
के बाद हमें स्वप्न
की सृष्टि मिथ्या
लगती है, वैसे ही ज्ञानवान
को यह जगत मिथ्या
लगता है |
100) शारीरिक
कष्ट पड़े तब ऐसी
भावना हो जाये
कि : ‘यह कष्ट
मेरे प्यारे प्रभु
की ओर से है…’ तो वह
कष्ट तप का फल देता
है |
101) चलते-चलते
पैर में छाले पड़
गये हों, भूख व्याकुल
कर रही हो, बुद्धि
विचार करने में
शिथिल हो गई हो,
किसी पेड़ के
नीचे पड़े हों,
जीवन असम्भव
हो रहा हो, मृत्यु
का आगमन हो रहा
हो तब भी अन्दर
से वही निर्भय
ध्वनि उठे : ‘सोऽहम्…सोऽहम्…मुझे
भय नहीं…मेरी मृत्यु
नहीं…मुझे
भूख नहीं…प्यास
नहीं…
प्रकृति
की कोई भी व्यथा
मुझे नष्ट नहीं
कर सकती…मैं वही हूँ…वही हूँ…’
102) जिनके
आगे प्रिय-अप्रिय, अनुकूल-प्रतिकूल,
सुख-दुःख और
भूत-भविष्य एक
समान हैं ऐसे ज्ञानी,
आत्मवेत्ता
महापुरूष ही सच्चे
धनवान हैं |
103) दुःख
में दुःखी और सुख
में सुखी होने
वाले लोहे जैसे
होते हैं | दुःख
में सुखी रहने
वाले सोने जैसे
होते हैं | सुख-दुःख
में समान रहने
वाले रत्न जैसे
होते हैं, परन्तु
जो सुख-दुःख की
भावना से परे रहते
हैं वे ही सच्चे
सम्राट हैं |
104) स्वप्न से जाग कर जैसे स्वप्न को भूल जाते हैं वैसे जाग्रत से जागकर थोड़ी देर के लिए जाग्रत को भूल जाओ | रोज प्रातः काल में पन्द्रह मिनट इस प्रकार संसार को भूल जाने की आदत डालने से आत्मा का अनुसंधान हो सकेगा | इस प्रयोग से सहजावस्था प्राप्त होगी |
105) त्याग और प्रेम से यथार्थ ज्ञान होता है | दुःखी प्राणी में त्याग व प्रेम विचार से आते हैं | सुखी प्राणी में त्याग व प्रेम सेवा से आते हैं क्योंकि जो स्वयं दुःखी है वह सेवा नहीं कर सकता पर विचार कर सकता है | जो सुखी है वह सुख में आसक्त होने के कारण उसमें विचार का उदय नहीं हो सकता लेकिन वह सेवा कर सकता है |
106) लोगों की पूजा व प्रणाम से जैसी प्रसन्नता होती है वैसी ही प्रसन्नता जब मार पड़े तब भी होती हो तो ही मनुष्य भिक्षान्न ग्रहण करने का सच्चा अधिकारी माना जाता है |
107) हरेक साधक को बिल्कुल नये अनुभव की दिशा में आगे बढ़ना है | इसके लिये ब्रह्मज्ञानी महात्मा की अत्यन्त आवश्यकता होती है | जिसको सच्ची जिज्ञासा हो, उसे ऐसे महात्मा मिल ही जाते हैं | दृढ़ जिज्ञासा से शिष्य को गुरु के पास जाने की इच्छा होती है | योग्य जिज्ञासु को समर्थ गुरु स्वयं दर्शन देते हैं |
108) बीते हुए समय को याद न करना, भविष्य की चिन्ता न करना और वर्त्तमान में प्राप्त सुख-दुःखादि में सम रहना ये जीवनमुक्त पुरुष के लक्षण हैं |
109) जब बुद्धि एवं हृदय एक हो जाते हैं तब सारा जीवन साधना बन जाता है |
110) बुद्धिमान पुरुष संसार की चिन्ता नहीं करते लेकिन अपनी मुक्ति के बारे में सोचते हैं | मुक्ति का विचार ही त्यागी, दानी, सेवापरायण बनाता है | मोक्ष की इच्छा से सब सदगुण आ जाते हैं | संसार की इच्छा से सब दुर्गुण आ जाते हैं |
111) परिस्थिति जितनी कठिन होती है, वातावरण जितना पीड़ाकारक होता है, उससे गुजरने वाला उतना ही बलवान बन जाता है | अतः बाह्य कष्टों और चिन्ताओं का स्वागत करो | ऐसी परिस्थिति में भी वेदान्त को आचरण में लाओ | जब आप वेदान्ती जीवन व्यतीत करेंगे तब देखेंगे कि समस्त वातावरण और परिस्थितियाँ आपके वश में हो रही हैं, आपके लिये उपयोगी सिद्ध हो रही हैं |
112) हरेक पदार्थ पर से अपने मोह को हटा लो और एक सत्य पर, एक तथ्य पर, अपने ईश्वर पर समग्र ध्यान को केन्द्रित करो | तुरन्त आपको आत्म-साक्षात्कार होगा |
113) जैसे बड़े होते-होते बचपन के खेलकूद छोड़ देते हो, वैसे ही संसार के खेलकूद छोड़कर आत्मानन्द का उपभोग करना चाहिये | जैसे अन्न व जल का सेवन करते हो, वैसे ही आत्म-चिन्तन का निरन्तर सेवन करना चाहिये | भोजन ठीक से होता है तो तृप्ति की डकार आती है वैसे ही यथार्थ आत्मचिन्तन होते ही आत्मानुभव की डकार आयेगी, आत्मानन्द में मस्त होंगे | आत्मज्ञान के सिवा शांति का कोई उपाय नहीं |
114) आत्मज्ञानी के हुक्म से सूर्य प्रकाशता है | उनके लिये इन्द्र पानी बरसाता है | उन्हीं के लिये पवन दूत बनकर गमनागमन करता है | उन्हीं के आगे समुद्र रेत में अपना सिर रगड़ता है |
115) यदि आप अपने आत्मस्वरूप को परमात्मा समझो और अनुभव करो तो आपके सब विचार व मनोरथ सफल होंगे, उसी क्षण पूर्ण होंगे |
116) राजा-महाराजा, देवी-देवता, वेद-पुराण आदि जो कुछ हैं वे आत्मदर्शी के संकल्पमात्र हैं |
117) जो लोग प्रतिकूलता को अपनाते हैं, ईश्वर उनके सम्मुख रहते हैं | ईश्वर जिन्हें अपने से दूर रखना चाहते हैं, उन्हें अनुकूल परिस्थितियाँ देते हैं | जिसको सब वस्तुएँ अनुकूल एवं पवित्र, सब घटनाएँ लाभकारी, सब दिन शुभ, सब मनुष्य देवता के रूप में दिखते हैं वही पुरुष तत्वदर्शी है |
118) समता के विचार से चित्त जल्दी वश में होता है, हठ से नहीं |
119) ऐसे लोगों से सम्बन्ध रखो कि जिससे आपकी सहनशक्ति बढ़े, समझ की शक्ति बढ़े, जीवन में आने वाले सुख-दुःख की तरंगों का आपके भीतर शमन करने की ताकत आये, समता बढ़े, जीवन तेजस्वी बने |
120) लोग बोलते हैं कि ध्यान व आत्मचिन्तन के लिए हमें फुरसत नहीं मिलती | लेकिन भले मनुष्य ! जब नींद आती है तब सब महत्वपूर्ण काम भी छोड़कर सो जाना पड़ता है कि नहीं ? जैसे नींद को महत्व देते हो वैसे ही चौबीस घन्टों में से कुछ समय ध्यान व आत्मचिन्तन में भी बिताओ | तभी जीवन सार्थक होगा | अन्यथा कुछ भी हाथ नहीं लगेगा |
121) भूल जाओ कि तुम मनुष्य हो, अमुक जाति हो, अमुक उम्र हो, अमुक ड़िग्रीवाले हो, अमुक धन्धेवाले हो | तुम निर्गुण, निराकार, साक्षीरूप हो ऐसा दृढ़ निश्चय करो | इसीमें तमाम प्रकार की साधनाएँ, क्रियाएँ, योगादि समाविष्ट हो जाते हैं | आप सर्वव्यापक अखण्ड चैतन्य हो | सारे ज्ञान का यह मूल है |
122) दोष तभी दिखता जब हमारे लोचन प्रेम के अभावरूप पीलिया रोग से ग्रस्त होते हैं |
123) साधक यदि अभ्यास के मार्ग पर उसी प्रकार आगे बढ़ता जाये, जिस प्रकार प्रारम्भ में इस मार्ग पर चलने के लिए उत्साहपूर्वक कदम रखा था, तो आयुरूपी सूर्य अस्त होने से पहले जीवनरूपी दिन रहते ही अवश्य 'सोऽहम् सिद्धि' के स्थान तक पहुँच जाये |
124) लोग जल्दी से उन्नति क्यों नहीं करते ? क्योंकि बाहर के अभिप्राय एवं विचारधाराओं का बहुत बड़ा बोझ हिमालय की तरह उनकी पीठ पर लदा हुआ है |
125) अपने प्रति होने वाले अन्याय को सहन करते हुए अन्यायकर्ता को यदि क्षमा कर दिया जाये तो द्वेष प्रेम में परिणत हो जाता है |
126) साधना की शुरुआत श्रद्धा से होती है लेकिन समाप्ति ज्ञान से होनी चाहिये | ज्ञान माने स्वयंसहित सर्व ब्रह्मस्वरूप है ऐसा अपरोक्ष अनुभव |
127) अपने शरीर के रोम-रोम में से ॐ... का उच्चारण करो | पहले धीमे स्वर में प्रारम्भ करो | शुरु में ध्वनि गले से निकलेगी, फिर छाती से, फिर नाभि से और अन्त में रीढ़ की हड्डी के आखिरी छोर से निकलेगी | तब विद्युत के धक्के से सुषुम्ना नाड़ी तुरन्त खुलेगी | सब कीटाणुसहित तमाम रोग भाग खड़े होंगे | निर्भयता, हिम्मत और आनन्द का फव्वारा छूटेगा | हर रोज प्रातःकाल में स्नानादि करके सूर्योदय के समय किसी एक नियत स्थान में आसन पर पूर्वाभिमुख बैठकर कम-से-कम आधा घन्टा करके तो देखो |
128) आप जगत के प्रभु बनो अन्यथा जगत आप पर प्रभुत्व जमा लेगा | ज्ञान के मुताबिक जीवन बनाओ अन्यथा जीवन के मुताबिक ज्ञान हो जायेगा | फिर युगों की यात्रा से भी दुःखों का अन्त नहीं आयेगा |
129) वास्तविक शिक्षण का प्रारंभ तो तभी होता है जब मनुष्य सब प्रकार की सहायताओं से विमुख होकर अपने भीतर के अनन्त स्रोत की तरफ अग्रसर होता है |
130) दृश्य प्रपंच की निवृति के लिए, अन्तःकरण को आनन्द में सरोबार रखने के लिए कोई भी कार्य करते समय विचार करो : 'मैं कौन हूँ और कार्य कौन कर रहा है ?' भीतर से जवाब मिलेगा : ' मन और शरीर कार्य करते हैं | मैं साक्षीस्वरूप हूँ |' ऐसा करने से कर्तापन का अहं पिघलेगा, सुख-दुःख के आघात मन्द होंगे |
131) राग-द्वेष की निवृति का क्या उपाय है ? उपाय यही है कि सारे जगत-प्रपंच को मनोराज्य समझो | निन्दा-स्तुति से, राग-द्वष से प्रपंच में सत्यता दृढ़ होती है |
132) जब कोई खूनी हाथ आपकी गरदन पकड़ ले, कोई शस्त्रधारी आपको कत्ल करने के लिए तत्पर हो जाये तब यदि आप उसके लिए प्रसन्नता से तैयार रहें, हृदय में किसी प्रकार का भय या विषाद उत्पन्न न हो तो समझना कि आपने राग-द्वेष पर विजय प्राप्त कर लिया है | जब आपकी दृष्टि पड़ते ही सिंहादि हिंसक जीवों की हिंसावृति गायब हो जाय तब समझना कि अब राग-द्वेष का अभाव हुआ है |
133) आत्मा के सिवाय अन्य कुछ भी नहीं है - ऐसी समझ रखना ही आत्मनिष्ठा है |
134) आप स्वप्नदृष्टा हैं और यह जगत आपका ही स्वप्न है | बस, जिस क्षण यह ज्ञान हो जायेगा उसी क्षण आप मुक्त हो जाएँगे |
135) दिन के चौबीसों घण्टों को साधनामय बनाने के लिये निकम्मा होकर व्यर्थ विचार करते हुए मन को बार-बार सावधान करके आत्मचिंतन में लगाओ | संसार में संलग्न मन को वहाँ से उठा कर आत्मा में लगाते रहो |
136) एक बार सागर की एक बड़ी तरंग एक बुलबुले की क्षुद्रता पर हँसने लगी | बुलबुले ने कहा : " ओ तरंग ! मैं तो छोटा हूँ फिर भी बहुत सुखी हूँ | कुछ ही देर में मेरी देह टूट जायेगी, बिखर जायेगी | मैं जल के साथ जल हो जाऊँगा | वामन मिटकर विराट बन जाऊँगा | मेरी मुक्ति बहुत नजदीक है | मुझे आपकी स्थिति पर दया आती है | आप इतनी बड़ी हुई हो | आपका छुटकारा जल्दी नहीं होगा | आप भाग-भागकर सामनेवाली चट्टान से टकराओगी | अनेक छोटी-छोटी तरंगों में विभक्त हो जाओगी | उन असंख्य तरंगों में से अनन्त-अनन्त बुलबुलों के रूप में परिवर्तित हो जाओगी | ये सब बुलबुले फूटेंगे तब आपका छुटकारा होगा | बड़प्पन का गर्व क्यों करती हो ? " जगत की उपलब्धियों का अभिमान करके परमात्मा से दूर मत जाओ | बुलबुले की तरह सरल रहकर परमात्मा के साथ एकता का अनुभव करो |
137) जब आप ईर्ष्या, द्वेष, छिद्रान्वेषण, दोषारोपण, घृणा और निन्दा के विचार किसीके प्रति भेजते हैं तब साथ-ही-साथ वैसे ही विचारों को आमंत्रित भी करते हैं | जब आप अपने भाई की आँख में तिनका भोंकते हैं तब अपनी आँख में भी आप ताड़ भोंक रहे हैं |
138) शरीर अनेक हैं, आत्मा एक है | वह आत्मा-परमात्मा मुझसे अलग नहीं | मैं ही कर्ता, साक्षी व न्यायधीश हूँ | मैं ही कर्कश आलोचक हूँ और मैं ही मधुर प्रशंसक हूँ | मेरे लिये प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र व स्वच्छन्द है | बन्धन, परिच्छिन्नता और दोष मेरी दृष्टि में आते ही नहीं | मैं मुक्त हूँ...परम मुक्त हूँ और अन्य लोग भी स्वतंत्र हैं | ईश्वर मैं ही हूँ | आप भी वही हो |
139) जिस प्रकार
बालक अपनी परछाईं
में बेताल की कल्पना
कर भय पाता है, उसी प्रकार
जीव अपने ही संकल्प
से भयभीत होता
है और कष्ट पाता
है |
140) कभी-कभी
ऐसी भावना करो
कि आपके सामने
चैतन्य का एक महासागर
लहरा रहा है | उसके
किनारे खड़े रह
कर आप आनंद से उसे
देख रहे हैं | आपका
शरीर सागर की सतह
पर घूमने गया है
| आपके
देखते ही देखते
वह सागर में डूब
गया |
इस
समस्त परिस्थिति
को देखने वाले
आप, साक्षी आत्मा
शेष रहते हैं | इस प्रकार
साक्षी रूप में
अपना अनुभव करो
|
141) यदि हम
चाहते हों कि भगवान
हमारे सब अपराध
माफ करें तो इसके
लिए सुगम साधना
यही है कि हम भी
अपने संबंधित सब लोगों
के सब अपराध माफ
कर दें | कभी किसी के दोष
या अपराध पर दृष्टि
न डालें क्योंकि
वास्तव में सब
रूपों में हमारा
प्यारा ईष्टदेव
ही क्रीड़ा कर रहा
है |
142) पूर्ण
पवित्रता का अर्थ
है बाह्य प्रभावों
से प्रभावित न
होना |
सांसारिक
मनोहरता एवं घृणा
से परे रहना, राजी-नाराजगी
से अविचल, किसी
में भेद न देखना
और आत्मानुभव के
द्वारा आकर्षणों
व त्यागों से अलिप्त
रहना | यही वेदान्त
का, उपनिषदों
का रहस्य है |
143) ईश्वर
साक्षात्कार तभी
होगा जब संसार
की दृष्टि से प्रतीत
होने वाले बड़े-से-बड़े
वैरियों को भी
क्षमा करने का
आपका स्वभाव बन
जायेगा |
144) चालू व्यवहार
में से एकदम उपराम
होकर दो मिनट के
लिए विराम लो | सोचो
कि ‘ मैं
कौन हूँ ? सर्दी-गर्मी
शरीर को लगती है
| भूख-प्यास
प्राणों को लगती
है | अनुकूलता-प्रतिकूलता
मन को लगती है | शुभ-अशुभ
एवं पाप-पुण्य
का निर्णय बुद्धि
करती है | मैं न शरीर हूँ, न
प्राण हूँ, न मन हूँ, न
बुद्धि हूँ | मैं तो
हूँ इन सबको सत्ता
देने वाला, इन
सबसे न्यारा निर्लेप
आत्मा |’
145) जो मनुष्य
निरंतर ‘मैं मुक्त हूँ…’ ऐसी भावना
करता है वह मुक्त
ही है और ‘मैं बद्ध
हूँ…’ ऐसी
भावना करनेवाला
बद्ध ही है |
146) आप निर्भय
हैं, निर्भय हैं,
निर्भय हैं | भय ही
मृत्यु है | भय ही
पाप है | भय ही नर्क है
| भय ही
अधर्म है | भय ही
व्यभिचार है | जगत में
जितने असत् या
मिथ्या भाव हैं
वे सब इस भयरूपी
शैतान से पैदा
हुए हैं |
147) परहित
के लिए थोड़ा काम
करने से भी भीतर
की शक्तियाँ जागृत
होती हैं | दूसरों
के कल्याण के विचारमात्र
से हृदय में एक
सिंह के समान बल
आ जाता है |
148) हम यदि
निर्भय होंगे तो
शेर को भी जीतकर
उसे पाल सकेंगे
| यदि
डरेंगे तो कुत्ता
भी हमें फ़ाड़ खायेगा
|
149) प्रत्येक
क्रिया, प्रत्येक
व्यवहार, प्रत्येक
प्राणी ब्रह्मस्वरूप
दिखे, यही सहज समाधि
है |
150) जब कठिनाईयाँ
आयें तब ऐसा मानना
कि मुझ में सहन
शक्ति बढ़ाने के
लिए ईश्वर ने ये
संयोग भेजे हैं
| कठिन
संयोगों में हिम्मत
रहेगी तो संयोग
बदलने लगेंगे | विषयों में
राग-द्वेष रह गया
होगा तो वह विषय
कसौटी के रूप में
आगे आयेंगे और
उनसे पार होना
पड़ेगा |
151) तत्वदृष्टि
से न तो आपने जन्म
लिया, न कभी
लेंगे | आप तो अनंत हैं, सर्वव्यापी
हैं, नित्यमुक्त, अजर-अमर, अविनाशी
हैं |
जन्म-मृत्यु
का प्रश्न ही गलत
है, महा-मूर्खतापूर्ण
है |
जहाँ
जन्म ही नहीं हुआ वहाँ
मृत्यु हो ही कैसे
सकती है ?
152) आप ही इस जगत के ईश्वर हो | आपको कौन दुर्बल बना सकता है ? जगत में आप ही एकमात्र सत्ता हो | आपको किसका भय ? खड़े हो जाओ | मुक्त हो जाओ | ठीक से समझ लो कि जो कोई विचार या शब्द आपको दुर्बल बनाता है, वही एकमात्र अशुभ है | मनुष्य को दुर्बल व भयभीत करनेवाला जो कुछ इस संसार में है, व