अपने रक्षक आप

प्रस्तावना

मनुष्य जीवन में उच्च आदर्श हो तो किसी भी निर्धारित लक्ष्य को पाना आसान हो जाता है। उच्च आदर्श वही होता है जो हमारे जीवन को सही दिशा देकर सफलता की ओर ले जाय। संसार में प्रत्येक मनुष्य सुखी, स्वस्थ और सम्मानित जीवन जीना चाहता है। पर उसे खोजता है आधुनिकता के नाम पर दिखने वाली बाहरी चमक दमक में....। बाह्य चकाचौंध की ओर आकर्षित हुए व्यक्ति का सम्मानित जीवन जी पाना तो दूर की बात है, वह तो अपने स्वास्थ्य के साथ साथ अमूल्य देह का ही सर्वनाश कर लेता है। आज विदेशों में ऐसी दयनीय स्थिति देखी जा रही है। फ्रायड जैसे निकृष्ट मानसिकतावाले व्यक्ति को अपना आदर्श मानने की भूल के कारण वहाँ का सामान्य जनजीवन त्रस्त हो चुका है।

हमारे देश में अनादिकाल से महापुरुषों का अवतरण होता रहा है, जिन्होंने अपने अनुभवों और जीवन शैली से मनुष्य-जाति को शाश्वत सुख का मार्ग दिखाया है। ऐसे महापुरुषों का आदर्श यदि हमारे जीवन में हो तो सुखी, स्वस्थ और सम्मानित जीवन जीना सहज और सरल है।

इस पुस्तक में ऐसे ही आदर्श पात्रों के जीवन से जुड़ी घटनाओं का संकलन प्रस्तुत किया गया है, जिसे पढ़कर आपको अपने जीवन में एक नयी दिशा, नया उत्साह अवश्य प्राप्त होगा।

अनुक्रम

श्री योग वेदांत सेवा समिति, अहमदाबाद

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अनुक्रम

प्रस्तावना... 1

शाप बना वरदान.. 3

संयम की आवश्यकता.. 4

संयमनिष्ठा.. 5

निर्भयता का रहस्य.... 6

आजादी की बुनियाद. 7

भोगों से वैराग्य... 8

वास्तविक सौंदर्य.. 10

भारत के सपूत. 11

सफलता का रहस्य.... 12

संकल्प और पुरुषार्थ.. 13

गृहस्थ जीवन की शोभा... 14

संयम का फल.. 15

कोई देख रहा है.......! 16

विद्यार्थी और ब्रह्मचर्य.. 17

 

 

 


शाप बना वरदान

"जो अपने आदर्श से नहीं हटता, धैर्य और सहनशीलता को अपने चरित्र का भूषण बनाता है, उसके लिए शाप भी वरदान बन जाता है।"

अर्जुन सशरीर इन्द्र-सभा में गया तो उसके स्वागत में उर्वशी, रम्भा आदि अप्सराओं ने नृत्य किये। अर्जुन के रूप सौंदर्य पर मोहित हो उर्वशी उसके निवास स्थान पर गयी और प्रणय निवेदन किया, साथ ही 'इसमें कोई दोष नहीं लगता' इसके पक्ष में अनेक दलीलें भी दीं, किंतु अर्जुन ने अपने दृढ़ इन्द्रिय-संयम का परिचय देते हुए कहाः

यथा कुन्ती च माद्री च शची चैव ममानघै।

तथा च वंशजननी त्वं हि मेऽद्य गरीयसी।।

गच्छ मूर्ध्ना प्रपन्नोऽस्मि पादौ ते वरवर्णिनि।

त्वं हि मे मातृवत् पूज्या रक्ष्योऽहं पुत्रवत् त्वया।।

'मेरी दृष्टि में कुंती, माद्री और शची का जो स्थान है, वही तुम्हारा भी है। तुम पुरु वंश की जननी होने के कारण आज मेरे लिए परम गुरुस्वरूप हो। हे वरवर्णिनि ! मैं तुम्हारे चरणों में मस्तक रखकर तुम्हारी शरण में आया हूँ। तुम लौट जाओ। मेरी दृष्टि में तुम माता के समान पूजनीया हो और पुत्र के समान मानकर तुम्हें मेरी रक्षा करनी चाहिए।'

(महाभारत वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमन पर्व 46.46.47)

उर्वशी हाव-भाव से और तर्क देकर अपनी कामवासना तृप्त करने में विफल रही तो क्रोधित होकर उसने अर्जुन को एक वर्ष तक नपुंसक होने का शाप दे दिया। अर्जुन ने उर्वशी से शापित होना स्वीकार किया परन्तु संयम नहीं तोड़ा।

जो अपने आदर्श से नहीं हटता, धैर्य और सहनशीलता को अपने चरित्र का भूषण बनाता है, उसके लिए शाप भी वरदान बन जाता है। अर्जुन के लिए शाप भी वरदान बन जाता है। अर्जुन के लिए भी ऐसा ही हुआ। जब इन्द्र तक यह बात पहुँची तो उन्होंने अर्जुन से कहाः "तुमने तो अपने इन्द्रिय संयम के द्वारा ऋषियों को भी पराजित कर दिया। तुम जैसे पुत्र को पाकर कुंती वास्तव में श्रेष्ठ पुत्रवाली है। उर्वशी का शाप तुम्हें वरदानरूप सिद्ध होगा। भूतल पर वनवास के 13वें वर्ष में तुम्हें अज्ञातवास करना पड़ेगा, उस समय यह सहायक होगा। उसके बाद तुम अपना पुरुषत्व फिर से प्राप्त कर लोगे।"

इन्द्र के कथनानुसार अज्ञातवास के समय अर्जुन ने विराट के महल में नर्तक वेश में रहकर विराट की राजकुमारी की संगीत और नृत्य विद्या सिखायी थी, तत्पश्चात वह शापमुक्त हुआ। अर्जुन उर्वशी का यह प्रसंग परस्त्री के प्रति मातृभाव रखने का सुन्दर उदाहरण है।

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संयम की आवश्यकता

"सदाचारी एवं संयमी व्यक्ति ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है।"

जब स्वामी विवेकानन्दजी विदेश में थे, तब ब्रह्मचर्य की चर्चा छिड़ने पर उन्होंने कहाः "कुछ दिन पहले एक भारतीय युवक मुझसे मिलने आया था। वह करीब दो वर्ष से अमेरिका में ही रहता है। वह युवक संयम का पालन बड़ी दृढ़तापूर्वक करता है। एक बार वह बीमार हो गया तो उसने डॉक्टर को बताया। तुम जानते हो डॉक्टर ने उस युवक को क्या सलाह दी ? कहाः "ब्रह्मचर्य प्रकृति के नियम के विरूद्ध है। अतः ब्रह्मचर्य का पालन करना स्वास्थ्य के लिए हितकर नहीं है।"

उस युवक को बचपन में ही ब्रह्मचर्य पालन के संस्कार मिले थे। डॉक्टर की ऐसी सलाह से वह उलझन में पड़ गया। वह मुझसे मिलने आया एवं सारी बातें बतायीं। मैंने उसे समझायाः तुम जिस देश के वासी हो वह भारत आज भी अध्यात्म के क्षेत्र में विश्वगुरू के पद पर आसीन है। अपने देश के ऋषि-मुनियों के उपदेश पर तुम्हें ज्यादा विश्वास है कि ब्रह्मचर्य को जरा भी न समझने वाले पाश्चात्य जगत के असंयमी डॉक्टर पर ? ब्रह्मचर्य को प्रकृति के नियम के विरूद्ध कहने वालों को 'ब्रह्मचर्य' शब्द के अर्थ का भी पता नहीं है। ब्रह्मचर्य के विषय में ऐसे गलत ख्याल रखने वालों से एक ही प्रश्न है कि आपमें और पशुओं में क्या अन्तर है ?"

यह बात सच है कि मन को कामवासना से हटाना बहुत कठिन है लेकिन उसे एक बार भी वश कर लोगे तो वह जिंदगी भर तुम्हारे कहने में चलेगा। केवल ब्रह्मचर्य का पालन किया जाय तो अल्पकाल में ही सारी विद्याएँ आ जाती हैं, श्रुतिधर एवं स्मृतिधर हुआ जा सकता है। ब्रह्मचर्य के अभाव में हमारे देश की भी बड़ी हानि हो रही है। प्रजा के रूप में हम निर्बल होते जा रहे हैं एवं सच्ची मनुष्यता खोते जा रहे हैं। ब्रह्मचर्य के प्रभाव से मन की एकाग्रता एवं स्मरणशक्ति का तीव्रता से विकास होता है।

ब्रह्मचर्य सभी अवस्थाओं में विद्यार्थी, गृहस्थी, साधु-संन्यासी, सभी के लिए अत्यन्त आवश्यक है। सदाचारी एवं संयमी व्यक्ति ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है। चाहे बड़ा वैज्ञानिक हो या दार्शनिक, विद्वान हो या बड़ा उपदेशक, सभी को संयम की जरूरत है। स्वस्थ रहना हो तब भी ब्रह्मचर्य की जरूरत है, सुखी रहना हो तब भी ब्रह्मचर्य की जरूरत है और सम्मानित रहना हो तब भी ब्रह्मचर्य की जरूरत है।

स्वामी विवेकानन्द के जीवन में संयम था तभी तो उन्होंने पूरी दुनिया में भारतीय अध्यात्मज्ञान का ध्वज फहरा दिया।

हे भारत के युवान व युवतियों ! यदि जीवन में संयम, सदाचार को अपना लो तो तुम भी महान-से-महान कार्य करने में सफल हो सकते हो।

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संयमनिष्ठा

"जानती हो, हाड़ और मांस का नजदीक-से-नजदीक का रिश्ता माँ और बेटे का ही होता है। बस, आज से तुम मेरी माँ हुई और मैं तुम्हारा बेटा।"

स्वामी रामतीर्थ जब प्रोफेसर थे तब उन्होंने एक प्रयोग किया और बाद में निष्कर्षरूप में बताया कि जो विद्यार्थी परीक्षा के दिनों में या परीक्षा से कुछ दिन पहले विषयों में फँस जाते हैं, वे परीक्षा में प्रायः असफल हो जाते हैं, चाहे वर्ष भर उन्होंने अपनी कक्षा में अच्छे अंक क्यों न पाये हों। जिन विद्यार्थियों का चित्त परीक्षा के दिनों में एकाग्र और शुद्ध रहा करता है, वे ही सफल होते हैं।

स्वामी रामतीर्थ का जीवन भी संयम से पूर्ण था। एक बार जब रामतीर्थ अमेरिका में थे, तब मनोरीना नाम की एक धनाढ्य व सुन्दर युवती ने उनके आगे एक प्रस्ताव रखा।

"मैं संसार भर में आपके नाम से कॉलेज, स्कूल, पुस्तकालय और अस्पताल खोलना चाहती हूँ। सारी दुनिया में आपके नाम कसे मिशन खुलवा दूँगी और प्रत्येक देश तथा नगर में आपके वेदान्त के प्रचार का सफल प्रबन्ध करवा दूँगी।"

वास्तव में युवती का मकसद कुछ और ही था। इन सब बातों से वह स्वामी जी को प्रलोभन देने का प्रयास कर रही थी किंतु रामतीर्थ भी अपनी निष्ठा में अटल थे। उन्होंने भी सहजतापूर्वक उत्तर दियाः दुनिया में जितने भी धार्मिक मिशन है, वे सब राम के ही हैं। राम अपने नाम से कोई अलग मिशन चलाना नहीं चाहता, क्योंकि राम कोई नयी बात तो कहता नहीं। राम जो कुछ कहता है, वह शाश्वत सत्य है।"

परंतु उस युवती ने जब बार-बार वही बात दोहरायी, तब स्वामी जी ने पूछाः "आखिर आप चाहती क्या हैं ?" इस सीधे प्रश्न पर उसने कहा कि "मैं केवल अपना मिसेज राम लिखना चाहती हूँ। मैं आपके नजदीक-से-नजदीक रहकर आपकी सेवा करना चाहती हूँ।" इस प्रकार जब वह युवती बार-बार नजदीकी रिश्ते की बात करने लगी तो रामतीर्थ ने भी कह दियाः

"जानती हो, हाड़ और मांस का नजदीक-से-नजदीक का रिश्ता माँ और बेटे का ही होता है। बस, आज से तुम मेरी माँ हुई और मैं तुम्हारा बेटा।"

युवावस्था के प्रारम्भ में स्वामी रामतीर्थ अत्यंत क्षीणकाय और दुर्बल थे। उनका स्वास्थ्य इतना चौपट था कि उसके सुधरने की कोई आशा नहीं की जा सकती थी। किन्तु केवल अपने दृढ़ संकल्प और संयम के बल पर उन्होंने अपने शरीर कोक पुष्ट और स्वस्थ बना लिया था। एक बार अमेरिका में उन्होंने शास्ता पर्वत की चोटी पर चढ़ने की प्रतियोगिता में भाग लिया, जिसकी ऊँचाई समुद्र-तल से 14,171 फुट है। इस प्रतियोगिता में राम को प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। एक बार वे 'मैराथन रेस' भी दौड़े थे पूरे 26 मील (42 कि.मी.) की। उस दौड़ में भी उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त किया था। सफलता की नींव है संयमनिष्ठा। स्वामी रामतीर्थ की संयमनिष्ठा ने उन्हें लौकिक सफलताएँ तो क्या, परम सफलता 'आत्मसाक्षात्कार' की भी प्राप्ति करायी थी।

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निर्भयता का रहस्य

"हाँ वह आता है, परंतु उसे मेरे मकान के बाहर ही खड़े रहना पड़ता है क्योंकि वह मुझे कभी खाली ही नहीं पाता।"

स्वामी दयानंद का ब्रह्मचर्य बल बड़ा अदभुत था। वे शरीर से हृष्ट-पुष्ट, स्पष्टभाषी एवं निडर व्यक्तित्व के धनी थे। उनके संयम का ही प्रबल प्रभाव था कि विरोधियों ने उन्हें 22-22 बार जहर देने की कुचेष्टा की, किन्तु उनके शरीर ने उसे दूध-घी की तरह पचा दिया।

एक बार अलीगढ़ में वे एक मुसलमान के यहाँ ठहरे हुए थे। अपना भोजन स्वयं बनाकर खाते एवं शाम को 'कुराने शरीफ' पर प्रवचन करते। वे कहतेः "एक तरफ तो बोलते हो कि 'ला इल्लाह इल्लिल्लाह... अल्लाह के सिवाय कोई नहीं है। सबमें अल्लाह है....' और दूसरी तरफ बोलते हो कि हिन्दुओं को मारो काटो... वे काफिर हैं... 'ये कैसे नालायकी के विचार हैं !' क दिन गाँव के आगेवानों ने उनसे कहाः

"स्वामी जी ! आप एक मुसलमान के घर रहते हैं और मुसलमानों को खरी-खोटी सुनाते हैं। थोड़ा तो ख्याल करें !'

इस पर उन निर्भीक बाबा ने कहाः "जिनके यहाँ रहता हूँ उनको अगर सत्य सुनाकर उन की गलती नहीं निकालूँगा तो फिर और किसको सत्य सुनाऊँगा ?"

एक बार जोधपुर के महाराज जसवंत सिंह (द्वितीय) एक वेश्या के साथ सिंहासन पर बैठे हुए थे। वे उस वेश्या पर बड़े आसक्त थे। तभी संदेशवाहक ने राजा को सावधान किया कि संन्यासी दयानंद पधार रहे हैं। दयानंद जी का नाम सुनते ही जसवंत सिंह के हाथ-पाँव फूल गये। उन्होंने शीघ्र पालकी मँगवायी और वेश्या को जाने को कहा। जल्दबाजी में पालकी एक ओर झुक गयी। जसवंत सिंह ने आगे बढ़कर पालकी को सँभालने के लिए कंधा दे दिया। ठीक उसी समय ऋषि दयानंद जी वहाँ पधारे। महाराजा को वेश्या की पालकी को कंधा देते देखकर दयानंदजी ने सिंहगर्जना कीः "सिंहों के सिंहासनि पर कुतिया का राज ! इन कुतियों से कुत्ते ही पैदा होंगे।" सारा दरबार थर्रा उठा और दयानंद जी वहाँ से लौट गये। एक राजा वेश्या की गुलामी करे यह बात उन्हें बिल्कुल सहन न हुई और परिणामों की परवाह किये बिना, निर्भयतापूर्वक उन्होंने उसे धिक्कार भी दिया।

एक बार किसी ने स्वामी जी से पूछाः "आपको कामदेव सताता है या नहीं ?" इस पर उन्होंने उत्तर दियाः "हाँ वह आता है, परंतु उसे मेरे मकान के बाहर ही खड़े रहना पड़ता है क्योंकि वह मुझे कभी खाली ही नहीं पाता।"

ऋषि दयानंद कार्य में इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें इधर-उधर की बातों के लिए फुर्सत ही नहीं थी। यही उनके ब्रह्मचर्य का रहस्य था।

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आजादी की बुनियाद

आजाद को धाक-धमकी और बेइज्जती के भय से अपना संयम-सत्त्व नाश कर देना किसी भी कीमत पर स्वीकार न था।"

महान देशभक्त, क्रान्तिकारी वीर चन्द्रशेखर आजाद बड़े ही दृढ़प्रतिज्ञ थे। हर समय उनके गले में यज्ञोपवीत, जेब में गीता और साथ में पिस्तौल रहा करती थी। वे ईश्वरपरायण, बहादुर, संयमी और सदाचारी थे। एक बार व अपने एक मित्र के घर ठहरे हुए थे। उनकी नवयुवती कन्या ने उन्हें कामजाल में फँसाना चाहा। आजाद ने तुरंत डाँटकर कहाः "इस बार तुम्हें क्षमा करता हूँ, भविष्य में ऐसा हुआ तो गोली से उड़ा दूँगा।" यह बात उन्होंने उसके पिता को भी बता दी और उनके यहाँ ठहरना बन्द कर दिया।

सन् 1925 में काकोरी कांड की असफलता के बाद आजाद ने काकोरी छोड़ा एवं ब्रिटिश गुप्तचरों से बचते हुए झाँसी के पास एक छोटे से गाँव ठिमरपुरा पहुँच गये। कोई नहीं जानता था कि धोती एवं जनेऊ में सुसज्ज ये ब्राह्मण 'आजाद' हैं। गाँव के बाहर मिट्टी की दीवारों के भीतर आजाद रहने लगे। वे दिन भर गीता, महाभारत और रामायण के कथा-प्रवचन से ग्रामवासियों का दिल जीत लेते थे। धीरे-धीरे लोग उन्हें ब्रह्मचारी जी के नाम से सम्बोधित करने लगे। किन्तु एक दिन आजाद अकेले बैठे थे कि इतने में वहाँ एक रूप-यौवनसम्पन्न नारी आ पहुँची। आश्चर्यचकित होकर आजाद ने पूछाः "बहन ! क्या बात है ? क्या किसी शास्त्र का शंका-समाधान करना है ?" वह स्त्री हँस पड़ी और बोलीः "समाधान... ब्रह्मचारी जी ! छोड़ो ये रामायण-महाभारत की बातें। मैं तो आपसे कुछ माँगने आयी हूँ।"

जिंदगी भर हिमालय की तरह अडिग रहने वाले आजाद गम्भीरतापूर्वक कड़क आवाज में बोलेः "तू घर भूली है बहन ! जा वापस लौट जा।"

वह बोलीः "बस, ब्रह्मचारी जी, मैं आपके सामने स्वेच्छा से खड़ी हूँ, मैं दूसरा कुछ नहीं माँगती। केवल आपको ही माँगती हूँ।"

आजाद उठकर दरवाजे की ओर जाने लगे तो वह स्त्री बोलीः "मुझे अस्वीकार करके कहाँ जाओगे ? मैं चिल्लाकर पूरे गाँव को इकट्ठा करूँगी और इल्जाम लगाकर बेइज्जती कर दूँगी।"

आजाद को धाक-धमकी और बेइज्जती के भय से अपना संयम-सत्त्व नाश कर देना किसी भी कीमत पर स्वीकार न था। वे बहादुर, संयमी और सदाचारी थे। वे दौड़कर दरवाजे के पास पहुँचे, दरवाजा पर धक्का मारा किंतु दरवाजा बाहर से बंद था। अब क्या करें ? आजाद क्षण भर स्तब्ध रह गये। दूसरे ही क्षण उनके मन में बिजली कौंधी। उन्होंने एक ऊँची नजर की। चारों तरफ 12 फुट की दीवारें थीं। उनका पौरूष जाग उठा। वे कूदकर दीवार पर चढ़ गये और दूसरी तरफ कूदकर तेज रफ्तार से गाँव के बाहर दौड़ गये।

यह उनके ब्रह्मचर्य का बल नहीं तो और क्या था। रूप-यौवनसम्पन्न नारी सामने-स्वेच्छा से आयी, फिर भी देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले 'आजाद' को वह बाँध न सकी। ऐसे-ऐसे संयमी, सदाचारी देशभक्तों के पवित्र बलिदान से भारत आजाद हो पाया है।

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भोगों से वैराग्य

"इन मल-मूत्र से भरे स्थानों के लिए मैं काम से अंधा हो रहा हूँ ! इन गंदे अंगों के पीछे मैं अपनी जिंदगी तबाह किये जा रहा हूँ !"

आंध्र प्रदेश में एक धनाढय सेठ का छोटा पुत्र वेमना माता-पिता की मृत्यु के बाद अपने भैया और भाभी की छत्रछाया में पला-बढ़ा। उसकी भाभी लक्ष्मी उसे माँ से भी ज्यादा स्नेह करती थी। वह जितने रूपये माँगता उतने उसे भाभी से मिल जाया करते। बड़ा भाई तो व्यापार में व्यस्त रहने लगा और छोटा भाई वेमना खुशामदखोरों के साथ घूमने लगा। उनके साथ भटकते-भटकते एक दिन वह वेश्या के द्वार तक पहुँच गया। वेश्या ने भी देखा कि ग्राहक मालदार है। उसने वेमना को अपने मोहपाश में फँसा लिया और कुकर्म के रास्ते चल पड़ा।

अभी वेमना की उम्र केवल 16-17 साल की ही थी। वेश्या जो-जो माँगें उसके आगे रखती, भाभी से पैसे लेकर वह उन्हें पूरी कर देता। एक बार उस वेश्या ने हीरे-मोतियों से जड़ा हार, चूड़ियाँ और अँगूठी माँगी।

वेमना उस वेश्या के मोहपाश में पूरी तरह बँध चुका था। उसने रात को भाभी के गहने उतार लिये। भाभी ने देख के अनदेखा कर दिया। कुछ दिनों बाद वेमना ने भाभी का मँगलसूत्र उतारने की कोशिश की, तब भाभी ने पूछाः "सच बता, तू क्या करता है ? पहले के गहने कहाँ गये ?" सच्चाई जानकर भाभी रो पड़ी। सोचने लगी कि 'इतनी सी उम्र में ही यह अपना तेज बल सब नष्ट कर रहा है।'

किंतु भाभी कोई साधारण महिला नहीं थी, सत्संगी थी। उसने देवर को गलत रास्ते जाने से रोकने के लिए डाँट-फटकार की जगह विचार का सहारा लिया और देवर के जीवन में भी सदविचार आ जाय ऐसा प्रयत्न किया। उसने एक शर्त रखकर वेमना को जेवर दियेः

"बेटा ! वह तो वेश्या ठहरी। तू जैसा कहेगा, वैसा ही करेगी। उसे कहना कि 'तू नग्न होकर सिर नीचे करक और अपने घुटनों के बीच से हाथ निकालकर पीछे से ले, तब मैं तुझे गहने दूँगा।' जब वह इस तरह तेरे से गहने लेने लगे तब तू काली माता का स्मरण करके उनसे प्रार्थना करना कि हे माँ ! मुझे विचार दो, भक्ति दो। मुझे कामविकार से बचाओ।"

दूसरे दिन वेमना की शर्त के अनुसार जब वेश्या गहने लेने लगी, तब वेमना ने माँ काली से सदबुद्धि के लिए प्रार्थना की। भाभी की शुभ भावना और माँ काली की कृपा से वेमना का विवेक जाग उठा कि 'इन मल-मूत्र से भरे स्थानों के लिए मैं काम से अंधा हो रहा हूँ। इन गंदे अंगों पीछे मैं अपनी जिंदगी तबाह किये जा रहा हूँ....' यह विचार आते ही वेमना तुरन्त गहने लेकर भाभी के पास आया और भाभी के चरणों में गिर पड़ा। भाभी ने वेमना का और भी मार्गदर्शन किया।

वेमना मध्यरात्रि में ही माँ काली के मंदिर में चला गया और सच्चे हृदय से प्रार्थना की। उसकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर माँ काली ने उसे योग की दीक्षा दे दी और माँ के बताये निर्देश के अनुसार वह लग गया योग-साधना में। उसकी सुषुप्त शक्तियाँ जागृत होने लगीं और कुछ सिद्धियाँ भी आ गयीं। अब वेमना वेमना न रहा, योगिराज वेमना होकर प्रसिद्ध हो गया। उनके सत्संग से 'वेमना योगदर्शनम्' और 'वेमना तत्त्वज्ञानम्' ये दो पुस्तकें संकलित हुई। आज भी आंध्र प्रदेश के भक्त लोग इन पुस्तकों को पढ़कर योग और ज्ञान के रास्ते पर चलने की प्रेरणा पाते हैं।

कहाँ तो वेश्या के मोह में फँसने वाला वेमना और कहाँ करूणामयी भाभी ने सही रास्ते पर लाने का प्रयास किया, माँ काली से दीक्षा मिली, चला योग व ज्ञान के रास्ते पर और भगवदीय शक्तियाँ पा लीं, भगवत्साक्षात्कार कर लिया एवं कइयों को भगवान के रास्ते पर लगाया। कई व्यसनी-दुराचारियों के जीवन को तार दिया। जिससे वे संत वेमना होकर आज भी पूजे जा रहे हैं।

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वास्तविक सौंदर्य

"दुर्गन्ध पैदा करने वाले इन खाद्यान्नों से बनी हुई चमड़ी पर आप इतने फिदा हो रहे हो तो...."

जैन धर्म में कुल 24 तीर्थांकर हो चुके हैं। उनमें एक राजकन्या भी तीर्थंकर हो गयी, जिसका नाम था मल्लियनाथ। राजकुमारी मल्लिका इतनी खूबसूरत थी कि कई राजकुमार व राजा उसके साथ ब्याह रचाना चाहते थे लेकिन वह किसी को पसंद नहीं करती थी आखिरकार उन राजकुमारों व राजाओं ने आपस में एकजुट मल्लिका के पिता को किसी युद्ध में हराकर उसका अपहरण करने की योजना बनायी।

मल्लिका को इस बात का पता चल गया। उसने राजकुमारों व राजाओं को कहलवाया कि 'आप लोग मुझ पर कुर्बान हैं तो मैं भी आप सब पर कुर्बान हूँ। तिथि निश्चित करिये। आप लोग आकर बातचीत करें। मैं आप सबको अपना सौंदर्य दे दूँगी।"

इधर मल्लिका ने अपने जैसी ही एक सुन्दर मूर्ति बनवायी एवं निश्चित की गयी तिथि से दो-चार दिन पहले से वह अपना भोजन उसमें डाल देती थी। जिस महल में राजकुमारों व राजाओं को मुलाकात देनी थी, उसी में एक ओर वह मूर्ति रखवा दी गयी। निश्चित तिथि पर सारे राजा व राजकुमार आ गये। मूर्ति इतनी हूबहू थी कि उसकी ओर देखकर राजकुमार विचार ही कर रहे थे कि 'अब बोलेगी... अब बोलेगी....' इतने में मल्लिका स्वयं आयी तो सारे राजा व राजकुमार उसे देखकर दंग रह गये कि 'वास्तविक मल्लिका हमारे सामने बैठी है तो यह कौन है ?"

मल्लिका बोलीः "यह प्रतिमा है। मुझे यही विश्वास था कि आप सब इसको ही सच्ची मानेंगे और सचमुच में मैंने इसमें सच्चाई छुपाकर रखी है। आपको जो सौंदर्य चाहिए वह मैंने इसमें छुपाकर रखा है।" यह कहकर ज्यों ही मूर्ति का ढक्कन खोला गया, त्यों ही सारा कक्ष दुर्गन्ध से भर गया। पिछले चार-पाँच दिन से जो भोजन उसमें डाला गया था, उसके सड़ जाने से ऐसी भयंकर बदबू निकल रही थी कि सब 'छि...छि...छि...' कर उठे।

तब मल्लिका ने वहाँ आये हुए राजाओं व राजकुमारों को सम्बोधित करते हुए कहाः "भाइयो ! जिस अन्न, जल, दूध, फल, सब्जी इत्यादि को खाकर यह शरीर सुन्दर दिखता है, मैंने वे ही खाद्य-सामग्रियाँ चार-पाँच दिनों से इसमें डाल रखी थीं। अब ये सड़कर दुर्गन्ध पैदा कर रही हैं। दुर्गन्ध पैदा करने वाली इन खाद्यान्नों से बनी हुई चमड़ी पर आप इतने फिदा हो रहे हो तो इस अन्न को रक्त बनाकर सौंदर्य देने वाला वह आत्मा कितना सुंदर होगा।"

मल्लिका की इस सारगर्भित बातों का राजा एवं राजकुमारों पर गहरा असर हुआ और उन्होंने कामविकार से अपना पिण्ड छुड़ाने का संकल्प किया। उधर मल्लिका संत-शरण में पहुँच गयी और उनके मार्गदर्शन से अपने आत्मा को पाकर मल्लियनाथ तीर्थंकर बन गयी। आज भी मल्लियनाथ जैन धर्म के प्रसिद्ध उन्नीसवें तीर्थंकर के रूप में सम्मानित होकर पूजी जा रही हैं।

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भारत के सपूत

"भारत में कई ऐसे सपूत हो गये जो पहले साधारण थे लेकिन ध्यान, जप, प्राणायाम योगासन एवं दृढ़ संकल्प के माध्यम से दुनिया को चौंकाने वाले हो गये।"

राममूर्ति नामक एक विद्यार्थी बहुत दुबला-पतला और दमें की बीमारी से ग्रस्त था। शरीर से इतना कमजोर था कि स्कूल जाते-जाते रास्ते में ही थक जाता और धरती पकड़कर बैठ जाता। जबकि राममूर्ति के पिता खूब मोटे-ताजे एवं तंदरुस्त थानेदार थे और वे राममूर्ति को भी एक प्रभावशाली व्यक्तित्व में देखना चाहते थे। किन्तु उसकी शारीरिक दुर्बलता देखकर वे खिन्न हो जाते थे। कई बार वे बोल पड़तेः

"मेरा बेटा होकर तुझे अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। इससे तो अच्छा होता तू मर जाता।"

अपने पिता द्वारा बार-बार तिरस्कृत होने से राममूर्ति का मनोबल टूट जाता लेकिन ऐसे में उसकी माँ उसे सँभाल लेती थी। उसमें साहस भर देती थी। हर रोज उसे वीर पुरुषों की गाथाएँ सुनाया करती थी। महान योद्धाओं के चरित्र सुनकर राममूर्ति अपनी माँ से कहताः "माँ ! मैं भी वीर हनुमान, पराक्रमी भीम और अर्जुन जैसा कब बनूँगा ?"

राममूर्ति की जिज्ञासा देखकर माँ बहुत प्रसन्न होती। माँ भारतीय संस्कृति का आदर करती थी। सत्संग में जाने से हमारे ऋषि-मुनियों के बताये हुए प्रयोगों की थोड़ी बहुत जानकारी उसे थी। उसने उन प्रयोगों को राममूर्ति पर आजमाना शुरु कर दिया। सुबह उठकर खुली हवा में दौड़ लगाना, सूर्य की किरणों में योगासन-प्राणायाम करना, दंड-बैठ लगाना, उबले अंजीर का प्रयोग करना.... इत्यादि से राममूर्ति का दमे का रोग तो मिट गया, साथ ही उसके फेफड़ों में प्राणशक्ति का इतना बल आ गया कि एक नाले में फँसी हुई भैंस को, जिसे गाँव के अन्य लोग नहीं निकाल पा रहे थे, राममूर्ति ने अपने बाहुबल से अकेले ही निकाल दिया। अब तो कहना ही क्या था। लोग राममूर्ति को पहलवान राममूर्ति के नाम से पहचानने लगे।

असम्भव कुछ भी नहीं है, सब सम्भव है। दमे की बीमारी से ग्रस्त राममूर्ति प्राणबल से पहलवान राममूर्ति बन गये। धीरे-धीरे उन्होंने अपने बल से ऐसे प्रयोग कर दिखाये कि भारत में ही नहीं, विदेश में भी उनकी प्रसिद्धि होने लगी। एक बार यूरोप का पहलवान युंजियन सेंडो भारत में आया। उसे घमंड था कि सारे यूरोप खंड में कोई भी उसे हरा नहीं सकता। राममूर्ति ने युंजियन सेंडो को संदेश भिजवाया कि वह उसके साथ कुश्ती करे। यह सुनकर युंजियन सेंडो को आश्चर्य हुआ कि मेरे साथ कुश्ती करने की किसकी हिम्मत हो गयी है। पर जब उसे खबर मिली की राममूर्ति 1200 रतल (करीब 552 किलो) वजन उठा लेता है, तब वह घबरा गया क्योंकि वह खुद 800 रतल(करीब 368 किलो) वजन ही उठा सकता था। उसने बहाना बनायाः "हम गोरे लोग हैं, हिन्दुस्तानी से हाथ नहीं मिलाते।"

उसके बाद राममूर्ति ने एक सर्कस निकाला, जिसमें 25-25 हार्स पावर की चालू जीपों को हाथों से पकड़े रखना, छाती पर पटिया रखकर उस पर हाथी को चलवाना ऐसे कई चमत्कार कर दिखाये। भारत में कई ऐसे सपूत हो गये जो पहले साधारण थे लेकिन जप, ध्यान, प्राणायाम, योगासन एवं दृढ़ संकल्प के माध्यम से दुनिया को चौंकाने वाले हो गये।

हे युवको ! तुम भी हिम्मत मत हारना, निराश मत होना। अगर कभी असफल भी हुए तो हताश मत होना वरन् पुनः प्रयास करना। तुम्हारे लिए असंभव कुछ भी नहीं होगा।

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सफलता का रहस्य

"फिल्म के अश्लील दृश्य या उपन्यासों के अश्लील वाक्य मनुष्य के मन को विचलित कर देते हैं और वह भोगों में जा गिरता है।"

घटित घटना है प्रसिद्ध गामा पहलवान, जिसका मूल नाम गुलाम हुसैन था, से पत्रकार जैका फ्रेड ने पूछाः "आप एक हजार से भी ज्यादा कुश्तियाँ लड़ चुके हैं। कसम खाने के लिए भी लोग दो-पाँच कुश्तियाँ हार जाते हैं। आपने हजारों कुश्तियों में विजय पायी है और आज तक हारे नहीं हैं। आपकी इस विजय का रहस्य क्या है ?"

गुलाम हुसैन (गामा पहलवान) ने कहाः "मैं किसी महिला की तरफ बुरी नजर से नहीं देखता हूँ। मैं जब कुश्ती में उतरता हूँ तो गीतानायक श्रीकृष्ण का ध्यान करता हूँ और बल के लिए प्रार्थना करता हूँ। इसीलिए हजारों कुश्तियों में मैं एक भी कुश्ती हारा नहीं हूँ। यह संयम और श्रीकृष्ण के ध्यान की महिमा है।"

ब्रह्मचर्य का पालन एवं भगवान का ध्यान.... इन दोनों ने गामा पहलवान को विश्वविजयी बना दिया। जिसके जीवन में संयम है, सदाचार हैं एवं ईश्वरप्रीति है वह प्रत्येक क्षेत्र में सफल होता ही है, इसमें संदेह नहीं है।

युवानों को चाहिए कि गामा पहलवान के जीवन से प्रेरणा लें एवं किसी भी स्त्री के प्रति कुदृष्टि न रखें। इसी प्रकार युवतियाँ भी किसी पुरुष के प्रत कुदृष्टि न रखें। यदि युवक-युवतियों ने इतना भी कर लिया तो पतन की खाई में गिरने से बच जायेंगे क्योंकि विकार पहले नेत्रों से ही घुसता है, बाद में मन पर उसका प्रभाव पड़ता है। फिल्म के अश्लील दृश्य या उपन्यासों के अश्लील वाक्य मनुष्य के मन को विचलित कर देते हैं और वह भोगों में जा गिरता है। अतः सावधान !

शाबाश, भारत के नौजवानो, शाबाश ! आगे बढ़ो.... संयमी व सदाचारी बनो... भारत की गौरवमयी गरिमा को पुनः लौटा लाओ... विश्व में पुनः भारत की दिव्य संस्कृति की पताका फहरने दो....

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संकल्प और पुरुषार्थ

"उस चोट का निशान किंग कां के लिए संयम में दृढ़ रहने के अपने संकल्प की याद दिलाने वाला प्रेरक चिह्न साबित हुआ।"

दरासोव (रूमानिया) मैं सन् 1909 में जन्मे एमाइल चजाया (Emile Czaja) का आयु के अनुपात में शारीरिक विकास बहुत कम हो रहा था। वह दुबला-पतला और दब्बू प्रकृति का था। अक्सर अपने साथियों से मार खाकर घर आता था। यह सब उसके लिए असह्य था पर विवश था, पर क्या करता।

एक दिन उसे बहुत बुरी तरह मार पड़ी। वह रोता-रोता घर आ रहा था कि उससे एक सज्जन ने पूछाः "बच्चे ! क्यों रोते हो ?" उसने उत्तर दियाः "मैं दुबला हूँ, सब लड़के मुझे मारते हैं।" उस व्यक्ति ने स्नेह से उसकी पीठ थपथपायी और प्राणबल भर दियाः "बेटे ! असम्भव कुछ नहीं है। तुम संयम, लगन व पुरुषार्थ का सहारा लो तो दुनिया को हिला सकते हो। फिर शरीर बल का विकास करना क्या बड़ी बात है। निराश मत होओ, उद्यम करो। तुम अवश्य सफल होओगे।"

उन सज्जन के वचन बालक एमाइल के दिल में घर कर गये। एमाइल ने उनके बताये अनुसार दृढ़ संकल्प कर लिया। वह संयमी जीवन जीते हुए प्रबल पुरुषार्थ करने लगा। अपने लक्ष्य की सिद्धि तक विवाह न करने की तथा संयम् ने दृढ़ रहने का उसने संकल्प ले लिया। अब वह प्रतिदिन खूब व्यायाम करके पौष्टिक आहार लेने लगा। कुछ ही समय में उसकी ऊँचाई 6 फीट 3 इंच और वजन 190 किलोग्राम हो गया। उसका विशाल, मजबूत और ऊँचा शरीर देखकर लोग दाँतों तले उँगली दबाने लगे।

किंग कांग ने अपना कुश्ती का पेशा भारत से ही आरम्भ किया। उसने किंगकांग नाम धारण कर दो हजार प्रथम श्रेणी की कुश्तियाँ लड़ीं और विश्वविख्यात पहलवान बना।

अपना पेशा आरम्भ करने के शुरूआती दौर में (लगभग 29 वर्ष की उम्र में) जब तक वह जर्मनी गया तो वहाँ उसके सुडौल शरीर पर अत्यधिक आसक्त हुई एक सुन्दरी ने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे किंग कांग ने अस्वीकार कर दिया। इससे क्रोधोन्मत्त हुई उस सुन्दरी ने अपने निरादर का बदला किंग कांग पर शराब की बोतल फेंककर लिया। उस चोट का निशान किंग कांग के लिए संयम में दृढ़ रहने के अपने संकल्प की याद दिलाने वाला प्रेरक चिह्न साबित हुआ। लक्ष्य की पूर्ति तक अविवाहित रहने के अपने संकल्प में वह अडिग रहा।

संयम की शक्ति को आप चाहे जहाँ लगाओ, वह आपको वैश्विक सफलता प्रदान करेगी। उसका सहारा लेकर किंग कांग ने शरीर को सुदृढ़ बनाया और विश्वविख्यात पहलवान बना। आप भी अपनी संयम-शक्ति को जिस लक्ष्य की और लगायेंगे उसे अवश्य प्राप्त कर सकेंगे। अपने लक्ष्य पर ही अपना सारा ध्यान केन्द्रित करके पूरी निष्ठा व लगन से उद्यम करें तो असम्भव भी सम्भव हो जाता है।

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गृहस्थ जीवन की शोभा

"संयोजक ने भूल से एक सच्ची बात कह दी। सचमुच, कस्तूरबा हमारी 'माँ' के समान ही हैं। मैं इनको आदर देता हूँ।"

महात्मा गाँधी और उनकी पत्नी कस्तूरा का दाम्पत्य-प्रेम विषय-वासना से प्रेरित न होकर एक आदर्श, विशुद्ध, निष्कपट प्रेम का जाज्वल्यमान उदाहरण था। वैसे प्रारम्भ में गाँधी जी भी कामविकार के मोह से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने अपनी जीवनी में यह बात बड़ी सच्चाई से लिखी है कि अपने पिता की मृत्यु के समय भी वे अपनी पत्नी के साथ बिस्तर पर थे।

ऐसी स्थिति थी लेकिन उन्होंने अपने जीवन में कुछ आदर्श नियमों को स्थान दिया हुआ था। जैसे नित्य सुबह शाम प्रार्थना करना, राम नाम का जप करना, श्रीमद् भगवद् गीता का अध्ययन करना, हर सोमवार को मौन रखना आदि। जिससे उनका काम राम में बदला और निष्कामता का उनके जीवन में प्राकट्य हुआ। निष्कामता से क्षमताएँ विकसित होती है।

गांधी जी एवं उनकी पत्नी कस्तूरबा एक दूसरे को केवल शरीर-भोग की वस्तु नहीं मानते थे, बल्कि आत्मिक प्रेम के साथ एक-दूसरे का पूरा सम्भव करते थे।

एक बार महात्मा गाँधी एक सभा में शामिल होने के अपनी धर्मपत्नी कस्तूरबा के साथ श्री लंका गये। गाँधी जी कस्तूरबा को 'बा' कहकर बुलाते थे। गुजराती में 'माँ' को 'बा' बोलते हैं।

गाँधी जी द्वारा कस्तूरबा जी को 'बा' कहकर बुलाने के कारण सभा के संयोजक ने समझा कि महात्मा गाँधी के साथ इनकी माँ भी आयी हैं, इसलिए गाँधी जी का परिचय देते समय संयोजक ने सभा में कहाः "भाइयो एवं बहनों ! आप और हम भाग्य शाली हैं कि इस सभा में गाँधी जी तो आये ही हैं पर साथ में उनकी माँ भी आयी है।"

गाँधी जी के साथ जो अन्य लोग थे, वे शर्माये कि 'अरर... हम लोगों ने इन्हें पहले नहीं बताया और इन्होंने यह क्या कह दिया !' कस्तूरबा भी बड़ी शर्मायी पर गाँधी जी खूब हँसे। जब गाँधी जी बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने कहाः "संयोजक ने भूल से एक सच्ची बात कह दी। सचमुच, कस्तूरबा हमारी 'माँ' के समान ही हैं। मैं इनको आदर देता हूँ।"

'मेरी पत्नी मेरे लिए क्या सोचेगी?' ऐसा न सोचकर उनके हित की भावना को प्रधानता देने वाले गाँधी जी और 'मेरे पति मेरे हित की भावना से ही ऐसा कह रहे हैं।' इस प्रकार का विवेक तथा अपने पति के प्रति विशुद्ध, उत्कट प्रेम रखने वाली त्याग की प्रतिमूर्ति कस्तूरबा का दाम्पत्य जीवन सभी गृहस्थों के लिए एक उत्तम आदर्श प्रस्तुत करता है। पैसा और प्रसिद्धि के पीछे समाज को पथभ्रष्ट करने का जघन्य अपराध कर रहे फिल्मी अभिनेताओं व अभिनेत्रियों की नकल करके अपना दाम्पत्य जीवन तबाह करने की मूर्खता करने की बजाय हमारे भारतवासी उतना ही समय संत-महात्माओं की जीवनियाँ पढ़ने में लगायें तो कितना अच्छा होगा।

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संयम का फल

"तू स्त्री है, यह मैं जानता हूँ। लेकिन मैं शत्रुओं से इतना नहीं चौंकता हूँ, जितना विकारों से चौंकता हूँ।"

गुजरात में भावनगर किला है। उस भावनगर का राजा भी जिससे काँपता था, ऐसा एक डाकू था जोगीदास खुमाण।

एक रात्रि को वह अपनी एकांत जगह पर सोया था। चाँदनी रात थी। करीब 11 बजने को थे। इतने में एक सुंदरी सोलह श्रृंगार से सजी-धजी वहाँ आ पहुँची। जोगीदास चौंककर खड़ा हो गया।

"खड़ी रहो। कौन हो ?"

वह युवती बाँहें पसारती हुई बोलीः "तेरी वीरता पर मैं मुग्ध हूँ। अगर सदा के लिए नहीं तो केवल एक रात्रि के लिए ही मुझे अपनी भुजाओं में ले ले।"

गर्जता हुआ जोगीदास बोलाः "वहीं खड़ी रह। तू स्त्री है, यह मैं जानता हूँ। लेकिन मैं शत्रुओं से इतना नहीं डरता हूँ, जितना विकारों से चौंकता हूँ।"

युवतीः "मैंने मन से तुम्हें अपना पति मान लिया है।"

जोगीदासः "तुमने चाहे जो माना हो, मैं किसी गुरु की परम्परा से चला हूँ। मैं अपना सत्यानाश नहीं कर सकता। तुम जहाँ से आयी हो, वहीं लौट जाओ।'

वह युवती पुनः नाज-नखरे करने लगी, तब जोगीदास बोलाः "तुम मेरी बहन हो। मुझे इन विकारों में फँसाने की चेष्टा मत करो। चली जाओ।" समझा-बुझाकर उसे रवाना कर दिया।

तब से जोगीदास कभी अकेला नहीं सोया। अपने साथ दो अंगरक्षक रखने लगा। वह भी, कोई मार जाय इस भय से नहीं, वरन् कोई मेरा चरित्र भंग न कर जाय, इस भय से रखता था।

एक बार जोगीदास कहीं जा रहा था। गाँव के करीब खेत में एक ललना काम कर रही थी और प्रभातियाँ गाये जा रही थी। जोगीदास ने उस लड़की से पूछाः

"ऐसे सन्नाटे में तू अकेली काम कर रही है, तुझे तेरे शीलभंग (चरित्रभंग) का डर नहीं लगता ?"

तब उस युवती ने हँसिया सँभालते हुए, आँखे दिखाते हुए कड़क स्वर में कहाः "डर क्यों लगे ? जब तक हमारा भैया जोगीदास जीवित है, तब तक आसपास के पचास गाँवों की बहू-बेटियों को डर किस बात का।"

उस युवती को पता नहीं था कि यही जोगीदास है। जोगीदास को आत्मसंतोष हुआ कि 'पचास गाँवों की बहू-बेटियों को तसल्ली है कि हमारा भैया जोगीदास है।'

डाकुओं में भी संयम होता है तो इस सदगुण के कारण वे इतने स्नेहपात्र हो सकते हैं तो फिर सज्जन का संयम उसे उसके लक्ष्य परमेश्वर से भी मिलाने में सहायक हो जाये, इसमें क्या आश्चर्य ! सिंह जैसा बल भर देता है ब्रह्मचर्य का पालन। कुप्रसिद्ध को सुप्रसिद्ध कर देता है ब्रह्मचर्य का पालन। सदाचार, सदविचार और यौवन की सुरक्षा करता है ब्रह्मचर्य का पालन।

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कोई देख रहा है.......!

"ईश्वर हमारे प्रत्येक कार्य को देख रहे हैं। आप उनके आगे भी कपड़ा रख दो ताकि आपको पाप का प्रायश्चित न करना पड़े।"

एक मुसाफिर ने रोम देश में एक मुसलमान लुहार को देखा। वह लोहे को तपाकर लाल करके उसे हाथ में पकड़कर वस्तुएँ बना रहा था, फिर भी उसका हाथ जल नहीं रहा था। यह देखकर मुसाफिर ने पूछाः "भैया ! यह कैसा चमत्कार है कि तुम्हारा हाथ नहीं जल रहा।"

लुहारः "इस पानी (नश्वर) दुनिया में मैं एक स्त्री पर मोहित हो गया था और उसे पाने केक लिए सालों तक कोशिश करता रहा परंतु उसमें मुझे असफलता ही मिलती रही। एक दिन ऐसा हुआ कि जिस स्त्री पर मैं मोहित था उसके पति पर कोई मुसीबत आ गयी।

उसने अपनी पत्नी से कहाः "मुझे धन की अत्यधिक आवश्यकता है। यदि उसका बंदोबस्त न हो पाया तो मुझे मौत को गले लगाना पड़ेगा। अतः तुम भी कुछ करके, तुम्हारी पवित्रता बेचकर भी मुझे कुछ धन ला दो।' ऐसी स्थिति में वह स्त्री, जिसको मैं पहले से ही चाहता था, मेरे पास आयी। उसे देखकर मैं बहुत ही खुश हो गया। सालों के बाद मेरी इच्छा पूर्ण हुई। मैं उसे एकांत में ले गया। मैंने उससे आने का कारण पूछा तो उसने सारी हकीकत बतायी। उसने कहाः 'मेरे पति को धन की बहुत आवश्यकता है। अपनी इज्जत व शील को बेचकर भी मैं उन्हें कुछ धन ला देना चाहती हूँ। आप मेरी मदद कर सकें तो आपकी बड़ी मेहरबानी।'

तब मैंने कहाः "थोड़ा धन तो क्या, तुम जितना भी माँगोगी, मैं देने को तैयार हूँ।"

मैं कामांध हो गया था, मकान के सारे खिड़की-दरवाजे बद किये। कहीं से थोड़ा भी दिखाई दे ऐसी जगह भी बंद कर दी, ताकि हमें कोई देख न ले। फिर मैं उसके पास गया।

उसने कहाः 'रुको ! आपने सारे खिड़की-दरवाजे, छेद व सुराख बन्द किये हैं, जिससे हमें कोई देख न सके लेकिन मुझे विश्वास है कि कोई हमें अब भी देख रहा है।'

मैंने पूछाः 'अब भी कौन देख रहा है ?'

'ईश्वर ! ईश्वर हमारे प्रत्येक कार्य को देख रहे हैं। आप उनके आगे भी कपड़ा रख दो ताकि आपको पाप का प्रायश्चित न करना पड़े।' उसके ये शब्द मेरे दिल के आर-पार उतर गये। मेरे पर मानो हजारों घड़े पानी ढुल गया। मुझे कुदरत का भय सताने लगा। मेरी सारी वासना चूर-चूर हो गयी। मैंने खुदा से माफी माँगी और अपनी इस दुर्वासना के लिए बहुत ही पश्चाताप किया। परमेश्वर की अनुकम्पा मुझ पर हुई। भूतकाल में किये हुए कुकर्मों की माफी मिली, इससे मेरा दिल निर्मल हो गया।मैंने सारे खिड़की-दरवाजे खोल दिये और कुछ धन लेकर उस स्त्री के साथ चल पड़ा। वह स्त्री मुझे अपने पति के पास ले गयी। मैंने धन की थैली उसके पास रख दी और सारी हकीकत कह सुनायी। उस दिन से मुझे प्रत्येक वस्तु में खुदाई नूर दिखने लगा है। तब से अग्नि, वायु व जल मेरे अधीन हो गये हैं।"

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विद्यार्थी और ब्रह्मचर्य

"यौवन में शक्ति जरूर है परंतु सजगतापूर्वक संयम का पालन नहीं किया तो छोटी-सी गलती भी बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है।"

विद्यार्थी काल शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक विकास का समय है और इस विकास का मुख्य आधार है वीर्यरक्षा ! विद्यार्थी को अपने अध्ययन और प्रवृत्ति लिए उत्साह, बुद्धिशक्ति, स्मृतिशक्ति, एकाग्रता, संकल्पबल आदि गुणों के विकास की बहुत आवश्यकता होती है। इन सबमें वीर्यरक्षा द्वारा बहुत प्रगति प्राप्त की जा सकती है। इसके विपरीत वीर्यनाश से तन और मन को बहुत नुकसान होता है। वीर्यनाश से निर्बलता, रोग, आलस्य, चंचलता, निराशा और पलायनवादिता के दुर्गुण आ धमकते हैं। इस दुष्प्रवृत्ति का शिकार विद्यार्थी अपने विकासकाल के अति महत्त्वपूर्ण समय को गँवा बैठता है।

विद्यार्थीकाल जीवनरूपी इमारत को बनाने के लिए नींव का पत्थर है। क्या विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य की आवश्यकता है ? यह प्रश्न ऐसा ही है, जैसे कोई पूछेः 'क्या इमारत के लिए मजबूत नींव की जरूरत है ? मछली को पानी की आवश्यकता है ?'

जीवन में दो विरोधियों को साथ में रखना यह प्रकृति का नियम है। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विवेक होना जरूरी है। विद्यार्थीकाल में जहाँ एक ओर जगत को कँपाने में सक्षम, चाहे जो करने में समर्थ ऐसी प्रचंड वीर्यशक्ति और मौका प्रकृति युवान को देती है, वहीं दूसरी ओर उसके यौवन को लूट लेने वाली विजातीय आकर्षण की सृष्टि भी उसके सामने आ खड़ी होती है।

जिस देश के युवक गुरुकुलों में रहकर 25 वर्ष तक कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करके चक्रवर्ती सम्राट, वीर योद्धा आदि बन कर असम्भव जैसे कार्य भी सहज ही कर लेते थे, उसी देश के निस्तेज युवक अपने परिवार को और खुद को भी नहीं सँभाल पाते यह कैसा दुर्भाग्य है। गोलियाँ बरसा के खुद को और अपने परिवार को अकाल मौत के घाट उतार देते हैं।

युवा पीढ़ी को निस्तेज बनाने वाले सेक्सोलॉजिस्टों एवं अखबारों को डॉ निकोलस के इस कथन को पढ़कर अपनी बुद्धि का सुधार करना चाहिए।

डॉ. निकोलस कहते हैं- "वीर्य को पानी की तरह बहाने वाले आजकल के अविवेकी युवाओं के शरीर को भयंकर रोग इस प्रकार घेर लेते हैं कि डॉक्टर की शरण में जाने पर भी उनका उद्धार नहीं होता। अंत में बड़ी कठिन विपत्तियों का सामना करने के बाद असमय ही उन अभागों का महाविनाश हो जाता है।"

यौवन में शक्ति जरूर है परंतु सजगतापूर्वक संयम का पालन नहीं किया तो छोटी-सी गलती भी बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है, खिलते फूल-सदृश विद्यार्थी-जीवन को निचोड़कर नरकतुल्य बना सकती है। अतः सावधान ! इस संबंध में फैल रही भ्रांत धारणाओं के निर्मूलन के लिए आश्रम से प्रकाशित पुस्तक - 'दिव्य प्रेरणा प्रकाश' और पूज्य संत स्वामी श्री लीलाशाह जी महाराज के सत्संग-प्रवचनों की पुस्तकें 'निरोगता का साधन''मन को सीख' अवश्य पढ़ें-पढ़ायें।

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