नामोचारण का फल... 8

सदगुरु और मंत्र दीक्षा..... 10

दस नामापराध... 21

मंत्रजाप विधि..... 25

जापक के प्रकार.. 25

जप के प्रकार.. 26

जप के लिए आवश्यक विधान... 32

मंत्रानुष्ठान... 40

विद्यार्थियों के लिए सारस्वत्य मंत्र के अनुष्ठान की विधि..... 45

परिप्रश्नेन... 46

 

मंत्रजाप महिमा एवं अनुष्ठान विधि

भगवन्नाम-महिमा

 

भगवन्नाम अनन्त माधुर्य, ऐश्वर्य और सुख की खान है । सभी शास्त्रों में नाम की महिमा का वर्णन किया गया है । इस नानाविध आधि-व्याधि से ग्रस्त कलिकाल में हरिनाम-जप संसार सागर से पार होने का एक उत्तम साधन है । भगवान वेदव्यास जी तो कहते हैं-

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।

कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा।।

(बृहन्नारदीय पुराणः 38.127)

पद्मपुराण में आया हैः

ये वदन्ति नरा नित्यं हरिरित्यक्षरद्वयम्।

तस्योच्चारणमात्रेण विमुक्तास्ते न संशयः।।

जो मनुष्य परमात्मा के इस दो अक्षरवाले नाम हरि का नित्य उच्चारण करते हैं, उसके उच्चारणमात्र से वे मुक्त हो जाते हैं, इसमें शंका नहीं है।

 

गरुड़ पुराण में उपदिष्ट है किः

यदीच्छसि परं ज्ञानं ज्ञानाच्च परमं पदम् ।

तदा यत्नेन महता कुरु श्रीहरिकीर्तनम् ।।

यदि परम ज्ञान अर्थात आत्मज्ञान की इच्छा है और उस आत्मज्ञान से परम पद पाने की इच्छा है तो खूब यत्नपूर्वक श्री हरि के नाम का कीर्तन करो ।

 

एक बार नारद जी ने भगवान ब्रह्मा जी से कहाः

"ऐसा कोई उपाय बतलाइए, जिससे मैं विकराल कलिकाल के काल जाल में न फँसूं।"

इसके उत्तर में ब्रह्माजी ने कहाः आदिपुरुषस्य नारायणस्य नामोच्चारणमात्रेण निर्धूत कलिर्भवति।

आदि पुरुष भगवान नारायण के नामोच्चार करने मात्र से ही मनुष्य कलि से तर जाता है।

(कलिसंवरणोपनिषद)

श्रीमदभागवत के अंतिम श्लोक में भगवान वेदव्यास कहते हैं-

नामसंकीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम् ।

प्रणामो दुःखशमनस्तं नमामि हरिं पदम् ।।

जिसका नाम-संकीर्तन सभी पापों का विनाशक है और प्रणाम दुःख का शमन करने वाला है, उस श्रीहरि-पद को मैं नमस्कार करता हूँ ।

कलिकाल में नाम की महिमा का बयान करते हुए भगवान वेदव्यास जी श्रीमदभागवत में कहते हैं-

कृते यद् ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः ।

द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात् ।।

सतयुग में भगवान विष्णु के ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से और द्वापर में भगवान की पूजा-अर्चना से जो फल मिलता था, वह सब कलियुग में भगवान के नाम कीर्तन मात्र से ही प्राप्त हो जाता है ।

(श्रीमदभागवतः 13.3.52)

श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसी दास जी महाराज इसी बात को इस रुप में कहते हैं-

कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग ।

जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग ।।

सतयुग, त्रेता और द्वापर में जो गति पूजा, यज्ञ और योग से प्राप्त होती है, वही गति कलियुग में लोग केवल भगवान के नाम से पा जाते हैं ।

(श्रीरामचरित. उत्तरकाण्डः 102ख)

आगे गोस्वामी जी कहते हैं-

कलिजुग केवल हरि गुन गाहा ।

गावत नर पावहिं भव थाहा ।।

कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना ।

एक आधार राम गुन गाना ।।

सब भरोस तजि जो भज रामहि ।

प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि ।।

सोइ भव तर कछु संसय नाहीं ।

नाम प्रताप प्रगय कलि माहीं ।।

कलियुग में तो केवल श्री हरि की गुण गाथाओं का गान करने से ही मनुष्य भवसागर की थाह पा जाते हैं ।

कलियुग में न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है । श्री राम जी का गुणगान ही एकमात्र आधार है । अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्रीरामजी को भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहों को गाता है, वही भवसागर से तर जाता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं । नाम का प्रताप कलियुग में प्रत्यक्ष है ।

(श्री रामचरित. उत्तरकाण्डः 102.4 से 7)

चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ ।

कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ ।।

यों तो चारों युगों में और चारों ही वेदों में नाम का प्रभाव है किन्तु कलियुग में विशेष रूप से है । इसमें तो नाम को छोड़कर दूसरा कोई उपाय ही नहीं है ।

(श्रीरामचरित. बालकाण्डः 21.8)

गोस्वामी श्री तुलसीदास जी महाराज के विचार में अच्छे अथवा बुरे भाव से, क्रोध अथवा आलस्य से किसी भी प्रकार से भगवन्नाम का जप करने से व्यक्ति को दसों दिशाओं में कल्याण-ही-कल्याण प्राप्त होता है ।

भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ ।

नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ ।।

(श्रीरामचरित. बालकाण्डः 27.1)

यह कल्पवृक्षस्वरूप भगवन्नाम स्मरण करने से ही संसार के सब जंजालों को नष्ट कर देने वाला है । यह भगवन्नाम कलिकाल में मनोवांछित फलों को देने वाला, परलोक का परम हितैषी एवं इस संसार में व्यक्ति का माता-पिता के समान सब प्रकार से पालन एवं रक्षण करने वाला है ।

नाम कामतरु काल कराला।

सुमिरत समन सकल जग जाला।।

राम नाम कलि अभिमत दाता।

हित परलोक लोक पितु माता।।

(श्रीरामचरित. बालकाण्डः 26.5-6)

इस भगवन्नाम-जपयोग के आध्यात्मिक एवं लौकिक पक्ष का सुंदर समन्वय करते हुए गोस्वामी जी कहते हैं कि ब्रह्माजी के बनाये हुए इस प्रपंचात्मक दृश्यजगत से भली भाँति छूटे हुए वैराग्यवान् मुक्ति योगी पुरुष इस नाम को ही जीभ से जपते हुए तत्त्वज्ञानरुप दिन में जागते हैं और नाम तथा रुप से रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुख का अनुभव करते हैं । जो परमात्मा के गूढ़ रहस्य को जानना चाहते हैं, वे जिह्वा द्वारा भगवन्नाम का जप करके उसे जान लेते हैं । लौकिक सिद्धियों के आकाँक्षी साधक लययोग द्वारा भगवन्नाम जपकर अणिमादि सिद्धियाँ प्राप्त कर सिद्ध हो जाया करते हैं । इसी प्रकार जब संकट से घबराये हुए आर्त भक्त नामजप करते हैं तो उनके बड़े-बड़े संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं ।

नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी।

बिरती बिरंचि प्रपंच बियोगी।।

ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा।

अकथ अनामय नाम न रूपा।।

जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ।

नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ।।

साधक नाम जपहिं लय लाएँ।

होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।।

जपहिं नामु जन आरत भारी।

मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।।

( श्री रामचरित. बालकाण्डः 21,1 से 5)

नाम को निर्गुण (ब्रह्म) एवं सगुण (राम) से भी बड़ा बताते हुए तुलसीदास जी ने तो यहाँ तक कह दिया किः

अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा।

अकथ अगाध अनादि अनूपा।।

मोरें मत बड़ नामु दुहू तें।

किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें।।

ब्रह्म के दो स्वरूप हैं- निर्गुण और सगुण। ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं। मेरी मति में नाम इन दोनों से बड़ा है, जिसने अपने बल से दोनों को वश में कर रखा है।

(श्रीरामचरित. बालकाण्डः 22,1-2)

अंत में नाम को राम से भी अधिक बताते हुए तुलसीदास जी कहते हैं-

सबरी गीघ सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ।

नाम उधारे अमित खल बेद गुन गाथ।।

श्री रघुनाथ जी ने तो शबरी, जटायु गिद्ध आदि उत्तम सेवकों को ही मुक्ति दी, परन्तु नाम ने अनगिनत दुष्टों का भी उद्धार किया। नाम के गुणों की कथा वेदों में भी प्रसिद्ध है।

(श्रीरामचरित. बालकाण्डः 24)

अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ।

भए मुकुत हरिनाम प्रभाऊ।।

कहौं कहौं लगि नाम बड़ाई।

रामु न सकहिं नाम गुन गाई।।

नीच अजामिल, गज और गणिका भी श्रीहरि के नाम के प्रभाव से मुक्त हो गये। मैं नाम की बड़ाई कहाँ तक कहूँ? राम भी नाम के गुणों को नहीं गा सकते।

(श्रीरामचरित. बालकाण्डः25,7-8)

किन्हीं महापुरुषों ने कहा हैः

आलोsयं सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः।

एकमेव सुनिष्पन्नं हरिर्नामैव केवलम्।।

सर्वशास्त्रों का मन्थन करने के बाद, बार-बार विचार करने के बाद, ऋषि-मुनियों को जो एक सत्य लगा, वह है भगवन्नाम।

तुकारामजी महाराज कहते हैं-

नामजप से बढ़कर कोई भी साधना नहीं है। तुम और जो चाहो से करो, पर नाम लेते रहो। इसमें भूल न हो। यही सबसे पुकार-पुकारकर मेरा कहना है। अन्य किसी साधन की कोई जरूरत नहीं है। बस निष्ठा के साथ नाम जपते रहो।

इस भगवन्नाम-जप की महिमा अनंत है। इस जप के प्रसाद से शिवजी अविनाशी हैं एवं अमंगल वेशवाले होने पर भी मंगल की राशि हैं। परम योगी शुकदेवजी, सनकादि सिद्धगण, मुनिजन एवं समस्त योगीजन इस दिव्य नाम-जप के प्रसाद से ही ब्रह्मनंद का भोग करते हैं। भवतशिरोमणि श्रीनारद जी, भक्त प्रह्लाद, ध्रुव, अम्बरीष, परम भागवत श्री हनुमानजी, अजामिल, गणिका, गिद्ध जटायु, केवट, भीलनी शबरी- सभी ने इस भगवन्नाम-जप के द्वारा भगवत्प्राप्ति की है।

मध्यकालीन भक्त एवं संत कवि सूर, तुलसी, कबीर, दादू, नानक, रैदास, पीपा, सुन्दरदास आदि संतों तथा मीराबाई, सहजोबाई जैसी योगिनियों ने इसी जपयोग की साधना करके संपूर्ण संसार को आत्मकल्याण का संदेश दिया है।

नाम की महिमा अगाध है। इसके अलौकिक सामर्थ्य का पूर्णतया वर्णन कर पाना संभव नहीं है। संत-महापुरुष इसकी महिमा स्वानुभव से गाते हैं और वही हम लोगों के लिए आधार हो जाता है।

नाम की महिमा के विषय में संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं-

"नाम संकीर्तन की ऐसी महिमा है कि उससे सब पाप नष्ट हो जाते हैं। फिर पापों के लिए प्रायश्चित करने का विधान बतलाने वालों का व्यवसाय ही नष्ट हो जाता है, क्योंकि नाम-संकीर्तन लेशमात्र भी पाप नहीं रहने देता। यम-दमादि इसके सामने फीके पड़ जाते हैं, तीर्थ अपने स्थान छोड़ जाते हैं, यमलोक का रास्ता ही बंद हो जाता है। यम कहते हैं- हम किसको यातना दें? दम कहते हैं- हम किसका भक्षण करें? यहाँ तो दमन के लिए भी पाप-ताप नहीं रह गया! भगवन्नाम का संकीर्तन इस प्रकार संसार के दुःखों को नष्ट कर देता है एवं सारा विश्व आनंद से ओत-प्रोत हो जाता है।"

(ज्ञानेश्वरीगीताः अ.9,197-200)

नामोचारण का फल

श्रीमदभागवत में आता है:

सांकेत्यं पारिहास्यं वा स्तोत्रं हेलनमेव वा |

वैकुण्ठनामग्रहणमशेषधहरं विटुः ||

पतितः स्खलितो भग्नः संदष्टस्तप्त आहतः |

हरिरित्यवशेनाह पुमान्नार्हति यातनाम् ||

 

भगवान का नाम चाहे जैसे लिया जाय- किसी बात का संकेत करने के लिए, हँसी करने के लिए अथवा तिरस्कार पूर्वक ही क्यों हो, वह संपूर्ण पापों का नाश करनेवाला होता है | पतन होने पर, गिरने पर, कुछ टूट जाने पर, डँसे जाने पर, बाह्य या आन्तर ताप होने पर और घायल होने पर जो पुरुष विवशता से भी हरि ये नाम का उच्चारण करता है, वह यम-यातना के योग्य नहीं |

(श्रीमदभागवत: 6.2.14,15)

 

मंत्र जाप का प्रभाव सूक्ष्म किन्तु गहरा होता है |

 

जब लक्ष्मणजी ने मंत्र जप कर सीताजी की कुटीर के चारों तरफ भूमि पर एक रेखा खींच दी तो लंकाधिपति रावण तक उस लक्ष्मणरेखा को लाँघ सका | हालाँकि रावण मायावी विद्याओं का जानकार था, किंतु ज्योंहि वह रेख को लाँघने की इच्छा करता त्योंहि उसके सारे शरीर में जलन होने लगती थी |

 

मंत्रजप से पुराने संस्कार हटते जाते हैं, जापक में सौम्यता आती जाती है और उसका आत्मिक बल बढ़ता जाता है |

 

मंत्रजप से चित्त पावन होने लगता है | रक्त के कण पवित्र होने लगते हैं | दुःख, चिंता, भय, शोक, रोग आदि निवृत होने लगते हैं | सुख-समृद्धि और सफलता की प्राप्ति में मदद मिलने लगती है |

 

जैसे, ध्वनि-तरंगें दूर-दूर जाती हैं, ऐसे ही नाह-जप की तरंगें हमारे अंतर्मन में गहरे उतर जाती हैं तथा पिछले कई जन्मों के पाप मिटा देती हैं | इससे हमारे अंदर शक्ति-सामर्थ्य प्रकट होने लगता है और बुद्धि का विकास होने लगता है | अधिक मंत्र जप से दूरदर्शन, दूरश्रवण आदि सिद्धयाँ आने लगती हैं, किन्तु साधक को चाहिए कि इन सिद्धियों के चक्कर में पड़े, वरन् अंतिम लक्ष्य परमात्म-प्राप्ति में ही निरंतर संलग्न रहे |

 

मनु महाराज कहते थे कि:

जप मात्र से ही ब्राह्मण सिद्धि को पा लेता है और बड़े-में-बड़ी सिद्धि है हृदय की शुद्धि |

 

भगवान बुद्ध कहा करते थे: मंत्रजप असीम मानवता के साथ तुम्हारे हृदय को एकाकार कर देता है |

 

मंत्रजप से शांति तो मिलती ही है, वह भक्ति मुक्ति का भी दाता है |

 

मंत्रजप करने से मनुष्य के अनेक पाप-ताप भस्म होने लगते हैं | उसका हृदय शुद्ध होने लगता है तथा ऐसे करते-करते एक दिन उसके हृदय में हृदतेश्वर का प्राकटय भी हो जाता है |

 

मंत्रजापक को व्यक्तिगत जीवन में सफलता तथा सामाजिक जीवन में सम्मान मिलता है | मंत्रजप मानव के भीतर की सोयी हुई चेतना को जगाकर उसकी महानता को प्रकट कर देता है | यहाँ तक की जप से जीवात्मा ब्रह्म-परमात्मपद में पहुँचने की क्षमता भी विकसित कर लेता है |

 

जपात् सिद्धिः जपात् सिद्धिः जपात् सिद्धिर्न संशयः |

 

मंत्र दिखने में बहुत छोटा होता है लेकिन उसका प्रभाव बहुत बड़ा होता है | हमारे पूर्वज ॠषि-मुनियों ने मंत्र के बल से ही तमाम ॠद्धियाँ-सिद्धियाँ इतनी बड़ी चिरस्थायी ख्याति प्राप्त की है |

 

गीताप्रेस गोरखपुर के श्री जयदयाल गोयन्दकाजी लिखते हैं:

 

वास्तव में, नाम की महिमा वही पुरुष जान सकता है जिसका मन निरंतर श्री भगवन्नाम के चिंतन में संलग्न रहता है, नाम की प्रिय और मधुर स्मृति से जिसको क्षण-क्षण में रोमांच और अश्रुपात होते हैं, जो जल के वियोग में मछली की व्याकुलता के समान क्षणभर के नाम-वियोग से भी विकल हो उठता है, जो महापुरुष निमेषमात्र के लिए भी भगवान के नाम को छोड़ नहीं सकता और जो निष्कामभाव से निरंतर प्रेमपूर्वक जप करते-करते उसमें तल्लीन हो चुका है |

 

साधना-पथ में विघ्नों को नष्ट करने और मन में होने वाली सांसारिक स्फुरणाओं का नाश करने के लिए आत्मस्वरूप के चिंतनसहित प्रेमपूर्वक भगवन्नाम-जप करने के समान दूसरा कोई साधन नहीं है |

 

नाम और नामी की अभिन्नता है | नाम-जप करने से जापक में नामी के स्वभाव का प्रत्यारोपण होने लगता है | इससे उसके दुर्गुण, दोष, दुराचार मिटकर उसमें दैवी संपत्ति के गुणों का स्थापन होता है नामी के लिए उत्कट प्रेम-लालसा का विकस होता है |

 

सदगुरु और मंत्र दीक्षा

अपनी इच्छानुसार कोई मंत्र जपना बुरा नहीं है, अच्छा ही है, लेकिन जब मंत्र सदगुरु द्वारा दिया जाता है तो उसकी विशेषता बढ़ जाती है | जिन्होंने मंत्र सिद्ध किया हुआ हो, ऐसे महापुरुषों के द्वारा मिला हुआ मंत्र साधक को भी सिद्धावस्था में पहुँचाने में सक्षम होता है | सदगुरु से मिला हुआ मंत्र सबीज मंत्र कहलाता है क्योंकि उसमें परमेश्वर का अनुभव कराने वाली शक्ति निहित होती है |

 

सदगुरु से प्राप्त मंत्र को श्रद्धा-विश्वासपूर्वक जपने से कम समय में ही काम बा जाता है |

 

शास्त्रों में यह कथा आती है कि एक बार भक्त ध्रुव के संबंध में साधुओं की गोष्ठी हुई | उन्होंने कहा:

देखो, भगवान के यहाँ भी पहचान से काम होता है | हम लोग कई वर्षों से साधु बनकर नाक रगड़ रहे हैं, फिर भी भगवान दर्शन नहीं दे रहे | जबकि ध्रुव है नारदजी का शिष्य, नारदजी हैं ब्रह्मा के पुत्र और ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए हैं विष्णुजी की नाभि से | इस प्रकार ध्रुव हुआ विष्णुजी के पौत्र का शिष्य | ध्रुव ने नारदजी से मंत्र पाकर उसका जप किया तो भगवान ध्रुव के आगे प्रकट हो गये |

 

इस प्रकार की चर्चा चल ही रही थी कि इतने में एक केवट वहाँ और बोला: हे साधुजनों ! लगता है आप लोग कुछ परेशान से हैं | चलिए, मैं आपको जरा नौका विहार करवा दूँ |

 

सभी साधु नौका में बैठ गये | केवट उनको बीच सरोवर में ले गया जहाँ कुछ टीले थे | उन टीलों पर अस्थियाँ दिख रहीं थीं | तब कुतुहल वश साधुओं ने पूछा:

 

केवट तुम हमें कहाँ ले आये? ये किसकी अस्थियों के ढ़ेर हैं ?

 

तब केवट बोला: ये अस्थियों के ढ़ेर भक्त ध्रुव के हैं | उन्होंने कई जन्मों तक भगवान को पाने के लिये यहीं तपस्या की थी | आखिरी बार देवर्षि नारद मिल गये तो उनकी तपस्या छः महीने में फल गई और उन्हें प्रभु के दर्शन हो गये |

 

सब साधुओं को अपनी शंका का समाधान मिल गया |

 

इस प्रकार सदगुरु से प्राप्त मंत्र का विश्वासपूर्वक जप शीघ्र फलदायी होता है |

 

दूसरी बात: गुरुप्रदत्त मंत्र कभी पीछा नहीं छोड़ता | इसके भी कई दृष्टांत हैं |

 

तीसरी बात : सदगुरु शिष्य की योग्यता के अनुसार मंत्र देते हैं | जो साधक जिस केन्द्र में होता है, उसीके अनुरूप मंत्र देने से कुण्डलिनी शक्ति जल्दी जाग्रत होती है |

 

गुरु दो प्रकार के माने जाते हैं :

1. सांप्रदायिक गुरु और

2. लोक गुरु

 

सांप्रदाय के संत सबको को एक प्रकार का मंत्र देते हैं ताकि उनका संप्रदाय मजबूत हो | जबकि लोकसंत साधक की योग्यता के अनुसार उसे मंत्र देते हैं | जैसे, देवर्षि नारद | नारदजी ने रत्नाकर डाकू को मरा-मरा मंत्र दिया जबकि ध्रुव को नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र दिया |

 

मंत्र भी तीन प्रकार के होते हैं :

1. साबरी

2. तांत्रिक और

3. वैदिक

 

साबरी तथा तांत्रिक मंत्र से छोटी-मोटी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं लेकिन ब्रह्मविद्या के लिए तो वैदिक मंत्र ही लाभदायी है | वैदिक मंत्र का जप इहलोक और परलोक दोनों में लाभदायी होता है |

 

किस साधक के लिये कौन सा मंत्र योग्य है ? यह बत सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान श्री सदगुरुदेव की दृष्टि छिपी नहीं रहती | इसीसे दीक्षा के संबंध में पूर्णतः उन्हीं पर निर्भर रहना चाहिए | वे जिस दिन, जिस अवस्था में शिष्य पर कृपा कर देते हैं, चाहे जो मंत्र देते हैं, विधिपूर्वक या बिना विधि के, सब ज्यों-का-त्यों शास्त्र सम्म्त है | वही शुभ मुहूर्त है, जब श्रीगुरुदेव की कृपा हो | वही शुभ मंत्र है, जो वे दे दें | उसमें किसी प्रकार के संदेह या विचार के लिए स्थान नहीं है | वे अनाधिकारी को अधिकारी बना सकते हैं | एक-दो की तो बात ही क्या, सारे संसार का उद्धार कर सकते हैं

श्रीगुरुगीता में आता है:

 

गुरुमंत्रो मुखे यस्य तस्य सिद्धियन्ति नान्यथा |

दीक्षया सर्व कर्माणि सिद्धयन्ति गुरु पुत्रके ||

 

जिसके मुख में गुरुमंत्र है, उसके सब कर्म सिद्ध होते हैं, दूसरे के नहीं | दीक्षा के कारण शिष्य के सर्व कार्य सिद्ध हो जाते हैं |

 

 

मंत्रदीक्षा

गुरु मंत्रदीक्षा के द्वार शिष्य की सुषुप्त शक्ति को जगाते हैं | दीक्षा का अर्थ है: दी अर्थात जो दिया जाय, जो ईश्वरीय प्रसाद देने की योग्यता रखते हैं तथा क्षा अर्थात जो पचाया जाय या जो पचाने की योग्यता रखता है | पचानेवाले साधक की योग्यता तथा देनेवाले गुरु का अनुग्रह, इन दोनों का जब मेल होता है, तब दीक्षा सम्पन्न होती है |

 

गुरु मंत्र दीक्षा देते हैं तो साथ-साथ अपनी चैतन्य शक्ति भी शिष्य को देते हैं | किसान अपने खेत में बीज बो देता है तो अनजान आदमी यह नहीं कह सकता कि बीज बोया हुआ है या नहीं | परन्तु जब धीरे-धीरे खेत की सिंचाई होती है, उसकी सुरक्षा की जाती है, तब बीज में से अंकुर फूट निकलते हैं और तब सबको पता चलता है कि खेत में बुवाई हुई है | ऐसे ही मंत्र दीक्षा के समय हमें जो मिलता है, वह पता नहीं चलता कि क्या मिला, परन्तु जब हम साधन-भजन से उसे सींचते हैं तब मंत्र दीक्षा का जो प्रसाद है, बीजरूप में जो आशीर्वाद मिला है, वह पनपता है |

 

श्री गुरुदेव की कृपा और शिष्य की श्रद्धा, इन दो पवित्र धाराओं का संगम ही दीक्षा है |गुरु का आत्मदान और शिष्य का आत्मसमर्पण, एक की कृपा दूसरे की श्रद्धा के मेल से ही दीक्षा संपन्न होती है | दान और क्षेप, यही दीक्षा है | ज्ञान, शक्ति सिद्धि का दान और अज्ञान, पाप और दरिद्रता का क्षय, इसी का नाम दीक्षा है |

 

सभी साधकों के लिये यह दीक्षा अनिवार्य है |चाहे जन्मों की देर लगे, परन्तु जब तक ऐसी दीक्षा नहीं होगी तब तक सिद्धि का मार्ग रुका ही रहेगा |

 

यद समस्त साधकों का अधिकार एक होता, यदि साधनाएँ बहुत नहीं होतीं और सिद्धियों के बहुत-से-स्तर होते तो यह भी सम्भव था कि बिना दीक्षा के ही परमार्थ प्राप्ति हो जाती | परंतु ऐसा नहीं है | इस मनुष्य शरीर में कोई पशु-योनी से आया है और कोई देव-योनी से, कोई पूर्व जन्म में साधना-संपन्न होकर आया है और कोई सीधे नरककुण्ड से, किसी का मन सुप्त है और किसी का जाग्रत | ऐसी स्थिति में सबके लिये एक मंत्र, एक देवता और एक प्रकार की ध्यान-प्रणाली हो ही नहीं सकती |

 

यह सत्य है कि सिद्ध, साधक, मंत्र और देवताओं के रूप में एक ही भगवान प्रकट हैं | फिर भी किस हृदय में, किस देवता और मंत्र के रूप में उनकी स्फूर्ति सहज है- यह जानकर उनको उसी रूप में स्फुरित करना, यह दीक्षा की विधि है |

 

दीक्षा एक दृष्टि से गुरु की ओर आत्मदान, ज्ञानसंचार अथवा शक्तिपात है तो दूसरी दृष्टि से शिष्य में सुषुप्त ज्ञान और शक्तियों का उदबोधन है | दीक्षा से हृदयस्थ सुप्त शक्ति के जागरण में बड़ी सहायता मिलती है और यही कारण है कि कभी-कभी तो जिनके चित्त में बड़ी भक्ति है, व्याकुलता और सरल विश्वास है, वे भी भगवत्कृपा का उतना अनुभव नहीं कर पाते जितना कि शिष्य को दीक्षा से होता है |

 

दीक्षा बहुत बार नहीं होती क्योंकि एक बार रास्ता पकड़ लेने पर आगे के स्थान स्वयं ही आते रहते हैं | पहली भूमिका स्वयं ही दूसरी भूमिका के रूप में पर्यवसित होती है |

 

साधना का अनुष्ठान क्रमशः हृदय को शुद्ध करता है और उसीके अनुसार सिद्धियों का और ज्ञान का उदय होता जाता है | ज्ञान की पूर्णता साधना की पूर्णता है |

 

शिष्य के अधिकार-भेद से ही मंत्र और देवता का भेद होता है जैसे कुशल वैद्य रोग का निर्णय होने के बाद ही औषध का प्रयोग करते हैं | रोगनिर्णय के बिना औषध का प्रयोग निरर्थक है | वैसे ही साधक के लिए मंत्र और देवता के निर्णय में भी होता है | यदि रोग का निर्णय ठीक हो, औषध और उसका व्यवहार नियमित रूप से हो, रोगी कुपथ्य करे तो औषध का फल प्रत्यक्ष देखा जाता है | इसी प्रकार साधक के लिए उसके पूर्वजन्म की साधनाएँ, उसके संस्कार, उसकी वर्त्तमान वासनाएँ जानकर उसके अनुकूल मंत्र तथा देवता का निर्णय किया जाय और साधक उन नियमों का पालन करे तो वह बहुत थोड़े परिश्रम से और बहुत शीघ्र ही सिद्धिलाभ कर सकता है |

 

मंत्र दीक्षा के प्रकार

दीक्षा तीन प्रकार की होती है:

1. मांत्रिक

2. शांभवी और

3. स्पर्श

 

जब मंत्र बोलकर शिष्य को सुनाया जाता है तो वह होती है मांत्रिक दीक्षा |

 

निगाहों से दी जानेवाली दीक्षा शांभवी दीक्षा कहलाती है |

 

जब शिष्य के किसी भी केन्द्र को स्पर्श करके उसकी कुण्डलिनी शक्ति जगायी जाती है तो उसे स्पर्श दीक्षा कहते हैं |

 

शुकदेवजी महाराज ने पाँचवें दिन परिक्षित पर अपनी दृष्टि से कृपा बरसायी और परिक्षित को ऐसा दिव्य अनुभव हुआ कि वे अपनी भूख-प्यास तक भूल गये | गुरु के वचनों से उन्हें बड़ी तृप्ति मिली | शुकदेवजी महाराज समझ गये कि सत्पात्र ने कृपा पचायी है | सातवें दिन शुकदेवजी महारज ने परिक्षित को स्पर्श दीक्षा भी दे दी और परिक्षित को पूर्ण शांति की अनुभूति हो गयी |

 

कुलार्णवतंत्र में तीन प्रकार की दीक्षाओं का इस प्रकार वर्णन है:

 

स्पर्शदीक्षा:

 

यथा पक्षी स्वपक्षाभ्यां शिशून्संवर्धयेच्छनैः |

स्पर्शदीक्षोपदेशस्तु तादृशः कथितः प्रिये ||

 

'स्पर्शदीक्षा उसी प्रकार की है जिस प्रकार पक्षिणी अपने पंखों से स्पर्श से अपने बच्चों का लालन-पालन-वर्द्धन करती है |'

 

जब तक बच्चा अण्डे से बाहर नहीं निकलता तब तक पक्षिणी अण्डे पर बैठती है और अण्डे से बाहर निकलने के बाद जब तक बच्चा छोटा होता है तब तक उसे वह अपने पंखों से ढ़ाँके रहती है |

 

दृग्दीक्षा:

स्वपत्यानि यथा कूर्मी वीक्षणेनैव पोष्येत् |

दृग्दीक्षाख्योपदेशस्तु तादृशः कथितः प्रिये ||

 

दृग्दीक्षा उसी प्रकार की है जिस प्रकार कछवी दृष्टिमात्र से अपने बच्चों का पोषण करती है |

 

ध्यानदीक्षा:

यथा मत्सी स्वतनयान् ध्यानमात्रेण पोषयेत् |

वेधदीक्षापदेशस्तु मनसः स्यात्तथाविधाः ||

 

ध्यानदीक्षा मन से होती है और उसी प्रकार होती है जिस प्रकार मछली अपने बच्चों को ध्यानमात्र से पोसती है |

 

पक्षिणी, कछवी और मछली के समान ही श्रीसदगुरु अपने स्पर्श से, दृष्टि से तथा संकल्प से शिष्य में अपनी शक्ति का संचार करके उसकी अविद्या का नाश करते हैं और महावाक्य के उपदेश से उसे कृतार्थ कर देते हैं | स्पर्श, दृष्टि और संकल्प के अतिरिक्त एक शब्ददीक्षा भी होती है | इस प्रकार चतुर्विध दीक्षा है और उसका क्रा आगे लिखे अनुसार है :

 

विद्धि स्थूलं सूक्षमं सूक्ष्मतरं सूक्ष्मतममपि क्रमतः |

स्पर्शनभाषणदर्शनसंकल्पनजत्वतश्च्तुर्धा तम् ||

 

स्पर्श, भाषण, दर्शन, संकल्प - यह चार प्रकार की दीक्षा क्रम से स्थूल, सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम है |

 

इस प्रकार दीक्षा पाये हुए शिष्यों में कोई ऐसे होते हैं, जो दूसरों को वही दीक्षा देकर कृतार्थ कर सकते हैं और कोई केवल स्वयं कृतार्थ होते हैं, परन्तु दूसरों को शक्तिपात करके कृतार्थ नहीं सकते |

 

साम्यं तु शक्तिपाते गुरुवत्स्वस्यापि सामर्थ्यम् |

 

चार प्रकार की दीक्षा में गुरुसाम्यासाम्य कैसा होता है, यह आगे बतलाते हैं :

 

स्पर्श:

स्थूलं ज्ञानं द्विविधं गुरुसाम्यासाम्यद्वत्वभेदेन |

दीपप्रस्तरयोरिव संस्पर्शात्स्निग्धवर्त्ययसोः ||

किसी जलते हुए दीपक से किसी दूसरे दीपक की घृताक्त या तैलाक्त बत्ती को स्पर्श करते ही वह बत्ती जल उठती है, फिर यह दूसरी जलती हुई बत्ती चाहे किसी भी अन्य स्निग्ध बत्ती को अपने स्पर्श से प्रज्वलित कर सकती है | यह शक्ति उसे प्राप्त हो गयी | यही शक्ति इस प्रकार प्रज्वलित सभी दीपों को प्राप्त है | इसीको परम्परा कहते हैं | दूसरा उदाहरण पारस है | पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है, परन्तु इस सोने में यह सामर्थ्य नहीं होता कि वह दूसरे किसी लोहखण्ड को अपने स्पर्श से सोना बना सके | साम्यदान करने की शक्ति उसमें नहीं होती अर्थात परम्परा आगे नहीं बनी रहती |

 

शब्दः

तद्वद् द्विविधं सूक्ष्मं शब्दश्रवणेन कोकिलाम्बुदयोः |

तत्सुतमयूरयोरिव तद्वज्ञेयं यथासंख्यम् ||

 

कौओं के बीच में पला हुआ कोयल का बच्चा कोयल का शब्द सुनते ही यह जान जाता है मैं कोयल हूँ | फिर अपने शब्द से यही बोध उत्पन्न करने की शक्ति भी उसमें जाती है | मेघ का शब्द सुनकर मोर आनन्द से नाच उठता है, पर यही आनन्द दूसरे को देने का सामर्थ्य मोर के शब्द में नहीं आता |

 

दृष्टि:

इत्थं सूक्ष्मतरमपि द्विविधं कूर्म्या निरीक्षणात्तस्याः |

पुत्र्यास्तथैव सवितुर्निरीक्षणात्कोकमिथुनस्य ||

 

कछवी के दृष्टि निक्षेपमात्र से उसके बच्चे निहाल हो जाते हैं और फिर यही शक्तिपात उन बच्चों को भी प्राप्त होती है | इसी प्रकार सदगुरु के करुणामय दृष्टिपात से शिष्य में ज्ञान का उदय हो जाता है और फिर उसी प्रकार की करुणामय दृष्टिपात से अन्य अधिकारियों में भी ज्ञान उदय कराने की शक्ति उस शिष्य में भी जाती है | परन्तु चकवा-चकवी को सूर्यदर्शन से जो आनन्द प्राप्त होता है, वही आनन्द वे अपने दर्शन के द्वारा दूसरे चकवा-चकवी के जोड़ों को नहीं प्राप्त करा सकते |

 

संकल्पः

सूक्ष्मतमपि द्विविधं मत्स्याः संकल्पतस्तु तद्युहितुः |

तृप्तिर्नगरादिजनिर्मान्त्रिकसंकल्पतश्च भुवि तद्वत ||

 

मछली के संकल्प से उसके बच्चे निहाल होते हैं और इसी प्रकार संकल्पमात्र से अपने बच्चों को निहाल करने सामर्थ्य फिर उन बच्चों को भी प्राप्त हो जाता है | परन्तु आंत्रिक अपने संकल्प से जिन वस्तुओं का निर्माण करता है, उन वस्तुओं में वह संकल्पशक्ति उत्पन्न नहीं होती |

 

इन सब बातों का निष्कर्ष यह है कि सदगुरु अपनी सारी शक्ति एक क्षण में अपने शिष्य को दे सकते हैं |

 

यही बात परम भगवदभक्त संत तुकारामजी अपने अभंग में इस प्रकार कहते हैं:

 

सदगुरु बिना रास्ता नहीं मिलता, इसलिए सब काम छोड़कर पहले उनके चरण पकड़ लो | वे तुरंत शरणागत को अपने जैसा बना लेते हैं | इसमें उन्हें जरा भी देर नहीं लगती |

 

गुरुकृपा से जब शक्ति प्रबुद्ध हो उठती है, तब साधक को आसन, प्राणायाम, मुद्र आदि करने की आवश्यकता नहीं होती | प्रबुद्ध कुण्डलिनी ऊपर ब्रह्मरन्ध की ओर जाने के लिए छटपटाने लगती है | उसके इस छटपटाने में जो कुछ क्रियाएँ अपने-आप होती हैं, वे ही आसन, मुद्र, बन्ध और प्राणयाम हैं | शक्ति का मार्ग खुल जाने के बाद सब क्रियाएँ अपने-आप होती हैं और उनसे चित्त को अधिकाधिक स्थिरता प्राप्त होती है | ऐसे साधक देखे गये हैं, जिन्होंने कभी स्वप्न में भी आसन-प्राणयामादि का कोई विष्य नहीं जाना , ग्रन्थों में देखा था, किसीसे कोई क्रिया ही सीखी थी, पर जब उनमें शक्तिपात हुआ तब वे इन सब क्रियाओं को अन्तःस्फूर्ति से ऐसे करने लगे जैसे अनेक वर्षों का अभ्यास हो | योगशास्त्र में वर्णित विधि के अन्नुसार इन सब क्रियाओ। का उनके द्वारा अपने-आप होना देखकर बड़ा ही आश्चर्य होता है | जिस साधक के द्वारा जिस क्रिया का होना आवश्यक है, वही क्रिया उसके द्वारा होती है, अन्य नहीं | जिन क्रियाओं के करने में अन्य साधकों को बहुत काल कठोर अभ्यास करना पड़ता है, उन आसनादि क्रियाओं को शक्तिपात से युक्त साधक अनायास कर सकते हैं | यथावश्यक रूप से प्राणयाम भी होने लगता है और दस-पन्द्रह दिन की अवधि के अन्दर दो-दो मिनट का कुम्भक अनायास होने लगता है | इस प्रकार होनेवाली यौगिक क्रियाओं से साधक को कोई कष्ट नहीं होता, किसी अनिष्ट के भय का कोई कारण नहीं रहता, क्योंकि प्रबुद्ध शक्ति स्वयं ही ये सब क्रियाएँ साधक से उसकी प्रकृति से अनुरूप करा लिया करती है | अन्यथा हठयोग से साधन में जरा सी भी त्रुटि होने पर बहुत बड़ी हानि होने का भय रहता है | जैसा कि हठयोगप्रदीपिका ने आयुक्ता-भ्यासयोगेन सर्वरोगसमुदभवः यह कह कर चेता दिया है, परन्तु शक्तिपात से प्रबुद्ध होने वाली शक्ति के द्वारा साधक को जो क्रियाएँ होती हैं, उनसे शरीर रोग रहित होता है, बड़े-बड़े असाध्य रोग भी भस्म हो जाते हैं | इससे गृहस्थ साधक बहुत लाभ उठा सकते हैं | अन्य साधनों के अभ्यास में तो भविष्य में कभी मिलनेवाले सुख की आशा से पहले कष्ट-ही-कष्ट उठाने पड़ते हैं, परन्तु इस साधन में आरम्भ से ही सुख की अनुभूति होने लगती है | शक्ति का जागना जहाँ एक बार हुआ कि फ्र वह शक्ति स्वयं ही साधक को परमपद की प्राप्ति कराने तक अपना काम करती रहती है | इस बीच साधक के जितने भी जन्म बीत जायें, एक बार जागी हुई कुण्डलिनी श्कति फिर कभी सुप्त नहीं होती है |

 

शक्तिसंचार दीक्षा प्राप्त करने के पश्चात साधक अपने पुरुषार्थ से कोई भी यौगिक क्रिया नहीं कर सकता, इसमें उसका मन ही लग सकता है | शक्ति स्वयं अंदर से जो स्फूर्ति प्रदान करती है, उसी के अनुसार साधक को सब क्रियाएँ होती रहती हैं | यदि उसके अनुसार वह करे अथवा उसका विरोध करे तो उसका चित्त स्वस्थ नहीं रह सकता, ठीक वैसे ही जैसे नींद आने पर भी जागनेवाला मनुष्य अस्वस्थ होता है | साधक को शक्ति के आधीन होकर रहना होता है | शक्ति ही उसे जहाँ जब ले जाय, उसे जाना होता है और उसीमें संतोष करना होता है | एक जीवन में इस प्रकार कहाँ-से-कहाँ तक उसकी प्रगति होगी, इसका पहले से कोई निश्चय या अनुमान नहीं किया जा सकता | शक्ति ही उसका भार वहन करती है और शक्ति किसी प्रकार उसकी हानि कर उसका कल्याण ही करती रहती है |

 

योगाभ्यास की इच्छा करनेवालों के लिए इस काल में शक्तिपात जैसा सुगम साधन अन्य कोई नहीं है | इसलिए ऐसे शक्तिसम्पन्न गुरु जब सौभाग्य से किसीको प्राप्त हों तब उसे चाहिए कि ऐसे गुरु का कृपाप्रसाद प्राप्त करे | इस प्रकार अपने कर्त्त्व्यों का पलन करते हुए ईश्वरप्रसाद का लाभ प्राप्त करके कृतकृत्य होने के लिए साधक को सदा प्रयत्नशील रहना चाहिए |

 

गुरु में विश्वास

गुरुत्यागाद् भवेन्मृत्युर्मंत्रत्यागाद्यरिद्रता |

गुरुमंत्रपरित्यागी रैरवं नरकं व्रजेत् ||

 

गुरु का त्याग करने से मृत्यु होती है, मंत्र को छोड़ने से द्ररिद्रता आती है और गुरु मंत्र त्याग करने से रौरव नरक मिलता है |

 

एक बार सदगुरु करके फिर उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता | जो हमारे जीवन की व्यवस्था करना जानते हैं, ऐसे आत्मवेत्ता, श्रोतिय, ब्रह्मनिष्ठ सदगुरु होते हैं | ऐसे महापुरुष अगर हमें मिल जायें तो फिर कहना ही क्या ? जैसे, उत्तम पतिव्रता स्त्री अपने पति के सिवाय दूसरे किसीको पुरुष नहीं मानती | मध्यम पतिव्रता स्त्री बडों को पिता के समान, छोटों को अपने बच्चों के समान और बराबरी वालों को अपने भाई के समान मानती है किन्तु पति तो उसे धरती पर एक ही दिखता है | ऐसे ही सतशिष्य को धरती पर सदगुरु तो एक ही दिखते हैं | फिर भले सदगुरु के अलावा अन्य कोई ब्रह्मनिष्ठ संत मिल जायें घाटवाले बाबा जैसे, उनका आदर जरूर करेंगें किन्तु उनके लिए सदगुरु तो एक ही होते हैं |

 

पार्वतीजी से कहा गया: तुम क्यों भभूतधारी, श्मशानवासी शिवजी के लिए इतना तप कर रही हो ? भगवान नारायण के वैभव को देखो, उनकी प्रसन्नता को देखो | ऐसे वर को पाकर तुम्हारा जीवन धन्य हो उठेगा |

 

तब पार्वतीजी ने कहा: आप मुझे पहले मिल गये होते तो शायद, मैंने आपकी बात पर विचार किया होता | अब तो मैं ऐसा सोच भी नहीं सकती | मैंने तो मन से शिवजी को ही पति के रूप में वर लिया है |

 

शिवजी तो आयेंगे ही नहीं, कुछ सुनेंगें भी नहीं, तुम तपस्या करते-करते मर जाओगी | फिर भी कुछ नहीं होगा |

 

पार्वतीजी बोलीं: इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में | करोड़ जन्म लेकर भी मैं पाऊँगी तो शिवजी को ही पाऊँगी |

कोटि जनम लगि रगर हमारी |

बरऊँ संभू तो रहौउँ कुमारी ||

 

साधक को भी एक बार सदगुरु से मंत्र मिल गया तो फिर अटल होकर लगे रहना चाहिए |

 

मंत्र में विश्वास

एक बार सदगुरु से मंत्र मिल गया, फिर उसमें शंका नहीं करनी चाहिए | मंत्र चाहे जो हो, किन्तु यदि उसे पूर्ण विश्वास के साथ जपा जाय तो अवश्य फलदायी होता है |

किसी नदी के तट पर एक मंदिर में एक महान गुरुजी रहते थे | सारे देश में उनके सैकड़ों-हजारों शिष्य थे | एक बार अपना अंत समय निकट जानकर गुरुजी ने अपने सब शिष्यों को देखने के लिए बुलाया | गुरुजी के विशेष कृपापात्र शिष्यगण, जो सदा उनके समीप ही रहते थे, चिंतित होकर रात और दिन उनके पास ही रहने लगे | उन्होंने सोचा: मालूम कब और किसके सामने गुरुजी अपना रहस्य प्रकट कर दें, जिसके कारण वे इतने पूजे जाते हैं | अतः यह अवसर जाने देने के लिए रात-दिन शिष्यगण उन्हें घेरे रहने लगे |

वैसे तो गुरुजी ने अपने शिष्यों को अनेक मंत्र बतलाये थे, किन्तु शिष्यों ने उनसे कोई सिद्धि प्राप्त नहीं की थी | अतः उन्होंने सोचा कि सिद्धि प्राप्त करने के उपाय को गुरुजी छिपाये ही हैं,