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प्रस्तावना

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।

'जिस कुल में स्त्रियों का आदर है वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं।'

इस प्रकार शास्त्रों में नारी की महिमा बतायी गयी है। भारतीय समाज में नारी का एक विशिष्ट गौरवपूर्ण स्थान है। वह भोग्य नहीं है बल्कि पुरुष को भी शिक्षा देने योग्य चरित्र बरत सकती है। अगर वह अपने चरित्र और साधना में दृढ़ तथा उत्साही बन जाय तो अपने माता, पिता, पति, सास और श्वसुर की भी उद्धारक हो सकती है।

धर्म (आचारसंहिता) की स्थापना भले आचार्यों ने की, पर उसे सँभाले रखना, विस्तारित करना और बच्चों में उसके संस्कारों का सिंचन करना इन सबका श्रेय नारी को जाता है। भारतीय संस्कृति ने स्त्री को माता के रूप में स्वीकार करके यह बात प्रसिद्ध की है कि नारी पुरुष के कामोपभोग की सामग्री नहीं बल्कि वंदनीय, पूजनीय है।

इस पुस्तक में परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचनों से आदर्श नारियों के कुछ ऐसे जीवन-प्रसंग संग्रहित किये गये हैं कि नारियाँ यदि इस चयन का बार-बार अवलोकन करेंगी तो उन्हें अवश्य लाभ होगा।

श्री योग वेदान्त सेवा समिति

सतं श्री आसारामजी आश्रम, अमदावाद।

 

अनुक्रम

संयमनिष्ठ सुयशा... 5

अदभुत आभासम्पन्न रानी कलावती... 14

उत्तम जिज्ञासुः मैत्रेयी... 15

ब्रह्मवादिनी विदुषी गार्गी... 17

अथाह शक्ति की धनीः तपस्विनी शाण्डालिनी... 20

सती सावित्री... 20

माँ सीता की सतीत्व-भावना... 22

आर्त भक्त द्रौपदी... 23

दैवी शक्तियों से सम्पन्न गुणमंजरी देवी... 24

विवेक की धनीः कर्मावती... 26

वास्तविक सौन्दर्य.. 39

आत्मविद्या की धनीः फुलीबाई. 43

आनंदीबाई की दृढ़ श्रद्धा... 48

कर्माबाई की वात्सल्य-भक्ति.... 50

साध्वी सिरमा... 51

मुक्ताबाई का सर्वत्र विट्ठल-दर्शन.. 56

रतनबाई की गुरुभक्ति.... 58

ब्रह्मलीन श्री माँ महँगीबा... 60

मेरी माँ का दिव्य गुरुभाव.. 60

'प्रभु ! मुझे जाने दो....' 61

इच्छाओं से परेः माँ महँगीबा... 62

जीवन में कभी फरियाद नहीं..... 63

बीमारों के प्रति माँ की करूणा... 63

'कोई कार्य घृणित नहीं है....' 64

ऐसी माँ के लिए शोक किस बात का?. 64

अम्मा की गुरुनिष्ठा... 66

स्वावलंबन एवं परदुःखकातरता... 66

अम्मा में माँ यशोदा जैसा भाव.. 67

देने की दिव्य भावना... 67

गरीब कन्याओं के विवाह में मदद.. 68

अम्मा का उत्सव प्रेम.. 68

प्रत्येक वस्तु का सदुपयोग होना चाहिए.. 69

अहं से परे. 69

मीराबाई की गुरुभक्ति.... 70

राजकुमारी मल्लिका बनी तीर्थंकर मल्लियनाथ.. 72

दुर्गादास की वीर जननी... 73

कर्मनिष्ठ श्यामो... 74

शक्तिस्वरूपा माँ आनंदमयी... 75

अभाव का ही अभाव.. 79

माँ अंजना का सामर्थ्य.. 80

 

लज्जावासो भूषणं शुद्धशीलं पादक्षेपो धर्ममार्गे च यस्या।

नित्यं पत्युः सेवनं मिष्टवाणी धन्या सा स्त्री पूतयत्येव पृथ्वीम्।।

'जिस स्त्री का लज्जा ही वस्त्र तथा विशुद्ध भाव ही भूषण हो, धर्ममार्ग में जिसका प्रवेश हो, मधुर वाणी बोलने का जिसमें गुण हो वह पतिसेवा-परायण श्रेष्ठ नारी इस पृथ्वी को पवित्र करती है।' भगवान शंकर महर्षि गर्ग से कहते हैः 'जिस घर में सर्वगुणसंपन्ना नारी सुखपूर्वक निवास करती है, उस घर में लक्ष्मी निवास करती है। हे वत्स ! कोटि देवता भी उस घर को नहीं छोड़ते।'

नारी का हृदय कोमल और स्निग्ध हुआ करता है। इसी वजह से वह जगत की पालक, माता के स्वरूप में हमेशा स्वीकारी गयी है। 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' के गणेष खण्ड के 40 वें अध्याय में आया हैः

जनको जन्मदातृत्वात् पालनाच्च पिता स्मृतः।

गरीयान् जन्मदातुश्च योऽन्दाता पिता मुने।।

तयोः शतगुणे माता पूज्या मान्या च वन्दिता।

गर्भधारणपोषाभ्यां सा च ताभ्यां गरीयसी।।

'जन्मदाता और पालनकर्ता होने के कारण सब पूज्यों में पूज्यतम जनक और पिता कहलाता है। जन्मदाता से भी अन्नदाता पिता श्रेष्ठ है। इनसे भी सौगुनी श्रेष्ठ और वंदनीया माता है, क्योंकि वह गर्भधारण तथा पोषण करती है।'

इसलिए जननी एवं जन्मभूमि को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ बताते हुए कहा गया हैः जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

 

संयमनिष्ठ सुयशा

अमदावाद की घटित घटना हैः

विक्रम संवत् 17 वीं शताब्दी में कर्णावती (अमदावाद) में युवा राजा पुष्पसेन का राज्य था। जब उसकी सवारी निकलती तो बाजारों में लोग कतारबद्ध खड़े रहकर उसके दर्शन करते। जहाँ किसी सुन्दर युवती पर उसकी नजर पड़ती तब मंत्री को इशारा मिल जाता। रात्रि को वह सुन्दरी महल में पहुँचायी जाती। फिर भले किसी की कन्या हो अथवा दुल्हन !

एक गरीब कन्या, जिसके पिता का स्वर्गवास हो गया था। उसकी माँ चक्की चलाकर अपना और बेटी का पेट पालती थी। वह स्वयं भी कथा सुनती और अपनी पुत्री को भी सुनाती। हक और परिश्रम की कमाई, एकादशी का व्रत और भगवन्नाम-जप, इन सबके कारण 16 वर्षीया कन्या का शरीर बड़ा सुगठित था और रूप लावण्य का तो मानों, अंबार थी ! उसका नाम था सुयशा।

सबके साथ सुयशा भी पुष्पसेन को देखने गयी। सुयशा का ओज तेज और रूप लावण्य देखकर पुष्पसेन ने अपने मंत्री को इशारा किया। मंत्री ने कहाः "जो आज्ञा।"

मंत्री ने जाँच करवायी। पता चला कि उस कन्या का पिता है नहीं, माँ गरीब विधवा है। उसने सोचाः 'यह काम तो सरलता से हो जायेगा।'

मंत्री ने राजा से कहाः "राजन् ! लड़की को अकेले क्या लाना? उसकी माँ से साथ ले आयें। महल के पास एक कमरे में रहेंगी, झाड़ू-बुहारी करेंगी, आटा पीसेंगी। उनको केवल खाना देना है।"

मंत्री ने युक्ति से सुयशा की माँ को महल में नौकरी दिलवा दी। इसके बाद उस लड़की को महल में लाने की युक्तियाँ खोजी जाने लगीं। उसको बेशर्मी के वस्त्र दिये। जो वस्त्र कुकर्म करने के लिए वेश्याओं को पहनकर तैयार रहना होता है, म्रंत्री ने ऐसे वस्त्र भेजे और कहलवायाः "राजा साहब ने कहा हैः सुयशा ! ये वस्त्र पहन कर आओ। सुना है कि तुम भजन अच्छा गाती हो अतः आकर हमारा मनोरंजन करो।"

यह सुनकर सुयशा को धक्का लगा ! जो बूढ़ी दासी थी और ऐसे कुकर्मों में साथ देती थी, उसने सुयशा को समझाया कि "ये तो राजाधिराज हैं, पुष्पसेन महाराज हैं। महाराज के महल में जाना तेरे लिए सौभाग्य की बात है।" इस तरह उसने और भी बातें कहकर सुयशा को पटाया।

सुयशा कैसे कहती कि 'मैं भजन गाना नहीं जानती हूँ। मैं नहीं आऊँगी...' राज्य में रहती है और महल के अंदर माँ काम करती है। माँ ने भी कहाः "बेटी ! जा। यह वृद्धा कहती है तो जा।"

सुयशा ने कहाः "ठीक है। लेकिन कैसे भी करके ये बेशर्मी के वस्त्र पहनकर तो नहीं जाऊँगी।

सुयशा सीधे-सादे वस्त्र पहनकर राजमहल में गयी। उसे देखकर पुष्पसेन को धक्का लगा कि 'इसने मेरे भेजे हुए कपड़े नहीं पहने?' दासी ने कहाः "दूसरी बार समझा लूँगी, इस बार नहीं मानी।"

सुयशा का सुयश बाद में फैलेगा, अभी तो अधर्म का पहाड़ गिर रहा था.... धर्म की नन्हीं-सी मोमबत्ती पर अधर्म का पहाड़...! एक तरफ राजसत्ता की आँधी है तो दूसरी तरफ धर्मसत्ता की लौ ! जैसे रावण की राजसत्ता और विभीषण की धर्मसत्ता, दुर्योधन की राजसत्ता और विदुर की धर्मसत्ता ! हिरण्यकशिपु की राजसत्ता और प्रह्लाद की धर्मसत्ता ! धर्मसत्ता और राजसत्ता टकरायी। राजसत्ता चकनाचूर हो गयी और धर्मसत्ता की जय-जयकार हुई और हो रही है ! विक्रम राणा और मीरा.... मीरा की धर्म में दृढ़ता थी। राणा राजसत्ता के बल पर मीरा पर हावी होना चाहता था। दोनों टकराये और विक्रम राणा मीरा के चरणों में गिरा !

धर्मसत्ता दिखती तो सीधी सादी है लेकिन उसकी नींव पाताल में होती है और सनातन सत्य से जुड़ी होती है जबकि राजसत्ता दिखने में बड़ी आडम्बरवाली होती है लेकिन भीतर ढोल की पोल की तरह होती है।

राजदरबार के सेवक ने कहाः "राजाधिराज महाराज पुष्पसेन की जय हो ! हो जाय गाना शुरु।"

पुष्पसेनः "आज तो हम केवल सुयशा का गाना सुनेंगे।"

दासी ने कहाः "सुयशा ! गाओ, राजा स्वयं कह रहे हैं।"

राजा के साथी भी सुयशा का सौन्दर्य नेत्रों के द्वारा पीने लगे और राजा के हृदय में काम-विकार पनपने लगा। सुयशा राजा के दिये वस्त्र पहनकर नहीं आयी, फिर भी उसके शरीर का गठन और ओज-तेज बड़ा सुन्दर लग रहा था। राजा भी सुयशा को चेहरे को निहारे जा रहा था।

कन्या सुयशा ने मन-ही-मन प्रभु से प्रार्थना कीः 'प्रभु ! अब तुम्हीं रक्षा करना।'

आपको भी जब धर्म और अधर्म के बीच निर्णय करना पड़े तो धर्म के अधिष्ठानस्वरूप परमात्मा की शरण लेना। वे आपका मंगल ही करते हैं। उन्हींसे पूछना कि 'अब मैं क्या करूँ? अधर्म के आगे झुकना मत। परमात्मा की शरण जाना।

दासी ने सुयशा से कहाः "गाओ, संकोच न करो, देर न करो। राजा नाराज होंगे, गाओ।"

परमात्मा का स्मरण करके सुयशा ने एक राग छेड़ाः

कब सुमिरोगे राम? साधो ! कब सुमिरोगे राम?

अब तुम कब सुमिरोगे राम?

बालपन सब खेल गँवायो, यौवन में काम।

साधो ! कब सुमिरोगे राम? कब सुमिरोगे राम?

पुष्पसेन के मुँह पर मानों, थप्पड़ लगा।

सुयशा ने आगे गायाः

हाथ पाँव जब कंपन लागे, निकल जायेंगे प्राण।

कब सुमिरोगे राम? साधो ! कब सुमिरोगे राम?

झूठी काया झूठी माया, आखिर मौत निशान।

कहत कबीर सुनो भई साधो, जीव दो दिन का मेहमान।

कब सुमिरोगे राम? साधो ! कब सुमिरोगे राम?

भावयुक्त भजन से सुयशा का हृदय तो राम रस से सराबोर हो गया लेकिन पुष्पसेन के रंग में भंग पड़ गया। वह हाथ मसलता ही रह गया। बोलाः 'ठीक है, फिर देखता हूँ।'

सुयशा ने विदा ली। पुष्पसेन ने मंत्रियों से सलाह ली और उपाय खोज लिया कि 'अब होली आ रही है उस होलिकोत्सव में इसको बुलाकर इसके सौन्दर्य का पान करेंगे।'

राजा ने होली पर सुयशा को फिर से वस्त्र भिजवाये और दासी से कहाः "कैसे भी करके सुयशा को यही वस्त्र पहनाकर लाना है।"

दासी ने बीसों ऊँगिलयों का जोर लगाया। माँ ने भी कहाः "बेटी ! भगवान तेरी रक्षा करेंगे। मुझे विश्वास है कि तू नीच कर्म करने वाली लड़कियों जैसा न करेगी। तू भगवान की, गुरु की स्मृति रखना। भगवान तेरा कल्याण करें।"

महल में जाते समय इस बार सुयशा ने कपड़े तो पहन लिये लेकिन लाज ढाँकने के लिए ऊपर एक मोटी शाल ओढ़ ली। उसे देखकर पुष्पसेन को धक्का तो लगा, लेकिन यह भी हुआ कि 'चलो, कपड़े तो मेरे पहनकर आयी है।' राजा ऐसी-वैसी युवतियों से होली खेलते-खेलते सुयशा की ओर आया और उसकी शाल खींची। 'हे राम' करके सुयशा आवाज करती हुई भागी। भागते-भागते माँ की गोद में आ गिरी। "माँ, माँ ! मेरी इज्जत खतरे में है। जो प्रजा का पालक है वही मेरे धर्म को नष्ट करना चाहता है।"

माँ: "बेटी ! आग लगे इस नौकरी को।" माँ और बेटी शोक मना रहे हैं। इधर राजा बौखला गया कि 'मेरा अपमान....! मैं देखता हूँ अब वह कैसे जीवित रहती है?' उसने अपने एक खूँखार आदमी कालू मियाँ को बुलवाया और कहाः "कालू ! तुझे स्वर्ग की उस परी सुयशा का खात्मा करना है। आज तक तुझे जिस-जिस व्यक्ति को खत्म करने को कहा है, तू करके आया है। यह तो तेरे आगे मच्छर है मच्छर है ! कालू ! तू मेरा खास आदमी है। मैं तेरा मुँह मोतियों से भर दूँगा। कैसे भी करके सुयशा को उसके राम के पास पहुँचा दे।"

कालू ने सोचाः 'उसे कहाँ पर मार देना ठीक होगा?.... रोज प्रभात के अँधेरे में साबरमती नदी में स्नान करने जाती है.... बस, नदी में गला दबोचा और काम खत्म...'जय साबरमती' कर देंगे।'

कालू के लिए तो बायें हाथ का खेल था लेकिन सुयशा का इष्ट भी मजबूत था। जब व्यक्ति का इष्ट मजबूत होता है तो उसका अनिष्ट नहीं हो सकता।

मैं सबको सलाह देता हूँ कि आप जप और व्रत करके अपना इष्ट इतना मजबूत करो कि बड़ी-से-बड़ी राजसत्ता भी आपका अनिष्ट न कर सके। अनिष्ट करने वाले के छक्के छूट जायें और वे भी आपके इष्ट के चरणों में आ जायें... ऐसी शक्ति आपके पास है।

कालू सोचता हैः 'प्रभात के अँधेरे में साबरमती के किनारे... जरा सा गला दबोचना है, बस। छुरा मारने की जरूरत ही नहीं है। अगर चिल्लायी और जरूरत पड़ी तो गले में जरा-सा छुरा भौंककर 'जय साबरमती' करके रवाना कर दूँगा। जब राजा अपना है तो पुलिस की ऐसी-तैसी... पुलिस क्या कर सकती है? पुलिस के अधिकारी तो जानते हैं कि राजा का आदमी है।'

कालू ने उसके आने-जाने के समय की जानकारी कर ली। वह एक पेड़ की ओट में छुपकर खड़ा हो गया। ज्यों ही सुयशा आयी और कालू ने झपटना चाहा त्यों ही उसको एक की जगह पर दो सुयशा दिखाई दीं। 'कौन सी सच्ची? ये क्या? दो कैसे? तीन दिन से सारा सर्वेक्षण किया, आज दो एक साथ ! खैर, देखता हूँ, क्या बात है? अभी तो दोनों को नहाने दो....' नहाकर वापस जाते समय उसे एक ही दिखी तब कालू हाथ मसलता है कि 'वह मेरा भ्रम था।'

वह ऐसा सोचकर जहाँ शिवलिंग था उसी के पास वाले पेड़ पर चढ़ गया कि 'वह यहाँ आयेगी अपने बाप को पानी चढ़ाने... तब 'या अल्लाह' करके उस पर कूदूँगा और उसका काम तमाम कर दूँगा।'

उस पेड़ से लगा हुआ बिल्वपत्र का भी एक पेड़ था। सुयशा साबरमती में नहाकर शिवलिंग पर पानी चढ़ाने को आयी। हलचल से दो-चार बिल्वपत्र गिर पड़े। सुयशा बोलीः "हे प्रभु ! हे महादेव ! सुबह-सुबह ये जिस बिल्वपत्र जिस निमित्त से गिरे हैं, आज के स्नान और दर्शन का फल मैं उसके कल्याण के निमित्त अर्पण करती हूँ। मुझे आपका सुमिरन करके संसार की चीज नहीं पानी, मुझे तो केवल आपकी भक्ति ही पानी है।"

सुयशा का संकल्प और उस क्रूर-कातिल के हृदय को बदलने की भगवान की अनोखी लीला !

कालू छलाँग मारकर उतरा तो सही लेकिन गला दबोचने के लिए नहीं। कालू ने कहाः "लड़की ! पुष्पसेन ने तेरी हत्या करने का काम मुझे सौंपा था। मैं खुदा की कसम खाकर कहता हूँ कि मैं तेरी हत्या के लिए छुरा तैयार करके आया था लेकिन तू... अनदेखे घातक का भी कल्याण करना चाहती है ! ऐसी हिन्दू कन्या को मारकर मैं खुदा को क्या मुँह दिखाऊँगा? इसलिए आज से तू मेरी बहन है। तू तेरे भैया की बात मान और यहाँ से भाग जा। इससे तेरी भी रक्षा होगी और मेरी भी। जा, ये भोले बाबा तेरी रक्षा करेंगे। जिन भोले बाबा तेरी रक्षा करेंगे, जा, जल्दी भाग जा...."

सुयशा को कालू मियाँ के द्वारा मानों, उसका इष्ट ही कुछ प्रेरणा दे रहा था। सुयशा भागती-भागती बहुत दूर निकल गयी।

जब कालू को हुआ कि 'अब यह नहीं लौटेगी...' तब वह नाटक करता हुआ राजा के पास पहुँचाः "राजन ! आपका काम हो गया वह तो मच्छर थी... जरा सा गला दबाते ही 'मे ऽऽऽ' करती रवाना हो गयी।"

राजा ने कालू को ढेर सारी अशर्फियाँ दीं। कालू उन्हें लेकर विधवा के पास गया और उसको सारी घटना बताते हुए कहाः "माँ ! मैंने तेरी बेटी को अपनी बहन माना है। मैं क्रूर, कामी, पापी था लेकिन उसने मेरा दिल बदल दिया। अब तू नाटक कर की हाय, मेरी बेटी मर गयी... मर गयी..' इससे तू भी बचेगी, तेरी बेटी भी बचेगी और मैं भी बचूँगा।

तेरी बेटी की इज्जत लूटने का षड्यंत्र था, उसमें तेरी बेटी नहीं फँसी तो उसकी हत्या करने का काम मुझे सौंपा था। तेरी बेटी ने महादेव से प्रार्थना की कि 'जिस निमित्त ये बिल्वपत्र गिरे हैं उसका भी कल्याण हो, मंगल हो।' माँ ! मेरा दिल बदल गया है। तेरी बेटी मेरी बहन है। तेरा यह खूँखार बेटा तुझे प्रार्थना करता है कि तू नाटक कर लेः 'हाय रेऽऽऽ ! मेरी बेटी मर गयी। वह अब मुझे नहीं मिलेगी, नदी में डूब गयी...' ऐसा करके तू भी यहाँ से भाग जा।"

सुयशा की माँ भाग निकली। उस कामी राजा ने सोचा कि मेरे राज्य की एक लड़की... मेरी अवज्ञा करे ! अच्छा हुआ मर गयी ! उसकी माँ भी अब ठोकरें खाती रहेगी... अब सुमरती रहे वही राम ! कब सुमिरोगे राम? साधो ! कब सुमिरोगे राम? झूठी काया झूठी माया आखिर मौत निशान ! कब सुमिरोगे राम? साधो ! सब सुमिरोगे राम? हा हा हा हा ऽऽऽ...'

मजाक-मजाक में गाते-गाते भी यह भजन उसके अचेतन मन में गहरा उतर गया... कब सुमिरोगे राम?

उधर सुयशा को भागते-भागते रास्ते में माँ काली का एक छोटा-सा मंदिर मिला। उसने मंदिर में जाकर प्रणाम किया। वहाँ की पुजारिन गौतमी ने देखा कि क्या रूप है, क्या सौन्दर्य है और कितनी नम्रता !' उसने पूछाः "बेटी ! कहाँ से आयी हो?"

सुयशा ने देखा कि एक माँ तो छूटी, अब दूसरी माँ बड़े प्यार से पूछ रही है... सुयशा रो पड़ी और बोलीः "मेरा कोई नहीं है। अपने प्राण बचाने के लिए मुझे भागना पड़ा।" ऐसा कहकर सुयशा ने सब बता दिया।

गौतमीः "ओ हो ऽऽऽ... मुझे संतान नहीं थी। मेरे भोले बाबा ने, मेरी काली माँ ने मेरे घर 16 वर्ष की पुत्री भेज दी।" बेटी... बेटी ! कहकर गौतमी ने सुयशा को गले लगा लिया और अपने पति कैलाशनाथ को बताया कि "आज हमें भोलानाथ ने 16 वर्ष की सुन्दरी कन्या दी है। कितनी पवित्र है। कितनी भक्ति भाववाली है।"

कैलाशनाथः "गौतमी ! पुत्री की तरह इसका लालन-पालन करना, इसकी रक्षा करना। अगर इसकी मर्जी होगी तो इसका विवाह करेंगे नहीं तो यहीं रहकर भजन करे।"

जो भगवान का भजन करते हैं उनको विघ्न डालने से पाप लगता है।

सुयशा वहीं रहने लगी। वहाँ एक साधु आता था। साधु भी बड़ा विचित्र था। लोग उसे 'पागलबाबा' कहते थे। पागलबाबा ने कन्या को देखा तो बोल पड़ेः हूँऽऽऽ..."

गौतमी घबरायी कि "एक शिकंजे से निकलकर कहीं दूसरे में....? पागलबाबा कहीं उसे फँसा न दे.... हे भगवान ! इसकी रक्षा करना।" स्त्री का सबसे बड़ा शत्रु है उसका सौन्दर्य एवं श्रृंगार दूसरा है उसकी असावधानी। सुयशा श्रृंगार तो करती नहीं थी, असावधान भी नहीं थी लेकिन सुन्दर थी।

गौतमी ने अपने पति को बुलाकर कहाः

"देखो, ये बाबा बार-बार अपनी बेटी की तरफ देख रहे हैं।"

कैलाशनाथ ने भी देखा। बाबा ने लड़की को बुलाकर पूछाः "क्या नाम है?"

"सुयशा।"

"बहुत सुन्दर हो, बड़ी खूबसूरत हो।"

पुजारिन और पुजारी घबराये।

बाबा ने फिर कहाः "बड़ी खूबसूरत है।"

कैलाशनाथः "महाराज ! क्या है?"

"बड़ी खूबसूरत है।"

"महाराज आप तो संत आदमी हैं।"

"तभी तो कहता हूँ कि बड़ी खूबसूरत है, बड़ी होनहार है। मेरी होगी तू?"

पुजारिन-पुजारी और घबराये कि 'बाबा क्या कह रहे हैं? पागल बाबा कभी कुछ कहते हैं वह सत्य भी हो जाता है। इनसे बचकर रहना चाहिए। क्या पता कहीं....'

कैलाशनाथः "महाराज ! क्या बोल रहे हैं।"

बाबा ने सुयशा से फिर पूछाः "तू मेरी होगी?"

सुयशाः "बाबा मैं समझी नहीं।"

"तू मेरी साधिका बनेगी? मेरे रास्ते चलेगी?"

"कौन-सा रास्ता?"

"अभी दिखाता हूँ। माँ के सामने एकटक देख.... माँ ! तेरे रास्ते ले जा रहा हूँ, चलती नहीं है तो तू समझा माँ, माँ !"

लड़की को लगा कि 'ये सचमुच पागल हैं।'

'चल' करके दृष्टि से ही लड़की पर शक्तिपात कर दिया। सुयशा के शरीर में स्पंदन होने लगा, हास्य आदि अष्टसात्त्विक भाव उभरने लगे।

पागलबाबा ने कैलाशनाथ और गौतमी से कहाः "यह बड़ी खूबसूरत आत्मा है। इसके बाह्य सौन्दर्य पर राजा मोहित हो गया था। यह प्राण बचाकर आयी है और बच पायी है। तुम्हारी बेटी है तो मेरी भी तो बेटी है। तुम चिन्ता न करो। इसको घर पर अलग कमरे में रहने दो। उस कमरे में और कोई न जाय। इसकी थोड़ी साधना होने दो फिर देखो क्या-क्या होता है? इसकी सुषुप्त शक्तियों को जगने दो। बाहर से पागल दिखता हूँ लेकिन 'गल' को पाकर घूमता हूँ, बच्चे।"

"महाराज आप इतने सामर्थ्य के धनी हैं यह हमें पता नहीं था। निगाहमात्र से आपने संप्रेक्षण शक्ति का संचार कर दिया।"

अब तो सुयशा का ध्यान लगने लगा। कभी हँसती है, कभी रोती है। कभी दिव्य अनुभव होते हैं। कभी प्रकाश दिखता है, कभी अजपा जप चलता है कभी प्राणायाम से नाड़ी-शोधन होता है। कुछ ही दिनों में मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर केन्द्र जाग्रत हो गये।

मूलाधार केन्द्र जागृत हो तो काम राम में बदलता है, क्रोध क्षमा में बदलता है, भय निर्भयता में बदलता है, घृणा प्रेम में बदलती है। स्वाधिष्ठान केन्द्र जागृत होता है तो कई सिद्धियाँ आती हैं। मणिपुर केन्द्र जाग्रत हो तो अपढ़े, अनसुने शास्त्र को जरा सा देखें तो उस पर व्याख्या करने का सामर्थ्य आ जाता है।

आपके से ये सभी केन्द्र अभी सुषुप्त हैं। अगर जग जायें तो आपके जीवन में भी यह चमक आ सकती है। हम स्कूली विद्या तो केवल तीसरी कक्षा तक पढ़े हैं लेकिन ये केन्द्र खुलने के बाद देखो, लाखों-करोड़ों लोग सत्संग सुन रहे हैं, खूब लाभान्वित हो रहे हैं। इन केन्द्रों में बड़ा खजाना भरा पड़ा है।

इस तरह दिन बीते..... सप्ताह बीते.. महीने बीते। सुयशा की साधना बढ़ती गयी.... अब तो वह बोलती है तो लोगों के हृदयों को शांति मिलती है। सुयशा का यश फैला.... यश फैलते-फैलते साबरमती के जिस पार से वह आयी थी, उस पार पहुँचा। लोग उसके पास आते-जाते रहे..... एक दिन कालू मियाँ ने पूछाः "आप लोग इधर से उधर उस पार जाते हो और एक दो दिन के बाद आते हो क्या बात है?"

लोगों ने बतायाः "उस पार माँ भद्रकाली का मंदिर है, शिवजी का मंदिर है। वहाँ पागलबाबा ने किसी लड़की से कहाः 'तू तो बहुत सुन्दर है, संयमी है।' उस पर कृपा कर दी ! अब वह जो बोलती है उसे सुनकर हमें बड़ी शांति मिलती है, बड़ा आनंद मिलता है।"

"अच्छा, ऐसी लड़की है?"

"उसको लड़की-लड़की मत कहो कालू मियाँ ! लोग उसको माता जी कहते हैं। पुजारिन और पुजारी भी उसको 'माताजी-माताजी कहते हैं। क्या पता कहाँ से वह स्वर्ग को देवी आयी है?"

"अच्छा तो अपन भी चलते हैं।"

कालू मियाँ ने आकर देखा तो.... "जिस माताजी को लोग मत्था टेक रहे हैं वह वही सुयशा है, जिसको मारने के लिए मैं गया था और जिसने मेरा हृदय परिवर्तित कर दिया था।"

जानते हुए भी कालू मियाँ अनजान होकर रहा, उसके हृदय को बड़ी शांति मिली। इधर पुष्पसेन को मानसिक खिन्नता, अशांति और उद्वेग हो गया। भक्त को कोई सताता है तो उसका पुण्य नष्ट हो जाता है, इष्ट कमजोर हो जाता है और देर-सवेर उसका अनिष्ट होना शुरु हो जाता है।

संत सताये तीनों जायें तेज, बल और वंश।

पुष्पसेन को मस्तिष्क का बुखार आ गया। उसके दिमाग में सुयशा की वे ही पंक्तियाँ घूमने लगीं-

कब सुमिरोगे राम? साधो ! कब सुमिरोगे राम....

उन पंक्तियों को गाते-गाते वह रो पड़ा। हकीम, वैद्य सबने हाथ धो डाले और कहाः "राजन ! अब हमारे वश की बात नहीं है।"

कालू मियाँ को हुआः 'यह चोट जहाँ से लगी है वहीं से ठीक हो सकती है।' कालू मिलने गया और पूछाः "राजन् ! क्या बात है?"

"कालू ! कालू ! वह स्वर्ग की परी कितना सुन्दर गाती थी। मैंने उसकी हत्या करवा दी। मैं अब किसको बताऊँ? कालू ! अब मैं ठीक नहीं हो सकता हूँ। कालू ! मेरे से बहुत बड़ी गलती हो गयी !"

"राजन ! अगर आप ठीक हो जायें तो?"

"अब नहीं हो सकता। मैंने उसकी हत्या करवा दी है, कालू उसने कितनी सुन्दर बात कही थीः

झूठी काया झूठी माया आखिर मौत निशान !

कहत कबीर सुनो भई साधो, जीव दो दिन का मेहमान।

कब सुमिरोगे राम? साधो ! कब सुमिरोगे राम?

और मैंने उसकी हत्या करवा दी। कालू ! मेरा दिल जल रहा है। कर्म करते समय पता नहीं चलता, कालू ! बाद में अन्दर की लानत से जीव तप मरता है। कर्म करते समय यदि यह विचार किया होता तो ऐसा नहीं होता। कालू ! मैंने कितने पाप किये हैं।"

कालू का हृदय पसीजा की इस 'राजा को अगर उस देवी की कृपा मिल जाये तो ठीक हो सकता है। वैसे यह राज्य तो अच्छा चलाना जानता है, दबंग है। पापकर्म के कारण इसको जो दोष लगा है वह अगर धुल जाये तो....'

कालू बोलाः "राजन् ! अगर वह लड़की कहीं मिल जाये तो?"

"कैसे मिलेगी?"

"जीवनदान मिले तो मैं बताऊँ। अब वह लड़की, लड़की नहीं रही। पता नहीं, साबरमती माता ने उसको कैसे गोद में ले लिया और वह जोगन बन गयी है। लोग उसके कदमों में अपना सिर झुकाते हैं।"

"हैं.... क्या बोलता है? जोगन बन गयी है? वह मरी नहीं है?"

"नहीं।"

"तूने तो कहा था मर गयी?"

"मैंने तो गला दबाया और समझा मर गयी होगी लेकिन आगे निकल गयी, कहीं चली गयी और किसी साधु बाबा की मेहरबानी हो गयी और मेरे को लगता है कि रूपये में 15 आना पक्की बात है कि वही सुयशा है। जोगन का और उसका रूप मिलता है।"

"कालू ! मुझे ले चल। मैं उसके कदमों में अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलना चाहता हूँ। कालू ! कालू!"

राज पहुँचा और उसने पश्चात्ताप के आँसुओं से सुयशा के चरण धो दिये। सुयशा ने कहाः "भैया ! इन्सान गलतियों का घर है, भगवान तुम्हारा मंगल करें।"

पुष्पसेनः "देवी ! मेरा मंगल भगवान कैसे करेंगे? भगवान मंगल भी करेंगे तो किसी गुरु के द्वारा। देवी ! तू मेरी गुरु है, मैं तेरी शरण आया हूँ।"

राजा पुष्पसेन सुयशा के चरणों में गिरा। वही सुयशा का प्रथम शिष्य बना। पुष्पसेन को सुयशा ने गुरुमंत्र की दीक्षा दी। सुयशा की कृपा पाकर पुष्पसेन भी धनभागी हुआ और कालू भी ! दूसरे लोग भी धनभागी हुए। 17वीं शताब्दी का कर्णावती शहर जिसको आज अमदावाद बोलते हैं, वहाँ की यह एक ऐतिहासिक घटना है, सत्य कथा है।

अगर उस 16 वर्षीय कन्या में धर्म के संस्कार नहीं होते तो नाच-गान करके राजा का थोड़ा प्यार पाकर स्वयं भी नरक में पच मरती और राजा भी पच मरता। लेकिन उस कन्या ने संयम रखा तो आज उसका शरीर तो नहीं है लेकिन सुयशा का सुयश यह प्रेरणा जरूर देता है कि आज की कन्याएँ भी अपने ओज-तेज और संयम की रक्षा करके, अपने ईश्वरीय प्रभाव को जगाकर महान आत्मा हो सकती हैं।

हमारे देश की कन्याएँ परदेशी भोगी कन्याओं का अनुकरण क्यों करें? लाली-लिपस्टिक लगायी... 'बॉयकट' बाल कटवाये... शराब-सिगरेट पी.... नाचा-गाया... धत् तेरे की ! यह नारी स्वातंत्र्य है? नहीं, यह तो नारी का शोषण है। नारी स्वातंत्र्य के नाम पर नारी को कुटिल कामियों की भोग्या बनाया जा रहा है।

नारी 'स्व' के तंत्र हो, उसको आत्मिक सुख मिले, आत्मिक ओज बढ़े, आत्मिक बल बढ़े, ताकि वह स्वयं को महान बने ही, साथ ही औरों को भी महान बनने की प्रेरणा दे सके... अंतरात्मा का, स्व-स्वरूप का सुख मिले, स्व-स्वरूप का ज्ञान मिले, स्व-स्वरूप का सामर्थ्य मिले तभी तो नारी स्वतंत्र है। परपुरुष से पटायी जाय तो स्वतंत्रता कैसी? विषय विलास की पुतली बनायी जाये तो स्वतन्त्रता कैसी?

कब सुमिरोगे राम?.... संत कबीर के इस भजन ने सुयशा को इतना महान बना दिया कि राजा का तो मंगल किया ही... साथ ही कालू जैसे कातिल हृदय भी परिवर्तित कर दिया.. और न जाने कितनों को ईश्वर की ओर लगाया होगा, हम लोग गिनती नहीं कर सकते। जो ईश्वर के रास्ते चलता है उसके द्वारा कई लोग अच्छे बनते हैं और जो बुरे रास्ते जाता है उसके द्वारा कइयों का पतन होता है।

आप सभी सदभागी हैं कि अच्छे रास्ते चलने की रूचि भगवान ने जगायी। थोड़ा-बहुत नियम ले लो, रोज थोड़ा जप करो, ध्यान करे, मौन का आश्रय लो, एकादशी का व्रत करो.... आपकी भी सुषुप्त शक्तियाँ जाग्रत कर दें, ऐसे किसी सत्पुरुष का सहयोग लो और लग जाओ। फिर तो आप भी ईश्वरीय पथ के पथिक बन जायेंगे, महान परमेश्वरीय सुख को पाकर धन्य-धन्य हो जायेंगे।

(इस प्रेरणापद सत्संग कथा की ऑडियो कैसेट एवं वी.सी.डी. - 'सुयशाः कब सुमिरोगे राम?' नाम से उपलब्ध है, जो अति लोकप्रिय हो चुकी है। आप इसे अवश्य सुनें देखें। यह सभी संत श्री आसारामजी आश्रमों एवं समितियों के सेवा केन्द्रों पर उपलब्ध है।)

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अनुक्रम

अदभुत आभासम्पन्न रानी कलावती

'स्कन्द पुराण' के ब्रह्मोत्तर खंड में कथा आती है कि 'काशीनरेश की कन्या कलावती के साथ मथुरा के दाशार्ह नामक राजा का विवाह हुआ। विवाह के बाद राजा ने रानी को अपने पलंग पर बुलाया लेकिन उसने इन्कार कर दिया। तब राजा ने बल प्रयोग की धमकी दी। रानी ने कहाः "स्त्री के साथ संसार-व्यवहार करना हो तो बलप्रयोग नहीं, स्नेह प्रयोग करना चाहिए। नाथ ! मैं भले आपकी रानी हूँ, लेकिन आप मेरे साथ बलप्रयोग करके संसार-व्यवहार न करें।"

लेकिन वह राजा था। रानी की बात सुनी-अनसुनी करके नजदीक गया। ज्यों ही उसने रानी का स्पर्श किया, त्यों ही उसे विद्युत जैसा करंट लगा। उसका स्पर्श करते ही राजा का अंग-अंग जलने लगा। वह दूर हटा और बोलाः "क्या बात है? तुम इतनी सुन्दर और कोमल हो फिर भी तुम्हारे शरीर के स्पर्श से मुझे जलन होने लगी?"

रानीः "नाथ ! मैंने बाल्यकाल में दुर्वासा ऋषि से शिवमंत्र लिया था। उसे जपने से मेरी सात्त्विक ऊर्जा का विकास हुआ है, इसीलिए मैं आपके नजदीक नहीं आती थी। जैसे अंधेरी रात और दोपहर एक साथ नहीं रहते, वैसे ही आपने शराब पीनेवाली वेश्याओं के साथ और कुलटाओं के साथ जो संसार-भोग भोगे हैं उससे आपके पाप के कण आपके शरीर, मन तथा बुद्धि में अधिक हैं और मैंने जप किया है उसके कारण मेरे शरीर में ओज, तेज व आध्यात्मिक कण अधिक हैं। इसीलिए मैं आपसे थोड़ी दूर रहकर प्रार्थना करती थी। आप बुद्धिमान हैं, बलवान हैं, यशस्वी हैं और धर्म की बात भी आपने सुन रखी है, लेकिन आपने शराब पीनेवाली वेश्याओं और कुलटाओं के साथ भोग भी भोगे हैं।"

राजाः "तुम्हें इस बात का पता कैसे चल गया?"

रानीः "नाथ ! हृदय शुद्ध होता है तो यह ख्याल आ जाता है।"

राजा प्रभावित हुआ और रानी से बोलाः "तुम मुझे भी भगवान शिव का वह मंत्र दे दो।"

रानीः "आप मेरे पति हैं, मैं आपकी गुरु नहीं बन सकती। आप और हम गर्गाचार्य महाराज के पास चलें।"

दोनों गर्गाचार्य के पास गये एवं उनसे प्रार्थना की। गर्गाचार्य ने उन्हें स्नान आदि से पवित्र होने के लिए कहा और यमुना तट पर अपने शिवस्वरूप के ध्यान में बैठकर उन्हें निगाह से पावन किया, फिर शिवमंत्र देकर शांभवी दीक्षा से राजा के ऊपर शक्तिपात किया।

कथा कहती है कि देखते ही देखते राजा के शरीर से कोटि-कोटि कौए निकल-निकल कर पलायन करने लगे। काले कौए अर्थात् तुच्छ परमाणु। काले कर्मों के तुच्छ परमाणु करोड़ों की संख्या में सूक्ष्मदृष्टि के द्रष्टाओं द्वारा देखे गये। सच्चे संतों के चरणों में बैठकर दीक्षा लेने वाले सभी साधकों को इस प्रकार के लाभ होते ही हैं। मन, बुद्धि में पड़े हुए तुच्छ कुसंस्कार भी मिटते हैं। आत्म-परमात्मप्राप्ति की योग्यता भी निखरती है। व्यक्तिगत जीवन में सुख शांति, सामाजिक जीवन में सम्मान मिलता है तथा मन-बुद्धि में सुहावने संस्कार भी पड़ते हैं और भी अनगिनत लाभ होते हैं जो निगुरे, मनमुख लोगों की कल्पना में भी नहीं आ सकते। मंत्रदीक्षा के प्रभाव से हमारे पाँचों शरीरों के कुसंस्कार व काले कर्मों के परमाणु क्षीण होते जाते हैं। थोड़ी ही देर में राजा निर्भार हो गया एवं भीतर के सुख से भर गया।

शुभ-अशुभ, हानिकारक एवं सहायक जीवाणु हमारे शरीर में रहते हैं। जैसे पानी का गिलास होंठ पर रखकर वापस लायें तो उस पर लाखों जीवाणु पाये जाते हैं यह वैज्ञानिक अभी बोलते हैं। लेकिन शास्त्रों ने तो लाखों वर्ष पहले ही कह दियाः

सुमति-कुमति सबके उर रहहिं।

जब आपके अंदर अच्छे विचार रहते हैं तब आप अच्छे काम करते हैं और जब भी हलके विचार आ जाते हैं तो आप न चाहते हुए भी गलत कर बैठते हैं। गलत करने वाला कई बार अच्छा भी करता है तो मानना पड़ेगा कि मनुष्य-शरीर पुण्य और पाप का मिश्रण है। आपका अंतःकरण शुभ और अशुभ का मिश्रण है। जब आप लापरवाह होते हैं तो अशुभ बढ़ जाते हैं अतः पुरुषार्थ यह करना है कि अशुभ क्षीण होता जाय और शुभ पराकाष्ठा तक परमात्म-प्राप्ति तक पहुँच जाय।

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अनुक्रम

लोग घरबार छोड़कर साधना करने के लिए साधु बनते हैं। घर में रहते हुए, गृहस्थधर्म निभाते हुए नारी ऐसी उग्र साधना कर सकती है कि अन्य साधुओं की साधना उसके सामने फीकी पड़ जाय। ऐसी देवियों के पास एक पतिव्रता-धर्म ही ऐसा अमोघ शस्त्र है, जिसके सम्मुख बड़े-बड़े वीरों के शस्त्र भी कुण्ठित हो जाते हैं। पतिव्रता स्त्री अनायास ही योगियों के समान सिद्धि प्राप्त कर लेती है, इसमें किंचित् मात्र भी संदेह नहीं है।

 

उत्तम जिज्ञासुः मैत्रेयी

महर्षि याज्ञवल्क्यजी की दो पत्नियाँ थीः मैत्रेयी और कात्यायनी। मैत्रेयी ज्येष्ठ थी। कात्यायनी की प्रज्ञा सामान्य स्त्रियों जैसी ही थी किंतु मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी।

एक दिन याज्ञवाल्क्यजी ने अपनी दोनों पत्नियों को अपने पास बुलाया और कहाः "मेरा विचार अब संन्यास लेने का है। अतः इस स्थान को छोड़कर मैं अन्यत्र चला जाऊँगा। इसके लिए तुम लोगों की अनुमति लेना आवश्यक है। साथ ही, मैं यह भी चाहता हूँ कि घर में जो कुछ धन-दौलत है उसे तुम दोनों में बराबर-बराबर बाँट दूँ ताकि मेरे चले जाने के बाद इसको लेकर आपसी विवाद न हो।"

यह सुनकर कात्यायनी तो चुप रही किंतु मैत्रेयी ने पूछाः "भगवन् ! यदि यह धन-धान्य से परिपूर्ण सारी पृथ्वी केवल मेरे ही अधिकार में आ जाय तो क्या मैं उससे किसी प्रकार अमर हो सकती हूँ?"

याज्ञवल्क्यजी ने कहाः "नहीं। भोग-सामग्रियों से संपन्न मनुष्यों का जैसा जीवन होता है, वैसा ही तुम्हारा भी जीवन हो जायेगा। धन से कोई अमर हो जाय, उसे अमरत्व की प्राप्ति हो जाय, यह कदापि संभव नहीं है।"

तब मैत्रेयी ने कहाः "भगवन् ! जिससे मैं अमर नहीं हो सकती उसे लेकर क्या करूँगी? यदि धन से ही वास्तविक सुख मिलता तो आप उसे छोड़कर एकान्त अरण्य में क्यों जाते? आप ऐसी कोई वस्तु अवश्य जानते हैं, जिसके सामने इस धन एवं गृहस्थी का सारा सुख तुच्छ प्रतीत होता है। अतः मैं भी उसी को जानना चाहती हूँ। यदेव भगवान वेद तदेव मे ब्रूहि। केवल जिस वस्तु को आप श्रीमान अमरत्व का साधन जानते हैं, उसी का मुझे उपदेश करें।"

मैत्रेयी की यह जिज्ञासापूर्ण बात सुनकर याज्ञवल्क्यजी को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने मैत्रेयी की प्रशंसा करते हुए कहाः

"धन्य मैत्रेयी ! धन्य ! तुम पहले भी मुझे बहुत प्रिय थी और इस समय भी तुम्हारे मुख से यह प्रिय वचन ही निकला है। अतः आओ, मेरे समीप बैठो। मैं तुम्हें तत्त्व का उपदेश करता हूँ। उसे सुनकर तुम उसका मनन और निदिध्यासन करो। मैं जो कुछ कहूँ, उस पर स्वयं भी विचार करके उसे हृदय में धारण करो।"

इस प्रकार कहकर महर्षि याज्ञवल्क्यजी ने उपदेश देना आरंभ कियाः "मैत्रेयी ! तुम जानती हो कि स्त्री को पति और पति को स्त्री क्यों प्रिय है? इस रहस्य पर कभी विचार किया है? पति इसलिए प्रिय नहीं है कि वह पति है, बल्कि इसलिए प्रिय है कि वह अपने को संतोष देता है, अपने काम आता है। इसी प्रकार पति को स्त्री भी इसलिए प्रिय नहीं होती कि वह स्त्री है, अपितु इसलिए प्रिय होती है कि उससे स्वयं को सुख मिलता। इसी न्याय से पुत्र, धन, ब्राह्मण, क्षत्रिय, लोक, देवता, समस्त प्राणी अथवा संसार के संपूर्ण पदार्थ भी आत्मा के लिए प्रिय होने से ही प्रिय जान पड़ते हैं। अतः सबसे प्रियतम वस्तु क्या है? अपना आत्मा।

आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो

निदिध्यासितव्यो मैत्रेयी आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन

मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम्।

मैत्रेयी ! तुम्हें आत्मा की ही दर्शन, श्रवण, मनन और निदिध्यासन करना चाहिए। उसी के दर्शन, श्रवण, मनन और यथार्थज्ञान से सब कुछ ज्ञात हो जाता है।"

(बृहदारण्यक उपनिषद् 4-6)

 

तदनंतर महर्षि याज्ञवल्क्यजी ने भिन्न-भिन्न दृष्टान्तों और युक्तियों के द्वारा ब्रह्मज्ञान का गूढ़ उपदेश देते हुए कहाः "जहाँ अज्ञानावस्था में द्वैत होता है, वहीं अन्य अन्य को सूँघता है, अन्य अन्य का रसास्वादन करता है, अन्य अन्य का स्पर्श करता है, अन्य अन्य का अभिवादन करता है, अन्य अन्य का मनन करता है और अन्य अन्य को विशेष रूप से जानता है। किंतु जिसके लिए सब कुछ आत्मा ही हो गया है, वह किसके द्वारा किसे देखे? किसके द्वारा किसे सुने? किसके द्वारा किसे सूँघे? किसके द्वारा किसका रसास्वादन करे? किसके द्वारा किसका स्पर्श करे? किसके द्वारा किसका अभिवादन करे और किसके द्वारा किसे जाने? जिसके द्वारा पुरुष इन सबको जानता है, उसे किस साधन से जाने?

इसलिए यहाँ 'नेति-नेति' इस प्रकार निर्देश किया गया है। आत्मा अग्राह्य है, उसको ग्रहण नहीं किया जाता। वह अक्षर है, उसका क्षय नहीं होता। वह असंग है, वह कहीं आसक्त नहीं होता। वह निर्बन्ध है, वह कभी बन्धन में नहीं पड़ता। वह आनंदस्वरूप है, वह कभी व्यथित नहीं होता। हे मैत्रेयी ! विज्ञाता को किसके द्वारा जानें? अरे मैत्रेयी ! तुम निश्चयपूर्वक इसे समझ लो। बस, इतना ही अमरत्व है। तुम्हारी प्रार्थना के अनुसार मैंने ज्ञातव्य तत्त्व का उपदेश दे दिया।"

ऐसा उपदेश देने के पश्चात् याज्ञवल्क्यजी संन्यासी हो गये। मैत्रेयी यह अमृतमयी उपदेश पाकर कृतार्थ हो गयी। यही यथार्थ संपत्ति है जिसे मैत्रेयी ने प्राप्त किया था। धन्य है मैत्रेयी ! जो बाह्य धन-संपत्ति से प्राप्त सुख को तृणवत् समझकर वास्तविक संपत्ति को अर्थात् आत्म-खजाने को पाने का पुरुषार्थ करती है। काश ! आज की नारी मैत्रेयी के चरित्र से प्रेरणा लेती....

(कल्यान के नारी अंक एवं बृहदारण्यक उपनिषद् पर आधारित)

 

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अनुक्रम

ब्रह्मवादिनी विदुषी गार्गी

ब्रह्मवादिनी विदुषी गार्गी का नाम वैदिक साहित्य में अत्यंत विख्यात है। उनका असली नाम क्या था, यह तो ज्ञात नहीं है किंतु उनके पिता का नाम वचक्नु था। अतः वचक्नु की पुत्री होने के कारण उनका नाम 'वाचक्नवी' पड़ गया। गर्ग गोत्र में उत्पन्न होने के कारण लोग उन्हें गार्गी कहते थे। यह गार्गी नाम ही जनसाधारण से प्रचलित हुआ।

'बृहदारण्यक उपनिषद् में गार्गी के शास्त्रार्थ का प्रसंग वर्णित हैः

विदेह देश के राजा जनक ने एक बहुत बड़ा ज्ञानयज्ञ किया था। उसमें कुरु और पांचाल देश के अनेकों विद्वान ब्राह्मण एकत्रित हुए थे। राजा जनक बड़े विद्या-व्यासंगी एवं सत्संगी थे। उन्हें शास्त्र के गूढ़ तत्त्वों का विवेचन एवं परमार्थ-चर्चा ही अधिक प्रिय थी। इसलिए उनके मन में यह जानने की इच्छा हुई कि यहाँ आये हुए विद्वान ब्राह्मणों में सबसे बढ़कर तात्त्विक विवेचन करने वाला कौन है? इस परीक्षा के लिए उन्होंने अपनी गौशाला में एक हजार गौएँ बँधवा दीं। सब गौओं के सींगों पर दस-दस पाद (एक प्राचीन माप-कर्ष) सुवर्ण बँधा हुआ था। यह व्यवस्था करके राजा जनक ने उपस्थित ब्राह्मण-समुदाय से कहाः

"आप लोगों में से जो सबसे बढ़कर ब्रह्मवेत्ता हो, वह इन सभी गौओं को ले जाये।"

राजा जनक की यह घोषणा सुनकर किसी भी ब्राह्मण में यह साहस नहीं हुआ कि उन गौओं को ले जाय। सब सोचने लगे कि 'दि हम गौएँ ले जाने को आगे बढ़ते हैं तो ये सभी ब्राह्मण हमें अभिमानी समझेंगे और शास्त्रार्थ करने लगेंगे। उस समय हम इन सबको जीत सकेंगे या नहीं, क्या पता? यह विचार करते हुए सब चुपचाप ही बैठे रहे।

सबको मौन देखकर याज्ञवल्क्यजी ने अपने ब्रह्मचारी सामश्रवा से कहाः "हे सौम्य ! तू इन सब गौओं को हाँक ले चल।"

ब्रह्मचारी ने आज्ञा पाकर वैसा ही किया। यह देखकर सब ब्राह्मण क्षुब्ध हो उठे। तब विदेहराज जनक के होता अश्वल याज्ञवल्क्यजी से पूछ बैठेः "क्यों? क्या तुम्हीं ब्रह्मनिष्ठ हो? हम सबसे बढ़कर ब्रह्मवेत्ता हो?

यह सुनकर याज्ञवल्क्यजी ने नम्रतापूर्वक कहाः

"नहीं, ब्रह्मवेत्ताओं को तो हम नमस्कार करते हैं। हमें केवल गौओं की आवश्यकता है, अतः गौओं को ले जाते हैं।"

फिर क्या था? शास्त्रार्थ आरंभ हो गया। यज्ञ का प्रत्येक सदस्य याज्ञवल्क्यजी से प्रश्न पूछने लगा। याज्ञवाल्क्यजी इससे विचलित नहीं हुए। वे धैर्यपूर्वक सभी के प्रश्नों का क्रमशः उत्तर देने लगे। अश्वल ने चुन-चुनकर कितने ही प्रश्न किये, किंतु उचित उत्तर मिल जाने के कारण वे चुप होकर बैठ गये। तब जरत्कारू गोत्र में उत्पन्न आर्तभाग ने प्रश्न किया। उनको भी अपने प्रश्न का यथार्थ उत्तर मिल गया, अतः वे भी मौन हो गये। फिर क्रमशः लाह्यायनि भुज्यु, चाक्रायम उषस्त एवं कौषीतकेय कहोल प्रश्न करके चुप होकर बैठ गये। इसके बाद वाचक्नवी गार्गी ने पूछाः "भगवन ! यह जो कुछ पार्थिव पदार्थ हैं, वे सब जल में ओत प्रोत हैं। जल किसमें ओतप्रोत है?

याज्ञवल्क्यजीः "जल वायु में ओतप्रोत है।"

"वायु किसमें ओतप्रोत है?"

"अन्तरिक्षलोक में।"

"अन्तरिक्षलोक किसमें ओतप्रोत है?"

"गन्धर्वलोक में।"

"गन्धर्वलोक किसमें ओतप्रोत है?"

"आदित्यलोक में।"

"आदित्यलोक किसमें ओतप्रोत है?"

"चन्द्रलोक में।"

"चन्द्रलोक किसमें ओतप्रोत है?"

नक्षत्रलोक में।"

"नक्षत्रलोक किसमें ओतप्रोत है?"

"देवलोक में।"

"देवलोक किसमें ओतप्रोत है?"

"इन्द्रलोक में।"

"इन्द्रलोक किसमें ओतप्रोत है?"

"प्रजापतिलोक में।"

"प्रजापतिलोक किसमें ओतप्रोत है?"

"ब्रह्मलोक में।"

"ब्रह्मलोक किसमें ओतप्रोत है?"

इस पर याज्ञवल्क्यजी ने कहाः "हे गार्गी ! यह तो अतिप्रश्न है। यह उत्तर की सीमा है। अब इसके आगे प्रश्न नहीं हो सकता। अब तू प्रश्न न कर, नहीं तो तेरा मस्तक गिर जायेगा।"

गार्गी विदुषी थीं। उन्होंने याज्ञवल्क्यजी के अभिप्राय को समझ लिया एवं मौन हो गयीं। तदनन्तर आरुणि आदि विद्वानों ने प्रश्नोत्तर किये। इसके पश्चात् पुनः गार्गी ने समस्त ब्राह्मणों को संबोधित करते हुए कहाः "यदि आपकी अनुमति प्राप्त हो जाय तो मैं याज्ञवल्क्यजी से दो प्रश्न पूछूँ। यदि वे उन प्रश्नों का उत्तर दे देंगे तो आप लोगों में से कोई भी उन्हें ब्रह्मचर्चा में नहीं जीत सकेगा।"

ब्राह्मणों ने कहाः "पूछ लो गार्गी !"

तब गार्गी बोलीः "याज्ञवल्क्यजी ! वीर के तीर के समान ये मेरे दो प्रश्न हैं। पहला प्रश्न हैः द्युलोक के ऊपर, पृथ्वी का निम्न, दोनों का मध्य, स्वयं दोनों और भूत भविष्य तथा वर्तमान किसमें ओतप्रोत हैं?"

याज्ञवल्क्यजीः "आकाश में।"

गार्गीः "अच्छा... अब दूसरा प्रश्नः यह आकाश किसमें ओतप्रोत है?"

याज्ञवल्क्यजीः "इसी तत्त्व को ब्रह्मवेत्ता लोग अक्षर कहते हैं। गार्गी यह न स्थूल है न सूक्ष्म, न छोटा है न बड़ा। यह लाल, द्रव, छाया, तम, वायु, आकाश, संग, रस, गन्ध, नेत्र, कान, वाणी, मन, तेज, प्राण, मुख और माप से रहित है। इसमें बाहर भीतर भी नहीं है। न यह किसी का भोक्ता है न किसी का भोग्य।"

फिर आगे उसका विशद निरूपण करते हुए याज्ञवल्क्यजी बोलेः "इसको जाने बिना हजारों वर्षों को होम, यज्ञ, तप आदि के फल नाशवान हो जाते हैं। यदि कोई इस अक्षर तत्त्व को जाने बिना ही मर जाय तो वह कृपण है और जान ले तो यह ब्रह्मवेत्ता है।

यह अक्षर ब्रह्म दृष्ट नहीं, द्रष्टा है। श्रुत नहीं, श्रोता है। मत नहीं, मन्ता है। विज्ञात नहीं, विज्ञाता है। इससे भिन्न कोई दूसरा द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, विज्ञाता नहीं है। गार्गी ! इसी अक्षर में यह आकाश ओतप्रोत है।"

गार्गी याज्ञवल्क्यजी का लोहा मान गयी एवं उन्होंने निर्णय देते हुए कहाः "इस सभा में याज्ञवल्क्यजी से बढ़कर ब्रह्मवेत्ता कोई नहीं है। इनको कोई पराजित नहीं कर सकता। हे ब्राह्मणो ! आप लोग इसी को बहुत समझें कि याज्ञवल्क्यजी को नमस्कार करने मात्र से आपका छुटकारा हुए जा रहा है। इन्हें पराजित करने का स्वप्न देखना व्यर्थ है।"

राजा जनक की सभा ! ब्रह्मवादी ऋषियों का समूह ! ब्रह्मसम्बन्धी चर्चा ! याज्ञवल्क्यजी की परीक्षा और परीक्षक गार्गी ! यह हमारी आर्य के नारी के ब्रह्मज्ञान की विजय जयन्ती नहीं तो और क्या है?

विदुषी होने पर भी उनके मन में अपने पक्ष को अनुचित रूप से सिद्ध करने का दुराग्रह नहीं था। ये विद्वतापूर्ण उत्तर पाकर संतुष्ट हो गयीं एवं दूसरे की विद्वता की उन्होंने मुक्त कण्ठ से प्रशंसा भी की।

धन्य है भारत की आर्य नारी ! जो याज्ञवल्क्यजी जैसे महर्षि से भी शास्त्रार्थ करनें हिचकिचाती नहीं है। ऐसी नारी, नारी न होकर साक्षात् नारायणी ही है, जिनसे यह वसुन्धरा भी अपने-आपको गौरवान्वित मानती है।

('कल्याण' के 'नारी अंक' एवं बृहदारण्यक उपनिषद् पर आधारित)

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अथाह शक्ति की धनीः तपस्विनी शाण्डालिनी

शाण्डालिनी का रूप-लावण्य और सौन्दर्य देखकर गालव ऋषि और गरूड़जी मोहित हो गये। 'ऐसी सुन्दरी और इतनी तेजस्विनी ! वह भी धरती पर तपस्यारत ! यह स्त्री तो भगवान विष्णु की भार्या होने के योग्य है....' ऐसा सोचकर उन्होंने शाण्डालिनी के आगे यह प्रस्ताव रखा।

शाण्डालिनीः "नहीं नहीं, मुझे तो ब्रह्मचर्य का पालन करना है।"

यह कहकर शाण्डालिनी पुनः तपस्यारत हो गयी और अपने शुद्ध-बुद्ध स्वरूप की ओर यात्रा करने लगी।

गालवजी और गरुड़जी का यह देखकर पुनः विचारने लगे कि 'अप्सराओं को भी मात कर देने वाले सौन्दर्य की स्वामिनी यह शाण्डालिनी अगर तपस्या में ही रत रही तो जोगन बन जायेगी और हम लोगों की बात मानेगी नहीं। अतः इसे अभी उठाकर ले चलें और भगवान विष्णु के साथ जबरन इसकी शादी करवा दें।'

एक प्रभात को दोनों शाण्डालिनी को ले जाने के लिए आये। शाण्डालिनी की दृष्टि जैसे ही उन दोनों पर पड़ी तो वह समझ गयी कि 'अपने लिए तो नहीं, किंतु अपनी इच्छा पूरी करने के लिए इनकी नीयत बुरी हुई है। जब मेरी कोई इच्छा नहीं है तो मैं किसी की इच्छा के आगे क्यों दबूँ? मुझे तो ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना है किंतु ये दोनों मुझे जबरन गृहस्थी में घसीटना चाहते हैं। मुझे विष्णु की पत्नी नहीं बनना, वरन् मुझे तो निज स्वभाव को पाना है।'

गरुड़जी तो बलवान थे ही, गालवजी भी कम नहीं थे। किंतु शाण्डालिनी की निःस्वार्थ सेवा, निःस्वार्थ परमात्मा में विश्रान्ति की यात्रा ने उसको इतना तो सामर्थ्यवान बना दिया था कि उसके द्वारा पानी के छींटे मार कर यह कहते ही कि 'गालव ! तुम गल जाओ और गालव को सहयोग देने वाले गरुड़ ! तुम भी गल जाओ।' दोनों को महसूस होने लगा कि उनकी शक्ति क्षीण हो रही है। दोनों भीतर-ही-भीतर गलने लगे।

फिर दोनों ने बड़ा प्रायश्चित किया और क्षमायाचना की, तब भारत की उस दिव्य कन्या शाण्डालिनी ने उन्हें माफ किया और पूर्ववत् कर दिया। उसी के तप के प्रभाव से 'गलतेश्वर तीर्थ' बना है।

हे भारत की देवियो ! उठो.... जागो। अपनी आर्य नारियों की महानता को, अपने अतीत के गौरव को याद करो। तुममें अथाह सामर्थ्य है, उसे पहचानो। सत्संग, जप, परमात्म-ध्यान से अपनी छुपी हुई शक्तियों को जाग्रत करो।

जीवनशक्ति का ह्रास करने वाली पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण से बचकर तन-मन को दूषित करने वाली फैशनपरस्ती एवं विलासिता से बचकर अपने जीवन को जीवनदाता के पथ पर अग्रसर करो। अगर ऐसा कर सको तो वह दिन दूर नहीं, जब विश्व तुम्हारे दिव्य चरित्र का गान कर अपने को कृतार्थ मानेगा।

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सती सावित्री

'महाभारत' के वन पर्व में सावित्री और यमराज के वार्तालाप का प्रसंग आता हैः

जब यमराज सत्यवान (सावित्री के पति) के प्राणों को अपने पाश में बाँध ले चले, तब सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चलने लगी। उसे अपने पीछे आते देखकर यमराज ने उसे वापस लौट जाने के लिए कई बार कहा किंतु सावित्री चलती ही रही एवं अपनी धर्मचर्चा से उसने यमराज को प्रसन्न कर लिया।

सावित्री बोलीः "सत्पुरुषों का संग एक बार भी मिल जाये तो वह अभीष्ट की पूर्ति कराने वाला होता है और यदि उनसे प्रेम हो जाये तो फिर कहना ही क्या? संत-समागम कभी निष्फल नहीं जाता। अतः सदा सत्पुरुषों के साथ ही रहना चाहिए।

देव ! आप सारी प्रजा का नियमन करने वाले हैं, अतः 'यम' कहलाते हैं। मैंने सुना है कि मन, वचन और कर्म द्वारा किसी भी प्राणी के प्रति द्रोह न करके सब पर समान रूप से दया करना और दान देना श्रेष्ठ पुरुषों का सनातन धर्म है। यों तो संसार के सभी लोग सामान्यतः कोमलता का बर्ताव करते हैं किंतु जो श्रेष्ठ पुरुष हैं, वे अपने पास आये हुए शत्रु पर भी दया ही करते हैं।"

यमराजः "कल्याणी ! जैसे प्यासे को पानी मिलने से तृप्ति होती है, उसी प्रकार तेरी धर्मानुकूल बातें सुनकर मुझे प्रसन्नता होती है।"

सावित्रि ने आगे कहाः "विवस्वान (सूर्यदेव) के पुत्र होने के नाते आपको 'वैवस्वत' कहते हैं। आप शत्रु-मित्र आदि के भेद को भुलाकर सबके प्रति समान रूप से न्याय करते हैं और आप 'धर्मराज' कहलाते हैं। अच्छे मनुष्यों को सत्य पर जैसा विश्वास होता है, वैसा अपने पर भी नहीं होता। अतएव वे सत्य में ही अधिक अनुराग रखते हैं विश्वास की सौहार्द का कारण है तथा सौहार्द ही विश्वास का। सत्पुरुषों का भाव सबसे अधिक होता है, इसलिए उन पर सभी विश्वास करते हैं।"

यमराजः "सावित्री ! तूने जो बातें कही हैं वैसी बातें मैंने और किसी के मुँह से नहीं सुनी हैं। अतः मेरी प्रसन्नता और भी बढ़ गयी है। अच्छा, अब तू बहुत दूर चली आयी है। जा, लौट जा।"

फिर भी सावित्री ने अपनी धार्मिक चर्चा बंद नहीं की। वह कहती गयीः "सत्पुरुषों का मन सदा धर्म में ही लगा रहता है। सत्पुरुषों का समागम कभी व्यर्थ नहीं जाता। संतों से कभी किसी को भय नहीं होता। सत्पुरुष सत्य के बल से सूर्य को भी अपने समीप बुला लेते हैं। वे ही अपने प्रभाव से पृथ्वी को धारण करते हैं। भूत भविष्य का आधार भी वे ही हैं। उनके बीच में रहकर श्रेष्ठ पुरुषों को कभी खेद नहीं होता। दूसरों की भलाई करना सनातन सदाचार है, ऐसा मानकर सत्पुरुष प्रत्युपकार की आशा न रखते हुए सदा परोपकार में ही लगा रहते हैं।"

सावित्री की बातें सुनकर यमराज द्रवीभूत हो गये और बोलेः "पतिव्रते ! तेरी ये धर्मानुकूल बातें गंभीर अर्थ से युक्त एवं मेरे मन को लुभाने वाली हैं। तू ज्यों-ज्यों ऐसी बातें सुनाती जाती है, त्यों-त्यों तेरे प्रति मेरा स्नेह बढ़ता जाता है। अतः तू मुझसे कोई अनुपम वरदान माँग ले।"

सावित्रीः "भगवन् ! अब तो आप सत्यवान के जीवन का ही वरदान दीजिए। इससे आपके ही सत्य और धर्म की रक्षा होगी। पति के बिना तो मैं सुख, स्वर्ग, लक्ष्मी तथा जीवन की भी इच्छा नहीं रखती।"

धर्मराज वचनबद्ध हो चुके थे। उन्होंने सत्यवान को मृत्युपाश से मुक्त कर दिया और उसे चार सौ वर्षों की नवीन आयु प्रदान की। सत्यवान के पिता द्युमत्सेन की नेत्रज्योति लौट आयी एवं उन्हें अपना खोया हुआ राज्य भी वापस मिल गया। सावित्री के पिता को भी समय पाकर सौ संताने हुईं एवं सावित्री ने भी अपने पति सत्यवान के साथ धर्मपूर्वक जीवन-यापन करते हुए राज्य-सुख भोगा।

इस प्रकार सती सावित्री ने अपने पातिव्रत्य के प्रताप से पति को तो मृत्यु के मुख से लौटाया ही, साथ ही पति के एवं अपने पिता के कुल, दोनों की अभिवृद्धि में भी वह सहायक बनी।

जिस दिन सती सावित्री ने अपने तप के प्रभाव से यमराज के हाथ में पड़े हुए पति सत्यवान को छुड़ाया था, वही दिन 'वट सावित्री पूर्णिमा' के रूप में आज भी मनाया जाता है। इस दिन सौभाग्यशाली स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षा के लिए वट वृक्ष की पूजा करती हैं एवं व्रत-उपवास आदि रखती हैं।

कैसी रहीं हैं भारत की आदर्श नारियाँ ! अपने पति को मृत्यु के मुख से लौटाने में यमराज से भी धर्मचर्चा करने का सामर्थ्य रहा है भारत की देवियों में। सावित्री की दिव्य गाथा यही संदेश देती है कि हे भारत की देवियों ! तुममें अथाह सामर्थ्य है, अथाह शक्ति है। संतों-महापुरुषों के सत्संग में जाकर तुम अपनी छुपी हुई शक्ति को जाग्रत करके अवश्य महान बन सकती हो एवं सावित्री-मीरा-मदालसा की याद को पुनः ताजा कर सकती हो।

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अनुक्रम

माँ सीता की सतीत्व-भावना

भगवान श्रीराम के वियोग तथा रावण और राक्षसियों के द्वारा किये जानेवाले अत्याचारों के कारण माँ सीता अशोक वाटिका में बड़ी दुःखी थीं। न तो वे भोजन करतीं न ही नींद। दिन-रात केवल श्रीराम-नाम के जप में ही तल्लीन रहतीं। उनका विषादग्रस्त मुखमंडल देखकर हनुमान जी ने पर्वताकार शरीर धारण करके उनसे कहाः "माँ ! आपकी कृपा से मेरे पास इतना बल है कि मैं पर्वत, वन, महल और रावणसहित पूरी लंका को उठाकर ले जा सकता हूँ। आप कृपा करके मेरे साथ चलें और भगवान श्रीराम व लक्ष्मण का शोक दूर करके स्वयं भी इस भयानक दुःख से मुक्ति पा लें।"

भगवान श्रीराम में ही एकनिष्ठ रहने वाली जनकनंदिनी माँ सीता ने हनुमानजी से कहाः "हे महाकपि ! मैं तुम्हारी शक्ति और पराक्रम को जानती हूँ, साथ ही तुम्हारे हृदय के शुद्ध भाव एवं तुम्हारी स्वामी-भक्ति को भी जानती हूँ। किंतु मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकती। पतिपरायणता की दृष्टि से मैं एकमात्र भगवान श्रीराम के सिवाय किसी परपुरुष का स्पर्श नहीं कर सकती। जब रावण ने मेरा हरण किया था तब मैं असमर्थ, असहाय और विवश थी। वह मुझे बलपूर्वक उठा लाया था। अब तो करुणानिधान भगवान श्रीराम ही स्वयं आकर, रावण का वध करके मुझे यहाँ से ले जाएँगे।"

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आर्त भक्त द्रौपदी

ईर्ष्या-द्वेष और अति धन-संग्रह से मनुष्य अशांत होता है। ईर्ष्या-द्वेष की जगह पर क्षमा और सत्प्रवृत्ति का हिस्सा बढ़ा दिया जाय तो कितना अच्छा !

दुर्योधन ईर्ष्यालु था, द्वेषी था। उसने तीन महीने तक दुर्वासा ऋषि की भली प्रकार से सेवा की, उनके शिष्यों की भी सेवा की। दुर्योधन की सेवा से दुर्वासा ऋषि प्रसन्न हो गये और बोलेः

"माँग ले वत्स ! जो माँगना चाहे माँग ले।"

जो ईर्ष्या और द्वेष के शिकंजे में आ जाता है, उसका विवेक उसे साथ नहीं देता लेकिन जो ईर्ष्या-द्वेष रहित होता है उसका विवेक सजग रहता है वह शांत होकर विचार या निर्णय करता है। ऐसा व्यक्ति सफल होता है और सफलता के अहं में गरक नहीं होता। कभी असफल भी हो गया तो विफलता के विवाद में नहीं डूबता। दुष्ट दुर्योधन ने ईर्ष्या एवं द्वेष के वशीभूत होकर कहाः

"मेरे भाई पाण्डव वन में दर-दर भटक रहे हैं। उनकी इच्छा है कि आप अपने हजार शिष्यों के साथ उनके अतिथी हो जायें। अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे भाइयों की इच्छा पूरी करें लेकिन आप उसी वक्त उनके पास पहुँचियेगा। जब द्रौपदी भोजन कर चुकी हो।"

दुर्योधन जानता था कि "भगवान सूर्य ने पाण्डवों को अक्षयपात्र दिया है। उसमें से तब तक भोजन-सामग्री मिलती रहती है, जब तक द्रौपदी भोजन न कर ले। द्रौपदी भोजन करके पात्र को धोकर रख दे फिर उस दिन उसमें से भोजन नहीं निकलेगा। अतः दोपहर के बाद जब दुर्वासाजी उनके पास पहुँचेगे, तब भोजन न मिलने से कुपित हो जायेंगे और पाण्डवों को शाप दे देंगे। इससे पाण्डव वंश का सर्वनाश हो जायेगा।"

इस ईर्ष्या और द्वेष से प्रेरित होकर दुर्योधन ने दुर्वासाजी की प्रसन्नता का लाभ उठाना चाहा।

दुर्वासा ऋषि मध्याह्न के समय जा पहुँचे पाण्डवों के पास। युधिष्ठिर आदि पाण्डव एवं द्रौपदी दुर्वासाजी को शिष्यों समेत अतिथि के रूप में आया हुआ देखकर चिन्तित हो गये। फिर भी बोलेः "विराजिये महर्षि ! आपके भोजन की व्यवस्था करते हैं।"

अंतर्यामी परमात्मा सबका सहायक है, सच्चे का मददगार है। दुर्वासाजी बोलेः "ठहरो ठहरो.... भोजन बाद में करेंगे। अभी तो यात्रा की थकान मिटाने के लिए स्नान करने जा रहा हूँ।"

इधर द्रौपदी चिन्तित हो उठी कि अब अक्षयपात्र से कुछ न मिल सकेगा और इन साधुओं को भूखा कैसे भेजें? उनमें भी दुर्वासा ऋषि को ! वह पुकार उठीः "हे केशव ! हे माधव ! हे भक्तवत्सल ! अब मैं तुम्हारी शरण में हूँ...." शांत चित्त एवं पवित्र हृदय से द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण का चिन्तन किया। भगवान श्रीकृष्ण आये और बोलेः "द्रौपदी ! कुछ खाने को तो दो !"

द्रौपदीः "केशव ! मैंने तो पात्र को धोकर रख दिया है।"

श्री कृष्णः "नहीं, नहीं... लाओ तो सही ! उसमें जरूर कुछ होगा।"

द्रौपदी ने पात्र लाकर रख दिया तो दैवयोग से उसमें तांदुल के साग का एक पत्ता बच गया था। विश्वात्मा श्रीकृष्ण ने संकल्प करके उस तांदुल के साग का पत्ता खाया और तृप्ति का अनुभव किया तो उन महात्माओं को भी तृप्ति का अनुभव हुआ वे कहने लगे किः "अब तो हम तृप्त हो चुके हैं, वहाँ जाकर क्या खायेंगे? युधिष्ठिर को क्या मुँह दिखायेंगे?"

शातं चित्त से की हुई प्रार्थना अवश्य फलती है। ईर्ष्यालु एवं द्वेषी चित्त से तो किया-कराया भी चौपट हो जाता है जबकि नम्र और शांत चित्त से तो चौपट हुई बाजी भी जीत में बदल जाती है और हृदय धन्यता से भर जाता है।

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अनुक्रम

 

दैवी शक्तियों से सम्पन्न गुणमंजरी देवी

(दिनांक 12 अक्तूबर, से 21 अक्तूबर 2002 तक मांगल्य धाम, रतलाम (म.प्र.) में शरद् पूर्णिमा पर आयोजित 'शक्तिपात साधना शिविर' में पूज्य श्री ने शिविरार्थियों को अपनी सुषुप्त दिव्य शक्तियों को जागृत करने का आह्वान किया।

विक्रम संवत् 1781 में प्रयागराज इलाहाबाद में घटित एक घटना का जिक्र करते हुए पूज्यश्री ने लोकपावनी वाणी में कहाः)

प्रयागराज इलाहाबाद में त्रयोदशी के कुंभ-स्नान का पर्व-दिवस था। कुंभ में कई अखाड़ेवाले, जति-जोगि, साधु-संत आये थे। उसमें कामकौतुकी नामक एक ऐसी जाति भी आयी थी जो भगवान के लिए ही राग-रागिनियों का अभ्यास किया करती थी तथा भगवदगीत के सिवाय और कोई गीत नहीं गाती थी। उसने भी अपना गायन-कार्यक्रम कुंभ मेले में रखा था।

श्रृंगेरी मठाधीश श्री सोमनाथाचार्य भी इस कामकौतुकी जातिवालों के संयम और राग-रागिनियों में उनकी कुशलता के बारे में जानते थे, इसलिए वे भी वहाँ पधारे थे। उस कार्यक्रम में सोमनाथाचार्य जी की उपस्थिति के कारण लोगों को विशेष आनंद हुआ और जब गुणमंजरी देवी भी आ पहुँची तो उस आनंद में चार चाँद लग गये।

गुणमंजरी देवी ने चान्द्रायण और कृच्छ्र व्रत किये थे। शरीर के दोषों को हरने वाले जप-तप और संयम को अच्छी तरह से साधा था। लोगों ने मन-ही-मन उसका अभिवादन किया।

गुणमंजरी देवी भी केवल गीत ही नहीं गाती थीं, वरन् उसने अपने जीवन में दैवी गुणों का इतना विकसित किया था कि जब चाहे अपनी दैविक सखियों को बुला सकती थी, जब चाहे बादल मँडरवा सकती थी, बिजली चमका सकती थी। उस समय उसकी ख्याति दूर-दूर तक पहुँच चुकी थी।

कार्यक्रम आरम्भ हुआ। कामकौतुकी जाति के आचार्यों ने शब्दों की पुष्पांजली से ईश्वरीय आराधना का माहौल बनाया। अंत में गुणमंजरी देवी से प्रार्थना की गयी।

गुणमंजरी देवी ने वीणा पर अपनी उँगलियाँ रखीं। माघ का महीना था। ठण्डी-ठण्डी हवाएँ चलने लगीं। थोड़ी ही देर में मेघ गरजने लगे, बिजली चमकने लगी और बारिश का माहौल बन गया। आने वाली बारिश से बचने के लोगों का चित्त कुछ विचलित होने लगा। इतने में सोमनाथाचार्यजी ने कहाः "बैठे रहना। किसी को चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। ये बादल तुम्हें भिगोयेंगे नहीं। ये तो गुण मंजरी देवी की तपस्या और संकल्प का प्रभाव है।"

संत की बात का उल्लंघन करना मुक्तिफल को त्यागना और नरक के द्वार खोलना है। लोग बैठे रहे।

32 राग और 64 रागिनियाँ हैं। राग और रागिनियाँ के पीछे उनके अर्थ और आकृतियाँ भी होती हैं। शब्द के द्वारा सृष्टि में उथल-पुथल मच सकती है। वे निर्जीव नहीं हैं, उनमें सजीवता है। जैसे 'एयर कंडीशनर' चलाते हैं तो वह आपको हवा से पानी अलग करके दिखा देता है, ऐसे ही इन पाँच भूतों में स्थित दैवी गुणों को जिन्होंने साध लिया है, वे शब्द की ध्वनि के अनुसार बुझे दीप जला सकते हैं, दृष्टि कर सकते हैं - ऐसे कई प्रसंग आपने-हमने-देखे-सुने होगें। गुणमंजरी देवी इस प्रकार की साधना से सम्पन्न देवी थी।

माहौल श्रद्धा-भक्ति और संयम की पराकाष्ठा पर था। गुणमंजरी देवी ने वीणा बजाते हुए आकाश की ओर निहारा। घनघोर बादलों में से बिजली की तरह एक देवांगना प्रकट हुई। वातावरण संगीतमय-नृत्यमय होता जा रहा था। लोग दंग रह गये ! आश्चर्य को भी आश्चर्य के समुद्र में गोते खाने पड़े, ऐसा माहौल बन गया !

लोग भीतर ही भीतर अपने सौभाग्य की सराहना किये जा रहे थे। मानों, उनकी आँखें उस दृश्य को पी जाना चाहती थीं। उनके कान उस संगीत को पचा जाना चाहते थे। उनका जीवन उस दृश्य के साथ एक रूप होता जा रहा था.... 'गुणमंजरी, धन्य हो तुम !' कभी वे गुणमंजरी को को धन्यवाद देते हुए उसके गीत में खो जाते और कभी उस देवांगना के शुद्ध पवित्र नृत्य को देखकर नतमस्तक हो उठते !

कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। देखते ही देखते गुणमंजरी देवी ने देवांगना को विदाई दी। सबके हाथ जुड़े हुए थे, आँखें आसमान की ओर निहार रही थीं और दिल अहोभाव से भरा था। मानों, प्रभु-प्रेम में, प्रभु की अदभुत लीला में खोया-सा था.....

श्रृंगेरी मठाधीश श्री सोमनाथाचार्यजी ने हजारों लोगों की शांत भीड़ से कहाः "सज्जनो ! इसमें आश्चर्य की कोई आवश्यकता नहीं है। हमारे पूर्वज देवलोक से भारतभूमि पर आते और संयम, साधना तथा भगव्तप्रीति के प्रभाव से अपने वांछित दिव्य लोकों तक की यात्रा करने में सफल होते थे। कोई-कोई ब्रह्मस्वरूप परमात्मा का श्रवण, मनन, निदिध्यासन करके यहीं ब्रह्ममय अनन्त ब्रह्माण्डव्यापी अपने आत्म-ऐश्वर्य को पा लेते थे।

समय के फेर से लोग सब भूलते गये। अनुचित खान-पान, स्पर्श-दोष, संग-दोष, विचार-दोष आदि से लोगों की मति और सात्त्विकता मारी गयी। लोगों में छल कपट और तमस बढ़ गया, जिससे वे दिव्य लोकों की बात ही भूल गये, अपनी असलियत को ही भूल गये..... गुणमंजरी देवी ने संग दोष से बचकर संयम से साधन-भजन किया तो उसका देवत्व विकसित हुआ और उसने देवांगना को बुलाकर तुम्हें अपनी असलियत का परिचय दिया !

तुम भी इस दृश्य को देखने के काबिल तब हुए, जब तुमने कुंभ के इस पर्व पर, प्रयागराज के पवित्र तीर्थ में संयम और श्रद्धा-भक्ति से स्नान किया। इसके प्रभाव से तुम्हारे कुछ कल्मष कटे और पुण्य बढ़े। पुण्यात्मा लोगों के एकत्रित होने से गुणमंजरी देवी के संकल्प में सहायता मिली और उसने तुम्हें यह दृश्य दिखाया। अतः इसमें आश्चर्य न करो।"

आपमें भी ये शक्तियाँ छुपी हैं। तुम भी चाहो तो अनुचित खान-पान, संग-दोष आदि से बचकर, सदगुरु के निर्देशानुसार साधना-पथ पर अग्रसर हो इन शक्तियों को विकसित करने में सफल हो सकते हो। केवल इतना ही नहीं, वरन् परब्रह्म-परमात्मा को पाकर सदा-सदा के लिए मुक्त भी हो सकते हो, अपने मुक्तस्वरूप का जीते जी अनुभव कर सकते हो....

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अनुक्रम

 

विवेक की धनीः कर्मावती

यह कथा सत्यस्वरूप ईश्वर को पाने की तत्परता रखनेवाली, भोग-विलास को तिलांजलि देने वाली, विकारों का दमन और निर्विकार नारायण स्वरुप का दर्शन करने वाली उस बच्ची की है जिसने न केवल अपने को तारा, अपितु अपने पिता राजपुरोहित परशुरामजी का कुल भी तार दिया।

जयपुर-सीकर के बीच महेन्द्रगढ़ के सरदार शेखावत के राजपुरोहित परशुरामजी की उस बच्ची का नाम था कर्मा, कर्मावती। बचपन में वह ऐसे कर्म करती थी कि उसके कर्म शोभा देते थे। कई लोग कर्म करते हैं तो कर्म उनको थका देते हैं। कर्म में उनको फल की इच्छा होती है। कर्म में कर्तापन होता है।

कर्मावती के कर्म में कर्तापन नहीं था, ईश्वर के प्रति समर्पण भाव थाः 'जो कुछ कराता है प्रभु ! तू ही कराता है। अच्छे काम होते हैं तो नाथ ! तेरी कृपा से ही हम कर पाते हैं।' कर्मावती कर्म करती थी, लेकिन कर्ताभाव को विलय होने का मौका मिले उस ढंग से करती थी।

कर्मावती तेरह साल की हुई। गाँव में साधु-संत पधारे। उन सत्पुरुषों से गीता का ज्ञान सुना, भगवदगीता का माहात्म्य सुना। अच्छे-बुरे कर्मों के बन्धन से जीव मनुष्य-लोक में जन्मता है, थोड़ा-सा सुखाभास पाता है परंतु काफी मात्रा में दुःख भोगता है। जिस शरीर से सुख-दुःख भोगता है, वह शरीर तो जीवन के अंत में जल जाता है, लेकिन भीतर सुख पाने का, सुख भोगने का भाव बना रहता है। यह कर्ता-भोक्तापन का भाव तब तक बना रहता है, जब तक मन की सीमा से परे परमात्मा-स्वरूप का बोध नहीं होता।

कर्मावती इस प्रकार का सत्संग खूब ध्यान देकर, आँखों की पलकें कम गिरें इस प्रकार सुनती थी। वह इतना एकाग्र होकर सत्संग सुनती कि उसका सत्संग सुनना बंदगी हो जाता था।

एकटक निहारते हुए सत्संग सुनने से मन एकाग्र होता है। सत्संग सुनने का महापुण्य तो होता ही है, साथ ही साथ मनन करने का लाभ भी मिल जाता है और निदिध्यासन भी होता रहता है।

दूसरे लोग सत्संग सुनकर थोड़ी देर के बाद कपड़े झाड़कर चल देते और सत्संग की बात भूल जाते। लेकिन कर्मावती सत्संग को भूलती नहीं थी, सत्संग सुनने के बाद उसका मनन करती थी। मनन करने से उसकी योग्यता बढ़ गयी। जब घर में अनुकूलता या प्रतिकूलता आती तो वह समझती कि जो आता है वह जाता है। उसको देखनेवाला मेरा राम, मेरा कृष्ण, मेरा आत्मा, मेरे गुरुदेव, मेरा परमात्मा केवल एक है। सुख आयेगा जायेगा, पर मैं चैतन्य आत्मा एकरस हूँ, ऐसा उसने सत्संग में सुन रखा था।

सत्संग को खूब एकाग्रता से सुनने और बाद में उसे स्मरण-मनन करने से कर्मावती ने छोटी उम्र में खूब ऊँचाई पा ली। वह बातचीत में और व्यवहार में भी सत्संग की बातें ला देती थी। फलतः व्यवहार के द्वन्द्व उसके चित्त को मलिन नहीं करते थे। उसके चित्त की निर्मलता व सात्त्विकता बढ़ती गयी।

मैं तो महेन्द्रगढ़ के उस सरदार खंडेरकर शेखावत को भी धन्यवाद दूँगा क्योंकि उसके राजपुरोहित हुए थे परशुराम और परशुराम के घर आयी थी कर्मावती जैसी पवित्र बच्ची। जिनके घर में भक्त पैदा हो वे माता-पिता तो भाग्यशाली हैं ही, पवित्र हैं, वे जहाँ नौकरी करते हैं वह जगह, वह आफिस, वह कुर्सी भी भाग्यशाली है। जिसके यहाँ वे नौकरी करते हैं वह भी भाग्यशाली हैं कि भक्त के माता-पिता उसके यहाँ आया-जाया करते हैं।

राजपुरोहित परशुराम भी भगवान के भक्त थे। संयमी जीवन था उनका। वे सदाचारी थे, दीन-दुःखियों की सेवा किया करते थे, गुरु-दर्शन में रूचि और गुरु-वचन में विश्वास रखने वाले थे। ऐसे पवित्रात्मा के यहाँ जो संतान पैदा हो, उसका भी ओजस्वी-तेजस्वी होना स्वाभाविक है।

कर्मावती पिता से भी बहुत आगे बढ़ गयी। कहावत है कि 'बाप से बेटा सवाया होना चाहिए' लेकिन यह तो बेटी सवायी हो गई भक्ति में !

परशुराम सरदार के कामकाज में व्यस्त रहते, अतः कभी सत्संग में जा पाते कभी नहीं, पर कर्मावती हर रोज नियमित रूप से अपनी माँ को लेकर सत्संग सुनने पहुँच जाती है। परशुराम सत्संग की बात भूल भी जाते परंतु कर्मावती याद रखती।

कर्मावती ने घर में पूजा के लिए एक कोठरी बना ली थी। वहाँ संसार की कोई बात नहीं, केवल माला और जप ध्यान। उसने उस कोठरी को सात्त्विक सुशोभनों से सजाया था। बिना हाथ-पैर धोये, नींद से उठकर बिना स्नान किये उसमें प्रवेश नहीं करती थी। धूप-दीप-अगरबत्ती से और कभी-कभी ताजे खिले हुए फूलों से कोठरी को पावन बनाया करती, महकाया करती। उसके भजन की कोठरी मानों, भगवान का मंदिर ही बन गयी थी। वह ध्यान-भजन नहीं करनेवाले निगुरे कुटुम्बियों को नम्रता से समझा-बुझाकर उस कोठरी में नहीं आने देती थी। उसकी उस साधना-कुटीर में भगवान की ज्यादा मूर्तियाँ नहीं थीं। वह जानती थी कि अगर ध्यान-भजन में रूचि न हो तो वे मूर्तियाँ बेचारी क्या करेंगी? ध्यान-भजन में सच्ची लगन हो तो एक ही मूर्ति काफी है।

साधक अगर एक ही भगवान की मूर्ति या गुरुदेव के चित्र को एकटक निहारते-निहारते आंतर यात्रा करे तो 'एक में ही सब है और सब में एक ही है' यह ज्ञान होने में सुविधा रहेगी। जिसके ध्यान-कक्ष में, अभ्यास-खण्ड में या घर में बहुत से देवी-देवताओं के चित्र हों, मूर्तियाँ हों तो समझ लेना, उसके चित्त में और जीवन में काफी अनिश्चितता होगी ही। क्योंकि उसका चित्त अनेक में बँट जाता है, एक पर पूरा भरोसा नहीं रहता।

कर्मावती ने साधन-भजन करने का निश्चित नियम बना लिया था। नियम पालने में वह पक्की थी। जब तक नियम पूरा न हो तब तक भोजन नहीं करती। जिसके जीवन में ऐसी दृढ़ता होती है, वह हजारों विघ्न-बाधाओं और मुसीबतों को पैरों तले कुचलकर आगे निकल जाता है।

कर्मावती 13 साल की हुई। उस साल उसके गाँव में चातुर्मास करने के लिए संत पधारे। कर्मावती एक दिन भी कथा सुनना चूकी नहीं। कथा-श्रवण के साररूप उसके दिल-दिमाग में निश्चय दृढ़ हुआ कि जीवनदाता को पाने के लिए ही यह जीवन मिला है, कोई गड़बड़ करने के लिए नहीं। परमात्मा को नहीं पाया तो जीवन व्यर्थ है।

न पति अपना है न पत्नी अपनी है, न बाप अपना है न बेटे अपने हैं, न घर अपना है न दुकान अपनी है। अरे, यह शरीर तक अपना नहीं है तो और की क्या बात करें? शरीर को भी एक दिन छोड़ना पड़ेगा, श्मशान में उसे जलाया जायेगा।

कर्मावती के हृदय में जिज्ञासा जगी कि शरीर जल जाने से पहले मेरे हृदय का अज्ञान कैसे जले? मैं अज्ञानी रहकर बूढ़ी हो जाऊँ, आखिर में लकड़ी टेकती हुई, रुग्ण अवस्था में अपमान सहती हुई, कराहती हुई अन्य बुढ़ियाओं की नाईं मरुँ यह उचित नहीं। यह कभी-कभी वृद्धों को, बीमार व्यक्तियों को देखती और मन में वैराग्य लाती कि मैं भी इसी प्रकार बूढ़ी हो जाऊँगी, कमर झुक जायेगी, मुँह पोपला हो जायेगा। आँखों से पानी टपकेगा, दिखाई नहीं देगा, सुनाई नहीं देगा, शरीर शिथिल हो जायेगा। यदि कोई रोग हो जायेगा तो और मुसीबत। किसी की मृत्यु होती तो कर्मावती उसे देखती, जाती हुई अर्थी को निहारती और अपने मन को समझातीः "बस ! यही है शरीर का आखिरी अंजाम? जवानी में सँभाला नहीं तो बुढ़ापे में दुःख भोग-भोगकर आखिर मरना ही है। राम.....! राम.....!! राम.....!!! मैं ऐसी नहीं बनूँगी। मैं तो बनूँगी भगवान की जोगिन मीराबाई। मैं तो मेरे प्यारे परमात्मा को रिझाऊँगी।'

कर्मावती कभी वैराग्य की अग्नि में अपने को शुद्ध करती है, कभी परमात्मा के स्नेह में भाव विभोर हो जाती है, कभी प्यारे के वियोग में आँसू बहाती है तो कभी सुनमुन होकर बैठी रहती है। मृत्यु तो किसी के घर होती है और कर्मावती के हृदय के पाप जलने लगते हैं। उसके चित्त में विलासिता की मौत हो जाती है, संसारी तुच्छ आकर्षणों का दम घुट जाता है और हृदय में भगवदभक्ति का दिया जगमगा उठता है।

किसी की मृत्यु होने पर भी कर्मावती के हृदय में भक्ति का दिया जगमगाने लगता और किसी की शादी हो तब भी भक्ति का दिया ही जगमगाता। वह ऐसी भावना करती कि

मैं ऐसे वर को क्यों वरूँ, जो उपजे और मर जाय।

मैं तो वरूँ मेरे गिरधर गोपाल को, मेरो चूडलो अमर हो जाय।

मीरा ने इसी भाव को प्रकटाकर, दुहराकर अपने जीवन को धन्य कर लिया था।

कर्मावती ने भगवदभक्ति की महिमा सुन रखी थी कि एक ब्राह्मण युवक था। उसने अपना स्वभावजन्य कर्म नहीं किया। केवल विलासी और दुराचारी जीवन जिया। जो आया सो खाया, जैसा चाहा वैसा भोगा, कुकर्म किये। वह मरकर दूसरे जन्म में बैल बना और किसी भिखारी के हाथ लगा। वह भिखारी बैल पर सवारी करता और बस्ती में घूम-फिरकर, भीख माँगकर अपना गुजारा चलाता।

दुःख सहते-सहते बैल बूढ़ा हो गया, उसके शरीर की शक्ति क्षीण हो गयी। वह अब बोझ ढोने के काबिल नहीं रहा। भिखारी ने बैल को छोड़ दिया। रोज-रोज व्यर्थ में चारा कहाँ से खिलाये? भूखा प्यासा बैल इधर-उधर भटकने लगा। कभी कहीं कुछ रूखा-सूखा मिल जाता तो खा लेता। कभी लोगों के डण्डे खाकर ही रह जाना पड़ता।

बारिश के दिन आये। बैल कहीं कीचड़ के गड्डे में उतर गया और फँस गया। उसकी रगों में ताकत तो थी नहीं। फिर वहीं छटपटाने लगा तो और गहराई में उतरने लगा। पीठ की चमड़ी फट गयी, लाल धब्बे दिखाई देने लगे। अब ऊपर से कौएँ चोंच मारने लगे, मक्खियाँ भिनभिनाने लगीं। निस्तेज, थका मांदा, हारा हुआ वह बूढ़ा बैल अगले जन्म में खूब मजे कर चुका था, अब उनकी सजा भोग रहा है। अब तो प्राण निकलें तभी छुटकारा हो। वहाँ से गुजरते हुए लोग दया खाते कि बेचारा बैल ! कितना दुःखी है ! हे भगवान ! इसकी सदगति हो जाय ! कितना दुःखी है ! हे भगवान ! इसकी सदगति हो जाये ! वे लोग अपने छोटे-मोटे पुण्य प्रदान करते फिर भी बैल की सदगति नहीं होती थी।

कई लोगों ने बैल को गड्डे से बाहर निकालने की कोशिश की, पूँछ मरोड़ी, सींगों में रस्सी बाँधकर खींचा-तानी की लेकिन कोई लाभ नहीं। वे बेचारे बैल को और परेशान करके थककर चले गये।

एक दिन कुछ बड़े-बूढ़े लोग आये और विचार करने लगे कि बैल के प्राण नहीं निकल रहे हैं, क्या किया जाये? लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गयी। उस टोले में एक वेश्या भी थी। वेश्या ने कुछ अच्छा संकल्प किया।

वह हर रोज तोते के मुँह से टूटी-फूटी गीता सुनती। समझती तो नहीं फिर भी भगवदगीता के श्लोक तो सुनती थी। भगवदगीता आत्मज्ञान देती है, आत्मबल जगाती है। गीता वेदों का अमृत है। उपनिषदरूपी गायों को दोहकर गोपालनन्दन श्रीकृष्णरूपी ग्वाले ने गीतारूपी दुग्धामृत अर्जुन को पिलाया है। यह पावन गीता हर रोज सुबह पिंजरे में बैठा हुआ तोतो बोलता था, वह सुनती थी। वेश्या ने इस गीता-श्रवण का पुण्य बैल की सदगति के लिए अर्पण किया।

जैसे ही वेश्या ने संकल्प किया कि बैल के प्राण-पखेरु उड़ गये। उसी पुण्य के प्रभाव से वह बैल सोमशर्मा नामक ब्राह्मण के घर बालक होकर पैदा हुआ। बालक जब 6 साल का हुआ तो उसके यज्ञोपवीत आदि संस्कार किये गये। माता-पिता ने कुल-धर्म के पवित्र संस्कार किये गये। माता-पिता ने कुल-धर्म के पवित्र संस्कार दिये। उसकी रूचि ध्यान-भजन में लगी। वह आसन, प्राणायाम, ध्यानाभ्यास आदि करने लगा। उसने योग में तीव्रता से प्रगति कर ली और 18 साल की उम्र में ध्यान के द्वारा अपना पूर्वजन्म जान लिया। उसको आश्चर्य हुआ कि ऐसा कौन-सा पुण्य उस बाई ने अर्पण किया जिससे मुझे बैल की नारकीय अवस्था से मुक्ति मिली व जप-तप करने वाले पवित्र ब्राह्मण के घर जन्म मिला?

ब्राह्मण युवक पहुँचा वेश्या के घर। वेश्या अब तक बूढ़ी हो चुकी थी। वह अपने कृत्यों पर पछतावा करने लगी थी। अपने द्वार पर ब्राह्मण कुमार को आया देखकर उसने कहाः

"मैंने कई जवानों की जिन्दगी बरबाद की है, मैं पाप-चेष्टाओं में गरक रहते-रहते बूढ़ी हो गयी हूँ। तू ब्राह्मण का पुत्र ! मेरे द्वार पर आते तुझे शर्म नहीं आती?"

"मैं ब्राह्मण का पुत्र जरूर हूँ पर विकारी और पाप की निगाह से नहीं आया हूँ। माताजी ! मैं तुमको प्रणाम करके पूछने आया हूँ कि तुमने कौन सा पुण्य किया है?"

"भाई ! मैं तो वेश्या ठहरी। मैंने कोई पुण्य नहीं किया है?"

"उन्नीस साल पहले किसी बैल को कुछ पुण्य अर्पण किया था?"

"हाँ..... स्मरण में आ रहा है। कोई बूढ़ा बैल परेशान हो रहा था, प्राण नहीं छूट रहे थे बेचारे के। मुझे बहुत दया आयी। मेरे और तो कोई पुण्य थे नहीं। किसी ब्राह्मण के घर में चोर चोरी करके आये थे। उस सामान में तोते का एक पिंजरा भी था जो मेरे यहाँ छोड़ गये। उस ब्राह्मण ने तोते को श्रीमदभगवदगीता के कुछ श्लोक रटाये थे। वह मैं सुनती थी। उसी का पुण्य उस बैल को अर्पण किया था।

ब्राह्मण कुमार को ऐसा लगा कि यदि भगवदगीता का अर्थ समझे बिना केवल उसका श्रवण ही इतना लाभ कर सकता है तो उसका मनन और निदिध्यासन करके गीता-ज्ञान पचाया जाये तो कितना लाभ हो सकता है ! वह पूर्ण शक्ति से चल पड़ा गीता-ज्ञान को जीवन में उतारने के लिए।

कर्मावती को जब गीता-माहात्म्य की यह कथा सुनने को मिली तो उसने भी गीता का अध्ययन शुरु कर दिया। भगवदगीता में तो प्राणबल है, हिम्मत है, शक्ति है। कर्मावती के हृदय में भगवान श्रीकृष्ण के लिए प्यार पैदा हो गया। उसने पक्की गाँठ बाँध ली कि कुछ भी हो जाये मैं उस बाँके बिहारी के आत्म-ध्यान को ही अपना जीवन बना लूँगी, गुरुदेव के ज्ञान को पूरा पचा लूँगी। मैं संसार की भट्ठी में पच-पचकर मरूँगी नहीं, मैं तो परमात्म-रस के घूँट पीते-पीते अमर हो जाऊँगी।

कर्मावती ने ऐसा नहीं किया कि गाँठ बाँध ली और फिर रख दी किनारे। नहीं.... एक बार दृढ़ निश्चय कर लिया तो हर रोज सुबह उस निश्चय को दुहराती, अपने लक्ष्य का बार-बार स्मरण करती और अपने आपसे कहा करती कि मुझे ऐसा बनना है। दिन-प्रतिदिन उसका निश्चय और मजबूत होता गया।

कोई एक बार निर्णय कर ले और फिर अपने निर्णय को भूल जाये तो उस निर्णय की कोई कीमत नहीं रहती। निर्णय करके हर रोज उसे याद करना चाहिए, उसे दुहराना चाहिए कि हमें ऐसा बनना है। कुछ भी हो जाये, निश्चय से हटना नहीं है।

हमें रोक सके ये जमाने में दम नहीं।

हमसे जमाना है जमाने से हम नहीं।।

पाँच वर्ष के ध्रुव ने निर्णय कर लिया तो विश्वनियंता विश्वेश्वर को लाकर खड़ा कर दिया। प्रह्लाद ने निर्णय कर लिया तो स्तंभ में से भगवान नृसिंह को प्रकट होना पड़ा। मीरा ने निर्णय कर लिया तो मीरा भक्ति में सफल हो गयी।

प्रातः स्मरणीय परम पूज्य स्वामी श्री लीलाशाहजी बापू ने निर्णय कर लिया तो ब्रह्मज्ञान में पारंगत हो गये। हम अगर निर्णय करें तो हम क्यों सफल नहीं होंगे? जो साधक अपने साधन-भजन करने के पवित्र स्थान में, ब्राह्ममूहूर्त के पावन काल में महान बनने के निर्णय को बार-बार दुहराते हैं उनको महान होने से दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं सकती।

कर्मावती 18 साल की हुई। भीतर से जो पावन संकल्प किया था उस पर वह भीतर-ही-भीतर अडिग होती चली गयी। वह अपना निर्णय किसी को बताती नहीं थी।, प्रचार नहीं करती थी, हवाई गुब्बारे नहीं उड़ाया करती थी अपितु सत्संकल्प की नींव में साधना का जल सिंचन किया करती थी।

कई भोली-भाली मूर्ख बच्चियाँ ऐसी होती हैं, जिन्होंने दो चार सप्ताह ध्यान-भजन किया, दो चार महीने साधना की और चिल्लाने लग गयीं कि 'मैं अब शादी नहीं करूँगी, मैं अब साध्वी बन जाऊँगी, संन्यासिनी बन जाऊँगी, साधना करूँगी' साधन-भजन की शक्ति बढ़ने के पहले ही चिल्लाने लग गयीं।

वे ही बच्चियाँ दो-चार साल बाद मेरे पास आयीं, देखा तो उन्होंने शादी कर ली थी और अपना नन्हा-मुन्ना बेटा-बेटी ले आकर मुझसे आशीर्वाद माँग रही थीं कि मेरे बच्चे को आशीर्वाद दें कि इसका कल्याण हो।

मैंने कहाः अरे ! तू तो बोलती थी, शादी नहीं करूँगी, संन्यास लूँगी, साधना करूँगी और फिर यह संसार का झमेला?"

साधना की केवल बातें मत करो, काम करो, बाहर घोषणा मत करो, भीतर-ही-भीतर परिपक्व बनते जाओ। जैसे स्वाति नक्षत्र में आकाश से गिरती जल की बूँद को पका-पकाकर मोती बना देती है, ऐसे ही तुम भी अपनी भक्ति की कुंजी गुप्त रखकर भीतर-ही-भीतर उसकी शक्ति को बढ़ने दो। साधना की बात किसी को बताओ नहीं। जो अपने परम हितैषी हों, भगवान के सच्चे भक्त हों, श्रेष्ठ पुरुष हों, सदगुरु हों केवल उनसे ही अपनी अंतरंग साधना की बात करो। अंतरंग साधना के विषय में पूछो। अपने आध्यात्मिक अनुभव जाहिर करने से साधना का ह्रास होता है और गोप्य रखने से साधना में दिव्यता आती है।

मैं जब घर में रहता था, तब युक्ति से साधन-भजन करता था और भाई को बोलता थाः थोड़े दिन भजन करने दो, फिर दुकान पर बैठूँगा। अभी अनुष्ठान चल रहा है। एक पूरा होता तो कहता, अभी एक बाकी है। फिर थोड़े दिन दुकान पर जाता। फिर उसको बोलताः 'मुझे कथा में जाना है।' तो भाई चिढ़कर कहताः "रोज-रोज ऐसा कहता है, सुधरता नहीं?" मैं कहताः "सुधर जाऊँगा।"

ऐसा करते-करते जब अपनी वृत्ति पक्की हो गयी, तब मैंने कह दियाः 'मैं दुकान पर नहीं बैठूँगा, जो करना हो सो कर लो। यदि पहले से ही ऐसे बगावत के शब्द बोलता तो वह कान पकड़कर दुकान पर बैठा देता।

मेरी साधना को रोककर मुझे अपने जैसा संसारी बनाने के लिए रिश्तेदारों ने कई उपाय आजमाये थे। मुझे फुसला कर सिनेमा दिखाने ले जाते, जिससे संसार का रंग लग जाये, ध्यान-भजन की रूचि नष्ट हो जाये। फिर जल्दी-जल्दी शादी करा दी। हम दोनों को कमरे में बन्द कर देते ताकि भगवान से प्यार न करूँ और संसारी हो जाऊँ। अहाहा....! संसारी लोग साधना से कैसे-कैसे गिरते-गिराते हैं। मैं भगवान से आर्तभाव से प्रार्थना किया करता कि 'हे प्रभु ! मुझे बचाओ।' आँखों से झर-झर आँसू टपकते। उस दयालु देव की कृपा का वर्णन नहीं कर सकता।

मैं पहले भजन नहीं करता तो घरवाले बोलतेः 'भजन करो.... भजन करो.... ' जब मैं भजन करने लगा तो लोग बोलने लगेः 'रुको.. रुको... इतना सारा भजन नहीं करो।' जो माँ पहले बोलती थी कि 'ध्यान करो।' फिर वही बोलने लगी कि 'इतना ध्यान नहीं करो। तेरा भाई नाराज होता है। मैं तेरी माँ हूँ। मेरी आज्ञा मानो।'

अभी जहाँ भव्य आश्रम है, वहाँ पहले ऐसा कुछ नहीं था। कँटीले झाड़-झंखाड़ तथा भयावह वातावरण था वहाँ। उस समय जब हम मोक्ष कुटीर बना रहे थे, तब भाई माँ को बहकाकर ले आया और बोलाः "सात सात साल चला गया था। अब गुरुजी ने भेजा है तो घर में रहो, दुकान पर बैठो। यहाँ जंगल में कुटिया बनवा रहे हो! इतनी दूर तुम्हारे लिए रोज-रोज टिफिन कौन लायेगा?"

माँ भी कहने लगी "मैं तुम्हारी माँ हूँ न? तुम मातृ आज्ञा शिरोधार्य करो, यह ईंटें वापस कर दो। घर में आकर रहो। भाई के साथ दुकान पर बैठा करो।"

यह माँ की आज्ञा नहीं थी, ममता की आज्ञा थी और भाई की चाबी भराई हुई आज्ञा थी। माँ ऐसी आज्ञा नहीं देती।

भाई मुझे घर ले जाने के लिए जोर मार रहा था। भाभी भी कहने लगीः "यहाँ उजाड़ कोतरों में अकेले पड़े रहोगे? क्या हर रोज मणिनगर से आपके भाई टिफिन लेकर यहाँ आयेंगे?"

मैंने कहाः "ना.... ना... आपका टिफिन हमको नहीं चाहिए। उसे अपने पास ही रखो। यहाँ आकर तो हजारों लोग भोजन करेंगे। हमारा टिफिन वहाँ से थोड़े ही मँगवाना है?"

उन लोगों को यही चिन्ता होती थी कि यह अकेला यहाँ रहेगा तो मणिनगर से इसके लिए खाना कौन लायेगा? उनको पता नहीं कि जिसके सात साल साधना में गये हैं वह अकेला नहीं है, विश्वेश्वर उसके साथ है। बेचारे संसारियों की बुद्धि अपने ढंग की होती है।

माँ मुझे दोपहर को समझाने आयी थी। उसके दिल में ममता थी। यहाँ पर कोई पेड़ नहीं था, बैठने की जगह नहीं थी। छोटे-बड़े गड्डे थे। जहाँ मोक्ष कुटीर बनी है, वहाँ खिजड़े का पेड़ थाष वहाँ लोग दारू छिपाते थे। कैसी-कैसी विकट परिस्थितियाँ थीं, लेकिन हमने निर्णय कर लिया था कि कुछ भी हो, हम तो अपनी राम-नाम की शराब पियेंगे, पिलायेंगे। ऐसे ही कर्मावती ने भी निर्णय कर लिया था लेकिन उसे भीतर छिपाये थी। जगत भक्ति नहीं और करने दे नहीं। दुनिया दोरंगी है।

दुनिया कहे मैं दुरंगी पल में पलटी जाऊँ।

सुख में जो सोते रहें वा को दुःखी बनाऊँ।।

आत्मज्ञान या आत्मसाक्षात्कार तो बहुत ऊँची चीज होती है। तत्त्वज्ञानी के आगे भगवान कभी अप्रकट रहता ही नहीं। आत्मसाक्षात्कारी तो स्वयं भगवत्स्वरूप हो जाते हैं। वे भगवान को बुलाते नहीं। वे जानते हैं कि रोम-रोम में, अनंत-अनंत ब्रह्माण्डों में जो ठोस भरा है वह अपने हृदय में भी है। ज्ञानी अपने हृदय में ईश्वर को जगा लेते हैं, स्वयं ईश्वरस्वरूप बन जाते हैं। वे पक्के गुरु के चेले होते हैं, ऐसे वैसे नहीं होते।

कर्मावती 18 साल की हुई। उसका साधन-भजन ठीक से आगे बढ़ रहा था। बेटी उम्र लायक होने से पिता परशुरामजी को भी चिन्ता होने लगी कि इस कन्या को भक्ति का रंग लग गया है। यदि शादी के लिए ना बोल देगी तो? ऐसी बातों में मर्यादा, शर्म, संकोच खानदानी के ख्यालों का वह जमाना था। कर्मावती की इच्छा न होते हुए भी पिता ने उसकी मँगनी करा दी। कर्मावती कुछ नहीं बोल पायी।

शादी का दिन नजदीक आने लगा। वह रोज परमात्मा से प्रार्थना करने लगी और सोचने लगीः "मेरा संकल्प तो है परमात्मा को पाने का, ईश्वर के ध्यान में तल्लीन रहने का। शादी हो जायेगी तो संसार के कीचड़ में फँस मरूँगी। अगले कई जन्मों में भी मेरे कई पति होंगे, माता पिता होंगे, सास-श्वसुर होंगे। उनमें से किसी ने मृत्यु से नहीं छुड़ाया। मुझे अकेले ही मरना पड़ा। अकेले ही माता के गर्भ में उल्टा होकर लटकना पड़ा। इस बार भी मेरे परिवारवाले मुझे मृत्यु से नहीं बचायेंगे।

मृत्यु आकर जब मनुष्य को मार डालती है, तब परिवाले सह लेते हैं कुछ कर नहीं पाते, चुप हो जाते हैं। यदि मृत्यु से सदा के लिए पीछा छुड़ानेवाले ईश्वर के रास्ते पर चलते हैं तो कोई जाने नहीं देता।

हे प्रभु ! क्या तेरी लीला है ! मैं तुझे नहीं पहचानती लेकिन तू मुझे जानता है न? मैं तुम्हारी हूँ। हे सृष्टिकर्ता ! तू जो भी है, जैसा भी है, मेरे हृदय में सत्प्रेरणा दे।"

इस प्रकार भीतर-ही-भीतर भगवान से प्रार्थना करके कर्मावती शांत हो जाती तो भीतर से आवाज आतीः "हिम्मत रखो.... डरो नहीं.... पुरुषार्थ करो। मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ।" कर्मावती को कुछ तसल्ली-सी मिल जाती।

शादी का दिन नजदीक आने लगा तो कर्मावती फिर सोचने लगीः "मैं कुंवारी लड़की... सप्ताह के बाद शादी हो जायेगी। मुझे घसीट के ससुराल ले जायेंगे। अब मेरा क्या होगा...?" ऐसा सोचकर वह बेचारी रो पड़ती। अपने पूजा के कमरे में रोते-रोते प्रार्थना करती, आँसू बहाती। उसके हृदय पर जो गुजरता था उसे वह जानती थी और दूसरा जानता था परमात्मा।

'शादी को अब छः दिन बचे... पाँच दिन बचे.... चार दिन बचे।' जैसे कोई फाँसी की सजा पाया हुआ कैदी फाँसी की तारीख सुनकर दिन गिन रहा हो, ऐसे ही वह दिन गिन रही थी।

शादी के समय कन्या को वस्त्राभूषण से, गहने-अलंकारों से सजाया जाता है, उसकी प्रशंसा की जाती है। कर्मावती यह सब सांसारिक तरीके समझते हुए सोच रही थी कि "जैसे बैल को पुचकार कर गाड़ी में जोता जाता है, ऊँट को पुचकार कर ऊँटगाड़ी में जोता जाता है, भैंस को पुचकार कर भैंसगाड़ी में जोता जाता है, प्राणी को फुसलाकर शिकार किया जाता है वैसे ही लोग मुझे पुचकार-पुचकार कर अपना मनमाना मुझसे करवा लेंगे। मेरी जिन्दगी से खेलेंगे।"

"हे परमात्मा ! हे प्रभु ! जीवन इन संसारी पुतलों के लिए नहीं, तेरे लिये मिला है। हे नाथ ! मेरा जीवन तेरे काम आ जाये, तेरी प्राप्ति में लग जाये। हे देव ! हे दयालु ! हे जीवनदाता !...." ऐसे पुकारते-पुकारते कर्मावती कर्मावती नहीं रहती थी, ईश्वर की पुत्री हो जाती थी। जिस कमरे में बैठकर वह प्रभु के लिए रोया करती थी, आँसू बहाया करती थी। जिस कमरे में बैठकर वह प्रभु के लिए रोया करती थी, आँसू बढ़ाया करती थी वह कमरा भी कितना पावन हो गया होगा। !

शादी के अब तीन दिन बचे थे.... दो दिन बचे थे... रात को नींद नहीं, दिन को चैन नहीं। रोते-रोते आँखें लाल हो गयीं। माँ पुचकारती, भाभी दिलासा देती और भाई रिझाता लेकिन कर्मावती समझती कि यह सारा पुचकार बैल को गाड़ी में जोतने के लिए हैं.... यह सारा स्नेह संसार के घट में उतारने के लिए है....

"हे भगवान ! मैं असहाय हूँ.... निर्बल हूँ.... हे निर्बल के बल राम ! मुझे सत्प्रेरणा दे.... मुझे सन्मार्ग दिखा।"

कर्मावती की आँखों में आँसू हैं... हृदय में भावनाएँ छलक रही हैं और बुद्धि में द्विधा हैः 'क्या करूँ? शादी को इन्कार तो कर नहीं सकती.... मेरा स्त्री शरीर...? क्या किया जाये?'

भीतर से आवाज आयीः "तू अपने के स्त्री मत मान, अपने को लड़की मत मान, तू अपने को भगवदभक्त मान, आत्मा मान। अपने को स्त्री मानकर कब तक खुद को कोसती रहेगी? अपने को पुरुष मान कर कब तक बोझा ढोती रहेगी? मनुष्यत्व तो तुम्हारा चोला है। शरीर का एक ढाँचा है। तेरा कोई आकार नहीं है। तू तो निराकार बलस्वरूप आत्मा है। जब-जब तू चाहेगी, तब-तब तेरा मार्गदर्शन होता रहेगा। हिम्मत मत हार। पुरुषार्थ परम देव है। हजार विघ्न-बाधाएँ आ जायें, फिर भी अपने पुरुषार्थ से नहीं हटना।"

तुम साधना के मार्ग पर चलते हो तो जो भी इन्कार करते हैं, पराये लगते हैं, शत्रु जैसे लगते हैं वे भी, जब तुम साधना में उन्नत होंगे, ब्रह्मज्ञान में उन्नत होंगे तब तुमको अपना मानने लग जायेंगे, शत्रु भी मित्र बन जायेंगे। कई महापुरुषों का यह अनुभव हैः

आँधी और तूफान हमको न रोक पाये।

मरने के सब इरादे जीने के काम आये।

हम भी हैं तुम्हारे कहने लगे पराये।।

कर्मावती को भीतर से हिम्मत मिली। अब शादी को एक ही दिन बाकी रहा। सूर्य ढलेगा... शाम होगी, रात्री होगी.... फिर सूर्योदय होगा... और शादी का दिन.... इतने ही घण्टे बीच में? अब समय नहीं गँवाना है। रात सोकर या रोकर नहीं गँवानी है। आज की रात जीवन या मौत की निर्णायक रात होगी।

कर्मावती ने पक्का निर्णय कर लियाः "चाहे कुछ भी हो जाये, कल सुबह बारात के घर के द्वार पर आये उसके पहले यहाँ से भागना पड़ेगा। बस यही एक मार्ग है, यही आखिरी फैसला है।"

क्षण..... मिनट.... और घण्टे बीत रहे थे। परिवार वाले लोग शादी की जोरदार तैयारियाँ कर रहे थे। कल सुबह बारात का सत्कार करना था, इसका इंतजाम हो रहा था। कई सगे-सम्बन्थी-मेहमान घर पर आये हुए थे। कर्मावती अपने कमरे में यथायोग्य मौके के इंतजार में घण्टे गिन रही थी।

दोपहर ही.... शाम हुई.... सूर्य ढला.... कल के लिए पूरी तैयारियाँ हो चुकी थीं। रात्रि का भोजन हुआ, दिन के परिश्रम से थके लोग रात्रि को देरी से बिस्तर पर लेट गये। दिन भर जहाँ शोरगुल मचा था, वहाँ शांति छा गयी।

ग्यारह बजे... दीवार की घड़ी ने डंके बजाये... फिर टिक्... टिक्.... टिक्... टिक्...क्षण मिनट में बदल रही हैं... घड़ी का काँटा आगे सरक रहा है.... सवा ग्यारह..... साढ़े ग्यारह.... फिर रात्री के नीरव वातावरण में घड़ी का एक डंका सुनाई पड़ा... टिक्....टिक्....टिक्.... पौने बारह..... घड़ी आगे बढ़ी... पन्द्रह मिनट और बीते.... बारह बजे... घड़ी ने बारह डंके बजाना शुरु किया.... कर्मावती गिनने लगीः एक... दो... तीन... चार... दस... ग्यारह... बारह।

अब समय हो गया। कर्मावती उठी। जाँच लिया कि घर में सब नींद में खुर्राटे भर रहे हैं। पूजा घर में बाँकेबिहारी कृष्ण कन्हैया को प्रणाम किया... आँसू भरी आँखों से उसे एकटक निहारा... भावविभोर होकर अपने प्यारे परमात्मा के रूप को गले लगा लिया और बोलीः "अब मैं आ रही हूँ तेरे द्वार.... मेरे लाला....!"

चुपके से द्वार खोला, दबे पाँव घर से बाहर निकली। उसने आजमाया कि आँगन में भी कोई जागता नहीं है? .... कर्मावती आगे बढ़ी। आँगन छोड़कर गली में आ गयी। फिर सर्राटे से भागने लगी। वह गलियाँ पार करती हुई रात्रि के अंधकार में अपने को छुपाती नगर से बाहर निकल गयी और जंगल का रास्ता पकड़ लिया। अब तो वह दौड़ने लगी थी। घरवाले संसार के कीचड़ में उतारें उसके पहले बाँके बिहारी गिरधर गोपाल के धाम में उसे पहुँच जाना था। वृन्दावन कभी देखा नहीं था, उसके मार्ग का भी उसे पता नहीं था लेकिन सुन रखा था कि इस दिशा में है।

कर्मावती भागती जा रही है। कोई देख लेगा अथवा घर में पता चल जायेगा तो लोग खजाने निकल पड़ेंगे.... पकड़ी जाऊँगी तो सब मामला चौपट हो जायेगा। संसारी माता-पिता इज्जत-आबरू का ख्याल करके शादी कराके ही रहेंगे। चौकी पहरा बिठा देंगे। फिर छूटने का कोई उपाय नहीं रहेगा। इस विचार से कर्मावती के पैरों में ताकत आ गयी। वह मानों, उड़ने लगी। ऐसे भागी, ऐसे भागी कि बस.... मानों, बंदूक लेकर कोई उसके पीछे पड़ा हो।

सुबह हुई। उधर घर में पता चला कि कर्मावती गायब है। अरे ! आज तो हक्के-बक्के से हो गये। इधर-उधर छानबीन की, पूछताछ की, कोई पता नहीं चला। सब दुःखी हो गये। परशुराम भक्त थे, माँ भी भक्त थी। फिर भी उन लोगों को समाज में रहना था। उन्हें खानदानी इज्जत-आबरू की चिन्ता थी। घर में वातावरण चिन्तित बन गया कि 'बारातवालों को क्या मुँह दिखायेंगे? क्या जवाब देंगे? समाज के लोग क्या कहेंगे?"

फिर भी माता-पिता के हृदय में एक बात की तसल्ली थी कि हमारी बच्ची किसी गलत रास्ते पर नहीं गयी है, जा ही नहीं सकती। उसका स्वभाव, उसके संस्कार वे अच्छी तरह जानते थे। कर्मावती भगवान की भक्त थी। कोई गलत मार्ग लेने का वह सोच ही नहीं सकती थी। आजकल तो कई लड़कियाँ अपने यार-दोस्त के साथ पलायन हो जाती है। कर्मावती ऐसी पापिनी नहीं थी।

परशुराम सोचते हैं कि बेटी परमात्मा के लिए ही भागी होगी, फिर भी क्या करूँ? इज्जत का सवाल है। राजपुरोहित के खानदान में ऐसा हो? क्या किया जाये? आखिर उन्होंने अपने मालिक शेखावत सरदार की शरण ली। दुःखी स्वर में कहाः "मेरी जवान बेटी भगवान की खोज में रातोंरात कहीं चली गयी है। आप मेरी सहायता करें। मेरी इज्जत का सवाल है।"

सरदार परशुराम के स्वभाव से परिचित थे। उन्होंने अपने घुड़सवार सिपाहियों को चहुँ ओर कर्मावती की खोज में दौड़ाया। घोषणा कर दी कि जंगल-झाड़ियों में, मठ-मंदिरों में, पहाड़-कंदराओं में, गुरुकुल-आश्रमों में सब जगह तलाश करो। कहीं से भी कर्मावती को खोज कर लाओ। जो कर्मावती को खोजकर ले आयेगा, उसे दस हजार मुद्रायें इनाम में दी जायेंगी।

घुड़सवार चारों दिशा में भागे। जिस दिशा में कर्मावती भागी थी, उस दिशा में घुड़सवारों की एक टुकड़ी चल पड़ी। सूर्योदय हो रहा था। धरती पर से रात्रि ने अपना आँचल उठा लिया था। कर्मावती भागी जा रही थी। प्रभात के प्रकाश में थोड़ी चिन्तित भी हुई कि कोई खोजने आयेगा तो आसानी से दिख जाऊँगी, पकड़ी जाऊँगी। वह वीरांगना भागी जा रही है और बार-बार पीछे मुड़कर देख रही है।

दूर-दूर देखा तो पीछे रास्ते में धूल उड़ रही थी। कुछ ही देर में घुड़सवारों की एक टुकड़ी आती हुई दिखाई दी। वह सोच रही हैः "हे भगवान ! अब क्या करूँ? जरूर ये लोग मुझे पकड़ने आ रहे हैं। सिपाहियों के आगे मुझ निर्बल बालिका क्या चलेगा? चहुँओर उजाला छा गया है। अब तो घोड़ों की आवाज भी सुनाई पड़ रही है। कुछ ही देर में वे लोग आ जायेंगे। सोचने का भी समय अब नहीं रहा।"

कर्मावती ने देखाः रास्ते के किनारे मरा हुआ एक ऊँट पड़ा था। पिछले दिन ही मरा था और रात को सियारों ने उसके पेट का माँस खाकर पेट की जगह पर पोल बना दिया था। कर्मावती के चित्त में अनायास एक विचार आया। उसने क्षणभर में सोच लिया कि इस मरे हुए ऊँट के खाली पेट में छुप जाऊँ तो उन कातिलों से बच सकती हूँ। वह मरे हुए, सड़े हुए, बदबू मारनेवाले ऊँट के पेट में घुस गयी।

घुड़सवार की टुकड़ी रास्ते के इर्दगिर्द पेड़-झाड़ी-झाँखड़, छिपने जैसे सब स्थानों की तलाश करती हुई वहाँ आ पहुँची। सिपाही मरे हुए ऊँट के पाय आये तो भयंकर दुर्गन्ध। वे अपना नाक-मुँह सिकोड़ते, बदबू से बचने के लिए आगे बह गये। वहाँ तलाश करने जैसा था भी क्या?

कर्मावती ऐसी सिर चकरा देने वाली बदबू के बीच छुपी थी। उसका विवेक बोल रहा था कि संसार के विकारों की बदबू से तो इस मरे हुए ऊँट की बदबू बहुत अच्छी है। संसार के काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर की जीवनपर्यन्त की गन्दगी से तो यह दो दिन की गन्दगी अच्छी है। संसार की गन्दगी तो हजारों जन्मों की गन्दगी में त्रस्त करेगी, हजारों-लाखों बार बदबूवाले अंगों से गुजरना पड़ेगा, कैसी-कैसी योनियों में जन्म लेना पड़ेगा। मैं वहाँ से अपनी इच्छा के मुताबिक बाहर नहीं निकल सकती। ऊँट के शरीर से मैं कम-से-कम अपनी इच्छानुसार बाहर तो निकल जाऊँगी।'

कर्मावती को मरे हुए, सड़ चुके ऊँट के पेट के पोल की वह बदबू इतनी बुरी नहीं लगी, जितनी बुरी संसार के विकारों की बदबू लगी। कितनी बुद्धिमान रही होगी वह बेटी !

कर्मावती पकड़े जाने के डर से उसी पोल में एक दिन.. दो दिन... तीन दिन तक पड़ी रही। जल्दबाजी करने से शायद मुसीबत आ जाये ! घुड़सवार खूब दूर तक चक्कर लगाकर दौड़ते, हाँफते, निराश होकर वापस उसी रास्ते से गुजर रहे थे। वे आपस में बातचीत कर रहे थे कि "भाई ! वह तो मर गयी होगी। किसी कुएँ या तालाब में गिर गयी होगी। अब उसका हाथ लगना मुश्किल है।" पोल में पड़ी कर्मावती ये बातें सुन रही थी।

सिपाही दूर-दूर चले गये। कर्मावती को पता चला फिर भी दो-चार घण्टे और पड़ी रही। शाम ढली, रात्री हुई, चहुँ ओर अँधेरा छा गया। जब जंगल में सियार बोलने लगे, तब कर्मावती बाहर निकली। उसने इधर-उधर देख लिया। कोई नहीं था। भगवान को धन्यवाद दिया। फिर भागना शुरु किया। भयावह जंगलों से गुजरते हुए हिंसक प्राणियों की डरावनी आवाजें सुनती कर्मावती आगे बढ़ी जा रही थी। उस वीर बालिका को जितना संसार का भय था, उतना क्रूर प्राणियों का भय नहीं था। वह समझती थी कि "मैं भगवान की हूँ और भगवान मेरे हैं। जो हिंसक प्राणी हैं वे भी तो भगवान के ही हैं, उनमें भी मेरा परमात्मा है। वह परमात्मा प्राणियों को मुझे खा जाने की प्रेरणा थोड़े ही देगा ! मुझे छिप जाने के लिए जिस परमात्मा ने मरे हुए ऊँट की पोल दी, सिपाहियों का रुख बदल दिया वह परमात्मा आगे भी मेरी रक्षा करेगा। नहीं तो यह कहाँ रास्ते के किनारे ही ऊँट का मरना, सियारों का माँस खाना, पोल बनना, मेरे लिए घर बन जाना? घर में घर जिसने बना दिया वह परम कृपालु परमात्मा मेरा पालक और रक्षक है।"

ऐसा दृढ़ निश्चय कर कर्मावती भागी जा रही है। चार दिन की भूखी-प्यासी वह सुकुमार बालिका भूख-प्यास को भूलकर अपने गन्तव्य स्थान की तरफ दौड़ रही है। कभी कहीं झरना मिल जाता तो पानी पी लेती। कोई जंगली फल मिलें तो खा लेती, कभी-कभी पेड़ के पत्ते ही चबाकर क्षुधा-निवृत्ति का एहसास कर लेती।

आखिर वह परम भक्ति बालिका वृन्दावन पहुँची। सोचा कि इसी वेश में रहूँगी तो मेरे इलाके के लोग पहचान लेंगे, समझायेंगे, साथ चलने का आग्रह करेंगे। नहीं मानूँगी जबरन पकड़कर ले जायेंगे। इससे अपने को छुपाना अति आवश्यक है। कर्मावती ने वेश बदल दिया। सादा फकीर-वेश धारण कर लिया। एक सादा श्वेत वस्त्र, गले में तुलसी की माला, ललाट पर तिलक। वृन्दावन में