अमदावाद (विशेष ब्यूरो)। संत श्री आसारामजी बापू के खिलाफ चल रहे षड्यंत्र के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए काँची के कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जगदगुरु श्री जयेन्द्र सरस्वतीजी ने कहाः 'राजनीति से गड़बड़ हो रही है। यह जल्दी से जल्दी शांत हो।' 

सनातन संस्कृति के आधारस्तंभ संत महापुरुषों को बार-बार आरोपित कर श्रद्धालू भक्तों की श्रद्धा को आहत करने के षड्यंत्रकारियों के कुप्रयासों को विफल करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहाः 'हम लोग बोल रहे हैं, कर रहे हैं, और ज्यादा करना है। सभी संत लोग शामिल होने के लिए प्रयास करके सभी जगह संतों द्वारा, गाँव-गाँव और नगर-नगर प्रचार-प्रसार होना अत्यंत आवश्यक है। संघे शक्ति कलियुगे। सब लोग मिलकर करना। सभी संत लोग, महाराज लोग, सब लोग मिलकर काम करने से कुप्रचारक दुर्जन भयभीत होंगे। इसलिए सब लोग मिलने का प्रयास करना।'"मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र श्री आसाराम जी बापू से मैं पूर्वकाल से हृदयपूर्वक परिचित हूँ। संसार में सुखी रहने के लिए समस्त जनता को शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक शांति दोनों आवश्यक हैं। सुख-शांति व स्वास्थ्य का प्रसाद बाँटने के लिए ही इन संत का, महापुरुष का अवतरण हुआ है। आज के संतों-महापुरुषों में प्रमुख मेरे प्रिय मित्र बापूजी हमारे भारत देश के, हिन्दू जनता के, आम जनता के, विश्ववासियों के उद्धार के लिए रात-दिन घूम-घूमकर सत्संग, भजन, कीर्तन आदि द्वारा सभी विषयों पर मार्गदर्शन दे रहें हैं। अभी में गले में थोड़ी तकलीफ है तो उन्होंने तुरन्त मुझे दवा बताई। इस प्रकार सबके स्वास्थ्य और मानसिक शांति, दोनों के लिए उनका जीवन समर्पित है। वे धनभागी हैं जो लोगों को बापूजी के सत्संग व सान्निध्य में लाने का दैवी कार्य करते हैं।"

प्रेस की ताकत' के पत्रकार ने इस प्रकरण के बारे में स्थानीय संतों से बातचीत की तो जगन्नाथ मंदिर, अमदावाद के महंत श्री रामेश्वरदास जी महाराज ने कहा कि 'आसारामजी बापू की संस्था को बदनाम किया जा रहा है, यह तो गलत बात है। राजनीति करने वाले धर्म को भी बदनाम करते हैं, धार्मिक लोगों को भी बदनाम करते हैं तथा अपनी राजनीति करने के लिए देश की संस्कृति का पोषण करने वालों के लिए भी षड्यंत्र करते हैं।"

वहीं सुप्रसिद्ध स्वामीनारायण मंदिर, अमदावाद के श्री हरिहरानन्दजी, महाराज ने मीडिया के रोल के बारे में कहा कि 'हम तो इतना कहना चाहते हैं कि यह हिन्दू संस्कृति जो है, उसको नष्ट कर देने के लिए कुछ लोग ऐसे सब षड्यंत्र बनाते हैं। किसी का समाज में मान होता है तो वे देख नहीं पाते, ऐसे झूठे आरोप डालकर अर्थ का अनर्थ करते हैं। बाकी जो कर्त्तव्य जिनका है वे तो करते हैं। हकीकत, जो रीयल स्टोरी है, वह जब सामने आयेगी, उसके बाद आप छाप सकते हैं।"

गीता मंदिर, अमदावाद के श्री शिवानन्दजी सरस्वती ने 'प्रेस की ताकत' के पत्रकार को एक विशेष भेंट में कहा कि 'ये दंगा मचा रहे हैं, किसको जला रहे हैं? बस को जला रहे हैं। घाटा किसको है? किसको भोगना पड़ेगा? अपने आपको ही भोगना पड़ेगा। टैक्स लगेगा, ये लगेगा... सरकार किसकी है? अपनी ही है न! कोई भी सरकार हो, चाहे काँग्रेस हो, भाजपा हो, कोई भी हो लेकिन घाटा तो अपने को ही है। महँगाई बढ़ेगी। तो ऐसा पेपर पढ़ने वालों को सोचना चाहिए कि क्या सही है, क्या सही नहीं है। इसको ध्यान में रखें, फिर बात कहनी चाहिए। उसने तो दे दिया है लेकिन सही क्या है उसका इंतज़ार भी करना पड़ता है। देखना चाहिए, फिर उसकी खोज करो कि यह सही है-नहीं है और जो सही नहीं है उसका विरोध करो।"

 जब 'प्रेस की ताकत' के पत्रकार राकेश अग्रवाल ने गीता मंदिर, अमदावाद के श्री भास्करानंदजी महाराज से उनके विचार जानने चाहे तो उन्होंने कहा कि 'जो दुर्घटना हुई, बच्चे मरे यह दुर्घटना कैसे भी हो सकती है। उसमें आश्रम का हाथ हो या न हो, मंदिर का इतना बवाल हुआ, तोड़-फोड़ हुई, हानि अपने हिन्दू-हिन्दू में ही....। यह बवाल एकदम गलत है, नहीं होना चाहिए क्योंकि इसमें राजनीति या फिर कोई दूसरी पार्टी का हाथ था, पूरा विश्वास है कि ऐसा ही था। मैं सब लोगों से कहना चाहता हूँ कि इस प्रकार अपने ही आप में ऐसे भ्रमित होकर किसी पर बहुत आरोप नहीं लगाना चाहिए और यह गलत ही बात है कि ये जो लोग भड़क रहे हैं, दंगा कर रहे हैं, रैली निकाल रहे हैं, धर्म के प्रति, आसारामजी के प्रति या आश्रम के प्रति यह बात सिद्ध नहीं हुई है कि आसारामजी बापू के साधकों ने मर्डर किया। यह निराधार बात जब सिद्ध हो जाये, उसके बाद ही किसी पर आरोप लगा सकते हैं।'

('प्रेस की ताकत' से साभार)

 "यदि आपने बापू के विरुद्ध कुछ भी छापा तो मै आपके ऊपर कोर्ट केस कर दूंगा !

ये वचन कहे जुनापीठ के महामंडलेश्वर स्वामी श्री अवधेशानंदजी ने | जब पत्रकारों ने आसाराम बापू प्रकरण पर उनके विचार जानने चाहे तो उन्होंने कहा कि, 'बहुत हो गया ! आज मीडिया बापू को खलनायक सिद्ध करने पर तुला हुआ है | भारतीय संस्कृति पर यह प्रहार कतई बर्दास्त नहीं होगा' | उन्होंने पत्रकारों से यह भी कह दिया कि, "यदि आपने आसारामजी बापू के विरुद्ध कुछ भी छापा तो मै आपके ऊपर कोर्ट केस कर दूंगा !"वे अलमस्त फकीर हैं। वे बड़े सरल और सहज हैं। वे जितने ही ऊपर से सरल हैं, उतने ही अंतर में गूढ़ हैं। उनमें हिमालय जैसी उच्चता, पवित्रता, श्रेष्ठता है और सागरतल जैसी गम्भीरता है। वे राष्ट्र की अमूल्य धरोहर हैं। उन्हें देखकर ऋषि-परम्परा का बोध होता है। गौतम, कणाद, जैमिनि, कपिल, दादू, मीरा, कबीर, रैदास आदि सब कभी-कभी उनमें दिखते हैं।

‘हर व्यक्ति जो निराश है उसे आसाराम जी की ज़रूरत है - श्री रामदेव जी

"श्रद्धेय-वंदनीय जिनके दर्शन से कोटि-कोटि जनों के आत्मा को शांति मिली है व हृदय उन्नत हुआ है, ऐसे महामनीषि संत श्री आसारामजी के दर्शन करके आज मैं कृतार्थ हुआ। जिस महापुरुष ने, जिस महामानव ने, जिस दिव्य चेतना से संपन्न पुरुष ने इस धरा पर धर्म, संस्कृति, अध्यात्म और भारत की उदात्त परंपराओं को पूरी ऊर्जा (शक्ति) से स्थापित किया है, उस महापुरुष के मैं दर्शन न करूँ ऐसा तो हो ही नहीं सकता। इसलिए मैं स्वयं यहाँ आकर अपने-आपको धन्य और कृतार्थ महसूस कर रहा हूँ। मेरे प्रति इनका जो स्नेह है यह तो मुझ पर इनका आशीर्वाद है और बड़ों का स्नेह तो हमेशा रहता ही है छोटों के प्रति। यहाँ पर मैं आशीर्वाद लेने के लिए आया हूँ।
मैं समझता हूँ कि जीवन में लगभग हर व्यक्ति निराश है और उसको आसारामजी की ज़रूरत है। देश यदि ऊँचा उठेगा, समृद्ध बनेगा, विकसित होगा तो अपनी प्राचीन परंपराओं, नैतिक मूल्यों और आदर्शों से ही होगा और वह आदर्शों, नैतिक मूल्यों, प्राचीन सभ्यता, धर्म-दर्शन और संस्कृति का जो जागरण है, वह आशाओ के राम बनने से ही होगा। इसलिए श्रद्धेय, वंदनीय महाराज श्री 'आसाराम जी' की सारी दुनिया को जरूरत है। बापू जी के चरणों में प्रार्थना करते हुए कि आप दिशा देते रहना, राह दिखाते रहना, हम भी आपके पीछे-पीछे चलते रहेंगे और एक दिन मंजिल मिलेगी ही, पुनः आपके चरणों में वंदन!"
 - प्रसिद्ध योगाचार्य श्री रामदेव जी महाराज

बापू नित्य नवीन, नित्य वर्धनीय आनंदस्वरूप हैं

"परम पूज्य बापू के दर्शन करके मैं पहले भी आ चुका हूँ। दर्शन करके 'दिने-दिने नवं-नवं प्रतिक्षण वर्धनाम्' अर्थात बापू नित्य नवीन, नित्य वर्धनीय आनंदस्वरूप हैं, ऐसा अनुभव हो रहा है और यह स्वाभाविक ही है। पूज्य बापू जी को प्रणाम!"
-सुप्रसिद्ध कथाकार संत श्री मोरारी बापू

पुण्य संचय व ईश्वर की कृपा का फलः ब्रह्मज्ञान का दिव्य सत्संग

"ईश्वर की कृपा होती है तो मनुष्य जन्म मिलता है। ईश्वर की अतिशय कृपा होती है तो मुमुक्षत्व का उदय होता है परन्तु जब अपने पूर्वजन्मों के पुण्य इकट्ठे होते हैं और ईश्वर की परम कृपा होती है तब ऐसा ब्रह्मज्ञान का दिव्य सत्संग सुनने को मिलता है, जैसा पूज्यपाद बापूजी के श्रीमुख से आपको यहाँ सुनने को मिल रहा है।"  
- प्रसिद्ध कथाकार सुश्री कनकेश्वरी देवी

संतो के सेवा कार्य भी तो दिखाये मीडिया !

    भारत के संत समाज के विरुद्ध अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक बहुत ही सोचा समझा और नियोजित षडयंत्र रचा गया है। कभी कथित हत्या के आरोप तो कभी योग से विश्व भर को निरोगी करने के एक योगी के प्रयासों को झूठा सिद्ध करने एवं उनकी दवाओं में पशुओं की हड्डियाँ होने संबंधी आरोपों के कुत्सित समाचारों से चारों ओर सनसनी फैली हुई है। बहुत गहराई से विचार करने पर यही सत्य सामने आता है कि यह सब कुछ और नहीं, कोका कोला जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की बोतलों से निकला वह जिन्न है जिसका बाबा रामदेवजी महाराज जैसे संतों ने पर्दाफाश किया है। उसके बाद जिस प्रकार कम से कम उस कोका कोला बनाम टायलेट क्लीनर की बिक्री को तगड़ा झटका लगा, उसके बाद यह तो तय ही था कि भारत के संत समाज के विरुद्ध कोई न कोई साजिश तो रची ही जायेगी।
मैं पत्रकारिता जगत का पूर्ण सम्मान करती हूँ, लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ होने के नाते उसकी अपनी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका भी है। मगर मैं पत्रकार जगत को पूछना चाहती हूँ कि जिस सजगता और सक्रियता से 'स्टिंग आप्रेशन' कर रहे हैं, काले और सफेद धन की पड़ताल कर रहे हैं, क्या उतनी ही सजगता के साथ आपके गुप्त कैमरों ने कभी उन दृश्यों को भी अपने स्टिंग आप्रेशन में कैद किया है जिनमें भारत के संत इस देश के वनवसियों, गिरिवासियों एवं वंचितों के उत्थान के प्रयास करते दिखायी देते हैं? क्या आपके कैमरों की लाईटें कभी वहाँ भी चमकती हैं जहाँ संतजन अपने सेवाकार्यों की रोशनी से गरीबी एवं विवशता के अँधेरों को मिटाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं?
मैं पूछना चाहती हूँ कि टेलिविज़न चैनलों से कि जिस तरह आप चौबीसों घंटे एक ऐसे स्टिंग आप्रेशन को बार-बार देश को दिखाते रहते हैं जिसकी सत्यता की जाँच होनी बाकी हो, क्या कभी आपने चौबीसों घंटे संतों के किसी चिकित्सालय में चल रहे निःशुल्क सेवाकार्यों का प्रसारण देशवासियों को दिखाया? क्या संतों के अथक परिश्रम से गढ़े गये वात्साल्य के उन मंदिरों पर आपने कैमरों को केन्द्रित किया, जहाँ दिन रात विशुद्ध सेवाभाव से समाज के उपेक्षित एवं निराश्रित बचपन को सुसंस्कारित दिशा देने के प्रयास किये जा रहे हैं?
नहीं.... ऐसा कभी-कभी ही किया करते हैं आप लोग क्योंकि इसमें कोई सनसनी नहीं होती। कभी यदि यह दिखाया भी गया होगा तो कुछ मिनटों का वृत्तचित्र दिखाकर इतिश्री कर ली गयी होगी। मैं मीडिया पर दोषोरोपण नहीं कर रही हूँ कि कैसे सनसनी फैलाने के समाचारों का संकलन और दृश्यों का फिल्मांकन किया जाता है। मुझे आज भी वह भयानक रौंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य स्मरण आता है जब दिल्ली में आरक्षण विरोधी एक छात्र के आत्मदाह का दृश्य मैंने टेलिविज़न पर समाचारों में देखा था – स्वयं पर पेट्रोल डालकर धू-धू करके जलता वह छात्र और उसके पीछे दौड़-दौड़कर उस दृश्य को फिल्माते चैनलों के कैमरामैन! कल्पना कीजिये कैसा क्रूरतम दृश्य था कि चार-पाँच लोग दौड़ कर जलते हुए उस असहाय छात्र को शूट कर रहे हैं लेकिन किसी के मन में भी यह दया नहीं आयी कि अपना कैमरा रखकर कहीं से बाल्टी भर पानी उड़ेलकर उसकी आग बुझाने का प्रयास किया जाय। मैं पूछना चाहती हूँ कि अगर वह छात्र उन छायाकारों में से किसी का बेटा या भाई होता तब भी क्या वह उसे जलता हुआ देखकर केवल तस्वीरें ही उतारता रहता? ऐसी भयावह एक्सलूसिव तस्वीरें दिखाकर आप देश को कहाँ ले जाना चाहते हैं?
आज विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर भारत के प्राचीन सांस्कृतिक मूल्यों, जिन्हें भारत का संत समाज आज भी सहेजे हुए है, को नष्ट करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। हिन्दुओं की सदाशयता (उदारता, सज्जनता) का लाभ उठाकर उनके मानबिन्दुओं पर हमला किया जा रहा है। कभी मुस्लिम अथवा ईसाई पंथों पर कोई टिप्पणी करके देखिये, उनके अनुयायी सड़कों पर उतर आयेंगे। मैं इलैक्ट्रॉनिक मीडियाकर्मीयों से निवदेन करती हूँ कि कभी किसी कटती हुई गाय का भी स्टिंग आप्रेशन कीजिये और उसे बार-बार अपने चैनलों पर दिखाइये। देश की जनता के बताइये कि वह जो गाय काटी जा रही है, उसका देश की अर्थव्यवस्था में कितना बड़ा योगदान था!
कभी स्टिंग आप्रेशन कीजिए उन मदरसों का, जहाँ मजहबी शिक्षा के नाम पर किस तरह से नयी पीढ़ी की रगों में नफरत का जहर भरा जा रहा है। उन घनघोर जंगलों और पहाड़ों में जाकर अपने स्टिंग आप्रेशन का जौहर दिखाइये जहाँ भूखे वनवासियों को मुट्ठी भर चावल देकर किस तरह से मतान्तरित किया जा रहा है। कभी अपने अत्याधुनिक कैमरों को सूदूर पूर्वोत्तर भारत के उन सुलगते प्रान्तों की ओर भी घुमाइये जहाँ अलगाववाद की आग भड़कायी जा रही है।
मैं निवेदन करना चाहती हूँ भारत के पत्रकार जगत से कि आप लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि भारत को बनाये रखने के लिए कटिबद्ध संत समाज को जनमानस से काट देने के कैसे कुत्सित और अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास किये जा रहे हैं! आप उन षडयन्त्रों का पीछा कीजिये जो कोका कोला के जहर को उजागर करने वाले एक संत को रास्ते से हटाने के कथित मंसूबे पाले हुए हैं। सारे संत-समाज की छवि को नकारात्मक बनाया जाना अन्यायपूर्ण है और ऐसे प्रयासों को रोकने का उत्तरदायित्व भी मीडियाकर्मियों का ही है।
- साध्वी ऋतम्भरा