श्रीगणेशाय नमः

श्रीयोगवाशिष्ठ

द्वितीय भाग निर्वाण प्रकरण


 

अनुक्रम

 

दिवसरात्रिव्यापारवर्णन.. 7

विश्रामदृढ़ीकरणं.. 9

ब्रह्मैकप्रतिपादन.. 11

चित्तभावाभाववर्णन.. 12

राघवविश्रान्तिवर्णन.. 13

राघवविश्रान्तिवर्णन.. 13

अज्ञानमाहात्म्यवर्णन.. 14

अविद्यालतावर्णन.. 18

अविद्या निराकरण.. 19

अविद्याचिकित्सावर्णन.. 21

जीवन्मुक्तनिश्चयोपदेश.. 23

जीवन्मुक्तनिश्चय वर्णन.. 27

ज्ञानज्ञेयविचार. 28

भुशुण्ड्यु पाख्याने सुमेरुशिखर लीलावर्णन.. 29

भुशुण्डिदर्शन.. 30

भुशुण-डिसमागमन.. 31

भुशुण्ड्यु पाख्याने अस्ताचललाभ.. 32

सन्तमाहात्म्यवर्णन.. 34

भुशुण्ड्यु पाख्याने जीवितवृत्तान्त वर्णन.. 36

चिरातीतवर्णन.. 38

संकल्पनिराकरण.. 40

समाधि वर्णन.. 41

चिरञ्जीविहेतुकथन.. 44

भुशुण्ड्यु पाख्यानसमाप्ति... 46

परमार्थयोगोपदेश.. 47

देहसत्ताविचार. 50

वशिष्ठाश्रमवर्णन.. 54

रुद्रवशिष्ठसमागम.. 55

जगत्परमात्मरूप वर्णन.. 57

चैतन्योन्मुखत्वविचार. 59

मनप्राणोक्त प्रतिपादन.. 63

देहपातविचार. 66

दैवप्रतिपादन.. 68

परमेश्वरोपदेश.. 70

देवनिर्णयो... 72

महेश्वरवर्णन.. 74

नीतिनृत्यवर्णन.. 75

अन्तर्बाह्यपूजावर्णन.. 76

देवार्चनाविधान.. 77

देवपूजाविचार. 79

जगन्मिथ्यात्वप्रतिपादन.. 80

परमार्थविचार. 82

विश्रान्ति आगम.. 84

चित्तसत्तासूचन.. 86

विल्वोपाख्यान.. 88

शिलाकोशउपदेश.. 89

सत्ताउपदेश.. 91

ब्रह्मएकताप्रतिपादन.. 93

स्मृतिविचारयोग.. 94

संवेदनविचार. 96

यथार्थोपदेश.. 98

नारायणावतार. 101

अर्जुनोपदेश.. 103

सर्वब्रह्मप्रतिपादन.. 106

जीवनिर्णय.. 108

अर्जुन विश्रान्तिवर्णन.. 110

भविष्यद् गीता... 112

प्रत्यगात्मबोधवर्णन.. 113

विभूतियोगोपदेश.. 115

जाग्रत्स्वप्नविचारो.. 116

ब्रह्मैकताप्रतिपादन.. 117

वैताल प्रश्नोक्ति.... 123

भगीरथोपदेश.. 125

निर्वाणवर्णन.. 128

भगीरथोपाख्यानसमाप्ति... 129

शिखर ध्वजचुड़ालोपाख्यान.. 130

चुड़ालाप्रबोध.. 131

अग्निसोमविचारयोग.. 133

चिन्तामणिवृत्तान्त.... 140

हस्तिआख्यानवर्णन.. 147

हस्तीवृत्तान्तवर्णन.. 148

शिखरध्वजसर्वत्याग वर्णन.. 150

राजविश्रान्ति वर्णन.. 154

निर्वाणप्रकरण.. 157

शिखरध्वजबोधन.. 157

शिखरध्वजबोध वर्णन.. 162

परमार्थपदेश.. 164

शिखरध्वजबोध वर्णन.. 166

शिखरध्वजस्त्री प्राप्ति... 169

विवाहलीला वर्णन.. 173

मायाशक्रागमन वर्णन.. 175

मायापिञ्जर वर्णन.. 176

निर्वाण प्रकरण.. 177

शिखरध्वजचुड़ालाख्यान.. 179

बृहस्पति बोधन.. 180

मिथ्यापुरुषाकाश रक्षाकरणं.. 182

मिथ्यापुरुषोपाख्यान.. 184

परमार्थयोगोपदेश.. 186

महाकर्त्राद्युपदेश.. 188

कलना निषेध.. 190

सन्तलक्षण माहात्म्यवर्णन.. 192

इक्ष्वाकुप्रत्यक्षपदेश.. 195

राजाइक्ष्वाकुप्रत्यक्षपदेश.. 197

सर्वब्रह्म-प्रतिपादन.. 200

परमनिर्वाण वर्णन.. 203

मोक्षरूप वर्णन.. 205

परमार्थपदेश.. 207

 

 

द्वितीय भाग निर्वाण प्रकरण प्रारम्भ

दिवसरात्रिव्यापारवर्णन

वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज! उपशम प्रकरण के अनन्तर अब तुम निर्वाण प्रकरण सुनो जिसके जानने से तुम निर्वाणपद को प्राप्त होगे | बड़े उत्तम वचन मुनिनायक ने रामजी से कहे हैं और रामजी ने सब और ओर से मन खैंचकर मुनीश्वर के वाक्यों में स्थापित किया है | और राजालोग भी निस्स्पन्द हो गये मानो कागज पर चित्र लिखे हैं-और वशिष्ठजी के वचनों को विचरने लगे | राजकुमार भी विचारते और कण्ठ हिलाते थे और शिर और भुजा फेर के विस्मय को प्राप्त हुए | वे प्रसन्नता को प्राप्त हुए कि जिस जगत् को सत्य जानकर हम बिचरते थे वह है ही नहीं | ऐसा विचारकर वे आश्चर्य को प्राप्त हुए | तब दिन का चतुर्थभाग रह गया और सूर्य अस्त हुए-मानो वशिष्ठजी के वचन सुनकर वे भी कृतार्थ हुए हैं -सब तेजक्षीण हो गया और शीतलता प्राप्त हुई | स्वर्ग से जो सिद्ध और देवता आये थे उनके गले में मन्दार आदिक वृक्षों के फूल थे उनसे पवन के द्वारा सब स्थान सुगन्धित हो गये और भँवरे फूलों पर गुञ्जार करने लगे और झरोखों के मार्ग से सूर्य की किरणें आती थीं उनसे सूर्यमुखी कमल जो राजा और देवताओं के शीश पर थे वह सूख गये | जैसे मन से जगत् की सत्ता निवृत्त हो जाती है और वृत्ति सकुचाती जाती है | बालक जो सभा में बैठे थे और पिञ्जरों में जो पक्षी बैठे थे उनके भोजन का समय हुआ और बालकों के भोजन के निमित्त मातायें उठीं | जब चौथे पहर राजा की नौबत, नगारे, भेरी, शहनाई, बाजे बजने लगे और वशिष्ठजी जो बड़े ऊँचे स्वर से कथा कहते थे- उनका शब्द नगारे और बाजों से दब गया तब-जैसे वर्षाकाल का मेघ गरजता है और मोर बोलकर तूष्णींम् हो जाते हैं तैसे ही वशिष्ठजी तूष्णीम् हो गये | ऐसा शब्द हुआ कि जिससे आकाश, पृथ्वी और सब दिशा भर गये और पिञ्जरो में पक्षी पंखों को फैलाकर भड़ भड़ शब्द करने लगे-जैसे भूकम्प हुए से लोग काँपते और शब्द करते हैं और-बालक माता के शरीर से लिपट गये | इसके अनन्तर मुनिशार्दूल वशिष्ठजी बोले कि हे निष्पाप, रघुनाथ! मैंने तुम्हारे चित्तरूपी पक्षी के फँसाने के निमित्त अपना वाक््रूपी जाल फैलाया है, इससे अपने चित्त को वश करके तुम आत्मपद में लगो | हे रामजी! यह जो मैंने तुमको उपदेश किया है उसके सार में दुर्बुद्धि को त्यागकर चित्त को लगाओ | जैसे हंस जल को त्याग कर दूध पान करता है तैसे ही आदि से अन्तपर्यन्त सब उपदेश बारम्बार विचारकर सार को अंगीकार करो | इस प्रकार संसारसमुद्र से तरकर परमपद को प्राप्त होगे | अन्यथा होगे | हे रामजी! जो इन वचनों को अंगीकार करेगा वह संसारसमुद्र से तर जावेगा और जो अंगीकार करेगा वह नीच गति को प्राप्त होगा | जैसे विन्ध्याचल पर्वत की खाईं में हाथी गिरके कष्ट पाता है तैसे ही वह संसार में कष्ट पावेगा | हे रामजी! ये जो मेरे वचन हैं इनको ग्रहण करोगे तो नीचे गिरोगे-जैसे पन्थी हाथ से दीपक त्यागकर रात्रि को गढ़े में गिरता है-और जो असंग होकर व्यवहार में विचरोगे तो आत्मसिद्धि को प्राप्त होगे | यह जो मैंने तुमको तत्त्वज्ञान, मनोनाश और वासनाक्षय कहा है इस अभ्यास से सिद्धि को प्राप्त होगे | यह शास्त्र का सिद्धान्त है | हे सभा! हे महाराजो, हे राम, लक्ष्मण और भूपतिलोगों! जो कुछ मैंने तुमसे कहा है उसको तुम विचारो, जो कुछ और कहना है उसे मैं प्रातःकाल कहूँगा | इतना कह वाल्मीकिजी बोले हे साधो! इस प्रकार जब मुनीश्वरों ने कहा तब सब सभा उठ खड़ी हुई और वशिष्ठजी के वचनों को पाकर सब खिल आये-जैसे सूर्य को पाकर कमल खिल आता है | वशिष्ठ और विश्वामित्र दोनों इकट्ठे उठे और वशिष्ठजी विश्वामित्र को अपने आश्रम में ले गये आकाशचारी देवता और सिद्ध वशिष्ठजी को नमस्कार करके अपने अपने स्थानों को गये, राजा दशरथ अर्ध्य पाद्य से वशिष्टजी का पूजन करके अपने अन्तःपुर में गये और श्रोता लोग भी आज्ञा लेकर और वशिष्ठजी का पूजन करके अपने अपने स्थानों में गये | राजकुमार अपने मण्डल को गये, मुनीश्वर वन में गये और राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न वशिष्ठजी के आश्रम को गये और पूजा करके फिर अपने गृह में आये | सब श्रोता अपने अपने स्थानों को जाकर स्नानसन्ध्यादिक कर्म करने लगे, पितर और देवताओं की पूजा और ब्राह्मणों से लेकर भृत्य पर्यन्त सबको भोजन कराकर अपने मित्र और भाइयों के साथ भोजन किया और यथाशक्ति अपने वर्णाश्रम के धर्म को साधा | जब सूर्य भगवान् अस्त हुए और दिन की क्रिया निवृत्त हो गई तब रात्रि हुई और निशाचर बिचरने लगे तब भूचर, राजऋषि और राजपुत्र आदिक जो श्रोता थे सो रात्रि को एकान्त में अपने अपने आसन पर बैठकर विचारने लगे | राजकुमार और राजा अपने अपने स्थानों पर बैठे और ब्राह्मण, तपस्वी कुशादिक बिछाकर बैठे विचारते थे कि संसार के तरने का क्या उपाय कहा है, और जो वशिष्ठजी ने वचन कहे थे उनमें भले प्रकार चित्त को एकाग्र कर और भले प्रकार विचारकर निद्रा को प्राप्त हुए | जैसे सूर्य उदय हुए पद्मिनियाँ मुँद जाती हैं तैसे ही वे सब सुषुप्ति को प्राप्त हुए, पर राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न तीन पहर वशिष्ठजी के उपदेश को विचारते रहे और आधे पहर सोकर फिर उठे | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे दिवसरात्रिव्यापारवर्णनन्नाम प्रथमस्सर्गः ||1||

अनुक्रम


विश्रामदृढ़ीकरणं   

वाल्मीकिजी बोले, हे साधो! इस प्रकार जब रात्रि व्यतीत हुई और तम का नाश हुआ तब राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्नादिक स्नान और सन्ध्यादिक कर्म करके वशिष्ठजी के आश्रम में जा स्थित हुए | वशिष्ठजी भी संन्ध्यादिक करके अग्निहोत्र करने लगे और जब कर चुके तब रामादिक ने उनको अर्ध्य पाद्य से पूजा और चरणों पर भले प्रकार मस्तक रक्खा | जब राम जी गये थे तब वशिष्ठजी के द्वारे पर कोई था पर एक घड़ी में अनेक सहस्त्र जीव आये और वशिष्ठजी रामादिक को साथ लेकर राजा दशरथ के गृह में आये | तब राजा दशरथ उनकी अगवानी को आगे आये और वशिष्ठजी का आदर पूजन किया और दूसरे लोगों ने भी बहुत पूजन किया | निदान नभचर और भूचर जितने श्रोता थे वे सब आये और नमस्कार करके बैठे और सब निस्स्पन्द और एकाग्र होकर स्थित भये | जैसे निस्स्पन्द वायु से कमलोंकी पंक्ति अचल होती है तैसे वे बैठे | भाटजन जो स्तुति करनेवाले थे वे भी एक ओर बैठे और सूर्य की किरणें झरोखों के मार्ग से आईं - मानो किरणें भी वशिष्ठजी के वचन सुनने को आई हैं | तब वशिष्ठजी की ओर रामजी ने देखा जैसे स्वामिकार्त्तिक शंकर की ओर, कच बृहस्पति की ओर और प्रह्लाद शुक्र की ओर देखें तैसे ही रामजी की दृष्टि औरों को देखते-देखते वशिष्ठजी पर स्थित हुई | तब वशिष्ठ जी ने रामजी की ओर देखा और बोली, हे रघुनन्दन! मैंने जो तुमको उपदेश किया है वह तुमको कुछ स्मरण है? वे वचन परमार्थबोध के कारण, आनन्दरूप और महागम्भीर हैं | अब और भी बोध के कारण और अज्ञानरूपी शत्रु के नाशकर्त्ता, इन्दुप्रभा वचनों को सुनो निरन्तर आत्मसिद्धान्त शास्त्र मैं तुमसे कहता हूँ | हे रामजी! वैराग्य और तत्त्व के विचार से संसारसमुद्र को तरता है और सम्यक््तत्त्व के बोध से जब दुर्बोध निवृत्त हो जाता है तब वासना का आवेश नष्ट हो जाता है और निर्दुःखपद को प्राप्त हो जाता है वह पद देशकाल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है | वही ब्रह्म जगत््रूप होकर स्थित हुआ है और भ्रम से द्वैत की नाईं भासता है | वह सब भावों से अविच्छिन्न सर्वत्र ब्रह्म है, इस प्रकार महत् स्वरूप जानकर शान्तिमान् हो | हे रामजी! केवल ब्रह्म तत्त्व अपने आपमें स्थित है, कुछ चित्त है, अविद्या है, मन है, जीव है, यह सब कलना ब्रह्म में भ्रम से फुरती हैं | जो स्पन्द फुरना दृश्य और चित्त है सो कलनारूप संभ्रम है | ब्रह्म में कोई पदार्थ नहीं | हे रामजी! स्वर्ग, पाताल और भूमि में सदाशिव से तृण पर्यन्त जो कुछ दृश्य है वह सब परब्रह्म है-चिद्रूप से अन्य नहीं | उदासीन और मित्र, बाँधव से लेकर सब ब्रह्म है जबतक अज्ञान कलना से जगत् में बुद्धि स्थित है और ब्रह्मभाव नानात्व है तबतक चित्तादि कलना होती है, जब तक देह में अहंभाव है और अनात्मदृश्य में ममत्व है तबतक चित्त आदिक भ्रम होता है और जबतक सन्तजन और सत््शास्त्रों से ऊँचे पद को नहीं पाया और मूर्खता क्षीण नहीं हुई तबतक चित्तादिक भ्रम होता है | हे रामजी! जबतक देहाभिमान शिथिलता को नहीं प्राप्त हुआ, संसार की भावना नहीं मिटी और सम्यक््ज्ञान करके स्थिति नहीं पाई, जबतक चित्तादिक प्रकट हैं, तबतक अज्ञान से अन्धा है और विषयों की आशा के आवेश से मूर्छित है और मोह मूर्च्छा से नहीं उठा तब तक चित्तादिक कलना होती है | हे रामजी! जबतक आशारूपी विष की गन्ध हृदयरूपी वन में होती है तबतक विचाररूपी चकोर नहीं प्राप्त होता और भोगवासना नहीं मिटती | जब भोगों की आशा मिट जावे और सत्य शीतलता और संतुष्टता में हृदय प्राप्त हो तब चित्तरूपी भ्रम निवृत्त हो जाता है | जब मोह और तृष्णा निवृत्तकरिये और नित्य अभ्यास हो तब चित्त शान्त भूमिका को प्राप्त होता है हे रामजी! जिस पुरुष की स्थिति स्वरूप में हुई है वह आपको देह से देखता है | उस सम्यक््दर्शी के चित्त की भूमिका कहते हैं | जब अनन्त चेतनतत्त्व की भावना होती है और दृश्य को त्यागकर आत्मस्वरूप में प्राप्त होता है तब वह पुरुष सब जगत् को अपना अंग ही देखता है अर्थात् सब अपना स्वरूप देखता है | ऐसा जो आत्मरूप देखता है उसको जीवत्वादिक भ्रम कहाँ है? जब अज्ञान भ्रम निवृत्त होता है | तब परम अद्वैत पद उदय होता है | जैसे रात्रि के क्षीण हुए उदय होता है तैसे ही मोह के निवृत्त हुए आत्म तत्त्व का साक्षात्कार होता है और जब स्वरूप का साक्षात्कार होता है तब चित्त नष्ट हो जाता है | जैसे सूखा पत्र अग्नि में दग्ध हो जाता है तैसे ही ज्ञानवान् का चित्त नष्ट हो जाता है | हे रामजी! जीवन्मुक्त जो महात्मा पुरुष और परावरदर्शी है और जिसको सर्वत्र ब्रह्म ही दीखता है उसका चित्त सत्यपद को प्राप्त होता है | वह चित्त सत्य कहाता है और उसमें वासना भी दृष्टि नहीं आती | वह चैतन्यमन है और वह चित्त सत्यपद को प्राप्त हुआ है |  यह जगत् ज्ञानवान् को लीलामात्र भासता है और वह हृदय से शान्तिरूप और नित्यतृप्त है उसको सर्वदा आत्मज्योति भासती है, विवेक से उसके चित्त से जगत् की सत्ता निवृत्त हो गई है और स्वरूप में उसने स्थिति पाई है सो चित्तसत्ता कहाती है | फिर वह कर्म चेष्टा करता भी दृष्टि आता है और मोह को नहीं प्राप्त होता जैसे भुना बीज नहीं उगता तैसे ही ज्ञानी की चेष्टा जन्म का कारण नहीं और जो अज्ञानी हैं उनकी वासना मोह संयुक्त है | जैसे कच्चा बीज उगता है तैसे ही अज्ञानी वासना से फिर जन्म लेता है और जिस चित्त से आसक्ति निवृत्त हुई है उसकी वासना जन्म का कारण नहीं | वह चित्तसत्ता कहाती है | हे रामजी! जिन पुरुषों ने पाने योग्य पद पाया है और ज्ञानाग्नि से चित्त दग्ध किया है वे फिर जन्म नहीं लेते | जो कुछ जगत् है उनको सब ब्रह्मरूप है जैसे वृक्ष और तरु नाममात्र दो वास्तव में एक ही है, तैसे हि ब्रह्म और जगत् नाम मात्र दोनों हैं, पर वास्तव में एक ही है | जैसे जल में तरंग और बुद्बुदे जलरूप हैं तैसे ही ब्रह्म में जगत् ब्रह्मरूप है | चैतन्य आत्मारूपी मिरच में जगत््रूपी तीक्ष्णता है | हे रामजी! ऐसे ब्रह्म तुम हो | जो तुम कहो कि मैं चित्त नहीं तो कुछ माना जाता है, क्योंकि जो तुम कहो मैं जड़ हूँ तो तुम आकाशवत् हुए तुम्हारे में कलना का उल्लेख कैसे हो? जो चैतन्य हो तो शोक किसका करते हो जो चिन्मय हो तो निरायास आदि अन्त से रहित हुए | निदान सब तुमही हो अपने स्वरूप को स्मरण करो तब शान्ति पावोगे | जो सब भाव में स्थित हो और सबको उदय करनेवाले शान्तरूप, चैतन्य और ब्रह्मरूप हो | हे रामजी! ऐसी जो चैतन्यरूपी शिला है उसके उदय में वासनारूपी फुरना कहाँ हो? वह तो महाघनरूप है | हे रामजी! जो तुम हो सोई हो, उसमें और तुम्हारे में कुछ भेद नहीं | वही सत् और असत् रूप होकर भासता है, जिसके अन्तर सब पदार्थ हैं और जिसमें नानात्व और `अहं' `त्वं', `अज्ञ' `तज्ञ' की कुछ कलना नहीं | ऐसा जो सत्यरूप चिद्घन आत्मा है उसको नमस्कार है | हे रामजी! तुम्हारी जय हो | तुम आदि और अन्त से रहित विशाल हो और शिला के अन्तर्वत् चिद्घनस्वरूप आकाशवत् निर्मल हो | जैसे समुद्र में तरंग हैं तैसे ही तुम्हारे में जो जगत् है सो लीला मात्र है | तुम अपने घनस्वरूप में स्थित हो | 

इति श्री योगवाशीष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्रामदृढ़ीकरणं नाम द्वितीयस्सर्गः ||2

अनुक्रम

 

 


ब्रह्मैकप्रतिपादन  

वशिष्ठजी बोले, हे निष्पाप, रामजी!जिस चैतन्यरूपी समुद्र में जगत््रूपी तरंग फुरते और लीन हो जाते हैं ऐसे अनन्त आत्मभाव की भावना से मुक्त और भाव अभाव से रहित हो | ऐसा जो चिदात्म तुम्हारा स्वरूप है वही सब जगत््रूप है तब वासनादिक आवरण कहाँ हैं? जीव और वासना सब आत्मा का किञ्चन है दूसरी वस्तु कुछ नहीं तब और कथा और प्रसंग कैसे हो? हे रामजी! महासरल गम्भीर और प्रकाशरूप जो चैतन्य समुद्र है वह तुम्हारा रूप है और रामरूपी एक तरंग फुर आया है सो समुद्र तुम हो ऐसा जो आत्मतत्त्व है वह जगत्् रूपी होकर भासता है | जैसे अग्नि से उष्णता, फूल से सुगन्ध, कज्जल से कृष्णता, बरफ से शुक्लता, गुड़ से मधुरता और सूर्य से प्रकाश भिन्न नहीं तैसे ही ब्रह्म से अनुभव भिन्न नहीं-नित्यरूप है | अनुभव से अहं भिन्न नहीं, अहं से जीव भिन्न नहीं, जीव से मन भिन्न नहीं, मन से इन्द्रियाँ भिन्न नहीं, इन्द्रियों से देह भिन्न नहीं और देह से जगत् भिन्न नहीं | इस प्रकार महाचक्र जो प्रवृत्त की नाईं हुआ है सो कुछ हुआ नहीं, शीघ्र प्रवर्तन है, चिरकाल का प्रवर्ता है, कोई न्यून है और अधिक है, सर्वदा एक अखण्डसत्ता परमात्मतत्त्व है जैसे आकाश में आकाश स्थित है तैसे ही ब्रह्मसत्ता अपने आप में स्थित है | वही सत्ता वज्रभूत और वही पूर्ण होकर स्थित है, द्वैतकल्पना कुछ नहीं | ऐसे अपने स्वरूप में जो पुरुष स्थित है वह जीवन्मुक्त है | ऐसा जो ज्ञानवान् है वह मन, इन्द्रियों और शरीर की चेष्टा भी करता है पर उसको कर्तव्य का लेप नहीं लगता | हे रामजी! ज्ञानवान् को कुछ त्यागने योग्य रहता है और ग्रहण करने योग्य है, वह सब पदार्थों से निर्लेप रहता है जबतक इनको ग्रहण और त्याग की बुद्धि होती है तबतक संसार के सुख दुःख का भागी होता है और इससे हेयोपादेय जिसको अभाव है वह सुख दुःख का भागी नहीं होता | हे रामजी! जो कुछ जगत् है वह एक अद्वैत आत्मतत्त्व है, अन्य कुछ नहीं | जैसे घट मठ की उपाधि से आकाश नाना प्रकार का भासता है और समुद्र तरंग से अनेक रूप भासता है पर नानात्वभाव को नहीं प्राप्त होता तैसे ही आत्मा में नाना प्रकार का जगत् भासता है और नानात्व को नहीं प्राप्त होता | ऐसे स्वरूप को जानकर उसमें स्थित हो, बाहर से अपने वर्णाश्रम का व्यवहार करो पर हृदय से पत्थर की नाईं हर्ष शोक से रहित हो | संवित्तमात्र आत्मा को जो अपना रूप देखता है वही सम्यक््दर्शी है और उसका अज्ञान और मोह नष्ट हो जाता है | जैसे नदी का वेग मूलसहित तट के वृक्ष को काटता है तैसे ही आत्मज्ञान मोह सहित अज्ञान को काटता है | मित्रता, वैर, हर्ष, शोक, राग, द्वेष आदिक जो विकार हैं वे चित्त में रहते हैं सो उसका चित्त नष्ट हो जाता है | हे रामजी! ज्ञानी सोता भी दृष्टि आता है पर कदाचित् नहीं सोता जिसका अनात्मा में अहं भाव निवृत्त हुआ है और जिसकी बुद्धि लेपायमान नहीं होती वह पुरुष इस लोक को मारे तो भी उसने कोई नहीं मारा और वह बन्धायमान होता है | हे रामजी! जो वस्तु हो और भासे उसको मायामात्र जानिये, जानने से वह नष्ट हो जावेगी | जैसे तेल बिना दीपक शान्त हो जाता है तैसे ही ज्ञान से वासना क्षय हो जाती है और चित्त अचित्त हो जाता है | जिसको सुख दुःख में ग्रहण त्याग नहीं वह जीवन्मुक्त आत्मस्थित है | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मैकप्रतिपादनन्नाम तृतीयस्सर्गः ||3||

अनुक्रम


चित्तभावाभाववर्णन

वशिष्ठजी बोले हे रामजी! मन, बुद्धि, अहंकार और इन्द्रयादिक जो दृश्य हैं वह अचिन्त्य चिन्मात्र है और जीव भी उससे अभिन्नरूप है | जैसे सुवर्ण और भूषण में भेद कुछ नहीं तैसे ही चिन्मात्र और जीवादिक अभिन्न हैं | जबतक चित्त अज्ञान में होता है तबतक जगत् का कारण होता है और जब अज्ञान नष्ट हो जाता है तब चित्तादिक का अभाव हो जाता है अध्यात्मविद्या जो वेदान्तशास्त्र है उसके अभ्यास से अज्ञान नष्ट हो जाता है | जैसे अग्नि के तेज से शीत का अभाव हो जाता है तैसे ही अध्यात्मविद्या के विचार और अभ्यास से अज्ञान नष्ट हो जाता है | जबतक अज्ञान का कारण तृष्णा उपशम को नहीं प्राप्त हुई तबतक अज्ञान है- और जबतृष्णा नष्ट हो तब जानिये कि अज्ञान का अभाव हुआ | हे रामजी! तृष्णारूपी विषूचिका रोग के नाश करने का मन्त्र अध्यात्मशास्त्र ही है, उसके अभ्यास से तृष्णा क्षीण हो जाती है | जैसे शरत््काल में कुहिरा नष्ट हो जाता है, तैसे ही आत्मअभ्यास से चित्त शान्त हो जाता है, और जैसे शरत््काल में मेघ नष्ट होजाता है तैसे ही विचार से मूर्खता नष्ट हो जाती है | जब चित्त अचित्तता को प्राप्त होता है तब वासनाभ्रम क्षीण हो जाता है जैसे तागे से मोती पिरोये होते हैं और तागे के टूटे से मोती भिन्न भिन्न हो जाते हैं तैसे ही अज्ञान के नष्ट हुए मनादिक सब नष्ट हो जाते हैं | जो पुरुष अध्यात्म शास्त्र के अर्थ को नहीं धारण करते और प्रीति ही करते हैं वे पापी कीटादिक नीच योनि को प्राप्त होंगे | हे कमलनयन! तुम्हारे में जो कुछ मूर्खता और चञ्चलता थी वह नष्ट हो गई है और जैसे पवन के ठहरने से जल अचल होता है तैसे ही तुम स्थिर और भाव अभाव से रहित परम आकाशवत् निर्मल पद को प्राप्त हुए हो | हे रामजी! मैं ऐसे मानता हूँ कि मेरे वचनों से तुम बोधवान् हुए हो और विस्तृत अज्ञानरूपी निद्रा से जागे हो | समान जीव भी हमारी वाणी से जग आते हैं, और तुम तो अति उदार बुद्धि हो तुम्हारे जागने में क्या आश्चर्य है? हे रामजी! जब गुरु भी दृढ़ होता है और शिष्य भी शुद्धपात्र होता है तब गुरु के वचन उसके हृदय में प्रवेश करते हैं सो मैं गुरु भी समर्थ हूँ कि मुझको अपना स्वरूप सदा प्रत्यक्ष है और सत््शास्त्र के अनुसार मैंने वचन कहे हैं और तेरा हृदय भी शुद्ध है उसमें प्रवेश कर गये हैं | जैसे तप्त पृथ्वी के क्षेत्र में जल प्रवेश कर जाता है तैसे ही हृदय में वचनों ने प्रवेश किया है | हे राघव! हम महानुभाव रघुवंश कुल के बड़े गुरु के गुरु हैं ,हमारे वचन तुमको धारने आते हैं | अब खेद से रहित होकर अपने प्रकृत आचार को करो | इतना कहकर बाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब मुनीश्वर ने कहा तब सूर्य अस्त होने लगा और सब सभासद परस्पर नमस्कार करके अपने अपने स्थानों को गये | रात्रि के व्यतीत हुए सूर्य की किरणों के निकलते ही फिर बैठे | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्तभावाभाववर्णनन्नामचतुर्थस्सर्गः ||4||

अनुक्रम

 
राघवविश्रान्तिवर्णन

रामजी बोले, हे मुनीश्वर! मैं परम स्वस्थता को प्राप्त होकर अपने आप में स्थित हूँ  और आपके वचनों की भावना से जगज्जाल के स्थित हुए भी मुझको शान्ति हो गई है | आत्मानन्द से मैं तृप्त हुआ हूँ-जैसे बड़ी वर्षा से पृथ्वी तृप्त होती है-और प्रसन्नता को पाकर स्थित हूँ | सब ओर से केवल आत्मारूप मुझको भासता है और नानात्व का अभाव हुआ है | जैसे कुहिरे से रहित दिशा और आकाश निर्मल भासता है तैसे ही सम्यक््ज्ञान से मुझको शुद्ध आत्मा भासता है और मोह निवृत्त हो गया है | मोहरूपी जंगल में जो तृष्णारूपी मृग और रागद्वेष आदिक धूलि और कुहिरा था सो सब निवृत्त हो गया है और ज्ञानरूपी वर्षा से सब शान्त हो गये है | अब मैं आत्मानन्द को प्राप्त हुआ हूँ, जो आदि अन्त से रहित और अमृत है बल्कि अमृत का स्वाद भी उसके आगे तुच्छ भासता है | ऐसे आनन्द से मैं अपने स्वभाव में प्राप्त हुआ हूँ मैं राम हूँ अर्थात् सबमें रमने वाला हूँ, मेरा मुझको नमस्कार है | अब में सब सन्देह से रहित हूँ और सब संशय और विकार मेरे नष्ट हुए हैं | जैसे प्रातःकाल होने से निशाचर और वैताल आदिक निवृत्त हो जाते हैं तैसे ही राग द्वेषादिक विकारोंका अभाव हुआ और निर्मल हृदय कमल में मैं स्थित हूँ | जैसे भँवरा फिरता फिरता कमल में स्थित होता है तैसे ही मैं आत्मरूपी सार में स्थित हूँ | अविद्यारूपी कलंक आत्मा को कहाँ था मैं तो निश्चय से निर्मलताको प्राप्त हुआ हूँ |जैसे सूर्य के उदय हुए तम का अभाव  हो जाता है तैसे ही मेरी संशय और अविद्या नाश हुई है | अब मुझे सर्व आत्मा भासता है  और कलना कोई नहीं | भावित आकार अपने स्वरूप को प्राप्त हुआ | मैं पूर्व प्रकृति को देखके हँसता हूँ कि क्या जानता था और क्या करता था | मैं तो नित्य शुद्ध ज्यों का त्यों आदि अन्त से रहित हूँ | हे मुनीश्वर! तेरे वचनरूपी अमृत के समुद्र में मैंने स्नान किया है और उससे अजर-अमर आनन्दपद को पाकर सूर्य से भी ऊँचे पद को प्राप्त हुआ हूँ और वीतशोक होकर परम शुद्धता, समता, शीतलता और अद्वैत अनुभव को प्राप्त हूँ | 

 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे राघवविश्रान्तिवर्णनन्नाम पञ्चमस्सर्गः ||5||
अज्ञानमाहात्म्यवर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे महाबाहो! फिर भी मेरे परम वचन सुनो; तुम्हारे हित की कामना से मैं कहता हूँ | अब तुम आत्मपद को प्राप्त हुए हो परन्तु बोध की वृद्धि के निमित्त फिर सुनो, जिसके सुनने से अल्पबुद्धि भी आनन्दपद को प्राप्त हो | हे रामजी! जिसको अनात्म में आत्माभिमान है और आत्मज्ञान नहीं हुआ उसको इन्द्रियरूपी शत्रु दुःख देते  हैं जैसे निर्बल पुरुषको चोर दुःख देते हैं और जिसकी आत्मपद में स्थिति हुई है उसको  इन्द्रियाँ दुःख नहीं देतीं-जैसे दृढ़ राजा के शत्रु भी मित्र हो जाते हैं तैसे ही ज्ञानवान् के इन्द्रियगण मित्र होते हैं | जिन पुरुषों की देह में स्थित बुद्धि है और इन्द्रियों के विषय की सेवना करते हैं उनको बड़े दुःख प्राप्त होते हैं | हे राम जी! आत्मा और शरीर का सम्बन्ध कुछ नहीं है | जैसे तम और प्रकाश विलक्षण स्वभाव हैं तैसे ही आत्मा और देह का परस्पर विलक्षण स्वभाव है | आत्मा सर्वविकारों से रहित, नित्यमुक्त, उदय अस्त से रहित और सबसे निर्लेप है और सदा ज्यों का त्यों प्रकाशरूप भगवान् आत्मा सतरूप है उसका सम्बन्ध किससे हो? देह जड़ और असत्य, अज्ञानरूप, तुच्छ, विनाशी और अकृतज्ञ है उसका संयोग किस भाँति हो? आत्मा चैतन्य, ज्ञान, सत् और प्रकाशरूप है उसका देह के साथ कैसे संयोग हो? अज्ञान से देह और आत्मा का संयोग भासता है, सम्यक््ज्ञान से संयोग का अभाव भासता है | हे रामजी! ये मैंनें निपुण वचन कहे हैं, इनका बारम्बार अभ्यास करने से संसार मोह का अभाव हो जावेगा | जब संसार का कारण मोह निवृत्त हुआ तब फिर उसका सद्भाव होगा जबतक अज्ञानरूपी निद्रासे दृढ़ होकर नहीं जागता तबतक आवरण रहता है | जैसे निद्रा के  जागे से फिर निद्रा घेर लेती है पर जब दृढ़ होके जागे तब फिर नहीं घेरती, तैसे ही दृढ़ अभ्यास से अज्ञान निवृत्त हुआ फिर आवरण करेगा | इससे मोह और दुःख निवृत्ति के अर्थ दृढ़ अभ्यास करो| हे रामजी! आत्मा देह के गुण को अंगीकार नहीं करता, यदि देह के गुण अंगीकार करे तो आत्मा भी जड़ हो जावे पर वह तो सदा ज्ञानरूप है, और जो देह आत्मा का गुण परमार्थ से अंगीकार करे तो देह भी चेतन हो जावे पर वह तो जड़रूप है |  उसको अपना ज्ञान कुछ नहीं | ज्यों का त्यों ज्ञान हो तब शरीर तुच्छ और जड़ भासे | हे रामजी! देह और आत्मा का कुछ सम्बन्ध नहीं और समवाय सम्बन्ध भी नहीं फिर इससे मिलकर वृथा दुःख को ग्रहण करना इससे बढ़के और मूर्खता क्या है? जब कुछ भी इसका समान लक्षण हो उसका सम्बन्ध कैसे हो? आत्मा चैतन्य है, देह जड़ है, आत्मा सत््रूप है, देह असत््रूप है, आत्मा प्रकाशरूप है, देह तमरूप है, आत्मा निराकार है, देह साकार है, आत्मा सूक्ष्म है और देह स्थूल है तो फिर आत्मा और देह का सम्बन्ध कैसे हो? और जब इनका संयोग ही नहीं तब दुःख किसका हो? जैसे सूक्ष्म और स्थूल दिन और रात्रि, ज्ञान और अज्ञान, धूप और छाया, सत् और असत् का सम्बन्ध नहीं होता तैसे ही आत्मा और देह का संयोग नहीं होता और देह के सुख दुःख से आत्मा को सुखी दुःखी जानना मिथ्याभ्रम है | जरा-मरण, सुख-दुःख, भाव-अभाव आत्मा में रञ्चकमात्रभी नहीं, यदि देह में अभिमान होता है तो ऊँच नीच जन्म पाता है, वास्तव में कुछ नहीं, केवल ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है और उसमें विकार कोई नहीं | जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब जल में होता है और जल के हिलने से प्रतिबिम्ब भी चलता है तैसे ही देह के  सुख दुःख से आत्मा में सुख दुःख विकार मूर्ख देखते हैं-आत्मा सदा निर्लेप है और जब यथाभूत सम्यक् आत्मज्ञान हो तब देह में स्थित भी भ्रम को प्राप्त हो | हे रामजी! जब यथाभूत ज्ञान होता है तब सत् को सत् जानता है और असत् को असत् जानता है | जैसे दीपक हाथ में होता है तब सत्-असत् पदार्थ भासते हैं तैसे ही ज्ञान से सत्-असत् यथार्थ जानता है और अज्ञान से मोह में भ्रमता है | जैसे वायु से पत्र भ्रमता है तैसे ही मोहरूपी वायु से अज्ञानी जीव भ्रमता है और कदाचित् स्वस्थ नहीं होता | जैसे यन्त्र की पुतली तागे से चेष्टा करती है तैसे ही अज्ञानी जीव प्राणरूपी तागे से चेष्टा करते हैं और जैसे नटुआ अनेक स्वाँग धारता है तैसे ही कर्म से जीव अनेक शरीर धारता है | जैसे काठकी पुतली तृण, काष्ठ, फूलादिक को लेती त्यागती और नृत्य करती है-  तैसे ही ये प्राणी भी चेष्टा करते हैं और शब्द, स्पर्श, रूप,रस, गन्ध का ग्रहण करते  हैं | जैसे वह पुतलियाँ जड़ हैं तैसे ही ये भी जड़ हैं | यदि कहिये कि इनमें तो प्राण है तो जैसे लुहार की धौकनी श्वास को लेती और त्यागती है तैसे ही ये जीव भी चेष्टा करते हैं | हे रामजी! अपना वास्तव स्वरूप है सो ब्रह्म है, उसके प्रमाद से जीव मोह और कृपणता को प्राप्त होते हैं | जैसे लुहार की खाल वृथा श्वास लेती है तैसे ही इनकी चेष्टा व्यर्थ है इनकी चेष्टा और बोलना अनर्थ के निमित्त है-जैसे धनुष  से जो बाण निकलता है सो हिंसा के निमित्त है, उससे और कुछ कार्य सिद्ध नहीं होता तैसे ही अज्ञानी की चेष्टा और बोलना अनर्थ और दुःख के निमित्त है, सुख के निमित्त नहीं और उसकी संगति भी कल्याण के निमित्त नहीं-जैसे जंगल के ठूँठ वृक्ष से छाया और फल की इच्छा करनी व्यर्थ है, तैसे ही अज्ञानी जीव की संगति से सुख नहीं होता | उनको दान देना व्यर्थ है-जैसे कीचड़ में घृत डालना व्यर्थ होता है तैसे ही मूर्खों को दान दिया व्यर्थ होता है और उनके साथ बोलना भी व्यर्थ है | जैसे यज्ञ में श्वान को बुलाना निष्फल है तैसे ही उनके साथ बोलना निष्फल है | हे रामजी! जो अज्ञानी जीव हैं वे संसार में आते, जाते और जन्मते, मरते हैं और शरीर में आस्था करते हैं, एवम् पुत्र, दारा, बान्धव, धनादिक से ममत्व बुद्धि करते हैं पर इस मिथ्यादृष्टि से वे दुःख पाते हैं और मुक्ति कदाचित नहीं होती, क्योंकि अनात्म में आत्मबुद्धि को त्याग नहीं करते और ममता बुद्धि में दृढ़ रहते हैं | हेरामजी! जो अज्ञानी हैं वे असत् पदार्थ को देखते हैं और वस्तुरूप की ओर से अन्धे हैं इससे वे परमार्थ धन से विमुख रहते हैं | नरक का सार जो स्त्री आदिक हैं उनमें वे प्रीति करते हैं और उनको देखकर प्रसन्न होते हैं | जैसे मेघ को देखकर मोर प्रसन्न होता है तैसे ही स्त्री आदिकों को देखकर मूर्ख प्रसन्न होते हैं | हे रामजी! मूर्ख के मारने के निमित्त स्त्री रूपी विष की बेलि है, नेत्ररूपी उसके फूल हैं, ओष्ठरूपी पत्र हैं, स्तनरूपी गुच्छे हैं और अज्ञानरूपी भँवरे वहाँ विराजमान होते हैं-और नाश करते हैं | मतिरूपी तालाब में हर्षरूपी कमल और चित्तरूपी भँवरे सदा रहते हैं और अज्ञानरूपी नदी में दुःखरूपी लहरें और तृष्णारूपी बुद्बुदे हैं, ऐसी नदी मरणरूपी बड़वाग्नि में  जा पड़ेगी | हे रामजी! जब जन्म होता है तब जीव महागर्भ अग्नि से जलता हुआ निकलता है और महामूर्ख अवस्था में निकलकर दुःखी होता है, जब यौवन अवस्था को प्राप्त होता है तब विषयों को सेवता है-वे भी दुःख के कारण होते हैं और फिर वृद्धा वस्था को प्राप्त होता है तब शरीर अशक्त होता है और हृदय को तृष्णा जलाती है | इस प्रकार जन्म-मरण अवस्था में जीव भटकते हैं | हे रामजी! संसाररूपी कूप में मोहरूपी घटों की माला है और तृष्णा और वासनारूपी रस्सी से बाँधे हुए जीव भ्रमते हैं |ज्ञान वान् को संसार कोई दुःख नहीं देता,गोपद की नाईं तुच्छ हो जाता है और अज्ञानी को समुद्रवत् तरना कठिन होता है | वह अपने भीतर ही भ्रम देखता है और निकल नहीं सकता थोड़ा भी उसको बहुत हो जाता है | जैसे पक्षी को पिंजरे में और कोल्हू के बैल को घर ही में बड़ा मार्ग हो जाता है तैसे ही अज्ञानी को तुच्छ संसार बड़ा हो भासता है | हे रामजी! जिस जगत् को रमणीय जानकर जीव उसके पदार्थों की इच्छा करता है वे सब पाञ्चभौतिक पदार्थ हैं पर मोह से उनको सुन्दर जानता है उनमें प्रीति करता है और स्थिर जानता है और वह सब अनर्थ के निमित्त होते हैं | हे रामजी! अज्ञानरूपी चन्द्रमा के उदय से भोगरूपी वृक्ष पुष्ट होते हैं और जन्मों की परंपरा रस को पाते हैं कर्मरूपी जल से सिंचते है और पुण्य और पापरूपी मञ्जरी उनमें होती है | अज्ञान रूपी चन्द्रमा का वासनारूपी अमृत है और आशारूपी चकोर उसको प्रसन्न होता है | आशा रूपी कमलिनी पर अज्ञानरूपी भँवरा बैठकर प्रसन्न होता है इससे सब जगत् अज्ञान से रमणीय भासता है | हे रामजी! जिस अज्ञान से यह जगत् स्थित है उसका प्रवाह सुनो | जब अज्ञानरूपी चन्द्रमा पूर्ण होकर स्थित होता है तब कामनारूपी क्षीरसमुद्र उछलता है और अनेक तरंग फैलाता है | उसके रस से तृष्णारूपी मञ्जरी पुष्ट होती है और काम, क्रोध, लोभ और मोहरूपी चकोर उसको देखकर प्रसन्न होते हैं | देह अभिमानरूपी रात्रि के निवृत्त हुए और विवेकरूपी सूर्य के उदय हुए अज्ञानरूपी चन्द्रमा का प्रकाश निवृत्त हो जाता है | हे रामजी! अज्ञान से जीव भ्रमते हैं और उनकी चेष्टा विपर्यय हो गई है, जो तुच्छ और नीच दुःखरूप पदार्थ हैं उनको देखकर सुखदायक और रमणीय जानते हैं और स्त्री को देख प्रसन्न होते हैं | कवीश्वर कहते हैं कि इसके कपोल कमलवत्, नेत्र भँवरेवत्, होठ हँसनेवाले और भुजा बेलि की नाईं हैं, कञ्चन के कलशवत् स्तन हैं, उदर और वक्षस्थल बहुत सुन्दर हैं और जंघस्थल केले के स्तम्भवत्् हैं |जिस स्त्री की कवि स्तुति करते हैं वह स्त्री रक्तमांस की पुतली है कपोल भी रक्तमांस हैं, होठ भी रक्तमाँस हैं, भुजा विष के वृक्ष के टासवत् हैं, स्तन  भी रक्तमाँस हैं और संपूर्ण शरीर भी रक्तमाँस अस्थि से पूर्ण एक मूर्ति बनी है उसको  जो रमणीय जानते हैं वे मूर्ख मोह से मोहित हुए हैं और अपने नाश के निमित्त इच्छा करते हैं | जैसे सर्पिणी से जो कोई हित करेगा वह नष्ट होगा तैसे ही इससे हित किये से नाश होगा और जैसे कदलीवन का महाबली हाथी काम से नीच गति पाता है और संकट में पड़ता है और अंकुश सहकर जो अपमान को प्राप्त होता है, सो एक के हित से ही ऐसी गति को प्राप्त होता है, तैसे ही यह जीव स्त्री की इच्छा करके अनेक दुःख पाता है | जैसे दीपक को रमणीय जानकर पतंग उसमें प्रवेश करता है और नष्ट होता है तैसे ही यह जीव स्त्री की इच्छा करता है और उसके संग से नाश को प्राप्त होता है | लक्ष्मी का आश्रय करके जो सुख की इच्छा करता है वह भी सुखी होगा | जैसे पहाड़ दूर से देखतेमात्र सुन्दर भासता है तैसे ही यह भी देखने में सुन्दर लगती है पर लक्ष्मी का आश्रय करके जो सुख की इच्छा करे सो सुख मिलेगा, अन्त में दुःख को ही प्राप्त होगा  जब लक्ष्मी प्राप्त होती है तब अनर्थ और पाप करने लगता है और दुःख का पात्र होता है, और जब जाती है तब दुःख दे जाती है और उससे जलता रहता है | हे रामजी! जगत् में सुख की इच्छा करना व्यर्थ है, प्रथम जन्म लेता है तब भी दुःख से जन्म लेता है,  फिर जन्म कर मूर्ख और नीच बालक अवस्था को प्राप्त होता है तब कुछ विचार नहीं होता है उसमें दुःख पाता है और कुछ शक्ति नहीं होती उससे दुःख पाता है, जब यौवन अवस्था रूपी रात्रि आती है तब उसमें काम, क्रोध,लोभ और मोहरूपी निशाचर विचरते हैं और तृष्णारूपी पिशाचिनी बिचरती है, क्योंकि उस अवस्था में विवेकरूपी चन्द्रमा नहीं उदय  होता उससे अन्धकार में वे सब क्रीड़ा करते हैं | हे रामजी! यौवन अवस्थारूपी वर्षा काल में बुद्धि आदिक नदियाँ मलिनभाव को प्राप्त होती हैं, कामरूपी मेघ गर्जता है और  तृष्णारूपी मोरनी उसको देख प्रसन्न होकर नृत्य करती है | फिर यौवन अवस्थारूपी चूहे को जरारूपी बिल्ली भोजन कर लेती है और शरीर महाजर्जरीभूत हो निर्बल हो जाता है, तृष्णा बढ़ती जाती है और हृदय से जलता है, निदान फिर मृत्युरूपी सिंह जरारूपी हरिण को भोजन कर लेता है | इस प्रकार मनुष्य उपजता और मरता है और आशारूपी रस्सी से बँधा हुआ घटीयन्त्र की नाईं भटकता है- शान्ति कदाचित् नहीं पाता | हे रामजी! ब्रह्माण्डरूपी एक वृक्ष है और उसमें जीवरूपी पत्र लगे हैं सो कर्मरूपी वायु से हिलते हैं और अज्ञानरूपी जड़ता है |चित्तरूपी ऊँचा वृक्ष है उस पर लोभादिक उलूक बैठते हैं | जगत््रूपी ताल में शरीररूपी कमल हैं उन पर जीवरूपी भँवरे बैठते हैं और कालरूपी हाथी आकर उनको भोजन कर जाता है | हे रामजी! जनतारूपी जीर्ण पक्षी आशारूपी फाँसी से बँधे हुए वासनारूपी पिंजड़े में पड़े हैं और रागद्वेषरूपी अग्नि में पड़े हुए कालरूपी पुरुष के मुख में प्रवेश करते हैं| जनरूपी पक्षी उड़ते फिरते हैं सो कोई दिन उनको जब कालरूपी व्याध जाल फैलावेगा तब फँसा लेगा | हे रामजी! संसाररूपी ताल में जीवरूपी मछलियाँ है और कालरूपी बगला उनको भोजन करता है | कालरूपी कुम्हार जनरूपी मृत्तिका के बासन बनाता है और वे शीघ्र ही फूट जाते हैं | जीवरूपी नदी कर्मरूपी तरंगों को फैलाती है और कालरूपी बड़वाग्नि में जा पड़ती है | जगत््रूपी हाथी के मस्तक में जीवरूपी मोती हैं, उस हाथी को कालरूपी सिंह भोजन कर जाता है |   वह कालरूपी भक्षक ऐसा है कि जिसने ब्रह्मा को भी भोजन किया है और करता है पर तृप्त नहीं होता | जैसे घृत की आहुति से अग्नि तृप्त नहीं होती तैसे ही काल जीवों के भोजन से तृप्त नहीं होता है | हे रामजी! एक निमेष में अनेक जगत् उपजते हैं और निमेष में लीन हो जाते हैं | सबके अभाव हुए जो शेष रहता है वह रुद्र है, फिर वह भी निवृत्त होता है और सबके पीछे एक परमतत्त्व ब्रह्मसत्ता रहती है | हे रामजी! जो  कुछ जगत् है वह अज्ञान से भासता है | जन्म, मरण, बालअवस्था, यौवन और वृद्धादिक विकार अज्ञान से भासते हैं और अज्ञान के नष्ट हुए सब नष्ट हो जाते हैं | जबतक आत्म विचार नहीं उपजता तबतक अज्ञान रहता है और जब आत्मविचार उपजता है तब अज्ञानरूपी रात्रि निवृत्त हो जाती है केवल ब्रह्मपद भासता है | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अज्ञानमाहात्म्यवर्णनन्नामषष्ठस्सर्गः ||6||

अनुक्रम


अविद्यालतावर्णन

अविद्यालतावर्णन वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! यह संसाररूपी यौवन चेतनरूपी पर्वत के श्रृंग पर स्थित है  और अविद्यारूपी बेलि उसमें बढ़कर विकास को प्राप्त हुई और सुख, दुःख, भाव, अभाव, अज्ञानपत्र, फूल और फल हैं | जहाँ अविद्या सुखरूप होकर स्थित होती है वहाँ ऊँचे सुख  को भुगाती है और सत्य की नाईं होती है और जहाँ दुःखरूप होकर स्थित होती है वहाँ दुःखरूप भासती है | वही सुख दुःख इसके फल हैं | दिनरूपी फूल हैं और रात्रिरूपी भँवरे हैं, जन्मरूपी अंकुर हैं और भोगरूपी रस से पूर्ण है जब विचार रूपी घुन अबिद्यारूपी वृक्ष को खाने लगता है तब वह नष्ट हो जाती है | जबतक विचाररूपी घुन नहीं लगा तबतक वह दिन-दिन बढ़ती जाती है और दृढ़ होती जाती है | हे रामजी! अविद्या रूपी बलि का मूल संवित फुरना है उससे फैली है, तारागण उसके फूल हैं, चन्द्रमा और सूर्यउसका प्रकाश है और दुष्कृत कर्मरूपी नरकस्थान कण्टक हैं, शुभ कर्मरूपी स्वर्ग   उसके फूल हैं और सुख दुःखरूपी फल लगते हैं, जीवरूपी उसके पत्र हैं जो कालरूपी वायु से हिलते हैं और जीर्ण होकर गिर पड़ते हैं, पृथ्वीरूपी उसकी त्वचा है, पर्वतरूपी पीड़ है, मरणरूपी उसमें छिद्र हैं, जन्मरूपी अंकुर हैं और मोहरूपी कलियाँ हैं जिनके महासुन्दर और अंग हैं उनसे जीव मोहित होते हैं- जैसे स्त्री को देखकर पुरुष मोहित होते हैं-और सात समुद्र के जल से सींची जाती है जिससे पुष्ट होती है | उस बेलि में एक विष की भरी सर्पिणी रहती है जो कोई उसके निकट  जाता है उसको काटती है और वह मूर्च्छा से गिर पड़ता है | संसाररूपी मूर्छा की देने वाली तृष्णारूपी सर्पिणी है | वह बेलि अन्यथा नष्ट नहीं होती, जब विचाररूपी घुन इसको लगे तो नष्ट हो जाती है | हे रामजी! जो कुछ प्रपञ्च तुमको भासता है सो सब अविद्यारूप है, कहीं अविद्या जलरूप हुई है कहीं पहाड़, कहीं नाग, कहीं देवता, कहीं दैत्य, कहीं पृथ्वी, कहीं चन्द्रमा, कहीं सूर्य, कहीं तारे, कहीं तम, कहीं प्रकाश, कहीं तेज, कहीं पाप, कहीं पुण्य, कहीं स्थावर ,कहीं मूढ़रूप, कहीं अज्ञान से दीन और कहीं ज्ञान से आपही क्षीण हो जाती है | कहीं तप दान आदिक से क्षीण होती है, कहीं पापादिक से वृद्ध होती है, कहीं सूर्यरूप होकर प्रकाशती है, कहीं स्थानरूप होती है, कहीं नरक में लीन हैं, कहीं स्वर्गवासी है, कहीं देवता होती है, कहीं कृमि  होती है कहीं विष्णुरूप होकर स्थित हुई है, कहीं ब्रह्मा होकर स्थित है, कहीं रुद्र  है, कहीं अग्निरूप है, कहीं पृथ्वीरूप हुई है और कहीं आकाश कहीं भूत भविष्यत् और वर्तमान हुई है | हे रामजी! जो कुछ देखने में आता है वह सब महिमा इसी की है | ईश्वर से आदि तृणपर्यन्त सब अविद्यारूप है जो इस दृश्यजाल से अतीत है उसको आत्मलाभ जानो | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अविद्यालतावर्णनन्नाम सप्तमस्सर्ग ||7|| 

 

अनुक्रम


अविद्या निराकरण

रामजी ने पूछा, हे ब्रह्मन्! विष्णु और हर आदिक तो शुद्ध आकार आकाश जाति हैं इनको अविद्या तुम कैसे कहते हो? यह सुनकर मुझको संशय उत्पन्न हुआ है | वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! प्रथम अविद्या और तत्त्व सुनो कि किसको कहते हैं | जो अविद्यमान हो और विद्यमान भासे वह अविद्या है और जो सदा विद्यमान है उसको तत्त्व कहते हैं | हे राम जी! शुद्ध संवित् और कलना से रहित जो चिन्मात्र आत्मसत्ता है सो ही तत्त्व है, उसमें जो अहं उल्लेख से संवेदनकलना पूर्णरूप से फुरी है सो ही चिन्मात्र संवित् का आभास है | वही संवेदन फुरकर स्थानभेद से सूक्ष्म, स्थूल और मध्यमभाव को प्राप्त हुई है और वही दृढ़ स्पन्द से मनन-भाव को प्राप्त हुई है | सात्त्विक, राजस और तामस तीनों उसी के आकार हुआ हैं | वह अविद्या त्रिगुण प्राकृत धर्मिणी हुई है और तीन गुण जो तुझसे कहे हैं वे भी एक गुण तीन प्रकार के हुए हैं जिससे अविद्या के गुण नव प्रकार के भेद को प्राप्त हुए हैं जो कुछ तुमको दृश्य भासता है वह अविद्या के नव गुणों में है | ऋषीश्वर, मुनीश्वर,सिद्ध,नाग, विद्याधर और देवता अविद्या के सात्त्विक भाग हैं और उस सात्त्विक के विभाग में नाग सात्त्विक -तामस हैं, विद्याधर, सिद्ध, देवता और मुनीश्वर, अविद्या के सात्त्विक भाग में सात्त्विक-राजस हैं और हरिहरादिक केवल सात्त्विक हैं | हे रामजी! सात्त्विक जो प्रकृतभाग है उसमें जो तत्त्वज्ञ हुए हैं वे मोह को नहीं प्राप्त होते, क्योंकि वे मुक्तिरूप होते हैं | हरिहरादिक शुद्ध सात्त्विक हैं और सदा मुक्तिरूप होकर जगत् में स्थित हैं | वे जबतक जगत् में हैं तबतक जीवन्मुक्त हैं और जब विदेह-मुक्त हुए तब परमेश्वर को प्राप्त होते हैं | हे रामजी! एक अविद्या के दो रूप हैं | एक अविद्या विद्यारूप होती है-जैसे बीज फल को प्राप्त होता है और फल बीजभाव को प्राप्त होता है जैसे जल से बुद्बुदा उठता है तैसे ही अविद्या से विद्या उपजती है और विद्या से अविद्या लीन होती है | जैसे काष्ठ से अग्नि उपजकर काष्ठ को दग्ध करती है तैसे ही विद्या अविद्या से उपजकर अविद्या को नाश करती है | वास्तव में सब चिदाकाश है जैसे जल में तरंग कलनामात्र है तैसे ही विद्या अविद्या भावनामात्र है  इसको त्यागकर शेष आत्मसत्ता ही रहती है | अविद्या और विद्या आपस में प्रतियोगी हैं जैसे तम और प्रकाश, इससे इन दोनों को त्यागकर आत्मसत्ता में स्थित हो | विद्या और अविद्या कल्पनामात्र हैं | विद्या के अभाव का नाम अविद्या है और अविद्या के अभाव का  नाम विद्या है |यह प्रतियोगी कल्पना मिथ्या उठी है | जब विद्या उपजती है तब अविद्या  को नष्ट करती है और फिर आप ही लीन हो जाती है-जैसे काष्ठ से उपजी अग्नि काष्ठ को जलाकर आप भी शान्त हो जाती है-उससे जो शेष रहता है वह अशब्द पद सर्वव्यापी है | जैसे बटबीज में पत्र, टास, फूल, फल और पत्ते होते हैं तैसे ही सबमें एक अनुस्यूत सत्ता व्यापी है सो ही ब्रह्मतत्त्व सर्वशक्ति है,     उसी से सर्वशक्ति का स्पंद है और आकाश से भी शून्य है | जैसे सूर्यकान्त में अग्नि होती और दूध में घृत है तैसे ही सब जगत् में ब्रह्म व्याप रहा है | जैसे दधि के मथे  बिना घृत नहीं निकलता तैसे ही विचार बिना आत्मा नहीं भासता और जैसे अग्नि से चिनगारे और सूर्य से किरणें निकलती है तैसे ही यह जगत् आत्मा का किंचनरूप है | जैसे घट के नाश हुए घटाकाश अविनाशी है तैसे ही जगत् के अभाव से भी आत्मा अविनाशी है | हे रामजी! जैसे चुम्बक पत्थर की सत्ता से जड़ लोह चेष्टा करता है परन्तु चुम्बक सदा अकर्ता ही है तैसे ही आत्मा की सत्ता से जगत् देहादिक चेष्टा करते हैं और चेतन होते हैं परन्तु आत्मा सदा अकर्त्ता है | इस जगत् का बीज चैतन्य आत्मसत्ता है और उसमें संवित् संवेदन आदिक शब्द भी कल्पनामात्र है | जैसे जल को कहिये कि बहुत सुन्दर और चञ्चल है सो जल ही है तैसे ही संवेदन आदिक सब चैतन्य रूप हैं | जहाँ किञ्चन है, अकिञ्चन है सो तुम्हारा स्वरूप है | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अविद्या निराकरणन्नामाष्टकस्सर्गः ||8||

 

अनुक्रम


अविद्याचिकित्सावर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! स्थावर-जंगम जो कुछ जगत तुमको भासता है वह आधिभौतिकथा को नहीं प्राप्त हुआ | वह सब चिदाकाशरूप है और उसमें कुछ भाव अभाव की कल्पना नहीं और जीवादिक भेद भी नहीं | हमको तो भेदकल्पना कुछ नहीं भासती | जैसे रस्सी में सर्प का अभाव है तैसे ही ब्रह्म में भेदकल्पना का अभाव है | हे रामजी! आत्मा के अज्ञान से भेदकल्पना भासती है और आत्मा के जाने से भेदकल्पना मिट जाती है वही सर्वसंपदा का अन्त है | शुद्ध चैतन्य में चित्त का सम्बन्ध होने का नाम अविद्या है | जो पुरुष चित्त की उपाधि से रहित चिन्मात्र है वह शरीर के नाश हुए नाश नहीं होता और शरीर के उपजे से नहीं उपजता | शरीर के उपजने और विनशने में वह सदा एकरस ज्यों का त्यों स्थित है | जैसे घट के उपजने और विनशने में घटाकाश ज्यों का त्यों रहता है तैसे ही शरीर के भाव अभाव में आत्मा ज्यों का त्यों है जैसे बालक दौड़ता है तो उसको सूर्य भी दौड़ता भासता है और स्थित होने में स्थित भासता है-    परन्तु सूर्य ज्यों का त्यों है, तैसे ही चित्त की चञ्चलता से मूर्ख जन आत्मा को व्याकुल देखते हैं, चित्त की अचलता में अचल देखते है और चित्त के उपजने में उपजता देखते हैं परन्तु आत्मा सदा ज्यों का त्यों है | जैसे मकड़ी अपने जाले से आप ही वेष्टित होती है और निकल नहीं सकती तैसे ही जीव अपनी वासना से आप ही बन्धायमान होते हैं | रामजी ने पूछा, हे भगवन् अत्यन्त मूर्खता को प्राप्त होकर जो स्थावर आदिक स्थित हुए हैं उनकी वासना कैसी होती है सो कृपा करके कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो स्थावर जीव हैं वे अमनसत्ता को नहीं प्राप्त हुए | वे केवल मन अवस्था  में भी प्रतिष्ठित नहीं पर मध्य अवस्था में हैं | उनकी पुर्यष्टका सुषुप्तिरूप है सो केवल दुःख का कारण है | उनका मन नष्ट नहीं हुआ वे सुषुप्ति अवस्था में जड़रूप स्थित हैं सो काल पाकर जागेंगे अब उनकी सत्ता मूकजड़ होकर स्थित है | रामजी ने पूछा  हे देवताओं में श्रेष्ठ! यदि उनकी सत्ता अद्वैतरूप होकर स्थावर शरीर में स्थित है तो मुक्ति अवस्था उनके निकट है यह सिद्ध हुआ | वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! मुक्ति कैसे निकट होती है? मुक्ति तब होती है जब बुद्धिपूर्वक वस्तु को विचारे और यथाभूत अर्थदृष्टि आवे | जब सत्ता समान का बोध हो तब केवल आत्मपद को प्राप्त हो | हे रामजी! जब ज्यों का त्यों पदार्थ जानकर वासना को त्याग करे तब सत्तासमान पद प्राप्त अध्यात्म शास्त्र को विचारे और उसमें जो सार है उसकी बारम्बार भावना करे तब उससे जो प्राप्त हो सो सत्तासमान परब्रह्म कहाता है | स्थावर के भीतर वासना है परन्तु बाहर दृष्टि नहीं आती, क्योंकि उनकी सुषुप्ति वासना है | जैसे बीज में अंकुर होता है और फिर उगता है, तैसे ही उनके जन्म होवेंगे और वासना जागेगी | उनके भीतर जगत् की सत्यता है पर बाहर दृष्टि नहीं आती है | वे सुषुप्तिवत् जड़धर्मा हैं वे अनन्त जन्मों में दुःख पावेंगे | हे रामजी! स्थावर जो अब जड़ धर्मी सुषुप्तिपद में  स्थित हैं सो बारम्बार जन्म को पावेंगे-जैसे बीज में पत्र, टास, फूल और फल स्थित होते हैं और मृत्तिका में घटशक्ति है तैसे ही स्थावर में वासना स्थित है | जिसमें वासनारूपी बीज है वह सुषुप्तिरूप कहाता है और वह सिद्धता जो मुक्ति है नहीं प्राप्त होती |जहाँ निर्बीज वासना है सो तुरीय पद है और वह सिद्धता को प्राप्त करती  है | हे रामजी! जब चित्तशक्ति दृढ़ वासना से मिली होती है तब स्थावर होती है और वह फिर जागती है | जैसे कोई कर्म करता हुआ सो जाता है तो सुषुप्ति से उठकर फिर वही कर्म करने लगता है, क्योंकि कर्मरूपी वासना उसके भीतर रहती है, तैसे ही स्थावर वासना से फिर जन्म पावेंगे | जब वह वासना हृदय से दग्ध हो तब जन्म का कारण नहीं होती | आत्मसत्ता समानभाव से घट पट आदिक सब पदार्थों में स्थित है | जैसे वर्षाकाल का एक ही मेघ नानारूप होकर स्थित होता है तैसे ही एक ही आत्मसत्ता सर्व पदार्थों में स्थित होती है | इससे सबमें आत्मा ही व्याप रहा है | ऐसी दृष्टि से जो  रहित है उसको विपर्यय दृष्टि भ्रमदायक होती है और जब आत्मदृष्टि प्राप्त होती है तब सब दुःख नाश हो जाते हैं | हे रामजी! असम्यक््दृष्टि को ही बुद्धीश्वर अविद्या कहते हैं | वह अविद्या जगत् का कारण है और उससे सब पसारा होता है | जब उससे रहित अपना स्वरूप भासे तब अविद्या नष्ट होती है | जैसे बरफ की कणिका धूप से नष्ट हो जाती है तैसे ही शुद्धस्वरूप के अभ्यास से अविद्या नष्ट हो जाती है | जैसे स्वप्न से रहित जब अपना स्वरूप देखता है तब फिर स्वप्न की ओर नहीं जाता, तैसे ही शुद्धस्वरूप के अभ्यास से सम्पूर्ण भ्रम निवृत्त हो जाते हैं | हे रामजी! जब वस्तु को जानता है तब अविद्या नष्ट हो जाती है | जैसे प्रकाश से अन्धकार नष्ट हो जाता है पर दीपक को हाथ में लेकर देखिये तो अन्धकार की कुछ मूर्ति दृष्टि नहीं आती, और जैसे  उष्णता से घृत का पिंड गल जाता है तैसे ही आत्मा के दर्शन हुए अविद्या नहीं रहती | वास्तव में अविद्या कुछ वस्तु नहीं, अविचार से सिद्ध है और विचार किये से लीन हो जाती है | जैसे प्रकाश से तम लीन हो जाता है तैसे ही विचार से अविद्या लीन हो जाती है | अज्ञान से अविद्या की प्रतीति होती है | जब तक आत्मतत्त्व को नहीं देखा तबतक अविद्या ही प्रतीति होती है और जब आत्मा को देखा तब अविद्या का अभाव हो जाता है | प्रथम यह विचार करे कि रक्त, माँस और अस्थि का यन्त्र जो शरीर है उसमें "मैं क्या वस्तु हूँ"? "सत्य क्या है? और असत्य क्या है?" इस विचार से जिसका अभाव होता है वह असत्य है और जिसका अभाव नहीं होता वह सत्य है | फिर अन्वय व्यतिरेक से विचारे कि कार्यकल्पित के होते भी हो और उसके अभाव में भी हो सो अन्वय सत्य है | देहादिक के भाव में भी जो आत्मा अधिष्ठान है और इनके अभाव में भी निरुपाधि सिद्ध है सो सत्य है  और देहादिक व्यतिरेक सत्य है | ऐसे विचारकर आत्मतत्त्व का अभ्यास करे और असत् देहादिक से वैराग्य करे तब निश्चय करके अविद्या लीन हो जाती है, क्योंकि वह वास्तव नहीं है, असत्यरूप है | उसके नष्ट हुए जो शेष रहे सो निष्किंचन है और सत्य है, ब्रह्म निरन्तर है सो तत्त्ववस्तु उपादेय करने योग्य है | हे रामजी! ऐसे विचार करके अविद्या नष्ट हो जाती है | जैसे पौंड़े का रस जिह्वा से लगता है तब अवश्य स्वाद आता है तैसे ही आत्मविचार से अविद्या अवश्य नष्ट हो जाती है यदि वास्तव में कहिये तो अविद्या भी कुछ भिन्न वस्तु नहीं एक अखंड ब्रह्मतत्त्व है | जिससे घट, पट,  रथ आदिक पदार्थ भिन्न-भिन्न भासते हैं उसको अविद्या जानो और जिससे सबमें एक ब्रह्म भावना होती है उसको विद्या जानो | इस विद्या से अविद्या नष्ट हो जावेगी | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अविद्याचिकित्सावर्णनन्नाम नवमस्सर्गः ||9|| 

 

अनुक्रम


जीवन्मुक्तनिश्चयोपदेश

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! बोधके निमित्त मैं तुम को बारम्बार सार कहता हूँ कि आत्मा का साक्षात्कार भावना के अभ्यास बिना होगा | यह जो अज्ञान अविद्या है सो अनन्त जन्म का दृढ़ हुआ भीतर बाहर दिखाई देता है, आत्मा सब इन्द्रियों से अगोचर है जब मन सहित षट् इन्द्रियों का अभाव हो तब केवल शान्ति को प्राप्त होता है | हे राम जी! जो कुछ वृत्ति बहिर्मुख फुरती है सो अविद्या है, क्योंकि वह वृत्ति आत्मतत्त्व  से भिन्न जानकर फुरती है और जो अन्तर्मुख आत्मा की ओर फुरती है सो विद्या अविद्या को नाश करेगी | अविद्या के दो रूप हैं-एक प्रधान रूप और दूसरा निकृष्टरूप है | उस अविद्या से विद्या उपजकर अविद्या को नाश करती है और फिर आप भी नष्ट हो जाती है | जैसे बाँस से अग्नि उपजती है और बाँस को जलाकर आप भी शान्त हो जाती है तैसे ही जो अन्तर्मुख है सो प्रधानरूप विद्या है और जो बहिर्मुख है सो निकृष्ट रूप अविद्याभाव को नाश करे | हे रामजी | अभ्यास बिना कुछ सिद्ध नहीं होता | जो कुछ किसी को प्राप्त होता है सो अभ्यासरूपी वृक्ष का फल है | चिरकाल जो अविद्या का दृढ़  अभ्यास हुआ है तब अविद्या दृढ़ हुई है | जब आत्मज्ञान के निमित्त यत्न करके दृढ़ अभ्यास करोगे तब अविद्या नष्ट हो जावेगी | हे रामजी! हृदयरूपी वृक्ष में जो अविद्यारूपी बुरी लता फल रही है उसको ज्ञानरूपी खंग से काटो और जो कुछ अपना प्रकृत आचार है उसको करो तब तुमको दुःख कोई होगा जैसे जनक राजा ज्ञात ज्ञेय होकर व्यवहार को करता था तैसे ही आत्मज्ञान का दृढ़ अभ्यास कर तुम भी बिचरो | हे रामजी! जैसा निश्चय पवन, विष्णुजी, सदाशिव, ब्रह्मा, वृहस्पति, चन्द्रमा, अग्नि , नारद, पुलह, पुलस्त्य, अंगिरा, भृगु, शुकदेव और ज्ञात ज्ञेय ब्राह्मणों का है वही तुमको भी प्राप्त हो | रामजी ने पूछा, हे ब्राह्मण! जिस निश्चय से बुद्धिमान विशोक  होकर स्थित हुए हैं वह मुझसे कहिये | वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जैसे सम्पूर्ण ज्ञानवानों का निश्चय है और जैसे वे व्यवहार में सम रहे हैं सो सुनो | विस्ताररूप जो कुछ जगज्जाल तुमको भासता है वह निर्मल ब्रह्मसत्ता अपनी महिमा में स्थित है- जैसे समुद्र में तरंग स्थित होते हैं और नाना प्रकार के उत्पन्न होते हैं सो एक जल रूप है, जल से भिन्न नहीं, तैसे ही जो ग्रहण करनेवाला है सो भी ब्रह्म है और जिसको भोजन करताहै वह भी ब्रह्म है, मित्र भी ब्रह्म है, शत्रु भी ब्रह्म है, ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है | यह निश्चय ज्ञानवान् को सदा रहता है और ब्रह्म को ब्रह्म स्पर्श करता है तब किसको स्पर्श किया? हे रामजी! जिनको सदा यही निश्चय रहता है उनको राग द्वेष कुछ दुःख नहीं दे सकते | ब्रह्म ही ब्रह्म में फुरता है, भावरूप भी ब्रह्म है, अभावरूप भी ब्रह्म है, कुछ भिन्न नहीं तो फिर राग-द्वेष कलना कैसे हो?  ब्रह्म ही ब्रह्म को चेतता है, ब्रह्म ही ब्रह्म में स्थित है, ब्रह्म ही अहं अस्मि है, ब्रह्म ही सम है, ब्रह्म ही आत्मा है और घट भी ब्रह्म है, पट भी ब्रह्म है, ब्रह्म ही से विस्तार को प्राप्त हुआ है | हे रामजी! जब सर्वत्र ब्रह्म ही है तब राग विराग कलना कैसे होवे? मृत्यु भी ब्रह्म है, शरीर भी ब्रह्म है, मरता भी ब्रह्म है और मारता भी ब्रह्म है | जैसे रस्सी में सर्प भ्रम से भासता है तैसे ही आत्मा में सुख दुःख मिथ्या है | भोग भी ब्रह्म है, भोगनेवाला भी ब्रह्म है और भोक्ता देह भी ब्रह्म है, निदान सर्वत्र ब्रह्म ही है | जैसे समुद्र में तरंग उपजते  और मिट जाते हैं सो जल से भिन्न नहीं तैसे ही शरीर उपजते और मिट जाते हैं सो ब्रह्म ही ब्रह्म में स्थित है | हे रामजी! जल के तरंग जो मृत्यु को प्राप्त होते हैं तो क्या हुआ वे तो जल ही हैं, तैसे ही मृतक ब्रह्म ने जो मृतक देह ब्रह्म को मारा तब कौन मुआ और किसने मारा? जैसे एक तरंग जल से उपजा और दूसरे तरंग से मिल दोनों इकट्ठे होकर मिट गये सो जल ही जल है, वहाँ मैं, तू इत्यादिक दूसरा कुछ नहीं, तैसे ही आत्मा में जो जगत् है सो आत्मा ही अपने आपमें स्थित है, तेरा, मेरा, भिन्न कुछ नहीं | जैसे सुवर्ण में भूषण और जल में तरंग अभेद रूप है तैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं | हे रामजी! जो पुरुष यथार्थदर्शी है उसको सदा यही निश्चय रहता है और जिनको सम्यक््ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ उनको विपर्ययरूप और का और भासता है | पर वास्तव में सदा एकरूप है, ज्ञान और अज्ञान का भेद है | जैसे रस्सी एक होती है परन्तु जिसको सम्यक््ज्ञान होता है उसको रस्सी भासती है और जिसको सम्यक््ज्ञान नहीं होता उसको सर्प हो भासता है, तैसे ही जो ज्ञानवान् पुरुष है उसको सब ब्रह्मसत्ता ही भासती है और जो अज्ञानी है उसको जगत् नानारूप हो भासता है और दुःखदायक होता है पर ज्ञानवान् को सुखरूप है | जैसे अन्धे को सब ओर अन्धकार ही भासता है और नेत्रवान् को प्रकाशरूप होता है तैसे ही सर्वजगत् आत्मरूप है परन्तु ज्ञानी को आत्मसत्ता सुखरूप भासती है और अज्ञानी को दुःख दायक है  जैसे बालक को अपनी परछाहीं में वैतालबुद्धि होती है और उससे भयवान् होता है पर बुद्धिमान निर्भय होता है तैसे ही अज्ञानी को जगत् दुःखदायक है और ज्ञानी को सुखरूप है | यदि मेरा निश्चय पूछो तो यों है कि मैं सर्व, ब्रह्म, नित्य, शुद्ध, सर्व में स्थित हूँ, कोई विनशता है, उपजता है | जैसे जल में तरंग   कुछ उपजते हैं और विनशते हैं जल ही जल है तैसे ही भूत भी आत्मा में और जगत् भी आत्मरूप है | आत्मब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है और शरीर के नाश हुए आत्मा का नाश नहीं होता | मृतकरूप भी ब्रह्म है शरीर भी ब्रह्म है वह ही अनेकरूप होकर भासता है ब्रह्म से भिन्न शरीर आदिक कुछ सिद्ध नहीं होते | जैसे तरंग, फेन और बुद्बुदे जल रूप हैं तैसे ही देह, कलना, इन्द्रियाँ, इच्छा देवतादिक सब ब्रह्मरूप हैं और जैसे भूषण सुवर्ण से भिन्न नहीं होता-सुवर्ण ही भूषणरूप होता-तैसे ब्रह्म से व्यतिरेक जगत् नहीं होता ब्रह्म ही जगत््रूप है | जो मूढ़ हैं उनको द्वैतकलना भासती है | हे रामजी! मन, बुद्धि, अहंकार, तन्मात्रा और इन्द्रियाँ सब ब्रह्म ही के नाम हैं और सुख-दुख कुछ नहीं | अहं आदिक जो शब्द हैं, उनमें भिन्न भिन्न भावना करनी व्यर्थ है, अपना अनुभव ही अन्य की नाईं हो भासता है-जैसे पहाड़ में शब्द करने से प्रतिशब्द का भास होता है सो अपना ही शब्द है उसमें और की कल्पना मिथ्या है | जैसे स्वप्न में कोई अपना शिर कटा देखता है सो व्यर्थ है पर सो भी भासि आता है | जिसको असम्यक्् ज्ञान होता है उसको ऐसे ही है | हे रामजी! ब्रह्म सर्वशक्ति है उसमें जैसे भावना होती है वही भासि आता है | जिसको सम्यक््ज्ञान होता है वह उसे निरहंकार, सुप्रकाश और सर्वशक्ति देखता है | कर्त्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, अधिकरण, यह जो षट्कार बुद्धि है सो सब सर्वत्र ब्रह्म ही है और ब्रह्म ही अर्पण, ब्रह्म ही हवि, ब्रह्म ही अग्नि, ब्रह्म ही होत्र, ब्रह्म ही हुतनेवाला और ब्रह्म ही फल देता है, ऐसे जाननेवाले का नाम ज्ञानी है और ऐसे जानने से अज्ञानी है | जाननेवाले का नाम ब्रह्मवेत्ता है | हे रामजी! यदि चिरकाल का बान्धव हो और उसको देखिये तो जानिये कि बान्धव है और जो देखने में आये और उसका अभ्यास दूर हो गया हो तो बान्धव भी अबान्धव की नाईं हो जाता है, तैसे ही अपना आप ही ब्रह्मस्वरूप है, जब भावना होती है तब ऐसे ही भासि आता है कि मैं ब्रह्म हूँ- और द्वैत कल्पना लीन हो जाती है-सर्व ब्रह्म ही भासता है | जैसे जिसने अमृत पान किया है वह अमृतमय होता है और जिसने नहीं पान किया वह अमृतमय नहीं होता, तैसे ही जिसने जाना है कि मैं ब्रह्म हूँ वह ब्रह्म हौ होता है और जिसने नहीं जाना उसको नानात्व कल्पनारूप जन्म मरण भासता है और ब्रह्म अप्राप्त की नाईं भासता है | हे राम जी! जिसको ब्रह्मभावना का अभ्यास है वह अभ्यास के बल से शीघ्र ही ब्रह्म होता है |  ब्रह्मरूपी बड़े दर्पण में जैसे कोई भावना करता है तैसा ही रूप हो भासता है | मन भावनामात्र है, दुर्वासना से स्वरूप का आवरण हुआ है, जब वासना नष्ट होती है तब निष्कलंक आत्मतत्त्व ही भासता है | जैसे शुद्ध वस्त्र पर केशर का रंग शीघ्र ही चढ़ जाता है, तैसे ही वासना से रहित चित्त में ब्रह्म निश्चय होता है | हे रामजी! आत्मा सर्वकलना से रहित है और तीनों काल में नित्य, शुद्ध, सम और शान्तरूप है | जिसको ज्ञान होता है वह ऐसे जानता है कि मैं ब्रह्म हूँ | और सर्वदाकाल, सर्व में सर्व प्रकार सर्व घट, पटादिक जो जगज्जाल है उसमें मैं ही ब्रह्म आकाशवत् व्याप रहा हूँ? कोई मुझको व्याप रहा हूँ? कोई मुझको दुःख है, कर्म है किसी का त्याग  करता हूँ और वाञ्छा करता हूँ और सर्वकलना से रहित निरामय हूँ | मैं ही रक्त, पीत, श्वेत और श्याम हूँ और रक्त, माँस अस्थि का वपु भी मैं ही हूँ, घट पटादिक जगत् भी मैं ही हूँ और तृण, बेलि, फूल, गुच्छे, टास, वन, पर्वत, समुद्र, नदियाँ, ग्रहण, त्याग, संकुचना, भूत आदि शक्ति सब मैं ही हूँ | विस्तार को प्राप्त मैं ही भया हूँ, वृक्ष, बेलि, फल गुच्छे, जिसके आश्रय फुरते हैं वह चिदात्मा मैं ही हूँ और सबमें रस रूप मैं ही हूँ | जिसमें यह सर्व है और जिससे यह सर्व है, जो सर्व है और जिसको सर्व है ऐसा चिदात्मा ब्रह्म मैं ही हूँ | जिसके चैतन्य, आत्मा, ब्रह्म, सत्य अमृत, ज्ञानरूप इत्यादिक नाम हैं ऐसा सर्वशक्त, चिन्मात्र, चैत्य से रहित प्रकाशमात्र, निर्मल, सर्वभूतों का प्रकाशक और मन, बुद्धि, इन्द्रियों का स्वामी मैं हूँ | जो कुछ भेद कलना है सो मनादि ही की थी और अब इनकी कलना को त्यागकर मैं अपने प्रकाश में स्थित हूँ | शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदिक जो सब जगत् का कारण है  उन सबका चैतन्य आत्मारूप ब्रह्म, निरामय, अविनाशी, निरन्तर, स्वच्छ आत्मा, प्रकाशरूप, मन के उत्थान से रहित, मौनरूप मैं ही हूँ और परम अमृत, निरन्तर सर्व भूतों में सत्तारूप से मैं ही स्थित हूँ | सदा अलेप साक्षी, सुषुप्ति की नाईं और द्वैतकलना से रहित अक्षोभरूप अनुभव मैं ही हूँ | शान्तरूप जगत् में मैं ही फैल रहा हूँ और सब वासना से रहित अक्षोभरूपी अनुभव मैं ही हूँ | जिससे सर्व स्वाद का अनुभव होता है सो चैतन्य ब्रह्म आत्मा मैं ही हूँ | जिसका चित्त स्त्री में आसक्त है, जिसको चन्द्रमा की कान्ति से अधिक मुदिता है और जिससे स्त्री का स्पर्श और मुदिता का अनुभव होता है ऐसा चैतन्य ब्रह्म मैं ही हूँ और सुख दुःख की कलना से रहित अमन सत्ता और अनुभवरूप जो आत्मा है सो चैतन्यरूप आत्मा ब्रह्म मैं ही हूँ | खजूर और नींब आदिक में स्वादरूप मैं ही हूँ, खेद और आनन्द, लाभ और हानि मुझको तुल्य है और जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और साक्षी तुरीयारूप आदि, अन्त से रहित चैतन्य ब्रह्म निरामय मैं हूँ | जैसे एक खेत के पौंड़ों में एक ही सा रस होता है तैसे ही अनेक मूर्तियों में एक ब्रह्मसत्ता ही स्थित है | वह सत्य, शुद्ध, सम, शान्तरूप और सर्वज्ञ है, जो प्रकाशक और सूर्य की नाईं है सो प्रकाशरूप ब्रह्म मैं ही हूँ और सब शरीरों में व्याप रहा हूँ | जैसे मोती की माला में तागा गुप्त होता है जिसमें मोती पिरोये हैं, तैसे ही मोतीरूपी शरीर में तन्तुरूप गुप्त मैं ही हूँ और जगत््रूपी दूध  में ब्रह्मरूपी घृत मैं ही व्याप रहा हूँ | हे रामजी! जैसे सुवर्ण में जो नाना प्रकार के भूषण बनते हैं सो सुवर्ण से भिन्न नहीं होते तैसे ही सब पदार्थ आत्मा में  स्थित हैं-आत्मा से भिन्न नहीं | पर्वत, समुद्र और नदियों में सत्तारूप आत्मा ही है, सर्व संकल्प का फलदाता और सर्व पदार्थों का प्रकाशक आत्मा ही है और सब पाने योग्य पदार्थों का अन्त है | उस आत्मा की उपासना हम करते हैं जो घट, पट, तट, और कन्ध में स्थित है | जाग्रत में जो सुषुप्तिरूप स्थित है और जिसमें कोई फुरना नहीं, ऐसे चैतन्यरूप आत्मा की हम उपासना करते हैं | मधुर में जो मधुरता है और तीक्ष्ण में तीक्ष्णता है और जगत् में चलना शक्ति है उस चैतन्य आत्मा की हम उपासना करते हैं |  जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीया और तुरीयातीत में जो समतत्त्व है उसकी हम उपासना करते हैं | त्रिलोकी के देहरूपी मोतियों में जो तन्तु की नाईं अनुस्युत है और फैलाने और संकोचने का कारण है उस चैतन्यरूप आत्मा की हम उपासना करते हैं | जो षोडश कलासंयुक्त और षोडश कला से रहित और अकिंचन, किंचनरूप है उस चैतन्य आत्मा की हम उपासना करते हैं | चैतन्यरूप अमृत जो क्षीरसमुद्र से निकला है और चन्द्रमा के मण्डल में रहता है, ऐसा जो स्वतः सिद्ध अमृत है जिसको पाकर कदाचित् मृत्यु हो उस चैतन्य अमृत की हम उपासना करते हैं | जो अखण्ड प्रकाश है और सब भूतों को सुन्दर करता है उस चिदात्मा को हम उपासते हैं | जिससे शब्द, स्पर्श, रूप , रस, गन्ध प्रकाशते हैं और आप इससे रहित है उस चैतन्य आत्मा की हम उपासना करते हैं | सब मैं हूँ और सब मैं नहीं और भी कोई नहीं इस प्रकार विदित वेद अपने अद्वैतरूप में विगतज्वर होकर स्थित होते हैं | यही निश्चय ज्ञानवानों का है | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तनिश्चयोपदेशोनाम दशमस्सर्गः ||10||

अनुक्रम


जीवन्मुक्तनिश्चय वर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो निष्पाप पुरुष है उसको यही निश्चय रहता है कि सत्यरूप आत्मतत्त्व है यह पूर्ण बोधवान् है यह पूर्ण बोधवान् का निश्चय है | उसको किसी में राग होता और किसी में द्वेष होता है, उसको जीना और मरना सुख दुःख नहीं देते और वह एक समान रहता हे | वह विष्णुनारायण का अंग है अर्थात् अभेद है और सदा अचल है | जैसे सुमेरु पर्वत वायु से चलायमान नहीं होता तैसे ही वह दुःख से चलायमान नहीं  होता | ऐसे जो ज्ञानवान् पुरुष हैं वे वन में विचरते हैं और नगर द्वीप आदिक नाना प्रकार के स्थानों में भी फिरते हैं परन्तु दुःख नहीं पाते | कोई स्वर्ग में फूलों के वन और बगीचों में फिरते हैं कोई पर्वत की कन्दराओं में रहते हैं, कोई राज्य करते  हैं और शत्रुओं को मारकर शिर पर झुलाते हैं, कितने श्रुति-स्मृति के अनुसार कर्म करते हैं, कोई भोग भोगते हैं, कोई विरक्त होकर स्थित हैं, कोई दान, यज्ञादिक कर्म करते हैं,  कोई स्त्रियों के साथ लीला करते, कहीं गीत सुनते और कहीं नन्दनवन में गन्धर्व गायन करते हैं, कोई गृह में स्थित हैं, कोई तीर्थ और यज्ञ करते, कोई नौबत, नगारे और तुरियाँ इत्यादिक सुनते और नाना प्रकार के स्थानों में रहते हैं परन्तु आसक्त नहीं होते | जैसे सुमेरु पर्वत ताल में नहीं डूबता तैसे ही ज्ञानवान किसी पदार्थ में बन्धवान् नहीं होते | वे इष्ट को पाकर हर्षवान् नहीं होते और अनिष्ट को पाकर दुःखी नहीं होते | वे आपदा और सम्पदा में तुल्य रहते हैं और प्रकृत आचार (कर्म) करते हैं, परन्तु उनका हृदय सर्व आरम्भ से रहित है | हे राघव! इसी दृष्टि का आश्रय करके तुम भी बिचरो | यह दृष्टि सब पापों का नाश करती है | अहंकार से रहित होकर जो इच्छा हो सो करो ,जब यथार्थदर्शी हुए तब निर्बन्ध हुए फिर जो कुछ पतित  प्रवाह से प्राप्त होगा उसमें सुमेरु की नाईं तुम रहोगे | हे रामजी! यह सब जगत् चिन्मात्र है, कुछ सत्य है, असत्य है, वही इस प्रकार होकर भासता है | इस दृष्टि को आश्रय करके और तुच्छ दृष्टि को त्यागो | हे रामजी! असंसक्त बुद्धि होकर सर्व भाव  अभाव में स्थित होकर राग द्वेष से चलायमान हो, अब सावधान हो जाओ, अब सावधान हो | रामजी बोले, हे भगवन्! बड़ा आश्चर्य है कि मैंने आपके प्रसाद से जानने योग्य और प्रबुद्ध हुआ हूँ | जैसे सूर्य की किरणों से कमल प्रफुल्लित होते हैं तैसे ही मैं प्रफुल्लित हुआ हूँ और जैसे शरत्काल में कुहिरा नष्ट हो जाता है तैसे ही आपके वचनों से मेरा संदेह और मान मोह मद मत्सर सब नष्ट हो गये हैं | मैं अब सब क्षोभ से रहित शान्ति को प्राप्त हुआ हूँ | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तनिश्चय वर्णनन्नामैकादशस्सर्गः ||11||

अनुक्रम


ज्ञानज्ञेयविचार

रामजी ने पूछा, हे भगवन्! सम्यक््ज्ञान के पश्चात् जीवन्मुक्त पद में किस प्रकार विश्रान्ति पाते हैं सो कहो | वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! संसार तरने की युक्ति है सो योगनाम्नी है | वह युक्ति दो प्रकार की है-एक सम्यक््ज्ञान और दूसरी प्राण के रोकने से | फिर रामजी ने पूछा, हे भगवन्! इन दोनों में सुगम कौन है जिससे दुःख भी हो और फिर क्षोभ भी हो? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी!दोनों प्रकार से योग शब्द कहाता है तो भी योग प्राण के रोकने का नाम है | योग और ज्ञान दोनों संसार से तरने के उपाय हैं | इन दोनों का फल एक ही सदाशिव ने कहा है | हे रामजी! किसी को योग करना कठिन होता है और ज्ञान का निश्चय सुगम होता है और किसी को ज्ञान का निश्चय कठिन होता है और योग करना सुगम है | यदि मुझसे पूछो तो दोनों में ज्ञान सुगम है, क्योंकि इसमें यत्न और कष्ट थोड़ा है | जानने योग्य पदार्थ के जानने से फिर सपने में भी भ्रम नहीं होता, क्योंकि वह साक्षीभूत होकर देखता है और जो बुद्धिमान् योगीश्वर हैं उनको भी कुछ यत्न नहीं होता, वे स्वभाविक ही चले जाते हैं और गुरु की युक्ति समझकर चित्त शान्त हो जाता है | हे रामजी! दोनों की सिद्धता अभ्यासरूप यत्न से होती है, अभ्यास बिना कुछ नहीं प्राप्त होता | वह ज्ञान तो मैंने तुमसे कहा है |  जो हृदय में विराजमान ज्ञेय है उसका जानना ही ज्ञान है जो प्राण अपान के रथ पर आरूढ़ है और हृदयरूपी गुहा में स्थित है | हे रामजी! उस योग का भी क्रम सुनो वह भी परम सिद्धता के निमित्त है | प्राण वायु जो नासिका और मुख के मार्ग से आती जाती है उसके रोकने का क्रम कहता हूँ | उससे चित्त उपशम हो जाता है | 

 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ज्ञानज्ञेयविचारोनाम द्वादशस्सर्गः ||12||

अनुक्रम


भुशुण्ड्यु पाख्याने सुमेरुशिखर लीलावर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! ब्रह्मरूपी आकाश के किसी अणु में यह जगत््रूपी स्पन्द आभास फुरा है-जैसे मरुस्थल में सूर्य की किरणों में मृग तृष्णाका जल फुर आता है-उस जगत् के कारणभाव को वह प्राप्त हुआ है जो ब्रह्म के नाभिकमल से उत्पन्न हुआ है और पितामह नाम से कहाता है | उसका मानसीपुत्र श्रेष्ठ आचारी मैं वशिष्ठ हूँ | नक्षत्र और ताराचक्र में मेरा निवास है और युग युग प्रति मैं वहाँ रहता हूँ | एक समय मैं नक्षत्रचक्र से उड़ा और इन्द्र की सभा में गया तो देखा कि वहाँ ऋषीश्वर,  मुनीश्वर बैठे थे | इतने में नारद आदिक चिरंजीवी का जो प्रसंग चला तो शातातप नाम एक बुद्धिमान ऋषीश्वर ने कहा कि हे साधो! सबमें चिरंजीवी एक है |    सुमेरु पर्वत की कोण पद्मरागनाम्नी कन्दरा के शिखर पर एक कल्पवृक्ष है जो महासुन्दर और अपनी शोभा से पूर्ण है | उस वृक्ष के दक्षिण दिशा की डाल पर बहुत पक्षी रहते हैं  उन पक्षियों में एक महाश्रीमान् कौवा रहता है जिसका नाम भुशुण्डि है | वह वीतराग और  बुद्धिमान् है और उसका आलय उस कल्पवृक्ष के टास पर बना हुआ है | जैसे ब्रह्मा नाभि कमल में रहते हैं तैसे ही वह आलय में रहता है | जैसे वह जिया है तैसे कोई जिया है  और जीवेगा | उसकी बड़ी आयु है और वह महाबुद्धिमान्, विश्रान्तिमान्, शान्तरूप और काल का वेत्ता है | हे साधो! बहुत जीना भी उसी का फल है और पुण्यवान् भी वही है | उसको आत्मपद में विश्रान्ति हुई है और संसार की आस्था जाती रही है | इस प्रकार जब उन देवताओं के देव ने कहा तब सम्पूर्ण सभा में ऋषीश्वरों ने दूसरी बार पूछा कि उसका  वृत्तान्त फिर कहो तब उसने फिर वर्णन किया तो सब आश्चर्य को प्राप्त हुए | जब यह कथा वार्त्ता हो चुकी तब सब सभा उठ खड़ी हुई और अपने-अपने आश्रम को गये, पर मैं आश्चर्यवान् हुआ कि ऐसे पक्षी को किसी प्रकार देखना चाहिये ऐसा विचार करके मैं सुमेरु पर्वत की कन्दरा के सम्मुख हो चला और एक क्षण में वहाँ जा पहुँचा तो क्या देखा कि महाप्रकाशरूप वह कन्दरा का शिखर रत्नमणियों से पूर्ण हे और उसका गेरू की नाईं रंग है | जैसे अग्नि की ज्वाला होती है तैसे ही उसका प्रकाशरूप था मानो प्रलयकाल में अग्नि की ज्वाला जलती है-और बीच में नीलमणि धूम्र के समान था-मानों धुआँ निकलता है और सब रंगों की खानि है | ऐसे प्रकाश था मानो संध्या के लाल बादल इकट्ठे हुए हैं, मानो योगीश्वरों के ब्रह्मरन्ध्र से अग्नि निकलकर इकट्ठी हुई वा मानो बड़वाग्नि समुद्र से निकलकर मेघ को ग्रहण करने के निमित्त स्थित हुई है | निदान महासुन्दर रचना बनी हुई थी जो फल और रत्नमणिसंयुक्त प्रकाशवान् था और ऊपर गंगा का प्रवाह चला जाता था सो यज्ञोपवीतरूप था | गन्धर्व गीत गाते थे, देवियों के रहने के स्थान बने थे   और हर्ष उपजाने को महासुन्दर लीला के स्थान विधाता ने वहाँ रचे थे |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाण प्रकरणे भुशुण्ड्यु पाख्याने सुमेरुशिखर लीलावर्णनन्नाम त्रयोदशस्सर्गः ||13||

 

अनुक्रम


भुशुण्डिदर्शन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! ऐसे शिखर पर मैंने कल्पवृक्ष देखा कि वह महासुन्दर फलों से पूर्ण है और रत्न और मणियों के गुच्छे और स्वर्ण की बेलें लगी हुई हैं, तारों से  दूने फूल दृष्टि आते हैं, मेघ के बादल से दूने पत्र दृष्टि आते हैं और सूर्य की किरणों से दुगुने त्रिवर्ग भासते हैं, जिनका बिजली की नाईं चमत्कार है | पत्रों पर देवता, किन्नर, विद्याधर और देवियाँ बैठी हैं और अप्सरा नृत्य और गान करती हैं-जैसे भँवरे गुञ्जार करते फिरते हैं | हे रामजी! रत्नों के गुच्छे और कलियाँ और  मणि के फूल फल पत्र निरन्ध्र दृष्टि आते थे, सब स्थान फूल फल गुच्छों से पूर्ण थे और छहों ऋतु के फूल फल वहाँ पाये जाते थे | उस वृक्ष के एक टास पर पक्षी बैठे कहीं फूल फलादिक खाते थे, कहीं ब्रह्माजी के हंस बैठे थे , कहीं अग्नि के वाहन तोते, कहीं अश्विनीकुमार और भगवती के शिखावाले मोर, कहीं बगले, कहीं कबूतर और कहीं गरुड़ बैठे ऐसे शब्द करते थे मानो ब्रह्मा कमल से उपजकर ँ़कार का उच्चार करते हैं कई ऐसे पक्षी देखे कि उनकी दो दो चोंचे थीं | फिर मैं आगे देखने को गया तो जहाँ उस वृक्ष का टास था वहाँ अनेक कौवे बैठे देखे | जैसे महाप्रलय में मेघ लोकालोक पर्वत पर आन बैठते हैं तैसे ही वहाँ अनेक कौवे अचल बैठे थे जो सोम, सूर्य, इन्द्र, वरुण और कुबेर के यज्ञ की रक्षा करनेवाले और पुण्यवान् स्त्रियों को प्रसन्नता देनेवाले भर्ता के संदेशे पहुँचानेवाले हैं | उनके मध्य में एक महा श्रीमान् ओर कान्तिमान् कौवा ऊँची ग्रीवा किये हुए बैठा था | जैसे नीलमणि चमकती है तैसे ही उसकी ग्रीवा चमकती थी और पूर्ण मन और मानी अर्थात् मान करने योग्य, सुन्दर और प्राणस्पन्द को जीतनेवाला, नित्य अन्तर्मुख और नित ही सुखी वह चिरंजीवी पुरुष वहाँ बैठा था जगत् में दीर्घ आयु और जगत् की आगमापायी गति देखते देखते जिसने बहुत कल्प का स्मरण किया है, इन्द्र की जिसने कई परम्परा देखी हैं, लोकपाल वरुण, कुबेर, यमादिक के कई जन्म देखे हैं और देवतों और सिद्धों के अनेक जन्म जिस पुरुष ने देखे हैं और जिसका प्रसन्न और गम्भीर अन्तःकरण है, जिसकी सुन्दरवाणी वक्रता से रहित है, जो निर्मल और निरहंकार सबका सुहृद मित्र है, जो पिता समान हैं,उनको पुत्र की नाईं है और जो पुत्र  के समान हैं उनको उपदेश करने के निमित्त पिता और गुरु की नाईं समर्थ है और जो सर्वथा सर्व प्रकार, सर्वकाल, सबमें समर्थ और प्रसन्न, महामति, हृदय, पुण्डरीक, व्यवहार का वेत्ता है, गम्भीर और शान्तरूप महाज्ञातज्ञेय है ऐसे पुरुष को मैंने देखा |   

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्डिदर्शनन्नाम चतुर्दशस्सर्गः ||14||

 

अनुक्रम


भुशुण-डिसमागमन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इसके अनन्तर मैं आकाशमार्ग से वहाँ आया और महातेजवान् दीपकवत् प्रकाशवान् मेरा शरीर था | जब मैं उतरा तब जितने पक्षी वहाँ बैठे थे वे सब जैसे वायु से कमल की पंक्ति क्षोभ को प्राप्त होती है और भूकम्प से समुद्र क्षोभ को  प्राप्त होता है तैसे ही क्षोभ को प्राप्त हुए | उनके मध्य में जो भुशुण्डि था उसने  मुझको यद्यपि अकस्मात् देखा तो भी जान गया कि यह वशिष्ठ है और खड़ा होकर बोला हे मुनीश्वर! स्वस्थ हो, कुशल तो है | हे रामजी! ऐसे कहकर उसने संकल्प के हाथ रचे और उनसे मेरा अर्ध्यपाद्यकर भावसंयुक्त पूजन किया और नौकरों को दूर करके आप ही वृक्ष के बड़े पत्र ले और उनका आसन रचकर मुझको बैठाकर बोला अहो, आश्चर्य है! हे भगवन्! आपने बड़ी कृपा की कि दर्शन दिया | चिरपर्यन्त दर्शनरूपी अमृत से हम वृक्ष सहित पूर्ण हो रहे हैं | हे भगवन्! मेरे पुण्य इक्ट्ठे होकर प्रसन्नता के निमित्त आपको प्रेर ले आये हैं | हे मुनीश्वर! देवता जो पूजने योग्य हैं उनके भी आप पूज्य हो कृपा करके कहो कि आप किस निमित्त आये हैं और आपका क्या मनोरथ है? आपके चरणों के दर्शन करके मैंने तो सब कुछ जाना है | स्वर्ग की सभा में जब चिरंजीवि यों का प्रसंग चला था तब मैं भी शरण आया था इससे आप मुझको पवित्र करने आये हो परन्तु प्रभु के वचनरूपी अमृत के स्वाद की मुझको इच्छा है इस निमित्त मैं प्रभु के मुख से कुछ सुना चाहता हूँ |   हे रामजी! जब इस -रकार चिरंजीवी भुशुण्डि नाम पक्षी ने मुझसे कहा तब मैंने कहा, हे पक्षियों के महाराज! जो कुछ तुमने कहा सो सत् है | मैं अभ्यागत तुम्हारे आश्रम पर इस निमित्त आया हूँ कि चिरंजीवियों की कथा चली थी और उसमें तुम्हारा वर्णन हुआ था | तुम मुझको शीतल चित्त दृष्टि आते हो, और कुशलमूर्ति हो और संसाररूपी जाल से निकले हुए दीखते हो | इससे मेरे संशय को दूर करो कि कब तुमने जन्म लिया था, ज्ञात ज्ञेय कैसे हुए, तुम्हारी आयु कितनी है, कौन-कौन वृत्तान्त तुमको देखा हुआ स्मरण है और किस कारण यहाँ निवास किया है | भुशुण्डि बोले, हे मुनीश्वर! जो कुछ तुमने पूछा वह सब कहता हूँ, शनैः शनैः तुम श्रवण करो | तुम तो स्वयम् साक्षात् प्रभु त्रिलोकी के पूज्य और त्रिकालदर्शी हो परन्तु जो कुछ तुमने आज्ञा की है सो मानने योग्य है | तुम सारिखे महात्मा पुरुषों के सम्मुख हुए अपने में जो कुछ तप्तता होती है वह भी निवृत्त हो जाती है-जैसे मेघ के आगे आये हुए सूर्य की तप्तता मिट जाती है | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण-डिसमागमनन्नाम पञ्चदशस्सर्गः ||15||

 

 

अनुक्रम


भुशुण्ड्यु पाख्याने अस्ताचललाभ

भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! इस जगत् में सब देवताओं के बड़े देव सदाशिव हैं जिन्होंने अर्धांङ्गिनी भगवती को शरीर में धारण किया है और जो महासुन्दर मूर्ति और त्रिनेत्र हैं | जिनकी बड़ी जटा है और मस्तक पर चन्द्रमा है जिससे अमृत टपकता है, और जटा के चहुँ ओर गंगा फिरती है जैसे फूलों की माला कण्ठ में होती है | नीलकण्ठ कालकूट के पीने से विष विभूषण हो गया है, कण्ठ में मुण्ड की माला है और सब ओर से भस्म लगी हुई है | दिशा उनके वस्त्र हैं, श्मशान में गृह है और महाशान्तरूप बिच रते हैं | उनके साथ जो सेना है उसके महाभयानक आकार हैं, किसी के तो रुद्र की नाईं तीन नेत्र हैं, किसी का तोते की नाईं मुख है, किसी का ऊँट का मुख है, कोई गर्दभमुखी है, किसी का बैल का मुख है, कोई जीवों के हृदय में प्रवेश करके रक्त माँस  के भोजन करनेवाले हैं, कोई पहाड़ में रहते हैं, कितने वन कन्दराओं और श्मशान में रहते हैं |   उनके साथ देवियाँ भी ऐसी हैं जिनकी महाभयानक चेष्टा और आचार हैं | उन देवियों में जो मुख्य देवियाँ हैं उनका जिस जिस दिशा में निवास है वह सुनो | जया, विजया, जित और अपराजित वामदिशा की ओर तुम्बर रुद्र के आश्रित हैं, और सिद्धा, मुखका, रक्तका और उतला, भैरव रुद्र के आश्रित हैं | सर्व देवियों के मध्य ये अष्ट नायिका और शतसहस्त्र देवियाँ हैं रुद्राणी, वैष्णवी, ब्रह्माणी, वाराही, वायवी कौमारी, वासवी, सौरी इत्यादिक | इनके साथ मिली हुई आकाश में उत्तम देव, किन्नर गन्धर्व पुरुष, सुरसंभवतियाँ तिनके साथ हुई हैं | भूचरपृथ्वी में कोटों है और नाना   प्रकार के रूप, नाम धारकर पृथ्वी में जीवों को भोजन करती हैं | उनके वाहन ऊँट, गर्दभ, काक, वानर, तोते इत्यादिक हैं | उन देवियों में कई पशुधर्मिणी हैं जो क्षुद्रकर्म में स्थित हैं और कई विदितवेद जीवनमुक्तपद में स्थित हैं | उनके मध्य नायका अलम्बसा देवी है | जैसे विष्णु का वाहन गरुड़ है तैसे ही उस देवी का वाहन काक है और यह देवी अष्टसिद्धि के ऐश्वर्य संयुक्त है | वे देवियाँ एककाल में बिचारती भईं और जगत् के पूज्य तुम्बर और भैरव की पूजा कर विचार किया कि सदा शिव हमारे साथ भावसंयुक्त नहीं बोलते और हमको तुच्छ जानते हैं इससे हम इनको कुछ अपना प्रभाव दिखावें क्योंकि प्रभाव दिखाये बिना कोई किसी को नहीं जानता | ऐसे विचार करके उमा को वश करके दुराय ले गईं और उत्साह करके मद्य, मांसादिक भोजन किया | निदान माया के छल से पार्वती को मारकर चावल की नाईं पकाया और उसके कुछ अंग पकाये हुए सदाशिव को दिये | तब सदाशिव ने जाना कि मेरी प्यारी पार्वती इन्होंने  मारी है | ऐसे निश्चय करके वह कोप करने लगे तब उन देवियों ने अपने अपने अंग से उसके अंग निकाले सौरी ने नेत्र, कौमारी ने नासा और इसी प्रकार सबने अपने अपने अङ्ग निकालकर वैसी ही पार्वती की मूर्ति ला दी और नूतन विवाह कर दिया तब सदाशिव प्रसन्न   हुए, सब ठौर उत्साह और आनन्द हुआ और सब देवियाँ अपने-अपने स्थानों को गईं | चन्द्र नाम काक जो अलम्बसा देवी का वाहन था उसने ब्रह्माणी की हंसिनी के साथ क्रीड़ा की और इसी प्रकार सबने क्रीड़ा की जिससे सबको गर्भ रहे | निदान वह हंसिनी ब्राह्मणी के पास गई तब ब्राह्मणी ने कहा कि अब तुमको मेरे उठाने की शक्ति नहीं-तुम गर्भवती हो-जहाँ तुम्हारी इच्छा हो वहाँ जाओ, फिर आना | हे मुनीश्वर! ऐसे कहकर ब्रह्माणी निर्विकल्प समाधि में स्थित हुई और नाभिसरोवर जो ब्रह्माजी का उत्पत्तिस्थान है वहाँ जा स्थित हुई और उस ताल के कमलपत्र पर निवास किया | जब कुछ काल व्यतीत हुआ तब उन हंसनियों ने तीन तीन अण्डे दिये | जैसे बैल से अंकुर उत्पन्न होता है तैसे ही उनसे एकविंशति अण्ड क्रम से उत्पन्न हुए | कुछ काल उपरान्त जब उनको फोड़ा तो उन अण्डों से हमारे अंग उत्पन्न हुए और क्रम करके  जब हम बड़े हो उड़ने योग्य हुए तब माता हमको ब्रह्माणी के पास ले गई | उनके आगे हमने मस्तक टेका तब ब्रह्माणी ने, जो किसी समय समाधि से उतरी थी, हमको देखकर कृपा वृत्ति धार हमारे शिर पर हाथ रक्खा | उसके हाथ रखने से हमारी अविद्या नष्ट हो गई और  हमारा मन तृप्त शान्तरूप हो गया और हम जीवन्मुक्त पद में स्थित हुए | तब हमको यह वृत्ति फुर आई कि किसी प्रकार एकान्त में जाकर ध्यान में स्थित होवें | देवी ने आज्ञा की कि अब तुम जाओ, तब देवीजी की आज्ञा से हम पिता के पास आये और पिता ने हमको कण्ठ लगाया और मस्तक चूँबा | फिर हमने अलम्बसा देवी की पूजा की तब पिता ने हमसे कहा, हे पुत्रों! तुम संसाररूपी जाल में तो नहीं फँसे और फँसे हो मैं भगवती की प्रार्थना करता हूँ वह भृत्यों पर दयालु है-जैसे तुम चाहोगे तैसे ही तुमको  प्राप्त करेगी | तब हमने कहा, हे पिता! हम तो ज्ञात ज्ञेय हुए हैं जो कुछ जानने योग्य था वह जाना है और जो पाने योग्य था वह हमने ब्रह्माणी देवीजी के प्रसाद से पाया है | अब हमको एकान्त स्थान की इच्छा है जहाँ एकान्त हो वहाँ जा बैठे | तब चन्द्र पिता ने कहा, हे पुत्रों | सुमेरु पर्वत निर्दोष महापावन निर्भय और क्षोभ रहित सुन्दर स्थान है, वह सर्वरत्नों की खानि है, सर्व देवताओं का आश्रयरूप है और सूर्य-चन्द्रमा उसके दीपक हैं जो चहूँ ओर फिरते हैं | ब्रह्माण्डरूपी मण्डप का वह थम्भा है और सुवर्ण का है, चन्द्र सूर्य उसके नेत्र हैं और तारों की कण्ठ में माला है |   दशों दिशा उसके वस्त्र हैं, रत्नमणियों के भूषण हैं और वृक्ष और बेल रोमावली हैं | उसकी त्रिलोकी में पूजा होती है और वह षोडशसहस्त्र योजन पाताल में है जहाँ नाग और दैत्य पूजा करते हैं और चौरासी सहस्त्र योजन ऊर्ध्व को है जहाँ गन्धर्व, देवता, किन्नर, राक्षस मनुष्य पूजा करते हैं | ऐसा पर्वत जम्बूद्वीप के एक स्थान में स्थित है और उसके आश्रय चतुर्दश प्रकार के भूतजाति रहते हैं वह बड़ा ऊँचा पर्वत है और पद्मराग नाम उसका एक शिखर सूर्यवत् उदय है | शिखर पर एक बड़ा कल्पवृक्ष है जो मानो जगत््रूपी शिखर का प्रतिबिम्ब पड़ा है | उस कल्पवृक्ष के दक्षिण दिशा की ओर जो ढाल है उसमें महारत्न के गुच्छे सुवर्ण के पत्र और चन्द्रमा के बिम्बवत् फूल हैं  और सघन रमणीय गुच्छे लगे हैं | वहाँ एक आलय बना हुआ है, वहाँ मैं भी आगे रह आया हूँ | जब देवीजी समाधि में स्थित हुई थी तब मैं वहाँ आलय बनाकर स्थित हुआ था | चिन्तामणि की उसमें शलाका लगी हैं और महारत्नों से बनाहै | वहाँ जा तुम निवास करो |वहाँ और कौवों के पुत्र भी रहते हैं जिनका हृदय आत्मज्ञानसे शीतलहै और बाहर से  भी शीतल है | तुमको वहाँ भोग भी है और मोक्ष भी है | हे वशिष्ठजी! जब इस प्रकार पिता ने हमसे कहा तब हम सबों ने पिता के चरण परसे और पिता ने हमारा मस्तक चूँबा| निदान हम विन्ध्याचलपर्वत से उड़े और आकाशमार्ग से मेघ नक्षत्र, चक्र, लोकान्तर होकर ब्रह्मलोक में पहुँच देवीजी को प्रणाम किया और उन्होंने भली प्रकार हमारे ऊपर कृपादृष्टि की | दया और स्नेह सहित कण्ठ लगाया और मस्तक चूँबा | हम भी मस्तक टेक कर सुमेरु को चले और सूर्य और चन्द्रमा के लोकों और तारागण, लोकपाल और देवताओं के लोकों और तारागण, लोकपाल और देवताओं के लोक, मेघ और पवन के स्थान लाँघकर सुमेरु पर्वत के कल्पवृक्ष पर पहुँचे | हे मुनीश्वर! जिस प्रकार हम उपजे और जिससे ज्ञान हुए हैं और जिस प्रकार यहाँ स्थित हुए हैं वह सब समाचार तुम्हारे आगे अखण्डित कहा |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्यु पाख्याने अस्ताचललाभोनाम षोडशस्सर्गः ||16||

 

अनुक्रम


सन्तमाहात्म्यवर्णन

भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! यह चिरकाल की वार्त्ता तुमसे कही है वह सृष्टि इस सृष्टि से दूर है परन्तु मैंने तुमको वर्तमान की नाईं अभ्यास के बल से सुनाया है | हे मुनीश्वर! मेरा कोई पुण्य था सो फला है कि   तुम्हारा निर्विघ्न दर्शन हुआ और यह आलय शाखा और वृक्ष आज पवित्र हुए | अब जो कुछ संशय है सो पूछो तो मैं कहूँ | वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इस प्रकार कहकर उसने मेरा  भली प्रकार अर्ध्यपाद्य से आदर सहित पूजन किया तब मैंने उससे कहा, हे पक्षियों के ईश्वर तुम्हारे वे भाई कहाँ हैं जो तुम्हारे समान तत्त्ववेत्ता थे, वह तो दृष्टि नहीं आते, अकेले तुमही दिखते हो? भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! यहाँ मुझको बहुत युग की पंक्ति व्यतीत हुई है जैसे सूर्य को कई दिन रात्रि व्यतीत हो जाते हैं तैसे ही मुझको युग व्यतीत हुए हैं | कुछ काल वे भी रहे थे पर समय पाकर उन्होंने शरीर त्याग दिये और तृण की नाईं तनु त्यागकर शिव आत्मपद को प्राप्त हुए | हे मुनीश्वर! बड़ी आयु हो अथवा सिद्ध महन्त हो, बली हो, अथवा ऐश्वर्यवान् हो, काल सबको ग्रासि लेता है | फिर मैंने पूछा हे साधो! जब प्रलयकाल का समय है आता तब सूर्य, चन्द्रमा, वायु मेघ ये सब अपनी अपनी मर्यादा त्याग देते हैं और बड़ा मोक्ष होता है पर तुमको खेद किस कारण नहीं होता? सूर्य की तपन से अस्ताचल उदयाचलादिक पर्वत भस्म हो जाते हैं पर उस क्षोभ में तुम खेदवान क्यों नहीं होते? भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! कई जीव जगत् मैं आधार से रहते हैं और कई निराधार रहते हैं जिनको सेना आदिक ऐश्वर्य पदार्थ होते हैं वे आधार सहित हैं और जो इन पदार्थों से रहित हैं वे निराधार हैं पर दोनों को हम तुच्छ देखते हैं सत् कोई नहीं | उनमें पक्षी की जाति महातुच्छ है जिनका उजाड़ वन में निवास है और वहाँ ही उनका दानापानी है | ये निरालम्ब हैं और इनकी जीविका दैव ने ऐसे ही बनाई है | हे भगवन् मैं तो सदा सुखी हूँ और अपने आपमें स्थित आत्मसन्तोष से तृप्त हूँ | कदाचित इस जगत्  के क्षोभ से खेद को प्राप्त नहीं होता और स्वभावमात्र में सन्तुष्ट और कष्टचेष्टा मुक्त से हूँ |   हे ब्राह्मण! अब हम केवल काल को व्यतीत करते हैं और जगत् के इष्ट अनिष्ट हमको चला नहीं सकते | मरने की हमको इच्छा है और जीने की इच्छा है, क्योंकि जीना मरना शरीर की अवस्था है, आत्मा की अवस्था नहीं | हमको जीने का राग नहीं और मरने में द्वेष नहीं-जैसी अवस्था प्राप्त हो उसी में सन्तुष्ट हैं | हे मुनीश्वर! ऐसे- ऐसे देखे हैं कि वे फिर भस्म हो गये हैं, उनकी अवस्था देखकर हमारे मन की चपलता जाती  रही है और हम इस कल्पवृक्ष पर बैठे हैं जिसमें रत्नों की बेलि लगी हैं | इसपर बैठकर  मैं प्राण अपान की गति को देखता हूँ | इनकी कला की जो सूक्ष्म गति है उसका मैं ज्ञाता हूँ और दिन रात्रि का मुझको कुछ ज्ञान नहीं | सत््बुद्धि से मैं काल को जानता हूँ और सार असार को भी भले प्रकार जानता हूँ | हे मुनीश्वर! जो कुछ विस्तार भासता है वह सब झूठ है, सत् कुछ नहीं, इसी कारण किसी दृश्यपदार्थ की इच्छा नहीं, हम परमउपशमपद में स्थित हैं और सब जगत् भी हमको शान्तरूप है | जो कोई इस जगज्जाल का आश्रय करता है वह सुखी नहीं होता | यह सब जगत् चञ्चलरूप है और स्थित कदाचित् नहीं होता | इसकी अवस्था में हम पत्थरवत् अचल हैं, किसी का हमको राग फुरता है और द्वेष है, हम किसी की इच्छा करें, सब जगत् हमको तुच्छ भासता है | यह सब भूतरूपी नदियाँ कालरूपी समुद्र में जा पड़ती हैं पर हम किनारे खड़े हैं इससे कदाचित नहीं डूबते और जितने जीव हैं वे डूबते हैं? पर कई एक तुम सरीखे निकले हुए हैं और तुम्हारी कृपा से हम भी निर्विकार पद को प्राप्त हुए हैं | हे मुनिश्वर! मैं निर्विकार सब जगत् के क्षोभ से रहित हूँ और आत्मपद को पाकर उपशमरूप हूँ | हे मुनीश्वर! तुम्हारे दर्शन से मैं अब पूर्ण आनन्द को प्राप्त हुआ हूँ, सन्त की संगति चन्द्रमा की चाँदनीवत् शीतल है और अमृत की नाईं आनन्द को प्राप्त हो, अर्थात् सब आनन्द को प्राप्त होते हैं | हे मुनीश्वर! सन्त का संग चन्द्रमा के अमृत से भी अधिक है, क्योंकि वह शीतल गौण है-    हृदय की तपन नहीं मिटाता और सन्त का संग अन्तःकरण की तपन मिटाता है वह अमृत क्षीरसमुद्र के मथन के क्षोभ से निकला है और सन्त का संग सुख से प्राप्त होता है और आत्मानन्द को प्राप्त करता है-इससे यह परम उत्तम है | मैं तो इससे और कोई उत्तम नहीं मानता, सन्त का संग सबसे उत्तम है सन्त भी वे ही हैं जिनकी आपातरमणीय सब इच्छाएँ निवृत्त हुई हैं अर्थात् जो विचार बिना दृश्य पदार्थ सुन्दर भासते हैं और नाशवन्त हैं वे उनको तुच्छ भासते हैं और वे सदा आत्मानन्द से तृप्त हैं | वे अद्वैत निष्ठ हैं, उनकी द्वैतकलना का अभाव हुआ है वे सदा आत्मानन्द में स्थित हैं | ऐसे पुरुष सन्त कहाते हैं | उन सन्तों की संगति ऐसी है जैसे चिन्तामणि होती है, जिसके पाये से सब दुःख नष्ट होते हैं | हे मुनीश्वर! त्रिलोकरूपी कमल के भँवरे और सब ज्ञानवानों से उत्तम तुमही दृष्टि आये हो | तुम्हारे वचन स्निग्ध, कोमल और आत्मरस से पूर्ण, हृदयगम्य और उचित हैं और तुम्हारा हृदय महागम्भीर और उदार, धैर्यवान् और सदा आत्मानन्द से तृप्त है, इससे तुम सबसे उत्तम मुझको दीखते हो | तुम्हारे दर्शन से मेरे सब दुःख नष्ट हुए हैं और आज मेरा जन्म सफल हुआ है | तुम सरीखे सन्तों का संग आत्मपद को प्राप्त करता है | और दुःख और भय नष्ट करके निर्भयता को प्राप्त करता है |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सन्तमाहात्म्यवर्णनन्नाम सप्तदशस्सर्गः ||17||

 

अनुक्रम


भुशुण्ड्यु पाख्याने जीवितवृत्तान्त वर्णन

भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! तुमने जो पूछा था कि सूर्य, वायु और जल का क्षोभ होता है तो तुम खेदवान क्यों नहीं होते उसका उत्तर सुनो | जब जगत् को क्षोभ होता है तब भी मेरा यह कल्पवृक्ष स्थिर रहता है क्षोभ को प्राप्त नहीं होता | हे मुनीश्वर! यह मेरा वृक्ष सब लोको को अगम है | भूत नष्ट होते हैं तब भी मैं इससे सुखी रहता हूँ | जब हिरण्यकशिपु द्वीपों सहित पृथ्वी समेटकर पाताल ले गया था तब भी मेरा वृक्ष कम्पायमान हुआ, जब देवता और दैत्यों का युद्ध हुआ तब और सब पर्वत चलायमान हुए पर मेरा वृक्ष स्थिर रहा और जब क्षीरसमुद्र के मथने के निमित्त विष्णुजी सुमेरु को भुजा से उखाड़ने लगे पर मेरा वृक्ष कम्पायमान हुआ- तब मन्दराचल को ले गये और क्षीरसमुद्र को मथने लगे | प्रलयकाल का पवन और मेघ का क्षोभ हुआ तब भी मेरा वृक्ष कम्पायमान हुआ | फिर एक दैत्य आकर सुमेरु को पटकने  लगा और उसने कुछ उखाड़ा परन्तु मेरा वृक्ष कम्पायमान हुआ | हे मुनीश्वर! बड़े- बड़े उपद्रव हुए हैं और प्रलयकाल के मेघ, पवन और सूर्य तपे हैं तब भी मेरा वृक्ष स्थिर रहा है | इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! फिर मैंने उससे पूछा कि हे साधो! जब प्रलयकाल के वायु और मेघ क्षोभते हैं तब तू विगतज्वर कैसे रहता है? भुशुण्डिजी ने कहा, हे साधो! जब प्रलयकाल के वायु, मेघ मेघादिक क्षोभ करते हैं तब मैं कृतघ्न की नाईं अपने आलय को त्यागकर और सब क्षोभ से रहित आकाश में स्थित होता हूँ और सब अंगों को सकुचा लेता हूँ | जैसे वासना के रोके से मन सकुच जाता है तैसे ही मैं भी अंग को सकुचा लेता हूँ | हे मुनीश्वर! जब प्रलयकाल का सूर्य तपता है तब मैं जल की धारणा से जलरूप हो जाता हूँ, जब वायु चलता है तब पर्वत की धारणा बाँधकर स्थित हो जाता हूँ, जब बहुत तत्त्वों का क्षोभ होता है तब सबको त्यागकर ब्रह्माण्ड खप्पर के पार जो निर्मल परमपद है वहाँ मैं सुषुप्तिवत् अचल गम्भीर हो जाता हूँ और जब ब्रह्मा उपजकर फिर सृष्टि रचता है तब मैं सुमेरु के वृक्ष पर इसी आलय में स्थित होता हूँ | फिर मैंने पूछा, हे पक्षियों के ईश्वर! जैसे तुम अखण्ड स्थित होते हो तैसे ही और योगीश्वर क्यों नहीं स्थित होते? भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! परमा- त्मा की यह नीति किसी से लंघी नहीं जाती, उन योगीश्वरों की नीति इसी प्रकार हुई है और मेरी उत्पत्ति इसी प्रकार है | ईश्वर की नीति अतुल है | उसकी तुल्यता किसी से नहीं की जाती, जहाँ जैसी नीति हुई वहाँ वैसे ही है, अन्यथा किसी से नहीं होती | हमको इसी प्रकार हुई है कि कल्प कल्प में इसी पर्वत के वृक्ष पर आलय होता है और हम आय निवास करते हैं | वशिष्ठजी बोले, हे पक्षियों के नायक! तुम्हारी अत्यन्त दीर्घ आयु है, तुम ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न और योगेश्वर हो और तुमने अनेक आश्चर्य देखे हैं उनमें जो स्मरण है वह कहो?   भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! एक बार ऐसे स्मरण आता है कि पृथ्वी पर तृण और वृक्ष  ही थे और कुछ था, फिर एक बार एकादशसहस्त्रवर्ष पर्यन्त भस्म ही दृष्टि आती थी, जो वृक्ष और तृण थे सो सब जल गये थे, एक बार ऐसी सृष्टि हुई कि उसमें चन्द्र और सूर्य उपजे और दिन और रात्रि की गति कुछ जानी जाती थी पर कुछ सुमेरु के रत्नों का प्रकाश होता था एक कल्प ऐसा हुआ है कि जिसमें देवता और दैत्यों का युद्ध हुआ था | और जब दैत्यों की जीत हुई तो उन्होंने सब देवता मनुष्यों की नाईं हत किये, ब्रह्मा,  विष्णु और रुद्र तीनों देवताओं के सिवा और सब सृष्टि उन्होंने जीती और बीस युग पर्यन्त उन्हीं की आज्ञा चली | एक बार ऐसे स्मरण आता है कि दो युग पर्यन्त पृथ्वी पर वृक्ष ही वृक्ष थे और कुछ सृष्टि थी, एक बार दो युग पर्यन्त पृथ्वी पर पर्वतही  पर्वत सघन हो रहे थे और कुछ था और एक बार ऐसा हुआ कि सब जल ही जल हो गया और कुछ भासे केवल सुमेरु पर्वत थंभे की नाईं भासे | एक बार अगस्त्यमुनि दक्षिण दिशा से आये और विन्ध्याचलपर्वत बढ़ा और सब ब्रह्माण्ड चूर्ण कर दिये | हे मुनीश्वर! बहुत कुछ स्मरण है परन्तु संक्षेप से-सुनो-- एक काल सृष्टि में मनुष्य, देवतादिक कुछ भासते थे, एक बार ऐसी सृष्टि हुई थी कि ब्राह्मण मद्यपान करते थे शूद्र बड़े हो बैठे थे और सब जीवों में विपर्यय धर्म हो गये थे ,एकबार ऐसी सृष्टि स्मरण में आती है कि पृथ्वी में कोई पर्वत दृष्टि   आता था, एक बार सृष्टि ऐसी उत्पन्न हुई कि सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, लोकपाल आदि कोई उपजा, एक सृष्टि ऐसी हुई कि सब ही उपजे, एक सृष्टि ऐसी हुई कि उसमें स्वामिकार्त्तिक उपजा, दैत्य और बढ़ गये और दैत्यों ही का राज्य हो गया | मुझको बहुत स्मरण है कहाँ तक कहूँ | सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, इन्द्र, उपेन्द्र और  लोकपालों के बहुत जन्म मुझको स्मरण आते हैं | जब हिरण्याक्ष को जो वेद को चुरा ले आया था हरि ने मारा था वह भी स्मरण है और क्षीरसमुद्र मथना भी स्मरण है | ऐसी सृष्टि भी देखी है कि जिसमें विष्णुजी का वाहन गरुड़ नहीं हुआ, ब्रह्माजी हंस वाहन बिना हुए हैं और रुद्र बैल वाहन बिना हुए हैं |    इसी प्रकार बहुत कुछ देखा है क्या क्या तुम्हारे आगे वर्णन करूँ |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्यु पाख्याने जीवितवृत्तान्त वर्णनन्नामाष्टादशस्सर्गः ||18||

 

 

अनुक्रम


 

चिरातीतवर्णन

भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! जब फिर सृष्टि उत्पन्न हुई तब तुम भारद्वाज, पुलस्त्य, नारद, इन्द्र, मरीचि, उद्दालक, क्रतु, भृगु, अंगिरा, सनत्कुमार, भार्गवेश आदिक उपजे | फिर सुमेरु, मन्दराचल, कैलास, हिमालय आदिक पर्वत उपजे और अत्रि वासुदेव, बाल्मीकि इत्यादिक यह तो अल्पकाल के उपजे हैं | हे मुनीश्वर! तुम ब्रह्मा  के पुत्र हो और तुम्हारे आठ जन्म मुझको स्मरण आते हैं | कभी तुम आकाश से उपजे हो कभी जल से उपजे, कभी पहाड़ से उपजे, कभी पवन से उपजे और कभी अग्नि से उपजे हो | हे मुनीश्वर मन्दराचलपर्वत को क्षीरसमुद्र में डालकर जब मथने लगे और देवता और दैत्य क्षोभवान् हुए कि मन्दराचल नीचे चला जाता है तब विष्णुजी ने कच्छपरूप धारणकर पर्वत को ठहराया था और अमृत निकाला था सो मुझको द्वादशबार स्मरण आता है | तीन बार हिरण्याक्ष पृथ्वी को पाताल में समेट ले गया है और छः बार परशुराम रेणुका माता का पुत्र हुआ है सो बहुत सृष्टि के पीछे हुआ है | जब क्षत्रियों में दैत्य उपजने लगे तो उनके नाश निमित्त विष्णुजी ने परशुरामजी का अवतार लिया था | हे मुनीश्वर! एक सृष्टि ऐसी हुई है कि जिसमें अगले से विपर्ययरूप शास्त्र और पुराण के अर्थ हुए और एक कल्प में और ही पाठ और ही युक्ति और ही अर्थ हुए क्योंकि युग युग प्रति और ही पुराण होते हैं, किसी को देवता बनाते हैं और किसी को ऋषीश्वर मुनीश्वर कहते हैं | कथा और इतिहास भी मुझे बहुत स्मरण हैं | बाल्मीकीजी ने द्वादशबार रामायण बनाई और विलय हो गया है और व्यासजी ने दो बार महाभारत बनाई और उन्होंने सातबार अवतार लिया है | मुनीश्वर! इस प्रकार आख्यान, कथा, इतिहास और शास्त्र जो जो हुए हैं वे सब मुझको बहुत स्मरण में आते हैं | हे साधो! दैत्यों के मारने के निमित्त विष्णुजी  युग युग प्रति अवतार लेते हैं | एकादशबार मुझको रामजी स्मरण में आते हैं- और वसुदेव के गृह में पृथ्वी के भार उतारने के निमित्त कृष्णजी ने सोलह बार अवतार लिया है सो भी मुझको स्मरण है और   तीन बार नरसिंह अवतार धारण कर विष्णुजी ने हिरण्य कशिपु को मारा है | हे मुनीश्वर! इसी प्रकार मुझको अनेक सृष्टि स्मरण आती है परन्तु सबही भ्रममात्र है, कुछ उपजी नहीं | जब आत्मतत्त्व में देखता हूँ तब कुछ सृष्टि नहीं भासती सब सत्तामात्र है | जैसे जल में बुद्बुदे उपजकर लीन हो जाते हैं तैसे ही आत्मा में मन के फुरने से कई सृष्टि उपजती हैं और लीन हो जाती हैं | उस फुरने से कई सृष्टि देखी हैं; कोई सदृश ही उपजती हैं कोई अर्धसदृश और कोई विपर्यय रूप हैं | हे मुनीश्वर! कोई कोई सृष्टि में एक से ही आकार और कर्म-आचार होते हैं कोई मन्वन्तर-मन्वन्तर प्रति और ही और सृष्टि होती है और किसी में ऐसे होता है कि पुत्र पिता हो जाता है, शत्रु मित्र हो जाता है, बान्धव अबान्धव और अबान्धव बान्धव हो जाता है | इस प्रकार भी विपर्यय होते दृष्टि आये हैं | कभी इस ही कल्पवृक्ष पर हमारा आलय होता है, कभी मन्दराचल में कभी हिमालय पर्वत में, और कभी मालव पर्वत में होता है | इसी प्रकार वन, वृक्ष और बेलि पर हो जाता है और कभी इसी कल्पवृक्ष के ऊपर  हो जाता है पर अब तो बहुत काल से इसी कल्पवृक्ष पर रहता हूँ | जब सृष्टि का नाश हो जाता है तब भी मेरा यही शरीर रहता है | मैं आसन लगाकर अपनी पुर्यष्टक को ब्रह्म सत्ता में स्थित करता हूँ इसी कारण मुझको फिर यही शरीर प्राप्त होता है | हे मुनीश्वर! जगत् सब संकल्पमात्र है, जैसा संकल्प फुरता है तैसा ही आगे हो भासता है | यह जगत् सत्य भी नहीं और असत्य भी नहीं केवल भ्रमरूप है | उस जगत् भ्रम में अनेक आश्चर्य दृष्टि आते हैं, पिता पुत्र हो जाता है, मित्र शत्रु हो जाता है, स्त्री पुरुष हो जाती और पुरुष स्त्री हो जाता है | कभी कलियुग में सतयुग बर्तने लगता है और सतयुग में कलियुग बर्तने लगता है और कभी द्वापर में त्रेता और त्रेता में द्वापर बर्तता है | कभी अदृश्य ही वेद विद्या के अर्थ होते हैं और नाना प्रकार के आश्चर्य भासते हैं | हे मुनीश्वर! जब एक सहस्त्र चौकड़ी युग की व्यतीति होती है तब ब्रह्माजी का एक दिन होता है,  सो एकबार दो दिन पर्यन्तब्रह्मा समाधि में लगा रहा और सृष्टि शून्य हो रही-यह स्मरण  आता है और भी कई देश क्रिया विचित्ररूप स्मरण आते हैं, क्या क्या कहूँ |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चिरातीतवर्णनन्नामैकोनविंशतितमस्सर्गः ||19||

 

 

अनुक्रम


संकल्पनिराकरण

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इस प्रकार जब भुशुण्डिजी ने कहा तब मैंने फिर जिज्ञासा के  अर्थ पूछा कि हे पक्षियों के ईश्वर! तुमतो चिरकाल पर्यन्त जगत् में व्यवहार करते रहे तो तुम्हारे शरीर को मृत्यु ने किस निमित्त ग्रास किया? भुशुण्डिजी बोले, हे  मुनीश्वर! तुम सब जानते हो परन्तु ब्रह्म जिज्ञासा करके पूछते हो इससे जैसे विद्यार्थी वेदार्थ पढ़कर फिर गुरु के आगे कहते हैं तैसे ही मैं आज्ञा मानकर कहता हूँ | हे मुनीश्वर! मृत्यु किसको मारता है और किसको नहीं मारता सो सुनो | दुःख रूपी मोती वासनारूपी तांत से पिरोये हैं, यह माला जिसके हृदयरूपी गले में पड़ी हुई है उसको मृत्यु मारता है और जिसके कण्ठ में यह माला नहीं पड़ी उसको मृत्यु नहीं मारता | शरीररूपी वृक्ष में चित्तरूपी सर्प बैठा है | आशारूपी अग्नि जिस वृक्ष को नहीं जलाती वह मृत्यु के वश नहीं होता | रागद्वेषरूपी विष से पूर्ण जो चित्तरूपी सर्प है, तृष्णा से चूर्ण होता है और लोभरूपी व्याधि से नष्ट होता है उसको मृत्यु मारता है और ग्रस लेता है | जिसको इनका दुःख नहीं स्पर्श करता उसको मृत्यु भी नहीं नाश करता | हे मुनीश्वर! शरीररुपी समुद्र क्रोधरूपी बड़वाग्नि से जलता है जिसको क्रोधरूपी अग्नि नहीं जलाता उसको मृत्यु भी नहीं मारता | जिसका मन परम पावन और निर्मल पद में दृढ़ विश्रान्त और स्थित हुआ है उसको मृत्यु नाश करता | हे मुनीश्वर जिसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, तृष्णा, चिन्ता, चञ्चलता, अभिमान, प्रमाद इत्यादि दुःख होते हैं उसको मृत्यु मारता है और जिसको काम क्रोध, लोभादिक रोग संसार  बन्धन का कारण बाँध नहीं सकते और जो इनसे लेपायमान नहीं होता उसको आधि व्याधिरूपी मल नहीं स्पर्श करता | जो मनुष्य लेता है, देता है और सब कार्य करता है पर चित्त में अनात्म स्पर्श नहीं करता   उसको और जो पुरुष इष्ट की वाच्छा नहीं करता और अनिष्ट में दोष नहीं करता दोनों की प्राप्ति में सम रहता है उसको समाहितचित्त कहते हैं | हे मुनिश्वर! जो कुछ ऐश्वर्यवान् सुन्दर पदार्थ हैं वे सब असत््रूप हैं, पृथ्वी पर चक्रवर्ती राजा और स्वर्ग में गन्धर्व, विद्याधर, किन्नर, देवता और उनकी स्त्रीगण और सुरों की सेना आदिक सब नाशरूप हैं | दैत्य, देवता, असुर, पहाड़, ताल,नदियाँ जो कुछ बड़े पदार्थ हैं वे सबही नाशरूप हैं | स्वर्ग, पृथ्वी और पाताललोक जो कुछ जगत् भोग हैं वे सब असत््रूप और अशुभ हैं | कोई पदार्थ श्रेष्ठ नहीं, पृथ्वी का राज्य श्रेष्ठ है, देवताओं का रूप श्रेष्ठ है, नागों का पाताललोक श्रेष्ठ है, कुछ शास्त्रों का विचारना श्रेष्ठ है, काव्य का जानना श्रेष्ठ है, पुरातन कथाक्रम वर्णन करना श्रेष्ठ है, बहुत जीना श्रेष्ठ है, मूढ़ता से मर जाना श्रेष्ठ है, नरक में पड़ना श्रेष्ठ है और इस त्रिलोकी में और कोई पदार्थ श्रेष्ठ है, जहाँ सन्त का मन स्थित है वही श्रेष्ठ है | यह नाना प्रकार का जगत््क्रम चलरूप है, जो ज्ञानवान् पुरुष हैं वे मूढ़ होकर चलपदार्थ में नहीं रमते और बहुत जीने की इच्छा भी नहीं करते हैं | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने संकल्पनिराकरण न्नामविंशतितमस्सर्गः ||20||

 

अनुक्रम


समाधि वर्णन

भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! केवल एक आत्मदृष्टि सबसे श्रेष्ठ है, जिसके पाये से  सब दुःख नाश होते हैं और परमपद पद प्राप्त होता है | वह आत्मचिन्तन सर्व दुःखों का नाशकर्त्ता है और चिरकाल के तीनों तापों से तपे और जन्म के मार्ग से थके हुए जीवों के श्रम को दूर करता है और तपन मिटाता है | समस्त दुःखों की खानि अनिद्या अनर्थ प्राप्त करनेवाली है उसको नाश करती है | जैसे अन्धकार को प्रकाश नष्ट करता है  तैसे ही जीव के हृदय में शीतल प्रकाश उपजाती है | हे भगवन्! ऐसी जो आत्मचिन्तना सब  संकल्पो से रहित है सो तुम सारिखे को सुगम प्राप्त है और हम सारिखों को कठिन है, क्योंकि समस्त कलना से अतीत है | हे मुनीश्वर! उस आत्मचिन्तन की सखी और भी कोई ताप हो तो सब ताप मिट जावें- और महा शीतलता हो उनमें से मुझको एक सखी प्राप्त हुई है वह सब दुःखों का नाश करती है, सब सौभाग्य देनेवाली और जीने का मूल है | ऐसी प्राणचिन्ता मुझको प्राप्त हुई है | हे रामजी! जब इस प्रकार मुझसे काकभुशुण्डि ने कहा तब मैंने जानकर भी क्रीड़ा के निमित्त फिर उससे पूछा कि हे सर्वसंशयों के निवृत्त करनेवाले, चिरंजीवी पुरुष! सत्य कहो, प्राण चिन्ता किसको कहते हैं? भुशुण्डिजी बोले, हे सर्ववेदान्त के वेत्ता और सर्व संशयों के नाशकर्त्ता! मेरे उपहास के निमित्त तुम मुझसे पूछते हो | तुम तो सब कुछ जानते हो परन्तु तुमसे शिष्य की भाँति कहता हूँ | क्योंकि गुरु के आगे कहना भी कल्याण के निमित्त है | भुशुण्डिजी के जीने का कारण और भुशुण्डि को आत्मलाभ देनेवाली प्राणचिन्ता कहाती है | हे भगवन्! इसी दृष्टि का आश्रय करके मैं परमपद को प्राप्त हुआ हूँ मुझको बन्धन नहीं होता और सब अवस्था में बैठते, चलते, जागते, सोते सब ठौर मेरा चित्त सावधान रहता है इस कारण कोई बन्धन नहीं होता | हे मुनीश्वर! मेंने प्राण और अपान के संसरने की गति पाई है, उस युक्ति से मुझको आत्मबोध हुआ है और उस बोध से मेरे मद, मोहादिक विकार सब नष्ट हो गये हैं और शान्तरूप होकर स्थित हुआ हूँ | हे मुनीश्वर! जिसको प्राण अपान की गति प्राप्त हुई है वह सब आरम्भ कर्म को करे अथवा सब आरम्भ का त्याग करे परन्तु सदा शान्तरूप है, उसका काल सुख से व्यतीत होता है | हे मुनीश्वर! प्राण हृदय से उपजकर द्वादश अंगुल पर्यन्त बाहर जाता है और वहाँ जाकर स्थित होता है, उस ठौर से अपानरूप हो हृदय में आकर स्थित होता है | हे मुनीश्वर! बाहर आकाश के सम्मुख जो प्राण जाता है सो अग्निवत् उष्ण होता है और जो हृदय आकाश के सम्मुख आता है सो शीतल नदी के प्रवाहवत् आता है, अपान चन्द्रमारूप है और बाहर से अन्तर आता है | और प्राण भीतर से बाहर जाता है, वह अग्नि, उष्ण और सूर्यरूप है | प्राणवायु हृदयाकाश को तपाता है और अन्न को पचाता है और अपान हृदय को चन्द्रमा की सदृश शीतल करता है | हे मुनीश्वर! अपानरूपी चन्द्रमा जब प्राणरूपी सूर्य में जहाँ तत्त्व है लीन होता है तो उसमें स्थित हुआ मन फिर शोक को नहीं प्राप्त होता और प्राणरूपी सूर्य जब अपानरूपी चन्द्रमा के घर में लीन होता है उस अवस्था में मन स्थित हुआ फिर जन्म का भागी नहीं होता | हे मुनीश्वर! सूर्यरूपी प्राण अपने सूर्यभाव को त्यागकर अपानरूपी चन्द्रमा को जबतक नहीं प्राप्त हुआ उस अवस्था के देशकाल को विचारे तो फिर शोक नहीं पाता और सब भ्रम नष्ट हो जाते हैं | द्वादश अंगुल पर्यन्त जो आकाश है उससे अपानरूप चन्द्रमा उपजकर हृदय के प्राणरूपी सूर्य में लीन होता है पर सूर्यभाव को जब तक नहीं प्राप्त होता उसके मध्यभाव अवस्था में जिसका मन लगा है वह परमपद को प्राप्त  होता है | हृदय में चन्द्रमा और सूर्य के अस्तभाव और उदयभाव का ज्ञाता था और इसका आधारभूत जो आत्मा है उसको जानकर फिर मन नहीं उपजता | हे मुनीश्वर! प्राण और अपानरूपी सूर्य और चन्द्रमा जो हृदय आकाश में उदय और अस्त होते हैं उनके प्रकाश से हृदय में जो भास्करदेव है उसको जो देखता है वही देखता है | बाहर जो सूर्य प्रकाशता है और कभी अन्धकार होता है तो उस प्रकाश के उदय हुए और तम के क्षीण हुए कुछ सिद्ध नहीं होता परन्तु जब हृदय का तम दूर होता है तब परमसिद्धता को प्राप्त होता है | बाहर के तम नष्ट हुए लोकों में प्रकाश होता है और हृदय के तम नष्ट हुए आत्म प्रकाश उदय होता है और अज्ञानअन्धकार का अभाव हो परमपद को जानकर मुक्त होता है | प्राण अपान की युक्ति जाने से तम नष्ट हो जाता है | हे मुनीश्वर! प्राण अपानरूपी जो चन्द्रमा और सूर्य हैं सो यत्न बिना उदय और अस्त होते हैं | जब प्राणरूपी सूर्य हृदयकोट से उपजकर बाहर जाता है तब उसी क्षण अपानरूपी चन्द्रमा में लीन होता है और अपानरूपी चन्द्रमा उदय हो जाता है और जब अपानरूपी चन्द्रमा हृदयकोट के प्राण वायुरूपी सूर्य में स्थित होता है तब उसी क्षण में प्राणरूपी सूर्य उदय होता है | प्राण के अस्त हुए अपान उदय होता है और अपान के अस्त हुए प्राण उदय होता है | जैसे छाया के अस्त हुए धूप उदय होती है और धूप के अस्त हुए छाया उदय होती है तैसे ही प्राण अपान की गति है | हे मुनीश्वर! जब हृदयकोट से प्राण उदय होता है तब प्राण का रेचक होने लगता है | और अपान का पूरक होने लगता है और जब प्राण अपान में स्थित हुआ तब अपान का कुम्भक होता है | उस कुम्भक में जब स्थिति होती है तब फिर तीनों तापों से नहीं तपता | जब अपान का रेचक होता है तब प्राण का पूरक होने लगता है और जब अपान जा स्थित होता है तब प्राण का कुम्भक होता है | उसमें जब स्थित होता है तब भी तीन तापों से तपायमान नहीं होता | हे मुनीश्वर! प्राण अपान के भीतर जो शान्तरूप आत्मतत्त्व है उसमें जब स्थित होती है तब मन तपायमान नहीं होता और जब अपान स्थित होता है और प्राणउदय नहीं हुआ उस अवस्था में जो साक्षीभूत सत्ता है वह  आत्मतत्त्व है | उसमें जब स्थिति होती है तब फिर वह कठिन नहीं होता | जब अपान के स्थान में प्राण जा स्थित होता है और अपान जबतक उदय नहीं हुआ वहाँ जो देश काल अवस्था है उसमें मन स्थित होता है तब मन का मनत्वभाव जाता है और फिर नहीं उपजता | हे मुनीश्वर! प्राण जो अपान में स्थित हुआ और अपान उदय नहीं हुआ वह कुम्भक है | अपान प्राण में स्थित भया और प्राण जबतक उदय नहीं हुआ उस कुम्भक में जो शान्त तत्त्व है वह आत्मा का स्वरूप है और शुद्ध और परम चैतन्य है | जो उसको प्राप्त होता  है वह फिर शोकवान् नहीं होता | जैसे पुष्प में गन्ध से प्रयोजन होता है तैसे ही प्राण अपान के भीतर जो अनुभव तत्त्व स्थित है उससे प्रयोजन है | वह प्राण है अपान है, उस अनुभव आत्मतत्त्व की हम उपासना करते हैं | प्राण अपान कोट क्षय को प्राप्त होता है और अपान प्राण कोट में क्षय होता है, उस प्राण-अपान के मध्य में जो चिदात्मा है उसकी हम उपासना करते हैं | हे मुनीश्वर! जो प्राण का प्राण है, अपान का अपान है जीव का जीव है और देह का आधारभूत है ऐसे चिदात्मा की हम उपासना करते हैं | जिसमें सर्व है, जिससे यह सर्व है और जो यह सर्व है, ऐसा जो चिदात्मा है उसकी हम उपासना करते हैं | जो सर्वप्रकाश का प्रकाश है, सब पावन का पावन है और सब भाव अभाव पदार्थों का अपना आप है- उस चिदात्मा की हम उपासना करते हैं | जो पवन परस्पर हृदय में संपुटरूप है उसमें जो साक्षी रूप और भीतर बाहर सब ठौर वही है, उस चिदात्मा की हम उपासना करते हैं | जब अपान अस्त हुआ और प्राण नहीं उपजा उस क्षण में जो कलंक से रहित है उस चैतन्यतत्त्व की हम उपासना करते हैं | जब प्राण अस्त हुआ और उसमें जो सत्यता है उस चिद्सत्ता की हम उपासना करते हैं | जब प्राण अस्त हुआ और अपमान नहीं उपजा ऐसा जो नासिका के अग्र में शुद्ध आकाश है और उसमें जो सत्यता है उस चिद्सत्ता की हम उपासना करते हैं | जो प्राण अपान के उत्पत्ति का स्थान, भीतर बाहर सब ओर से व्याप्त और सब योग कला का आधारभूत है उस चिद्तत्त्व की हम उपासना करते हैं | जो प्राण अपान के रथ पर आरूढ़ है और शक्ति का शक्तिरूप है उस चिद्तत्त्व की हम उपासना करते हैं | हे मुनिश्वर! जो संपूर्ण कला कलंक से रहित और सर्वकला जिसके आश्रय हैं ऐसा जो अनुभवतत्त्व है और सब देवता जिसकी शरण को प्राप्त होते हैं उस आत्मतत्त्व की हम उपासना करते हैं | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने समाधि वर्णनन्नाम एकविंशतितमस्सर्गः ||21||

 

अनुक्रम


चिरञ्जीविहेतुकथन

भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! इस प्रकार मैं प्राणसमाधि को प्राप्त हुआ हूँ और इस  क्रम से मैं आत्मपद को प्राप्त हुआ हूँ | इसी निर्मल दृष्टि का आश्रय करके स्थित हूँ और एक निमेष भी चलायमान नहीं होता | सुमेरु पर्वत की नाईं स्थित हूँ और चलता हुआ भी स्थित हूँ, जाग्रत में सुषुप्ति स्वप्न में स्थित हूँ और सर्वदा आत्मसमाधि में लगा रहता हूँ, विक्षेप कदाचित् नहीं होता | हे मुनीश्वर! नित्य अनित्य भाव से जो जगत् स्थित है उसको त्यागकर मैं अन्तर्मुख अपने आपमें स्थित हूँ और प्राण अपान की कला जो तुम्हारे विद्यमान कही है उसका सदा ऐसे ही प्रवाह चला जाता है उसमें मेरी अयत्न समाधि है इससे मैं सदा सुखी रहता हूँ कुछ कष्ट नहीं होता | जिसको यह कला नहीं प्राप्त हुई वह कष्ट पाता है | हे मुनीश्वर! अज्ञानी जीव महाप्रलय पर्यन्त संसार समुद्र में डूबते हैं और निकलकर फिर डूबते और इसी प्रकार गोते खाते हैं |  और जिन पुरुषों ने पुरुषार्थ करके आत्मपद पाया है वे सुख से बिचरते हैं | हे मुनीश्वर! भूतकाल की मुझको चिन्ता नहीं और भविष्य की इच्छा नहीं, वर्तमान में यथा प्राप्त राग द्वेष से रहित होकर, विचरता हूँ | मैं सुषुप्ति की नाईं स्थित हूँ इससे केवल स्वरूप में भाव अभाव पदार्थों से रहित हूँ और इस कारण चिरंजीवी हो दुःख से रहित हूँ | प्राण अपान की कला को शम करके स्वरूप में स्थित हूँ | आज यह कुछ पाया है और कल यह पाऊँगा यह चिन्ता मेरी दूर हो गई है, इस कारण निर्दुःख जीता हूँ किसी की प्रशंसा करता हूँ और कदाचित निन्दा करता हूँ, सब आत्मस्वरूप देखता हूँ इस कारण सुखी जीता हूँ | इष्ट की प्राप्ति में हर्षवान् नहीं और अनिष्ट की प्राप्ति में शोकवान् नहीं होता मैंने परम त्याग किया है सर्व आत्मभाव देखता हूँ  और जीवभाव दूर हो गया है इस कारण अदुःख जीता हूँ | हे मुनीश्वर | मेरे मन की चपलता मिट गई है और राग द्वेष दूर हो गये हैं | मन शान्त हुआ है | इस कारण अरोग जीता हूँ, काष्ठ, सुन्दर स्त्री, पहाड़, तृण, अग्नि और सुवर्ण को सम देखता हूँ | हे  मुनीश्वर! मैं जरामरण के दुःख और राजलाभ के सुख और शोक से रहित समभाव में स्थित हूँ और निर्दुःख जीता हूँ ये मेरे बान्धव हैं ये अन्य हैं | यह मैं हूँ, यह मेरा है, यह सब कलना मुझको कुछ नहीं इसी से सुखी जीता हूँ और आहार व्यवहार करता, बैठता, चलता, सूँघता, स्पर्श करता और श्वास लेता हूँ परन्तु यह जो अभिमान है कि मैं `देह हूँ,' इस अभिमान से रहित हो सुखी जीता हूँ इस संसार की ओर से मैं सुषुप्त रूप हूँ और इस संसार की गति को देखकर हँसता हूँ कि वास्तव मे यह है नहीं आश्चर्य है,इस कारण निर्दुःख जीता हूँ | हे मुनीश्वर! मैं सर्वदा काल, सर्वप्रकार पदार्थों  में समबुद्धि हूँ और विषमता मुझको कुछ नहीं भासती, किसी से सुखी होता हूँ और दुःखी हूँ-जैसे हाथ फैलाइये तो भी शरीर है और संकोचिये तो भी शरीर है इसी प्रकार मैंने सर्वात्मा आपको जाना है इससे मुझको कोई दुःख नहीं | मेरी बोली और निश्चय स्निग्ध और कोमल सबको हृदयगम्य है | सर्वत्र मैं जो ऐसे देखता हूँ इस कारण निर्दुःख  जीता हूँ |  चरण से मस्तक पर्यन्त देह में मुझको ममता नहीं और अहंकाररूपी कीचड़ से मैं निकला हूँ इस कारण अरोग जीता हूँ | कार्यकर्त्ता और भोजनकर्त्ता भी दृष्ट आता हूँ परन्तु मेरे मन में निष्कर्मता दृढ़ है | हे मुनीश्वर! सामर्थ्य करके कार्य करूँ तो भी मुझको अभिमान नहीं और दरिद्री होऊँ तो भी संपत्ति और सुख की इच्छा नहीं अर्थात् किसी में आसक्त नहीं होता | इस असत्यरूप शरीर के नाश हुए अभिमान नष्ट नहीं होता | भूतों का समूह सब असत्यरूप है और आत्मा सत्यरूप है, ऐसे जानकर मैं स्थित हूँ  और आशारूपी फाँसी से मेरे मुक्तचित्त की वृत्ति समाहित हुई है और अनात्म में आत्म अभिमान की वृत्ति नहीं फुरती | हे मुनीश्वर! मैंने जगत् को असत्य जाना है और आत्मा को सत्य और हाथ में बिल्वफलवत् प्रत्यक्ष जाना है | इस जगत् में मैं सुषुप्त हूँ | सुख को पाकर मैं सुखी नहीं होता और दुःख को पाकर दुःखी नहीं होता | सबका मैं परम मित्र हूँ इस कारण मैं निर्दुःख जीता हूँ, आपदा में अचलचित्त हूँ, संपदा में सब जगत का मित्र हूँ और भाव अभाव से ज्यों हूँ इस कारण सदासुखी जीता हूँ | मैं परिछिन्न अहं हूँ, कोई अन्य है, कोई मेरा है और मैं किसी का हूँ, यह भावना मेरे चित्त में दृढ़ है | मैं जगत् हूँ, और मैं ही आकाश, देश, काल, क्रिया, सब हूँ, यह निश्चय मुझको दृढ़ है | घट भी चैतन्य है, पट भी चैतन्य है, रथ भी चैतन्य है और यह सब चैतन्य तत्त्व है, यह निश्चय मुझको दृढ़ है इस कारण अदुःख जीता हूँ | हे मुनि शार्दूल! यह सब जो मैंने तुमसे कहा भुशुण्डि नाम काक ने जो त्रिलोकीरूपी कमल का भँवरा है मुझसे कहा था |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुड्यु पाख्याने चिरञ्जीविहेतुकथनन्नाम द्वाविंशतितमस्सर्गः ||22||

 

अनुक्रम


भुशुण्ड्यु पाख्यानसमाप्ति

भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! जैसा मैं हूँ तैसा तुम्हारी आज्ञा के सिद्धि अर्थ कहा है नहीं तो गुरु के आगे कहना भी ढिठाई है | तुम ज्ञान के पारगामी हो | फिर मैं बोला, हे भगवन्! आश्चर्य है और आश्चर्य से भी आश्चर्य है कि तुमने श्रवण का भूषण कहा और आत्म उदितरूप वचन जो तुमने कहे हैं वे परम विस्मय के कारण हैं |   हे भगवन्! तुम धन्य हो | तुम महात्मा पुरुष हो और चिरंजीवियों के मध्य तुम मुझको साक्षात् दूसरे ब्रह्मा भासते हो | आज हम भी धन्य है जैसे मैंने पूछा तैसे ही तुमने  कहा | हे साधो! मैंने सब भूमिलोक देखे हैं और दिशागण, आकाश और पाताललोक भी देखे हैं, त्रिलोकी में तुमसा कोई बिरला ही है | जैसे बाँस बहुत हैं पर मोतीवाला बिरला ही होता है तैसे ही तुम सरिखे बिरले हैं | हे साधो! आज हम पुण्यरूप हुए हैं और आज हमारी देह पवित्र हुई जो तुम जैसे मुक्तआत्मा का दर्शन हुआ है | हे साधो अब हम सप्तर्षियों के मध्य जाते हैं, हमारे मध्याह्न का समय हुआ है | जब मैंने ऐसे कहा तब भुशुण्डि कल्पलता से उठ खड़ा हुआ और संकल्प के हाथ करके उसने सुवर्ण का पात्र रच कर मोती और रत्नों से भरा और मुझको अर्ध्यपाद्य करके पूजन किया | जैसे सदाशिव की पूजा करते हैं तैसे ही उसने चरणों से लेकर मस्तक पर्यन्त मेरा पूजन किया और बहुत नम्र होकर प्रणाम किया | मैंने भी उसको प्रणाम किया और इस प्रकार परस्पर नमस्कार करके मैं वहाँ से उठ खड़ा हुआ और आकाशमार्ग को चला | जैसे पक्षी उड़ता है तैसे ही मैं उड़ा और वह भी मेरे साथ उड़ा | परस्पर हम दोनों हाथ ग्रहण किये जब एक योजन पर्यन्त चले गये तब मैंने उससे कहा, हे साधो! तुम अब यहाँ से फिरो | इस प्रकार बारम्बार कहकर मैंने उसको ठहराया और मैं चला गया | जबतक मैं उसको दृष्टि आता रहा तबतक वह देखता रहा और जब मैं दीखा तब वह अपने स्थान में जा बैठा | मैं सप्तर्षियों के मण्डल में जा पहुँचा और अरुन्धती से पूजित हुआ | हे रामजी! भुशुण्डि के आश्चर्यरूप वचन मैंने तुमको सुनाये हैं | अब भी सुमेरु के श्रृंग पर उस  कल्पवृक्ष की लता मैं वह कल्याणरूप सम स्थित है और शान्तिरूप और मान करने के योग्य है और सदा समाधिमान् है | हे रामजी! यह हमारा और उसका समागम सतयुग के दो सौ वर्ष व्यतीत हुए हुआ था और सतयुग क्षीण हो त्रेतायुग बर्तता है उसमें तुम अपजे हो | हे रामजी! अभी आठ वर्ष बीते हैं कि हमारा उसका फिर मिलाप हुआ था तो वह उसी वृक्ष लता पर है | हे रामजी! यह इतिहास जो मैंने तुमसे कहा है सो परम उत्तम है | जब इसको विचारोगे तब संसारभ्रम निवृत्त हो जावेगा | मुनि वशिष्ठ और भुशुण्डि की कथा को  जो निर्मलबुद्धि से विचारेगा वह भवरूप संसार के भय से तरेगा |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्यु पाख्यानसमाप्तिर्नाम त्रयोविंशतितमस्सर्गः ||23||

 

अनुक्रम


परमार्थयोगोपदेश

वशिष्ठजी बोले, हे अनघ! यह जो मैंने तुमसे भुशुण्डि का वृत्तान्त कहा इसे बोध करके  भुशुण्डि महासंकट से तरा है, इस दशा को तुम भी आश्रय करके प्राणों की युक्ति से अभ्यास करो तब तुम भी भुशुण्डि की नाईं भवसमुद्र के पार होगे | जैसे भुशुण्डि ने ज्ञानयोग से पाने के योग्य पद पाया है तैसे ही तुम भी पावो और जैसे प्राण अपान के अभ्यास से भुशुण्डि परमतत्त्व को प्राप्त हुआ है तैसे ही तुम भी अभ्यास करके प्राप्त हो | विज्ञानदृष्टि जो तुमने सुनी है उसकी ओर चित्त को लगाकर आत्मपद को पावो फिर जैसे इच्छा हो तैसे करो | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! पृथ्वी में आपके ज्ञानरूपी सूर्य की किरणों के प्रकाश से मेरे हृदय से अज्ञानरूपी तम दूर हो गया है और अब प्रबुद्ध होकर अपने आनन्दरूप में स्थित हुआ हूँ और जानने योग्य पद को जानता हूँ-मानो दूसरा वशिष्ठ हुआ हुआ | हे भगवन्! यह जो भुशुण्डि का चरित्र आपने परमार्थबोध के निमित्त कहा है उसमें रक्त माँस और अस्थि का शरीररूपी गृह किसने रचा है, कहाँ से उपजा है, कैसे स्थित हुआ है और कौन इसमें स्थित है? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! परमार्थतत्त्व के बोध और दुःख के निवृत्ति के अर्थ ये मेरे वचन हैं सो सुनो! अस्थि इस शरीररूपी गृह का थम्भा है और उसके नव द्वार हैं, रक्त माँस से जो यह लेपन किया है सो किसी ने बनाया नहीं आभासमात्र है और मिथ्या भ्रम से भासता है | जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा भ्रम से भासता है तैसे ही असत्य रूप शरीर भी भ्रम से भासता है | हे रामजी! जबतक अज्ञान है तबतक देह सत्य भासता है और जब ज्ञान होता है तब देह असत्य भासता है- जैसे स्वप्नकाल में स्वप्न के पदार्थ सत्य भासते हैं और जाग्रत काल में स्वप्न असत्य भासता है तैसे ही अज्ञानकाल में अज्ञान के देहादिक पदार्थ सत्य भासते हैं और ज्ञानकाल में असत्य हो जाते हैं | जैसे जल में बुद्बुदा जल के अज्ञान से सत्य भासता है और जल के जाने से असत्य भासता है, और सूर्य की किरणों में मरुस्थल में नदी भासती है, तैसे ही आत्मा में देह भासती है | हे रामजी! जो कुछ जगत् भासता है वह सब आभासमात्र अज्ञान से भासता है और `अहं' `त्वं' आदिक कल्पना सब मनोमात्र मन में फुरती हैं | तुम जो कहते हो कि देह अस्थि और माँस का गृह रचा है सो अस्थि माँस से नहीं रचा संकल्पमात्र है, संकल्प से भासता है और संकल्प के अभाव हुए देह नहीं पाया जाता | हे रामजी! स्वप्न में जो देह धरकर दिशा, तट, पर्वत इत्यादि तुम देखते फिरते हो जाग्रत में तुम्हारा वह देह कहाँ जाता है? जो देह सत्य होता तो जाग्रत मेंभी रहता और मनोराज से स्वर्ग को जाता है तथा सुमेरु और भूमिलोक में फिरता  है | हे रामजी! इन स्थानों में जैसे मन का फुरना देह होकर भासता है सो असत्यरूप है तैसे ही यह शरीर मन के फुरनेमात्र है इससे असत्य जानो | यह मेरा धन है, यह मेरा देह है, यह मेरा देश है इत्यादिक कल्पना मन की रची हुई है-सबका बीज चित्त ही है | हे रामजी! जगत् को दीर्घकाल का स्वप्न जानो वा दीर्घ चित्त का भ्रम जानो अथवा दीर्घ मनोराज जानो, वास्तव में जगत् कुछ नहीं | जब अपने वास्तव परमात्मास्वरूप को अभ्यास करके जानता है तब जगत् असत्यरूप भासता है | हे रामजी! मैंने पूर्व भी तुमको  ब्रह्माजी के वचनों से कहा है कि सब जगत् मन का रचा हुआ है-इससे संकल्पमात्र है | चिरकाल का जो अभ्यास हो रहा है इससे सत् भासता है, जब दृढ़ पुरुष प्रयत्न से आत्म अभ्यास हो तब असत्य भासेगा | हे रामजी! जो भावना हृदय में दृढ़ होती है उसका अभाव भी सुगम नहीं होता पर जब उसके विपर्यय भावना का अभ्यास करिये तब उसका अभाव हो जाता है | यह मैं हूँ यह और है इत्यादिक कलना जो हृदय में दृढ़ हो रही है जब इसके विपर्यय आत्मभावना हो तब वह मिटे और सर्व आत्मा ही भासे | हे रामजी! जिसकी तीव्र भावना होती है वही रूप उसका हो जाता है-जैसे कामी पुरुष को सुन्दर स्त्री की कामना रहती है तैसे ही जीव को जब आत्मपद की चिन्ता रहे तब भी वही रूप होता है | जैसे कीटभृंगी हो जाता है और जैसे दिन में व्यापार का अभ्यास होता है तो रात्रि को स्वप्न में भी वही देखता है, तैसे ही जिसका जीव को दृढ़ अभ्यास होता है वही अनुभव होता है | जैसे सूर्य आकाश में तपता है और मरुस्थल में जल होकर भासता है पर वहाँ जल का अभाव है तैसे ही भाव से रहित पृथ्वी आदिक पदार्थ भ्रम से भावरूप भासते हैं | जैसे दृष्टि दोष से आकाश में तरुवरे मोरपुच्छवत् भासते हैं तैसे ही अज्ञान से जगज्जाल भासते हैं | हे रामजी! यह जगत् सब आभासरूप है स्वरूप के प्रमाद से भय और दुःख को प्राप्त होता है पर जब स्वरूप को जानता है तब भ्रम, भय और दुःख से रहित होता है | जैसे स्वप्नपुर  में चित्त के भ्रम से सिंहों से भय पाता है और जब जाग्रत स्वरूप में चित्त आता है तब सिंह का भय निवृत्त हो जाता है, तैसे ही आत्मज्ञान से निर्भय होता हे | जब वैराग अभ्यास करके जीव निर्मल आत्मपद को प्राप्त होता है तब फिर क्षोभ को नहीं प्राप्त होता और रागद्वेषरूपी मल उसको नहीं स्पर्श करता | जैसे ताँबा जब पारस के स्पर्श से सुवर्ण होता है तब वह ताँबे भाव को नहीं ग्रहण करता, तैसे ही जीव फिर मलिन नहीं होता | अहं, त्वं आदिक जो कुछ जगत् भासता है वह सब आभासमात्र ही है | हे रामजी! प्रथम सत्य असत्य को जानकर असत्य का निरादर करो और सत्य का अभ्यास करो तब चित्त सर्वकलना से रहित होकर शान्तपद को प्राप्त होता है |जिस तत्त्वज्ञान से सम्यक दर्शी हुआ है उसको जगत् के इष्ट पदार्थ पाये से हर्ष नहीं होता और अनिष्ट के पाये से शोक नहीं होता, वह किसी की स्तुति करता है, किसी की निन्दा करता है और हृदय में शीतल और शान्तरूप हो जाता है | जब कोई बान्धव मृतक हो तब उससे तपायमान क्यों होता है वह तो अवश्य ही मरता | जब अपनी मृत्यु आवे तब अवश्य शरीर छूटता है वृथा क्यों तपायमान होता है | जब सम्पदा प्राप्त होतो उससे हर्षवान् नहीं होता, क्योंकि जो कुछ भोगना था सो भोगा हर्ष किससे हुआ? दुःख आन प्राप्त हो तब शोक क्यों करना शरीर का व्यवहार सुख दुःख आता जाता है और अमिट है और जब अपना किया कर्म उदय होता है तब भी शोक क्यों करता है? हे रामजी! जो सत्य है वह असत्य नहीं और जो असत्य है सो सत्य नहीं फिर रागद्वेष किस निमित्त करना? जिसको ऐसा निश्चय हुआ है कि मैं हूँ, जगत् है और पृथ्वी है तो वह शोक किसका करे और जब देह अन्य है और मैं चैत्य हूँ तो चैत्य हूँ तो चैतन्य का तो नाश नहीं होता तब शोक किसका करना? हे रामजी! दुःख तो किसी प्रकार नहीं है पर जबतक विचार नहीं है पर जबतक विचार नहीं तबतक दुःख होता है और विचार किये से दुःख कोई रहता | सम्यक््दर्शी जो मुनीश्वर है वह सत्य को सत्य और असत्य को असत्य जानता है इस  कारण दुःख नहीं पाता और जो असम्यक््दर्शी है वह अज्ञान से दुःख पाता है | जैसे दिन के अन्त मण्डल शीतल हो जाता है तैसे ही सम्यक््दर्शी का हृदय शीतल होता है | जिसको कर्तव्य में कर्तृत्व का अभिमान नहीं है वही सम्यक््दर्शी है | हे रामजी! जितने जगत् के पदार्थ हैं उनको हृदय से आभासमात्र जानो और बाहर जैसे आचार हो तैसे करो अथवा उसका भी त्याग करो और निराभास होकर स्थित होओ | मैं चिदाकाश, नित्य, सर्वज्ञ और सबसे रहित हूँ , ऐसा अभ्यास करके एकान्त और निर्मल आपको देखोगे | अथवा ऐसी धारणा  करो कि मैं हूँ, यह भोग है, अर्थरूप जगत आडम्बर है, अथवा ऐसे धारो कि मैं ही नित्य शुद्ध, चिदात्मा और आकाशरूप सब कुछ हूँ, मेरे से कुछ भिन्न नहीं और मैं अपने आपमें स्थित हूँ | इन दोनों पक्षों में जो इच्छा हो सो ग्रहण करो तो तुमको सिद्धता का कारण होगा | जगत् को आभासमात्र जानो परन्तु यह भी कलंकरूप है इस चिन्तना को भी त्यागकर निराभास हो | तुमचिदाकाश, नित्य, सर्वव्यापी और सबसे रहित हो ,आभास को त्यागकर निर्मल अद्वैत हो रहे अथवा विधि निषेध दोनों दृष्टियों का आश्रय करो | हे रामजी! क्रिया को करो परन्तु रागद्वेष से रहित हो | जब रागद्वेष से रहित होगे तब उत्तम पदार्थ ब्रह्मानन्द को प्राप्त होगे | और जो सर्व का अधिष्ठान है उसको पावोगे | हे रामजी! जिसका हृदय रागद्वेषरूपी अग्नि से जलता है उसको सन्तोष, वैराग आदिक गुण नहीं प्राप्त होते | जैसे दग्ध भूतल के वन में हरिण प्रवेश नहीं करते तैसे ही रागद्वेषादिकवाले हृदय में सन्तोषादिक नहीं प्रवेश करते | हे रामजी! हृदयरूपी कल्पतरु है | ऐसा वृक्ष जो रागद्वेषादिक सर्पों से रहित है उससे कौन पदार्थ है जो प्राप्त हो-शुद्ध हृदय से सब कुछ प्राप्त होता है | हे रामजी! जो बुद्धिमान भी है और शास्त्र का ज्ञाता भी है परन्तु रागद्वेष संयुक्त है वह सियार की नाईं नीच है और उसको धिक्कार है | जिन पदार्थों के पाने के निर्मित्त लोग यत्न करते हैं वे तो आते जाते हैं | धन को इकट्ठा कोई करता है और कोई ले जाता है तब रागद्वेष किसका करिये? जो कुछ प्रारब्ध है सो अवश्य होता है, धन का व्यर्थ यत्न क्या करिये? बान्धव और वस्त्र आते हैं फिर जाते भी हैं | जैसे समुद्र में झष का आश्रय बुद्धिमान नहीं लेते तैसे ही जगत् के पदार्थों का आश्रय ज्ञानवान् नहीं लेते | भाव अभावरूप परमेश्वर की माया है और संसार की रचना स्वप्न की नाईं है, उनमें जो आसक्त होते हैं उनको वे सर्पिणी वत् डसते हैं | धन, बान्धव और जगत् वास्तव में मिथ्या ही हैं अज्ञान से सत्य भासते हैं | हे रामजी! जो आदि हो और अन्त भी रहे पर मध्य में भासे उसको भी असत्य जानिये | जैसे आकाश में फूल असत्य हैं तैसे ही संसार-रचना असत्य है और जैसे संकल्प रचना असत्य है, जैसे गन्धर्वनगर सुन्दर भासता है पर नष्ट हो जाता है और जैसे स्वप्न पुर दीर्घकाल को भासता है पर भ्रमरूप है, तैसे ही यह जगत् असत्यरूप और भ्रममात्र है  केवल संकल्परूप अभ्यास के वश से दृढ़ता को प्राप्त हुआ है | दीवार जो आकारवान् भासती है सो आकार से रहित प्रकाशरूप है और आत्मपद सुषुप्ति की नाईं अद्वैतरूप है | उस सुषुप्तिरूप पद से जब गिरता है तब दीर्घ स्वप्न को देखता है | हे रामजी! अज्ञान रूपी निद्रा में जो अपने स्वभाव से गिरा है वह संसाररूपी स्वप्न को देखता है | जब अज्ञानरूपी निद्रा का अभाव हो तब अपने आत्मराज और निर्विकल्प मुदित आत्मपद को प्राप्त होता है |   जैसे सूर्य को देखकर कमल प्रफुल्लित होते हैं तैसे ही ज्ञान से शुभगुण फूलते हैं | आत्मरूपी सूर्य सब दुःख से रहित है | जो पुरुष निद्रा में होता है वह सूक्ष्म वचनों से नहीं जागता पर बड़े शब्द करने और जल डालने से जागता है सो मैंने तुम पर मेघ की नाईं गर्जकर वचनरूपी जल की वर्षा की है और ज्ञानरूपी शीतलता सहित ये वचन हैं उनसे अब तुम ज्ञानरूपी जाग्रत बोध को प्राप्त हुए | ऐसे ज्ञानरूपी सूर्य से जगत् को  भ्रमरूप देखोगे | हे रामजी! तुमको जन्म है, मृत्यु है, कोई दुःख है, भ्रम है, सर्वकल्पों से रहित आत्मपुरुष अपने आपमें स्थित हो और तुम्हारी वृत्ति सम, शान्त और सुषुप्ति की नाईं है और अति विस्तृत, सम और शुद्ध अपने स्वरूप में स्थित हो |   

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमार्थयोगोपदेशोनाम चतुर्विंशतितमस्सर्गः ||24||

 

अनुक्रम


देहसत्ताविचार

इतना कहकर, वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब वशिष्ठजी ने वचन कहे तब रामजी सम, शान्त और चेतनतत्त्व में विश्राम पाकर परमानन्द को प्राप्त हुए और समस्त सभा जो बैठी थी वह भी वशिष्ठजी के वचन सुनकर सम और आत्मसमाधि में स्थित हो रही और बोलने का व्यवहार शान्त हो गया | पिंजरे में जो पक्षी बोलते थे वे भी शान्त हो गये,  वन के जो वानर थे वे भी वचन सुनकर स्थित हो रहे और सर्व ओर से शान्ति हो गई | जैसे अर्धरात्रि के समय भूमि शान्त हो जाती है तैसे ही सभा के लोग तूष्णीम् हो रहे और वचनों को विचारने लगे कि क्या उपदेश मुनीश्वर ने किया है | एक घड़ी पर्यन्त शान्ति रही उसके अनन्तर फिर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! अब तुम सम्यक् प्रबुद्ध हुए हो और अपने आप में स्थित हुए हो जो कुछ जाना है उसके अभ्यास का त्याग करना इसी में दृढ़ रहना | हे रामजी! संसाररूपी चक्र का नाभिस्थान चित्त है | उस चित्त नाभि के स्थिर हुए संसारचक्र भी स्थिर हो जाता है | इस संसाररूपी चक्र का बड़ा तीक्ष्ण वेग है, यद्यपि रोकते हैं तो भी फुरने लगता है, इससे दृढ़ प्रयत्न करके इसको रोकिये | सन्तों के संग और सत््शास्त्रों के वचन युक्तबुद्धि से रुकता है | हे  रामजी! अज्ञान से जो दैव कल्पा है उसको त्यागकर अपने पुरुषार्थ का आश्रय करो, इससे परमशान्तपद प्राप्त होता है | ब्रह्मा से लेकर चींटी पर्यन्त जो सब अज्ञानरूपी  है सो असत्यरूप है और भ्रम से सत्य की नाईं भासता है इसको त्याग करो | हे रामजी! असत्यरूप पदार्थों में जो रागद्वेष करते हैं वे मूर्ख हैं उनसे तो चित्र का पुरुष भी श्रेष्ठ है | जब इष्टविषय प्राप्त होता है तब वे हर्ष से प्रफुल्लित होते और अनिष्ट की प्राप्ति से द्वेष करते हैं पर चित्र के पुरुष को रागद्वेष किसी में नहीं होता इस कारण मैं कहता हूँ कि चित्र का पुरुष भी इनसे श्रेष्ठ है | ये आधि व्याधि से जलते हैं पर वह सदा ज्यों का त्यों है | चित्र का पुरुष तब नाश हो जब आधारभूत को नाश करिये, अधिष्ठान के नाश बिना उसका नाश नहीं होता और मनुष्य अविनाश के आधार है उसका नाश नहीं होता पर मूर्खता से आपको नाश होते मानते हैं और रागद्वेष से संयुक्त हैं इससे चित्र के पुरुष से भी तुच्छ हैं | मनोराज संकल्परूप देह भी इस देह  से श्रेष्ठ है, क्योंकि जो कुछ दुःख इसको होते हैं वे बड़े कालपर्यन्त रहते हैं पर मनोराज का दुःख और संकल्प के आये से अभाव हो जाता है इससे थोड़ा है | संकल्पदेह से भी स्थूलदेह तुच्छ है | हे रामजी! जो थोड़े काल से देह हुई है उसमें दुःख भी थोड़ा है और जो दीर्घ संकल्परूपी देह है वह दीर्घः दुःख को ग्रहण करती है इससे महा नीच है | हे रामजी! यह देह भी संकल्पमात्र है सत्य है, असत्य है, उसके भोग के निमित्त मूर्ख यत्न करते हैं और क्लेश पाते हैं | देह अभिमान करके इसके सुख से वे सुखी होते हैं और दुःख से दुःखी होते हैं और इसके नष्ट हुए आपको नष्ट हुआ मानते हैं | जैसे मनोराज के नाश हुए चन्द्रमा का नाश नहीं होता तैसे ही इस देह के नाश हुए  देही पुरुष का नाश नहीं होता जैसे संकल्प पुरुष के नाश हुए पुरुष का नाश नहीं होता और जैसे स्वप्नभ्रम के नाश हुए पुरुष का नाश होता, तैसे ही देह के नाश हुए आत्मा का नाश नहीं होता | जैसे घन धूप के कारण रेणु में जल भासता है और भली प्रकार जा देखिये तब जल का अभाव हो जाता है परन्तु देखनेवाले का अभाव नहीं होता, तैसे ही संकल्प से रचा विनाशरूप जो देह है उसके नाश हुए तुम्हारा नाश तो नहीं होता | हे रामजी! दीर्घकाल का रचा जो स्वप्नमय देह है उसके दुःख और नाश से आत्मा को दुःख और नाश नहीं होता | चैतन्य आत्मसत्ता नष्ट नहीं होती और स्वरूप से चलायमान भी नहीं होती, विकार को प्राप्त होती है, वह तो सर्वदा शुद्ध और अच्युतरूप अपने आप में स्थित है और देह के नाश हुए उसका नाश नहीं होता | अज्ञान के दृढ़ अभ्यास से देह के धर्म अपने में भासते लगे हैं, जब आत्मा का दृढ़ अभ्यास हो तो देहाभिमान और देह के धर्मों का अभाव हो जावे | जैसे कोई चक्र पर चढ़कर भ्रमता है तो उतरने पर कुछ काल भ्रमता भासता है पर जब चिरकाल व्यतीत होता हे तब स्थित हो जाता है, इसी प्रकार देह रूपी चक्र को प्राप्त हुआ और अज्ञान से भ्रमा हुआ आपको भ्रमता देखता है और जब अज्ञान का वेग निवृत्त होता है तब भी कोई काल देहभ्रम भासता है जिससे जानता है कि मेरा नाश होता है, मुझको दुःख होता है इत्यादिक | यह कल्पना अज्ञान से भासती है पर जब उस भ्रमदृष्टि को धैर्य से निवृत्त करते हैं तब अभाव हो जाती है | हे रामजी! जैसे भ्रम से रस्सी में सर्प भासता है तैसे ही आत्मा में देह भासती है सो असत्य और जड़ है, कर्म करती है और मुक्त होने की इच्छा करती है | दैव परमात्मा भी कुछ नही करता, वह सदा शुद्ध, दृष्टा और प्रकाशक है | जैसे निर्वात् द्वीप अपने आप स्थित  होता है तैसे ही तुम भी शुद्ध स्वरूप अपने आपमें स्थित हो | जैसे सूर्य आकाश में स्थित होता है पर सर्व जगत् को प्रकाश करता है और उसके आश्रय लोग चेष्टा करते हैं परन्तु सूर्य कुछ नहीं करता वह केवल सबका साक्षीभूत है तैसे ही आत्मा के आश्रय देहा दिक की चेष्टा होती है परन्तु आत्मा साक्षीरूप है और पापपुण्य से रहित है | हे राम जी! इस देहरूपी शून्य गृह में अहंकाररूपी पिशाच कल्पित है जैसे बालक परछाहीं में वैताल कल्प के भय पाता है तैसे ही अहंकाररूपी पिशाच कल्पकर जीव भय पाता है | वह अहंकाररूपी पिशाच महानीच है और सब सन्तजनों से निन्द्य है | जब अहंकाररूपी वैताल निकले तब आनन्द हो | देहरूपी शून्य गृह में इसका निवास है, जो पुरुष इसका टहलुआ हो रहा है उसको यह नरक में ले जाता है इससे तुम टहलुआ होना | जब इसके नाश का उपाय करोगे तब आनन्द पावोगे | हे रामजी! यह चित्तरूपी उन्मत्त वैताल जिसको स्पर्श करता है उसको अशुद्ध करता है अर्थात् उसका धैर्य और निश्चय विपर्यय करके उसे दुःख देता है और निज स्वरूप से गिरा  देता है | जो बड़े बड़े साधु महन्त हैं वे भी इसके भय से समाधि में स्थित होते हैं कि किसी प्रकार अहंकार का अभाव हो | हे रामजी! अहंकाररूपी पिशाच जिसको स्पर्श करता है उसको आप-सा कर लेता है | यह जैसे आप तुच्छ है तैसे ही और को भी तुच्छ करता है | जहाँ सत्संग सत्शास्त्र का विचार और आत्मज्ञान का निवास नहीं होता उस शून्य और उजाड़रूपी देहमन्दिर में यह रहता है और जो कोई ऐसे स्थान में प्रवेश करता है उसमें प्रवेश कर जाता है | हे रामजी! जिसको अहंकाररूपी पिशाच लगा है उसका धन से कल्याण नहीं होता और मित्र बान्धव से कल्याण होता है | अहंकार पिशाच से मिला हुआ जो कुछ क्रिया कर्म वह करता है सो अपने नाश के निमित्त करता है और बिष की बेलि को उपजाता और बढ़ता है | हे रामजी! जो पुरुष विवेक और धेर्य से रहित है उसको अहंकाररूपी पिशाच शीघ्र ही खा जाता है | वह सर्वरूप है और जिसको स्पर्श करता है उसको शव कर छोड़ता है | जिसको अहंकाररूपी पिशाच लगा है वह नरक रूपी अग्नि में काष्ठ की नाईं जलेगा | अहंकाररूपी सर्प देहरूपी वृक्ष के छिद्र में विष को धारे बैठा है, उसके निकट जो जावेगा उसको मार डालेगा और जिस अहं मम भाव को प्राप्त होगा सो मृतक समान होगा और जन्ममरण पावेगा | अहंकाररूपी पिशाच जिसको लगा  है उसे मलिन करता है और स्वरूप से गिराकर संसाररूपी गढ़े में डालता है और बड़ी आपदा को प्राप्त करता है | जिसकी आपदाएँ हैं उन्हें अहंकार प्राप्त करता है | बहुत वर्ष पर्यन्त भी उन आपदाओं का वर्णन कर सकेगा | हे रामजी! यह जो मलिन कल्पना उठती है कि `मैं हूँ',`मैं मरता हूँ',`मैं दग्ध होता हूँ',`मैं दुःखी हूँ',` मैं मनुष्य हूँ' इत्यादि सो अहंकाररूपी पिशाच की शक्ति है | आत्मस्वरूप नित्यशुद्ध, चिदाकाश, सर्वगत, सच्चिदानन्द, जो सबका अपना आप है पर अहंकार के वश से जीव आपको परिच्छिन्न और अलेप दुःखी मानता है | जैसे आकाश सर्वगत और अलेप है, तैसे ही आत्मा सबमें अलेप है और सबसे असम्बन्धी है पर अहंकार के सम्बन्ध से रहित है | हे रामजी! ग्रहण, त्याग, चलना बैठना इत्यादिक जो कुछ क्रिया है सो देहरूपी यन्त्र और वायुरूपी रस्सी से अहंकाररूपी यन्त्री कराता है और आत्मा सदा निर्लेप सबका अधिष्ठानरूप कारणकार्यभाव से रहित है | जैसे वृक्ष की ऊँचाई का कारण आकाश निर्लेप है, तैसे ही आत्मा सर्वचेष्टा का कारण अधिष्ठान और निर्लेप है जैसे आकाश और पृथ्वी का सम्बन्ध नहीं तैसे ही आत्मा और अहंकार का सम्बन्ध नहीं है | चित्त को जो आप जानते हैं वे महामूर्ख हैं | आत्मा प्रकाशरूप नित्य और सर्वगत विभु है, चित्त मूर्ख जड़ है और आवरण करता है | हे रामजी! आत्मा सर्वज्ञ और चैतन्यरूप है, चित्त मूढ़ है और पत्थरवत् जड़ है, इसको दूर करो इसका और तुम्हारा कुछ सम्बन्ध नहीं | तुम इस मोह से तरो देहरूपी शून्य गृह में चित्तरूपी वैताल का निवास है, जिसको वह अपने वश करता है उसको बान्धव भी नहीं छुड़ा सकते और शास्त्र भी नहीं छुड़ा सकते जिसका देहाभिमान क्षीण हो गया है उसको गुरु और शास्त्र भी छुड़ा सकते हैं जैसे अल्प कीचड़ से हरिण को निकाल लेते हैं तैसे ही गुरु और शास्त्र निकाल लेते  हैं | हे रामजी! जितने देहरूपी शून्य मन्दिर हैं उन सबमें अहंकाररूपी पिशाच रहता है, कोई देहरूपी गृह अहंकार पिशाच से खाली नहीं और भय से मिला हुआ है | जैसे पिशाच अपवित्र स्थान में रहता है, पवित्र स्थान में नहीं रहता तैसे ही जहाँ सन्तोष,  विचार, अभ्यास, सत्संग से रहित देह है उस स्थान में अहंकार निवास करता है और जहाँ सन्तोष, विचार अभ्यास और सत्संग होता है तहाँ से मिट जाता है | जितने शरीररूपी श्मशान हैं वे चित्तरूपी वैताल से पूर्ण हैं और अपरिमित मोहरूपी वैताल के वश जगत््रूपी महावन में मोह को प्राप्त होते हैं | जैसे बालक मोह पाता है | हे रामजी! तुम आपसे अपना उद्धार करो और सत्य विचार करके धैर्य को प्राप्त हो | इस जगत््रूपी पुरातन वन में जीवरूपी मृग बिचरते हैं और भोगरूपी तृण का आश्रय करते हैं पर वे भोगरूपी तृण देखने में तो सुन्दर भासते हैं परन्तु उनके नीचे गड्ढा है | जैसे हरियाली और तृण से ढका हुआ गड्ढा देखके मृग के बालक भोजन करने लगते हैं और गड्ढे में गिर पड़ते हैं तैसे ही जीवरूपी मृग भोगों को रमणीय जानकर भोगने लगते हैं और उनकी तृष्णा से नरक आदिक में गिरते और अग्नि में जलते हैं | हे रामजी! तुम ऐसे होना | जो कोई भोगों की तृष्णा करेगा वह नरकरूपी गड्ढे में गिरेगा, इससे तुम मृगमति को त्यागकर सिंहवृत्ति को धारो | मोहरूपी हाथी को सिंह होकर अपने नखों से विदारण करो और भोग की तृष्णा से रहित हो | भोग की तृष्णावाले जीव जम्बूद्वीपरूपी जंगल में मृग की नाईं भटकते हैं - उन्हीं की नाईं तुम बिचरना | हे रामजी! स्त्री जो रमणीय भासती हैं उनका स्पर्श अल्पकाल ही शीतल और सुखदायक भासता है परन्तु कीचड़ की नाईं है | जैसे कीचड़ का लेप भी शीतल भासता है परन्तु तुच्छ है | जैसे हाथी दलदल में फँसा हुआ निकल नहीं सकता, तैसे ही यह भोगरूपी दलदल में फँसा हुआ नहीं निकल सकता | इससे तुम सन्त की वृत्ति को ग्रहण करो | ग्रहण करना किसको कहते हैं और त्याग किसका नाम है ऐसे विचार से असत््वृत्ति को त्याग करो और आत्म तत्त्व का आश्रय करो | हे रामजी! यह अपवित्र देह अस्थि, माँस, रुधिर से पूर्ण है और तुच्छ है और इसका दुष्ट आचार है | देह के निमित्त भोग की इच्छा करने से कुछ परमार्थ सिद्ध नहीं होता | देह और ने रची है, चेष्टा और से करती है और ने इसमें प्रवेश किया है, दुःख को ग्रहण करता है जो दुःख का भागी होता है | संकल्प ने देह रची है, प्राण से चेष्टा करता है, अहंकार पिशाच ने इसमें प्रवेश किया है और गर्जता है, मन की वृत्ति सुख दुःख को ग्रहण करती है और जीव दुःखी होता है | इससे आश्चर्य है | हे रामजी! परमार्थसत्ता एक है और सर्व समान है | इससे भिन्न सत्ता नहीं | जैसे पत्थर घन जड़ होता है और उसमें और कुछ नहीं फुरता तैसे ही सत्तामात्र से भिन्न  द्वैत सत्ता किसी पदार्थ की नहीं | जैसे पत्थर घनरूप है तैसे ही परमात्मा घनरूप है और जड़ चेतन भिन्न कोई नहीं यह मिथ्या संकल्प की रचना है | जैसे बालक को परछाहीं में बैताल भासता है तैसे ही सब कल्पना मन की है जैसे एक पौंड़े के रस से गुड़, शक्कर इत्यादि होती है तैसे ही एक पुरशोत्तम सत्तासमान सर्व है उसमें जड़ चेतन की कल्पना मिथ्या है, जब तक सम्यक््दृष्टि नहीं प्राप्त हुई तबतक  जड़ चेतन की दृष्टि होती है और जब यथार्थदृष्टि प्राप्त होती है तब भेदकल्पना सब मिट जाती है | जैसे सीपी में रूपा भासता है सो सत्य होता है और असत्य होता है तैसे ही आत्मा में जड़, चेतन,सत्य, असत्य विलक्षण कल्पना है | हे रामजी! जो सत्य है सो असत्य नहीं होता और जो असत्य है सो सत्य नहीं होता | आत्मा सदा सत्यरूप अपने आपमें स्थित है और उसमें द्वैत और एक का अभाव है | जैसे पत्थर में अन्य सत्ता का अभाव है तैसे ही आत्मा में द्वैतसत्ता का अभाव है | नानारूप भासता है तो भी द्वैत कुछ नहीं सदा अनुभवरूप है और उसमें विभाग कल्पना कुछ नहीं-सदा अद्वैतरूप है भेदकल्पना चित्त से भासती है, जब चित्त का अभाव होता है तब जड़ चेतन की कल्पना मिट जाती है जैसे बन्ध्या के पुत्र और आकाश में वृक्ष का अभाव है तैसे ही आत्मा में  कल्पना का अभाव है | हे रामजी! यह चेतन है यह जड़ है, यह उपजता है, यह मिट जाता है इत्यादिक कल्पना सब मिथ्या हैं | जैसे रस्सी में सर्प मिथ्या है तैसे ही केवल निर्विकल्प चिन्मात्र आत्मा में कल्पना मिथ्या है गुरु और शास्त्र भी जो आत्मा को चैतन्य कहते हैं और अनात्मा को जड़ कहते हैं वह भी बोध के निमित्त कहते हैं और दृष्टान्त तथा युक्ति से दृश्य को आत्मस्वरूप में स्थित कराते हैं | जब स्वरूप में दृढ़ स्थित होगी तब जड़ चेतन की भेद-कल्पना जाती रहेगी केवल अचैत्य चिन्मात्र सत्ता भासेगी जो तत्त्व है | इस प्रकार गुरु जड़ चेतन के विभाग का उपदेश करते हैं तो भी मूर्ख नहीं ग्रहण कर सकते तो जब प्रथम ही अचैत्य-चिन्मात्र-अवाच्यपद का उपदेश करे तब कैसे ग्रहण करे | हे रामजी! और आश्चर्य देखो कि चित्त और है, इन्द्रियाँ और  हैं, देह और है, देह का कर्त्ता कोई दृष्टि नहीं आता और अहंकार से वेष्टित की है | यह जीव ऐसा मूर्ख है कि देह को अपना आप जानता है- और दुःख पाता है पर जो विचारवान् पुरुष अत्मपद में स्थित हुए हैं | उन महानुभावों को कोई क्रिया दुःखबन्धन नहीं कर सकती | जैसे मन्त्र जाननेवाले को सर्प दुःख नहीं दे सकता तैसे ही ज्ञानवान् को कर्म बन्धन नहीं करते | हे रामजी! तुम शीश हो, नेत्र हो, रक्त हो, माँस हो, अस्थि आदिक हो, मन हो और भूतजात हो, तुम चित्त से रहित चैतन्य केवल चिन्मात्र साक्षीरूप हो इसीलिये शरीर से ममता त्याग कर नित्य शुद्ध और सर्वगत आत्मस्वरूप में स्थित हो |

 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे देहसत्ताविचारोनाम पञ्चविंशतितमस्सर्गः ||25||

 

अनुक्रम


वशिष्ठाश्रमवर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इसी दृष्टि का ऐसा आश्रय करो और भेदकष्ट दृष्टि का त्याग और नाश करो | जब कष्टदृष्टि नष्ट होगी तब ऐसा आत्मानन्द प्रकट होगा जिस आनन्द के पाये से अष्टसिद्धि का ऐश्वर्य भी अनिष्ट जानकर त्यागोगे | अब और दृष्टि सुनो जो महामोह का नाश करती है और जो आत्मपद पाना कठिन है उसे सुख से प्राप्त कराती है जिसका नाश कदाचित् नहीं होता | यह दृष्टि दुःख से रहित आनन्दरूप शिवजी से मैंने सुनी है जो पूर्वकाल में कैलास की कन्दरा में संसारदुःख की शान्ति के लिये अर्ध चन्द्रधारी सदाशिव ने मुझसे कही थी | हे रामजी! महाचन्द्रमा की नाईं शीतल और प्रकाशमान हिमालय पर्वत का एक शिखर कैलास पर्वत है जहाँ गौरी के रमणीय स्थान और मन्दिर है और गंगा का प्रवाह झरनों से चलता है, पक्षी शब्द करते हैं और मन्द- मन्द सुखदायक पवन चलता है कुबेर के मोर वहाँ बिचरते हैं, कल्पवृक्ष लगे हुए हैं और महाउज्ज्वल, शीतल, सुन्दर कन्दरा पर मन्दार और तमाल वृक्ष लगे हुए हैं जिनमें ऐसे फूल लगे हैं मानो श्वेत मेघ हैं | वहाँ गन्धर्व और किन्नर आते और गाते हैं और देवताओं के रमणीय सुन्दर स्थान हैं | उस पर्वत पर सदाशिव त्रिनेत्र हाथ में त्रिशूल  लिये और गणों से वेष्टित अर्धाङ्ग में भगवती को लिये विराजते हैं ऐसे सर्व लोकों के  कारण ईश्वर जिन्होंने कामदेव का गर्व नाश किया और षट्मुख सहित स्वामिकार्त्तिक जिनके पास बैठे हैं-  और महाभयानक शून्य श्मशानों में जिनका निवास है उस देव की मैंने पूजा की और महापुण्यवान् एक कुटी बनाकर एक कमण्डलु और फूल और माला पूजन के निमित्त रक्खे, यथाशास्त्र पुण्य क्रिया से उसमें तप करने लगा | जल पान करूँ, फल भोजन करूँ, विद्यार्थी जो साथ थे उनको पढ़ाऊँ और शास्त्र का अर्थ विचारूँ | ब्रह्मविद्या की पुस्तकों का समूह आगे था और मृग और उनके बालक बिचरते थे इस प्रकार वेद का पढ़ना, ब्रह्मविद्या को विचारना और शास्त्रानुसार तप करना इन गुणों से कैलास वनकुञ्ज में हम विश्राम करते थे | निदान श्रावण बदी अष्टमी की अर्धरात्रि को जब मैं समाधि से उतरा तो क्या देखता हूँ कि दशोदिशा काष्ठवत् मौन और शान्तरूप हैं, महातम घिरा है और  मन्द मन्द पवन चलता है और ओस के कणके गिरते हैं- मानो पवन हँसी करता है | उसी समय महाशीतल अमृतरूपी किरणों से चन्द्रमा प्रकाशित हो ओषधियों को रस से पुष्ट करने लगा, चन्द्रमुखी कमल खिल आये, चकोर अमृत की किरणों को पानकर मानो चन्द्रमारूप हो गये,प्रातःकाल के तारों की नाईं मणि ऊपर आन पड़ने लगीं और सप्तर्षि शिर पर स्थित हुए-मानो मेरे तप को देखने आये हैं | सप्तर्षियों मैं जो तीन तारे हैं उनके मध्य में मेरा मन्दिर है वहाँ मैं सदा विराजता हूँ | चन्द्रमा से सब स्थान शीतल हो गये और पवन से फूल गिरने लगे |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे वशिष्ठाश्रमवर्णनन्नाम षड््विंशतितमस्सर्गः   ||26||

 

अनुक्रम


रुद्रवशिष्ठसमागम

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! तब मुझको तेज का प्रकाश दृष्टि आने लगा | जैसे मन्दराचल पर्वत के पाये से क्षीरसमुद्र उछल आता है | मानो हिमालय पर्वत मूर्ति धरकर स्थित है | मानो माखन का पहाड़ पिण्ड स्थित हुआ है वा सब शंखों की स्पष्टता स्थित हुई है वा मोती का समूह इकट्ठा होकर उड़ने लगा है | महातीक्ष्ण प्रकाश दृष्टि आने लगा मानो गंगा का प्रवाह उछलने लगा है | उस प्रकाश की शीतलता ने सब दिशा और तट पूर्ण कर लिये और मैं देखकर आश्चर्यवान् हुआ कि क्या अकाल ही प्रलय होने लगा तब मैं बोध दृष्टि से मन में विचारने लगा कि यह क्या है- और देखा कि देवताओं के गुरु ईश्वर सदाशिवचन्द्रकला को धारे हुए और गौरी भगवती का हाथ ग्रहण किये गणों के समूह से वेष्टित चले आते हैं | उनके कानों में सर्प पड़े थे कण्ठ में मुण्डों की माला थी, शीश पर जटा थी और उनपर कदम्ब वृक्ष और तमाल वृक्ष के फूल पड़े हुए थे | उनको प्रथम मैंने मन से देखा, मन ही से मन्दार वृक्ष के  पुष्प लेकर अर्ध्य पाद्यकिया, मन ही से प्रणाम किया और मन ही से प्रदक्षिणा कर अपने  आसन से उठ खड़ा हुआ फिर अपने शिष्य को जगा अर्ध्यपाद्य लेकर चला और त्रिनेत्र शिवजी को पुष्प अज्जली दे और प्रदक्षिणा कर प्रणाम किया तब चन्द्रधारी ने मुझको कृपा दृष्टि से देख और सुन्दर मधुरवाणी से कहा, हे ब्रह्मण! अर्ध्य पाद्य ले आओ हम तेरे  आश्रम में अतिथि आये हैं | हे निष्पाप! तुझको कल्याण तो है? तू मुझको महाशान्तरूप भासता है और महासुन्दर उज्ज्वल तप की लक्ष्मी से तू शोभित है | चलो ,हम तुम्हारे आश्रम को चलें | हे रामजी! फूलों से आच्छादित स्थान में सदाशिव बैठे थे सो ऐसे कह कर उठ खड़े हुए और अपने गणों सहित मेरी कुटीर में आये |वहाँ मैंने पुष्प और अर्ध्य से उनके चरणों की पूजा करके फिर हाथों की पूजा की और इसी प्रकार चरणों से लेकर शीश पर्यन्त सब अंगों की पूजा की | फिर गौरी भगवती का पूजन करके उनकी सखियों और शिव के गणों को पूजा | हे रामजी! इस प्रकार भक्तिपूर्वक जब मैं पार्वती परमेश्वर का पूजन कर चुका तब शशिकला के धारी शिवजी ने शीतल वाणी से मुझसे कहा कि हे ब्राह्मण! नाना प्रकार की चिन्तनेवाली जो चित्तवृत्ति है सो तेरे स्वरूप में विश्रान्ति को प्राप्त हुई है और तेरी संवित आत्मपद में स्थित हुई है | तुम्हारे शिष्यों को कल्याण तो है और तुम्हारे पास जो हरिण विचरते हैं वे भी सुख से हैं? मन्दार वृक्ष तुमको पूजाके निमित्त फूल-फल भली प्रकार देते हैं और गंगाजी तुमको भली प्रकार स्नान कराती हैं? देह के इष्ट अनिष्ट की प्राप्ति में तुम खेदवान् तो नहीं होते? इस पर्वत में कुबेर के अनुचर यक्ष और राक्षस जो रहते हैं वे तुमको दुःख तो नहीं देते और मेरे गण जो निशाचर हैं वे तो तुमको कष्ट नहीं देते? हे रघुनन्दन! इस प्रकार जब देवेश ने मुझसे वाञ्छित प्रश्न किये तब मेंने उनसे कहा,  हे कल्याणरूप महेश्वर! जो तुमको सदा स्मरण करते हैं उनको इस लोक में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो पाना कठिन हो और उनको भय भी किसी का नहीं | जिनका चित्त तुम्हारे स्मरण के आनन्दमें सर्व ओर पूर्ण से हुआ है वे जगत् में दीन नहीं होते | वही देश और  उन्हीं जनों के चरण और वही दिशा पर्वत वन्दना करने योग्य हैं जहाँ एकान्त बुद्धि बैठकर तुम्हारा स्मरण होता है | हे प्रभो! तुम्हारा स्मरण पूर्वपुण्य रूपी वृक्ष का फल है और वर्तमान कर्मों से सिंचता है | तुम मन के परम मित्र हो, तुम्हारा स्मरण  सर्व आपदा का हरनेवाला है और सर्वसम्पदा रूपी लता को बढ़ानेवाला वसन्तऋतु है | हे प्रभो! बड़ी महिमा और बड़े से बड़े कर्मों के कारण का कारण तुम्हारा स्मरण है | हे  प्रभो! तुम्हारा स्मरण विवेकरूपी समुद्र में परमार्थरूपी रत्न है, अज्ञानरूपी तम का नाशकर्तासूर्य का समूह है, ज्ञान अमृत का कलश धैर्यरूपी चाँदनी का चन्द्रमा और मोक्ष का द्वार है | हे प्रभो! तुम्हारा स्मरण अपूर्वरूपी उत्तम दीपक है और चित्त का मण्डप जो संसार है उस सबको प्रकाशता है | हे प्रभो! तुम्हारा स्मरण उदार चिन्ता मणि की नाईं सर्व आपदा को निवृत्त करने वाला और बड़े उत्तम पद को देनेवाला है | हे प्रभो! तुम्हारा स्मरण एक क्षण भी स्थित हो तो सर्वदुःख और भय नाश करता है और वरदायक है | उसके बल से मैं भी तुम्हारे नाईं सुख से बसता हूँ | बाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब मुनीश्वर ने कहा तब दिन का अन्त हुआ, सब सभा परस्पर नमस्कार करके अपने अपने स्थानों को गई और सूर्य की किरणों के साथ फिर सब अपने अपने आसन पर बैठे | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे रुद्रवशिष्ठसमागमो नाम सप्तविंशतितमस्सर्गः ||27||

 

अनुक्रम


जगत्परमात्मरूप वर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब मैंने इस प्रकार कहा तब गौरी भगवती जगत्माता जैसे माता पुत्र से कहे मुझसे बोलीं, हे वशिष्ठजी! अरुन्धती जो पतिव्रताओं में मुख्य है  वह कहाँ है? उसको ले आवो वह मेरी प्यारी सखी है उससे मैं कथा वार्ता करूँगी | हे रामजी! इस प्रकार जब मुझसे पार्वती ने कहा तब मैं शीघ्र ही जाकर अरुन्धती को ले आया और वे दोनों परस्पर कथा वार्ता करने लगीं | मैंने विचारा कि मुझको ईश्वर मिले हैं और पूछने का अवसर भी पाया है इससे सर्व ज्ञान के समुद्र से पूछकर संदेह दूर करूँ | हे रामजी! ऐसे विचार करके मैंने गौरीश से पूछा और जो कुछ चन्द्रकलाधारी  ने मुझसे कहा है वह तुझसे कहता हूँ | मैंने पूछा, हे भगवन्! भूत, भविष्यवत् और वर्तमान तीनों कालके ईश्वर और सब कारणों के कारण तुम्हारे प्रसाद से मैं कुछ पूछने को समर्थ हुआ हूँ | हे महादेव! जो कुछ मैं पूछता हूँ उसे प्रसन्नबुद्धि हो उद्वेग को त्यागकर शीघ्र ही कहो | हे सर्व पापों के नाश करने और सर्व कल्याण के वृद्धि करनेवाले! देव अर्चन का विधान मुझसे कहो | ईश्वर बोले, हे ब्राह्मण! जो उत्तम देव अर्चन है और जिसके किये से संसारसमुद्र से तर जाइये सो सुनो | हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ! पुण्डरीकाक्ष जो विष्णु है सो देव नहीं और त्रिलोचन जो शिव हैं सो भी  देव नहीं, कमल से उपजा ब्रह्मा है सो भी देव नहीं और सहस्त्र नेत्र इन्द्र भी देव नहीं, देव पवन है, सूर्य है, अग्नि है, चन्द्रमा है, ब्राह्मण हैं, क्षत्रिय हैं, तुम हो, मैं हूँ, देह है, चित्त है और कलनारूप है, अकृत्रिम, अनादि, अनन्त और संवित््रूप देव कहाता है | आकारादिक परिच्छिन्नरूप हैं सो वास्तव में कुछ नहीं | एक अकृत्रिम, अनादि, अनन्त, चैतन्यरूप देव है सो देव शब्द से कहाता है और उसी का पूजन पूजन है | उस देव को जिससे यह सब हुआ है और जो सत्ता शान्त-आत्मरूप है उसको सब ठौर में देखना यही उसका पूजन है पर जो उस संवित् संवित् तत्त्व को नहीं जानते उनको आकार की अर्चना कही है | जैसे जो पुरुष  योजनपर्यन्त नहीं चल सकता उसको एक कोस दो कोस का चलना भी भला है, तैसे ही जो पुरुष अकृत्रिम देव की पूजा नहीं कर सकता उसको आकार का पूजना भी भला है | हे ब्राह्मण! जिसकी भावना कोई करता है उसके फल को उसी अनुसार भोगता है | जो परिच्छिन्न की उपासना करता है उसको फल भी परिच्छिन्न प्राप्त होता है और जो अकृत्रिम, आनन्द, अनन्तदेवकी उपासना करता है उसको वही परमात्मारूपी फल प्राप्त होता है |   हे साधो! अकृत्रिम फल को त्यागकर जो कृत्रिम को चाहते हैं ऐसे हैं जैसे कोई मन्दार वृक्ष के वन को त्यागकर कंटक के वन को प्राप्त हो | वह देव कैसा है, उसकी पूजा क्या है और क्योंकर होती है सो सुनो! बोध, साम्य और शम ये तीन फूल हैं | बोध सम्यक््ज्ञान का नाम है , अर्थात् आत्मतत्त्व को ज्यों का त्यों जानना, साम्य सबमें पूर्ण देखने को कहते हैं और शम का अर्थ यह है कि चित्त को निवृत्त करना और आत्मतत्त्व से भिन्न कुछ फुरना इन्हीं तीनों फूलों से शिव चिन्मात्र शुद्ध देव की  पूजा होती है और आकार अर्चन से अर्चा नहीं होती | आत्मसंवित् जो चिन्मात्र है उसको त्यागकर और जड़ की जो अर्चना करते हैं वे चिर पर्यन्त क्लेश के भागी होते हैं | हे ब्राह्मण! जो ज्ञात ज्ञेय पुरुष हैं वे आत्मध्यान से भिन्न पूजन अर्चन को बालक की क्रीड़ावत् मानते हैं | आत्मा भगवन् एक देव है सो ही शिव है और परम कारणरूप है, उसका सर्वदा हौ ज्ञान अर्चन से पूजन है और कोई पूजा नहीं है | चैतन्य, आकाश और निरवयव स्वभाव स्वभाव एक आत्मदेव को जान और पूज्यपूजक और पूजा त्रिपुटी से आत्म देव की पूजा नहीं होती | मैंने पूछा, हे भगवन्! चैतन्य आकाशमात्र आत्मा को वैसे जगत् और चैतन्य को कैसे जीव कहते हैं सो कहो | ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! चैतन्य आकाश प्रसिद्ध है वह प्रकृति से रहित है और जो महाकल्प में शेष रहता है वह आपही किंचनरूप होता हे उस किंचन से यह जगत् होता है | जैसे स्वप्न में चिदात्मा ही सर्व गत जगत््रूप होकर भासता है तैसे ही जाग्रत भी चिदाकाशरूप है | आदि सर्ग से लेकर इस काल पर्यन्त आत्मा से भिन्न का अभाव है | जैसे स्वप्न में जो जगत् भासता है सो भी सब चिदाकाशरूप है भिन्न कल्पना कोई नहीं | चिन्मात्र ही पहाड़रूप हैं, चिन्मात्र  ही जगत् है, चिन्मात्र ही आकाश है, चिन्मात्र ही सब जीव हैं, और चिन्मात्र ही सब भूत हैं, चिन्मात्र से भिन्न कुछ नहीं | सृष्टि के आदि से अन्त पर्यन्त जो कुछ द्वैत कल्पना भासती है सो भ्रममात्र है | जैसे स्वप्न में कोई किसी के अंग काटे सो काटता तो नहीं निद्रा द्वेष से ऐसे भासता है, तैसे ही यह जाग्रत् भी भ्रममात्र है |  हे मुनीश्वर! आकाश, परमाकाश और ब्रह्माकाश तीनों एक ही के पर्याय हैं-जैसे स्वप्न में संकल्परूप माया से अनुभव होता है सो सब चिदाकाश है तैसे ही यह जाग्रत जगत् चिदाकाशरूप है और जैसे स्वप्नपुर आकाश से कुछ भिन्न नहीं होता, तैसे ही जाग्रत् स्वप्ना भी आत्मतत्त्व होकर भासता है, आत्मा से भिन्न वस्तु नहीं | हे मुनीश्वर! जैसे स्वप्न में चिदाकाश ही घट पट आदिक होकर भासता है तैसे ही स्थित प्रलयादि जगत् चिदात्मा से कुछ भिन्न नहीं आत्मा ही ऐसे भासता है | जैसे शुद्ध संवित् मात्र से भिन्न स्वप्न में नगर नहीं पाया जाता तैसे ही जाग्रत में अनुभव से भिन्न कुछ नहीं पाते | हे मुनीश्वर! जगत् तीनों कालों में भाव अभावरूप पदार्थ हो भासता है सो सब चिदाकाशरूप हैं-आत्मा से भिन्न कुछ नहीं | हे मुनीश्वर! यह देव मैंने तुमको परमार्थ से कहा है | तुममें और सर्वभूत जाति जगत् में सबका जो देव है सो चिदाकाश परमात्मा है-उससे भिन्न कुछ नहीं | जैसे संकल्पपुर में चिदाकाश ही शरीररूप हो भासता  है उससे कुछ भिन्न नहीं बना तैसे ही यह सब चिदाकाशरूप है |

 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने जगत््परमात्मरूप वर्णनन्नामाष्टाविंशतितमस्सर्गः || ||

 

 

अनुक्रम


चैतन्योन्मुखत्वविचार

ईश्वर बोले, हे ब्राह्मण! इस प्रकार यह सर्वविश्व केवल परमात्मारूप है | परमात्मा काश ब्रह्म ही एक देव कहाता है, उस ही का पूजन सार है और उसही से सब फल प्राप्त होते हैं वह देव सर्वज्ञ है और सब उसमें स्थित हैं | वह अकृत्रिम देव अज, परमानन्द और अखण्डरूप है, उसको साधन करके पाना चाहिये जिससे परमसुख प्राप्त होता है | हे मुनीश्वर!तू जागा हुआ है इस कारण मैंने तुझसे इस प्रकार की देव अर्चना कही है पर जो असम्यक््दर्शी बालक है, जिनको निश्चयात्मक बुद्धि नहीं प्राप्त हुई उनको धूप,दीप पुष्पकर्म आदिक से अर्चना कही है और आकार कल्पित करके देव की मिथ्या कल्पना की है | हे मुनीश्वर! अपने संकल्प से जो देव बनाते हैं और उसको पुष्प, धूप, दीपादिक से पूजते हैं सो भावना मात्र है उससे उनको संकल्परचित फल की प्राप्ति होती है यह बालक बुद्धि की अर्चना है |  तुम सरिखे की यही पूजा है जो तुमसे सर्व आत्मभावना से कही है | हे मुनीश्वर! हमारे  मत में तो और देव कोई नहीं, एक परमात्मा देव ही तीनों भुवनों में है | वही देव शिव है और सर्वपद से अतीत है | वह सर्वसंकल्पों से रहित है और सर्वसंकल्पों का अधिष्ठान भी वही है | देश काल और वस्तु के परिच्छेद से वह रहित है और सर्व प्रकार शान्तरूप एक चिन्मात्र निर्मल स्वरूप है | वही देव कहाता है | हे मुनीश्वर! जो संवित्सत्ता पञ्चभूतकला से अतीत और सर्व भाव के भीतर स्थित है वही सबको सत्ता देनेवाला देव है और सबकी सत्ता हरनेवाला भी वही है |हे ब्राह्मण! जो ब्रह्म सत्य-असत्य के मध्य और सत्य-असत्य के परे कहाता है वही देव परमात्मा है | परमस्वतः सत्तास्वभाव से जो सबको  प्राप्त हुआ है और महाचित्त कहाता है सो परमात्म देवसत्ता है जैसे सब वृक्षों की लता के भीतर रस स्थित है तैसे ही सत्ता समान रूप से परमचेतन आत्मा सर्व और से स्थित है और जो चैतन्यतत्त्व अरुन्धती का है और जो चैतन्यतत्त्व तुझ निष्पाप का और पार्वती का है वही चैतन्यतत्त्व मेरा है और वही चैतन्यतत्त्व त्रिलोकी मात्र का है सोई देव है और देव कोई नहीं | हाथ पाँव संयुक्त जो देव कल्पते हैं वह चिन्मात्र सार  नहीं, चिन्मात्र ही सर्व जगत् का सारभूत है और वही अर्चना करने योग्य है, उससे सब फलों की प्राप्ति होती है वह देव कहीं दूर नहीं और किसी प्रकार किसी को प्राप्त होना भी कठिन नहीं; जो सबकी देह में स्थित और सबका आत्मा है सो दूर कैसे हो और कठिनता से कैसे प्राप्त हो | सब क्रिया वही करता है, भोजन, भरण और पोषण वही करता है, वही श्वास लेता है और सबका ज्ञाता भी वही है जो पुर्यष्टका में प्रतिबिम्बित होकर प्रकाशता है जैसे पर्वत पर जो चर अचर की चेष्टा होती है और चलते बैठते और स्थित होते हैं सो सबका आधारभूत पर्वत है, तैसे ही मन सहित षटइन्द्रियों की चेष्टा आत्मा के आश्रय होती है | उसी की संज्ञा व्यवहार के निमित्त तत्त्ववेत्ताओं ने देव कल्पी है | एक देव, चिन्मात्र, सूक्ष्म, सर्व व्यापी, निरञ्जन, आत्मा, ब्रह्म इत्यादिक नाम ज्ञानवानों ने उपदेशरूप व्यवहार के निमित्त रक्खे हैं | हे मुनीश्वर! जो कुछ विस्तारसहित जगत् भासता है सबका वह प्रकाशक है और सबसे रहित है, नित्य, शुद्ध और अद्वैतरूप है और सब जगत् में अनुस्युत है | जैसे वसन्तऋतु में नाना प्रकार के फूल और वृक्ष भासते हैं पर सबमें एक ही रस व्याप रहा है जो अनेक रूप हो भासता है, तैसे ही एक ही आत्मसत्ता अनेक रूप होकर भासती है | हे मुनीश्वर! जो कुछ जगत् है सो सब आत्मा का चमत्कार है और आत्मतत्त्व में ही स्थित है, कहीं आकाश, कहीं जीव, कहीं चित्त और कहीं अहंकाररूप है, कहीं दिशारूप, कहीं द्रव्य, कहीं भाव- विकार, कहीं तम, कहीं प्रकाश और कहीं सूर्य, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आदिक स्थावर जंगमरूप होकर स्थित है | जैसे समुद्र में तरंग और बुद्बुदे होते हैं तैसे ही एक परमात्मा देव में त्रिलोकी है | हे मुनीश्वर! देवता, दैत्य, मनुष्य आदिक सब एकदेव में बहते हैं | जैसे जल में तृण बहते हैं, तैसे ही परमात्मा में जीव बहते हैं वही चैतन्यतत्त्व चतुर्भुज होकर दैत्यों का नाश करता है जैसे मेघरूप होकर धूप को रोकता है-और वही चैतन्यतत्त्व त्रिनेत्र मस्तक पर चन्द्र धारे और वृषभ पर आरूढ़ पार्वती रूपी कमलिनी के मुख का भँवरा रुद्र होकर स्थित होता है | वही चेतना विष्णुरूपसत्ता   है, जिसके नाभिकमल से ब्रह्मा त्रिलोकी वेदत्रयरूप कमलिनी की लता बड़ी होकर स्थित हुआ है | हे मुनीश्वर! इस प्रकार एक ही चैतन्यतत्त्व अनेकरूप होकर स्थित हुआ है जैसे एक ही रस अनेक रूप होकर स्थित होता है और जैसे एक ही सुवर्ण अनेक भूषण रूप होकर स्थित होता है, तैसे ही एक ही चैतन्य अनेकरूप होके स्थित होता है | इससे सर्वदेह एक चैतन्यतत्त्व के हैं | जैसे एक वृक्ष के अनेक पत्र होते हैं तैसे ही एक ही चैतन्य के सर्व देह हैं | वही चैतन्य मस्तक पर चूड़ामणि धारनेवाला त्रिलोकपति इन्द्र होकर स्थित हुआ है | देवतारूप होकर वही स्थित हुआ है और दैत्यरूप होकर भी वही स्थित है और मरने उपजने का रूप भी वही धारता है | जैसे एक समुद्र में तरंग के समूह उपजते और मिट जाते हैं सो सब जलरूप ही हैं तैसे ही उपजना और विनशना चैतन्य में होता है वह चैतन्यतारूप परमात्मा एक ही वस्तु है | हे मुनीश्वर! चैतन्य रूपी आदर्श में जगत््रूपी प्रतिबिम्ब होता है और अपनी रची हुई वस्तु को आप ही ग्रहण करके अपने में धरता है |  जैसे गर्भिणी स्त्री अपने गर्भ को धारती है तैसे ही चैतन्यतत्त्व जगत््रूप प्रतिबिम्ब को धारता है | हे मुनीश्वर! सर्वक्रिया उसी देव से सिद्ध होती हैं और सूर्यादिक उसी से प्रकाशते हैं और उसी से प्रफुल्लित होते हैं तैसे ही आत्मा से अन्धकार और प्रकाश दोनों सिद्ध होते हैं | हे मुनीश्वर! त्रिलोकीरूपी धूलि चेतन रूपी वायु से उड़ती है | जो कुछ जगत् के आरम्भ हैं उन सबको चैतन्यरूपी दीपक प्रकाश करता है | जैसे जल के सींचने से बेलि प्रफुल्लित होती है और फूलफल उत्पन्न करती है, तैसे ही चैतन्यसत्ता सब पदार्थों को प्रकट करती है और सबको सत्ता देकर सिद्ध करती है | हे मुनीश्वर! चैतन्य ही में जड़ की सिद्धता और चेतन ही में जड़ का अभाव होता है जैसे प्रकाश ही से अन्धकार सिद्ध होता है और प्रकाश ही से अन्धकार का अभाव होता है तैसे ही सब देह चैतन्य ही से देहों का अभाव होता है | विष्णु भी उसी से होते हैं और शिवजी भी उसी से होते हैं | हे मुनीश्वर! ऐसा पदार्थ  कोई नहीं जो चैतन्य बिना सिद्ध हो, जो कोई पदार्थ है सो आत्मा ही से सिद्ध होता है हे मुनीश्वर! शरीररूपी सुन्दर वृक्ष बड़ी ऊँची डालों सहित है परन्तु चैतन्यरूपी मञ्जरी बिना नहीं शोभता | जैसे रस बिना वृक्ष नहीं शोभता तैसे ही चैतन्य बिना शरीर नहीं शोभता | बढ़ना, घटना आदिक जो विकार हैं वह एक आत्मा से सिद्ध होते हैं यह जगत् सब चैतन्यरूप है और चैतन्यमात्र ही अपने आपमें स्थित है इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब इस प्रकार अमृतरूपी वाणी से त्रिनेत्र ने मुझसे कहा तब मैंने नम्रता से पूछा | हे देव! जब सब जगत् चैतन्य देव व्यापकरूप स्थित है और चैतन्य ही बड़े विस्तार को प्राप्त भया है तब यह प्रथम चेतन था अब यह चेतनता से रहित है इस कल्पना का सब लोकों में प्रत्यक्ष अनुभव कैसे होता है | ईश्वर बोले, हे ब्रह्म वेत्ताओं में श्रेष्ठ! यह महाप्रश्न तेने किया है उसका उत्तर सुन! इस शरीर में दो  चेतन स्थित हैं एक चैतन्योन्मुखत्वरूप है और दूसरा निर्विकल्प आत्मा | जो चेतन चैतन्योन्मुखत्व दृश्य से मिला हुआ है सो जीव संकल्पके फुरने से अन्य की नाईं हो गया है पर वास्तव में और कुछ नहीं हुआ केवल दृश्य संकल्प के अनुभव को ग्रहण करने से जीवरूप हुआ है | जैसे स्त्री अपने शीलधर्म को त्यागकर दुराचारिणी हो जाती है तो उसकी शीलता जाती रहती है परन्तु स्त्री का स्वरूप नहीं जाता तैसे ही चैतन्यो न्मुखत्व से अनुभवरूपी जीवरूप हो जाता है परन्तु चैतन्यरूप का त्याग नहीं करता | जैसे संकल्प के वश से पुरुष एक क्षण में और रूप हो जाता है तैसे ही चित्तसत्ता फुरने भाव से अन्यरूप हो जाती है | हे मुनीश्वर! आदि में चित्त स्पन्द चित्कला में  हुआ है, तब शब्द के चेतने से आकाश हुआ, फिर स्पर्श तन्मात्रा का चेतना हुआ तब वायु प्रकट हुआ, इसी प्रकार पाँचों तन्मात्रा के फुरने से पञ्चतत्त्व हुए | फिर देश आदिक  का विभाग हुआ उसमें जीव प्रतिबिम्बित हुआ, फिर निश्चय वृत्ति हुई उसका नाम बुद्धि हुआ, फिर अहंवृत्ति फुरी उसका नाम अहंकार हुआ, फिर संकल्प विकल्प वृत्ति फुरी उसका नाम मन हुआ, चिन्तना से चित्त हुआ, फिर संसार की भावना हुई तब संसार का अनुभव हुआ और अभ्यास के वश से संसार भासने लगा जैसे विपर्यय भावना करके ब्राह्मण आपको चाण्डाल जाने, तैसे ही भावना के विपर्यय होने से वही चैतन्य आपको जीव  मानने लगा है, संकल्प की दृढ़ता से चेतनरूपी जीव को ग्रहण कर संकल्प में वर्तता है और अनन्त संकल्पों से जड़ता तीव्रता को प्राप्त होकर जड़भाव को ग्रहण कर देहभाव को प्राप्त होता है | जैसे जल दृढ़ जड़ता से बरफरूप हो जाता है तैसे ही चैतन्य जब अनन्त संकल्पों से जड़ देहभाव को प्राप्त होता है तब चित्त मन मोहित हुआ जड़ता का आश्रय करके संसार में जन्म लेता है और मोह को प्राप्त हुआ तृष्णा से पीड़ित होता और  काम, क्रोध संयुक्त भाव-अभाव में प्राप्त होता है | एवं अपनी अनन्तता को त्यागकर परिच्छिन्न व्यवहार में वर्तता है, दुःखदायक अग्नि से तप्त हुआ शून्यभाव को प्राप्त होता है और भेद को ग्रहण करके महादीन हो जाता है | हे मुनीश्वर! मोहरूपी गड्ढे में जीवरूपी हाथी फँसा है   और भाव अभाव से सदा डोलायमान होता है | जैसे जल में तृण भासता है तैसे ही असाररूप संसार में विकारसंयुक्त रागद्वेष से जीव तपता रहता है शान्ति को कदाचित् नहीं पाता और जैसे यूथ से बिछुरा मृग कष्टवान् होता है तैसे ही आवरण भाव जन्ममरण से जीव कष्टवान् होता है और अपने संकल्प से आप ही भय पाता है | जैसे बालक अपनी परछाहीं में वैताल कल्पकर आप ही भय पाता है तैसे ही जीव अपने संकल्प से आप ही भयभीत होता है  और संकट पाता है, आशारूपी फाँसी से बँधा हुआ कष्ट से कष्ट पाता है और कर्मों को करके तपायमान हुआ अनेक जन्म पाता है और भय में रहता है | बालक होता है तब महादीन और परवश होता है, यौवन अवस्था में कामादिक के वश हुआ स्त्री में रत रहता है और वृद्ध अवस्था में चिन्ता से मग्न होता है | जब मृतक होता है तब कर्मों के वश फिर जन्मता है और गर्भ में दुःख पाता है और फिर बालक, यौवन, वृद्ध और मृतक अवस्था को पाता है | स्वरूप से गिरा हुआ इसी प्रकार भटकता है, कदाचित स्थिर नहीं होता | हे मुनीश्वर! एक चित्सत्ता स्पन्दभाव से अनेक भाव को प्राप्त होती है, कहीं दुःख से रुदन करती है, कहीं दुःख भोगती है, कहीं स्वर्ग में देवाङ्ना होती है, पाताल में नागिनी, असुरो में असुरी, राक्षसों में राक्षसी, वनकोट में वानरी, सिंहों में सिंही किन्नरों में किन्नरी, हरिणों में हरिणी, विद्याधरों, में विद्याधरी, गन्धर्वों में गन्धर्वी, देवताओं में देवी इत्यादिक जो रूप धारती है सो चैतन्योन्मुखत्व जीवकला है  क्षीरसमुद्र में वह विष्णुरूप होकर स्थित होती है, ब्रह्मपुरी में ब्रह्मारूप होती है, पञ्चमुख होकर रुद्र होती है और स्वर्ग में इन्द्र होती है | तीक्ष्णकला से सूर्य दिन का कर्त्ता होती है और क्षण, दिन, मास,वर्ष करती है | चन्द्रमा होकर वही रात्रि करती और काल होकर नक्षत्र फेरती है | कहीं प्रकाश, कहीं तम, कहीं बीज, कहीं पाषाण, कहीं मन होती है और कहीं नदी होकर बहती है, कहीं फूल होकर फूलती है, कहीं भँवर होकर सुगन्ध लेती है, कहीं फल होकर दीखती है, कहीं वायु होकर चलती है, कहीं अग्नि होकर जलाती है, कहीं बरफ होती है और कहीं आकाश होकर दीखती है | हे मुनीश्वर! इसी प्रकार सर्वगत सर्वात्मा सर्वशक्तिता से एक ही रूप चित््शक्ति आकाश से भी निर्मल है | जैसे चेतता है तैसे ही होकर स्थित हुई है | जैसे जैसी भावना करती है शीघ्र ही तैसा रूप हो जाता है परन्तु स्वरूप से भिन्न नहीं होती | जैसे समुद्र में फेन तरंग होकर भासते हैं परन्तु जल से भिन्न नहीं-जल ही जल है तैसे  ही चित््शक्ति अनेक रूपों को धारती है परन्तु चैतन्य से भिन्न नहीं होती | चित्् शक्ति ही कहीं हंस, काक, कहीं, शूकर, कहीं मक्खी, चिड़िया इत्यादिक रूप धारकर संसार में प्रवर्तती है जैसे जल में आया तृण भ्रमता है तैसे ही भ्रमती है और अपने संकल्प से आप ही भय पाती है और जैसे गधा अपना शब्द सुन आप ही दौड़ता है और भय पाता है तैसे ही जीव अपने संकल्प से आप ही भय पाता है | हे मुनीश्वर! यह मैंने जीवशक्ति का आचार तुझसे कहा, इसी आचार को ग्रहण करके बुद्धि नीच पशुधर्मिणी हुई है और स्वरूप के प्रमाद से जैसा जैसा संकल्प करती है तैसी ही तैसी कर्मगति को प्राप्त हो शोकवान् होती है, अनन्त दुःख पाती है और अपनी चैत्यता से ही मलिन होती है | जैसे  तुष से ढपा चावल बड़े संताप को प्राप्त होता है, फिर फिर बोया जाता है, फिर फिर उगता है, और काटा जाता है, तैसे स्वरूप के आवरण से जीवकला दुर्भाग्य से जन्म मरण दुःख को प्राप्त होती है | जैसे भर्त्तार से रहित स्त्री शोकवान् होती है तैसे ही जीवकला कष्ट पाती है | हे मुनीश्वर! जड़दृश्य और अनात्मरूप की प्रीति करने और निज स्वरूप के विस्मरण करने से आशारूपी फाँसी से बँधा हुआ चित्त, जीव को नीच योनि में प्राप्त करता है जैसे घटीयन्त्र कभी नीचे जाता है और कभी ऊर्ध्व को जाता है तैसे ही जीव आशा के वश हुआ कभी पाताल और कभी आकाश को जाता है |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे वशिष्ठेश्वर संवादे चैतन्योन्मुखत्वविचारो नामैकोनत्रिशत्तमस्सर्गः ||29||

 

अनुक्रम


मनप्राणोक्त प्रतिपादन

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! स्वरूप का विस्मरणजो इस प्रकार होता है कि मैं हन्ता हूँ, मैं दुःखी हूँ, सो अनात्मा में अहं प्रतीति करके ही दुःख का अनुभव करता है | जैसे स्वप्न में पुरुष आपको पर्वत से गिरता देख के दुःखी होता है और आपको मृतक हुआ देखता है तैसे ही स्वरूप के प्रमाद से अनात्म में आत्म अभिमान करके आपको दुःखी देखता है | हे मुनीश्वर! शुद्ध चैतन्यतत्त्व में जो चित्तभाव हुआ है सो चित्तकला फुरने से जगत् का कारण हुआ है परन्तु वास्तव में स्वरूप से भिन्न नहीं | जैसे जैसे चित्कला चेतती गई है तैसे ही जगत् होता गया है | वह चित्त का कारण भी नहीं हुआ और जब कारण ही नहीं हुआ तब कार्य किसको? हे मुनीश्वर! वह है, चेतन है, चेतनेवाली है, दृष्टा है, दृश्य है और दर्शन है जैसे पत्थर में तेल नहीं होता कारण है, कर्म है और कारण इन्द्रियाँ है, जैसे चन्द्रमा में श्यामता नहीं होती | वह मन है और मानने योग्य दृश्य वस्तु है-जैसे आकाश में अंकुर नहीं होता | वह अहन्ता है, तम है और दृश्य है-जैसे शंख को श्यामता नहीं  होती | हे मुनीश्वर! वह नाना है, अनाना है-जैसे अणु में सुमेरु नहीं होता| वह  शब्द है, स्पर्श का अर्थ है-जैसे मरुस्थल में बेलि नहीं होती | वस्तु है, अवस्तु है-जैसे बरफ में उष्णता नहीं होती | शून्य है अशून्य है, जड़ है चेतन है | जैसे सूर्यमण्डल में अन्धकार नहीं होता | हे मुनीश्वर! शब्द और अर्थ इत्यादिक की कल्पना भी उसमें कुछ नहीं-जैसे अग्नि में शीतलता नहीं होती | वह तो केवल केवलीभाव अद्वैत चिन्मात्र तत्त्व है स्वरूप से किसी को कुछ भी दुःख नहीं होता  हे मुनीश्वर! जगत् को असत् जानकर अभावना करना और आत्मा को सत् जानकर भावना करना इस भावना से सर्व अनर्थ निवृत्त हो जाते हैं पर यह और किसी से प्राप्त नहीं होता अपने आप ही से प्राप्त होता है और अनादि ही सिद्ध है | जब उसकी ओर भावना होती है तब सब भ्रम मिट जाते हैं और जब अनात्मभावना होती है तब उसका पाना कठिन होता है | जो यत्नके साथ है सो यत्न बिना नहीं पाया जाता, आत्मा निर्विकल्प, अद्वैत और सबसे अतीत है, उसे अभ्यास बिना कैसे पाइये? आत्मतत्त्व परम, एक, स्वच्छ, तेज का भी प्रकाशक, सर्वगत, निर्मल, नित्य, सदा उदित, शक्तिरूप, निर्विकार और निरञ्जन है | घट,पट, वट, वृक्ष, गादी, वानर दैत्य, देवता, समुद्र , हाथी इत्यादिक स्थावर-जंगमरूप  जो कुछ जगत् है सबका साक्षीरूप होकर आत्मतत्त्व स्थित है और दीपकवत् सबको प्रकाशता है | आप सर्वक्रिया से अतीत है पर उसी से सर्वकार्य सिद्ध होते हैं, सर्वक्रिया संयुक्त भासता है और सर्वविकल्प से रहित जड़वत् भी भासता है परन्तु परम चैतन्य है |  आत्मतत्त्व सब चेतन का सार चेतन, निर्विकल्प और परमसूक्ष्म है और अपने आपमें किञ्चन हो भासता है | अपने ही प्रमाद से रूप, अवलोक और नमस्कार त्रिपुटी भासती है, जब बोध होता है तब ज्यों का त्यों आत्मा भासता है | नित्य, शुद्ध, निर्मल और परमा नन्दरूप के प्रमाद से चैतन्य चित्तभाव को प्राप्त होता जैसे साधु भौ दुर्जन के संग से असाधु हो जाते हैं तैसे ही अनात्मा के संग से यह नीचता को प्राप्त होता है | जैसे सोना दूसरी धातु की मिलौनी से खोटा हो जाता है और जब शोधा जाता है तब शुद्धता को प्राप्त होता है तैसे ही अनात्म के संग से यह जीव दुःखी होता है और जब अभ्यास और  यत्न करके अपने शुद्धरूप को पाता है तब वही रूप हो जाता है | जैसे मुख के श्वाश से दर्पण मलीन हो जाता है तो उसमें मुख नहीं भासता पर जब मलिनता निवृत्त होती है तब शुद्ध होता है और उसमें मुख स्पष्ट भासा है, तैसे ही चित्त संवेदन के प्रमाद से फुरने के कारण जगत् भ्रम भासने लगता है और आत्मस्वरूप नहीं भासता | जब यह जगत् सत्ता फुरने सहित दूर होगी तब आत्मतत्त्व भासेगा और जगत् की असत्यता भासेगी | हे मुनीश्वर! जब शुद्ध संवित् में चेतनता का फुरना निवृत्त होता है तब जीव अहंताभाव को प्राप्त होने से अविनाशीरूप को विनाशी जानता है | हे मुनीश्वर! स्वरूप से कुछ भी उत्थान होता है तो उससे स्वरूप से गिरकर कष्ट पाता है | जैसे पहाड़ से गिरा नीचे चला जाता है और चूर्ण होता है तैसे ही जीव स्वरूप से उत्थान होता है और अनात्मा में अभिमान और अहंप्रतीति होती है तब अनेक दुःखों को प्राप्त होता है | हे मुनीश्वर! सब पदार्थों का सत्ता रूप आत्मा है, उसके अज्ञान से दैवत्वभाव को प्राप्त होता है जब उसका बोध हो तब दैवत्वभाव निवृत्त हो जावेगा वह आत्मा शुद्ध और चिन्मात्रस्वरूप है उसी की सत्ता से देह इन्द्रियादिक भी चेतन होते हैं और अपने अपने विषय को ग्रहण करते हैं जैसे सूर्य के प्रकाश से सब जगत् का व्यवहार होता है और प्रकाश बिना कोई व्यवहार नहीं होता, तैसे आत्मा की सत्ता से ही देह, इन्द्रिया दिक का व्यवहार होता है और है और अपने अपने विषय को ग्रहण करती हैं | हे मुनीश्वर जो नेत्र में मुख्य श्यामता है वह अपने आपमें रूप को ग्रहण करती है उसका बाहर के विषय से संयोग होता है और उस रूप का जिसमें अनुभव होता है वह परम चैतन्य सत्ता है | त्वचा इन्द्रियाँ और स्पर्श का जब संयोग होता है तो इन जड़ों का जिससे अनुभव होता है वह साक्षीभूत परम चैतन्यसत्ता है और नासिका इन्द्रिय का जब गन्ध तन्मात्र से संयोग होता है तो उसके संयोग में जो अनुभवसत्ता है सो परम चैतन्य है | इसी प्रकार शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध पाँचों विषयों को श्रोत्र, नेत्र, त्वचा, रसना, नासिका पाँचों इन्दियों से मिलकर जानने वाला साक्षीभूत परम चैतन्य आत्मतत्त्व है | वह मुख्य संवित् परम चैतन्य कहाता है और जो बहिर्मुख फुरकर दृश्य से मिला है वह मलीन चित्त कहाता है जब वही मलीनरूप अपने शुद्धस्वरूप में स्थित होता है तब शुद्ध होता है | हे मुनीश्वर! यह जगत् सब आत्मस्वरूप है और शिलाधन की नाईं अद्वैत और सर्व विकारों से रहित है, उदय होता है और अस्त होता है संकल्प के वश से जीव भाव को प्राप्त होता है और संकल्प के निवृत्त हुए परमात्मारूप हो जाता है | हे मुनीश्वर! आदि चित्तकला जीवरूपी रथ पर आरूढ़ हुई है, जीव अहंकाररूपी रथ पर आरूढ़ हुआ है, अहंकार बुद्धिरूपी रथ पर आरूढ़ है, बुद्धि मनरूपी रथ पर आरूढ़ है, मन प्राण रूपी रथ पर चढ़ा है और प्राण इन्द्रियाँरूपी रथ पर चढ़े हैं | इन्द्रियों का रथ देह का रथ पदार्थ है | जो कर्म इन्द्रियाँ करती हैं उसी के वश जरामरणरूपी संसारपिंजरे में भ्रमती हैं | इस प्रकार यह चक्र चलता है और उसमें प्रमाद करके जीव भटकता है |  हे मुनीश्वर! यह चक्र आत्मा का आभास विरूप है | जैसे स्वप्नपुर में नाना प्रकार के  पदार्थ भासते हैं सो वास्तव में कुछ नहीं हैं, तैसे ही यह जगत् वास्तव में कुछ नहीं  है और जैसे मृगतृष्णा की नदी भ्रम करके भासती है, तैसे ही यह जगत् भ्रम से भासता है | हे मुनीश्वर! मन का रथ प्राण है, जब प्राणकला फुरने से रहित होती है तब मन भी स्थित हो जाता है और मन के स्थित हुए मन का मनन भी शान्त हो जाता है | जब प्राण कला फुरती है तब मन का मनन भी फुरता है और जब प्राणकला स्थित होती है तब मनन निवृत्त हो जाता है | जैसे प्रकाश बिना पदार्थ नहीं भासते और वायु के शान्त हुए धूर नहीं उड़ती   तैसे प्राण के फुरने से रहित मन शान्त होता है जैसे जहाँ पुष्प होते हैं वहाँ गन्ध भी होती है और जहाँ अग्नि है वहाँ उष्णता भी होती है, तैसे ही जहाँ प्राणस्पन्द होता है वहाँ मन भी होता है | हृदय में जो नाड़ी है उसमें प्राण स्वतः फुरते हैं और  उसी से मनन होता है संवित् जो स्वच्छरूप है सो जड़ अजड़ सर्वत्र भासती है और संवेदन  प्राणकला में फुरती है | हे मुनीश्वर! आत्मसत्ता सर्वत्र अनुस्यूत है परन्तु जहाँ प्राणकला होती है वहाँ भासती है और जहाँ प्राणकला नहीं होती वहाँ नहीं भासती | जैसे  सूर्य का प्रकाश सब ठौर में होता है परन्तु जहाँ उज्ज्वल स्थान, जल अथवा दर्पण होता  है वहाँ प्रतिबिम्ब भासता है और ठौर नहीं भासता, तैसे ही आत्मसत्ता सर्वत्र है परन्तु जहाँ प्राणकला पुर्यष्टका होती है वहाँ भासती है और ठौर नहीं भासती | जैसे दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब भासता है और शिला में नहीं भासता तैसे ही पुर्यष्टका जो मनरूप है सो सबका कारण है और अहंकार, बुद्धि, इन्द्रियाँ उसी के भेद हैं, जो आपही से कल्पित है, सब दृश्यजाल उसही से उदय होता है और कोई वस्तु नहीं | यह भली प्रकार अनुभव किया है | इससे मन ही देहादिक हो प्रवर्तता है | और सब वस्तु उसही से भासती हैं |

 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने मनप्राणोक्त प्रतिपादनन्नाम त्रिंशत्तमस्सर्गः ||30||

 

अनुक्रम


 

देहपातविचार

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! आत्मसत्ता बिना जीव कन्धवत् होता है और आत्म सत्ता से चेतन होकर चेष्टा करता है | जैसे चुम्बक पाषाण की सत्ता से जड़ लोहा चेष्टा करता है तैसे ही सर्वगत आत्मा की सत्ता से जीव फुरता है और आत्मसत्ता भी जीवकला में भासती है ठौर नहीं भासती जैसे मुख का प्रतिबिम्ब दर्पण मैं भासता है और ठौर नहीं भासता तैसे ही परमात्मा सर्वगत और सर्वशक्त भी है परन्तु जीवकला ही में है | हे मुनीश्वर शुद्ध वास्तव स्वरूप से जो इस जीवकला का उत्थान दृश्य की ओर हुआ है इससे चित्भाव को  प्राप्त हुआ है | जैसे शूद्र की संगति करके ब्राह्ण भी आपको शूद्र मानने लगता है, तैसे ही स्वरूप के प्रमाद से जीवकला आपको चित्त जानने लगी है | अज्ञान से घेरा हुआ जीव महादीनभाव को प्राप्त होता है, जड़ देह के अभ्यास से कष्ट पाता है और काम, क्रोध, वात, पित्तादिक से जलता है | जैसी जैसी भावना होती है तैसा ही तैसा कर्म करता है और उन कर्मों की भावना से मिला हुआ भटकता है | जैसे रथ पर आरूढ़ होकर रथी चलता है तैसे ही जीव आत्मा मन प्राण और कर्मों से चलता है | हे मुनीश्वर | चैतन्य ही जड़ दृश्य को अंगीकार करके जीवत्वभाव को प्राप्त है और मन प्राणरूपी रथ पर चढ़कर पदार्थ की भावना से नाना प्रकार के भेद को प्राप्त हुए की नाईं स्थित होता  है | जैसे जल ही तरंगभाव को प्राप्त होता है, तैसे ही चैतन्य ही नाना प्रकार होकर स्थित होता है | निदान यह जीवकला आत्मा की सत्ता को पाकर वृत्ति में फुरनरूप होती है | जैसे सूर्य की सत्ता को पाकर नेत्र रूप को ग्रहण करते हैं तैसे ही परमात्मा की  सत्ता पाकर जीव वृत्ति में फुरता है और परमात्मा चित्त में स्थित हुआ फुरणरूप जीता है | जैसे घर में दीपक होता है तब प्रकाश होता है, दीपक बिना प्रकाश नहीं होता | अपने स्वरूप को भुलाकर जीव दृश्य की ओर लगा है इस कारण आधि व्याधि से दुःखी होता है | जैसे जब कमल डोडी के साथ लगता है तब उस पर भ्रमरे आन स्थित होते हैं, तैसे ही जब जीव दृश्य की ओर लगता है तब दुःख होता है और उससे जीव दीन हो जाता है | जैसे जल तरंगभाव को प्राप्त होता है- तैसे ही जीव अपनी क्रिया से बन्धायमान होता   है |  जैसे बालक अपनी परछाहीं को देखकर आपही अविचार से भय पाता है तैसे ही अपने स्वरूप के प्रमाद से जीव आपही दुःख पाता है और दीनता को प्राप्त होता है | हे मुनीश्वर! चिद्शक्ति सर्वगत अपना आप है | उसकी अभावना करके जीव दीनता को प्राप्त होता है | जैसे सूर्य बादल से घिर जाता है तैसे ही मूढ़ता से आत्मा का आवरण होता है पर जब प्राणों का अभ्यास करे तब जड़ता निवृत्त हो और अपना आप आत्मा स्मरण हो | जिनकी वासना निर्मल हुई है तो वह स्थिर हुई एकरूप हो जाती है और वे जीव जीवन्मुक्त होकर चिरपर्यन्त जीते हैं और हृदयकमल में प्राणों को रोककर शान्ति को प्राप्त होते हैं | जब काष्ठलोष्टवत् देह गिर पड़ती है तब पुर्यष्टका आकाश में लीन हो जाती है | जैसे आकाश में पवन लीन होता है तैसे ही उनका मन पुर्यष्टका वहाँ ही लीन हो जाती है | हे मुनीश्वर! जिनकी वासना शुद्ध नहीं हुई उनकी मृत्युकाल में आकाश में स्थित होती है और उसके अनन्तर फिर फुर आती तब उस वासना के अनुसार स्वर्ग नरक को देखने लगता है | जब शरीर मन और प्राण से रहित होता है तब शून्यरूप हो जाता है | जैसे पुरुष घर को त्यागकर दूर जा रहता है तैसे ही शरीर को त्यागकर मन और प्राण और ठौर जा रहते हैं और शरीर शून्य हो जाता है | हे मुनीश्वर! चिद्सत्ता सर्वत्र है परन्तु  जहाँ पुर्यष्टका होती है वहाँ ही भासती है और चेतन का अनुभव होता है और ठौर नहीं होता | हे मुनीश्वर! जब यह जीव शरीर को त्यागता है तब पञ्चतन्मात्रा को ग्रहण करके संग ले जाता है और जहाँ इसकी वासना होती है वहाँ ही प्राप्त होता है | प्रथम इसका अन्तवाहक शरीर होता है, फिर दृश्य के दृढ़ अभ्यास से स्थूलभाव को प्राप्त हो जाता है और अन्तवाहकता विस्मरण हो जाती है | जैसे स्वप्न में भ्रम से स्थूल आकार देखता है, तैसे ही मोह करके मरता है तब अपने साथ स्थूल आकार देखता है | फिर स्थूल देह में अहं प्रतीति करता है और उससे मिलकर क्रिया करता है तब असत्य को सत्य मानता है और सत्य को असत्य जानता है | इस प्रकार भ्रम को प्राप्त होता है | जब सर्वगत चिदंश से जीव मनरूप होता है तब जगत् भाव को प्राप्त होता है | जब देह से पुर्यष्टका निकल जाती है तब आकाश में जा लीन होती है और देह फुरने से रहित होती तब उसको मृतक कहते हैं और अपने स्वरूप शक्ति को विस्मरण करके जर्जरीभाव को प्राप्त होता है | जब जीव शक्ति हृदयकमल में मूर्छित होती है और प्राण रोके जाते हैं तब यह मृतक होता है | एवम् फिर जन्म लेता है और फिर मर जाता है | हे मुनीश्वर! जैसे वृक्ष में पत्र लगते हैं, और काल पाकर नष्ट हो जाते हैं और फिर नूतन लगते हैं, तैसे  ही यह जीव शरीर को धारता है और नष्ट हो जाता है, फिर शरीर धारता है और वह भी नष्ट हो जाता है | जो वृक्ष के पत्र की नाईं उपजते और नष्ट होते हैं उनका शोक करना व्यर्थ है | हे मुनीश्वर! चैतन्यरूपी समुद्र में शरीररूपी अनेक तरंग बुद्बुदे  उपजते हैं और नष्ट होते हैं उनका शोक करना व्यर्थ है | जैसे दर्पण में जो अनेक पदार्थ का प्रतिबिम्ब होता है सो दर्पण से भिन्न नहीं होता तैसे ही चैतन्य में अनेक पदार्थ भासते हैं | वह चैतन्य निर्मल आकाश की नाईं विस्तीर्णरूप है, उसमें जो पदार्थ फुरते हैं वे अनन्यरूप है और विधि शरीर भी वही रूप है |

 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने देहपातविचारो नामैकत्रिंशत्तमस्सर्गः ||31||

 

अनुक्रम


दैवप्रतिपादन

वशिष्ठजी बोले, हे अर्द्धचन्द्रधारी! जो चैतन्यतत्त्व परमात्मा पुरुष है वह अनन्त और एक रूप है उसको यह द्वैत कहाँ से प्राप्त हुआ? भूत और भविष्यकाल कहाँ से दृढ़ हो रहे हैं? एक में अनेकता कहाँ से प्राप्त हुई है? बुद्धिमान दुःख को कैसे निवृत्त करते हैं और वह कैसे निवृत्त होता है? ईश्वर बोले, हे ब्राह्मण! ब्रह्म चैतन्य सर्वशक्त है | जब वह एक ही अद्वैत होता है तब निर्मलता को प्राप्त होता है | एक के भाव से द्वैत कहाता है और द्वैत की अपेक्षा से एक कहाता है पर यह दोनों कल्पनामात्र हैं | जब चित्त फुरता है तब एक और दो की कल्पना होती है और चित्त स्पन्द के अभाव हुए दोनों की कल्पना मिट जाती है और कारण से जो कार्य भासता है सो भी एकरूप है | जैसे बीज से लेकर फल पर्यन्त वृक्ष का विस्तार है सो एक ही रूप है और बढ़ना घटना उसमें कल्पना होती है,  तैसे ही चैतन्य में चित्तकल्पना होती है तब जगत््रूप हो भासता है परन्तु उस काल में भी वही रूप है | हे मुनीश्वर! वृक्ष के समेत भी बीज एक वस्तुरूप है और कुछ नहीं हुआ परन्तु बीज फुरता है तब वृक्ष हो भासता है, तैसे ही जब शुद्ध चैतन्य में चेतन कलना फुरती है तब जगत््रूप हो भासता है | हे मुनीश्वर! कारण-कार्य विकाररूप जगत् असम्यक््दष्टि से भासता है | जैसे जल में तरंग भासते हैं सो जलरूप है-जल से भिन्न नहीं, जैसे शश के सींग असत् हैं और जल में द्वैततरंग कलना असत् है-अज्ञान से भासती है, तैसे ही आत्मा में अज्ञान से जगत् भासता है | जैसे द्रवता से जल ही तरंगरूप हो भासता है तैसे ही फुरने से आत्मतत्त्व जगत््रूप हो भासता है और द्वैत नहीं | चैतन्य रूपी बेलि फैली है और उसमें पत्र, फल और फल एक ही रूप है | जैसे एक बेलि अनेकरूप हो भासती है तैसे ही एक ही चैतन्य जो अहं, त्वं, देश, काल आदिक विकार होकर भासता है  सो वही रूप है | हे मुनीश्वर! जब सब ही एक चैतन्य है तब तेरे प्रश्न का अवसर कहाँ हो? देश, काल, क्रिया नीति, आदिक जो शक्ति-पदार्थ हैं सो एक ही चिदात्मा है | जैसे  जल में जब द्रवता होती है तब तरंगरूप हो भासता है और उसका नाम तरंग होता है, तैसे ही ब्रह्ममें जगत् फुरता है तब अहं, त्वं आदिक नाना प्रकार के नाम होते हैं पर वह ब्रह्म, शिव, परमात्मा, चैतन्यसत्ता, द्वैत, अद्वैत आदिक नामों से अतीत है, वाणी का  विषय नहीं | ऐसा निर्विकल्प निर्विषय तत्त्व सदा अपने आप में स्थित है | यह जगत् जो  कुछ भासता है सो भी वही चैतन्यतत्त्व है | जैसे बेलि फूल और पत्र होकर फैलती है तैसे ही चैतन्य सर्वरूप होकर फैलता है | हे मुनीश्वर! महा चैतन्य में जब किंचन होता है तब जीवरूप होकर स्थित होता है और फिर द्वैतकलना को देखता है | जैसे स्वप्न स्वरूप त्यागकर परिच्छिन्न वपुको धारण करता है और द्वैतरूप जगत् देखता है पर जब जागता है तब अपने अद्वैतरूप को देखता है परन्तु जागे बिना भी द्वैत कुछ नहीं हुआ तैसे ही यह जाग्रत् जगत् भी कुछ है नहीं भ्रम से भासता है | जब यह जीव अपने वास्तवरूप की ओर सावधान होता है तब उसके अभ्यास से वही रूप हो जाता है | हे मुनीश्वर! इस जीव का आदि वपु अन्तवाहक है और संकल्प ही उसका रूप है, जब उसमें अहं भावना तीव्र होती है तब वही आधिभौतिक होकर भासता है | जब उसमें सत्यता दृढ़ हो जाती है तो उसकी भावना करके रागद्वेष से क्षोभायमान होता है | पर जब काकतालीयवत् अकस्मात् से हृदय में विचार उपजता है तब संकल्परूपी आवरण दूर हो जाता है और अपने वास्तवस्वरूप को प्राप्त होता है | जैसे बालक अपनी परछाहीं में वेताल कल्पकर भय पाता है तैसे ही जीव अपने संकल्प से आप ही भय पाता है | हे मुनीश्वर! यह जो कुछ जगत् भासता है सो सब संक्ल्पमात्र है, जैसे संकल्प हृदय में दृढ़ होता है तैसा ही भासने लगता है | प्रत्यक्ष देखो कि जो पुरुष कुछ कार्य करता है तो कर्तृत्वभाव उसके हृदय में दृढ़ होता है और कहता है कि यह कार्य मैं करूँ, जब यही संकल्प दृढ़ होता है तब उस कार्य से आपको अकर्ता जानता है, तैसे ही दृश्य की भावना से जगत् सत्य दृढ़ हो गया है | जब दृश्य का संकल्प निवृत्त होता है और आत्मभावना में लगता है तब जगत््भ्रम निवृत्त हो जाता है और आत्मा ही भासता है | हे मुनीश्वर परमार्थ से द्वैत कुछ है ही नहीं, सब संकल्प रचना है | संकल्प से रचा जो दृश्य है सो संकल्प के अभाव से अभाव हो जाता है जैसे मनोराज और गन्धर्वनगर मन से रचित होता है और जब संकल्प के अभाव हुए से अभाव होता है तब क्लेश कुछ नहीं रहता | हे मुनीश्वर! जगत् संकल्प की तुष्टता से जीव दुःख का भागी होता है | जैसे स्वप्न में संकल्प करके जीव दुःखी होता है | इस संकल्पमात्र की इच्छा त्यागने में क्या कृपणता है? जैसे स्वप्न में जो भोगता है सो सुख भी कुछ वस्तु नहीं भ्रममात्र है तैसे यह सुख भी भ्रममात्र है | हे मुनीश्वर! संकल्प विकल्प ने जीव को दीन किया है | जब संकल्प विकल्प को त्याग करता है तब चित्त अचित्त हो जाता है और ऊँचे पद में विराजमान होता है | जिस पुरुष ने विवेकरूपी वायु से संकल्परूपी मेघ को दूर किया  है वह परम निर्मलता को प्राप्त होता है | जैसे शरत््काल का आकाश निर्मल होता है तैसे ही संकल्प विकल्परूपी मल से रहित जीव उज्ज्वलभाव को प्राप्त होता है | संकल्प के त्यागे से जो शेष रहता है सो सत्तामात्र परमानन्द तेरा स्वरूप है | हे मुनीश्वर! आत्मा सर्वशक्तिरूप है, जैसी भावना होती है तैसा ही उसे अपनी भावना से देखता है इससे सब संकल्पमात्र है, भ्रम से उदय हुआ है और संकल्प के लीन हुए सब लीन हो जाता है | हे मुनीश्वर! संकल्परूपी लकड़ी और तृष्णारूपी घृत से जन्मरूपी अग्नि को यह जीव बढ़ाता है और फिर अन्त कदाचित नहीं होता | जब असंकल्प रूपी वायु और जल से इसका अभाव करे तब शान्त हो जाता है | जैसे दीपक निर्वाण हो जाता है तैसे ही जन्मरूपी अग्नि का अभाव हो जाता है और संकल्परूपी वायु से तृण की नाईं भ्रमता है | हे मुनीश्वर! तृष्णारूपी कंज की बेलि को जीव संकल्परूपी जल से सींचता है, असंकल्परूपी शोषता और विचाररूपी खङ्ग से काटे तब उसका अभाव होता है | जो अभावमात्र है सो आभास के क्षय हुए अभाव हो जाता है | जैसे गन्धर्वनगर होता है तैसे ही यह जगत् असम्यक्ज्ञान से भासता है और सम्यक््ज्ञान से लीन हो जाता है | जैसे कोई राजा स्वप्न में अपने को रंग देखे और पूर्व का स्वरूप विस्मरण करके दीनता को प्राप्त हो पर जब पूर्व का स्वरूप स्मरण आवे तब आपको राजा जाने और दुःख मिट जावे तैसे ही जीव को जब अपने पूर्व का वास्तव स्वरूप विस्मरण हो जाता है तब आपको परि च्छिन्न दीन और दुःखी जानता है पर जब स्वरूप का ज्ञान होता है तब सब दुःख का अभाव हो जाता है और जैसे शरत््काल का आकाश निर्मल होता है तैसे ही निर्मल हो जाता है | जैसे वर्षाकाल के मेघ गये से आकाश निर्मल होता है तैसे ही अज्ञानरूपी मल से रहित जीव निर्मल होकर शुद्धपद को प्राप्त होता है | जो ऐसी युक्ति से भावना करता है कि मैं एक आत्मा और द्वैत से रहित हूँ तो वही होता है और द्वैत का अभाव हो जाता है और  उत्तमपद ब्रह्मदेव पूज्य, पूजक और पूजा, किञ्चित निष्किंचन की नाईं चित्त एकरूप हो जाता है | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणेईश्वरोपाख्यान् दैवप्रतिपादनन्नाम द्वात्रिंशत्तमस्सर्गः ||32||

 

अनुक्रम


परमेश्वरोपदेश

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! वह देव निरन्तर स्थित है, द्वैत और एक पद से रहित है और द्वैत और एक संयुक्त भी वही है | संकल्प से मिलकर चेतनरूप संसार को प्राप्त हुआ है और जो संकल्प मल से रहित है वह संसार से रहित है | जब ऐसे जानता है कि `मैं हूँ इसी संकल्प से बन्धवान् होता है और जब इसके भाव से मुक्त होता है तब सुख दुःख का अभाव हो जाता है और शुद्ध निरञ्जन एकसत्ता सर्वात्मा आकाशवत् होता है इसी का नाम मुक्ति है | आकाशवत् व्यापक ब्रह्म होता है | वशिष्ठजी बोले हे प्रभो! जब मन में मन क्षीण होता है और इन्द्रियाँ मन में लीन होती हैं वह द्वितीय और तृतीयपद किसकी नाईं शेष रहता है? जो महासत्ता आत्मसत्ता सबको लीन करती है सो किसकी नाईं? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! जब मन से मन को जिसके अंग इन्द्रियाँ हैं विचार करके छेदता है अथवा उपासना करके आत्मबोध प्राप्त होता है तब द्वैत एक की कल्पना नष्ट हो जाती है और जगज्जाल की सत्यता नष्ट हो जाती है उसके पीछे जो शेष रहता है सो आत्मतत्त्व प्रकाशता है | जैसे भूने बीज से अंकुर नहीं उपजता तैसे ही जब मन उपशम होता है तब उसमें जगत् सत्ता का अभाव हो जाता है और चैतन्यसत्ता चित्तसत्ता को भक्षण कर लेती है | जब मनरूपी मेघ की सत्ता नष्ट होती है तब शरत््काल के आकाशवत् निर्मल आत्मसत्ता भासती है | जब चित्त की चपलता मिट जाती है तब परम निर्मल पावन चिन्मात्रतत्त्व प्राप्त होता है, एक द्वैत-और भाव-अभावरूपी संसार कल्पना मिट जाती है और समसत्तारूप तत्त्व जो सर्वव्यापक और संसारसमुद्र से पार करनेवाला प्राप्त होता है तब सुषुप्त की नाईं निर्भय बोध हो जाता है और शान्तिरूप आत्मा को पाकर शान्तरूप हो जाता है | हे मुनीश्वर! मन की क्षीणता का यह प्रथमपद तुमसे कहा है अब द्वितीयपद सुनो | जब चित्तशक्ति मन के मनन से मुक्त होती है तब चन्द्रमा के प्रकाश वत् शीतल हो जाता है, आकाशवत् विस्तृतरूप अपना आप भासता है और घन सुषुप्तरूप हो जाता है | जैसे पत्थर की शिलापोल से रहित होती है तैसे ही वह दृश्य से रहित घन सुषुप्त उसका रूप होता है और नमक के सदृश रसमय ब्रह्म हो जाता है जैसे आकाश में शब्द लीन हो जाता है तैसे ही वह चित्त आत्मा में लीन हो जाता है और जैसे वायु चलने से रहित अचल होता है तैसे ही चित्त अचल हो जाता है | जैसे गन्ध पुष्प में स्थित होती है तैसे ही चित्तवृत्ति आत्मतत्त्व में विश्राम को पाती है | वह आत्मसत्ता जड़ है, चेतन है, सर्व कल्पना से रहित अचैत्य चिन्मात्र बीजरूप सब  सत्ताओं को धारण करनेवाली और देशकालके परिच्छेद से रहित है जिसको वह प्राप्त होती है उसको तुरीयापद भी कहते हैं | वह सर्वदुःख कलंक से रहित पद है | उस सत्ता को पाकर साक्षी की नाई स्थित होता है और सर्वत्र, सर्वदा सम स्थित होता है | सर्वप्रकाश वही  है और शान्तिरूप है | उस आत्मसत्ता का जिसको आत्मतत्त्व से अनुभव होता है उसको द्वितीय पद प्राप्त होता है | हे मुनीश्वर! यह द्वितीयपद भी तुझसे कहा अब तृतीयपद सुन | जब आत्मतत्त्व में वृत्ति का अत्यन्त परिणाम होता है तब ब्रह्म, आत्मा आदिक नामों की भी निवृत्ति हो जाती है, भाव अभाव की कल्पना कोई नहीं फुरती और स्थान की नाईं अचल वृत्ति होकर परमशान्त और निष्कलंक सबसे उल्लंघित तुरीयातीतपद को प्राप्त होता है | जो सबका अन्त और सबका आधाररूप एक, अद्वैत, नित्य, चिन्मात्रतत्त्व है और तुरीया से भी आगे है जिसमें वाणी की गति नहीं | हे मुनीश्वर! सर्वकल्पना से रहित अतीतपद जो मैंने तुमसे कहा है उसमें स्थित हो | वही सनातनदेव है और विश्व भी वही रूप है | वही तत्त्व संवेदन के वश से ऐसा रूप होकर भासता है पर वास्तव में कुछ प्रवृत्त है और कुछ निवृत्त है,आकाशरूप समसत्ता अद्वैततत्त्व अपने आपमें स्थित और  आकाशवत् निर्मल है और उसमें द्वैतभ्रम का अभाव है | एक चिद्घनसत्ता पाषाणवत् अपने आपमें स्थित है उसमें और जगत् में रञ्चक भी भेद नहीं | जैसे जल और तरंग में कुछ भेद  नहीं होता तैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं | सम सत्ता शिव शान्तिरूप और सर्ववाणी के विलास से अतीत है इसकी चतुर्मात्रा है और तुरीया परमशान्त है | इतना कह बाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज! इस प्रकार जब ईश्वर ने कहा और परम शान्ति रूप आत्मतत्व का प्रसंग वशिष्ठजी ने सुना तब दोनों की वृत्ति आत्मतत्त्व में स्थित हो गई और तूष्णीम हो गये मानो चित्र लिखे हैं-और मुहूर्त पर्यन्त चित्त की वृत्ति ऐसे ही रही | फिर ईश्वर जागे |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने परमेश्वरोपदेशोनाम त्रयस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ||33||

 

अनुक्रम


देवनिर्णयो

बाल्मीकिजी बोले, कि एक मुहूर्त्त उपरान्त सदाशिवजी ने तीनों नेत्र खोले तो जैसे पृथ्वीरूपी डब्बे से सूर्य निकले तैसे ही उनके नेत्र निकले और जैसे द्वादश सूर्य का प्रकाश इकट्ठा हो तैसे ही उनका प्रकाश हुआ | उन्होंने देखा कि वशिष्ठजी के नेत्र मूँदे हुए हैं,तब कहा कि हे मुनीश्वर! जागो, अब नेत्र क्यों मूँदे हो? जो कुछ देखना था सो तुमने देखा अब समाधि लगाने का श्रम किस निमित्त करते हो? तुम सरीखे तत्त्ववेत्ताओं को किसी में हेयोपादेय नहीं होता | तुम जैसे बुद्धिमान हो तैसे ही आत्मदर्शी भी हो | जो कुछ पाने योग्य था सो तुमने पाया है और जानने योग्य जाना है | बालकों के बोध के निमित्त जो तुमने मुझसे पूछा था सो मैंने कहा है अब तुमको तूष्णीम रहने से क्या प्रयोजन है? हे रामजी! इस प्रकार कहकर सदाशिव ने मेरे भीतर प्रवेश करके चित्त की वृत्ति से जगाया और जब मैं जागा तब फिर ईश्वर ने कहा, हे वशिष्ठजी इस शरीर की क्रिया का कारण प्राणस्पन्द है | प्राणों से ही शरीर की चेष्टा होती है और उसमें आत्मा उदासीन की नाईं स्थित है वह कुछ करता है, भोगता है | जब जीव को अपने स्वरूप का प्रमाद होता है तब देह में अभिमान होता है और क्रिया करता और भोगता आपको मानता है इससे दुःख पाता है और इस लोक परलोक में भटकता है | जब आत्मविचार उपजता है तब आत्मा का अभ्यास होता है, देह अभिमान मिट जाता है और दुःख से मुक्त होता है | शरीर के नष्ट हुए आत्मा का नाश नहीं होता | शरीर चेतन होकर  प्राणों से फुरता है, जब प्राण निकल जाते हैं तब शरीर मूक जड़रूप हो जाता है | चलाने और पवित्र करनेवाली जो संवित््शक्ति है वह आकाश से भी सूक्ष्म है | वह शरीर के नाश हुए नाश नहीं होती और जो नाश नहीं होती तो नाश का भ्रम कैसे हो? हे मुनीश्वर! आत्मतत्व ब्रह्मसत्ता सर्वत्र है परन्तु वहीं भासती है जहाँ सात्त्विकगुण का अंश मन होता है और प्राण होते हैं | मन और प्राणों सहित देह में भासती है | जैसे निर्मल दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब भासता है और आदर्श मलीन होता है तब मुख विद्यमान भी होता है परन्तु नहीं भासता है, तैसे ही मन और प्राण जब देह में होते हैं तब आत्मा भासता है और जब मन और प्राण निकल जाते हैं तब मलीन शरीर में आत्मसत्ता नहीं भासती | हे मुनीश्वर! आत्मसत्ता सब ठौर पूर्ण है परन्तु भासती नहीं जब उसका अभ्यास हो तब सर्वात्मरूप होकर भासती है | सर्वकलना से रहित शुद्ध शिवरूप सर्व की सत्तारूप वही है | शिव, ब्रह्मा, देवता, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, सूर्यादिक सब जगत् का आदि वपु वही है | वह एक देव शुद्ध चैतन्यरूप सब देवों का देव है, सब उसके नौकर हैं और सब उसके चित्त उल्लास हैं | हे मुनीश्वर! इस जगत् में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र जो बड़े हैं सो उसही तत्व से प्रकट हुए हैं जैसे अग्नि से  चिनगारे उपजते हैं और समुद्र से तरंग प्रकट होते हैं तैसे ही हम उससे प्रकट हुए हैं यह अविद्या भी उसही से प्रकट हो अनेक शाखाओं को प्राप्त हुई है | देव, अदेव, वेद और वेद के अर्थ और जीव सब उस अविद्या की जटा हैं और अनन्तभाव को प्राप्त हुई हैं जो  फिर-फिर उपजती और मिटती हैं | देश, काल, पृथिव्यादिक भी सब उसी से उत्पन्न हैं और सर्वसत्तारूप वही आत्मदेव है | हम जो ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र हैं सो हमारा परमपिता आत्मा ही है, सर्व का मूल बीज वही देव है और सब उससे पूजे हैं | जैसे वृक्ष से पत्र उपजते हैं तैसे ही सब उसी महादेव से उपजते हैं, सबका अनुभवकर्त्ता वही है और सबको सत्ता देनेवाला और सब प्रकाशों का प्रकाशक वही है | वह तत्त्ववेत्ताओं से पूजने योग्य है, सबमें प्रत्यक्ष है और सर्वदा सर्व प्रकार सबमें उदित आकार चैतन्य अनुभव रूप है | उसके आवाहन में मन्त्र, आसन आदिक सामग्री चाहिये, क्योंकि वह सर्वदा अनुभवरूप से प्रत्यक्ष है और सर्व प्रकार सर्व ठौर में विद्यमान है | जहाँ-जहाँ उसके पाने का यत्न करिये वहाँ-वहाँ आगे ही विद्यमान है | वह शिवतत्त्व आदि ही से सिद्ध है और मन वाणी में तीनोंरूप वही हो भासता है | सबकी आदि और पूज्य और नमस्कार करने योग्य है और जानने योग्य भी वही है | हे मुनीश्वर! ऐसा जो आत्मतत्त्व जरा, मृत्यु शोक और भय का काटनेवाला है उसको जीव आपसे आपही देखता है और उसके साक्षात्कार हुए चित्त बीज की नाईं हो जाता है फिर नहीं उगता | वह शिव तत्त्व जीव का भी बीज है और सर्वपद का पद वही है | अनुभवरूप आत्मा  परमपद है, भिन्न दृष्टि का त्याग करो |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने देवनिर्णयो नाम चतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ||34||

 

अनुक्रम


महेश्वरवर्णन

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! वह चिद््रूप तत्त्व सबके भीतर स्थित है | अनुभवमय शुद्ध देव ईश्वर और सब बीज वही है | सर्व सारों का सार, कर्मों का कर्म और धर्मों का धर्म चैतन्यधातु निर्मलरूप सब कारणों का कारण और आप अपना कारण है | वह सर्व भाव अभाव का प्रकाशक और सर्व चेतनों की चैतन्यसत्ता परम प्रकाशरूप है | भौतिक प्रकाश से  रहित और अलौकिक प्रकाश सब जीवों का जीव वही है | चैतन्य घन निर्मल आत्मा अस्ति तन्मयरूप है और सत् असत्् से रहित महासत््रूप है | सर्वसत्ता की सत्ता वही है | वही चिन्मात्रतत्त्व नाना रूप हो रहा है | जैसे एक ही आत्मसत्ता स्वप्न में आकाश, कन्ध, पहाड़ आदिक होकर भासती है तैसे ही नाना रंग रञ्जना होकर वही भासता है | जैसे सूर्य की किरणों में मरुस्थल की नदी अनेक कोटि किरणों से अनेक तरंग संयुक्त हो भासती है तैसे ही यह जगत् उसमें भासता है | हे मुनीश्वर! उसी आत्मतत्त्व का यह आभास प्रकाश है, उससे भिन्न कुछ नहीं | जैसे अग्नि से उष्णता भिन्न नहीं-वही रूप है, तैसे ही आत्मा से जगत् कुछ भिन्न नहीं- वही स्वरूप है | सुमेरु भी उसके आगे परमाणुरूप है; संपूर्ण काल उसका एक निमेषरूप है, कल्प भी निमेष और उन्मेषवत उदय और लय होते हैं और सप्त समुद्र संयुक्त पृथ्वी उसके रोम के अग्रवत् तुच्छ है | ऐसा वह देव है |    वह संसाररचना को नहीं करता और कर्तृत्वभाव को प्राप्त होता है | बड़े कर्मों को करता भासता है तो भी कुछ नहीं करता, द्रव्यरूप दृष्टि आता है तो भी द्रव्य से रहित है तो भी द्रव्यवान् है, देहवान् नहीं तो भी देहवान् है और बड़ा देहवान् है तो भी अदेह है | सर्वका सत्तारूप वही देव है | ठंडी, भोलि, घले, मतचुल, पिंडली, माँगले, बेल,विलिमिला, लोबलाग, युगुल, सभस इत्यादि वाक्य निर्थक हैं इनका अर्थ कुछ नहीं तो भी उस देव से सिद्ध होते हैं | ऐसा कुछ नहीं जो उस देव में असत् नहीं और ऐसा भी कुछ  नहीं जो उस देव से सत् नहीं | हे मुनीश्वर! जिससे यह सर्व है, जो यह सर्व है और सर्व में नित्य है उस सर्वात्मा को मेरा नमस्कार है |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे महेश्वरवर्णनन्नाम पञ्चत्रिंशत्तमस्सर्गः||35||

अनुक्रम

 

 


नीतिनृत्यवर्णन

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! शब्द की सत्तारूप वही है, सर्व सत्तारूप रत्नों का डब्बा वही है और वही तत्त्व चमत्कार करके फुरता है | जैसे जल ही तरंग, फेन, बुदबुदे आदिक आकार हो करके फुरता है तैसे ही वह देव नाना प्रकार के आकार होकर फुरता है | वही फल और गुच्छेरूप होकर स्थित होता है और वही उनमें सुगन्धित होता है घ्राण इन्द्रिय में स्थित होकर आपही उसे सूँघता है, आपही त्वचा इन्द्रिय होता है, आपही पवन होकर चलता है, आपही ग्रहण करता है, आपही जलरूप होता है, आपही वायु होकर सुखाता है, आपही श्रवणेन्द्रिय और आपही शब्द होकर ग्रहण करता है | इसी प्रकार जिह्वा, त्वचा, नासिका, कर्ण और नेत्र होकर आपही स्पर्श, रूप, रस, गन्ध और शब्द को ग्रहण करता है | उसी ने सब पदार्थ रचे हैं और उसी ने नीति रची है | ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, शिव और पञ्चम ईश्वर सदाशिव पर्यन्त वही देव इस प्रकार हुआ है और आपही साक्षीवत् स्थित होता  है| जैसे दीपक के प्रकाश से मन्दिर की सर्वक्रिया होती हैं तैसे ही संसाररूपी मण्डप  की सब क्रिया उसी साक्षी से होती हैं उसमें उसकी शक्ति नृत्य करती है और आप साक्षी रूप होकर देखता है | वशिष्ठजी बोले कि फिर मैंने पूछा, हे जगत््नाथ! शिव की शक्ति क्या है, कैसे स्थित है, देव को साक्षात् कैसे है और उसका नृत्य कैसे होता है? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! आत्मतत्त्व स्वभाव से अचल और शान्तरूप है | शिव परमात्मा निर्मल चिन्मात्ररूप और निराकार है | उसकी शक्ति इच्छा और काल, नीति, मोह, ज्ञान, क्रियाकर्त्रादि शक्ति हैं | उन शक्तियों का अन्त नहीं | वह अनन्तरूप चिन्मात्र देव है | यह जो मैंने तुझसे शक्ति कही है सो भी शिवरूप है भिन्न नहीं शिव  और शक्ति एक रूप है और बहुत भासती है | जैसे पदार्थों में अर्थ शक्ति और आत्मा में साक्षी शक्ति कल्पित है तैसे ही कालशक्ति नृत्यक की नाईं ब्रह्माण्डरूपी नृत्यमण्डल  में नृत्य करती है और क्रियाशक्ति भी कर्तृत्व से नृत्य करती है सो शक्ति कहाती है | जैसे आदिनीति हुई है ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त तैसे ही स्थित है-अन्यथा नहीं  होती | हे मुनीश्वर! यह सम्पूर्ण जगत् नृत्य करता है | संसाररूपी नटिनी के प्रेरनेवाली नीति है और परमेश्वर परमात्मा साक्षीरूप है | वह सदा उदित प्रकाशरूप है  और एकरस स्थित है नीति आदिक शक्ति भी उससे भिन्न नहीं वे वही रूप हैं-इससे सर्वदेव ही जानो द्वैत नहीं |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने नीतिनृत्यवर्णनन्नाम षट््त्रिंशत्तमस्सर्गः ||36||

अनुक्रम

 


अन्तर्बाह्यपूजावर्णन

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! वह एक देव परमात्मा सन्तों से पूजने योग्य है | वह चिन्मात्र अनुभव आत्मा घटपटादिक सर्व में स्थित है और ब्रह्मादिक देवता और जीव सबके भीतर बाहर भी वही स्थित है | उस सर्वात्मा शान्तरूप देव का पूजन दो प्रकार से होता है | उस इष्टदेव का पूजन ध्यान है और ध्यान ही पूजन है | जहाँ जहाँ मन जावे वहाँ- वहाँ लक्ष्यरूप आत्मा का ध्यान करो | सबका प्रकाशक आत्मा ही है, चिद्रूप अनुभव से भीतर स्थित है और अहंता से सिद्ध है | वही सबका साररूप है और सबका आश्रयरूप है | उसका जो विराट््रूप है सो सुनो | वह अनन्त है, परमाकाश उसकी ग्रीवा है, अनेक पाताल उसके चरण हैं, अनेक दिशायें उसकी भुजा हैं, सर्व प्रकाश उसके शस्त्र हैं हृदयकोश कोण में स्थित है और ब्रह्माण्ड समूहों को परंपरा से प्रकाशता है | परमाकाश अपाररूप है, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादि देवता और जीव उसकी रोमावली हैं, त्रिलोकी में जो देहरूपी यन्त्र हैं उनमें इच्छादिक शक्तिरूप सूत्र व्यापा है जिससे  सब चेष्टा करते हैं | वह देव एक ही है और अनन्त है | सत्तामात्र उसका स्वरूप है, सब  जगज्जाल उसका विवृत्त है, काल उसका द्वारपाल है और पर्वतादिक ब्रह्माण्ड जगत् उसकी देह के किसी कोण में स्थित है | उस देव की चिन्तना करो | उसके सहस्त्र चरण हैं और सहस्त्र ही नेत्र, शीश और भुजा और भुजाओं के विभूषण हैं | सर्वत्र उसकी नासिका इन्द्रिय है, सर्वत्र त्वचा इन्द्रिय है और सर्व ओर मन है पर सर्व मननकला से अतीत है | सर्व ओर वही शिवरूप सर्वदा सर्व का कर्त्ता है, सर्व संकल्पों के अर्थ का फल दायक है और सर्वभूत के भीतर स्थित और सब साधनों को सिद्ध करता है | ऐसा देव सबमें सब प्रकार और सर्वदा काल स्थित है | उसी देव की चिन्तना करो और उसी देव के ध्यान में सावधान रहो | सदा उस ही के आकार रहना उस देव का बाहरी पूजन है | अब भीतर का पूजन सुनो |हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ! संवित्तमात्र जो देव है सो सदा अनुभव से प्रकाशता है | उसका पूजन दीपक करके नहीं होता और धूप, पुष्प, दान, लेप और केशर से होता है | अर्ध्य, पाद्यादिक जो पूजा की सामग्री हैं उनसे भी देव का पूजन नहीं होता | उसका पूजन तो क्लेश बिना नित्य ही होता है | हे मुनीश्वर! एक अमृतरूपी जो बोध है उससे उस देव का सजातीय प्रत्यय ध्यान करना उसका परम पूजन है | हे मुनीश्वर! शुद्ध चिन्मात्र देव अनुभवरूप है उसका सर्वदाकाल और सर्व प्रकार पूजन  करो, अर्थात् देखते, स्पर्श करते, सूँघते, सुनते, बोलते, देते, लेते, चलते, बैठते और इससे लेकर जो कुछ क्रिया हैं सब प्रत्येक चैतन्य साक्षी में अर्पण करो और उसी के परायण हो | इस प्रकार आत्मदेव का पूजन करो | हे मुनीश्वर! आत्मदेव का ध्यान करना ही धूप दीप है और सर्वसामग्री पूजन की यही है | ध्यान ही उस देव को प्रसन्न करता है और उससे परमानन्द प्राप्त होता है और किसी प्रकार से उस देव की प्राप्ति नहीं होती |   हे मुनीश्वर! मूढ़ भी इस प्रकार ध्यान से उस ईश्वर की पूजा करे तो त्रयोदश निमेष में जगत् उदान के फल को पाता है और सत्रह निमेष के ध्यान से प्रभु को पूजे तो अश्व मेधयज्ञ के फल को पावे और केवल ध्यान से आत्मा का एक घड़ी पर्यन्त पूजन करे तो राजसूययज्ञ किये के फल को पावे | जो दो प्रहर पर्यन्त ध्यान करे तो लक्ष राजसूययज्ञ के फल को पावे और जो दिन पर्यन्त ध्यान करे तो असंख्य फल पावे | हे मुनीश्वर! यह परम योग है, यही परमक्रिया है और यही परम प्रयोजन है | हे मुनीश्वर! दोनों पूजा मैंने तुमसे कही | जिसको ये परमपूजा प्राप्त होती है वह परमपद को प्राप्त होता है, उसको सब देवता नमस्कार करते हैं और सब करके वह पुरुष पूजने योग्य होताहै |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने अन्तर्बाह्यपूजावर्णनन्नाम सप्तत्रिंशत्तमस्सर्गः ||37||

अनुक्रम

 

 

देवार्चनाविधान

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! अब तुम अभ्यन्तर का पूजन सुनो जो सर्वत्र पवित्र करने वाले को पवित्र करता है और सब तम और अज्ञान का नाश करता है | वह आत्मपूजन मैं तुमसे कहता हूँ जो सर्व प्रकार से सर्वदा काल में उस देव का पूजन होता है और व्यव धान कभी नहीं पड़ता, चलते, बैठते, जागते, सोते सर्व व्यवहार में नित्य ध्यान में रहता है | हे मुनीश्वर! इस संसार में संवित््रूप चिन्मात्र नित्य स्थित है उसका पूजन करो | जो सब प्रत्ययों का कर्त्ता और सदा अनुभव से प्रकाशता है उसका आपसे आप पूजन करो | उठते चलते, खाते, पीते जो कुछ बाहर के अर्थ त्याग, ग्रहण और भोग हैं सबको करते भी उस देव की पूजा करो | हे मुनीश्वर! शरीर में-शिवलिंग चिह्न से रहित बोधरूप देव है, यथाप्राप्त में सम रहना उस देव का पूजन है | यथाप्राप्ति के समभाव में स्नान करके शुद्ध होकर बोधरूप लिंग का पूजन करो जो कुछ प्राप्त हो उसमें राग द्वेष से रहित होना और सर्वदा साक्षीरूप अनुभव में स्थित रहना यही उसका पूजन है | हे मुनीश्वर! सूर्य के भुवन आकाश में यही सूर्य होकर प्रकाशता है और चन्द्रमा के भुवन में चन्द्रमा होकर स्थित होता है | इनसे आदि लेकर जो पदार्थ के समूह हैं जैसी जैसी भावना से उनमें फुरना हुआ है वही रूप होकर वह देव स्थित है | हे मुनीश्वर! जो नित्य, शुद्ध, बोधरूप और अद्वैत है उसको देखना और किसी में वृत्ति लगाना यही उस देव का पूजन है | प्राण अपानरूपी रथ पर आरूढ़ हुआ जो हृदय में स्थित है उसका ज्ञान ही पूजन है | वही सब कर्म कर्त्ता है, सब भोगों का भोक्ता और सब शब्दों का स्मरण करनेवाला और भागवतरूप है और सबकी भावना करनेवाला परम प्रकाश रूप है | ऐसा जो संवित् तत्त्व है उसको सर्वज्ञ जानकर चिन्तना करना वही उसका पूजन है | वह देव सब देहों में स्थित है तो भी आकाशवत् निर्मल है वह जाता भी है और नहीं जाता | प्राणरूपी आलय में प्रकाशता है, हृदय, कण्ठ, तालु, जिह्वा, नासिका और पीठ में व्यापक है शब्द आदिक विषयों को करता और मन को प्रेरता है | जैसे तिल के आश्रय तेल है तैसे ही आत्मा सबका आश्रय है | वह कलनारूपी कलंक से रहित है और कलनागण से संयुक्त भी है | सम्पूर्ण देहों में वही एकदेव व्याप रहा है परन्तु प्रत्यक्ष हृदय में जो होता है सो निर्मल चिन्मात्र प्रकाशरूप है और कलनारूपी कलंक से रहित सदा प्रत्यक्ष है और अपने आपही से अनुभव होता है | सर्वदा सर्व पदार्थों का प्रकाशक प्रत्येक चैतन्य आत्मतत्त्व जो अपने आपमें स्थित है सो अपने फुरने से शीघ्र ही द्वैत की नाईं हो जाता है | हे मुनीश्वर! जो कुछ साकाररूप जगत् दृष्ट आता है सो सब विराट् आत्मा है | इससे आपको विराट् की भावना करो कि हाथ, पाँव, नख, केश यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मेरा देह है, मैं ही प्रकाशरूप एक देव हूँ नीति इच्छादिक मेरी शक्ति हैं और सब मेरी उपासना करते हैं | जैसे स्त्री श्रेष्ठ भर्तार की सेवा करती है तैसे ही शक्ति मेरी उपासना करती है, मन मेरा द्वारपाल है जो त्रिलोकी का निवेदन करनेवाला है, चिन्तना मेरी आने जानेवाली प्रतिहारी है नाना प्रकार के ज्ञान मेरे अंग के भूषण हैं, कर्म इन्द्रियाँ मेरे द्वार हैं और ज्ञानइन्द्रियाँ मेरे गण हैं | ऐसा मैं एक अनन्त आत्मा अखण्डरूप भेद से रहित अपने आपमें स्थित सबमें परिपूर्ण हूँ | हे मुनीश्वर! इसी भावना से जो एक देव की पूजा करता है वह परमात्मा देव को प्राप्त होता है | दीनता आदिक उसके क्लेश सब नष्ट हो जाते हैं, अनिष्ट की प्राप्ति में उसे शोक नहीं उपजता और इष्ट की प्राप्ति में हर्ष नहीं उप जता, तोषवान होता है और कोपवान् होता है, विषय की प्राप्ति से तृप्ति मानता है और इनके वियोग से खेद मानता है, और अप्राप्त की वाच्छा करता है, प्राप्त के त्याग की इच्छा करता है, सर्वपदार्थ में समभाव रहता है | ऐसा पुरुष उस  देव का परम उपासक है | ग्रहण त्याग से रहित सबमें तुल्य रहना और भेदभाव को प्राप्त होना उस देव का उत्तम अर्चन है | हे मुनीश्वर! चैतन्य तत्त्व देव मैंने तुमसे कहा है जो देहों में स्थित है | जो वस्तु प्राप्त हो उसको अर्चन करके उसी के आगे रखना, सबका साक्षी आत्मा को देखना और किसी से खेदवान् होना और उसमें अहंप्रतीति रखकर भिन्न दृश्यों की भावना करना, यही उस देव की अर्चना है | हे मुनीश्वर! जो कुछ हो प्राप्त हो उसमें यत्न बिनातुल्य रहना जो भक्ष्य, लेह्य, चोष्य भोजन प्राप्त हो उसे देव के आगे रखके ग्रहण त्याग की बुद्धि उसमें करना, यह उस देव का पूजना है | सब पदार्थों की प्राप्ति में देव की पूजा करने से अनिष्ट भी इष्ट हो जाता है | मृत्यु आवे तो देव की पूजा, जन्म हो तब देव की पूजा, दरिद्र आवे तब देव की पूजा, राग प्राप्त हो तो देव की पूजा और नाना प्रकार की विचित्र चेष्टा करनी सो सब देव के आगे पुष्प हैं, रागद्वेष में सम रहना ही उस देव की पूजा है सन्तों के हृदय में रहनेवाली जो मैत्री है कि सम्पूर्ण विश्व का मित्र होना उससे भी उस देव का पूजन है और भोग, त्याग, राग से जो कुछ प्राप्त हो उससे उस देव का पूजन करो | जो नष्ट हुआ सो हुआ और जो प्राप्त हुआ सो हुआ दोनों में निर्विकार रहना इससे उस देव का अर्चन करो | ये भोग आपातरमणीय हैं, होते भी हैं और नष्ट भी हो जाते हैं इनकी इच्छा करना, सदा सन्तुष्ट रहना जैसे आनि प्राप्त हो उसमें राग द्वेष से रहित होना सो देव का अर्चन है | हे मुनीश्वर! जो कुछ प्रारब्ध से प्राप्त हो उससे आत्मा का अर्चन करो और इच्छा अनिच्छा को त्यागकर जो प्राप्त हो उससे उस देव का अर्चन करो हे मुनीश्वर! ज्ञानवान् किसी की इच्छा करता है और त्याग करता है जो अनिच्छित प्राप्त हो उसको भोगता है |   जैसे समुद्र में नदी प्राप्त होती है और वह उससे कुछ हर्ष मानता है शोक करता है  तैसे ही ज्ञानवान् इष्ट अनिष्ट की प्राप्ति में राग द्वेष से रहित यथाप्राप्त को भोगता है सो ही उस देव का पूजन है, देश, काल, क्रिया, शुभ अथवा अशुभ प्राप्त हो उसमें संसरण विकार को प्राप्त होना उस देव की अर्चना है यदि द्रव्य अनर्थरूप हो तो भी समरस से मिला हुआ अमृत हो जाता है | जैसे षट््रसस्वाद शक्कर से मिले हुए मधुर  हो जाते हैं तैसे ही अनर्थरूपी रस समरस से मिले हुए अमृत हो जाते हैं, खेद नहीं करते और अनन्त रूप हो जाते हैं | चन्द्रमा की नाईं सब भावना अमृतमय हो जाती है | जैसे आकाश निर्लेप है तैसे ही समताभाव करके चित्त राग द्वेष से रहित निर्मल हो जाता  है | दृष्टा को दृश्य से मिला देखना साक्षीरूप रहना ही देवकी अर्चना है | जैसे पत्थर की शिला निस्स्पन्द होती है तैसे ही विकल्प से रहित चित्त अचल होता है, सो ही  देव की अर्चना है | हे मुनीश्वर! भीतर से आकाशवत् असंग रहना और बाहर से प्रकृति आचार में रहना, किसी का संग हृदय में स्पर्श करना और सदा समभाव विज्ञान से पूर्ण रहना ही उस देव की उपासना है | जिसके हृदयरूपी आकाश से अज्ञानरूपी मेघ नष्ट हो गया है उसको स्वप्न में भी विकार नहीं प्राप्त होता और जिसके हृदयरूपी आकाश से अहंतारूपी कुहिरा शान्त हो गया है वह शरत््काल के आकाशवत् उज्ज्वल होता है | हे मुनीश्वर! जिसको समभाव प्राप्त हुआ है और उससे उसने देव को पाया है वह पुरुष ऐसा हो जाता है जैसा नूतन बालक राग द्वेष से रहित होता है | जीवरूपी चेतना को उल्लंघ कर  परम चैतन्यतत्त्व को प्राप्त होता है और सकल इच्छा और सुख दुःख भ्रम से मुक्तशरीर का नायक प्रतिष्ठित होता है सोही देव अर्चना है |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे देवार्चनाविधानन्नामाष्टत्रिंशत्तमस्सर्गः ||38||

अनुक्रम

देवपूजाविचार

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! जैसी कामना हो और जो कुछ आरम्भ करो अथवा करो सो अपने आपसे चिन्मात्र संवित््तत्त्व की अर्चना करो इससे वह देव प्रसन्न होता है और जब देव  प्रसन्न हुआ तब प्रकट होता है | जब उसको पाया और स्थित हुआ तब राग द्वेषादिक शब्दों का अर्थ नहीं पाया जाता | जैसे अग्नि में बर्फ का कणका नहीं पाया जाता तैसे ही फिर उसमें रागद्वेषादिक नहीं पाये जाते इससे उस देव की अर्चना करनी योग्य है | यदि राज्य अथवा दरिद्र सुख दुःख प्राप्त हो उसमें सम रहना ही देव अर्चना करनी है | हे मुनीश्वर! शुद्धचिन्मात्र से  प्रमादी होना इसी का नाम अर्चना है | जो कुछ घटपट आदिक जगत् भासता है सो सब आत्मरूप है उससे भिन्न कुछ नहीं | वह आत्मा शिव शान्तिरूप अनाभास है और एक ही प्रकाशरूप है | सम्पूर्ण जगत् प्रतीतिमात्र है और आत्मा से भिन्न कुछ द्वैत वस्तु आभास नहीं | सर्वात्मा रूप अद्वैततत्त्व जब भासता है तब उसमें प्राप्त हुआ जानता है कि बड़ा आश्चर्य है, घटपटादिक सब वही रूप है और तो कुछ नहीं | हे मुनीश्वर यह सब सर्वात्मा अनन्त शिवतत्त्व है, जिसको ऐसे निश्चय प्राप्त हुआ है उसने देव की पूजा जानी है | घटपट आदिक जो पदार्थ हैं और पूज्य-पूजा-पूजक भाव सो सब ब्रह्मरूप है, निर्मलदेव आत्मा में कुछ भेद भाव नहीं है | हे मुनीश्वर! आत्मदेव सर्वशक्त और अनन्तरूप है जगत् में उससे भिन्न कुछ नहीं | निर्मल प्रकाश संवित््रूप आत्मा स्थित है, हमको तो ईश्वरदेव से भिन्न कुछ नहीं भासता और सर्वत्र, सर्व प्रकार वही सर्वात्मा सम्पूर्ण दृष्ट आता है | जिसको देश काल के परिच्छेद सहित ईश्वर भासता है वे हमारे उपदेश के पात्र नहीं, ज्ञानबन्ध नीच हैं | उनकी दृष्टि को त्यागकर मेरी दृष्टि का आश्रय ले तो स्वस्थ, बीतराग और निरामय हो और यथाप्रारब्ध जो कुछ सुख दुःख आन प्राप्त हो खेद से रहित होकर उस देव का अर्चन करे तब शान्ति प्राप्त हो | हे मुनीश्वर! उस देव की सब प्रकार सर्वात्मा करके भावना करो-वही उसका पूजन है | वृत्ति का सदा अनुभवरूप में स्थित रहना और यथाप्राप्त में खेद से रहित विचरना यही उस देव की अर्चना है | जैसे स्फटिक के मन्दिर में प्रतिबिम्ब भासते हैं सो और कुछ नहीं निष्कलंक स्फटिक ही है, तैसे ही सब ओर से रहित और जन्मादिक दुःख से रहित निष्कलंक आत्मा है   उसकी प्राप्ति से तेरे में जन्मादिक कलंक दुःख कुछ रहेगा |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने देवपूजाविचारो नामैकोनचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ||39||

अनुक्रम

 

 


जगन्मिथ्यात्वप्रतिपादन

वशिष्ठजी बोले, हे देव! शिव किसको कहते हैं और ब्रह्म, आत्म, परमात्म, तत्सत्, निष्किञ्चन, शून्य, विज्ञान इत्यादिक किसको कहते हैं और ये भेदसंज्ञा किस निमित्त हुई हैं कृपा करके कहो? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! जब सबका अभाव होता है तब अनादि अनन्त अनाभास सत्तामात्र शेष रहता है जो इन्द्रियों का विषय नहीं उसको निष्किञ्चन कहते हैं | फिर मैंने पूछा, हे ईश्वर! जो इन्द्रियाँ बुद्धि आदिक का विषय नहीं उसको क्योंकर पा सकते हैं? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! जो मुमुक्षु हैं और जिनको वेद के आश्रयसंयुक्त सात्त्विकी वृत्ति प्राप्त हुई है उनको सात्त्विकीरूप जो गुरु शास्त्रनाम्नी विद्या प्राप्त होती है उससे अविद्या नष्ट हो जाती है और आत्मतत्त्व प्रकाश हो आता है | जैसे साबुन से धोबी वस्त्र का मल उतारता है तैसे ही गुरु और शास्त्र अविद्या को दूर करते हैं | जब कुछ काल में अविद्या नष्ट होती है तब अपना आप  ही दिखता है | हे मुनीश्वर! जब गुरु और शास्त्रों का मिलकर विचार प्राप्त होता है, तब स्वरूप की प्राप्ति होती है द्वैतभ्रम मिट जाता है और सर्व आत्मा ही प्रकाशता है  और जब विचार द्वारा आत्मतत्त्व निश्चय हुआ कि सर्व आत्मा ही है उससे कुछ भिन्न नहीं  तो अविद्या जाती रहती है | हे मुनीश्वर! आत्मा की प्राप्ति में गुरु और शास्त्र प्रत्यक्ष कारण नहीं क्योंकि जिनके क्षय हुए से वस्तु पाइये उनके विद्यमान हुए कैसे  पाइये? देह इन्द्रियों सहित गुरु होता है और ब्रह्म सर्व इन्द्रियों से अतीत है, इनसे कैसे पाइये? अकारण है परन्तु कारण भी है, क्योंकि गुरु और शास्त्र के क्रम से  ज्ञान की सिद्धता होती है और गुरु और शास्त्र बिना बोध की सिद्धता नहीं होती | आत्मा निर्देश और अदृश्य है तो भी गुरु और शास्त्र से मिलता है और गुरु और शास्त्र से भी मिलता नहीं अपने आप ही से आत्मतत्त्व की प्राप्ति होती है | जैसे अन्धकार में पदार्थ हो और दीपक के प्रकाश से दीखे तो दीपक से नहीं पाया अपने आपसे पाया है | तैसे ही गुरु और शास्त्र भी है |  यदि दीपक हो और नेत्र हों तब कैसे पाइये और नेत्र हों और दीपक हो तो भी नहीं पाया जाता जब दोनों हों तब पदार्थ पाया जाता है, तैसे ही गुरु और शास्त्र भी हों और अपना पुरुषार्थ और तीक्ष्णबुद्धि हो तब आत्मतत्त्व मिलता है अन्यथा नहीं पाया जाता | जब गुरु, शास्त्र और शिष्य की शुद्ध बुद्धि तीनों इकट्ठे मिलते हैं तब संसार के सुख दुःख दूर होते हैं और आत्मपद की प्राप्ति होती है | जब गुरु और शास्त्र आवरण को दूर कर देते हैं तब आपसे आप ही आत्मपद मिलता है | जैसे जब वायु बादल को दूर करती है तब नेत्रों से सूर्य दीखता है | अब नाम के भेद सुनो | जब बोध के वश से कर्म इन्द्रियाँ और ज्ञान इन्द्रियाँ क्षय हो जाती हैं उसके पीछे जो शेष रहता है उसका नाम संवित््तत्त्व आत्मसत्ता आदिक हैं | जहाँ ये सम्पूर्ण नहीं और  इनकी वृत्ति भी नहीं उसके पीछे जो सत्ता शेष रहती है सो आकाश से भी सूक्ष्म और निर्मल अनन्त परमशून्यरूप है- कहाँ शून्य का भी अभाव है | हे मुनीश्वर! जो शान्तरूप मुमुक्षु मनन कलना से संयुक्त है उनको जीवन्मुक्त पद के बोध के निमित्त शास्त्र मोक्ष उपाय, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, लोकपाल, पण्डित, पुराण, वेद शास्त्र और सिद्धान्त रचे हैं और शास्त्रों ने चैतन्य ब्रह्म, शिव, आत्मा, परमात्मा,  ईश्वर, सत्, चित्,आनन्द आदिक भिन्न भिन्न अनेक संज्ञा कही हैं पर ज्ञानी को कुछ भेद नहीं | हे मुनीश्वर! ऐसा जो देव है, उसका ज्ञानवान् इस प्रकार अर्चन करते हैं और जिस पद के हम आदिक टहलुये हैं उस परमपद को वे प्राप्त होते हैं | फिर मैंने पूछा, हे भगवन्! यह सब जगत् अविद्यमान है और विद्यमान की नाईं स्थित है सो कैसे हुआ है | समस्त कहने को तुमहीं योग्य हो? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर!जो ब्रह्म आदिक  नाम से कहाता है वह केवल शुद्ध संवित्मात्र है और आकाश से भी सूक्ष्म है | उसके आगे  आकाश भी ऐसा स्थूल है जैसा अणु के आगे सुमेरु होता है | उसमें जब वेदनाशक्ति आभास होकर फुरती है तब उसका नाम चेतन होता है | फिर जब अहन्तभाव को प्राप्त हुआ-जैसे स्वप्न में पुरुष आपको हाथी देखने लगे तैसे आपको अहं मानने लगा, फिर देशकाल आकाश आदिक देखने लगा तब चेतन कला जीव अवस्था को प्राप्त हुई और वासना करनेवाली हुई, जब जीवभाव हुआ तब बुद्धि निश्चयात्मक होकर स्थित हुई और शब्द और क्रियाज्ञान संयुक्त हुई और जब इनसे मिलकर कल्पना हुई तब मन हुआ जो संकल्प का बीज है | तब अन्तवाहक शरीर में अहंरूप होकर ब्रह्मसत्ता स्थित हुई | इस प्रकार यह उत्पन्न हुई है | फिर वायुसत्ता स्पन्द हुई जिससे स्पर्श सत्ता त्वचा प्रकट हुई,  फिर तेजसत्ता हुई प्रकाश सत्ता हुई और प्रकाश से नेत्रसत्ता प्रकट हुई, फिर जलसत्ता  हुई जिससे स्वादरूप-रससत्ता हुई और उससे जिह्वा प्रकट हुई, फिर गन्धसत्ता से भूमि, भूमि से घ्राणसत्ता और उससे पिण्डसत्ता प्रकट हुई | फिर देशसत्ता, कालसत्ता और सर्व सत्ता हुईं जिनको इकट्ठा करके अहंसत्ता फुरी | जैसे बीज, पत्र, फूल, फलादिक के आश्रय होता है तैसे ही इस पुर्यष्टका को जानो | यही अन्तवाहक देह है | इन सबका आश्रय ब्रह्मसत्ता है | वास्तव में कुछ उपजा नहीं केवल परमात्मसत्ता अपने आपमें स्थित है | जैसे तरंगादि में जल स्थित है तैसे ही आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है | हे मुनीश्वर! संवित् में जो संवेदन पृथकरूप होकर फुरे उसे निस्स्पन्द करके जब स्वरूप को जाने तब वह नष्ट हो जाती है | जैसे संकल्प का रचा नगर संकल्प के अभाव हो जाता है, तैसे ही आत्मा के ज्ञान से संवेदन का अभाव हो जाता है | हे मुनीश्वर! संवेदन तबतक भासता है जबतक उसको जाना नहीं, जब जानता है तब संवेदन का अभाव हो जाता है और संवित् में लीन हो जाता है, भिन्नसत्ता इसकी कुछ नहीं रहती | हे मुनीश्वर! जो प्रथम अणु तन्मात्रा थी सो भावना के वश से स्थूल देह को प्राप्त हुई और स्थूल देह होकर भासने लगी, आगे जैसे जैसे देशकाल पदार्थ की भावना होती गई तैसे तैसे भासने लगी और जैसे गन्धर्वनगर और स्वप्नपुर भासता है तैसे ही भावना के वश से ये पदार्थ भासने लगे हैं मैंने पूछा, हे भगवन्! गन्धर्वनगर और स्वप्नपुर के समान इसको कैसे कहते हो? यह जगत् तो प्रत्यक्ष दीखता है? वासना के वश से दीखता है कि अविद्यमान में स्वरूप के प्रमाद करके विद्यमान बुद्धि हुई है और जगत् के पदार्थौं को सत् जानकर जो वासना फुरती है उससे दुःख होता है | हे मुनीश्वर! यह जगत् अविद्यमान है | जैसे मृगतृष्णा का जल असत्य होता है तैसे ही यह जगत् असत्य है उसमें वासना, वासक और वास्य तीनों मिथ्या हैं जैसे मृगतृष्णा का जल पान करके कोई तृप्त नहीं होता, क्योंकि जल ही असत् है, तैसे ही यह जगत् ही असत् है इसके पदार्थों की वासना करनी वृथा है | ब्रह्मा से आदि तृणपर्यन्त सब जगत मिथ्यारूप है | वासना, वासक और वास्य पदार्थों के अभाव हुए केवल आत्मतत्त्व रहता है  और सब भ्रम शान्त हो जाता है | हे मुनीश्वर! यह जगत् भ्रममात्र है-वास्तव में कुछ नहीं जैसे बालक को अज्ञान से अपनी परछाहीं में वैताल भासता है और जब विचार करके देखे तब वैताल का अभाव हो जाता है तैसे ही अज्ञान से यह जगत् भासता है और आत्म विचार से इसका अभाव हो जाता है | जैसे मृगतृष्णा की नदी भासती है और आकाश में नीलता और दूसरा चन्द्रमा भासता है, तैसे ही आत्मा में अज्ञान से देह भासता है | जिसकी बुद्धि देहादिक में स्थिर है वह हमारे उपदेश के योग्य नहीं है | जो विचारवान् है उसको उपदेश करना योग्य है और जो मूर्ख भ्रमी और असत््वादी सत््कर्म से रहित अनार्य है उसको ज्ञानवान् उपदेश करे | जिनमें विचार, वैराग्य, कोमलता और शुभ आचार हों उनको उपदेश करना योग्य है और जो इन गुणों से रहितृ हों उनको उपदेश करना ऐसे होता है जैसे कोई महासुन्दर और सुवर्णवत् कान्तिवाली कन्या को नपुंसक को विवाह देने की इच्छा करे |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगन्मिथ्यात्वप्रतिपादनन्नाम चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ||40||

अनुक्रम

 

 

परमार्थविचार

वशिष्ठजी बोले,हे भगवन्! वह जीव जो आदि में उत्पन्न हुआ और अपने साथ देहभ्रम देखने लगा उसके अनन्तर वह कैसे स्थित हुआ? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! वह जीव स्वप्न की नाईं सर्वगत चिद्घन आत्मा के आश्रय उपजकर अपने शरीर को देखता भया | हे मुनीश्वर! आदि जो जीव फुरकर प्रमाद को प्राप्त हुआ और अपने स्वरूप ही में अहं प्रत्यय रहा, इस कारण ईश्वर होकर स्थित हुआ | उसको यह निश्चय रहा कि मैं सनातन नित्, शुद्ध, परमानन्द और अव्यक्तरूप परमपुरुष हूँ आत्मा की अपेक्षा से उसको जीव कहा है और सृष्टि जगत् की अपेक्षा करके उसको ईश्वर कहा | हे मुनीश्वर! वह जो आदि जीव है सो कभी विष्णुरूप होकर ब्रह्मा को नाभिकमल से उत्पन्न करता है, किसी सृष्टि में प्रथम ब्रह्मा हुआ है और विष्णु और रुद्र उससे हुए हैं | किसी सृष्टि में प्रथम रुद्र हुआ उससे विष्णु और ब्रह्मा हुए | चैतन्य आकाश में जैसा-जैसा संकल्प फुरा है तैसा ही तैसा होकर स्थित हुआ है | आदि जीव ने उपजकर जिस-जिस प्रकार का संकल्प किया है तैसा-तैसा होकर स्थित हुआ है वास्तव में सब असत््रूप है और अज्ञानरूप भ्रम करके हुआ है | जैसे परछाहीं में वैताल होता है तैसे ही अज्ञान करके सत््रूप हो भासता है | आदि पुरुष से लेकर जो सृष्टि है सो परमाकाश के एक निमेष में हुई है और उन्मेष में लय हो जाती है | एक निमेष के प्रमाद से कल्प के समूह व्यतीत हो जाते हैं और परमाणु परमाणु में सृष्टियाँ फुरती हैं उनमें कल्प और महाकल्प भासते हैं | कई सृष्टियाँ परस्पर दिखती हैं और कई अन्योन्य अदृश्यरूप हैं | इसी प्रकार सृष्टियाँ उसके स्पन्दकला में फुरी हैं और चमत्कार होता है और जब स्पन्दकला स्वरूप की ओर आती है तब लीन हो जाती है | जैसे स्वप्न का पर्वत जागे से लीन हो जाता है तैसे ही जाग्रत की सृष्टि अफुर हुए लीन हो जाती है | हे मुनीश्वर! जीव-जीव प्रति अपनी-अपनी सृष्टियों को कोई देशकाल रोक नहीं सकता, क्योंकि वे अपने-अपने संकल्प में स्थित हैं  और आत्मा का चमत्कार है | जैसा फुरना फुरता है तैसा चमत्कार भासता है | हे मुनीश्वर कुछ उपजा है, कुछ नाश होता है, स्वतः चैतन्यतत्त्व अपने आपमें चमकता है | जैसे स्वप्ननगर उपजकर नष्ट हो जाता है और संकल्प का पहाड़ उपजकर मिट जाता है, तैसे ही जगत् उपजकर नष्ट हो जाता है | जैसे स्वप्न और संकल्प के पहाड़ को कोई रोक नहीं सकता तैसे ही अपनी-अपनी सृष्टि को देशकाल रोक नहीं सकता क्योंकि और ठौर में इनका सद्भाव नहीं |  इससे यह जगत् अपने-अपने काल में सत््रूप है, आत्मा में सद्भाव नहीं संकल्परूप है | हे मुनीश्वर! जैसे आदितत्त्व से जीव ईश्वर फुरे हैं तैसे ही कर्म फुरे हैं | रुद्र  से लेकर वृक्ष पर्यन्त सब एक क्षण में उसी तत्त्व से फुर आये हैं | सुमेरु आदिक भी अपने स्थित में रोकते हैं अन्य अणु को नहीं रोक सकते क्योंकि वहाँ है ही नहीं |इससे आत्मा में सृष्टि आभासरूप है | हे मुनीश्वर! इस प्रकार सब जगत् मायामात्र है और भावना से भासता है, जब आत्मा का अभ्यास होता है, तब भेदकल्पना मिट जाती है और केवल उपशमरूप शिवतत्त्व भासता है | हे मुनीश्वर! निमेष का जो शत भाग है उसके अर्द्धभाग प्रमाद होने से नाना प्रकार का जगत् हो भासता है | सत् असत््रूप जगत् मन रूपी विश्वकर्मा बनाता है | आत्मतत्त्व दूर है, निकट है नीचे है, पूर्व में है और पश्चिम में है सत् असत् के मध्य अनुभवरूप सर्व का ज्ञाता है | उसको प्रत्यक्ष आदिक प्रमाण विषय नहीं कर सकते-जैसे जल से अग्नि नहीं निकलती | हे मुनीश्वर! जो कुछ तुमने पूछा था सो मैंने कहा उसमें चित्त के लगाने से तुम्हारा कल्याण होगा | इतना कह सदाशिव बोले कि अब हम अपने वाञ्छित स्थान को जाते हैं, चलो पार्वती अपने स्थान को चलें | इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब इस प्रकार ईश्वर ने कहा तब मैंने अर्ध्यपाद्य से उनका पूजन किया और ईश्वर पार्वती और गणों को लेकर आकाशमार्ग को चले | जब तक मुझको दृष्टि आते रहे तबतक मैं उनकी ओर देखता रहा फिर अपने कुश के स्थान पर आन बैठा और जो कुछ ईश्वर ने उपदेश किया था वह मैं अपनी सुध बुध से विचारने लगा |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमार्थविचारोनामैकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ||41||

अनुक्रम

 

 


विश्रान्ति आगम

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो कुछ ईश्वर ने मुझसे कहा सो मैं आप भी जानता था और तुम  भी जानते हो! यह जगत् भी असत् है और देखनेवाला भी असत् है उस मायारूप जगत् में मैं तुमसे सत् क्या कहूँ और असत् क्या कहूँ? जैसे जल में द्ववता होती है तैसे ही आत्मा में जगत् है और जैसे पवन में स्पन्द और आकाश में शून्यता होती है तैसे ही आत्मा में जगत् है | हे रामजी! जोकुछ पतित प्रवाह से प्राप्त होता है उसी से मैं देवअर्चन करता हूँ | इस क्रम से मैं निर्वा सनिक हूँ और जगत् की क्रिया में भी निर्दुःख होकर चेष्टा करता हूँ, व्यवहार करता दृष्टि आता हूँ तो भी सदा शान्तिरूप हूँ और यथाप्राप्त आचाररूपी फूल से आत्मदेव की अर्चना करता हूँ-छेद भेद मुझको कोई नहीं होता है | हे रामजी! विषय और इन्द्रियों का सम्बन्ध सब जीवों को तुल्य है पर जो ज्ञानवान् हैं वे सावधान रहते हैं औरजो कुछ देखते, सुनते, बोलते, खाते सूँघते और स्पर्श करते हैं वह सब आत्मत्त्व में अर्चन करते हैं और आत्मा से भिन्न नहीं जानते | अज्ञानियों को कर्तृत्व-भोक्तृत्व का अभि मान होता है और उसमें वे दुःखी होते हैं | हे रामजी! तुम भी ऐसी दृष्टि का आश्रय करके संसाररूपी वन में निःसंग विचरो तो तुमको कुछ खेद होगा | जिसकी वृत्ति इस प्रकार समान हो गई है उसको बड़ा प्राप्त हो धन बाँधवों का वियोग हो तो भी उसको खेद नहीं होता | यह जो दृष्टि मैंने तुमसे कही है जब उसका आश्रय करोगे तब तुमको कोई दुःख होगा | हे रामजी! सुख,दुःख, धन और बान्धवों का वियोग ये सब पदार्थ अनित्य हैं ये आते भी हैं और जाते भी हैं इनको आगमापायी जानकर बिचरो | यह संसार विषमरूप है, एकरस कदाचित नहीं रहता, इसको स्थित जानकर दुःखी होना | हे रामजी! पदार्थ और काल जैसे जावे तैसे जावे और जैसे सुख दुःख आवे तैसे आवे ये सब आग मापायी पदार्थ हैं, आते भी हैं और जाते भी हैं | इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट की निवृत्ति में हर्षवान् होना और अनिष्ट की प्राप्ति और इष्ट के वियोग से खेदवान्  होना, जैसे आवे तैसे जावे, जैसे जावे तैसे आवे, जिसको आना है वह आवेगा और जिसको जाना है वह जावेगा, ये सुख दुःख प्रवाहरूप हैं इनमें आस्था करके तपायमान होना | हे रामजी! यह सब जगत् तुमही हो और तुमही जगत््रूप हो और चिन्मात्र विस्तृत आकार भी तुमही हो यदि सब तुमही हो तो हर्ष शोक किस निमित्त करते हो? इसी दृष्टि का आश्रय करके जगत् में सुषुप्त होकर विचरो तो तुरीयातीत अवस्था को प्राप्त होगे जो सम प्रकाशरूप है | हे रामजी! जो कुछ मुझे तुमसे कहना था सो कहा है  आगे जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो | पीछे तुमने पूछा था कि अनन्तरूप ब्रह्म में कलंक कैसे प्राप्त हुआ है? सो अब फिर प्रश्न करो कि मैं उत्तर दूँ | रामजी ने कहा, हे ब्रह्मन्! अब मुझको कुछ संशय नहीं रहा, मेरे सब संशय नष्ट हो गये हैं और जो कुछ जानना था सो मैंने जाना है | अब मैं परम अकृत्रिम को प्राप्त हुआ हूँ | हे मुनीश्वर  आत्मा में मैल है, द्वैत है और एक आदि कोई कल्पना है | पहिले मुझको अज्ञानता थी तब मैंने पूछा था, अब तुम्हारे वचनों से मेरी अज्ञानता नष्ट हुई इससे कुछ कलंक नहीं भासता | आत्मा में जन्म है, मरण है, सर्व ब्रह्म ही है | हे मुनीश्वर | प्रश्न संशय से उपजता है सो संशय मेरा नष्ट हो गया है | जैसे यन्त्री की पुतली हिलाने से रहित अचल होती है तैसे ही मैं संशय से रहित अचल स्थित हूँ और सर्व सारों का सार मुझको प्राप्त हुआ है | जैसे सुमेरु अचल होता है तैसे ही मैं अचल हूँ और कोई क्षोभ मुझको नहीं | ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो मुझको त्यागने योग्य हो और ऐसा भी कोई पदार्थ नहीं जो ग्रहण करने योग्य हो, किसी पदार्थ की मुझको इच्छा है और अनिच्छा  है मैं शांतरूप स्थित हूँ, स्वर्ग की मुझको इच्छा है नरक से द्वेष है, सर्व ब्रह्मरूप मुझको भासता है और मन्दराचल पर्वत की नाईं आत्मतत्त्व में स्थित हूँ | हे मुनीश्वर! जिसको अवस्तु में वस्तुबुद्धि होती हैऔर कलना हृदय में स्थित होती है वह किसी को ग्रहण करता है, किसी को त्याग करता है और दीनता को प्राप्त होता है | हे मुनीश्वर! यह संसार महासमुद्र है, उसमें रागद्वेषरूपी कलोलें हैं और शुभ अशुभ रूपी मच्छ रहते हैं | ऐसे भयानक संसारसमुद्र से अब मैं आपके प्रसाद से तर गया हूँ और सब सम्पदा के अन्त को प्राप्त होकर मेरे दुःख नष्ट हो गये हैं | सबके सार को प्राप्त होकर मैं पूर्ण आत्मा हूँ और अदीन पद और परम शान्त अभेदसत्ता को प्राप्त हुआ हूँ |   आशारूपी हाथी को मैंने सिंह बनकर मारा है अब मुझको आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासता | मेरे सब विकल्पजाल कट गये है, इच्छादिक विकार नष्ट हो गये हैं और दीनता जाती रही है | तीनों जगत् में मेरी जय है और मैं सदा उदितरूप हूँ |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्रान्ति आगमनन्नाम द्विचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ||42||

अनुक्रम

 

 


चित्तसत्तासूचन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो केवल देह इन्द्रियों से करता है और मन से नहीं करता वह जो कुछ करता है सो कुछ नहीं करता | जो कुछ इन्द्रियों से इष्ट प्राप्त होता है उससे क्षणमात्र सुख प्राप्त होता है, उस क्षण की प्रसन्नता में जो बन्धवान् होता है  वह बालकवत् मूर्ख है | जो ज्ञानवान् है वह उसमें बन्धवान् नहीं होता | हे रामजी! वाञ्छा ही इसको दुःखी करती है | जो सुन्दर विषयों की वाञ्छा होती है तो जब जीव यत्न से उनको प्राप्त करता है तो क्षण भर सुख होता है और जब वियोग होता है तब दुःखी होता है | इस कारण इनकी वाञ्छा त्यागना ही योग्य है | इनकी वाञ्छा तब होती हे जब स्वरूप का ज्ञान होता है और देहादिक में सद्भाव होता है जब देहादिक में अहंभाव होता है तब अनेक अनर्थ की प्राप्ति होती है, इससे हे रामजी! ज्ञानरूपी पहाड़ पर चढ़े रहना और अहन्तारूपी गढ़े में गिरना | हे रामजी! आत्मज्ञानरूपी सुमेरु पर्वत पर चढ़कर फिर अहन्ता (अभिमान) करके गढ़े में गिरना बड़ी मूर्खता है | जब दृश्यभाव को त्यागोगे तब  अपने स्वभावसत्ता को प्राप्त होगे, जो सम और शान्तरूप है और जिससे विकल्पजाल सब मिट जावेगा, समुद्रवत् पूर्ण होगे और द्वैतरूप फुरेगा | हे रामजी! जब हृदय में विषय को विष जाने तब मन भी निरस हो जाता है और चित्त निसंग होता है | वास्तव में देखो तो सबमें सत्ता समानरूप ब्रह्म चिद्घन स्थित है पर अद्वैतरूप के प्रमाद से नहीं भासता | हे रामजी! आत्मा का अज्ञान ही बन्धनरूप है और आत्मा का बोध मुक्तरूप है, इससे बल करके आपही जागो तब इस बन्धन से मुक्त होगे | हे रामजी! जिसमें विषय का स्वाद नहीं और जिसमें उनका अनुभव होता है वह तत्त्व आकाशवत् निर्मलसत्ता वासना से रहित है |   वासना से रहित होकर जो पुरुष कुछ क्रिया करता है वह विकार को नहीं प्राप्त होता | यदि अनेक क्षोभ आनि प्राप्त हों तो भी उसको विकार कुछ नहीं होता | ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय ये तीनों आत्मरूप भासते हैं, जब ऐसे जाने तब किसी का भय नहीं रहता | चित्त के फुरने से जगत् उत्पन्न होता है और चित्त के अफुर हुए लीन हो जाता है | जब वासना सहित प्राण उदय होते हैं तब जगत् उदय होता है और जब वासना सहित प्राण लीन होते हैं तब जगत् भी लीन होता है | अभ्यास करके वासना और प्राणों को स्थित करो | जब मूर्खता उदय होती है तब कर्म उदय होते हैं और मूर्खता के लीन हुए कर्म भी लीन होते हैं, इससे सत्संग और सत््शास्त्रों के विचार से मूर्खता को क्षय करो | जैसे वायु के  संग से धूलि उड़के बादल का आकार होती है तैसे ही चित्त के फुरने से जगत् स्थित होता  है | हे रामजी! जब चित्त फुरता है तब नाना प्रकार का जगत् फुर आता है और चित्त के अफुर हुए जगत् लीन हो जाते है | हे रामजी! वासना शान्त हो अथवा प्राणों का निरोध हो तब चित्त अचित्त हो जाता है और जब चित्त अचित्त हुआ तब परमपद को प्राप्त होता है | हे रामजी! दृश्य और दर्शन सम्बन्ध के मध्य में जो परमात्मसुख है और जो एकान्तसुख है सो संवित् ब्रह्मरूप है, उसके साक्षात्कार हुए मन क्षय होता है | जहाँ  चित्त नहीं उपजता सो चित्त से रहित अकृत्रिम सुख है | ऐसा सुख स्वर्ग में भी नहीं होता | जैसे मरुस्थल में वृक्ष नहीं होता तैसे ही चित्त सहित विषयों से सुख नहीं होता | चित्त के उपशम में जो सुख है सो वाणी से कहा नहीं जाता, उसके समान और कोई सुख नहीं और उससे अतिशय सुख भी नहीं | और सुख नाश हो जाता है पर आत्म सुख नाश नहीं होता-अविनाशी है और उपजने विनशने से रहित है | हे रामजी! अबोध से चित्त उदय होता है और आत्मबोध से शान्त हो जाता है | जैसे मोह से बालक को वैताल दिखाई देता है और मोह के नष्ट हुए नष्ट हो जाता है, तैसे ही अज्ञान से चित्त उदय होता है और अज्ञान के नष्ट हुए नष्ट होता है | यदि चित्त विद्यमान भी भासता है तब भी बोध से निर्बीज होता है | जैसे पारस के साथ मिलकर ताँबा सुवर्ण होता है तो आकार तो वही दृष्टि आता है परन्तु ताँबे भाव का अभाव हो जाता है, तैसे ही अज्ञान से जगत् भासता है और ज्ञान से चित्त अचित्त हो जाता है, जड़ जगत् नहीं भासता, ब्राह्मसत्ता ही भासती है और सत्पद को प्राप्त होता है परन्तु नामरूप तैसे ही भासता है | हे रामजी! ज्ञानी का चित्त भी क्रिया करता दृष्टि आता है परन्तु चित्त अचित्त हो जाता है | जो अज्ञान करके भासता है सो ज्ञान करके शून्य हो जाता है | जो कुछ जगत् अबोध से भासता था सो बोध से शान्त हो जाता है फिर नहीं उपजता | वह चित्त शान्तपद को प्राप्त होता है | कुछ काल तो वह भी तुरीया अवस्था में स्थित हुआ बिचरता है फिर तुरीयातीत पद को प्राप्त होता हे | अधः, ऊर्ध्व, मध्य सर्वब्रह्म ही इस प्रकार अनेक होकर स्थित हुआ है | अनेक भ्रम करके भी एक ही है और सर्वात्मा ही है-चित्तादिक कुछ नहीं |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्तसत्तासूचनन्नाम त्रिचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ||43||

अनुक्रम

 

 


विल्वोपाख्यान

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! अब तुम संक्षेप से एक अपूर्व और आश्चर्य बोध का कारण दृष्टान्त सुनो | एक वेलफल है जिसका अनन्त योजन पर्यन्त विस्तार है और जिसे अनन्त युग व्यतीत हो गये हैं जर्जरीभाव को कदाचित् नहीं प्राप्त होता | वह अनादि है उसमें अविनाशी रस है इससे कभी नाश नहीं होता और चन्द्रमा की नाईं सुन्दर है | सुमेरु आदिक जो बड़े पहाड़ हैं उनको महाप्रलय का पवन तृणों की नाई उड़ाता है पर वह पवन भी उसको नहीं हिला सकता | हे रामजी! योजनों की अनन्त कोटानिकोट संख्या है पर उसकी संख्या नहीं की जाती | ऐसा वह बेलफल है और बहुत बड़ा है | जैसे सुमेरु के निकट राई का दाना  सूक्ष्म और तुच्छ भासता है तैसे ही उस बेलफल के आगे ब्रह्माण्ड सूक्ष्म और तुच्छ भासता है | यह बेल रस से पूर्ण है, कभी गिरता नहीं और पुरातन है | उसका आदि, अन्त और मध्य, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्रादिक भी नहीं जान सकते और उसके मूल को कोई जान सकता है, मध्य को कोई जान सकता है |    उसका अदृष्ट आकार है और अदृष्ट फल है, अपने प्रकाश से प्रकाशता है, उसका धन आकार है, सदा अचल है किसी विकार को नहीं प्राप्त होता और सत्, निर्मल, निर्विकार, निरन्तररूप निरन्ध्र और चन्द्रमा की नाईं शीतल, सुन्दर है | उसमें ज्ञान संवित्् रूपी रस है सो अपना रस आपही लेता है और सबको देता है और सबको प्रकाशकर्त्ता भी वही है | उसमें अनेक चित्ररेखों ने निवास किया है परन्तु वह अपने स्वरूप को नहीं त्यागता अनेकरूप होकर भासता है और उसमें स्पन्दरूपी रस फुरता है | तत्त्वं, इदं, देश, काल, क्रिया, नीति, राग, द्वेष, हेयोपादेय, भूत, भविष्यत, काल, प्रकाश, तम, विद्या, अविद्या इत्यादि कलना जाल उस रस के फुरने से फुरते हैं | वह बेल आत्मरूप है  और अनुभवरूपी उसमें रस है | वह सदा अपने आपमें स्थित और नित्य शान्तरूप है | उसको जानकर पुरुष कृतकृत्य होता है |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विल्वोपाख्यानन्नाम चतुश्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ||44||

अनुक्रम

 

 


शिलाकोशउपदेश

रामजी बोले, हे भगवन्! सर्वधर्मों के वेत्ता आपने यह बेलरूपी महाचिद्घन सत्ता कही सो मुझे ऐसे निश्चय हुआ कि चैतन्य ही अहंतादिक जगत् हो भासता है भेद रंचक भी नहीं एक द्वैत कलना सर्व वही है | वशिष्ठजी बोले हे रामजी! जैसे ब्रह्माण्ड की मज्जा सुमेरु आदिक पृथ्वी है तैसे ही चैतन्य बेल की मज्जा यह ब्रहमाण्ड है | सब जगत् चैतन्य बेलरूप है-भिन्न नहीं और उस चैतन्य का विनाश नहीं हो सकता | हे रामजी! चैतन्यरूपी मिरचे के बीज में जगत््रूपी चमत्कार तीक्ष्णता है सो सुषुप्तवत् निर्मल है और शिला के