निर्वाण
प्रकरण
(१०१- २००)
अनुक्रम
प्रथमद्वितीयतृतीयभूमिकालक्षण विचार
भुशुण्डिविद्याधरोपाख्यान समाप्ति
श्रीयोगवाशिष्ठ निर्वाणप्रकरण उत्तरार्द्ध प्रारम्भ
शिलान्तरवशिष्ठब्रह्मसंवाद वर्णन
मनु बोले,
हे राजन्! बड़ा आश्चर्य है
कि शुद्ध चिन्मात्र आत्मा में माया
से नाना प्रकार के
देह, इन्द्रियाँ और
दृश्य भासि आये हैं | हे राजन्! दृश्य का
कारण अज्ञान है
| जिस आत्मा के
अज्ञान से
दृश्यरूप भासता है-
उसी के
ज्ञान से
लीन हो
जाता है
इससे संवेदन को
त्यागकर आत्मा की
भावना कर
| यह मैं हूँ, ये मेरे हैं ये संकल्प मिथ्या ही
फुरते हैं | हे राजन्! प्रथम कारणरूप से
एक जीव उपजा
और उस
आदि जीव के अनेक जीवगण हुए | जैसे
अग्नि से
चिनगारे निकलते हैं तैसे
ही उसने अनेक रूप धारे
हैं और
कोई गन्धर्व, कोई विद्याधर कोई मनुष्य, कोई राक्षस इत्यादिक हुए हैं | फिर जैसे संकल्प होते गये हैं, तैसे ही
रूप होते गये, वास्तव में जैसे जल
में तरंग स्वरूप के
प्रमाद से
अनेकभाव प्राप्त होते हैं तैसे
ही अपने संकल्प आप
ही को
बन्धनरूप होते गये हैं | इससे संकल्प नानात्व कलना मिथ्या है
| हे राजन्! इस
भावना को
त्यागकर आत्मपद को
प्राप्त हो
आत्मा अनन्त है
| यह विश्व और
प्रकार का
भान होता है
| जैसे समुद्र सम
है पर
उसमें कई
आवर्त्ततरंग और
बुद्बुदे उठते हैं सो जल से
भिन्न नहीं तैसे ही
आत्मा में अनेक
प्रकार का
विश्व फुरता है
सो आत्मा से
भिन्न नहीं, आत्मस्वरूप ही
है इससे आत्मा की
भावना कर
| कहीं ब्रह्म सत् संकल्प होकर
फुरता है
तो जानता है
कि मैं ब्रह्म, शुद्धरूप और
सदा मुक्तरूप हूँ और इस संसारसमुद्र से
पार हो
गया हूँ | जहाँ
चेतनाशक्ति है
वहाँ आपको जीवता मानता है
और दुःखी भी
जानता है
| अन्तःकरण से
मिलकर भोग की भावना करना और
सदा विषय की
तृष्णा करना जीवात्मा कहाता है
और जहाँ वासना क्षय हुई है और शुद्ध आत्मा प्रत्यक्ष है
वहाँ जीवसंज्ञा नष्ट हो
जाती है
और केवल शुद्ध आत्मा प्रकाशता है
| हे राजन्! चेतन जब
अन्तःकरण से
मिलकर बहिर्मुख फुरता है
तब संसारी हुआ जरा मरण से
दुःखी होता है
और जहाँ चेतनशक्ति अन्तर्मुख होती है
तब जन्ममरण की
भावना को
त्यागकर स्वरूप की
भावना करता है
और सर्व दुःख की
निवृत्ति होती है
| जब इसकी भावना स्वरूप की
ओर लगती है
तब कोई दुःख
नहीं रहता और
जब स्वरूप का
प्रमाद होता है
तब दुःख पाता है
| स्वरूप के
ज्ञान से
आनन्दरुप मुक्त होता है
| हे राजन्! तू
संसाररूपी कूप की गगरी रस्सी से
बँधती है
तो कभी ऊर्ध्व को जाती है
और कभी अधः को जाती है
पर जब
रस्सी टूट पड़ती
है- तब न ऊर्ध्व को
जाती है
और न अधः को
जाती है
| कूप क्या है
| अधः क्या है
और ऊर्ध्व क्या है?
सो भी
सुन | हे
राजन्! संसाररूपी कूप है, स्वर्गलोक ऊर्ध्व है
और नरक अधः है | पुण्यकर्म से
स्वर्ग को
जाता है
और पापकर्म से
नरक में जाता
है | इसी प्रकार आशारूपी रस्सी से
बँधा हुआ जीव जन्ममरणरूपी चक्र में फिरता
है | स्वर्ग और
नरक में फिरने
का कारण आशा है | जब आशा निवृत्त होती है
तब न कोई नरक है न स्वर्ग है
| जब तक
देह में अभिमान है तब तक
नीच से
नीच गति को प्राप्त होता है
| जैसे पत्थर की
शिला समुद्र में डारिये तो नीचे से
नीचे चली जाती
है तैसे ही
नीच स्थानों को
देखकर देहाभिमानी नीचे को
चला जाता है
| जब इन्द्रियादिक का
अभिमान त्याग करता है
तब जैसे क्षीर समुद्र से
निकलकर चन्द्रमा अधः से ऊर्ध्व को
चला जाता है
तैसे ही
ऊर्ध्व को
जाता है
| हे राजन्! यदि आत्मा
की भावना करोगे तो
आत्मा ही
होगा, इससे आशारूपी फाँसी को
तोड़कर शान्तपद को
प्राप्त हो
| आत्मा चिन्तामणि की
नाईं है
| जैसी भावना कीजिये तैसे ही
सिद्ध होती है,
यदि तू
आत्मभावना करेगा तो
सम्पूर्ण विश्व अपने में देखेगा | जैसे
पर्वत शिला और
पत्थर को
अपने में देखता
है तैसे ही
तू भी
सर्वआत्मा जानेगा | हे राजन्! जो कुछ दृश्य है सो सर्वात्मा के आश्रय है, शास्त्र और शास्त्रदृष्टि सब आत्मा के आश्रय हैं और राजा भी आत्मा के आश्रय है वह सर्वसत्य आत्मा चिन्तामणि कल्पवृक्ष है, जैसी कोई भावना करता है तैसी सिद्धि होती है | हे राजन्! फुरने में यह सर्वदृश्य सत्य है और जब फुरना नष्ट होता है तब न कोई शास्त्र है और न कोई दृष्टि है | केवल अद्वैत आत्मा है तो निषेध किसका कीजिये और अंगीकार किसका करिये | जो पुरुष अहंकार से रहित हुआ है वह सर्वशास्त्र दृष्टि पर विराजता है और सर्वात्मा होता है | जैन उसी को जिन कहते हैं और कालवादी उसी को काल कहते हैं सबका आसरा आत्मा है | जो पुरुष देहाभिमानी है वह मूर्ख है और स्वरूप के अज्ञान से अधः ऊर्ध्वलोक को गमन-आगमन करता है, पशु, पक्षी, स्थावर जंगम योनि पाता है और आशारूपी फाँसी से बधा हुआ दुःख को प्राप्त होता है | जो पुरुष सम्यक्दर्शी है और जिसकी शुद्ध चेष्टा है उसको कोई विकार दृष्टि नहीं आता आकाश की नाईं सदा निर्मल भासता है | उसको सम्पूर्ण विश्व आत्मस्वरूप भासता है और जो चेष्टा ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्राद्रिक करते हैं उसका कर्ता भी आपको जानता है | उसको सर्व दुःख का अन्त होता है, वह आत्मपद को प्राप्त होता है और उसको सर्व सुख की सीमा प्राप्त होती है | हे राजन्! जैसे नदी तबतक चलती है जबतक समुद्र को नहीं प्राप्त हुई पर जब समुद्र को प्राप्त होती है तब नहीं चलती तैसे ही जब तू आत्मपद को प्राप्त होगा तब कोई इच्छा तुझे न रहेगी | हे राजन्! तू अहंकार का त्याग कर अथवा ऐसा जान कि सब मैं ही हूँ | जरा मरण आदिक दुःख तब तक हैं जबतक आत्मबोध नहीं प्राप्त हुआ, जब आत्मबोध होता है तब कोई दुःख नहीं रहता | दोनों ही दुःख भारी हैं पर ज्ञानी को इन्द्र के वज्रसमान दुःख भी स्पर्श नहीं करता | हे राजन्! जैसे पेड़ से सुखकर फल गिरता है उसी प्रकार जब ज्ञानरूपी फल प्राप्त होता है तब मन, बुद्धि अहंकार पेड़ की नाईं गिर पड़ते हैं | जब तक मन की चपलता है तबतक दुःख पाता है तबक दुःख पाता है और जब मन की चपलता निवृत्त होती है तब कोई क्षोभ नहीं रहता और शान्तपद को प्राप्त होता है | शान्ति तब होती है जब प्रकृति का वियोग होता है | प्रकृति के संयोग से संसारी होता है और दुःख पाता है इससे प्रकृति को त्याग दे अर्थात् अहंकार से रहित होकर चेष्टा कर | जब तू अहंकार से रहित होगा तब उस पद को प्राप्त होगा जो न जड़ है, न शून्य है, न अशून्य है, न केवल है, उसे न आत्मा कह सकते हैं न अनात्मा, न एक होता है न दो | जो कुछ नाम है सो प्रतियोगी से मिले हुए हैं | प्रतियोगी हुआ द्वैत होता है और आत्मा अद्वैत है जिसमें वाणी की गम नहीं और जो अवाच्यपद है उसको कैसे कहिये? जितनी नाम संज्ञा हैं सो उपदेशमात्र हैं, आत्मा अनिर्वाच्यपद है | इससे संकल्प का त्याग कर और आत्मा की भावना कर | जब तू आत्मभावना करेगा तब केवल आत्मा ही प्रकाशेगा | जैसे फूल को कोई अंग सुगन्ध से रहित नहीं होता- तैसे ही आत्मा से कुछ भिन्न नहीं | हे राजन्! जब अहंकार का त्याग करोगे तब अपने आप से शोभायमान होगे और आकाश की नाईं निर्मल आत्मा में स्थित होगे | अहंकार को त्याग कर उस पद को प्राप्त होगे जहाँ शास्त्र और शास्त्रों के अर्थ प्राप्त नहीं होते, जहाँ सम्पूर्ण इन्द्रियों के रस लीन हो जाते हैं और सब दुःख नष्ट हो जाते हैं तब केवल मोक्षपद को प्राप्त होगे | हे राजन्! मोक्ष किसी देश में नहीं कि वहाँ जाकर पावे, न किसी काल में ही है कि अमुक काल आवेगा तब मुक्त होगा और न कोई पदार्थ ही है कि उसको ग्रहण करेगा, केवल अहंकार के त्याग से मोक्ष होता है जब तू अहंकार का त्याग करेगा तभी मोक्ष है | जब तू इस अनात्म अभिमान को त्यागेगा तब अपने आपसे शोभायमान होगा और जैसे धुँवा बिना अग्नि प्रकाशमान होता है तैसे ही अहंकार बिना प्रकाशेगा | जैसे बड़े पर्वत पर निर्मल और गम्भीर तालाब शोभता है तैसे ही तू शोभेगा | हे राजन्! तू अपने स्वरूप में स्थित हो |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे समाधानवर्णनंनामैकाधिकशततस्सर्गः ||101||
मनु बोले,
हे राजन्! तू
शुद्ध और
रागद्वेष से
रहित आत्मारामी नित अन्तर्मुख हो
रह जब
तू आत्मारामी होगा तब
तेरी व्याकुलता नष्ट हो
जावेगी और
शीतल चन्द्रमा सा
पूर्ण वत् हो जावेगा | ऐसा होकर
अपने प्रकृत आचार में बिचर
और किसी फल
की वाञ्छा न कर जो
पुरुष वाच्छा से
रहित होकर कर्म करता है
वह सदा अकर्ता है और महा शोभा
पाता है
| ऐसी अवस्था में स्थित
होकर जो
भोजन आवे उसको
भक्षण कर
और जो
अनिच्छित वस्त्र आवे उसको
पहिर, जहाँ नींद आवे वहाँ
सो रह
और रागद्वेष से
रहित हो
| जब तू
ऐसा होगा तब
शास्त्र और
शास्त्रों के
अर्थ से
उल्लंघित बर्तेगा जो
ऐसा पुरुष है
वह
परम रस
को पाकर रस
को पाकर मतवाला होता है
और उसको संसार की
कुछ नहीं रहती | हे
राजन्! ज्ञानवान् चाहे काशी में देह त्यागे अथवा चाण्डाल के
गृह में त्यागे वह सदा मुक्त है
और वह
सदा आत्मस्वरूप में स्थित
है | वर्तमानकाल में वह देह को
नहीं त्यागता, क्योंकि जिस काल में उसको ज्ञान हुआ उसी में देह का अभाव हुआ-ज्ञान
से देह बाध हो जाती है
| हे राजन्! ज्ञानवान् सदा मुक्त
रूप है,
वह न किसी की
स्तुति करता है
और न निन्दा करता है,
क्योंकि उसके चित्त की
कलना मिट गई है | यद्यपि रागद्वेष ज्ञानवान् में भी दृष्टि आते हैं और वह
हँसता रोता भी
देख पड़ता है
परन्तु उसके अन्तर न राग है
और न द्वेष है,
और वास्तव से
न हँसता है
न रोता है-ज्यों का
त्यों है
| जैसे आकाश शून्यरूप है
और उसमें बादल भी
दृष्टि आते हैं परन्तु आकाश को
कुछ लेप नहीं
करते, तैसे ही
ज्ञानवान् को
कोई क्रिया बन्धन नहीं करती पर
अज्ञानी जानते हैं कि ज्ञानवान् को
क्रिया बन्धन करती है
हे राजन्! ज्ञानवान् सर्वदा नमस्कार करने और
पूजने योग्य हैं | जिस स्थान में ज्ञानवान् बैठता है
उस स्थान को
भी नमस्कार है,
जिससे बोलता है
उस जिह्वा को
भी नमस्कार है,
जिससे बोलता है
उस जिह्वा को
भी नमस्कार है
और जिस पर ज्ञानवान् दृष्टि करता है
उसको भी
नमस्कार है,
वह सबका आश्रय है
| हे राजन् जैसा ज्ञानवान् की
दृष्टि से
आनन्द मिलता है
वैसा आनन्द तप,
दान और
यज्ञ आदि कर्मों से नहीं मिलता और
ऐसी दृष्टि और
किसी की
नहीं होती जैसी सन्त की
दृष्टि है
वह ऐसे आनन्द
को पाता है
जिसमें वाणी की
गम नहीं | जो
पुरुष सन्त की
दृष्टि को
पाकर सुखी होता है
उससे लोग दुःख
नहीं पाते और
लोगों से
वह दुःखी नहीं होता और
न किसी का
भय करता है,
न किसी का
हर्ष करता है
| हे राजन्! सिद्धि पाने का
सुख पाने का
सुख अल्प है,
क्योंकि उड़ने की
सिद्धि पाई तो अनेक पक्षी उड़ते फिरते हैं, इससे
आत्मज्ञान् तो
नहीं मिलता और
आत्मज्ञान बिना शान्ति नहीं होती | जब
आत्मज्ञान् प्राप्त होता है
तब जरा, मृत्यु आदिक
दुःख से
मुक्त होता है
और कोई दुःख
नहीं रहता जैसे पिंजरे से
छूटा सिंह फिर पिंजरे के बन्धन में नहीं
पड़ता, तैसे ही
वह पुरुष अज्ञानरूपी पिंजरे में नहीं
फँसता! हे
राजन्! इससे तू
आत्मा की
भावना कर
कि तेरे दुःख नष्ट हो
जावें | अज्ञान से
तुझे दुःख भासते हैं-अज्ञान से रहित सदा आनन्द
रूप है
| इससे अनुभवरूप आत्मा में स्थित
हो | जब
तू आत्मा में स्थित
होगा तब
जैसे शुद्ध के
निकट श्वेत, रक्त, पीत, श्याम
आदि रंग रखिये
तो वह
उनके प्रतिबिम्ब को
ग्रहण करती है
पर कोई रंग स्पर्श नहीं करता कल्पित से
भासते हैं, तैसे
ही तू
प्रकृत आचार को
अंगीकार करता रहेगा पर
तुझे पाप पुण्य
का स्पर्श न होगा |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मनुइक्ष्वाकुसंवादसमाप्तिर्नाम द्वयधिकशततमस्सर्गः ||102||
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इस प्रकार उपदेश करके जब मनुजी तूष्णीं हो गये तब राजा ने भली प्रकार उनका पूजन किया | फिर मनुजी आकाश को उड़के ब्रह्मलोक में जा पहुँचे और राजा इक्ष्वाकु राज्य करने लगा | हे रामजी! जैसे राजा इक्ष्वाकु ने जीवन्मुक्त होकर राज्य किया है तैसे ही तुम भी इस दृष्टि का आश्रय करके बिचरो | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! आपने जो कहा कि जैसे राजा इक्ष्वाकु ज्ञान पाकर राज्य चेष्टा करता रहा तैसे ही तू भी कर उसमें मेरा यह प्रश्न है कि जो अतिशय अपूर्व हो उसका पाना विशेष है और जो पूर्व में किसी ने पाया है उसका पाना अपूर्व और अतिशय नहीं, इसलिये मुझसे नहीं, इसलिये मुझसे कहिये कि सर्व से विशेष अपूर्व अतिशय क्या है | वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! ज्ञानवान् सदा शान्तरूप और रागद्वेष से रहित है और वह अपूर्व अतिशय को पाता है | जो कुछ और अतिशय है वह पूर्व अतिशय है, पर ज्ञानवान् अपूर्व अतिशय को पाता है ज्ञानी से अन्य कोई नहीं पाता आत्मज्ञान को ज्ञानी ही पाता है और वह ज्ञान एक ही है | हे रामजी! जो दूसरा नहीं पाता तो अपूर्व अतिशय हुआ | हे रामजी! अपूर्व अतिशय को पाकर ज्ञानवान् प्रकृत आचार और सर्वचेष्टा भी करता है तो भी निश्चय सर्वदा आत्म में रखता है | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! ऐसा ज्ञान वान् जो अज्ञानी की नाईं सर्व चेष्टा करता है उसको किन लक्षणों से तत्त्ववेत्ता जानिये?
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! एक स्वसंवेद लक्षण है और दूसरा पर संवेद लक्षण है | आपही अपने को जाने और न जाने इसे स्वसंवेद कहते हैं और जिसको और भी जानते हैं उसे परसंवेद कहते हैं | हे रामजी! परसंवेद के लक्षण कहता हूँ सो सुनो | तप, दान, यज्ञ, व्रत इत्यादिक करना परसंवेद है और दुःख-सुख की प्राप्ति में धैर्य से रहना समान साध के लक्षण हैं | महा कर्ता और महाभोक्ता और महात्यागी होना, क्षमा, दया इत्यादिक लक्षण साधु के हैं ज्ञानवान् के नहीं और उड़ना, छिप जाना, जो अणिमादिक सिद्धि हैं वे भी समान लक्षण हैं परन्तु यह स्वाभाविक आन फुरते हैं सो और से भी जाने जाते हैं पर जो ज्ञानी के लक्षण हैं वे स्वसंवेद हैं | इससे भिन्न उसके शरीर में सींग नहीं होते कि उससे जानिये | जैसे और व्यवहार हैं तैसे ही ज्ञानी को सिद्धिसमान है | यह भी ज्ञानवान् का लक्षण नहीं ओर पुण्य पापादिक क्रिया परसंवेद हैं सो माया के कल्पे हैं ज्ञानी के नहीं जितने लक्षण देखने में आवेंगे वे मिथ्या हैं और माया के कल्पे हैं | ज्ञानी का लक्षण स्वसंवेद है | वह सर्वदा आत्मा में स्थित है और और अपने आपसे सन्तुष्ट है | उसे न किसी का हर्ष है, न शोक है, जन्म मरण में समान है और काम, क्रोध, लोभ मोह सबको जानता है | उसका लक्षण इन्द्रियों का विषय नहीं क्योंकि वह निर्वाच्यपद को प्राप्त हुआ है | रामजी! जिसको ज्ञान प्राप्त होता है उसका चित्त स्वाभाविक ही विषयों से विरस होता है और इन्द्रियजित होता है-उसकी भोगों की इच्छा निवृत्त हो जाती है |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ज्ञानिलक्षणविचारो नाम त्रयधिकशततमस्सर्गः ||103||
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! मायाजाल का काटना महाकठिन है | यह आदि कलना जीव को हुई है |जो कोई इसमें सत््बुद्धि करता है वह पखेरू की नाईं जाल में फँसा हुआ निकल नहीं सकता है-तैसे ही अनात्मा अभिमान से निकल नहीं सकता है | हे रामजी! फिर मेरे वचन सुनो क्योंकि जैसे मेघ का शब्द मोर को प्रियतम लगता है, तैसे ही मेरे वचन प्रिय लगते हैं | मैं भी तेरे हित के निमित्त कहता और उपदेश करता हूँ | रघुकुल का ऐसा कोई नहीं हुआ जो शिष्य का संशय निवृत्त न करे | हे रामजी! मेरा शिष्य भी ऐसा कोई नहीं हुआ जो मेरे उपदेश से न जगा हो | इस
निमित्त मैं तप, ध्यान आदिक को भी त्याग कर तुझे जगाऊँगा-इससे मैं तुझको उपदेश करता हूँ | हे रामजी! शुद्ध आत्मा में जो अहंभाव हुआ है और जो कुछ अहंकार से भासता है सो मिथ्या है-इसमें कुछ सत् नहीं-और जो इसका साक्षीभूत ज्ञानरूप है वह सत्य है-उसका कदाचित नाश नहीं होता | जो जो वस्तु फुरने से उपजी हैं वे सब नाशवन्त हैं-यह बात बालक भी जानते हैं | जो सत्य है वह असत्य नहीं होता और जो वस्तु असत् है यह सत् नहीं होती | जैसे रेत से घृत निकलना असत् है अर्थात् कदाचित् नहीं निकलता जैसे एक मेढ़क के लाख कणका करिये अथवा शिला पर घिसिये पर जब उस पर वर्षा होती है तब सब कणके दर्दुर हो जाते हैं | इससे सत्य का कदाचित नाश नहीं होता और असत्य का सद्भाव कदाचित नहीं होता | हे रामजी! सत््ब्रह्म की भावना करो | जो ब्रह्म की भावना करता है वह ब्रह्म ही होता है | जैसे घृत में घृत, दूध में दूध और जल में जल मिल जाता है तैसे ही यह जीव भावना करके चिद्घन ब्रह्म के साथ एक हो जाता है और जीवसंज्ञा निवृत्त हो जाती है | जैसे अमृत के पान किये से अमर होता है तैसे ही ब्रह्म की भावना करने से ब्रह्म होता है | जो अनात्मा की भावना करता है तो पराधीन होकर दुःख पाता है जैसे विष के पान किये से अवश्य मरता है तैसे ही अनात्मा की भावना से अवश्य दुःख पाता है | और उसका नाश होता है | इससे आत्मभावना करो | हे रामजी! जो वस्तु संकल्प से उदय होती है वह थोड़े काल रहती है और जो चल वस्तु है वह भी अवश्य नाश होती है | यह दृश्य आत्मा में भ्रम से सिद्ध है | जैसे मृग तृष्णा का जल, सीपी में रूपा और आकाश मैं दूसरा चन्द्रमा भ्रम से सिद्ध है-वास्तव नहीं, तैसे ही अहंकार देह इन्द्रियों से सुख भासता है सो सब मिथ्या है | इससे दृश्य की भावना त्याग करके अपने अनुभवस्वरूप में स्थित हो | जब आत्मा में स्थित होगे तब मोह को न प्राप्त होगे | जैसे पारस के स्पर्श से सुवर्ण हुआ ताँबा फिर ताँबा नहीं होता, तैसे ही तू भी जब आत्मपद को जानेगा तब फिर इस मोह को न प्राप्त होगा कि मैं हूँ, यह मेरा `अहं' त्वंभाव तेरा निवृत्त हो जावेगा और यह भावना न रहेगी | रामजी ने पूछा हे भगवन्! मच्छर और जूँ आदिक जो प्रस्वेद से उत्पन्न होते हैं सो सब कर्म करके उत्पन्न होते हैं और देवता, मनुष्यादि सब कर्मों से उत्पन्न होते हैं अथवा कर्मों बिना भी कुछ होते हैं?
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! आदि परमात्मा से जो सब जीव उत्पन्न हुए हैं सो चार प्रकार के हैं | एक तो कर्मों से उत्पन्न हुए हैं और एक कर्मों बिना हुए हैं, एक आगे होंगे और एक अब भी उत्पन्न होते हैं | रामजी बोले, हे संशयरूपी हृदय अन्धकार के निवृत्त करनेवाले सूर्य और संदेहरूपी बादलों के निवृत्त करनेवाले पवन! कृपा करके कहिये कि कर्मों बिना कैसे उत्पन्न होते हैं और कर्मों से कैसे उत्पन्न होते हैं?
कैसे कैसे हुए हैं, कैसे होते हैं और कैसे आगे होंगे?
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! आत्मा चिदाकाश अपने आप में स्थित है | जैसे अग्नि अपनी उष्णता में स्थित है तैसे ही आत्मा अपने स्वभाव में स्थित है | वह अनन्त और अविनाशी है-उसमें फुरनशक्ति स्वाभाविक स्थित है जैसे पवन में स्पन्द शक्ति स्वाभाविक होती है और जैसे फूलों में सुगन्ध स्वाभाविक रहती है तैसे ही आत्मा में फुरनशक्ति है | हे रामजी! फुरनशक्ति जैसे ही आद्यफुरी है तो उस शब्द की अपेक्षा से आकाश हुआ और जब स्पर्श की अपेक्षा की तब पवन प्रकट हुआ | इसी प्रकार पञ्चतन्मात्रा हो आईं शुद्धसंवित् में जो आदि फुरना हुआ उससे प्रथम अन्तवाहक शरीर हुये , उनका निश्चय आत्मा में रहा कि हम आत्मा हैं और सम्पूर्ण विश्व हमारा संकल्प है | हे रामजी! कई इस प्रकार उत्पन्न होकर अन्तवाहक से फिर विदेह मुक्ति को प्राप्त हुये | जैसे जल से बरफ होकर सूर्य के तेज से शीघ्र ही फिर जल हो जाती है तैसे ही फिर वे शीघ्र ही विदेहमुक्त हुये | कई अन्तवाहक से आधिभौतिक इस प्रकार हो गये कि जबतक अन्तवाहक में स्मरण रहा तबतक अन्तवाहक रहे और जब स्वरूप का प्रमाद हुआ और संकल्प से जो भूत रचे थे उनमें दृढ़ निश्चय हुआ और जाना कि हम ये हैं तब आधिभौतिक हो गये जैसे ब्राह्मण शूद्रों के कर्म करने लगे- और उसके निश्चय में हो जावे कि मेरा यही कर्म है और जैसे शीत करके जल से बरफ हो जाती है तैसे ही संवित् में जब दृढ़ संकल्प हुआ तब उन्होंने आपको आधिभौतिक जाना हे रामजी! आदि परमात्मा से जो कर्म बिना उत्पन्न हुए हैं उनका कोई कर्म नहीं, क्योंकि जो अन्तवाहक में रहे उनकी ईश्वरसंज्ञा हुई | उनके संकल्प से जीव उपजे , उनका कारण ईश्वर हुआ और आगे जीवकलना से उनका फुरना कर्म हुआ | आगे जैसे जैसे कर्म संकल्प से करते हैं तैसे तैसे शरीर धारते हैं | हे रामजी! आत्मा से जो जीव उपजे हैं सो आदि-अकारण होते हैं, जो आज उपजे हैं तो भी और जो चिरकाल से उपजे हैं तो भी और जो चिरकाल से उपजे हैं तो भी | वे पीछे कारण भाव को कर्म के वश से प्राप्त हुए हैं | हे रामजी! जिनका आदि फुरना हुआ है और स्वरूप में दृढ़ निश्चय रहा है उनकी संज्ञा पुण्य है और जो स्वरूप को विस्मरण करके आधिभौतिक में निश्चय करते रहे उनकी धनसंज्ञा है | हे रामजी! पुण्य से धन होना सुगम है और धन से पुण्य होना कठिन है-कोई भाग्यवान् पुरुष ही यत्न करके धन से पुण्यवान् होता है | जैसे पर्वत से पत्थर गिरना सुगम है तैसे ही पुण्य से धन होना सुगम है और जैसे पत्थर को पर्वत पर चढ़ाना कठिन है तैसे ही धन से पुण्य होना कठिन है | कितने चिरकाल धन में बहते हैं और कितने यत्न करके शीघ्र ही पुण्यवान् होते हैं | हे रामजी! जो सदा अन्तवाहक रहते हैं उनकी संज्ञा ईश्वर है और अन्तवाहक को त्यागकर आधिभौतिक होते हैं वे जीव कहाते हैं और परतन्त्र हैं-जैसे कर्म करते हैं तैसे ही शरीर धारते हैं जो धन से पुण्य होते हैं वे ज्ञानवान् हैं और उनका फिर जन्म नहीं होता | अब भी जो प्रथम उत्पन्न होते हैं वे कर्म बिना होते हैं और जब अपने स्वरूप से गिरते हैं तब जैसा संकल्प करते हैं तैसे ही शरीर धारते हैं | हे रामजी! यह विश्व संकल्प मात्र है, इससे संकल्प का त्याग करो | इस दृश्य की आस्था न करो | हे रामजी! खाना, पीना इत्यादिक चेष्टा करो परन्तु उसमें अहंभाव न करो | अहंकार अज्ञान से सिद्ध हुआ है सो दृश्य मिथ्या है | अहंभाव के होने से दुःखी होता है इससे अहंकार से रहित चेष्टा करो | हे रामजी! बन्धन और मोक्ष का लक्षण सुनो | विषय और इन्द्रियों के संयोग से इष्ट में राग करना और अनिष्ट में द्वेष करना ही बन्ध है |जैसे जाल में पक्षी बन्धायमान होता है | ग्राह्य ग्राहक इन्द्रियाँ और विषय के सम्बन्ध से इष्ट अनिष्ट होता है | जिसमें इन्द्रियों का संयोग होता है उसमें समबुद्धि रहे, उनके धर्म अपने में न देखे और उनका जाननेवाला जो अनुभव रूप आत्मा है उसमें साक्षीरूप होकर स्थित रहे, इस प्रकार जो इनका ग्रहण करता है वह सदा मुक्तिरूप है और जो इससे भिन्न है वह मूर्ख जीव बन्धवान् है तुम इस ग्राह्य ग्राहक सम्बन्ध से सावधान रहो | इनका सम्बन्ध ही बन्धन है और इनसे रहित होना मुक्ति है | रागद्वेष करनेवाला मन है, इस मन का त्याग करो, मन ही दुःखदायी है | जैसे कुम्हार का चक्र फिरता है और उससे बासन उत्पन्न होते हैं तैसे ही मनरूप चक्र से पदार्थरूपी बासन उत्पन्न होते हैं | मन के फुरने से संसार सत्य होता है और जब फुरना निवृत्त होगा तब कोई दुःख न रहेगा | हे रामजी! जब फुरने और अफुरने में समान होगे तब राग-द्वेष से रहित होकर बिचरोगे | यह हो और यह न हो, इससे रहित होकर चेष्टा करो | अभिलाषपूर्वक संसार में न फुरो | हे रामजी! पूर्व जो ज्ञान वान् हुए हैं उनको भूत की चिन्तना न थी और आगे होने की आशा भी न थी | वर्तमान काल में शास्त्र के अनुसार रागद्वेष से रहित वे चेष्टा करते थे, इससे तू भी संकल्प का त्यागकर स्वरूप में स्थित हो | हे रामजी! ब्रह्मा से आदि तृणपर्यन्त किसी पदार्थ में राग हुआ तो बन्धन है | मेरा यही आशीर्वाद है कि ब्रह्मा से आदि तृण पर्यन्त किसी पदार्थ में तुम्हें रुचि न हो अपने आपही में रुचि हो | हे रामजी! यह संसार मिथ्या है और इसमें कोई पदार्थ सत् नहीं-सब मन के रचे हुए हैं, इससे मन को स्थित करो | जैसे धोबी साबुन से वस्त्र का मैल दूर करता है तैसे ही मन से मन को स्थिर करो | जब मन को स्वरूप में स्थिर करोगे तब मन अपने संकल्प को आप ही नाश करेगा | जैसे दुष्ट पुरुष की जब धन से वृद्धि होती है तब वह अपने भाई आदिक के नाश करने का उपाय करता है, तैसे ही मन जब आत्मपद में स्थित होता है तब अपने संकल्प को नष्ट करता है जब तुम्हारा मन स्वरूप में स्थित होगा तब तुम अमन होगे और तुम्हारे सब दुःख नष्ट हो जावेंगे | मन के नाश बिना सुख नहीं | हे रामजी! यह मन ऐसा दुष्ट है कि जिससे उपजता है उसी के नाश का निमित्त होता है जैसे बाँस से अग्नि उपजकर उसी को जलाती है, तैसे ही आत्मा से उपजकर यह मन आत्मा ही को तुच्छ करता है | जैसे राजा का नौकर राजा की सत्ता पाकर राजा को ही मारकर आप राजा होता है, तैसे ही मन आत्मा की सत्ता पाकर और उसको ढ़ाँपकर आपही कर्ता भोक्ता हो बैठा है | इससे मन को मन ही से नाश करो | जैसे लोहा तपाकर लोहे को काटता है तैसे ही मन ही को शुद्ध करो | हे रामजी! वृक्ष, बेलि, फल, फूल, पशु, पक्षी, देवता, यज्ञ, नाग जो कुछ स्था वर-जंगम पदार्थ हैं वे प्रथम कर्मों के बिना उत्पन्न हुए हैं और पीछे जब स्वरूप से गिरते हैं और घन पद को प्राप्त होते हैं तब कर्मों से शरीर होते हैं | कर्मों का बीज अहंकार है और अहंकार में शरीर है | जैसे बीज से वृक्ष होता है और समय पाकर फूल, फल प्रकट होते हैं, तैसे ही अहंकार से शरीर प्रकट होते हैं और जब अहंकार नष्ट हुआ तब कोई शरीर नहीं-केवल आत्मपद है | अहंकार है नहीं और प्रत्यक्ष दिखाई देता है और आत्मपद अच्युत है पर गिरे की नाई भासता है, निरावलम्ब है और अवलम्ब की नाई दृष्टि आता है, निराकार है पर आकार सहित भासता है, निराभास है और आभाससहित दिखाई देता है | इससे केवल चिन्मात्र आत्मा में स्थित हो | यह सब चिन्मात्र ही रूप है | हे रामजी! जब ऐसी भावना होती है तब चित् अचित्त हो जाता है और जब चित् अचित् हुआ तब जगत्कलना मिट जाती है केवल आत्मतत्व ही भासता है |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे कर्मविचारो नाम चतुरधिकशततमस्सर्गः ||104||
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इस जीव के तीन स्वरूप हैं-एक स्वरूप तो शुद्धात्मा चिदा नन्द ब्रह्म है जिससे सब प्रकाशते हैं, दूसरा अन्तवाहक पुण्यनाम है जो आत्मा के प्रमाद से हुआ है | जो मात्र पद से उत्थान हुआ है तो भी प्रमादी नहीं, क्योंकि आत्मा का स्मरण रहा है | और
जब आत्मपद को भूला तब तीसरा आधिभौतिक हुआ और पञ्चतत्वों को अपना आप जानने लगा है | हे रामजी! ये तीन स्वरूप जीव के हैं | आत्मा के प्रमाद से जीवसंज्ञा पाता है और दुःखी और परतन्त्र होता है | इससे पञ्चभौतिक और अन्तवाहक को त्यागकर वास्तव- -स्वरूप में स्थित हो | हे रामजी! ये जो स्थूल और सूक्ष्म शरीर हैं सो विचार से नष्ट हो जाते हैं पर तीसरा जो स्वरूप है वह सत्य है | तू उसी में स्थित हो | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! ये तीन रूप जो तुमने जीव के कहे उनके मध्य में नाशरूप कौन है और सत््रूप कौन हैं?
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! हाथ पाँव संयुक्त जो देह है और भोग से मिली हुई है और यह जीव अपने ही संकल्प से सदा फैलाव रचता है | चित्तरूपी देह इस फुरनेरूप से अन्तवाहक है वह सदा प्राणवायु के रथ पर स्थित रहता है-देह हो चाहे न हो हे रामजी! ये दोनों शरीर उपजते और नष्ट भी होते हैं और आदिअन्त से रहित चिन्मात्र जो निर्विकल्प है उसे जीव का परमरूप जानो जो तुरीयापद है उसी से जाग्रदादिक उपजे हैं और उसी में लीन होते हैं | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! मैं तीन को जानता हूँ-एक जाग्रत है जो निद्रा से रहित है और जिसमें इन्द्रियाँ और चार अन्तःकरण अपने-अपने विषयको ग्रहण करते हैं, दूसरा स्वप्न है वहाँ भी इन्द्रियाँ विषय की जाग्रत् की नाईं संकल्प से ग्रहण करती हैं और तीसरे में इन्द्रियाँ अपने विषय से रहित होती हैं और जड़ता आती है, तब कुछ नहीं भासता शिला की नाईं जड़ता तमोगुण आत्मक है- सो सुषुप्ति है | इन तीनों को तो मैं जानता हूँ पर तुरीया और तुरीयातीत को कृपा करके कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! अपना होना और न होना दोनों को त्यागकर पीछे केवल तुरीयापद रहता है सो शान्त और निर्मलपद है | हे रामजी! तुरीया जाग्रत नहीं क्योंकि जाग्रत संकल्प जाल है और उससे मनरूप इन्द्रियों में रागद्वेष होता है | तुरीया स्वप्न अवस्था भी नहीं क्योंकि स्वप्न भ्रमरूप होता है- जैसे रस्सी में सर्प भासता है सो और का और होता है और तुरीया सुषुप्ति भी नहीं, क्योंकि उसमें अत्यन्त जड़ता है तुरिया चेतनरूप, उदासीन और शुद्ध है और जाग्रत स्वप्न और सुषुप्ति से रहित हैं | जीवन्मुक्त तुरीयापद में स्थित रहता है | हे रामजी! जो तुरीयापद में स्थित है वह जगत् में स्थित हुआ भी शान्त है और अज्ञानी को जगत् वज्रसारवत् दृढ़ है | ज्ञानी सदा शान्तरूप है, क्योंकि वह तीनों अवस्थाओं का साक्षी है, उसको न उनमें राग है न द्वेष है उदासीन की नाई है तुरीयातीतपद को वाणी की गम नहीं | जीवन्मुक्त पुरुष जब विदेहमुक्त होता है तब इसी पद को प्राप्त होता है जहाँ वाणी की भी गम नहीं | जबतक जीवन्मुक्त है तबतक तुरीयापद में स्थित रह राग द्वेष से रहित होता है और इन्द्रियाँ भी अपने विषय में राग द्वेष से रहित होकर स्वाभाविक बर्तती हैं | जिस पुरुष को राग द्वेष उत्पन्न होता है वह तुरीयापद को नहीं प्राप्त हुआ और चित्त सहित है और जिस पुरुष को राग द्वेष नहीं उत्पन्न होता उसका चित्त सत््पद को प्राप्त हुआ है | जिसका सत््पद को प्राप्त हुआ उसको संसार की सत्यता नहीं भासती, वह स्वप्नवत् जगत् को देखता है | इससे तू भी सत््पद में स्थित होकर साक्षीरूप हो रह |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे तुरीयापदविचारो नाम पञ्चाधिकशततमस्सर्गः ||105||
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! कर्ता, कारण और कर्म ये तीनों हों पर तू इनका साक्षी हो इनका कर्तृत्व अभिमान तुझे न हो कि मैं यह करता हूँ अथवा त्याग किया है, उदासीन की नाईं हो रहे | इसी पर एक आख्यान कहता हूँ उसे सुनो | तुम प्रबुद्ध हो तो भी दृढ़ बोध के निमित्त सुनो! हे रामजी! एक वन में काष्ठमौन-नामक एक मुनि रहता था एक दिन एक बधिक किसी मृग पर बाण चलाता हुआ उसके पीछे दौड़ता जाता था वह आगे गया तो मृग बधिक की दृष्टि से अगोचर हो गया | बधिक ने देखा कि एक तपस्वी बैठा है, उससे पूछा, हे मुनीश्वर! यह एक मृग आया था सो किस ओर को गया तुमने देखा हो तो मुझसे कहो काष्ठमौन बोले, हे बधिक! हमको कुछ सुधि नहीं, क्योंकि हम निरहंकार है, हमारे साथ चित्त और अहंकार दोनों नहीं | जो तुम कहो कि इन्द्रियों की चेष्टा कैसे होती है तो सूर्य के आश्रय लोगों की चेष्टा होती है और दीपक के आश्रय चेष्टा होती है और सूर्य दीपक साक्षी हैं तैसे ही हम इन्द्रियों के साक्षी हैं और इनकी चेष्टा स्वाभाविक होती है | हमको इनसे कुछ प्रयोजन नहीं | हे बधिक! अहंकार करनेवाला अहंकार है जैसे माला के भिन्न भिन्न दाने तागे के आश्रय होते हैं और सबमें एक तागा होता है तब माला होती है पर जब तागा टूट पड़ता है तब दाने भिन्न भिन्न हो जाते हैं, तैसे ही इन्द्रियाँरूपी दाने हैं और अहंकाररूपी तागा है, उस अहंकाररूपी तागे के टूटने से इन्द्रियाँ भिन्न भिन्न हो जाती हैं जैसे राजा के नाश हुए सेना और गोपाल के नष्ट हुए गौवें भिन्न भिन्न हो जाती है और पिता के नष्ट हुए बालक व्याकुल होते हैं तैसे ही अहंकार बिना इन्द्रियाँ व्याकुल होती हैं | उनका अभिमान मुझमें कुछ नहीं | इनका अभिमानी अहंकार था सो मेरा नष्ट हो गया है | इन्द्रियाँ अपने अपने विषय में बिचरती हैं मुझको इनका न राग है और न द्वेष है | हे साधो! मुझे न जाग्रत है और न स्वप्न, न सुषुप्ति भासती है, इन तीनों से रहित हम तुरीयापद में स्थित हैं और हमारा अहं त्वं मिट गया है | हम नहीं जानते कि मृग बायें गया या दाहिने, क्योंकि नेत्र इन्द्रियाँ देखनेवाली हैं उनको बोलने की शक्ति नहीं | ये अपने अपने विषय को ग्रहण करती हैं, एक इन्द्रिय को दूसरे की शक्ति नहीं फिर तुझसे कौन कहे? इन सबका धारनेवाला अहंकार था जो सबको अपना आप जानता था | जैसे शरत््काल में मेघ नष्ट होते हैं तैसे ही अहंकार के नष्ट होने से हम स्वच्छ, निर्मलशान्त तुरीयापद में स्थित हैं | इन्द्रियों का बीज अहंकार मृतक हो गया है और इन्द्रियाँ भी मृतक हो गई हैं देखनेमात्र दृष्टि आती हैं | जैसे भीत पर पुतलियाँ लिखी हों पर उनसे कार्य कुछ न हो तैसे ही हमारी इन्द्रियों से कुछ कार्य नहीं होता तो तुझसे कौन कहे | वशिष्ठजी बोले हे रामचन्द्र! जब इस प्रकार मुनीश्वर ने कहा तब बधिक समझकर उठ गया | हे रामजी! तुरीयापद शान्तरूप है जहाँ जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों का अभाव है वह केवल अद्वैतपद है | ये जो ब्रह्म, आत्मा चिदानन्द आदि संज्ञा हैं तो तुरीयापद में हैं और तुरीयातीतपद में शब्द की गम नहीं वह अशब्दपद है | विदेहमुक्त पुरुष उसी पद को प्राप्त होते हैं और जीवन्मुक्त साक्षात् करके तुरीयाव स्था में बिचरते हैं, जहाँ जाग्रत जो दीर्घ दुःख सुख का भान है सो नहीं और स्वप्न जो राग द्वेष के लिये अल्पकाल है सो भी नहीं और जड़ता तामस अवस्था भी नहीं इन तीनों से रहित तुरीयापद है और शान्त है उसमें कोई क्षोभ नहीं | यह जगत् उसका आभास है | जैसे समुद्र में तरंग वास्तव में कुछ नहीं-जल ही है, तैसे ही केवल तुरीया स्वरूप सत्तासमान तेरा स्वरूप है उसमें स्थित हो उसमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र सिद्ध, ज्ञानी इत्यादिक स्थित हैं और काष्ठ मौन बधिक का उपदेश करनेवाला भी तुरीयापद में स्थित है | उसकी विशेषकलना जो भिन्न भिन्न नामरूप को देखनेवाली थी निवृत्त हुई थीं, केवल सत्तासमान में स्थित था | इससे कलना को त्यागकर तुम भी तुरीयापद में स्थित हो रहो |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे काष्ठमौनवृत्तान्तवर्णनं नाम षडधिकशततमस्सर्गः ||106||
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! यह विश्व केवल आकाशरूप है पर आत्मा से भिन्न नहीं, आत्मा का ही चमत्कार है | जैसे मेघ में बिजली का चमत्कार होता है तैसे यह विश्वरूप चित्त कला आत्मा का चमत्कार है | हे रामजी! वास्तव में ब्रह्म ही है कुछ भिन्न नहीं | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! यह विश्व आपने ब्रह्मरूप कहा कि मेघ में बिजली की नाईं क्षण में उपजता और क्षण में लीन होता है, पर मेघ में बिजली दृष्टि आती है | जहाँ मेघ होता है वहाँ बिजली भी होती है इससे मेघ से बिजली उत्पन्न हुई तो उसका कारण मेघ है | हे मुनीश्वर! इस चित्तस्पन्द कला के कारण की उत्पत्ति ब्रह्म से कैसे हुई है सो कृपा करके मुझसे समझाकर कहिये?
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! यह जो वितण्डक होकर तुम तर्क करते हो सो कुछ नहीं-इस नाशबुद्धि को त्यागो | यह तो बालक भी जानते हैं कि बिजली क्षणभंगुररूप है सत्य नहीं | तुम्हारा और क्या प्रयोजन है सो कहो | यह तर्क कारण कार्यरूप का कैसा करते हो? रामजी बोले, हे भगवन्! यह स्पन्दकला सत्य है वा असत्य है | इसका कारण कौन है जिससे वह फुरती है | वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! सर्व प्रकार से सर्वात्मा ही स्थित है | चित्त और चित्तस्पन्द यह भेदकल्पना वास्तव में कुछ नहीं , ब्रह्म ही अपने स्वरूप में आप स्थित है और सब भ्रम से भासते हैं | जैसे भ्रमदृष्टि से आकाश में मोती भासते हैं और नेत्र मूँदकर खोलो तो तरुवरे भासते हैं, तैसे ही यह जगत् भ्रम से भासता है | हे रामजी! हम इस संसार समुद्र के पार हुए हैं | हम सरीखे ज्ञानवानों के यथार्थ वचन सुनकर हृदय में धारो तो शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति हो और जो मूर्खता करके मेरे वचनों को न धारोगे तो तुम्हारे दुःख नष्ट न होंगे और वृक्ष तृण, बेल आदिक योनि पावोगे | हे रामजी! आकाश और काल आदिक पदार्थ सर्वकलना से सिद्ध हुए हैं-आत्मा में कोई नहीं | हे रामजी! वायु से रहित जो समुद्र का चमत्कार है उसका कारण कौन है?
दीपक में जो प्रकाश और अग्नि में उष्णता है तो उस प्रकाश और उष्णता का कारण कौन है?
वायु के निस्पन्द और स्पन्द का कारण कौन है?
जैसे इनका कारण कोई नहीं, वायु का रूप स्पन्द निस्पन्द है, अग्नि का रूप उष्णता है और दीपक का रूप प्रकाश है तैसे ही कलना भी आत्मस्वरूप है-कुछ भिन्न नहीं | हे रामजी! यह कलना जो तुझको भासती है उसको त्याग करो | जब अपने आपको देखोगे तब संशय मिट जावेंगे | जैसे जब प्रलयकाल का जल चढ़ता है तब सर्व जलमय हो जाता है-कुछ भिन्न नहीं होता, तैसे ही अपने स्वरूप को जब तुम देखोगे तब तुमको सब आत्मा ही भासेगा-आत्मा से भिन्न कुछ न दृष्ट आवेगा | हे रामजी! आत्मा एक रस है, सम्यक््दर्शन से ज्यों का त्यों भासेगा और असम्यक् दर्शन से और का और भासेगा | जैसे रस्सी को यथार्थ न देखिये तो सर्पभ्रम होता है और भयवान् होता है और जब ज्यों की त्यों रस्सी जानी तब सर्पभ्रम निवृत्त हो जाता है तैसे ही आत्मा के न जाने से जीव संसारी होता है, भयभीत होता है, आपको जन्मता मरता मानता है और सर्वविकार देह के आत्मा में जानता है पर आत्मा को जानता है तब सब भ्रम निवृत्त हो जाते हैं | जैसे नेत्रों से तारे दीखते हैं और जब नेत्र मूँद लो तो उनका आकार अन्तः करण में भासता है, क्योंकि उनकी सत्यता हृदय में होती है-पर जब हृदय से उनकी सत्यता उठ जाती है तब फिर नहीं भासते, तैसे ही चित्त के भ्रम से संसार हुआ है उसको मिथ्या जानो | हे रामजी! फुरने में जो दृढ़भावना हुई है जो ही सत्य होकर मिथ्या संसार हुआ है, जब चित्त का त्याग करोगे तब संसार की सत्यता जाती रहेगी | रामजी बोले हे भगवन् आपने जो कहा कि यह विश्व कल्पनामात्र है सो मैंने जाना कि इसी प्रकार-कुछ सत्य नहीं जैसे राजा लवण, इन्द्र ब्राह्मण के पुत्र और शुक्र की कलना जब फुरने से दृढ़ हुई तब उन्हें फुरनरूप विश्व सत्य होकर स्थित हुआ और भासने लगा | हे भगवन्! यह मैं जानता हूँ कि विश्व फुरनेमात्र है पर जब फुरना मिट जाता है तो उसके पीछे जो शान्ति रूप शेष रहता है सो कहो?
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! अब तुम सम्यक् बोधवान् हुए हो और जो जानने योग्य है वह तुमने जाना है | हे रामजी! अध्यात्म शास्त्र का यह सिद्धान्त है कि और सब दृश्य असंभव है एक चिद्घन ब्रह्म अपने आपमें स्थित है | हे रामजी! आत्मा शुद्ध, निर्मल और विद्या, अविद्या से रहित हैं और संसार का उसमें अत्यन्त अभाव है जो कुछ शब्द आदिक संज्ञा हैं वे भी फुरने में हैं आत्मा तो निर्वाच्यपद है उसकी समझा इतनी शास्त्रकारों ने कही हैं | शून्यवादी तो उसी को शून्य कहते हैं, विज्ञानवादी विज्ञानरूप कहते हैं, उपासनेवाले उसी को ईश्वर कहते हैं, कोई कहते हैं आत्मा सर्व का कारण है वही शेष रहता है, कोई आत्मा को सर्व शक्त कहते हैं कोई कहते हैं कि आत्मा निःशक्त है और कोई साक्षी आत्मा और शक्ति को भिन्न मानते हैं | हे रामजी! जितने वाद हैं सो सर्व ही कलना से हुए हैं और कलना को मानकर सब वाद उठाते है, वास्तव में कोई वाद नहीं आत्मा निर्वाच्यपद है | मेरा जो सिद्धान्त है वह भी सुनो | आत्मा सर्वकलना से अतीत है | जैसे पवन स्पन्द शक्ति से फुरता है और निस्पन्द से ठहर जाता है, क्योंकि स्पन्द भी पवन है और निस्पन्द भी पवन है इतर कुछ नहीं, तैसे ही आत्मा शुद्ध अद्वैतरूप है और कलना भी आत्मा के आश्रय फुरती है आत्मा से भिन्न नहीं | और जो भिन्न प्रतीत होती है उसको मिथ्या जानकर और अपने निर्विकार स्वरूप में स्थित रहो | जब तुम आत्मस्वरूप में स्थित होगे तब जितने शास्त्रों के भिन्न भिन्न मतवाद हैं सो कोई न रहेंगे केवल अपना आप स्वच्छ आत्मा ही भासेगा | हे रामजी! उस निर्विकल्पपद को पाकर तुम शान्तिमान् हुए हो और असत् की नाईं स्थित हुए हो, क्योंकि द्वैतकलना नहीं फुरती | हे रामजी! आत्मा, ब्रह्मआदिक शब्द भी उपदेश निमित्त कहे हैं पर आत्मा शब्द से अतीत हैं और सर्व जगत् आत्मस्वरूप है और संसाररूप विकार आत्मा में असम्यक् दर्शन से भासते हैं जैसे शून्य आकाश में तरुवरे मोतीवत् भासते हैं सो अविदित हैं तैसे ही आत्मा में जगत् द्वैत अविदित भासता है | इससे जगत् द्वैत की वासना त्यागकर निर्विकल्प आत्मस्वरूप में स्थित रहो |
इति श्रीयोगवाशिष्ठेनिर्वाणप्रकरणे अविद्यानाशरूपवर्णनंनाम सप्ताधिकशततमस्सर्गः ||107||
रामजी ने पूछा, हे भगवन्! देह, इन्द्रियाँ और कलना में सार वस्तु क्या है?
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो कुछ यह अहं त्वं आदि जगत् दृश्य है सो सब चिन्मात्र है | जैसे समुद्र जल ही मात्र है तैसे ही जगत् है | मनसहित षट् इन्द्रियों से जो कुछ दृश्य भासता है सो भ्रममात्र है | हे रामजी! देह, इन्द्रियाँ आदि सब मिथ्या हैं, आत्मा में कोई नहीं चित्त के कल्पे हुए हैं और चित्त ही इनको देखता है | जैसे मरुस्थल में मृग को जलबुद्धि होती है तो जल के निमित्त दौड़कर दुःख पाता है, तैसे ही चित्तरूपी मृग आत्मरूपी मरुस्थल में देह इन्द्रियाँ विषयरूपी जल कल्पकर दौड़ता है और दुःख पाता है सो देह इन्द्रियाँ भ्रम करके भासते हैं | जैसे मूर्ख बालक परछाहीं में वैताल कल्पता है तैसे ही मूर्ख चित्त ने देह इन्द्रियादिक कल्पना की हैं | हे रामजी! आत्मा शुद्ध निर्विकार है उसमें चित्त ने भ्रम से विकार आरोपण किये हैं | जैसे भ्रान्ति दृष्टि से आकाश में दो चन्द्रमा भासते हैं , तैसे ही चित्त ने देह इन्द्रियाँ कल्पी हैं पर चित्त भी कुछ सत्य नहीं, आत्मा की सत्ता लेकर चेष्टा करता है | जैसे चुम्बक की सत्ता लेकर लोहा चेष्टा करता है तैसे ही निर्विकार आत्मा की सत्ता लेकर चित्त नाना प्रकारके विकार कल्पता है | इससे चित्त का त्याग करो जिससे तुम्हारा विकारजाल मिट जावे | हे रामजी देह इन्द्रियों में सार क्या है सो सुनो | कुछ संसार है उसका सार देह है, क्योंकि सब देह के सम्बन्धी है | जब देह मिट जाता है तब सम्बन्धी भी नहीं रहते | देह का सार इन्द्रियाँ हैं, इन्द्रियों का सार प्राण हैं, प्राणों का सार मन है और मन का सार वृद्धि है | बुद्धि का सार अहंकार है, अहंकार का सार जीव है, जीव का सार चिदावली है-चिदावली वासना संयुक्त चेतना को कहते हैं-और चिदावली का सार चित्त से रहित शुद्ध चैतन्य है जिसमें सर्व विकल्प की लय है और जो शुद्ध निर्मल और चिन्मात्र ब्रह्म आत्मा है उसमें कोई उत्थान नहीं | हे रामजी! चिदावली पर्यन्त सबको त्यागकर इनका जो सार चैतन्य आत्मा है उसमें स्थित हो | विश्व कलना-मात्र है, आत्मा में कुछ नहीं, संकल्प की दृढ़ता से सत् की नाईं भासता है | पहिले भी शुक्र और लवण राजा और इन्द्र के पुत्रों का वृत्तान्त कहा है कि संकल्प से उन्हें जगत् दृढ़ होकर भासि आया था सो वास्तव में कुछ नहीं था, तैसे ही यह विश्व भी चित्त के फुरने में स्थित हैं | असम्यक््दृष्टि से अद्वैत आत्मा में दृश्य भासता है | जैसे सूर्य की किरणों में जल भासता है तैसे ही आत्मा में अहंकार आदिक अज्ञान से दृश्य भासते हैं | इससे इनको त्यागकर अपने वास्तव स्वरूप में स्थित हो | हे रामजी! एक गढ़ तुमसे कहता हूँ जिसमें किसी शत्रु की गम नहीं उसमें स्थित हो | हम भी उसी गढ़ में स्थित हैं और जितने ज्ञानवान् हैं वे भी उसी में स्थित होते हैं | हे रामजी! काम, क्रोध, लोभ, अभिमानादिक विकार आत्मा में पाये जाते हैं | जैसे रात्रि में दिन नहीं होता, तैसे ही विकार रूपी दिन गढ़ रूपी रात्रि में नहीं पाया जाता इससे अचिन्त्यरूप गढ़ में जहाँ कोई फुरना नहीं और जो केवल शान्तरूप है उसमें अहंभाव त्यागकर स्थित हो तो अहं त्वं भाव निवृत्त हो जावे | जब स्वरूप का साक्षात्कार होता है तब ज्ञानी फुरने अफुरने में स्वरूप को तुल्य देखता है और सम्पूर्ण जगत् उसको आत्मरूप भासता है | इससे चिदावली से आदि देह पर्यन्त जो अनात्म है उसको क्रम करके त्यागो | प्रथम देह को त्यागो , फिर इन्द्रियों के अभिमान को त्यागो, इसी क्रम से सबको त्याग के अपने वास्तवस्वरूप में स्थित हो |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवत्वाभावप्रतिपादनं नामाष्टाधिकशततमस्सर्गः ||108||
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! यह संसार चेतनमात्र है | आत्मा से कुछ भिन्न नहीं, आत्मा ही विश्वरूप होकर स्थित हुआ है | जैसे सूर्यकी किरणें ही जलाभास होती हैं तैसे ही आत्मा का चमत्कार दृश्यरूप होकर स्थित हुआ है | जैसे संकल्प और संकल्प-कर्त्ता भिन्न नहीं और आकाश ही भ्रम से मोती की माला होकर भासता है, तैसे ही आत्मा ही दृश्यरूप होकर भासता है | जैसे बीज ही वृक्ष फूल और फल होता है तैसे ही विश्व आत्मा ही है और दृश्यरूप होकर स्थित हुआ है | जैसे जल के तरंग जल ही हैं तैसे ही विश्व आत्मा ही है | हे रामझी! चिदावली भी जीव, अहंकार, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियाँ, देह, विश्व, आकाश, काल, दिशा, पदार्थ, सब आत्मा से कुछ भिन्न नहीं | इससे विश्व को अपना स्वरूप जानो | जैसे सूर्य का प्रकाश सूर्य ही है तैसे ही तुम जानो कि सर्व मैं ही हूँ | जो ऐसे न जान सको तो ऐसे जानो कि देह भी जड़ है और इन्द्रियों से पालित है, सो मैं नहीं | इन्द्रियाँ भी नहीं, क्योंकि प्राण इन्द्रियों का सार है जो प्राण न हो तो इन्द्रियाँ किसी काम की नहीं | प्राण भी नहीं , क्योंकि प्राण का सार मन है जो मन मूर्छित होता है और प्राण आते जाते भी हैं तो भी किसी काम के नहीं मन भी मैं नहीं क्योंकि मन के प्रेरनेवाली बुद्धि है, जो निश्चय बुद्धि करती है मन भी वहीं जाता है | बुद्धि भी मैं नहीं, क्योंकि बुद्धि का प्रेरक अहंकार है और अहं कार भी मैं नहीं, क्योंकि अहंकार का सार जीव है, जीव बिना अहंकार किसी काम का नहीं | जीव मैं नहीं, क्योंकि जीव का सार चिदावली है | चिदावली शुद्ध चिद्में चैतन्योन्मुख होने को कहते हैं | जीवसंज्ञा से प्रथम ईश्वर भाव चिदावली भी मैं नहीं, क्योंकि चिदावली का सार चिन्मात्र है सो अद्वितीय निर्विकल्प स्वरूप है | ये सब अनात्मभ्रम से सिद्ध हुए हैं, मैं केवल शान्तरूप आत्मा हूँ | हे रामजी! जो तुम्हारा वास्तवरूप है वही हो रहो उससे भिन्न अनात्म में अहं प्रतीत को त्याग दो, तुम देह से रहित निर्विकार हो तुममें जन्म मरणादिक कोई विकार नहीं और शान्तरूप ज्यों के त्यों स्थित हो | तुम कदाचित् स्वरूप से और नहीं हुए-उसी स्वरूप में स्थित रहो |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सारप्रबोधनं नाम नवाधिशततमस्सर्गः ||109||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! आत्मा चिन्मात्र से
बढ़के और
सार कुछ नहीं
उसी में स्थित
रहो जिससे सब
ताप मिटि जावें | हे
रामजी! सर्व आत्मा ही
स्थित है
| जैसे बीज ही फल फूल होकर
स्थित होता है
तैसे ही
सर्व आत्मा ही
स्थित है
तो निषेध और
त्याग किसका करिये |इतना कह
वाल्मीकिजी बोले, हे
शिष्य! ऐसे वशिष्ठजी के
वचन सुनकेरामजी प्रसन्न हुए और जैसे कमल सूर्य
को देखकर खिल आता है तैसे ही
रामजी की
बुद्धि वशिष्ठजी के
वचनरूपी सूर्य से
खिल आई
| तब बोले, हे
भगवन् सर्वधर्मज्ञ! आपकी कृपा से
अब मैं जगा | बड़ा आश्चर्य है
कि मैंने इतने काल दुःख
पाया | अहंता और
ममतारूपी बड़ा बोझा जो
सिर पर
था उससे मैं दुःखी
था | जैसे किसी के
सिर पर
पत्थर की
शिला हो
और ज्येष्ठ आषाढ़ की
धूप में वह पैदल चले तो दुःख पाता है
और जो
उसके सिर से कोई उस
शिला को
उतार ले
और छाया में बैठावे तो बड़े सुख को प्राप्त होता है,
तैसे ही
अज्ञानरूपी धूप में अहंताममतारूपी शिला से
मैं दुःखी था
और आपने वचनरूपी बल
से उस
शिला को
उतार लिया और
आत्मारूपी वृक्ष की
छाया में विश्राम कराया | हे
भगवन्! अब
मुझे शान्तिपद प्राप्त हुआ है और मेरे तीनों ताप मिट गये हैं | अब जो सुमेरु पर्वत का
भार भी
आन प्राप्त हो
तो भी
मुझे कोई कष्ट
नहीं | अब
मेरे सर्व संशय निवृत्त हुये हैं | जैसे शरत््काल का
आकाश निर्मल और
स्वच्छरूप होता है,
तैसे रागद्वेषरूपी द्वन्द्व मेरा नष्ट हुआ है | अब मैं अपने
स्वभाव में स्थित
हुआ हूँ परन्तु एक प्रश्न है
कृपा करके उसका उत्तर कहिये | महापुरुष बारम्बार प्रश्न करने से
खेद नहीं मानते| हे
भगवन्! आप
कहते हैं कि सर्वब्रह्म ही
है तो
शास्त्र का
विधि निषेध और
उपदेश किसके लिये कहते हैं कि यह कर्म कर्तव्य है
और यह
कर्म कर्तव्य नहीं | वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी आत्मा से
कुछ भिन्न नहीं | विश्व भी
उसका चमत्कार है
| जैसे समुद्र में पवन से नाना प्रकार के
तरंग फुरते हैं पर जल से
कुछ भिन्न नहीं, तैसे ही
चैतन्य आत्मा में चैतन्योन्मुखत्व अहंभाव को
लेकर फुरा है
उससे देश, काल, वस्तु बन
गये हैं और शास्त्र फुरे हैं फिर फुरने से
दो रूप हुए हैं एक
विद्या और
दूसरा अविद्या | उसमें विद्यारूप जो
जीव हुए हैं वे ईश्वर कहाते है
और अविद्यारूप जीव हैं | जिनको अपने स्वरूप में अहं प्रत्यय वास्तव की
रही है
सो इश्वर है
और जिनको स्वरूप का
प्रमाद हुआ और संकल्प विकल्प में बहते
हैं वे
जीव दुःखी हैं | हे रामजी! इतनी संज्ञा फुरने में हुई है तो
भी आत्मा से
कुछ भिन्न नहीं | जैसे एक
ही रस
फूल, फल
और वृक्ष हुआ है रस से
कुछ भिन्न नहीं | आत्मा रस
की नाईं भी
परिणाम को
नहीं प्राप्त हुआ, फुरने
से ईश्वर जीव विद्या अविद्या हुए हैं-आत्मा में कुछ नहीं | हे
रामजी! जिनका संकल्प आधिभौतिक में दृढ़
नहीं हुआ वे जीव शीघ्र ही
आत्मपद को
प्राप्त होते हैं और उनको आत्मा का
साक्षात्कार शीघ्र ही
होता है
| जिनका संस्कार आधिभौतिक में दृढ़
हुआ है
वे चिरकाल में आत्मपद को प्राप्त होते हैं | आत्मपद की प्राप्ति बिना वे
दुःख पाते हैं और जिनको आत्मपद की
प्राप्ति होती है
वे सुखी होते हैं | हे रामजी! ज्ञानी और
अज्ञानी के
स्वरूप में और कुछ भेद नहीं
केवल सम्यक् और
असम्यक् दर्शन का
भेद है
| हे रामजी! विद्या भी
दो प्रकार की
है-एक
ईश्वरवाद और
दूसरा अनीश्वरवाद है
| जो ईश्वरवादी हैं वे तुरीयापद को
प्राप्त होते हैं और जो अनीश्वरवादी हैं उनको
जब ईश्वर की
भावना होती है
तब वे
शास्त्र और
गुरुद्वारा ईश्वर को
प्राप्त होते हैं ईश्वरवादी भी
दो प्रकार के
हैं-एक
वे जो
और वासना त्यागकर ईश्वरपरायण होते हैं- वे शीघ्र ही ईश्वर को प्राप्त होते हैं | आत्मा ही ईश्वर है जो सबका अपना आप है | दूसरे ईश्वर को मानते हैं पर उनकी वासना संसार की ओर होती है वे चिरकाल में आत्मपद को प्राप्त होते हैं | अनीश्वरवादी दो प्रकार के हैं-एक कहते हैं कि कुछ होगा उनको होते होते की भावना से शास्त्र और गुरु के द्वारा आत्मपद की प्राप्ति होगी | दूसरे कहते हैं कि कुछ नहीं, उनको चिरकाल में जब आस्तिक भावना होगी तब आत्मपद को प्राप्त होंगे | हे रामजी! उनके निमित्त विधि और निषेध कहे हैं कि शुभकर्म को अंगीकार करो और अशुभकर्म त्यागो तो उससे जब अन्तःकरण शुद्ध होगा तब आत्मपद की प्राप्ति होगी | जो विधि निषेध शास्त्र न कहे तो बड़ा छोटे को भोजन कर लेवे इस निमित्त शास्त्र का दण्ड है | हे रामजी! स्वरूप में किसी को उपदेश नहीं उम्र में उपदेश है | जिस पुरुष का भ्रम निवृत्त हुआ है वह मोह में नहीं डूबता-जैसे जल में डूबा नहीं डूबता | और जिसका चित्त वासना से घेरा हुआ संसरता है उसका इस संसार से निकलना कठिन है | जैसे उजाड़ के कुयें में गिर के निकलना कठिन होता है तैसे ही चित्त से मिलकर संसार से निकलना कठिन होता है | हे रामजी! इस चित्त को स्थिर करो कि तुम्हारे दुःख मिट जावें और सत्तासमान पद को प्राप्त हो | हे रामजी! जिसको आत्मा का साक्षात्कार हुआ है और अनात्म में अहं प्रत्यय निवृत्त हुआ है वह पुरुष जो कुछ करता है उसमें बन्धायमान नहीं होता वह सदा अकर्ता आपको देखता है और जिसको अहंप्रत्यय अनात्म में है वह पुरुष करे तो भी कर्ता है और जो न करे तो भी कर्ता है | हे रामजी! जो अज्ञानी शुभकर्म करता है तो शुभकर्म करता हुआ स्वर्ग को प्राप्त होता है और अशुभ कर्म करने से नरक को प्राप्त होता है | जो शुभकर्म को त्यागता है तो भी नरक को प्राप्त होता है, क्योंकि अनात्म में आत्म अभिमान है | इससे बुद्धि को निग्रह करो और इन्द्रियों से चेष्टा करो | देखने, सुनने, सूँघने को मैं तुम्हें नहीं बर्जता, यही कहता हूँ कि अनात्म में अभिमान को त्यागो | जब अनात्म अभिमान को त्यागोगे तब शान्तपद को प्राप्त होगे- और जहाँ तुम्हारा चित्त फुरेगा वहाँ आत्मा ही भासेगा-आत्मा से भिन्न कुछ न भासेगा | इससे चित्त को त्यागो-चित्त अहंभाव का नाम है-और आत्मपद में स्थित हो | जैसे विश्व की उत्पत्ति हुई है सो भी सुनो | शुद्धचैतन्यमात्र में चिदावलीरूप अहंतरंग फुरा है उस चिदावलीरूपी समुद्र में जीवरूपी तरंग उपजता है और जीवरूपी समुद्र में अहंकाररूपी तरंग भासित हुआ है | अहंकाररूपी समुद्र में बुद्धिरूपी तरंग उपजा है, बुद्धिरूपी समुद्र में चित्तरूपी तरंग भासी है और चित्तरूपी समुद्र में संकल्परूपी समुद्र में जगत््रूपी तरंग उपजा है और जगत््रूपी समुद्र में देहरूपी तरंग भासित हुआ है और उसके संयोग से दृश्य का ज्ञान हुआ है कि यह पदार्थ है, यह नहीं है, ये ऐसे हैं, उसी से देश, काल, दिशा सब हुए हैं | हे रामजी! निदान वे सब संकल्प से हो गये हैं सो आत्मा से भिन्नकुछ नहीं | केवल शान्तरूप एकरस आत्मा है उसमें नाना प्रकार के आचार रचे हैं जैसे स्वप्न की सृष्टि नाना प्रकार हो भासती है सो अपना ही अनुभव होता है तैसे ही इस जगत् को भी जानो, आत्मा सर्वदा एकरस, अद्वैत, शुद्ध, परम निर्वाण, अपने आपमें स्थित है और फुरने से नाना प्रकार की कल्पना उदय हुई है | हे रामजी! शुद्ध आत्मा में चिदेव संज्ञा भी संकल्प से हुई है-"चिदेवपञ्चभृतानि, चिदेव भुवनत्रयम" आत्मा निर्वाच्यपद है उसमें वानी का गम नहीं और शुद्ध शान्तरूप है | चिदेव जो फुरी है उस फुरने से संसार हुए की नाईं स्थित है | जैसे एक ही बीज ने वृक्ष, फूल, फल आदिक संज्ञा पाई है सो बीज से भिन्न कुछ नहीं और आत्मा बीज की नाईं भी नहीं संकल्प से ही नानासंज्ञा हुई और जगत् स्थित हुआ है तो भी आत्मा से कुछ भिन्न नहीं | जैसे वायु चलती है तो वायु है और ठहरती है तो भी वायु है, तैसे ही आत्मा में नानात्व कुछ नहीं केवल शुद्ध अद्वैत है | आत्मारूपी समुद्र में नाना प्रकार विश्वरूपी तरंग स्थित हैं | हे रामजी! आकार भी आत्मा से कुछ भिन्न नहीं, जो आत्मा से भिन्न भासे उसे मिथ्या जानो और मृगतृष्णा के जल की नाईं जानकर उसकी भावना त्यागो और स्वरूप की भावना करो |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मैकत्वप्रति नाम दशाधिकशततमस्सर्गः ||110|
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! मेरे वचनों को
धारो और
हृदय में आस्तिक भावना
करो | जब
सर्वत्याग करोगे तब
चित्त क्षीण हो
जावेगा और
जब चित्त क्षीण हुआ तब शान्ति होगी हे
रामजी! काष्ठवत् मौन होकर
हृदय में सबका
त्याग करो | बाहर
से कर्मों को
करो पर
अभिमान से
रहित होकर अन्तर्मुख हो
रहो | अन्तर्मुखी आत्मा में स्थित
होने को
कहते हैं | जब आत्मा में स्थित
होगे तब
विद्यमान दृश्य भी
तुम्हे न भासेगा, क्योंकि तब
सर्व आत्मा ही
भासेगा | जो
तुम्हारे पास भेरी
के शब्द होंगे तो
भी न सुन पड़ेंगे और
जो सुगन्धि लोगे तो
भी नहीं ली,
निदान जो
कुछ क्रिया करोगे सो
तुम्हें स्पर्श न करेगी-आकाश की
नाईं सबसे असंग रहोगे | हे
रामजी! स्वरूप से
भिन्न न देखना और
आत्मा से
भिन्न न फुरना, अन्धे गूँगे की
नाईं और
पत्थर की
शिलावत् मौन हो रहो तब
तुम्हारी चेष्टा यन्त्र की
पुतलीवत् होगी | जैसे यन्त्र की
पुतली तागे की
सत्ता से
चेष्टा करती है
तैसे ही
तुम्हारी नीति शक्ति से
प्राणों की
चेष्टा होगी | स्वाभाविक क्रिया में अभिमान से रहित होकर स्थित होना, जो
अभिमान सहित चेष्टा करता है
वह मूर्ख और
असम्यक््दर्शी है
और जो
सम्यक््दर्शी है
उसको अनात्म में अभिमान नहीं
होता | हे
रामजी! जिसको अनात्म अभिमान नहीं और
जिसका चित्त दृश्य में लेपायमान नहीं होता वह
सारी सृष्टि को
संहार करे अथवा
उत्पन्न करे उसको
कुछ बन्धन नहीं होता, क्योंकि वह
सब कर्म अभिलाषा से
रहित करता है
| हे रामजी! समाधि में स्थित
हो और
जाग्रत की
नाईं सब
कर्म करो | तुममें सब कर्म दृष्टि भी
आवें तो
भी उनमें सुषुप्त की
नाईं कोई फुरना
न करे | अपने
स्वरूप की
समाधि रहे | समाधि
भी तब
कहिये कि
कोई दूसरा हो
जो इसमें स्थित हो
व इसका त्याग करे | हे रामजी! जहाँ एक
शब्द और
दो शब्द भी
नहीं कह
सकते वह
अद्वितीयात्मा परमार्थसत्ता है,
उसमें चित्त ने
नाना प्रकार के
विकार कल्पे हैं-ज्ञानी को एकरस भासता है
| ज्ञानी को
ज्ञानी जानता है
| जैसे सर्प के
खोज को
सर्प ही
जानता है,
तैसे ही
ज्ञानी को
एकरस आत्मा ही
भासता है
सो ज्ञानी जानता हैं | मूर्खको संकल्प से
नाना प्रकार का
जगत् भासता है
इससे संकल्प को
त्यागकर अपने प्रकृत आचार में बिचरो
| जैसे उन्मत्त और
बालक की
चेष्टा स्वाभाविक होती है
कि अंग हिलते
हैं, तैसे ही
अभिमान से
रहित होकर चेष्टा करो | जैसे
पत्थर की
शिला जड़ होती
है तैसे ही
दृश्य की
भावना से
ऐसे रहित हो
कि जड़ की नाईं कुछ न फुरे | जब
ऐसे होगे तब
शान्तपद को
प्राप्त होगे | हे
रामजी! चित्त के
सम्बन्ध से
क्षोभ उत्पन्न होता है
| जैसे वसन्तऋतु में फूल उत्पन्न होते हैं तैसे
ही चित्तरूपी वसन्त ऋतु में दुःखरूपी फूल उत्पन्न होते हैं जब तुम चित्त को
शान्त करोगे तब
परमपद को
प्राप्त होगे जो
सूक्ष्म से
सूक्ष्म और
स्थूल से
स्थूल है
| इससे तुम असंग
हो रहो | जब तुम स्थूल से
स्थूल होगे तब
भी असंग रहोगे | ऐसे पद को पाकर काष्ठ पत्थर की
नाईं मौन हो रहो | हे
रामजी! दृश्य पदार्थ को
त्यागकर जो
दृष्टा जाननेवाला है
उसमें स्थित हो
| हे रामजी! इन्द्रियाँ तो
अपने अपने विषय को
ग्रहण करती हैं उनकी
ओर तुम भावना
मत करो कि यह सुन्दररूप है
और इसकी प्राप्ति हो
| भले के
प्राप्त होने की
भावना मत
करो, इसके जाननेवाला जो
आत्मा है
उसी में स्थित
रहो जो
पुरुष दृष्टा में स्थित
होता है
वह गोपद की
नाईं संसार समुद्र को
लाँघ जाता है
| हे रामजी! जो
पदार्थ दृष्टि आते हैं उनमें अपनी अपनी सृष्टि है
सो संकल्प मात्र ही
है और
अपने अपने संकल्प में स्थित
है पर
सर्वसंकल्प आत्मा के
आश्रय हैं जैसे
सब पदार्थ आकाश में स्थित
हैं तैसे ही सब संकल्प की सृष्टि आत्मा के आश्रय है एक के संकल्प को दूसरा नहीं जानता-सृष्टि अपनी अपनी है | जैसे समुद्र में जितने बुद्बुदे हैं उनको जल से एकता है और आकार से एकता नहीं, तैसे ही स्वरूप से एकता है, और संकल्पसृष्टि अपनी-अपनी है | जो पुरुष ऐसे चिन्तता है कि मैं उसकी सृष्टि को जानूँ तब जानता है | हे रामजी! आत्मा कल्पवृक्ष है, उसमे जैसी कोई भावना करता है तैसी ही सिद्धि होती है | जब ऐसी ही भावना करके जीव स्वरूप में लगता है कि सब सृष्टि मुझे भासे तो भावना से भासि आती है | ज्ञानी ऐसी भावना नहीं करता क्योंकि आत्मा से भिन्न वह कोई पदार्थ नहीं जानता और जानता है कि स्वरूप से सबकी एकता है पर संकल्परूप से एकता नहीं होती |जैसे तरंगों की एकता नहीं पर जल की एकता है और जो एक तरंग दूसरे के साथ मिल जाता है तो उससे एकता होती है, तैसे ही एक का संकल्प भावना से दूसरे के साथ मिलता है, इससे ज्ञानी जानता है संकल्प रूप आकार नहीं मिलते और स्वरूप से सबकी एकता है | जिसकी भावना होती है कि मैं इसकी सृष्टि को देखूँ तो वह उसके संकल्प से अपना संकल्प मिलाकर देखता है तब उसकी सृष्टि जानता है | जैसे दो मणियों का प्रकाश भिन्न भिन्न होता है और जब दोनों इकट्ठी एक ही ठौर में रखिये तो दोनों का प्रकाश इकट्ठा हो जाता है, तैसे ही संकल्प की एकता भावना से होती है | ज्ञानी को प्रथम संकल्प हो कि मैं उसकी सृष्टि देखूँ तो संकल्प से देखता है और ज्ञान के उपजे से वाच्छा नहीं रहती | हे रामजी! इच्छा चित्त का धर्म है | जब चित्त ही नष्ट हो गया तब इच्छा किसको रहे | जब स्वरूप का प्रमाद होता है तब चित्तरूपी दैत्य प्रसन्न होता है कि यह मेरा आहार हुआ और मैं इसको भोजन करूँगा | हे रामजी! जो पुरुष चित्त की ओर हुआ है और जिसको स्वरूप की भावना नहीं हुई सो चित्तरूपी दैत्य उसे जन्मरूपी वन में लिये फिरता है, उसको भोजन करता रहता है, उसका पुरुषार्थ नष्ट करता है और आत्मभावनावाली बुद्धि उत्पन्न नहीं होने देता | जैसे वृक्ष को अग्नि लगे तो फिर उसमें फल नहीं लगते, तैसे ही पुरुषार्थरूपी वृक्ष को भोगरूपी अग्नि लगी तो शुद्ध बुद्धरूपी फल उत्पन्न नहीं होते | हे रामजी! अपना चित्त आत्मा में लगावो और विषय की ओर जाने न दो | यह चित्त दुष्ट है, जब इसको स्थित करोगे तब परम अमृत से शोभायमान होगे और जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा अमृत से शोभता है तैसे ही ब्रह्मलक्ष्मी से शोभोगे और परम निर्वाणपद को प्राप्त होगे |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे निर्वाणवर्णनं नामैकादशाधिकशततमस्सर्गः ||111||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! ज्ञान की
सप्तभूमिका हैं इनसे
ज्ञान की
उत्पत्ति होती है
रामजी ने
पूछा, हे
भगवन्! जिस भूमिका में जिज्ञासु प्राप्त होता है
उसका लक्षण क्या है
और ये
सप्तभूमिका क्या हैं और कैसे प्राप्त होती है
सो कहिये?
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! ये
सप्तभूमिका जिस प्रकार प्राप्त होती हैं और जिस प्रकार इनसे ज्ञान प्राप्त होता है
सो सुनो | हे
रामजी! जब
बालक माता के
गर्भ में होता
है तब
उसको दृढ़ सुषुप्ति जड़ अवस्था होती
है-जैसे ज्ञानी को
होती है-परन्तु बालक में संस्कार रहता है
उससे संस्कार की
सत्यता आगे होती
है | जैसे बीज में अंकुर होता है
उससे आगे वृक्ष
होता है
तैसे ही
बालक की
भावी होती है
और ज्ञानी की
भावी नहीं होती | जैसे दग्धबीज में अंकुर
नहीं होता तैसे ही
ज्ञानी की
भावी नहीं होती, क्योंकि वह
संसार से
सुषुप्ति है
और स्वरूप में नहीं
| जब बालक को
बाहर निकल के
कुछ काल व्यतीत होता
है तब
जड़ता निवृत्त हो
जाती है
और सुषुप्ति रहती है
तब जड़ता निवृत्त हो
जाती है
और सुषुप्ति रहती है
| कुछ काल के उपरान्त सुषुप्ति भी
लय हो
जाती है
और चेतनता होती है
| तब वह
जानता हैं कि `यह मैं हूँ,' "ये मेरे पिता-माता हैं" | तब
कुलवाले उसको सिखाते हैं कि यह मीठा है,
यह कड़ुआ है,
यह तेरी माता है,
यह तेरा पिता है,
यह तेरा कुल है, इससे पाप होता
है, इससे पुण्य होता है,
इससे स्वर्ग मिलता है,
इससे नरक पाता
है, इस
प्रकार यज्ञ होता है,
इस प्रकार तप
होता है
और इस
प्रकार दान करते
हैं | हे
रामजी! इस
प्रकार कुल के उपदेश और
शास्त्र के
भय से
वह धर्म में विचरता है और पाप का त्याग करता है
| ऐसा शास्त्र अनुसार बिचरनेवाला पुरुष धर्मात्मा कहाता है
| वे धर्मात्मा पुरुष भी
दो प्रकार के
हैं-एक
प्रवृत्ति की
ओर है
और दूसरा निवृत्ति की
ओर है
| जो प्रवृत्ति की
ओर है
वह पुण्यकर्मों से
स्वर्ग के
फल भोगता है
और मोक्ष को
उत्तम नहीं जानता, इससे संसार में जल के तृणवत् भ्रमता है
और कभी चिरकाल से इस क्रम से
मुक्त होता है
जो निवृत्ति की
ओर होता है
उसको विषय भोग से वैराग्य उपजता है
और वह
कहता है
कि यह
संसार मिथ्या है,
मैं इससे तरूँ और
उस पद
को प्राप्त होऊँ जहाँ क्षय और
अतिशय न हो- यह संसार सर्वदा जलरूप और
दुःखदायी है
| हे रामजी! उस
पुरुष को
इस क्रम से
ज्ञान और
विज्ञान उत्पन्न होता है
और जो
पशुधर्मा मनुष्य है
उसको ज्ञान प्राप्त होना कठिन है-शास्त्र के
अर्थ के
न जाननेवालों को
पशुधर्मी कहते हैं | वे अपनी इच्छा से
बिचरकर अशुभ को
ग्रहण करते और
विचार से
रहित होते हैं | मनुष्य भी दो प्रकार के
हैं-एक
प्रवृत्ति के
धारनेवाले और
दूसरे निवृत्ति के
धारनेवाले | प्रवृत्तिमार्ग इसे कहते
हैं कि
जिसको शास्त्र शुभ कहे उसको ग्रहण करना और
और जिसे अशुभ कहे उसका
त्याग करना और
कामना करके फल
के निमित्त यज्ञादिक शुभकर्म करने कि
स्वर्ग, धन,
पुत्रादिक मुझे प्राप्त हों | ऐसी कामना धारकर जो
शुभकर्म करके इस
प्रकार संसारसमुद्र में बहते
हैं वे
निवृत्ति की
ओर भी
आते हैं तब स्वरूप पाते हैं | निवृत्ति यह
है कि
जो निष्काम होकर और
शुभकर्म करके अन्तःकरण शुद्ध करता है
उसको वैराग्य उपजता है
और वह
कहता है
कि मुझे कर्मों से
क्या है
और फलों से
क्या है,
मै किसी प्रकार आत्मपद को
प्राप्त होऊँ | वह
यही विचारता है
कि मैं संसार
से कब
मुक्त हूँगा? यह संसार मिथ्या है
और मुझे भोग से क्या है? यह
भोग तो
सर्प है
| हे रामजी! इस
प्रकार यह
भोगों की
निन्दा करता है,
संसार से
उपरत होता है,
शम, दम
आदिक जो
ज्ञान के
साधन हैं उनमें
बिचरता है,
देश, काल और पदार्थ को शुभ अशुभ बिचारता है, मर्यादा से बिलता है, सन्तजनों का संग करता है और सत् शास्त्र और ब्रह्म विद्या को बारम्बार विचारता है | इस प्रकार सन्तजनों के संग से उसकी बुद्धि बढ़ती जाती है | जैसे शुक्लपक्ष् के चन्द्रमा की कला दिन प्रतिदिन बढ़ती है तैसे ही उसकी बुद्धि बढ़ती है और विषयों से उपरत होती है तब वह तीर्थ, ठाकुरद्वारों आदि शुभ स्थानों को पूजता है, देह और इन्द्रियों से सन्तों की टहल करता है और सबसे मित्रता रखके दया, सत्य और कोमल तापूर्वक बिचरता है | वह ऐसे वचन बोलता है कि जिससे सब कोई प्रसन्न हो और जो यथाशास्त्र हों, इससे भिन्न किसी को नहीं कहता | वह अज्ञानी का संग त्यागता है, स्वर्ग आदिक सुख की भावना नहीं करता- केवल आत्मपरायण होता है, सन्त और शास्त्रों की दृढ़ भावना करता है और उनके अर्थों में सुरत लगाकर और किसी ओर चित्त नहीं लगाता है | जैसे कदर्य दरिद्री सर्वदा धन की चिन्ता करता है तैसे ही वह सदा आत्मा की चिन्तना करता है | जो पुरुष इतने गुणों से युक्त है उसको प्रथम भूमिका प्राप्त हुई है | वह पापरूपी सर्प को मोर के समान नष्ट करता है, सन्तजन, सत्शास्त्र और धर्मरूपी मेघ को गर्दन ऊँची करके देखता है और प्रसन्न होता है | इसका नाम शुभेच्छा है | उसको फिर दूसरी भूमिका प्राप्त होती है तब जैसे शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की कला बढ़ती जाती है तैसे ही उसकी बुद्धि बढ़ती जाती है | उसके ये लक्षण हैं, सत््शास्त्रों और ब्रह्मविद्या को विचार के दृढ़ भावना करनी |उस विचार का कवच जो गले में डालता है उससे शस्त्रों का कोई घाव नहीं लगता | इन्दियरूपी चोर के हाथ में इच्छारूपी बरछी है सो विचाररूपी कवच पहिरने वाले को नहीं लगती | हे रामजी! इन्द्रियरूपी सर्प में तृष्णारूपी विष है उससे मूर्ख को मारता है | विचारवान् पुरुष इन्द्रियों के विषयों को नाश कर डालता है और सब ओर से उदासीन रहता है और दुर्जनों की संगति का बल करके त्याग करता है | जैसे गधा तृण को त्यागता है तैसे ही मूर्ख की संगति वह त्यागता है | उसमें सर्व इच्छा का भी त्याग होता है परन्तु एक इच्छा रहती है कि दया सब पर करता है और सन्तोषवान् रहता हे | उसके निषेधगुण स्वाभाविक जाते रहते हैं और दम्भ, गर्व, मोह, लोभ आदिक स्वाभाविक नष्ट हो जाते हैं | जैसे सर्प कञ्चुकी को त्यागकर शोभायमान होता है तैसे ही विचारवान् इन्द्रियों के विषयों को त्याग करके शोभता है | जो उसमें क्रोध भी दृष्टि आता है तो क्षणमात्र होता है हृदय में स्थित नहीं हो सकता है | वह खाना, पीना, लेना, देना आदि क्रिया विचारपूर्वक करता है और सर्वदा शुद्धमार्ग में बिचरता है, सन्तजनों का संग और सत्शास्त्रों के अर्थ विचारने से बोध को बढ़ाता और तीर्थों के स्नान से काल व्यतीत करता है | हे रामजी! यह दूसरी भूमिका है | जब तीसरी भूमिका आती है तब श्रुति जो वेद और स्मृति जो धर्मशास्त्र उनके अर्थ हृदय में स्थित होते हैं- और जैसे कमलपर भँवरे आन स्थित होते हैं तैसे ही उस पुरुष के हृदय में शुभगुण स्थित होते हैं, तब उसे फूलों की शय्या सुखदायी नहीं भासती, वन और कन्दरा सुख दायक भासते हैं | निदान उसका वैराग्य दिन दिन बढ़ता जाता है और वह तालाब, बावलियों और नदियों में स्नान करके शुभस्थानों में रहता है, पत्थर की शिला पर शयन करता है, देह को तप से क्षीण करता है, धारणा से चित्त को किसी ठौर में नहीं लगाता, आत्मभावना और ध्यान करके भोगों से सर्वदा उपराम होता है | भोगों को अन्त वन्त विचार के कि यह स्थिर नहीं रहते और देहके अहंकार को उपाधि जानकर वह त्यागता है, देह को रक्त,माँस, पुरीषादिक से पूर्ण जानकर उसमें अहंकार को त्यागता है और निन्दा करता है और सूखे तृण की नाईं तुच्छ जानकर त्यागता है | जैसे विष्ठासंयुक्त तृण को पशु त्यागता है तैसे ही देह के अहंकार को वह त्यागता है और कन्दराओं में बिचरके फल फूलों का आहार करता है, सन्तजनों की टहल करके आयु बिताता है और सदा असंग रहता है | यह तीसरी भूमिका है |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे प्रथमद्वितीयतृतीयभूमिकालक्षणविचारो नाम द्वादशाधिकशततमस्सर्गः ||112||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! ज्ञान का
यह साधन है
कि ब्रह्मविद्या को
विचार के
उसके अर्थ की
बारम्बार भावना करना और
पुण्यक्रिया में विचरना, इससे
भिन्न ज्ञान का
कोई साधन नहीं-इसी से ज्ञान की
प्राप्ति होती है
| जिस पुरुष को
ऐसी भावना होती उसको यदि नाना
प्रकार की
सुगन्ध-अगर, चन्दन,
चोये आदि और अप्सरा अनिच्छित प्राप्त हों तो उनका निरादर करता है
और जो
स्त्री को
देखता है
तो माता समान जानता है,
पराये धन
को पत्थर के
बट्टे समान देखकर वाच्छा नहीं करता और
सब भूतों को
देखखर दया ही करता है
| जैसे आपको सुख से प्रसन्न और
दुःख से
अनिष्ट जानता है
तैसे ही
वह और
को भी
आप जानकर सुख देता
है और
दुःख किसी को
नहीं देता | इस
प्रकार वह
पुण्यक्रिया में विचरता है | सत््शास्त्रों के
अर्थ का
अभ्यास करता है
और सर्वदा असंग रहता है
| असंगति भी
दो प्रकार की
है | रामजी ने
पूछा, हे
भगवन्! संग असंग का
लक्षण क्या है
इनका भेद समझाकर कहिये? वशिष्ठजी बोले हे
रामजी! असंग दो
प्रकार का
है-एक
समान और
दूसरा विशेष, उनका लक्षण सुनो | समान असंग यह
है कि
मैं कुछ नहीं
करता | न मैं किसी को
देता हूँ और न मुझे कोई देता
है | सब
ईश्वर की
आज्ञा है,
जिसको धन
देने की
इच्छा होती है
उसको धन
देता है
और जिससे लेना होता है
उससे लेता है,
अपने अधीन कुछ नहीं
| समान असंगवाला जो
कुछ दान, तप, यज्ञादि करता है
वह ईश्वरार्पण करता है
और अपना अभिमान कुछ नहीं
करता और
कहता है
कि सब
ईश्वर की
शक्ति से
होता है
| इस प्रकार निरभिमान होकर वह
धर्म चेष्टा में स्वाभाविक विचरता है
और जो
कुछ इन्द्रियों के
भोग की
सम्पदा है
उसको आपदा जानता है,
और भोगों को
महा आपदारूप मानता है
| संपदा आपदारूप है,
संयोग वियोगरूप है
और जितने पदार्थ हैं वे सब सन्निपातरूप हैं-विचार
से नष्ट हो
जाते हैं इससे
सबको वह
नाश रूप जानता
है | यह
संयोग वियोग को
दुःखदायी जानता है,
परस्त्री को
विष की
बेलिसमान रससे रहित जानता है
और सब
पदार्थों को
परिणामी जानकर किसी की
इच्छा नहीं करता | सम्पूर्ण विश्व का
जो ईश्वर है
उसे जिसको सुख देना
है उसको सुख देता
है और
जिसको दुःख देना है
उसको दुःख देता है,
अपने हाथ कुछ नहीं, कराने करनेवाला ईश्वर है
| न मैं करता
हूँ, न मैं भोक्ता हूँ और न मैं वक्ता
हूँ-सब
ईश्वर की
सत्ता से
होता है
| ऐसे निरभिमान होकर वह
पुण्यक्रिया करता है
| यह समान असंग है
| उसके वचन सुनने
से श्रवण को
अमृत की
प्राप्ति होती है
| इस प्रकार सन्तों के
मिलने और
तीसरी भूमिका की
प्राप्ति से
जिसकी बुद्धि बढ़ी है
और जो
निरभिमान है
उसके उपदेश में अनुभव
से तबतक अभ्यास करे जबतक
हाथ पर
आँवले की
नाईं आत्मा का
अनुभव साक्षात्कार प्रत्यक्ष हो!
विशेष असंगवाला कहता है
कि न मैं कुछ करता
हूँ, न कराता हूँ, केवल
आकाशरूप आत्मा हूँ न मुझ में करना
है, न कराना है,
न कोई और है, न मेरा है,
मैं केवल आकाशरूप अद्वैत आत्मा हूँ | हे रामजी! वह
पुरुष न भीतर, बाहर, न पदार्थ, न अपदार्थ, न जड़, न चेतन, न आकाश, न पाताल, न देश, न पृथ्वी, न मैं, न मेरे को
देखता है,
वह निवास, अज,
अविनाशी, सर्व शब्द अर्थों से
रहित, केवल शून्य आकाश में स्थित
है | चित्त से
रहित चेतन में जो प्रस्थित है
उसको श्रेष्ठ असंग कहते हैं और उसकी चेष्टा दृष्टि भी
आती है
तो भी
उसमें हृदय से
पदार्थों की
भावना का
अभाव है
| जैसे जल
में कमल दृष्टि भी आता है
परन्तु ऊँचा रहता है,
तैसे ही
वह क्रिया में विचरता दृष्टि भी आता है
परन्तु असंग रहता है
| उसको कोई कामना
नहीं रहती कि
यह हो
और यह
न हो
क्योंकि उसको संसार का
अभाव निश्चय हुआ है और सर्वकलना से रहित है | उसको आत्मा से भिन्न किसी पदार्थ की सत्ता नहीं फुरती | यह श्रेष्ठ असंग कहाता है | कार्य करने से उसका कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता और न करने में कुछ हानि नहीं होती वह सर्वदा असंग है और संसार में कदाचित नहीं डूबता, क्योंकि वह तो संसारसमुद्र के पार हुआ है और उसने अनात्म में आत्मभावना त्यागी है, अहंभाव का त्याग किया है, इष्ट अनिष्टरूप जितने पदार्थ हैं उनके सुख-दुख की वेदना उसे नहीं फुरती और वह सदा मौनरूप है | उसे पैसा पत्थर के समान है | यह श्रेष्ठ असंग कहाता है | हे रामजी! एक कमल है जो अज्ञानरूपी कीचड़ से निकलकर आत्मरूपी जल में विराजता है उसका बीज संसार की अभावना है | उस जल में तृष्णारूपी मछलियाँ हैं जो उस कमल के चहुँ ओर फिरती हैं और उसके साथ कुकर्म दुःखरूपी काँटे हैं | अज्ञानरूपी रात्रि से उस कमल का मुख मूँदा रहता है और विचाररूपी सूर्य के उदय हुए से खिलता और शोभता है | उसमें सुगन्ध सन्तोष है | और वह हृदय के बीच लगता है | उसका फल असंग है | यह तीसरी भूमिका में उगता है | हे रामजी! सन्त की संगति और सत््शास्त्रों का विचारना सार को प्राप्त करता है और अमृत मोक्ष को प्राप्त होता है | बड़ा कष्ट है कि ऐसे स्वरूप को विस्मरण करके जीव दुःखी होते हैं | इसका स्वरूप जो दुःखों का नाश करता है और जिसमें कोई दुःख नहीं, आनन्दरूप है सो इन भूमिकाओं के द्वारा प्राप्त होता है | हे रामजी! यह तीसरी भूमिका ज्ञान के निकटवर्ती है और विचारवान् इन भूमिकाओं में स्थित होकर बुद्धि को बड़ाते हैं | जब इस प्रकार वह बोध को बढ़ाता है तो शास्त्र की युक्ति से रक्षा करता है और क्रम करके इस तीसरी भूमिका को प्राप्त होता है जहाँ असंगता प्राप्त होती है | जैसे किसान खेती की रक्षा करके बढ़ाता है तैसे ही वह विचाररूपी जल से बुद्धि को बढ़ाता है तब बुद्धिरूपी बेल बढ़ती है | फिर चतुर्थ भूमिका प्राप्त होती है और अहंकार, मोहादिक शत्रुओं से रक्षा करता है | हे रामजी! इस भूमिका को प्राप्त होकर ज्ञानवान् होता है सो यह भूमिका क्रम करके प्राप्त होती है अथवा बड़े पुण्य कर्म किये हो उनसे आन फुरती है वा अकस्मात् भी आन फुरती है | जैसे नदी के तट पर कोई आ बैठा हो और नदी के वेग से बीच में जा पड़े तैसे ही जब पहली भूमिका प्राप्त होती है तब बुद्धि को बढ़ाती है और जब बुद्धिरूपी बेल बढ़ती तब ज्ञानरूपी फल लगता है | जब ज्ञान उपजता है तब उसमें प्रत्यक्ष क्रिया दृष्टि भी आवे तो भी उसका वह अभिमान नहीं करता जैसे शुद्धमणि प्रतिबिम्ब को ग्रहण भी करती है परन्तु उसमें कोई रंग नहीं चढ़ता |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे तृतीयभूमिकाविचारोनाम त्रयोदशाधिकशततमस्सर्गः ||113||
रामजी बोले, हे
भगवन्! आपने भूमिका का
वर्णन किया पर
उसमें मुझे यह
संशय है
कि जो
भूमिका से
रहित और
प्रकृत के
सम्मुख हैं उनको
भी कदाचित् ज्ञान उपजेगा अथवा न उपजेगा?
और जो
एक , दो
वा तीन भूमिका पाकर
शरीर छूटे और
आत्मा का
साक्षात्कार न हुआ हो
और उसको स्वर्ग की
भी कामना नहीं तो
वह कौन गति पाता है?
वशिष्ठजी बोले हे
रामजी! जो
पुरुष विषयी हैं उनको
ज्ञान प्राप्त होना कठिन है,
वे वासना करके घटी यन्त्र की नाईं कभी स्वर्ग और कभी पाताल को
जाते हैं और दुःख पाते हैं, कदाचित् अकस्मात् काकतालीय न्याय की
नाईं उनको संत के संग और
सत््शास्त्रो को
सुनने की
वासना फुरती है
| जैसे मरुस्थल में बेलि
लगना कठिन है
तैसे ही
जिस पुरुष को
आत्मा का
प्रमाद है
और भोग की भावना है
उसको ज्ञान प्राप्त होना कठिन है
| परन्तु जब
अकस्मात् उसे सन्तों के संग से
वैराग्य उपजता है
और उसकी बुद्धि निवृत्ति की
ओर आती है तब भूमिका के
द्वारा उसे ज्ञान
प्राप्त होता है
और तभी मुक्त
होता है
हे रामजी! अकस्मात् यही भावना
उपजे बिना योनियों में भ्रमता है | जिसको एक
अथवा दो
भूमिका प्राप्त हुई है और शरीर छूट गया तो वह
और जन्म पाकर ज्ञान को
प्राप्त होता है
और पिछला संस्कार जाग आता है और
दिन बढ़ता जाता है
| जैसे बीज से प्रथम वृक्ष का
अंकुर होता है,
फिर डाल, फूल और फल
से बढ़ता जाता है
तैसे ही
उसका अभ्यास बढ़ता जाता है
और ज्ञान प्राप्त होता है
| जैसे पहलवान खेलकर रात्रि को
सो जाता है
और फिर दिन हुए उठता है
तब पहलवान ही
का अभ्यास आय
फुरता है
और जैसे कोई मार्ग
चलता चलता सो
जावे और
जागकर चलने लगे तैसे
ही वह
फिर पूर्व के
अभ्यास में लगता
है | हे
रामजी! जिसको यह
भावना होती है
कि मुझे विशेषता प्राप्त हो
वह जन्म पाता है
और ब्रह्मा से
चींटीपर्यन्त जिसको विशेष होने की
कामना है
सो जन्म पाता है
| ज्ञानी को
भोगों की
और विशेष प्राप्त होने की
इच्छा नहीं होती |जिसको भोग की इच्छा होती है
वह भोग से आपको विशेष जानता है
और अनिष्ट की
निवृत्ति की
इच्छा करता है
ज्ञानी को
कोई वासना नहीं होती कि
यह विशेषता मुझे प्राप्त हो
इसी से
वह फिर जन्म
नहीं पाता जैसे भूना बीज नहीं
उगता-तैसे ही
वासना से
रहित ज्ञानी जन्म नहीं पाता | हे
रामजी! जन्म का
कारण वासना है
| जैसी जैसी वासना होती है
तैसी तैसी अवस्था को
जीव प्राप्त होता है
| नाना प्रकार की
वासना हैं, जब शरीर छूटने का
समय आता है तब जो
वासना दृढ़ होती है
और जिसका सर्वदा अभ्यास होता है
वही अन्तकाल में दिखाई
देती है
चाहे वह
पाठ की,
तप की,
कर्म की
देवता इत्यादिक की
हो सबको मर्दन करके वही उस समय भासती है
| हे रामजी! उस
समय अग्रगत पदार्थ होते हैं सो भी नहीं भासते और
पाँचों इन्द्रियों के
विषय विद्यमान हों तो भी नहीं भासते पर
वही पदार्थ भासता है
जिसका दृढ़ अभ्यास किया होता है
| वासनाएँ तो
अनेक होती हैं परन्तु जैसी भावना दृढ़ होती है
उसी के
अनुसार शरीर धारता है
| जब देह छूटता
है तब
मुहूर्त पर्यन्त सुषुप्ति की
नाईं जड़ता रहती है
उसके उपरान्त चेतनता होती है
तब वासना के
अनुसार शरीर देखता है
और जानता है
कि यह
मेरा शरीर है,
मैं उत्पन्न हुआ हूँ | कोई ऐसे होते
हैं कि
उसी क्षण में युग का अनुभव करते हैं, कोई ऐसे हैं कि चिरकाल पर्यन्त जड़ रहते
हैं तब
उनको चेतनता फुरती है
और उसके अनुसार संसार भ्रम देखते हैं और कोई जो
संस्कारवान् होते हैं उनको
शीघ्र ही
एक क्षण में चेतनता होती
है और
वे जानते हैं कि हम उस
ठौर मुये थे
और इस
ठौर जन्मे हैं, यह हमारी माता है,
यह पिता है
और यह
कुल है
| इस प्रकार एक
मुहूर्त में जागकर वे देखते हैं और बड़े कुल को देखते हैं | इसी प्रकार वे परलोक और यमराज के दूतों को देखते हैं और जानते हैं कि यह हमें लिये जाते हैं और हमारे पुत्रों ने पिण्ड किये हैं उनसे हमारा शरीर हुआ है और दूत ले चले हैं | तब आगे ये धर्मराज को देखते हैं और उसके निकट जाके खड़े होते हैं और पुण्य पाप दोनों मूर्ति धारकर उनके आगे स्थित होते हैं | तब धर्मराज अन्तर्यामी से एक एक का हाल पूछता है कि उसने क्या कर्म किये हैं? यदि पुण्यवान् होता है तो स्वर्गभोग भोगकर फिर योनि में डाला जाता है और जो पापी होता है तो नरक में डाल देते हैं | निदान सब प्रकार जन्मों को धारता है | सर्प की योनि में कहता है कि मैं सर्प हूँ और बैल, वानर, तीतर, मच्छ, बगला, गर्दभ, बेलि, वृक्ष इत्यादिक योनि पाता है, तो जानता है कि मैं यही हूँ | अकस्मात् काकताली योग की नाईं कदाचित् मनुष्य शरीर पाता है तो माता के गर्भ में जानता है कि यहाँ मैंने जन्म लिया है, यह मेरी माता है, मैं पिता से उत्पन्न हुआ हूँ और यह मेरा कुल है | फिर बाहर निकलता है और बालक होता है तब जानता है कि मैं बालक हूँ, यौवनावस्था होती है तब जानता है कि मैं जवान हूँ और फिर वृद्ध होता है तब जानता है कि मैं यही हूँ | अकस्मात् काकताली योग की नाईं कदाचित् मनुष्य शरीर पाता है तो माता के गर्भ में जानता है कि यहाँ मैंने जन्म लिया है, यह मेरी माता है, मैं पिता से उत्पन्न हुआ हूँ और यह मेरा कुल है | फिर बाहर निकलता है और बालक होता है तब जानता है कि मैं बालक हूँ, यौवनावस्था होती है तब जानता है कि मैं जवान हूँ और फिर वृद्ध होता है तब जानता है कि मैं बालक हूँ, यौवनावस्था होती है तब जानता है कि मैं जवान हूँ और फिर वृद्ध होता है तब जानता है कि मैं वृद्ध हूँ | इस प्रकार काल बिताकर जब मरता है तो सर्प, तोता, तीतर, वानर, मच्छ, कच्छ, वृक्ष, पशु, पक्षी, देवता इत्यादिक का जन्म धारण करता है | हे रामजी! संसार मैं वह घटीयन्त्र की नाईं फिरता है और फिर कभी ऊर्ध्व और कभी अधः को जाता है और इसी प्रकार स्वरूप के प्रमाद से दुःख पाता है | हे रामजी! इतना विस्तार जो तुमसे कहा है सो बना कुछ नहीं केवल अद्वैत आत्मा है पर चित्त के संयोग से इतना भ्रम देखता है और वासना द्वारा विमानों को देखता है और आकाश में जाता है | जैसे पवन गन्ध को ले जाता है तैसे ही पुर्यष्टका को ले जाता है और शरीर देखता है | हे रामजी! आत्मा से भिन्न कुछ नहीं परन्तु चित्त के संयोग से इतने भ्रम देखता है कि इससे चित्त को स्थित करो तो भ्रम मिट जावेगा और आत्मतत्त्व मात्र ही शेष रहेगा | जो शुद्ध और आनन्दरूप है उसी में स्थित हो रहो |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्ववासनारूपवर्णनं नाम चतुर्दशाधिकशततमस्सर्गः ||114||
वशिष्ठजी बोले , हे
रामजी! यह
तो प्रवृत्तिवाले का
क्रम कहा अब निवृत्ति का
क्रम सुनो | जिसको भूमिका प्राप्त हुई है और आत्मपद नहीं प्राप्त हुआ उसके
पास सब
दग्ध हो
जाते हैं | जब उसका शरीर छूटता है
तब वह
वासना के
अनुसार शून्याकार हुआ फिर अपने साथ शरीर
देखता है
और फिर बड़े
परलोक को
देखता है
जहाँ स्वर्ग के
सुख भोगता है
| फिर विमान पर
चढ़ के
लोकपालों के
पुरों में विचरता है जहाँ मन्द मन्द पवन चलता
है, सुन्दर वृक्षों की
सुगन्ध है
और पाँचों इन्द्रियों के
रमणीय विषय हैं देवताओं में क्रीड़ा करता है
और भोगों को
भोग कर
संसार में उपजता
है और
फिर भूमिका क्रम को
प्राप्त होता है
| जैसे मार्ग चलता कोई सो जावे तो
जागकर फिर चलता
है तैसे ही
शरीर पाकर वह
फिर भूमिका क्रम को
प्राप्त होता है
और जैसी-जैसी भावना दृढ़ होती है
तैसे ही
भासता है
| यह सब
जगत् संकल्पमात्र है,
संकल्प के
अनुसार ही
भासता है
और वासना के
अनुसार परलोक भ्रम सुख दुःख
देखता है,
वहाँ से
भोगकर फिर संसार
में आन
पड़ता है
| इसी प्रकार संकल्प से
भटकता है
और जब
आत्मा की
ओर आता है तब संसारभ्रम मिट जाता
है | जबतक आत्मा की
ओर नहीं आता तब तक अपने संकल्प से
संसार को
देखता है
| जीव जीव प्रति
अपनी अपनी सृष्टि भासती है
देवता, दैत्य, भूमिलोक, स्वर्ग सब
संकल्प के
रचे हुए हैं | जो कुछ संसार
भासता है-ब्रह्मा, विष्णु रुद्र से
आदि लेकर वह
सब मनोमात्र है,
मन के
संकल्प से
उदय हुआ है और असत््रूप है
| जैसे मनोराज, गन्धर्वनगर और
स्वप्नसृष्टि भ्रमरूप हैं, तैसे
ही यह
जगत् भ्रम रूप है सब सृष्टि परस्पर अदृष्ट है,
कहीं उदय होती
भासती है
और कहीं लय
हो जाती है
| जैसे मूर्ख और
देश को
जाता है
तैसे ही
देह को
त्यागकर जीव परलोक
को जाता है
पर स्वरूप में आना, जाना, अहं, त्वं,कल्पना कोई नहीं,
केवल सत्तामात्र अपने आप
में स्थित है
और जगत् भी
वही है
| हे रामजी! यह
विश्व आत्मस्वरूप है
| जैसे मणि का चमत्कार होता है
तैसे ही
विश्व आत्मा का
चमत्कार है
और जो
कुछ तुमको भासता है
सो आत्मा ही
है आत्मा बिना आभास नहीं होता जैसे ईख
में मधुरता और
मिरचों में तीक्ष्णता होती है
तैसे ही
आत्मा में विश्व
है | जो
कुछ भी
देखो सुनो स्पर्श करो और सुगन्ध लो
उसे सब
आत्मा ही
जानों अथवा जो
इनके जाननेवाला अनुभव है
उसमें स्थित हो
और इन्द्रियाँ और
विष को
त्यागकर अनुभवरूप में स्थित
हो | हे
रामजी! यह
विश्व संवित््रूप है
और संवित् ही
विश्वरूप है
| जब संवित् बहिर्मुख होकर रस
लेती है
तब जाग्रत् को
देखती है,
जब अन्तर्मुख होकर रस
लेती है
तब स्वप्न होता है
और जब
शान्त हो
जाती है
तभी सुषुप्ति होती है
संसार को
सत्य जानकर जब
रस लेती है
तब जाग्रत और
सुषुप्ति अवस्था होती है
और जब
संवित् से
रस की
सत्यता जाती रहती है
तब तुरीयापद होता है
| यह पदार्थ है,
यह नहीं, जब
यह नष्ट हो
तब तुरीयापद है
| हे रामजी! यह
विश्व फुरनेमात्र है,
जब फुरना नष्ट हो
तब विश्व देखने में नहीं
आता| जैसे स्वप्न के
देश, काल, पदार्थ जागे
से मिथ्या होते हैं तैसे
ही यह
जाग्रत भी
मिथ्या है
| जीव जीव प्रति
जो अपनी अपनी सृष्टि होती है
उसमें आप
भी कुछ बन जाता है
इससे दुःखी होता है
| जब
इस अहंकार को
त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित
हो तब
विश्व कहीं नहीं है
|
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सृष्टिनिर्वाणैकताप्रतिपादनं नाम पञ्चदशाधिकशततमस्सर्गः ||115||
वशिष्ठजी बोले , हे
रामजी! इस
सृष्टि का
स्वरूप संकल्पमात्र है
और संकल्प भी
आकाश रूप है | आकाश और
स्वर्ग में कुछ भेद नहीं, जैसे पवन और स्पन्द में भेद नहीं | सृष्टि में अनेक
पदार्थ हैं परन्तु परस्पर नहीं
रोकते और
वास्तव में विश्व
भी आत्मा का
चमत्कार है
और आत्मरूप है
| जो आत्मरूप है
तो राग और द्वेष किसमें कीजिये? चेतन धातु में कोटि
ब्रह्माण्ड स्थित हैं और यह आश्चर्य है
कि आत्मा में कुछ नहीं हुआ | भिन्न
भिन्न संवेदन दृष्टि आती है, और नाना प्रकार के
पदार्थ भासते हैं | हे रामजी! जीव जीव प्रति अपनी अपनी सृष्टि है
| एक सृष्टि ऐसी है कि उसका रूप एक सा दृष्टि आता है परन्तु सृष्टि अपनी अपनी है
और कई
ऐसी हैं कि भिन्न भिन्न हैं परन्तु समानता करके
एकही दृष्टि आती हैं | जैसे जल
की बूदें इकट्ठी होती हैं और धूलि के
कण भिन्न भिन्न होते हैं परन्तु एकही
धूलि भासती है
| जैसे नदी में नदी पड़ती है
तो एक
ही जल
हो जाता है
तैसे ही
समान अधिकरण करके सब
संकल्प एक
ही भासते हैं, एक एक के
साथ मिलते हैं और नहीं भी
मिलते | जैसे क्षीर समुद्र में घृत डालिये तो
नहीं मिलता तैसे ही
एक संकल्प ऐसे हैं कि और
से नहीं मिलते-जैसे सूर्य, दीपक और
मणि का
प्रकाश भिन्न भिन्न दृष्टि आता पर एक से
होते हैं तैसे
ही कई
सृष्टि एकसी भासती हैं और भिन्न भिन्न भी
होती हैं | हे रामजी! इतनी सृष्टि जो
मैंने तुमसे कही है सो सब
अधिष्ठान में फुरने
से कई
कोटि उत्पन्न होती हैं और कई कोटि लीन हो जाती हैं | जैसे
जल में तरंग
और बुद्बुदे उपजकर लीन हो जाते हैं तैसे
ही सृष्टि उत्पन्न और
लीन होती है
पर अधिष्ठान ज्यों का
त्यों है,
क्योंकि उससे कुछ भिन्न
नहीं | ब्रह्म, आत्मा आदिक जो
सर्व हैं सो भी फुरने में हुए हैं | जबतक शब्द अर्थ की
भावना तबतक भासते हैं और जब भावना निवृत् हुई तब शब्द अर्थ कोई न भासेगा केवल शुद्ध चैतन्यमात्र ही
शेष रहेगा और
संसार का
भाव किसी ठौर न होगा | जैसे पवन जबतक
चलता है
तबतक जाना जाता है
कि पवन है और गन्ध भी
पवन करके जानी जाती है
कि सुगन्ध आई
अथवा दुर्गन्ध आई
और जब
पवन नहीं, चलता तब
उसका वेग नहीं
भासता और
गन्ध भी
नहीं भासती ; तैसे ही
जब फुरना निवृत्त हुआ तब संसार और
संसार का
अर्थ दोनों नहीं भासते | फुरने में जीव प्रति सृष्टि में सत्तासमान ब्रह्म स्थित है
और सबका अपना आप
है-द्वैतभाव को
कदाचित् नहीं प्राप्त हुआ | हे रामजी! इससे ऐसे जानो
कि आकाश, पृथ्वी, जल,
अग्नि आदि सब पदार्थ आत्मा ही
हैं अथवा ऐसे जानो
कि सब
मिथ्या है
और इनका साक्षी ब्रह्म ही
अपने आप
में स्थित है
उससे कुछ भिन्न
नहीं और
उसी ब्रह्म के
अंश में अनेक
सुमेरु और
मन्दराचल आदिक स्थित हैं | अंशांशीभाव भी
आत्मा में स्थूलता के
निमित्त कहे हैं वास्तव नहीं- जनावने निमित्त कहे हैं | आत्मा एकरस है
| हे रामजी! ऐसा पदार्थ कोई नहीं जो
आत्म सत्ता बिना हो
| जिसको सत्य जानते हो
सो भी
आत्मा है
और जिसको असत्य जानते हो
वह भी
आत्मा है;
आत्मा में जैसे
सत्य का
फुरना है
तैसे ही
असत्य का
फुरना है-फुरना दोनों का
तुल्य है
| जैसे स्वप्न में, एक को सत्य जानता है
और दूसरे को
असत्य जानता है
तैसे ही
जो इन्द्रियों के
विषय होते हैं उनको
सत्य जानता है
और आकाश के
फूल और
शश के
श्रृंग को
असत्य कहता है
सो सब
अनुभव से
फुरे हैं इससे
अनुभवरूप है
| ऐसा पदार्थ कोई नहीं
जो आत्मा में असत्
नहीं; जो
कुछ भासते हैं सो सब फुरने से
हुए हैं सत्य
क्या और
असत्य क्या; सब
मिथ्या और
स्वप्न के
सत् और
असत् की
नाईं हैं | जो अनुभव करके सिद्ध है
सो सब
सत्य है
और अनुभव से
भिन्न असत्य है
| हे रामजी! गुणातीत परमात्मस्वरूप में स्थित हो | हे रामजी! भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों काल में ज्ञानवान् पुरुष सम रहता है और दशोदिशा, आकाश, जल, अग्नि आदिक पदार्थ उसको सब आत्मा ही दृष्टि आता है-आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासता | सूर्य, चन्द्रमा, तारे सब आत्मा हैं यह विश्व आकाशरूप है और शुद्ध निर्मल है; आकाश में आकाश स्थित है, कुछ भिन्न नहीं | जो तुम्हें भिन्न भासे उन्हें मिथ्या जानो वे भ्रम करके सिद्ध हुए है, कोई सत् नहीं | पर परमार्थ से देखो तो सर्व आत्मा है |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्वाकाशैकताप्रतिपादनं नाम षोडशाधिकशततमस्सर्गः ||116||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! यह
विश्व स्वप्न के
समान है
| जैसे स्वप्न की
सेना नाना प्रकार की
दीखती है
और शस्त्र चलते भासते हैं पर आत्मा में इनका
रूप देखना और
मानना और
शब्द अर्थ कोई नहीं,
वह जगत् से
रहित है
और जगत््रूप भान होता
है | अहं,त्वं
जो कुछ भासता
है सो
सब स्वप्नवत् है
और भ्रम से
सिद्ध हुआ है | जो सबका अधिष्ठान् है
वह सत्य है
और सब
उसी में कल्पित हैं | जो अनुभव से
देखिये तो
सब आत्मस्वरूप है
और भिन्न देखिये तो
कुछ नहीं | जैसे स्वप्नके देश, काल, पदार्थ सब
अर्थाकार भी
भासते तो
भी मिथ्या हैं वैसे
ही यह
विश्व भ्रम करके फुरता है
| उनकी अपेक्षा से
वह और
तू है
और उसकी अपेक्षा से
वह अहं है वास्तव में दोनों
नहीं-जो
है सो
आत्मा ही
है रामजी ने
पूछा, हे
भगवन्! आपने कहा कि त्वं आदिक अहं आदिक
त्वं पर्यन्त सब
स्वप्न सेना की
नाईं मिथ्या हैं और अनुभव से
देखिये तो
आत्मरूप हैं तो हम स्वप्नसेना में है अथवा हमारा अहं आत्मा
है सो
कहिये?
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! अनात्म देहादिक में यह अहंभावना करनी कि
मैं हूँ तो स्वप्न सेना के
तुल्य है
और अधिष्ठान चिन्मात्र दृश्य और
अहंकार से
रहित अहंभावना करनी आत्मरूप है
| हे रामजी! तुम आत्मरूप हो
यह विश्व सत् भी नहीं और
असत् भी
नहीं, जो
अधिष्ठानरूप से
देखिये तो
आत्मरूप है
और जो
अधिष्ठान से
रहित देखिये तो
मिथ्या है
| वह अधिष्ठान शुद्ध, आनन्दरूप, चित्त से
रहित चिन्मात्र परब्रह्म है
उसमें अज्ञान से
दृश्य दीखता है
|जैसे असम्यक् दृष्टि से
सीपी में रूपा
भासता है
तैसे ही
आत्मा में अज्ञानी दृश्य कल्पते हैं | हे रामजी! दृश्य अविचार से
सिद्ध है
और विचार किये से
कुछ वस्तु नहीं होती पर
जिसके आश्रय कल्पित है
सो अधिष्ठान सत्य है
| जैसे सीपी के
जाने से
रूपे की
बुद्धि जाती रहती है
तैसे ही
आत्मविचार से
विश्व बुद्धि जाती रहती है
| जैसे समुद्र में पवन से चक्र-तरंग फुरते और
प्रत्यक्ष भासते हैं पर विचार किये से
चक्र में भी जलबुद्धि होती है
तैसे ही
आत्मरूपी समुद्र में मन के फुरने से
विश्वरूपी चक्र उठते हैं और विचार किये से
तुमको मन
के फुरने में भी आत्मरूप भासेगा, विश्वरूपी चक्र न भासेंगे और
भ्रम निवृत्त हो
जावेगा | जो
वस्तु फुरने में उपजी
है सो
अफुर हुए निवृत्त हो
जाती है
| यह विश्व अज्ञान से
उपजा है
और ज्ञान से
लीन हो
जायेगा | इससे विश्व को
भ्रममात्र जानो | रामजी ने
पूछा, हे
भगवन् आपने कहा कि ब्रह्मा, रुद्र आदि और उत्पत्ति, सम्हार करने पर्यन्त सब
विश्व भ्रम मात्र है,
इस जानने से
क्या सिद्धि होता है,
यह तो
प्रत्यक्ष दुःखदायक भासता है?
वसिष्ठजी बोले, हे
रामजी! जो
कुछ तुम देखते
हो सो
सम्यक् दृष्टि से
सब आत्मरूप है-कुछ भिन्न नहीं-और
असम्यक् दृष्टि करके विश्व है
तो दृष्टि का
भेद है-सम्यक् असम्यक् देखने में भी अधिष्ठान ज्यों का
त्यों है
| जैसे अन्धकार में रस्सी
सर्प हो
भासती है
और भयदायक होती है
और जो
प्रकाश से
देखिये तो
रस्सी भी
भासती है,
तैसे ही
जिसने आत्मा को
जाना है
उसको दृश्य भी
आत्मरूप है
| अज्ञानी को
विश्व भासता और
दुःखदायी होता है
| जैसे मूर्ख बालक अपनी परछाहीं में वैताल
कल्पकर भयवान् होता है
और अपने न जानने से
दुःख पाता है
जो जाने तो
भय किस निमित्त पावे? हे
रामजी! जीव अपने
संकल्प से
आप बन्धायमान होता है
| जैसे कुसवारी कीट अपने
बैठने का
स्थान बनाकर आपही फँस मरती
है, तैसे ही
अनात्मा में अहं प्रतीति करके जीव आपही
दुःख पाता है
| हे रामजी! आपही संसारी होता है
और आपही ब्रह्म होता है
जब दृश्य की
ओर फुरता है
तब संसारी होता और
जब स्वरूप की
ओर आता है तब ब्रह्म आत्मा होता है | इससे जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो , जो संसारी होने की इच्छा हो तो संसारी हो और जो ब्रह्म होने की इच्छा हो तो ब्रह्म हो जावो | मुझसे पूछो, तो दृश्य अहंकार को त्याग कर आत्मा में स्थित हो रहो-विश्व भ्रममात्र है, कुछ वास्तव है नहीं | यह पुरुषार्थ है कि संकल्प से संकल्प को काटो | जब बाहर से अन्तर्मुख होगे तब ब्रह्म ही भासेगा और दृश्य की कल्पना मिट जावेगी, क्योंकि आगे भी नहीं था | हे रामजी! जो सत् वस्तु आत्मा है उसका अनेक यत्नों से नाश नहीं होता और जो असत्य अनात्मा है उसके निमित्त यत्न कीजिये तो सत्य नहीं होता | जो सत्य वस्तु है उसका कदाचित् अभाव नहीं और असत् है उसका भाव नहीं होता असत् वस्तु तबतक भासती है जबतक उसको भले प्रकार नहीं जाना और जब विचार से देखिये तब नाश हो जाती है | अविद्या के पदार्थ विद्या से नष्ट हो जाते हैं-जैसे स्वप्न का सुमेरु पर्वत सत्य हो तो जाग्रत में भी भासे-इससे है नहीं | यह संसार जो तुमको भासता है सो स्वरूप के ज्ञान से नष्ट हो जावेगा | हमसे पूछो तो हमको आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासता, सब आत्मा ही है, यह भी नहीं है कि यह जीव अज्ञानी है किसी प्रकार मोक्ष होवे | न हमको ज्ञान से प्रयोजन है, न मोक्ष होने से प्रयोजन है, क्योंकि हमको सब आत्मा ही भासता है | हे रामजी! जबतक चेतन है तबतक मरता और जन्म भी पाता है, जब जड़ होता है तब शान्ति को प्राप्त होकर मुक्त होता है चेतन दृश्य की ओर फुरने को कहते हैं, इसी से जन्म मरण के बन्धन में आता है | जब दृश्य के फुरने से जड़ हो जावे तब मुक्त हो | इसका होना ही दुःख है और न होना ही मुक्ति है | अहंकार का होना बन्धन है और अहंकार का न होना मुक्ति है | इससे पुरुष प्रयत्न यही है कि अहंकार का त्याग करो और चैतन्य ब्रह्मघन अपने आप में स्थित हो | जिसको संसार की सत् भावना है उसको संसार ही है , ब्रह्म नहीं और जिसको ब्रह्म भावना हुई है उसको ब्रह्म ही भासता है | हे रामजी! जो पाताल में जावे अथवा सम्पूर्ण पृथ्वी, दशोदिशा, आकाश, देवताओं के स्थान में फिरे तो भी सुख न पावेगा और आत्मा का दर्शन न होगा, क्योंकि अनात्मा में अहंकार किये से सुख नहीं | जब आत्मप्रदर्शी होकर देखोगे तो सब आत्मा ही भासेगा ||
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्वविजयो नाम सप्तदशाधिकशततमस्सर्गः ||117||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! यह
संसार संकल्पमात्र है
और तुच्छहै | पर्वत, नदियाँ, देश और काल सब
भ्रम से
सिद्ध हैं | जैसे
स्वप्न में पर्वत,
नदियाँ, देश, काल, निद्रादोष से
भासते हैं, तैसे
ही अज्ञाननिद्रा से
यह संसार भासता है
| हे रामजी! जागकर देखो तो
संसार है
नहीं, इसका तरना महासुगम है
और सुमेरु पर्वतादिक जो
भासते हैं सो कमल की
नाईं कोमल हैं | जैसे
कमल के
मूँदने में कुछ यत्न नहीं तैसे ही
यह निवृत्त होते हैं | अज्ञानियों की
स्थूलदृष्टि है
और आकार को
सब देख रहे हैं जैसे पवन का चलना जाना जाता है
और जब
चलने से
रहित होता है
तब मूर्ख नहीं जानता तैसे ही
भूत प्राणी आकार को
जानते हैं, और इसमें जो
निराकार स्थित है
उसको नहीं जानते जैसे पवन चलता
है तो
भी पवन है और ठहरता है
तो भी
पवन है
तैसे ही
विश्व फुरता है
सो भी
आत्मा है
और अफुरने में भी वही है
| इससे विश्व भी
आत्म रूप है कुछ भिन्न नहीं, जो
सम्यक््दर्शी हैं उनको
फुरने न फुरने में आत्मा
ही भासता है
| जैसे स्पन्द निस्पन्दरूप पवन ही है तैसे ही
ज्ञानी को
सर्वदा एकरस है
अज्ञानी को
द्वैत भासता है
| जैसे ठूँठ में बालक
पिशाचबुद्धि करता है
तैसे ही
आत्मा में जगद््बुद्धि अज्ञानी करता है
और जैसे नेत्रदोष से
आकाश में तरुवरे भासते
हैं तैसे ही
मन के
फुरने से
जगत् भासता है
| हे रामजी! जैसे वायु का
रूप कदाचित् नहीं तैसे ही
जगत् का
अत्यन्त अभाव है
और जैसे मरुस्थल में जल का अभाव है
तैसे ही
आत्मा में जगत्
का अभाव है
| हे रामजी! सुमेरु पर्वत, आकाश, पाताल, देवता, यक्ष, राक्षस इत्यादिक ऐसे अनेक
ब्रह्माण्ड इकट्ठे करके विचाररूपी काँटे में रक्खे
और पीछे आधीरत्ती डालें तो
भी पूरे नहीं होते क्योंकि हैं नहीं,
अविचारसिद्ध हैं | स्वप्न के पर्वत जागे पर
चावल प्रमाण भी
नहीं रहते, क्योंकि हैं नहीं,
भ्रममात्र हैं | हे रामजी! इस
संसार की
भावना मूर्ख करते हैं | ऐसे जो अनात्मदर्शी पुरूष हैं उनको
ऐसे जानो कि
जैसे लुहार की
फूँकनी से
पवन निकलता है
तैसे ही
उन पुरुषों के
श्वास वृथा आते जाते
हैं | जैसे आकाश में अँधेरी व्यर्थ उठती
है तैसे ही
उन पुरुषों का
जीना और
सब चेष्टा व्यर्थ है
और वे
आत्मघाती हैं अर्थात् अपना आप
नाश करते हैं और उनकी चेष्टा दुःख के
निमित्त है
| यह अपने अधीन है
| जो दृश्य की
ओर होता है
तो संसार होता है
और जो
अन्तर्मुख होता है
तो सब
आत्मा ही
होता है
| यह संसार मिथ्या है,
न सत् कहिये,
न असत् कहिये, भ्रम से
हुआ है
ये जीव भूत, भविष्य और
वर्तमानकाल में विपरीत देखते
हैं जैसे अग्नि शीतल होती है,
आकाश पाताल में, पाताल
आकाश में, तारे
पृथ्वी पर,
आकाश के
ऊपर भी
होती है,
बादल बिना मेघ वर्षा
करता है
और आकाश में हल फिरते हैं ऐसे कौतुक मैं देखता
हूँ | हे
रामजी! इसमें कुछ आश्चर्य नहीं, मन
करके सब
कुछ होता है
| जैसे मनोराज किया तैसा ही
आगे स्थित होता है
और सिद्ध होती है
| पर्वत पुर में भिक्षुक के
समान भिक्षा माँगते फिरते हैं, ब्रह्माण्ड उड़ते फिरते हैं, बालू
से तेल निकलता है और मृतक युद्ध करते हैं, मृग गाते हैं और वन नृत्य करते हैं हे रामजी! मनोराज करके सब
कुछ बनता है
| चन्द्रमा की
किरणों से
पर्वत भस्म होते हैं, इसमें
क्या आश्चर्य है? ऐसे ही यह संसार भी
मनोराज है
और शौघ्र संवेग है
इससे इसको जीव सत् मानता है
और आगे जो बालू से
तेलादिक कहे है उनको सत् नहीं
जानता, क्योंकि उसमें मृदु संवेग है
पर दोनों तुल्य हैं | हे रामजी जिनको सत् और असत् कहते हो
सो आत्मा में दोनों
नहीं | ये
जो तुमको सत् पदार्थ भासते
हैं तो
अग्नि आदिक शीतल भी
सत् हैं और जो मिथ्या भासते हैं तो वे भी मिथ्या हैं, केवल तीव्र और मृदु संवेग का भेद है | जब तीव्र संवेग दूर होता है तब सब मिथ्या मानते हैं | जैसे स्वप्न से जागा हुआ स्वप्न को मिथ्या कहता है और जाग्रत् को सत्य कहता है पर दोनों मनोराज हैं | हे रामजी! जितने आकार दृष्टि आते हैं उन सबको मिथ्या जानो, न तुम हो, न मैं हूँ और न यह जगत् है परमार्थ सत्ता ज्यों की त्यों है, उसमें अहं त्वं का उत्थान कोई नहीं, वह केवल शान्तरूप, आकाशरूप और निराकाररूप है जिसमें कुछ द्वैत नहीं-केवल अपने आपमें स्थित है जैसे बालक मृत्तिका के हाथी, घोड़े और मनुष्य बनाकर उनके नाम कल्पता है- कि यह राजा है, यह हाथी है, यह घोड़ा हे सो मृत्तिका से भिन्न नहीं पर बालक के मन में उनके नाम भिन्न भिन्न दृढ़ होते हैं, तैसे ही मनरूपी बालक नाना प्रकार की संज्ञा कल्पता है पर आत्मा से कुछ भिन्न नहीं | इसे हे रामजी! तुम किसका भय करते हो?
निर्भय हो रहो | तुम्हारा स्वरूप शुद्ध, निर्भय और अविद्या के कारण कार्य से रहित है उसमें स्थित रहो | यह संसार तुम्हारे फुरने में हुआ है, आत्मा न सत्य है, न असत्य है, न जड़ है, न चेतन है, न प्रकाश है, न तम है, न शून्य है, न अशून्य है | शास्त्र ने जो विभाग कहे हैं कि यह जड़ है, यह चेतन है सो इस जीव के जगाने के निमित्त कहे हैं | आत्मा में कोई वास्तव संज्ञा नहीं-केवल आत्मत्वमात्र है इससे दृश्य की कलना त्याग कर आत्मा में स्थित हो | ब्रह्मा से आदि स्थावर पर्यन्त सब कलनामात्र है, इसमें क्या आस्था करनी है? संसार के भाव दोनों तूल्य हैं | फुरना जैसा भाव का है तैसा ही अभाव का है-स्वरूप में दोनों की तुल्यता है और व्यवहारकाल में जैसा है तैसा ही है |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्वप्रमाणवर्णनं नामाष्टदशाधिकशततमस्सर्गः ||118||
रामजी ने
पूछा, हे
भगवन्! भूमिका प्रसंग यहाँ चला था, उसमें जो
सार आपने कहा वह मैं समझ गया, अब भूमिकाओं का
विस्तार कहिये | योगी का
शरीर जब
छूटता है
और स्वर्ग के
भोगों को
भोगकर गिरता है
तो फिर उसकी
क्या अवस्था होती है
सो भी
कहिये | वशिष्ठ जी
बोले, हे
रामजी! जिस योगी
को भोग की वाच्छा होती है
वह स्वर्ग में जाकर
भोग भोगता है
पर यदि उसको
और भी
भोगने की
इच्छा होती है
तो वह
मध्यमण्डल मनुष्यलोक में पवित्रस्थान और
धनवानों के
गृह में जन्म
लेता है
और जो
उसको भोग की वाञ्छा और
नहीं होती तो
ज्ञानवानों के
गृह में जन्म
लेता है
| थोड़े काल के उपरान्त उसका पिछला संस्कार आ फुरता है
वह स्मरण करके आत्मा की
ओर होता जाता है
| जैसे कोई पुरुष
लिखता हुआ सो जाता है
पर जब
जागता है
तब उस
लिखे को
देखकर फिर आगे लिखता है
तैसे ही
वह योगी पूर्व के
अभ्यास को
दिन दिन बढ़ाता जाता
है | वह
अज्ञानी का
संग नहीं करता क्योंकि वह
भोगों के
सम्मुख है
और आत्ममार्ग से
वहि र्मुख है,
जो चुगुली करनेवाले हैं उनका
संग नहीं करता, उसके सब
अवगुण नाश हो जाते हैं और दम्भ, गर्व, राग, द्वेष,
भोग की
तृष्णा आदि स्वाभाविक छूट जाते
हैं | वह
शान्ति को
प्राप्त होता है
और उसको कोमलता, दया आदि शुभगुण स्वाभाविक प्राप्त होते हैं | हे रामजी! इस
निश्चय को
पाकर वह
वर्णाश्रमके धर्म यथाशास्त्र करता हुआ संसार
समुद्र के
पार के
निकट प्राप्त होता है
पर पार नहीं
होता यह
भेद है
सो तीसरी भूमिका है-फिर मोह को नहीं प्राप्त होता | जैसे चन्द्रमा की
किरणें कदाचित् ताप को नहीं प्राप्त होती तैसे ही
तीसरी भूमिकावाला संसाररूपी गढ़े में नहीं
गिरता | हे
रामजी! यह सप्तभूमिका ब्रह्मरूप हैं पर इतना ही भेद है कि तीन भूमिका जाग्रत् रूप हैं, चतुर्थ स्वप्न है, पंचम सुषुप्ति है, षष्ठ तुरीय है और सप्तम तुरीयातीत है | हे रामजी! प्रथम तीन भूमिकाओं में संसार की सत्यता भासती है इससे जाग्रत् कही है और पिछली चारों में संसार का अभाव है इससे जाग्रत् से विलक्षण है | जाग्रत् में घट, पट आदिक सत् भासते हैं कि घट घट ही है और पट पट ही है अन्यथा नहीं अपना ही कार्य सिद्ध करते हैं, इससे अपने काल में ज्यों के त्यों हैं | इसी प्रकार सब पदार्थ हैं | तीसरी भूमिकावाला स्थावर-जंगम को जानता है और नाम और रूप से ग्रहणकरता है पर हृदय में राग द्वेष नहीं धारता, क्योंकि विचार करके तुच्छ जाने है पर संसार का अत्यन्त अभाव नहीं जाना और ब्रह्मस्वरूप को भी नहीं जानता, क्योंकि उसको स्वरूप का साक्षात्कार नहीं हुआ | जब स्वरूप को जाने तब संसार का अत्यन्त अभाव हो जावे | इन तीनों भूमिकाओं से संसार की तुच्छता होती है नष्टता नहीं होती | इनको पाकर जब शरीर छूटता है तब और जन्म में उसको ज्ञान प्राप्त होता है और दिन दिन में ज्ञानपरायण होता है जब बुद्धि शुद्ध होती है तब ज्ञान उपजता है | जैसे बीज से प्रथम अंकुर होता है और फिर डाल, फूल, फल निकलते हैं तैसे ही प्रथम भूमिका ज्ञानका बीज है, दूसरी अंकुर है, तीसरी डाल है और चतुर्थ से ज्ञान की प्राप्ति होती है सो ही फल है प्रथम तीन भूमिकाओंवाला धर्मात्मा होता है और पुरुषों में श्रेष्ठ है | उसका लक्षण यह है कि वह निरहंकार, असंगी और धीर होता है | उसकी बुद्धि से विषयों कि तृष्णा निवृत्त हो जाती है और वह आत्मपद की इच्छा रखता है | यह पुरुष श्रेष्ठ कहाता है, प्रकृत आचार में यथाशास्त्र विचरता है और शास्त्रमार्ग को कदाचित् नहीं छोड़ता जो शास्त्रमार्ग को मर्यादा के साथ अपने प्रकृत आचार में बिचरता है सो पुरुष श्रेष्ठ है | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! पीछे आपने कहा है कि जब मनुष्य शरीर छोड़ता है तब एक मुहूर्त में उसको युग व्यतीत होता है और जन्म से आदि मरणपर्यन्त जैसी किसी को भावना होती है तैसा आगे भासता है सो एक मुहूर्त में युग कैसे भासता है? यह कहिये | वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! यह जगत् जो तीनों कालोंसहित भासता है वह ब्रह्मस्वरूप ही है, भिन्न कुछ नहीं-समान ही है | जैसे ईख में मधुरता है तैसे ही ब्रह्म में जगत् है और जैसे तिलों में तेल है और मिरचों में तीक्ष्णता है तैसे ही आत्मा में जगत् है | जैसे तिलों में तेल होता है तैसे ही ब्रह्म में जगत् है | कहीं सत्, कहीं असत्, कहीं जड़, कहीं चेतन, कहीं शुभ, कहीं अशुभ, कहीं नरक, कहीं मृतक, कहीं जीवित, ब्रह्म से काष्ठपर्यन्त भाव अभावरूप होता | वह सत् असत् से विलक्षण है | आत्मसत्ता से अब सत्य है और भिन्न देखिये तो असत्य है | हे रामजी! जिनको सत्य असत्य जानते हो कि पृथ्वी आदिक पदार्थ सत्य और आकाश के फूलादिक असत्य हैं सो दोनों तुल्य हैं | जो विद्यमान पदार्थ सत्य मानिये तो आकाश के फूल भी सत् मानिये | जैसे स्वप्न में कई पदार्थ सत् और असत् भासते हैं तैसे ही जाग्रत में भासते हैं पर फुरना दोनों का समान है | जैसे सत्य पदार्थों का फुरना हुआ तैसा ही असत् का भी हुआ है, फुरने से रहित सत् असत् दोनों का अभाव हो जाता है | इससे यह विश्व भ्रम से सिद्ध हुआ है | जैसे जल में पवन से चक्र उठते हैं तैसे ही आत्मा में फुरने से संसार भासता है, इसकी भावना त्यागकर स्वरूप में स्थित हो रहो | तुमने जो प्रश्न किया कि एक मुहूर्त में युग कैसे भासता है? उसका उत्तर सुनो | जैसे किसी पुरुष को स्वप्ना आता है तो एक क्षण में बड़ा काल बीता भासता है तथा और का और भासता है सो आश्चर्य तो कुछ नहीं, मोह से सब कुछ उत्पन्न होता है और भ्रम से दृष्टि आता है | हे रामजी! जैसे पुरुष सोया है तो एक आपही होता है पर उसमें नाना प्रकार का जगत भ्रम से भासता है तैसे ही स्वरूप के प्रमाद से जीव कई भ्रम देखता है | स्वरूप के जाने बिना भ्रम का अन्त नहीं होता इससे तुम और प्रश्न किस निमित्त करते हो? एक चित्त को स्थिर करके देखो तो न कोई संसार भासेगा न कोई संसार भासेगा न कोई जन्म-मरण होंगे, न कोई बन्ध है, न मोक्ष है केवल आत्मा ही भासेगा | जब संकल्प फुरता है तब अविद्या से आपको बन्ध जानता है और संकल्प से रहित मुक्त जानता है और विद्या से मुक्त जानता है पर आत्मस्वरूप ज्यों का त्यों है उसे न बन्ध है, न विद्या और न अविद्या है-केवल शान्तरूप है | इससे सर्वदा सर्व प्रकार, सर्व ओर से ब्रह्म ही है दूसरा कुछ नहीं | हे रामजी! जब स्वरूप की भावना होती है तब संसार की भावना जाती रहती है-ये सर्वशब्द कलना में यह पदार्थ है, यह नहीं है आत्मा में यह कोई नहीं | जैसे पवन चलने और ठहरने में एक ही है तैसे ही विश्व चित्त का चमत्कार है | ब्रह्मा से चींटी पर्यन्त ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है और आत्मा ही के आश्रय सर्व शब्द फुरते हैं पर आत्मा फुरने और न फुरने में सम है, क्योंकि दूसरा कोई नहीं | हे रामजी! जो ब्रह्मसत्ता ही है तो आकाश क्या है, पृथ्वी क्या है, मैं क्या हूँ, यह जगत् क्या है, ये प्रश्न बनते ही नहीं | एक मन को स्थिर करके देखो कि ब्रह्मा से चींटी पर्यन्त कुछ भी पदार्थ भासता है जो सत् भासे तो प्रश्न कीजिये | इससे जैसे भ्रम से दूसरा चन्द्रमा भासता है तैसे ही जगत् भी भ्रम से भासता है | रूप अर्थात् दृश्य, अवलोक अर्थात् इन्द्रियाँ, मनस्कार अर्थात् मन की स्फूर्ति, ये शब्द कलना में फुरे हैं सो सब मिथ्या है-आत्मा में ये कोई नहीं | हे रामजी! आकाश आदिक जो पदार्थ हैं सो भावना में स्थित हुए हैं | जैसी भावना करता है तैसे ही पदार्थ-सिद्ध होते हैं और भासते हैं | जब संसार की भावना जावे तब कोई पदार्थ न भासे | हे रामजी! सुषुप्ति में ही जब इसका अभाव हो जाता है तो तुरीया में कैसे भान हो | जब जीव स्वरूप से गिरता है तब उसको संसार भासता है और संसार में वासना और प्रमाद से घटीयन्त्र की नाईं फिरता है | स्वरूप से उतर कर अनात्म में अभिमान करने को प्रमाद कहते हैं कि मैं हूँ | यही अज्ञान है जिससे दुःख पाता है, जब अज्ञान नष्ट हो तब संसार के शब्द अर्थ का अभाव हो जावे | अहंकार से संसार होता है, संसार का बीज अहंकार ही है | अहंकार में आत्माभिमान करने को कहते हैं | हे रामजी! शुद्ध आत्मा अहंकार के उत्थान से रहित केवल शान्तरूप है और विश्व भी वही रूप है | इसकी भावना में दुःख है | यह संवित शक्ति आत्मा के आश्रय फुरती है | जैसे तेल की बूँद जल में डालिये तो चक्र की नाईं फिरती है तैसे ही संवेदन शक्ति आत्मा के आश्रित फुरती है और ब्रह्म एक स्वरूप है उसका स्वभाव ऐसे है | जैसे मोर का अण्डा और उसका वीर्य एकरस है अपने स्वभाव से वीर्य ही नाना प्रकार के रंग धारता है तो भी मोर से कुछ भिन्न नहीं, तैसे ही आत्मा के संवेदन स्वभाव से नाना प्रकार का विश्व भासता है परन्तु आत्मा से कुछ भिन्न नहीं- आत्मरूप ही है सम्यक््दर्शी को नाना प्रकार में एक आत्मा ही भासता है और अज्ञानी को नाना प्रकार का जगत् भासता है | हे रामजी! ब्रह्मरूपी एक शिला है उसमें त्रिलोकरूपी अनेक पुतलियाँ कल्पित हैं | जैसे एक शिला में शिल्पी पुतलियाँ कल्पता है इसमें इतनी पुतलियाँ होंगी सो वे पुतलियाँ उसके चित्त में हैं और शिला में कुछ नहीं हुआ तैसे ही आत्मारूपी शिला में चित्तरूपी शिल्पी नाना प्रकार के पदार्थरूपी पुतलियाँ कल्पता है सो सर्व आत्मा रूप है | इससे पदार्थों की भावना त्यागकर आत्मा में स्थित हो | यह संसार भी निर्वाच्य है; क्योंकि ब्रह्म ही है ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं न कोई उपजता है, न कोई विनशता है ज्यों का त्यों आत्मा ही स्थित है |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगद्भावप्रतिपादनं नाम शताधिककैकोनविंशतितमस्सर्ग: ||119||
रामजी ने
पूछा, हे
भगवन्! तो इस
संसार का
बीज अहंकार हुआ इसका
पिता अहंकार है
तो मिथ्या संसार जो
विद्यमान भासता है
सो भ्रमरूप हुआ? और जो
भ्रमरूप है
तो लोग और शास्त्र, श्रुति और
स्मृति क्यों कहते हैं कि इसका शरीर पिण्ड से
होता है? और जो
पिण्ड से
होता है
तो आप
कैसे भ्रम कहते हैं? जो भ्रम है
तो लोग, शास्त्र, श्रुति और
स्मृति क्यों पिण्ड से
कहते हैं? इससे मेरे संशय को
निवृत्त कीजिये | वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! मेरा कहना सत्य है
| ऐसे ही
है | ब्रह्म में ब्रह्मत्व स्वभाव है
और जगत् का
स्वभाव भी
वही है
| हे रामजी! आदि को किंचन हुआ और चित्तशक्ति फुरी है
वही ब्रह्मरूप हुआ है और उसको पदार्थों का
मनोराज हुआ है | यह आकाश है,
यह पवन है; यह कर्तव्य है,
यह अकर्तव्य है,
यह सत्य है,
यह झूठ है इत्यादि जबतक मनोराज है
तबतक सर्व मर्यादा ऐसे ही है | फिर ब्रह्मा में यह चिन्तना हुई कि जगत् की
मर्यादा के
निमित्त वेद को कहूँ कि
यह पदार्थ शुभ है और यह
अशुभ है
| हे रामजी! आत्मा में कुछ द्वैत नहीं, मायारूप जगत् में मर्यादा है,
तो अधः, ऊर्ध्व, नीच, ऊँच कौन कहे ? यह मर्यादा भी
वेद में नीति
निश्चय हुई है कि ये
शुभ कर्म हैं, इनके
किये से
स्वर्ग सुख ही भोगते हैं और ये अशुभकर्म हैं इनके
किये से
नरक-दुःख भोगते हैं | हे रामजी! जैसे वेद में निश्चय किया है
तैसे ही
जीव अपनी वासना के
अनुसार भोगता है
| हे रामजी! यह
रचित शक्ति नीति होकर ब्रह्मादिक में फुरी
है परन्तु उनको सदा स्वरूप में निश्चय है इससे वे
बन्धन नहीं होते और
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र ने
यह वेद माला
धारी है
कि जैसा कोई कर्म
करे तैसा ही
फल देते हैं, यह वेद सब
की नीति है
| हे रामजी जिन पुरुषों को
संसार की
सत्यता-दृढ़ हुई है वे जैसे कर्म शुभ अथवा
अशुभ करते हैं तैसे
ही शरीर को
धारते हैं | इसमें
संशय नहीं कि
जो शास्त्रमर्यादा को
अपनी इच्छा से
उल्लंघित बर्तते हैं सो शरीर त्यागकर कुछ काल मूर्छित हो
जाते हैं और आत्मज्ञान बिना एक
मुहूर्त में जागकर
बड़े नरकों को
चले जाते हैं | जिनको
शून्य भावना हुई है कि आगे नरक स्वर्ग कोई नहीं
और जो
लोक परलोक के
भय को
त्यागकर शास्त्र से
बाह्य बर्तते हैं सो मरकर पत्थर वृक्षादिक जड़योनि पाते हैं और चिरकाल से
उनकी वासना प्रणमती है
फिर दुःख के
भागी होते हैं और जिनको आत्मभावना हुई है और संसार की
भावना निवृत्त हुई है वे शास्त्र विहित करें अथवा अविहित करें उनको कोई बन्धन
नहीं | हे
रामजी! चित्तरूपी भूमि में निश्चयरूपी जैसा बीज बोता
है तैसा ही
काल पाकर उगता है-यह निःसंशय है
| इससे तुम आत्मभावनारूप बीज बोओ कि सर्व आत्मा है
| ऐसी भावना करो तब शुद्ध आत्मा ही
भासेगा और
जिनको संसार का
निश्चय हुआ है उनको संसार है
| हे रामजी! जो
पुरुष धर्मात्मा हैं उनको
उसी वासना के
अनुसार भासता है
| धर्मात्मा भी
दो प्रकार के
हैं-एक
सकामी और
दूसरे निष्कामी | जो
धर्म करते हैं और पापरूपी कामना सहित हैं तो वे स्वर्गभोग फिर गिरते
हैं और
जो निष्काम ईश्वरार्पण कर्म करते हैं उनका
अन्तःकरण शुद्ध होकर ज्ञान की
प्राप्ति होती है
| यह भी
संसार में मर्यादा है
कि जैसा किसी को
निश्चय होता है
तैसा ही
संसार को
देखता है
| पिण्ड करके भी
शरीर होता है
क्योंकि यह
भी आदि नीति
में निश्चय हुआ है जैसे आदि नीति
में निश्चय हुआ है तैसे ही
होता है
| जो पवन है सो पवन ही है और
जो अग्नि ही
है सो
अग्नि ही
है इसी प्रकार कल्पपर्यन्त जैसे मनोराज हुआ है तैसे ही
स्थित है
| जैसे जल
नीचे ही
को जाता है-ऊँचे नहीं जाता, तैसे ही
जो आदि में निश्चय हुआ है वही कल्पपर्यन्त रहता है | हे रामजी! जगत् व्य वहार में तो ऐसे है और परमार्थ से दूसरा कुछ हुआ नहीं, इस जीव ने आकाश में मिथ्या देह रची है | परमार्थ से केवल निराकार अद्वैत आत्मा है शरीर इसके साथ नहीं है इससे जगत् कैसे हो?
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पिण्डनिर्णयो नाम शताधिक विंशतिततमस्सर्गः ||120||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! तुम्हारे प्रश्न पर
एक इतिहास बृहस्पति और
बलि राजा का
है सो
सुनो | जब
छः कल्प व्यतीत हुए तो दूसरे परार्द्ध में राजा
बलि हुआ | वह अति महापराक्रमी था
| उस
राजा बलि ने सम्पूर्ण दैत्यों और
राक्षसों को
जीतकर अपने वश
किया और
उन पर
अपनी आज्ञा चलाई | इन्द्र को
भी जीतकर अपने वश
किया और
उसका सम्पूर्ण ऐश्वर्य ले
लिया | देवता और
किन्नरों पर
उसकी आज्ञा चली और भूलोक भी
उसने ले
लिया | जब
वह सबको ले
चुका तब
उसने धर्म आचार को
ग्रहण किया | एक
समय सब
सभा बैठी थी
और यह
कथा चली कि जन्म कैसे होता है
और मरण कैसे
होता है?
तब राजा बलि ने देव गुरु बृहस्पति से
प्रश्न किया कि
हे ब्राह्मण! यह पुरुष जब
मृतक होता है
तब शरीर तो
भस्म हो
जाता है
फिर कर्मों के
फल कैसे भोगता है
और शरीर बिना कैसे आता जाता
है सो
कहिये?
बृहस्पति बोले, हे
राजन्! जीव के देह नहीं है
| जैसे मरुस्थल में जल भासता है
पर है
नहीं, तैसे ही
जीव के
साथ शरीर भासता है
और है
नहीं | जीव न जन्मता है,
न मरता है,
न भस्म होता है,
न दुःखी होता है
| यह सदा अच्युतरूप है
पर स्वरूप के
प्रमाद से
आपको दुःखी जानता है
कि मैं इनको
भोगता हूँ और जन्मा हूँ इतना
काल हुआ है, यह मेरी माता है
यह पिता है,
मैं इनसे उपजता हूँ और फिर आपको मृतक हुआ जानता
है | हे
राजन्! भ्रम से
ऐसे देखता है
जैसे निद्राभ्रम से
स्वप्न में देखता
है तैसे ही
अज्ञान से
जीव आपको मानता है
| जब मृतक होता है
तब जानता है
कि मेरा शरीर पिण्ड से
हुआ है
और अब
मैं दुःख सुख भोगूँगा | जैसे स्वप्न में आकाश
होता है
और वहाँ वासना से
अपने साथ शरीर
देखता है
और सुख दुःख
भोगता है
तैसे ही
मर कर
जीव अपने साथ शरीर
देखता है
और दुःख सुख का भागी होता है|
परमार्थ से
इसके साथ शरीर
ही नहीं तो
जन्म मरण कैसे
हो? स्वरूप से
प्रमाद करके देहधारी की
नाईं स्थित हुआ है और उस
देह से
मिलकर जैसी-जैसी भावना करता है
तैसे ही
फल भोगता है
और वासना के
अनुसार जैसी भावना होती है
तैसे ही
आगे शरीर देखता है
और पञ्चभौतिक संसार को
देखता है,
इस प्रकार भ्रमता है
और जन्मता मरता आपको देखता है
| जैसे समुद्र से
तरंग उठता और
मिट जाता है
तैसे ही
शरीर उपजता और
नष्ट होता है
| शरीर के
सम्बन्ध से
ही उपजता और
विनाशता भासता है
| यह आश्चर्य है
कि आत्मा ज्यों का
त्यों स्वाभाविक स्थित है
उसमें वासना के
अनुसार विश्व देखता है
| हे राजन्! विश्व इसके हृदय में स्थित
है और
भावना के
अनुसार आगे देखता
है | इस
जीव में विश्व
है और
विश्व में जीव नहीं | जैसे तिल में तेल है
और तेल में तिल नहीं और
सुवर्ण में भूषण
कल्पित है
भूषण में सुवर्ण कल्पित नहीं
वैसे ही
विश्व सत् भी नहीं और
असत् भी
नहीं | सत् इस कारण नहीं कि
चलरूप है
स्थित नहीं और
असत् इससे नहीं कि
विद्यमान भासता है
| इससे इसकी भावना त्यागो, यह
दृश्य मिथ्या है
और इसका अनुभव मिथ्या है
और इसका जाननेवाला अहंकार जीव भी मिथ्या है
| जैसे मरुस्थल में जल मिथ्या है
तैसे ही
आत्मा में अहंकार और जीव मिथ्या है
| हे राजन्! जबतक शास्त्रों के
अर्थ में चपलता
है और
स्थिति से
रहित है
तबतक संसार की
निवृत्ति नहीं होती और
जब दृश्य के
फुरने और
अहंकार से
जड़ हो
तब इसको आत्मपद की
प्राप्ति हो
| जबतक दृश्य की
ओर फुरता है
और चेतन सावधान है
तबतक संसार में भ्रमता है | हे राजन्! आत्मा न कहीं जाता है,
न आता है, न जन्मता है,
न मरता है
| जब चैत्य और
चित्त का
सम्बन्ध मिट जावे
तब आनन्दरूप ही
है |चैत्य दृश्य को
कहते हैं और चित्त अहंकारसंवित् का
नाम है
| जब दोनों का
सम्बन्ध आपस में मिट जावेगा तब शेष आत्मा ही रहेगा | वह ब्रह्म आत्मा और शिवपद है जिसमें वाणी की गम नहीं और अनुभव निर्वाच्य पद है उसी में स्थित हो | हे रामजी! जिस युक्ति से इसकी इच्छा अनिच्छा निवृत्त हो सो युक्ति श्रेष्ठ है जबतक फुरना उठता है कि यह भाव है यह अभाव है, तबतक इसको जीव कहते हैं और जब भाव अभाव का फुरना मिट जाता है तब जीवसंज्ञा भी जाती रहती है | शिवपद आत्मा को प्राप्त होता है जहाँ वाणी की गम नहीं |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे बृहस्पतिबलिसंवादवर्णनंनाम शताधिकैकविंशतितमस्सर्गः ||121||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! इस
प्रकार बृहस्पति ने
बलि राजा से
कहा था
वह तेरे प्रश्न के
उत्तर निमित्त मैंने कहा है | जबतक हृदय में संसार
की सत्यता है
तबतक जैसे कर्म करेगा तैसा ही
शरीर धरेगा | हे
रामजी! जिस वस्तु
को चित्त देखता है
उसकी ओर
अवश्य जाता है,
उसका संस्कार उसके हृदय में होता
है और
जिस पदार्थ को
सत् जानता है
उस पदार्थ का
संस्कार स्थित हो
जाता है
| जैसे मोर के अण्डे में शक्ति
होती है
और जब
समय आता है तब नाना प्रकार के
रंग उसमें प्रकट भासते हैं, तैसे
ही चित्त का
संस्कार भी
समय पाकर जागता है
| हे रामजी! चित्त अज्ञान से
उपजता है
| फिर बृहस्पति ने
कहा हे
राजन्! बीज पृथ्वी पर उगता है
आकाश में नहीं
उगता, जैसा बीज पृथ्वी में बोया जाता है
तैसा ही
फल होता है
| यहाँ अहंरूप अपना होना यही पृथ्वी है जैसी जैसी भावना से
कर्म करता है
तैसा तैसा चित्तरूपी पृथ्वी पर
उत्पन्न होता है
और फिर उसमें
फल होता है
| उन कर्मों के
अनुसार देह धार के सुख दुःख
को भोगता है
| ज्ञानवान् आकाशरूप है
आकाश में बीज कैसे उपजे? बीज भावना
से अज्ञानरूपी पृथ्वी में उगता
है | बलि ने पूछा, हे
देवगुरो! आपने कहा कि जीव जीता हो
अथवा मृतक हो
इसे अपनी भावना ही
से अनुभव होता है
तो जब
यह मृतक हुआ और इसकी पिण्डादिक में भावना
न हुई तो फिर इसका शरीर कैसे होता है? बृहस्पति बोले, हे
राजन्! पिण्डदान आदि क्रिया न हों पर
उसके हृदय भावना हो
और उसी समय किसी ने
किया तो
भी वह
जो हृदय में भावना
है वही कर्मरूप है
और उसी में भासि आता है और जो
उसके हृदय में भावना
नहीं और
किसी बान्धव ने
उसके निमित्त पिण्डदान किया तो
भी इसको भासि आता है, क्योंकि वह
भी इसकी वासना में स्पन्द है | हे राजन् जो
अज्ञानी जीव हैं और जिनको अनात्म में आत्मबुद्धि है
उनके कर्म कहाँ गये हैं वे जो
कर्म करते हैं वही उनके चित््रूपी भूमि में उगते
हैं | उनके शरीरों की
क्या संख्या है?
वे वासनारूपी अनेक शरीर ज्ञान बिना स्वप्नवत् धारते है
| बलि बोले, हे
देवगुरो! यह
निश्चय करके मैंने जाना है
कि जिसको निष्किंचन की
भावना होती है
वह निष्किंचन पद
को प्राप्त होता है
और संसार की
ओर से
शिला की
नाईं हो
जाता है
जिसकी जैसी भावना होती है
तैसा ही
स्वरूप हो
जाता है
जब संसार से
पत्थरवत् हो
तब मुक्त हो
| बृहस्पति बोले, हे
राजन्! निष्किंचन को
जब जानता है
तब संसार की
ओर से
जड़ है
और केवल सारपद में स्थित
होता है
| जिसे गुण चला न सकें उसे जानिये कि निष्किंचन पद
को प्राप्त हुआ है | वही निःसंदेह मुक्त है
| हे राजन्! जबतक संसार सत्यता चित्त में स्थित
है तबतक वासना है
और जबतक वासना है
तबतक संसार है
| संसार के
अभाव बिना शान्ति नहीं होती | स्वरूप के
प्रमाद से
चित्त हुआ है, चित्त से
वासना हुई है और वासना से
संसार हुआ है, इससे इस
वासना को
त्याग करो | फुरना
फुरे तो
निष्किंचनभाव हो
और शान्तभागी हो
|हे राजन्! जिस युक्ति और क्रम से
यह निष्किंचनरूप हो
वही करे | वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! इस
प्रकार से
सुरपुर में असुर
नायक को
सुरगुरु ने
जो पिण्डदानादि क्रिया कही वह मैंने तुमको सुनाई |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे बृहस्पतिबलिसंवादो नाम शताधिकद्वाविंशतितमस्सर्गः ||122||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! चाहे जीता हो
चाहे मृतक हो
जो कुछ इसके
चित्त के
साथ स्पर्श होगा उसका अनुभव अवश्य करेगा | जैसे मोर के अण्डे में रस होता है
तो वह
समय पाकर विस्तार पाता है
तैसे ही
इसके भीतर जो
वासना का
बीज है
वह यदि प्रकट
नहीं भासता तो
भी समय पाकर
विस्तारवान् होता है
| जबतक चित्त है-तबतक संसार है
और जब
चित्त नष्ट हो
तब सब
भ्रम मिट जावे
| हे रामजी! चित्त भी
असत् है
तो विश्व भी
असत्य है
| जैसे आकाश में नीलता
भ्रम से
भासती है
तैसे ही
आत्मा में विश्व
भ्रम है
| हे रामजी! हमको न चित्त भासता है
न विश्व भासता है,
मैं भी
आकाश हूँ और तुम भी
आकाशरूप हो
| यह चित्तस्वरूप के
प्रमाद करके उपजता है
| जैसे जहाँ काजल होता है
वहाँ श्यामता भी
होता है
तैसे ही
जहाँ चित्त होता है
वहाँ वासना होती है
| जब ज्ञानरूपी अग्नि से
वासना दग्ध हो
तब चित्त सत्पद को
प्राप्त होता है
और जीवित संज्ञा निवृत्त होती है
| हे रामजी! चित्त के
उपशम का
उपाय मुझसे सुनो तो
उससे चित्त निर्वाण हो
जावेगा | जो
भूमिका ज्ञान की
हैं उनसे चित्त नष्ट हो
जावेगा | उनमें से
तीन भूमिका तो
तुमसे क्रम से
कही हैं और चार कहने को
रही हैं | हे रामजी! प्रथम तीन भूमिकाओं में से जिसको एक
भी प्राप्त होती है,
उसको महापुरुष जानो | उसके मान और मोह निवृत्त होजाते हैं और उसे संगदोष नहीं लगता उसमें विचार स्थिति से
कामना नष्ट हो
जाती है
और राग द्वेष
न रहकर सुख दुःख
में सम
रहता है
| ऐसा अमूढ़ पुरुष अव्ययपद को
प्राप्त होता है
| इतने गुण तीसरी
भूमिका में प्राप्त होते हैं और चित्त नष्ट हो
जाता है
तब संहार नहीं दृष्टि आता है जैसे दीपक से
देखिये तो
अन्धकार नहीं मिलता |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्ताभावप्रतिपादनं नाम शताधिकत्रयोविंशतितमस्सर्गः |123||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! जब
तृतीय भूमिका दृढ़ पूर्ण होके दृढ़ अभ्यास से
चौथी भूमिका उदय होती
है तो
अज्ञान नष्ट हो
जाता है
और सम्यक््ज्ञान चित्त में उदय होता है
| तब वह
पूर्णमासी के
चन्द्रमावत् शोभा पाता है
और आदि अन्त
से रहित निर्विभाग चैतन्य तत्त्व में उस योगी का
चित्त स्थित होता है
और वह
सबको सम
देखता है
| जिस योगी को
चतुर्थ भूमिका प्राप्त होती है
उसके नाना प्रकार के
भेदभाव निवृत्त हो
जाते हैं और अभेद सर्व आत्मभाव उदय होता
है | उसको जगत् स्वप्न की
नाईं भासता है
और इन्द्रियों का
व्यवहार स्वप्नवत् हो
जाता है
| जैसे जिनको सुषुप्ति होती है
उसे काल में खाना-पीना रस
से रहित हो
जाता है
तैसे ही
चतुर्थ भूमिकावाले का
व्यवहार रस
से रहित होता है
| जैसे सूर्य अपने प्रकाश से
प्रकाशता है
तैसे ही
उसको आत्मा का
प्रकाश उदय होता
है और
उसकी सब
कल्पना नष्ट हो
जाती है,
न किसी पदार्थ में राग रहता है,
न किसी में द्वेष
रहता है
| संसारसमुद्र में डुबानेवाले राग और द्वेष हैं | इष्ट
पदार्थ में न राग होता है
और न अनिष्ट में द्वेष
होता है
| इससे वह
संसारसमुद्र में गोते
नहीं खाता और
उसके चित्त को
मोहित नहीं कर
सकता | हे
रामजी! जब
तक तृतीय भूमिका होती है
तब तक
उसको जाग्रत अवस्था होती है
और जब
चतुर्थ भूमिका प्राप्त होती है
तब जगत् स्वप्न हो
जाता है
| तब वह
सरजगत् को
क्षणभंगुर और
नाशवन्त देखता है
और द्रष्टा, दर्शन, दृश्य भावना का
अभाव हो
जाता है
| रामजी ने
पूछा, हे
भगवन्! जाग्रत्, स्वप्न और
सुषुप्ति का
लक्षण कहिये और
तुरीया और
तुरीयातीत मुझसे कहिये | गुरु शिष्य को
उपदेश करते खेदवान् नहीं होते | वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! तत्त्व का
विस्मरण, पदार्थों की
भावना और
नाशवन्त पदार्थों को
सत् की
नाईं जानना ही
जाग्रत है
| पदार्थों में भाव-अभाव की
सत्यता और
जगत् को
मिथ्या भावनामात्र जानना स्वप्ना कहाता है
और जाग्रत और
स्वप्न जिसमें लय
हो जावें सो
सुषुप्ति है
यदि ज्ञान से
भेद की
शान्ति हो
जावे और
जाग्रत- स्वप्न-सुषुप्ति तीनों का
अभाव हो
ऐसी जो
निर्मल स्थिति है
सो तुरीया है
| हे रामजी अज्ञानी जीव संसार
का वर्षाकाल के
मेघ की
नाईं देखते हैं, क्योंकि उनको दृढ़ होकर भासता है
पर जिसको चतुर्थ भूमिका प्राप्त हुई है वह शरत््काल के
मेघ की
नाईंसंसार को
देखता है
और जिसको पञ्चम भूमिका प्राप्त हुई है वह शरत््काल में मेघ नष्ट हुए की नाईं देखता है
| जैसे निर्मल आकाश होता है
तैसे ही
उसको निर्मल भासता है
| इन तीनों को
वृत्तान्त सुनो | अज्ञानी जगत् को
जाग्रत् की
नाईं देखता है
और उसको जगत् की
दृढ़ सत्यता भासती है
इससे उसे राग द्वेष उपजता है
| चतुर्थ भूमिकावाला जगत् को
ऐसे देखता है
जैसे शरत््काल का
मेघ वर्षा से
रहित होता है
| जैसे स्वप्न की
सृष्टि होती है
तैसे ही
उसको जगत् की
सत्यता नहीं भासती, क्योंकि उसको स्मृति स्वप्न की
होती है
और वह
जगत् को
स्वप्नवत् देखता है
इससे उसको राग द्वेष
नहीं उपजता | पञ्चम भूमिका की
प्राप्ति वाला जगत् को
सुषुप्ति की
नाईं देखता है
| जैसे शरत््काल का
मेघ नष्ट होके फिर नहीं
दीखता तैसे ही
उसको संसार का
भान नहीं होता और
उसकी चेष्टा स्वाभाविक ही
खुलता और
मुँद जाता है-
तैसे ही
उसको कुछ यत्न
नहीं-चेष्टा में जैसा
प्रतियोगी स्वाभाविक प्राप्त होता है
सो करता है
| जैसे कमल के खुलने का
प्रतियोगी जब
सूर्य उदय हुआ तब खुल गया और जब
मूँदने का
प्रतियोगी रात्रि हुई तब मूँद जाता है-उसको कुछ खेद नहीं, तैसे ही
उस पुरुष की
अहं ममता से
रहित स्वाभाविक चेष्टा होती है
| हे रामजी! अहंता ममता रूपी जाग्रत् से वह पुरुष सुषुप्त हो जाता है और सम्पूर्ण भावरूप जो शब्द और अर्थ हैं उनका उसको अभाव हो जाता है, उसको अशेष शेषका मनन नष्ट हो जाता है और उसको पशु, पक्षी, मनुष्य, देवता, भला , बुरा इत्यादिक भिन्न-भिन्न पदार्थों की भावना नहीं रहती, उसकी द्वैत कलना नष्ट हो जाती है और एक ब्रह्मसत्ता ही भासती है-संसार नहीं भासता | हे रामजी! अहंतारूपी तिल से संसाररूपी तेल उपजता है और अहंतारूपगन्ध उपजती है | संसार का कारण अहंता ही है | जिस पुरुष की अहंता नष्ट हो जाती | वह इन्द्रियों से इष्ट को पाकर हर्षवान् नहीं होता और अनिष्ट के प्राप्त हुए द्वेष नहीं करता | वह ऐसे आपको नहीं जानता कि मैं खड़ा हूँ वा बैठा हूँ अथवा चलता हूँ , वह आपको सर्वदा आकाशरूप जानता है और न भीतर देखता है न बाहर देखता है, न आकाश को देखता है और न पृथ्वी को देखता है, सर्व ब्रह्म ही देखता है उसको कुछ भिन्न नहीं भासता और वह दृष्टा, दर्शन, दृश्य तीनों का साक्षी रहता है | वह अहंकार का भी साक्षी,इन्द्रियों का भी साक्षी है और इनके साथ स्पर्श कदाचित् नहीं करता, जैसे ब्राह्मण चाण्डाल से स्पर्श नहीं करता | जैसे बीज से अंकुर होता है और फिर अंकुर से डाल होते हैं, इसी प्रकार सब पदार्थों का परिणाम है पर उनमें आकाश ज्यों का त्यों रहता है, क्योंकि उनके साथ स्पर्श नहीं करता, तैसे ही वह पुरुष दृष्टा, दर्शन, दृश्य से अतीत रहता है | जैसे मरुस्थल में जल असत् है तैसे ही उस पुरुष को त्रिपुटी और अहन्ता उस पुरुष की नष्ट हो जाती है इससे भेदबुद्धि भी नहीं रहती और इसी से वह शान्त, निर्मल, संसार से सुषुप्त, चैतन्य घनता से पूर्ण और सर्वदा शान्तरूप है | जिन नेत्रों से लोग संसार देखते हैं उनसे वह अन्धा हुआ है-अर्थ यह कि जिस मन से फुरना होता है उसको उसने नाश किया है और यदि भय, क्रोध, अहंकार, मोह इत्यादि उस पुरुष में दीखते भी हैं पर उसके हृदय में कुछ स्पर्श नहीं करते | जैसे पक्षी आकाश में उड़ता है परन्तु आकाश को स्पर्श नहीं कर सकता तैसे ही उस पुरुष को कोई विकार स्पर्श नहीं करता | हे रामजी! उस पुरुष के सम्पूर्ण संशय नष्ट हो गये हैं और वह सर्वदा स्वरूप में स्थित और शान्तरूप है, आत्मा से भिन्न वह किसी सुख की वाञ्छा नहीं करता और उसके सर्व संकल्प नष्ट हुए हैं | उसे आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासता, जाग्रत की नाईं दृष्टि आता है पर सर्वदा जाग्रत से सुषुप्त है |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पञ्चमभूमिकावर्णनं नाम चतुर्विंशतिशताधिकतमस्सर्गः ||124||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! तीसरी भूमिका पर्यन्त जाग्रत है
और चतुर्थ भूमिका में जाग्रत अवस्था को स्वप्नवत् देखता है
| पञ्चम भूमिकावाला संसार से
सुषुप्त होता है
और छठी भूमिकावाला तुरीयापद में स्थित
होता है
और सर्वदा अक्रिय है
अर्थात् किसी क्रिया में बन्धवान् नहीं होता | वह
सर्वकाल आनन्दरूप है,
भिन्न होकर आनन्द को
नहीं भोगता आपही आनन्द है,
केवल अपने आप
स्वतः स्थित है
और सर्वदा निर्वाण है
| हे रामजी! सर्वक्रिया में वह यथाशास्त्र विचरता दृष्टि आता है परन्तु हृदय में शून्य
है-उसको किसी से
स्पर्श नहीं | जैसे आकाश में सर्व
पदार्थ भासते हैं और आकाश का
स्पर्श किसी से
नहीं , तैसे ही
सर्वक्रिया उसमें विद्यमान दृष्टि भी
आती हैं तो भी वह
हृदय से
किसी से
स्पर्श नहीं करता, क्योंकि उसको क्रिया में बन्धवान् करनेवाला जो
अहंकार था
सो उसका नष्ट हो
गया है-केवल शान्तरूप है
| चिन्मात्र में अहंभाव का उत्थान ही
अज्ञान है
और वही दुःखदायी है
| जब अहंभाव निवृत्त होता है
तब कोई कर्म
स्पर्श नहीं करता | यद्यपि उसको विश्व दृष्टि भी
आता है
तो भी
वास्तव से
नहीं देखता, क्योंकि उसको सर्व ब्रह्म ही
भासता है,
खाता है
और नहीं खाता, देता भी
है और
कदाचित् नहीं देता, लेता है
तो भी
कदाचित् किसी से
कुछ नहीं लेता और
चलता है
परन्तु कदाचित् नहीं चला | हे रामजी! जो
देश काल वस्तु
पदार्थ हैं उन सब में वह आत्मभाव रखता है
यद्यपि उसमें प्रत्यक्ष चेष्टा दीखती है
तो भी
उसके हृदय में कुछ नहीं | जैसे सपने में खाता,
पीता, लेता, देता आपको भासता है
और जागे से
सबका अभाव हो
जाता है
तैसे ही
जो पुरुष परमार्थसत्ता में जगा है उसको गुण व क्रिया अपने में नहीं
भासती और
जो करता है
उसमें अभिलाषा नहीं रखता उसकी सब
चेष्टा स्वाभाविक होती है
| अपने निमित्त उसे कुछ कर्तव्य, नहीं | ऐसे भगवान् ने भी कहा है कि वह
सर्व आत्मा ही
देखता है
| आकाश, पृथ्वी, सूर्य, ब्राह्मण हाथी, श्वान, चाण्डाल आदिक सबमें वह
आत्मभाव देखता है
सब आकारों को
मृगतृष्णा के
जलवत् देखता है
कि इनका अत्यन्त अभाव है
| दृष्टा, दर्शन, दृश्य भी
उसको आकाशवत् भासते हैं और वह निर्मल आकशवत् शान्तरूप है
| अहंकार से
रहित वह
केवल चिन्मात्र में स्थित
है और
ग्रहण-त्याग से
अतीत सर्वकलना से
रहित, निर्वाण, स्वच्छ, निर्मल आकाश रूप स्थित
है | अहं मम आदिक चिद्ग्रन्थि उसकी भेदी हैं और अनात्म में अहं अभिंमान उसका नष्ट होता है-केवल शान्तरूप हो
रहता है
| जैसे क्षीर समुद्र से
मन्दराचल पर्वत निकलकर शान्तरूप हुआ तैसे
ही वह
रागद्रेषरूपी क्षोभ करनेवाले अन्तःकरणरूपी समुद्र से
निकल गया तब शान्तरूप अक्षोभ हुआ परम शोभा से
शोभता है
| जैसे विश्वकर्मा ने
सूर्य का
मण्डल रचा है और वह
प्रकाश से
शोभा पाता है
तैसे ही
ज्ञानरूपी प्रकाश से
वह प्रकाशता है
| जैसे चक्र फिरता फिरता रह
जाता है
और शान्त होता है
तैसे ही
अज्ञान से
फिरता फिरता ठहरकर वह
सदा शान्ति को
प्राप्त हुआ है और अपने आपसे प्रकाशता है
| जैसे पवन से रहित दीपक प्रकाशता है
तैसे ही
कलनारूपी पवन से रहित पुरुष अपने आपसे प्रकाशता है
और एकरस है
| जैसे घट
के भीतर और
बाहर शून्य है
तैसे ही
देह के
भीतर बाहर आत्मा है
| जैसे जल
में घट
रखिये तो
उसके भीतर बाहर जल
होता है
तैसे ही
वह पुरुष अपने आपसे भीतर बाहर पूर्ण हो
रहा है-
और एकरस है-द्वैतकलना को
नहीं प्राप्त होता और
उस पद
को पाकर आनन्दवान् है
| जैसे कोई मारे
जाने के
निमित्त पकड़ा गया हो और उसकी रक्षा हो
तो वह
बड़े आनन्द को
प्राप्त होता है
तैसे ही
वह पुरुष आनन्द को
प्राप्त होता है
| जैसे कोई आधि व्याधि से छूटा आनन्द को प्राप्त होता है तैसे ही वह ज्ञानवान् आनन्द को प्राप्त होता है | जैसे कोई मंजिल चलने से थका हुआ शय्या पर विश्राम करे और आनन्द को प्राप्त होता है तैसे ही ज्ञानवान् है | जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा अमृत से आनन्दवान् होता है तैसे ही वह पुरुष अपने आनन्द से घूर्म है | जैसे काष्ठ के जले से रहित अग्नि धुएँ से रहित प्रज्वलित होती है तैसे ही ज्ञानवान् अज्ञानरूपी धुएँ से रहित प्रज्वलित होती है, तैसे ही ज्ञानवान् अज्ञानरूपी धुएँ से रहित शोभता है | हे रामजी! जब वह संसार की ओर देखता है तो उसे अग्नि से जलता हुआ आपसे जुदा देखता है और ज्ञानरूपी पर्वत के ऊपर स्थित होकर संसार को जलता देखता है | हे रामजी! यह जो कहा है कि संसार को जलता देखता है सो ऐसे भी नहीं फुरता कि मैं ज्ञानी हूँ और यह संसार है | स्वरूप की अपेक्षा से यह कहा है कि संसार उसको दुःखदायी भासता है | वह आनन्द से रहित परमानन्द को प्राप्त हुआ है और सत् असत् से रहित जो अपना आप है उसमें स्थित है | जैसे पर्वत भीतर बाहर अपने आप में स्थित और एकरस है तैसे ही वह पुरुष एकरस है | संसार में जाग्रत होकर चेष्टा करता है पर हृदय में संसार की भावना से रहित है | उस पद में वाणी की गम नहीं परन्तु कुछ कहता हूँ सुनो, कोई चैतन्य कहते हैं, कोई आत्मा कहते हैं; कोई साक्षी कहते हैं, कालवाले उसी को काल कहते हैं, ईश्वरवादी ईश्वर कहते हैं, सांख्यवाले प्रकृति इत्यादिक संज्ञाओं से कहते हैं | ये सब उसी के नाम हैं-उससे भिन्न नहीं | उस पद को सन्तजन जानते हैं | हे रामजी! ऐसे पद को पाय के वह अपने आपसे शोभता है | जैसे मणि के भीतर बाहर प्रकाश होता है तैसे ही वह पद पुरुष भीतर बाहर से शोभता है और अपने स्वरूप से सदा घूर्म रहता है | जो पुरुष छठी भूमिका में स्थित है उसके ये लक्षण होते हैं कि संसार से सुषुप्त होकर- स्वरूप में सावधान रहता है और उसका जीवत्वभाव जाता रहता है | जैसे घट की उपाधि से घटाकाश परिच्छिन्न भासता है और जब घट भग्न हुआ तब घटाकाश महाकाश एक हो जाता है तैसे ही अहंकाररूपी घट के भग्न हुए आत्मा ही भासता है |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे षष्ठभूमिकोपदेशो नामशताधिकपञ्चविंशतितमस्सर्गः ||125||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! इसके अनन्तर जब
सप्तम भूमिका उस
पुरुष को
प्राप्त होती है
तब आपको आत्मा ही
जानता है
और भूतों का
ज्ञान जाता रहता है
| तब केवल आत्म त्वमात्र होता है
और दृश्य का
ज्ञान नहीं रहता, बल्कि यह
भी ज्ञान नहीं रहता कि
विश्व मेरे आश्रय फुरता है
| देहसहित हो
अथवा विदेह हो
उसको आत्मा से
उत्थान कदाचित नहीं होता | जैसे आकाश अपनी शून्यता में स्थित
है तैसे ही
वह आत्मस्वरूप में स्थित
होता है
और उसकी चेष्टा भी
स्वाभाविक होती है
| जैसे बालक पालने में अपने
अंग स्वाभाविक हिलाता हे
तैसे ही
उसकी खान,पान आदिक चेष्टा स्वाभाविक ही
है और
जैसे काष्ठ की
पुतली तागे से
चेष्टा करती है
तैसे ही
प्रारब्ध वेग के तागे से
उसकी चेष्टा होती है-उसको अपनी कुछ इच्छा
नहीं रहती | हे
रामजी! सप्तम भूमिकावाला जैसी अवस्था को
प्राप्त होता है
सो आपही जानता है
और कोई नहीं
जान सकता जिसका चित्त सत्पद को
प्राप्त हुआ है वह भी
उस अवस्था को
नहीं जान सकता,
जिसको वह
पद प्राप्त हुआ है वही जानता है
| हे रामजी! जीवन्मुक्त का
चित्त सत्पद को
प्राप्त होता है
और यह
तुरीयापद में स्थित
होता है
| उसका चित्त निर्वाण हो
जाता है
और तुरीयातीत पद
को प्राप्त होकर विदेहमुक्त होता है
| उसको अहंभाव का
उत्थान कदाचित् नहीं होता और
सत् रूप है पर असत् की
नाईं स्थित है
| हे रामजी! वह
पुरुष उस
पद को
प्राप्त होता है
जिसमें वाणी की
गम नहीं परन्तु कुछ कहता
हूँ | वह
पद, शुद्ध निर्मल, अद्वैत, चैतन्य ब्रह्म और
काल का
भी काल केवल
चिन्मात्र है
और ज्यों का
त्यों अच्युत पद
है | इस
पद को
पाकर ऐसे होता
है जैसे वस्त्र के
ऊपर मूर्ति लिखी हो
तैसे ही
यह उत्थान से
रहित है
और उसको अहंब्रह्म का
उत्थान भी
नहीं रहता |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सप्त भूमिकालक्षणविचारो नाम षड््विंशाधिकशततमस्सर्गः ||126||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! ये
सप्तभूमिका जो
तुमसे कही हैं, ज्ञान की
प्राप्ति इन्हीं से
होती है,
अन्य साधन से
ज्ञान की
प्राप्ति नहीं होती | हे
रामजी! जब
पुरुष ज्ञानवान् हो
तब जानिये कि
उसकी वृत्ति प्रथम भूमिका में स्थित
हुई है
| इससे तुम भूमिका की ओर चित्तरूप चरण रक्खो
तब तुमको स्वरूप की
प्राप्ति होगी | हे
रामजी! तीसरी भूमिका पर्यन्त सर्वकामना निवृत्त होती हैं केवल
एक आत्मपद की
कामना रहती है
| यदि उस
अवस्था में शरीर
छूट जावे तो
और जन्म पाकर ज्ञान को
प्राप्त होता है
और यदि चतुर्थ भूमिका में प्राप्त होकर शरीर छूटे तो
फिर जन्म नहीं पाता, क्योंकि आत्मपद की
प्राप्ति हुए से फिर कुछ पाने
की इच्छा नहीं रहती | जन्म का
कारण इच्छा है;
जब कुछ इच्छा
न रही तब जन्म भी
न रहा | जिसको
चतुर्थ भूमिका प्राप्त होती है
उसको स्वरूप की
प्राप्त होती है
तो फिर इच्छा
कैसे हो?
जैसे भुना बीज नहीं
उगता तैसे ही
उसका चित्त ज्ञान अग्नि से
दग्ध होता है,
क्योंकि वह
सत्पद को
प्राप्त होता है,
इसी से
वह जन्म नहीं लेता और
मरता भी
नहीं-संसार को
स्वप्नवत् देखता है
| पञ्चम भूमिकावाला सुषुप्ति की
नाईं होता है
और छठी भूमिका साक्षीरूप तुरीयापद है;
सप्तम तुरीयातीत निर्वाच्य पद
है | हे
रामजी! मुझे इतने कहने का
प्रयोजन यही है कि वासना का
त्याग करो और अचित् पद
को प्राप्त हो
इसका अभिमान होना ही
वासना है,
जब इसका अभिमान निवृत्त हो
तब शान्ति होगी, परिच्छिन्न अहंकार न रहेगा | आत्मा के
अज्ञान से
हुआ है
और आत्मज्ञान से
लीन हो
जाता हे
| हे रामजी! संसाररूपी एक
नदी में आधिव्याधि उपाधि रोग तरंगें है; रागद्वैषरूपी छोटे मच्छ हैं और तृष्णारूपी बड़े मच्छ हैं उसमें
जीव दुख पाते
हैं | जैसे जल
नीचे को
चला जाता है
तैसे मृत्यु के
मुख में संसार
चला जाता है
और अज्ञानरूपी जल
है | हे
रामजी! तृष्णा से
पुरुष बाँधे हैं,इससे तुम हाथी
की नाईं वैराग्य और
अभ्यासरूपी दाँतों से
तृष्णारूपी जंजीर काटो | हे
रामजी! तृष्णारूपी सर्पिणी विषयरूपी फुत्कारे से
विचाररूपी बेलि को
जलाती है
इससे जीवरूपी किसान दुःख पाता है
| इससे तुम वैराग्यरूपी अग्नि से
उस सर्पिणी को
जलाओ | हे
रामजी! तृष्णा दुःखदायी है
| जब तक
तृष्णा है
तब तक
सन्तों के
वचन स्थित नहीं होते | जैसे दर्पण पर
मोती नहीं ठहरता तैसे ही
तृष्णावान् के
हृदय में सन्तों के वचन नहीं ठहरते | तृष्णा के
इतने नाम-हैं-तृष्णा, अभिलाषा, इच्छा, फुरना, संसरना इत्यादिक सब
इसी के
नाम हैं | इच्छारूपी मेघ ने ज्ञानरूप, सूर्य को
ढ़ाँका है
| इससे वह
नहीं भासता जब
विचाररूपी पवन चले तब इच्छारूपी मेघ नष्ट
हो जावे और
आत्मरूपी सूर्य का
साक्षत्कार हो
| हे रामजी! यह
जीव आकाश का
पक्षी है
पर कर्म में इच्छारूपी तागे से
बँधा है
इससे नहीं उड़ सकता
और परमात्मपद को
भी प्राप्त नहीं होता-इच्छा ही
से दीन है जब इच्छा नष्ट हो
तब आत्मस्वरूप है
| इससे तुम इच्छा
को नाशकर आत्मपरायण हो
अर्थात् विषय संसार से
वैराग्य और
आत्माभ्यास करो | हे रामजी! यह
जो मैंने तुमसे भूमिका का
क्रम कहा है जब इसमें आवे तब ज्ञान की
प्राप्ति हो
पर इनको तब
प्राप्त होता है
जब कि
एक हथिनी को
जीते जो
एक वन
में रहती और
महामत्तरूप उसके दो
पुत्र हैं जो अनेक जीवों को
मारकर अनर्थ प्राप्त करते हैं | उसके
जीते से
सर्व जगत् जीता जाता है
| रामजी ने
पूछा, हे
भगवन्! ऐसी मत्तरूप हथिनी कौन है और कहाँ रहती है? उसके दाँत और
पुत्र कौन हैं? कैसे वह
मरती है,
कैसे उत्पन्न हुई है और कौन वन है?
यह सब
मुझसे कहिये | वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! इच्छारूपी हथिनी और
शरीर रूपी वन
है और मनरूपी गुफा में रहती है, इन्द्रियाँरूपी उसके बालक हैं और संकल्प विकल्परूपी दाँत हैं उनसे छेदती है | हे रामजी! एक नदी है जिसका प्रभाव सदा चला जाता है और जिसमें दो मच्छ रहते हैं जो कभी नाश नहीं होते संसरना ही नदी है जिसमें रोगद्वेष मच्छ रहते हैं सो नाश नहीं होते | हे रामजी! वे मच्छ तब नाश हों जब संसरणरूपी जल नष्ट हो जिसके सुकृत दुष्कृतरूपी किनारे हैं, चिन्तारूपी ग्राह हैं, और कर्मरूपी लहरें हैं उनमें जीवरूपी तृण आकर भटकता है | इस तृष्णारूपी विषबेलि का नाश करो | हे रामजी! तृष्णारूपी अंकुर का बढ़ाना घटाना अपने ही अधीन है, जो अंकुर को जल दीजिये तो बड़ता जाता है और जो न दीजिये तो जल जाता है | फुरनरूपी जल देने से तृष्णारूपी अंकुर बढ़ता जाता है | और न देने से स्वरूप के अभ्यास द्वारा जल जाता है | हे रामजी! तृष्णारूपी बड़ा मच्छ है जो धैर्य आदिक माँस को भक्षण करने वाला है, उसे वैराग्यरुपी कण्डी और अभ्यासरूपी दाँतों से नाश करो | हे रामजी! इच्छा का नाम बन्धन है और निरिच्छा का नाम मुक्ति है | हे रामजी! एक सुगम उपाय कहता हूँ जिससे तृष्णा नष्ट हो जावेगी निज अर्थ की भावना करो तो उस भावना से शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होगी, एवं तुम्हारी जय होगी और सबसे उत्तम पद को प्राप्त होगे, फिर तुम्हें वासना न रहेगी और शरीर की चेष्टा स्वाभाविक होगी और सर्व संकल्प नष्ट हो जावेंगे |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे संसरणभावप्रतिपादनंनाम शताधिकसप्तविंशतितमस्सर्गः ||127||
रामजी ने
पूछा हे
भगवन्! आप कहते हैं कि निज अर्थ की
भावना से
वासना नष्ट हो
जावेगी और
शीघ्र ही
आत्मपद की
प्राप्ति होगी सो
वासना तो
चिरकाल की
चित्त में स्थित
है एक
ही बार कैसे
नष्ट होगी?
आप कहते हैं कि वासना के
नष्ट हुए जीवन्मुक्त होता है
पर जिसकी वासना नष्ट होगी उसका शरीर कैसे रहेगा, वासना बिना चेष्टा क्योंकर होगी और
जीवन्मुक्त पद
कैसे रहेगा?
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! मेरे वचनों को
जो कानों के
भूषण हैं सुने
से दरिद्र न रहेगा | निज अर्थ
के धारने से
संशय नष्ट हो
जावेंगे और
आत्मपद की
प्राप्ति होगी | उस
निज अक्षर के
तीन अर्थ हैं- एक तो अन्य के
अर्थ हैं कि पञ्चभौतिक शरीर से
तेरा स्वरूप विलक्षण है
और दूसरा अर्थ विरुद्ध है
अर्थात् शरीर जड़ और तमरूप है
और तेरा स्वरूप आदित्यवर्ण और
तम से
परे है
| हे रामजी! जब तूने ऐसे धारणा
की कि
मैं आत्मा हूँ और यह देहादिक अनात्मा है
तब देह से मिल कर
अभिलाषा कैसे रहेगी?
अर्थ यह कि अभिलाषा न करेगा, क्योंकि जब तक जाना नहीं जाता तब तक अभिलाषा है | तीसरा अर्थ यह है कि सबका अभाव है अर्थात् न मैं हूँ और न कोई जगत् है | जब ऐसे जाना तब किसकी इच्छा रहेगी?
अर्थात् किसी की न रहेगी | अथवा जो तुम आपको देह से विलक्षण आत्मा जानोगे तो भी अविद्यक तमरूप शरीर की अभिलाषा न रहेगी | देह तम रूप है और तुम आदित्यवर्ण हो अर्थात् प्रकाशरूप हो, तुम्हारा और इसका क्या संयोग जैसे सूर्य के मण्डल में रात्रि नहीं दिखती तैसे ही जब तुम आपको प्रकाशरूप जानोगे तब तमरूप संसार न दीखेगा | तब शरीर की चेष्टा स्वाभाविक होगी और तुममें कुछ चेष्टा न होगी | जैसे अर्धनिद्रावाले की चेष्टा होती है तैसे ही चेष्टा होगी और तुमको बालक की नाईं अभिमान न होगा | जैसे बालक की उन्मत्त चेष्टा होती है तैसे ही तुम्हारी चेष्टा भी स्वाभाविक होगी | हे रामजी! यदि तुम यह इच्छा करो कि यह सुख हो और यह दुःख न हो तो कदाचित् न होवेगा | जो कुछ शरीर की प्रारब्ध है सो अवश्य परन्तु ज्ञानवान् के हृदय से संसार की सत्यता जाती रहती है और स्वाभाविक चेष्टा होती है, इच्छा नहीं रहती | हे रामजी! जैसे कोई पुरुष किसी देश को जाता है और पहुँचने का समय थोड़ा हो तो वह मार्ग के स्थान देखता भी जाता है परन्तु बन्धवान् किसी में नहीं होता, तैसे ही चित्त को आत्मपद में लगाओ | ऐसा शरीर पाकर यदि आत्मपद न पाया तो कब पावेगा? जो आत्मपद से विमुख है वह वृक्षादिक जन्मों को पावेगा, इससे हे रामजी चित्त आत्मपद में रक्खो और स्वाभाविक इच्छा बिना चेष्टा करो इच्छा ही दुःखदायक है | जब इच्छा नष्ट होती है तब उसी को ज्ञानवान् तुरीयापद कहते हैं जहाँ जाग्रत स्वप्न और सुषुप्ति का अभाव हो सो तुरीयापद है | हे रामजी! यह जाग्रत स्वप्न और सुषप्ति अवस्था जहाँ न पाइये सो तुरीयापद है | जब संवेदन फुरना अहंकार का अभाव हो जावे तब तुरीयापद प्राप्त होता है | हे रामजी! अहंकार का होना दुःखदायक है | जब इसका नाश हो तबही आनन्द है | आत्मपद से भिन्न जो माया की रचना है उससे मिलकर आपको जानता है `कि मैं हूँ' यही अनर्थ है | इससे अहंकार का त्याग करो | जिसको देखकर यह फुरता है उसको निज अर्थ की भावना से नास करो और जो आत्मपद से भिन्न भासता है उसे मिथ्या जानो | यही निज अक्षर का अर्थ है जो कुछ संसार भासता है उसको स्वप्नमात्र जानो इसको सत्य जानकर इसकी इच्छा करना ही अनर्थ है और मिथ्या जानकर इच्छा न करना कल्याण है | हे रामजी! ऊँची बाहु करके पुकारता हूँ पर मेरे वचन कोई नहीं सुनता कि इच्छा ही संसार का कारण है और इच्छा से रहित होना ही परमकल्याण है जब जीव इच्छा से रहित होता है तब शान्तपद को प्राप्त होता है और निरच्छित हुये आत्मा ही भासता है जो आनन्दरूप, सम और अद्वैत है और उसमें जगत् का अभाव है | हे रामजी! मोह का बड़ा माहात्म्य है हृदय में जो आत्मरूपी चिन्तामणि स्थित है उसको विस्मरण करके मूर्ख अहंकाररूपी काच को ग्रहण करते हैं | हे रामजी! तुम निरभिमान होकर चेष्टा करो | जैसे यन्त्र की पुतली में अभिमान कुछ नहीं होता और उसकी चेष्टा होती है, तैसे ही प्रारब्ध वेग से तुम्हारी चेष्टा होगी | यह अभिमान तुम न करो कि ऐसे हो और ऐसे न हो | जब ऐसे होगे तब शान्तपद को प्राप्त होगे, जहाँ वाणी की गम नहीं ऐसे आनन्द को प्राप्त होगे | जब तक इन्द्रियों के अर्थ की तृष्णा है तब तक जन्म मृत्यु के बन्धन में है इससे पुरुष प्रयत्न यही है कि तृष्णा का नाशकरो, कर्म के फल की तृष्णा न हो और कर्म के करने की भी इच्छा न हो | इन दोनों को त्यागकर स्वरूप में स्थित हो- रहो बल्कि ऐसा भी निश्चय न हो कि मैंने त्याग किया है | हे रामजी! जिस पुरुष ने कर्म को त्याग किया है और अहंकार सहित है उसने पुण्य और पाप सब कुछ किया है और जिसमें अहंभाव नहीं है वह चाहे जैसे कर्म करे तो भी कुछ नहीं करता और वह बन्धन को नहीं प्राप्त होता | जो न करने में अभिमान सहित है उसको कर्ता देखते हैं वह बन्ध वान् है | ऐसे आत्मा को जानकर अहं मम का त्याग करो | ऐसे संवेदन के त्यागने में कुछ यत्न नहीं है | स्मृति उसकी होती है जिसका अनुभव होता है, पर जिसका अनुभव नहीं उसका त्याग सुगम है | अनुभव प्रत्यक्ष देखने को कहते हैं | तुम्हारे स्वरूप में विश्व नहीं है तो अनुभव क्या हो | ये पदार्थ जो तुमको भासते हैं उनके कारण को जानो | इनका कारण अनुभव है, जो अनुभव ही इनका मिथ्या है तो स्मृति कैसे सत् हो? रस्सी में सर्प का अनुभव हुआ और फिर स्मरण किया कि वहाँ सर्प देखा था, जो सर्प का अनुभव ही मिथ्या है फिर उसका स्मरण कैसे सत् हो इससे जो वस्तु मिथ्या है उसके त्यागने में क्या यत्न है? जब प्रपञ्च को मिथ्या जाना तब तुझको कोई क्रिया बन्धन न करेगी, चेष्टा स्वाभाविक होगी और रागद्वेष जाता रहेगा | जैसे शरत््काल की बेलि सूख जाती है और उसका आकार दृष्टि आता है, तैसे ही तुम्हारा चित्त देखने में आवेगा और चित्त का धर्म जो रागद्वैष है वह जाता रहेगा वह चित्त सत्पद को प्राप्त होगा | जब सबका विस्मरण (बोध) होता है उसको शिवपद कहते हैं | वह परमपद ब्रह्म शब्द-अर्थ से रहित केवल चिन्मात्र अद्वैत पद है, उसमें अहं मम का त्याग करके स्थित रहो | संसार इसी का नाम है कि मैं हूँ और यह मेरा है | इसको त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो | हे रामजी! जब तक अहंमम का संवेदन है तब तक दुख नहीं मिटते और जब यह संवेदन मिटा तब आनन्द है | आगे जो इच्छा हो सो करो |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे इच्छाचिकित्सोपदेशन्नाम शताधिककाष्ठविंशतितमस्सर्ग: ||128||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! अद्वैत आत्मा जिसको एक
दो नहीं कह
सकते अपने आप
स्वभाव में स्थित
है और
अन्तःकरण चतुष्टय बाह्यपदार्थ सब
चेतनमात्र हैं कुछ भिन्न नहीं | रूप, इन्द्रियाँ और
मन का
फुरना, देश, काल सर्व आत्मरूप ही
है | जैसे बालक मिट्टी की
सेना बनाकर हाथी, घोड़े, राजा प्रजा नाम कल्पता है सो सब
मिट्टी है
भिन्न कुछ नहीं
तैसे ही
अहंमम आदिक भी
सब आत्मरूप है-कुछ पृथक नहीं | जैसे मिट्टी में हाथी,
घोड़ा आदि नाम कल्पित हैं, तैसे
आत्मा में ही जगत् कल्पित है-
आत्मा से
भिन्न कुछ नहीं
| इस अहंकार को
त्याग करो कि आत्मपद से
भिन्न कुछ न फुरे | हे
रामजी! रूप, अवलोक और
मनस्कार- यह
सब शिवरूपी मृत्तिका के
नाम हैं और माता, मान, मेय आदिक यह
सब वही रूप हुए तो
जिससे संचित् कहिये?
यह अहं मम आदिक भी
चिदाकाश से
कुछ भिन्न वस्तु नहीं | इनको ऐसे जानकर
अफुर शिलावत् निःसंग हो
रहो | रामजी ने
पूछा, हे
भगवन्! आपने कहा कि अहं मम
फुरने का
त्याग करो यह मिथ्या है
और अहं मम असत् है
| ज्ञानी ऐसी भावना
करते हैं कि इनकी सत्ता कुछ नहीं
और तुम असंग
हो रहो पर असंग निष्कर्म से
होता है
अथवा कर्म से
होता है
यह कहिये | वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! यह
तुम्हीं कहो कि कर्म क्या है
और निष्कर्म क्या है,
इनका कारण कौन है और इनका नाश कैसे
हो और
नाश होने से
क्या सिद्धि होगी, जो
तुम जानते हो
तो कहो | रामजी
बोले हे
भगवन्! जैसे आपसे सुना है
और समझा है
सो मैं कहता
हूँ | जो
वस्तु नाश करनी
हो उसको निश्चय करके मूल से नास कीजिये तभी उसका
नाश होता है,
शाखा और
पत्र काटे से
उसका नाश हीं होता-इससे इनका क्रम सुनो | इस
संसाररूपी वन
में देह रूपी
वृक्ष है
जिसका बीज -वास और वासना रस
हैं और
सुखदुःख फूल हैं | जाग्रत कर्म वासनारूपी वसन्तऋतु हैं उससे
वह प्रफुल्लित होता है
और सुषुप्ति पापकर्मरूपी शरत््काल है
उससे सूख जाता
है | ऐसा शरीररूपी वृक्ष है
| तरुणरूपी उसकी कली है सो क्षण का
क्षण सुन्दर है,
जरारूपी फूल इसको
हँसते हैं और रागद्वेष रूपी वानर क्षण क्षण में क्षोभते हैं | जाग्रतरूपी वसन्तऋतु है
जो सुषुप्तिरूपी हिम करती
है और
वासनारूपी रस
से बढ़ता है
| पुत्र कलत्र आदिक तृण और घास हैं और इन्द्रियों के
छिद्ररूपी मुख हैं जिनसे शरीर की
चेष्टा होती है
| ज्ञान इन्द्रियाँ पञ्चथम्भ हैं जिनके
वृक्ष सधा है और इच्छारूपी बेलि है
जो अपने अपने को
चाहती है
| बड़ा थम्भ इसका मन
है जो
सबको धारता है
और पञ्चप्राण इसके रस
हैं उनसे प्रत्यक्ष सबको ग्रहण करता है
| इनका बीज जीव है-जीव चैत्योन्मुखत्व चेतन को
कहते हैं, जीवत्व का बीज संवित् है
जो मात्रपद से
उत्थान हुआ है और उस
संवित् का
बीज ब्रह्म है-उसका बीज कोई नहीं | हे
भगवन्! सबका मूल संवित
का फुरना है,
जब इसका अभाव होता है
तब आत्मा ही
शेष रहता है
| हे भगवन्! यह
तो मैं जानता
हूँ आगे आप भी कुछ कृपा
करके कहिये | हे
भगवन्! जबतक चित्त से
सम्बन्ध है
तबतक संसार में जन्ममरण होता है
और जब
चित्त से
रहित होता है
तब परब्रह्म है-वह शिवपद अनिच्छित, शान्त और
अनन्तरूप है
| चिन्मात्र में जो अहं का
उत्थान है
वही कर्मरूपी वृक्ष का
कारण है
जब तक
अनात्मा से
मिलकर कहता है
कि `मैं हूँ' वही संसार का
कारण है
| यह आपके वचनों से
मैंने समझा है
सो प्रार्थना की
है आगे कुछ कृपा करके आप
भी कहिये | वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! इसी प्रकार कर्म
का बीज सूक्ष्म संवित् है
| जब तक
संवित् है
तबतक कर्मों का
बीज नाश नहीं
होता और
ये सब
संज्ञा इसी की हैं | कर्मों का
बीज इच्छा, तृष्णा, अज्ञान, चित्त और
ग्रहणत्याग की
बुद्धि इत्यादिक बहुत संज्ञा हैं, क्या किसी में हेयोपादेय बुद्धि करे? हे रामजी! जबतक अज्ञान है तबतक इच्छा नष्ट नहीं होती और कर्म भी नाश नहीं होते | नाश दोनों का नहीं होता परन्तु भेद इतना ही है कि अज्ञानी को भासता है कि यह इच्छा है, यह कर्म है | ज्ञानवान् को सब ब्रह्म ही भासता है इससे वह सुखी रहता है और अज्ञानी को कर्म भासता है इस लिये बन्धवान् होता है | कर्म से कर्म बुद्धि जाने को त्याग कहते हैं क्रिया का त्याग करने को त्याग नहीं कहते | हे रामजी बड़ी उपाधि अहंकार है | जिसका अहंकार नष्ट हुआ है वह पुरुष कर्म करता है तो भी उसने कभी कुछ नहीं किया और जो अहंकारसहित है वह पुरुष जो तूष्णीं हो बैठा है तो भी सब कर्म करता है | इस अहं के त्याग का नाम सर्वत्याग है, क्रिया के त्याग का नाम सर्वत्याग नहीं | सब कर्मों के बीज अहंकार का त्यागना और परम शान्ति को प्राप्त होना ही पुरुष प्रयत्न है |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे कर्मबीज दाहोपदेशं नाम शताधिकनवविंशस्सर्ग: ||129||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! इस
संवेदन का
होना ही
अनर्थ है
कि आपको कुछ जानता
है | जब
यह निवृत्ति हो
तबही इसको आनन्द है
| हे
रामजी! ज्ञानी की
चेष्टा अहंकार से
रहित स्वाभाविक होती है
| जैसे अर्धनिद्रित पुरुष होता है
तैसे ज्ञानी अपने स्वरूप में घूर्म
है | जैसे हाथी मद
से उन्मत्त होता है
तैसे ही
ज्ञानवान् स्वयं ब्रह्म लक्ष्मी से
घूर्म है
| जैसे कामी को
काम व्यसन होता है
तैसे ही
सुखरूपी स्त्री को
पाकर ज्ञानी घूर्मरहता है,
क्योंकि निरहंकार है
| सब दुखों का
बीज अहंकार है,
जब अहंकार नष्ट हो
तब आनन्द हो
हे रामजी! संसाररूपी विष की बेलि का
बीज अहंकार है,
जब अहंकार का
अभाव हो
तब संसार का
भी अभाव होता है
| हे रामजी! अहंकार ही
दुःख का
मूल है
| इस संवेदन का
विस्मरण करना बड़ा कल्याण है
और अनात्मा से
मिलकर आपको मानना ही
अनर्थ है
| रामजी ने
पूछा, हे
भगवन्! जो वस्तु असत्य है
वह नहीं होती और
जो सत्य है
उसका अभाव नहीं होता | फिर आप कैसे कहते हैं कि अहं संवेदन का
नाश करो? ये तो
सत् भासती है
नाश कैसे हो? वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! तुम सत्य
कहते हो
कि जो
वस्तु असत्य है
वह नहीं होती और
जो सत्य है
उसका नाश नहीं
होता | हे
रामजी! यह
जो अहंकार दृश्य तुमको भासता सो
कदाचित् नहीं हुआ-मिथ्या कल्पित है | जैसे रस्सी में सर्प
होता है
तैसे ही
आत्मा में अहंकार है और जैसे सूर्य की
किरणों में जलाभास होता
है तैसे ही
आत्मा में अहंकार शब्द
अर्थ फुरता है
| यह शब्द और
अर्थ मिथ्या है
| इसका लक्ष्य यह
है कि
मैं हूँ सो कल्पित है,
आत्मा केवल शुद्धस्वरूप है
उसमें अहं त्वं
का शब्द अर्थ कोई नहीं
| यह अबोध से
भासते हैं और बोध से
लीन हो
जाते हैं | वेदना
का बोझ अनर्थ
का कारण है
| जब यह
निर्वाण हो
तब कर्म का
बीज मूल से कटे | हे
रामजी! जो
कर्मों का
त्यागकर एकान्त जाकर बैठता है
और ऐसे मानता
है कि
मैं कर्म नहीं करता सो
कहता ही
है पर
वास्तव में अहंकार से है इससे फल
को भोगता ही
है, क्योंकि अहंकार सहित फिर कर्म
करेगा | वह
आत्मज्ञान बिना अनात्म से
मिलकर आपको मानता है
| जो पुरुष कर्म-इन्द्रियों से
चेष्टा करता है
और आत्मा को
लेप नहीं | जानता वह
अकर्ता ही
है--उसके करने से
कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होते और
न करने से
भी नहीं होते | ऐसा पुरुष
परम निर्वाणपद को
प्राप्त होता है
जिसमें वाणी की
गम नहीं | हे
रामजी! उसमें फुरना कोई नहीं-केवल चमत्कार है
अर्थात् हुआ कुछ नहीं और
भासता है
| जैसे बेल की मज्जा बेल से भिन्न नहीं तैसे ही
जगत् है
| जैसे सोने से
भूषण भिन्न नहीं तैसे ही
निज शब्द का
अर्थ है
पर ये
भिन्न भिन्न शब्द अर्थ तबतक भासते हैं जबतक
अहं वेदना है
| हे रामजी! आत्मपदसदा अपने आपमें स्थित है
| जैसे पत्थर अपनी जड़ता में स्थित
है तैसे ही
आत्मा चैतन्य घनता में स्थित
है | उसको मुनीश्वर चैतन्य सार कहते
हैं और
उस अपने स्वरूप के
प्रमाद से
दुःख पाता है
| हे रामजी! जो
पुरुष गृहस्थी में स्थित
है पर
अहंकार से
रहित है
उसको वनवासीजानो और
सदा एकान्त है
और जो
वनवासी अहंकार सहित है
वह सदा जनों
में स्थित है
| प्रथम तो
वह एक
गढ़े में था फिर उसको त्याग कर
दूसरे गढ़े में पड़ा
है कि
वेषधारी है
और वनवास लिया है
| ईश्वर चाहे तो
निकसे नहीं तो
बड़े कूप में पड़ा है
| हे रामजी! जो
पुरुष अर्ध त्याग करता है
वा एक
अंग का
त्याग करता है
और दूसरे का
अंगीकार करता है
ऐसा पुरुष आपको निष्कामी मानता है
पर उसको यह
त्याग रूपी पिशाचिनी भोगती है
| हे रामजी! यह
जीव निष्कर्म तब
ही होता है
जब इसकी अहं वेदना
नष्ट होती है-अन्यथा नहीं होता | इससे कर्म को
मूल से उखाड़ो | जैसे सुरदण्ड, बेलि और वृक्षको मूल से काटता है, तैसे ही काटो | अहंवेदना ही मूल है उसको काटना चाहिये | हे रामजी! पुरुषप्रयत्न इसी का नाम है कि अपने आपका नाश करना और आपही रहना देह से मिला हुआ आपको जानता है उसका नाश करना और शिवपद को प्राप्त होना जो सर्वदा सत््स्वरूप अद्वैत है-यह विश्व भी उसका चमत्कार है | जैसे नारियल में खोपरा होता है और उसके बहुत नाम रखते हैं सो नारियल से कुछ भिन्न नहीं, तैसे ही संसार आत्मा से भिन्न नहीं | जैसे थम्भे में काष्ठ से भिन्न कुछ नहीं तैसे ही यह संसार है | यह नानात्व भी चैतन्य घन आत्मा ही है निज अक्षर का अर्थ जो कहा है सो भी वही है तो विधि निषेध किसका कीजिये? सब परमात्वतत्त्व है दूसरा किंचित भी नहीं | हे रामजी! ऐसे आत्मा को जानकर सुख से बिचरो | जैसे अर्द्धनिद्रित की चेष्टा होती है और जैसे बालक में सोकर स्वाभाविक अंग हिलाता है तैसे ही तुम्हारी चेष्टा होगी | अपना अभिमान तुम न करो | हे रामजी! जो कुछ भाव-अभाव पदार्थ भिन्न-भिन्न भासते हैं वे असत्य हैं, आत्मा के साक्षात्कार हुए से परमात्मतत्त्व ही भासेगा, तब अहंकार उत्थान निवृत्त होगा | हे रामजी! एक और युक्ति सुनो जिससे आत्मज्ञान हो | यह जो अहं अहं क्षण क्षण में फुरती है सो जब फुरे तब ही उस क्षण में जानो कि मैं नहीं | जब ऐसे दृढ़ हुआ तब अहंकाररूपी पिशाच नाश हो जावेगा और आत्मतत्त्व का साक्षात्कार होगा | इससे अहंकार के नाश का यत्न करो कि `न मैं हूँ' `न जगत् है'| हे रामजी! ज्ञान इसी का नाम है कि `अहं' `मम' न रहे | उसको मुनीश्वर परब्रह्म और सम्यक््पद कहते हैं | और जहाँ (अहं मम ) है वहाँ अविद्यारूपी तम है | हे रामजी! अज्ञानी के हृदय में सब पदार्थों का भाव स्थित है इससे देश काल घर, नगर, मनुष्य, पशु, पक्षी आदिक त्रिगुण संसार भासता है | जब इनका अभाव हो जावे तब शान्तिपद की प्राप्ति हो |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अहंकारनाश विचारो नाम शताधिकत्रिंशततमस्सर्गः ||130||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! जिसके मन
से `मैं' और `मेरे' का
अभिमान गया है उसको शान्ति हुई है और जिसके हृदय में `मैं' `देह' `मेरे' `सम्बन्धी' `गृह' आदिक
का अभिमान है
उसको कदाचित् शान्ति नहीं और
शान्ति बिना सुख नहीं
| हे रामजी! प्रथम आप
बनता है
तब जगत् है
| जो आप
न बने तो जगत् कहाँ हो? इसका होना ही
अनर्थ का
कारण है
| जिस पुरुष ने
अहंकार का
त्याग किया है
वह सर्वत्यागी है
और जिसने अहंकार का
त्याग नहीं किया उसने कुछ नहीं
त्यागा | जिसने क्रिया का
त्याग किया और
आपको सर्वत्यागी मानता है
सो मिथ्या है
| जैसे वृक्ष की
डालें काटिये तो
फिर उगता है
नाश होता, तैसे ही
क्रिया के
त्याग किये त्याग नहीं होता | जो
त्यागने योग्य अहंकार नष्ट नहीं होता तो
क्रिया फिर उपजती
है इससे अहंकार का
त्याग करो तब सर्वत्यागी होगे | इसका नाम महात्याग है
और स्वप्न में भी संसार न भासेगा, जाग्रत का
क्या कहना है-
उसको संसार का
ज्ञान कदाचित् नहीं होता | हे
रामजी! संसार का
बीज अहंभाव है,
उसी से
स्थावर जंगम जगत् भासता है,
जब इसका नाश हुआ तब जगत््भ्रम मिट जाता
है--इससे इसके अभाव की
भावना की
भावना करो | जब तुम्हें अहंभाव की
भावना फुरे तो
जानो कि
मैं नहीं | जब
इस प्रकार अहं का अभाव हुआ तब पीछे जो
शेष रहेगा सो
ही आत्मपद है
| हे रामजी! सब
अनर्थों का
कारण अहंभाव है
उसका त्याग करो | हे रामजी! शस्त्र के
प्रहार और
व्याधि को
यह जीव सह सकता हे
तो इस
अहं के
त्यागने में क्या
कदर्थना है? हे
रामजी! संसार का
बीज अहं का सद्भाव है,
उसका नाश करना
मानो संसार का
मूलसंयुक्त नाश करना
है-इसी के नाश का
उपाय करो | जिसका
अहंभाव नष्ट हुआ है उसको सब
ठौर आकाशरूप है
और उसके हृदय में संसार
की सत्ताकुछ नहीं फुरती | यद्यपि वह
गृहस्थ में हो तो भी
उसको यह
प्रपञ्च शून्य वन
भासता है
| जो अहंकार सहित है
और वन
में जा
बैठे तो
भी वह
जनों के
समूह में बैठा
है, क्योंकि उसका अज्ञान नष्ट नहीं हुआ | जिसने
मन सहित षट् इन्द्रियों को
वश नहीं किया उसको मेरी कथा के सुनने का
अधिकार नहीं- वह
पशु है
| जिस पुरुष ने
मन को
जीता है
अथवा दिन प्रतिदिन जीतने जी
इच्छा करता है
वह पुरुष है
और जो
इन्द्रियों का
विश्रामी अर्थात् क्रोध, मोह से सम्पन्न है
वह पशु है और महाअन्धतम को
प्राप्त होता है
| हे रामजी! जो
पुरुष ज्ञानवान् है
उसमें यदि इच्छा
दृष्ट आती है तो वह
उसकी इच्छा अनिच्छा ही
है और
उसके कर्म अकर्म ही
हैं | जैसे भूना दाना फिर नहीं
उगता पर
उसका आकार भासता है
तैसे ही
ज्ञानवान् की
चेष्टा दृष्ट आती है सो देखनेमात्र है
उसके हृदय में कुछ नहीं | हे
रामजी! जो
पुरुष कर्मेन्द्रियों से
चेष्टा करता है
और हृदय में जगत्
की सत्यता नहीं मानता उसे कोई बन्धन नहीं होता और
जो जगत् को
सत्य मानकर थोड़ा भी
कर्म करता है
तो भी
वह फैल जाता-
जैसे थोड़ी अग्नि जागकर बहुत होजाती है-ज्ञानी को
बन्धन नहीं होता | उसकी प्रारब्ध शेष है सो भी
हृदय में नहीं
मानता और
जानता है
कि ये
कर्म शरीर के
हैं आत्मा के
नहीं जैसे कुम्हार के
चक्र का
वेग उतरता जाता है
तैसे ही
प्रारब्धवेग उसका उतर जाता
है और
फिर जन्म नहीं होता, क्योंकि उसको अहंकाररूपी चरण नहीं
लगता इससे अहं कार का नाश करो, जब अहंकार नष्ट होगा तब
सबसे आदिपद की
प्राप्ति होगी जो
परम निर्वाणपद है
और जिसमें निर्वाण भी
निर्वाण हो
जाता है
| हे रामजी! जब
वर्षाकाल होता है
तब बादल होते हैं, जब शरत्काल आता है तब बादल जाते रहते हैं | हे रामजी! जबतक अज्ञानरूपी वर्षाकाल है
तबतक अहंकाररूपी वर्षा है
और जब
विचाररूपी शरत्काल आवेगा तब
अहंकाररूपी मेघ जाते रहेंगे और आत्मरूपी आकाश निर्मल भासेगा | हे रामजी! जैसे मलिन आदर्श में मुख का प्रतिबिम्ब उज्ज्वल नहीं भासता और जब मैल निवृत्त होता है तब मुख का प्रतिबिम्ब प्रत्यक्ष भासता है तैसे ही अहंकाररूपी मैल से जीव ढाँपा हुआ है इससे आत्मा नहीं भासता, अहंकाररूपी मैल निवृत्त हो तब आत्मा ज्यों का त्यों भासे | जैसे समुद्र में नाना प्रकार के तरंग उठते हैं तो सम्यक््दर्शी को सब जलमय दृष्ट आते हैं और भूषण में सुवर्ण ही भासता है तैसे ही नाना प्रकार के प्रपञ्च उस समदर्शी को चैतन्यघन आत्मा ही दृष्ट आते हैं-आत्मा से भिन्न कुछ नहीं देखता | वह सबसे पत्थर की शिलावत् हो जाता है क्योंकि उसका अहंकार नष्ट हो गया है और जो अहंकार नष्ट हो गया है और जो अहंकार संयुक्त है और क्रिया का त्यागकर आपको सुखी मानता है वह मूर्ख है | जैसे कोई लकड़ी लेकर आकाश को नाश किया चाहे तो वह नष्ट नहीं होता तैसे ही क्रिया के त्याग से दुःख नष्ट नहीं होते-जब सम्पूर्णसंसार क्रिया के बीज अहंकार का नाश हो तब अक्रिय आत्मस्वरूप को प्राप्त होता है | जैसे ताँबा अपने ताम्रभाव को त्यागकर सुवर्ण होता है तैसे ही जब जीव अपना जीवत्व भाव त्यागे तब आत्मा होता है और जैसे तेल की बूँद जल में फैल जाती है और नाना प्रकार के रंग जल में भासते हैं तैसे ही ब्रह्म में अनेक प्रकार की कलना दिखाई देती हैं- आत्मा, ब्रह्म, निराकार, निरञ्जन इत्यादिक नाम भी अहंकार से शुद्ध में कल्पे हैं, वह अफुर केवल सत्तामात्र हैं और सत्य और असत्य की नाईं स्थित है | हे रामजी! संसाररूपी मिरच का पेड़ है अथवा संसाररूपी फूल है उसमें अहंतारूपी सुगन्ध है, जब अहंता उदय होती है तब संसार क्षण में उदय होता और अहंता के नाश हुए संसार क्षण में नाश हो जाता है क्षण में उदय, होता है और क्षण में नाश होता है सो अहंता का होना ही उदय होने का क्षण है और अहंता का लीन होना नाश का क्षण है | हे रामजी जैसे मृत्तिका में जल के संयोग से घट बनता है तब मृत्तिका घटसंज्ञा पाती है, तैसे ही पुरुष को जब अहंकार का संग होता है तब संसारी होता है और जीवसंज्ञा पाता है और देश, काल, पृथ्वी, पर्वत आदिक दृश्य को प्रत्यक्ष देखता है, और जब अहंता नाश होती है तब सुखी होता है, निदान जो कुछ नाम और उसका अर्थ है सो अहंता से भासता है और जब अहंता को त्यागे तब शान्तरूप आत्मा ही शेष रहता है | जैसे पवन से रहित दीपक प्रकाशता है तैसे ही अहंकाररूपी पवन से रहित जीव अपने स्वभाव में स्थित होकर आनन्दपद को प्राप्त होता है, अनादि पद पाता है, सबका अपना आप होता है और देश, काल, वस्तु अपने में देखता है | हे रामजी! जबतक अहंता का नाश नहीं होता तबतक मेरे वचन हृदय में स्थित न होंगे | जैसे रेत से तेल निकलना कठिन है तैसे ही जिस पुरुष ने अपना स्वभाव नहीं जाना उसको ब्रह्म का पाना कठिन है | अपना स्वभाव जानना अति सुगम है | जब अहंता का त्याग करे कि न मैं हूँ और न जगत् है तब कल्याण होता है और तभी अहंता का नाश होता है और कोई भ्रम नहीं रहता | जैसे रस्सी के जाने से सर्पभ्रम निवृत्त हो जाता है | जबतक अहंता फुरती है तब तक उसको उपदेश नहीं लगता | जैसे आरसी पर मोती नहीं ठहरता तैसे ही जिसको अहंता फुरती है उसके हृदय में मेरे वचन नहीं ठहरते और जिसका हृदय शुद्ध है उसको मेरे वचन लगते हैं | जैसे तेल की बूँद जल में फैल जाती है तैसे ही उसको थोड़े वचन भी बहुत हो लगते हैं हे रामजी! इसी पर एक पुरातन इतिहास कहता हूँ सो तुम सुनो, वह मेरा और काकभुशुण्डि का संवाद है | एक समय मैं सुमेर पर्वत के शिखर पर गया तो वहाँ भुशुण्डि बैठा था, उससे मैंने प्रश्न किया कि हे अंग! ऐसा भी कोई पुरुष देखा है जिसकी आयु बड़ी हो और ज्ञान से शून्य रहा हो?
जो उसको देखा हो तो कहो | भुशुण्डि बोले, हे भगवन्! एक विद्याधर हुआ जिसकी बड़ी आयु थी और जिसने बहुत विद्या ध्ययन किया था | वह सत्कर्मों में बहुत बिचरता था, उसने बहुत भोग भोगे थे और चारयुग पर्यन्त जप, तप, नियम आदिक सकाम कर्म किये थे | जब चतुर्थ युग का अन्त हुआ तब उसको विचार उपजा और जितनेभोग सुखरूप जानकर भोगता था उनमें उसको वैराग्य हुआ, तब उनको त्यागकर लोकालोक पर्वत पर जा बिचरा और बिचारा कि यह संसार असाररूप है किसी प्रकार इससे छूँटू | इसमें बारम्बार जन्म और मरण है और कोई पदार्थ सत्य नहीं, जिसका आश्रय करूँ? ऐसे विचार करके वह विकृत आत्मा पुरुष सुमेरु पर्वत पर मेरे पास आया और सिर नीचा करके मुझे दण्डवत की | मैंने भी उसका बहुत आदर किया तब हाथ जोड़कर उसने कहा, हे भगवन्! इतने कालपर्यन्त मैं विषयों को भोगता रहा परन्तु मुझे शान्ति न हुई इससे मैं दुःखी हूँ आप कृपा करके शान्ति का उपाय कहो | हे भगवन्! चित्ररथ के बाग में जिसमें सदाशिवजी रहते हैं और जहाँ बहुत कल्पवृक्ष हैं उसमें मैं चिरकाल रहा, फिर विद्याधरों के स्वर्ग में रहा, फिर इन्द्र के नन्दनवन और सुवर्ण की कन्दरा में रहकर सुन्दर अप्सराओं के साथ स्पर्श किया और विमान पर बहुत आरूढ़ रहा हूँ | हे भगवन्! बहुत स्थान मैंने देखे हैं और तप, दान, यज्ञ, व्रत भी बहुत किये हैं | सहस्र वर्ष तक ऐसे सुन्दर रूप देखता रहा हूँ जिनकी सुन्दरता नहीं कह सकता तो भी नेत्रों को तृप्ति न हुई, बहुत सुगन्ध सूँघी पर नासिका को तृप्ति न हुई, रसना से भोजन बहुत प्रकार के खाये पर शान्ति न हुई बल्कि तृष्णा बढ़ती गई, कानों से बहुत प्रकार शब्द और राग सुने और त्वचा से बहुत स्पर्श किये हैं तो भी शान्ति न हुई | हे भगवन्! मैं जिस ओर सुख जानकर प्रवेश करूँ उसी ओर दुःख प्राप्त होवे-जैसे मृग क्षुधा निवारने के लिये घास खाने जाता है और राग सुनकर मूर्छित हो जाता है तब उसको बधिक पकड़ लेता है तो मृग दुःख पाता है तैसे ही मैं सुख जानकर विषयों को ग्रहण करता था और बड़े दुःखों को प्राप्त होता था हे भगवन्! मैंने चिरकाल तक पाँचों इन्द्रियों और छठे मन सहित दिव्य भोग भोगे हैं जो कुछ कहे नहीं जाते परन्तु मुझे शान्ति न हुई और न इन्द्रियाँ तृप्त हुईं | जैसे घृत से अग्नि तृप्त नहीं होती तैसे ही दिन दिन प्राप्ति तृष्णा वृद्ध होती जाती है और हृदय जलाती है | जो पुरुष इन भोगों के निमित्त यत्न करता है कि मैं इनसे सुखी हूँगा वह मूर्ख है और उसको धिक्कार है- वह समुद्र में तरंग का आश्रय करता है | ये तब तक सुखरूप भासते हैं जब तक इन्द्रियों और विषयों का संयोग है, जब इन्द्रियों से विषयों का वियोग होता है तब महादुःख को प्राप्त होता है, क्योंकि तृष्णा हृदय में रहती है और भोग जाते रहते हैं तब जो जो विषय भोगे होते हैं वे दुःखदायक हो जाते हैं | हे भगवन्! मैंने इसी से बहुत दुःख पाया है | यद्यपि इन्द्रियाँ कोमल हैं तो भी सुमेरु की नाईं कठिन हैं | कोमल भासती हैं परन्तु ऐसी हैं जैसे सर्पिणी और खड्ग की धार कोमल होती है पर स्पर्श किये से मर जाता है | जैसे जल में नाव पवन से भ्रमती है, तैसे ही अज्ञानरूपी नदी में पवनरूपी इन्द्रियों ने मुझे दुःख दिया है | हे भगवन्! ऐसे भी मैंने देखे कि सारा दिन माँगते रहे और भोजन के निमित्त इकट्ठा नहीं हुआ और ऐसे भी देखे हैं कि उन्होंने ब्रह्मा से आदि काष्ठ पर्यन्त सब भोग भोगे हैं | पर जिसको दिन में भोजनमात्र भी प्राप्त नहीं होता और जो सब इन्द्रियों के इष्टरूप भोगों को भोगता है उन दोनों को भस्म होते देखा है और भस्म दोनों की तुल्य हो जाती है-विशेषता कुछ नहीं | इन्द्रियों के बन्धन में बारम्बार जन्मते मरते अज्ञानी शान्ति नहीं पाते | जो तुम कहो कि तू तो सुखी दृष्टि आता है तुझे क्या दुःख है तो हे भगवन्! वह दुःख देखने में नहीं आता परन्तु मेरा हृदय जलता है | हे भगवन्! ब्रह्मा के लोक में मैंने बड़े सुख देखे हैं परन्तु वहाँ भी दुःखी ही रहा हूँ, क्योंकि क्षय और अतिशय वहाँ भी रहता है इससे वे भी जलते हैं | इन्द्रियों का शस्त्र से भी कठिन घाव है जो नाना प्रकार की संसार की विषमता दिखाती हैं और उनमें सर्वदा राग द्वेष रहता है जिससे मैं बहुत जलता रहता हूँ | इससे मुझसे वही उपाय कहिये जिससे मैं शान्ति पाऊँ | वह कौन सुख है जिससे फिर दुःखी न होऊँ और जिसका कदाचित् नाश नहीं और जो आदि अन्त से रहित है | जो उसके पाने में कष्ट है तो भी मैं यत्न करता हूँ कि किसी प्रकार प्राप्त हो | हे मुनीश्वर! इन्द्रियों ने मुझे बड़ा कष्ट दिया है | ये इन्द्रियाँ गुणरूपी वृक्ष को अग्नि हैं, शुभ गुणों को जलाती हैं और विचार धैर्य, संतोष और शान्ति आदिक गुणरूपी वृक्ष को नाश करनेवाली हैं | हे भगवन्! इन्होंने मुझे दुःख दिया है | जैसे मृग का बच्चा सिंह के वश पड़े तो वह उसको मर्दन करता है, तैसे ही इन्द्रियों ने मुझे मर्दन किया है | हे भगवन्! जिस पुरुष ने इन्द्रियों को वश किया है उसका पूजन सब देवता करते हैं और उसके दर्शन की इच्छा करते हैं और जिसने मन को वश नहीं किया उसको दीन जानते हैं | जिस पुरुष ने इन्द्रियों को वश किया है वह सुमेरु पर्वत की नाईं अपनी गम्भीरता में स्थित है और जिसने इन्द्रियाँ वश नहीं कीं वह तृण की नाईं तुच्छ है | जिसको इन्द्रियाँ के अर्थ में सदातृष्णा रहती है वह पशु है, उसको मेरा धिक्कार है | हे मुनीश्वर! जो बड़ा महन्त भी हो यदि उसके इन्द्रियाँ वश नहीं तो वह महानीच है | हे मुनीश्वर! इन्द्रियों ने मुझे बड़ा दुःख दिया है | जैसे महाशून्य उजाड़ में चोर लूट लेते हैं तैसे ही इन्द्रियों ने मुझे लूट लिया है | इन्द्रियाँरूपी सर्पिणी में तृष्णारूपी विष है इससे इनमें सारा विश्व मोहित देख पड़ता है और कोई बिरला इनसे बचा होगा | इन्द्रियाँ दुष्ट हैं जो अपने-अपने विषय को लेती हैं और को नहीं देती और तुच्छ और जड़ हैं | जैसे बिजली का चमत्कार होता है और फिर छिप जाता है तैसे ही इन्द्रियों को सुख क्षणमात्र दिखाई देते हैं और फिर छिप जाते हैं | जबतक इन्द्रियों और विषयों का संयोग है तबतक सुख छिप जाते हैं | जबतक इन्द्रियों और विषयों का संयोग है तबतक सुख भासता है और जब इनका वियोग होता है तब दुःख उत्पन्न होता है, क्योंकि तृष्णा रहती है | एक सेना है उसमें इन्द्रियों के भोग उन्मत्त हाथी हैं, तृष्णारूपी जंजीर है, इन्द्रियाँरूपी रथ हैं, नाना प्रकार के विषय घोड़े हैं और संकल्प विकल्परूपी खड्गों का धारनेवाला अहंकार है और यह जो क्रिया अहंकारसहित होती है सो शास्त्रों के समूह हैं | हे मुनीश्वर! जिस पुरुष ने इस सेना को नहीं जीता वह मोहरूपी अन्धे कुयें में गिरके कष्ट पाता है और जिसने जीता है वह परमसुख को प्राप्त होता है | हे मुनीश्वर! ये इन्द्रियाँ भोग की इच्छारूपी खाईं में अहंकाररूपी राजा को डाल देती हैं और उसमें से निकलना कठिन होता है | जिस पुरुष ने इनको जीता है उसकी त्रिलोकी में जय होती है और जिसने नहीं जीता वह महादीनता को प्राप्त होता है और जन्म जन्मान्तर पाता है | इन इन्द्रियों में रजो गुण और तमोगुण रहता है | ये तबतक दाह देती हैं जबतक रज तम वृत्ति है | यह भी मन की वृत्ति है | जब इनका अभाव होता है तब शान्ति प्राप्त होती है | यह शोध करके देखा है कि इन्द्रियाँ, तप, यज्ञ, व्रत, तीर्थ और किसी औषध से वश नहीं होतीं और न इनके वश करने का कोई उपाय है, केवल सन्त के संग के निरवासी हो तब वश होती हैं | इससे मैं तुम्हारी शरण हूँ, कृपा करके मुझे आपदा के समुद्र से निकालो, क्योंकि मैं डूबता हूँ | मैं इस संसारसमुद्र में दीन हूँ, तुम पार करो और तुम्हारी महिमा सन्तों से भी सुनी है |हे भगवन्! जो कोई सब आयु पर्यन्त विषयों के दिव्य भोग भोगता रहे और इनसे शान्ति चाहे तो न प्राप्त होगी | बड़े सुख दुःख समान हैं | आकाश में उड़नेवाले भी इन्द्रियों को वश नहीं कर सकते इससे दीन और दुःखी रहते हैं | कोई पुरुष वीर्यवान हो और फूल की नाईं महामत्त हाथी के दाँत को चूर्ण कर सकता हो परन्तु इन्द्रियों को अन्तर्मुख करना महा कठिन है | हे मुनीश्वर! इतने काल तक मैं महा अध्यात्म तप से दुःखी रहा हूँ | तुम कृपा करके निकालो मैं तुम्हारी शरण हूँ |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विद्याधरवैराग्यवर्णनं नाम शताधिकैकत्रिंशत्तमस्सर्गः ||131||
भुशुण्डिजी बोले, हे
वशिष्ठजी! जब
इस प्रकार विद्याधर ने
मेरे आगे प्रार्थना की
तो मैंने कहा, हे अंग! तू
धन्य है
| अब तू
जागा है
| जैसे कोई पुरुष
अन्धे कुयें में पड़ा
हो और
उसकी इच्छा हो
निकले तो
जानिये कि
निकलेगा | हे
विद्याधर! मैं उपदेश
करता हूँ सो तू अंगीकार करियो और
सत्य जानके मेरे वचनों में संशय
न करना | जो
सबके वचन हैं सो तुझसे कहता हूँ | जैसे
उज्ज्वल आरसी प्रति बिम्ब को
यत्न बिना ग्रहण करती है
तैसे ही
मेरे वचन शीघ्र
ही तेरे हृदय में प्रवेश करेंगे | जिसका
अन्तःकरण शुद्ध होता है
उसको सन्त उपदेश करें अथवा न करें उसको सहज वचन ही उपदेश हो
लगते हैं | जैसे
शुद्ध आदर्श प्रतिबिम्ब को
यत्न बिना ग्रहण करता है
तैसे ही
मेरे वचनों को
तू धार लेगा
तो तेरे दुःख नाश हो जावेंगे और
परमानन्द को
जो अविनाशी सुख और आदि अन्त से
रहित है
सो प्राप्त होगा | इन्द्रियों के
सुख आगमापायी हैं सो दुःख के
तुल्य हैं-इनसे
रहित परमसुख है
| हे विद्याधरों में श्रेष्ठ! जो
कुछ तुझे सुखरूप दृष्ट आवे उसका
त्याग कर
तब तुझे परमसुख प्राप्त होगा | सब
दुःखों का
मूल अहंभाव है,
जब अहंकार नाश हो तब शान्ति होगी | संसार का
बीज भी
अहंकार है
और संसार मृगतृष्णा के
जलवत् है
| तबतक संसार नष्ट नहीं होता जबतक अहंतारूपी संसार का
बीज है,
जब अहंतारूपी बीज नष्ट
हो जावे तब
संसार भी
निवृत्त हो
जावे | संसाररूपी वृक्ष के
सुमेरु आदिक पर्वत पत्र है,
तारागणकली और
फूल हैं सातों
समुद्र रस
हैं, जन्म मरण बेल है, सुख दुःख
फल हैं और वह आकाश, दिशा, पाताल को
धार के
स्थित हुआ है | अहंकाररूपी वृक्ष पृथ्वी पर
उत्पन्न हुआ है, अहंकार ही
उसका बीज है और वृक्ष मिथ्या भ्रममात्र असत्य और
सत्य की
नाईं स्थित हुआ है | इससे अहंकाररूपी बीज का नाश करो और निरहंकाररूपी अग्नि से
इसको जलाओ तब
अत्यन्त अभाव हो
जावेगा | यह
भ्रम करके भय
देता है
| जैसे रस्सी में सर्पभ्रम और
भय देता है
इससे निरहंकाररूपी अग्नि से
इसका नाश करो |
इति श्रीयोगवाशिष्ठेनिर्वाणप्रकरणे शताधिकद्वात्रिंशत्तमस्सर्ग ||132||
भुशुण्डिजी बोले, हे
विद्याधर! यह
ज्ञान जैसे उत्पन्न होता है
सो सुनो | ब्रह्म विद्या शास्त्र के
सुनने और
आत्मविचार से
यह उपजता है
| उस आत्मज्ञानरूपी अग्नि से
संसाररूपी वृक्ष को
जलाओ | यह
आगे भी
नहीं था,
अनहोता ही
उदय हुआ है और मन
के संकल्प से
हुए की
नाईं स्थित है
| जैसे पत्थर में शिल्पी कल्पता है कि इतनी पुतलियाँ निकलेंगी सो
हुई कुछ नहीं,
तैसे ही
मनरूपी शिल्पी यह
विश्वरूपी पुतलियाँ कल्पता है
| जब मन
का नाश करोगे
तब संसार भ्रम मिट जावेगा, आत्मविचार करके परमपद को
प्राप्त होगे और
अपना आप
परमात्मरूप प्रत्यक्ष भासेगा | इससे अहंता को
त्याग करके अपने स्वरूप में स्थित
हो रहो | हे विद्याधर! यह
जो संसाररूपी वृक्ष है
सो अहंतारूपी बीज से उपजा है,
उसको जब
ज्ञानरूपी अग्नि से
जलाइये तब
फिर यह
जगत् न उपजेगा | यदि इसको
विचार करके देखिये तब
अहं त्व नहीं
रहता | हे
विद्याधर! यह
अहं त्वं मिथ्या है-इसके अभाव की
भावना करो, यही उत्तम ज्ञान है
| हे साधो! जब
गुरु के
वचन सुनकर उनके अनुसार पुरुषार्थ करे तब परमपद को
प्राप्त होता है
और जय
होती है
| हे विद्यारूपी कन्दरा के
धारने वाले, पर्वत और
विद्यारूपी पृथ्वी के
धारनेवाले शेषनाग! यह
संसाररूपी एक
आडम्बर है
और उसके सुमेरु जैसे कई
थम्भे हैं जो रत्नों की
पंक्ति से
जड़े हुए हैं और वन,
दिशा पहाड़, वृक्ष, कन्दरा, वैताल, देवता, पाताल, आकाश इत्यादिक ब्रह्माण्ड उसके ऊपर स्थित
हैं | रात्रि दिन भूत प्राणी और
इनके जो
घर हैं सो चौपड़ के
खाने हैं, जैसा
कर्म करता है
वह उसके अनुसार दुःख सुख भोगता
है | ऐसे ही सम्पूर्ण प्रपञ्च जो
क्रियासंयुक्त दिखाई देता है
सो भ्रम से
सिद्ध है--इससे मिथ्या है
| जैसे स्वप्ने की
संकल्प से
भासती है
तैसे ही
यह सृष्टि भी
भ्रम से
भासती है
और अज्ञान की
रची हुई है, आत्मा के
अज्ञान से
भासती है
और आत्मा के
ज्ञान से
लीन हो
जाती है
| जब सृष्टि है
तब भी
परमात्मतत्त्व ही
है और
जब सृष्टि न होगी तब
भी परमात्मतत्त्व ही
होगा, आगे भी वही था
और कुछ प्रपञ्च तुझे दृष्ट आता है सो शून्य आकाश ही
है | त्रिगुणमय प्रपञ्च गुणों का
रचा हुआ अपने
स्वरूप के
प्रमाद से
स्थित हुआ है और आत्मज्ञान से
शून्य हो
जावेगा | जब
प्रपञ्च ही
शून्य हुआ तब आत्मा और
अनात्मा का
कहना भी
न रहेगा और
पीछे जो
शेष रहेगा सो
केवल शुद्ध परमतत्त्व है
और तेरा अपना आप
है,उसमें स्थित हो
रहे दृश्य का
त्यागकर कि
न मैं हूँ और न जगत् है
| जब तू
ऐसा होगा तब
तेरी जय
होगी | आत्मपद सबसे उत्तम है
जब तू
आत्मपद में स्थित
होगा तब
सबसे उत्तम होगा और
तेरी जय
होगी--इससे आत्मपद में ही स्थित हो
रह |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे संसाराडम्बरोत्पत्तिर्नाम शताधिकत्रयस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ||133||
भुशुण्डिजी बोले, हे
विद्याधर! यह
प्रपञ्च भी
आत्मा का
चमत्कार है
आत्मा शुद्ध चैतन्य है
जिसमें जड़ और चेतन स्थित हैं और वह सबका अधिष्ठान है
सो सत्तामात्र तेरा अपना आप
है और
अहं त्वं शब्द अर्थ से
रहित आत्मत्वमात्र है
पर सत्यस्वरूप होके असत्य की
नाईं स्थित है
| हे विद्याधर! तू
इस जड़ और चेतन से
अबोधमान हो
रह | जब
तू अबोध होगा तब
शान्त और
चिद्घन होगा | ये
जो जड़ और चेतन हैं इन दोनों का
परमार्थ चैतन्य के
आगे अन्तर है,
यद्यपि वह
अदृश्य है
तो भी
इनके भीतर ही
रहता है
| जैसे समुद्र के
भीतर बड़वाग्नि रहती है
इन जड़ चेतनरूप का
कारणरूप वही है, उत्पत्ति भी
उसी से
होती है
और नाश भी वही करता है
| हे विद्याधर! जब
ऐसे जाना कि
मैं चेतनरूप भी
नहीं और
जड़ भी
नहीं तो
पीछे जो
रहेगा वह
तेरा स्वरूप है
| जब तेरे भीतर इन
जड़ और
चेतन दोनों का
स्पर्श नहीं हुआ तब सबके भीतर जो
चैतन्य है
वही ब्रह्म तुझे भासेगा और
विश्व आत्मा में कुछ नहीं हुआ | जैसे
सूर्य की
किरणों का
चमत्कारजला भास होता
है तैसे ही
शुद्ध चैतन्य का
चमत्कार विश्व हो
भासता है
| हे अंग! जैसे
भीति पर
पुतलियाँ लिखी होती हैं सो भीति से
कुछ भिन्न नहीं, चितेरे ने
लिखी हैं, तैसे
ही शून्य आकाश में चित्तरूपी चितेरे ने
विश्वरूपी पुतलियाँ कल्पी सी
हैं आत्म रूपी भीति से
भिन्न नहीं जैसे सुवर्ण में भूषण
कल्पित है
सो सुवर्ण से
भिन्न नहीं, तैसे ही
आत्मा में अज्ञान से विश्व देखते हैं वह आत्मा से
भिन्न नहीं | जगत्, ब्रह्म, आत्मा, आकाश, देश, काल सब उसी तत्त्व की संज्ञा हैं | वही शुद्ध चैतन्य आकाश है
जिसका चमत्कार ऐसे स्थित
है उसी तत्त्व में तू भी
स्थित हो
रह | यह
जगत् ऐसे है जैसे दूर दृष्टि से आकाश में बादल
हाथी की
सूँड़ से
भासते हैं | यह जो अहं त्वं
जगत् है
सो अबोध से
भासता है
और बोध करके
लीन हो
जाता है-
जैसे मरुस्थल में सूर्य
की किरणों से
जल भासता है
और गन्धर्वनगर है
तैसे ही
यह जगत् है-इससे इसका त्याग करो |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्तचमत्कारोनाम शताधिकचतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ||134||
भुशुण्डिजी बोले, हे
विद्याधर! यह
स्थावर जंगम जगत् सब
आत्मा से
उत्पन्न हुआ है और आत्मा ही
में स्थित है
और आत्मा ही
विश्व में स्थित
है | जैसे स्वप्न का
विश्व स्वप्नवाले में स्थित
है | आत्मा किसी का
कारण नहीं, क्योंकि अद्वैत है
| हे अंग! जो तू उस
पद के
पाने की
इच्छा करता है
तो तू
ऐसे निश्चयकर कि
न मैं हूँ और न यह जगत् है
| जब तू
ऐसा होगा तब
आत्मपद की
प्राप्ति होगी जो
देश, काल और वस्तु के
परिच्छेद से
रहित है
और सब
यही परमात्मतत्त्व स्थित है
| जगत् का
कर्ता संकल्प ही
है, क्योंकि संकल्प से
जगत् उत्पन्न होता है
| जैसे पवन से अग्नि उत्पन्न होता है
और पवन ही से दीपक निर्वाण होता है,
तैसे ही
जब संकल्प बहिर्मुख फुरता है
तब संसार उदय हो भासता है
और जब
संकल्प अंतर्मुख होता है
तब आत्मपद प्राप्त होता है
और सर्वप्रपञ्च लय
हो जाता है
| इससे संसार की
नाना प्रकार की
संज्ञा फुरने से
ही होती हैं स्वरूप में कुछ नहीं, न सत्य है,
न असत्य है,
न स्वतः है,
न अन्य है
| यह सब
कलनामात्र है,
सत्, असत् और
स्वतः, अन्य का
अभाव हुआ तो वहाँ अहं त्वं
कहाँ पाइये? वह
है नहीं और
बालक के
यक्षवत् भ्रममात्र है
| हे साधो! अहं त्वं
नष्ट हो
गये तहाँ जो
सत्ता है
सो परमपद है
और जहाँ जगत् है
वहाँ विचार से
लीन हो
जाता है
वास्तव में पूछो
तो ब्रह्म और
जगत् में कुछ भेद नहीं -नाममात्र दो
हैं-जैसे घट
और कुम्भ हैं-परन्तु भ्रम
से नानात्व भासते हैं | जैसे
समुद्र में आवर्त
और तरंग हैं सो जल से
कुछ भिन्न नहीं और
पवन के
संयोग से
आकार भासते हैं तैसे
ही आत्मा में जगत्
कुछ भिन्न नहीं, संकल्प के
फुरने से
नाना प्रकार का
जगत् भासता है
| हे अंग! संकल्प के साथ मिलकर चित्त जैसे भावना करता है
तैसा ही
रूप अपना देखता है
स्वरूप से
कुछ भिन्न नहीं, परन्तु भावना से
और का
देखता है
| जैसे शुद्ध मणि के निकट कोई रंग रखिये तो
तैसा ही
रूप भासता है
और मणि में कुछ रंग नहीं
तैसे ही
चित्त शक्ति में कुछ हुआ नहीं और
हुए की
नाईं स्थित है
| इससे अपने स्वरूप की
भावना करो और जड़ चैतन्य को
छोड़कर शुद्ध चैतन्य में स्थित
हो रहो | जब जैसे जानकर अपने स्वरूप में स्थित
होगे तब
तुम्हें उत्थान भी
अपना स्वरूप भासेगा जैसे स्थिर समुद्र में तरंग
फुरते हैं सो कारणरूप जल
बिना तो
नहीं होते, तैसे ही
ब्रह्म कारण रूप बिना
जगत् नहीं परन्तु ब्रह्मसत्ता अकर्तारूप, अद्वैत और
अच्युत है
इसी से
कहा है
कि अकर्ता है
और जगत् अकारणरूप है
| जो जगत् अकारणरूप है
तो न उपजता है
और न नाश होता है-मरुस्थल के
जलवत् है
इसी से
कहा है
कि जगत् कुछ वस्तु
नहीं केवल अज,
अच्युत और
शान्तरूप आत्मरूप ही
अखण्डित स्थित है
और शिला कोशवत् अचैत्य चिन्मात्र है
| जिसके हृदय में चिन्मात्र की
भावना नहीं उस
मूर्ख से
हमारा क्या है?
हे साधो! परमार्थ से
कुछ नहीं बना पर जहाँ-जहाँ मन
है तहाँ-तहाँ अनेक जगत् हैं और तृण सुमेरु आदिक सबमें जगत् है
| जो विचारकर देखिये तो
वही रूप है और कुछ नहीं
| जैसे सुवर्ण के
जानने से
भूषण भी
स्वर्ण भासता है
तैसे ही
केवल सत्ता समानपद एक
अद्वैत भिन्न कुछ नहीं
और भिन्न-भिन्न संज्ञा भी
वही है
|
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकपञ्चत्रिशत्तमस्सर्गः ||135||
भुशुण्डिजी बोले, हे
विद्याधर! जब
आत्मपद प्राप्त होता है
तब ऐसी अवस्था होती
है कि
जो नग्नशरीर हो
और उस
पर बहुत शस्त्रों की
वर्षा हो
तो उससे दुःखी नहीं होता और
सुन्दर कण्ठ से
मिले तो
हर्षवान् नहीं होता अर्थात् दोनों ही
में तुल्य रहता है
हे विद्याधर! तब
तक आत्मपद का
अभ्यास करे जबतक
संसार से
सुषुप्त की
नाईं न हो | अभ्यास ही
से आत्मपद को
प्राप्त होगा | जब
आत्मपद की
प्राप्ति होगी तब
पाञ्चभौतिक शरीर को
ज्वर स्पर्श न करेंगे और
यद्यपि शरीर में प्राप्त भी
हों तो
भी उसके भीतर प्रवेश नहीं करते | वह केवल शान्तपद में स्थित
रहता है--जैसे जल
में कमल को स्पर्श नहीं होता | हे
देवपुत्र! जब
तक देहादिकों में अभ्यास है तबतक आत्मा के
प्रमाद से
सुखदुःख स्पर्श करते हैं और जब आत्मा का
साक्षात्कार होता है
तब सब
प्रपञ्च भी
आत्मरूप हो
जाते हैं | हे विद्याधर! जैसे कोई पुरुष
विष पान करता
है तो
उसको जलन और खाँसी होती है-
सो अवस्था विष की है-विष से भिन्न और
कुछ नहीं परन्तु नाम संज्ञा हुई है- विष न जन्मता, न मरता है
और जलन खाँसी
उसमें दृष्टि आती है तैसे ही
आत्मा न जन्मता है
और न मरता है
और गुणों के
साथ मिलकर अवस्था को
प्राप्त हुआ दृष्टि आता है आत्मा जन्ममरण से
रहित है
पर गुणों के
साथ मिलने से
जन्मता मरता भासता है
और अन्तःकरण, देह इन्द्रियादिक भिन्न-भिन्न भासते हैं | हे साधो! यह
जगत् भ्रम भासता है,
जो ज्ञानवान् पुरुष हैं वे इस जगत् को
गोपद की
नाईं अपने पुरुषार्थ से
लाँघ जाते हैं और जो अज्ञानी हैं उनको
अल्प भी
समुद्र समान हो
जाता है
| इससे आत्मपद पाने का
यत्न करो जिसके
जानने से
संसारसमुद्र तुच्छ हो
जावे | वह
आत्मतत्त्व सबमें अनुस्यूत और
सबसे अतीत है,
उसके जानने से
अन्तःकरण शीतल हो
जाता है
और सब
ताप नष्ट हो
जाते हैं | हे साधो! फिर उसका
त्याग करना अविद्या है
और बड़ी मूर्खता है
| हे साधो! ये
सब पदार्थ ब्रह्मरूप ही
है और
जो ब्रह्मस्वरूप हुए तो मन अहंकार,कलंक आदिक भी
वही है,
किसी से
किसी को
कुछ दुःख सुख नहीं
| हे विद्याधर! जब
आत्मपद को
जाना तब
अन्तःकरण आदि भी ब्रह्म स्वरूप भासेंगे | जो
संकल्प से
भिन्न भिन्न जाने जाते हैं वे संकल्प के
होते भी
ब्रह्मस्वरूप भासेंगे | इससे निःसंकल्प होकर स्थित हो
कि न मैं हूँ, न यह जगत् है
और न इदम् है
| इन शब्दों और
अर्थों से
रहित होकर स्थित हो
रहे कि
सब संशय मिट जावें
| हे विद्याधर! जब
तू ऐसा निर हंकार और
निःसंकल्प होगा तब
उत्थानकाल में भी बुद्धि, बोध, लज्जा,
लक्ष्मी स्मृति, यश,
कीर्ति इत्यादिक जो
शुभारम्भ अवस्था हैं सब आत्मस्वरूप भासेंगी और
सब आत्म बुद्धि रहेगी | इनके प्राप्त हुये भी
केवल परमार्थ सत्ता से
भिन्न न भासेगा--जैसे अन्धकार में सर्प
के पैर का खोज नहीं भासता क्योंकि है
नहीं, तैसे ही
तुमको सर्व आत्मा न भासेगी-सब
आत्मा ही
भासेगी और
जितने कुछ भावरूप पदार्थ स्थित
हैं सो
अभाव हो
जावेंगे |हे
अंग! जिस पुरुष
में विचारकर आत्मपद पाने का
यत्न किया है
वह पावेगा और
जिसने कहा कि मैं मुक्त हो
रहूँगा और
ईश्वर मुझ पर दया करेंगे वह
पुरुष कदाचित् मुक्त न होगा | पुरुष के
प्रयत्न बिना कदाचित् मुक्ति न होगी | आत्मस्वरूप में न कोई दुःख है
और किसी गुण से मिला हुआ सुख है वह
केवल शान्तरूप है
किसी से
किसी को
कुछ सुख दुःख
नहीं, न सुख है
और न दुःख है,
न कोई कर्त्ता है
और न भोक्ता है
केवल ब्रह्मसत्ता अपने आप
में स्थित है
|
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकषट््त्रिंशत्तमस्सर्गः ||136||
भुशण्डिजी बोले, हे
विद्याधर! जैसे कोई कलना
करे कि
आकाश में और आकाश स्थित है तो
मिथ्या प्रतीति है,
तैसे ही
आत्मा में जो अहंकार फुरता है
सो मिथ्या है
| जैसे आकाश में और आकाश कुछ वस्तु
नहीं | परमार्थ तत्त्व ऐसा सूक्ष्म है
कि उसमें आकाश भी
स्थूल है
और ऐसा स्थूल
है कि
जिसमें सुमेरु आदिक भी
सूक्ष्म अणुरूप हैं और राग द्वेष से
रहित चैतन्य केवल शान्तरूप है-गुण और
तत्त्व के
क्षोभ से
रहित है
| हे देवपुत्र! अपना अनुभवरूपी चन्द्रमा अमृत का
वर्षानेवाला है
| हे अंग! जितने
दृश्य पदार्थ भासते हैं सो हुए कुछ नहीं
| हे अंग! आत्मरूप अमृत की
भावना कर
तू जन्म मरण के बन्धन से
मुक्त हो
जैसे आकाश में दूसरे
आकाश की
कल्पना मिथ्या है
तैसे ही
निराकार चिदात्मा में अहं मिथ्या है,
और जैसे आकाश अपने आप
में स्थित है
तैसे ही
आत्मसत्ता अपने आप
में स्थित है
और अहं त्वं
आदिक से
रहित है
जब उसमें अहं का उत्थान होता हे
तब जगत् फैल जाता
है-जैसे वायु फुरने से
रहित हुई आकाशरूप हो
जाती है
तैसे ही
संवित् उत्थान अहं से रहित हुई आकाशरूप हो
जाती है
और जगत्भ्रम मिट जाता
है | फुरने से
जगत् फुर आया है, वास्तव में कुछ नहीं ज्ञानवान् को
आत्मा ही
भासता है
और देश, काल बुद्धि, लज्जा, लक्ष्मी, स्मृति, कीर्त्ति सब
आकाश रूप हैं- ब्रह्म रूपी चन्द्रमा के
प्रकाश से
प्रकाशते हैं | जैसे बादलों के
संयोग से
आकाश भ्रमभाव को
प्राप्त होता है,
तैसे ही
प्रमाद से
संवित् दृश्यभाव को
प्राप्त होती है
परन्तु और
कुछ नहीं होती | जैसे तरंग उठने से
जल और
कुछ नहीं होता और
जैसे काष्ठ छेदे से
और कुछ नहीं
होता, तैसे ही
दृष्टा से
दृश्य भिन्न नहीं होता | जैसे केले के
थम्भ में पत्र
बिना और
कुछ नहीं निकलता और
पत्र शून्यरूप है
तैसे ही
क्रूररूप जगत् भासता है
परन्तु आत्मा से
भिन्न नहीं शून्य रूप है | शीश, भुजा, नेत्र, चरण आदिक
नाना प्रकार भिन्न भिन्न भासते हैं परन्तु सब रूप केले के
पत्रों की
नाईं भासते हैं और सब असाररूप हैं | हे विद्याधर! चित्त में रागरूपी मलिनता है,
जब वैराग्यरूपी झाड़ से
झाड़िये तब
चित्त निर्मल हो
| जैसे दीवार पर
चित्र लिखे होते हैं तैसे
ही आत्मा जगत् भासता है
और देवता, मनुष्य, नाग, दैत्य
आदिक सब
जगत् संकल्परूपी चितेरे ने
चित्र लिखे हैं, स्वरूप के विचार से
निवृत्त हो
जाते हैं | जब स्नेहरूप संकल्प फुरता है
तब भाव अभावरूप जगत् फैल जाता
है | जैसे जल
में तेल के बूँद फैल जाते
हैं और
जैसे बाँस से
अग्नि निकलकर बाँस को
दग्ध करती है
तैसे ही
संकल्प इससे उपजकर इसी को खाते हैं | आत्मा
में जो
देश काल पदार्थ भासते
हैं यही अविद्या है--पुरुषार्थ से
इसका अभाव करो | दो भाग साधु के
संग और
कथा सुनने में व्यतीत करो, तृतीय भाग शास्त्र का
विचार करो और चतुर्थ भाग में आत्मज्ञान का
आप ही
अभ्यास करो | इस उपाय से
अविद्या नष्ट हो
जावेगी और
अशब्द और
अरूपपद की
प्राप्ति होगी | विद्याधर ने
पूछा, हे
मुनीश्वर! चार भागों के
उपाय से
जो अशब्दपद प्राप्त होता है
सो काल का क्रम क्या है? और नाम अर्थ
के अभाव हुए शेष रहता क्या है? भुशुण्डिजी बोले, हे
विद्याधर! संसार-समुद्र के
तरने को
ज्ञान वालों का
संग करना और
जो विकृत निर्वैर पुरुष हैं उनकी
भली प्रकार टहल करना
इससे अविद्या का
अर्धभाग नष्ट होगा, तीसरा भाग मनन करने और
चतुर्थ भाग अभ्यास करके
नष्ट होगा | जो
यह उपाय न कर सको तो यह युक्ति करो कि जिसमें चित्त अभिलाषा करके आसक्त हो
उसी का
त्याग करो कि जिसमें चित्त अभिलाषा करके आसक्त हो
उसी का
त्याग करो | एक भाग अविद्या इस
प्रकार नष्ट होगी | तीन भाग शास्त्र विचार और अपने यत्न से शनैः शनैः नष्ट होवेगी | साधुरंग सत्शास्त्र विचार और अपना यत्न होवे तो एक ही बार अविद्या नष्ट हो जावेगी | यह समकाल कहे हैं | एक एक के सेवने से एक एक भाग निवृत्त होता है | पीछे जो शेष रहता है उसमें नाम अर्थ सब असत््रूप हैं और वे अजर, अनन्त, एकरूप हैं | संकल्प के उपजे से
पदार्थ भासते हैं और संकल्प से
लीन हो
जाते हैं | हे विद्याधर! यह
जगत् संकल्प से
रचाहै-जैसे आकाश में सूर्य
निराधार स्थित होता है
तैसे ही
देशकाल की
अपेक्षा से
रहित यह
मननमात्र स्थित है!
तीनों जगत् मन
के फुरने से
फुर आते हैं और मन
के लय
हुए हो
जाते हैं-जैसे
स्वप्न के
पदार्थ जागे से
अभाव हो
जाते हैं | हे विद्याधर! ब्रह्मरूपी वन
में एक
कल्पवृक्ष है
जिसकी अनेक शाखा हैं! उसकी
एक शाख से जगत्- रूपी (गूलर) का
फल है
जिसमें देवता, सत्य, मनुष्य, पशु आदिक
मच्छर हैं | वासनारूपी रस
से पूर्ण मज्जा पहाड़ है,
पञ्छभूत मुख द्वारा उसका
निकलने का
खुला मार्ग इत्यादिक सुन्दर रचना बनी है | उसमें त्रिलोकी का
ईश्वर इन्द्र एक
हुआ और
गुरु के
उपदेश से
उसका आवरण नष्ट हो
गया | फिर इन्द्र और दैत्यों का
युद्ध होने लगा और इन्द्र अपनी सेना को
ले चला पर उसकी हीनता हुई इसलिये वह भागा और
दशों दिशाओं में भ्रमता रहा पर जहाँ जावे वहाँ दैत्य उसके पीछे चले आवें
| जैसे पापी परलोक में शोभा
नहीं पाता तैसे ही
इन्द्र ने
जब शान्ति न पाई तब
अन्तवाहकरूप करके सूर्य की
त्रस रेणु में प्रवेश कर गया | जैसे कमल में भँवरा प्रवेश करे तैसे
ही उसने प्रवेश किया तो
वहाँ उसको युद्ध का
वृत्तान्त विस्मरण हो
गया तब
एक मन्दिर में बैठा
आपको देखता हुआ | जैसे
निद्रा से
स्वप्नसृष्टि भास आवे तैसे ही
उसने वहाँ रत्न और
मणियों संयुक्त नगर देखा-वह उसमें गया और पृथ्वी, पहाड़, नदियाँ, चन्द्र, सूर्य, त्रिलोकी इसको भासने लगी और उस जगत् का
इन्द्र आपको देखा कि
दिव्य भोग और ऐश्वर्य से
सम्पन्न मैं इन्द्र स्थित
हूँ | वह
इन्द्र कुछ काल के उपरान्त शरीर को
त्याग के
निर्वाण हुआ--जैसे
तेल से
रहित दीपक निर्वाण होता है-तब कुन्दनाम उसका पुत्र हुआ और राज्य करने लगा | फिर उसके एक
पुत्र हुआ तब कुन्द भी
इन्द्र शरीर को
त्यागकर परमपद को
प्राप्त हुआ और उसका पुत्र राज्य करने लगा | फिर उसके भी
एक पुत्र हुआ, इसी प्रकार सहस्त्र पुत्र होकर राज्य करने लगा | फिर उसके भी
एक एक
पुत्र हुआ,इसी प्रकार सहस्त्र पुत्र होकर राज्य करते रहे उन्हीं के कुल में यह हमारा इन्द्र राज्य करता है
इससे यह
जगत् संकल्पमात्र है
और उस
त्रसरेणु में यह सृष्टि है
| इसलिये इस
जगत् को
संकल्पमात्र जानकर इसकी आस्था त्यागो |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे इन्द्रोपाख्याने त्रसरेणुजगतवर्णनन्नाम शताधिकसप्तत्रिंश्त्तमस्सर्गः ||137||
भुशुण्डिजी बोले, हे
विद्याधर! फिर उनके
कुल में एक बड़ा श्रीमान् इन्द्र हुआ जो त्रिलोकी का
राज्य करता रहा और फिर निर्वाण हुआ | उसके
एक पुत्र था
जिसको वृहस्पतिजी के
वचनों से
ज्ञानरूप प्रतिभा उदय हुई तब वह
विदितवेद होकर स्थित हुआ, यथाप्राप्ति में इन्द्र होकर
राज्य करने लगा और दैत्यों को
जीता | एक
काल में वह किसी कार्य के
निमित्त कमल की तन्तु में घुस गया तो
वहाँ उसको नाना प्रकार का
जगत् भासने लगा और अपनी इन्द्र की
प्रतिभा हुई इससे
उसे इच्छा उपजी कि
मैं ब्रह्मत्त्व को
प्राप्त हो
जाऊँ और
दृश्य पदार्थ की
नाईं उसे प्रत्यक्ष देखूँ | इसलिये एकान्त बैठकर समाधि में स्थित
हुआ तो
उसको भीतर बाहर ब्रह्म साक्षात्कार हुआ और उस प्रतिमा के
उदय होने से
यह निश्चय हुआ कि सर्व ब्रह्म ही
है और
सब ओर
पूजने योग्य है
| सब उसी को पूजते भी
हैं और
सर्व हैं | सर्व
शब्द, रूप, अवलोक
और मनस्कार से
रहित केवल शुद्ध आत्मपद है
और सर्व ओर
उसी के
पाणिपाद हैं | सब शीश और
मुख उसी के हैं, सब
ओर उसी के श्रवण हैं, सब ओर उसी के नेत्र हैं और सबमें आत्मत्व से
वही स्थित हो
रहा है
| सब इन्द्रियों और
विषयों को
वही प्रकाशता है
और सब
इन्द्रियों से
रहित है
और असक्त हुआ भी सबको धार रहा है | वह
निर्गुण है
और इन्द्रियों के
साथ मिल कर गुणों का
भोक्ता है
और सब
भूतों के
भीतर बाहर व्याप रहा है | सूक्ष्म है
इससे दुर्विज्ञेय है
और इन्द्रियों का
विषय नहीं | अज्ञानी को
अज्ञान से
दूर है
और आत्मत्व द्वारा ज्ञानी को
ज्ञान से
निकट है
और अनन्त, सर्वव्यापी केवल शान्तरूप है
जिसमें दूसरा कोई नहीं
| घट,
पट, दीवार, गाय, आवा, बरा, नरा, सबमें
वही तत्त्व भासता है
और पर्वत, पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, देश, काल, वस्तु सब
ब्रह्म ही
है-ब्रह्म से
भिन्न नहीं | हे
विद्या धर!इस प्रकार इन्द्र को
ज्ञान हुआ और जीवन्मुक्त हुआ | तब वह सब
चेष्टा करे परन्तु अन्तर
से बन्धवान् न हो | जब
कुछ काल बीता
तब इन्द्र उस
निर्वाणपद को
प्राप्त हुआ जिसमें आकाश
भी स्थूल है
| फिर उस
इन्द्र का
एक बड़ा शूरवीर पुत्र सब
दैत्यों को
जीतकर देवता और
त्रिलोकी का
राज्य करने लगा और उसको भी
ज्ञान उत्पन्न हुआ | सतशास्त्र और
गुरु के
वचनों से
कुछ काल में वह भी
निर्वाण हुआ तब उसका जो
पुत्र रहा वह राज्य करने लगा | इसी प्रकार कई
इन्द्र हुए और राज्य करते रहे और नाना प्रकार के
व्यवहारों को
देखते रहे | फिर उसके कुल में कोई पुत्र था
उसको यह
हमारी सृष्टि भासि आई
तो वह
भी ब्रह्मध्यानी हुआ और इस त्रिलोकी का
राज्य करने लगा और अबतक विश्व का
इन्द्र वही है | हे विद्याधर! इस
प्रकार जो
विश्व की
उत्पत्ति है
सो संकल्पमात्र है
और सब
मैंने तुझसे कही हैं | पहले उसको त्रसरेणु में सृष्टि भासी,
फिर उस
सृष्टि के
एक कमल की तन्तु में भासी
और फिर उसमें
कई वृत्तान्त जो
संकल्पमात्र थे
उसने देखे और
उस अणु में अनेक अवस्था देखी | हे
विद्याधर! पर
वास्तव में वह कुछ हुई नहीं
| जैसे आकाश में नीलता
भासती है
और है
नहीं तैसे ही
यह विश्व है
| आत्मा में विश्व
का अत्यन्त अभाव है
| यह विश्व अहंभाव से
उपजा है
| जब अहंभाव फुरता है
तब आगे सृष्टि बनती
है और
जब अहं का अभाव होता है
तब विश्व कोई नहीं
| इस विश्व का
बीज अहं है, इससे तू
ऐसी भावना कर
कि न मैं हूँ और न जगत् है
जब ऐसी भावना
की तब
आत्मा ही
शेष रहेगा जो
प्रत्यक्ष ज्ञानरूप अपना आप
है | हे
विद्याधर! इस
मेरे उपदेश को
अंगीकार कर
|
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे संकल्पैकताप्रतिपादनन्नाम शताधिकअष्टत्रिशत्तमस्सर्गः ||138||
भुशण्डिजी बोले, हे
विद्याधर! जब
अहं का
उत्थान होता है
तब आगे सृष्टि बनकर
भासता है
और जब
अहं का
अभाव होता है
तब विश्व कुछ नहीं
भासता केवल शुद्धआत्मा ही
भासता है
हे विद्याधर! इन्द्र ने
कहा कि
मैं हूँ, उसको
सूर्य की
किरणों के
अणु में ऐसे अहं हुआ तो उसमें नाना विस्तार देखा और
कष्ट पाया | जो
उसको अहं न होता तो
दुःख न पाता | दुःखरूपी वृक्ष का
अहंरूपी बीज है और आत्मविचार से
इसका नाश होता
है | जब
अहं का
नाश होता है
तब आत्मपद का
साक्षात्कार होता है
और आत्मपद के
साक्षात्कार हुए से प्रच्छन्न अहं का नाश होता है
| हे विद्याधर! आत्मपद एक
पर्वत है
जिस पर
आकाश रूपी वन
है और
उसमें संसाररूपी वृक्ष लगा है | उसमें वासनारूपी रस
है, अज्ञानरूपी भूमि से
उत्पन्न हुआ है, नदियाँ-समुद्र उसकी नाड़ी हैं, चन्द्रमा और
तारे फूल हैं वासनारूपी जल
से बढ़ता है
और अहंकाररूपी वृक्ष का
बीज है
| सुख-दुःखरूपी इसके फल
हैं, आकाश इसकी डालें हैं और जड़ पाताल है
| तुम इस
वृक्ष को
ज्ञानरूपी अग्नि से
जलावो और
अहंरूपी वृक्ष के
बीज का
नाश करो | हे विद्याधर! एक
खाईं है
जिसके जन्ममरणरूपी दो
किनारे हैं, अनात्मरूपी उसमें जल
है, वासनारूपी तरंग है
और विश्व रूपी बुद्बुदे होते भी
हैं और
मिट भी
जाते हैं | शरीररूपी झाग है और अहंकाररूपी वायु है,
जब वायु हुई तब तरंग और
बुद्बुदे सब
होते हैं और जब वायु मिट गई तब केवल स्वच्छ निर्मल ही
भासता है
| हे विद्याधर! जो
वायु हुई तो जल से
भिन्न कुछ न हुआ और
जो न हुई तो
भी जल
से भिन्न कुछ नहीं-जल ही
है; तैसे ही
अज्ञान के
होते और
निवृत्त हुए भी आत्मपद ज्यों का
त्यों है
परन्तु सम्यक्दर्शन से
आत्मपद भासता है
और अज्ञानसे जगत् भासता है
| अहं का
होना ही
अज्ञान है
जब अहं हुआ तब मम
भी होता है
सो `अहं' `मम' नाम संसार का
है जब
अहं मम
मिटता है
तब जगत् का
अभाव होता है
| अहं के
होते दृश्य भासता है
और दृश्य में अहं होता है,
इससे संवेदन को
त्यागकर निर्वाणपद में प्राप्त हो
| इतना कह
भुशुण्डिजी ने
मुझसे कहा कि हे वशिष्ठजी! इस
प्रकार जब
मैंने विद्याधर को
उपदेश किया तो
वह समाधि में स्थित
हुआ और
परम निर्वाणपद को
प्राप्त हुआ | जैसे दीपक निर्वाण हो
जाता है
तैसे ही
उसका चित्त क्षोभ से
रहित शान्ति को
प्राप्त हुआ | हे ब्राह्मण! उसका हृदय शुद्ध था
इस कारण मेरे वचन शीघ्र
ही उसके हृदय में प्रवेश कर गये | जब
वह समाधि में स्थित
हुआ तो
मैंने उसको बारम्बार जगाया परन्तु वह
न जागा-जैसे कोई जलता
जलता शीतल समुद्र में जाय बैठे और
उससे कहिये कि
तू निकल तो
वह नहीं निकलता, तैसे ही
संसारताप से
जलता हुआ जब आत्मसमुद्र को
प्राप्त होता है
तब वह
अज्ञानरूपी संसार के
प्रवाह को
नहीं देखता | हे
वशिष्ठजी! जिसका अन्तःकरण शुद्ध होता है
उसको थोड़े वचन भी बहुत हो
लगते हैं | जैसे
तेल की
एक बूँद जल
में बहुत फैल जाती
है तैसे ही
जिसका अन्तःकरण शुद्ध होता है
उसको थोड़ा वचन भी बहुत होकर लगता है
| और जिसका अन्तःकरण मलिन होता है
उसको वचन नहीं
लगते | जैसे आरसी पर
मोती नहीं ठहरता तैसे ही
गुरुशास्त्र के
वचन उसको नहीं लगते | जब
विषयों से
वैराग उपजे तो
जानिये कि
हृदय शुद्ध हुआ है | हे वशिष्ठजी! जब
मैंने विद्याधर को
उपदेश किया तब
वह शीघ्र ही
आत्मपद को
प्राप्त हुआ क्योंकि उसका चित्त निर्मल था
| हे मुनीश्वर! जो
तुमने मुझसे पूछा था
सो कहा कि उस विद्याधर को
मैंने ज्ञान से
रहित चिरकाल जीता देखा | इतना कह
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! ऐसे कहकर
काकभुशुण्डि चुप हो रहा और
मैं नमस्कार करके आकाशमार्ग से
अपने घर
आया | हे
रामजी! मेरे और
काकभुशुण्डि के इस संवाद को एकादश चौकड़ी युग बीते हैं | हे रामजी यह नियम नहीं है कि थोड़े काल में ज्ञान उपजे वा बहुत काल में, यह हृदय की शुद्धता की बात है, जिसका हृदय शुद्ध होता है उसको गुरु और शास्त्रों का वचन शीघ्र ही लगता है-जैसे जल नीचे को स्वाभाविक जाता है | हे रामजी! इतना उपदेश जो तुमको मैंने क्रम से किया है उसका तात्पर्य यही है कि फुरने को त्याग करो कि न मैं हूँ और न कोई जगत् है-तब पीछे निर्विकल्प केवल आत्मपद रहेगा जो सबका अपना आप और उसका साक्षात्कार तुमको होगा | जैसे मलिन दर्पण में मुख नहीं दीखता तैसे ही आत्मरूपी दर्पण अहंरूपी मलसे ढपा है, जब इसका त्याग करो तब आत्मपद की प्राप्ति होगी और जगत् भी अपना आप भासेगा | आत्मा से कुछ भिन्न नहीं, क्योंकि केवल आत्मत्वमात्र है और जो कुछ भासता है उसे मृग तृष्णा के जलवत् और बन्ध्या के पुत्रवत् जानो, यह जगत् आत्मा के प्रमाद से भासता है जैसे आकाश में नीलता भासती है पर है नहीं, तैसे ही जगत् प्रत्यक्ष भासता है और है नहीं | जैसे रस्सी में सर्प मिथ्या है तैसे ही आत्मा में जगत् मिथ्या है | जब आत्मा का ज्ञान होगा तब जगत् का अत्यन्त अभाव होगा और केवल आत्मत्वमात्र अपना आप भासेगा |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्डिविद्याधरोपाख्यान समाप्तिर्नाम शताधिकनवत्रिंशत्तमस्सर्गः ||139||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! तुम अहं वेदना से
रहित हो
रहो | संसाररूपी वृक्ष का
बीज अहं ही है | वासना से
शुभ अशुभरूप कर्म का
सुख दुःख फल
है और
वासना ही
से प्रफुल्लित होता है,
इससे अहंभाव को
निवृत्त करो | जब अहं फुरता है
तब आगे जगत्
भासता है,
जब अहंता से
रहित होगे तब
जगत््भ्रम मिट जावेगा | अहंता
आत्मबोध से
नष्ट होता है
| आत्मबोधरूपी खंभारी से
उड़ाया अहंतारूपी पाषाण न जानोगे कि
कहाँ गया और सुवर्ण पाषाणतुल्य तुमको हो
जावेगा | शरीररूपी पत्र पर
अहंतारूपी अणु स्थित
है, जब
बोधरूपी वायु चलेगी तब
न जानोगे कि
कहाँ गया | शरीररूपी पत्र पर
अहंतारूपी बरफ का कारण स्थित है
,बोधरूपी सूर्य के
उदय हुए न जानोगे कि
वह कहाँ गया बोध बिना अहंता नष्ट नहीं होती चाहे कीचड़ में रहे और चाहे पहाड़ में जावे,
चाहे घर
में रहे और चाहे स्थल में रहे, चाहे स्थूल हो
और चाहे सूक्ष्म हो
चाहे निराकार हो
और चाहे रूपान्तर को
प्राप्त हो,
चाहे भस्म हो
और चाहे मृतक हो,
चाहे दूर हो अथवा निकट हो
जहाँ रहेगा वहीं अहंता इसके साथ है | हे रामजी! संसाररूपी वट
का बीज अहंता
है उसी से सब शाखा फैली है
सब अर्थों का
कारण अहंता है,
जबतक अहंता है
तबतक दुःख नहीं मिटता और
जब अहंभाव नष्ट हो
तब परमसिद्धि की
प्राप्ति हो
| हे रामजी! जो
कुछ मैंने उपदेश किया है
उसको भली प्रकार विचारकर उसका अभ्यास करो तब संसाररूपी वृक्ष का
बीज जल
जावेगा और
आत्मपद की
प्राप्ति होगी |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अहंकारअस्तयोगोपदेशो नाम शताधिकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ||140||
वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! संसार संकल्पमात्र सिद्ध है
और भ्रम से
उदय हुआ है | आत्मस्वरूप में अनेक
सृष्टि बसती हैं, कोई लीन होती है
कोई उत्पन्न होती हैं और कोई उड़ती हैं, कहीं
इकट्ठी होती हैं और कहीं भिन्न भिन्न उड़ती हैं सो सब मुझको प्रत्यक्ष भासती हैं | देखो
वे उड़ती जाती हैं सो ये सब
आकाशरूप हैं और आकाश ही
से मिलती हैं | जैसे
केले का
वृक्ष देखनेमात्र सुन्दर होता है
पर उसमें कुछ सार नहीं होता तैसे ही
विश्व देखनेमात्र सुन्दर है
पर आकाशरूप है
| जैसे जल
में पहाड़ का
प्रतिबिम्ब पड़ता है
और हिलता भासता है
तैसे ही
यह जगत् है
| रामजी ने
पूछा, हे
भगवन् आप
कहते हैं कि सृष्टि मुझे प्रत्यक्ष उड़ती भासती हैं- तुम भी देखो, यह
तो मैंने कुछ नहीं
समझा कि
आप क्या कहते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे
रामजी! अनेक सृष्टि उड़ती हैं सो सुनो | पञ्चभौतिक शरीर में प्राण
में चित्त स्थित है
और उस
चित्त में अपनी-अपनी सृष्टि है
| जब यह
पुरुष शरीर का
त्याग करता है
तब लिंगशरीर जो
वासना और
प्राण हैं वे उड़ते हैं | उस लिंग शरीर में जो विश्व है
सो सूक्ष्मदृष्टि से
मुझको भासता है
| हे रामजी! आकाश में जो वायु है
जिसका रूपरंग कुछ नहीं
वही वायु प्राणों से
मिलकर मुझे प्रत्यक्ष दिखाई देती है-इसी का
नाम जीव है | स्वरूप से
न कोई आता है न जाता है
परन्तु लिंगशरीर के
संयोग से
आता-जाता और
जन्मता-मरता दीखता है
और अपनी वासना के
अनुसार आत्मामें विश्व देखता है
और कुछ नहीं
बना | यह
वासनामात्र सृष्टि है,
जैसी वासना होती है
तैसा विश्व भासता है
| हे रामजी! यह
पुरुष आत्म स्वरूप है
परन्तु लिंगशरीर के
मिलने से
इसका नाम जीव हुआ है
और आपको प्रच्छन्न जानता है,
वास्तव में ब्रह्मस्वरूप है
| देश, काल और वस्तु के
परिच्छेद से
रहित ब्रह्म है
पर उसके प्रसाद से
आपको कुछ मानता
है इसी का नाम लिंगशरीर है
| जैसे घटाकाश भी
महाकाश है
परन्तु घट
के खप्पर से
परिच्छिन्न हुआ है तैसे ही
यह पुरुष भी
आत्मस्वरूप है
और अहंकार के
संयोग से
प्रच्छन्न हुआ है | जैसे घट
को एकदेश से
उठाकर देशान्तर में ले जा रक्खो तो
आकाश तो
न कहीं गया और न आया परन्तु आता-जाता भासता है,
तैसे ही
आत्मा अखण्डरूप है
परन्तु प्राण चित्त से
चलता भासता है
| जब अहंकाररूप चित्त नष्ट हो
तब अखण्डरूप हो,
जबतक अहंकार नहीं जाता तबतक जगत््भ्रम दीखता है
और वासना करके भटकता फिरता है
| वासनामय सृष्टि अपने अपने चित्त में स्थित
है | जब
शरीर का
त्याग करता है
तब आकाश में उड़ता
है और
प्राणवायु उड़कर जो
आकाश में शून्यरूप वायु है
उससे जा
मिलता है
| वहाँसबको अपनी-अपनी वासना के
अनुसार सृष्टि भासि आती है और अपनी सृष्टि लेकर इस
प्रकार उड़ते हैं जैसे
वायु गन्ध को
ले जाती है
सो ही
मुझको सूक्ष्मदृष्टि से
उड़ते भासते है
| हे रामजी! स्थूलदृष्टि से
लिंगशरीर नहीं भासता, सूक्ष्मदृष्टि से
दीखता है
| जिस पुरुष को
सूक्ष्मदृष्टि से
लिंगशरीर देखने की
शक्ति है
और ज्ञान से
रहित है
वह भी
मेरे मत
में मूर्ख और
पशु है
| हे रामजी! जब
मनुष्य वासना का
त्याग करता है-अर्थात् इस
अहंकार को
कि मैं हूँ त्याग करता है
तो आगे विश्व
नहीं देता केवल निर्विकल्प ब्रह्म भासता है
और उसके प्राण नहीं उड़ते वहीं लीन हो जाते हैं, क्योंकि उसका चित्त अचित्त हो
जाता है
| जबतक अहंकार का
संयोग है
तबतक विश्व भी
चित्त में स्थित
है | जैसे बीज में वृक्ष और
तिलों में तेल स्थित होता है
तैसे ही
उसके हृदय में विश्व
स्थित है
| जैसे मृत्तिका में बड़े
छोटे बासन, लोहे में सुई और खड़ग और
बीज में वृक्षभाव स्थित है
चैतन्य अथवा जड़ हो तैसे ही
यह संकल्पकलना में भेद है, स्वरूप से कुछ नहीं और वैसे ही यह जगत् भी है | हे रामजी! विश्व संकल्पमात्र है, क्योंकि दूसरी अवस्था में नाश हो जाता है | यह जाग्रत जो तुमको भासती है सो मिथ्या है | जब स्वप्न आता है तब जाग्रत नहीं रहती और जब जाग्रत् आती है तब स्वप्न नष्ट हो जाता है,जब मृत्यु आती है तब सृष्टि का अत्यन्त अभाव हो जाता है और देश, काल, पदार्थ सहित वासना के अनुसार और सृष्टि भासती है | हे रामजी!यह विश्व ऐसा है जैसे स्वप्न नगर | जैसे संकल्पपुर होते हैं तैसे ही ये सब संकल्प उड़ते फिरते हैं | कई सृष्टि परस्पर मिलती हैं, कई नहीं मिलतीं परन्तु सब संकल्परूप हैं और भ्रम से और का और भासता है | जैसे कोई पुरुष बड़ा होता है और कोई छोटा भासता है तो छोटे को बड़ा भासता है और जैसे हाथी के निकट और पशु तुच्छ भासते हैं और चींटी के निकट और बड़े भासते हैं तैसे ही जो ज्ञानवान् पुरुष है उसको बड़े पदार्थ देश, काल संयुक्त विश्व तुच्छ भासता है और वह उन्हें असत्य जानता और जो अज्ञानी है उसको संकल्पसृष्टि बड़ी होकर भासती है | जैसे पहाड़ बड़ा भी होता है परन्तु जिसकी दृष्टि से दूर है उस को महालघु और तुच्छसा भासता है और चींटी की निकट तुच्छ मृत्तिका का ढेला भी पहाड़ के समान है तैसे ही ज्ञानी की दृष्टि में जगत् नहीं, इससे बड़ा जगत् भी उसको तुच्छ रूप भासता है और अज्ञानी को तुच्छरूप भी बड़ा भासता है | हे रामजी! यह विश्वभ्रम से सिद्ध हुआ है | जैसे भ्रम से सीपी में रूपा और रस्सी में सर्प भासता है तैसे ही आत्मा के प्रमाद से यह भासता है पर आत्मा से यह विश्व भासता है पर आत्मा से भिन्न नहीं | जैसे निद्रादोष से जीव अपने अंग भूल जाते हैं और जागे हुए सब अंग भासते हैं तैसे ही अविद्यारूपी निद्रा में सोया हुआ जब जागता है तब उसे सब विश्व अपना आप दिखाई देता है | जैसे स्वप्न से जगा हुआ स्वप्न के विश्व को अपना आपही देखता है तैसे ही यह विश्व अपना आपही भासेगा | हे रामजी! जब मनुष्य निद्रा में होता है तब उसे शुभ अशुभ विश्व में राग कुछ नहीं होता और जब जागता है तब इष्ट में राग और अनिष्ट में द्वेष होता है इसी प्रकार जबतक विश्व में हेयोपादेय बुद्धि है तबतक जो सर्वज्ञ भी हो तो भी मूर्ख है | हे रामजी! जब जड़ हो जावे तब कल्याण हो | जड़ होना यही है कि दृश्य से रहित आत्मा में स्थित हो वह आत्मा चिन्मात्र है | जबतक आत्मा से भिन्न जो कुछ सत्य अथवा असत्य जानता है तबतक स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती और जब संवित् फुरने से रहित हो तब स्वरूप का साक्षात्कार हो | इससे फुरने का त्याग करो | यह स्थावर-जंगम जगत् जो तुमको भासता है सो सर्व ब्रह्मरूप है | जब तुम ऐसे निश्चय करोगे तबसर्व विवर्त्त का अभाव हो जावेगा और आत्मपद ही शेष रहेगा | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! यह जीव आपने कहा सो जीव का स्वरूप क्या है, वह आकार को कैसे ग्रहण करता है, उसका अधिष्ठान परमात्मा कैसे है और उसके रहने का स्थान कौन है सो कहिये | वशिष्ठजी बोले, हे रामजी,! यह जो शुद्ध परमात्मतत्त्व निर्विकल्प चिन्मात्र है, उसमें चैत्योन्मुखत्व हुआ कि `मैं हूँ' ऐसे चित्कला अज्ञानरूप फुरी है और उसको देह का सम-बन्ध हुआ है उसी का नाम जीव है | वह जीव न सूक्ष्म है, न स्थूल है, न शून्य है, न अशून्य है, न थोड़ा है, न बहुत है, केवल शुद्ध आत्मत्व मात्र है | वह न अणु है, न स्थूल है, अनन्त चैतन्य आकाशरुप है उसी को जीव कहते हैं स्थूल से स्थूल वही है और सूक्ष्म से सूक्ष्म वही है | अनुभव चैतन्य सर्वगत जीव है, उसमें वास्तव शब्द कोई नहीं और जो कोई शब्द है सो प्रतियोगी से मिलकर हुआ है | जीव अद्वैत है उसका प्रतियोगी कैसे हो यही जीव का स्वरूप है | चैत्य के संयोग से जीव हुआ है और उसका अधिष्ठान चैतन्य आकाश, निर्विकल्प, चैत्य से रहित, शुद्ध, चैतन्य परमात्मतत्त्व है, उसमें जो संवित फुरी है उसी का नाम जीव है वह सूक्ष्म से सूक्ष्म और स्थूल से स्थूल और सबका बीज है | उसी को विराट् कहते हैं और उसका शरीर मनोमय है | आदि परमात्मतत्त्व से फुरा है और अन्य अवस्था को प्राप्त नहीं हुआ अर्थात् प्रच्छन्नता को नहीं प्राप्त हुआ-आपको सर्व आत्मा जानता है | इसका नाम विराट् है उसका प्रथम मनोमात्र और शुद्ध प्रकाशरूप राघद्वेष रूपी मल से रहित अनन्त आत्मा है और सर्व मन, कर्मों और देहों का बीज है, सबमें व्याप रहा है और सब जीवों का अधिष्ठाता है | उसी के संकल्प से ये जीव रचे हैं और पञ्छज्ञान इन्द्रियों, अहंकार, मन और संकल्प यह आठों आकार ग्रहण किये हैं | परमार्थ को त्यागने फुरने से जो आकार उत्पन्न हुए हैं उनको ग्रहण करना इसी का नाम पुर्यष्टका है | फिर इन इन्द्रियों के छिद्र रचे और स्थूल रूप रचकर उनमें आत्मा प्रतीत किया | जैसे जीव शयनकाल में जाग्रत् शरीर को त्यागकर स्वप्न शरीर का अंगीकार करता है तैसे ही शुद्ध, चिन्मात्र, निर्विकार अद्वैतस्वरूप को त्यागकर उसने वासनामय शरीर का अंगीकार किया है पर वास्तवस्वरूप का कुछ त्याग नहीं किया और स्वरूप से नहीं गिरा शुद्ध निर्विकल्प भाव को त्यागकर विराट्भाव हुआ है | इसी प्रकार आगे उस पुरुष ने ज्ञान से चारों वेद रचे और नीति को निश्चय किया | नीति इसे कहते हैं कि यह पदार्थ ऐसे हो और इतने कालतक रहे-निदान यह रचना रची और जो जो संकल्प करता गया सो सो देश, काल, पदार्थ, दिशा, ब्रह्माण्ड सब होते गये | ईश्वर, विराट्, आत्मा, परमेश्वर इत्यादिक जीव के नाम हैं पर जीव का वासनामय स्वरूप झूठ नहीं | वासना के शरीर ग्रहण करने से वासना रूप कहा है पर वास्तवरूप शुद्ध, निर्विकार और अद्वैत है और कदाचित्त स्वरूप से अन्य अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ, सदा ज्ञानरूप, अद्वैत और परमशुद्ध है | उसको अपने चैतन्यस्वभाव से चैत्य का संयोग हुआ है इससे कहा है कि उसका वपु वासनारूप है | उसी आदि जीव से ब्रह्मा, विष्णु रुद्र आदि देवता, दैत्य, आकाश, मध्य, पाताल और त्रिलोकी उत्पन्न हुई हैं | जैसे दीपक से दीपक होता है और जल से जल होता है तैसे ही सब विराट्स्वरूप है | महाआकाश उस विराट् का उदर है, समुद्र रुधिर है, नदियाँ नाड़ी हैं और दिशा वपु हैं | उसके उदर में कई ब्रह्माण्ड सुमेरु पर्वत समाये रहते हैं पवन उसका मूँड़ है उञ्चास पवन प्राणवायु हैं, पृथ्वी माँस हैं, सुमेरु आदिक पर्वत हाथ हैं, तारे रोमावली हैं , सहस्त्र शीश नेत्र हैं और अनन्त और अनादि है | चन्द्रमा उसका कफ है जिससे अमृत स्रवता है और भूत उपजते हैं और सूर्य पित्त है जो सबका उत्पन्नकर्ता है और सब मन, कर्मों और सब शरीरों का आदि बीज विराट् है | हे रामजी! इस चित्त के सम्बन्ध से तुच्छ हुआ है पर वास्तव में परमात्मस्वरूप है | जैसे महाकाश घट के संयोग से घटाकाश होता है | तैसे ही विराट् परमात्मा ने फुरने से सृष्टि रची है और उसमें अहं प्रत्यय की है इससे तुच्छ हुआ है, सो इसको मिथ्या भ्रम हुआ है | जैसे स्वप्न में कोई अपना मरना देखता है तैसे ही आपको दृश्य देखता है | लघुता भी आत्मा की अपेक्षा से है, दृश्य में विराट् है और आत्मा से इसका अनुभव है | हे रामजी! इसी प्रकार उसने उपजकर सृष्टि रची है | जैसे एक विराट पुरुष ने आदि निश्चय किया है तैसे ही अबतक है | यह आपही उपजा है और आपही लीन हो जाता है | हे रामजी! जिस प्रकार विराट् की आत्मा से उत्पत्ति हुई है तैसे ही सब जीवों की है | यह सब विराट् रूप है परन्तु जो स्वरूप से उपजकर दृश्य से तद्रूप हुए हैं और जिनको वास्तवरूप भूल गया है सो तुच्छरूप जीव हुए और जो स्वरूप से फुरकर स्वरूप से नगिरे और जिसे आगे अपना ही संकल्परूप विश्व देखकर प्रमाद न हुआ उसका नाम विराट् आत्मा है | हे रामजी जीव चैतन्य और निराकाररूप है इसको शरीर का संयोग कलना से हुआ है | जब आपको दृश्य संयुक्त देखता है तब महाआपदा को प्राप्त होता है और जब द्वैत से रहित निर्वि कल्प होकर देखे तब शुद्ध चैतन्य आत्मपद को प्राप्त होता है | हे रामजी! यह विराट् सबको उत्पन्न करता है | ऐसे कई विराट् आत्मपद से उदय हुए हैं ; कई मिट गये हैं और कई आगे होंगे | जैसे समुद्र से कई तरंग बुदबुदे उठते हैं और लीन होते हैं तैसे ही आत्मारूपी समुद्र से कई विराट् उठते हैं, कई लीन होते हैं और कई उपजेंगे | ऐसा परमात्मा सबका अधिष्ठान है और सबके भीतर बाहर पूर्ण ज्ञानस्वरूप है | ऐसा तेरा अपना आप अनुभवरूप है | हे रामजी! इस संवेदन को त्यागकर देखो वही परमात्मा स्वरूप है यह जो कुछ तुमको भासता है उसको बिचारकर त्यागो | जब तुम इसका त्याग करोगे तब चिन्मात्र जो परम शुद्ध तुम्हारा स्वरूप है सो तुमको भासेगा-उसके आगे चैतन्यता ही आवरणरूप है | जैसे सूर्य के आगे बादलों का आवरण होता है और जबतक बादल होते हैं तबतक सूर्य का प्रकाश ज्यों का त्यों नहीं भासता पर जब बादल दूर होते हैं तब प्रकाश स्वच्छ भासता है, तैसे ही जब फुरना निवृत्त होवेगा तब शुद्ध आत्मा ही प्रकाशेगा |
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विराडात्मवर्णनं नाम शताधिकैकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ||141||
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! यह परमात्मा पुरुष फुरने से जीवसंज्ञा को प्राप्त हुआ है फुरने में भी वही है पर अपने स्वरूप को नहीं जानता इसी से दुःख पाता है | जैसे पवन चलता है तो भी वही रूप है और जब ठहरता है तो भी वही रूप है-दोनों में तुल्य है-तैसे ही आत्मा सर्वदा एकरस है कदाचित परिणाम को नहीं प्राप्त हुआ | जीव प्रमाद से दृश्य को कल्पता है और दृश्य को आप जानता है इसी से दुःख पाता है पर जो इसको अपना स्वरूप स्मरण रहे तो दृश्य में भी अपना रूप भासे और जो निःसंकल्प हो तो भी विश्व अपना रूप भासे | विश्व भी इसी का रूप है परन्तु अविचार से भिन्न भासता है | जैसे स्वप्न का विश्व स्वप्नवाले का रूप है परन्तु निद्रादोष से नहीं जानता और जब जागता है तब जानता है कि मैं ही था, तैसे ही यह प्रपञ्च सब तुम्हारा स्वरूप है | तुम अपने स्वरूप में निरहंकार स्थित होकर देखो तो कुछ नहीं बना | जो आत्मा से भिन्न तुम कुछ बनोगे तो प्रपञ्च विश्व भासेगा और जो आत्मस्वरूप में स्थित हो तो अपना आप भासेगा और प्रपञ्च का अभाव हो जावेगा | हे रामजी! शून्याशून्य, जड़, चैतन्य, किंचन निष्किंचन, सत्य-असत्य सब आत्मा ही पूर्ण है तो निषेध किसका करिये? हे रामजी! वह ऐसा अनुभवरूप है जिससे सब पदार्थ सिद्ध होते हैं पर ऐसे आत्मा को मूर्ख नहीं जानते | जैसे जन्म का अन्धा मार्ग को नहीं जानता तैसे ही अज्ञानी महाअन्ध जागती ज्योति आत्मा को नहीं जानते और जैसे उलूकादिक सूर्य उदय हुए को नहीं जानते तैसे ही वासना से घेरे हुए आपको नहीं जान सकते | जैसे जाल में पक्षी फँसा होता है तैसे ही जीव फँसे हुए हैं | इसी का नाम बन्धन है | जब वासना का वियोग हो तो इसी का नाम मुक्ति है | हे रामजी! विषमता से जीव संज्ञा हुई है, जब सम हुआ तब ब्रह्म है सो ब्रह्म अहंकार को त्यागकर होता है जैसे खप्पर के संयोग से घटाकाश कहाता है और जब खप्पर टूट जाता है तब महाकाश हो जाता है, तैसे ही जब अहंकार नष्ट होता है तब आत्मस्वरूप है | हे रामजी! अज्ञान से एक देशी जीव हुआ है, जब प्रच्छिन्नता का वियोग हो तब आत्मस्वरूप ही है | हे रामजी! अपने वास्तव निर्गुणस्वरूप में गुणों का संयोग उपाधि से भासता है सो अनर्थ रूप है | जब निर्गुण और सगुण की गाँठ टूटे तब केवल अद्वैत तत्त्व अपना आप भासेगा जो अनामय और दुःख से रहित है और सत् असत् से परे ज्ञानरूप और आदि-अन्त से रहित है जिसके पाये से फिर कुछ पाना नहीं रहता और जिसके जानने से और कुछ जानना नहीं रहता | ऐसा जो उत्तमपद है उसको आत्मतत्त्व से प्राप्त होंगे | हे रामजी! यह जो ज्ञान तुमसे कहा है उसको आश्रय करके तुम ज्ञानवान् होना, ज्ञानबन्ध न होना | ज्ञानबन्ध से तो अज्ञानी भला है, क्योंकि अज्ञानी भी साधुओं के संग और सत्शास्त्रों के सुनने से ज्ञानवान् होता है पर ज्ञानबन्ध मुक्त नहीं होता | जैसे रोगी कहे कि मुझको कोई रोग नहीं है, मैं अरोग हूँ, तो वह वैद्य की औषध भी नहीं खाता क्योंकि वह आपको अरोग जानता है तैसे ही जो ज्ञानबन्ध है उसको संतों का संग और सत््शास्त्रों का श्रवण भी नहीं होता इससे वह अन्धतम को प्राप्त होता है | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! ज्ञान और ज्ञानबन्ध का फल क्या है सो कहिये? वशिष्ठजी बोले हे रामजी! जिस पुरुष ने आत्मा के विशेषण शास्त्रों से श्रवण किये हैं कि आत्मा नित्य, शुद्ध, ज्ञान स्वरूप और तीनों शरीरों से भिन्न है और ऐसे सुनकर आपको मानता है पर विषयों को भोगने की सदा