श्रीयोगवाशिष्ठ

निर्वाण प्रकरण (२००- २८९)

अनुक्रम

 

निर्वाण प्रकरण (२००- २८९). 1

अनुक्रम.. 1

जलरूपवर्णन.. 6

चिद्रूप वर्णन.. 8

ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादन.. 10

आकाशकुटीसिद्धसमाधियोगवर्णन.. 12

अन्तरोपाख्यानवर्णन.. 16

अन्तरोपा0 वर्णन.. 19

मुक्तसंज्ञा वर्णन.. 21

जीवन्मुक्तव्यवहार. 24

परमार्थरूप वर्णन.. 26

नास्तिकवादी निराकरण.. 28

परमउपदेश वर्णन.. 31

निर्वाण प्रकरण.. 33

सर्वपदार्थभाव वर्णन.. 37

जाग्रत््स्वप्नैकताप्रतिपादन.. 42

जगन्निर्वाण वर्णन.. 45

कारणकार्याभाव वर्णन.. 47

भाप्रतिपादन.. 48

विपश्चित््समुद्रप्राप्तिर्नाम.. 49

जीवन्मुक्तलक्षण वर्णन.. 52

विपश्चिदुपाख्यान वर्णन.. 59

विपश्चिच्छरीरप्राप्तिर्नाम.. 62

बटधानोपाख्यान वर्णन.. 65

विपश्चितत््कथा वर्णन.. 67

महाशववृत्तान्त वर्णन.. 69

स्वयंमाहात्म्यवृत्तान्तवर्णन.. 70

मच्छरव्याध वर्णन.. 72

हृदयान्तरस्वप्नमहाप्रलय वर्णन.. 74

हृदयान्तरप्रलयाग्निकदाह वर्णन.. 79

कर्मनिर्णय.. 81

महाशवोपाख्याने निर्णयोपदेश.. 84

कार्यकारणाकारणनिर्णय.. 88

जाग्रत््स्वप्नसुषुप्ति विचार. 90

जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति वर्णन.. 91

सुषुप्ति वर्णन.. 93

सुषुप्तिवर्णन.. 95

स्वप्ननिर्णय.. 96

स्वप्न विचार. 99

रात्रिसंवाद.. 101

निर्वाण प्रकरण.. 104

यथार्थोपदेश.. 105

भविष्यत्कथा वर्णन.. 106

सिद्धनिर्वाण वर्णन.. 109

निर्वाण प्रकरण.. 112

स्वर्गनरकप्रारब्ध वर्णन.. 115

निर्वाणोपदेश.. 118

निर्वाण प्रकरण.. 121

इन्द्रिययज्ञवर्णन.. 123

ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादन.. 126

जाग्रत््स्वप्नप्रतिपादन.. 127

निर्वाण प्रकरण.. 128

निर्वाण प्रकरण.. 131

शालभजनकोपदेश.. 133

जीवन्मुक्त लक्षणवर्णन.. 136

जीवन्मुक्तिबाह्यलक्षणव्यवहारवर्णन.. 138

द्वैतैकता़भाववर्णन.. 140

स्मृत्यभावजगत््परमाकाश वर्णन.. 142

ब्रह्मजगदेकताप्रति0 नाम.. 144

ब्रह्मगीतापरमनिर्वाण वर्णन.. 146

परमार्थगीता वर्णन.. 148

ब्रह्माण्डोपाख्यान.. 150

ब्रह्मगीता वर्णन.. 152

इन्द्राख्यानवर्णन.. 154

सर्वब्रह्म प्रतिपादन.. 157

ब्रह्मगीतागौर्युद्यान वर्ण.. 158

ब्राह्मणकथा वर्णन.. 161

ब्राह्मणभविष्यत् वर्णन.. 163

निर्वाण प्रकरण.. 166

कुन्ददन्तविश्रामप्राप्ति... 169

ब्रह्मप्रतिपादन.. 170

जीवसंसार वर्णन.. 175

सर्वब्रह्मरूप प्रतिपादन.. 178

विद्यावादबोधोपदेश.. 179

रामविश्रान्ति वर्णन.. 185

रामविश्रांतिवर्णन.. 186

रामविश्रान्तिवर्णन.. 187

रामविश्रान्तिवर्णन.. 189

चिन्तामणिप्राप्ति... 191

गुरुशास्त्रोंपमा वर्णनं.. 192

विश्रामप्रकटीकरण.. 194

निर्वाणवर्णन.. 199

चिदाकाशजगदेकताप्रतिपादन.. 201

जगद्भाववर्ण.. 203

प्रश्नवर्णन.. 205

प्रश्नोत्तरवर्णन.. 207

निर्वाण प्रकरण.. 209

राजप्रश्नो0वर्णन.. 211

निर्वाण प्रकरण.. 214

मोक्षोपायवर्णन.. 218

 

 

जलरूपवर्णन

रामजी ने पूछा, हे भगवन्! तुमको जो धारणा से पृथ्वी का अनुभव हुआ और उसमें जगत् हुआ वह संकल्परूप था मन से उपजा था अथवा आधिभौतिक था? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी सब जगत् संकल्परूप है और आधिभौतिक की नाईं भासता है परन्तु केवल चिदाकाश अपने आपमें स्थित है | वह चिदाकाश मैं हूँ, कदाचित् उपजा हूँ और नाश होऊँगा, सर्वदा अद्वैत अचैत्य, चिन्मात्ररूप हूँ | उसके संकल्प का नाम मन है, आभास का नाम संकल्प है और उसी का नाम ब्रह्मा और इच्छा है, उसी में जगत् स्थित है सो आकाशरूप है-कुछ बना नहीं हे रामजी! जिसको सत्य और असत्य कहते हो वह शुभ-अशुभरूप जगत् मन में स्थित है और सर्वआकार निराकाररूप हैं, भ्रान्ति से पिण्डाकार भासते हैं | जैसे स्वप्न में शुभ- अशुभ पदार्थ भासते हैं सो निराकार हैं पर भ्रान्ति से पिण्डाकार भासते हैं तैसे ही वे जगत् भी निराकार हैं पर भ्रम से पिण्डाकार भासते हैं और विचार किये से शून्य हो जाते हैं | जैसे मनोराज से आकार रचित है, तैसे ही हमारे आकार जानो-स्वरूप से कुछ उपजे नहीं | जैसे मृत्तिका में बालक नानाप्रकार की सेना रचते हैं और उस मृत्तिका का उनको भिन्न-भिन्न भाव निश्चय होता है, तैसे ही अद्वैत आत्मा में मनरूपी बालक ने जगत् कल्पा है वास्तव में कुछ नहीं-आत्मतत्त्व सदा अपने आपमें स्थित है | जैसे मृगतृष्णा का जल ही नहीं तो उसमें डूबा किसे कहिये, तैसे ही मन आप आभासरूप है तो उसका रचा जगत् कैसे सत् हो? हे रामजी! सब चिदाकाशरूप है-दूसरा कुछ बना नहीं | आत्मरूप आकाश में मनरूपी नीलता है सो अविचार सिद्ध है और विचार किये से नीलता कुछ वस्तु नहीं | जैसे दीपक के विद्यमान होने से अन्धकार नहीं रहता, तैसे ही विचार किये से मन और मन की रचना जगत् नहीं रहता | मन का निर्वाण करना ही परमशान्ति है और कोई उपाय नहीं | हे रामजी! जितने क्षोभ हैं, उनका कर्त्ता मन है और सम्पूर्ण शब्द अर्थ कल्पना मन से उठती है-मन के निर्वाण हुए कोई नहीं रहती | रामजी ने पूछा, हे मुनीश्वर! आप अनन्त ब्रह्माण्ड की ���ृथ्वी होकर स्थित हुए सो कुछ और रूप भी हुए अथवा हुए? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! आत्मरूपी जो जाग्रत् है उसमें मैं अनन्त ब्रह्माण्ड की पृथ्वी होकर स्थित हुआ | मैं चैतन्य था और जड़ की नाईं स्थित हुआ-वास्तव में मैं जगत् था केवल चिदाकाश था जिसमें कुछ नाना है, अनाना है; अस्ति है, नास्ति  है, और जिसमें अहं-त्वं-इदं का अभाव है | वह केवल परम चिदाकाश है जो आकाश से भी निर्मल चिदाकाश है और जो है सो सर्व शब्द ब्रह्म है | जगत् के होते भी वह अरूप है, क्योंकि कुछ आरम्भ परिणाम से नहीं बना-केवल आत्मा का चमत्कार है | हे रामजी! जहाँ जहाँ पदार्थ सत्ता है वहाँ वहाँ जगत् वस्तु है | सर्वदा काल, सर्वकार, सब पदार्थों का स्पन्द ब्रह्म है, जहाँ ब्रह्मसत्ता है वहाँ जगत् है | इस प्रकार मैंने  अनन्त ब्रह्माण्ड को देखा | जब मैं अनन्त ब्रह्माण्ड की पृथ्वी होकर स्थित हुआ तो जब जल की धारणा की तब जलरूप होकर फैला और वृक���, घास, फूल, फल, गुच्छे, डाल तमाल और पत्रों में रस होकर स्थित हुआ, थम्भे में मैं ही बल हुआ और समुद्र हुआ; नदियों के प्रवाह होकर मैं ही बहने लगा और उसमें गड़ गड़ करने लगा और तरंग बुद्बुदे  फेन को फैलाकर विलास किया, ओस के कणके होकर मैं ही स्थित हुआ, आकाश में मेघ होकर बरसता और प्राणियों को तृप्त करने लगा | उनमें रुधिर आदि रस होकर मैं ही स्थित हुआ और उनकी नाड़ियों में मथन करके आप ही प्रवेश किया | जैसी नाड़ी होती है तैसा तैसा रस होकर मैं स्थित हुआ | रस, बीज, कफ, पित्त, मूत्र आदिक सब नाड़ियों में मैं ही स्थित हुआ | सर्व प्राणियों की जिह्वा के अग्रभाग में रस होकर मैं स्थित हुआ और अपने आपका आपसे स्वादु को ग्रहण करने लगा- 576 और हिमालय में बरफ होकर स्थित हुआ | हे रामजी! मैं चैतन्य होके जड़ की नाईं स्थित् हुआ, बीज होकर मैंने ही उत्पन्न किया और प्रलय के मेघ होकर मैंने ही नाश किया | इस प्रकार जल होकर स्थावर, जंगम सर्वजगत् में स्थित हुआ और सदा अपने आपमें स्थित होकर अपने स्वरूप को त्यागा | जैसे स्वप्न में जगत् अनुभवरूप है और अनहोता भासता है, तैसे ही मैं जलरूप होकर जगत् को धारता भया | हे रामजी! नाना प्रकार के स्थानों में मैं स्थित हुआ, फूलों की शय्या पर चिरकाल पर्यन्त विश्राम करता रहा, गन्ध होकर फूलों में स्थित हुआ और मेघ होकर आकाश में बिचरा और ऐसी वर्षा की कि पर्वतों पर वेग से प्रवाह चलने लगा और मैं कणके कणके होके समुद्र और नदी में बिचरा | यह प्रतिभा चिद्अणु में मुझको हुई |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे़न्तरोपाख्याने जलरूपवर्णनंनाम द्विशताधिकप्रथमस्सर्गः ||201||

अनुक्रम

 


चिद्रूप वर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जल के अनन्तर मैंने तेज की भावना की अर्थात् तेज धारा, तब मुझमें इतने अंग उदय हुए-चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि-और इनसे जगत् की क्रिया सिद्ध होने लगी | जैसे राजा के अंग अनुचर और हरकारे होते हैं तैसे ही तमरूपी चोर को दीपक रूपी हरकारे मारने लगे आकाशरूपी जो मैं था इसमें मेरे कण्ठ में तारावलीरूपी माला पड़ी थी | सूर्य होकर मैं जल को सोखता और दशों दिशाओं को प्रकाशता रहा | आकाश जो ऊर्ध्वता से श्याम भासता है वह मेरे निकट प्रकाशमान होता था, सब जगत् में मैं ही  फूल रहा था और जहाँ मैं रहूँ तहाँ से तम का अभाव हो जावे | चन्द्रमा और सूर्यरूपी डब्बा है जिससे दिन, रात और काल, वर्षरूपी अनेक रत्न सर्वदा निकलते रहते हैं | राजसी, सात्त्विकी और तामसी क्रियारूपी कमलिनी का मैं सूर्य हुआ और सर्वदेवताओं और पितरों को तृप्त करता रहा | यज्ञ की अग्नि और रत्न, मोती, मणि आदिक जो प्रकाश पदार्थ हैं उसमें प्रकाश मैं ही हुआ | प्राणों के भीतर मैं स्थित हुआ और प्राण अपान  के क्षोभ से अन्न को पचाने लगा | जैसे आत्मा के प्रकाश से रूप, अवलोक और मनस्कार प्रकाशते हैं,तैसे ही सब पदार्थ मेरे प्रकाश से प्रकाशित होने लगे, क्योंकि  मैं तेजरूप था-मानो चैतन्यसत्ता का दूसरा भाई हूँ | जैसे सर्वपदार्थ आत्मा से सिद्ध  होते हैं, तैसे ही मुझसे सिद्ध होने लगे | हे रामजी! राजों में तेज और सिद्धों में  वीर्य में ही था, बलरूप होकर जगत् को मैं ही पुष्ट करता था, बड़वाग्नि दाहकशक्ति होकर जगत् को मैं ही नष्ट करता था और तेजवानों में तेज, बलवानों में बल मैं ही था | तले भी मैं था, मध्य भी मैं ही था और चन्द्रमा सूर्य से रहित जो स्थान हैं उनमें भी  मैं ही था | अग्निरूपी दीपक और चन्द्रमा और सूर्यरूपी नेत्रों से मध्यमण्डल में स्पष्ट मैं देखता था | हे रामजी! इस प्रकार तेजरूप होकर भीतर बाहर जंगम पदार्थों में स्थित हुआ पर जब बोधदृष्टि से देखूँ तब सर्व आत्मा ही का भान हो और जब अन्त वाहक दृष्टि से आपको विराट््रूप जानूँ कि सर्वजगत् में मैं ही फैल रहा हूँ |और सर्व  पदार्थ मेरे ही अंग हैं | निदान तेजवानों में तेज और क्रोधवानों में क्रोध यतियों में यती और अजीत मैं हुआ और सर्व और मेरी ही जय है, क्योंकि जय उसकी होती है जिसमें बल और तेज होता है- सो बल मैं हूँ और तेज भी मैं हूँ इससे मेरी जय है | हे रामजी! सुवर्ण और रत्नमणि में जो प्रकाश और रूप है सो मैं हुआ | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! इस प्रकार जो आप जगत् की क्रिया अनुभव करने लगे कि जलरूप होकर अग्नि को बुझाना और अग्नि होकर जल को जलाना इत्यादिक क्रिया जो तुम्हारे ऊपर इष्ट अनिष्ट से होती रहीं उनको तुमने सुख दुःख से अनुभव किया किया सो मेरे बोध के निमित्त कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जैसे चैतन्य पुरुष स्वप्ने में पर्वत वृक्ष, देह इन्द्रियों और नाना प्रकार के जड़पदार्थ देखते हैं जो वास्तव में उनमें नहीं हैं, केवल अनुभवरूप हैं परन्तु निद्रादोष से वे उन्हें द्वैत की नाईं जानते हैं और उनका राग-द्वेष अपने में मानते हैं, यथार्थ में दृष्टा ही दृश्यरूप होकर स्थित होता है परन्तु निद्रादोष से नहीं जान सकता और जब जागता है तब स्वप्न की सब सृष्टि को अपना आपही जानता है, तैसे ही यह जगत् अपने स्वरूप में नहीं, जब बोध स्वरूप में जागोगे तब पदार्थ भावना जाती रहेगी और सब जगत् बोध स्वरूप भासेगा | हे रामजी! जिस पुरुष को देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित अखण्ड सत्ता उदय हुई है उसको ज्ञानी कहते हैं | जब यह पुरुष परमात्म अवलोकन करता है तब जगत् आत्मस्वरूप ही भासता है | जिस पुरुष को स्वप्न की सृष्टि में पूर्व का स्वरूप विस्मरण नहीं हुआ उसको अन्तवाहक कहते हैं और उसको पत्थर, जल और अग्नि में प्रवेश करने से भी खेद नहीं होता | हे रामजी! मैं जो आकाश में उड़ता फिरा और आकाश को भी लाँघकर ब्रह्माण्ड के खप्पर पर फिरा हूँ सो अन्तवाहक शरीर से ही फिरा हूँ | जिसको अन्तवाहक शरीर प्राप्त होता है उसको कोई आवरण नहीं रोक सकता क्योंकि सब उसके सब उसके अंग होते हैं | मुझको शुद्ध आत्मा में स्वप्ना हुआ था पर पूर्व का स्वरूप विस्मरण नहीं हुआ इससे सब जगत् मुझको अपना स्वरूप ही भासता रहा और अपने संकल्प से कल्पे हुए अपने ही अंग भासते थे | जैसे कोई मनोराज से अग्नि का समुद्र रचे और उसमें स्नान करे तो वह भी होता है, क्योंकि उसको खेद नहीं होता सब अपने संकल्प में ही उसको भासते हैं | अन्तवाहक शरीर से विराट सबको अपना आप देखता है तैसे ही सब जगत् मुझको अपना आप भासता था तो खेद कैसे हो? जैसे स्वप्न में पर्वत, नदियाँ और अग्नि देखता है सो वही रूप है और आप भी एक आकार धारण करके बन जाता है और पूर्व का स्वरूप उसकी परिच्छिन्नता से भूल जाता है और रागद्वेष से जलता है | मैंने तत्त्वरूप बन के आपको जड़ रूप देखा और चैतन्यरूप भी देखा इस प्रकार  मुझको अपना स्वरूप विस्मरण हुआ तब मैं विराट््रूप सबको अपना अंग ही देखता रहा इससे मुझे खेद कैसे होता? खेद तब होता है जब अपना स्वरूप भूलता है और परिच्छिन्न सा बन जाता है, पर मैं तो बोधवान् रहा कि मैंने स्पन्द से सब रूप धारे हैं | हे राम जी! जिसको यह निश्चय है उसको दुःख कहाँ? सुखदुःखरूप जो पदार्थ हैं सो मैंने अपने में ऐसे देखे जैसे आदर्श में प्रतिबिम्ब भासता है | जिसको यह दृष्टि हो उसको दुःख कहाँ है? हे रामजी! जिसको अन्तवाहक शक्ति प्राप्त होती है वह पाताल और आकाश में जाने को समर्थ होता है और जहाँ प्रवेश किया चाहें वहाँ जा सकता है, क्योंकि सृष्टि संकल्पमात्र है | हे रामजी! और कुछ बनी नहीं आत्मा का किञ्चन ही सृष्टिरूप होकर भासता है | हे रामजी! यह सृष्टि सब ब्रह्मस्वरूप है | हमको तो सदा ऐसे ही भासती है | जब तुम जागोगे तब तुमको भी ऐसे ही भासेगी | तुम भी अब जागे हो | उस प्रकार मैं अग्नि होकर स्थित हुआ कि जिसकी शिखा से कालख निकलती थी | प्रकाश में ही हुआ और अपने चिद्स्वरूप अनुभव में मुझको जगत् भासे उसमें मैं स्थित हुआ | अन्धकार और उलूकादि भी मेरे प्रकाश से प्रकाशते हैं और भावरूप पदार्थ भी मैं अपने में जानता भया, क्योंकि भाव रूप पदार्थ तब भासते हैं जब उनका रूप होता है, सो रूपवान् पदार्थ मैं ही था इस कारण सब मेरे ही में सिद्ध होते थे | इस प्रकार मुझको यह प्रतिभा हुई |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे़न्तरोपाख्यानचिद्रूप वर्णनन्नाम द्विशताधिकद्वितीयस्सर्गः ||202||

अनुक्रम

 


ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! फिर मैंने पवन की धारणा का अभ्यास किया तब पवनरूप होकर विचरने लगा और कमल के फूलों और वृक्षों को हिलाने लगा | तारों और नक्षत्रों का आधारभूत हुआ वे मेरे आदार पर फिरने लगे | चन्द्रमा और सूर्य के चलानेवाला भी मैं ही हुआ और समुद्र और नदियों के प्रवाह मेरी ही शक्ति से चलते रहे मन का बड़ा वेग भी मैं ही हुआ और प्राणियों में मेरा निवास हुआ �� ही प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान पञ्चरूप होकर स्थित हुआ और सब नाड़ियों में मेरा निवास हुआ | सब नाड़ियों को रस अपना-अपना भाग मैं ही पहुँचाता रहा और हलना, चलना, बोलना, लेना, देना सब मुझही से सिद्ध होता था निदान सर्वपदार्थों में स्पर्शशक्ति मैं ही हुआ और सर्वशब्द  मेरे ही से सिद्ध होते थे | क्रियारूपी बुन्द का मेघ हुआ, आकाशरूपी गृह में मेरा निवास था और दशों दिशा सब मेरे में ही फुरी थीं | देवताओं को गन्ध से मैं ही सुख देता था और दीपक को मैं ही प्रज्वलित करता था | पक्षियों में मेरा सदा निवास था | जैसे अग्नि में उष्णता रहती है तैसे ही सबके सुखाने और हरियावल करनेवाला मैं ही हूँ | हे रामजी! इस प्रकार मैं पवन होकर स्थित हुआ इसलिये रूप, अवलोक और मन स्कार सर्व पदार्थ मैं ही हुआ और चन्द्रमा, सूर्य, तारे, अग्नि, इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु ,रुद्र, वरुण, कुबेर और यम आदिक जगत् होकर मैं ही स्थित हुआ | पञ्चभूतों के भीतर और बाहर भी मैं था, प्राण-अपान के क्षोभ से दुःख होता है सो मैं ही साकार निराकाररूप हूँ और रक्त पीत श्यामरंग पदार्थ सब मैं ही हूँ | पञ्चभूत जो चिद्अणु फुरे हैं सो उसी का रूप हैं जैसे स्वप्न की सृष्टि सब अपना ही रूप होती है-इतर कुछ नहीं होती | हाड़, माँस, पृथ्वी होकर भूतों में स्थित हुआ और वायुरूप प्राण, अग्नि रूप समिधा और आकाशरूप अवकाश भया हूँ | इस प्रकार मैं सर्व में स्थित भया | मैं भी चैतन्यरूप था और वे तत्त्व भी चैतन्यवपु थे | जैसे स्वप्न में जगत् आकाशरूप हैं | हे रामजी! सर्वकाल, सर्वकार सर्व का सर्वात्मा स्थित है दूसरा कुछ नहीं! आत्मसत्ता सदा अपने आपमें स्थित हैं इससे भिन्न जानना भ्रान्तिमात्र है | यह  दृष्टि ज्ञानवान् की है पर जो असम्यक्दर्शी है उनको भिन्न भिन्न पदार्थ भासते हैं |  इस प्रकार मैंने सम्पूर्ण जगत् अपने में ही देखा | हे रामजी! मैं ब्रह्मरूप था इससे उसमें जगत् होते दृष्ट आये और जो मैं ब्रह्म से इतर होता तो एकतृण भी उत्पन्न होता | मैं जो ब्रह्म रूप था इससे सृष्टि उत्पन्न होती है | हे रामजी! जब मैंने बोधदृष्टि से देखा तब आत्मा से भिन्न कुछ दीखा और जब अन्तवाहक दृष्टि से देखा तब स्पन्द के कारण अणु अणु में सृष्टि भासी! जैसे जहाँ चन्दन का अणु होता है वहाँ सुगन्ध भी होती है, तैसे ही जहाँ जहाँ तत्त्व के अणु हैं वहाँ वहाँ सृष्टि भी है | हे रामजी! एक अणु में अनन्त सृष्टि मुझको भासी | जैसे एक पुरुष शयन करता है और उसको स्वप्नमें सृष्टि भासती है और फिर स्वप्न से स्वप्नान्तर की सृष्टि देखता है तो एक ही जीव में बहुत भासते हैं, तैसे ही एक अणु से अनेक सृष्टि होती हैं | हे रामजी! जो सृष्टि है तो आभास रूप है और आभास अधिष्ठान के आश्रय होता है | सबका अधिष्ठान ब्रह्मसत्ता है जो देश और काल के परिच्छेद से रहित अखण्ड अद्वैत सत्ता है | इसी से कहा है कि अणु-अणु में सृष्टि है, क्योंकि कोई अणु भिन्न नहीं, ब्रह्मसत्ता ही है, सर्वब्रह्म है तो सृष्टि भी ब्रह्मरूप है-इससे सब ब्रह्म ही जानो | ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं | जैसे वायु और स्पन्द में भेद नहीं, तैसे ही ब्रह्म और जगत् में भेद नहीं |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादनंनाम द्विशताधिकतृतीयस्सर्गः ||203||

अनुक्रम

 


आकाशकुटीसिद्धसमाधियोगवर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इस प्रकार जब मेरे में सृष्टि फुरी तब मैं उनके भ्रम को त्याग और संकल्प को खैंचकर अन्तर्मुख हुआ और अपनी जो कुटी थी उसकी ओर आया | मैंने कुटी देखी तो उसमें एक पुरुष बैठा मुझको दृष्टि आया | तब मैंने विचार किया कि  यह कौन है, मेरा शरीर कहाँ है? मैंने विचार करके देखा कि यह कोई महासिद्ध है | मेरा शरीर इसने मृतक जानकर गिरा दिया है और आप पदमासन बाँधकर दोनों टँखने पुट्ठों के ऊपर किये और शिर और ग्रीवा सूधे किये बैठा है | दोनों हाथ काँधों पर ऊर्ध्व किये  है-मानों कमल फूल है मानों अन्तर का प्रकाश बाहर उदय हुआ है और नेत्र मूँदे है- मानों सब वृत्ति खैंच ली है | हे रामजी! इस प्रकार समाधि लगाकर पद्मासन बाँधे वह आत्मपद में स्थित बैठा था और उसका मुख सूर्य की नाईं प्रकाशता था | जैसे धुयें से रहित अग्नि प्रकाशता है, तैसे ही वह सिद्ध प्रकाशमान स्थित था | इस प्रकार मैंने उसको आत्मपद में स्थित देखा | जैसे दीपक निर्वाण स्थित होता है, तैसे ही उसे स्थित देखकर मैंने विचार किया कि इसे यहाँ ही बैठा रहने दूँ और मैं अपने स्थान सप्तर्षि यों में जाऊँ | इस प्रकार कुटी के संकल्प को त्यागकर मैं उड़ा और उड़ते हुए मार्ग में मुझको विचार उपजा कि देखूँ अब उस सिद्ध की क्या दशा है | फिर उलटकर देखा तो कुटी सहित सिद्ध वहाँ नहीं था, क्योंकि कुटी उसकी आधारभूत थी सो मेरे संकल्प में स्थित थी, जब मेरा संकल्प निर्वाण हो गया तब वह कुटी गिर पड़ी तो उसमें वह सिद्ध कैसे रहे, वह भी गिर पड़ा | हे रामजी! उसको गिरता देखकर मैं भी उसके पीछे हुआ कि उसका कौतुक देखूँ | निदान आगे वह चला और मैं पीछे चला परन्तु मैं स्वाधीन और वह पराधीन चला जाता था | जैसे मेघ से बूँद गिरती है तो नहीं ठहरती तैसे ही वह चला और सप्तद्वीप के पार दशसहस्त्र योजन स्वर्ण की धरती है उस पर आन पड़ा और उसी प्रकार पद्मासन बाँधे हुए शीश और ग्रीवा उसी प्रकार सम ठहरे, क्योंकि उसके शीश और ग्रीवा ऊर्ध्व को थे | हे रामजी! शरीर प्राण से हलता चलता है,जब प्राण ठहर जाते हैं तब शरीर नहीं हलता चलता इस कारण उसका शरीर सम ही रहा और जैसे कुटी में बैठा था उसी प्रकार आसन करके पृथ्वी पर पड़ा | तब मेरे मन में आया कि इसके साथ कुछ चर्चा भी करना चाहिये परन्तु यह तो समाधि में स्थित है इसलिये प्रथम किसी प्रकार इसको जगाऊँ | हे रामजी ऐसा विचार करके मैं मेघ होकर उसके शिर पर वर्षा करने लगा और बड़ा शब्द किया जिससे पहाड़ फटने लगे पर उस शब्द और वर्षा से भी वह जागा | फिर जब मैं ओले होकर उसके ऊपर वर्षा करने | लगा-जैसे पत्थर की वर्षा की वर्षा होती है तब ऐसी वर्षा होने  से वह नेत्र खोलकर देखने लगा-जैसे पर्वत पर मोर मेघ को देखने लगे और मैं उसके आगे स्थित हुआ | तब उसने समाधि खोली और उसकी प्राण इन्द्रियाँ अपने स्थान में आईं | हे रामजी! जब मुझको उसने अपने आगे देखा तब मैं अद्वैतभाव को त्यागकर बोला, हे साधो तू कौन है, कहाँ स्थित है, क्या करता था और किस निमित्त कुटी में स्थित था? सिद्ध बोले, हे मुनीश्वर! मैं अपने प्रकृतभाव में स्थित हूँ और सब कुछ कहूँगा परन्तु जल्दी जल्दी मतकर-मैं स्मरण करके कहता हूँ | हे रामजी! मुझसे इस प्रकार कहकर वह स्मरण करने लगा और फिर स्मरण करके बोला, हे वशिष्ठजी! मुझपर क्षमा करो, क्योंकि सन्तों का शान्तस्वभाव होता है | मुझसे तुम्हारी बड़ी अवज्ञा हुई है परन्तु  तुम क्षमा करो-मेरा तुमको नमस्कार है | हे रामजी! इस फ्रकार नमस्कार करके उसने निर्मल आनन्द के उपजाने वाले यह वचन कहे कि हे मुनीश्वर! संसाररूपी नदी है जिसका बड़ा प्रवाह है  और कदाचित् नहीं सूखता | चित्तरूपी समुद्र से यह प्रवाह निकलता है, जन्म-मरण इसके दोनों किनारे हैं, रागद्वेषरूपी इसमें तरंग हैं और भोग की तृष्णा इसमें चक्र फिरता है-उसमें मैंने बड़ा दुःख पाया है | हे मुनीश्वर! अपने सुख के निमित्त देवों के स्थानों में भी मैं गया, दिव्य भोग भोगे और स्पर्श आदिक जो भोग हैं वे भी सब मैंने भोगे हैं परन्तु शान्ति मुझको नहीं प्राप्त हुई और जिस सुख को मैं चाहता था सो पाया | जैसे पपीहा मेघ की बूँद चाहता है और मरुस्थल की भूमिका में उसको शान्ति नहीं होती, तैसे ही मुझको विषयों के सुख में शान्ति हुई | हे मुनीश्वर! इस जगत् को असार जानकर मेरा चित्त विरक्त हुआ है इतने काल मैंने भोग भोगे परन्तु मुझको शान्ति हुई | इसको असत् जानकर मैं फिरा और विचार किया कि जो सार हो उसमें स्थित हो रहूँ | तब मैंने जाना कि सार अपना अनुभवरूप ज्ञानसंवित ही है-इससे मैं उसी  में स्थित हुआ हूँ | हे मुनीश्वर! जितने विषय हैं वे विषरूप हैं | विष के पान किये  से मृत्यु ही होती है | स्त्री, धन आदिक सुख मोह और दुःख के देनेवाले हैं | ऐसा कौन पुरुष है जो इनमें आया सावधान रहता है? ये तो स्वरूप से नष्ट करने वाले हैं | हे मुनीश्वर! देहरूपी एक नदी है जिसमें बुद्धिरूपी एक मछली रहती है, जब वह शिर बाहर निकालती है अर्थात् इच्छा करती है तब भोगरूपी बगला इसको खा जाता हे अर्थात् आत्म मार्ग से शून्य करता है | ये जो भोगरूपी चोर हैं जब इनका संग जीव करता है तब वे इसको लूट लेते हैं अर्थात् आत्मज्ञान से शून्य करते हैं और जब आत्मज्ञान से शून्य होता है तब जन्मों का अन्त नहीं आता-अनेक शरीर धारता है | जैसे चक्र पर चढ़ी हुई मृत्तिका अनेक वासनों के आकार धारती है तैसे ही आत्मज्ञान से रहित जीव अनेक शरीर धारता है पर अब मैं जाता हूँ मुझको वे अब नहीं लूट सकते | हे मुनीश्वर! भोगरूपी बड़े नाग हैं, और जो नाग हैं उनके डसे से शरीर मृतक होते हैं पर विषयरूपी सर्प के फूत्कार से ही मृतक होता है अर्थात् इच्छा करने से ही आत्मपद से शून्य होता है | जब  जीव को विषयों की इच्छा से सम्बन्ध होता है तब उसका क्षण-क्षण में निरादर होता है- जैसे कदली वन से रहित हुआ और महावत के वश में आया हस्ती निरादर पाता है | हे मुनीश्वर! जिस शरीर के निमित्त जीव विषयों की इच्छा करता है वह शरीर भी नाशरूप है इसमें अहंप्रतीति करनी परम आपदा का कारण है और अहंप्रतीति करनी परमसुख का कारण है | जैसे सर्प के मुख में पड़ा हुआ दर्दुर मच्छर खाने की इच्छा करता है सो महामूर्ख है | किसी क्षण काल उसको ग्रास लेगा, इससे भोगों की इच्छा करनी व्यर्थ है और दुःख का कारण है | हे मुनीश्वर जब बाल अवस्था व्यतीत होती है तब युवा अवस्था आती है और युवा के उपरान्त जब वृद्धावस्था आती है तब शरीर जर्जरीभाव को प्राप्त होता है | जैसे वसन्तऋतु की मञ्चरी जेठ आषाढ़ में सूख जाती है, तैसे ही वृद्धावस्था  में शरीर जर्जरीभाव को प्राप्त होता है और दुःख पाता है | बालक अवस्था में जीव क्रीड़ा में मग्न होता है, यौवन अवस्था में कामादिक सेवता और वृद्ध होकर चिन्ता में  मग्न रहता है | इस प्रकार जब यह तीनों अवस्था व्यतीत होती हैं तब मर जाता है | जीवों की अवधि इस प्रकार व्यतीत होती है और परमपद से अप्राप्त रहते हैं | हे मुनीश्वर! यह आयु बिजली के चमत्कार की नाईं है | इस क्षणभंगुर अवस्था में जो भोगों की वाञ्छा करते हैं वे महादुःख को प्राप्त होते हैं | इनमें सुख देखकर जो कोई कहे कि मैं स्वस्थ रहूँगा तो कदाचित् होगा | जैसे जल के तरंगों में बैठकर कोई स्थित हुआ चाहे तो नहीं हो सकता-अवश्य मरेगा-तैसे ही विषय भोगों से शान्ति सुख नहीं होता | जैसे कोई महाधूप से तपा हुआ सर्प के फन की छाया के नीचे बैठकर सुख की वाञ्छा करे तो सुख पावेगा पर जब आत्मज्ञान रूपी वृक्ष की छाया के नीचे बैठे तब शान्त और सुखी होगा | जिन पुरुषों ने विषयों की सेवना की है वे परमसुख को प्राप्त होते हैं और जिन्होंने आत्मपद की सेवना की है वे परमानन्द को प्राप्त होते हैं | जैसे नदी का प्रवाह नीचे चला जाता है, तैसे ही मूर्ख का मन विषयों की ओर धावता है | यह संसार मायामात्र है और इसमें शान्ति कदाचित् नहीं प्राप्त होती | जैसे मरुस्थल की नदी के जल से तृषा निवृत्त नहीं होती तैसे ही विषय भोगों से शान्ति कदाचित् नहीं  होती | जो आत्मपद से विमुख हैं वे विषयों की ओर धावते हैं और जो आत्मपद में स्थित हैं वे विषयों की ओर नहीं दौड़ते | जैसे समुद्र में तरंग उपजकर नष्ट होते हैं और जैसे नदी का वेग समुद्र की ओर गमन करता है पर पत्थर की शिला गमन नहीं करती, तैसे ही भोगरूपी समुद्र की ओर अज्ञानी दौड़ता है ज्ञानी नहीं गमन करता | हे मुनीश्वर! कमल में सुगन्ध तबतक होती है जबतक सर्प के मुख का वायु नहीं लगा, तैसे ही बुद्धि में विचार तबतक है जबतक चित्तरूपी सर्परूपी सर्प को भोग और इच्छारूपी वायु नहीं लगा | जब यह लगता है तब विचाररूपी सुगन्ध ले जाता है और विषरूपी तृष्णा को छोड़ जाता है | बाण निशान की ओर तब धावता है जब धनुष और चिल्ले को त्यागता है और त्यागे से फिर नहीं मिलता, तैसे ही आत्मारूपी चिल्ले से जब चित्तरूपी बाण छूटता है तब भोगरूपी निशान की ओर धावता है और जब जाता है तब फिर आना कठिन होता है-अर्थात् अन्तर्मुख होना कठिन होता है | हे मुनीश्वर! यह आश्चर्य है कि जो पदार्थ सुखदायक नहीं हैं उनकी ओर चित्त बड़ा यत्न करता है पर तो भी वे सिद्ध नहीं होते और अयत्नसिद्ध आत्मपद है उसको त्यागते हैं | जिनको यह सुख जानता है वे सब दुःख के स्थान हैं जिस अपने को यह भला जानता है वह अनर्थ का कारण है | जिस देह को जीव सुखरूप जानता है वह सर्वरोग का मूल है | जिनको यह भोग जानता है वे इसको दुःख देनेवाले परमरोग हैं और जिनको यह सत्य जानता है वे सब मिथ्या हैं, जिनको यह स्थित जानता है वे स्थित नहीं चलरूप हैं, जिनको यह रस जानता है वे सब विरस हैं, जिनको बान्धव जानता है वे सब  अबान्धव हैं और दृढ़ बन्धनरूप हैं और जिसको यह सुख देनेवाली स्त्री जानता है वह सर्पिणी है और परमविष के देनेवाली है जिसका काटा मर जाता है फिर नहीं जीता अर्थात् आत्मपद में स्थित नहीं होता | हे मुनीश्वर! मैं परम आपदा का कारण देह को जानता हूँ  इसके निवृत्त हुए जीव परमपद को प्राप्त होता है जिस पुत्र, धन आदिक को जीव संपदा जानता है सो परम दुःखरूप आपदा है, इसमें सुख कदाचित् नहीं | यह वार्त्ता मैं सुनकर नहीं कहता, मैंने देखकर विचार किया है, विचार करके अनुभव किया है और अनुभव करके कहा है कि यह संसार मायामात्र है | बड़े-बड़े स्थानों में भी गया हूँ परन्तु सार पदार्थ मुझको कोई दृष्टि नहीं आया | स्वर्ग में नन्दनवन आदि काष्ठरूप ही देखे, मृत्युलोक में आकर देखा तो पञ्चभूत ही दृष्टि आये और शरीर में रक्त, माँस, हाड़, मूत्र आदिक देखे, जो ऐसे शरीर में अहमप्रत्यय करते हैं मैं उनको धिक्कार देता हूँ | शरीर की आयुष्य ऐसी है जैसे दोनों हाथों में जल लीजिये तो बह जाता है अथवा जैसे जल में तरंग बुद्बुदे उपजकर नष्ट होते हैं बिजली का चमत्कार होकर नष्ट हो जाता है | जो ऐसे शरीर को पाकर सुख की तृष्णा करते हैं वे महामूर्ख हैं | बालक अवस्था तरंग की नाईं नष्ट हो जाती है यौवन अवस्था बिजली के चमत्कार वत् छिप जाती है और वृद्ध अवस्था में केश श्वेत हो जाते हैं और दाँत घिसकर गिर पड़ते हैं | जैसे नीचे स्थान में जल स्थित हो जाता है तैसे ही सब रोग वृद्ध अवस्था में स्थित होते हैं और तृष्णा दिन दिन बढ़ती जाती है | हे मुनीश्वर! उस समय सब पदार्थ जर्जरीभूत हो जाते हैं और तृष्णा जवान होती है-जैसे वसन्तऋतु की मञ्जरी बढ़ती जाती है-और जो सुखभोग प्राप्त होकर बिछुड़ जाते हैं उनका दुःख होता है | हे मुनीश्वर! इस प्रकार इनको असत्य जानकर मैं स्वरूप में स्थित हुआ हूँ | यदि पाँचों इन्द्रियों के इष्ट बड़ी उत्तम मूर्ति धारके स्थित हों तो भी हमको खैंच नहीं सकते  जैसे मूर्ति की लिखी कमलिनी भँवर को नहीं खैंच सकती, तैसे ही हम सरीखों को विषय नहीं चला सकते | हे मुनीश्वर! तुम्हारा शरीर मैंने अवज्ञा करके डाल दिया है-विचार से नहीं फेंका | ब्रह्मा रुद्रादिक जो त्रिकालज्ञ हैं वे भी इस चर्मदृष्टि से नहीं जान सकते, जब विचार से देखते हैं तभी जानते हैं, इस कारण विचार बिना मैंने तुम्हारा  शरीर फेंक दिया था | अब तुम क्षमा करो | योगेश्वर विचार से ही भूतम भविष्यत् और वर्तमान को जानता है, इन नेत्रों से तो वही जाना है कि जो अग्रभाग में होता है विशेष नहीं जाना जाता,  इस कारण मुझसे तुम्हारा शरीर गिरा है |

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे आकाशकुटीसिद्धसमाधियोगवर्णनन्नाम द्विशताधिक चतुर्थस्सर्गः ||204||

अनुक्रम


अन्तरोपाख्यानवर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे साधो! मुझसे भी तेरा गिराना विचार बिना हुआ है कि विचार बिना मैं उठ गया था | यह कुटी मेरे अन्तवाहक संकल्प में थी सो मैं अपने स्थान को चला इस कारण यह कुटी गिर पड़ी और तुम भी गिर पड़े | जो बीत गई सो भली हुई उसकी क्या चिन्तना कीजिए? ज्ञानवान् बीती की चिन्तना नहीं करते जो होनी थी सो भली हुई | हे साधो! अब जहाँ तुम्हें जाना है वहाँ जावो और हम भी जाते हैं | हे रामजी! इस प्रकार चर्चा करके हम दोनों आकाश मार्ग को उड़े-जैसे पक्षी उड़ते हैं-और परस्पर नमस्कार करके हम दोनों भिन्न भिन्न हो गये | वह अपने स्थान को चला और मैं अपने स्थान को चला और बहुतेरे स्थान देखता गया परन्तु मुझको कोई जानता था | हे रामजी यह सम्पूर्ण वृत्तान्त जो मैंने तुमसे कहा है उसे तुम विचारो | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! आपने जो सिद्ध के साथ समागम किया था तो आकाशमार्ग में कैसे शरीर से किया था  और पंचभौतिक शरीर तो पृथ्वी पर पड़ा था और पृथ्वी में अणुरूप हो गया था फिर आप किस शरीर से बिचरे? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! अन्तवाहक शरीर से मैं बिचरता फिरा था और उससे ही मैं सिद्ध और देवताओं के स्थानों और इन्द्र, वरुण और कुबेर के स्थानों में फिरा हूँ परन्तु मुझे कोई देखता था और मैं सबको देखता था | संकल्प रचित पुरुष से मेरा व्यवहार हुआ था और किससे कहूँ? रामजी ने पूछा, हे मुनीश्वर! अन्तवाहक शरीर तो इन्द्रियों का विषय नहीं है फिर सिद्ध से आपने चर्चा कैसे की और उसने तुमको कैसे देखा? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इस प्रकार जो तुम कहते हो तो सुनो | मैं इस निमित्त दृष्टि आया कि मेरा सत्य संकल्प था | मुझे यह फुरना हुआ कि सिद्ध मुझको देखे और मुझसे चर्चा करे इससे उसने मुझको देखा उसका संकल्प भी मेरे में आया तब जाना | जो दोनों सिद्ध हों और उनका संकल्प भिन्न भिन्न हो तो एक दूसरे के संकल्प को नहीं जानते-  परन्तु किसी का विशेष संकल्प हो तो वह दूसरे के संकल्प को जानता है | इससे यद्यपि उसका संकल्प मेरे देखने को था पर मेरा दृढ़ संकल्प था इससे मैं उसके संकल्प को खैंचकर अपनी ओर ले आया | जो बली होता है उसी की जय होती है-इससे उसने मुझको देखा | हे रामजी! जो अन्तवाहक में स्थित होता है उसको तीनों काल का ज्ञान होता है परन्तु व्यवहार में लगे तो उसे भूल जाता है और जो वर्तमान पदार्थ होता है उसी का ज्ञान होता है | इसी कारण उसने मेरा शरीर डाल दिया था, क्योंकि वह समाधि के व्यवहार  में लगा था और मेरे संकल्प से वह कुटी भी गिरी थी कि जब मैं अपने स्थान के व्यवहार को ऐसी चिन्तना करके चला था | जो मैं चिन्तना में होता, अन्तवाहक शरीर में होता और उस कुटी का भविष्यत् विचार उस संकल्प को रहने देता तो वह सिद्ध गिरता पर मैं तो और ही व्यवहार में लगा था इससे अन्तवाहक विस्मरण हो गया जिससे वह कुटी गिर पड़ी और सिद्ध भी गिर पड़ा | हे रामजी! इस प्रकार सिद्ध गिरा और उससे चर्चा हुई तब मैं वहाँ से चला और अन्तवाहक शरीर से आकाशमार्ग में फिरने लगा | सिद्धों के समूह और देवता, विद्याधर, गन्धर्व, किन्नर , ऋषि. मुनि, वरुण, कुबेर, इन्द्र , यम आदि सबके स्थान देखे परन्तु मुझको कोई देखे | मैं बड़े बड़े शब्द करूँ कि किसी प्रकार कोई शब्द सुने और मुझको देखे परन्तु मेरा शब्द कोई सुने और कोई देखे |जैसे स्वप्ने में कोई शब्द करे तो उसका शब्द जाग्रत्वाला कोई नहीं सुनता और जैसे असंकल्पवाला दूसरे की सृष्टि व्यवहार का शब्द नहीं जानता तैसे ही मुझको कोई जानता था | हे रामजी! इस प्रकार मैं प्रथम आकाश में पिशाच की नाईं होकर बिचरा और फिर दैत्यों के स्थानों में बिचरा मैं सबको देखूँ पर मुझको कोई देखे | रामजी ने पूछा, हे भगवन् | पिशाच का शरीर, जाति और क्रिया कैसी होती है और उनके रहने का कौन स्थान है? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! पिशाच की कथा से कुछ प्रयोजन था तथापि तुमने प्रसंग पाकर पूछा है इससे मैं कहता हूँ |  पिशाच का आकार नहीं होता और जो रूप वे धारते हैं सो सुनो | कई तो आकाश की नाईं शून्य होते हैं और परछाही की नाई भय देते हैं, कई शूकर और कई काकरूप धारकर स्थित होते हैं | ऐसे रूप धारके वे विचरते हैं और सबको देखते और जानते हैं पर उनको कोई नहीं जानता | शीत-उष्ण से वे भी दुःख पाते हैं और इच्छा, द्वेष, लोभ, मान, मोह, क्रोध आदिक विकार उनमें भी रहते हैं | शीतल जल और भले भोजन की वे भी इच्छा करते हैं  और नगरों वृक्षों और दुर्गन्ध स्थानों में भी रहते हैं | कहीं सियार होकर दिखाई देते हैं और कहीं श्वान होकर दृष्टि आते हैं | मन में भी प्रवेश करते हैं और मन्त्र पाठ, दान आदिक से जो वश होते हैं सो भी अपनी अपनी वासना के अनुसार होते हैं | इनमें भी उत्तम, मध्यम और नीच होते हैं, जो उत्तम हैं वे देवताओं के स्थानों, मध्यम के स्थानों और नीच नरकों के स्थानों में रहते हैं और इनकी उत्पत्ति अचैत्य चिन्मात्र जो दृश्य से रहित शुद्ध चैतन्यहै उससे हुई है | हे रामजी! सबका अपना आप वही चैतन्यसत्ता की नाईं है, उसमें जैसी जैसी वासना होती है तैसा ही तैसा पदार्थ हो  भासता है | हे रामजी! कहीं पिशाच है और जगत् है, ब्रह्मसत्ता ही ज्यों की त्यों अपने आपमें स्थित है | शुद्ध आत्मत्वमात्र में किञ्चन `अहं' होकर फुरा है उसी को जीव कहते हैं | उस अहं की दृढ़ता से मन फुरा है सो मन ब्रह्मारूप होकर स्थित हुआ है | उस ब्रह्मा ने मनोराज से आगे जगत् उत्पन्न किया है और ब्रह्मा ही जगत््रूप होकर स्थित हुआ है सो ब्रह्मा स्थित है | हे रामजी! ब्रह्मा का शरीर अन्तवाहक और केवल आकाशरूप है और उसके दृढ़ संकल्प से आधिभौतिक जगत् दृढ़ हुआ है- उसी मन से और मन हुआ है | हे रामजी! जैसे ब्रह्मा का शरीर अन्तवाहक है तैसे ही सबका शरीर अन्तवाहक है परन्तु संकल्प की दृढ़ता से आधिभौतिक भासता है और सब मनरूप है परन्तु दीर्घकाल का स्वप्ना है वह जाग्रत होकर स्थित हुआ है इससे दृढ़ भासता है | जिनको शरीर में अहंकार है उनको जगत् आधिभौतिक भासता है और जो प्रबोधरूप हैं उनको सब जगत् संकल्परूप है- वास्तव में कुछ उपजा नहीं, तुम हो, मैं हूँ ब्रह्मा है और जगत् है-सब ही ब्रह्मरूप है | जैसे आकाश और शून्यता में कुछ भेद नहीं, अग्नि और उष्णता में कुछ भेद नहीं और वायु और स्पन्द में  कुछ भेद नहीं, तैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं | ब्रह्मा और जगत् दोनों अज  है, ब्रह्मा ही उपजा है और जगत् ही उपजा है-दोनों ब्रह्मरूप हैं | जो ब्रह्म से  भिन्न भासता है वह भ्रान्तिमात्र है | हे रामजी! पञ्चभूत और छटा मन इनका नाम जगत् है | जबतक ये भूत उसमें दृष्टि आते हैं तबतक भ्रान्ति है और जब इनसे रहित केवल चैतन्य भासे तब उसी का नाम परमपद है | हे रामजी! जब आत्मपद में जागोगे तब पञ्च भूत भी आत्मा से भिन्न भासेंगे | सबका अधिष्ठान चैतन्यसत्ता है जबतक आत्मा का प्रमाद है तब तक संसारभ्रम मिटेगा | सब जगत् निराकार संकल्पमात्र है परन्तु संकल्प की दृढ़ता से आकाश में स्थूलभूत दृष्टि आते हैं | ज्ञानकाल और अज्ञानकाल में जगत् उपजा नहीं परन्तु अज्ञानी को दृढ़ भासता है | जैसे मनोराज से किसी ने नगर रचा हो तो वह उसी के हृदय में है और कहीं नहीं भासता, तैसे ही जबतक जीव अज्ञान निद्रा में सोया है तबतक जगत् भासता है पर जब जागेगा तब आकाशरूप देखेगा | हे रामजी! अपना संकल्प आपको नहीं बाँधता | जबतक स्वरूप का प्रमाद नहीं होता तबतक ब्रह्मा का संकल्प ब्रह्मा को नहीं बन्धन करता | स्वरूप भी अहंप्रत्यय से तो संकल्प रूप है और दूसरी कुछ वस्तु सत्य नहीं-आत्मा ही है | वास्तव में जगत् का आदि है, मध्य है और अन्त है, जगत् का होना है और अनहोना है-आत्मसता ही अपने आपमें स्थित है | हे रामजी! जो सर्वात्मा ही है तो राग-द्वेष किसका हो? सब अपना आप ही है और अपना आप जो आत्मतत्त्व है उसका किञ्चन संवेदन फुरने से जगत््रूप होकर स्थित हुआ है | जैसे किसी पुरुष ने मनोराज से एक स्थान रचा और उसमें दृढ़ भावना हुई तो आधिभौतिक भासने लग जाता है, तैसे ही जगत् भी ब्रह्मा का संकल्प है और चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, रुद्र, वरुण और कुबेर आदिक सब संकल्परूप हैं पर संकल्प की दृढ़ता से आधिभौतिक भासते हैं | हे रामजी! आत्मरूपी एक ताल है जिसमें चैतन्यरूपी जल है, फुरनरूपी कीचड़ है और उसमें चौदह प्रकार के भूतजातरूप दर्दुर रहते हैं सो सब  संकल्पमात्र है | हे रामजी! आकाश में एक आकाशक्षेत्र है जिसमे शिला उत्पन्न होती हैं | स्वर्गलोक और देवता बड़ी शिला हैं, एक उनमें उज्ज्वल शिला है सो ज्ञानवान् है मध्यम शिला मनुष्य हैं नीचे शिला तिर्यक आदिक योनि हैं सो सब ही निर्बीज हैं अर्थात् कारण से रहित हैं और अद्वैत आत्मा सदा अपने आपमें स्थित है-कुछ उत्पन्न नहीं हुआ परन्तु भ्रान्ति से भिन्न भिन्न भासता है | जैसे फैन बुद्बुदे और तरंग सब जल रूप हैं, तैसे ही यह जगत् सब आत्मरूप है और जैसे स्वप्न और संकल्प की सृष्टि कारण बिना होती है, तैसे यह जगत् कारण बिना संकल्प से उत्पन्न हुआ है | जैसे ब्रह्मादिक हुए हैं तैसे ही पिशाच भी उदय हुए हैं | हे रामजी! जैसा किञ्चन आत्मा में होता है तैसा ही होकर भासता है, वास्तव में पृथ्वी आदिक तत्त्व कहीं नहीं और कहीं ब्रह्म उपजा है, कोई जगत् उपजा है सब भ्रममात्र हैं | जितने वपु भासते हैं वे सब निर्वपु हैं, चैतन्यता से फुरे हैं और सब जीवों का आदि अन्तवाहक शरीर है | जैसे ब्रह्मा का अन्तवाहक शरीर था, तैसे ही सर्व जीवों का अन्तवाहक शरीर होता है परन्तु संकल्प की दृढ़ता से आधिभौतिक हो भासता है | सब जीवों का अपना अपना भिन्न भिन्न संकल्प है उसी के अनुसार अपनी सृष्टि होती है | जो तुम कहो कि भिन्न भिन्न हैं तो जीव इकट्ठे क्यों दृष्टि आते हैं, चाहिये कि अपनी अपनी सृष्टि में हो तो उसका उत्तर यह है कि जैसे एक नगरवासी और नगर में जावे और एक नगरवासी और मैं आवे और दोनों जाय इकट्ठे बैठें, तैसे ही सब जीव इकट्ठे भासते हैं पर उनके इकट्ठे हुए भी इसकी सृष्टि को वह नहीं देखता और उसकी सृष्टि को यह नहीं देखता जैसे स्वप्न में भिन्न भिन्न भूतजात होते हैं और अनुभव में इकट्ठे इकट्ठे दृष्टि आते हैं और एक अनुभव में भिन्न भिन्न होते हैं एक दूसरे की सृष्टि को नहीं जानते | जीव को अन्तवाहक भूल गया है इससे आधिभौतिक दृढ़ हो रहा है जैसा अनुभव में अभ्यास होता है तैसा ही भासता है | जहाँ पिशाच होता है वहाँ अन्धकार भी होता है | जो मध्याह्न का सूर्य उदय हो और पिशाच आगे आवे तो अन्धकार हो जाता है ऐसा तमरूप वह होता है | जैसे उलूकादिक को प्रकाश में अन्धकार होता है तैसे ही अनेक सूर्य का प्रकाश हो तो भी पिशाच को अन्धकार ही रहता है | हे रामजी! जैसा उनमें निश्चय होता है तैसा ही भान होता है, क्योंकि उनका ओज तमरूप है | जैसा किसी को निश्चय होता है तैसा ही भासता है | हमको तो सदा आत्मा का निश्चय है इससे हमें सदा आत्मतत्त्व का भान होता है | जैसा पिशाच पाञ्चभौतिक शरीर से रहित चेष्टा करते हैं तैसे ही मैं पंचभौतिक शरीर से रहित आकाश में चेष्टा करता रहा हूँ |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणेअन्तरोपाख्यानवर्णनन्नाम द्विशताधिकपञ्चमस्सर्गः ||205||

अनुक्रम

 


अन्तरोपा0 वर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! मैं चिदाकाशरूप हूँ इसलिये पाञ्चभौतिक शरीर से रहित अन्त वाहक शरीर से मैं विचरता रहा परन्तु मुझको कोई देखे | चन्द्रमा, सूर्य और इन्द्र जो सहस्त्र नेत्रवाले हैं और सिद्ध, गन्धर्व, ऋषीश्वर, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी  इस चर्मदृष्टि से मुझे देख सकें और मैं सबको देखता फिरूँ | इन्द्र के निकट जाकर मैंने उसके अंग हिलाये परन्तु उसने मुझको जाना | जैसे संकल्पनगर किसी को हिलावे और वह देखे और आधिभौतिक शरीर हिले | इससे मैं अति मोह को प्राप्त हुआ कि इतने काल मैं रहा और मुझको कोई देख नहीं सकता | तब मैंने यह इच्छा की मुझको सब देखें | मैं तो सत्यसंकल्परूप था इससे सब मुझे देखने लगे | जैसे कोई इन्द्रजाल को देखे तैसे ही वे मुझको देखने लगे | जिसने पृथ्वी पर देखा उसने पृथ्वी से उपजा वशिष्ठ जाना और मनुष्यलोक में कई जल से उपजा जानेंकि वारिज वशिष्ठ है | कई ने वायु से उपजा जाना और कई जानें कि सप्तऋषियों के मध्य जो तेजोमय वशिष्ठ है वही है | इस प्रकार जगत् में मुझको सब देखने लगे और मैं सबके साथ व्यवहार करने लगा | जब बहुत काल इसी प्रकार व्यतीत हुआ तब सबने भावना की दृढ़ता से पञ्चभौतिक शरीर मुझको देखा और प्रथम वृत्तान्त सबको विस्मरण हो आधिभौतिकता दृढ़ हो गई जैसे अज्ञान जीव स्वप्न के नर को आधिभौतिक देखता है, तैसे ही मेरे साथ उन्होंने आकार देखा पर मुझको सदा अपने स्वरूप अहं प्रत्यय से भिन्न द्वैत कुछ भासता था, क्योंकि मैं ब्रह्मरूप था | मेरा नाम वशिष्ठ ऐसा है जैसे रस्सी में सर्प होता है, मैं तो चिदा काशरूप हूँ पर औरों को वशिष्ठ प्रतीति उपजी है | हे रामजी! तुम सरीखों को मेरा आकार दृष्ट आता है पर मुझको आधिभौतिक और अन्तवाहक दोनों शरीर चिदाकाश का किंचन भासते हैं | मैं सदा निराकार अद्वैतरूप हूँ | चेष्टा तुम्हारी और हमारी समान है परन्तु मुझको सदा आत्मपद का निश्चय है इस कारण मैं जीवन मुक्त होकर विचरता हूँ अज्ञानी की क्रिया में द्वैत भासता है और हमको क्रिया में भी अद्वैत भासता है, ब्रह्मा भी ब्रह्मस्वरूप भासता है और उसको संकल्प जो जगत् है वह भी ब्रह्मस्वरूप है | जैसे समुद्र में तरंग जलरूप है- भिन्न कुछ नहीं, तैसे ही ब्रह्म में जगत् ब्रह्मरूप है-भिन्न कुछ नहीं | इसे मैं चिदाकाशरूप हूँ-द्वैत कुछ नहीं फुरता | जब अहं फुरती है तब जगत् द्वैतरूप होकर भासता है जैसे अहं के फुरने से स्वप्न की सृष्टि होती है, तैसे ही जाग्रत सृष्टि भी होती है सो संकल्पमात्र है | ब्रह्मा और ब्रह्मा का जगत् संकल्प की दृढ़ता से आधिभौतिक की नाईं हो भासता है पर वास्तव में ब्रह्मा उपजा है और जगत् उपजा है चिदानन्द ब्रह्म अपने आपमें स्थित है और सदा एक रस है | हे रामजी! सृष्टि की आदि से प्रलय पर्यन्त जो कुछ क्षोभ है उसमें आत्मा सदा एकरस है और उसमें कदाचित क्षोभ नहीं, क्योंकि वास्तव कुछ उपजा नहीं,जो कुछ भासता है सो अज्ञान से सिद्ध है और ज्ञान से जगत्भ्रम निवृत्त हो जाता है | जैसे स्वप्नसृष्टि में किसी को कहीं निधि भासे तो वह उसकी प्राप्ति के निमित्त  यत्न करता है पर जब जागता है तो उसको स्वप्ना जान फिर उसके पाने का यत्न नहीं करता,  तैसे ही जब आत्मबोध होता है तब फिर इस जगत् में जगत् बुद्धि नहीं रहती | अज्ञान ही जगत््भ्रम का कारण है और उस अज्ञान के निवृत्ति का उपाय यही है कि इस महा रामायण का विचार करना-उसी से संसारभ्रम निवृत्त होगा | यह संसार अविद्या से वासनामात्र है, जो इसको सत्य जानकर इसकी ओर धावते हैं वे परमार्थ से शून्य हैं मूढ़ हैं, कीट हैं और बानर की नाईं चञ्चल हैं | जिनको भोगों में सदा इच्छा रहती है वे नीचपशु हैं और उनको संसार से निवृत्त होना कठिन है, क्योंकि उनके हृदय में सदा तृष्णा रहती है और वैराग्य को नहीं प्राप्त होते | हे रामजी! भोग तो ज्ञानवान् भी भोगते हैं परन्तु वे भोगबुद्धि से नहीं भोगते पर प्रवाहपतित जो कुछ प्रारब्धवेग से प्राप्त होता है उसको भोगतेत हैं और जानते हैं कि गुणों में गुण वर्तते है और इन्द्रियों सहित भोग को भ्रान्तिमात्र जानते हैं | जो अज्ञानी हैं वे आसक्त होकर भोगते और तृष्णा करते हैं और भोग की तृष्णा से उनका हृदय जलता है-इसी का नाम बन्धन है | भोग दुःखरूप हैं, जो इनको सेवते हैं वे हृदय में सदा तृष्णा से जलते हैं और उनका द्वैतरूप जगत्् रूप कदाचित् नहीं मिटता और ज्ञानवान् सदा आत्मा से तृप्त रहते हैं इससे शान्तरूप हैं जैसे हिमालय पर्वत में सब पदार्थ शीतल हो जाते हैं तैसे ही आत्मज्ञान से हृदय शीतल हो जाता है, आत्मानन्द की प्राप्ति होती है और कोई दुःख नहीं रहता | जिनका चित्त सदा स्त्री, पुत्र और धन में आसक्त है और इच्छा करते हैं वे महामूर्ख और नीच हैं, उनको धिक्कार है | जिसको आत्मपद की इच्छा हो उसको सदा सन्तो का संग करना चाहिये और शास्त्रों को श्रवण करके विचार करना चाहिये | इस अभ्यास से आत्मपद की प्राप्ति की प्राप्ति होती है | हे रामचन्द्र! इस शास्त्र का विचार परमपद को प्राप्त करानेवाला है | जो पुरुष इस शास्त्र को त्यागकर और की ओर लगते हैं वे मूर्ख हैं | वाल्मीकिजी बोले, हे राजन् जब इस प्रकार वशिष्ठजी ने कहा तब सायंकाल का समय हुआ और सर्वश्रोता परस्पर नमस्कार करके गये और सूर्य की किरणों के उदय होने से फिर आन स्थित हुए |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे अन्तरोपा0 वर्णनसमाप्तिर्नामद्विशताधिकषष्ठस्सर्गः ||206||

अनुक्रम


मुक्तसंज्ञा वर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! तुमको यह अन्तरोपाख्यान सुनाया है इसके विचार से जगत्् भ्रम नष्ट हो जायगा | ऐसे तुम जब विचार कर देखोगे तब अनन्त ब्रह्माण्ड आत्मा में धँसते दृष्टि आवेंगे |हे रामजी! आत्मा में जगत् कुछ वास्तव नहीं हुआ इससे मिटता भी  नहीं, चित्त के फुरने से भासता है, जब चित्त का फुरना अधिष्ठान में लीन हो जावेगा तब अद्वैततत्व आत्मा ही भासेगा | हे रामजी! अद्वैततत्त्व में जगत् भ्रम में भासता है | ज्ञानवान् की दृष्टि में सदा अद्वैत ही भासता है | जगत् मैं और तुम सब चिदाकाश हैं | आत्मा से भिन्न कुछ नहीं-आत्मसत्ता ही जगत् होकर भासती है | जैसे अपना अनुभव स्वप्ने की दृष्टि को भासता है सो अनुभवरूप ही है, तैसे ही यह जगत् भी चिदाकाशरूप है | यदि नाना प्रकार विकार भी दृष्टि आते हैं तो भी आत्मसत्ता अनुस्यूत और अखण्ड रूप है-आत्मसता और जगत् में भेद कुछ नहीं जैसे सुवर्ण और भूषणों में भेद नहीं होता,  तैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं ब्रह्म ही चेतनता से जगत््रूप हो भासता है  जैसे स्वप्न में अपने ही अनुभव से बहुत विस्तृत हो भासता है सो अनुभव से इतर कुछ नहीं हुए और जैसे समुद्र और तरंगों में कुछ भेद नहीं, तैसे ही कुछ, जगत् और अनुभव तीनो में कुछ भेद नहीं-असम्यक् दृष्टि से भेद भासता है, सम्यक््दृष्टि से कोई भेद नहीं | हे रामजी! आत्मसत्ता में प्रथम आभास फुरा है सो ब्रह्मरूप होकर स्थित हुआ है वह ब्रह्मा चिदाकाशरूप है और वही ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है | उसी ब्रह्म सत्ता ने अपने भाव को नहीं त्यागा और ब्रह्मरूप होकर स्थित हुई है | फिर उसने जगत् रचा इसलिये वह जगत् भी आकाशरूप वास्तव में जगत् उपजा है ब्रह्मा उपजा है और स्वप्ना हुआ है और परमार्थसत्ता सदा अपने आप में स्थित है जो शुद्ध, अनन्त, अविनाशी अचेत चिन्मात्र है और जगत् भी वही स्वरूप है | हे रामजी! मैं चिदाकाशरूप हूँ, मेरे साथ कोई आकार है, मैं कदाचित् उपजा हूँ और मैं कदाचित् मृतक होता हूँ | मैं नित्य, शुद्ध, अजर-अमर सदा अपने स्वभाव में स्थित हूँ और अनेक विकारों में भी एकरस हूँ |  जैसे स्वप्न में बड़े क्षोभ होते हैं तो भी जाग्रत् वपु को स्पर्श नहीं करते, क्यों कि उसमें कुछ हुए नहीं आभासमात्र है, तैसे ही जगत् की उत्पत्ति-प्रलयादिक क्षोभ में आत्मसत्ता को स्पर्श नहीं होता अर्थात् वह क्षोभ से रहित सदा अनुभवरूप है | जिस पुरुष ने ऐसे अनुभव को नहीं पहिचाना जिससे सब कुछ सिद्ध होता है और उसे छिपाया है वह महामूर्ख है और आत्महत्यारा है-वह महाआपदा के समुद्र में डूबेगा-और जिसको अपने स्वरूप में अहं प्रत्यय हुई है उसको मानसी दुःख कदाचित् नहीं स्पर्श करता | जैसे पर्वत को चूहा नहीं चूर्ण कर सकता, तैसे ही उसको दुःख नहीं स्पर्श करता! जिसको आत्मा में अहं प्रत्यय नहीं उसको शान्ति नहीं प्राप्त होती | जैसे वायुगोले में उड़ा हुआ तृण स्थिर नहीं होता, तैसे ही देह अभिमानी को कदाचित् शान्ति नहीं प्राप्त होती | जो अपने शुद्ध स्वरूप को त्यागकर देह से आपको मिला हुआ जानता है सो क्या करता है? वह मानो चिन्तामणि को त्यागकर राख को अंगीकार करता है और शुद्ध चिन्मात्र अपने स्वरूप को त्यागकर देह में आत्म अभिमान करता है | हे रामजी! जब जीव अनात्म में आत्मअभिमान करता है तब आपको विकारवान् और जन्मता मरता मानता है और जब देह अभिमान को त्यागकर आत्मा को आत्मा मानता है तब जन्मता है मरता है, शस्त्र से कटता है, अग्नि से दग्ध होता है, जल से डूबता है, और पवन से सूखता है-निराकार अविनाशी और चिदाकाशरूप है | हे रामजी! यदि चेतन की मृत्यु होती हो तो पिता के मरे से पुत्र भी मर जाता और एक के मरे से सभी मर जाते, क्योंकि आत्मसत्ता चेतन एक अनुस्यूत है पर एक के मरने से सब नहीं मरते, इससे चैतन्य आत्मा को मृत्यु कदाचित् नहीं | शरीर के काटे से आत्मा नहीं कटता शरीर के दग्ध हुए आत्मा नहीं दग्ध होता और सम्पूर्ण विश्व भस्म हो जावे तो भी आत्मा भस्म नहीं होता |  आत्मा नित्य, शुद्ध, अनन्त, अच्युतरूप-कदाचित्् स्वरूप से अन्यथा भाव को नहीं प्राप्त हुआ है | हे रामजी! मैं अहंब्रह्मरूप हूँ अर्थात् सब में अहंरूप निराकार अखण्ड मैं हूँ मुझको जन्म है और मृत्यु है, सुख की इच्छा नहीं, कुछ हर्ष है, शोक है, जीने की इच्छा है और मरने की इच्छा है | जैसे रस्सी में सर्प और सुवर्ण में भूषण कल्पित हैं तैसे ही आत्मा में वशिष्ठ नामरूप है और देश,काल, वस्तु,  के परिच्छेदन से रहित अनन्त आत्मा, नित्य, शुद्ध और बोधरूप हूँ | सबका स्वरूप आत्म तत्त्व है परन्तु वास्तवस्वरूप के प्रमाद से और अवस्तु को प्राप्त हुए की नाईं भासता है | जो पुरुष स्वरूप में स्थित नहीं हुये वे संसारमार्ग की ओर दृढ़ हुए हैं,  उनका जीना वृथा है और वे कहनेमात्र चैतन्य हैं, नहीं तो पाषाण की शिलावत् हैं | जैसे लुहार की धौंकनी से पवन निकलता है, तैसे ही उनका जीना वृथा है | वे घड़ीयन्त्र  की नाईं वासना में भटकते हैं, आत्मानन्द को नहीं प्राप्त होते और सदा तपते रहते हैं जिनको अत्मपद में स्थिति हुई है उनको दुःख कदाचित् स्पर्श नहीं करता | यदि प्रलयकाल का पवन चले और पुष्करमेघ की वर्षा हो, बड़वाग्नि लगे और द्वादश सूर्य तपें पर वे ऐसे क्षोभों में भी चलायमान नहीं,होते, क्योंकि वे सर्वब्रह्मस्वरूप जानते हैं | जैसे तृण से पर्वत चलायमान नहीं होता, तैसे ही बड़े दुःखों से भी चलायमान नहीं होते  दुःख तब होता है जब आत्मा से भिन्न कुछ भासता है पर उनको तो आत्मा से भिन्न कुछ भासता ही नहीं | हे रामजी! यह सब जगत् आत्मअनुभवरूप है, क्योंकि आत्म रूप है | जैसे स्वप्न में अनुभव से भिन्न कुछ वस्तु नहीं होती तैसे ही सब जगत् अनु भवरूप है और जो भिन्न भासता है सो भ्रान्तिमात्र है | यह जगत् जो नाना प्रकार का भासता है सो आत्मा में अव्यक्तरूप है और भ्रम से प्रकट भासता है | जैसे आकाश में नीलता से सिद्ध है, तैसे ही आत्मा में जगत् भ्रम से सिद्ध है | वास्तव में ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं, आत्मसत्ता ही जगत् होकर भासती है और उसमें जैसा निश्चय होता है तैसा ही तैसा अधिष्ठानरूप भासता है | जिनको कारण से सृष्टि का होना दृढ़ हो रहा है उनको वैसा ही भासता है, जिनको परमाणुओं से सृष्टि उत्पन्न होने का निश्चय है उनको वैसा ही सत्य भासती है और माध्यमिक सत् असत् के मध्य वस्तु को मानते हैं | एक चार्वाकी म्लेच्छ हैं जो चारों तत्त्वों से सृष्टि की उत्पत्ति मानते हैं, बौद्ध  कहते हैं कि जो कुछ वस्तु है वह बोध है इसके अभाव हुए से शून्य है | ब्राह्मण, हाथी, गौ, श्वान, घोड़ा, सूर्यादिक में भिन्न भिन्न प्रतीति हो रही हैं पर जो ज्ञान वान् ब्राह्मण हैं वे सबमें एक ब्रह्मसत्ता अनुस्यूत् देखते हैं | हे रामजी! वस्तु तो एक है पर उसमें जैसा निश्चय जिसको हुआ है तैसा ही भासता है | जैसे चिन्तामणि और कल्पतरु में जैसी भावना करते हैं तैसी ही सिद्धि होती है, तैसे ही आत्मसत्ता में जैसी भावना करते हैं, तैसा ही रूप हो भासता है | हे रामजी! बुद्धिमानों से निर्णय किया है कि सारभूत आत्मसत्ता ही है, जब उसमें दृढ़ अभ्यास करोगे तब आत्मसत्ता ही भासेगी और फिर उस निश्चय से चलायमान होगे | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! पाताल, भूतल और स्वर्ग में बुद्धिमान कौन हैं जिनको पूर्वापर के विचार से परावर का साक्षात्कार हुआ है और आत्मस्वरूप का वे कैसे निश्चय करते हैं वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जितना जगत् है सब इन्द्रियों के विषयों की तृष्णा से जलता है और इष्ट की प्राप्ति में हर्ष और अनिष्ट की प्राप्ति में शोक करता है | ऐसा कोई बिरला ही है जो जगत् में सूर्य की नाईं प्रकाशता है, नहीं तो सब तृणवत् भोगरूपी वायु में भटकते हैं और जो सबसे श्रेष्ठ कहाता है वह भी विषयरूपी अग्नि में जलता है जैसे कृमि अशुभ स्थानों में रहते हैं और उनसे आपको प्रसन्न मानते हैं तैसे ही देवता  भी सदा भोगरूपी अपवित्र स्थानों में आपको प्रसन्न मानते हैं सो मेरे मत में दुर्गन्ध के कृमि हैं | गन्धर्व तो मूढ़ हैं उनको तो कुछ सुधि नहीं अर्थात् आत्मपद की गन्ध भी नहीं-वे तो मेरे मत में मृग हैं | जैसे मृग को राग में आनन्द होता है, तैसे ही गन्धर्व राग से उन्मत्त रहते हैं और आत्मपद से विमुख हैं | विद्याधर भी मूर्ख हैं, क्योंकि वे वेद के अर्थरूपी चतुराई को अग्नि में जलाते हैं और वेद के सार भूत अमृत को नहीं जानते इसलिये आत्मपद से विमुख हैं | सिद्ध मेरे मत में पक्षी हैं जो पक्षी की नाईं उड़ते फिरते हैं और अभिमानरूपी पवन के चलने से अनात्मरूपी गढ़े में आन पड़ते हैं अपने वास्तव स्वरूप में स्थित नहीं होते- यक्ष धन के अभिमान से मूर्ख की नाईं प्रीति कर जलते हैं और आत्मपद में स्थित नहीं होते | योगिनी भी मद से सदा उन्मत्त रहती हैं इससे आत्मपद में स्थित नहीं पातीं और दैत्यों को भी सदा वताओं के मारने की इच्छा रहती है इससे सदा शोक में रहते हैं और  आत्मपद से विमुख हैं | तुम तो पहले से ही जानते हो | मनुष्य भी आत्मपद से गिरे हुए हैं,क्योंकि सदा यही इच्छा रहती है कि गृह बनाइये और वे खाने और धन इकट्ठे करने के निमित्त यत्न करते हैं और इन्द्रियों के विषयों में डूबे हुए हैं | पाताल में नाग रहते हैं जिनका जल में भी निवास है वे सुन्दर नागनियों में आसक्त रहते हैं इसलिए वे भी आत्मानन्द से गिरे हुए हैं | निदान जितने भूतप्राणी हैं वे सब विषयों के सुख में लगे हुए हैं और आत्मपद से विमुख हैं | सब जातों में बिरले जीवन्मुक्त भी  हैं और ज्ञानवान् भी हैं- उन्हें सुनो | देवताओं में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र सदा आत्मानन्द में मग्न हैं और चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, वायु, इन्द्र, धर्मराज, वरुण, कुबेर, बृहस्पति शुक्र, नारद, कच आदि जीवन्मुक्त पुरुष हैं | सप्तऋषि और दक्ष प्रजा पति, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और सनातन जीवन्मुक्त हैं और और भी बहुत मुक्त हैं | सिद्धों में कपिलमुनि, यक्षों में विद्याधर और योगिनी और दैत्यों में हिरण्यकशिपु, प्रह्लाद,बलि, विभीषण, इन्दरजीत, स्वरमेय, चित्रासुर और नमुचि आदिक जीवन्मुक्त हैं मनुष्यों में राजर्षि और ब्रह्मर्षि और नागों में शेषनाग, वासुकि नाग आदिक जीवन्मुक्त हैं | ब्रह्मलोक, विष्णुलोक और शिवलोक में कोई कोई बिरले जीवन्मुक्त हैं  हे रामजी! जात जात में जो जीवन्मुक्त हुए है सो तुमसे संक्षेप में कहे हैं और जहाँ  जहाँ देखता हूँ वहाँ वहाँ अज्ञानी ही बहुत हैं ज्ञानवान् कोई बिरला दृष्टि आता है |  जैसे सब जगह और वृक्ष बहुत हैं परन्तु कल्पवृक्ष बिरला होता है, तैसे ही संसार में अज्ञानी बहुत दृष्टि आते हैं, ज्ञानी कोई बिरला है | हे रामजी! शूरमा और कोई नहीं, जिनकी आत्मपद में स्थिति हुई है वही शूरमा हैं और संसार समुद्र तरना उन्हीं को सुगम है | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मुक्तसंज्ञावर्णनन्नाम द्विशताधिकसप्तमस्सर्गः ||207||

अनुक्रम

 


जीवन्मुक्तव्यवहार

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो विवेकी पुरुष विरक्तचित्त है और जिनकी स्वरूप में स्थिति हुई है उनके राग, द्वेष, काम, क्रोध, मोह, अभिमान, दम्भ, आदिक विकार स्वाभाविक नष्ट हो जाते हैं | जैसे सूर्य के उदय हुए अन्धकार स्वाभाविक निवृत्त हो जाता है और जैसे बाण को देखकर कौवा भाग जाता है तैसे ही विवेकरूपी बाण को देखकर विकाररूपी कौवे भाग जाते हैं | विवेकी पुरुषों के हृदय में इतने गुण स्वाभाविक आन स्थित हैं कि वे किसी पर क्रोध नहीं करते और जो करते भी दृष्टि आते हैं-सो किसी निमित्तमात्र जानना, उनके हृदय में सदा शीतलता और दया रहती है और जो कोई उनके निकट आता है वह भी शीतल हो जाता है, क्योंकि वे निरावरण स्थित हैं | जैसे चन्द्रमा के निकट गये से शीतल होता है तैसे ही ज्ञानवान् के निकट आये से हृदय शीतल होता है और कोई पुरुष उनसे उद्वेगवान् नहीं होता | जो कोई निकट आता है उसको वे विश्राम के निमित्त स्थान देते हैं और उसका अर्थ भी पूर्ण करते हैं | जैसे कमल के निकट भँवरा जाता है तो वे उसको विश्राम का स्थान देते हैं और सुगन्ध से उसका अर्थ पूर्ण करते हैं,तैसे ही सन्तजन अर्थ पूर्ण करते हैं | वे यथाशास्त्र चेष्टा करते हैं और हेयो पादेय की विधि को भी जानते हैं | जो कुछ उन्हें स्वाभाविक प्राप्त हो उसको वे शास्त्र की विधि सहित अंगीकार भी करते हैं और हृदय में सर्व की भावना से रहित हैं | उनमें दान-स्नान आदिक शुभ क्रिया स्वाभाविक होती हैं और उदारता, वैराग्य; धैर्य, शम दम आदिक गुण स्वाभाविक होते हैं | वे इस लोक में भी सुख देनेवाले हैं और परलोक में भी सुख देनेवाले हैं | हे रामजी! जिन पुरुषों में ऐसे गुण पाइये वे ही सन्त हैं | जैसे जहाज के आश्रय समुद्र से पार होते हैं तैसे ही संसारसमुद्र के पार करनेवाले सन्तजन हैं | जिनको सन्तजनों का आश्रय हुआ है वे ही तरे हैं | सन्तजन संसारसमुद्र के पार के पर्वत हैं | जैसे समुद्र में जल होता है तो बड़े तरंग उछलते हैं और उसमें  बड़े मच्छर रहते हैं पर जब उसका प्रवाह उछलता हे तब पर्वत उस प्रवाह को रोकता है और उछलने नहीं देता तैसे ही चित्तरूपी समुद्र में इच्छारूपी तरंग है और रागद्वेष  रूपी मच्छ रहते हैं, जब इच्छारूपी तरंग का प्रवाह उछलता है तब सन्तरूपी पर्वत उसको रोकते हैं | सन्तजन अपने चित्त को भी रोकते हैं और जो उनके निकट कोई जाता है तो उसकी रक्षा करते हैं | यदि शरीर नष्ट होने लगे अथवा नगर नष्ट होने लगे निकट अग्नि लगे तो भी ज्ञानवानों का हृदय स्वरूप से चलायमान नहीं होता, वे सदा अपने स्वरूप में स्थित रहते हैं | जैसे भूकम्प से सुमेरु चलायमान नहीं होता तैसे ही वे भी चलायमान नहीं होते | यह जो मैंने तुमसे शुभगुण स्नान, दान आदि कहे हैं सो जीवों को सुख देने वाले हैं और दुःख को निवृत्त करनेवाले हैं | इनसे सुख की प्राप्ति होती है और दुःख नष्ट हो जाता है | जब स्नानदान की ओर मनुष्य आता है तब सन्तों की संगति में भी उसका चित्त लगता है और जब सन्तों की संगति में चित्त लगा तब क्रम से परमपद की प्राप्ति होती है | इससे मनुष्य को यही कर्तव्य है कि शास्त्र के अनुसार शुभ चेष्टा करे और सन्तों के निश्चय का अभ्यास करे | हे रामजी! जिसको सन्तों की संगति प्राप्त होती है वह भी सन्त हो जाता है | सन्तों का संग वृथा नहीं जाता | जैसे अग्नि से मिला पदार्थ अग्निरूप होता जाता है, तैसे ही सन्तों के संग से असन्त भी सन्त हो जाता है और मूर्खों की संगति से साधु भी मूर्ख हो जाता है | जैसे उज्ज्वल वस्त्र मल के संग से मलीन हो जाता है तैसे ही मूढ़ का संग करने से साधू भी मूढ़ हो जाता है, क्योंकि पाप के वश से उपद्रव भी होते हैं, इसी से पाप के वश साधु को भी दुर्जनों की संगति से दुर्जनता आनि उदय होती है | इससे हे रामजी! दुर्जन की संगति सर्वथा त्यागनी चाहिये और सन्तों की संगति कर्तव्य है | जो परमहंस सन्त मिले और जो साधु हो और जिसमें एक गुण भी शुभ हो उसको भी अंगीकार कीजिये, परन्तु साधु के दोष विचारिये-उसका शुभगुण ही अंगीकार कीजिये | जैसे भँवरा केतकी के कण्टकों की ओर नहीं देखता, उसकी सुगन्ध को ग्रहण करता है | इससे हे रामजी! संसारमार्ग को त्यागकर सन्तों की संगति करो तब संसारभ्रम निवृत्त हो जावेगा |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तव्यवहारो नाम द्विशताधिकाष्टमस्सर्गः ||208||

अनुक्रम


परमार्थरूप वर्णन

रामजी ने पूछा, हे भगवन्! हमारे दोष तो सत्शास्त्रों, सत्संग और उनकी युक्ति से और  समानदुःख तीर्थ, स्नान, दान, जप और पूजा से निवृत्त होते हैं पर और जीव जो कीट, पतंग, पशु, पक्षी आदिक हैं उनके दुःख कैसे निवृत्त होंगे? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी जो वास्तवसत्ता है उसी का नाम ब्रह्म है और वह अखण्ड अद्वैत है, उसमें कुछ द्वैत का  विभाग नहीं है परन्तु उसमें जो चित्त किंञ्चन अभास फुरा है सो फुरना ही नानात्व हुए  की नाईं स्थित हुआ है वास्तव में कुछ हुआ नहीं | जैसे स्वप्न में स्वप्न की सृष्टि भासती है परन्तु वास्तव कुछ हुई नहीं निद्रादोष से भासती है, तैसे ही जाग्रत् सृष्टि भी कुछ वास्तव नहीं हुई अज्ञान से जीवों को भासती है | वास्तव में सब ब्रह्म रूप है पर अपने स्वरूप के प्रमाद से जीवत्वभाव को अंगीकार किया है | उस अंगीकार करने और अनात्म देहादिक में आत्मअभिमान करके जैसा निश्चय करता है तैसी ही गति पाता है | देश, काल, क्रिया और द्रव्य का जैसा संकल्प अनुभवसत्ता में दृढ़ होता है तैसा ही भासता है | उसमें चार अवस्था कल्पित होती हैं और जैसी-जैसी भावना होती है उसके अनुसार अवस्था का अनुभव होता है | वे चार अवस्था ये हैं-एक घनसुषुप्ति, दूसरी क्षीण सुषुप्ति, तीसरी स्वप्न अवस्था और चौथी जाग्रत् |पर्वत् और पाषाण घन-सुषुप्ति  में है | जैसे सुषुप्ति अवस्था में कुछ नहीं फुरता, जड़ीभूत हो जाता है, तैसे ही इसको कुछ फुरना नहीं फुरता-घनसुषुप्ति में स्थित है | वृक्ष क्षीणसुषुप्ति में स्थित हैं | जैसे क्षीणसुषुप्ति में कुछ फुरना फुरता है, तैसे ही वृक्षों में भी फुरना होता है इससे वे क्षीणसुषुप्ति में हैं | तिर्यक् जो पक्षी, कीट, पतंग, आदि जीव हैं वे स्वप्न अवस्था में स्थित हैं | जैसे स्वप्न में पदार्थ भासता है परन्तु स्पष्ट नहीं भासता तैसे ही इनको थोड़ा सूक्ष्म ज्ञान है इससे वे स्वप्न अवस्था में स्थित हैं | मनुष्य और देवता जाग्रत््रूप जगत् का अनुभव करते हैं | हे रामजी! यह चारों अवस्था आत्मा में स्थित हैं | सबका अहंप्रत्ययरूप आत्मा है-बड़े का क्या और छोटे का क्या | उसमें जैसे संकल्प दृढ़ होता है तैसा ही हो भासता है | हे रामजी | हमको एक दिन व्यतीत होता है और चींटी को उसी में युग का अनुभव होता है, हमको जो सूक्ष्म अणु होता है उनको वही पर्वत के समान भासता है | हे रामजी! स्वरूप सबका एक आत्मसत्ता है परन्तु भावना से भिन्न-भिन्न भासता है | एक कीट है जो बहुत सूक्ष्म है, जब वह चलता है तब जानता है कि मेरा गरुड़ का सा वेग है और उसको वही सत् हो रहा है | बालखिल्य का अंगुष्ठप्रमाण शरीर है उनको वही बड़ा भासता है और विराट् को वही अपना बड़ा शरीर भासता है | निदान जैसी जिसको भावना होती है तैसा ही उसको भासता है | मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी सबका अपना-अपना भिन्न-भिन्न संकल्प है, जैसा संकल्प किसी को दृढ़ हो रहा है उसको तैसा ही स्वरूप भासता है | जैसे मनुष्य राग, द्वेष, भय, क्रोध, लोभ, अहंकार, क्षुधा, तृषा, हर्ष, शोक आदि विकारों में आसक्त होता है, तैसे ही, कीट, पतंग, पक्षी आदि को भी होता परन्तु इतना भेद है कि जैसे हमको यह जगत् स्पष्टरूप भासता है, तैसे उनको नहीं भासता | संसारी सब हैं परन्तु वासना के अनुसार न्यून अधिक भासता है और दुःख का अनुभव स्थावर-जंगम को भी होता है | जब किसी स्थान में अग्नि लगती है और उसमें वृक्ष और पाषाण जलते हैं तब  उनको भी दुःख होता है परन्तु सूक्ष्म-स्थूल का भेद है | जैसे और जीव के शस्त्र प्रहार किये से शरीर नष्ट होने का दुःख होता है, तैसे ही वृक्षादिक को भी होता है परन्तु घनसुषुप्ति, क्षीणसुषुप्ति और स्वप्न-जाग्रत् का भेद है | पर्वत पाषाण को सूक्ष्म दुःख होता है, वृक्ष को पाषाण से विशेष होता है परन्तु स्पष्ट मान और अपमान  का दुःख नहीं होता, स्वप्न की नाईं होता है | मनुष्य और देवताओं को स्पष्ट राग- द्वेष जाग्रत की नाईं होता है, क्योंकि वे जाग्रत् अवस्था में स्थित हैं और वृक्ष, पाषाण आदिक को स्पष्ट दुःख का विकल्प नहीं उठता, क्योंकि वे जड़ता स्वभाव में स्थित हैं पर दुःख तो सबको होता है | और आश्चर्य देखो कि कीट महादुःखी रहते हैं, जब वे मृतक होते हैं तब सुखी होते हैं, अज्ञान से जो इस शरीर में अवस्था हुई है उसको भी मरना बुरा भासता है तो और जीव को भला कैसे लगे | हे रामजी! अपने स्वरूप के प्रमाद से भय, क्रोध, लोभ, मोह, जरा, मृत्यु, क्षुधा, तृषा, राग-द्वेष, हर्ष, शोक, इच्छादिक विकारों की अग्नि से जीव जलते हैं, आत्मानन्द को नहीं प्राप्त होते और घड़ीयन्त्र की नाईं वासना के अनुसार भटकते हैं | जब वासना दृढ़ पाप की होती हे तब जीव पाषाण और वृक्षयोनि पाते हैं और जब क्षीण वासना तामसी होती है तब तिर्यक पक्षी, सर्प और कीटयोनि पाते हैं | हे रामजी! राजसी वासना से जीव मनुष्य होते हैं और सात्त्विकी वासना से देवता होते हैं पर जब मनुष्य शरीर धारकर निर्वासनिक होते हैं तब मुक्ति पाते हैं | जब ज्ञान उत्पन्न होता है तब जीवों  के दुःख नष्ट हो जाते हैं, दुःख के नाश करने का और कोई उपाय नहीं | यह जगत् के दुःख तबतक भासते हैं जबतक आत्मज्ञान नहीं उपजा, जब आत्मज्ञान उपजता है तब जगत्भ्रम सब मिट जाता है | मुझसे पूछो तो वास्तव में कोई देवता है, मनुष्य है, पशु है, पक्षी है, पाषाण है, वृक्ष है और कीट है, सब चिदाकाशरूप हैं दूसरा कुछ नहीं बना भ्रान्ति से नानास्वरूप हो भासता है और सदा सर्वदाकाल सर्व प्रकार आत्मसत्ता आपमें स्थित है | हे रामजी! कुछ जगत् का होना है, अनहोना है, आत्मता शब्द है, परमात्मा शब्द है, मौन है, अमौन है, शून्य है, अशून्य है केवल अचेत चिन्मात्र अपने आप में स्थित है और उसमें जन्म और जन्मान्तर भ्रम से भासते हैं | जैसे स्वप्न से स्वप्नान्तर भ्रम से भासता है और जैसे स्वप्न में एक अपना आप होता है और निद्रादोष से द्वैत भासता है, तैसे ही अब भी आत्मा अद्वैत है पर अविचार से नानात्व भासता है | दुःख भी अज्ञान से भासता है विचार किये से दुःख कुछ नहीं | जो मृतक होकर उत्पन्न होता है तो शान्ति हुई दुःख कोई नहीं और जो मृतक होकर शान्त हो जाता है उपजता नहीं तो भी दुःख कोई नहीं मुक्त हुआ, जो मरता नहीं तो भी ज्यों हुआ दुःख कोई नहीं हुआ और जो सर्व चिदाकाश है तो भी दुःख कोई हुआ | हे रामजी! अज्ञानी के निश्चय में दुःख है पर विचार किये से दुःख कोई नहीं | यह जगत् आत्मरूपी आदर्श में प्रतिबिम्बित है परन्तु यह जगत््रूपी कैसा प्रतिबिम्ब है- जो अकारणरूप है | इसका कारणरूप बिम्ब कोई नहीं कारण से रहित है | जैसे नदी में नीलता का प्रतिबिम्ब पड़ता है सो अकारणरूप है, तैसे ही यह जगत् अकारणरूप है | अज्ञानी को प्रमाददोष से उसमें सत्यता है और ज्ञानी को द्वैत नहीं भासता-अज्ञानी को  द्वैत भासता है | हे रामजी! हमको! तो सदा चिदाकाश भासता है-हम जागे हुए हैं इससे द्वैत नहीं भासता | जैसे सूर्य को अन्धकार नहीं भासता, तैसे ही हमको द्वैत नहीं भासता | जो ज्ञानी है उसको ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं भासता उसे सर्वब्रह्म ही भासता है | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्करणे परमार्थरूपवर्णनन्नाम द्विशताधिकनवमस्सर्गः ||209||

अनुक्रम


नास्तिकवादी निराकरण

श्रीरामजी ने पूछा, हे भगवन्! जो कुछ तुमने कहा है सो तो मैंने जाना परन्तु नास्तिकवादी का कल्याण किस प्रकार होता है, क्योंकि वे कहते हैं कि जबतक जीव है तबतक सुख भोगे और जब मर जावेगा तब भस्मीभूत होवेगा, कहीं आना है, जाना है? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! आत्मसत्ता आकाश की नाईं अखण्ड सर्वत्र पूर्ण है, जबतक उसका भान नहीं होता तबतक मन की तप्तता नहीं नष्ट होती | जब आत्मसत्ता का भान होता है तब शान्ति प्राप्त होती है और आपको अमर जानता है | जिस पुरुष ने अखण्ड निश्चय अंगीकार किया है उसको दुःख स्पर्श नहीं करता वह ब्रह्मदर्शी होता है और जिसको ब्रह्मसत्ता का निश्चय नहीं हुआ उसको मन के ताप नहीं छोड़ते और स्वरूप के प्रमाद से  आपको मरता जानता है पर महाप्रलयरूप आत्मा में सर्व शब्दों का अभाव है | जैसे महा प्रलय में सर्व शब्दों का अभाव होता है, तैसे ही आत्मा में सर्व शब्दों का अभाव है जिसको आत्मा में निश्चय हुआ है उसको सर्व शब्दों का अभाव हो जाता है और वह महा ज्ञानवान् है उसको आत्मसत्ता ही भासती है | जो वास्तव है उसको हमारे उपदेश की आवश्य कता नहीं-वह ज्ञानी है | हे रामजी! आत्मसत्ता में द्वैत जगत् कुछ नहीं बना, पर मार्थ सदा अपने आपमें स्थित है और उसमें जो सृष्टि भासती है सो स्वप्नवत् अकारण है इसलिये ज्ञानवान् पुरुष सर्व शब्द अर्थों को सत् नहीं जानता है | ऐसा पुरुष हमारे उपदेश के योग्य नहीं, क्योंकि सर्वशास्त्रों का सिद्धान्त आत्मपद है,जो उसको जानता है उसको फिर कर्तव्य कुछ नहीं रहता | जिसको ऐसी दशा नहीं प्राप्त हुई वह उपदेश का अधिकारी है | यह जगत् आत्मा का किञ्चन है अज्ञानी को सत्य भासता है और ज्ञानी के निश्चय में कुछ नहीं | जैसे किसी ने संकल्प से एक वृक्ष रचा हो तो उसके पत्र, टास, फूल, फल उसको भासते हैं पर और के मन में शून्य होते हैं, तैसे ही अज्ञानी के निश्चय में जगत् होता है और ज्ञानी के निश्चय में विलास और आत्मा से भिन्न कुछ नहीं | हे रामजी! आत्मसत्ता सर्वत्र और सर्वव्यापी है, उसमें जैसा निश्चय फुरना होता है तो अहंप्रत्यय भावना की दृढ़ता से तैसे ही भासता है | जिस पदार्थ का निरन्तर दृढ़ अभ्यास होता है तो शरीर के त्यागे से भी वही अभ्यास, धारणारूप हो जाता है पर आत्मसत्ता ज्ञानमात्र है और केवल अद्वैत संवित् सबका अपना आप है | जिसको स्वरूप का ज्ञान होता है सो शास्त्रों के दण्ड से रहित होता है | वेद और शास्त्र जिसको भला, बुरा, सच वा झूठ वर्णन करते हैं उसमें जिस पुरुष को निश्चय होता है उसको वासना के अनुसार वे फल देते हैं और जिसके निश्चय में आत्मा से भिन्न सर्व शब्दों का अभाव होता है उसको आत्मा अनात्म विभाग कलना भी नहीं रहती, देह रहे अथवा रहे | हे रामजी! जिसकी संवित् जगत् के शब्द अर्थ में बँधी हुई है उसको पदार्थों में राग-द्वेष उपजता है | जैसे सुषुप्ति में भी आत्म सत्ता है पर अभाव की नाईं स्थित है, तैसे नास्तिकवादी भी अपने जड़स्वरूप को देखते हैं, क्योंकि उनको जड़शून्यता का ही अभ्यास है और उसी से उनकी संवित् दृश्य सुख से बेधी हुई है इससे उनका जगत््भ्रम नहीं मिटता | उस मलीन वासना से जो संवित् मिली है इससे उनको जड़ पत्थररूप प्राप्त होते हैं उस जड़ता को भोगकर वे वासना के अनुसार फिर  दुःख भोगेंगे | उस भावना से जगत् नहीं भासता पर कुछ काल पीछे चैतन्य होकर फिर उन्हीं कर्मों को भोगते हैं | जैसे सूर्य के आगे बादल आवे और फिर निवृत्त हो, तैसे ही जगत् होता है | फुरनरूप जो जीव है उसमें जैसा निश्चय होता है तैसा ही भासता है | जिसको एक आत्मा में निश्चय होता है सो जन्म-मरण आदिक विकार से रहित होता है और जिसको नानास्वरूप जगत् निश्चय होता है सो जन्म-मरण से नहीं छूटता | हे रामजी! जिसकी बुद्धि में पदार्थों का रंग चढ़ता है वह रागद्वेषरूपी नरक से मुक्त नहीं होता और जिसको एक आत्मा का अभ्यास होता है उसको अभ्यास के बल से सब जगत् आत्म त्व भासता है और वह राग-द्वेष से मुक्त होता है | जैसे स्वप्न में किसी को अपना जाग्रत््स्वरूप स्मरण आता है तब वह स्वप्न के सर्वजगत् को अपना आप देखता है, तैसे ही जिसको आत्मज्ञान होता है उसको सर्वजगत् अपना आपही भासता है | सर्वदा काल आत्म सत्ता अनुभवरूप जाग्रत् ज्योति है, जिसको ऐसी आत्मसत्ता में नास्तिभावना होती है वह  ऐसी अवस्था को प्राप्त होता है कि गढ़े में कीट होता है, पाषाण, वृक्ष, पर्वत आदिक स्थावर योनि को प्राप्त होता है और उनमें चिरकाल पर्यन्त रहता है | जब तक बुद्धि को  द्वैत का संयोग होता है तब तक वह जगत्भ्रम देखता है-और भ्रम नहीं मिटता पर जब उसकी संवित को द्वैत का संयोग मिट जावे तब जगत््भ्रम निवृत्त हो जाता है | हे रामजी  सम्यक््ज्ञान से जगत् के भ्रम का अभाव हो जावेगा | अभाव का निश्चय फुरे तब फिर जगत्  नहीं भासता और जब संसार के पदार्थों से संवित् बेधी हुई है तब जैसा निश्चय होगा तैसा ही प्राप्त होगा और उसी निश्चय के अनुसार गति पावेगा | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! नास्तिकवादी का वृत्तान्त तो तुमने कहा सो मैंने जाना पर जिस पुरूष के हृदय  में जगत् की सत्यता स्थित है और जो आत्मबोध के मार्ग से शून्य है और शुद्ध स्वरूप को नहीं जानता उसके मोक्ष की क्या युक्ति है और उसकी क्या अवस्था होती है-मेरे बोध की दृढ़ता के निमित्त कहो? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इसका उत्तर मैंने प्रथम ही तुमसे कहा है पर अब फिर तुमने जो पूछा है इससे फिर कहता हूँ | प्रथम तो पुरुष का अर्थ सुनो | हे रामजी! यह जगत् नेत्रों में स्थित नहीं है, श्रवण में है और नासिका आदि इन्द्रियों में स्थित है-चैतन्य संवित् में स्थित है | चैतन्य संवित् ही पुरुषरूप है , जिस पुरुष को उसमें निश्चय है सो ज्ञानवान है और उसको द्वैतकलना नहीं फुरती और जो प्रत्यक्षदृष्टि भी आती है परन्तु उसके निश्चय में  नहीं होती है | जैसे आकाश में धूलि भी दृष्टि आती है परन्तु स्पर्श नहीं करती, तैसे  ही ज्ञानवान् को द्वैत कलना स्पर्श नहीं करती | जिस चैतन्य संवित् में फुरने का सम्बन्ध है उसको जगत् का आकार भासता है और जिस पुरुष की संवित् में देश, काल, क्रिया और द्रव्य का सम्बन्ध है वह कलंक में दृढ़ हो रहा है और जो अपने वास्तव अद्वैत स्वरूप के अभ्यास से मार्जन नहीं करता वह वास्तव चैतन्य आकाशरूप भी है तो भी कलंक से वासना के अनुसार जगत् उसको आपसे भिन्न भासता है-द्वैतभ्रम है-द्वैतभ्रम नहीं मिटता | हे रामजी! जो पुरुष ऐसा भी है कि देह के इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में सम रहता है, पर उसे आत्मसत्ता ज्यों की त्यों नहीं भासती तो वह अज्ञानी है, आत्म सत्ता जाने बिना उसका संसार निवृत्त नहीं होता | जब आत्मसत्ता का साक्षात्कार होगा तभी सब भ्रम निवृत्त होगा | हे रामजी! यह पुरुष जीव है, फुरन है और शरीर के नाश होने से नाश होता है, यह केवल चिन्मात्रस्वरूप है पर वासना से भ्रम को देखता और शून्यवादी वृक्ष,पर्वत, जड़ादिक योनि पाते हैं | जो सदा अनुभव है उसको त्यागकर जो और को इष्ट मानते हैं वे मूर्ख हैं और उनको आत्मसुख नहीं प्राप्त होता | आत्मा के प्रमाद से अहं, त्वं, भीतर, बाहर आदिक शब्द भासते हैं और जब आत्मज्ञान हुआ तब सर्वशब्द आत्मरूप होजाता है जिन पुरुषों ने आत्म अनात्म को निर्णय करके नहीं देखा वे पुरुषों में नीच हैं और जिस पुरुष ने निर्णय करके आत्मा में अहं प्रतीति की है और अनात्म का त्याग किया है वह महापुरुष है और उसको मेरा नमस्कार है | जिसने अनात्म में अहं प्रतीति की है और आत्मा का त्याग किया है वह बालक है | जैसे आकाश में बादल ही हाथी और घोड़े के आकार हो भासते हैं और समुद्र में तरंग भासते हैं, तैसे ही आत्मा में जगत् भासता है सो द्वैत कुछ नहीं | जैसे स्वप्न के नगर अपने-अपने  अनुभव में स्थित होते हैं-  और बाहर द्वैत की नाईं भासते हैं सो आभाशमात्र हैं , तैसे ही आत्मा में जगत् भासता है सो आभाशमात्र है-वास्तव में कुछ नहीं | जिसको आत्मसत्ता का अनुभव हुआ है उसको जगत् के शब्द-अर्थ और रागद्वेष किसी की कल्पना नहीं रहती और पुण्यपाप का फल उसको नहीं करता | हे रामजी! ज्ञानसंवित् का नाश कदाचित् नहीं होता इससे विश्व भी अनुभव रूप है | इस जगत् का निमित्तकारण और समवाय कारण कोई नहीं, क्योंकि अद्वैत है और जो तुम कहो कि प्रत्यक्ष घटादिक समवाय और निमित्तकारण उपजते दीखते हैं, तो जैसे स्वप्न में कारण कार्य अनहोते भासते हैं तैसे ही यह भी जानो | प्रथम तो स्वप्न में ये बने हुए दृष्टि आते हैं और पीछे कारण से होते दृष्टि आते हैं, तैसे ही यह भी जानो केवल भ्रममात्र है | जैसे स्वप्नदृष्टि का जागे हुए से अभाव होता है, तैसे ही ज्ञान से इसका अभाव हो जाता है यह दीर्घकाल का स्वप्न है इससे जाग्रत कहाता है | जैसे स्वप्न की सृष्टि अपने आप होती है-और निद्रादोष से भिन्न भासती है, तैसे ही यह  जगत् अपना आप है परन्तु अज्ञान से भिन्न भासता है | जाग्रत में ज्ञान से सब अपना आप भासता है इससे राग-द्वेष का अभाव हो जाता है | जैसे चन्द्रमा और चन्द्रमा की चाँदनी  में भेद नहीं तैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं- आत्मा ही जगत््रूप हो भासता है | हे रामजी! तुम अपने अनुभव में स्थित होकर देखो कि सर्व ब्रह्मरूप है जगत् कुछ  नहीं भासता-सर्वात्मरूप है और मध्य है | जैसे शरत्काल का आकाश शुद्ध होता है तैसे ही आत्मसत्ता फुरनेरूपी बादल से परमशुद्ध और शान्तरूप है और उसमें स्थित हुए से मान और मोह का अभाव हो जाता है, किसी पदार्थ की तृष्णा नहीं रहती और प्रारब्धवेग से जो कुछ आन प्राप्त होता है उसको भोगता है | वह आत्मदृष्टि से दुःख से रहित हुआ प्रत्यक्ष आचार करता है, उसको शास्त्र का दण्ड नहीं रहता और परमशान्तरूप विराजता है  

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे नास्तिकवादीनिराकरणंनाम द्विशताधिकदशमस्सर्गः ||210||

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परमउपदेश वर्णन

वशिष्ठजी बोले हे रामजी! मैं चिदाकाशरूप हूँ और दृष्टा दर्शन दृश्य जो त्रिपुटी भासती है सो भी चिदाकाशरूप है | आत्मसत्ता ही त्रिपुटीरूप हो भासती है-दूसरी वस्तु कुछ नहीं | नास्तिकवादी जो कहते हैं कि परलोक कोई नहीं अर्थात् जो कहते हैं कि आत्म सत्ता कोई नहीं सो मूर्ख हैं | हे रामजी! जो अनुभव आत्मसत्ता हो तो नास्तिक किससे सिद्ध हो? जिससे नास्तिकवाद भी सिद्ध होता है सो ही आत्मसत्ता है | जो इष्ट- अनिष्ट पदार्थ में रागद्वेष करते हैं और आत्मा का नाश कहते हैं सो महामूर्ख हैं | जैसे जाग्रत् के प्रमाद से स्वप्न में इष्ट अनिष्ट में राग-देष होता है और इष्ट को ग्रहण करता और अनिष्ट को त्यागता है और जागे से सब अपना ही स्वरूप भासता है और ग्रहण त्याग और राग-द्वेष किसी पदार्थ में नहीं रहता, तैसे ही आत्मा के अज्ञान से किसी पदार्थ में राग होता है और किसी में द्वेष होता है | जब आत्मज्ञान होता है तब सब अपना स्वरूप भासता है और राघद्वेष किसी में नहीं रहता | चित्त के फुरने से जगत् उत्पन्न होता है और चित्त के शान्त हुए लय हो जाता है, इससे जगत् मन में स्थित है और वह मन आत्मा के अज्ञान से हुआ है | जब आत्मज्ञान होता है तब मनुष्य, देवता, हाथी, नाग आदिक स्थावर-जंगम सब आत्मरूप भासता है और रागद्वेष किसी में नहीं रहता | नास्तिकवादी जो नास्ति कहते हैं सो ही नास्ति का साक्षी सिद्ध होता है | जिससे नास्ति भी सिद्ध होता है सो अस्ति आत्मपद है, उस अस्ति अनुभव के इतने नाम शास्त्र कार कहते हैं-सत्, आत्मा, विष्णु, शिव, चिदाकाश, ब्रह्म, अहंब्रह्म और अस्मि | एक कहते हैं कि शून्य ही रहता है और एक कहते हैं कि अस्ति पद रहता है | हे रामजी! ये सर्वसंज्ञा आत्मसत्ता ही की है, सो आत्मसत्ता अपना ही आप स्वरूप है | वही आत्मा मैं हूँ और ये अंग जो मेरे साथ दृष्टि आते हैं इनको इष्ट पदार्थों से लेपन कीजिये अथवा चूर्ण करिये तो मुझको हर्ष और शोक कुछ नहीं | इनके बढ़ने से मैं बढ़ता नहीं और इनके नष्ट हुए मैं नष्ट होता | हे रामजी! तीन शब्द होते हैं कि `मैं जन्मा हूँ' `मैं जीता हूँ' और `मैं मरूँगा' | जो प्रथम हो और उपजे उसको जन्म कहते हैं, मध्य में जीता कहते हैं और फिर नाश हो उसको मृतक कहते हैं, पर आत्मा , में तीनों विकार नहीं हैं | आत्मा उपजा भी नहीं क्योंकि आदि ही सिद्ध है, मृतक भी नहीं होता, क्योंकि अविनाशी है | चैतन्य आकाश सबका अधिष्ठान है और काल का भी अधिष्ठान है फिर उसका कैसे नाश हो? वह तो उदय-अस्त से रहित है! जिससे देश, काल, वस्तु और जगत् का किञ्चन होता है उससे आत्मा का नाश कैसे हो- इससे आत्मा अविनाशी है | हे रामजी! जिस वस्तु को देश, काल का परिच्छेद होता है उसका नाश भी होता है सो देश, काल और वस्तु तीनों आत्मा में कल्पित हैं | जैसे सूर्य की किरणों में जल कल्पित होता है, तैसे ही आत्मा  में तीनों कल्पित हैं | कल्पित वस्तुओं से सत्य का नाश कैसे हो? इससे आत्मा अवि नाशी और अद्वैत है उसमें दूसरी वस्तु कुछ नहीं | जैसे शून्यस्थान में बैताल कल्पित होताहै, तैसे ही आत्मा में जगत् कल्पित है | उस अभावरूप जगत् में प्रमाद से एक का अभाव जानता है और एक का सद्भाव जानता है | जब इस निश्चय को त्यागकर मोक्ष हो तब शान्ति प्राप्त होगी | विचार करके देखिये तो इस संसार में दुःख कहीं नहीं | जो मरके फिर जन्म लेता है तो भी दुःख कहीं हुआ, क्योंकि शरीर जब वृद्ध होकर क्षीण हुआ तब उसको त्यागकर नव तनु को ग्रहण किया तो उत्साह हुआ, जो मृतक होकर फिर नहीं उपजता तो भी आनन्द हुआ क्योंकि जबतक जीता था तबतक ताप था | एक का भाव जानता था, एक को ग्रहण करता था और एक को त्याग करता था तिनसे तपता था | यदि छूटा तो बड़ा आनन्द हुआ और जो सर्वचिदाकाशरूप है तो भी अपना आप आनन्दरूप है दुःख हुआ | हे रामजी! एक प्रमाद से ही दुःख होता है और किसी प्रकार दुःख नहीं होता | यह सब जगत् आत्मरूप है और जो आत्मरूप है तो दुःख कैसे हो? जो तुमकहो कि मैं अपने कर्मों से डरता हूँ, जो परलोक में मुझको भय का कारण होंगे तो ऐसे जानो कि बुरे कर्म का दुःख यहाँ भी होता है और परलोक में भी होगा-इससे बुरे कर्म मत करो | मैं तुमसे ऐसा उपाय कहता हूँ जिससे सर्व दुःख नष्ट हो जावें | वह उपाय यह है कि तुम जानो `मैं नहीं' अथवा ऐसे जानो कि `सर्व मैंही हूँ' और सर्व वासना त्यागकर आपको अविनाशी जानो और आत्मसत्ता में स्थित हो रहो | यह जगत् भी सब तुम्हारा स्वरूप है, जब कि ऐसे आत्मा को जानोगे तब शरीर के त्याग किये से भी कोई दुःख रहेगा और शरीर के होते भी दुःख कहीं नहीं | यदि पूर्व शरीर को त्यागकर नूतन जन्म लिया तो भी आनन्द हुआ, परमशान्ति हुई और जो चिदाकाशरूप है तो भी परमआनन्द हुआ | हे रामजी सर्वप्रकार आनन्द है परन्तु भ्रान्ति से दुःख भासता है | जब स्वरूप का साक्षात्कार होगा तब सर्व जगत् ब्रह्मा नन्दस्वरूप भासेगा | हे रामजी! जिसको आत्मसत्ता का प्रकाश है सो पुरुष सदा आनन्द में मग्न रहता है और प्रकृत आचार को भी करता है परन्तु इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में स्वरूप से चलायमान कदाचित् नहीं होता | जैसे सुमेरु पर्वत वायु से चलायमान नहीं होता तैसे ही ज्ञानी इष्ट-अनिष्ट में चलायमान नहीं होता और परम गम्भीरता में रहता है | इससे जो कुछ आत्मा से भिन्न उत्थान होता है उसको त्यागकर अपने स्वभाव में स्थित हो रहो कि चिन्मात्रसत्ता शरत्काल के आकाशवत् निर्मल है | जब ऐसे स्वच्छ केवल और चिन्मात्र का अनुभव होगा तब जगत् द्वैतरूप होकर भासेगा और व्यवहार में भी द्वैत होगा |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमउपदेशवर्णनं नाम द्विशताधिकैकादशस्सर्गः ||211||

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निर्वाण प्रकरण

रामजी ने पूछा, हे भगवन्! जिन पुरुषों को आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार हुआ है वह  कैसे हो जाते हैं और उनका कैसा आचार होता है सो मुझसे कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जैसे उनकी चेष्टा और जैसे उनका निश्चय है सो सुनो | सबके साथ उनका मित्र भाव होता है, बल्कि पाषाण से भी मित्रभाव होता है | बन्धुओं को वे ऐसे जानते हैं जैसे वन के वृक्ष और पत्र होते हैं और स्त्री-पुत्रादिक के साथ वे ऐसे होते हैं जैसे वन के मृग के पुत्र से होते हैं | जैसे उनमें स्नेह नहीं होता, तैसे ही पुत्रा दिक में भी वे स्नेह नहीं करते और जैसे माता की पुत्र में दया होती है, तैसे ही वे सब पर दया करते हैं-  और निश्चय में उदासीन रहते हैं | जैसे आकाश किसी से स्पर्श नहीं करता, तैसे ही वे किसी से स्पर्श नहीं करते और जो कुछ आपदा है वह उनको परमसुख है | जितने कुछ जगत् में रस हैं सो उनको विरस हो जाते हैं, किसी में वैराग करते हैं और किसी में द्वेष करते हैं | वे तृष्णा करते दृष्टि भी आते हैं परन्तु हृदय से जड़ और पत्थर की नाईं होते हैं, व्यवहार करते भी हैं परन्तु निश्चय में परमशून्य और मौन होते हैं अर्थात् सदा समाधि में स्थित होते हैं | ये सब क्रिया करते दृष्टि आते हैं  सो इस प्रकार करते हैं कि सबको स्तुति करने योग्य हैं | वे यत्न से रहित सब क्रिया का आरम्भ करते भी हैं परन्तु निश्चय से सदा आपको अकर्ता मानते हैं | जो कुछ उन्हें प्रारब्धवेग से प्राप्त होता है, उसको भोगते हैं और देशकाल क्रिया सबको अंगी कार करते हैं | जो परस्त्री आदिक अनिष्ट प्राप्त हों उनका त्याग भी करते हैं परन्तु निश्चय में सदा अकर्ता ज्यों के त्यों रहते हैं और सुख-दुःख की प्राप्ति में  समबुद्धि रहते हैं | प्रकृत आचार में यथाशास्त्र बिचरते हैं परन्तु स्वरूप से कदा चित चलायमान नहीं होते | जैसे फूल के मारने से सुमेरु चलायमान नहीं होता | तैसे ही दुःख-सुख की प्राप्ति में वे चलायमान नहीं होते | वे सदा स्वभावमें स्थित रहते हैं और सुख-दुःख को भोगते भी दृष्टि आते हैं, पर उसके निश्चय में कुछ नहीं होता | जैसे स्फटिकमणि के सम्मुख कोई रंग रखिये तो उसमें भासता है परन्तु उसका रूप कुछ और नहीं हो जाता वह ज्यों की त्यों ही रहती हैं, तैसे ही सुख दुःख के भोग ज्ञानवान्  में भी दृष्टि आते हैं परन्तु वह स्वरूप से कदाचित् चलायमान नहीं होता-चेष्टा वे अज्ञानी की नाईं करते हैं परन्तु निश्चय से परमसमाधि हैं | जैसे अज्ञानी को भविष्यत् का राग-द्रेष, सुख-दुःख कुछ नहीं होता, तैसे ही ज्ञानी को वर्तमान का राग- द्वेष नहीं होता और स्वाभाविक चेष्टा उसकी ऐसे होती है | वह सबसे मित्रभाव रखता है, उसमें कोई खेदवान् होता है और वह किसी से खेदवान् होता है | जब उसको सुख प्राप्त होता है तब रागवान् दृष्टि आता है और दुःख की प्राप्ति में द्वेषवान् दृष्टि आता है परन्तु निश्चय से उसको हर्षशोक कुछ नहीं | जैसे नट स्वाँग लाता है और  जैसे स्वाँग होता है तैसी ही चेष्टा करता है-राजा का स्वाँग हो अथवा दरिद्री का- परन्तु निश्चय उसे अपने स्वरूप में ही होता है, तैसे ही ज्ञानवान् में सुख-दुख दृष्टि आते हैं परन्तु निश्चय उसका आत्मस्वरूप में ही होता है और पुत्र, धन, बान्धव  आदिक को बुद्बुदे की नाईं जानता है | जैसे जल में तरंग और बुद्बुदे होते हैं और फिर  लीन भी हो जाते हैं परन्तु जल को कुछ राग-द्वेष नहीं होता, तैसे ही ज्ञानवान् को रागद्वेष कुछ नहीं होता | वह सब पर दया रखता है और पतित प्रवाह में जो सुख-दुःख आन प्राप्त होता है उसको भोगता है | जैसे वायु दुर्गन्ध-सुगन्ध को साथ ले जाती है, परन्तु उसको राग-द्वेष कुछ नहीं होता तैसे ही ज्ञानवान् को राग-द्वेष कुछ नहीं होता बाहर अज्ञानी की नाईं वह व्यवहार करता है परन्तु निश्चय में जगत् को भ्रान्तिमात्र जानता है अथवा सर्वब्रह्म जानता है | वह सदा स्वभाव में स्थित होता है और अनिच्छित प्रारब्ध को भोगता है परन्तु जाग्रत में सुषुप्ति की नाईं स्थित है, पूर्व और भविष्यत् की चिन्तना नहीं करता और वर्तमान में बिचरता है-वह हृदय से शीतल रहता है और बाहर इष्ट अनिष्ट दृष्टि आते हैं पर हृदय से अद्वैतरूप से | ज्ञान वान् कर्म करता है परन्तु कर्म में अकर्म को जानता है और जीता ही मृतक की नाईं है | हे रामजी! जैसे मृतक होता है और उसको फिर जगत् की कलना नहीं फुरती, तैसे ही जिसको आत्मपद में अहंप्रत्यय हुई है उसको द्वैत नहीं भासता और प्रत्यक्ष व्यवहार उसमें दृष्टि भी आता है परन्तु निश्चय में अर्थ शान्त हो गया है रामजी ने पूछा, हे भगवन्! यह ज्ञानी के लक्षण जो आपने कहे सो उनको वही जानें और कोई नहीं जानता, क्योंकि बाहर की चेष्टा तो अज्ञानी के तुल्य ही है और हृदय से शान्त रूप हैं | ब्रह्मचर्य से भी हृदय में धैर्य होता है और तपस्या से भी रागद्वेष  कुछ नहीं फुरता | एक मिथ्या तपसी हैं कि उसी प्रकार बन बैठते हैं, उनका निश्चय सत्य  है अथवा असत्य है उनको कैसे जानिये? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! यह निश्चय सत्य हो अथवा असत्य हो यह लक्षण सन्त के ही हैं और आत्मा के साक्षात्कार का निश्चय अपने आपसे जानता है और किसी से नहीं जाना जाता इस कारण उसका लक्षण ज्ञानी ही जानता है और कोई नहीं जानता | जैसे सर्प के खोज को सर्प ही जानता है और कोई नहीं जानता, तैसे ही ज्ञानी का लक्षण सुसंवेद्य है | हे रामजी! यह जो गुण कहे हैं सो ज्ञानवान्  में स्वाभाविक ही रहते हैं और दूसरे को यत्नसाध्य है | ज्ञानवान् को सर्व जगत् भ्रान्तिमात्र है अथवा अनुभवदृष्टि से अपना आपही भासता है | इसी कारण से वह परम शान्त है और रागद्वेष उसके निश्चय में नहीं फुरता और अपने निश्चय को बाहर प्रकट करता है पर जो अधिकारी है वह उसको जानता है और जो अनधिकारी अज्ञानी है वह उसको नहीं जान सकता | जैसे वन में चन्दन की बड़ी सुगन्ध होती है परन्तु दूर से नहीं भासती तैसे ही अज्ञानी उसके निश्चय से दूर है इस कारण वह नहीं जान सकता | चर्म दृष्टि से उसको देखे तो नहीं देख सकता और वह अधिकारी बिना जनावता भी नहीं | जैसे अमूल्य चिंतामणि नीच को दीजिये तो भी उसके माहात्म्य को वह नहीं जानता, इससे उसका निरादर करता है, तैसे ही आत्मरूपी चिन्तामणि और अनधिकारी अज्ञानी उसका माहात्म्य नहीं जानता इसका निरादर करता है- इसी कारण ज्ञानवान् प्रकट नहीं करते | हे रामजी! वह जो प्रकट है कि हमको अर्थ की प्राप्ति होगी, हमारा मान होगा, हमारे चेले बनेंगे और हमारी पूजा होगी उसे ज्ञानवान् गन्धर्वनगर और इन्द्रजाल की नाईं जानते हैं, फिर वे किसकी वाञ्छा करें? इस कारण वे अनधिकारी को अपना इष्ट नहीं प्रकट करते और जो कोई निकट बैठता है तो भी अपने निश्चयरूपी अंग को सकुचा लेते हैं | जैसे कछुआ अपने अंगों को सकुचा लेता है तैसे ही वह अपने निश्चयरूपी अंग को सकुचा लेता है पर जिसको अधिकारी देखता है उससे प्रकट करता है | हे रामजी! पात्र में रक्खा शोभता है,  अपात्र में रक्खा अनिष्ट हो जाता है | जैसे गो को घास दिये से क्षीर हो जाता है और सर्प को क्षीर दिये से विष हो जाता है, तैसे ही अधिकारी को दिया उपदेश शुभ होता है और अनिधिकारी को अनिष्ट हो जाता है | हे रामजी! अणिमा आदि ले जो सिद्धियाँ हैं वे जप, द्रव्य, काल अथवा देश से सबको प्राप्त होती हैं और अभ्यास के बल से अज्ञानी को भी प्राप्त होती हैं और ज्ञानी को भी होती हैं परन्तु ये ज्ञान का फल नहीं, जप आदिक का फल है | जिसकी सिद्धि के निमित्त जो पुरुष दृढ़ होकर लगता है वही सिद्ध होता है, जो इन सिद्धियों का दृढ़ अभ्यास करता है तो उनसे आकाशमार्ग में उड़ने और आने-जाने लगता है पर यह पदार्थ तबतक रस देते हैं जबतक आत्ममार्ग से शून्य है | हे रामजी! पर सिद्धता इनसे प्राप्त होती | परमसिद्धि आत्मपद है | जिसको आत्मपद की प्राप्ति हुई है वह इनकी अभिलाषा नहीं करता | ऐसा पदार्थ पृथ्वी में कोई नहीं और आकाश में देवताओं के स्थानों में ही है जिसमें ज्ञानी का चित्त मोहित हो, ज्ञानवान् को सब पदार्थ मृगतृष्णा के जलवत् भासते हैं, मेरे सिद्धान्त में तो यही है कि सदा विषयों से उपराम रहना और आत्मा को परम इष्ट जानना इसी का नाम ज्ञान है | ज्ञानी को जो प्रारब्ध से प्राप्त हो उसको करता है परन्तु करने से उसका कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता और करने में कुछ प्रत्यवाय भी नहीं होता | किसी अर्थ का वह आश्रय करता है, उसके निमित्त किसी भूत का आश्रय करता है और सर्वदा अपने आप स्वभाव में स्थित होता है | ऐसे निश्चय को पाकर वह आश्चर्यवान् होता है और कहता है कि बड़ा आश्चर्य है कि जो सदा अपना आप स्वरूप है उसको विस्मरण करके में इतने काल भ्रमता रहा पर अब मुझको शान्ति प्राप्ति हुई है जगत् को देख के वह हँसता है, क्योंकि यह जगत् आभासरूप है और अपनी ही संवित् में स्थित है | जैसे आरसी में प्रतिबिम्ब स्थित होता है, तैसे ही अपनी संवित् में जगत् स्थित है | उसको जो द्वेत जानता है और रागद्वेष से जलता है ऐसे अज्ञानी को देख कर वह हँसता है और व्यवहार करता भी हँसता है | जैसे किसी ने स्वप्न में हाथ में सुवर्ण दिया और फिर ले लिया और इसने उसको स्वप्न जाना तो चेष्टा करता है परन्तु हँसता है और कहता है कि यह मेरा ही स्वरूप है, तैसे ज्ञानी व्यवहार करता भी अपने निश्चय में हँसता है | जैसे किसी ग्राम में अग्नि लगे और एक पुरुष उस गाँव से निकल कर पर्वत पर जा बैठे तब वह जलतों को देखकर हँसता है, तैसे ही ज्ञानवान् पुरुष भी संसाररूपी जलते नगर से निकल कर आत्मरूपी पर्वत पर जा बैठा है और अज्ञानियों को दग्ध होता देखकर हँसता है अर्थात् आप अशोच होकर उनको अशोच देखता है | हे रामजी! जब ज्ञानवान् बोधदृष्टि से देखता है तब अद्वैतसत्ता भासती है और जब अन्तवाहक में स्थित  होकर देखता है तब जैसे पदार्थ होते हैं तैसे ही उनको देखता है और आपको सदा शान्तरूप देखता है-अर्थ यह कि जो आत्मतत्त्व परमानन्द स्वरूप है उससे भिन्न जितने कुछ पदार्थ  हैं सो सब दोषरूप हैं और सिद्धि से आदि लेकर जितनी क्रिया हैं वे संसार का कारण है जैसे समुद्र में कई तरंग बड़े और कई छोटे होते हैं परन्तु समुद्र ही में हैं जिस तरंग का आश्रय करेगा वह सिद्धता को प्राप्त होवेगा और हलने, डोलने, करने से मुक्त होवेगा, तैसे ही सिद्धता आदिक जो क्रिया हैं वे कहीं बड़े ऐश्वर्य हैं और कहीं छोटे  ऐश्वर्य है परन्तु संसार ही में हैं जो पुरुष इस क्रिया को त्याग कर अन्तर्मुख होगा वह संसाररूपी समुद्र को त्यागकर आत्मरूपी पार को प्राप्त होगा | हे रामजी! जिस पुरुष को जिस पदार्थ का अभ्यास होता है उसको वही प्राप्त होता है | जैसे पाषाण को नित्यप्रति घिसते रहिये तो वह भी चूर्ण हो जाता है, तैसे ही जिस पदार्थ का अभ्यास करता है सो प्राप्त होता है | जिसको अभ्यास से आत्मपद प्राप्त होता है वह सर्वदा परम श्रेष्ठ हो जाता है, सब जगत् से ऊँचे विराजता है और परमदया की खानि होता है | जैसे मेघ समुद्र से जल लेकर वर्षा करते हैं सो जल का स्थान समुद्र ही होता है, तैसे  हि जितने कुछ दया करते दृष्टि आते हैं सो ज्ञान के प्रसाद से ही करते हैं | सर्व दया का स्थान ज्ञानवान् ही है और ज्ञानवान् सबका हृदय है | जो कुछ प्रवाहपतित कार्य आन प्राप्त होता है उसको वह करता है और जो शरीर को दुःख आन प्राप्त होता है उसको ऐसे देखता है जैसे अन्य शरीर को होता है और अपने में सुख-दुःख दोनों का अभाव देखता है | जिनको यह अभ्यास नहीं हुआ वे शरीर के राग-द्वेष से जलते हैं और ज्ञानी को शान्तिमान् देखकर औरों को भी प्रसन्नता उपज आती है | जैसे पुण्य करके जो स्वर्ग को गया है उसको वहाँ इष्ट पदार्थ दृष्ट आते हैं और कल्प वृक्ष की सुन्दरता मञ्जरियाँ और सुन्दर अप्सरा आदिक भासती हैं जिन पदार्थों को देख कर प्रसन्नता उपजती है तैसे ही ज्ञानवान् की संगति में जो पुरुष जाता है उसको प्रसन्नता उपज आती है | जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा शीतलता उपजाता है, तैसे ही ज्ञानवान् की संगति शीतलता उपजाती है | ज्ञानवान् आत्मपद को पाकर आनन्दवान् होता है और वह कभी आनन्द दूर नहीं होता क्योंकि उसको उस आनन्द के आगे अष्टसिद्धियाँ तृण समान भासती हैं | हे रामजी! ऐसे पुरुषों का आचार और जिन स्थानों में वे रहते हैं वह भी सुनो | कई तो एकान्त जा बैठते हैं, कई शुभस्थानों में रहते हैं, कई गृहस्थी ही में रहते हैं, कई अवधूत हुए सबको दुर्वचन कहते हैं, कई तपस्या करते हैं, कई परम ध्यान लगाके बैठते हैं, कई नंगे फिरते हैं, कई बैठे राज्य करते हैं, कई पण्डित होकर उपदेश करते हैं, कई परम मौन धारे हैं, कई पहाड़की कन्दराओं में जा बैठते हैं, कई ब्राह्मण हैं, कई सन्यासी हैं, कई अज्ञानी की नाईं बिचरते हैं, कई नीच पामर होते हैं और कई आकाश में उड़ते हैं और नाना प्रकार की क्रिया करते दृष्ट आते हैं परन्तु सदा अपने स्वरूप में स्थित हैं | हे रामजी! जिसको पुरुष कहते हैं सो देह और इन्द्रियाँ पुरुष नहीं और अन्तःकरण चतुष्टय भी पुरुष नहीं पुरुष केवल चिदाकाशरूप है, वह कुछ करता है और किसी से उनका नाश होता है | जैसे नट स्वाँग ले आता है और सब चेष्टा करता है परन्तु नटभाव से आपको असंग देखता है, तैसे ही ज्ञानवान् व्यवहार भी करते हैं परन्तु आपको अकर्त्ता और असंग देखते हैं, और ऐसा निश्चय रखते हैं कि हम अछेद, अदाह, अक्लेद, अशोष, नित्य, सर्वगत, स्थित अचल और सनातन हैं | हे रामजी! इस प्रकार आत्मा में जिसको अहं प्रतीति हुई है उसका नाश कैसे हो और वह बन्धायमान कैसे हो? वह पुरुष चाहे जैसे आरम्भ करे और चाहे जैसे स्थान में रहे उसको बन्धन कुछ नहीं होता | चाहे वह पाताल में चला जावे, आकाश में उड़ता फिरे अथवा देशान्तरों में भ्रमा फिरे उसको कुछ अधिकता है और कुछ शून्यता है | पहाड़ में चूर्ण हो जावे तो भी वह चूर्ण नहीं होता | यह तो चैतन्य पुरुष है शरीर के  नाश हुए इनका नाश कैसे हो? ऐसे अपने स्वरूप में वह सदा स्थित है और आकाशवत् परम निर्मल, अजर, अमर और शिवपद है इससे हे रामजी! ऐसे जानकर तुम भी अपने स्वरूप में स्थित हो रहो |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिकद्वादशस्सर्गः ||212|

अनुक्रम


सर्वपदार्थभाव वर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! एक भावमात्र है, दूसरा भासमात्र और तीसरा भासितमात्र है भावमात्र केवल चैतन्यमात्र को कहते हैं, उसमें जो चैत्योन्मुखत्व अहंकार का उत्थान हुआ उसका नाम भास है और उसमें जो जगत् हुआ उसका नाम भासित है | भासित कल्पित का नाम है | कल्पित के नाश हुए अधिष्ठान का नाश नहीं होता, जो अधिष्ठान कुछ और भाव हो तो उसका नाश भी होवे सो तो और कुछ बना नहीं | उसके फुरने से तीन संज्ञा हुई है सो फुरना भी उसी का किञ्चन है | आत्मा फुरने फुरने में ज्यों का त्यों है | जैसे स्पन्द और निस्पन्द वायु एक ही है, तैसे ही बोध अबोध में आत्मा एकही है |बोध, अबोध, फुरना, अफुरना एक रूप है | हे रामजी! वह आत्मा किससे और कैसे नाश हो? चैतन्य भी मरता हो तो इसका किञ्चन जगत् कैसे रहे? किञ्चन आभास को कहते हैं, सो आभास अधिष्ठान बिना नहीं होता इससे आत्मा का नाश नहीं होता और तुम जो चैतन्य को भी मरता मानो कि मरके फिर नहीं उपजता तो भी आनन्द हुआ | मेरा भी यही उपदेश है कि चैतन्यता मिटे | जब चैतन्यता उपजती है तब जगत् भासता है और उसके मिटे से आत्मा ही शेष रहेगा | ब्रह्म चैतन्य का तो नाश नहीं होता | जो तुम कहो कि वह चैतन्य नाश हो जाता है-यह और चैतन्य है जिससे जगत् होता है तो हे रामजी अनुभव तो एकही है उसका नाश कैसे मानिये? जैसे बरफ शीतल है चाहे किसी ठौर पान कीजिये वह सबकी शीतल ही है और अग्नि उष्ण ही है चाहे जिस ठौर से स्पर्श कीजिये उष्ण ही अनुभव होता है तैसे ही आत्मा का स्वरूप चैतन्य है | वह एक अखण्डरूप है और जहाँ कोई पदार्थ भासता है उसी चैतन्यता से प्रकाशता है | वह चैतन्यसत्ता स्वच्छ निर्मल और अद्वैत सदा अपने आप में स्थित है; उसका नाश कैसे हो? जो तुम शरीर के नाश हुए आत्मा को नाश होता मानो तो नहीं बनता, क्योंकि शरीर यहाँ अखण्ड पड़ा है और वह परलोक में चेष्टा करता है और पिशाच आदिक का शरीर भी नहीं दृष्टि आता | जो शरीर बिना उसका अभाव होता हो तो उनका भी अभाव हो जाता इससे शरीर के अभाव हुए आत्मा का अभाव नहीं होता, क्योंकि शरीर के मृतक हुए कुछ चेष्टा शरीर से नहीं होती क्योंकि पुर्यष्टक जीवकला में नहीं! शरीर तो अखण्ड पड़ा है उससे कुछ नहीं होता और जीव परलोक में सुख दुःख भोगता है तो शरीर के नाश हुए नाश हुआ | जो तुम कहो कि सब स्वभाव उसमें रहता है तो सर्वदा काल उसको क्यों नहीं देखते उसी समय आपको क्यों मृतक देखते हैं और बान्धव भाई जन सब उसी समय क्यों मृतक जानते हैं और जो तुम कहो कि जीवित धर्म से वेष्टित है इसी से सब अवस्था का अनुभव नहीं करता मृत्यु समय जब जीवत्वभाव नष्ट हो जाता है तब मृतक होता है जो ऐसे हो तो परलोक का अनुभव करे तो ऐसा नहीं है क्योंकि जब शरीरपात  होता है तब सब अवस्था को भी जानता है और परलोक में शब्द होता है उसका अनुभव करता है, अपने के अनुसार सुख दुःख भोगता है और देश स्थान को प्राप्त होता है | यह वार्त्ता शास्त्र से भी प्रसिद्ध है और अनुभव करके भी प्रसिद्ध है कि मृतक को किसी ने नहीं जाना और अभाव को किसी ने नहीं जाना और जिसने जाना वह आत्मा एक अखण्ड है-इससे हे रामजी! शरीर के नाश में आत्मा का नाश नहीं होता वह तो नित्य शुद्ध है और जैसा निश्चय उसमें होता है तैसा ही हो भासता है और जैसा मिलता है तैसा प्रकाशता है | ऐसा जो सत्य आत्मा है वह किसी में बन्धायमान नहीं होता जैसे रस्सी में सर्प आकार भासता है पर वह रस्सी सर्प तो नहीं हो जाती जब कल्पित सर्प का अभाव हो जाता है तब रस्सी ज्यों की त्यों रहती है, तैसे ही आत्मसत्ता आकार हो भासती है परन्तु आकार तो नहीं होती जब आकार का अभाव हो जाता है- तब आत्मसत्ता ज्यों की त्यों रहती है इसी कारण बन्धायमान नहीं होती | ऐसी आत्मसत्ता में जो विकार भासते हैं सो भ्रममात्र हैं और भ्रान्ति से ही लोग दुःख पाते हैं | हे  रामजी! वह जगत् आभासमात्र हैं और उस आभासमात्र में जो राग द्वेष आदिक फुरते हैं उनकी निवृत्ति का उपाय मैं तुमसे कहता हूँ | जो कुछ उपदेश मैंने किया है उसके विचारने से भ्रान्ति निवृत्त हो जावेगी और आत्मपद की प्राप्ति होगी | अभ्यास बिना आत्मपद की प्राप्ति चाहे तो कदाचित् होगी, जब बारम्बार अभ्यास करेगा तब द्वेतभ्रम मिट जावेगा और आत्मपद प्राप्त होगा | जिसका कोई नित्य अभ्यास करता है और उसका यत्न भी करता है सो प्राप्त होता है | वह कौन पदार्थ है जो अभ्यास से प्राप्त हो जो थककर फिरे नहीं और दृढ़ अभ्यास करे तो प्राप्त होता ही है | राज्य की लक्ष्मी तब  प्राप्त होती है जब रण में दृढ़ होकर युद्ध करते हैं और जय होती है और केवल मुख से कहे कि मेरी जय हो तो नहीं होती, तैसेही आत्मपद भी तब प्राप्त होगा जब दृढ़ अभ्यास करोगे-अभ्यास बिना कहनेमात्र से प्राप्त नहीं होता | हे रामजी! इस मन के दो प्रवाह  है एक जगत् का कारण है और दूसरा स्वरूप की प्राप्ति का कारण है | जो असत्यशास्त्र हैं और जिनमें आत्मज्ञान प्रत्यक्ष नहीं कहा उनको त्यागो | यह जो महारामायण मोक्ष उपाय है उसमें चार वेद षट्शास्त्र और सर्व इतिहास और पुराणों का सिद्धान्त मैंने कहा है और इसके समान और किसी ने कहा है कोई कहेगा | ऐसा जो शास्त्र है इसके विचार में मन को लगावो तो शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त होगे | हे रामजी! आत्मज्ञान वर और शाप की नाईं नहीं कि कहनेमात्र से सिद्ध हो, इसकी प्राप्ति तब होगी जब बारम्बार विचार करके दृढ़ अभ्यास करोगे और जब इसकी भावना होगी तब मुक्ति को प्राप्त होगे | ऐसा कल्याण पिता, माता और मित्र भी करेंगे और तीर्थ आदिक सुकृत से भी होगा जैसा कल्याण बारम्बार विचारने से मेरा उपदेश करेगा इससे और सब उपायों को त्यागकर इसी का विचार करो तो सब भ्रान्ति मिट जावेगी और शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होगी | हे रामजी! अज्ञानरूप विसूचिका रोग है और उसमें पड़ जीव जलते हैं | जो हमारे शास्त्र को विचारेगा उसका रोग नष्ट हो जावेगा | ईश्वर की यह महामाया है कि मिथ्या भ्रमसे जीव दुःखी होते हैं | जो अपना दुःख नाश करना चाहे वह मेरा शास्त्र बिचारे | जितने सुन्दर पदार्थ दृष्टि आते हैं वे सब मिथ्या हैं और उनके निमित्त यत्न करना परम आपदा है | यह सब पदार्थ आपातरमणीय हैं जो देखनेमात्र सुन्दर हैं पर भीतर से शून्य हैं | इनकी प्राप्ति में मूर्ख आनन्द मानते हैं | हे रामजी! यह पदार्थ तब तक सुन्दर भासते हैं जबतक मृत्यु नहीं आई, जब मृत्यु आवेगी तब सब क्रिया रह जावेंगी इसलिए इनके निमित्त जो यत्न करते हैं वे मूर्ख हैं | जिस काल में मृत्यु आती है उस काल कष्ट प्राप्त होता है और यदि चन्दन का लेप कीजिये तो भी शीतल नहीं होता | जिस द्रव्य के निमित्त जीव बड़े यत्न करता है, युद्ध करता है और प्राण त्यागता है सो धन स्थित नहीं रहता एक दिन धन और प्राणी का वियोग हो जाता है और जब वियोग होता है तब कष्ट पाता है | मैं ऐसा उपाय कहता हूँ जिसमें यत्न भी थोड़ा हो और सुगमता से आत्मपद प्राप्त हो | जब शास्त्र के अर्थ में दृढ़ अभ्यास होता है तब वह अजर, अमर पद प्राप्त होता है, इससे तुम बोधवान् हो और बोध करके अभ्यास का यत्न करो | जो यत्न करोगे तो अज्ञानरूपी शत्रु लातें मारेगा, यदि उस शत्रु को मारना हो  तो निर्माण और निर्मोह होकर आत्मपद का अभ्यास करो | हे रामजी! जो पुरुष अबतक अज्ञानरूपी शत्रु के मारने और आत्मपद पाने का यत्न नहीं करते वे परम कष्ट पावेंगे और संसाररूपी दुःख से कदाचित् मुक्त होंगे | इस कष्ट से निकलने का यही उपाय है कि महारामायण ब्रह्मविद्या का जो उपदेश है उसको विचार करके अपने हृदय में धारणा करें | इस उपाय से भ्रान्ति मिट जावेगी | यह महारामायण उपदेश सर्वसिद्धान्तो का सार  है, और शास्त्रों से आत्मपद को प्राप्त हो अथवा भी हो परन्तु इसके विचार से अवश्य आत्मा को प्राप्त होगा | जैसे तिल की खली से तेल निकलना कठिन है और तिलों से तेल निकालिये तो निकलता है, तैसे ही मेरा उपदेश तिल की नाईं है और इतर खली की नाईं है | हे रामजी! सम्पूर्ण शास्त्रों के मुख्य सिद्धान्तों का सार जो सिद्धान्त है सो मैंने तुमसे कहा है | जो  आत्मा सदा विद्यमान है उसको लोग भ्रान्ति से अविद्यमान जानते हैं इसलिए उसी के विद्यमान करने को सर्वशास्त्र प्रवर्त्तते हैं पर जो उसके विचार से आत्मपद को विद्यमान नहीं जानता वह मेरे उपदेश के विचारने से अवश्य आत्मपद को विद्यमान जानेगा यह निश्चय है | हे रामजी! और शास्त्रों के दृढ़ विचार और यत्न से जो सिद्धि होती है सो इस शास्त्र के विचार से सुख से ही प्राप्त होगी | शास्त्रकर्ता का और लक्षण  बिचारना पर शास्त्र की युक्ति विचार देखनी है | जो कुछ सर्व शास्त्र का सार सिद्धान्त है सो मैंने तुमसे सुगममार्ग से कहा है |इसके विचार से इसकी युक्ति देखो अज्ञानी जो कुछ मुझको कहते हैं और हँसते हैं सो मैं सबही जानता हूँ परन्तु मेरा जो दया का स्वभाव है इससे मैं चाहता हूँ कि किसी प्रकार वे नरकरूप संसार से निकलें और इसी कारण मैं उपदेश करता हूँ | हे रामजी! मैं जो तुमको उपदेश करता हूँ सो किसी अपने अर्थ के निमित्त नहीं करता कि मेरा कुछ अर्थ सिद्ध हो | जो कोई तुमको उपदेश करता है सो सुनो, तुम्हारा जो कोई बड़ा पुण्य है वही शुद्ध संवित् होकर मलीन संवित् को उपदेश करता है | वह संवित् देवता है, मनुष्य है, यक्ष है, राक्षस  है और पिशाच आदिक भी नहीं है, केवल जो ज्ञानमात्र है सो तुमहीं हो, मैं भी वही हूँ और जगत् भी वही है और जो सर्व वही है तो वासना किसकी करनी है | हे रामजी! जीव को दुःख का कारण वासना ही है जो पुरुष इस संसार बन्धन के दुःख की चिकित्सा अब करेगा वह आत्महत्यारा है और बड़े दुःख में जा पड़ेगा जहाँ से निकलने की सामर्थ्य होगी इससे अबहीं उपाय करो | जबतक सर्वभाव की वासना निवृत्त नहीं होती तबतक स्वरूप का साक्षात्कार नहीं होता-इसी का नाम बन्धन है | जब वासना क्षय होगी तब आत्मपद की प्राप्ति होगी | जितने पदार्थ भासते हैं वे सब अविचार सिद्ध हैं, विचार किये से कुछ नहीं रहते, और जो विचार किये से रहें उनकी अभिलाषा करनी व्यर्थ है | जो वस्तु होती है उसके पाने का यत्न भी कीजिये तो बनता है और जो वस्तु हो ही नहीं उसके निमित्त यत्न करना मूर्खता है | यह जगत् के पदार्थ असत्यरूप हैं | जैसे शशे के  सींग असत् हैं और मरुस्थल की नदी असत् होती है तैसे ही यह जगत् असत् है | जो सम्यक्दर्शी ज्ञानवान् पुरुष है वह जानता है कि यह जगत् शशे के सींगवत् असत् और भ्रान्तिमात्र है इसलिये इसके निमित्त यत्न करना मूर्खता है | जो पदार्थ कारण बिना दृष्टि आवे उसको भ्रान्तिमात्र जानिये | आत्मा जगत् का कारण नहीं इससे जगत् मिथ्या है | आत्मपद सब इन्द्रियों और मन से अतीत है और जगत् पाञ्चभौतिक है | जगत् मन और इन्द्रियों का विषय है और आत्मपद मन और इन्द्रियों का विषय नहीं तो उसे जगत् का कारण कैसे कहिये? जो अशब्दपद है सो नाना प्रकार शब्द का कारण कैसे हो और जो निराकार आत्मपद है सो पृथ्वी आदिक नाना प्रकार के भूत आकारों का कारण कैसे हो? हे रामजी! जैसा कारण होता है उससे तैसा ही कार्य उपजता है, आत्मा निराकार है और जगत् साकार है इसलिये निराकार साकार का कारण कैसे हो? जैसे वट का बीज साकार होता है इसलिये उसका कार्य वट भी साकार होता है और साकार से निराकार कार्य तो नहीं होता, तैसे ही निराकार से साकार कार्य भी नहीं होता | इससे इस जगत् का कारण आत्मा नहीं और समवाय कारण है, निमित्त कारण है | निमित्त कारण तब होता है जब कुछ द्वितीय वस्तु होती है | जैसे मृत्तिका से कुलाल घट बनाता है | पर आत्मा तो अद्वैत है वह निमित्त कारण कैसे हो? और समवाय कारण भी तब होता है जब साकार वस्तु होती है-जैसे मृत्तिका परिणाम से घट होता है-पर आत्मा निराकार अपरिणामी है जगत् का कारण कैसे हो? दोनों कारणों से जो रहित भासे उसे जानिये कि भ्रान्तिमात्र है जैसे स्वप्ने में नाना प्रकार के आकार भासते हैं सो कारण बिना भासते हैं इसलिये वे भ्रान्तिमात्र हैं, तैसे ही यह जगत् भी कारण बिना भ्रान्तिमात्र भासता है | आत्मा में जगत् कदाचित् नहीं हुआ | जैसे प्रकाश में तम नहीं होता, तैसे ही आत्मा में जगत् नहीं | यदि तुम कहो कि तो फिर भासता क्या है सो उसी का किञ्चन भासता है जो वही रूप है जैसे चलती है तो भी वायु है और ठहरती है तो भी वायु है, चलने और ठहरने में कुछ भेद नहीं होता और जैसे आकाश और शून्यता में भेद कुछ नहीं होता तैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं-वही आत्मसत्ता फुरने से जगत््रूप हो भासती है | जैसै जल और तरंग में कुछ भेद नहीं, तैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं और कुछ द्वैत वस्तु है नहीं जो लोग कहते हैं कि जगत् कर्मों से होता है सो असत्य है, क्योंकि कर्म भी बुद्धि से होते हैं सो आत्मा में बुद्धि ही नहीं तो कर्म कैसे हो और जो कर्म ही नहीं तो जगत् कैसे हो? जैसे शशे के सींग के धनुष से बाण चलाना असत्य है, तैसे ही कर्म से जगत् का होना असत्य है | एक कहते हैं कि सूक्ष्म परमाणु से जगत् हो जाता है पर यह भी असत्य है, क्योंकि जो सूक्ष्म परमाणु परिणाम से जगत््रूप हुए होते तो बुद्धिरूप जगत् भासता पर यह तो बुद्धिरूप क्रिया होती दृष्टि आती है | जो परमाणु से जगत् होता तो इनहीं से बड़ता जाता, क्योंकि जो परमाणु जड़ हैं वही बढ़ते हैं पर ऐसे तो नहीं होता बुद्धिपूर्वक चेष्टा होती दृष्टि आती है, इसी से कहा है कि वे असत्य कहते हैं, क्योंकि सूक्ष्म भी किसी से उत्पन्न हुआ चाहिये और कोई उसके रहने का स्थान भी चाहिये पर आत्मा में देश, काल और वस्तु तीनों कल्पित हैं | जो आत्मा में ये हुए तो परमाणु कैसे हो और जगत् कैसे हो? आत्मा अद्वैत है इससे जगत् उपजा है और नष्ट होता है | जो जगत् उपजा होता तो नष्ट भी होता, जो उपजा ही नहीं तो वह नष्ट कैसे हो? आत्मसत्ता ज्यों का त्यों अपने आपमें स्थित है | इससे हे रामजी! मैं, तुम और सब जगत् आकाशरूप है किसी के साथ आकार नहीं-सब निराकाररूप है | जो तुम कहो कि फिर बोलते-चालते क्यों हैं? तो जैसे स्वप्ने में सब आकाशरूप होते हैं पर नाना प्रकार की चेष्टा करते दृष्टि आते हैं और बोलते-चालते हैं, तैसे ही यह भी बोलते चालते हैं परन्तु आकाशरूप हैं | तुम्हारा जो स्वरूप है सो भी सुनो | देश को त्यागकर देशान्तर को जो संवित् जाता है उसके मध्य जो ज्ञानसंवित् है वही तुम्हारा स्वरूप है | वह अनामय और सर्व दुःख से रहित है | जैसे जब जाग्रत् दशा को त्यागकर जीव स्वप्ने में जाता है तो जाग्रत् त्याग दिया हो और स्वप्ना आया हो मध्य में जो अचेत चिन्मात्र सत्ता है वही तुम्हारा स्वरूप है, उसमें पण्डितों और ज्ञानवानों का निश्चय है और ब्रह्मा, विष्णु रुद्रादिक उसी में स्थित रहते हैं उनको कदाचित् उत्थान नहीं होता | जैसे बरफ से अग्नि कदाचित् नहीं उपजती, तैसे ही उनको स्वरूप से उत्थान कदाचित् नहीं होता | वह आत्मसत्ता उपजती है, विनशती है और और की ओर होती है-सर्वदा अपने स्वभाव में स्थित है | हे रामजी! जितना कुछ जगत् तुम देखते हो सो वास्तव में कुछ उपजा नहीं-भ्रम से भासता है | जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के आरम्भ होते दृष्टि आते हैं और जागे से उनका अत्यन्त अभाव भासता है, तैसे ही यह जगत् भी है | आदि जो अद्वैत तत्त्व में स्वप्ना हुआ है उसमें ब्रह्मा उपजे और उन्होंने आगे जगत् रचा सो ब्रह्मा भी आकाशरूप है स्वरूप से भिन्न कुछ नहीं हुआ-सब असत्य रूप है | जैसे स्वप्न में नदी और पर्वत दृष्टि आते हैं परन्तु कुछ उपजे नहीं, अनुभवसत्ता ही ज्यों की त्यों स्थित है, तैसे ही ब्रह्मा से आदि तृणपर्यन्त जगत् सब असत्यरूप है जिसको तुम ब्रह्मा कहते हो वह वास्तव में कुछ उपजे नहीं तो जगत् की उत्पत्ति मैं तुमसे कैसे कहूँ? जैसे मरुस्थल की नदी ही उपजी नहीं तो उसमें मछलियाँ कैसे कहिये? तैसे ही आदि ब्रह्मा नहीं उपजा तो उसमें जगत् कैसे उपजा कहिये? केवल आत्मा चैतन्यसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है और यह जगत् भी वही रूप है परन्तु अज्ञान से विपर्ययरूप भासता है | जैसे स्वप्न में पुरुष अनुभवरूप होता है और अपने प्रमाद से नाना प्रकार के पदार्थ और पर्वत,जल, पृथ्वी, जन्म, मरणादिक विकार देखता है परन्तु हुआ कुछ नहीं आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों स्थित है और अज्ञान से भासते हैं, तैसे ही इस जगत् को भी जानो-आत्मसत्ता से भिन्न कुछ नहीं सब चिदाकाश रूप हैं और अज्ञान से आत्मसत्ता ही जगत््रूप हो भासती है | इससे हे रामजी | जिसके ज्ञान से निवृत्त हो जाता है ऐसे आत्मतत्त्व के पाने का यत्न करो | वह नित्य शुद्ध और परमानन्दस्वरूप है और सदा अपने स्वभाव में स्थित है और वही तुम्हारा अनुभवस्वरूप है जो सदा अनुभव करके प्रकाशता है और उसमें स्थित होने में क्या कायरता करनी है? हे रामजी! जितना प्रपञ्च है सो सब भ्रान्तिमात्र है | जैसे रस्सी में सर्प भ्रान्तिमात्र है तैसे ही आत्मा में जगत् भ्रममात्र है इससे उसको त्यागकर अपने स्वभाव में स्थित हो |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सर्वपदार्थभाववर्णनं नाम त्रयदशाधिकद्विशततमस्सर्गः ||213||

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जाग्रत््स्वप्नैकताप्रतिपादन

वसिष्ठजी बोले! हे रामजी! जिस प्रकार यह जगत् आभास फुरा है और भासता है सो भी सुनो | आदि जो शुद्ध अचेत चिन्मात्र है उसमें जब चेतनता फुरती है तब वह वेदन होती है और उसमें शब्दतन्मात्रा होती है फिर उसमें आकाश उत्पन्न होता है और फिर स्पर्श की इच्छा होती है तब वायु उपजती है | जब आकाश में उत्थान होता है तब उस वायु और आकाश के संघर्षभाव से अग्नि उपजती है और जब अग्नि में उष्णस्वभाव होता है तब जल उत्पन्न होता है अर्थात् जब तेज की अधिकता होती है तब जल उत्पन्न हो आता है | जब स्वेदवत् जल बहुत इकट्ठा होता है तब उसमें पृथ्वी उत्पन्न होती है इस प्रकार आकाश और वायु से जल और पृथ्वी ये उत्पन्न होते हैं तब तत्त्वों से शरीर उपजते हैं और स्थावर जंगम और नाना प्रकार का जगत् दृष्टि आता है सो सब पाञ्चभौतिक है और वास्तव में पञ्चभूत हैं, कोई उपजता है और नष्ट होता है केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है | जैसे स्वप्न में नाना प्रकार का जगत् आरम्भ परिणाम सहित भासता है परन्तु वास्तव में कुछ उपजा नहीं आत्मसत्ता ही जगत् आरम्भ परिणाम सहित भासता है परन्तु वास्तव में कुछ उपजा नहीं आत्मसत्ता ही चित्त के फुरने से जगत््रूप हो भासती  है, तैसे ही यह जाग्रत् जगत् भी जानो | हे रामजी! यह जगत् सब अनुभवरूप है पर भ्रम करके आकारसहित भासता है और जब भली प्रकार विचार के देखिये- तब जगत्भ्रम मिट जाता है केवल चैतन्य आत्म तत्त्वमात्र शेष रहता है | जैसे निद्रा दोष से स्वप्ने में नाना प्रकार के क्षोभ भासते हैं और जब जागता है तब एक अपना आपही भासता है, तैसे ही आत्मसत्ता में जागे से अद्वैत ही अद्वैत भान होता है | हे राम जी! जो बोधसमय में द्वैत कुछ भासे तो अबोध समय भी जानिये कि द्वैत कुछ नहीं हुआ और जो बोध के समय सत्य भासे तो जानिये कि सर्वदाकाल यही सत्ता है | हे रामजी! यह निश्चय धारो कि जगत् कुछ वस्तु नहीं-जैसे आकाश में नीलता, किरणों में जल और रस्सी में सर्प भासता है, तैसे ही आत्मा जगत् भासता है और विचार किये से कुछ नहीं पाया जाता | हे रामजी! अपनी कल्पना ही जीव को जगत््रूप हो भासती है और कुछ नहीं | जैसे स्वप्ने की सृष्टि अपनी कल्पनारूप है परन्तु निद्रादोष से भिन्न हो भासती है और उसमें राग-द्वेष उपजता है पर जागे से सब क्षोभ मिट जाते हैं, तैसे ही अज्ञान से जगत् सत्य भासता है और उसमें रागद्वेष भासते हैं-ज्ञान से सब शान्त हो जाते हैं | हे रामजी! यह जगत् भ्रममात्र है, ज्ञानवान् के निश्चय में सब चिदाकाश है और अज्ञानी के निश्चय में जगत् है | यदि बड़े क्षोभ प्राप्त हों तो भी ज्ञानवान्  को चला नहीं सकते क्योंकि उसके निश्चय में कुछ द्वैत नहीं फुरता, वह सदा एकरस रहता है यदि प्रलयकाल के मेघ गर्जे, समुद्र उछलें और पहाड़ के ऊपर पहाड़ पड़े, ऐसे भयानक शब्द हों तो भी ज्ञानवान् के निश्चय में कुछ द्वैत नहीं फुरता |जैसे कोई पुरुष सोया  पड़ा हो तो उसके स्वप्न में बड़े क्षोभ होते हैं और जाग्रत् निकट बैठे भी नहीं भासते, तैसे ही ज्ञानवान् के निश्चय में द्वैत कुछ नहीं भासता, क्योंकि है नहीं और अज्ञानी को होते भासते हैं | जैसे बन्ध्या स्त्री स्वप्ने में अपने पुत्र को देखती है सो अनहोता भ्रम से उसको भासता है तैसे ही अज्ञानी को अनहोता जगत् सत्य होकर भासता है | हे रामजी! भ्रम से अनहोता जगत् भासता है और होते का अभाव भासता है | जैसे बन्ध्या अनहोते पुत्र को देखती है और पुत्रवाली स्वप्न में पुत्र का अभाव  देखती है, तैसे ही अज्ञान से अनहोता जगत् सत् भासता है- और सदा अनुभवरूप आत्मा का अभाव भासता है सो भ्रम से ही और का और भासता है | जैसे दिन में सोया हुआ स्वप्ने में रात्रि देखता है और रात्रि को सोया हुआ स्वप्ने में दिन देखता है, शून्यस्थान में नाना प्रकार के व्यवहार और अन्धकार में प्रकाश देखता है सो भ्रम से ही देखता है और पृथ्वी पर सोया है और स्वप्ने में आकाश पर दौड़ता फिरता है और आपको गढ़े में गिरता देखता है सो भी भ्रम से ही भासता है, तैसे ही यह जगत् को विपर्ययरूप भ्रम से ही देखता है | जाग्रत् और स्वप्न में कुछ भेद नहीं, जैसे स्वप्ने में मुये भी बोलते चालते दृष्टि आते हैं | हे रामजी! जैसे स्वप्ने में तुमको नाना प्रकार का जगत् भासता है और जागकर कहते हो तब भ्रममात्र था, तैसे ही हमको यह जाग्रत् जगत् भ्रममात्र भासा है | जैसे जल और तरंग में कुछ भेद नहीं, तैसे ही जाग्रत् और स्वप्ने में कुछ भेद नहीं | जैसे दो मनुष्य एक ही से होते हैं और दो सूर्य हों तो उनमें कुछ भेद नहीं होता, तैसे ही जाग्रत और स्वप्ने में कुछ भेद जानना | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! स्वप्ने की प्रतिभा अल्पमात्र भासती है और शीघ्र ही जागकर कहता है कि भ्रममात्र थी और जाग्रत दृढ़ होकर भासती है पर तुम दोनों को समान कैसे कहते हो? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जिस प्रतिभा का प्रत्यक्ष अनुभव होता है सो जाग्रत् कहाती है और जिसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता और चित्त में स्मृति होती है वह स्वप्ना है | वह जाग्रत और स्वप्ना दो प्रकार का है जिसका प्रत्यक्ष अनुभव होता है वह जाग्रत् है और उसमें जब सो गया तब स्वप्ना हुआ उस स्वप्ने में जगत् भासि आया तो जहाँ जगत् भासि आया वही उसकी जाग्रत हो गई और जहाँ से सोया था वह स्वप्ना हो गया | वहाँ जो स्वप्ना भासित हुआ उसको जाग्रत जानों और लोगों से चेष्टा करने लगा जब वहाँ से मृतक हो गया फिर उसमें आया तो पिछले को स्वप्ना जानने लगा तो चित्त के भ्रम से स्वप्ने को जाग्रत देखा और जाग्रत् को स्वप्ना देखा | हे रामजी! यह क्या हुआ? जैसे किसी को स्वप्ना आया और उसमें अपनी चेष्टा और व्यवहार करने लगा और फिर उसमें स्वप्ना हुआ उस स्वप्नान्तर से जागा फिर उस स्वप्ने में आया तो उसको स्वप्ना जानने लगा और उस स्वप्ने को जाग्रत् जानने लगा | हे रामजी! जैसे वह स्वप्नान्तर से जागकर उसको स्वप्ना कहता है और स्वप्ने को  जाग्रत् कहता है, तैसे ही यहाँ जाग्रत् स्वप्नारूप है और आगे जो होता है वह स्वप्ना न्तर है | एक और प्रकार है कि जो इस जाग्रत् में मृतक हुआ शरीर छूट गया तब परलोक देखता है सो परलोक जाग्रत् हो गया और इस जाग्रत को स्वप्ना जानने लगा | जैसे स्वप्न से जागा स्वप्ने को भ्रम कहता है, तैसे ही इस जाग्रत् को परलोक में भ्रम जानता है | फिर परलोक में स्वप्ना आया तब परलोक की जाग्रत् स्वप्नवत् हो गई और जो स्वप्ने में सृष्टि भासी उसको जाग्रत् जानता है | फिर वहाँ से मृतक होकर यहाँ आया तब यह जाग्रत् हो गई और परलोक स्वप्ना हो गया | इससे हे रामजी! स्वप्ना और जाग्रत् दोनों मिथ्या हैं | जब मूर्ख स्वप्ने से जागते हैं तब वे जानते कि इसका नाम जागना है और इसको जाग्रत् मानते हैं और उसको स्वप्ना जानते हैं | पर वास्तव में वह स्वप्नान्तर है और यह स्वप्ना है | इसमें जो तीव्रसंवेग हो रहा है इससे उसको जाग्रत जानते हैं और उसको स्वप्ना जानते हैं पर दोनों तुल्य हैं कुछ भेद नहीं | आत्मा में दोनों असत्यरूपी हैं और इनकी प्रतिभा भ्रममात्र भासती है | आत्मा कदाचित् उपजता है, मरता है और उपजता भी है और मरता भी है | उपजता इस कारण से नहीं कि पूर्व सिद्ध है और मरता इस कारण नहीं कि भविष्यत्काल में भी सिद्ध है | परलोक में सुख-दुःख भोगता है और भ्रमकाल में जन्मता भी है और मरता भी है सो प्रत्यक्ष भासता है पर वास्तव में ज्यों का त्यों है | हे रामजी! यह जगत् उसका आभास है और चैत्य का चमत्कार चैतन्य होकर भासता है | जैसे घट मृत्तिकारूप है-मृत्तिका से भिन्न नहीं, तै से ही चेतन भी चैतन्यरूप है | चैतन्य से भिन्न जगत् नहीं-स्थावर-जंगम जगत् सब चिन्मात्र है | हे रामजी! जैसे तुमको स्वप्ना आता है और उसमें पत्थर और पहाड़ भासते है सो तुम्हारा ही अनुभवरूप है भिन्न तो नहीं तैसे ही यह दृश्य सब चिन्मात्र रूप है | जैसे घट मृत्तिका से भिन्न नहीं , तैसे ही जगत् चिदाकाश से भिन्न नहीं | जैसे काष्ठ के पात्र काष्ठ से भिन्न नहीं सब काष्ठ ही रूप हैं तैसे ही चैतन्यरूप है चैतन्य से भिन्न नहीं | जैसे पाषाण की मूर्ति पाषाणरूप है, तैसे ही जगत् भी चैतन्य रूप है जैसे समुद्र ही तरंगरूप हो भासता है, तैसे ही चैतन्यरूप हो भासता है जैसे अग्नि उष्णरूप है, तैसे ही चैत्यचैतन्यरूप है जैसे वायु स्पन्दरूप है तैसे चैतन्य चैत्यरूप है जैसे वायु निस्स्पन्दरूप है तैसे चैतन्य चैत्यरूप है, जैसे पृथ्वी घन रूप होती है और आकाश शून्यरूप होता है- जहाँ शून्यता है वहाँ आकाश है-तैसे ही जहाँ चैतन्य है | जैसे स्वप्न में शुद्ध संवित् पहाड़ और नदियाँ रूप हो भासती हैं, तैसे ही चिन्मात्रसत्ता जगत््रूप हो भासती है | हे रामजी! जो कुछ पदार्थ तुमको भासते हैं उनका त्याग कर आत्मा की ओर देखो | यह सब विश्व आत्मरूप है शुद्ध चिदाकाशरूप निर्दुःख आकाश से भी निर्मल है, ऐसे जानकर उसमें स्थित हो | हे रामजी! जब तुमको स्वभावसत्ता का अनुभव साक्षात्कार होगा तब सर्वद्वैतकलना जो भासती है सो शान्त हो जावेगी और केवल आत्मतत्त्वमात्र शेष रहेगा |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जाग्रत््स्वप्नैकताप्रतिपादनंनाम चतुर्दशाधिकद्विशततमस्सर्गः ||214||

अनुक्रम


जगन्निर्वाण वर्णन

रामजी ने पूछा, हे भगवन्! चिदाकाश कैसा है जिसको तुम परब्रह्म कहते हो और उसका क्या रूप है? तुम्हारे अमृतरूपी वचनों को पानकरता मैं तृप्त नहीं होता इससे कृपा करके कहिये | वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जैसे एक माता के गर्भ से दो पुत्र जोड़े उत्पन्न होते हैं और उनका एकसा आकार होता है पर जगत् के व्यवहार के निमित्त उनका नाम भिन्न-भिन्न होता है और भेद कुछ नहीं और जैसे दो पात्रों में जल रखिये तो जल एक  ही है और पात्रों के नाम भिन्न-भिन्न होते हैं तैसे ही स्वप्न और जाग्रत् दो नाम हैं परन्तु एक ही से हैं पर आत्मा में दोनों कल्पित हैं और जिसमें दोनों कल्पित हैं  सो चिदाकाश है | वृत्ति जो फुरती है और देशदेशान्तर को जाती है उसके मध्य में जो संवित् ज्ञानरूप है कि जिसके आश्रय वृत्ति फुरती है सो चिदाकाश संवित् है और वृक्ष जो रस को खैंचकर ऊर्ध्व को जाते हैं सो उसी के आश्रय जाते हैं- ऐसी जो सत्ता है सो चिदाकाशरूप है | हे रामजी! जैसे सर्ववृक्ष फूल, फल, टास आदि सहित रस के आश्रय फुरते हैं, तैसे ही यह सब जगत् चिदाकाश के आश्रय फुरता है और उसी के आश्रय वृत्ति फुरती है-ऐसी जो सत्ता है सो चिदाकाश है | जिसकी इच्छा सब निवृत्त हो गई है और रागद्वेषरूपी मल शरत््काल के आकाशवत् निवृत्त हो गया है और शुद्ध संवित् है उसको चिदाकाश जानो | हे रामजी! जगत् का जब अन्त हुआ पर जड़ता नहीं आई उसके मध्य जो अद्वैत सत्ता सो चिदाकाश है, बेल, फूल, फल, गुच्छे और वृक्ष जिसके आश्रय बढ़ते हैं सो चिदाकाश है और रूप, अवलोक, मनस्कार इन तीनों का जहाँ अभाव है-ऐसी जो शुभसंवित् है-वह चिदाकाश है पृथ्वी, पर्वत और नदियाँ सबका जो आश्रय है सो चिदाकाश है और दृष्टा, दृश्य, दर्शन, ये तीनों जिससे उपजे हैं फिर जिनमें लीन  होते हैं ऐसी जो अधिष्ठान सत्ता है सो चिदाकाश है | जिससे सब उपजते हैं, जो यह सब है और जिसमें सब हैं ऐसा सर्वात्मा चिदाकाश है और अर्द्धरात्रि को जो उठता है और इन्द्रियों की चपलता का विषय से अभाव होता है और उस काल में अफुरसत्ता होती है सो चिदाकाश है | जिस संवित् में स्वप्ने की सृष्टि फुरती है और जाग्रत् भासती है और दोनों के करनेवाले में शोभता है सो चिदाकाश है | जैसा फुरना होता है, तैसा ही जगत् में भासता है और वही द्रष्टा, दर्शन, दृश्य होकर भासता है दूसरा कुछ नहीं, आत्मरूपी सूत्र में असत्य-सत्य जगत््रूपी मणि पिरोये हुए हैं |जिसके आश्रय इनका फुरना होता है वह चिदाकाश है | हे रामजी! जिसके आश्रय एक निमेष में जगत् उपजता है और उन्मेष में लीन हो जाता है, ऐसी जो अधिष्ठान सत्ता है उसको चिदाकाश जानो | यह सब जगत् मिथ्या है और भ्रान्ति से भासता है जैसे मरुस्थल की नहीं भासती है | इनसे जो रहित है और जिसमें संकल्प-विकल्प का क्षोभ नहीं और सदा अपने आपमें स्थित और दुःख से रहित निर्विकल्प सत्ता है वही चिदाकाश है | हे रामजी! नेति नेति से जो पीछे अनाद्यपद शेष रहता है उसको तुम चिदाकाश जानो | शुद्ध चैतन्य आत्मसत्ता सबका अपना आप और सबका अनुभवरूप होकर प्रकाशता है उसमें जैसा फुरना होता है कि ये ऐसे हैं तैसा ही हो भासता है सो चिदाकाश रूप है | इससे शुद्ध आत्मसत्ता ही फुरने से जगत््रूप हो भासती है | जैसे जाग्रत् के अन्त में  अद्वैतसत्ता होती है और फिर उससे स्वप्न की सृष्टि भासि आती है पर स्वप्ने की सृष्टि वास्तव कुछ नहीं उपजी वही अनुभव स्वप्न की सृष्टि हो भासता है, तैसे ही यह जगत् जो कार्यरूप दृष्टि आता है सो अविद्या से भासता है वास्तव में कुछ उपजा नहीं | जैसे स्वप्ने की सृष्टि अकारण भासती है तैसे ही यह सृष्टि अकारण है | ब्रह्मा से आदि चींटीपर्यन्त सब स्थावर -जंगमरूप जगत् चिदाकाशरूप है कुछ उत्पन्न नहीं हुआ और जो दूसरा कुछ हुआ तो कारण-कार्य भी कुछ हुआ | हे रामजी! कोई दृष्टा है, कोई दृश्य है, भोक्ता है और भोग है सब कल्पनामात्र है | आत्मा के अज्ञान से कल्पता उठती है और आत्मज्ञान से लीन हो जाती है- जैसे समुद्र के जाने से तरंग-कल्पना मिट जाती है, क्योंकि अनुभव आत्मा में कारण-कार्य कुछ नहीं हुआ | जो तुम कहो कि कारण-कार्य क्यों भासते हैं तो जैसे इन्द्रजाल की बाजी में नाना प्रकार के पदार्थ दृष्टि आते हैं परन्तु वास्तव कुछ नहीं बने, तैसे ही यह जगत् कारण-कार्य कुछ बना नहीं | जैसे स्वप्ने में अपना अनुभव ही नगररूप हो भासता है, तैसे ही यह जगत् भासता है | हे रामजी! आत्मसत्ता ही फुरने से जगत् की नाईं भासती है | जिस जगत् को इदम् रुफ कहते हैं वह अहंरूप है, जिसको समुद्र कहते हैं वह भी अहंकाररूप हैं, जिसको रुद्र कहते है वह अपना ही अनुभवरूप है इत्यादिक जो सब जगत् भासता है सो भावनामात्र है | जैसी जिसकी भावना दृढ़ होती है तैसा ही रूप होकर भासता है | जैसे चिन्तामणि और कल्पतरु में जैसी भावना होती है, तैसा ही सिद्ध होता है, तैसे ही आत्मसत्ता में जैसी भावना होती है तैसी ही हो भासती है | इससे जब चिदाकाश का निश्चय दृढ़ होता है तब अज्ञान से जो विरुद्ध भावना हुई थी सो निवृत्त हो जाती है |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे जगन्निर्वाणवर्णनंनाम पञ्चदशाधिक द्विशततमस्सर्गः ||215||

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कारणकार्याभाव वर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब मन थोड़ा भी फुरता है तब यह जगत् उत्पन्न हो जाता है जब जब फुरने से रहित होता है तब जगत् भावना मिट जाती है इस प्रकार जो ज्ञानवान् है,  वह पुरुष इन्द्रियों से देखता, सुनता, ग्रहण करता भी निर्वासनिक हो जाता है और जगत् की ओर से घनसुषुप्त होता है | हे रामजी! जिसका मन निर्वासनिक और शान्त हुआ है वह बोलता, चालता, खाता, पीता भी पाषाणवत् मौन हो जाता है-इससे यह जगत् कुछ उत्पन्न नहीं हुआ | जैसे मृगतृष्णा की नदी अनहोती भासती है और भ्रम से आकाश में दूसरा चन्द्रमा भासता है तैसे ही मन के भ्रम से आत्मा में जगत् भासता है, आदिकारण से कुछ नहीं उत्पन्न हुआ | जिसका आदिकारण पाइये वह कारण भी असत्य जानिये इससे सब जगत् कारण बिना ही भासता है उपजा कुछ नहीं! हे रामजी! जो पदार्थ कारण बिना भासता है और वह अधिष्ठान में भासित होता है उसको भी वही रूप जानिये और जो अधिष्ठान से व्यतिरेक भासे उसे भ्रममात्र जानिये | जैसे स्वप्ने में इन्द्रियादिक पदार्थ भासते हैं और उसमें दृश्य दर्शन सब मिथ्या हैं हुआ कुछ नहीं, तैसे ही यह जाग्रत जगत् भी मिथ्या है, कुछ उपजा है, स्थित हुआ है, आगे होना है और नाश होता है | जो उपजा ही नहीं तो नाश कैसे हो? कोई दृष्टा है, दर्शन है, और दृश्य है, केवल चिन्मात्रसत्ता अपने आपमें स्थित है | रामजी ने पूछा हे भगवन् यह दृष्टा, दर्शन और दृश्य क्या है और कैसे भासता है? यह आगे भी कहा है और अब फिर भी कहिये | वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! यह दृश्य सब अदृश्यरूप है, अकारण ही दृश्य हो भासता है और दृष्टा, दर्शन, दृश्य जो कुछ जगत् विस्तार सहित भासता है सो आदिस्वरूप है | जैसे स्वप्ने में आकाश का वन भासे और और पदार्थ भासे सो सब चिदाकाशरूप हैं तैसे ही यह जगत् भी चिन्मात्र रूप है कारण कार्यभाव कहीं नहीं जैसे वायु स्पन्दरूप होती है तब भासती है और निस्पन्द हुए नहीं भासती, तैसे ही आत्मा में जब चित्त फुरता है तब आत्मसत्ता जगत््रूप हो भासती है सो वही आत्मसत्ता भाव में अभावरूप है |  जैसे आकाश में शून्यता है, तैसे ही आत्मा में जगत् आत्मरूप है इससे जो कुछ भासता है  सो चैतन्य का आभास प्रकाश है और परमार्थसत्ता केवल अपने आपमें स्थित है | इससे इतर कहिये तो दृष्टा है और दृश्य है आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों है | रामजी ने पूछा, हे ब्राह्मण, ब्रह्म के वेत्ता जो इसी प्रकार है तो कारण-कार्य का भेद कैसे होता दीखता है? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जैसा-जैसा फुरना उसमें होता है तैसा ही तैसा रूप हो भासता है चैतन्य आकाश ही जगत््रूप हो भासता है और कहीं कारण है, कार्य है | जैसे स्वप्न सृष्टि कारण-कार्यसहित भासती है सो किसी कारण से नहीं उपजी अकारणरूप है, तैसे ही यह सृष्टि किसी कारण से नहीं उपजती अकारणरूप है | कहीं कर्त्ता है और भोक्ता है केवल भ्रम से कर्त्ता-भोक्ता भासता है और स्वप्ने की नाईं विकल्प उठते हैं-वास्तव में ब्रह्मसत्ता ही है | हे रामजी! जैसे स्वप्ने में नगर और जगत् भासता है सो चिदाकाश अनुभवसत्ता ही ऐसे हो भासती है-अनुभव से भिन्न कुछ नहीं तैसे ही यह जगत् सम्पूर्ण चिदाकाश है | जब ऐसे जानोगे तब जगत् भी ब्रह्मतत्त्व भासेगा | हे रामजी! यह जगत् चित्त के फुरने से उपजा है | जैसे मूर्ख बालक अपनी परछाहीं में वैताल कल्पता है तैसे ही चित्तभ्रम से जगत् को कल्पता है पर इसका कारण ब्रह्म ही है और कारण कहीं नहीं, क्योंकि महाप्रलय में चिदाकाश ही रहता है सो कारण किसका हो? वही सत्ता इन्द्र, रुद्र, नदियाँ, पर्वत आदि जगत् हो भासता है और उससे भिन्न द्वैतरूप कुछ नहीं | इसमें जैसा-जैसा फुरना होता है तैसा ही  रूप भासता है | जैसे चिन्तामणि और कल्पवृक्ष में जैसी भावना होती है तैसा ही रूप भासता है, तैसे ही आत्मसत्ता में जैसी भावना होती है तैसा ही पदार्थरूप हो भासता है

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे कारणकार्याभाववर्णनंनाम षोडशाधिकद्विशततमस्सर्गः ||216||

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भाप्रतिपादन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! अचेत चिन्मात्र जो आकाशरूप आत्मसत्ता है सो ही जगत््रूप हो भासती है | शुद्धचिन्मात्र में जब अहंफुरना होता है- तब जगत् हो भासता है | यही अहंरूप जीव है जगत् में जीवता दृष्टि आता है परन्तु मृतक की नाईं स्थित है और तुम, मैं आदिक सब जगत् जीवता बोलता, चलता और व्यवहार करता भी दृष्टि आता है परन्तु काष्ठ मौनवत् स्थित है | आत्मरूपी रत्न का जगत््रूपी चमत्कार है और वह प्रकाश आत्मा से भिन्न नहीं | जैसे आकाश में तरुवरे, मरुस्थल में जल और धुयें के पर्वत मेघ भासते हैं सो भ्रान्तिमात्र है तैसे ही यह जगत््लक्षण भी भासता है परन्तु वास्तव में कुछ नहीं अवस्तु है-उपजा कुछ नहीं | हे रामजी! चित्त रूपी बालक ने जगत् जालरूपी सेना रची है सो असत्य है | पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आदिक भूत भ्रान्तिमात्र हैं और उनमें सत्य प्रतीति करनी मूर्खता है | बालक की कल्पना में सत्य प्रतीति बालक ही करते हैं और जो इस जगत् का आश्रय करके सुख की इच्छा करते हैं वे मानो आकाश के धोने का यत्न करते हैं और उनका सर्व यत्न व्यर्थ है  यह सब जगत् भ्रान्तिरूप है, इसमें जो आस्था करके इसके पदार्थ पाने का यत्न करते हैं सो जैसे बंध्या स्त्री पुत्र पाने का यत्न करे सो व्यर्थ है, तैसे ही जगत् में जो सुख के पाने का यत्न करते हैं सो व्यर्थ है | हे रामजी! यह पृथ्वी आदिक जो सम्पूर्ण भूत पदार्थ भासते हैं सो भ्रान्तिमात्र हैं और जो भ्रान्तिमात्र हैं तो इनकी उत्पत्ति किससे और कैसे कहिये? जो मूर्ख बालक हैं उनको पृथ्वी आदिक जगत् पदार्थ सत्य भासते हैं ज्ञानवान् को ये सत्य नहीं भासते और अज्ञानी को सत्य भासते हैं पर उनसे हमको क्या प्रयोजन है? जैसे सोये को स्वप्ने में आत्म अनुभवसत्ता ही पृथ्वी, पहाड़ और नदियाँ जगत् हो भासता है पर वे सब आकार भासते भी निराकाररूप हैं तैसे ही यह जगत् आकारसहित भासता है परन्तु आकार कुछ बना नहीं निराकार सत्ता ही जगत््रूप हो भासती है और यह जगत् निराकार ही है पर और कुछ नहीं आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे़भाप्रतिपादनन्नाम सप्तदशाधिकद्विशततमस्सर्गः ||217||

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विपश्चित््समुद्रप्राप्तिर्नाम

रामजी ने पूछा, हे भगवन्! तुम कहते हो कि जगत् अविद्यमान है पर अज्ञान से स्वप्ने की नाईं सत्य भासता है इससे विद्यमान भी है और जैसे स्वप्ने का नग शून्यरूप है तैसे  ही यह जगत् अज्ञानरूप है सो अज्ञान क्या है और कितने काल की अविद्या हुई है, किसको है और इसका प्रमाण क्या है सो कहिए? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी | जो कुछ तुमको जगत् दृष्टि आता है सो सब अविद्या है | वह अविद्या अनन्त है और देश और काल से इसका अन्त कदाचित् नहीं होता | जिसको अपने वास्तव स्वरूप का अज्ञान है उसको सत् दिखाई देती है  इस पर एक इतिहास है सुनिये | हे रामजी! आत्मरूप चिदाकाश के अणु में अनन्त ब्रह्माण्ड स्थित हैं, उनमें से एक ब्रह्माण्ड इसी का सा है और उस ब्रह्माण्ड के जगत् में तुरंत नाम एक देश है जिसका राजा विपश्चित् था | वह एकसमय अपनी सभा में बैठा था और उसके चारों दिशा में उसकी बड़ी तेजवान् सेना उपस्थित थी | वह अग्नि देवता के सिवा और किसी देवता को पूजता था और बड़ी लक्ष्मी से शोभित और बहुत गुणों और ऐश्वर्य से सम्पन्न था | एक काल में वह सभा में बैठा था कि पूर्व दिशा की ओर से हरकारा आया और उसने कहा, हे भगवन्! तुम्हारा जो पूर्व दिशा का मण्डलेश्वर था वह जरा से मृतक होके मानो यम को जीतने गया है इससे पूर्व दिशा की रक्षा करो, क्योंकि वहाँ और मण्डलेश्वर आता है | हे रामजी! इस प्रकार वह कहता ही था कि दूसरा हरकारा पश्चिम से आया और कहने लगा कि हे भगवन्! तुमने जो पश्चिम दिशा का मण्डलेश्वर किया था सो तप से मृतक हो गया है और वहाँ एक और मण्डलेश्वर आता है इसलिये वहाँ की रक्षा करो | हे रामजी! इस प्रकार दूसरा हरकारा कह रहा था कि एक और हरकारा आया और उसने कहा कि हे भगवन्! दक्षिण दिशा का मण्डलेश्वर पूर्व-पश्चिम की रक्षा के निमित्त गया था सो मार्ग ही में मृतक हुआ इससे दोनों की रक्षा के निमित्त सेना भेजो क्योंकि एक दृढ़ शत्रु आया है और विलम्ब का समय नहीं है शीघ्र ही सेना भेजिये | हे रामजी! इस प्रकार सुनकर राजा बाहर निकला और कहने लगा कि सब सेना मेरे पास होकर दिशाओं की रक्षा के निमित्त जावे और बड़े बड़े शस्त्र , हाथी, रथ आदिक सेना ले जावो | हे रामजी! इस प्रकार राजा कहता ही था कि एक और पुरुष आया और बोला कि हे भगवन्! उत्तर दिशा की ओर जो तुम्हारा मण्डलेश्वर था उसके ऊपर और शत्रु पड़ा है और बड़ा युद्ध होता है इससे उसकी रक्षा के निमित्त शीघ्र ही सेना भेजो अब विलम्ब का समय नहीं है और आगे कई दुष्ट चले आते हैं | मैं फिर जाता हूँ, क्योंकि मेरा स्वामी युद्ध करता है | हे रामजी! इस प्रकार कहकर वह चला गया तब द्वारपाल ने आकर कहा कि हे भगवन्! उत्तर दिशा का मण्डलेश्वर आया है आज्ञा हो तो ले आऊँ | राजा ने कहा, ले आवो| वह उसे ले आया और उस मण्डलेश्वर ने राजा के सम्मुख आकर प्रणाम किया | राजा ने देखा कि उसके अंग टूट गये हैं और मुख से रुधिर चला जाता है पर ऐसी अवस्था में भी उस धैर्यसंयुक्त मण्डलेश्वर ने कहा कि हे भगवन्! मेरे अंगों की यह दशा हुई है | मैं तुम्हारा देश रखने को चला था पर मेरे  ऊपर शत्रु आन पड़ा और मेरी सेना थोड़ी थी इस कारण दौड़कर तुम्हारे पास आया हूँ कि प्रजा की रक्षा करो | हे रामजी! जब इस प्रकार कहा तब राजा ने सब मन्त्रियों को बुलाया | मन्त्री राजा के पास आये और बोले, हे भगवन्! तीन उपाय छोड़ो और एक उपाय करो अर्थात् एक नम्रता, दूसरा धन और तीसरा बुद्धि का भेद ये तीनों अब नहीं चाहिये | ये दुष्ट नम्रता माननेवाले नहीं हैं, क्योंकि नीच और पापी हैं और धन इस कारण देना चाहिये कि ये आधीन हैं और भेदभाव भी नहीं जानते, क्योंकि सब मिलके इकट्ठे हुए हैं इससे ये तीनों उपाय छोड़ो और एक उपाय करो कि युद्ध हो | अब विलम्ब का समय नहीं है, क्योंकि उनकी सेना निकट आई है-अब उत्साहसहित कर्म करना है प्राणों की रक्षा नहीं चाहिये | हे रामजी! जबइस प्रकार मन्त्रियों ने कहा तब राजा ने आज्ञा की कि सब सेना मेरी आज्ञा से उनके सम्मुख जावे और निशान, नगारे, हस्ती घोड़ा, रथ, पियादे सेना के साथ जावें | इस प्रकार जब राजा ने कहा तब सब विद्यमान सेना आन स्थित हुई और नौबत-नगारे बजने लगे |  जब नाना प्रकार के शस्त्रोंसहित चारों प्रकार की सेना इकट्ठी हुई तब राजा ने कहा, हे साधो! तुम आगे जावो | सेना आगे हो उसके पीछे सेनापति जावें और शत्रुओं के साथ युद्ध करो मैं भी स्नान करके आता हूँ | हे रामजी! इस प्रकार कहकर राजा ने मन्त्री को भेजा और आप गंगाजल से स्नानकर एक स्थान में अग्नि का कुण्ड था उसके निकट जाकर हवन करने लगा | जब अग्नि प्रज्ज्वलित हुई तब राजा ने कहा, हे भगवन्! इतना काल मुझको व्यतीत हुआ है कि यथाशास्त्र मैं बिचरता रहा, अपनी प्रजा सुखी रखी, अभय राज्य किया, शत्रु को नाश करके सिंहासन के नीचे दबाया और आप सिंहासन पर बैठा हूँ | पातालवासी दैत्य भी मैंने जीत रखे हैं, दशों दिशाएँ अपने अधीन की हैं सातों समुद्रपर्यन्त सब मेरे भय से काँपते हैं और सब ठौर में मेरी कीर्ति हो रही है  रत्नों के स्थान मेरे भरे हुए हैं और वस्त्र, सेना; घोड़े और हाथी भी बहुत हैं | मैंने बड़े भोग भी भोगकर बड़े-बड़े दान भी किये हैं और सिद्ध और देवताओं में भी मेरा यश हुआ है | शरीर भी बूढ़ा हुआ है और क्षोभ भी बड़ा प्राप्त हुआ है इससे अब मेरा जीने से मरना भला है | हे भगवन् मैं तुमको शीश निवेदन करता हूँ; कृपा करके लो | यदि मुझ पर प्रसन्न होना तब एक की चार मूर्ति देना कि चारों ओर जाऊँ और जहाँ मुझको कुछ कष्ट हो वहाँ दर्शन देना | हे रामजी! इस प्रकार कहकर उसने खंग निकाला और अपना शीश काटकर अग्नि में डाल दिया तब धड़ भी आप ही अग्नि में जा पड़ा और शीश धड़ दोनों भस्म हो गये अथवा अग्नि ने भक्षण कर लिया | तब उसी की सी चार मूर्ति निकल आईं और उनके उसी के से आकार; वस्त्र , भूषण, मुकुट और कवच पहिरे और नाना प्रकार के शस्त्र धारे हुए उदय हुए | हे रामजी! इस प्रकार बड़े तेज संयुक्त चारों राजा विपश्चित् प्रकट भये और रथ, हस्ती; घोड़े, प्यादे और चारों प्रकार की सेना भी प्रकट हुई | निदान चारों ओर से शत्रु युद्ध करने लगे और बड़ा युद्ध होने लगा |  नगर जलने लगे, बड़ा हाहाकार शब्द होने लगा और शूरवीर युद्ध में प्राण को त्यागते और  उछल-उछलकर लड़ते थे | बड़े रुधिर के प्रवाह चलते थे, खंग और बरछी की वर्षा होती थी और अग्नि का अट्ठ-अट्ठ शब्द होता था-मानो समय बिना ही प्रलय होने लगा है | निदान बड़ा युद्ध हुआ जो सूरमा थे वे युद्ध में मरने को जीना मानते थे और जीने को मरना जानते थे, ऐसा निश्चय धरके वे युद्ध करते थे और जो कायर थे वे भाग जाते थे-जैसे गरुड़ के भय से सर्प भाग जाते हैं और सूरमे सम्मुख होकर लड़ते थे | इस प्रकार बड़ा युद्ध होने लगा और रुधिर की नदियाँ चलीं जिनमें हाथी,घोड़े , रथ और सूरमें बहते जाते थे और बड़े बड़े वृक्ष और नगर गिरते और बहते जाते थे | माँस भक्षण के निमित्त योगिनी भी उपस्थित हुई | जो-जो युद्ध में मृतक हो उसको अप्सरा और विद्याधरी विमान पर चढ़ाकर स्वर्ग को ले जाती थीं | हे रामजी! इस प्रकार जब युद्ध हुआ तब राजा विपश्चित् की सेना सब शून्य हो गई अर्थात् थोड़ी हो गई | राजा ने सुना कि सेना बहुत मारी गई है इसलिये उसने सवार होकर देखा कि सेना थोड़ी रह गई है इससे एक एक राजा एक एक ओर को गया अर्थात् चारों राजा चारों ओर गये और विचार करने लगे कि यह महागम्भीर सेनारूपी समुद्र है, इसमें शस्त्ररूपी जल है, धाररूपी तरंग है और शूर में रूपी मच्छ हैं | ऐसा जो समुद्र है उसको अगस्त्य होकर मैं पान करूँ-ऐसे विचारकर उसने उद्यम किया, क्योंकि शत्रु की विशेष सेना देखी-एक तो आगे ही को चली आवें, दूसरे शूरमे तेज से सेना को जलावें और तीसरे बहुत सेना आवे | ऐसी तीन प्रकार की सेना के राजा ने तीन उपाय किये | प्रथम उसने वायव्यास्त्र हाथ में लिया और परमात्मा  ईश्वर को नमस्कार कर और मन्त्र पढ़के पवन का अस्त्र चलाया | इससे आँधी गई और जितनी सेना आगे चली आती थी वह सब उलटी उड़ने लगी | फिर उसने मेघरूपी अस्त्र चलाया तब वर्षा होने लगी और उससे जो तेज उन्हीं सेना को जलाता था वह शीतल हो गया | उसके अनन्तर उसने शिवअस्त्र चलाया, उसमें से प्रथम शस्त्रों की नदी चली फिर त्रिशूलों की  नदी चली,  फिर चक्रों की नदी चली, फिर वज्र की नदी चली, बरछी की नदी चली, बिजली की नदी चली और अग्नि इत्यादिक की नदी चली और दूसरे शस्त्रों की वर्षा हुई | जब इस प्रकार नदियाँ चलीं तब जो कुछ सेना सम्मुख आती थी सो मृतक हो गई | जैसे कमलिनी काटी जाती है तैसे ही शूरवीर काटे गये | कोई पहाड़ों की कन्दराओं में गिरें और वहाँ से उड़कर समुद्र में जा पड़े और कोई सुमेरु की कन्दराओं में जाकर छिपें और समुद्र में जाकर डूबे-जैसे अज्ञानी विषयों में डूबते हैं | इस प्रकार दोनों ओर से सेना शून्य हुई और  चारों दिशाओं की सेना नष्ट हो गई | नीच से नीच देशों के और पहाड़ की कन्दराओं के रहनेवाले सब बहते जावें | हे रामजी! कई शस्त्रों से और कई आँधी से उड़े सो सब क्षेत्रों में जा पड़े और कई वन में और कई नीचे देशों में गिरे | जो पुण्यवान् थे वे उत्तम क्षेत्र में जा पड़े और मृतक होकर वे स्वर्ग में गये और पापी नीच देशों में जा पड़े उससे दुर्गति को प्राप्त हुए | कई पिशाच हुए, कितनों को विद्याधरियाँ ले गईं और कई ऋषीश्वरों के स्थानों में जीतकर जा पड़े उनकी उन्होंने रक्षा की | इसी प्रकार कितने बाणों से छेदे हुए नाश हुए और कई रुधिर की नदियों में बहते समुद्र की ओर चले गये | हे रामजी! जब सब सेना शून्य हो गई तब आकाश शुद्ध हुआ | जैसे ज्ञानी का मन निर्मल होता है तैसे ही आकाश अधिक क्षोभ से रहित भया | जब सब सेना शून्य हो गई तब चारों राजा आगे चले | हे रामजी! निदान चारों विपश्चित् चारों दिशाओं के समुद्रों पर जा पहुँचे, तब उन्होंने क्या देखा कि बड़े गम्भीर समुद्र है, कहीं रत्न और कहीं हीरा, मोती इत्यादिक चमकते हैं और बड़े गम्भीर समुद्र में बड़े मच्छ और तरंग उछलते हैं और रेती में नाना प्रकार के लौंग, इलायची, चन्दन इत्यादिक के वृक्ष समुद्र पर जाकर देखे |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विपश्चित््समुद्रप्राप्तिर्नाम द्विशताधिकाष्टादशस्सर्गः ||218||

अनुक्रम


जीवन्मुक्तलक्षण वर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब इस प्रकार राजा विपश्चित् समुद्र के पार जा पहुँचा तब  उसके साथ जो मन्त्री पहुँचे थे उन्होंने राजा को सब स्थान दिखाये जो बड़े गम्भीर थे  बड़े गम्भीर समुद्र जो पृथ्वी के चहुँ फेर वेष्टित थे वह भी दिखाये और बड़े-बड़े तमालवृक्ष, बावलियाँ, पर्वतों की कन्दरा, तालाब और नाना प्रकार के स्थान दिखाये | ऐसे स्थान राजा को मन्त्री ने दिखाकर कहा, हे राजन्! तीन पदार्थ बड़े अनर्थ और परम सार के कारण हैं-एक तो लक्ष्मी, दूसरा आरोग्य देह और तीसरा यौवनावस्था | जो पापी जीव हैं वे लक्ष्मी को पाप में लगाते हैं, देह आरोग्यता से विषय सेवते हैं और यौवन अवस्था में भी सुकृत नहीं करते, पाप ही करते हैं और जो पुण्यवान् हैं वे मोक्ष में लगाते हैं अर्थात् लक्ष्मी से यज्ञादिक शुभकर्म और आरोग्य से परमार्थ साधते हैं और यौवन अवस्था में भी शुभकर्म करते हैं-पाप नहीं करते | हे रामजी! जैसे समुद्र और पर्वत के किसी ठौर में रत्न होते हैं और किसी ठौर में दर्दुर होते हैं, तैसे ही संसाररूपी समुद्र में कहीं रत्नों की नाईं ज्ञानवान् होते हैं और कहीं अज्ञाननरूपी दर्दुर होते हैं | हे राजन्! यह समुद्र मानो जीवन्मुक्त है क्योंकि जल से भी मर्यादा नहीं छोड़ता और रागद्वेष से रहित है | किसी स्थान में दैत्य रहते हैं, कहीं पंखोंसंयुक्त पर्वत, कहीं बड़वाग्नि और कहीं रत्न हैं परन्तु समुद्र को किसी स्थान में राग है, द्वेष हे | जैसे ज्ञानवान् को किसी में रागद्वेष नहीं होता परन्तु सबमें ज्ञानवान् कोई बिरला होता है | जैसे जिस सीपी और बाँस से मोती निकलते हैं सो बिरले ही होते हैं, तैसे ही तत्त्वदर्शी ज्ञानवान् कोई बिरला होता है  हे रामजी! सम्पूर्ण रचना यहाँ की देखो कि कैसे पर्वत हैं जिनके किसी स्थान में पक्षी रहते हैं, किसी स्थान में विद्याधर रहते हैं, कहीं देवियाँ विलास करती हैं, कहीं योगी रहते हैं और कहीं ऋषीश्वर, मुनीश्वर, कहीं ब्रह्मचारी, वैरागी आदिक पुरुष रहते हैं | यह द्वीप है और सात समुद्र हैं जिनके बड़े तरंग उछलते हैं और पर्वत का कौतुक और आकाश, चन्द्रमा, सूर्य, तारे, ऋषि, मुनि, को देखो और देखो कि सबको आकाश ठौर दे रहा है पर महापुरुष कि नाईं आप सदा असंग रहता है और शुभ-अशुभ दोनों में तुल्य है | स्वर्गादिक शुभस्थान हैं और चाण्डाल पापी नरकस्थान और अपवित्र  है परन्तु आकाश दोनों में तुल्य है-  असंगता से निर्विकार है | जैसे ज्ञानी का मन सब स्थानों से निर्लेप होता है, तैसे ही आकाश सब पदार्थों से असंग और न्यारा है और महात्मा पुरुष की नाईं सर्वव्यापी है | हे आकाश! तू कैसा है कि प्रकाशरूप तुझमें अन्धकार दृष्टि आता है-यह आश्चर्य है! हे आकाश! तू सबका आधारभूत है और जो तुझको शून्य कहते हैं वे मूर्ख हैं ,दिन को तुझको श्वेतता भासती है, रात्रि को अन्धकार भासता है और संन्ध्याकाल में तेरे में लाली भासती है पर तू तीनों से न्यारा है | ये तीनों राजसी, तामसी और सात्त्विकी  गुण हैं पर तू इनके होते भी असंग है | हे आकाश! तू निर्मल है और तम तेरे में दृष्टि आता है परन्तु तू सदा ज्यों का त्यों है | यह अनित्य रूप है | चन्द्रमा तेरे  में शीतलता करता है, सूर्य दाहक होते हैं, तीर्थ आदिक पवित्र स्थान हैं और पापमय अपवित्र स्थान हैं परन्तु तू सब में एक समान ज्यों का त्यों रहता है और वृक्ष को बढ़ने और ऊँचे होने की सत्ता तू ही देता है | अपनी महिमा को तू आप ही जाने और कोई तेरी महिमा पा नहीं सकता | तू निष्किञ्चन अद्वैत है, सबको धार रहा है और सबका अर्थ तुझसे ही सिद्ध होता है | जल नीचे को जाता है और तू सबसे ऊँचा है और विभु है | अनेक पदार्थ तेरे में उत्पन्न होते हैं और नष्ट हो जाते हैं पर तू सदा ज्यों का त्यों रहता है | जैसे अग्नि से चिनगारे उपजते और अग्नि ही में लीन हो जाते हैं, तैसे ही तेरे में अनन्त जगत् उपजते और लीन होते हैं और तू सदा ज्यों का त्यों रहता है जो तुझको शून्य कहते हैं वे मूढ़ हैं | हे राजन! ऐसा आकाश कौन है सो भी सुनो | ऐसा आकाश आत्मा है जो चैतन्य आकाश है और जिसमें अनन्त जगत् उत्पन्न और लीन हो जाते हैं | उसको जो शून्य कहते हैं वे महामूर्ख हैं-जो सबको अधिष्ठान है, सबको धार रहा है और सदा निःसंग है ऐसे चिदाकाश को नमस्कार है | हे राजन्! यह आश्चर्य है कि वह सदा एक रस है पर उनमें नाना तरंग भासते हैं-यही माया है | हे राजन्! एक विद्या धरी और विद्याधर थे | उनके मन्दिर में एक ऋषि निकला पर उस विद्याधर ने उनका आदरभाव किया इससे ऋषीश्वर ने शाप दिया कि तू द्वादशवर्ष पर्यन्त वृक्ष होगा | निदान वह विद्याधर वृक्ष हो गया | पर अब जो हम आये हैं हमारे देखते ही वह शाप से मुक्त हो वृक्षभाव को त्यागकर फिर विद्याधर हुआ है | यह ईश्वर की माया है कि कभी कुछ हो जाता है और कभी कुछ हो जाता है | हे मेघ! तू धन्य है! तेरी चेष्टा भी सुन्दर है, तीर्थों में सदा तेरी स्थिति है, तू सबसे ऊँचे विराजता है और सब आचार तेरा भला दृष्टि आता है परन्तु एक तुझमें नीचता है कि ओले की वर्षा करता है जिससे खेतियाँ नष्ट हो जाती हैं और फिर नहीं उगतीं | तैसे ही अज्ञानी की चेष्टा देखनेमात्र सुन्दर है और हृदय से मूर्ख हैं, उनकी संगति बुरी है और ज्ञानवान् की चेष्टा देखने में भली नहीं तो भी उनकी संगति कल्याण करती है | हे राजन्! सबमें नीच श्वान हैं क्योंकि जो कोई उसके निकट आता है उसको काट लेता है, घर घर में भटकता फिरता और मलीन स्थानों में जाता है, तैसे ही अज्ञानी जीव श्रेष्ठ पुरुषों की निन्दा करता है पर मन में तृष्णा रखता है और विषयरूपी मलीन स्थानों में गिरता है | वह मूर्ख मनुष्य मानो श्वान है और श्वान से भी नीच है | ब्रह्मा ने सम्पूर्ण जगत् को रचा है परन्तु उसमें श्वान सबसे नीच है पर श्वान क्या समझता है सो सुनो | एक पुरुष ने श्वान से प्रश्न किया कि हे श्वान! तुझसे कोई नीच है अथवा नहीं? तब श्वान ने कहा कि मुझमें भी नीच मूर्ख मनुष्य है और उससे मैं श्रेष्ठ हूँ क्योंकि प्रथम तो मैं सूरमा हूँ, दूसरे जिसका भोजन खाता हूँ उसकी रक्षा करता हूँ और उसके द्वारे बैठा रहता हूँ पर मूर्ख से ये तीनों कार्य नहीं होते |इससे मैं उससे श्रेष्ठ हूँ क्योंकि मूर्ख को देहाभिमान है इससे वह श्वान से भी नीच है | हे राजन्! परम अनर्थ का कारण देहाभिमान है | देहाभिमान से जीव परम आपदा को प्राप्त होता है | वह मूर्ख नहीं मानो कौवा है जो सबसे ऊँची टहनी पर बैठकर कां कां करता है | हे राजन्! कमल की खानों के ताल के निकट एक कौवा जा निकला तो क्या देखे कि भँवर बैठे कमल की सुगन्ध लेते हैं, उनको देखकर वह हँसने लगा और कां कां शब्द किया |  तब उसको देख भँवरे हँसे कि यह कमल की सुगन्ध क्या जाने, तैसे ही जिज्ञासु भँवरे के समान हैं जो परमार्थरूपी सुगन्ध लेते हैं | जो अज्ञानरूपी कौवे हैं वे परमार्थ रूपी  सुगन्ध लेते हैं | जो अज्ञानरूपी कौवे हैं वे परमार्थ रूपी सुगन्ध नहीं जानते इस कारण मूर्ख को देखकर जिज्ञासु हँसते हैं जो आत्मरूपी सुगन्ध को नहीं जानते | अरे कौवे! तू क्यों हंस की रीत करता है? हंस तो हीरे और मोती चुगनेवाले हैं और तू नीच स्थानों को सेवनेवाला है | मन्त्री ने कहा, हे कोयल! तुम कमल को देखकर क्या प्रसन्न होते हो? प्रसन्न तो तब हो जब बसन्तऋतु हो पर यह तो वर्षाकाल का समय है-यह फूल ओलों से नष्ट हो जावेंगे | राजन्! कोयलरूपी जो जिज्ञासु हैं उनको यह उपदेश है हे जिज्ञासु! जो सुन्दर पदार्थ तुमको दृष्ट आते हैं इनको देखकर तुम क्यों प्रसन्न होते हो? प्रसन्न तो तब हो जो यह सत्य हों पर यह तो मिथ्या हैं और अविद्या के रचे हैं | तुम क्यों प्रसन्न होते हो? अपने कुल में जा बैठो और अज्ञानी का संग छोड़ दो | जैसे कौवा हंसों में जा बैठता है तो भी उसका चित्त गन्दगी के भोजन में होता है और हंस का आहार जो मोती है उन मोतियों की ओर देखता भी नहीं, तैसे ही अज्ञानी जीव कदाचित् सन्तों की संगति में जा भी बैठता हे तो भी उसका चित्त विषयों की ओर ही भ्रमता फिरता है और स्थिर नहीं होता | जैसे कोयल का बच्चा कौवे को माता-पिता जानकर उनमें जा बैठता है तब उनकी संगति से यह भी गन्दगी के भोजन करनेवाला हो जाता है | इससे कोयल उसको बर्जन करते हैं कि रे बेटा! तू कौवे की संगति मत बैठ,  अपने कुल में बैठ, क्योंकि तेरा भी नीच आहार हो जावेगा, तैसे ही जिज्ञासु जो अज्ञानी का संग करता है तो उसके अनुसार भी विषयों की तृष्णा उत्पन्न होती है तब उसको बर्जन करते हैं कि रे जिज्ञासु! तू मूर्ख अज्ञानियों में मत बैठ, अपना कुल जो  सन्तजन हैं उनमें बैठ | जैसे कोयल के बच्चे को कौवे सुख देनेवाले नहीं होते, तैसे ही मूर्ख तुझको सुख देनेवाले नहीं होंगे | मन्त्री फिर कहने लगा, अरी चील! तू क्यों हंस की रीत करती है? तू भी बहुत ऊँचे उड़ती है परन्तु हंस का गुण तेरे में कोई नहीं | जब तू माँस को पृथ्वी पर देखती है तब वहाँ गिर पड़ती है और हंस नहीं गिरते, तैसे ही जो मूर्ख हैं वे सन्तों की नाईं ऊँचे कर्म भी करते हैं परन्तु विषयों को देखकर गिरते हैं पर सन्त नहीं गिरते तो मूर्ख सन्तों की रीत कैसे करें | फिर मन्त्री ने कहा, हे बगला! तू हंस की रीत क्या करता है? अपने पाखण्ड को छुपाकर तू आपको हंस की नाईं उज्ज्वल दिखाता है पर जब मछली निकलती है तब तू खा लेता है, यही तेरे में अवगुण है | हंस मानसरोवर के मोती चुगनेवाले हैं और तू गढ़े में से तृष्णा करके मछली खानेवाला है, तू क्यों आपको हंस मानता है? तैसे ही जीव विषयों की तृष्णा करते हैं और ज्ञानवान् विवेक से तृप्त हैं, उनकी रीत अज्ञानी क्यों करता है? हे राजन्! जो हंस हैं वे सदा अपनी महिमा में रहते हैं और अपना जो मोती का आहार है उसको भोजन करते हैं, दूसरे किसी पदार्थ का स्पर्श नहीं करते | जैसे चन्द्रमुखी कमल चन्द्रमा को देखकर शोभा पाते हैं-चन्द्रमा बिना शोभा नहीं पाते, तैसे ही बुद्धि भी तब शोभा पाती है जब ज्ञान उदय होता है आत्मज्ञान बिना बुद्धि शोभा नहीं पाती | बड़े बड़े सुगन्धवाले वृक्ष का माहात्म्य भँवरे ही जानते हैं और जीव नहीं जानते | इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! समुद्र के किनारे पर राजा विपश्चित् को मन्त्रियों ने ऐसे कहकर फिर कहा, हे राजन्! अब पृथ्वीनगर के मण्डलेश्वर स्थापन करो | हे रामजी! जब ऐसे मन्त्री ने कहा, तब सब दिशाओं के मण्डलेश्वर स्थापन किये गये और चारों राजा जो अपनी-अपनी दिशा के समुद्र पर बैठे थे उन्होंने अपने-अपने मन्त्री से कहा, हे साधो! अब हमने समुद्रपर्यन्त दिग्विजय की है और अब हमारी जय हुई है, अब चैत्य जो दृश्य है सो दृश्य विभूति को देखो | समुद्र के पार द्वीप है, फिर उस समुद्र के पार और द्वीप है, फिर समुद्र है और फिर द्वीप है  और इसी प्रकार सप्तद्वीप और सात समुद्र हैं पर उनके पार क्या हैं? इस प्रकार सर्व दृश्य देखने की इच्छा करके उन्होंने अग्निदेवता का आवाहन किया तब उनकी दृढ़भावना से अग्निदेवता सम्मुख आन स्थित हुए और बोले, हे राजन्! जो कुछ तुमको वाञ्छा है सो माँगो | तब राजा ने कहा, हे भगवन्! ईश्वर की माया से पाञ्चभौतिक दृश्य में जो भूत हैं उनके देखने की हमारी इच्छा है सो पूर्ण करो | हे देव! हम इसी शरीर से दृश्य देखने जावे और जब यह शरीर चलने से रहित हो तब मन्त्र सत्ता से जावें पर जहाँ मन्त्र की भी गम नहीं वहाँ सिद्धि से जावें और जहाँ सिद्धि की भी गम नहीं वहाँ मन के वेग से जावें और मृतक भी हों | यह वर हमको दो | हे रामजी! जब इस प्रकार राजा ने कहा तब अग्नि ने कहा कि ऐसे ही होगा | इस प्रकार कहकर अग्नि अन्तर्धान हो गये | जैसे समुद्र से तरंग उठकर फिर लय हो जावे तैसे ही अग्नि अन्तर्धान हो गये | जब राजा विपश्चित् वर पाकर चलने को समर्थ हुआ तब जितने मन्त्री और मित्र थे वे रुदन करने लगे और बोले, हे राजन्! तुमने यह क्या निश्चय किया है? ईश्वर की माया का अन्त किसी ने नहीं पाया इससे तुम अपने स्थान को चलो , यह क्या निश्चय तुमने धारा है? हे रामजी! इस प्रकार मन्त्री कहते रहे परन्तु राजा ने उनको आज्ञा देकर एक एक दिशा के समुद्र में प्रवेश किया और चारों दिशाओं में चारों राजाओं ने गमन किया पर जो बड़े बड़े शक्तिमान् मन्त्रीगण थे वे सात ही चले | तब राजा मन्त्रशक्ति से समुद्र को लाँघ गया | कहीं पृथ्वी पर चले और कहीं ऊँचे चले इसी प्रकार और द्वीप में जा निकला, तब बड़ा समुद्र आया उसमें प्रवेश कर गया जिसमें बड़े तरंग उछलते थे और जिसका सौ योजनपर्यन्त विस्तार था | कभी अधः को और कभी ऊर्ध्व को जाते थे | हे रामजी 1 ऐसे तरंग उछलें मानो पर्वत उछलते हैं जब वे ऊर्ध्व को उछलें तब स्वर्गपर्यन्त उछलते भासें और जब अधः को जावें तब पातालपर्यन्त चलते भासें | जैसे पानी में तृण फिरता है, तैसे ही राजा फिरे | इस प्रकार कष्ट से रहित समुद्र और दिशा को लाँघ गया परन्तु मध्य में जो वृत्तान्त हुआ सो सुनो | क्षीर समुद्र में एक मच्छ रहता था जिसको सब देवता प्रणाम करते थे और जो विष्णु भगवन् के मच्छ अवतार के परिवार में था | जब राजा ने क्षीसमुद्र में प्रवेश किया तब राजा को उसने मुख में डाल लिया पर राजा मन्त्र के बल से उसके मुख से निकल गया | आगे फिर एक मच्छ मिला उसने भी उसे मुख में डाल लिया पर उससे भी वह निकल गया | फिर आगे पिशाचिनी का देश था वहाँ राजा को पिशाच ने काम से मोहित किया | फिर उसने दक्षप्रजापति की कुछ अवज्ञा की जिससे उसने शाप दिया और राजा वृक्ष हो गया | निदान कुछ काल वृक्ष रहकर फिर छूटा तो एक देश में दर्दुर हुआ और सौ वर्षपर्यन्त खाईं में पड़ा रहा | फिर उससे छूटकर मनुष्य हुआ तब किसी सिद्ध के शाप से शिला हो गया और सौ वर्षपर्यन्त शिला ही रहा | उसके उपरान्त अग्निदेवता ने शिला से छुड़ाया तो फिर मनुष्य हुआ, तब वह सिद्ध आश्चर्यवान् हुआ कि मेरे शाप को दूर करके यह मनुष्य क्यों कर हुआ है- यह तो मुझसे भी बड़ा सिद्ध है | ऐसे जानकर उसने उसके साथ मैत्री की | इसी प्रकार दूसरे समुद्रों को भी यह लाँघता गया और क्षीरसमुद्र, खारी समुद्र और इक्षु के रस के समुद्र को लाँघकर द्वीपों को लाँघता गया | फिर एक अप्सरा से मोहित हुआ और बहुत काल में वहाँ से छूटा-तो एक देश में पक्षी हुआ और बहुत कालपर्यन्त पक्षी रहकर छूटा तो एक गोपी पिशाचिनी थी उसने बैल बनाके उसे रखा और दूसरे विपश्चित् ने बैल विपश्चित् को उपदेश करके गाया | निदान हे रामजी! चारों दिशाओं में चारों विपश्चित् भ्रमते फिरे | दक्षिण दिशा का तो पिशाचिनी से मोहित हुआ इससे उसने बहुत जन्म पाये और पूर्व का बहता हुआ मच्छ के मुख में चला गया और उसने निकाल डाला, इससे लेकर वह अवस्था देखी | उत्तर दिशा का जो हुआ उसने वही अवस्था देखी और पश्चिम दिशा का हेमचू पक्षी की पीठ पर प्राप्त हुआ और उसने उसे कुशद्वीप में डाल दिया इससे  उसने भी अनेक अवस्था पाई | हे रामजी! एक एक विपश्चित् ने भिन्न भिन्न योनि और अवस् था का अनुभव किया | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! तुम कहते हो कि `विपश्चित एक ही था और उनकी संवित् भी एक ही थी और आकार भी एक ही था तो भिन्न भिन्न रुचि कैसे हुई जो एक पक्षी हुआ,दूसरा वृक्ष हुआ और इससे लेकर वासना के अनुसार अनेक शरीर पाते फिरे | वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इसमें क्या आश्चर्य है? उनकी संवित् एक ही थी परन्तु भ्रम से भिन्नता हो जाती है | जैसे किसी पुरुष को स्वप्ना आता है तो उसमें पशु-पक्षी हो जाते हैं और भिन्न भिन्न रुचि भी हो जाती है, तैसे ही उसकी भिन्न भिन्न रुचि हो गई | जैसे देखो कि शरीर तो एक ही होता है पर उसमें नेत्र, श्रवण, नासिका, जिह्वा और त्वचा की रुचि भिन्न भिन्न होती है और अपने अपने विषयों को ग्रहण करती हैं सो एकही शरीर में अनेकता भासती है, तैसे ही उनकी एक ही संवित् थी परन्तु भिन्न भिन्न हो गया था इससे मन के फुरने से एक  में अनेक भासीं | जैसे एक ही योगेश्वर इच्छा करके और और शरीर धर लेता है और एक से अनेक हो जाता है | एक सहस्त्रबाहु अर्जुन था सो एक भुजा से युद्ध करता था, दूसरी भुजा से दान करता था और एक से लेता था, इसी प्रकार सब भुजाओं से चेष्टा करता था वे भी भिन्न भिन्न हुए | एक ही शरीर में भिन्न भिन्न चेष्टा होती है | जैसे विष्णु भगवन् कहीं दैत्यों के साथ युद्ध करते, कहीं कर्म करते हैं, कहीं लीला करते हैं और कहीं शयन करते हैं सो संवित् तो एक ही है परन्तु चेष्टा भिन्न भिन्न होती है, तैसे ही उनकी संवित् में अनेक रुचि हुई तो इसमें क्या आश्चर्य है? हे रामजी! इस प्रकार  उन्होंने जन्म से जन्मान्तर को अविद्यक संसार में देखा | रामजी ने पूछा, हे भगवन्!  वे तो बोधवान् विपश्चित् थे और बोधवान् जन्म नहीं पाता फिर उनको किस प्रकार जन्म हुआ? वशिष्ठजी बोले हे रामजी! वे विपश्चित् बोधवान् थे परन्तु बोध के निकट धारणा अभ्यासवाले थे | जो वे ज्ञानवान् होते तो दृश्यभ्रम देखने की इच्छा क्यों करते? इससे वे ज्ञानवान् थे-धारणा अभ्यासी थे अतः समुद्र को लाँघ गये और मच्छ के उदर से बल करके निकले सो यह योगशक्ति प्रसिद्ध है | ज्ञान का लक्षण सुसंवेद्य है  परसंवेद्य नहीं | राजा विपश्चित् ज्ञानवान् थे इस कारण देश-देशान्तर में भ्रमते रहे और ज्ञान बिना अविद्यक संसार में जन्ममरण में भटकते रहे | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! योगेश्वरों को भूत, भविष्य, वर्तमान, तीनों कालों का ज्ञान कैसे होता है और  एक देश में स्थित हुआ सर्वत्र कर्मों को कैसे करता है सो सब मुझसे कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! अज्ञानी की वार्त्ता यह मैंने तुमसे कही है और जितना जगत् है सो सब चिदाकाशस्वरूप है | जिसको ऐसी सत्ता का ज्ञान हुआ है वे महापुरुष हैं | जैसे स्वप्ने से कोई पुरुष जागे तो स्वप्ने की सब दृष्टि उसको अपना ही स्वरूप भासती है और उसमें कन्धायमान नहीं होता | यह सब नानात्व भासती है सो नाना नहीं और अपनी भी नहीं केवल आत्मसत्ता ज्यों की त्यों अपने आप में स्थित है | जैसे आकाश अपनी शून्यता में स्थित है, तैसे ही आत्मा अपने आपमें स्थित है | ये तीनों काल भी ज्ञानवान् को ब्रह्मरूप हो जाते हैं और सब जगत् भी ब्रह्मरूप हो जाते हैं और द्वैतभाव उसका मिट जाता है | ऐसे ज्ञानवान् को ज्ञानी ही जानता है और कोई नहीं जान सकता, जैसे अमृत को जो पान करता है सो ही उसके स्वाद को जानता है और कोई जान नहीं सकता | हे रामजी! ज्ञानी और अज्ञानी की चेष्टा तो तुल्य भासती है परन्तु ज्ञानी के निश्चय में कुछ और है और अज्ञानी के निश्चय में और है | जिसका हृदय शीतल हुआ है वह ज्ञानवान् है और जिसका हृदय जलता है वह अज्ञानी है | वह बाँधा हुआ है और ज्ञानवान् का शरीर चूर्ण हो अथवा उसे राज्य प्राप्त हो तो भी उसको रागद्वेष नहीं उपजता, वह सदा ज्यों का त्यों एकरस रहता है | वह जीवन्मुक्त है परन्तु यह लक्षण उसका कोई जान नहीं सकता वह आपही जानता है शरीर को दुःख और सुख भी प्राप्त होता है, मरता और रुदन भी करता है और हँसता, लेता और देता भी है और इससे लेकर सब चेष्टा करता दृष्टि आता है पर वह अपने निश्चय में दुःखी होता है, सुखी होता है, देता है और लेता है-सदा ज्यों का त्यों रहता है | हे रामजी! व्यवहार तो उसका भी अज्ञानी की नाईं ही दृष्टि आता है परन्तु हृदय से उसका निश्चय होता है और अद्भुत पद में स्थित रहता है कदाचित् नहीं गिरता | उसका परम उदित रूप होता है और रागसहित भी दृष्टि आता है परन्तु हृदय से राग किसी में नहीं करता, क्रोध करता भी दृष्टि आता है परन्तु उसको क्रोध कदाचित् नहीं होता | जैसे आकाश शुभपदार्थ को धारता है और धूम और बादल से ढापा भी दृष्टि आता है परन्तु किसी से स्पर्श नहीं करता, तैसे ही ज्ञानवान् में सब क्रिया दृष्टि आती हैं परन्तु अपने निश्चय में वह किसी से  स्पर्श नहीं करता | जैसे नटवा स्वाँग ले आता है और चेष्टा करता दीखता है पर हृदय से  अपने नटत्व भाव में निश्चय होता है, तैसे ही ज्ञानवान् को भी सब क्रिया में अपना आत्म भाव निश्चय होता है | जैसे जिसको स्वप्ना आता है वह यदि स्वप्न में भी अपना पूर्वरूप स्मरण रखता है तो स्वप्न के पदार्थ में बर्तता है तो भी उनके मुख में आपको  सुखी नहीं मानता और दुःख में आपको दुःखी नहीं मानता-सब सृष्टि उसको अपना ही स्वरूप भासती है, तैसे ही ज्ञानवान् को अपने स्वरूप के निश्चय से सुख-दुःख का क्षोभ नहीं होता | जो ऐसे पुरुष हैं उनको दुःख से क्या होता है? जैसे उनकी इच्छा होती है तैसे  ही सिद्ध होकर भासती है | हे रामजी! यह जितनी सृष्टि है सो सब चित्सत्ता में है और  योगीश्वर पुरुष उसी में स्थित होकर जहाँ प्राप्त हुआ चाहते हैं वहाँ अन्तवाहक से जा प्राप्त होते हैं और तीनों काल उनको विद्यमान होते हैं साधन कुछ नहीं परन्तु ज्ञानी अवश्य करके किसी निमित्त यत्न नहीं करते-जैसा प्राप्त होता है उसी में प्रसन्न रहते हैं | हे रामजी! एक काल में ब्रह्माजी ऊर्ध्वमुख से सामवेद को गायन करते थे और सदाशिव का मान किया तब सदाशिव ने अपने नख से ब्रह्मा का पाँचवाँ शीश काट डाला परन्तु ब्रह्माजी के मन में कुछ क्रोध फुरा | उन्होंने विचारा कि मैं चिदाकाश हूँ सो अब भी चिदाकाश हूँ मेरा तो कुछ गया नहीं, शिर से मेरा क्या प्रयोजन है? कुछ हानि है और कुछ लाभ है | हे रामजी! इस प्रकार सर्व विश्व रचनेवाले ब्रह्मा का शिर कटा, जो वे फिर भी शिर लगा लेते तो समर्थ थे परन्तु उनको लगाने का कुछ प्रयोजन था और लगाने में कुछ हानि भी थी | उनका भी निश्चय सदा आत्मपद में हैं इस कारण उन्हें कुछ क्षोभ हुआ | हे रामजी! काम के सदृश और कोई विकार नहीं है | जो सदाशिव पार्वती को बायें अंग में धारते हैं और कामदेव के पाँच बाण चलने से सर्वविश्व मोहित होता है उस काम को सदाशिव ने भस्म कर डाला तो क्या स्त्री के त्यागने को वे समर्थ नहीं हैं परन्तु उनको रागद्वेष कुछ नहीं इस कारण त्याग नहीं करते |  त्यागने से कुछ अर्थ की सिद्धि नहीं होती और रखने से कुछ अनर्थ नहीं होता-जो कुछ प्रवाहपतित कार्य होता है उसको करते हैं खेद नहीं मानते इससे वे जीवन्मुक्त हैं | विष्णुजी सदा विक्षेप में रहते हैं, आप भी कर्मकरते हैं और लोगों से भी कराते हैं और लोगों से भी कराते हैं और शरीर धारते हैं और त्याग भी देते हैं इत्यादिक क्षोभ में रहते हैं सो त्यागने को समर्थ भी हैं परन्तु त्यागने में उनका कुछ कार्य सिद्ध नहीं होता और करने में कुछ हानि नहीं होती | उनको लोग कई गुणों से गुणवान् जानते और मुझको तो शुद्ध चिदाकाश रूप भासता है | मूर्ख कहते हैं कि विष्णु श्याम सुन्दर हैं परन्तु वे शुद्ध चिदाकाशरूप हैं और सदा शुद्धस्वरूप में उनको अहंप्रत्यय है | आकाशमार्ग में जो सूर्य स्थित है वे कभी ऊर्ध्व की ओर और कभी नीचे जाते हैं तो क्या उनको स्थित होने की सामर्थ्य नहीं है? है परन्तु चलना और ठहरना दोनों उनको सम है और खेद से रहित होकर प्रवाहपतित कार्य में रहते हैं इससे जीवन्मुक्त हैं | जीवन्मुक्त चन्द्रमा भी है सो घटते घटते सूक्ष्म होते दृष्टि आते हैं और कभी बढ़ते जाते, शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्ष उनमें होते हैं और रात्रि को प्रकाशते हैं तो क्या वे अपनी क्रिया को त्याग नहीं सकते? नहीं त्याग सकते हैं, परन्तु क्षोभ से रहित होकर प्रवाहपतित कार्य में बिचरते हैं इससे जीवन्मुक्त हैं | अग्नि सदा दौड़ता  रहता है और यज्ञ और होम के भोजन करने को सर्व ओर जाता है तो क्या उसको गृह में बैठने की सामर्थ्य नहीं है? है परन्तु जो कुछ अपना आचार है उसको वह नहीं त्यागता, क्योंकि ठहरने में उसका कुछ कार्य सिद्ध नहीं होता और चलने में कुछ हानि नहीं होती-दोनों में वे तुल्य जीवन्मुक्त हैं | हे रामजी! वृहस्पति और शुक्र को बड़ा क्षोभ रहता है, वृहस्पति देवताओं की जय के निमित्त यत्न करते हैं और शुक्र दैत्यों की जय के निमित्त यत्न करते रहते हैं तो क्या इनको त्यागने की सामर्थ्य नहीं है परन्तु दोनों इनको तुल्य हैं इस कारण खेद से रहित होकर अपने कार्य में विचरते है इससे जीवन्मुक्त पुरुष हैं | हे रामजी! राज्य में बड़े क्षोभ होते हैं पर राजा जनक आनन्दसहित राज्य करता है और जीवन्मुक्त है- और प्रह्लाद, बलि, वृत्रासुर और मुर आदि दैत्य जीवन्मुक्त हुए हैं और समताभाव को लिये खेद से रहित नाना प्रकार की चेष्टा करते रहे हैं और हृदय से शीतल और जीवन्मुक्त रहे हैं | राजा नल, दिलीप और मान्धाता आदि ने भी समताभाव को ले राज्य किया है सो जीवन्मुक्त हैं | ऐसे ही अनेक राजा हुए हैं और उनमें रागवान् भी दृष्टि आये हैं परन्तु हृदय में रागद्वेष से रहित शीतलचित्त रहे हैं | हे रामजी! ज्ञानी और अज्ञानी की चेष्टा तुल्य होती है परन्तु इतना भेद है कि ज्ञानी का चित्त शान्त है और अज्ञानी का चित्त क्षोभ में है, इष्ट की प्राप्ति में वह हर्षवान् होता है और  अनिष्ट की प्राप्ति में द्वेष करता है और ग्रहणत्याग की इच्छा से जलता है, क्योंकि उसको संसार सत्य भासता है और जिसका चित्तशान्त हो गया है उसके भीतर राग है, द्वेष है, स्वाभाविक शरीर की जो प्रारब्ध होती है उसमें कुछ अपना अभिमान नहीं  होता | उसके निश्चय में सब आकाशरूप हैं, जगत् कुछ बना नहीं-भ्रममात्र है जैसे आकाश में नीलता भ्रममात्र है और दूर नहीं होती तैसे ही यह जगत् भ्रम से भासता है परन्तु है नहीं | जैसे आकाश में नाना प्रकार के तरुवरे भासते हैं तैसे ही आत्मा में जगत् भासता है और जैसे काष्ठ की पुतली काष्ठरूप होती है, तैसे ही जगत् भ्रमरूप है | जो कुछ भ्रम से भिन्न भासता है वह सब भविष्यनगर में असत्य है और जो कुछ तुम्हें दृष्टि आता है सो कुछ नहीं केवल सर्व कलना से रहित, शुद्धसंवित जड़ता बिना मुक्त स्वभाव एक अद्वैत आत्मसत्ता स्थित है और केवल आकाशरूप है, उसमें जगत् भी वही रूप है और पाषाण की शिला वत् घन मौन है | तुम भी उसी रूप में स्थित हो रहो |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तलक्षणवर्णनन्नाम द्विशताधिकैकोनविंशतितमस्सर्गः ||219||

अनुक्रम


विपश्चिदुपाख्यान वर्णन

रामजी ने पूछा, हे भगवन्! उस राजा विपश्चित् ने फिर क्या किया? वशिष्ठजी बोले, हे  रामजी! जो उनकी दशा हुई है सो तुम सुनो | पश्चिम दिशा का विपश्चित् वन में बिचरता फिरता था कि एक मत्त हाथी के वश पड़ा और उसने उसे पहाड़ की कन्दरा में मार डाला, दूसरे विपश्चित् को राक्षस ले गया और बड़वाग्नि में डाल दिया वहाँ अग्नि ने उसे भक्षण कर लिया, तीसरे विपश्चित् को एक विद्याधर स्वर्ग में ले गया और उसने वहाँ इन्द्रका मान किया इसलिये उसको इन्द्र ने शाप दिया और वह भस्म हो गया, इसी प्रकार चौथा भी हुआ उसके एक मच्छ ने आठ टुकड़े कर डाले | जैसे प्रलयकाल में लोक भस्म हो जाते हैं तैसे ही चारों विपश्चित् मर गये | तब उनकी संवित्त आकाशरूप हुई परन्तु उनको जगत् देखने का संस्कार था इससे उनको आकाशरूप संवित् फिर आन फुरी उससे जाग्रत भासने लगा और पृथ्वी, द्वीप, समुद्र, स्थावर जंगमरूप जगत् को देखा और अन्तवाहक शरीर से चेष्टा करने लगे | उनमें से एक पश्चिम दिशा का विपश्चित् विष्णु भगवन् के स्थान में मुआ निर्वाण हो गया इससे उसकी संवित् में सर्व अर्थ शून्य हो गये और वह वहाँ मुक्त हुआ | एक मच्छ के उदर में सहस्त्र वर्ष पर्यन्त रहा उससे फिर एक देश का राजा हुआ और वहाँ राज्य करने लगा | एक चन्द्रमा के निकट जा वहाँ मरके चन्द्रमा के लोक को प्राप्त हुआ और एक बहता हुआ समुद्र के पार हुआ और आगे चौरासी हजार योजन पृथ्वी को लाँघता गया | इसी प्रकार चारों फिर जिये और समुद्र बन और पर्वतों को लाँघते गये | सबके आगे दसशहस्त्र योजन सुवर्ण की पृथ्वी आई जहाँ देवताओं के बिचरने के स्थान हैं उनको भी वे लाँघते गये | आगे लोकालोक पर्वत आया जिसने सर्व पृथ्वी को आवरण किया है-जैसे वृक्षों से वन का आवरण होता है, तैसे ही उस  पर्वत ने पञ्चाशत्कोटि योजन पृथ्वी को आवरण किया है और पचास हजार योजन ऊँचा है- वे उस लोकालोक पर्वत में पहुँचे जहाँ तारों का नक्षत्र चक्र फिरता है उसको भी वे लाँघ गये | उसमें आगे एक शून्य नक्षत्र था सो महाशून्य था जहाँ पृथ्वी, जल आदिक तत्त्व कोई था, एक शून्य आकाश है जहाँ कोई स्थावर पदार्थ है, कोई जंगम पदार्थ  है, कोई उपजे है, कभी मिटे है उसको भी उन्होंने देखा | इसी प्रकार सम्पूर्ण भूगोल को उन्होंने देखा | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! भूगोल क्या है, किसके आश्रय है  और उसके ऊपर क्या है?  वसिष्ठजी बोले, हे रामजी! जैसे गेंद होता है, तैसे भूगोल है और संकल्प के आश्रय है | सब ओर उसके आकाश है और सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र सहित चक्र फिरता है | हे राम जी! यह कोई वस्तु बुद्धि से नहीं बनी संकल्प से बनी है जो वस्तु बुद्धि से बनी होती है सो क्रम से स्थित होती है और यह तो विपर्ययरूप से स्थित है | पृथ्वी के चहुँफेर दशगुण जल है उससे परे दशगुणी अग्नि है, उसके उपरान्त दशगुणा वायु है और फिर  ब्रह्माण्ड खप्पर है | वह खप्पर एक अधः को और एक ऊर्ध्व को गया है और उसके मध्य में  जो पोल है वह आकाश है जो वज्रसार की नाईं है और अनन्तकोटि योजन का उसका विस्तार है | उस ब्रह्माण्ड का उसमें भूगोल है, उसके उत्तर दिशा में सुमेरु पर्वत है, पश्चिम दिशा में लोकालोक पर्वत है और ऊपर नक्षत्रचक्र फिरता है | जहाँ वह जाता है वहाँ प्रकाश होता है और जहाँ वह नहीं होता वहाँ तमरूप भासता है सो सब संकल्परचना है | जैसे बालक संकल्प से पत्थर का बट्टा रचे, तैसे ही चैतन्यरूपी बालक ने यह संकल्परूपी भूगोल रचा है | हे रामजी! जैसे-जैसे उस समय उसमें निश्चय हुआ है तैसे ही स्थित हुआ है | जहाँ पृथ्वी स्थित रची है वहाँ ही स्थित है और जहाँ खात रची है वहाँ खात ही है परन्तु जैसे स्वप्ने में अविद्यमान प्रतिभा होती है तैसे ही भूगोल है | हे रामजी! जिनको ऐसा ज्ञान है कि सुमेरु में देवता और पूर्वादि दिशाओं में मनुष्य आदि जीव रहते हैं पण्डित हैं तो भी मूर्ख हैं, क्योंकि ये तो भ्रममात्र हैं कुछ बने नहीं | जो हमसे आदि लेकर तत्त्ववेत्ता हैं उनको ज्ञाननेत्र से आत्म सत्ता ज्यों की त्यों भासती है और जो मन सहित षट्इन्द्रियों से अज्ञानी देखते हैं उनको जगत् भासता है | ज्ञानवानों को परब्रह्म सूक्ष्म ज्यों का त्यों भासता है और जगत् को वे असत् जानते हैं | जैसे आकाश में अनहोती नीलता भासती है, तैसे ही आत्मा में अनहोता जगत् भासता है | जैसे नेत्रदूषण से आकाश में तरुवरे भासते हैं, तैसे ही अज्ञान से आत्मा में जगत् भासता है सो केवल आभासमात्र है | हे रामजी! जगत् उपजा भी दृष्टि आता है और नष्ट होता भी दृष्टि आता है परन्तु बना कुछ नहीं | जैसे संकल्प का रचा नगर अपने मन में भासता है, तैसे ही यह जगत् मन में फुरता है | यह सम्पूर्ण भूगोल संकल्प में स्थित है | जैसे बालक संकल्प करके पत्थर का बट्टा रचे तैसे ही भूगोल है | यह ब्रह्माण्ड सौ कोटि योजन पर्यन्त है | उसका एक भाग अधः को गया है और एक ऊर्ध्व को गया है, उसमें चैतन्यरूपी बालक ने यह भूगोल रचा है सो संकल्प के आश्रय खड़ा है | जैसे आदि नीति हुई है, तैसे ही भासता है | इस पृथ्वी के उत्तर दिशा में सुमेरु पर्वत है, पश्चिम दिशा की ओर लोकालोक पर्वत है और ऊपर तारों और नक्षत्रों का चक्र फिरता है, लोकालोक के जिस ओर वह जाता है उस ओर प्रकाश होता है | भूगोल ऐसे है, जैसे गेंद होता है और इसके एक ओर पाताल है, एक ओर स्वर्ग है, एक ओर मध्यमण्डल है और आकाश सर्व ओर है | आकाशवासी जानते हैं कि हम ऊर्ध्व हैं और मध्यवासी जानते हैं कि हम ऊर्ध्व है | इस प्रकार भूगोल है और उसके ऊपर महातमरूप एक शून्य खात है | जहाँ पृथ्वी है, कोई पहाड़ है, स्थावर है जंगम है और कुछ उपजा है | उसके ऊपर एक सुवर्ण की दीवार है जिसका दश सहस्त्र योजन विस्तार है और उसके ऊपर दशगुणा जल है सो पृथ्वी को चहुँ फेर से घेरे हैं, उससे परे दशगुण अग्नि है, फिर दशगुण वायु है और उसके आगे आकाश है | फिर ब्रह्माकाश महाकाश है जिसमें अनन्त ब्रह्माण्ड स्थित हैं परन्तु ये तत्त्व  जैसे तृण के आश्रय कपूर ठहरता है तैसे ही पृथ्वीभाग के आश्रय ठहरे हैं | वास्तव में  शुद्ध चैतन्य ब्रह्म का चमत्कार है जो आकाशवत् निर्मल है और उसमें कोई क्षोभ नहीं है, परमशान्त, अन्त और सर्व का अपना आप है | हे रामजी! अब फिर विपश्चित् की वार्ता सुनो | जब वे लोकालोक पर्वत पर जा स्थित हुए तब एक शून्य खात (खाई) उनको दृष्ट आया और पर्वत से उतरकर खात में वे जा पड़े | वह खात भी पर्वत के शिखर पर था और वहाँ शिखर की नाईं बड़े बड़े पक्षी भी रहते थे इस कारण उन पक्षियों ने चोंचों से  इनके शरीर चूर्ण किये, तब उन्होंने अपने स्थूल शरीर को त्यागकर अपना सूक्ष्म अन्त वाहक शरीर जाना | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! आधिभौतिक कैसे होती है और अन्तवाहक क्या है? फिर उन्होंने क्या किया? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! तैसे कोई संकल्प से दूर से दूर चला जावे तो जिस शरीर से जावे वह अन्तवाहक है और जो पाञ्चभौतिक शरीर प्रत्यक्ष भासता है सो आधिभौतिक है | जब मार्ग से कहीं जाने को चित्त का संकल्प उठता है तब स्थूल शरीर से गए बिना नहीं पहुँच सकता  और जब मार्ग में चले तब पहुँचता है सो ही आधिभौतिक है और यह प्रमाद से होता है | जैसे रस्सी के झूलने से सर्प भासता है, तैसे ही आत्मा के अज्ञान से आधिभौतिक शरीर भासता है और जैसे कोई मनोराज का पुर बना के उसमें आप भी एक शरीर बनकर चेष्टा करता फिरे तो उसे जब तक पूर्व का शरीर विस्मरण नहीं हुआ तब तक वह संकल्प शरीर से चेष्टा करता है सो अन्तवाहक है | उस शरीर को संकल्पमात्र जानना-विशेष बुद्धि कहाती है | आत्मबोध हुए बिना जो उस संकल्पशरीर में दृढ़ भावना होती है तो उसका नाम आधि भौतिक होता है-सो घट बढ़ कहाता है | इससे जब तक शरीर का स्मरण है तब तक आधि- भौतिकता निवृत्त नहीं होती और जब शरीर का विस्मरण होता है तब आधिभौतिकता मिट जाती है | विपश्चित् आत्मबोध से रहित थे और जहाँ चाहते थे वहाँ चले जाते थे पर स्वरूप से   कुछ अन्तवाहक है और कुछ आधिभौतिक है, प्रमाद से ये सब आकार भासते हैं | वास्तव में सब चिदाकाशरूप है, दूसरी वस्तु कुछ नहीं बनी सब वही है और उसी के प्रमाद  से विपश्चित् अविद्यक जगत् को देखने चले थे | वह अविद्या भी कुछ दूसरी वस्तु नहीं- ब्रह्म ही है तो ब्रह्म का अन्त कहाँ आवे | वहाँ से वे चले परन्तु जानें कि हमारा अन्तवाहक शरीर है | निदान वे सब पृथ्वी को लाँघ गये | फिर जल को भी लाँघ गये और उसके परे जो सूर्य दाहक अग्नि का आवरण प्रकाशवान् है तिसको भी लाँघकर मेघ और वायु  के आवरण को भी लाँघे | फिर आकाश को भी लाँघ गये तो उसके परे ब्रह्माकाश था जहाँ उनको संकल्प के अनुसार फिर जगत् भासने लगा पर उसको भी लाँघे | फिर आगे ब्रह्माकाश मिला और फिर उनको पञ्चभूत भासि आये,  उसके आवरण को भी लाँघ गये | फिर उस ब्रह्माण्डकपाट के परे तत्त्वों को लाँघकर ब्रह्माकाश आया, उसमें एक और पाञ्चभौतिक ब्रह्माण्ड था | उसको भी लाँघ गये पर अन्त पाया | स्वरूप के प्रमाद से दृश्य के अन्त लेने को वे भटकते फिरे पर अविद्यारूप संसार का अन्त कैसे आवे? यह जीव तब तक अन्त लेने को भटकता फिरता है जब तक अविद्या नष्ट नहीं होती, जब अविद्या नष्ट होगी तभी अविद्यारूप संसार का अन्त होगा | हे रामजी! जगत् कुछ बना नहीं वही ब्रह्माकाश ज्यों का त्यों स्थित है और उसका जानना ही संसार है | जब तक उसका प्रमाद है तब तक जगत् का अन्त आवेगा और जब स्वरूप का ज्ञान होगा तब अन्त आवेगा | सो वह जानना क्या है? चित्त को निर्वाण करना ही जानना है | जब चित्त निर्वाण होगा तब जगत् का अन्त आवेगा | जब तक चित्त भटकता फिरता है तब संसार का अन्त नहीं आता | इससे चित्त का नाम ही संसार है | जब चित्त आत्मपद में स्थित होगा तब जगत् का अन्त होगा इस उपाय बिना शान्ति नहीं प्राप्त होती | 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विपश्चिदुपाख्यानवर्णनंनाम द्विशताधिकविंशतिस्सर्गः ||220||

अनुक्रम


विपश्चिच्छरीरप्राप्तिर्नाम

रामजी ने पूछा,हे भगवन्! वे जो दो विपश्चित् थे उनकी क्या दशा हुई, यह भी कहो | वे तो दोनों एक ही थे | वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! एक तो निर्वाण हुआ था और दूसरा ब्रह्माण्डों को लाँघता लाँघता और एक ब्रह्माण्ड में गया तब वहाँ उसको सन्तों का संग प्राप्त हुआ और उनकी संगति से उसको ज्ञान प्राप्त हुआ | ज्ञान को पाकर वह भी निर्वाण हो गया | एक अब तक दूर फिरता है और यहाँ एक पहाड़ की कन्दरा में मृग होकर बिचरता हे | हे रामजी! यह जगत् आत्मा का आभास है | जैसे सूर्य की किरणों में जल भासता है और जब तक किरणें हैं तबतक जलाभास निवृत्त नहीं होता, तैसे ही जब तक आत्मसत्ता है तब तक जगत् का चमत्कार निवृत्त नहीं होता और आत्मा के जाने से जगत् सत्ता नहीं रहती | जैसे किरणों के जाने से जलाभास नहीं रहता और जो जल भासता है तो भी किरणों ही की सत्ता भासती है,  तैसे ही आत्मा के जाने से आत्मा की सत्ता ही भासती है-भिन्न जगत् की सत्ता नहीं भासती | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! विपश्चित् एक ही था तो एक ही संवित् में भिन्न भिन्न वासना कैसे हुई? एक मुक्त हो गया, एक मृग होकर फिरता रहा और एक आगे निर्वाण हो गया-यह भिन्नता कैसे हुई? संवित् तो एक ही थी उसमें कम और अधिक फल कैसे हुए सो कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! वासना जो होती है सो देशकाल और पदार्थों से होती है | उसमें जिसकी दृढ़ भावना होती है उसकी जय होती है | जैसे एक पुरुष ने मनोराज से अपनी चार मूर्त्तियाँ कल्पीं और उनमें भिन्न भिन्न वासना स्थापित की पर संवित् तो एक है, यदि पूर्व का शरीर भूलकर उसमें दृढ़ हो गये तो जैसी जैसी भावना उनके शरीर में दृढ़ होती है वही प्राप्त है, तैसे ही संवित् में नाना प्रकार की वासना फुरती हैं | जैसे एक ही संवित् स्वप्ने में नाना प्रकार धारती है और भिन्न भिन्न वासना होती है, तैसे ही आकाशरूप संवित् में भिन्न भिन्न वासना होती है | हे रामजी! संवित् उनकी एक थी परन्तु देश, काल और क्रिया से वासना भिन्न भिन्न हो गई और पूर्व की संवित् स्मृति भूल गई उससे उन्होंने न्यून और अधिक फल पाये | वह संवित् क्या रूप है? हे रामजी! देश से देशान्तर को जो संवेदन जाती है उसके मध्य जो संवित्तसत्ता है सो ब्रह्मसत्ता है | जैसे जाग्रत के आकार को छोड़ा और  स्वप्ना नहीं आया उसके मध्य जो ब्रह्मसत्ता है वह किञ्चनरूप जगत् होकर भासती है परन्तु किञ्चन भी कुछ भिन्न वस्तु नहीं! वह एक है दो है, एक कहना भी नहीं होता तो दो कहाँ हो और जगत् कहाँ हो? यही अविद्या है कि है नहीं और भासती है | जैसी जैसी वासना फुरती है उसमें जो दृढ़ होती है उसकी जय होती है | इस कारण एक विपश्चित् जनार्दन (विष्णु) के स्थान में निर्वाण हो गया और दूसरा दूर से दूर ब्रह्माण्ड को लाँघता गया और उसको सन्तों का संग प्राप्त हुआ जिससे ज्ञान उदय होकर वासना मिट गई और उसका अज्ञान नष्ट हो गया | जैसे सूर्य के उदय हुए अन्धकार नष्ट हो जाता है, तैसे ही जब उसका अज्ञान नष्ट हो गया तब वह उस पद को प्राप्त भया जिसके अज्ञान से दूर से दूर भटकता है | तीसरा दूर से दूर भटकता फिरता है और चौथा पहाड़ की कन्दरा में मृग होकर बिचरता है | हे राम जी! जगत् कुछ वस्तु नहीं, अज्ञान के वश से भटकता है इसलिये अज्ञान ही जगत् है जबतक अज्ञान है तबतक जगत् है | जब ज्ञान उदय होता है तब वह अज्ञान को नाश करता है और तभी जगत् का अभाव हो जाता है | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! यह जो मृग हुआ है सो कहाँ कहाँ फिरा है और कहाँ कहाँ स्थित हुआ है? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! दो ब्रह्माण्ड को लाँघते दूर से दूर चले गये थे, उनमें से एक अब तक चला जाता है और पृथ्वी, समुद्र, वायु आकाश उसकी संवित् में फुरते हैं | यह तो दूर से चला गया है और  हमारी आधिभौतिक दृष्टि का विषय नहीं और एक ब्रह्माण्ड को लाँघता गया था पर अब इस जगत् में पहाड़ की कन्दरा का मृग हुआ है सो हमारी इस दृष्टि का विषय है | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! ये तो दूर गये थे और उनमें से एक इस जगत् में अब मृग हुआ है, तुमने कैसे जाना कि आगे वह ब्रह्माण्ड में था और अब इस जगत् में है? वशिष्ठजी बोले हे रामजी!मैं ब्रह्म हूँ और सर्व ब्रह्माण्ड मेरे अंग हैं | मुझको सबका ज्ञान है |  जैसे अवयवी पुरुष अपने अंगों को जानता है कि यह अंग फुरता है और यह नहीं फुरता, तैसे ही मैं सबको जानता हूँ | जहाँ जहाँ यह लाँघता गया है उसे बुद्धि के नेत्रों से  मैं जानता हूँ परन्तु तुम नहीं जान सकते | जैसे समुद्र में अनेक तरंग फुरते हैं और समुद्र सबको जानता है, तैसे ही मैं समुद्ररूप हूँ और मेरे में ब्रह्माण्डरूपी तरंगें हैं इससे मैं सबको जानता हूँ | हे रामजी! वह जो मृग है सो दूर ब्रह्माण्ड में फिरता है | वह विपश्चित् यह सामान्य मृग नहीं है परन्तु जैसा है सो सुनो! हे रामजी! एक ब्रह्माण्ड इस हमारे ब्रह्माण्ड सा है जिसका ऐसा ही आकार है, ऐसी ही चेष्टा है, एक ही सा जगत् है और स्थावर-जंगम सब एक ही से हैं | वहाँ जो देश, काल और क्रिया का बिचरना होता है सो इसके ही समान होता है | जैसे नामरूप आकार यहाँ होते हैं, जैसे बिम्ब का प्रतिबिम्ब तुल्य ही होता है और जैसे एक ही आकार का एक प्रतिबिम्ब जल में होता है और द्वितीय दर्पण में होता है सो दोनों तुल्य हैं, तैसे ही दोनों ब्रह्माण्ड एक समान हैं और ब्रह्मरूपी आदर्श में प्रतिबिम्बित होते हैं | इस कारण यह मृग विपश्चित् है इसी निश्चय को धारे हुए है यह  और वह दोनों तुल्य हैं सो पहाड़ की कन्दरा में हैं | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! वह विपश्चित् अब कहाँ है और उसका क्या आचार है? अब मैं जानता हूँ कि उसका कार्य हुआ है | अब चलकर मुझको दिखाओ और उसको दर्शन देकर अज्ञानफाँस से मुक्त करो | इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे अंग! जब रामजी ने इस प्रकार कहा तब मुनिशार्दूल वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जहाँ तुम्हारा लीला का स्थान है और तुम क्रीड़ा करते हो उस ठौर में वह मृग बाँधा हुआ है | यह तुमको तिरगदेश के राजा ने दिया है सो बहुत सुन्दर है इस कारण तुमने उसे रखा है | उसको मँगाओ | तब रामजी ने अपने सखाओं से, जो निकटवर्ती थे, कहा कि उस मृग को सभा में ले आओ | हे राजन्! जब इस प्रकार रामजी ने कहा तब वे सभा में उस मृग को ले आये और जितने श्रोता सभा में बैठे थे वे बड़े आश्चर्य को प्राप्त हुए | वह मृग बड़ी ग्रीवा किये महासुन्दर और कमल की नाईं नेत्रवाला था, कभी वह घास खाने लगे, कभीं सभा में खेले और कभी ठहर जावे | तब रामजी ने कहा, हे भगवन्! आप इसको कृपा करके मनुष्ययोनि को प्राप्त कीजिये और उपदेश करके जगाइये कि हमारे साथ प्रश्न-उत्तर करे, अभी तो यह प्रश्न-उत्तर नहीं करता? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इस प्रकार उसको उपदेश लगेगा, क्योंकि जिसका कोई इष्ट होता है उसी से उसको सिद्धि होती है, इससे मैं इसके इष्ट को ध्यान करके बुलाता हूँ- उससे इसका कार्य सिद्ध होगा | बाल्मीकिजी बोले, हे राजन्? इस प्रकार कहकर वशिष्ठजी ने कमण्डलु हाथ में लेकर तीन आचमन किया और पद्मासन बाँध, नेत्र मूँद और ध्यान में स्थित होकर अग्नि का आवाहन किया | हे वह्ने! यह तेरा भक्त है इसकी सहायता करो इस पर दया करो | तुम सन्तों का दयालु स्वभाव है | जब ऐसे वशिष्ठजी ने कहा तब सभा में बड़े प्रकाश धारे अग्नि की ज्वाला काष्ठ अंगार से रहित प्रकट हुई और जलने लगी | जब ऐसे अग्नि जागी तब वह मृग उसे देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसके चित्त में बड़ी भक्ति उत्पन्न हुई | तब वशिष्ठजी ने नेत्र खोलकर अनुग्रह सहित मृग की ओर देखा |उससे उसके सम्पूर्ण पाप दग्ध हो गये | वशिष्ठजी ने अग्नि से कहा, हे भगवन्, वह्ने! यह तेरा भक्त है | अपनी पूर्व की भक्ति स्मरण करके इस पर दया करो और उसके मृगशरीर को दूर करके इसको विपश्चित् शरीर दो कि यह अविद्याभ्रम से मुक्त हो | हे राजन्! इस प्रकार वशिष्ठजी अग्नि से कहकर रामजी से बोले, हे रामजी! अब यही मृग अग्नि में प्रवेश करेगा तब इसका मनुष्यशरीर हो जावेगा | ऐसे वशिष्ठजी कहते ही थे कि अग्नि को वह मृग देखकर एक चरण पीछे को हटा और उछलकर अग्नि में प्रवेश कर गया | जैसे बाण निशान में प्रवेश करते हैं, तैसे ही उसने प्रवेश किया | हे राजन्! उस मृग को कुछ खेद हुआ बल्कि उसको अग्नि आनन्दरूप दृष्टि आया | तब उसका मृगशरीर अन्तर्धान हो गया और महाप्रकाशरूप मनुष्यशरीर को धारे अग्नि से निकला | जैसे कपड़े के ओढ़े से स्वाँगी स्वाँग धारण कर निकल आता है, तैसे ही वह निकल आया और अति सुन्दर वस्त्र पहिरे हुए, शशि पहिरे हुए, शीश पर मुकुट, कण्ठ, में रुद्राक्ष की माला और यज्ञोपवीत धारण किये था | अग्निवत् वह तेजवान् था किन्तु सभा में जो बैठे थे उनसे भी अधिक उसका तेज था मानो अग्नि को भी लज्जित किया है | जैसे सूर्य के उदय हुए चन्द्रमा का प्रकाश लज्जित हो जाता है, तैसे ही वह सर्व से प्रकाशवान् हो गया | फिर जैसे समुद्र से तरंग निकलकर लीन हो जाता है, तैसे ही वह अग्नि अन्तर्धान हो गये | उसको देखकर रामजी आश्चर्य को प्राप्त हुए और सर्वसभा विस्मय को प्राप्त हुई | तब बड़े प्रकाश को धारनेवाला विपश्चित् निकलकर ध्यान में लग गया और विपश्चित् से आदि लेकर इस शरीरपर्यन्त सर्व शरीर स्मरण करके नेत्र खोल वशिष्ठजी के निकट साष्टांग प्रणाम कर बोला, हे ब्राह्मण! ज्ञान के सूर्य और प्राण के दाता! तुमको मेरा नमस्कार है | जब इस प्रकार उसने कहा तब वशिष्ठजी ने उसके शिर पर हाथ रखा और कहा, हे राजन्! तू उठ खड़ा हो | अब मैं तेरी अविद्या दूर करूँगा और तू अपने स्वरूप को प्राप्त होगा | तब राजा विपश्चित् ने उठकर राजा दशरथ को प्रणाम किया और बोला, हे राजन्! तेरी जय हो | तब राजा दशरथ ने अपने आसन से उठकर कहा, हे राजन्! तुम बहुत दूर फिरते रहे हो अब यहाँ मेरे पास बैठो | तब राजा विपश्चित् विश्वा मित्र आदिक जो ऋषि बैठे थे उनको यथायोग्य प्रणाम करके बैठ गया और राजा दशरथ ने विपश्चित् को, जो बड़े प्रकाश को धारे हुए था, भास कहके बुलाया और कहा, हे भास! तुम संसारभ्रम के लिये चिरकाल फिरते रहे हो, थके होगे अब विश्राम करो जो देश काल क्रिया की हैं और देखा है सो कहो! यह आश्चर्य है कि अपने मन्दिर में सोये हो और निद्रादोष से गढ़े में गिरते फिरे और देश देशान्तरों को भटकते फिरे | यही अविद्या है |हे भास! जैसे वन का विचरनेवाला हाथी जंजीर से बन्धायमान हुआ दुःख पाता है, तैसे ही तुम विपश्चित् भी थे और अविद्या से जगत् के देखने के निमित्त भटकते रहे | हे राजन्! जगत् कुछ वस्तु नहीं है पर भासता है यही माया है | जैसे भ्रम से आकाश में नाना प्रकार के रंग भासते हैं तैसे ही अविद्या से यह जगत् भासते हैं और सत्य प्रतीत होते हैं पर सब आकाशरूप ही आकाश में स्थित हैं | उस आकाश में जो कुछ तुमने आत्मरूपी चिन्तामणि के चमत्कार से देखा है सो कहो |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विपश्चिच्छरीरप्राप्तिर्नाम द्विशताधिकैकविंशतितमस्सर्गः ||221||

अनुक्रम

 


बटधानोपाख्यान वर्णन

दशरथजी बोले, हे भास! बड़ा आश्चर्य है कि तुम विपश्चित् बुद्धिमान थे और चेष्टा से  तुमने अविपश्चित् बुद्धि की है जो अविद्या के देखने को समर्थ हुए थे | यह जगत्् प्रतिभा तो मिथ्या उठी है, असत्य के ग्रहण की इच्छा तुमने क्यों की? बाल्मीकिजी बोले, हे राजन! जब इस प्रकार राजा दशरथ ने कहा तब प्रसंग पाकर विश्वामित्र बोले, हे राजन्, दशरथ! यह चेष्टा वही करता है जिसको परम बोध नहीं होता और केवल मूर्ख और अज्ञानी भी नहीं होता, क्योंकि जिसको परमबोध और आत्मा का अनुभव होता है वह जगत् को अविद्यक जानता है और उस अविद्यक जगत् के अन्त लेने को इतना यत्न नहीं करता, क्योंकि वह तो असत्य जानता है और जो देहअभिमान मूर्ख अज्ञ है वह भी यह यत्न नहीं करता, क्योंकि उसको देखने की सामर्थ्य भी नहीं होती | इससे मध्य भावी है | जो आत्मबोध से रहित है और जिसने आधिभौतिक शरीर त्याग किया है वही संसार देखने का यत्न करता है और जिनको उत्तम बोध नहीं हुआ वे इस प्रकार बहुत भटकते फिरते हैं | हे राजन्! इसी प्रकार बट धाना भी इसी ब्रह्माण्ड में फिरते हैं | सत्तर लक्ष वर्ष उनके व्यतीत हुए हैं कि इसी ब्रह्माण्ड में फिरते हैं | उनने भी यही निश्चय धारा है कि पृथ्वी कहाँ तक चली जाती है | इस निश्चय से वह निवृत्त नहीं होते और इसी ब्रह्माण्ड में भ्रमते हैं और उनको अपनी वासना के अनुसार विपरीत और ही औरस्थान भासते हैं | हे राजन्! जैसे किसी बालक का रचा संकल्प का वृक्ष आकाश में हो, तैसे ही यह भूगोल ब्रह्मा के संकल्प में स्थित है और संकल्प से गेंद के समान आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी इन पाँचों तत्त्वों का ब्रह्माण्ड रचा है और उसके चौफेर चींटियाँ फिरती हैं, जिस ओर से वे जाती हैं सो ऊर्ध्व भासता है सो और ही और निश्चय होता है, तैसे ही यह संकल्प के रचे भूगोल के किसी कोण में बटधाना जीव हुआ है | हे राजन्! उसके तीन पुत्र थे, उनको यह संकल्प उदय हुआ कि हम जगत् का अन्त देखें | इसी संकल्प से फिरते फिरते पृथ्वी लाँघते है फिर पृथ्वी और जल आता है जल लाँघते हैं फिर आकाश आता है फिर पृथ्वी, जल वायु फिर उसी भूगोल के चहुफेर फिरते रहे | जैसे आकाश में गेंद हो तैसे ही यह पृथ्वी आकाश में है और इसका अध-ऊर्ध्व कोई नहीं | चरण अध शिर ऊर्ध्व उसी के चौफेर घूमते रहे परन्तु अपने निश्चय से और का और जानते रहे | जबतक स्वरूप का प्रमाद है तबतक जगत् का अभाव नहीं होता और जब आत्मा का साक्षात्कार होता है तब जगत् ब्रह्मरूप हो जाता है | जगत् कुछ वन नहीं, फुरने में भासता है जैसे स्वप्ने में अज्ञान से अनन्त जगत् दीखते हैं कि यह फुरना परब्रह्म में हुआ है और जो फुरने में है सो भी परब्रह्म है और कुछ बना नहीं-आत्मसता ही अपने आपमें स्थित है | जैसे पत्थर की शिला घनरूप होती है, तैसे ही आत्मतत्त्व चैतन्यघन है | जैसे आकाश और शून्यता में कुछ भेद नहीं, तैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं | सब कल्पना परब्रह्मरूप है और ब्रह्म ही कल्पना रूप है | इस जड़ और चैतन्य में कुछ भेद नहीं | हे राजन्! जिसको जगत् शब्द से कहते हो वह ब्रह्मसत्ता ही है | कुछ उत्पन्न हुआ है और प्रलय होता है-सर्व ब्रह्म ही  है | जैसे पहाड़ में पत्थर से इतर कुछ नहीं होता, तैसे ही यह जगत् ब्रह्मसत्ता से इतर कुछ नहीं | जैसे पाषाण की पुतली पाषाणरूप ही है, तैसे ही जगत् ब्रह्मरूप ही है एक सूक्ष्म अनुभव अणु से अनेक अणु होते हैं, जैसे एक पहाड़ से अनेक शिला होती है | हे राजन्! जो ज्ञानवान् पुरुष हैं उनको जगत् भासता है और जो अज्ञानी हैं उनको नाना प्रकार हो भासता है | जगत् कुछ वस्तु नहीं है परन्तु जबतक संकल्प है तब तक जगत् फुरता है | जैसे रत्नों का चमत्कार होता है, तैसे ही जगत् आत्मा का चमत्कार है और चैतन्य आत्मा के आश्रय अनन्त सृष्टियाँ फुरती हैं सो सृष्टि सब आत्मरूप हैं आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं | जो जाग्रत पुरुष ज्ञानवान् हैं उनको ब्रह्मरूप ही भासता है और जो अज्ञानी हैं उनको नाना प्रकार का जगत् भासता है | हे राजन्! कई एक इसको शून्य कहते हैं कि शून्य ही है और कुछ नहीं, कई इसको जगत् कहते हैं और कई ब्रह्म कहते हैं | जैसा किसी को निश्चय होता है उसको वही रूप भासता है | आत्मरूपी चिन्ता मणि है जैसा जैसा संकल्प उसमें फुरता है तैसा तैसा ही भासता है | सबका अधिष्ठान ब्रह्मसत्ता है जैसा जैसा उसमें निश्चय होता है तैसा ही तैसा होकर भासता है और दृष्टा, दर्शन, दृश्य-त्रिपुटी जो भासती है सो भी ब्रह्म होकर भासती है द्वितीय कुछ  वस्तु नहीं और जो कुछ जगत् भासता है वही अज्ञान है | हे राजन्! जबतक वासना नष्ट नहीं होती तबतक दुःख भी नहीं मिटते और जब वासना मिट जावे- तब सर्व जगत् ब्रह्मरूप अपना आप ही भासे और रागद्वेष किसी में नहीं रहे | जैसे स्वप्न में नाना प्रकार की सृष्टि भासती हैं जब पूर्व का स्वरूप स्मरण आता है तो सर्वरूप आप हो जाता है और रागद्वेष मिट जाता है, तैसे ही ज्ञानवान् को यह जगत् ब्रह्मरूप अपना आप भासता है और विकार से रहित होता है | पूर्व, अपूर्व और अपर को विचारना कि यह शुभ है और यह अशुभ है, अशुभ को त्याग करना यह गौण विचार है | जबतक पूर्वापर मन में रहता है तबतक जगत् में भटकता है और बाँधा रहता है, क्योंकि शुभ-अशुभ दोनों जगत् में है जब इनका विस्मरण हो जावे और सम्पूर्ण जगत् को भ्रममात्र  जानकर आत्मपद में सावधान हो तब मुक्त होता है | इस जीव को अपनी वासना ही बन्धन का कारण है | जब तक जगत् में वासना होती है तबतक रागद्वेष उपजता है और उससे बँधा रहता है | जिनको जगत् के सुख दुःख में रागद्वेष की भावना नहीं उपजती और जिनकी वासना  भी नष्ट होती है उनको यह जगत् ब्रह्मरूप अपना आप ही भासता है और जगत् में दुःखदायक कुछ नहीं भासता | उनको सब ब्रह्म ही भासता है |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे बटधानोपाख्यानवर्णनन्नाम द्विशताधिकद्वाविंशतितमस्सर्गः ||222||

अनुक्रम


विपश्चितत््कथा वर्णन

दशरथजी ने विपश्चित् से पूछा, हे भास, तुम चिरकाल पर्यन्त जगत् में फिरते रहे हो जिस प्रकार तुमने चेष्टा की है और जो देश, काल, पदार्थ देखे हैं सो सब ही कहो | भास बोले, हे राजन्! मैं जगत् को देखता फिरा हूँ और फिरता थक गया हूँ परन्तु देखने की जो इच्छा थी इस कारण मुझको दुःख नहीं हुआ है | जो कुछ मैंने चेष्टा की है और जो देखा है सो कहता हूँ | हे राजन्! मैंने बहुत जन्म धारे हैं , और बहुत बार मृतक हुआ  हूँ; बहुत बेर शाप पाया है, ऊँच नीच जन्म धारे हैं और मर मर गया हूँ और बहुत ब्रह्माण्ड देखे हैं परन्तु यह सब अग्नि देवता के वर से देखे हैं | एक बार मैं वृक्ष हुआ और सहस्त्र वर्ष पर्यन्त फूल, फल, टास, संयुक्त रहा | जब कोई काटे तब मैं  दुःखी होऊँ और मेरे हृदय में पीड़ा होवे | फिर वहाँ से शरीर छूटा तब मैं सुमेरु पर्वत पर सुवर्ण का कमल हुआ और वहाँ का जलपान किया | फिर एक देश में पक्षी हुआ और सौ वर्ष पक्षी रहकर फिर सियार हुआ और मुझे हस्ती ने चूर्ण किया इससे मृतक होकर फिर सुमेरु पर्वत पर सुन्दर मृग हुआ और देवता और विद्याधर मेरे साथ प्रीति करने लगे | कुछ काल में मरकर फिर देवताओं के वन में मञ्जरी हुआ और वहाँ देवियाँ और विद्याधरियाँ मुझको स्पर्श करें और सुगन्ध लें तब मैं देवताओं की स्त्री हुआ, फिर सिद्ध हुआ और मेरा वचन फुरने लगा, फिर मैंने और शरीर धारा और एक ब्रह्माण्ड लाँघ गया | इसी प्रकार कई ब्रह्माण्ड मैं लाँघ गया तब एक ब्रह्माण्ड में जो आश्चर्य देखा है सो सुनो | वहाँ मैंने एक स्त्री देखी जिसके शरीर में कई ब्रह्माण्ड थे | इससे मैं आश्चर्यवान् हुआ और देश काल क्रिया से पूर्ण कई त्रिलोकी देखीं | जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब दृष्टि आता है, तैसे ही मुझको उसमें जगत् भासे | तब मैंने उससे कहा, हे देवि! तुम कौन हो और यह तेरे शरीर में क्या है? देवी बोली, हे साधो! मैं शुद्ध चित््शक्ति हूँ और यह सब मेरे अंग मेरे में स्थित है | मेरी क्या बात पूछनी है-यह सब जगत् जो तू देखता है चिद्रूप है, चैतन्य से भिन्न और कुछ नहीं और सबमें ब्रह्माण्ड (त्रिलोकी) स्थित है जो अपना आप ही है | जो अपने स्वभाव में स्थित हैं उनको अपने ही में ये भासते हैं और जो स्वरूप में स्थित नहीं हैं उनको जगत् बाहर और आपसे भिन्न भासते हैं | हे राजन्! यह जगत् कुछ बना नहीं | जैसे स्वप्न की सृष्टि और गन्धर्वनगर भासता है, तैसे ही आत्मा में जगत् भासता है और जैसे जल में तरंग भासता है सो जलरूप है-तरंग कुछ भिन्न वस्तु नहीं होते, तैसे ही सब जगत् चिद्रूप में भासता है सो चैतन्य से भिन्न कुछ नहीं परन्तु जब स्वभाव में  स्थित होकर देखोगे तब ऐसे ही भासेगा और जो अज्ञानदृष्टि से देखोगे तो नाना प्रकार का जगत् दृष्टि आवेगा | हे राजन्, दशरथ! जब इस प्रकार उस देवी ने मुझसे कहा तब मैं वहाँ से चला और आगे दूसरी सृष्टि में गया तो देखा कि वहाँ सब पुरुष ही रहते हैं, स्त्री कोई नहीं और पुरुष से पुरुष उत्पन्न होते हैं | उससे भी आगे और सृष्टि में गया तो वहाँ सूर्य था, चन्द्रमा था, तारे थे, अग्नि थी, दिन था और रात्रि थी | जैसे चन्द्रमा, सूर्य और तारों का प्रकाश होता है, तैसे ही सब अपने प्रकाश से प्रकाशते थे | उनको देखकर मैं आगे और सृष्टि में गया तो वहाँ क्या देखा कि आकाश ही से जीव उत्पन्न होकर आकाश ही में लीन होते हैं और इकट्ठे ही सब उपजते और इकट्ठे ही सब लीन हो जाते हैं, वहाँ मनुष्य हैं, देवता हैं, वेद हैं, शास्त्र हैं, जगत् है-इनसे विलक्षण ही प्रकार है | हे राजन्! इस प्रकार मैंने कई सृष्टियाँ देखी हैं जो मुझको स्मरण आती हैं | आगे और सृष्टि में गया तो वहाँ क्या देखा कि सब जीव एक ही समान हैं किसी को रोग है और किसी को दुःख है-सब एक से गंगा के तीर पर बैठे हैं | हे राजन्! एक और आश्चर्य मैंने देखा है सो भी सुनो | एक सृष्टि में मैं गया तो वहाँ क्षीरसमुद्र मन्दराचल से मथा जाता था | एक ओर विष्णु भगवान् और देवता थे और मन्दराचल पर्वत रत्नों से जड़ा हुआ शेषनाग से रस्सी की नाईं लिपटा हुआ था, मथने के निमित्त दूसरी ओर दैत्य लगे थे बड़ा सुन्दर शब्द होता था | वहाँ वह कौतुक देखकर मैं आगे गया तो एक और सृष्टि देखी जहाँ मनुष्य आकाश में उड़ते फिरते थे और देवता की नाईं पृथ्वी पर  बिचरते और वेदशास्त्र जानते थे | हे राजन्! एक और आश्चर्य मैंने देखा सो भी सुनो एक सृष्टि में मैं जा निकला तो वहाँ मन्दराचल पर्वत पर कल्पतरु का बन था और उसमें मदनका नाम एक अप्सरा रहती थी | वहाँ जाकर मैं सो रहा तो ज्यों ही रात्रि का समय आया कि वह अप्सरा मेरे कण्ठ में लगी तब मैंने जागकर उसको देखा और कहा कि हे सुन्दरी! तूने मुझको किस निमित्त जगाया? मैं तो सुख से सो रहा था | तब उस अप्सरा ने कहा कि हे राजन्! मैंने इस निमित्त तुझको जगाया है कि चन्द्रमा उदय हुआ है और चन्द्रकान्तमणि चन्द्रमा को देखकर स्रवेगी और नदी की नाईं प्रवाह चलेगा, ऐसा हो कि उसमें तू बह जावे | हे राजन्, दशरथ! इस प्रकार उसने कहा ही था कि नदी का प्रवाह चलने लगा | तब वह अप्सरा उस प्रवाह को देखकर मुझे आकाश को ले उड़ी- और पर्वत के ऊपर जहाँ गंगा का प्रवाह चलता था उसके तट पर मुझको स्थित किया | सात वर्ष पर्यन्त मैं वहाँ रहकर फिर एक और ब्रह्माण्ड में गया तो देखा कि वहाँ तारा नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य कुछ भी थे | उसको देखकर मैं और आगे गया | इसी प्रकार अनन्त ब्रह्माण्ड मैंने देखे! हे राजन्! ऐसा देश ऐसी पृथ्वी, नदी और पहाड़ कोई होगा जिसको मैंने देखा हो और ऐसी चेष्टा कोई होगी जो मैंने की हो | कई शरीरों के मैंने सुख भोगे हैं, कितनों के दुःख भोगे हैं और बन, कन्दरा और गुप्त स्थानों में फिरकर सब देखा परन्तु अग्नि देवता के वर को पाकर फिरता-फिरता मैं थक गया तो भी आगे ही चला गया और अनेक अविद्यक ब्रह्माण्ड भी देखे परन्तु अब उनका अन्त आया है कि यह जगत् भ्रममात्र है | मैंने शास्त्रों में सुना है कि यह जगत् है नहीं तो भी दुःख देता है | जैसे बालक को अपनी परछाहीं में वैताल भासता है, तैसे ही यह जगत् अविचार से भासता है और विचार किये से निवृत्त हो जाता है | एक आश्चर्य और सुनो कि एक ब्रह्माण्ड में मैं गया तो वहाँ महाआकाश था | उस महाआकाश से गिरकर मैं पृथ्वी पर आन पड़ा और वहा सो गया तब मैं महागाढ़ सुषुप्तिरूप हो गया और सब जगत् का मुझे विस्मरण हो गया जब वह गाढ़ सुषुप्ति क्षीण हुई तब एक स्वप्ना आया और उसमें तुम्हारा यह जगत् मुझको भासि आया | उसमें मुझको पहाड़, कन्दरा, देश और बहुत से गुप्त, प्रकट स्थान भासि आये | जहाँ केवल सिद्धों की गम थी वहाँ भी मैं गया और जहाँ  सिद्धों की भी गम थी वहाँ भी मैं गया | इस प्रकार अनेक जगत् मैंने देखे परन्तु आश्चर्य है कि स्वप्ने की सृष्टि प्रत्यक्ष जाग्रत की तरह दृष्टि आती थी और स्वप्ने  के शरीर में पड़े भासते थे | इससे सब जगत् भ्रममात्र है और असत्य ही सत्य होकर दिखाई देता है | इस प्रकार देख कर मैं बड़े आश्चर्य में पड़ा हूँ |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विपश्चितत््कथावर्णनन्नाम द्विशताधिकत्रयोविंशतितमस्सर्गः ||223||

अनुक्रम


महाशववृत्तान्त वर्णन

विपश्चित् बोले, हे राजन्! एक सृष्टि और भी मैंने देखी है जो इसी महाआकाश में है- अर्थात् इस महाआकाश से भिन्न नहीं और जहाँ तुम्हारा भी गम नहीं | जैसे स्वप्ने की सृष्टि कोई जाग्रत में देखा चाहे तो दृष्टि नहीं आती तैसे ही वह सृष्टि है | हे राजन्! पृथ्वी का एक स्थान मेरे देखते ही देखते परछाहीं की नाईं फिरने लगा और फिर उस आकाश में वही पहाड़ की नाईं भासने लगा, यहाँ तक कि मनुष्यों के शरीर और दशों दिशाओं को रोक लिया और आकाश से भी बड़ा भासने लगा इससे आकाश में भी समाता था | उसने सूर्य और चन्द्रमा को भी मेरे देखतेही देखते ढ़ाँप लिया और फिर भूकम्प सा आया मानो प्रलयकाल ही गया | तब मैंने अपने इष्ट अग्निदेवता की ओर देखकर प्रार्थना की कि हे भगवन्! तुम मेरी जन्म-जन्म रक्षा करते आये हो इससे अब भी रक्षा करो, मैं नष्ट होता हूँ | तब अग्नि ने कहा, तू भय मत कर | फिर मैंने अग्नि में जब प्रवेश किया, तब अग्नि ने कहा कि मेरे वाहन पर सवार होकर मेरे स्थान को चल | फिर अग्निदेव मुझको अपने वाहन तोते पर चढ़ाकर आकाशमार्ग से तुरन्त ले उड़ा | जब हम उड़े  तब पीछे से वह शव पृथ्वी पर गिरा और उसके गिरने से सुमेरु जैसे पर्वत भी पाताल को चले गये | वह महाशरीर सैकड़ों सुमेरु के समान गिरा और मन्दराचल, मलयाचल, अस्ताचल से लेकर जो बड़े-बड़े पर्वत थे सो भी नीचे को चले गये | पृथ्वी में गढ़े पड़ गये और  उसके शरीर के नीचे जो वृक्ष, मनुष्य, दैत्य, स्थावर, जंगम आये वे सब नष्ट हो गये और  बड़ा उपद्रव उदय हुआ | निदान उसके शरीर से सर्व दिशा पूर्ण हो गई और उसके अंग ब्रह्माण्ड से भी पार निकल गये | हे राजन्, दशरथ! इस प्रकार मैं भयानक दशा को देख कर अपने इष्टदेव अग्नि से बोला कि हे देव! यह उपद्रव क्योंकर हुआ, यह सब क्या है और ऐसा शरीर क्यों पड़ा है? आगे तो कोई भी ऐसा शरीर नहीं देखा-सुना? अग्नि ने कहा तू अभी तूष्णी हो रह | यह सब वृत्तान्त मैं तुझसे कहूँगा पर प्रथम इसको शान्त होने दे | इस प्रकार अग्नि कहता ही था कि देवता, विद्याधर, गन्धर्व और सिद्ध जितने स्वर्गवासी थे वे सर्व आकर स्थित हुए-  और विचार करने लगे कि यह उपद्रव प्रलयकाल बिना हुआ है इसके नाश करने को देवीजी की आराधना करनी चाहिये | हे राजन्! ऐसे विचार करके वे देवी की स्तुति करने लगे कि हे देवि शववाहिनि, चण्डिके! हम तेरी शरण आये हैं, इस उपद्रव से हमारी रक्षा करो | ऐसे कहकर वे स्तुति करने लगे |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे महाशववृत्तान्तवर्णनन्नाम द्विशताधिक- चतुर्विंशतितमस्सर्गः ||224||

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स्वयंमाहात्म्यवृत्तान्तवर्णन

विपश्चित् बोले, हे राजन्, दशरथ! उन देवताओं ने स्तुति करके शव की ओर जो देखा तो क्या देखते हैं कि सातों द्वीप उसके उदर में समा गये हैं, भुजाओं से सुमेर आदिक पर्वत ढप गये हैं और उसके दूसरे अंग ब्रह्माण्ड को भी ले हैं और साथ ही पाताल को भी गये | निदान उनकी मर्यादा कहीं पाई नहीं जाती थी | एक ही अंग से पृथ्वी छिप गई | ऐसे देखकर विद्याधर, गन्धर्व और सिद्धों से लेकर सम्पूर्ण नभचर स्तुति करने लगे | हे अम्बे, चण्डिके! अपने गण को साथ लेकर इस उपद्रव से हमारी रक्षा करो- हम तेरी शरण आये हैं | हे राजन्! जब इस प्रकार स्तुति करके देवता आराधन करने लगे तब चण्डिका आकाशमार्ग से यक्ष, वैताल भैरव आदिक गण अपने साथ लेकर आई और जैसे मेघ सर्व दिशाओं को ढाँप लेता है, तैसे ही सर्व ओर से उसके गणों ने आकार आकाश को ढाँप लिया और चण्डिका ऐसे तेजरूप को धारे हुए चली आती थी मानो अग्नि की नदी चली आती थी | उसके रक्त नेत्र शिर पर पक्के केश और श्वेत दाँत थे और वह बड़े शस्त्र धारे हुए कई कोटि योजन पर्यन्त उसका विस्तार था | वह सब दिशा और आकाश अपने शरीर से आच्छादित किये, कण्ठ में मुण्डों की माला पहिने , मुरदे वाहन पर आरूढ़ और परमात्मपद में उसकी स्थित थी | वह ऐसे महाप्रकाशवान् थी मानों सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि आदिक के प्रकाश को भी लज्जित कर रही है और हाथों में खड्ग, मूसल, ध्वजा, ऊखल आदिक नाना प्रकार के शस्त्र धारे आकाश में तारागण की नाईं गर्जती हुई गणों सहित  इस प्रकार चली आती थी मानो समुद्र से निकली साक्षात् बड़वाग्नि चली आती है | जब वह निकट आई तब देवता फिर प्रार्थना करने लगे कि हे अम्बे! इसका नाश करो अपने गणों को आज्ञा दीजिये कि इसका भोजन करें, हम इसको देखकर बड़े शोक को प्राप्त हुए हैं और तेरी शरण हैं, इस उपद्रव से हमारी रक्षा करो | हे राजन् , दशरथ जब इस प्रकार देवताओं ने कहा तब चण्डिका ने प्राणवायु को खींचा और जितना शव में रक्त था वह सब पान कर गई | जैसे समुद्र को अगस्त्य ने पान किया था, तैसे ही उसने रक्त पान किया | जब उससे देवी का उदर और अंग सब पूर्ण हो गये और नेत्र लाल हो आये तब देवी नृत्य करने लगी और उसके गण सब उस शव का भोजन करने लगे | कई मुख को खाने लगे, कई भुजा को कई उदर को, कई वक्षस्थल को, कई टाँगों को और कई चरणों को, इसी प्रकार उसके सब अंगों को गण भोजन करने लगे | कई गण आँतें लेकर आकाश में सूर्य के मण्डल को गये, कई गण उस शव के अन्त पाने को उड़े सो मार्ग ही में  मर गये परन्तु कहीं अन्त पाया और देवी जो उस शव की ओर देखती थी इससे उसके नेत्रों  से अग्नि निकलती थी-और उससे माँस परिपक्व होता था और गण भोजन करते थे | माँस पकने के समय जो शरीर से रक्त निकलता था उससे मन्दराचल और हिमाचल पर्वत लाल हो गये-मानो पर्वतों ने भी लाल वस्त्र पहिरे हैं | रक्त की नदियाँ बहने लगीं और जो बड़े सुन्दर स्थान और दिशा थीं वे सब भयानक हो गईं और पृथ्वी के जीव सब नष्ट हो गये पर जो पहाड़  की कन्दरा में जाकर दब रहे थे सो बच गये शेष सब नष्ट हो गये | रामजी ने पूछा हे भगवन्! तुम कहते हो कि उसके नीचे प्राणी आकर सब नष्ट हो गये और अंग उसके ऐसे कहते हो कि ब्रह्माण्ड को भी लाँघ गये एवम् फिर कहते हो कि देवता बच रहे सो क्या कारण है? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो उसके शरीर और अंग के नीचे आये वे तो नष्ट हो गये पर मुख और ग्रीवा में कुछ भेद है तिसमें जो पोल है और गोदी और टाँग के नीचे के पोल में और सुमेरु, मन्दराचल, उदयाचल और अस्ताचल पर्वतों में कुछ पोल है उनकी कन्दरा में बैठे हुए देवता बच गये-  और जो अंग के छिद्रों में रहे वे भी बच रहे और कहने लगे कि बड़ा कष्ट है जो हमारे बैठने के कई स्थान नष्ट हो गये | हाय! वे वृक्ष कहाँ गये, बरफ का पर्वत हमारा कहाँ  गया, उनकी सुन्दरता कहाँ गई, वन और बगीचे कहाँ गये, चन्दन के वृक्ष कहाँ गये और वे जनों के समूह कहाँ गये जो हमको यज्ञ करके पूजते थे? वे ऊँचे वृक्ष कहाँ गये जिन के ब्रह्मलोक पर्यन्त फूल और टहनी जाती थीं और वह क्षीरसमुद्र कहाँ गया जिसके मथने से बड़ा शब्द हुआ था? उसके पुत्र जो रत्न, कल्पतरु और चन्द्रमा थे वे कहाँ गये और जम्बूद्वीप कहाँ गया जिसमें जम्बू के रस की नदी चलाई थी और सुवर्णवत् जल के चक्र उठते थे? ईख के रस का समुद्र कहाँ गया? हा कष्ट! शक्कर के और मिश्री के पर्वत और अप्सराओं के बिचरने के स्थान कहाँ गये और पृथ्वी कहाँ गई? वे नन्दनवन के स्थान कहाँ गये जहाँ हम अप्सराओं के साथ विलास करते थे? उन विषयों का अभाव नहीं हुआ मानो  हमको शूल चुभते हैं | जैसे फल को कण्टक चुभते हैं, तैसे ही विषय के आभासरूपी हमको कण्टक चुभते हैं | इसी प्रकार वे अति शोकवान् हुए और कहने लगे हा कष्ट! हा कष्ट! इधर विषयों का स्मरण करके देवता शोक करते थे और उधर उस शव के जितने अंग थे उनको गणों ने भोजन कर लिया और उससे अघा गये | कुछ मेदा का पिण्ड शेष रह गया था उससे बहुत दुर्गन्ध हुई और उस पिण्ड की पृथ्वी हो गई इससे उसका नाम मेदिनी हो गया और मोटे हाड़ों के सुमेरु आदिक पर्वत हुए | तब ब्रह्माजी ने देखा कि सब विश्व शून्यसा हो गया है इससे उन्होंने संकल्प किया कि अब फिर मैं सृष्टि रचूँ | निदान पूर्व की नाईं उसने सृष्टि रची और जगत् का सब व्यवहार उसी प्रकार चलने लगा |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे स्वयंमाहात्म्यवृत्तान्तवर्णनन्नाम द्विशताधिक पञ्चविंशतितमस्सर्गः ||225||

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मच्छरव्याध वर्णन

विपश्चित् बोले, हे राजन्, दशरथ! जब यह कर्म हो रहा था तब मैंने अपने इष्ट देवता से, जो तोतेवाहन पर आरूढ़ था, प्रश्न किया कि हे महादेव! सर्वजगत् के ईश्वर  और सर्वजगत् के भोक्ता! यह शव कौन था, कहाँ स्थित था और किस प्रकार गिरा? अग्नि बोले, हे राजन्! जिसका अनन्त त्रिलोकी आभास है उससे इस शव का वृत्तान्त वर्णन हो सकता है, एक त्रिलोकी से इसका वृत्तान्त नहीं हो सकता | इससे सुनो, हे राजन्! एक परम आकाश है जो जो चिन्मात्र पुरुष सर्वज्ञ, अनामय और अनन्त है | वह आत्मतत्त्व केवल अपने शरीर में स्थित है पर उसका जो आभास संवेदन फुरना है, वही किञ्चन होता है  वह जब किसी स्थान में फुरता है तब ऐसी भावना होती हे कि मैं तेज अणु हूँ | उस भावना  के वश से अणु सी हो जाती है | जैसे कोई पुरुष सोया है और स्वप्ने में आपको मार्ग में चलता देखता है, अथवा जैसे तुम स्वप्ने में आपको पौढ़े देखो ऐसे ही चित्तसंवेदन ने आपको अणु जाना है | जैसे फुरना ब्रह्मा को हुआ है, तैसे ही धूर के कणके का भी अधिष्ठान में फुरना तुल्य हुआ है | जब उस अणु को शरीर की भावना होती है तब अपने साथ शरीर देखता है और शरीर के होने से नेत्र आदिक इन्द्रियाँ घन होती हैं तब शरीर और इन्द्रियों से आपको मिला हुआ जानता है | जब अपना आप जानकर उनको ग्रहण करके इन्द्रियों से विषय को ग्रहण करता है तब वही चिद्रूप जीव प्रमाद से आधाराधेयभाव को मानता है पर अधिष्ठान सत्ता में कुछ हुआ नहीं, वह अद्वैतसत्ता ज्यों की त्यों अपने आप में स्थित है | जैसे स्वप्ने में प्रमाद से अपने आपको किसी गृह में बैठे देखता है, तैसे ही वहाँ प्रमाद से आधाराधेयभाव को देखता है और प्राण और मन अहंकार को धारता है और जानता है कि मेरे माता-पिता हैं और मैं अनादि जीव हूँ | अपना शरीर जानकर आगे पाञ्चभौतिक जगत् शरीर को देखता है और अपने फुरने के अनुसार अंग होते हैं इसी प्रकार जो आदि शुद्ध चिन्मात्र तत्त्व में फुरना हुआ तो चित्तकला फुरी और उसने आपको तेज अणु जाना तब उसमें अहंवृत्ति तो अहंकार हुआ, निश्चयात्मक बुद्धि हुई चेतनारूप चित्त और संकल्पविकल्परूप मन हुआ | यह उत्पन्न होकर फिर तन्मात्रा उपजी फिर उसके इच्छा द्वारा शरीर और इन्द्रियाँ उत्पन्न हुई और देखने की इच्छा हुई | उस संवित् में दृश्य भासि आई तब संवित् शक्ति ने आपको प्रमाददोष से द्वैतरूप जाना और साथ ही उसके अपने माता पिता और कुल फुर आये कि यह मेरी माता है, यह मेरा पिता है  और यह मेरा कुल है सो चिरकाल से चला आता है | इसी प्रकार एक दैत्य अहंकार सहित विचरने लगा और एक कुटी में एक ऋषि बैठा था, उस कुटी की ओर गया और उसकी कुटी चूर्ण करके जब ऋषि के निकट आया तब ऋषि ने कहा, हे दुष्ट! तूने यह क्या चेष्टा ग्रहण की है | अब तू मरकर मच्छर होगा | हे विपश्चित्! उस ऋषि के शापरूपी अग्नि से उसका शरीर भस्म हो गया और उसकी निराकार चेतनसंवित् भूताकाशरूप हो गई | फिर आकाश में उसका वायु से संयोग हुआ और उस ऋषि मौनी के शाप की वासना आन उदय हुई | जैसे पृथ्वी में समय पाकर बीज से अंकुर उत्पन्न होता है तैसे ही पञ्च तन्मात्रा उदय हुईं और अपना मच्छर का शरीर जिसकी आयु दो अथवा तीन दिन की होती है, अज्ञान से भासि आया | रामजी ने पूछा, हे भगवन्! जीव जो जन्म पाते हैं सो जन्म से जन्मान्तर को चले आते हैं अथवा ब्रह्मा से उपजे होते हैं-यह कहो? वशिष्ठजी बोले , हे रामजी! कई जन्म से जन्मान्तर चले आते हैं और कई ब्रह्मा से उपजे होते हैं | जिनको पूर्ववासना का संसरना होता है वे वासना के अनु सार शरीर धारते हैं और जन्म से जन्मान्तर पाते चले आते हैं और जिनको संस्कार बिन भूत भासि आते हैं वे ब्रह्मा से उत्पन्न होते हैं | हे रामजी! आदि में सब जीव संस्काररूपी कारण बिना उत्पन्न हुए हैं और पीछे से जन्मान्तर होता है | जो संस्कार बिना भूत भासे, उसे जानिये कि ब्रह्मा से उपजा है और जिसको संस्कार से सृष्टि भासे उसे जानिये कि इसका जन्मान्तर है | यह दो प्रकार से भूतों की उत्त्पत्ति मैंने तुमसे कही है | अब फिर उस मच्छर का  क्रम सुनो | हे रामजी! जब उसने मच्छर का जन्म पाया तब कमलिनियाँ और हरी घास, तृण और पत्तों में मच्छरों को साथ लिये रहने लगा | निदान वहाँ एक मृग आया और उसका चरण उस मच्छर पर इस प्रकार पड़ा जैसे किसी पर सुमेरु पर्वत पड़े | तब वह मच्छर चूर्ण होकर मृतक हो गया-  और मृतक होने के समय मृग की ओर देखने लगा इससे मरके तत्काल ही मृग हुआ और वन में विचरने लगा फिर एक काल में उसको बधिक ने देखकर बाण चलाया और उस बाण से वह मृग बेधा गया | बेधे हुए मृग ने बधिक की ओर देखा इसलिये वह मरके बधिक हुआ और धनुष बाण लेकर मृग और पक्षियों को मारने लगा |एक समय में वह वन को गया और वहाँ एक मुनीश्वर को देख  उसके निकट जा बैठा, तब मुनीश्वर ने कहा, हे भाई! तूने यह क्या पापचेष्टा का आरम्भ किया है? इस चेष्टा से तो तू नरक को प्राप्त होवेगा इससे किसी जीव को दुःख दे | जिन भोगों के निमित्त तू यह चेष्टा करता है सो बिजली के चमत्कारवत् हैं | जैसे मेघ में बिजली का चमत्कार होता है और फिर मिट जाता है, तैसे ही ये भोग भी होकर मिट जाते  हैं और जैसे कमल के पत्र पर जल की बूंद ठहरती है पर उसकी आयु कुछ नहीं होती क्षणपल में गिर पड़ती है, तैसे ही इस शरीर की आयु कुछ नहीं है | जैसे अञ्जली में जल डाला नहीं ठहरता, तैसे ही यौवन अवस्था चली जाती है | क्षणभंगुर है और यौवन असार है उसमें  भोगना क्या है? इनसे कदाचित््शान्ति नहीं होता | जो तुझको शान्ति की इच्छा हो तो निर्वाण होने का प्रयत्न कर, तब तू दुःख से मुक्त होगा | अपने हिंसाकर्म को त्याग दे | इसके करनेसे नरक में जावेगा और कदाचित् शान्ति तुझको प्राप्त होगी | तू अपने हाथ से अपने चरण पर क्यों कुल्हाड़ा मारता है और अपने नाश के निमित्त तू क्यों विष का बीज बोता है? इस कर्म से तू दुःखरूप संसार में भटकता फिरेगा और शान्तिमान् कदा चित् होगा | इससे अब तू वही उपाय कर जिससे संसारसमुद्र से पार हो |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मच्छरव्याध वर्णनन्नाम द्विशताधिक षड्विंशतितमस्सर्गः ||226||

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हृदयान्तरस्वप्नमहाप्रलय वर्णन

अग्नि बोले, हे राजन्! जब इस प्रकार ऋषीश्वर ने उस वधिक से कहा तब उसने धनुषबाण को डाल दिया और बोला हे भगवन्! जिस प्रकार मैं संसारसमुद्र से पार हो जाऊँ वह उपाय कृपा करके मुझसे कहिये परन्तु वह कैसा उपाय हो जो दुःसाध्य हो और मृदु हो अर्थात् जो अल्प भी हो और कठिन भी हो | ऋषीश्वर बोले, हे बधिक! मन को एकाग्र करने का नाम शम है और इन्द्रियों के रोकने को हम दम कहते है--वही मौन है | मन को एकाग्रकरने से अन्तःकरण शुद्ध होता है और अन्तःकरण की शुद्धता से आत्मज्ञान उपजता है इससे संसारभ्रम निवृत्त होकर परमानन्द की प्राप्ति होती है | अग्नि बोले, हे राजन्! इस प्रकार जब ऋषिश्वर ने कहा तब वह बधिक उठ खड़ा हुआ और प्रणाम करके तप करने लगा | इन्द्रियों को उसने संयम में रक्खा और जो अनिच्छित यथाशास्त्र प्राप्त हो उसका भोजन करने लगा और हृदय से सब क्रियाओं की मौनवृत्ति धारण की | जब उसको कुछ काल तप करते व्यतीत हुआ तब उसका अन्तःकरण शुद्ध हुआ और ऋषीश्वर के निकट प्रणाम करके बैठ गया और बोला, हे भगवन् बाहर जो दृश्य है सो हृदय में किस प्रकार करती है और स्वप्ने की सृष्टि अन्तर की वाह्य रूप हो कैसे भासती है? यह कृपा करके कहो | ऋषीश्वर बोले, हे वधिक!  यह बड़ा गूढ़ प्रश्न तूने किया है | यही प्रश्न मैंन भी गणपति से किया और उनके कहने से मैंनें जो ग्रहण किया है सो सुन | एक समय यही सन्देह दूर करने का उपाय मैंने भी किया था और पद्मासन बाँध, बाहर की इन्द्रियों को रोक मन में लगा मन, बुद्धि आदिक को पुर्यष्टक में स्थित किया | फिर पुर्यष्टक को भी शरीर से विरक्त किया और उसको आकाश में निराधार ठहराया | निदान जब विलक्षण हुआ चाहूँ तब विलक्षण हो जाऊँ और जब शरीर में व्यापा चाहूँ तब व्याप जाऊँ | हे वधिक! इस प्रकार जब मैं योगधारणा से पूर्ण हुआ, तो एक काल में एक पुरुष हमारी कुटी के पास सो रहा था और उसके श्वास भीतर-बाहर जाते थे | उसको देखकर मैंने यह इच्छा की कि इसके भीतर जाकर कौतुक देखूँ कि क्या अवस्था होती है | ऐसे विचार करके मैंने पद्मासन बाँधा और योग की धारण करके उसके श्वासमार्ग से भीतर प्रवेश किया | जैसे उष्ट्र उँघता हो और उसके श्वासमार्ग से सर्प प्रवेश करे | तैसे ही मैंने प्रवेश किया तो उसके भीतर अपने-अपने रस को ग्रहण करनेवाली नाड़ियाँ मुझे दृष्टि आईं | कई वीर्य को ग्रहण करनेवाली हैं, कई रक्त और कफ को ग्रहण करती हैं, कई मलमूत्रवाली हैं और अनेक विकार जो उसके भीतर थे सो सब देखे | इससे मैं अप्रसन्न भया कि महा अपवित्र स्थान है और रक्तमज्जासंयुक्त महानरक के तुल्य अन्धकार  है | फिर और आगे गया तो वहाँ एक कमल देखा कि उसमें उसका संवेदन फुरता है और संवित्तशक्ति जो महातेजवान हृदयाकाश है सो भी वहाँ स्थित है | वही त्रिलोकी का आदर्श है और त्रिलोकी में जो पदार्थ हैं, उसका दीपक है और सर्व पदार्थों की सत्ता रूप है | ऐसी संवित््रूपी जीवसत्ता वहाँ स्थित थी उसमें मैं तद्रूपता को प्राप्त हुआ फिर मैंने सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, जल,तेज वायु, आकाश पर्वत, समुद्र, देवता, गन्धर्व आदि नाना प्रकार के स्थावर-जंगम विश्व को देखा | ब्रह्मा और रुद्र सहित सम्पूर्ण सृष्टि को उसके भीतर देखकर मैं आश्चर्यवान् हुआ कि उसके भीतर सृष्टि क्यों कर भासी | हे बधिक! उसने जाग्रत् में उस सृष्टि का अनुभव इन्द्रियों से किया था और भीतर चित्तत्व में उसका संस्कार हुआ था वही भीतर भासने लगा और भीतर जो भूत सत्ता थी सो उसके स्वप्ने में सृष्टिरूप बाहर बनी और मुझको प्रत्यक्ष भासने लगी | जैसे जाग्रत प्रत्यक्ष अर्थाकार भासती है, तैसे ही मुझको यह सृष्टि भासने लगी | हे वधिक! इस जाग्रत् सृष्टि और उस सृष्टि में मैंने कुछ भेद देखा-दोनों तुल्य हैं | चिरपर्यन्त प्रतीति का नाम जाग्रत् हैं और अल्पकाल की प्रतीति का नाम स्वप्ना है पर  स्वरूप से दोनों तुल्य हैं | जो उसके स्वप्ने के अनुभव में था सो मुझको जाग्रत् भासा और जो मुझको जाग्रत भासा सो उसको स्वप्ना भासा | निद्रादोष से उसको स्वप्ना हुआ सो उसको भी उस काल में जाग्रत््रूप भासने लगा, क्योंकि स्वप्ना जो स्वप्नरूप है सो जाग्रत् में स्वप्ना है और स्वप्न में तो जाग्रत् है, तैसे जाग्रत् भी अपने काल में जाग्रत् है, नहीं तो, स्वप्नरूप है, सो जाग्रत् में भी जो सत्य प्रतीति है वही प्रमाद है | इन दोनों में कुछ भेद नहीं, क्योंकि जाग्रत् और स्वप्न दोनों का अधिष्ठान चैतन्यसत्ता परब्रह्म ही है-  और उसी के प्रमाद से प्राण के साथ सम्बन्ध हुआ है | जब प्राण से चित्तसंवेदन मिलती है तब उस फुरनरूप के इतने नाम होते हैं-जीवमन, चित्त, बुद्धि, अहंकार आदिक | यही संवेदन जो बाह्यरूप हो फुरती है तब जाग्रतरूप जगत् हो भासता है और पाँच ज्ञान इन्द्रियाँ, पाँच कर्मइन्द्रियाँ और चतुष्टय अन्तःकरण ये चौदह अपने-अपने विषय को ग्रहण करते हैं-इसका नाम जाग्रत् है | जब चित्तस्पन्द निद्रादोष से अन्तर्मुख फुरता  है तब नाना प्रकार की स्वप्ने की सृष्टि देखता है और उस काल में वही जाग्रत््रूप हो  भासता है | अधिष्ठान जो आत्मसत्ता है जब संवेदन उसकी ओर फुरती है और बाह्य विषय के फुरने से रहित अफुरन होती है तब जाग्रत् भासती है और स्वप्ना भासता है केवल निर्विकल्प आत्मसत्ता शेष रहती है | हे बधिक! मैंने विचार देखा है कि जगत् और  कुछ वस्तु नहीं फुरने ही का नाम जगत् है | जब चित्त संवेदन फुरनरूप होती है तब जगत्  भासता है और जब चित्तसंवेदन फुरने से रहित होती है तब जगत् कल्पना मिट जाती है, इसलिये मैंने निश्चय किया है कि वास्तव में केवल चिन्मात्र है | जगत् कुछ वस्तु नहीं मिथ्या कल्पनामात्र है | हे बधिक! जगत्भावना त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो रहो | अब वही वृत्तान्त फिर सुनो | जब उसके भीतर मैंने स्वप्न और जाग्रत् अवस्था  देखीं तब मैंने यह इच्छा की कि सुषुप्ति अवस्था भी देखूँ और बिचार किया कि सुषुप्ति प्रलय का नाम है जहाँ दृष्टा, दर्शन और दृश्य तीनों का अभाव हो जाता है परन्तु जहाँ मैं देखनेवाला हुआ वहाँ महाप्रलय कैसे होगी और जो मैं जाननेवाला होऊँ तब सुषुप्ति को कौन जानेगा | हे बधिक! तब मैंने विचार के देखा कि और सुषुप्ति कोई नहीं जहाँ चित्त की वृत्ति नहीं फुरती उसी का नाम सुषुप्ति है | ऐसे विचार करके मैंने चित्त को फुरने से रहित किया तब उसकी सुषुप्ति देखी तो क्या देखा कि कोई वहाँ अहं और त्वं शब्द है, शुभ है, अशुभ है, जाग्रत् है, स्वप्ना है और सुषुप्ति की कल्पना है, सर्व कल्पना से रहित केवल चित्तसत्ता मैंने देखी | जो तुम कहो कि सुषुप्ति निर्विकल्प तुमने कैसे देखी तो उसका उत्तर यह है- कि अनुभव ज्ञानरूप आत्मसत्ता सर्वदा काल में ज्यों का त्यों है और उसमें जैसा आभास फुरता है तैसा ही ज्ञान होता है | यह जो तुम भी दिन प्रतिदिन देखते हो और सुषुप्ति से उठकर जानते हो कि मैं सुख से सोया था सो अनुभव से ही देखते हो, तैसे ही मैंने भी  वह देखा जहाँ चित्तसंकल्प कोई नहीं फुरता केवल निर्विकल्प है परन्तु सम्यकबोध से रहित है उस अभाव वृत्ति का नाम सुषुप्ति है | फिर मुझको तुरीया देखने की इच्छा हुई पर तुरीया देखनी महा कठिन है | तुरीया साक्षीभूत वृत्ति का नाम है, वह सम्यकज्ञान से उत्पन्न होती है और जाग्रत् स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था की साक्षीभूत है और सुषुप्ति की नाईं है | जैसे सुषुप्ति में अहं, त्वं आदिक कल्पना कोई नहीं होती तैसे  ही तुरीया में भी नहीं | उसमें ब्रह्म का सम्यकबोध होता है और सुषुप्ति जड़ीभूत तम रूप अविद्या होती है | तुरीया में जड़ता नहीं होती, सुषुप्ति और तुरीया में इतना ही भेद होता है |सच्चिदानन्द साक्षी वृत्ति होती है सम्यकबोध का नाम तुरीयापद है और  तुरीया इससे भिन्न नहीं | ऐसे निश्चय से मैंने उसको देखा | हे वधिक! चारों अवस्था मैंने माया अर्थात् फुरने सहित भिन्न भिन्न देखी पर आत्मसत्ता अपमे आप में स्थित है  उसमें कोई जाग्रत है, स्वप्ना है, सुषुप्ति है और तुरीया है-इनका भेद वहाँ नहीं | आत्मसत्ता सदा अद्वैत है और ये चारों चित्त संवेदन में होती हैं | हे वधिक! ऐसा अनुभव करके मैं बाहर आया और बाहर भी मुझको वैसे ही भासने लगा, तब मैंने कहा कि यही जगत् मुझको उसके भीतर भासा था बाहर कैसे आया? तब मैंने फिर उसके भीतर प्रवेश किया | प्रथम जो उसके भीतर मैंने प्रवेश किया था और उसके भीतर सृष्टि देखी थी तब उसकी और मेरी संवेदन मिल गई थी पर जब मैंने अपनी संवेदन उसको भिन्न की तब दो ब्रह्माण्ड हो गये और एक उसका संवेदन फुरने में और एक मेरी संवेदन में भासने लगा, क्योंकि मैंने प्रथम उसकी सृष्टि को देख और अर्थरूप जानकर ग्रहण किया था  उसका संस्कार दृढ़ हो गया | आत्मसत्ता के आश्रय जैसे संवेदन फुरती गई तैसे होकर भासने लगा |  उसका स्वप्न मुझको भासने लगा-जैसे एक दर्पण में दो प्रतिबिम्ब भासें, तैसे ही एक अनुभव में मुझे दो सृष्टि भासने लगीं | तब मैंने विचार किया कि सृष्टि संकल्परूप है संकल्प जीव-जीव का अपना-अपना है और अपने-अपने संकल्प की भिन्न भिन्न सृष्टि है इससे अनुभव के आश्रय जैसा-जैसा संकल्प फुरता है तैसी-तैसी सृष्टि भासती | सृष्टि का  कारण और कोई नहीं | हे बधिक! अष्टनिमेष पर्यन्त मुझको दो सृष्टि भासती रही फिर मैंने उसके और अपने चित्त की वृत्ति इकट्ठी करके मिलाई तो दोनों तद्रूप हो गईं-जैसे  जल और दूध मिलकर एक रूप हो जाते हैं और दूसरी सृष्टि का अभाव हो गया | जैसे भ्रम दृष्टि से आकाश में दो चन्द्रमा भासते हैं और भ्रम के गये से दूसरे चन्द्रमा का अभाव हो जाता है, तैसे ही द्वितीय वृत्ति के अभाव हुए से दूसरी सृष्टि का अभाव हो गया | निदान एक सृष्टि भासने लगी और नाना प्रकार के व्यवहार होते दृष्टि आवें और  चन्द्रमा, सूर्य, पृथ्वी, द्वीप, समुद्र स्पष्ट भासने लगे | कुछ काल के उपरान्त चित्त की वृत्ति सुषुप्ति की ओर आई और स्वप्ने की सृष्टि का विस्तार लीन होने लगा- जैसे सन्ध्या के समय सूर्य की किरणें सूर्य में लय हो जाती हैं | जब वह सृष्टि चित्त में लय होने लगी तब स्वप्ने की सृष्टि मिट गई, सुषुप्ति अवस्था हुई और सर्व इन्द्रियाँ स्थिर हो गईं | हे बधिक! सुषुप्ति तब होती है जब जीव अन्न भोजन करता है और वह समवाही नाड़ी पर आन स्थित होता है, तब जाग्रतवाली नाड़ी ठहर जाती है, उससे  प्राण भी ठहर जाते हैं और तब मन भी हर जाता है-उसका नाम सुषुप्ति है | जब मन फिर फुरता है तब जाग्रत् होती है | इतना सुन रामजी ने पूछा, हे मुनीश्वर! जब मन प्राणों से ही चलता है तब मन का अपना रूप तो कहीं हुआ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी परमार्थ से कहिये तो देह ही नहीं तो मन क्या हो | जैसे स्वप्न में पहाड़ भासते हैं तैसे ही यह शरीर भासता है क्योंकि सबका आदि कारण कोई नहीं इससे जगत् मिथ्याभ्रम है- केवल ब्रह्मसत्ता अपने आप में स्थित है | जो तत्त्ववेत्ता हैं उनको तो ऐसे ही भासता  है और अज्ञानी के निश्चय को हम नहीं जानते- जैसे सूर्य उलूक के अनुभव को नहीं जानता और उलूक सूर्य के निश्चय को नहीं जानता, तैसे ही ज्ञानी और अज्ञानी का निश्चय भिन्न भिन्न होता है | शुद्ध चिन्मात्र आकाश में जगत् भ्रम कोई नहीं पर फुरनभाव से अपने चेतन वपु को भूल ज्ञान बिना ही मननभाव को प्राप्त होता है और तब मन आत्मसत्ता के आश्रय होकर प्राणवायु को अपना आश्रयभूत कल्पता है कि मेरा प्राण है | हे रामजी! फिर जैसे-जैसे मन कल्पना करता है, तैसे- तैसे देह इन्द्रियों और जगत् भासते हैं | परब्रह्म सर्वशक्तिसम्पन्न है उसमें जैसी जैसी भावना से मन फुरता है तैसा ही तैसा रूप हो भासता है-वास्तव और कुछ नहीं  केवल ब्रह्मसत्ता ही अपने आप में स्थित है | मन का फुरना जैसे-जैसे दृढ़ हुआ है तैसे ही तैसे देह, इन्द्रियों और जगत् भासने लगा है | जैसे स्वप्ने में कल्पनामात्र  जगत् भासता है तैसे ही इसे जानो | हे रामजी! जितने विकल्प उठते हैं वे सब मन के रचे हुए हैं | जब मन उदय होता है तब यह फुरना होता है कि यह पदार्थ सत्य है और यह असत्य है जब चित्तशक्ति का मन से सम्बन्ध होता है तब प्रथम प्राण उदय होते हैं और प्राण को ग्रहण करके मन कहता है कि मैं जीव हूँ, प्राण ही मेरी गति है और प्राण बिना मैं कहाँ था | फिर कहता है कि जब प्राण का वियोग होगा तब मैं मर जाऊँगा-फिर रहूँगा | फिर ऐसे कहता है कि मुआ हुआ भी मैं जीऊँगा | हे रामजी! संशयवाले को इस लोक में सुख है और परलोक में सुख है जब तक आत्मबोध का साक्षात्कार नहीं होता तब तक चित्त भी निर्वाण नहीं होता और विकल्प भी नहीं मिटते | हे रामजी! मन के विस्मरण का उपाय आत्मज्ञान से इतर कोई नहीं और मन के शान्ति हुए बिना कल्याण भी नहीं होता | दो उपायों से मन शान्त होता है मन की वृत्ति स्थित करने और प्राण स्पन्द के रोकने से मन स्थित होता है तब प्राण रुक जाते हैं और प्राण के स्पन्द को रोकने से मन स्थित होता है तब प्राण रुक जाते हैं और प्राण के स्पन्द को रोकने से मन स्थित होता है जब प्राण क्षोभते हैं तब चित्त भी क्षोभता है और तभी आध्यात्मिक और आधिभौतिक तापों की अग्नि से जलता है | मन के स्थित करने से परमसुख प्राप्त होता है सो मन की स्थित दो प्रकार की है-एक ज्ञान की स्थिति है और दूसरी अज्ञान् की स्थिति है | जब प्राणी बहुत अन्न भोजनकरता है तब नाड़ी पर जा स्थित होता है और प्राण ठहर जाता है और जब प्राण ठहरे तब मन भी जड़ीभूत हो जाता है-उसी का नाम सुषुप्ति है | वे नाड़ी कौन हैं जिन पर अन्न जाय स्थित होता है? वे नाड़ी वे ही हैं जिनके मार्ग से जाग्रत में प्राण निकलते हैं |  जब वासना सहित वे ही नाड़ी रोकी जाती हैं तब मन सुषुप्त हो जाता है | यह अज्ञानी के मन की स्थिति है क्योंकि जड़ता है सो संसार को लिये शीघ्र ही फिर उठ आता है | जैसे पृथ्वी में बीज समय पाकर अंकुर ले आता है तैसे ही वह संस्कार से फिर सुषुप्ति से उठता है | जो ज्ञानवान् सम्यकदर्शी है उसका चित्त चैतन्यता के लिये स्थित होता है वह चैतन्यता दो प्रकार की है-एक तो योगी को होती है जिससे वह समाधि में मन को स्थित करता है | वह समाधिनिष्ठ चित्त है, जड़ता नहीं | जैसे सुषुप्ति में जड़ता होती है तैसी जड़ता वह नहीं है | दूसरे ज्ञानवान् जीवन्मुक्त के चित्त की वृत्ति सम्यक्ज्ञान से स्थित होती है, क्योंकि उसका चित्त वासना से रहित है | यही स्थिति है | जिसका चित्त उस प्रकार स्थित है उसी पुरुष को शान्ति है और जिसका चित्त वासना सहित है उसको कदाचित् शान्ति नहीं प्राप्त होती और उसके दुःख भी नहीं मिटते | उसे निर्वासनिक चित्त करने को सम्यक्ज्ञान का कारण यह मेरा शास्त्र ही है इसके समान और कोई उपाय नहीं | हे रामजी! यह जो मोक्ष-उपाय शास्त्र मैंने कहा है उसके विचार से शीघ्र ही स्वरूप की प्राप्ति होवेगी इससे सर्वदा इसी का विचार कर्तव्य है जब इसको भली प्रकार विचारोगे तब चित्त निर्वासनिक हो जावेगा अब वही बधिक का प्रसंग सुनो | मुनीश्वर बोले, हे बधिक! जब मैंने उस पुरुष के चित्त में प्राण के मार्ग से प्रवेश किया तब क्या देखा कि उसके प्राण रोके गये हैं और अन्न करके जाग्रत नाड़ी जो फुरती थी सो रोकी गई है, क्योंकि अन्न पचा था इस कारण वह सुषुप्ति में था उसकी सुषुप्ति में मुझको भी अपना आप विस्मरण हो गया | जब कुछ अन्न पचा तब उसके प्राण फुरने लगे और जब प्राण फुरे तब चित्त की वृत्ति भी कुछ जड़ता को त्यागती भई पर सम्पूर्ण जड़ता को त्याग नहीं किया | प्राण के फुरने से  चन्द्रमा, सूर्य आदिक जो कुछ विश्व है सो भी फुरा तब मैंने नाना प्रकार के जगत् को देखा और मुझे अपना पूर्वसंस्कार भूल गया | निदान वहाँ मैं भी अपने कुटुम्ब में रहने  लगा, साथ ही उसके मुझे अपनी कुटी भासी और स्त्री, पुत्र, भाई जन बान्धव सब भासि आये | फिर मेरे में देखते-देखते प्रलयकाल के पुष्कर मेघ गर्जने लगे, मूशल-धार जल बरसने लगा और सातों समुद्र उछलने लगे | निदान जो कुछ प्रलयकाल के उपद्रव होते हैं सो भी उदय हुए | प्रथम अग्नि लगी, जब अग्नि लग चुकी और सब स्थान जल गये तब जल का उपद्रव उदय हुआ तब मैंने क्या देखा कि नगर, ग्राम, पुर, मनुष्य, पशु, पक्षी सब बहते जाते हैं और हाहाकार शब्द करते निदान बड़ा क्षोभ हुआ और मैंने एक आश्चर्य देखा  कि मेरी कुटी भी बही जाती है और स्त्री, पुत्र, भाई, जन इत्यादिक सब जल के प्रवाह में बहे जाते हैं | जिस स्थान में हम थे वह स्थान भी बहा जाता था और मैं भी लुढ़कता  जाता था निदान बहते बहते मुझको ऐसा कष्ट प्राप्त हुआ कि कहने में नहीं आता | एक तरंग से तो मैं ऊर्ध्व को चला जाऊँ और एक तरंग के साथ नीचे चला जाऊँ तब मुझे अपना पूर्व शरीर स्मरण गया और जितना कुछ जगत् है वह मुझको सब भासने लगा, मिथ्या राग द्वेष सब मिट गया और शरीर की सब चेष्टा उसी प्रकार होने लगी कि तरंग के साथ कभी ऊर्ध्व और कभी नीचे पड़ा परन्तु मेरा हृदय शान्त हो गया | उस काल में नगर, देश और  मण्डल बहते जाते थे और त्रिनेत्र सदाशिव और विद्याधर,गन्धर्व,यक्ष,किन्नर सिद्ध आदि  सब बहते जाते थे|अष्टदल कमल की पंखड़ी पर