अमृत-वाणी
स्वामी लीलाशाह महाराज

प्रथम संस्करण
- प्रकाशक
- आत्म दर्शन प्रकाशन मण्डल
- नवाब का बेड़ा, अजमेर
AMRIT-VANI
(Swami Lilashah Maharaj)
Translated by:
Deepchandra Belani M.A., Prabhakar
First Edition: August 1994
Published by:
Atma Darshan Prakashan Mandal
Nawab Ka Bera, AJMER – 305001
Printed By:
CHETAN M. RAICHANDANI
Amar Bharat Printing Press
Hathi Bhata, Ajmer.
भूमिका
बहुत कम लोग इस संसार में आते हैं, जो अपने जीवन में हजारों क्या लाखों मनुष्यों के प्रिय एवं पूज्य बन जाते हैं और उनके चरित्र पर गहरी छाप अंकित कर जाते हैं । स्वामी लीलाशाह महाराज ऐसे पुरुषों में प्रमुख थे ।
उन्होंने गरीब घर में जन्म लिया, स्कूली शिक्षा नाम मात्र की ली, कोई मठ मन्दिर स्थापित नहीं किया और किसी गद्दी पर बैठे, किन्तु अपने त्याग, तपस्या, सेवा, नम्रता और अनुभव के आधार पर आगे और आगे बढ़े । गृह रहित होते हुए सब जगह उनका गृह था । शिक्षाविद न होते हुए भी ज्ञान के सागर थे, लक्ष्मी उनके चरणों में लोटती थी । वे लक्ष्मी दास न बनकर, लक्ष्मी पति बने रहे, जो धन श्रद्धालु सज्जन भेंट में दे जाते थे, वह अपने पास नहीं रखते थे । किन्तु दरिद्र लोगों, विधवाओं, गरीब विद्यार्थियों, बीमारों व अन्य उपकार के कार्यों के लिए उदारता से देते रहते थे ।
श्रद्धालुओं के द्वारा धन की वर्षा होते हुए भी वे अपने शरीर पर अत्यन्त कम व्यय करते थे । शरीर पर वही खादी का चोगा, सर पर कपड़े का टुकड़ा बंधा हुआ और नीचे कछा ! दिन में एक समय सादा भोजन करते थे, लेकिन खाना खाने में पर्याप्त समय लेते थे । खाना खूब चबा-चबा कर खाते थे, सोने के लिए उन्हें नरम बिस्तर भी नहीं होता था और प्रायः टाट बिछाकर उस पर सोते थे ।
सिन्ध में रहते हुए स्वामी जी ने किसी एक स्थान पर ठिकाना नहीं किया, रटन ही करते रहते थे । दूर-दूर के गांवों में जाकर पहुंचते थे और प्रायः नगर अथवा गांव से बाहर रहना पसन्द करते थे । कहते थे कि - ″गुदड़ी मेरे कन्धे पर और रोटी राज्य पर है ।″
देश के बंटवारे के पश्चात भारत में आये तो रटन करते-करते समस्त भारत के कोने-कोने में जाकर पहुँचते थे और जिज्ञासुओं और श्रद्धालुओं को घर बैठे दर्शन देकर प्रसन्न करते थे । भारत में आने के पश्चात तीन बार विदेशों में भी गये और अमृत रूप वचनों की वर्षा करके आये ।
स्वामी जी का शरीर हल्का-फुल्का था, उनमें बहुत चुस्ती थी । चलते थे तो दूसरों को दौड़ना पड़ता था । योग आसनों और योग क्रियाओं में प्रवीण थे । बड़ी आयु होते हुए भी कठिन से कठिन आसन सरलता से करते थे और लोगों को भी उनके करने की प्रेरणा देते थे । वे महान योगीराज थे ।
स्वामी जी के गुणों की कहाँ तक प्रशंसा की जाय प्रशंसा की जाय ! उनमें सहस्रों गुणों का समावेश था, उनके वर्णन करने की इस कमजोर कलम की शक्ति नहीं है । वे गुणों का भण्डार थे । इसलिए ही विभिन्न विचार रखने वाले भी उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखते थे ।
स्वामी जी की बड़ी विशेषता थी कि वे कथनी और करनी में समान थे । कहने और करने में कोई भेद न रखते थे । दिखावे, पाखण्ड का उनके पास नाम भी नहीं था । भीतर बाहर एक जैसे थे । कहते थे कि प्रत्येक को कर्मयोगी होना चाहिए, क्योंकि निष्काम कर्म से अन्तःकरण शुद्ध होता है । स्वामी जी का कर्म क्षेत्र अत्यन्त विशाल था । धार्मिक, सामाजिक और आत्मिक क्षेत्र अर्थात् प्रत्येक क्षेत्र में कार्य किये । वे मानों एक चलती-फिरती संस्था थे, जिसके द्वारा अनेक कार्य होते रहते थे ।
वे बहुमुखी ही थे । स्वामी जी मानो एक विशाल वृक्ष की नाईं थे । जिनकी छाया में सहस्रों और लाखों विश्राम कर रहे थे । जहाँ जाते थे, वहाँ पाठशालाएं, धर्मशालाएं, व्यायामशालाएं और गोशालाएं खोलने की प्रेरणा देते थे, उनके द्वारा गरीब विद्यार्थियों को मासिक , जाते थे, विधवाओं को सहायता मिलती थी । बीमारों को दवा के साथ आशीर्वाद मिलता था, कन्याओं के विवाहों में सहायता करते थे और दहेज के विनाश के कारण उसके विरुद्ध उन्होंने आन्दोलन चलाया । केवल प्रवचन नहीं करते थे । किन्तु जिज्ञासुओं की व्यक्तिगत उन्नति में भी रुचि रखते थे । उनको गुणों और कार्यों का कहाँ तक वर्णन किया जाय । उनकी महिमा वर्णनातीत है । अतः आज भी लोग उनके नाम पर बलिहार जाते हैं और उनके प्रिय कार्यों को आगे बढ़ाने का प्रयत्न कर रहे हैं ।
हमें उनके जय-जयकार करने में ही प्रसन्न नहीं होना चाहिए परन्तु हमारी यथार्थ श्रद्धान्जली तब समझी जायेगी, जब उनके बताये हुए मार्ग अनुसार अपनी और दूसरों की उन्नति करने में यथा शक्ति लग जायेंगे और अपना जीवन आदर्श और सुन्दर बनायेंगे ।
ऐसे महापुरुषों के प्रवचनों को हम "अमृत-वाणी" समझते हैं । हमारी ओर से सिन्धी में "स्वामी लीलाशाह दर्शन" 1975 ई. में छपाया गया था, जिसमें श्रद्धांजलियों के अतिरिक्त स्वामी जी के लगभग दो सौ प्रवचन भी दिये गये थे, जो स्वामी जी के विभिन्न नगरों में दिये गये थे । इस पुस्तक की एक भी प्रति बेचने के लिए हमारे पास नहीं है ।
हिन्दी भाषी (सिन्धी अथवा हिन्दी श्रद्धालु) भाइयों का आग्रह था कि स्वामी जी के प्रवचन हिन्दी में भी प्रकाशित किये जायें ताकि हम भी लाभ उठा सकें ।
श्रद्धालुओं की मांग उचित समझकर समय निकाल कर मैंने स्वामी जी के प्रवचनों का सिन्धी से हिन्दी में अनुवाद किया, अनुवाद चाहे प्रूफिंग आदि का मैंने कभी कोई पारिश्रमिक नहीं लिया है और सेवा भाव से ही कार्य किया है ।
मुझे विश्वास है कि प्रेमी इस पुस्तक के प्रचार में भी सहयोग करेंगे, जैसे उन्होंने "स्वामी लीलाशाह वाणी" हिन्दी संस्करण में दिया है । जिसमें स्वामी जी के वर्ष के प्रतिदिन के लिए अमूल्य विचार दिये गये हैं, उस पुस्तक के बाद संस्करण निकल चुके हैं ।
12-6-1994
अजमेर दीपचन्द्र बेलाणी

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संख्या विषय स्थान
1. दुनिया मुसाफिरखाना आगरा
2. दुर्ग पर कब्जा कीजिए आगरा
3. सुधार का मार्ग नैनीताल
4. भोगों की अग्नि से बचिये नैनीताल
5. एक को लीजिये भोपाल
6. शिक्षा से आचरण उत्तम कानपुर
7. मनुष्य जीवन का उद्देश्य नैनीताल
8. कल्याण मार्ग नैनीताल
9. एक रस कैसे रहा जाय नैनीताल
10. महान मूर्ख कौन ? नैनीताल
11. ज्ञान कब होगा अजमेर
12. ज्ञान का सार अजमेर
13. साधना जेतपुर
14. जीवन का उद्देश्य जेतपुर
15. ज्ञानी और संसार आगरा
16. योग के अंग जेतपुर
17. बच्चों को रहन-सहन की सीख आगरा
18. आनन्द कहाँ ? नैनीताल
19. बन्धन और मोक्ष का कारण आगरा
20. मेरा निश्चय नैनीताल
21. आत्म ज्ञान उपलेठा
22. आत्मा का सिद्धान्त उपलेठा
23. पूर्ण शान्ति का साधन उपलेठा
24. वृत्तियाँ आबू पहाड़
25. स्वर्ग कैसे मिले ? बैरागढ़
26. जीवन मुक्ति अजमेर
27. विद्यार्थियों का कर्तव्य अजमेर
28. माताओं को परामर्श मथुरा
29. अध्यास अथवा भ्रांति आगरा
30. शरीर और मन बांटवा
31. मन को वश में करो बांटवा
32. ब्रह्माकार वृत्ति बांटवा
33. दृष्टा और दृश्य बांटवा
34. विषय भोग और महत्त्व बांटवा
35. तीनों कालों में सत् आबू पहाड़
36. इच्छा की निवृत्ति आबू पहाड़
37. दर्शन कब ? आबू पहाड़
38. वृत्तियों का अभाव आबू पहाड़
39. ज्ञान और कर्मफल आबू पहाड़
40. नित्य आनन्द कैसे मिले ? आबू पहाड़
41. सब का आधार आबू पहाड़
42. ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य आबू पहाड़
43. ध्यान और चिन्तन आबू पहाड़
44. आधार को देखो आबू पहाड़
45. सत् वचन आबू पहाड़
46. भगवत् दर्शन आबू पहाड़
47. मन के कहे पर मत चलो आबू पहाड़
48. ज्ञान, ज्ञानी और कर्म आबू पहाड़
49. वीरता किसमें आगरा
50. लोभ न करो आगरा
51. पुरुषार्थ की आवश्यकता जेतपुर
52. आनन्द प्राप्ति हेतु कौनसी आवश्यकता बांटवा
53. लाभ कब मिलेगा ? आगरा
54. भगवान की प्रसन्नता किन पर ? आगरा
55. शान्ति कब मिलेगी ? आगरा
56. मन की मलीनता को शुद्ध करो आगरा
57. क्रियाएं कौन करता है ? नैनीताल
58. बालक सुधरे तो भारत सुधरा आगरा
59. सत्संग महिमा जयपुर
60. विद्यार्थियों को उपदेश नसीराबाद
61. तृष्णा अजमेर
62. तुम देह नहीं हो बांटवा
63. जय सत्य की होगी आगरा
64. नाशवन्त दुनिया आगरा
65. भूल न जाओ आगरा

स्वामी लीलाशाह महाराज
1954 में बम्बई में समुद्र के तट पर खींचा गया चित्र


अमृत वाणी
स्वामी लीलाशाह महाराज
(1)
(15 जनवरी 1957 पर आगरे में किया गया प्रवचन)
"काहे एक बिना चित्त लाइये ?
ऊठत बैठत सोवत जागत, सदा सदा हरि ध्याईये ।"
हे भाई ! एक परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी से क्यों चित्त लगाता है ? उठते-बैठते, सोते-जागते तुझे सदैव ध्यान करना चाहिए । यह समस्त दुनिया तो एक मुसाफिरखाना (सराय) है । मुसाफिरखाने में कई चीजें रखी रहती हैं तो उनमें से मुसाफिर केवल काम निकाल सकता है, किन्तु उन्हें वह ले नहीं सकता । इसी प्रकार इस संसार के पदार्थ काम निकालने के लिए हैं, लेकिन उनमें आसक्ति रखकर अपना जीवन भ्रष्ट करने के लिए नहीं है ।
सपने के संसार पर, क्यों मोहित किया मन मस्ताना है ?
घर मकान महल न अपने, तन मन धन बेगाना है,
चार दिनों का चैत चमन में, बुलबुल के लिए बहाना है,
आई खिजां हुई पतझड़, था जहां जंगल, वहां वीराना है,
जाग मुसाफिर कर तैयारी, होना आखिर रवाना है,
दुनिया जिसे कहते हैं, वह तो स्वयं मुसाफिरखाना है ।
कर्तव्य का पालनः- हम दुनिया में माल खजाना इकट्ठा करने के लिए नहीं आये हैं । न विलासिता में अपनी बहुमूल्य देह गँवाने आये हैं । हम आये हैं अपने कर्तव्य पालन के लिए । कर्तव्य पालन ही हमारा परम धर्म है । उसी में ही हमारा सच्चा मानसिक, शारीरिक एवं आत्मिक सुख निहित है । सदैव उद्यम करते रहना चाहिए, फिर काम हो अथवा नहीं । सन्त के पास चलें अथवा नहीं, सन्त सत्संग करेगा अथवा नहीं, लोग थोड़े आयेंगे अथवा बहुत, चलें तो देर न हो जाय आदि बातें विचारना यह सब मन की मस्ती है । इसी मन ने तुम्हें 84 लाख योनियों में भटकाया है । अतः फिर भी उसके कहने पर लगकर एक बार गफलत दिखाओगे तो उसके जाल में फंसे जाओगे और तत्पश्चात वह तुमसे अयोग्य काम कराकर फिर भी रहट की लोटियों की तरह तुम्हें योनियों के चक्र में भटकाता रहेगा ।
काम पूर्ण हो अथवा नहीं, कथा सन्त करे अथवा नहीं, लोग आवें अथवा नहीं, इन बातों से तुम्हारा क्या ! तुम्हारा धर्म है उद्यम करके अपने कर्तव्य का पालन करना । तुम अपनी नीयत निर्मल रखो और कदापि निराशा को भीतर चित्त में आने न दो । विभिन्न स्थानों पर एक महान शक्ति है, जो स्वयमेव ही काम कर रही है । घड़ी को थोड़ी चाबी देने से कैसे न सेकण्ड और मिनट कांटे तथा घण्टा कांटा स्वयं ही चलते रहते हैं । इस प्रकार प्रकृति भी अपना कार्य स्वयं ही करती रहेगी, तुम केवल उद्यम करते रहो फल की इच्छा न रखो ।
किसान का काम है उद्यम करके, झाड़ झंखाड़ काटकर खेत को पानी सींचकर हल देकर, बीज छिटकारना । थोड़े समय के पश्चात् स्वयं ही अंकुर उगते । अंकुर उगने के पश्चात भी किसान का काम है, उसकी अच्छी तरह देखभाल करते रहना । फिर देखो तो कैसे न खेत में भुट्टे निकलते हैं और अन्न के भण्डार इकट्ठे होते हैं । जो किसान केवल सोचता रहता है कि कैसे करुँ? अन्न बोऊँ, फिर अन्न होगा अथवा नहीं इत्यादि । तो फिर कुछ न होगा । किसान की मनोकामनाएँ कदापि पूर्ण नहीं होंगी । उसी प्रकार हमें भी चाहिए कि सदैव अपना कर्तव्य पालन करते रहें, व्यर्थ सोच विचार छोड़कर चित्त सर्वदा प्रसन्न रखें ।
"दादू दावा छोड़ दो बिना दावा दुःख कट ।"
यह समय हमारी परीक्षा का है । अनुकूलता में प्रत्येक दिल लगाकर काम करता रहता है, किन्तु मर्द वह है, जो प्रतिकूलता का भी सामना करे । शाह साहब का वचन हैः-
दुःख सुखनि जी सुंहूं, घोरिया सुख दुःखनि रोज ।
भावार्थः- दुःख सुखों की शोभा है । दुःखों के सिवाय सुख भी नहीं चाहिए ।
अध्यापकों का दण्ड सहन करके ही फिर अध्यापक का पद प्राप्त कर सकते हो । वह सवार ही नहीं होगा, जिसने धक्का न खाया होगा । जिसका व्यवहार श्रेष्ठ, उसका परमार्थ भी श्रेष्ठ होता है । यह सब है कि दुनिया के संग में मन दुःखी होता है, पर उसका साधन भी अवश्य होगा ।
कमरे में कितना में अन्धकार हो, परन्तु प्रकाश आने से तत्काल सेकण्ड में वर्षों का अन्धेरा गायब हो जाता है । शरीर में दर्द हो तो उसे मालिश से दूर किया जा सकता है । यदि भूख व्याकुल करे तो भोजन खाने से तृप्ति प्राप्त की जा सकती है । सचमुच वीरता परीक्षा के समय है । दुःखों में ही हमारी सच्ची परीक्षा होती है ।
"सुख में जान बहुत मिल बैठत, रहत चौदिश घेरे,
वक्त पड़े सभी संग छाडत, कोऊ न आवत नेरे ।"
सुख में सब कोई साथ में रहेगा, पर अच्छा तभी है जब कोई दुःख में साथ दे । काम पड़ते ही मर्द की कद्र होती है । तुम्हारा काम है कर्तव्य पालन करना । तुम केवल निमित्त कारण हो । महात्मा गांधी सब कार्य परमात्मा की ओर से समझता था । जय पराजय सब ईश्वर की ओर से समझता था । वह सदैव कहता था कि मैं तो निमित्त कारण हूँ, मेरा इसके लाभ से क्या प्रयोजन ?
पराधीनताः- इन्द्रियां मन को अपने-अपने विषयों की ओर खींचती हैं । प्रत्येक इन्द्रिय का प्रवाह वायु के प्रवाह से भी कई गुना अधिक है । इस विषय़ों रूप प्रवृत्ति रूप प्रवाह से मन क्षण में एक और आकर्षित हो जाता है । इन्द्रियों के विभिन्न विषयों में इस प्रकार खींचा हुआ मन एक जगह स्थिर नहीं रह सकता है और सदैव चंचल बना रहता है । यह मन की पराधीनता है । सब प्रकार की पराधीनता या वश रहित होना दुःख का कारण है । जो इन्द्रियों के वश में होकर विषयों के पीछे पड़ा हुआ है, वह पराधीन ही है । पराधीन का अर्थ है शत्रु के अधीन अथवा वश में होना । फिर कौन है, जो शत्रु के वश में होकर सुख भोगने की अभिलाषा कर सकता है ?
तृष्णा जहाँ, वहाँ ही जान ले संसार है,
होवे नहीं तृष्णा जहाँ, संसार के वह पार है,
वैराग्य पक्का धार कर, मत भूल विषयासक्त हो,
तृष्णा न कर, हो जा सुखी, मत भोग में आसक्त हो ।
पराधीन होने वाले को सदैव दुःख प्राप्त होता है । अतः प्रत्येक मनुष्य को उचित है कि वह अपने मन को सदैव वश में रखे । जिसकी इन्द्रियाँ विषयों से हर प्रकार निवृत्त होती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर, शांत और गम्भीर रहती है और उसे ही सब सुख प्राप्त होते हैं । इन्द्रियों को बिल्कुल स्वच्छन्द कर देने से अपनी शक्ति क्षीण होती है और इसी निर्बलता के कारण मनुष्य को दुःख भोगना पड़ता है । किन्तु जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को अपने संयम में रखता है और इन्द्रियों को स्वच्छन्द न करके अपने वश में रखता है अर्थात् उन्हें अपनी इच्छा अनुसार चलाता है और उन्हें विषयों के जंगल में भटकने नहीं देता है, उसकी शक्ति भीतर ही रहती है । इस अपनी विशेष शक्ति से व्यक्ति परम सुख प्राप्त करता है । शक्ति की अधिकता सुख है । यदि किसी को सुखी होना है तो वह अपनी विशेष शक्ति से ही होगा । दूसरे से प्राप्त शक्ति से सुख कभी प्राप्त न होगा ।
अतः जो व्यक्ति सुख का इच्छुक है, उसे मन को विषयों से हटा करके अपने वश में रखने का उद्यम करना चाहिए ।
आत्मा रथवान हैः- शरीर आत्मा का रथ है । बुद्धि सारथी अर्थात् कोचवान है और मन लगाम है । इन्द्रियों रूप घोड़े, इस रथ में बंधे हुए हैं, जो अपने विषय रूप मार्ग में जाने की वृत्ति रखते हैं ।
जो व्यक्ति ज्ञान रहित होता है और जो मन को योग से शांत नहीं करता है, उसकी वे इन्द्रियाँ उसके वश में नहीं रहतीं । उसकी दशा ऐसी भयानक होती है, जैसे नये सीखने वाले घोड़ों वाले रथ में बैठे हुए किसी रथवान की होती है । किन्तु जो ज्ञानी है और जो योग से अपने मन को वश में करता है, उसकी इन्द्रियाँ उसके वश में रहती हैं और उसे सुख प्राप्त होता है । जो व्यक्ति स्वयं ज्ञानी है और मन को अपने वश में रखता है और पवित्र रहता है, वह इस पद को प्राप्त करता है । यह से फिर गिरना नहीं पड़ता अर्थात् जन्म मृत्यु से छूट जाता है । जिसका सारथी ज्ञानवान है, जिसका मन रूप लगाम अपने वश में है, वही रास्ता पार कर जाता है और भगवान का परम पद अर्थात् श्रेष्ठ आनन्द का स्थान प्राप्त करता है, किन्तु मनमुख अर्थात् पराधीन मनुष्यों को सर्वदा दुःखी ही रहना पड़ता है । "पराधीन सपने सुख नाहीं ।"
आत्मिक नशाः- एक व्यक्ति भालू का पार्ट करने लगा, उसे अधिक भांग पिलाई गयी थी । उसे कोई होश नहीं रहा । वह सचमुच स्वयं को भालू समझ कर लोगों को खाने लगा । जब उसे खटाई खिलायी गयी तब उसे होश आया । तत्पश्चात सावधान हुआ और की गई मूर्खता पर पछताने लगा । उसी प्रकार हमें अज्ञान रूप नशा चढ़ा हुआ है । हम स्वयं को देही समझ बैठे हैं । जब यह नशा उतरेगा, तब हमें आत्मिक ज्ञान आयेगा ।
भक्ति किसकीः- एक प्रेमी शंकर भगवान की भक्ति करता था । एक दिन उसने शंकर भगवान की मूर्ति पर एक चूहा चलते हुए देखा । उसे मन में विचार आया कि हां ! शंकर भगवान से चूहा बड़ा है । वह चूहे का उपासक बन गया । कुछ दिनों के पश्चात उसने देखा कि बिल्ली चूहे को खा गई । तत्पश्चात वह बिल्ली को बड़ा मानने लगा । फिर एक दिन उसने कुत्ते को देखा कि बिल्ली को मार रहा है । फिर वह कुत्ते में श्रद्धा रखने लगा । फिर एक दिन उसने देखा कि उसकी पत्नी कुत्ते को मार रही थी । तत्पश्चात वह पत्नी की पूजा करने लगा । पत्नी पर उसने एक दिन क्रोध किया । क्रोध करते समय उसे विदित हुआ कि हां ! मैं स्वयं पत्नी से भी उत्तम हूँ । फिर अपनी उपासना करने लगा । ऐसा समझने लगा कि सबमें स्वयं मैं हूँ । अन्त में शुद्ध संकल्प करने से उसे आत्मिक बोध होने लगा और स्वयं को सबका साक्षी सच्चिदानन्द समझने लगा । ऐसा करते-करते परम शान्ति को प्राप्त हुआ ।
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अध्याय 2
26 जनवरी 1957 पर आगरे में किया गया प्रवचन
जिसको स्वर्ग अथवा सुख न चाहिए, वह हाथ उठाए । किसी ने भी हाथ नहीं उठाया । हां, तुम में से कोई भी ऐसा नहीं है, जो स्वर्ग के मजे भोगना नहीं चाहता । प्रत्येक सुख भोगने का इच्छुक है । किन्तु यदि सुख भोगना चाहते हो तो दुर्ग पर कब्जा कीजिये । कौन सा दुर्ग ? यह मन, बुद्धि और इन्द्रियों रूप दुर्ग है । उसको अपना दास बनाइये । ऐसा न हो कि तुम उनके गुलाम होकर, अपना अमूल्य जन्म नष्ट कर दो ।
धिक्कार है उस अर्थ (धन) को, धिक्कार है उस कर्म को,
धिक्कार है उस काम को, धिक्कार है उस धर्म को,
जिससे न होवे शान्ति, उस व्यापार में क्यों आसक्त हो ?
पुरुषार्थ अन्तिम सिद्ध कर, मत भोग में आसक्त हो ।
ताला यदि सन्तरी के हाथ में है तो वह कैदी को भीतर बन्द कर सकता है अथवा बाहर निकाल सकता है । वह स्वामी है, किन्तु कैदी बिचारा पराधीन है । वह भीतर बन्द है, उसका कोई वश नहीं चलता ।
एक दरवेश राजदरबार में गया । वहाँ वह इधर-उधर देख हंसने लगा । मन्त्री ने आकर दरवेश को कहा कि "स्वामी ! यह राजदरबार है, आप यह क्या कर रहे हैं ? देखते नहीं हो कि स्वयं बादशाह सलामत दरबार में विराजमान हैं ।"
दरवेश ने मन्त्री को कहा कि "हाँ, अच्छा, राजा से एक बात पूछ कर आओ कि मन आप का गुलाम है अथवा आप मन के गुलाम हो ?"
मन्त्री ने जाकर बादशाह से पूछाः बादशाह ने लज्जित होकर कहा, "मन्त्री ! कैसी बात पूछते हो, मैं तो मन का गुलाम हूँ ।"
मन्त्री ने यह बात आकर दरवेश को बताई । दरवेश ने सुन कर मुस्करा दिया और खूब ठहाके मारने लगा । कहा, "तुम्हारा बादशाह तो मेरे गुलाम का भी गुलाम है । मन तो मेरे वश में है । वह विकलांग की भांति कुछ नहीं कर सकता । यह बादशाह तो नहीं हुआ, वह तो पराधीन हुआ । घोड़े की लगाम यदि सवार के हाथ में नहीं है तो फिर पता नहीं कि सवार का क्या हाल हो । वह आखिर उसे घुमा-घुमा कर ऐसे गड्ढे में फेंकेगा, जहाँ से उसका निकलना ही कठिन हो जायेगा ।
ये शब्द मन्त्री ने जाकर बादशाह को सुनाये । बादशाह तत्काल आकर दरवेश के चरण में पड़ा । दरवेश ने उस पर दया-दृष्टि की और उसे बोध देकर भवसागर से पार किया ।
मन को सदैव अपने वश में रखो । मन कोई सुन्दर नारी देखता है तो उस में बुरी कामना उत्पन्न होती है । उसे बदलने के लिए नीचे देखो । आँखें बन्द करके, उसे कहो कि अब देखो । वह देख नहीं सकेगा । मन इस प्रकार मुर्दा बन जायेगा । पहले इन्द्रियों को अधिकार में रखो तो फिर स्वतः मन और बुद्धि पर कब्जा रहेगा ।
मन का स्वभावः- एक प्रेमी स्वामी जी के पास आया । स्वामी जी ने आदर सत्कार करके उसे बिठाया । उससे पूछा "सज्जन, कर खबर ! कुछ नाम जपते होंगे । मन की अवस्था बताओ ।"
उसके कहा- "स्वामी जी, मन बड़ा चंचल है ।"
स्वामी जी ने कहाः "मन का वास्तविक यह रूप नहीं है । वह तो जड़ पदार्थ है । मन तो मनन को कहते हैं । जैसे-जैसे संकल्प होंगे, मन का वही रूप होगा । वास्तव में मन का चंचल स्वभाव नहीं है । पानी को जिस बर्तन में डालेंगे, वह वैसा आकार धारण करेगा । पानी में जैसा रंग डालोगे, वह वैसा रूप दिखायेगा ।
मन भी इस प्रकार है । मन पर अधिकार कीजिये । जिस ओर चिल्लाए, उस ओर ज्ञान का अंकुश डाल दीजिये ।
मन में चंचलता आई कहाँ से ? वह उस में स्वाभाविक नहीं है । निमित्त कारण है । उस में तामसी तथा राजसी विचार भरे हुए हैं । वे निकालने चाहिए । मन पर अज्ञान के पर्दे चढ़े हुए हैं – 1. मल 2. विक्षेप 3. आवरण । ये तीनों दूर करने हैं । जब ये पदार्थ दूर होते हैं, तब मन निर्मल होता है, बुद्धि सात्विक होती है, अन्तःकरण में प्रकाश उत्पन्न होता है और उसमें सच्चे आनन्द का मजा आता है ।
पहले संकल्प शुद्ध रखिये । कोई भी बुरा संकल्प भीतर आया तो समझो कि शत्रु ने अपना पड़ाव डाला । उसे मन-मन्दिर में घुसने न दीजिये । नहीं तो अवसर पाकर डाका डालकर भिखमंगा कर जायेगा । अतः आरम्भ से सावधान रहिये । हर समय छोटे बच्चे की भांति उस पर चौकसी रखिये । कभी अशुभ वचन मुख से न निकालो । अशुभ वचन बोलने से बुद्धि मलीन होती है । गुरु साहिबों को देखो कि कैसा न अमूल्य वचन है ! उस में देखिये कि कितना आनन्द भरा हुआ है ।
मुखिया कौन ?:- मुखिया किसे कहते हो ? मुखिया शब्द मुख से निकला है । जिस प्रकार मुख सब अंगों में श्रेष्ठ है । वह कार्य करना बन्द कर दे तो सभी शरीर के अंग निकम्मे हो जायें । उसी प्रकार मुखिया भी एक पूज्य, सदाचारी, श्रेष्ठ सज्जन पुरुष है । मुख के दो कार्य हैं – एक खाना और दूसरा बोलना । खाने और बोलने का एक समान द्वार है । सच्चा मुखिया भी वह, जो सोच विचार करके बोले । किसी का पैसा न खाए ।
बुद्धिमान मनुष्य वह, जिसका मुख दिल में हो अर्थात् सोच करके बोले । मूर्ख वह, जिसका दिल मुख में हो अर्थात् जो उसे आवे, वह कह दे।
ठीक आप भी अगर शुभ संकल्प मन में धारण करेंगे और अशुभ वचन मुख से न निकालोगे, सोच समझ कर चलेंगे तो पौ बारह है । आप से स्वयं ही शुभ कार्य होते रहेंगे । फिर तो आप का बाल भी बांका न होगा । जिधर जाओगे, उधर आपका यश होगा । प्रत्येक आपको चाहता रहेगा ।
तुम्हारे हृदय में उमंग, प्रेम, उत्साह, प्रसन्नता एवं भलमनसाहत की लहरें उत्पन्न होती रहेंगी । तुम्हारा फिर ऐसे अयोग्य कार्य करने पर चित्त ही न होगा, जिससे अन्य को कोई हानि पहुँचे अथवा तुम्हारा मन उदास रहेगा ।
गांधी महाराज का नाम भारत देश तो छोड़ो, परन्तु समस्त विश्व में क्यों प्रसिद्ध है ? क्यों सारा संसार आज दिन तक उनकी बरसियाँ मना रहा है ? क्या शक्ति में तुमसे सबल थे ? क्या वे महलात में रहते थे और बहुमूल्य वस्त्र पहनते थे ? क्या उनके पास बन्दूकें, तोपें थीं ? क्या वे अपने साथ पहरे वाले लेकर चलते थे, जो उन पर रात दिन पहरा देते रहते थे ? कदापि नहीं । वे तो सबके मित्र थे, सबसे भलाई करते थे और सदैव उनके मन में उमंग तथा उत्साह होता था । कोई भी, किसी भी समय उनके पास जाता था तो वे उसका हार्दिक आदर सत्कार, उसे हर प्रकार की सहायता करते थे वे सत्यवादी थे और अन्त समय तक सत्य के लिए लड़ते रहे । तुम भी शुद्ध कार्य करोगे तो तुम्हारा नाम भी अजर अमर रहेगा ।
ज्ञान मुक्ति का साधनः- आत्मा परमात्मा की एकता यही ज्ञान मुक्ति का साधन है, तुम क्षेत्रज्ञ हो । तुम सूर्य के समान हो । तुम स्वामी हो न सेवक, उंगली ऊपर उठा सकते हो और फिर नीचे उतार सकते हो । मन की क्या शक्ति है ? निष्काम कर्म करो, हृदय रूप गुफा में कचरा (गंद), चूहों के बिल और अंधकार हैं । परन्तु कचरा कैसे जाय ? झाड़ू लगाने से । बिल कैसे बन्द किये जाएं ? पत्थर तथा कंकरीट लगाने से । अंधकार कैसे नष्ट हो ? प्रकाश से । प्रकाश करने के विचार शुद्ध रखो । संकल्प विकल्प रखना है झाडू लगाना । पांच चोरों काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार से स्वयं को बचाना है, बिलों को बन्द करना और ज्ञान का प्रकाश करना है अविद्या रूप अन्धकार को हटाना ।
कोई भी बालक लालटेन लेकर भीतर अन्धेरी गुफा में जायेगा तो प्रकाश हो जायेगा । जब यह दिव्य दृष्टि उत्पन्न होगी तो फिर देर ही नहीं, तुम स्वयं वह जगमग न बुझने वाली ज्योति हो । जैसे सूर्य से उत्पन्न बादल सूर्य को कुछ समय के लिए ढक देते हैं, वैसे तुम पर भी अविद्या का पर्दा चढ़ गया है । चारों और प्रकृति पर दृष्टि डालिए । सूर्य तब प्रकाश करता है । वह किसी को बुलाता नहीं है । वह अपनी अडिग वृत्ति में पूरा है । अपने आपमें समाया हुआ है ।
सत्संग करो, भलाई के काम करो । किसी का बुरा न चाहो । तुम क्या यह चाहते हो कि कोई तुमसे कड़वा बोले ? क्या तुम यह चाहते हो कि कोई तुमसे विश्वास घात करे ? क्या तुम चाहते हो कि कोई तुम्हारा अधिकार हड़प कर जाय ? कदापि नहीं । तो फिर तुम भी दूसरों से इस प्रकार चलो, जिस प्रकार तुम चाहो कि दूसरे लोग तुम्हारे साथ चलें । बस, यही ज्ञान मुक्ति का साधन समझो ।

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अध्याय 3
12 जून 1957 पर नैनीताल किया गया प्रवचन
महापुरुषों का संगः- सागर का पानी खारा होता है । वही पानी सूर्य के ताप के कारण साफ होकर ऊपर जाता है और बादलों का रूप ग्रहण करता है । सर्दी लगने से वह वर्षा होकर बरसता है । वह खारा पानी नहीं होता किन्तु मीठा । सागर के पानी वाला खारापन सूर्य के ताप से उसमें निकल जाता है । इसी प्रकार वह संसार द्वारा अर्थात् दुःख रूप भासता है, किन्तु ब्रह्मनेष्ठी और ब्रह्मश्रोत्री महापुरुषों के संग में रहकर, सत्शास्त्रों के श्रवण, मनन, निद्ध्यासन करने से वह सुख रूप भासता है ।
मन और दुःखः- दुःख कब सताता है, जब मन में प्रतीत होता है । जब प्रतीत न करे तो भासेगा ही नहीं । क्लोरोफॉर्म देने से चीर-फाड़ करते हुए भी दुःख क्यों नहीं भासता ? क्या दुःख का लोप हो जाता है । शरीर में दुःख तो वैसे का वैसा रहता, लेकिन मूर्च्छा के कारण मन दुःख प्रतीत नहीं करता । दुःख सुख का निर्भर तो विचार पर है, छोटा । बच्चा रक्त की बूँद देखकर घबरा जाता है । डॉक्टर को दूर से अपनी ओर आता देखकर चिल्लाता है । डॉक्टर उसे हाथ लगाता है तो रोता है । वह दुःख उसे उसके ही अपने विचार पहुँचा रहे हैं । हम जब यह वास्तविकता जानकर, दुःख सुख के साक्षी होकर संसार में चलेंगे, तो कदापि दुःखी नहीं होंगे ।
भ्रमः- एक लड़के को उसके पिता ने कहा कि "भीतर कमरे में जाकर देख आओ कि कितने व्यक्ति सत्संग सुन रहे हैं और कितने व्यक्ति उपदेश कर रहे हैं ।" वास्तव में एक उपदेशक और पचास सत्संगी बैठे थे, किन्तु वे शीश महल में बैठे थे । चारों ओर दीवारों को आईने लगे हुए थे । लड़के ने आदमी तो देखे, किन्तु उनके साथ आईनों में उनका प्रतिबिम्ब भी देखा । वह गिनती करके अपने पिता के पास गया और उसे बताया कि पिता जी, दो उपदेशक और एक सौ सत्संगी बैठे हैं । उसका पिता समझ गया कि वास्तविकता क्या है, कुछ बोला नहीं । जब आदमी चले गये, तब बेटे को भीतर ले गया और उसे कहने लगा कि "देखो यहाँ कितने लड़के हैं ?" उत्तर दिया कि "दो" । उसके बाप ने कहा कि "भला उस लड़के को इधर बुला लो ।" लड़के ने बहुत यत्न किया कि उसे पकड़ लूँ, किन्तु दूसरा हो तो उसे पकड़े ।
अन्त में आईने को चोट लगाई तो वह टूट गया और दूसरा लड़का भी दिखाई नहीं दिया । तब अपने पिता को कहा कि "दूसरा लड़का तो है ही नहीं, मैं एक ही हूँ ।" तब उसके पिता ने कहा "वह तुम्हारा प्रतिबिम्ब आईने में था और उपदेशक भी तुझे दो देखने में आये थे, वे भी दो नहीं थे । सत्संगी भी सौ नहीं थे, किन्तु पचास थे, जिनका प्रतिबिम्ब तूने आईनों में देखा था ।"
इसी प्रकार संसार में ये सब एक के ही प्रतिबिम्ब हैं । तुमसे भिन्न अन्य वस्तु है ही नहीं । भ्रांति के कारण ही यह नानात्व प्रतीत हो रहा है ।
उल्लुओं की पंचायत एकत्रित हुई । उन्होंने एक दूसरे से पूछा कि तुम में से किसी ने सूर्य देखा है । भला उनमें से किसी ने सूर्य देखा हो तो कहे । उन्होंने कहा कि सूर्य होता ही नहीं है । वही दशा अज्ञानी लोगों की है । वे ईश्वर के लिए कहते हैं कि ईश्वर है ही नहीं । वे संसार को सत् समझ रहे हैं ।
अपने आप को भूल के, हैरान हो गया ।
माया के जाल में फंसा बैरान हो गया ।
मन की गतिः- एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा कि स्वामी जी, आपका मन आपके वश में है ? गुरु ने उत्तर दिया कि बेटे कल पूछना । दूसरे दिन शिष्य ने गुरु के वही प्रश्न किया । गुरु ने फिर उत्तर दिया कि "कल पूछना" । इस प्रकार प्रतिदिन वही उत्तर देता रहा । अन्त में गुरु के अन्तकाल का समय आ गया, तब शिष्य ने गुरु को हाथ जोड़ कर बिनती की कि "मुझे आज तक आपने उत्तर नहीं दिया है । अब तो कृपा करके बताइये ।"
तब गुरु ने कहा- "बेटा, हाँ मेरा मन मेरे वश में है । अब तक मैं तुम्हें उत्तर नहीं दे रहा था, क्योंकि मन पर विश्वास नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह किसी भी समय धोखा दे दे तो फिर झूठा प्रमाणित होना पड़े । अब जब मैं संसार से विदा ले रहा हूँ, तब कह सकता हूँ कि मन मेरे बस में है ।"
मन की गति अटपटी, झटपट लखे न कोय,
मन की खटपट जे मिटे, तो चट पट दर्शन होय ।
महापुरुषों का दिलः- स्वामी राम तीर्थ अमेरिका में रटन करते हुए एक ऐसे स्थान पर जा निकले, जहां पास वाले गड्ढे में एक पिल्ला दूध पी रहा था । दो लड़के टेनिस खेलने जा रहे थे । उन्होंने यह दृश्य देखा । एक को दया आई, अतः उसे निकालने के लिए बढ़ने लगा । दूसरा उसे कहने लगा कि भाई टेनिस को देर हो रही है, छोड़ दो इसको । चलो तो खेल पर चलें । किन्तु पहला लड़का नहीं हटा । वस्त्रों सहित गड्ढे में कूद पड़ा और पिल्ले को बाहर निकाल लाया । साथी ने उसे कहा- "कुत्ते के लिए तुमने अपने अमूल्य कपड़े खराब कर दिये ।"
उसने उत्तर दिया- "कुत्ते को डूबते हुए देखकर मेरा दिल दुःखी होने लगा । यदि उसे न निकालता तो मेरा भोजन विष हो जाता और बार-बार कुत्ते की याद आती । उसको जीवनदान देने से मेरे दिल को प्रसन्नता पहुँची है । ऐसा कहकर लड़का खेल पर जाने के बदले कपड़े बदलने के लिए घर लौट गया ।
सचमुच सत्पुरुषों का हृदय उस लड़के की भाँति मोम जैसा कोमल होता है । वे दूसरों को देखकर स्वयं दुःख अनुभव करते हैं और दूसरों के सुख में सुख अनुभव करते हैं । ऐसे सत्पुरुष ही परोपकारी कहलाते हैं ।
विकारों से बचोः- दो नाविक थे, वे नाव चलाकर नदी की सैर करके सायंकाल को वापस आकर तट पर पहुँचे और एक दूसरे से समाचार पूछने लगे । एक नाविक ने कहा कि भाई मैं ऐसा चतुर हूँ कि नाव जब भंवर के पास आती है, तब तत्काल वीरता से काम लेकर नाव चतुराई से उससे से बाहर निकाल लाता हूँ । दूसरे ने कहा कि मैं ऐसा चतुर हूँ कि नाव को भंवर के पास जाने ही नहीं देता । दोनों में से श्रेष्ठ कौन ? पिछला नाविक, क्योंकि पहला किसी न किसी दिन भंवर का शिकार हो जायेगा । इसी प्रकार सत् मार्ग के पथिकों को ऐसा विचार रखना चाहिए । विषय विकारों से दूर भागा जाय, जैसे बटेर भागे बाज से ।
अगर आग के नजदीक बैठोगे जाकर,
उठोगे एक दिन कपड़े जलाकर,
माना कि दामन बचाये रहे तुम,
मगर सेक हरदम लाते रहे तुम ।
कोई जुआ नहीं करता, किन्तु देखता रहता है तो देखते-देखते वह जुआ करना सीख जायेगा और समय आएगा कि वह जुआ करने के अतिरिक्त रह न सकेगा । इसी प्रकार अन्य विषय भी हैं । विषय विकारों से दूर रहना चाहिए । जो विषयों से दूर रहते हैं, वे भाग्यवान हैं । किन्तु गृहस्थ आश्रम में रहते हुए, जो उनसे दूर रहते हैं, वे ही अधिक प्रशंसनीय हैं ।
व्याकुलता क्यों:- एक मन्त्री धर्मात्मा और सत्संगी था । उसे राज दरबार का अत्यन्त बहुत काम करना पड़ता था । कभी-कभी उससे तंग आ जाता था । परन्तु बाद में जब उसे स्मरण आता था कि संसार नाशवन्त है, तब ठहाके मारने लगता था । कहता था "मैं क्या कर रहा हूँ । किसका काम कर रहा हूँ । सब नाशवान है तो फिर व्याकुलता किस बात की । हमें भी सब दम गुजर जानकर दुनिया में चलना चाहिए । विषयों में फंसकर अपना जीवन बरबाद न करना चाहिए ।
स्वयं का निरीक्षण करोः- दूसरों को पहाड़ जितनी भूल भी तिल जितनी करके समझो, किन्तु अपनी तिल जितनी भूल भी पहाड़ जितनी करके जानो ।
यदि कोई तुम्हारी निन्दा करे तो प्रसन्नता के साथ वह सुनो, मन को तपाना नहीं चाहिए । यदि तुम में सचमुच वह दोष हो तो उसे दूर करने का निश्चय करो, किन्तु यदि वह तुझमें न हो तो सुनी अनसुनी कर दो ।
सदैव अपने दोष देखा करो । दूसरों के दोषों की ओर न देखो ।
अपना सुख आप तू, निज मन मांहि विचार,
नारायण जो खोट है, ताको तुर्त निकार ।
अनात्म रूपी पदार्थों में से वृत्ति निकाल कर आत्मा में लगाओ ।
है सो सुन्दर है सदा-नहीं सो सुन्दर नहीं ।
नहीं तो प्रत्यक्ष देखिये – है सो लहिए नहीं ।
आत्मा सुन्दर है । आत्मा ही आनन्द का धाम है । मनुष्य जन्म प्राप्त करके, उसे जिसने पहचाना नहीं तो फिर मानवता किसकी ।
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अध्याय 4
28 जून 1957 पर नैनीताल में किया प्रवचन
साधू कौनः- साधू वह जो कर्तव्यों का पालन करे, जिसमें शील हो । कहे एक और करे दूसरी, वह साधू नहीं कहा जायेगा ।
कथणी सुनणी ठीक है, रहणी रहे न जो;
तीस बतीस दोहरी, ताहि पछानो सो ।
तीस (30) और बतीस (32) हुए बासठ (62) । उनसे दो निकाल दीजिये तो होंगे साठ । सठ (शठ) अर्थात् मूर्ख । जो नाना प्रकार की कथाएँ सुने अथवा करे, किन्तु उन्हें क्रियान्वित नहीं करता वह महामूर्ख कहा जायेगा । जिसमें दैवी सम्पदा के गुण नहीं हैं, वह साधू कैसे कहा जायेगा । कागज पर सौ अग्नियाँ चित्रित करो, लेकिन वे कागज को जला नहीं सकेंगी । वैसे आचरण के सिवाय ज्ञान भी मनुष्य को लाभ नहीं पहुँचा सकेगा ।
पीठ दीजियेः- सागर की भांति महा गम्भीर होकर रहो । सागर को जल की कोई इच्छा नहीं रहती, किन्तु नदियाँ स्वयं ही आकर उसमें प्रवेश करती हैं । तुम भी उसी प्रकार बनो । किसी के समक्ष हाथ नहीं फैलाओ । सत्पुरुषों के पीछे धन स्वयंमेव ही फिरता रहता है । छाया के पीछे कोई पड़े तो वह हाथ नहीं आती, किन्तु आगे-आगे भागती जाती है । परन्तु जब छाया को पीठ दी जाती है, तब वह भी स्वयं पीछे-पीछे दौड़ती रहती है । उसी प्रकार जो माया से मुख मोड़ लेते हैं, माया उनके पीछे दौड़ती रहती है ।
सच्ची शक्तिः- हमें यह समझना चाहिए कि जो महान शक्ति सूर्य, चन्द्र और तारों को प्रकाशित कर रही है, वह हम स्वयं हैं । अपने असली स्वरूप को पहचानो । अपनी शान का, अनादि ज्योति का विचार करें । सच्ची सुन्दरता का ध्यान करें और तुच्छ शरीर के सम्बन्ध इस प्रकार भुला दें, मानो वे थे ही नहीं । न तो मृत्यु है और न तो बीमारी अथवा अन्य कष्ट । सदैव हर हाल में हमें प्रसन्नता, आनन्द और शान्ति से भरपूर रहना चाहिए ।
भोगः- "भोग रोग भयं ।" भोगों में रोगों का डर रहता ही है । भोग भोगने का परिणाम रोग ही होता है । भोग बुरी बला (सांप) है । भोग भोगने के पश्चात् चित्त कदापि तृप्त नहीं होता । सदैव व्याकुल रहता है । भोगों का सुख अनित्य है । दिल चाहता है बार-बार भोग भोगूँ । अतः मन की शांति नहीं रहती । जैसे घी को अग्नि में डालने से प्रथम वह बुझने लगती है, परन्तु तत्पश्चात भड़क उठती है, वैसे भोग भी हैं । भोगने से पहले थोड़ी प्रसन्नता एवं तृप्ति होती है, परन्तु फिर अग्नि भड़कती है और मनुष्य को जलाती, कमजोर करती और नाश करती रहती है । वह बिल्कुल दुःखदायक है । मनुष्य को सदैव गुलाम बनाकर रखना चाहती है । अतः सर्वदा सावधान रहना चाहिए ।
तृष्णाः- तृष्णा क्या है । पहले साधारण इच्छा उत्पन्न होती है, वह बढ़कर तृष्णा बनती है । तृष्णा उत्पन्न होने से प्रमाद एवं पाप आकर उसका साथ देते है, तत्पश्चात मनुष्य होश गंवा बैठता है और अन्धा बनकर मन का आश्रय लेता है । उसका आश्रय लेकर वह ऊँचे हाथी की भांति किसी गहरे गड्ढे में जाकर गिरता है, जहाँ से उसका निकलना कठिन हो जाता है । तृष्णा के साथ चिन्ता भी आकर दुर्ग बनाता है । तृष्णा वाला दूसरों को दुःख देकर भी सुखी होने की चेष्टा करता रहता है और इस प्रकार अपना जीवन व्यर्थ कष्टों में बिताता है ।
कुसंगः- धुआँ सफेद मकान को भी काला कर देता है, वैसे कुसंगी नेक व्यक्ति को बिगाड़ देता है । 'संग तारे, कुसंग डुबोवे' । यह सत्य है । मकड़ी कैसे एक कीड़े को फंसा कर, अपने घर में बन्द कर देती है, थोड़े दिनों के पश्चात कीड़ा उस जैसा बन जाता है । कीड़ा हरी लता पर बैठता है तो अन्त में उसके संग में हरा हो जाता है । इसी प्रकार दुष्ट का संग है । उनके संग करने से मन मलीन होता है । नीच मनुष्य के संग से मरना श्रेष्ठ है ।
कबीर संगत करीए साध की-अन्त करे निर्वाह,
साकत संग न कीजिए, जाते ही होय बिनास ।
कबीर संगत साध की, दिन-दिन दूना हेत,
साकत कारे कानेबरे-धोए होय न सेत ।
दर्शनः- बुदबुदा जल ही है । बुदबुदे को सागर का दर्शन कब होगा, जब अपना अस्तित्व छोड़ेगा तो फिर बुदबुदा और सागर एक हो जायेंगे ।
बुदबुदा लहरों के पास गया तो मुझे सागर देवता के दर्शन कराइये । लहरें और बुदबुदा मिलकर सागर के पास दर्शन के लिए आए और प्रार्थना की कि "सागर देवता ! हमें अपना दर्शन कराइये ।" सागर ने फरमाया कि ऐ मूर्खों ! तुम मुझसे भिन्न हो क्या ? तुम स्वयं सागर हो । अस्तित्व करके तुमने स्वयं को भिन्न समझा है । तुम स्वयं मेरी जान हो । इसी प्रकार मनुष्य अपना आपा भुला बैठा है । वास्तविकता उससे भूल गई है ।
शाह साहब का कलाम है कि "प्रतिध्वनि ही बुलावा है, और यदि वाणी का रहस्य समझो । पहले ही साथ-साथ थे, सुनने में दो हुए । पुन्हू (प्रियतम) स्वयं हुए, किन्तु ससुई बने रहने पर पीड़ाएं थीं ।"

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अध्याय 5
30 अक्तूबर 1957 पर भोपाल में किया गया प्रवचन
सर्वदा आनन्द में रहोः- दुःख-मान-अपमान, हर्ष-शोक आदि द्वन्द्व आदि शरीर के धर्म हैं । जब तक शरीर है, तब तक आते जाते रहेंगे । उनके आने जाने पर तुम व्याकुल न होओ । तुम पूर्ण हो । वे बातें तुम्हें चलायमान क्यों करती हैं, जो अल्प हैं और टिकने वाली नहीं है, परन्तु बीत जाने वाली हैं । उन्हें तो अपना अस्तित्व है ही नहीं । तुम्हारे अस्तित्व का आधार लेकर प्रतीत होती हैं । तुम उनसे भिन्न और उन्हें प्रकाशित करने वाले हो । अतः सर्वदा आनन्द में रहो और शांत मन रहो । वास्तव में व्याकुल करने वाले पदार्थ नहीं हैं परन्तु उनका विचार व्याकुल करता है । इस विचार को सत् वस्तु में लगाकर अपने स्वयं में मगन रहो और सदैव प्रसन्नचित्त रहो । उद्यम न त्यागो । प्रारब्ध पर भरोसा रखना कमजोरी का काम है । अतः अपनी भलाई और दूसरों की भलाई के लिए हाथ पैर चलाते चलो । फल की इच्छा से ऊपर हो जाओ क्योंकि इच्छा बन्धन में लाती है । कुछ भी हो, तो भी स्वयं को उसको साक्षी समझकर आनन्द में रहो ।
बिन्दियों के पीछे न पड़ोः- एक (1) को दाहिनी ओर बिन्दिया देते जाओगे, वैसे उसका मूल्य बढ़ता ही जायेगी । यथा एक को एक बिन्दी देने से दस, दो बिन्दी देने से सौ, तीन बिन्दी देने से हजार और ऐसे अधिक से अधिक अंक होता जायेगा परन्तु यदि एक को मिटा दिया जाय तो फिर दाहिनी ओर वाली बिन्दियाँ कितनी भी हों तो उनका कोई भी मूल्य न रहेगा । यदि बिन्दियों का कुछ भी मूल्य है तो वह एक के कारण । वैसे यही दशा है दुनिया के पदार्थों की । सत् वस्तु के अतिरिक्त पदार्थों की सत्ता है ही नहीं । व्यवहारिक पदार्थ उस सत् वस्तु के सहारे ही प्रतीत होते हैं । अतः उन अनित्य पदार्थों के पीछे भटकना छोड़कर उस सत् वस्तु को पकड़ो तो भव-बन्धन से मुक्ति प्राप्त करोगे । वास्तव में मुक्ति एवं बन्धन भी विचार में हैं । उस विचार को अपने अंतरात्मा को स्थिर करो तो फिर यह समस्त व्यवहार केवल प्रतीत मात्र जाकर रहेगा । तुम्हारे अतिरिक्त कुछ है ही नहीं । तुम ही केवल अकेले विद्यमान हो, शेष बिन्दियाँ ही हैं ।
उद्देश्यः- प्रत्येक प्राणी का उद्देश्य है नित्य सुख की प्राप्ति और सभी दुःखों का नाश । जो भी प्रवृत्ति हम करते हैं, वह इसके लिए, फिर भले ही हम यह न जानते हो, किन्तु हम ऐसे भोजन करते हैं अथवा सिनेमा देखते हैं । वस्त्र पहनते हैं अथवा घूमते-फिरते हैं, वह सब इसके लिए कि सुख मिले और यही है प्रत्येक का उद्देश्य कि सुख मिले परन्तु वह सुख जो नाश न हो और दुःख मिले ही नहीं । इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए बाह्य पदार्थों के वास्तविक स्वरूप को समझना आवश्यक है । उन बाह्य पदार्थों जिनका अस्तित्व है ही नहीं, उनकी प्राप्ति केवल तुम्हारे कारण है । वास्तव में तुम्हारे अतिरिक्त कुछ है ही नहीं ।
सहज प्राणायामः- अत्याधिक उन्नति के लिए शारीरिक उन्नति करना प्रथम कर्तव्य है । शरीर ठीक होगा तो भजन ध्यान भी ठीक हो सकेगा, दुर्बल को कोई सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती । फिर व्यवहार में अथवा परमार्थ में इसके लिए प्राणायाम एक विचित्र मन्त्र है, जिससे शरीर स्वस्थ होता और मन वश में होता है । सहज प्राणायाम यही है कि चलते-फिरते तथा उठते-बैठते भगवान-ध्यान चालू रखा जाय । हरि ओम् शान्ति का उच्चारण चलता रहे तो प्राण स्वयं ही दीर्घ होता जायेगा और इस प्रकार प्राणों पर संयम होना आरम्भ हो जायेगा । विशेषतः प्रातः सायं जब पेट खाली रहता है, यह दीर्घ नामोच्चारण हरि ओम् शान्ति दीर्घ स्वर से उच्चारना अथवा जोर से अधिक फलदायक होगा, करके देखो । यदि चालीस दिन में प्रभाव ज्ञात न हो तो मैं उत्तरदायी हूँ । भगवत् भजन के समय स्वाभाविक ही दीर्घ श्वास लिये जाते हैं, यही है सहज प्राणायाम ।
प्रबल इच्छाः- संसार के सब व्यवसायों धन इकट्ठा करने, सम्पत्ति संग्रह करने, सम्मान प्राप्त करने आदि के लिए हम क्या नहीं करते । सिर को स्वाहा करने से भी नहीं चूकते । जब हम यह स्पष्ट जानते हैं कि यह सब साथ न चलेगा और अन्त में काम नहीं देगा । यदि हम चाहें तो भगवत् प्राप्ति भी कर सकते हैं, जो इस शरीर के न होने से साथ में नष्ट न होगी, शर्त यह है कि यह उद्यम हम उस ओर लगायें, जो हम आदि पदार्थों के प्राप्त करने में लगाते हैं । उद्यम हम कर सकते हैं, कष्ट हम सह सकते हैं, केवल इच्छा को परिवर्तित करना पड़ेगा । ऐसा आज तक नहीं हुआ है कि मनुष्य को किसी पदार्थ को प्राप्त करने की प्रबल इच्छा हो और उसे वह पदार्थ प्राप्त न हुआ हो । अतः सज्जनों, चित्त में प्रबल इच्छा धारण करो और उद्यम करो । किसके लिए ? अनित्य पदार्थों की प्राप्ति के लिए नहीं । वे तुम्हारे साथ नहीं चलेंगे । वे केवल देखने मात्र के लिए हैं । उद्यम करो नित्य आनन्द प्राप्त करने के लिए, इच्छा रखो मुक्ति की । प्रबल इच्छा धारण करो अपने स्वरूप में स्थित होने की, अपने वास्तविक उद्देश्य पर पहुँचने की, ऐसा करो और सर्वदा आनन्द में रहो ।
भलाई के कार्यः- सदैव भलाई के कार्य करते रहो, दूसरों को अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित करो, यह भलाई का काम है, कर भला, होवे भला । झूठ न बोलो । ऐसा कोई भी काम मत करो, जिसके करने से लज्जा आवे । भगवान तुम्हें सदा शक्ति प्रदान करे, जो नेक कार्य करते रहो ।

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अध्याय 6
15 जनवरी 1958 को कानपुर में श्री उत्तमचन्द मूलचन्दाणी के घर में किया गया प्रवचन
जीने का भावः- प्रत्येक प्राणी चाहता है कि मैं सदैव जीवित रहूँ । शरीर में प्रत्येक की ममता है । कोई कितना भी बूढ़ा क्यों न हो जाय, तो भी जीवित रहना चाहता है । शास्त्रों में एक कथा है कि एक दिन नारद महाराज रटन करते हुए भगवान नारायण के पास गये । भगवान को कहने लगे- "महाराज ! स्वर्ग में कितने ही स्थान खाली पड़े हैं, वे भर क्यों नहीं देते ? उसके लिए इतनी बड़ी फीस क्यों लेते हैं ?"
भगवान ने नारद को कहाः "प्यारे नारद, यदि तुम्हारी यह इच्छा है तो आज का दिन तुझे छूट है । जितने भी लोग चाहो वे लाकर उनका स्वर्ग में प्रवेश कराओ ।"
यह सुनकर नारद अत्यंत प्रसन्न हुआ और पृथ्वी पर आया । मार्ग में उसे एक युवक मिला । नारद ने उससे कहा- ऐ प्रियतम, जाते कहाँ हो ? मेरे साथ चलो तो मैं तुझे स्वर्गधाम को ले चलूँ । आज का दिन स्वर्ग का द्वार सर्वथा खुला है ।"
नवयुवक ने चकित होकर कहा- "तुम कहते क्या हो ?" कुशल तो है ? मैंने अभी ताजा विवाह किया है ! मुझे अभी कोई बच्चा ही नहीं हुआ है । अभी कैसे चलूँगा ?"
नारद ने यह सुनकर मन में सोचा कि किसी वृद्ध व्यक्ति की तलाश करूँ । आगे बढ़ा तो उसे एक वृद्ध मिला । नारद ने उससे कहा- "बूढ़े बाबा ! स्वर्ग को चलना चाहो ते मेरे साथ चलो । वहाँ बहुत आनन्द है । तुमने संसार में बहुत भोग भोगे हैं ।"
वृद्ध व्यक्ति यह सुनकर काँप गया । उसने उत्तर दिया- "ऐसे कैसे होगा । अभी तो पोता जन्मा है । वह बड़ा हो, जनेऊ पहने कुछ तो आशाएं पूरी हों । कुछ वर्ष तो ठहरो ।"
नारद इस पर निराश होकर, लौटकर भगवान के पास गये और कहा- "कोई भी स्वर्ग में आना स्वीकार नहीं करता । एक वृद्ध को मैंने कहा । उसने भी कहा कुछ वर्ष ठहरो ।"
भगवान ने कहा- "अच्छा, मैं तुम्हें इजाजत देता हूँ कि जब चाहो, तब किसी को भी ले जाना ।"
कुछ वर्ष बीत गये । बूढ़ा अत्यंत कमजोर हो गया था, नारद फिर उसके पास गया और उससे कहा- "अब तो तुम्हारी कामनाएं पूर्ण हो गई होंगी । अब तो मेरे साथ स्वर्ग में चलोगे ?"
वृद्ध ने क्रोध से कहा- "महाराज, क्या तुम्हारी आँखें केवल मुझमें आ गड़ी हैं ? अब मेरा पोता विवाह तो करे ।"
"अच्छा, भले ही शादी करो ।" ऐसा कहकर नारद लौट गया और कुछ वर्षों के पश्चात फिर वहाँ गया । वहाँ पहुँचने पर उसे विदित हुआ कि कुछ वर्ष पहले उस बूढ़े का देहान्त हो चुका है । नारद ने आँखें बन्द कर के देखा तो वह बूढ़ा कुत्ते की योनि लेकर आया है उसी घर का रक्षक होकर बैठा है । नारद ने मन में सोचा कि अब उसे कहकर देखूँ । बढ़कर कुत्ते के पास गया और उससे कहा- "मानव योनि तो तुमने ऐसे ही गंवाई । अब कुत्ते की योनि में दुःख भोग रहे हो । क्या अब मेरे साथ चलोगे तो स्वर्ग में ले चलूँ ?"
कुत्ते ने कहा- "मैं स्वर्ग को नहीं चलूँगा । यहाँ हूँ तो पुत्र पोतों को देखकर तो प्रसन्न हो रहा हूँ ।"
अब नारद निराश होकर पीछे लौटा और जाकर भगवान को सारी कहानी सुनाई कि वह बूढ़ा कुत्ते की योनि में भी स्वर्ग में आने के लिए उद्यत नहीं है । तब भगवान ने उसे कहा- "नारद, अब तो तुमने देखा न कि कोई भी स्वर्ग में आने के लिए तैयार नहीं ।"
सचमुच मनुष्य इतना तो ममता में फंसा रहता है कि वह परमार्थ का विचार नहीं रखता । वह संसार में अपने को अतिथि मानकर, उसे अपना सदैव का स्थान समझ बैठा है और इसलिए वह सैंकड़ों दुःख सहन करता है और जब उसकी आयु बीत जाती है और काल आकर उसके कंधों पर खड़ा रहता है, तब बहुत रोता है और पछताता है । किन्तु बाद में क्या होगा ? श्री तेग बहादुर जी नवम महले के श्लोकों में कहते हैं-
कीजो हो सो न कियो, पड़ियो लोभ के फंद,
नानक समो रम गयो- अब क्यों रोवत अंध ?
नाम और रूपः- नाम और रूप क्या है ? नाम रूप वह माया है, जो परिवर्तित होती जाती है और नित्य नये-नये रंग रूप धारण कर रही है । नहीं तो अस्ति, भाति, प्रिय ही साक्षी चेतन है ।
हनुमान से श्री रामचन्द्र जी ने पूछा कि- "ऐ हनुमान ! तुम मुझे क्या समझते हो ?" हनुमान ने उत्तर दिया कि यदि जीव दृष्टि से पूछते हैं तो मैं आपका दास हूँ, लेकिन यदि वास्तविक दृष्टि से पूछते हैं तो मैं आपका ही रूप हूँ ।" वास्तविकता तो यही है ।
नाम और रूप प्रत्येक वस्तु के बदलते रहते हैं, किन्तु अस्ति, भाति, प्रिय नहीं । कपास का ही उदाहरण लीजिये । वह नाम और रूप परिवर्तित करती हैं । कपास काती जाती है तो तागे होते हैं । उसका रूप बदल गया, उसका नाम भी कपास से बदलकर सूत अथवा तागा हुआ । यह सूत बुनकर वस्त्र का रूप धारण करता है । उस कपास का नाम ही कपड़ा हुआ और उसका रूप भी बदल गया । फिर वह विभिन्न रूपों से सिलकर पाजामा, कुर्ता, सूट आदि नाम धारण करता है । उसके रूप भी अलग-अलग होते हैं । वे हमें प्रिय भी लगते हैं । वह कपड़ा गलकर, फटकर टूट जाता है, तब उससे फिर कागज बनता है और उसी कागज से पुस्तक । इस प्रकार नाम और रूप बदलते रहते हैं । वह पुस्तक भी अस्ति, भाति, प्रिय है । उसे अस्ति (अस्तित्व- Existence), भाति है अर्थात् भासता है, क्योंकि उसका ज्ञान हमें होता है और प्रिय भी है, क्योंकि वह हमें प्यारा लगता है । सबकी यही दशा है ।
अभ्यास में अरूचिः- स्वामी जी का प्रवचन चल रहा था तो एक जिज्ञासु ने विनती की- "स्वामी जी, कृपा करके बतायें कि अभ्यास में हमारी रुचि क्यों नहीं होती ?"
महाराज ने फर्माया- "बाबा, अभ्यास से मजा तब आयेगा जब उसकी आवश्यकता अनुभव की जायेगी । कहानी कहते हैं- "एक दिन सियार को बहुत प्यास लगी । प्यास से परेशान होकर दौड़ता हुआ वह नदी के तट पर पहुँचा और जल्दी-जल्दी पानी पीने लगा । सियार की पानी के लिए इतनी तड़प देखकर मछली ने सियार को कहा- "मामा सियार, तुम्हें पानी से इतना मजा क्यों आता है ? मुझे तो आता ही नहीं ।"
सियार ने उसे कहा- "दिखाऊँ कि मजा क्यों आता है ?" मछली ने कहा- "हाँ मामा ।" सियार ने उसे गले से पकड़ कर गरम रेत पर फेंक दिया । विचारी पानी के सिवाय बहुत तड़पने लगी और परेशान होकर मरने पर थी तो सियार ने फिर उसे पानी में डाला और उससे पूछा कि- "अब जाना कि मजा आने का कारण क्या है ?"
मछली ने कहा- "हाँ, अब मैंने समझा कि जल ही मेरा जीवन है, उसके अतिरिक्त मेरा जीना ही कठिन है ।" इस मछली की भांति जब तुम भी अनुभव करोगे, तब अभ्यास के सिवाय रह नहीं सकोगे और रात दिन उसमें लगे रहोगे ।
गुरु नानक देव से माता जी ने पूछा- "बेटे, रात दिन जबान से क्या कहते रहते हो ?" साहब ने कहा- "आखां जीवां-बिसरे मर जाय, रात दिन जब सच्चा नाम स्मरण करता हूँ, तभी मैं जीवित हूँ, नहीं तो मैं मर जाऊँ ।" इस प्रकार सत्पुरुष अभ्यास की आवश्यकता अनुभव करके, उस रंग में लीन रहते हैं और बार-बार साक्षी रूप का चिन्तन करते रहते हैं ।
ऊठत बैठत सोवत नामा, कह नानक जन सद कामा ।
भेद क्यों:- जीवात्मा और परमात्मा दो भिन्न वस्तु नहीं हैं, जीव से अज्ञान निकलेगा और माया पर दृष्टि न डालने से एकता भासेगी । जिस प्रकार एक डिब्बे में गेहूँ पड़ा है, और दूसरी टोकरी में भी गेहूँ पड़ा है । डिब्बे और टोकरी का विचार छोड़ दोगे तो शेष सामान्य वस्तु गेहूँ ही रहेगी ।
एक गुरु ने शिष्य से कहाः "बेटे, गंगा नदीं से जल का गिलास भरकर लाओ ।" शिष्य ने आज्ञा का पालन किया । गुरु ने शिष्य से कहा- "बेटे ! यह गंगाजल कहाँ है ? गंगा में तो नावें चल रही हैं, इनमें वे कहाँ है ?"
शिष्य घबरा गया । उसने कहा- "स्वामी जी, मैं तो गंगा जी से जल भरकर लाया हूँ ।" शिष्य को घबराया हुआ देखकर गुरु ने फरमाया- "बेटे, दुःखी न हो । यह जल और गंगाजल कल्पना के कारण भिन्न भासता है, वास्तव में है वही । यह फिर जाकर गंगा में डालोगे तो वही रहेगा, रत्ती भर भी भेद नहीं देखोगे । इसी प्रकार आत्मा और परमात्मा भ्रान्ति के कारण दो वस्तुएँ प्रतीत हैं, किन्तु हैं एक ।"
जिस प्रकार कमरे के भीतर की जमीन और बाहर की जमीन भिन्न दिखाई पड़ती है, यद्यपि दीवारें जिन्होंने उनको अलग किया है, वे पाताल तक गई हुई नहीं हैं । वास्तव में जमीन में भेद नहीं है, दोनों जमीनें एक हैं, लेकिन दीवारों की भ्रांति के कारण भिन्न भासती हैं । वही अवस्था जीव ब्रह्म से भी है ।
जब बोला जाता है, तब आवाज वही एक होती है, किन्तु जो सुनता है, उसे सुनने वाला कहा जाता है, लेकिन दोनों के कर्तव्य भिन्न-भिन्न हैं । इसी प्रकार ईश और जीव दो नाम हैं । बात एक है, लेकिन कल्पना के कारण दो कहे जाते हैं । दोनों में से नाम रूप निकाल दो तो शेष एक चेतन की ही सत्ता रहेगी ।
वाद विवादः- व्यर्थ वाद-विवाद न करो । बहुत बोलना उचित नहीं है ।
वाद विवाद काहू से न कीजिए,
रसना राम अमृत रस पीजिए ।
यदि घी अधिक खाया जायेगा तो अपथ्य हो जायेगा । यदि वर्षा अधिक होगी तो हानि हो जायेगी । देखते हो कि दीपक जलता है तो बाती और तेल जलता है । इसी प्रकार जितना बोला जाता है, उतनी भीतर की शक्ति (Energy) कम होती है । इसलिए इस युग का महान पुरुष महात्मा गांधी भी प्रत्येक सोमवार पर मौन व्रत धारण करते थे और बोलते बिल्कुल नहीं थे ।
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अध्याय 7
24 जून 1958 पर नैनीताल में किया गया प्रवचन
कर्म फलः- दो बातें कभी न भूलो, एक तो जैसा-जैसा कर्म करोगे, वैसा-वैसा फल मिलेगा । जैसे धरती में जैसा बीज डालोगे, वैसा ही फल उत्पन्न होगा । कोई भी वह बोए किन्तु जमीन किसी का भी विचार नहीं करती, अमीर हो अथवा गरीब । सबको फल देती रहती है, वैसे ही इस पृथ्वी पर जो मनुष्य जो जैसा कर्म करता रहता है, उसको वैसा फल अवश्य मिलता है ।
दूसरी बात कि जैसे एक बीज का फल एक नहीं होता, एक बीज डालने से कई दाने बाली के रूप में उत्पन्न होते हैं, वैसे थोड़ी ही बुराई करने से बड़ा धोखा पहुँचता है, थोड़े पुण्य कर्म करने से बड़ा लाभ पहुँचता है, थोड़े पुण्य कर्म करने से मन शान्त रहता है, अनेक प्रकारों के रूप में सुख रूप ही भासता है ।
अतः कोई भी कर्म थोड़ा करके न जानो । थोड़ी भूल पहाड़ सदृश समझनी चाहिए ।
इसलिए मन को बार-बार समझाओ कि हे मन, यह क्या कर रहा है ? तृष्णा रूप गंदे जल में गोते खा रहा है । अमूल्य मनुष्य जन्म विषय भोगों में बरबाद कर रहा है । रत्नों को छोड़कर कंकड़ इकट्ठे कर रहे हो । तुम अपने पड़ाव की यात्रा में काँटे बो रहे हो । तुझे जाना कहाँ था और जा कहाँ रहा है । असंख्य योनियों में भटक-भटक कर, आखिर तुझे यह अमूल्य मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ है । यह जन्म तुझे किन्हीं पुण्य कर्मों के कारण प्राप्त हुआ है । 'बड़े भाग मानुष जन्म पाया' परन्तु तुम इस शरीर में भी विकारों के वश में हो गये हो । वे तुम्हें रात दिन लूट रहे हैं तो भी तुम्हें कोई पता नहीं पड़ता ।
भोग में रोगः- गुरु ग्रन्थ साहब के राग आशा वाणी श्री रविदास शब्द पहले में आता है-
मृग मीन भ्रंग पतंग कंचर, एक दुःख बिनास;
पंच दुःख असाध जामंहि, ताकि के तक आस ।
श्री रविदास जी फरमाते हैं कि हिरन शब्द पर रीझ कर शिकारी के वश में हो जाता है, मछली खाने के लोभ में धीवर के जाल में फंसती है । भ्रमर फूल की सुगन्ध पर आसक्त होकर अपनी जान बलिदान कर देता है, पतंग दीपक की ज्योति पर मस्त होकर अपने को जलाकर समाप्त कर देता है, हाथी काम के वश में होकर स्वयं को नाश कर देता है, परन्तु मनुष्य तो पाँचों विषयों में फंसा हुआ है । अतः उसके बचने की कौनसी आशा होगी ? अवश्य ही वह नाश होगा ।
भोग को सदैव रोग समझो । विषय विकारों में डूबकर सुख शान्ति की अभिलाषा कर रहे हो । शोक तुम्हारे ऐसे जीने पर !
तुम्हारा लक्ष्य कौन था ? स्व स्वरूप में लीन (Reunion) होने का था परन्तु तुम ऐसे निर्लज्ज हो गये कि तुम्हें कोई लज्जा भी नहीं आती ।
स्मरण रखो कि तुम्हें धर्मराय के समक्ष आँख नीची करनी पड़ेगी । कबीर साहब ने फरमाया है-
धर्मराय जब लेखा मांगे – क्या मुख लेके जायेगा ?
कहत कबीर सुनो रे साधो – साध संगत तर जाएगा ।
भूलो नहीं कि वहाँ प्रत्येक अन्न प्रकट होगा, प्रत्येक अपने कामों के लिए उत्तरदायी रहेगा । तुम्हें तो वहाँ अपना सिर नीचे करना पड़ेगा । अतः सोचो अभी भी समय गया नहीं है । सामी साहब कहते हैं कि जो समय बीता, वह बीत गया, शेष समय तो अच्छा आचरण करो । अन्तःकरण में अपने प्रियतम को देखो । मनुष्य देह वापस नहीं मिलेगी ।
अतः आज अपने मन में दृढ़ निश्चय कर लो कि मैं सत्पुरुषों का संग करके, सत्शास्त्रों का अध्ययन करके, विवेक एवं वैराग्य का आश्रय लेकर, किसी ब्रह्मनेष्ठी, ब्रह्मश्रोत्री महापुरुष की शरण पकड़कर, अपने कर्तव्यों का पालन करके इस मनुष्य योनि में मोक्ष पद को प्राप्त करूँगा ।
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अध्याय 8
25 जून 1958 पर नैनीताल में किया गया प्रवचन
परमात्मा और सत्पुरुषों का साथ सदैव प्रेम भले ही रखा जाय, रखना भी चाहिए, यह कल्याण का मार्ग है, किन्तु प्यारे, बार-बार यह बात कहनी न चाहिए । यह प्रेम जितना भीतर रखा जायेगा, उतना अधिक लाभ होगा । जिनको समझा जाय कि ये यथार्थ आत्मदर्शी हैं, उन्हें भूलकर भी शरीर भावना से न देखना चाहिए, अपितु पूर्ण ही पूर्ण सच्चिदानन्द स्वरूप समझा जाय । आत्मा करके वे यथार्थ आत्मदर्शी और हम सभी एक हैं, जरा भी भेद नहीं है । जैसे एक ही आकाश सब घरों में और घड़ों में चारों ओर फैला हुआ है, वैसे आत्मा करके हम एक आकाश की भांति व्यापक हैं, द्वैत ही बन्धन का कारण है । जिस दिन से स्वयं को हमने शरीर समझा और परमात्मा से अपने को भिन्न समझा, बस, उस दिन से दुःख आरम्भ हुए ।
हमारे सामने यह उद्देश्य होना चाहिए कि स्वयं को पहचान कर जन्म आदि दुःखों से छुटकारा पाकर, अखण्ड आनन्द में लीन होंगे अर्थात् मुक्त हो जायें और जीवन मुक्ति विदेह मुक्ति का आनन्द ले सकें ।
शरीर की आसक्ति ही हमें कष्ट देती है ।
अर्जुन बड़े मोह में पड़ा था । श्री कृष्णचन्द्र के समझाने पर वह समझ गया और जाना कि अरे संसार अर्थात् स्वप्न में तो अन्धकार में अंधों की नाईं ढूँढता ही रहा । अरे जैसे मुझ साक्षी में सपने की दृष्टि है, वैसे यह भी सपने की बाजी है ।
बाजीगर जैसे बाजी पाए, लोक तमाशे आए ।
हमारी आत्मा स्थिति बार-बार चिन्तन करने से हो सकती है, जो अपने को शिष्य कहलाता है, अरे वह यदि शिष्य होकर रहा और गुरु न बना तो फिर उसने शिष्य बनकर क्या किया ? अर्थात् यदि वह पूर्ण ज्ञानी न बना और अज्ञान के अन्धकार में सदैव रहा अर्थात् अपने हाड़, मांस, मल आदि से भरा हुआ ही समझता रहा तो फिर वह सच्चा शिष्य कैसे कहा जायेगा ? इस शिष्य होने से उसे कौन सा लाभ हुआ ?
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अध्याय 9
26 जून 1958 पर नैनीताल में किया गया प्रवचन
विचित्र मन्त्रः- प्रत्येक मनुष्य को प्रायः यह भावना रहती है कि मैं सदैव सुखी रहूँ और कदापि दुःखी न रहूँ, किन्तु सुख-दुःख तो ऊपर आकाश से नहीं गिरता । विचार ही है, जो मनुष्य को दुःखी अथवा सुखी करते हैं । कैसे भी खुशी के वातावरण में कोई मग्न क्यों न हो तो भी उस समय यदि उसके चित्त में किसी फुरने ने आ घेरा तो ठीक उसी समय ही वह उदासीन दिखाई देता रहेगा । अतः प्रिय प्रियतम, यदि तुम चाहो तो मैं सदैव प्रसन्न रहूँ और मेरा मन कदापि चंचल न हो तो फिर यह विचित्र मंत्र याद रखो- "यह भी बीत जायेगा ।" यह सदैव हृदय पटल पर अंकित कर दो । यह मंत्र है, जिसके सदैव स्मरण अथवा ध्यान करने से मनुष्य दुःख सुख के समय स्वयं को संभाल कर सावधान हो सकता है, न दुःख में कुमहलाता है और न सुख में फूलता है ।
ईश्वर दरबारः- सत्संग हंसी मजाक नहीं । राजदरबार में कैसे न सावधान रहना पड़ता है । यहाँ सत्संग में उससे अधिक सावधान रहना है । कुछ माताएं सत्संग में मालाएं फेरती रहती हैं, कुछ स्वैटर बुनती रहती हैं, तो कुछ खरबूजे का बीज छीलती रहती हैं, यह कैसी न मूर्खता है । भक्ति मार्ग कोई हंसी है क्या ? इस प्रकार अमूल्य समय व्यर्थ जाता है । इस प्रकार मन की वृत्ति एक स्थान पर नहीं रहेगी तो सत्संग किसका ? ऐसा करने से मन चंचल रहेगा और मन कदापि स्थिर न रह सकेगा ।
लख बन्दूक लग रहन, लख लगन तीर,
पार दास यह मन न करे, बिना शब्द के सीर ।
ईश्वर दरबार में सम्मान के साथ बैठना चाहिए और नित्य श्रद्धा से सत्संग श्रवण करना चाहिए ।
सदैव एक रस रहोः- स्वयं को साक्षी जानो । किसी कार्य के हर्त्ता कर्त्ता समझ कर अपने को दुःखी न करो । तुम तो सत् चित् आनन्द स्वरूप, न बुझने वाली ज्योति हो । संसार के परिवर्तन में स्वयं को मत फंसाओ । नवम् के पहाड़े में कैसी न विशेषता है ?
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Sr. No. |
Table no. |
#VALUE! |
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9 |
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9 |
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9 |
9 |
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10 |
9 |
90 |
प्रत्येक दशा में पिछले अंकों का योग करके देखोगे तो उत्तर नौ (9) आयेगा । 2x9=18 में 1+8=9, 27 में 2+7=9 होता है । इस प्रकार सब अंकों का योग प्रत्येक दशा में 9 होता है । इसी प्रकार तुम अपने वास्तविक स्वरूप को एक रस विश्वास सहित जानो और सदैव आनन्द में रहो ।
दुःख सुख का साक्षीः- जोधपुर के शहर में एक 80 वर्ष का वृद्ध अत्यन्त दुःखी रहता था । वह सन्तों के पास गया । उन्हें जाकर दिल का हाल बताया । कहा "स्वामी जी, आशीर्वाद करें कि प्राण निकलें । मैं अत्यन्त दुःखी हूँ । मेरा बेटा बैरिस्टर है, आज्ञाकारी है । परन्तु उसकी धर्मपत्नी सारा दिन झगड़ा लगा बैठी है । मुझे ठीक समय पर भोजन भी नहीं मिलता ।" सन्तों ने उसे उपदेश किया-
मनुष्य जन्म दुर्लभ है, होय न बारू बार,
जैसे फल पाका भूं गिरे, बहुर न लागे डार ।
आत्मिक चिन्तन करो । तुमने समस्त आयु ऐसे ही गंवा दी है । तुम सबके साक्षी हो । अजर, अमर, आनन्द स्वरूप हो । तुम्हें दुःख सुख कुछ नहीं कर सकता । तुम उससे थोड़ा ऊपर चढ़ो और फिर आनन्द देखो ।"
उसने ठीक वैसा किया तो उसके दुःख दूर हो गये । दुःख रूप वृत्ति को परिवर्तित करके, उसने सुख रूप कर दिये । थोड़े समय के पश्चात उसका फिर संतों से मिलना हुआ । उसने संतों से कहा- " स्वामी जी, आपने मुझ पर बड़ी कृपा की । अब तो झगड़ा है ही नहीं । मैं सावधान रहता हूँ । मुझ में दुःख प्रवेश ही नहीं करता । यमराज की भी शक्ति नहीं कि मुझसे सामना कर सके ।"
सन्तों ने उसे कहा- "बेटा, सब कुछ प्रारब्ध के वश में है । दुःख सुख के तुम साक्षी हो । यदि कोई दुःख हो तो ऐसा समझो कि मेरे कर्मों का फल विधाता माता दे रही है । यह सब निमित्त कारण है, विभिन्न स्थलों पर, विभिन्न समयों पर कोई महान शक्ति है, जो काम कर रही है ।"
लक्ष्मण ने श्री रामचन्द्र महाराज को कहा- "कैकेयी को मजा चखाना चाहिए ।" श्री रामचन्द्र जी ने उसे रोका और कहा "कैकेयी तो मुझे अपनी माता से भी अधिक प्यार करती है । इस बिचारी का क्या दोष ? सब कुछ प्रारब्ध के वश में है ।
कका कारण कर्ता सोऊ – लेखा लेख न मेटन कोऊ,
नहीं कुछ होत दोऊ बारा – करणी हारा न बोलण हारा ।
कैकेयी माता यदि ऐसा न करती तो वनवास में कौन जाता और राक्षसों को कौन मारता ? स्मरण रखो कि कोई किसी को कुछ नहीं कर सकता ।
नाच नचे संसार मति – मन के भाइ सुभाई,
होवन हार न मिटे कस – तोड़े यत्न कोढ कमाई ।
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अध्याय 10
29 जून 1958 पर नैनीताल में किया गया प्रवचन
ज्ञानचन्द नामक एक जिज्ञासु था । वह सदैव प्रभु भक्ति में लीन रहता था । दान पुण्य बहुत करता था । स्नान करके पूजा पाठ करता था । तत्पश्चात जाकर दुकान का कार्य करता था । भोजन का समय होता था तो दुकान बन्द करके जाता था और फिर नहीं खोलता था । उसके आचरण पर लोग चकित थे और उसे पागल समझते थे । वे कहते- वह महान मूर्ख है कि सब पैसे दान में लुटा देता है तथा दुकान भी थोड़े घंटे ही खोलता है । प्रातः सायं सत्संग में समय बरबाद कर रहा है । यह तो कोई पागल है ।
एक दिन नगर के सेठ ने उसे अपने पास बुलाया । उसने एक लाल टोपी बनवाई थी । वह उसे देकर कहा- "यह टोपी मूर्खों के लिए है । तुम्हारे सदृश कोई महान मूर्ख दीखने में नहीं आया है, अतः यह तुझे पहनने के लिए देता हूँ । इसके पश्चात यदि तुझे अपने से कोई बड़ा मूर्ख दिखाई पड़े तो उसे पहनने के लिए दे देना ।"
ज्ञानचन्द शान्ति में वह टोपी लेकर घर लौटा । एक दिन नगर का सेठ बीमार पड़ गया । ज्ञानचन्द उससे मिलने के लिए गया । उससे समाचार पूछने लगा । सेठ ने कहा- "बाबा" अब चलने की तैयारी है । ज्ञानचन्द ने उससे पूछा- "कहाँ जाने की तैयारी है आपने ? वहाँ कोई व्यक्ति भेजा है कि आपके लिए जाकर प्रबन्ध करे ? अपने साथ स्त्री, पुत्र, भाई अथवा कोई ले जायेंगे अथवा नहीं ?"
सेठ ने उत्तर दिया कि "भाई, वहाँ कौन साथ में चलेगा ? कोई भी साथ चलने वाला नहीं । 'अकेला आना, अकेला जानता, कोई न रहसी राजा राना ।' कुटुम्ब परिवार, धन, दौलत, महल, गाड़ियाँ सभी छोड़कर यहाँ से जाना है । भगवान के अतिरिक्त कोई भी साथी होने वाला नहीं है ।"
सेठ के ये शब्द सुनकर ज्ञानचन्द ने अपने यहाँ सेठ की दी हुई लाल टोपी सेठ को देकर कहा "आप पहनिये ।" सेठ ने पूछा- "क्यों ?" ज्ञानचन्द ने उत्तर दिया कि मुझसे महान मूर्ख आप हैं, जो आपको पता भी था कि समस्त सम्पत्ति यहाँ ही रहेगी, आपका कोई भी साथी न होगा और भगवान के सिवाय कोई भी सहायक नहीं है ।
सुख में जान बहुत मिल बैठत, रहत चौदिस घेरे,
विपत पड़े सभी संग छोड़त, कोउ न आवे नेरे ।
जब कोई धनवान एवं शक्तिवान है, तभी प्रत्येक स्वामी-स्वामी करता रहता है और चारों ओर से घेरकर खड़ा होता है । किन्तु जब कोई आपदा आती है, तब कोई पास नहीं जाता है । ऐसा जानते हुए भी क्षणभंगुर वस्तु से आप ने प्रीति लगाकर, आत्मिक सुख लेने से निराश रहे और अपने भविष्य का सामान इकट्ठा न किया । इस अवस्था में आपसे महान मूर्ख कौन हो सकता है ? गुरु तेग बहादुर साहब ने नवां महले के श्लोकों में फरमाया है-
करणो हो सो ना कीओ पड़ियो लोभ के फंद,
नानक समो रम गयो – अब क्यों रोवत अन्ध ?
"सेठ साहब ! अब तो आप कुछ नहीं कर सकते । आप देख रहे हैं कि कोई भी आपकी सहायता करने वाला नहीं । क्या वे बड़े मूर्ख नहीं कहलायेंगे, जो जानते हुए भी माया के मोह में फंसकर, ईश्वर से विमुख रहे, कुछ करते, दान पुण्य करने से हाथ ठंडे करते, ईश्वर कीर्तन, नाम स्मरण और सत्संग में जी तन व्यतीत करते तो इस प्रकार दुःखी क्यों होते ?"
नशे से बचोः- सवेरे उठना भी कर्तव्य है । अपने बालकों को सवेरे उठाओ, स्वयं भी स्वेरे उठो । सिनेमा से बचो । वे डाकू हैं, नशे लूटते हैं । डाकुओं के हाथ न चढ़ो । जो कहते हैं कि शराब भले पियो, मांस खाओ, उनसे स्वयं को बचाओ । सावधान होकर चलो । वे सब डाकू हैं । अध्यापक यदि अपने कर्तव्य का पालन करें तो वे आचार्य हैं । पाप करने से तुम सुख नहीं पाओगे । छिपाकर किससे पाप करोगे ? प्रभु तो सबको देखता है ।
बड़े में बड़ा सुखः- बड़े में बड़ा सुख है मुक्ति का । बड़े में बड़ा दुःख है पाप का । प्रभु की प्रार्थना मिलकर अथवा अकेले अवश्य करनी चाहिए । कमर कसकर परमात्मा को याद करो तथा औरों को याद कराओ तो तुम्हें भी भाग मिलेगा । 'परमेश्वर ते भूलिए व्यापन सभी रोग ।' अतः भगवान को सदैव याद रखो ।
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अध्याय 11
13 सितम्बर 1958 को अजमेर में किया गया प्रवचन
अजमेर में एक जिज्ञासु ने प्रार्थना की कि वेदान्त का ज्ञान तो ध्यान में आता ही नहीं और रूखा लग रहा है, उस पर स्वामी जी ने कहा- "बाबा, जब तक मन नहीं मरा है, तब तक वेदान्त का ज्ञान अच्छा लगेगा भी कैसे ? श्री विद्यारण्य स्वामी "जीवन मुक्तिविवेक ग्रन्थ में कहते हैं कि सहस्र अंकुरों टहनियों और पत्ते वाले संसार रूप वृक्ष की जड़ मन ही है । यह आवश्यक है कि संकल्प को दबाने के लिए मन का रक्त, बल सुखा देना चाहिए, उसे नाश कर देना चाहिए । ऐसा करने से यह संसार रूप पेड़ सूख जायेगा ।"
आगे चलकर कहते हैं कि "अब मैंने समझा, अभी ही मैंने समझा आत्मदेव को चुराने वाला चोर मैंने मन को समझा है । अतः अब इस मन को मारता हूँ, उसने बहुत दिनों से मुझे मारा है ।"
महाराज वशिष्ठ कहते हैं कि "अनेक प्रकारों के फलदाता इस संसार रूप वृक्ष को जड़ से उखाड़ने का, अपने मन को वश में करने का केवल एक ही उपाय है । मन का उठना और स्वच्छन्दता अपनाना ही मनुष्य के नाश होने का कारण है और मन की समाप्ति होना उनकी उन्नति का कारण है ।"
"ज्ञानी का मन नाश को प्राप्त होता है और अज्ञानी को मन बांधने वाला जंजीर है । जब तक परम तत्त्व (सत्) के दृढ़ अभ्यास से अपने मन को जीता नहीं जाता, तब तक आधी रात को नाच करने वाले प्रेत, पिशाच आदि की तरह वह नाच करता रहता है ।
"जिसके चित्त का अभिमान (मलिन अहंकार) अर्थात् धन आदि झूठे पदार्थों पर गर्व करना शान्त नहीं हुआ है और जिसने इन्द्रिय रूप शत्रु को वश में किया है, उसकी भोग वासनाएं, जैसे जाड़े में कमल का फूल नष्ट हो जाता है, वैसे नष्ट हो जाती हैं । जो हाथ से हाथ को दबाकर, दाँतों से दाँत दबाकर, अंगों से अंग पलट कर, पहले अपने मन को जीतते हैं वे ही पुरुष इस विशाल संसार में भाग्यवान बुद्धिमान हैं । उनकी ही मनुष्यों में गिनती हो सकती है ।
"हृदय रूप वन में फन निकाल कर बैठा हुआ सांप मन है । जिसमें संकल्प विकल्प रूप घातक विष है, ऐसा मन रूप सांप जिसने मारा है, उस पूर्णिमा के पूर्ण चांद की तरह निर्विकार पुरुष को मैं नमस्कार करता हूँ ।"
"इस माया चक्र के बीच में चित्त है, जो सब ओर से उस पर आक्रमण करके स्थिर बना है, उसे कोई भी बाधा नहीं आती ।"
श्री गौड़पाद आचार्य ने कहा है- "समस्त योगी पुरुषों को भव (संसार) का नाश मन के वश में करने से ही होता है । इस प्रकार दुःख की निवृत्ति ज्ञान और अक्षय शांति भी मन के वश करने में ही है ।"
जैसे सपने की सृष्टि एक काल्पनिक बगीचा है वह यह दृढ़ निश्चय है, वैसे यह दुनिया जो दीखती है, वह निश्चय ही एक काल्पनिक बगीचा है । सपने की सृष्टि सपने के समय ही सच्ची भासती है, जब तक पूर्ण रीति से सत् का ज्ञान नहीं हुआ है, न उससे पहले और न पीछे । जैसे सपने से जागने पर उसके असत् होने का पता पड़ता है, वैसे अपरोक्ष 'यथार्थ' ज्ञान होने पर उसके न होने का पता पड़ता है ।
प्रश्न यह है कि क्या ज्ञानियों को यह सृष्टि नहीं भासती ? इसका उत्तर यह कि ज्ञानी को सृष्टि इस प्रकार भासती है, जैसे वैज्ञानिक को सिनेमा में दृश्य भासते हैं, वे प्रकाश के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं । ज्ञानी सृष्टि को बाजीगर की बाजी ही मानता है ।
संसार का सौन्दर्य और आनन्द अविचार के कारण ही भासते हैं, परन्तु जब विचार से उसके आनन्द और सौन्दर्य का भासना निकल जाता है, तब उसमें से स्वतः ही वैराग्य आ जाता है । ऐसे निश्चय होने से उससे आसक्ति निकल जाती है ।
जैसे कामी विषयी पुरुष स्वप्न में देखी गई स्त्री की प्राप्ति के लिए सपने के समय करोड़ रुपये भी देना चाहे, किन्तु जागने पर उस स्वप्न की सुन्दर स्त्री सत् नहीं है । इसी प्रकार ज्ञानी जिसने संसार को दृढ़ता से स्वप्न के समान समझा है, वह उसके लिए कैसी आसक्ति रखेगा ?
"पूर्ण ज्ञानी सागर के समान है, जो वर्षों के पानी तथा नदियों के पानी को अपने में मिला लेता है । कुछ ज्ञानी संसार को असत् समझते हैं । दोनों भावनाएं विषयों से बचने का उपाय है । कोई भी भावना धारण करके वासनाओं को मारना चाहिए । मन के मरने से ही ज्ञान होगा और सच्चा सुख प्राप्त होगा ।"
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अध्याय 12
14 सितम्बर 1958 को स्वामी बोधराज मन्दिर अजमेर में किया गया प्रवचन
सुन्दर, चन्द्र और नारायण बनें:- सुनना है समझने के लिए और समझना है आचरण के लिए . हमें चाहिए कि सुन्दर बनें, चन्द्र और नारायण बनें । सुन्दर अच्छे गुणों से होंगे । चन्द्र देखो कैसा शीतल प्रकाश देता है । हम भी शीतल प्रकाश देंगे कर्तव्य पालन से । कर्तव्य पालन में कष्ट तो आएंगे ही किन्तु तुम क्या चाहते हो ? हमें पहले अपना लक्ष्य पहचानना चाहिए । यदि किसी से पूछा जाए कि तुम कहाँ जाते हो और वह कहे कि पता नहीं है । तो हमें हंसी आ जायेगी । अपना लक्ष्य क्या है समझें । हम क्या चाहते हैं, वह हमें समझना चाहिए ।
दौड़ किसके लिएः- तुम्हें चन्द्र (दीपचन्द्र बेलानी) ने बताया कि सभी सुख चाहते हैं । तुम यहाँ क्यों आए हो ? तुमने सोचा कि लीलाशाह आया है जाकर उनके वचन सुनेंगे । नदी दौड़ती जाती है । क्यों ? समुद्र से मिलन के लिए रात दिन वह दौड़ती रहती है । तुम भी आनन्द के लिए रात दिन दौड़ते रहते हो । तुम में से प्रत्येक की इच्छाएँ अपनी हैं परन्तु वे सब किसके लिए हैं ? किन्तु आनन्द चाहते हो तो पापों से दूर रहो । पाप तथा निर्बलता चली जाए तो दुःख नहीं रहेंगे ।
पाप क्या हैः- कुछ पूछते हैं कि पाप क्या है ? पाप एक भूल है । भूल न होवे तो दुःख न मिले । पाप भूल तथा निर्बलता है । बेटी कैसी भी सुन्दर हो तो भी मन में पाप आता है ? नहीं । मन को समझाओ, सोचो कि सुन्दरता क्या है ? यह सुन्दर खाल उसके भीतर क्या है । मांस, रोग, (पीप) और हड्डियाँ । दुनिया में गंदी चीज देखनी हो तो शरीर को देखो । शरीर सुन्दर नहीं है किन्तु बुद्धि । बुद्धि की महिमा निःसन्देह है । लेकिन शरीर तो गन्दा है । बीमारी और बुढ़ापे में शरीर को देखो । जिस चीज से यह शरीर बना है, उसे देखो । मन को किसी न किसी प्रकार वश में करना है । मन स्थिर (एकाग्र) न होगा और सुनते ही न होंगे तो समझोगे क्या ? मन को वश में कैसे करोगे, तुम्हारा लक्ष्य तुम्हें तब तक नहीं मिलता, जब तक तुमने मन को स्थिर नहीं किया है ।
अंध श्रद्धा छोड़ोः- माताएं विभिन्न आशाएं करती हैं । उसके लिए उन्हें चाहिए कि पापों से दूर रहें । स्वच्छन्दता छोड़ो । पाखण्डी साधुओं से दूर रहो । मैं गुरुओं का खण्डन नहीं करता । गुरु के सिवाय ज्ञान नहीं मिलेगा, परन्तु नारी जाति के लिए पति ही गुरु है । माताओं को निश्चय है कि गुरु के बिना गति नहीं । साधु उसका उल्टा लाभ लेते हैं । कहते हैं 'कान में कुरु, तू मेरी चेली, मैं तेरो गुरु; नाणे (धन) की थैली मेरे सामने रख, तू चाहे जी चाहे मर ।" माताओं में बहुत श्रद्धा है । भले रखें, परन्तु देश काल का विचार करें । नारायण (प्रो. नारायणदास भम्भाणी) ने तुम्हें बताया कि नारायण अन्तःकरण में है । जैसे फूलों में सुगन्ध, लकड़ियों में अग्नि, तिलों में तेल है; वैसे हृदय में ही भगवान है । हृदय में जो भगवान है, उसे ही गुरु बनाना चाहिए ।
माता सीता की महिमाः- माता सीता नरक में गई अथवा स्वर्ग में ? उसने कितने गुरु किये थे । उसने क्या किया ? केवल पति का साथ दिया । वाह, भारत में क्या परन्तु संसार में उसकी कीर्ति गाई जा रही है । 'जय सीताराम' गा रहे हैं । पहले सीता उसके पश्चात राम । पहले लक्ष्मी बाद में नारायण । मनुस्मृति पढ़कर देखो, उसमें लिखा है कि 'नारी जाप, तप करने से ऐसी शुद्ध नहीं होती, जैसी पतिवृता होने से । सीता ने महल त्याग दिये, घासफूस की झोंपड़ियों में रही । कन्दमूल खाए । 14 वर्ष तपस्या की तो उसकी प्रशंसा की जा रही है और स्वर्ग में गई ।
बच्चों का सुधारः- 'चेतना मुखी सदा सुखी ।' ज्ञान कैसे होता है ? माता से । शास्त्रों में कहा गया है कि 'मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः, आचार्य देवो भवः ।' माता के पश्चात है पिता और उसके पश्चात है गुरु । बच्चे सुधरे तो मानो संसार सुधर गया । यदि नेता ध्यान दें तो बच्चों का सुधार हो जाये । वे अस्पतालों और जमीनों पर ध्यान दे रहे हैं परन्तु बच्चों पर ध्यान नहीं देते ।
स्वास्थ्य और भोजनः- सुख के लिए स्वास्थ्य आवश्यक है । तन स्वस्थ तो मन स्वस्थ । शरीर की उन्नति व्यायाम, भोजन आदि से होती है । भोजन कैसे करें, उसका विचार रखना है । खाना खाने का ढंग आ जाये तो भारत में भोजन पांचवाँ भाग बच जाए । भोजन में बड़ी शक्ति है परन्तु हम खाने पर बैठेंगे तो भी बोलते रहते हैं । भोजन ऐसे नहीं किया जाता । खाना बिल्कुल चबाकर खाना चाहिए । शेर गुण ग्रहण करो । न खाने योग्य चीज वह सात दिन की भूख होने पर भी नहीं खाता । आधा तोला से अधिक दूध मुँह में नहीं डालना चाहिए । घूंट-घूंट करके पियेंगे तो एक पाव ढाई पाव जितनी शक्ति देगा । गीता विश्व ग्रन्थ है । वह सब सूत्र रूप में बताता है । खाने के लिए भी बताता है कि योग्य खाना खाना चाहिए । राम की जय कहोगे तो तुम्हारी जय होगी । जय अर्थात् मंगल । खाना नियम पर और चुपचाप खाओ । शरीर से इतना काम लेते हो, उसे खाना देने के लिए घंटा आधा घंटा लिया तो क्या है । शराब, मांस आदि से दूर रहो । वैद्य डॉक्टर, हकीम जैसे बढ़ते जाते हैं, वैसे बीमारियाँ भी बढ़ती जाती हैं । मैं चाहता हूँ कि बीमारियों को भगाने के लिए चबा कर खाओ । व्यायाम व प्राणायाम भी स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है । जिसका मन और बुद्धि वश में है, वही हीरे (वीर्य) को बचा सकेगा । ग्रास को दाँतों जितना अर्थात् 32 बार चबाना चाहिए । ग्रास चबाकर पिया करो । मिर्च मसाले भले खाओ किन्तु थोड़े । भोजन पर जोर क्यों देता हूँ, क्योंकि भोजन से ही शरीर चलता है । 'तुझे क्या गैर से मतलब, तू अपनी तोड़ निभाता जा ।' मैं तो डॉक्टरों और हकीमों को विनती करुँ कि लोगों को बताएँ कि खाना चबाकर खाएं । चार ग्रास की अभी भूख हो तो खाना छोड़ दो ।
गोपीचन्द को उसकी माँ ने कहा था कि चका चक माल खाना । गोपीचन्द की शंका पर उसने जो उत्तर दिया था, उसका तात्पर्य था कि भूख लगने पर खाना । खाने का अधिकार उसको है, जिसको भूख हो । दूसरी बात उसे कही 'पलंगों पर सोना' पुत्र गोपीचन्द के शंका करने पर उसकी माता ने उत्तर दिया कि तुझे बहुत नींद आवे, तब सोना फिर पत्थरों पर भी आराम से सो सकेगा । चबा कर खाने से कब्ज दूर होता है, दाँत दृढ़ होते हैं और भूख बढ़ती है ।
भगवान कहाँ:- सत्संग में जाओ परन्तु वह हो सच्चा सत्संग । स्कूल भगवान का दरबार है । स्कूलों के द्वारा लोग बड़े पदों पर पहुँचते हैं । विद्यार्थियों को अध्यापकों का सम्मान करना चाहिए । मन और तन स्वस्थ हो, निश्चय बुद्धि हो तो फिर माताएं ठगी न जा सकेंगी ।
भगवान तुम्हारे अन्दर है, उसे अपना गुरु बनाओ । प्राणायाम करते रहो । प्राण महाशक्ति है । आयाम अर्थात् उसे वश में रखना । माताओं का चाहिए सीता के समान पति का साथ दें ।
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अध्याय 13
13 अक्तूबर 1958 पर जेतपुर में किया गया प्रवचन
पहले योग साधनों का वर्णन किया गया है । समाधि के लिए आसन साधने की आवश्यकता है । उनमें दो मुख्य रूप हैं – 1. पद्मासन 2. सिद्धासन । इनमें से सिद्धासन सरल है । पैर की एड़ी गुदा और जननेन्द्रिय के बीच में रखकर दूसरे पैर की एड़ी पहले पैर के ऊपर रखकर बिल्कुल सीधा होकर बैठना चाहिए और कहीं भी देखना न चाहिए । एक आत्मा का विचार रखकर अन्य सभी विचार छोड़ देने चाहिए । उस समय भगवान का स्मरण करना चाहिए और आत्म-चिन्तन करना चाहिए । यह अभ्यास साढ़े तीन घण्टे होने से आसन सिद्ध होगा ।
प्राणायाम निम्न प्रकार से करना चाहिएः- पहले पूरक करना चाहिए अर्थात् लम्बी सांस भीतर ले जानी चाहिए, और वहाँ कुछ समय के लिए रोकना चाहिए । फिर धीरे-धीर बाहर निकालना चाहिए, उसे रेचक कहा जाता है । फिर बाहर निकालकर रोकना चाहिए, भीतर के रोकने को आन्तरिक कुम्भक और बाहर रोकने को बाह्य कुम्भक कहते हैं । यह अभ्यास बार-बार करना चाहिए । इससे मन और इन्द्रियाँ वश में होती हैं । प्राण, मन, इन्द्रियों और वीर्य का एक दूसरे से सम्बन्ध है ।
नियम के साथ अभ्यास करते हुए, ॐ का जाप और ब्रह्म का चिन्तन करते हुए धीरे-धीरे समाधि को प्राप्त किया जाता है ।
यदि मन वश में नहीं हुआ तो पाँच विषयों में फंसे रहेंगे और ब्रह्म प्राप्ति का अखण्ड आनन्द प्राप्त न कर सकेंगे । जब विषयों में फंसे रहेंगे, तब बोध कहां से होगा ? जब विषयों से छूटोगे, तभी आत्मा का सुख मिलेगा ।
जिस मनुष्य के पिछले जन्म के निष्काम कर्म किये हुए हैं, उसका इस जन्म में आत्मा से प्रेम होता है और वह दुनिया के पदार्थों को तुच्छ समझता है । ऐसे वैराग्य से ही हृदय शुद्ध होता है । शुद्ध हृदय से मन वश में होता है और चित्त को शांति प्राप्त होती है । जैसे बारूद पहले विद्यमान होगा तो उसको दियासिलाई लगाने की आवश्यकता होती है । वैसे वैराग्यवान शुद्ध चित्त वाला है, उसको सत्गुरु अपने उपदेश से जगाता है ।
आत्मज्ञान के लिए रामकृपा, सत्गुरु दया और साधु संग की आवश्यकता होती है । वे मिलें तो बस बेड़ा ही पार । उपासना एवं निष्काम कर्म से अन्तःकरण शुद्ध होता है और रामकृपा होती है । सत्गुरु दया यह है कि जो उपदेश वह करे, उस पर आचरण किया जाय । वह रास्ता बतायेगा, परन्तु चलना हमें होगा ।
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अध्याय 14
14 अक्तूबर 1953 को जेतपुर में किया गया प्रवचन
मनुष्य जन्म दुर्लभ है, बार-बार नहीं मिलेगा । 'अब के बिछड़े कब मिलेंगे, जाय पड़ेंगे दूर ।' बड़े में बड़ा दुःख है जन्म मृत्यु का और बड़े में बड़ा सुख है मुक्ति का । अतः ऐ प्यारे, आज ही शुद्ध संकल्प करो कि इस जन्म में ही हम मोक्ष को प्राप्त करेंगे ।
विचार वाणी और व्यवहार में सच्चे रहने से मन पवित्र होगा । बुरे कर्म करने वाला कभी न चाहेगा कि दुःख मिले और मेरी निन्दा हो । दैवी सम्पदा धारण करने से मुक्ति मिलेगी और जन्म मृत्यु का चक्र छूटेगा । इन दैवी सम्पदा के गुणों का 'श्रीमद् भगवद् गीता' के सोलहवें अध्याय के तीन श्लोकों में वर्णन हुआ है ।
मनुष्य शरीर, जाति, वर्ण, आश्रम, धर्म आदि से, अपनी एकता करके, उनका अभिमान करने लगता है, उन्हें अपना जानता है । उनके अनुसार स्वयं को कितने ही बन्धनों में बांध कर राग द्वेष करने लगता है । तब उसका मन अशुद्ध रहता है । अतः साधक को यही विश्वास एवं निश्चय धारण करना चाहिए कि मैं शरीर नहीं हूँ । मुझे मनुष्य शरीर भगवान की कृपा से साधन के लिए मिला है । यह निश्चय करके शरीर में सुख की भावना न रखनी चाहिए । उसे अपना न मानना चाहिए । जो प्राप्त हो, उसका शुद्ध उपयोग करना चाहिए । प्राप्त हुए का शुद्ध उपयोग और जो न प्राप्त हो, उसकी इच्छा न करने से राग की निवृत्ति होगी । राग की निवृत्ति होने से द्वेष स्वयमेव निकल जायेगा और राग द्वेष के दूर होने से निर्वासना आयेगी तब कोई इच्छा उत्पन्न न होगी । प्रत्येक प्रकार की इच्छा दूर होने से चित्त शुद्ध रहेगा । चित्त के शुद्ध रहने से प्रेम-योग व बोध स्वयमेव उत्पन्न होंगे ।
वर्तमान परिवर्तन शील जीवन में मनुष्य को सत्ता एवं प्रभुता की प्रीति हो गई है । इसका मूल कारण है अपने में अपूर्णता अनुभव करना । अभेद भाव और भेद भाव का आपस में सम्बन्ध है, दूसरा कुछ नहीं है । यदि शरीर और बुद्धि आदि हटायी जायें तो सम्भवतः ऐसा न हो । तब जड़ भावना चेतन भावना में बदल जायेगी ।
मैं शरीर हूँ, इस भावना के मिट जाने से देह धर्म की आसक्ति हट जायेगी । उस के हटने से शरीर और उससे सम्बन्ध रखने वाले पदार्थों और बातों से सत्ता की किंचित् मात्र भी गंध न रहेगी । तब राग वैराग्य में और भोग योग में परिवर्तित हो जायेंगे ।
जिसके साथ और जहाँ स्वरूप की एकता होती है अर्थात् जिनको अपना जाना जाता है, उसका मोह और उसके साथ प्रेम स्वयमेव हो जाता है । प्राणों की जो वास्तविक आवश्यकता है, जिसकी पूर्णता अत्यंत आवश्यक व स्वाभाविक है, उससे निराश होने प्रमाद के अतिरिक्त और कुछ नहीं, क्योंकि स्वाभाविक आवश्यकता की पूर्ति और अस्वाभाविक इच्छाओं की निवृत्ति करना ही सच्चा पुरुषार्थ है ।
पहले बताया गया कि प्राणी जिससे अपना आप मिलाता है, उसे उसकी सिद्धि प्रतीत होने लगती है । अतः साधक को विचार करना चाहिए कि मैं, जो स्वयं को मनुष्य मानता हूँ, वह पक्षियों, पशुओं आदि प्राणियों से अधिक कौन सी विशेषता रखता है ? आहार, निद्रा, मैथुन, विषय भोग आदि भोगने का सुख और उनके वियोग और मृत्यु पर दुःख तो अन्य जीवों एवं मनुष्य में समान हैं, अपितु पशुओं आदि का जीवन मनुष्य की तुलना में अधिक नियमों वाला और प्रकृति के अनुसार है । विचार करने से विदित होगा कि मनुष्य में दूसरों की तुलना में विवेक शक्ति अधिक है । जिससे वह यह समझ सकता है कि मैं कौन हूँ और मुझे क्या करना चाहिए । किन्तु यदि मनुष्य इस विवेक शक्ति का आदर न करे और उसका शुद्ध उपयोग न करे, भोगों के सुखों में जीवन बिताता है तो पशुओं तथा पक्षियों और उसके मध्य में भेद कौन सा ? पशु पक्षी आदि जीव तो अपने कर्म का फल भोग करके, वह पूरा कर रहे हैं । परन्तु विवेक का आदर न करने वाला मनुष्य तो अपने उल्टे नये कर्मों से स्वयं को जकड़ता रहता है और अपने चित्त को अधिक अशुद्ध बनाता रहता है । अतः साधक को चाहिए कि अपने विवेक का आधार लेकर यह बात समझे कि यह मनुष्य शरीर उसे किस के लिए मिला और उसका उपयोग कैसे करना चाहिए।
विचार करने से ज्ञात होगा कि यह जीवन साधन धाम (साधन का स्थान) है । उसमें प्राणी अपना चित्त शुद्ध करके मोक्ष को प्राप्त कर सकता है । चित्त की शुद्धि के लिए देह का होना आवश्यक है । साधक ऐसा संकल्प न करें कि उसकी पूर्ति के लिए उसका अन्य किसी पर आधार है, जिसको यह स्वयं पूर्ण नहीं कर सकेगा । जो स्वयं पूर्ण नहीं कर सकता और दूसरों द्वारा प्राप्त की हुई वस्तु प्राप्त करने के लिए संकल्प करना है, तब उसके संकल्प कैसे भी शुद्ध क्यों न हों, तो भी उससे उसका चित्त शुद्ध न होगा । अपने संकल्पों का दूसरों के द्वारा पूर्ति करने वाला उसका ऋणी होता है और उसका चित्त अशुद्ध होता है, तब पराधीनता की वृद्धि होती है और पराधीन प्राणी कभी भी सुखी नहीं हो सकता ।
अतः दूसरों पर अपना अधिकार न मानना चाहिए, परन्तु अपने द्वारा किये गये योग्य संकल्पों को पूरा करना चाहिए अन्यथा राग की वृद्धि होती है और अन्तःकरण अशुद्ध होता है, जिसके कारण फिर संकल्पों की बाढ़ आती है । अतः साधक को प्रत्येक प्रवृत्ति के द्वारा दूसरों के अधिकार और संकल्पों की रक्षा और पूर्ति करनी चाहिए । अतः वह अभिमान नहीं आना चाहिए कि मैंने दूसरों का कोई उपकार किया है, ऐसा समझना चाहिए कि जो उन्हें दिया जाता है, वह उनके लिए ही प्राप्त हुआ है और उसमें मेरा कुछ नहीं है । जैसे कोई डाकिया डाकखाने से प्राप्त की हुई चीजें पार्सल आदि पते वाले स्थानों पर लोगों को पहुँचाता है, परन्तु इसलिए उस पर कोई अनुग्रह नहीं करता । हां, यह बात अनुभव करता है कि मैं अपने कर्तव्य का पूरा पालन करके सरकार की प्रसन्नता प्राप्त कर सकूंगा । इस प्रकार यदि हम भी व्यवहार करेंगे तो हम पर परमात्मा की कृपा और प्रसन्नता होगी ।
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अध्याय 15
31 जनवरी 1955 को आगरा में किया गया प्रवचन
एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया कि 'स्वामी जी ! ज्ञानी को संसार सपना कैसे प्रतीत होता है ? यदि सपने की नाईं है तो फिर व्यवहार किसका ? यदि जग है स्वप्न तो फिर ज्ञानी किसका ?
स्वामी जी ने मुस्कराकर उत्तर दिया - "बेटा ! ज्ञानी सदैव कमल के फूल की भांति निर्लेप रहते हैं । खरबूजा बाहर के फांके-फांके होता है, किन्तु भीतर से मिला हुआ है । इस प्रकार ज्ञानी दुनिया में रहते हैं, बाहर से उनका आकार भिन्न-भिन्न, किन्तु भीतर में एक रस । वे संसार में रहते हुए संसार के नहीं हैं । बाहर से कर्ता है, लेकिन भीतर से अकर्ता ।
दुःख सुख दोनों सम कर जानो, मान और अपमाना ।
हर्ष शोक ते रहे अतीता, तिन जगत न पहचाना ।।
एक विद्यार्थी सपने में देखता है कि अध्यापक मुझे पढ़ा रहा है और अन्य सौ विद्यार्थी भी विद्या ले रहे हैं, किन्तु जागने पर सब समाप्त था । वह अपने आप में स्थित है अन्य कुछ भी नहीं है । ज्ञानी भी इस प्रकार अपने आप में स्थिर रहता है, उसे स्वयं के अतिरिक्त अन्य कुछ भी भासता नहीं है । उन पर सांसारिक बातों का कोई भी प्रभाव नहीं होता है ।"
प्रसन्नता और अप्रसन्नताः- मन की प्रसन्नता और अप्रसन्नता का आधार अनुकूलता और प्रतिकूलता पर है । जब कोई चीज मन के अनुकूल है, तब मन का झुकाव उसकी ओर होता है और मन की एकाग्रता होती है और मन स्थिर होता है, जिससे उस विषय से कुछ समय के लिए सुख भासता है । अनुकूल वस्तु के प्राप्त होने से चित्त में जो लहरें उठती हैं, वे वास्तव में उस महान आनन्द रूप चेतन की छाया है । वह सच्चा आनन्द नहीं है ।
दुःख फिर क्यों प्राप्त होता है ? मन के विरुद्ध जब कोई बात होती है, तब उस प्रतिकूलता के कारण ही दुःख भासता है । जब किसी शत्रु को दूर से ही देखा जाता है तो मन में बेचैनी आकर निवास करती है और दुःख की लहर उत्पन्न होती है । यह मन की प्रतिकूलता (विरुद्ध होने) के कारण होता है । मन शत्रु को देखना नहीं चाहता, जिससे उसके उसे घृणा उत्पन्न होती है ।
द्वैत और सुखः- अज्ञानी सर्वदा अग्नि रहित जलते-पचते रहते हैं । ऐसा द्वैत के कारण है । अतः
दुइ दूर करो, कुछ और नहीं,
तुम शांत करो, कुछ शोर नहीं,
तुम साध बना, कोई चोर नहीं ।
ज्ञानः- आत्म ध्यान से भ्रान्ति भाव नष्ट होता है । आत्म ज्ञान होने से मन स्थिर होता है, अज्ञान का पर्दा हटता है, अपना साक्षात्कार होता है और जैसे बत्ती जलाने से वर्षों का अन्धेरा दूर होता है, वैसे ज्ञान होने से मन की मलिनता दूर होती है और हृदय में सच्चा प्रकाश होता है ।
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अध्याय 16
28 अक्तूबर 1958 को जेतपुर में किया गया प्रवचन
मूर्खताः- दस मूर्ख यात्रा पर चले । रास्ते में अपने को गिनने लगे कि कहीं कोई गायब न हो गया हो । एक व्यक्ति ने सबकी गिनती की, किन्तु स्वयं को नहीं गिना तो नौ हो गये । फिर दूसरे व्यक्ति ने गिनती की, परन्तु उसने भी स्वयं को नहीं गिना तो उसने भी नौ गिने । इस प्रकार दसओं व्यक्तियों ने ही गिनती की, किन्तु प्रत्येक स्वयं को न गिनकर नौ-नौ समझने लगा । अन्त में उन्होंने समझा कि एक व्यक्ति गुम हो गया है, अतः वे बहुत चिन्ता में पड़ गये । वहाँ से एक साधु गुजरा, उनकी मूर्खता जानकर, उन्हें गिनती करके दिखाया तो दस हुए । उसने उन्हें बताया कि "तुम दस हो, परन्तु अपने को न गिनकर नौ बनते हो ।"
इस प्रकार हम संसार में उन यात्रियों के समान हैं, जो स्वयं को भुला बैठे हैं । जब कोई महापुरुष मिलता है, तब वह हमें अनुभव कराता है कि हम यह शरीर, इन्द्रिय आदि नहीं हैं, किन्तु आत्मस्वरूप हैं ।
वैराग्य और अभ्यासः- मन को वश में करने के लिए वैराग्य और अभ्यास की आवश्यकता है । इनके अतिरिक्त चित्त शान्त नहीं होगा । दुनिया देखने मात्र बनती है, परन्तु वास्तव में एक सत् चित् आनन्द स्वरूप ही सर्वव्यापक है ।
आनन्द किसकाः- शरीर नाशवन्त है । संसार के सब पदार्थ भी मिथ्या ही हैं, केवल आत्मा ही सत्य और आनन्द-स्वरूप है । अन्य पदार्थों से जो आनन्द प्राप्त होता है, वह भी आत्मा का आभास ही है । आम खाते हो तो वह तुम्हें मीठा लगता है और समझते हो कि उसमें से आनन्द आता है । किन्तु वह आनन्द आम से तुम्हें नहीं मिलता, परन्तु आम खाते हुए उसमें मन स्थिर होता है, तब उसमें से आनन्द आता है, परन्तु वह क्षणभर है । जब जीव का मन बिल्कुल स्थिर होता है और आत्मा में लीन होता है, तब उसे सच्चा और दृढ़ आनन्द प्राप्त होता है । अन्य पदार्थों से प्रेम निकाल कर, एक सत् चित् आनन्दस्वरूप आत्मा में प्रेम रखो, उसका सदैव चिन्तन करते रहो तो अन्त में उस आनन्द में मगन रहोगे ।
पाप और पुण्यः- पाप का अर्थ है भूल और निर्बलता । पाप का परिणाम है दुःख और पुण्य का परिणाम है सुख । परमात्मा ने हमें कर्म करने में स्वतन्त्र रखा है, परन्तु कर्मों के फल भोगने में परतन्त्र हैं । उनका फल परमात्मा ने अपने वश में रखा है । भला करोगे तो भला होगा । जैसा-जैसा कर्म करोगे, परमात्मा वैसा-वैसा फल देगा ।
यज्ञः- यज्ञ अनेक हैं । अतिथि यज्ञ, देव यज्ञ, भूत यज्ञ, ब्रह्म यज्ञ, दान यज्ञ आदि । मेहमान की सेवा अतिथि यज्ञ है । सात्विक भोजन बनाकर, उसमें से कुछ अग्नि में डालना भी देव यज्ञ है । कुत्ते बिल्ली को खाना देना, पक्षियों को अन्न पानी देना, गाय को खिलाना पिलाना आदि भूत यज्ञ है । हमारे माता-पिता और अन्य बड़े जीवित हों अथवा मर गये हों, उनकी सेवा और उनके निमित्त कुछ करना पितृ यज्ञ है ।
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अध्याय 17
जून 1959 को आगरा में किया गया प्रवचन
मन्दिर, घर और स्कूल बिल्कुल पवित्र रखने चाहिए । इन तीनों की पवित्रता पर विशेष ध्यान देना चाहिए । यदि इन तीनों का सुधार हो गया तो बेड़ा ही पार ।
मन्दिर में किसके लिए जाना होता है ? भगवान के ध्यान के लिए । आज कल मन्दिरों का हाल देखो तो कैसा है ? चरस और गांजे का प्रचलन लगा पड़ा है । जिज्ञासुओं को भ्रमों और भ्रांतियों में बहकाया जा रहा है । आत्मिक विद्या का तो नाम भी नहीं ।
घर में देखो तो चारों ओर अशांति की आग लगी हुई है । घर में शांति न हो तो घर किस काम का हुआ ? पक्षी आदि भी अपने घोंसले में विश्राम पाने के लिए जाते हैं । जंगल के जानवर आदि भी अपनी गुफाओं में जाकर वास करते हैं । किसके लिए ? विश्राम के लिए । मनुष्य को भी घर में यदि विश्राम न मिला तो फिर वह घर तो नहीं कहा जायेगा । रामायण पढ़ने से हमें कौन सी शिक्षा मिलती है ? राम को मर्यादा थी । रामायण पढ़ने से हमें यह शिक्षा मिलती है कि गृहस्थ आश्रम में पत्नी को पति से किस प्रकार चलना चाहिए । पति के पत्नी के प्रति कौन से कर्तव्य हैं । भाई का भाई से कैसा प्रेम का नाता होना चाहिए । प्रत्येक प्राणी को अपना कर्तव्य किस प्रकार पालन करना चाहिए ?
बचपन से ही बालक एवं बालिकाओं के जीवन पर ध्यान देना चाहिए । यदि बचपन में सूक्ष्म दृष्टि से उनके रहन-सहन, खान-पान, बोल-चाल, शिष्टता और सदाचार पर ध्यान दिया जाये तो फिर बड़े होने पर सिर दर्द की आवश्यकता ही न हो । सम्बन्धी ऐसा नहीं समझते कि बालक भविष्य के पिता हैं । बालक खराब अर्थात् संस्कार खराब । बालकों को बचपन से ही सफाई पर ध्यान दिलाना चाहिए । उनमें बचपन से ही प्रातः उठने की आदत डालनी चाहिए । ब्रह्म मुहूर्त में उठने से आयु, बुद्धि और बल बढ़ता है । उन्हें बचपन से सिखाना चाहिए कि खाना चबाकर खाना चाहिए । कम से कम 32 बार प्रत्येक ग्रास को चबाकर खाना चाहिए । यदि खाना अपूर्ण चबाकर खाया जायेगा तो पाचन शक्ति खराब हो जायेगी । यदि पाचन शक्ति खराब हुई तो बीमार होना पड़ेगा । यदि बीमार होना पड़ा तो फिर पूरे घर में अशांति फैल जायेगी ।
घर में ही बच्चों को दैवी सम्पदा के गुण सिखाने चाहिए । माता-पिता को चाहिए कि घर में बच्चों के सामने कदापि बुरे वचन न बोलें । उनसे कभी विवाद की बातें न करें । उन्हें कभी डराना न चाहिए । माता यदि उन्हें बचपन से ही डरायेगी कि 'शांति करो, ताऊ आ रहा है । चुप रहो नहीं तो भूत उठाकर ले जायेगा । उन्हें चोर डाकुओं की बात बतायेगी तो फिर उनके बच्चे बड़े होकर निडर कैसे होंगे ? वे बड़े होकर अवश्य ही कायर और डरपोक हो जायेंगे । अतः उन्हें बचपन से ही प्रातः सायं प्रार्थना करना सिखाना चाहिए । उनके भोजन पर विशेष ध्यान देना चाहिए । उन्हें सात्विकी भोजन करना चाहिए । भूल चूक से भी उन्हें तामसी और रजोगुणी भोजन न खिलाना चाहिए । उन्हें लाल मिर्च, चटनी, कुल्फी, गोल गप्पा कभी खिलाने नहीं चाहिए । उन्हें समझाना चाहिए कि "संग तारता है और कुसंग डुबोता है ।" बालक इंजन के समान हैं । गुरु एवं रिश्तेदार एक प्रकार के ड्राईवर हैं । जैसे ड्राईवर बदलते रहते हैं, वैसे ही गुरु और रिश्तेदार भी हैं । स्कूल के समय अध्यापक और घर में रिश्तेदार बालक के ड्राईवर हैं । घर में रिश्तेदारों का बड़ा कर्तव्य है । उन्हें देखना है कि वह किसका संग करता है, क्या खाता है, क्या करता है, कब सोता है, कब उठता है । व्यर्थ ही तो समय नहीं गंवाता । इधर-उधर भटकता फिरता तो नहीं और वह प्रातः सायं व्यायाम करता है अथवा नहीं । उन्हें बालक के शारीरिक, मानसिक और आत्मिक उन्नति का भी ख्याल रखना है । यूरोप तथा अमेरिका में बड़े घरों में रिश्तेदार सदैव बच्चों को काम में तत्पर रखते हैं । रिश्तेदार जैसे लड़कियों के रहन-सहन पर ध्यान देते हैं, उसी प्रकार यदि लड़कों के रहन-सहन पर ध्यान दें तो उन्हें बच्चों के बड़े होने पर शिकायत करने का कोई कारण ही न रहे ।
स्कूलों में भी सदैव आदर्श अध्यापक होने चाहिए । अध्यापक का बालक के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है । अध्यापकों को चाहिए कि बचपन से ही बालकों में अच्छे विचार फूँके, जैसे एक खराब आम पूरे टोकरे को खराब कर देता है, वैसे क्लास में एक लड़का खराब हो गया तो संभव है कि वह सम्पूर्ण क्लास को खराब कर दे ।
अतः अध्यापकों को जासूस रखने चाहिए । उन्हें बालकों के जीवन पर पूरा-पूरा ध्यान देना चाहिए । उन्हें अच्छी-अच्छी नैतिक कहानियाँ सुनानी चाहिए । उनमें शूरवीरता के विचार उत्पन्न करने चाहिए ।
अतः उनके रहन सहन पर पूरा-पूरा ध्यान देना चाहिए । उनमें अच्छे-अच्छे संस्कार फूंकने चाहिए । खराब लड़के स्कूल की तबाही का कारण हैं । विद्यार्थी और गाली गलौच ! चुगली ! यह बात तो उनके सपने में भी नहीं होनी चाहिए । विद्यार्थी होकर चुगली लगायेगा, ईर्ष्या करेगा, वैर रखेगा, स्वार्थी बनेगा तो फिर बड़े होने पर उससे कैसी आशा रखी जा सकती है ?
अध्यापकों को चाहिए कि बच्चों को अच्छी-अच्छी पुस्तकें घरों में पढ़ने के लिए उपलब्ध करके दें, ताकि उन्हें व्यर्थ भटकने का अवसर न मिले । उन्हें सदाचारी बनने के लिए हर प्रकार का यत्न करना चाहिए ।
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अध्याय 18
6 जून 1962 में नैनीताल में किया गया प्रवचन
संतोष सुमति सादगी बख्श करो भगवान,
सबका बेड़ा पार हो, दीजिए भक्ति ज्ञान ।
लोग समझते हैं कि दुनिया के विषयों में वास्तव में सुख नहीं है । तब सुख कहाँ है ? जब गाढ़ निद्रा से उठा जाता है, तब आनन्द भासता रहता है । इससे सिद्ध होता है कि वास्तविक सुख अथवा आनन्द विषयों में नहीं, परन्तु गाड़ निद्रा में है । नींद से उठने पर कहते हो कि अत्यन्त आनन्द में सोया पड़ा था । आपका यह कहना दिखाता है कि गहरी नींद सुषुप्ति अवस्था में ही आनन्द है । इस अवस्था में आनन्द क्यों विदित होता है ? क्योंकि उस अवस्था में मन एकाग्र होता है और उसमें आत्मा की छाया पड़ती है, तब सुख मिलता है अथवा आनन्द का आभास होता है ।
तुम कहोगे कि स्वामी जी, ऐसा तो हैं, किन्तु हमें खोलकर समझाओ । अच्छा सुनो । बात तो बिल्कुल स्पष्ट है । जब हमें कोई अच्छी चीज मिलती है अथवा किसी रिश्तेदार से मिलते हैं, तब हमें आनन्द प्राप्त होता है । तब हम समझते हैं कि वह आनन्द उस वस्तु के प्राप्त होने अथवा रिश्तेदार के मिलने से प्राप्त होता है । वास्तव में आनन्द तो उन से नहीं मिलता । जब कोई स्वस्थ नहीं है, तब वह मनोहर चीज प्राप्त हो अथवा वे मित्र आकर मिलें, तो भी उनके कारण आनन्द नहीं प्राप्त होता । स्वस्थ व्यक्ति को मनोहर चीज अथवा रिश्तेदार के मिलने पर आनन्द इसलिए मिलता है, जो उस समय मन एकाग्र होता है, किन्तु स्वस्थ न होने की अवस्था में उनके मिलने पर भी आनन्द इसलिए नहीं मिलता, जो मन स्थिर अथवा एकाग्र नहीं होता और उसमें चंचलता रहती है ।
इसमें हमने देखा कि आनन्द मनोहर चीज अथवा मित्र में नहीं है । यदि उन में होता तो निरोगता अथवा बीमारी में वही आनन्द मिलता । स्मरण रखिये कि आनन्द तो भगवत् स्वरूप आत्मा में है । मन के एकाग्र होने से आत्मा की उसमें छाया पड़ती है और इसलिए आनन्द भासता है । जब मन चंचल रहता है, तब आनन्द नहीं मिलता ।
लाखों में से कोई एक है, जिसे सच्चे सुख अथवा आनन्द का ज्ञान है । हम सभी आनन्द चाहते हैं किन्तु हम समझते हैं कि इन्द्रियों व विषयों शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध में सच्चा सुख है । बराबर भूखे को भोजन मिलता है तो उसे उसमें से आनन्द है ? नहीं, उसे यदि अधिक खाना खिलाओगे तो उसकी पाचन क्रिया खराब होगी और अधिक दुःखी होगा । भोजन शरीर के लिए आवश्यक है, इसलिए भूख लगती है । उसे खाना दिया जाय तो शरीर को काम करने की शक्ति प्राप्त होती है, किन्तु अधिक खाने से पेट बिगड़ने से दुःख भोगने पड़ेंगे और जो काम शरीर और मन से लेना है, वह वे न कर सकेंगे ।
अतः शरीर को स्वस्थ व बलवान रखने के लिए खाना खाओ । बिल्कुल चबाकर खाओ, ताकि भोजन शीघ्र पथ्य हो जाय और पथ्य बिगड़े नहीं । मैं तो बता रहा था कि सच्चा सुख किसी भी विषय में नहीं है, वह आत्मा में है । परमात्मा को पहचानने से ही सच्चा सुख मिलेगा । अतः उस सच्चे स्वामी को रात दिन, काम करते हुए, घूमते-फिरते, उठते-बैठते याद करना चाहिए । केवल माला उठाकर, वह सबके समक्ष फेरना और लोगों को दिखाने से लाभ नहीं प्राप्त होना है ।
इसी प्रकार कर्तव्य पालन ही करना चाहिए, किन्तु हृदय में उस भगवान को स्मरण करना चाहिए । बाहरी दिखावे की आवश्यकता नहीं है । विषयों की आसक्ति को त्यागिये, बुरे विचारों एवं बुरे कर्मों से सदैव दूर रहो और सदैव भलाई और पुण्य के काम करो, अच्छे विचार संकल्प धारण करो । पुण्य और भलाई के कर्मों को करने से मन निर्मल होता है । ऐसा करने से दिल में परमात्मा का स्मरण आता है, उसके लिए प्रेम बढ़ता है और ऐसे ही आनन्द प्राप्त होता है ।
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अध्याय 19
9 मई 1959 को आगरे में किया गया प्रवचन
मन जीते जग जीतः- शास्त्रों में लिखा है कि बन्धन और मोक्ष का कारण मन है । विषयों में लिपटा हुआ मन बन्धन का कारण है । जो मन विषयों से छूटा हुआ और शुद्ध है, वह मोक्ष और मुक्ति का कारण है । अतः अहंकार त्याग करके नम्रता और प्रेम धारण करके, मन को जीतने का साधन सीखो ।
सत्संगः- मन को जीतने के लिए सत्संग आवश्यक है । सत्संग का शाब्दिक अर्थ है, वह संग, जिसके द्वारा सत् वस्तु की प्राप्ति हो । सत्संग की अपार महिमा शास्त्रों में कथन की गई है । गुरु अर्जुन देव ने फरमाया हैः-
मेरे माधव जी, सत्संग मिले सो तरिया,
गुरु प्रसाद परम पद पाया, सूखे काट हरइया ।
अर्थात् हे प्रियतम, सत्संग द्वारा ही इस दुनिया रूपी महासागर से तैर कर पार पहुँचा जाता है । सत्संग से सूखी लकड़ियों की भांति यह नीच मन हरा भरा होकर, परम आनन्द को प्राप्त करता है ।
होत संगत सर्व सुख, दुःख कुसंग की खान,
गंध्री अरु लोहार की बैठी देख दुकान ।
तुलसी रामायण बाल काण्ड में भी कहा है-
बिन सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिन सुलभ न सोई ।
इस जीव की उन्नति सत्संग से ही होती है । सत्संग से जीव का स्वभाव बदल जाता है । मानो जीव नया जन्म धारण करता है । कुसंग से जीव की हानि होती है । नीचों के संग से नीच हो जाना पड़ता है और उत्तम कोटि के महात्माओं के संग से श्रेष्ठ हो जाता है । जैसे चींटी गुलाब के फूल का संग करके, देवताओं और महात्माओं के सर पर बैठने योग्य बनती है, वैसे नीच आदमी भी महात्माओं के उत्तम संग प्राप्त करके, ब्रह्म स्वरूप को प्राप्त करता है ।
एक जवाहरी अत्यन्त धनवान था । उसे एक पुत्र था । जिस समय जवाहरी का अन्तकाल निकट आया, उस समय पुत्र को बुलाकर कहने लगा कि जो धर्म कर्म मैं नित्य करता हूँ, वह तुम करते रहना । तुम मेरा स्वरूप हो । एक नकली जवाहर पेटी में डालकर, वह पेटी पुत्र को दे दी और उसे कहा कि इस पेटी में एक अमूल्य जवाहर है । तुम्हें जब आवश्यकता पड़े, तब मेरे मित्र जयचन्द्र के पास पेटी दिखा कर, उसकी इच्छा अनुसार बेचना ।
एक वर्ष के पश्चात उसके बेटे को कुछ आवश्यकता पड़ी । वह पेटी लेकर जयचन्द्र के पास गया । उसे कहा कि पिता जी की आज्ञा अनुसार मैं पेटी लेकर आया हूँ । इसमें एक अमूल्य रत्न पड़ा है । आप मुझे अच्छे भाव में बेचकर दीजिये । जयचन्द्र ने पेटी खोलकर जवाहर जांच कर देखा फिर उसके समक्ष उसी प्रकार बन्द करके दे दी और कहा कि अभी कुछ पैसे व्यय के लिए दे देता हूँ । यह जवाहर जाकर रखो । जब कोई ग्राहक आयेगा, तब तुम्हें बताऊँगा । अभी तुम मेरी दुकान पर रहकर जवाहरों की परख करना सीखो । वह मान गया । वह लड़का धीरे-धीरे जवाहरों की परख करना सीख गया । एक दिन जयचन्द्र ने लड़के को कहा कि वह जवाहर वाली पेटी ले आओ । लड़का पेटी ले आया और जवाहर निकालकर हाथ में देखने लगा । कहने लगा कि "यह तो शीशे का टुकड़ा है ।" उसे देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ । कहा कि "महोदय, आपने उस समय ही मुझे क्यों नहीं बताया कि जवाहर नकली है ।" उसने उत्तर दिया कि "बच्चा ! तुझे उस समय विश्वास न होता कि वह कोई नकली जवाहर है । अब तो तुम स्वयं ही परख कर सकते हो । तुम कहते हो कि केवल शीशे का टुकड़ा है ।"
इस दृष्टांत का तात्पर्य यह है कि जैसे जवाहरी का बेटा झूठे शीशे को जवाहर मानकर स्वयं को धनवान समझ कर झूठी आशा रखकर बैठा था, उसी प्रकार जीव भी मिथ्या क्षणभंगुर शरीर, जो देखते-देखते नाश हो जाने वाला है, उसे भ्रांति के कारण सत्ता समझ बैठा है और सुख भोगने की झूठी इच्छा रखता है, परन्तु विचार करने से समझ पड़ेगी कि ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ भी सत् नहीं है । सब देखने मात्र है । उसकी सत्ता से रहित है । जैसे जवाहरी का बेटा समझने लगा । वैसे यह जीव भी ब्रह्मनिष्ठ गुरु के संग में ब्रह्मविद्या अद्वैत के अभ्यास करने से अमूल्य ब्रह्म रत्न की परीक्षा से ज्ञान को जानकर मोक्ष को प्राप्त करता है ।
कबीर जांको खोजते, पायो सोई ठौर,
सोई फिर के तू भया, जांको कहता और ।
आत्माः- आत्मा ज्ञान स्वरूप एक रस है । उसमें अनेकता है ही नहीं । रात्रि को लालटेन लेकर भीतर कमरे में कोई जाता है । कमरे में कोई नहीं है । फिर दो सत्संगी कमरे के भीतर जाते हैं, तो कहने में आता है, दो सत्संगी भीतर बैठे हैं । तीसरा आदमी भी वहाँ आता है कहा जाता है कि तीन सत्संगी कमरे के भीतर बैठे हैं । वह भिन्नता किसमें आई ? काला घोड़ा और सफेद घोड़ा कहते हो । भिन्नता किसमें है ? रंगों में । घोड़ों की जाति तो एक है । उनमें तो कोई परिवर्तन नहीं है । प्रकाश तो कमरे में तब भी था । जब उसमें कोई नहीं था । फिर दो तीन सत्संगी आये, तो भी वह था । प्रकाश में तो भिन्नता नहीं रही । प्रकाश को जब कोई विषय मिला तो उसे प्रकाशित किया । प्रकाश ने विषय को अपने प्रकाश से रोशन किया । ज्ञान पहले है, फिर जब कोई विषय सामने आता है, उसे वह ज्ञात करता है । उसे प्रकाश ने रोशन किया । ज्ञान में भेद बिल्कुल नहीं है । भेद है तो विषयों में । विषयों में भांति-भांति के रूप रस और गंध होते हैं । दुर्गन्ध, सुगंध, चित्र, सुन्दर चित्र, काला चित्र; वह भिन्न-भिन्न वस्तुओं का ज्ञान है । दो तीन सत्संगी बैठे हैं । उन दो तीन को हटाओ तो शेष क्या रहेगा ? प्रकाश ।
विषय को ज्ञान से अलग करो तो शेष क्या रहेगा ? एक स्वयं ज्योति स्वरूप, अपने आप में स्वयं में स्थित, जगमगाती ज्योति । विषय को जानने के लिए ज्ञान की आवश्यकता है । किन्तु ज्ञान को जानने के लिए किसी की भी आवश्यकता नहीं है ।
उदाहरण लोः- कमरे में पुस्तक रखी है, पुस्तक को जानने के लिए किसकी आवश्यकता है । 1. प्रकाश 2. आँख 3. मन की वृत्ति 4. चेतन । प्रकाश को जानने के लिए चाहिएः- 1. आँख 2. मन की वृत्ति और चेतन । आँख को जानने के लिए केवल दो आवश्यकताएं हैं- 1. मन की वृत्ति 2. चेतन.
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अध्याय 20
17 जुलाई 1962 को नैनीताल में किया गया प्रवचन
आत्मा स्वतः सिद्ध है । केवल महापुरुष एवं सद्गुरु ही उसका ज्ञान कराते हैं कि भाई, तुम तो स्वयं को शरीर समझ रहे हो, वह तुम नहीं हो । तुम आनन्द रूप परमात्मा हो और न जीव ।
जो आँखें रूपों को देखती हैं, वे जड़ हैं । शरीर न सुन्दर है न प्रेम रूप और न सत् ही है । यह शरीर रुधिर, रोग, मांस, मैल और मुर्दा है । इस जैसी गंदी वस्तु दूसरी कोई भी दुनिया में नहीं है । यह जो कुछ दीख रहा है, वह है ही नहीं, तो फिर मन जायेगा कहाँ । मन दौड़ता है विषय रूप गन्दे पदार्थों की ओर । वे विषय पदार्थ रूप हैं ही नहीं, ऐसा समझकर उनसे दूर रहना चाहे, इसे वैराग्य कहा जाता है । अभ्यास का अर्थ है बार-बार आत्मा का चिन्तन करना अर्थात् स्मरण करना, उसका ध्यान करना, उसका ज्ञान कथन करना । आनन्द में स्थिर होने से मन वश में आ जायेगा, बहुत अभ्यास करने से मन का बिल्कुल अभाव हो जायेगा ।
शरीर का जो प्रारब्ध होगा, वैसे इधर-उधर आता-जाता रहेगा और काम आदि करता रहेगा । यह शरीर न पहरे था, न पीछे रहेगा और न बीच में है । केवल सच्चिदानन्द है । ज्ञानियों सत्पुरुषों का यही निश्चय है कि तुम भी सदैव यही निश्चय रखो कि सच्चिदानन्द ही सच्चिदानन्द हूँ । सब कुछ मैं हूँ और न अन्य कुछ ।
मन इन्द्रियों और शरीर से काम काज करते हुए, लेन-देन करते हुए, खाते-पीते, चलते-फिरते, बोलते हुए अर्थात् सब कुछ काम काज करते हुए भी स्वयं को हर समय, हर पल में सच्चिदानन्द समझा जाय, फिर तो बेड़ा ही पार । पाँचों उंगलियाँ घी में । तुम्हारा कार्य सम्पूर्ण हुआ । दूसरा न पहले था और न पीछे रहेगा और न बीच में । केवल एक सच्चिदानन्द स्वरूप तुम पहले भी थे, अभी भी हो और बाद में भी रहोगे, यह कहना भी उचित नहीं । जब एक सच्चिदानन्द ही सच्चिदानन्द है तो फिर तुलना किससे की जाये ।
आत्मा को सच्चिदानन्द रूप कहा जाता है । ज्ञान स्वरूप आनन्द स्वरूप इसलिए कहा जाता है, ताकि दूसरे पदार्थों और संसार के ज्ञान को छोड़कर झुके और आनन्द स्वरूप भी इसलिए कहा जाता है कि आप सभी संसारी आनन्दों को छोड़कर स्वयं सच्चिदानन्द में स्थित हों । सत्य तो यह है कि सच्चिदानन्द शांत ही शांत है, दूसरा कुछ भी नहीं ।
ज्ञान और देखने में भेद है । ज्ञान की सहायता से ही नेत्र इस संसार के दृश्य को देखते हैं, नेत्र जड़ हैं, उनकी कोई सत्ता नहीं है, जो सत्ता है, वह मेरी जान है, फिर सच्चिदानन्द स्वरूप अब मैं सत्ता युक्त अथवा अस्ति, भाति और प्रिय व्यापक किसमें हो ? अस्ति, भाति, प्रिय तो पदार्थों और देश काल करके कहा गया है, अतः देश काल पदार्थ तो बने ही नहीं, तो फिर अस्ति, भाति प्रिय किसमें हो । जब अन्य कुछ हो, तब कहा जाय । किन्तु दूसरा कुछ भी नहीं, केवल एक सच्चिदानन्द ही सच्चिदानन्द मेरी जान है । सदैव अपने स्वयं सच्चिदानन्द के स्वरूप में स्थित रहना चाहिए, जो सर्वदा स्वयं में स्थित है ।
कैसे, मैंने तुम्हें जो आत्म चिन्तन की बातें बताई, वे समझी है थोड़ी बात, केवल बुद्धि में बैठ जाए । मुझे भी समझ में बैठ नहीं रही थी । फिर बहुत समय के पश्चात सन्तों के संग में सत् शास्त्रों के विचार से पता लग गया । अतः तुम भी प्यारे संतों का संग करते रहो और सत् शास्त्रों के विचार से पता लग गया । अतः तुम भी प्यारे सन्तों का संग करते रहो और सत् शास्त्रों को विचरते रहो । पच्चीकरण बार-बार अच्छी तरह पढ़कर, समझकर फिर योग वसिष्ठ पढ़ो, तत्पश्चात अधिक समझ में आएगा ।
जिज्ञासु को बार-बार निश्चय है कि मैं अवश्य मोक्ष को प्राप्त करुँगा । यही एक बार-बार इच्छा करनी चाहिए । ज्ञानी जो भी व्यवहार करता है, वह सब आभास मात्र । सब आभास रूप समझ कर रहा है, परन्तु उसे भीतर शांति है । बाहर से यद्यपि कुछ विक्षप्तता आदि दीखती है, किन्तु वह परम शांति में ही स्थित है । हर काल में वह एक रस रहता है ।
स्वयं को ऐसा समझना चाहिए कि मेरे हृदय में आनन्द की धाराएं बह रही हैं, उनमें लीन रहना चाहिए । जब यह मन बाह्य पदार्थों को सत्य समझता है, तब उनके पीछे दौड़ता है, परन्तु जब ये पदार्थ सत्य ही नहीं है अर्थात् है ही नहीं तो फिर इच्छा किसकी रहेगी ।
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अध्याय 21
3 सितम्बर 1931 को उपलेटा में किया गया प्रवचन
ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात भी सत्गुरु, सत्शास्त्रों एवं सत्संग की स्तुति महिमा करते रहना चाहिए, जीवन पर्यन्त करते रहना चाहिए । ऐसा समझकर उपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि सत्गुरु के यहाँ काम पूर्ण हुआ, जो जानने योग्य वस्तु थी, वह मैंने जान ली । आत्मा करके सभी एक हैं, किन्तु शरीर करके गुरु, शास्त्र एवं सत्संग की सेवा स्तुति करते रहना चाहिए और एक गुरु को ही सच्चा मित्र समझकर तन, मन तथा धन से जो भी शक्ति अनुसार सेवा पहुँचे, वह सदैव के लिए करते रहना चाहिए, क्योंकि गुरु की कृपा से जन्म-मृत्यु के चक्र से छूटकर पूर्ण आनन्द की सीमा पर चढ़कर पहुँचे हैं ।
अरे, तुम वही ज्योति हो, तुम स्वयं सच्चा आनन्द रूप हो । तुम यह जो देख रहे हो, वे सब बुदबुदे के सदृश हैं, जो वास्तव में है ही नहीं, जो बुदबुदा तुम में से निकलकर तुझे प्रतीत हो रहा है, वह वास्तव में सपने के समान झूठा है । जगत बना ही नहीं । तुम कहोगे कि स्वामी जी, वह तो हम देख रहे हैं । वैसे तो स्वप्न में भी तुम समस्त पदार्थों को देख रहे थे, किन्तु सब जागते हो तो कहते हो कि अरे, यह सब झूठे चित्र थे, जो स्वप्न में सच्चे समझ बैठे थे । जागने से पता पड़ गया कि ये समस्त कल्पित हैं । वास्तव में हैं ही नहीं, न थे और न होंगे । वैसे स्वयं को जानें । जब ज्ञान में जागते हैं, तब तत्काल पता पड़ जाता है कि मैं ही एक सत्य स्वरूप हूँ और समस्त तेरा ही विस्तार है, मैं ही केवल सच्चा आनन्द स्वरूप, शान्त, निर्विकार, शुद्ध, अखण्ड व्यापक, धैर्यवान, सब में और सबको आधार देने वाला अस्तित्व शक्ति दाता हूँ । मुझसे अतिरिक्त दूसरा कुछ बना ही नहीं । एक ही है, एक के सिवाय अन्य शून्य ही शून्य समझो । "जिसने पहचाना स्वयं को, उसने पहचाना प्रभु को ।" ये समस्त लीलाएं अपनी हैं, न ईश्वर, न भगवान, न बंदा, न खुदा । मनुष्य सभी साधन इसलिए करता है कि उसे अपने आत्मा का पूर्ण ज्ञान नहीं है । स्वयं को जानने से तत्काल पता पड़ता है कि इतना समय जो मैं दुःख कष्ट सहन कर रहा था और यत्न कर रहा था, वे सभी व्यर्थ थे । ध्यान, उपासना, योग, मन्त्र आदि सभी तब तक हैं, जब तक ज्ञान नहीं हुआ है । अन्य सभी यत्न छोड़कर आत्म ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, क्योंकि अन्तिम पड़ाव यही है । ऐसा न कहना चाहिए कि मैं दो तीन जन्म लेकर तत्पश्चात ज्ञान प्राप्त करूँगा । नहीं, नहीं, अरे, इसी जन्म में ही भाग्य से तुम्हें यह मनुष्य जन्म मिला है, क्या पता कि दूसरा जन्म कैसी गति वाला मिले । फिर क्या वहाँ ज्ञान प्राप्त करोगे ? नहीं, नहीं, अभी कमर कस करके, जैसे महान आवश्यक कार्य सब दैनिक करने वाले समझते हो, वैसे सबमें एक आत्म ज्ञान प्रथम नम्बर समझकर प्रतिदिन नियम से सत्य शास्त्रों का अभ्यास करते रहो ।
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अध्याय 22
4 सितम्बर 1961 को उपलेटा में किया गया प्रवचन
ज्ञान समाधि ही निर्विकल्प समाधि है । ज्ञान द्वारा उसमें स्थित एवं लीन रहना चाहिए, जो पूर्ण प्रत्येक में स्वयं ही स्वयं है । गीता में कृष्ण ने अर्जुन को थोड़ा ही ज्ञान दिया, जिससे उसके सभी शोक नष्ट हो गये । इससे ऊपर अन्य कोई उपाय नहीं है । शोक को नाश करने वाला और शांति देने वाला थोड़ा ज्ञान होने से संसार के समस्त भ्रम नष्ट हो जाते हैं और बुद्धि को तृप्ति मिलती है और सदैव तृप्त रहा जाता है । जैसे अंधकार में प्रकाश आता है तो अंधकार स्वयं ही ओझल हो जाता है । योग वसिष्ठ की स्वामी रामतीर्थ ने बहुत प्रशंसा की है और स्वामी विवेकानन्द ने लिखा है कि योग वसिष्ठ को ग्रहण करने से ज्ञान न हो तो मेरा सर काट लें । अतः तुम भी योग वसिष्ठ प्रतिदिन पढ़ते रहो । योग वसिष्ठ अत्यन्त उच्च कोटि की पुस्तक है; जिससे अति सरल प्रकार से ज्ञान प्राप्त होता है तथा गूढ़ तात्पर्य को जाना जा सकता है, पूर्ण तत्त्व को प्राप्त किया जाता है तथा अखण्ड शान्ति मिलती है । उसमें अमूल्य हीरे मोती की भांति वचन भरे हुए हैं । अतः यह पुस्तक योग वसिष्ठ सिंधी में मिले तो ठीक, नहीं तो हिन्दी में गोरखपुर वालों से मंगाकर पढ़ा करो ।
हिन्दी भाषा अत्यन्त आवश्यक है । अतः हिन्दी शीघ्र सीख लो । प्रतिदिन थोड़े अभ्यास से शीघ्र सीख जाओगे, यह बहुत सरल है ।
समस्त कार्य निष्काम करने से हृदय शुद्ध होता है । उसके पश्चात ज्ञान प्राप्त होता है । भले ही सभी काम व्यवसाय आदि और सेवा करते रहो, किन्तु सपने की तरह समझ कर । मोह ममता रहित समस्त कार्य करते रहने चाहिए । गुरु से, माता-पिता जी आदि से सबसे मधुर प्रकार से बोलना चाहिए, साहस से काम लेते रहना चाहिए । आगे-आगे बढ़ते रहना तब अवश्य ही लक्ष्य को प्राप्त करोगे । जैसा जिसका निश्चय होगा, उसे वैसा ही फल भी प्राप्त होगा ।
जगत असत् और आत्मा सत् है । आत्मा को जानना ही कमाल है । उसको आचरण में लाकर मन को सम्पूर्ण रूप से आत्मा में शान्त करना चाहिए । आत्मा को जानने से शेष कोई वस्तु नहीं रहती, जिसकी इच्छा करें । उसकी सब इच्छाएं वैराग्य, शम, दम आदि जो आरम्भिक साधन हैं, जो वेदांत में स्थिति करने वाले हैं, उनसे भस्म हो जाती हैं, शेष एक सच्चा आनन्द स्वयं ही रहता है, वह सब में उसे देखता है । गुरु के वचनों पर विश्वास रख कर दृढ़ निश्चय करोगे तो तुम्हारी निश्चय जय होनी है ।
संसार मेला है, स्वप्न है, सपना है, तुम ही एक सत्य हो । जो कुछ हम देख रहे हैं, वह सभी सपने में । जाग्रत आदि तीनों अवस्थाएं स्वप्न के सदृश हैं । वेदांत की दार्शनिकता सबसे उच्च है, उसका किसी से सम्बन्ध नहीं है । न ऋद्धियों से न सिद्धियों से, न हठ योग, न राज योग, न मन्त्र योग से न ब्रह्मा बनने से, न विष्णु, न राजा, न रंक होने की इच्छा से । यह सर्वोत्तम सिद्धान्त है नित्य आत्मा का ।
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अध्याय 23
5 सितम्बर 1961 को उपलेटा में किया गया प्रवचन
शास्त्रों में कई प्रकार के वचन हैं । रोचक, भयानक, यथार्थ । अनेक शास्त्र रचित हैं । उनमें रोचक और भयानक वचनों का त्याग करके शेष यथार्थ वचन, जो आत्मा को ज्ञात करावें, उन्हें ग्रहण करना चाहिए, जो एकत्व वाले हों । न भगवान, न बंदा, एक ही एक । वे शास्त्रों के वचन सभी ईश्वर का ज्ञान देने वाले हैं । परन्तु उनका सार स्वयं पहचान कर प्रतीत किया जाय । वे वचन यथार्थ हैं और न अन्य कुछ । भगवान को समझा जाय, स्वयं अपने को समझा जाय । वह भगवान ब्रह्म परमात्मा, जिसे दूसरा समझ रहे थे, वह स्वयं तुम हो, एक ही एक । तुम्हारे सिवाय अन्य कुछ भी नहीं है । दूसरा शून्य ही शून्य है ।
संतोष- संतोषी ही सुखी है । भले ही कोई करोड़पति क्यों न हो, किन्तु उसे सन्तोष नहीं है तो शून्य है । संतोषी ही सबसे धनवान है, उसे ही शान्ति प्राप्त होती है । नियमित जीवन बनाना चाहिए । भोजन, विश्राम, व्यायाम, भ्रमण, ज्ञान, ध्यान आदि सबका समय निश्चित कर देना चाहिए । इस नियम के अनुसार चलते रहना चाहिए, इससे स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक रहेगा । शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक उन्नति भी होगी और यदि ठीक नियमानुसार न चलोगे तो बीमार हो जाओगे और तुम्हारी यथोचित उन्नति न होगी ।
भेद से कुछ न होगा- मूल आत्मा में भीतर का निश्चय चाहिए, बाह्य ढोंग नहीं चलेगा, सच्ची लगन चाहिए, हृदय में, बाह्य भेष से कुछ न बनेगा । दाढ़ी रखना अथवा वस्त्र साधुओं जैसे पहनने से अथवा गेरुए पहनने से अथवा मालाएं पहनने से कुछ नहीं होगा । भले बाहर से कैसी भी स्थिति में हो, किन्तु हार्दिक निश्चय सच्चा और दृढ़ आचरण वाला होना चाहिए, तब बेड़ा पार होगा । आत्म ज्ञान में ही वासनाएं नष्ट होंगी और न योग से, न कर्म से । इनसे तो अधिक वासनाएं बढ़ती जायेंगी । आत्म ज्ञान से पूर्ण शांति एवं मोक्ष मिलता है ।
नियन्त्रण- मन और इन्द्रियों को काबू में रखने से मोक्ष प्राप्त होता है । मन किसी और जाय और इन्द्रियां भोग की इच्छा करें तो मन को रोकना चाहिए और इन्द्रियों को चंचल होने न दिया जाय । पांच विकारों 1. कामना 2 क्रोध 3 मोह 4. अहंकार और 5 लोभ से बचते रहना चाहिए ।
आकाश क्या है- आकाश जो ऊपर देख रहे हो उसका कोई रंग रूप नहीं है । केवल दूर से जितनी अपनी आँखों की दृष्टि जाकर ठहरती है, वहाँ नीलापन दिखाई देता है । वास्तव में आकाश का कोई रंग रूप नहीं है । आकाश अर्थात् पोला स्थान देने वाला है, जिसे खाली भी कहा जाय । आकाश का भी आकाश मैं हूँ, एक ही एक, शान्त स्वरूप मेरा कोई रंग रूप नहीं है । जैसे आकाश का रंग रूप नहीं है, वैसे मैं आकाश का रूप हूँ । ये सभी मेरी किरणें हैं, जो मुझ आकाश से भिन्न नहीं हैं । सब कुछ वही व्याप्त है । मैं, ही सब में हूँ और तुरिया स्वरूप शान्त, शून्य, जिसका न रंग, न रूप, न जन्म, न मृत्यु, न आना, न जाना । यह शरीर तीनों कालों में जाना ही नहीं । मैं सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म आत्मा एक ही हूँ । अखण्ड शान्त आनन्द ही आनन्द हूँ । आँखों में वैराग्य, हृदय में ज्ञान, मुख में स्मरण होना चाहिए । लोभ, क्रोध तथा कामनाएं तीनों त्यागने चाहिए ।
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अध्याय 24
10 जून 1964 को आबू पहाड़ पर किया गया प्रवचन
"सो प्रभु दूर नहीं, सो प्रभु तू है ।"
जहाँ-जहाँ मन जाता है, उससे पहले ही वहाँ उस मन को जानने वाली ज्ञान शक्ति पहुँच जाती है । वह ज्ञान सर्व व्यापक है ।
चित्त को अनेक वृत्तियाँ फैलाती हैं । जितने संसार के शब्द पदार्थ हैं, वे सब चित्त की वृत्तियाँ हैं । मैं शुद्ध चेतन एक ही अनन्त रूप होकर देखने आ रहा हूँ । सभी मुझ एक चेतन के कण हैं । यथा सूर्य और उसकी असंख्य किरणें, जैसे जल और उसकी अनेक लहरें । मैं सभी पदार्थों में, शब्द आदि अनेक वृत्तियों में एक ही चेतन स्वरूप परमात्मा हूँ । जैसे एक तागे में अनेक मनके, सभी मनकों में एक ही तागा व्यापक, सभी मनकों को सत्ता देने वाला आधार है । वैसे सभी जड़ पदार्थों और अन्तःकरण की वृत्तियों में एक ही चेतन परमात्मा व्यापक है ।
आँखें बन्द करने से भी चित्त की वृत्तियाँ भीतर फिर रही हैं । उन उठने वाली वृत्तियों की रोक कर चेतन परमात्मा में लीन करके, बार-बार सच्चिदानन्द स्वरूप परमात्मा के ध्यान एवं चिन्तन में लीन करके सत् चित् आनन्द स्वरूप आत्मा के अतिरिक्त अन्य कोई भी वृत्ति उठने न दी जाये । चेतन परमात्मा में स्थित रहना चाहिए । फिर जहाँ वृत्ति जाय, वहाँ-वहाँ सदैव स्वयं को ही सब में चेतन-परमात्मा ही परमात्मा देखा जाय । निराकार शब्द चेतन ही जगत है । चित्त का शांत रहना ही ब्रह्म है ।
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अध्याय 25
24 अप्रैल 1966 को बैरागढ़ में सन्त हृदाराम की कुटिया में किया गया प्रवचन
स्वर्ग की प्राप्ति कैसे होगी ? सुनते हो न ? स्वर्ग भोगों के भोगने से नहीं मिलेगा । हमें भोग भोगने के लिए मनुष्य योनि नहीं मिली है । किन्तु कुछ करने तथा होने के लिए । यह योनि देवताओं से भी उत्तम है, क्योंकि इस योनि में हम कर्म कर सकते हैं, किन्तु कौनसा कर्म किया जाय ?
भलाई के कार्य करो, मन शुद्ध रखो, ईश्वर भक्ति करो । हर समय पर मन सावधान रखो, बुरे संकल्पों से मुक्ति प्राप्त करो तो यहीं ही स्वर्ग बन जाय । लेकिन जिसे नरक चाहिए, वह बुरे कर्म करे । कैसे हां न !
सिनेमा- सिनेमा ने तो सत्यानाश कर दिया है । देखो कि इस सिनेमा से कितने घर बरबाद हो गये हैं । कैसे न बुरे चित्र एवं वासनाओं से भरे गाने चित्त को खराब करते हैं ! मन खराब तो शरीर खराब । बीमारियाँ आकर घेरती हैं । पैसे भी दो और बीमारियाँ भी लो । ऐसी सिनेमा से क्या लाभ ? आजकल केवल पैसे कमाने के लिए बुरे से बुरी फिल्म निर्माण करके, लोगों का खाना खराब किया जा रहा है ।
एक बार विनोबा को सिनेमा में ले गये । वहाँ बुरे चित्र दिखाने लगे तो विनोबा दरी बिछा कर सो गये । तुम भी ऐसी फिल्म न देखो । तुम कहोगे कि स्वामी जी, आप तो सिनेमा के विरुद्ध बोलते हो । अरे बाबा, मैं सिनेमा के विरुद्ध नहीं बोलता, परन्तु तुम खेल वालों को कहो कि यदि तुम अच्छे खेल मंगवाओगे तो हम खेल देखेंगे, नहीं तो सिनेमा घर का द्वार भी नहीं देखेंगे ।
आजकल के चित्रों ने तो युवकों का ब्रह्मचर्य ही नष्ट कर दिया है । ऐसे भी कुछ खेल होते रहते हैं, जो हमें हर प्रकार की हानि पहुँचाते हैं ।
पाखण्ड- देख नहीं रहे हो कि आजकल पाखण्ड कितना बढ़ रहा है । कहते हैं कि आओ तो तुम्हें भगवान दिखायें । अरे, भगवान दिखाने वाले द्वार-द्वार पर धक्के खाने जाते हैं क्या ? प्रत्येक के पीछे पड़ रहे है कि आओ तो तुम्हें भगवान दिखायें । पिता भी कहें एवं खाना भी खिलायें । तुम समझो तो यदि वे ऐसे होते तो फिर प्रत्येक के पीछे धक्के क्यों खा रहे हैं ? ये सभी वेतन पर खड़ी स्त्रियां व पुरुष हैं, जो अपनी लालच में आकर, दूसरों को पाप कर्मों की ओर घसीट कर ले जा रहे है । कहते हैं कि "हमारे भगवान के देखने के पश्चात जैसे चाहो, वैसे करो, कोई भी पाप नहीं लगेगा । अरे बाबा, ऐसे भी कहीं हुआ है कि पाप कर्म का पाप न लगे ? देखो न, जिस भी महात्मा अथवा और किसी ने बुरा काम किया है तो उसे बुरा फल अवश्य मिला है । बकरा कितना भी बलवान क्यों न हो, किन्तु स्वच्छन्द घूमेगा तो क्या होगा ? अवश्य ही उसे गीदड़ एवं भेड़िये खा जायेंगे । फिर ऐसी मुक्ति और भगवान देखने अथवा बनने से क्या लाभ ?
भगवान कोई खिलौना है क्या, जो दिलाते हैं ? किसी बालक से पूछो कि बुरे कर्मों का क्या फल मिलेगा तो कहेगा कि बुरा । और अच्छे कर्मों का कैसा फल मिलेगा तो कहेगा कि अच्छा । यदि बालक भी समझता है कि अच्छा काम किया जायेगा तो अच्छा होगा, तुम बड़े तो अच्छी तरह समझ सकते हो कि ये भगवान दिखाने वाले इतने कुकर्म करते हुए शान्ति किस प्रकार प्राप्त कर सकेंगे ? ऐसे बुरों के संग से बचो । भगवान देखने वाले तो 'पहुंचे' हुए होते हैं । कहना होगा कि जिन निरंकारियों ने भगवान देखा है, वे सभी पहुंचे हुए हो गये हैं क्या ?
अरे बाबा, साईं कंवरराम पहुंचा हुआ था न ? फिर किसी भी निरंकारी में साईं कंवरराम जैसे लक्षण (गुण) हैं ? फिर उन्होंने भगवान देखा है, अथवा देखकर घर को आ जाते हैं, फिर कहें कि भगवान देखा है । अरे साईं कंवरराम जैसे किसी में गुण हों तो लीलाशाह उनका दास बने । ऐसे सन्तों को मेरा बार-बार नमस्कार है । उनके पास तो केवल बकवास है, दूसरी कोई लगन नहीं है ।
आचार है नहीं, फिर चले हैं भगवान दिखाने । अगर ऐसे होते तो सब ओर से निन्दा होने की आवाजें क्यों आतीं ? बताओ कि कौन सा निरंकारी है, जो शान्त चित्त है ? बहुत बोलने वाले और कामिनी, कंचन के लिए तो बहुत ही स्वयं को मार कर हत्या कर रहे हैं ।
गीता- गीता जगत में प्रसिद्ध पुस्तक है । वह 500 बोलियों में छप चुकी है । इसकी तुलना अन्य कोई पुस्तक नहीं कर सकती है । गीता बताती है कि शरीर पाकर ऐसे पद को प्राप्त किया जा सकता है, जो कदापि मौत जन्म के चक्र में नहीं पड़ सकता । गीता कहती है कि "भोग न भोगें सदाचारी एवं सतो गुणी बनिये ।"
इस बीच एक ने कहा कि "स्वामी जी, आप तो हैं सन्त किन्तु हम गृहस्थी क्यों न भोग भोगें ?"
उत्तर दिया कि "बाबा, निःसंदेह भोगें, परन्तु ईश्वर आज्ञा के विरुद्ध थोड़ा भी सुख भोगेंगे तो पहाड़ जितना दुःख सहन करेंगे । जो नर-नारी अपने ऊपर संयम न रखेगा वह अवश्य दुःख भोगेगा ।"
खाओ, पीओ और जीवित रहो- वह तो आज कल के जवानों का नारा हो गया है । ऐ जवानों ! तुम क्या खा पी सकते हो ? तुम से अधिक तो पशु खा सकते हैं । है कोई जवान, जो दो सेर अन्न को एक ही समय खा सके ? कोई भी न खा सकेगा, किन्तु जो खाएगा, उसे सब कहेंगे पेटू है । उसकी निन्दा हो जायेगी । अरे, ऐसे खाना खाने से क्या लाभ ? जो निन्दा का टोकरा सिर पर उठाये ? फिर कहते हैं कि खाओ, पिओ और जीवित रहो । मनुष्य योनि में क्या खा सकते हो ? कभी हाथी की योनि मिलेगी, तो फिर दो सेर क्या, परन्तु दो मन खाया जाय तो कोई पेटू नहीं कहेगा परन्तु मनुष्य योनि में कुछ तो कर लें, जो प्रशंसा का मुकट पहनकर, मुस्कराते हुए, चलकर प्रियतम से मिलें ।
अध्याय 26
4 मार्च 1966 को अजमेर में किया गया प्रवचन
एक विद्यार्थी मेरे पास आया । कहा कि स्वामी जी, 'आप कह रहे थे कि भगवान हमसे जुदा नहीं है । जब हम से जुदा नहीं है तो फिर माँगे किससे ?" मैंने कहा, तुमने अच्छा प्रश्न किया है । मुझे प्रसन्नता हुई कि एक छात्र ने यह प्रश्न किया था । इस समय हमारे देश में रजोगुण बढ़ गया है, हमारे देश की दुर्गति हो रही है, विद्यार्थी तथा अन्य लोग गलत मार्ग पर जा रहे हैं, सम्बन्धी एवं अध्यापक भी धर्म से विमुख हैं । उस समय विद्यार्थियों में ऐसा प्रश्न उत्पन्न होना अच्छी बात है । मैंने उसे कहा कि यह बात तुम समझो और तुम्हारे मस्तिष्क में बैठे, इसके लिए आवश्यक है कि सत्संग करो, अच्छे कार्य करो और कर्तव्य पालन करो । हम क्या हैं, वह समझें । हम यह स्थूल और सूक्ष्म शरीर नहीं हैं । अगर स्वयं को भगवान का अंश समझते हैं, तब जीवन मुक्ति मांगते हो ।
जीवन-मुक्ति क्या है ? सदैव आनन्द में रहना । हमें यही याचना करनी चाहिए । बिड़ला अथवा टाटा जैसे धनवान सेठ के पास जायें और वह कहें कि मांग जो तुम्हें चाहिए, तो क्या उससे मुठ्ठी भर अन्न ही मांगना चाहिए ? यह तो तुच्छ याचना है । हमारे सेठों के सेठ भगवान हैं । क्या उनसे संसार के नाशवन्त पदार्थों की मांग करें ? हमें मांगना चाहिए तो जीवन-मुक्ति । अन्य किसी वस्तु की याचना क्यों करें ? अपना-अपना कर्तव्य पालन करके, स्वयं को पहचान कर जीवन मुक्त बनें ।
यह कोई साधारण बात नहीं है । हममें जीवन मुक्ति की प्राप्ति के लिए गुण होने चाहिए । राजा वह, जिसके पास प्रजा हो, कोष हो, सेना एवं कोष के अतिरिक्त शाह होना असंभव है । हम में भी विवेक वैराग्य षट् सम्पत्ति आदि गुण नहीं हैं तो जीवनमुक्त कैसे बनेंगे ?
गीता की महिमा- वेद संसार में पुरातन से पुरातन ग्रन्थ हैं । वेद अखण्ड असीम ज्ञान का भण्डार हैं, उसका ज्ञानकाण्ड है वेदान्त । गीता में ज्ञान का भण्डार है । वेदव्यास गंभीर, गुणवान ज्ञानी थे, उन्होंने ही उसकी रचना की । उससे अधिक कौन ज्ञानी हो सकता है ? उस गीता पर सहस्रों टीकाएं हो चुकी हैं । उस पर लोकमान्य तिलक महाराज ने भी एक गीता रहस्य नामक एक टीका लिखी है । ज्ञानेश्वरी गीता भी अतुलनीय है । गीता पर श्री स्वामी रामतीर्थ महाराज जी के प्रसिद्ध ग्रन्थ लेखक शिष्य नारायण स्वामी ने भी सुन्दर टीका लिखी है ।
उनकी भूमिका के आधार पर मैंने "उन्नति के लिए दुःख की आवश्यकता" लिखी है । अभी भी गीता पर टीकाएं लिख रहे हैं । पता नहीं कि अभी भी उस पर कितनी टीकाएं लिखी जायेंगी ।
हमारे देश के प्रसिद्ध कवि ठाकुर को अमरीका में एक पुस्तकालय में घुमाने के लिए ले गये । वहाँ उन्होंने कहा कि मुझे वह पुस्तक दिखाइये, जो सर्वोत्तम हो । उन्होंने एक पुस्तक निकाली, जो कई रुमालों में लपेटी हुई थी । वह थी "श्रीमद् भगवद् गीता ।" ठाकुर को बहुत प्रसन्नता हुई । जिस ग्रन्थ का संसार में सम्मान है, उसकी ओर थोड़ा भी ध्यान नहीं देते । वह ग्रन्थ भगवान के मुख की वाणी है, भारत का अमूल्य रत्न है । उसका तुम्हें जो सम्मान करना चाहिए, वह नहीं करते हो ।
लोगों को कहा जाता है कि गीता पढ़ो तो कहते हैं कि हमें भिखारी होना है क्या, जो गीता पढ़ें ? क्या अर्जुन भिखारी बनना चाहते थे, जो उसे गीता का ज्ञान बताया गया । क्या श्री कृष्ण भगवान ने उसे भिखारी बनाने के लिए गीता का ज्ञान दिया था ? वह तो शेर बनाने के लिए है, वह तो जीवन मुक्त बनाने वाली है ।
ईसाई देखो तो बाईबल का कितना सम्मान करते हैं, और उसके प्रचार के लिए कितना धन व्यय करते हैं ? उनके बालक भी बाईबल पढ़ते हैं । वही दशा मुसलमानों की है, कुरान उन्हें अवश्य ही पढ़ाया जाता है । परन्तु हम हिन्दू अपने अमूल्य रत्न गीता का आदर नहीं करते । गीता स्वयं पढ़ो और बच्चों को पढ़ाओ । उसका प्रचार करना अपना धर्म समझो ।
गीता के पन्द्रहवें अध्याय के पांचवें श्लोक में आया है कि मान एवं मोह रहित, आसक्ति रूप दोष से मुक्त, सदैव आत्मरूप में स्थित, कामना से दूर, सुख-दुःख आदि विरोधी जोड़ों से मुक्त ज्ञानी कहलाते हैं । जीवन-मुक्ति प्राप्त करने का यह साधन है । ऐसे स्वभाव धारण किये तो अधिक क्या चाहिए ?
विवेक वैराग्य से रहें- ज्ञानेश्वरी गीता पढ़ो । वैराग्य का सच्चा अर्थ समझो । तुम कहोगे कि "बाबा, पंडिताई की बातें न कीजिये ।" मैं सरल बातें बता रहा हूँ । संसार में हम विवेक वैराग्य से रहें । संसार के सब पदार्थ नित्य एवं सुखदायक नहीं हैं, उनके विषय सुख क्षण भंगुर हैं । संसार में रहो, परन्तु सब कुछ विचार से ग्रहण करो और भोगो । दुनिया की कोई भी वस्तु सुन्दर नहीं है, न आनन्द दायक है और न सत् है । शरीर को ही जांच कर देखो । बचपन, जवानी वृद्धावस्था, इस प्रकार अवस्थाएं बदल रही हैं । अन्त में मौत आ जाती है । क्या शरीर सुन्दर है ? नेत्रों और नाक से क्या निकलता है ? शरीर की खाल उतार कर देखो । रक्त और पीप, हड्डियों और मांस का पुतला है, भीतर मलमूत्र से भरा पड़ा है । हम जो खाते हैं, वह भीतर जाकर गंदा होता है और अन्त में मलमूत्र के रूप में बाहर निकलता है । जिस शरीर को सुन्दर समझते हो, वह वृद्धावस्था एवं बीमारी अवस्था में देखो । चेचक अथवा अन्य कोई रोग हो तो तत्पश्चात सुन्दर व्यक्ति को देखो । अविचार के कारण ही हम उसे सुन्दर समझते हैं ।
क्या शरीर आनन्द रूप है ? माता के गर्भ का दुःख, जन्म का दुःख, बचपन, बीमारियों का दुःख विचार करके देखो । दुःख ही दुःख है । शरीर सत् भी नहीं है, शरीर तो नाशवान वस्तु है । काल कन्धों पर खड़ा है ।
सुख के लिए सत्संग- सुख चाहते हो, जीवन मुक्ति चाहते हो तो सत्संग करो । कहते हो कि जब बड़े होंगे, तब सत्संग करेंगे । वृद्ध बनोगे तो तुम्हारी कैसी दशा होगी ? तुम्हारे अंग निर्बल हो जायेंगे, शरीर कांपता रहेगा । बैठने और चलने की शक्ति तुम में नहीं रहेगी । दांत गिर जायेंगे और खांसी आकर पकड़ेगी । किसी सन्त से पूछा गया कि दुःखों का स्थान बताइये । उत्तर दिया कि बुढ़ापा । बताओ कि बुढ़ापे में सत्संग क्या करोगे ? तुम में सत्संग की बातें समझने की शक्ति कहां रहेगी, पर्याप्त बुद्धि भी नहीं रहेगी ।
ज्ञान तो बचपन से मिलना चाहिए । माता मदालसा अपने बालकों को छोटी आयु में ही वह लोरी देती थी, जिससे वे राजा होने की परवाह न करके त्यागी हो जाते थे । वह कहती थी कि जो मेरी कोख से जन्म ले, वह फिर जन्म-मृत्यु के चक्र में न आये । हमें मनुष्य जन्म मिला है, इसके लिए चौरासी के चक्र से मुक्त हों । इसलिए प्रयत्न करें ।
सुख कहाँ- दो मित्र 4-5 वर्ष के पश्चात आपस में मिले । एक दूसरे से समाचार लेने लगे । एक कहने लगा कि मुझे बढ़िया घर था, दस बीघे भूमि थी, 10-12 बैल थे, पांच बच्चे हुए । वे सभी नाश हो गये, स्त्री व बच्चे सभी मर गये । भूमि, बैल भी समाप्त हो गये, शेष ये वस्त्र रह गये हैं ।
यह सुनकर उसका मित्र हंसने लगा । इस पर उसके मित्र को क्रोध आया । कहा कि अच्छे मित्र बने हो ! मेरी इस अवस्था पर तुम्हें शोक तो नहीं होता, अपितु ठहाके मार रहे हो ! तुझे तो मेरी दया पर दुःखी होना चाहिए था ।
मित्र ने कहा- हां, लेकिन मेरी बात भी सुनो । 65 बीघे जमीन थी और लगभग 30 मकान । मैंने विवाह किया तो इक्कीस बच्चे हुए । लगभग साठ बैल और गाय थीं । सिंध नेशनल बैंक में पांच हजार नकदी थी । वे सब नष्ट हो गये । मैंने उन्हें स्मरण किया तो उनकी तुलना में तुम्हारा दुःख कुछ नहीं था, अतः मैं हंसने लगा ।
विचार करके देखोगे तो शरीर और पदार्थ में कोई सुख नहीं है । शरीर दुःखालय है ।
एक सेठ संतों को भोजन कराता था । एक सन्त का उसे पता लगा तो उसे अपने पास ले आया, उसे अपने पास ठहराया । वह विचार करने लगा कि सन्त कहते हैं कि दुनिया में दुःख है, किन्तु यहां तो सेठ के पास सोने चांदी के बर्तन हैं और सुख के सभी साधन हैं । तब उसने भोजन करने के पश्चात सेठ से पूछा- "सेठ जी, तुम्हें कोई दुःख तो नहीं है ।" सेठ की आँखों से आँसू बहने लगे । सन्त की सान्त्वना देने पर उत्तर दिया कि यह सच है कि धन दौलत तो बहुत है, किन्तु मुझे सन्तान नहीं है, अतः दुःखी हूँ ।
दूसरों के दुःख देखोगे तो अपने भूल जाओगे । तुम्हें सुन्दर हाथ पैर, नेत्र आदि अवश्य मिले हैं परन्तु किन्हीं को हाथ नहीं है, किन्हीं को आँखें नहीं हैं, कुछ को पैर नहीं हैं । गीता के द्वितीय अध्याय के चौदहवें श्लोक में आया है कि सर्दी गर्मी, सुख-दुःख तथा विषयों की प्राप्ति सभी क्षणभंगुर हैं, नाशवान हैं ।
शरीर किसके लिए ? – जिसको शरीर मिला है, उसे कोई न कोई दुःख है, परन्तु मनुष्य शरीर किसके लिए मिला है, उस बात को समझो । यह बात बिल्कुल आवश्यक है । मनुष्य योनि गई तो पता नहीं कि फिर कौन सी योनि तुम्हें मिलेगी । अतः सन्त कहते हैं कि जीवन मुक्ति के लिए यत्न करो । तुम्हें भोगों से सुख नहीं मिलेगा । बुरे संग से दूर रहो, बुरे कर्म मत करो । शुद्ध विचार रखो । भगवान का भजन करो । स्मरण करो । चिन्तन करो । ध्यान करो । आत्मज्ञान प्राप्त करो तो मोक्ष को पाओगे ।
जो दीखता है, वह अस्ति, भाति, प्रिय नाम एवं रूप वाला है । नाम व रूप तो सर्वदा बदलते रहते हैं । दुनिया के सब पदार्थ नाशवान हैं, कोई भी वस्तु सत् नहीं है । वृहदारण्यक उपनिषद् में यह अच्छी प्रकार समझाया गया है ।
सत्य क्या है – सत्य तो उसे कहते हैं, जो तीनों कालों भूत, वर्तमान और भविष्यत में स्थित हो । वो पहले था, अभी है तथा बाद में भी हो । किसका भी शरीर पहले नहीं था, अभी है और बाद में नहीं रहेगा । प्रत्येक वस्तु रूप बदल रही है । यह शरीर जन्म लेने से पूर्व नहीं था, जन्म लेने के पश्चात बचपन, जवानी, बुढ़ापा और तत्पश्चात मृत्यु आती है । तब वह सत्य कैसे हुआ ? अविवेक के कारण ही हम इस शरीर को सत्य समझते हैं । जब हमें सत्य बुद्धि प्राप्त होगी, जब हमारी शुद्धि होगी, तब हम उसे सत् और प्रिय नहीं समझेंगे ।
राग तथा द्वेष का त्याग – राग और द्वेष का त्याग करो, वैराग्य धारण करो । वैराग्य धारण करने का अर्थ फकीरी लेना नहीं है किन्तु राग अर्थात् असत् वस्तुओं में से प्रेम या ममता का त्याग करना है । आसक्ति छोड़ो । भगवान का नाम अन्धे के लिए लाठी के समान है । भगवान का आधार लो । मनुष्य जन्म का आदर करो । तुम इसी जन्म में ही जीवनमुक्त हो सकते हो । भगवान से जीवन मुक्ति मांगो, अन्य कुछ भी नहीं मांगो ।
तुकाराम दक्षिण भारत में महान भक्त हो गये हैं । उनके भजन प्रसिद्ध है । वे भी अपने भजन में कहते हैं कि भगवान से सुबुद्धि मांगो, अन्य कुछ भी नहीं मांगो ।
ये बातें जो मैं तुम्हें सुना रहा हूँ, वह इसके लिए कि जीवन मुक्ति प्राप्त करने में सहायक हैं । जो बातें इस मार्ग में बाधा है, वे त्याग दो । बुरा संग, बुरे विचार, बुरा व्यवहार त्याग दो । होली आई है । होली पर तामसी भोजन करना पाप है । होली पर जो कुछ करते हो, वह उचित नहीं है । शराब, मांस का उपयोग नहीं करना चाहिए ।
मनुष्य जन्म को सफल बनाने के लिए सत्संग करो । "सत्संग करिये भाई, जान अजान परसो लोहा कंचन हो आई ।" अर्थात् लोहा जानते हुए अथवा न जानते हुए भी पारस से लगेगा तो सोना हो जायेगा । इस प्रकार सत्संग है । चन्दन के पेड़ के निकट जो अन्य पेड़ होते हैं, वे भी चन्दन की सुगंध खींचकर चन्दन जैसे सुगंधित हो जाते हैं ।
"राम मिलन के कारने, तू क्यों होय उदास ।"
"दादू संगति साध की, राम उन्हीं के पास ।"
वेद वाणी तथा सन्त वाणी हमारा उद्धार करने वाली है । भगवान से जीवनमुक्ति मांगो । जीवन मुक्त हुए तो विदेह मुक्ति स्वयमेव मिलनी है । तुम्हें जीवन मुक्ति मिले तो सभी कार्य पूर्ण हुए । भगत कंवरराम कहते थे "है भी राम फिर भी कहो राम ।"
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अध्याय 27
9 मार्च 1966 को अजमेर के आदर्श विद्यालय में किया गया प्रवचन
जैसे बैठे हो, वैसे अच्छे लग रहे हो । काश, गुणों में भी सुधरते रहो । बड़े कहते हैं कि बच्चे सुधरे तो जग सुधरा । बालकों को सुधारने वाला कौन है ? माता, पिता व शिक्षक । स्कूल दरबार के समान है । विद्यार्थी स्कूल में आये तो उसे चाहिए कि शिक्षक के आगे सर झुकाए । एक गृहस्थी स्कूल के पास से गुजरा तो उसने अपना सर उसके सामने झुकाया । पूछताछ करने पर विदित हुआ कि वह वहाँ से जाते हुए सदैव सर झुकाता है । तब मैंने सोचा कि बराबर स्कूलों से पढ़कर तत्पश्चात ही मनुष्य योग्य गृहस्थी होते हैं ।
कई बच्चे किताबें लापरवाही से रखते हैं, जिन पुस्तकों से विद्या प्राप्त करते हैं । तुम पुस्तकों पर पोश चढ़ा कर बाद में ही पढ़ा करो । विद्या की बड़ी महिमा है । विद्या पढ़ने से जीव का भाग्य खुलता है । अंधा, लूला, लंगड़ा, काना भी विद्वान होने से मान पाता है ।
विद्यार्थियों को चाहिए कि दृढ़ संकल्प करें कि मैं उत्तीर्ण होऊँगा । विद्यार्थियों को सुस्ती नहीं करनी चाहिए । परिश्रम करेगा तो अवश्य उत्तीर्ण होगा ।
तुम प्रार्थना अवश्य किया करो । प्रार्थना से मनुष्य उन्नति करता है, महात्मा गाँधी भी प्रतिदिन प्रार्थना करता था । वे इतने महान थे, जो उनमें 23 अवतार समाये हुए थे । उन्हें कभी भुला न सकेंगे । महात्मा गाँधी कहते थे कि स्कूलों में धार्मिक शिक्षा देनी चाहिए । महात्मा गाँधी ने अपनी आत्मकथा में बताया कि उनके माता-पिता उसे उपदेशों पर ले जाते थे । अतः वह रामायण भक्त हो गया । अध्यापक तो बच्चों को समझायें किन्तु माता-पिता को भी चाहिए कि बच्चों को शिक्षा दें । पहले माताएं बच्चों को कहानियाँ सुनाती थीं ।
हम भले कहें कि भगवान नहीं है, परन्तु जिन्होंने उसमें विश्वास रखा है, वे कैसे कहेंगे कि भगवान नहीं है ? महात्मा गाँधी से किसी ने पूछा कि भगवान है । उन्होंने कहा कि हाँ है ।
स्वामी विवेकानन्द ने श्री रामकृष्ण परमहंस से पूछा- "भगवान है ?" उन्होंने उत्तर दिया- "हाँ, मैंने वह देखा है ।" एक व्यक्ति ने कहा- "मैं भगवान को कैसे मानूँ ? दूसरों को जूतियाँ दी हैं, किन्तु मुझे जूती भी न दी है ।" आगे चला तो वह व्यक्ति देखा, जिसे पैर भी नहीं थे । तब उसने चिल्ला कर कहा- "भगवान ! मुझे जूती नहीं चाहिए । मैं ऐसे ही अच्छा हूँ । मैं आभारी हूँ कि भगवान ! तुमने मुझे पैर तो दिये हैं ।"
स्वास्थ्य के लिए, प्रसन्नता के लिए सीटी बजाया करो । डॉ. हरनामदास जैसा व्यक्ति भी ऐसा करते थे । सत्य है कि खुशी जैसी खुराक नहीं, चिन्ता जैसी बीमारी नहीं । भगवान को सदैव याद करो । समय न मिलने का बहाना नहीं करना चाहिए । समय तो मिल सकता है । केवल सुस्ती त्यागो । मनुष्य शरीर बड़े भागों से मिला है । नाम स्मरण करके, मुक्ति प्राप्त करो । कुंभकरण की तरह नींद नहीं करते । उठो, जागो और प्रभु को प्राप्त करो ।
भारत शब्द का अर्थ क्या है ? भा का अर्थ है प्रकाश, और रत का अर्थ है प्रीति । ज्ञान में जिसकी प्रीति है, वह भारत है । इस भारत में ऐसी देवियाँ है, जो अपने पुरुष के अतिरिक्त, अन्य सभी को पुरुष को दृष्टि से नहीं देखतीं ।
माता पिता का प्रतिदिन चरण स्पर्श करो । ऐसा करने से आयु बढ़ती है । संबंधियों को बच्चों को चरण स्पर्श करते समय तीन मुट्ठियाँ (मुट्टिका) लगानी चाहिए । पहली मुट्ठी का अर्थ है कि तू बड़ी आयु वाला हो । दूसरी मुठ्ठी का अर्थ है कि तुम अच्छी बुद्धि प्राप्त करो । तीसरी मुट्ठी का अर्थ है कि तू दुनिया की सेवा कर ।
मनुष्य वह है, जिसमें मानवता है । मनुष्य वह समझो जिस में इन्सानियत है । उत्तम मानव वह है, जिसने अपने मन को वश में किया है और विचार शुद्ध किये हैं ।
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अध्याय 28
3 सितम्बर 1962 को सायं मथुरा में श्री केवलराम भाटिया के घर में स्त्रियों की सभा में किया गया प्रवचन
माताओ आप देवियाँ हैं । घर की रानियाँ हैं । घर को बनाना, घर की गाड़ी ठीक प्रकार से चलाना आपका कर्तव्य है । इसके साथ चाहिए कि बुरे कर्मों से बचो, अच्छे कर्म करो । तुम कहोगी कि अच्छे कर्म करने से क्या होगा ? अच्छे कर्म करने से संकल्प अच्छे होंगे । यह मार्ग है सचखंड की ओर चलने का । सिनेमाएं बिल्कुल नहीं देखा करो । सिनेमा देखने से विचार, संकल्प खराब होते हैं । भगवान को याद करो । भगवान को प्रार्थना करो कि "सबका भला करो ।"
तुम समझती हो कि हम सुन्दर हैं । किसमें ? जिस शरीर को सुन्दर समझती हो, मरने के पश्चात सुन्दर क्यों नहीं लगता ? फिर उसको घर में क्यों नहीं रहने देते ? क्यों उसे ले जाकर जलाते हैं ? जिस शरीर को सुन्दर समझती हो, उसकी चमड़ी उतारकर देखो भीतर क्या है ? भीतर रक्त, रोग, गंद, मैल है । फिर यह शरीर सुन्दर कैसे हुआ ? उस शरीर में सौन्दर्य नहीं है । सौन्दर्य होता है अच्छे कर्म करने से । अच्छे कर्म करो । सत्संग करो तो तुम्हारे विचार अच्छे होंगे ।
दुःखों से न डरो । सुख-दुःख हानि लाभ, संसार में मिले हुए हैं । दुःखों से भागकर छूटा नहीं जा सकता । सुख के लिए दुःखों की आवश्यकता है । जब तक शरीर है तब तक दुःख आते जाते रहेंगे । उनकी चिन्ता न करो ।
घरों को यदि सुखधाम बनाना चाहती हो तो सासों को चाहिए कि वे बहुओं को पुत्रियों के समान समझें और उनसे बेटियों की नाईं प्रेम पूर्ण व्यवहार करें । बहुओं को भी चाहिए कि सासों को माताओं के सदृश समझें और उनसे सम्मान एवं प्यार रखें और उनकी सेवा करें । इस प्रकार घर की गाड़ी अच्छी चलेगी और घरों में सुख-शांति रहेगी ।
फिर भी तुम्हें कहूँगा कि प्रातः उठने और रात को सोने के समय भगवान को अवश्य प्रार्थना करती रहो कि "हे प्रभु ! हमें अच्छी बुद्धि दो और सबका भला करो ।" इसमें तुम्हारा भला है ।
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अध्याय 29
15 तथा 16 दिसम्बर 1965 पर श्री कृष्ण गऊशाला आगरे में किया गया प्रवचन
भ्रान्ति के कारण ही हम स्वयं को दुःखी कर रहे हैं । यदि भ्रान्ति भाव निकल जाय तो फिर आनन्द विदित होगा ।
अविद्या भुलाए, विधो जीउ भ्रम में,
पाशु पंहिजो पाण में, बेठो विञाए,
अण हूंदे दरियाअ में गोता नितु खाए,
मुंहुं मढ़ीञ पाए, 'सामी' दिसे कीनकी।
सिन्धी के प्रसिद्ध कवि सामी साहब कहते हैं कि- "अविद्या ने भुलाकर जीव को भ्रम में डाल दिया है । स्वयं को अपने में गंवा बैठा है । नदी है ही नहीं, उसमें गोते खा रहा है । सामी कहते हैं कि भीतर में झांक कर देखता नहीं ।"
राज महल में राजा का पाँच वर्ष का पुत्र नींद में सोया पड़ा था । एक भील अवसर पाकर बालक को चुराकर ले गया । उसके आभूषण उतार कर, उस राजकुमार को अपने बच्चों के साथ जाकर रखा । भील के बच्चे और राजकुमार मिलकर भील के पास पलते रहते थे और मिल जुल कर खेलते रहते थे ।
राजकुमार बड़ा होता गया । जब युवावस्था में आया, तो भी वह भीलों की तरह काम काज करता रहा अर्थात् हिंसा, पाप, चोरियाँ और जीवों का घात करता है ।
एक दिन घूमते शिकार करते हुए घने जंगल में जा पहुँचा । वहाँ उसे प्यास ने बहुत सताया । जल की खोज में इधर-उधर जाँच की तो उसे एक महात्मा की कुटिया देखने में आई । उस कुटिया में जाकर महात्मा को प्रणाम करके विनती करके कहने लगा- "महाराज ! मुझे प्यास सता रही है । कृपा करके पानी पिलाइये ।"
महात्मा ने उसे पहचान लिया । उन्होंने राजकुमार को राजमहल में अच्छी तरह देखा था । राजा दर्शन के लिए महात्मा को बुलाता था । महात्मा ने उस लड़के को बिठाया और कहा कि तुझे पानी पिलाता हूँ । महात्मा ने उससे पूछा कि "तुम कौन हो ?" लड़के ने उत्तर दिया - "मैं भील हूँ ।" महात्मा यह सुनकर आश्चर्य में पड़ गया । उसे कहा कि तुम राजकुमार हो, मैं तुम्हें अच्छी प्रकार जानता हूँ । तू भीलों के संग में आकर अयोग्य काम करके अपने को भील समझ बैठा है । तुम अपने को पहचानो, अपने वास्तविक स्वरूप को याद करो । जब तुम राजकुमार वाले स्वरूप को जानोगे, तब तुम इस भील के जीवन को छोड़ कर, राजमहल में जाकर राज सिंहासन प्राप्त करके राजा होकर राज्य चलाओगे और आनन्द पाओगे ।"
राजकुमार को महात्मा के वचन सुनने के पश्चात बचपन का स्मरण आया और उसे, बिल्कुल निश्चय हो गया कि मैं भील नहीं हूँ । मैं निःसन्देह राजकुमार हूँ ।
तत्पश्चात शीघ्र ही स्नान करके निर्मल हुआ । महात्मा ने तत्काल राजा को सन्देश भेजा । राजकुमार के लिए राजकीय वस्त्र और आभूषण आये, जो राजकुमार ने पहने । वस्त्र एवं आभूषण पहन कर राजकुमार राजा के लोगों के साथ राजमहल में गया और जाकर राजा से मिला । फिर तो राजमहल में रहकर राज्य भोग प्राप्त करके, बड़े आनन्द को पाया ।
इस दृष्टान्त का तात्पर्य यह है कि इस जीव रूप राजकुमार को देह अध्यास अर्थात् भ्रान्ति के कारण काम क्रोध आदि अपने वश में करके, संसार रूप घने वन में ले जाकर उसके दैवी सम्पदा गुण रूप आभूषण उतार कर उसे अपने जैसा कर देते हैं ।
यही जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर, अपने को भील मानकर, अनेक प्रकार के कुकर्म कर रहा है और वह अज्ञान के कारण समझ रहा है कि मैं ही कर्त्ता भोक्ता हूँ । मैं पुण्यात्मा और पापी हूँ । मैं सुखी और दुःखी हूँ ।
इसी प्रकार जीवन अपने को कर्ता, भोक्ता और सुखी-दुःखी मानकर संसार रूप जंगल में भटक रहा है । जब वह जीव किसी पुण्य के प्रताप से किसी आत्मवेत्ता गुरु की शरण में जाता है, तब उसे सत्गुरु ज्ञान उपदेश देता है कि तू देह नहीं है । तू अज्ञानी नहीं है । तू जाति वरण वाला नहीं है, तू कर्त्ता और भोक्ता, पाप और पुण्य के सम्बन्ध वाला नहीं है । तू शुद्ध सत् चित् आनन्द चिदघन स्व स्वरूप को भूलकर इस अवस्था में हुआ है । तू स्व स्वरूप याद कर और अपने को पहचान, तब तू सुख प्राप्त करेगा । सत्गुरु के उपदेश से वह जीव भाव भूलकर, साक्षी, अभिन्न, एक रूप ब्रह्म की अद्वैत निष्ठा प्राप्त करके, सुख सागर ब्रह्म में लीन होता है ।
गलती तब दूर होती है, जब दुरुस्त की जाती है । गलती जब दबाई जाती है तब फोड़ की भांति फटती है, नहीं तो भयानक रूप धारण करती है । कोई भी भूल थोड़ी करके न समझो । अपनी थोड़ी भूल भी पहाड़ जितनी करके समझो । गणित में देखो कि विद्यार्थी केवल थोड़ी भूल करता है तो हिसाब गलत हो जाता है और वह थोड़े अंकों से अनुत्तीर्ण हो जाता है ।
गफलत से तुच्छ केले का छिलका कोई रास्ते में फेंकता है और किसी मनुष्य का उसके ऊपर लांघते पैर फिसल जाता है तो उसे कितनी न चोट आ जाती है ? बालकों के जीवन में साधारण से साधारण बात पर भी ध्यान देना चाहिए, नहीं तो बड़ा होने पर उनका चरित्र बिगड़ जाता है । तृण की चोरी, दह लाख की चोरी । पहले बालक किसी का पेन अथवा किताब चोरी करता है । यदि रिश्तेदारों ने उस पर ध्यान नहीं दिया और डांटा नहीं तो बड़े होने पर वह डाकू बन जायेगा । आरम्भ में यदि झूठ बोलने की आदत पड़ी तो कोई भी विश्वास नहीं करेगा और जीवन बुरा बन जायेगा । यदि थोड़ा घाव होने का ख्याल न रखा तो फुंसी हो जायेगी और यदि फुंसी को छोड़ दिया जायेगा तो नासूर (न छूटने वाला घाव) हो जायेगा ।
इसलिए बचपन से ही कदम पर दृढ़ रहना चाहिए, देखा जाय कि मुझसे कोई भूल हो गई है तो उसे सुधारना चाहिए, नहीं तो बड़े होने पर पछताना पड़ता है ।
हमारा भला तब होगा, जब स्वयं में विश्वास और श्रद्धा रखकर दूसरे की शरण लेंगे । बालक भी माता-पिता की शरण में कैसे न पलता रहता है । माता-पिता उसकी हर समय कैसे न संभाल कर रहे हैं । उन्हें बच्चे का सब प्रकार से ख्याल रहता है । बालक जब बड़ा होकर स्कूल में जाने योग्य होता है तो शिक्षक की शरण लेता है । तब शिक्षक शरण आये को पढ़ाकर, परीक्षा दिलवाकर, बुद्धिमान बना कर उच्च कोटि पर पहुंचाता है ।
शरण लेना अथवा आत्म समर्पण तीन प्रकार के होते हैं:
1. अपराधी अथवा बीमार- अपराधी वकील की शरण लेता है । वकील उसे आश्वासन देता है कि मैं तुझे मुकद्दमे में बचाऊँगा, तो भी मुवक्किल को हर समय यह ख्याल रहता है कि पता नहीं क्या होगा । मुकद्दमे में विजय पाऊँगा अथवा नहीं । बीमार डॉक्टर की शऱण में जाता है, किन्तु उसको भी प्रतीक्षा रहती है कि कब डॉक्टर साहब मुझे इन्जेक्शन और दवाईयों द्वारा स्वस्थ करके निरोग बनायेगा अथवा नहीं ।
2. बच्चों की शरणगति- जैसे बच्चा अपने आपको पिता को अर्पण करता है । बच्चा यदि पिता का हाथ पकड़ता है, तो भी उसे डर रहता है कि हाथ छूट न जाय । परन्तु यदि पिता बालक का हाथ पकड़ता है, तो भी उसे डर रहता है कि हाथ छूट न जाय । इस स्थिति में उसे चोट पहुंचने का हर समय डर रहता है ।
3. मुर्दे जैसी शरणगति- मुर्दे के कफन के लिए विशेष दुकान होती है जो हर समय खुली रहती है, दूसरी जगह से नहीं मिले तो उससे अवश्य मिलेगा । यदि हड़ताल होती है तो भी कफन मिल सकता है । असम्भव कार्य भी सम्भव हो ही जाते हैं । उस स्थिति में यदि कोई रूठा हुआ होता है तो भी अर्थी के समय अवश्य चलता है । ठीक तू भी जीवित होते हुए मर जा ।
मिटा दो अपनी हस्ती को, गर्च मरतबा चाहिए ,
दाना खाक में मिलकर, गुले गुलजार होता है ।
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अध्याय 30
23 सितम्बर 1961 पर बांटवा में किया गया प्रवचन
यह शरीर एक मकान है, जो निवास स्थान कुछ समय के लिए मिला है, जिसमें ममता रखकर अपना मकान समझ बैठे हैं । वह मेरा नहीं है । वह पांच तत्त्वों का बना हुआ है । स्वयं तो बिल्कुल ही अपने को वह शरीर समझ बैठे हैं । जब पता चलेगा, तब कहेंगे कि हाय, मैं तो अपने को शरीर समझ बैठा था, वह भूल के कारण । जब मैं ज्ञान में जागा, तब बराबर समझा कि मैं वह घर नहीं हूँ, मैं तो उससे भिन्न हूँ सत् चित् आनन्द स्वरूप । आत्मा सब में एक समान सदैव नित्य रहने वाला अजर अमर अखण्ड है । जो एक है, वह सत् परमात्मा सबमें रम रहा है । यह उपरोक्त ज्ञान ही जिज्ञासु के लिए एक खुराक है ।
मन पर पूर्ण संयम रखना चाहिए । बुरे संकल्पों से अलग रहना चाहिए । उस पर पूर्ण दृष्टि रखनी चाहिए, नहीं तो बड़ी खराबी होगी । किसी भी बुरे विचार को बार-बार विचारना न चाहिए । पूर्णतः उसकी स्मृति ही मिटा देनी चाहिए । मन की दौड़ बाहर नहीं हो तो समझ लो आपके अभ्यास का मन पर प्रभाव पड़ा है । समुद्र में जहाज पर कोई पक्षी बैठा होगा तो वह कहाँ जायेगा ? उड़ते-उड़ते इधर-उधर घूम फिर कर फिर भी थककर आकर जहाज पर शान्त करके बैठ जायेगा । वैसे मन भी भले दौड़े । स्वयमेव थककर एक आत्मा में स्थिर होगा । मन कोई वस्तु नहीं है । मन को तुम्हारी ही शक्ति है । तुम मन से भिन्न ज्योति स्वरूप आत्मा हो । ये सूर्य, चन्द्र, तारे सभी तुम्हारे प्रकाश के कारण प्रकाश दे रहे हैं । वे आभास मात्र अल्प हैं । सूर्य दिन को है तो रात को नहीं और चन्द्रमा रात को है तो दिन को नहीं । परन्तु वह ज्योति ही, जो तीनों कालों में प्रकाश कर रही है, न कम न अधिक । वही एक सत्य स्वरूप है तुम्हारी जान । वस्त्र शरीर से भिन्न हैं, वैसे ही आत्मा शरीर से भिन्न है । सब में एक आकाश की तरह व्यापक है । शरीर को जो इन्द्रियाँ मिली हुई हैं, उनके द्वारा चाहे शुभ कर्म करे अथवा बुरा, शुभ देखे अथवा अशुभ, परन्तु सदैव शुभ देखना चाहिए और इन्द्रियों से शुभ कर्म कराने चाहिए ।
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अध्याय 31
24 सितम्बर 1961 को बांटवा में किया गया प्रवचन
ज्ञानी को निश्चय, यथार्थ ज्ञान, साक्षात्कार होने से ही पूर्ण शान्ति प्राप्त होगी और न श्रवण, मनन अथवा निद्ध्यासन से । ज्ञानवान के निश्चय में न संचित कर्म, न क्रयमान कर्म और न प्रारब्ध कर्म होते हैं । वह पूर्ण ज्ञान होने से सब कर्म आभास मात्र समझता है । मन बड़े-बड़े विद्वानों और चतुर व्यक्तियों को भी उलझन में डाल देता है । ज्ञानी के निश्चय में न आभास है और न कर्म, वह तो एक ज्योति स्वरूप, अपने आप में स्थित है । ज्ञानवान से कोई भी कर्म, दुःख सुख सम्बन्धित नहीं है । उसके निश्चय में यह सब आभास मात्र है ।
मन को जीतो- "जिसने मन जीता, उसने जग जीता ।" जिसने मन को दास बनाया है, वही मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करेगा । जो जीवन मुक्त नहीं है, वही विदेह मुक्त नहीं होगा । जब मन को भगवान का नाम 200 बार माला फेरने के बीच में छोड़ दे तो समझो कि अब मन चंचल हुआ है और यदि पूरे 200 बार माला फेरे तो मन अब स्थिर हुआ है । इस मन की सहायता से ही मोक्ष पाया जा सकता है । जिसने मन को वश में किया है, वही सन्त है, वही पूर्ण मंजिल प्राप्त करेगा । यदि मन को उसने वश में नहीं किया तो चौरासी लाख योनियों में दुःख भोगेगा । इस जन्म में मन को जीतकर मनीराम को अपना नौकर अथवा गुलाम बनाकर उससे मोक्ष का काम लेना चाहिए और न विषय विकारों में उसे डुबोया जाये । मन को कामना, विषय और तृष्णा आदि से खाली करके, अपने आप से प्रेम किया जाय और सदैव मन पर चौकस रहना चाहिए, आत्म आनन्द में स्थित रहना चाहिए ।
दुःख किसको- दुःख किसको होता है ? शरीर को । चाहे शरीक को कोई धक्का लगाये अथवा लाठी लगाये और मारे अथवा फांसी दे तो क्या हुआ ? कुछ भी नहीं । मैं तो जैसा का वैसा अजर, अमर, अखण्ड स्थित हूँ । हृदय शुद्ध होगा तो आत्मज्ञान की बातें भीतर रहेंगी । यदि आत्मज्ञान प्राप्त करने की इतनी बुद्धि न हो, तो प्रार्थना करें कि हे भगवान, मुझे सद्बुद्धि और शक्ति दे कि मैं अपने मन को गुलाम बनाऊँ । मन को समझाया जाय कि हे मन, तुम ज्योति स्वरूप हो । अन्तःकरण में बिल्कुल सच्चाई रखी जायेगी तथा हृदय शुद्ध रखा जायेगा तो तत्काल ज्ञान प्राप्त होगा । ज्ञानवान के पुण्य का फल, जो उसकी सेवा आदि करते हैं, उन्हें मिलता है और ज्ञानवान के पाप का फल उन्हें, जो ज्ञानवान की निन्दा करते हैं, वे ही पाप कर्म के भागी होते हैं । यथार्थ ज्ञान होने से जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति मिलती है । केवल ख्याली ज्ञान कथन करने से नहीं अथवा सुनने सुनाने से नहीं मिलती । ऐसा नहीं समझना चाहिए कि बस यह पूर्ण ज्ञानी हो गया । नहीं-नहीं जिसे आत्म साक्षात्कार हुआ है, वही जीवन-मुक्त है और विदेह मुक्त होगा और जाकर अखण्ड आत्मानन्द में लीन होगा ।
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अध्याय 32
25 सितम्बर 1961 को बांटवा में किया गया प्रवचन
ऐसा नहीं कि हमने आत्मध्यान आधा घण्टा अथवा एक घण्टा किया तो बस शान्ति मिल जायेगी । नहीं, नहीं हम सोलह घंटे तो करते रहें अन्य काम काज, शेष थोड़ा समय मन को दें आत्मध्यान के लिए तो क्या हम पूर्ण आनन्द पा लेंगे ? नहीं । आत्म आनन्द, आत्मज्ञान, आत्मध्यान के लिए सदैव ब्रह्माकार वृत्ति स्थित हो । चलते-फिरते, काम काज करते हुए भी मन प्रियतम में स्थित रखा जाय, शेष काम बाह्य ढंग से करते रहना चाहिए । मन को काम में फंसाना नहीं चाहिए । मन सदैव उस ध्यान में रहे और मन का साक्षी होकर उसे आत्मध्यान में दृढ़ रखा जाय । यदि मन चंचल हो तो तत्काल मन को लौटाकर, आत्मा में स्थिर किया जाय और उसे आत्मा से कदापि न हटाया जाय, चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आवें । वीर होकर उनका सामना किया जाय, कभी पीछे न हटना चाहिए । दुःख सुख शरीर से सम्बन्धित हैं । जब तक शरीर है, तब तक दुःख सुख आते जाते रहेंगे । न दुःख रहेगा, न सुख । ये बदलते रहेंगे । ये परिवार आदि सब आभास मात्र हैं । ज्ञानी का यही दृढ़ निश्चय होता है कि चाहे सब नाश हो जाय, तो भी उसे कोई दुःख, हर्ष, शोक नहीं है । वह सदैव समदृष्टि, अपने आत्मा में मस्त रहता है । वे मृत्यु अथवा जन्म सब अभ्यास परछाई अथवा छाया समझते हैं । वास्तव में जन्म है ही नहीं । जो जन्मा ही नहीं तो मृत्यु किसकी ? मोक्ष किसका ? एक आत्मा के अतिरिक्त और कहीं भी मन को नहीं लगायें, प्रयत्न करके अभी ही ध्यान आत्मध्यान में स्थित करके, वह अखण्ड आनन्द प्राप्त कीजिये, जो कदापि नाश न हो और न ही होगा । अपने को स्वप्न में भुला बैठे हैं । जब जागते हैं, तब जानते हैं कि मैं तो इस सपने का दर्शक था । यह संसार एवं शरीर परिवर्तित होते रहेंगे, बादलों की भांति आते जाते रहेंगे ।
विद्या वह, ज्ञान वह, जो कण्ठ में हो और पैसा वह जो गांठ में हो । जिसमें दैवी सम्पदा गुण हैं, वही मोक्ष प्राप्त करेगा । योग, तप मन्त्र आदि से मन शुद्ध होता है और तत्पश्चात ज्ञान होता है । मोक्ष का उपाय एक आत्मज्ञान है यथार्थ ज्ञान है । ज्ञान अर्थात् अनुभव, जानकारी समझ बूझ । जिसमें साक्षात् ज्ञान और दैवी सम्पदा गुण आते हैं, उसे ही ज्ञानी समझना चाहिए । वह कैसा ज्ञान ? एक आत्मा का, और कोई ज्ञान नहीं ।
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अध्याय 33
26 सितम्बर 1961 को बांटवा में किया गया प्रवचन
एक थाल है जड़ । उसे प्रकाशित करता है दीपक । दीपक को जानता है मन । मन को जानता है चौथा आत्मा । इससे सिद्ध हुआ कि आत्म ज्योति के सहारे मन प्रतीत हुआ । मन के कारण दीपक, दीपक से उस थाल को अन्धकार में हमने देखा ।
आत्म ज्योति के सहारे से, उसकी सहायता से ही यह सब कुछ देख रहे हैं । आत्मा सत् है, वह जानकारी जानने वाला सत् है । आनन्द ही सत् है, अन्य सब है शून्य । 'जग सारा सपना।' यह जगत न पहले था, न बाद में रहेगा; केवल बीच में दिखता है । यह इस प्रकार, जिस प्रकार दर्पण में गुलाब के फूल की लाली दिखती है, जो लाली गुलाब की है । वैसे यह जो भी दिखता है, वह भी तुम्हारी ज्योति की ही लाली अथवा झलक है, आभास मात्र है ।
शब्द, रूप, रस और गंध को जानने वाला सत् आत्मा है, जो कभी नष्ट नहीं होता । सब में आकाशवत् व्यापक है सबका आधार है । एक ज्ञान है, उस ज्ञान से ही सबको जान सकते हैं । वह दृष्टा है, अन्य दृश्य है । दृष्टा दृश्य से भिन्न है । जो सत् व्यापक एक है, वही नूर है, वही आत्मा है । ज्ञानी उसे कहा जाय, जिसमें सतो गुणी स्वभाव है, दैवी सम्पदा गुण हैं । किसी को तब ज्ञानी नहीं समझना चाहिए, जब तक उसमें ये गुण न आवें ।
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अध्याय 34
10 जून 1964 को आबू पहाड़ पर किया गया प्रवचन
जो विषय भोगों को मक्खन और पेड़े समझते हैं, वे मानो चूना खाते हैं । चूना खाने वाले की दशा क्या होती है ? वह मर जाता है । जैसे सांप को हाथ लगाने से सांप का विष चढ़ जाता है, वैसे विषय भोग भी विष के समान हैं । लेश मात्र भोगने से भी दुःख सहन करने पड़ते हैं । जिसको ज्ञान रूप नेत्र हैं, शुद्ध बुद्धि रूप शुद्धता है और दृष्टि रूप शास्त्रों का प्रमाण है कि वह ज्ञान प्राप्त करके मोक्ष को अवश्य प्राप्त करेगा, अन्य कुछ नहीं । भले ही दर्पण शुद्ध हो, परन्तु यदि हिलता रहेगा तो उसमें अपना मुख नहीं देख सकेंगे । हमारा दर्पण है शुद्ध हृदय, किन्तु यदि मन स्थिर नहीं होगा तो अपना स्वरूप अर्थात् आत्मा कैसे देख सकेंगे ? अतः काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकार शब्द, स्पर्श, रूप, रस आदि विषयों के समूह से जब हम अपने को बचायेंगे, तब मोक्ष को प्राप्त करेंगे ।
फूलः- स्वामी विवेकानन्द जी ने भी कहा है कि जहाँ फूलों की सुगन्ध है, वहाँ भ्रमर स्वयमेव आ जायेंगे । वैसे जिसका हृदय शुद्ध है, पवित्र है, उसे ज्ञान है और शास्त्रों के प्रमाणों रूप दर्पण है, वहाँ कई आकर सुगन्ध लेते हैं ।
संतान तथा गृहस्थ- विवाह है सन्तान के लिए । दो चार बच्चे हों तो फिर स्त्री पुरुष दोनों को वानप्रस्थी होकर रहना चाहिए । तभी वे उन्नति को प्राप्त कर सकेंगे और मोक्ष प्राप्त करेंगे ।
ज्ञानी, सत्पुरुष, आचार्य को दूसरे पहचान नहीं सकते । उसे केवल सच्चे जिज्ञासु ही पहचान सकते हैं, वे ही उस ज्ञानी के रहस्य को, कथनी करनी, आचार-विचार को जान सकते हैं और न कोई दूसरा ।
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अध्याय 35
22 जून 1964 को आबू पहाड़ पर किया गया प्रवचन
शरीर सुन्दर नहीं है, यदि होता तो प्राण निकल जाने के बाद भी सुन्दर लगता । हम शरीर को वहाँ छोड़कर आयेंगे, जहाँ कौए बीठ छोड़ते रहते हैं तथा मूत्र करेंगे । मन के समक्ष बार-बार उपरोक्त विचार रखने चाहिए । शरीर को न सुन्दर, न सत् और न आनन्द रूप जानकर देहाभिमान त्याग करके आत्म निश्चय रखना चाहिए ।
जिस प्रकार संसार के पदार्थों में हमारी प्रीति है, उस प्रकार आत्म ज्ञान, आत्मध्यान, आत्मानंद में प्रीति रखें । जगत के पदार्थों, वासना, काम, क्रोध आदि से प्रीति हटाकर आत्मा में ऐसी प्रीति रखें, फिर मोक्ष तत्काल । जो सच्चा जिज्ञासु है, वह मोक्ष को अवश्य प्राप्त करेगा । किन्तु लगातार अभ्यास, चिन्तन, ध्यान करते रहना चाहिए, फिर निश्चय ही आ जायेगा ।
अपनी सूरत को देखने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता रहती है । एक निर्मल दर्पण, दूसरा नेत्र, तीसरा प्रकाश है । आत्मा के नेत्र हैं ज्ञान, वेद, शास्त्र; उसका प्रमाण है शुद्ध दर्पण ।
न मैं, न मेरा, न पराया, किसका, मैं-मैं कहने से मेरा कहा जाता है । अतः अहमता, ममता का त्याग करके, सच्चे आत्म की 'मैं' धारण करो ।
हम परमानन्द स्वरूप पर ब्रह्म हैं, सब में हमारी छाया है । यह जो आनन्द विषयों में भासता है, वह विषयों का आनन्द नहीं है; वह आनन्द ब्रह्म का है, केवल आनन्द ही आनन्द ! हम आनन्दरूप ब्रह्म पहले भी थे, अब भी हैं और बाद में भी रहेंगे । यह जगत पहले भी न था, बाद में भी न रहेगा, किन्तु बीच में जो दिखता है वह खाक है । आरम्भ में केवल एक आनन्द तत्त्व था, वैसे अब भी अस्तित्व ब्रह्म का है । जैसे सोना पहले भी सोना था, अब उसमें से आभूषण बने तो भी सोना है, फिर जब सभी आभूषण नाश हो जायेंगे, तो भी वह सोना है । वैसे केवल आनन्दरूप पारब्रह्म ही सत् है ।
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अध्याय 36
23 जून 1964 को आबू पहाड़ पर किया गया प्रवचन
जैसे सूर्य की छाया जो पानी में दिखती है, वह सच्चा सूर्य नहीं है, किन्तु सूर्य का आभास मात्र है, वैसे विषय भोगों में जो आनन्द प्रतीत हो रहा है, वह भी आभास मात्र है, वह सच्चा आनंद नहीं है । फिर जो आभास आनंद क्षण मात्र है, वह भी ब्रह्म का ही आनन्द है । जैसे सूर्य का आभास सूर्य का ही रूप है, वैसे जो आनन्द हम जान रहे हैं, वह सब पारब्रह्म परमेश्वर का है और जो चेतनता देख रहे हो, वह भी ब्रह्म की है । पर पारब्रह्म परमेश्वर एक ही सत् चेतन तथा आनन्द स्वरूप है । किसी भी सत्ता रूप में भास रहा है तो किसी में चेतनता रूप में, तो किसी में आनन्द स्वरूप में सत्ता अर्थात् अस्तित्व, जैसे जड़ पदार्थ में चेतनता, जैसे कुछ प्राणियों में ज्ञान और कुछ में आनन्द अर्थात् जिसे आनन्द आ रहा है, किन्तु जिसका हृदय शुद्ध है, उसे पारब्रह्म परमेश्वर एक ही अभेद रूप में प्रतीत हो रहा है, जो सत् भी स्वयं, चेतन भी स्वयं और आनन्द भी स्वयं, सच्चा आनन्द स्वरूप ।
स्वामी राम तीर्थ जी महाराज के पास एक सज्जन ने जाकर प्रार्थना की कि "स्वामी जी" मुझ पर ऐसी कृपा कीजिये, जो मैं दुनिया का राजा बनूँ ।" स्वामी जी ने कहा कि "दुनिया का राजा बनकर फिर क्या करोगे ?" कहा- "आनन्द मिलेगा, प्रसन्नता प्राप्त करूँगा ।" स्वामी जी ने उत्तर दिया - "समझो कि तुम राजा बने हो, तुम्हारी इच्छा निवृत्त हो गई, उस इच्छा निवृत्ति के पश्चात आनन्द तथा प्रसन्नता प्राप्त हुई है, वह आनन्द राजा होने में नहीं है, परन्तु राज्य मिलने के पश्चात इच्छा की निवृत्ति हो गई, तब तुम्हें आनन्द मिला । अतः यदि तुम अभी भी इच्छा का त्याग करो, तो तुम्हें आनन्द ही आनन्द मिलेगा । जिस आनन्द के लिए तुम राज्य मांग रहे हो, उससे अधिक आनन्द तो इच्छा की निवृत्ति में है ।"
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अध्याय 37
24 जून 1964 को आबू पहाड़ पर किया गया प्रवचन
शान्त हृदय में ही सत् चेतन और आनन्द स्वरूप परब्रह्म परमेश्वर का साक्षात् दर्शन हो सकता है, और वह फिर समझता है कि यह तो मेरा ही स्वरूप है । जो बहुत प्रवृत्ति के कारण परम तत्त्व का चिन्तन नहीं कर सकता है, वह तब काम काज आदि प्रवृत्ति में होते हुए भी अस्ति भाति और प्रिय का ध्यान करे, उस ध्यान से भी परम तत्त्व को प्राप्त कर सकता है और उसमें ही लीन हो जाता है ।
भोग- भोग हम नहीं भोगते, भोग ही हमें भोग रहे हैं । क्षणिक सुख के लिए बल, बुद्धि, आयु और स्वास्थ्य को नष्ट कर रहे हैं । वह क्षणिक सुख भी भोग में नहीं है, वह भी हमारे मन की स्थिरता के होने के कारण, इच्छा के निवृत्त होने पर प्रतीत होता है । तब जो आनन्द मिला, वह हमारे ही आत्मा का है और भोग भोगने का नहीं ।
इच्छा की निवृत्ति से मन शान्त होता है और आनन्द मिलता है । बस यही सच्चा आनन्द है । अतः सब इच्छाओं और वासनाओं का त्याग करो तो मन शान्त हो और अन्तःकरण का आनन्द प्राप्त हो । जो आनन्द स्वरूप पर ब्रह्म परमेश्वर का स्वरूप है, वह हम स्वयं ही हैं । इच्छाओं के त्याग में ही सच्ची शांति है । त्याग से ही सच्ची शांति में स्थित हो जाते हैं । सोने में आभूषण कल्पित हैं, मिट्टी में घड़े कल्पित हैं । सोने और मिट्टी के अतिरिक्त कुछ भी बना ही नहीं । वैसे जगत भी ब्रह्म में कल्पित है, ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं ।
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अध्याय 38
6 जून 1964 को आबू पहाड़ पर किया गया प्रवचन
निर्विकल्प समाधि से अन्तःकरण की वृत्तियों का बिल्कुल अभाव हो जाता है, तब शेष आनन्द ही रहता है । वही सत् है, शेष उसके अतिरिक्त सब असत् है । ज्ञान होने के पश्चात यदि कोई भी कामना इच्छा नहीं रहती । यथार्थ पूर्ण ज्ञान से ही मुक्ति मिलती है । जिस को दृढ़ निश्चय हुआ है कि जगत मिथ्या है और मैं सत् चित् आनन्द स्वरूप परमात्मा हूँ, वह मुक्त है । पूर्ण परमानन्द प्राप्त करने के लिए सविकल्प समाधि और निर्विकल्प समाधि लगाकर और श्रवण, मनन और निद्ध्यासन से उस पूर्ण आनन्द का अनुभव होता है और अनुभव करने पर स्वयं कहता है कि वह आनन्द स्वरूप परब्रह्म मैं हूँ । ज्ञानी यद्यपि बाह्य काम काज करता है, तो भी वह आत्म आनन्द में रमण कर रहा है । जिसकी ऐसी अवस्था है, वह धन्य है तथा पूज्य है । तुम केवल अपना हृदय शुद्ध रखो । आत्मा तुम्हारे भीतर बैठा है, वह स्वयं ही तुम्हें सच्चा ज्ञान देगा और जो-जो शंका तुम में उत्पन्न होगी, वह तुम्हें भीतर बार-बार स्वयं समझाएगा । ज्ञानी को खान-पान की कोई चिन्ता नहीं रहती । उसे प्रारब्ध के अनुसार स्वयं ही मिलता है और उसके शरीर का पालन-पोषण होता रहता है ।
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अध्याय 39
12 जून 1964 को आबू पहाड़ पर किया गया प्रवचन
ज्ञानी न कर्त्ता है, न भोक्ता और न उसकी मौत है । आत्मा का जन्म ही नहीं, तो कर्त्ता भोक्ता कौन होगा ? प्रारब्ध कर्म शरीर में लगते हैं, ज्ञानी तो शुद्ध चेतन आत्मा है । जो ज्ञानी की सेवा करते हैं, उन्हें पुण्यों का फल मिलता है और जो ज्ञानी की निन्दा आदि करें अथवा उसे दुःख देते हैं, वे पाप के भागी होते हैं । संचित कर्म अर्थात् जो पहले करके आया है, वे ज्ञानी की ज्ञान अग्नि से भस्म हो जाते हैं, वे ज्ञानी को स्पर्श नहीं कर सकते । आधिभौतिक दुःख अर्थात् शरीर के दुःख बीमारी आदि, आधिदैविक दुःख अर्थात् गर्मी, वर्षा, ओले आदि, आध्यात्मिक दुःख अर्थात् शेर, सांप आदि जीवों से मिला हुआ दुःख, ज्ञानी के तीनों ताप नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि ज्ञानी स्वयं तो आत्मा है । ज्ञानी को उपरोक्त दुःख स्पर्श नहीं कर सकते । दुःख कौन भोगता है ? आत्मा में तो दुःख है ही नहीं । शेष प्रारब्ध कर्म भी शरीर भोगकर छूटेगा । आत्मा में न कर्म है, न धर्म, न पुण्य, न पाप । जो जन्म मानेगा, वह मरेगा भी । ऐसी बात महामुनि शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को बतायी है । अतः आत्मा का जन्म नहीं । आत्मा कमल के फूल की भांति निर्लेप है । तुम वह आत्मा हो, जो कभी नाश नहीं होता ।
अज्ञानी दुःखी होकर कहता है कि मैं पाप कर्म का फल भोग रहा हूँ । ज्ञानी के लिए न पुण्य कर्म का फल सुख है और न पाप कर्म का फल दुःख । ज्ञानी के लिए न सुख है, न दुःख । ज्ञानी तो सर्वदा एक रस स्व स्वभाव में स्थित रहता है, जो शुद्ध चेतन आनन्द स्वरूप है ।
ईश्वर अंश, जीव अविनाशी,
चेतन अमल, सहज सुख रासी,
सो माया वश भयो गोसाई,
भयो जीव मरकट की नियाई ।
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अध्याय 40
13 जून 1964 को आबू पहाड़ पर किया गया प्रवचन
यह समस्त विशाल संसार ही ज्ञानी का घर है । चौदह ही लोकों में स्वयं ही स्वयं चेतन सम्पूर्ण है । लेश मात्र भी जगह नहीं ।
दादू दावा छोड़ दे, बिन दावा दिन काट ।
यदि कोई कहे कि यह काम मैं दावा के साथ कर सकता हूँ, परन्तु कौन सा भरोसा है शरीर पर ? एक सैकण्ड में नाश हो सकता है, सदैव सचेत सजग रहना चाहिए । यह सृष्टि इस प्रकार है, जैसे सपने में अपने को भूल जाने से ही अनेक आकारों के साथ प्रतीत होकर दिखने में आती है । जागने के पश्चात कुछ भी नहीं दिखता सिवाये चेतन आत्मा के, जो तीनों कालों को प्रकाशित कर रहा है, वह सत्य स्वरूप है । भगवत् ध्यान, भगवत् ज्ञान, भगवत् आनन्द में स्थित होना है । पूछोगे कि महाराज ! भगवान का रूप कैसा है ? क्या ये दृश्य आदि ? नहीं-नहीं, भगवान का स्वरूप किसी भी विषय के अतिरिक्त है । वह भगवान का स्वरूप है, तुम कहोगे कि स्वामी, भला भगवान के दर्शन कैसे हों ? भाई, भगवान तो प्रतिदिन दर्शन दे रहा है । सुषुप्ति अथवा गहरी नींद में जो आनन्द मिल रहा है, जो देख रहे हैं कि किसी भी विषय सम्बन्ध के अतिरिक्त है, वहाँ कोई भी विकल्प पदार्थ अथवा मन की वृत्ति नहीं है, तो फिर वह आनन्द कहाँ से आया ? वह आनन्द कहीं बाहर से नहीं आया । आनन्द हमारे भीतर है । यदि भगवान को बाहर खोजने जायेंगे तो यह हमारी बड़ी भूल है । पारब्रह्म परमेश्वर हमारे भीतर है, केवल आनन्द ही आनन्द है ।
तुम पूछोगे की महाराज, भला यह आनन्द जाग्रत में सदैव कैसे हो ? सुनो शरीर से ऊपर हो जाओ अर्थात शरीर को स्वयं न समझकर, शरीर को आभास मात्र जानकर, भगवत् ध्यान में लगाना चाहिए अथवा काम में लग जाना चाहिए, किसी भी प्रकार शरीर से ऊपर होना चाहिए ।
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अध्याय 41
8 जून 1964 को आबू पहाड़ पर किया गया प्रवचन
स्वयं को अविनाशी अखण्ड आनन्द ही आनन्द स्वरूप जानकर, सर्वदा उसी आनन्द ही आनन्द में स्थित रहना चाहिए । यही तो ईश्वर दर्शन है । बस, विश्वास कर लेना चाहिए कि आनन्द मेरी जान है, सिवाय मुझ आनन्द स्वरूप परमात्मा के अन्य कुछ चौदह लोकों में बना ही नहीं, ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिए । स्वयं को भूलने से, शरीर आदि जगत के पदार्थ प्रतीत हो रहे हैं और अपने को यथार्थ समझने से, शेष एक ही आनन्द स्वरूप रहता है ।
पूछोगे कि स्वामी जी, फिर भला ये पदार्थ आदि जो दिख रहे हैं ? भाई, वे उस प्रकार है, जैसे लहरें, बुदबुदे, छोटी लहरें, बड़ी लहरें, उन सबका आधार एक ही जल है । जल के अतिरिक्त अन्य कुछ बना ही नहीं, अथवा जैसे अनेक घड़े हैं, उन सबका आधार मिट्टी ही है । मिट्टी के अतिरिक्त कुछ बना ही नहीं । मिट्टी न हो तो क्या घड़े बनेंगे ? नहीं । वैसे जो कुछ हम देख रहे हैं, उन सबका आधार एक ही आनन्द स्वरूप परमात्मा है । उन सबमें सत्ता आनन्द की है, ये सभी आनन्द स्वरूप ही तो हैं ।
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अध्याय 42
ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं
8 जून 1964 को आबू पहाड़ पर किया गया प्रवचन
यह संसार क्षण भंगुर है । उसका अभाव करके, ब्रह्मभाव रखना चाहिए । बार-बार इस मांस रूप थैले से बाहर निकल कर स्वयं को मांस रूपी थैले को साक्षी दृष्टा समझना चाहिए ।
"जब लग फांसी मजहब की, तब लग होत न ज्ञान ।"
यह सब सच्चिदानंद ही सच्चिदानंद है । न स्त्री, न पुरुष, न बूढ़ा, न जवान, न वर्ण, न आश्रम, न ब्राह्मण, न क्षत्रिय, न वैश्य, न शूद्र, न ब्रह्मचारी, न गृहस्थी, न वानप्रस्थी, न संन्यासी, यह सब ब्रह्म ही ब्रह्म है । तीन शरीर तीन हत्याएं हैं । उनसे जितना शीघ्र हो सके, उतना शीघ्र बचा जाय । स्वयं को उन तीन शरीरों से भिन्न साक्षी ज्ञान स्वरूप जानकर सत् ज्ञान और आनन्द में स्थित रहना चाहिए ।
विवेक अर्थात् सत् असत् का ज्ञान, सत् का ग्रहण करके असत् का त्याग करना । संसार न सुन्दर है, न सत् है और न आनन्द स्वरूप है । आनन्द हमारी जान है, ऐसा दृढ़ निश्चय करना चाहिए ।
स्वयं के अतिरिक्त चाहे समस्त दुनिया घूमे तो भी आनन्द कहीं भी प्राप्त न होगा । ऐसा दृढ़ निश्चय मन में होने से मन भटकना छोड़ देगा । आनन्द वह सच्चा, जो किसी भी विषय सम्बन्ध के अतिरिक्त हो, उस शुद्ध आनन्द को ही ब्रह्मानन्द कहा जाता है । वह आनन्द हमारे भीतर है, हम स्वयं वह आनन्द स्वरूप हैं ।
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अध्याय 43
9 जून 1964 को आबू पहाड़ पर किया गया प्रवचन
निराकार ब्रह्म का वेदों एवं शास्त्रों में जो वर्णन किया गया है, उस स्वरूप का जिज्ञासु को चाहिए कि ध्यान एवं चिन्तन करे । चिन्तन तथा ध्यान करते-करते वही स्वरूप हो जाना चाहिए । इसके लिए बार-बार ब्रह्म स्वरूप का ध्यान चिन्तन करते रहना चाहिए । 'जगत मिथ्या ब्रह्म सत्' करके समझना चाहिए । जगत है असत्, जड़ एवं दुःख रूप और ब्रह्म सत् चित् आनन्द स्वरूप ।
जैसे सपने की सृष्टि मिथ्या है, वैसे जाग्रत की सृष्टि भी मिथ्या कल्पित है । जाग्रत की सृष्टि स्वप्न में नहीं है, स्वप्न की सृष्टि जाग्रत में नहीं है । इससे प्रमाणित हुआ कि दोनों सृष्टियाँ मिथ्या हैं ।
वैराग्य का अर्थ है किसी भी दुनिया के पदार्थ में मन अन्यथा प्रीति न हो और न कोई वासना ही रहे । ऐसा नहीं कि हाथ में कमण्डल उठा कर, जटाएं रख कर, लम्बा कुर्ता पहने तो उसे वैराग्य कहा जायेगा । हृदय में यदि वासनाएं पड़ी होंगी तो उसे वैराग्यवान नहीं कहा जा सकता ।
जिसका अज्ञान कर्म और वासनाएं दूर हो जाती हैं, वह विदेह मुक्त हो जाता है, जिसका फिर जन्म नहीं होता ।
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अध्याय 44
15 जून 1964 को आबू पहाड़ पर किया गया प्रवचन
लहरों को छोड़कर उसके आधार जल को देखो, आभूषणों को छोड़कर उसके आधार स्वर्ण को देखो, बर्तनों को छोड़कर उसके आधार मिट्टी को देखो । वैसे जगत के नाम रूप को छोड़ कर उसके आधार आनन्द स्वरूप परमात्मा को देखो, निज आनन्द स्वरूप भगवान को देखो ।
जब कोई विद्यार्थी कठिन प्रश्न हल करना चाहता है, तब सियाही, कलम और स्वयं को भूल जाता है । जब वह प्रश्न हल कर लेता है, तब उससे पूछा जाय कि आनन्द आया अथवा नहीं, तो कहेगा कि आया ! वैसे जब जिज्ञासु पूर्ण रीति से स्वयं को जानने लगता है, तब शरीर, लिखने पढ़ने आदि सबको भूल जाता है, फिर उससे पूछ कर देखा जाये कि आनन्द आया अथवा नहीं ? वह आनन्द ही भगवान का स्वरूप है । आनन्द स्वरूप भगवत् के अतिरिक्त अन्य कुछ है ही नहीं । सब अपना ही काल्पनिक बाग है । मृत्यु के लिए तैयार रहना चाहिए । अभी बुलावा हो तो किसी में मोह, ममता रखने के सिवाय तत्काल चले जाना चाहिए ।
विवेक कहां से मिलेगा ? सत्संग कैसा हो ? जिसने सत्य को प्राप्त किया है, उसका संग करना चाहिए अथवा सतत् शास्त्रों का अध्ययन उससे मिलता है, सत् और असत् का विवेक । असत् को छोड़कर, सत् वस्तु आत्मा का ही संग करना चाहिए, उसे ही कहा जाता है सत्संग । किन्तु आजकल सत्संग बहुत से हो गये हैं । सत् पुरुष कोई बिरला है । भारत में बहुत से लाल पड़े हैं । जैसे यहाँ लाल गुफा में एक बंगाली संत ने 32 वर्षों की आयु में आकर 53 वर्ष भगवान का भजन किया ।
जाग्रत में कार्यों में प्रवृत्त होते हुए भी सदैव आनन्द में रहना चाहिए । स्वयं को शरीर न समझकर, फिर चाहे ध्यान किया जाय अथवा कर्म में लगा रहा जाय, तो भी सर्वदा एक रस आनन्द में रहा जा सकता है । कहोगे कि गृहस्थ में भी उस आनन्द रूप भगवान को प्राप्त किया जा सकता है ? हाँ, जैसे राजा जनक आदि ने गृहस्थ में रहते हुए भी ज्ञान प्राप्त किया । तो क्षीण बुद्धि वाला तत्काल शंका उठायेगा ।
बुद्धियाँ चार प्रकार की हैं । प्रारब्ध कर्म अनेक रहे पड़े हैं । जैसे अनाज के ढेर से कुछ खाया गया है, शेष खाना है तब जाकर अनाज का ढेर समाप्त हो । वैसे जीव के अनेक जन्मों के पाप पुण्य आकर इकट्ठे हुए हैं । जब वे समाप्त हों, तब ज्ञान प्राप्त करके जन्म मृत्यु से छूटेगा ।
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अध्याय 45
16 जून 1964 को आबू पहाड़ पर किया गया प्रवचन
महामुनि अष्टावक्र ने राजा जनक को उपदेश किया है कि न जाग्रत वाली सृष्टि सत्य है और न सपने वाली, दोनों मिथ्या हैं । चाहे मनुष्य समस्त संसार के साहित्य को पढ़ जावे, परन्तु जब तक आत्मज्ञान नहीं हुआ है, तब तक कुछ न हुआ । आत्मज्ञान के अतिरिक्त शांति नहीं मिलेगी ।
बिल्कुल सावधान होकर सत्संग सुनना चाहिए । मन को बिल्कुल एकाग्र करके, सुनाने वाले के सामने दृष्टि रखी जावे । हमने भी बहुत कष्ट सहन करके ज्ञान प्राप्त किया । गुरु की सेवा स्थान की सफाई, गौ-सेवा, पानी भरने आदि के काम किये थे, तब कहीं एक पाठ मिलता था । इतना होते हुए भी गुरु का डण्डा ऊपर से होता था । खुद को पाखाना (विष्ठा) भी उठाना पड़ता था । जब लहर आती है, तब सन्त अपने मुखारविन्द से ज्ञान की वर्षा करते हैं ।
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा अपना, तो मुझसे बुरा न कोय ।
जहाँ दया तहां धर्म है, जहां लोभ वहाँ पाप,
जहाँ क्रोध वहाँ काल है, जहाँ क्षमा तहां आप ।
दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान,
तुलसी दया न छोड़िये, जब लग घट में प्राण ।
सत् बराबर तप नहीं, झूठ बराबर न पाप,
जाके हृदय सांच है, ताके हृदय आप ।
तुलसी इस जग में आय के, कर लीजै दो काम,
देने को टुकड़ा भला, लेने को हरि का नाम ।
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अध्याय 46
17 जून 1964 को आबू पहाड़ पर किया गया प्रवचन
भगवान का हमें प्रतिदिन दर्शन हो रहा है, परन्तु हमें उसका ज्ञान नहीं । स्वामी जी, भला उसका स्वरूप क्या है ? बाबा, उसका स्वरूप आनन्द है । गहरी नींद में हमें प्रतिदिन दर्शन होता है । जो किसी भी विषय सम्बन्ध रहित शुद्ध आनन्द है, वही भगवान का स्वरूप है । स्वामी जी, भला उस आनन्द स्वरूप का जाग्रत में भी सदैव दर्शन हो सकता है । हाँ, शरीर को भुलाकर अर्थात् देह अभिमान त्याग करके भगवत् स्वरूप आनन्द का ही ध्यान करते रहना चाहिए अथवा काम में लगा रहना चाहिए, अर्थात् नाम स्मरण में तो फिर सदैव आनन्द ही आनन्द है । आनन्द स्वरूप भगवान के अतिरिक्त अन्य कुछ भी दिखने में न आयेगा ।
हमारी जान पारब्रह्म परमेश्वर है । वह सबकी जान है । पारब्रह्म ही विभिन्न भेष पहनकर अनेक रूपों में दर्शन दे रहा है । आनन्द ही आनन्द रूप भगवत् ।
ये तीन शरीर ही तीन हत्याएं हैं । उनसे जितना शीघ्र हो सके, उतना शीघ्र छुटकारा पाना चाहिए । स्थूल शरीर तो सौ वर्ष पूरे करके अग्नि में भस्म हो जायेगा, किन्तु सूक्ष्म शरीर में जो कर्म वासनाएं और अज्ञान रहा हुआ है, वह तो फिरता रहता है । तीसरा कारण शरीर तो बड़ा दुःखदायक है । जो अज्ञान है, वह इन तीन शरीरों को स्वयं समझने से बड़ी आपदा का कारण है । "मैं" से ही मेरा कहा जाता है 'किन्तु न मैं हूँ, और न मेरा' तभी ही भगवत् दर्शन होगा ।
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अध्याय 47
18 जून 1964 को आबू पहाड़ पर किया गया प्रवचन
समस्त आयु पुस्तक पढ़ने से, उधर सत्संग की एक घड़ी से समस्त वेदान्त के सार का पता पड़ जाता है ।
गुरु अर्थात् प्रकाश देने वाला । एक सौ चन्द्रमा उदय हों तो भी हृदय के भीतर प्रकाश नहीं कर सकते, भीतर का प्रकाश गुरु दे सकता है ।
पारब्रह्म, परमेश्वर आत्मा ही हमारी जान है, केवल आनन्द ही आनन्द रूप निर्गुण, निराकार और न दृश्य साकार ।
प्रथम आत्मा एवं परमात्मा में विश्वास रखना चाहिए । ब्रह्म सत्, जगत मिथ्या, जिस प्रकार रस्सी में सांप । मैंने जो कहा, वह सत् है ।
अनन्त ज्ञानी कोटि को निश्चय निज मत एक ।
एक अज्ञानी के हृदय में वर्तित मतों अनेक ।
एक ब्रह्म सत्, जगत मिथ्या, सत्य वाक्य गुरु वेद है । श्रद्धा उस विश्वास अर्थात् गुरु और शास्त्र जो कहते हैं, वे वाक्य सत्य है । ये अन्य जो निष्काम अथवा भक्ति, उपासना योग आदि किये जाते हैं, वे सभी साधन है भगवान प्राप्ति के लिए । मोक्ष का साधन एक ही ज्ञान है, ज्ञान से मोक्ष मिलता है ।
पहले विश्वास रख कर, तत्पश्चात शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए कि जो भी लिखा है, वह सत् है ।
मन मति न चलिए, मन है नीच ते नीच ।
विषय – लालच लाय के, डारेगा भर कीच ।
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अध्याय 48
20 जून 1964 को आबू पहाड़ पर किया गया प्रवचन
स्वयं को भगवान से भिन्न जानकर, जो उसकी पूजा आदि करता है, वह जन्म-मृत्यु को प्राप्त होता रहेगा, क्योंकि जो द्वैत मानेगा, वह भय को प्राप्त होगा । यह जो संसार में कहा जाता है कि भगवान की भक्ति आदि करो अथवा उसका नाम आदि जपो, यह केवल है लोगों को प्रवृत्त करने के लिए, जब तक अपने को समझे कि भगवान पारब्रह्म परमेश्वर एक ही खुद स्वयं हैं । मन को अस्ति, भाति, प्रिय स्वरूप दिखाते रहना चाहिए । इस प्रकार मन स्वयं ही थककर शान्त होकर बैठ जायेगा । तात्पर्य यह कि मन को सदैव उपरोक्त ध्यान में रखना चाहिए । उसे तत्पर रखना चाहिए । जो पदार्थ उसके सामने फिर कर आवे, उसमें अस्ति, भाति, प्रिय देखना चाहिए । नाम रूप को समझना चाहिए । जैसे जल में लहरें, रस्सी में सांप भासता है, किन्तु है नहीं । स्वप्न की सृष्टि देखते भी मिथ्या है अर्थात् असत् है । लहरों को छोड़कर उसके आधार पानी को देखो । जेवरों को छोड़कर, उसके आधार सोने को देखो, मिट्टी के बर्तनों को छोड़कर, मिट्टी को देखो । फिर जिस प्रकार लहरें जल रूप हैं, आभूषण सोना रूप है, बर्तन मिट्टी का ही रूप हैं, वैसे जगत ब्रह्म का ही स्वरूप है । जल और लहरों में कोई भेद है क्या, सोने और आभूषणों में भेद है क्या ? वैसे ब्रह्म और जगत में भी भेद नहीं है । एक ही ब्रह्म फिर आकाश की भांति असंग भी है, क्योंकि आकाश सब को धारण कर रहा है, तो भी असंग है । सूर्य का प्रकाश सब पर पड़ रहा है, परन्तु है असंग ।
प्रारब्ध के वेग के कारण ज्ञानी सब कर्म करता है, भोग भोगता है । नहीं तो अकर्ता और उपभोक्ता है । ज्ञानी को कोई लेप नहीं लगता । वह निर्लेप है ।
ज्ञान तीन घड़ियों में हो सकता है, चाहे ज्ञान भले ही युगों का हो, जैसे प्रकाश होने से अंधकार का तत्काल अभाव हो जाता है, वैसे एक घड़ी में श्रवण करके, दूसरे में मनन करके, तीसरी में निद्ध्यासन करके, दृढ़ निश्चय से ज्ञान हो सकता है ।
शरीर और नाम का अभिमान त्याग करके आत्म अभिमान रखना चाहिए, ताकि आत्म अभिमान ही रहे । अब यदि तुमसे कोई पूछे कि तुम्हारा नाम क्या है ? चाहे गीता तुम्हारे सर पर रखे तो भी कहोगे कि मेरा नाम घनश्याम है । वैसे जब स्वयं को आत्मा समझोगे, दृढ़ निश्चय रखोगे, तब चाहे तुम्हारे सर पर कोई गीता रखे तो भी कहोगे कि मैं आत्मा हूँ और न शरीर ।
ज्ञानी का शरीर प्रारब्ध अनुसार चल रहा है । उसे कोई इच्छा अथवा वासना नहीं है, वैसे इच्छा भी उत्पन्न नहीं होती, प्रारब्ध अनुसार वह बर्ताव कर रहा है । पारब्रह्म परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य कोई भी चीज नहीं है । सबके अन्तःकरण में साक्षी स्वरूप है । सबके भीतर मैं आनन्द स्वरूप बैठा हूँ ।
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अध्याय 49
24 सितम्बर 1966 को श्री किशनचन्द मयाराम की कोठी पर आगरे में किया गया प्रवचन
वीर वह है जो अपने कर्तव्यों का पालन करता रहे । किन्तु यह कायर होकर वन में कन्दमूल खाकर अपना जीवन व्यतीत किया तो भी वीरता कैसी । वीर वह, जो घर की भी करे तो हर की भी करे ।
'राहत माया में फिरत उदास, कहत कबीर मैं ताका दास ।'
कोई भी ऐसा व्यक्ति न होगा, जो चाहता होगा कि मैं आपदा में जाकर पथभ्रष्ट होऊँ । प्रत्येक अपने मार्ग पर आचरण करने की चेष्टा करता रहता है । नदी के तट पर पथिक अपना रास्ता लेकर जा रहा है तो नदी के मगरमच्छ उसे घसीट कर नदी के बीच में ले जाकर अपना शिकार बनाते हैं ।
उसी प्रकार काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार ये पांच शत्रु हैं, जो मगरमच्छ की तरह मुँह फाड़ करके हम पर समय-समय पर आक्रमण करते रहते हैं । उनसे बचने का कौनसा उपाय है, उसकी औषधि सरल है । उनका गढ़ है मन । यदि वह मन वश में हो गया तो फिर वे शत्रु कुछ नहीं कर सकेंगे ।
परन्तु मन को वश में कैसे किया जा सकेगा ? मन को वश में करने का उपाय है इन्द्रियों का दमन करना । इन्द्रियों को वश में करने से मन मुर्दा हो जायेगा ।
समझो कि तुम्हारे चित्त में आता है कि अमुक व्यक्ति की हत्या कर दूँ । तब तुम बिल्कुल शांत रहो । मन को आदेश दो कि भले उसे एक क्या परन्तु दस लकड़ियाँ लगाओ, किन्तु तुम शान्त रहो । फिर क्या होगा ? मन का कोई वश न चल सकेगा ।
हम सुन्दर नारी देखते हैं – मन में राग होने से उसे देखने की चेष्टा करते हैं । मन को कहो कि भले देखो, फिर भी देखो तत्पश्चात तुम आँखें नीची कर लो । परिणाम क्या होगा ? मन मुर्दा हो जायेगा ।
बाहर की राजधानी पर अधिकार सरलता से किया जा सकता है, किन्तु सच्चा शूरवीर तो वह है, जो भीतर की राजधानी पर अधिकार करे ।
एक सन्त पुरुष गया किसी राजदरबार में । वह अपनी मस्ती में हंस रहा था और इधर-उधर देख रहा था । राजा ने मन्त्री को कहा कि 'इस सन्त को जाकर समझाओ । वह देखो कैसा अनुचित व्यवहार कर रहा है ?
मन्त्री तत्काल दरबार से उठकर सन्त के पास गया और सन्त को कहने लगा कि सन्त स्वामी ! यह क्या कर रहे हैं ? सामने देख रहे हैं कि राजदरबार लगा हुआ है । राजा स्वयं दरबार में उपस्थित है । अधिकारी गण भी बैठे हैं । कुछ तो नम्रता अपनाइए ।
सन्त ने मन्त्री से कहा कि 'अपने राजा से पूछ कर बताओ कि मन आपके वश में है अथवा आप मन के अधीन हैं ?' मन्त्री ने राजा के पास जाकर सम्पूर्ण बात की । राजा तत्काल घबरा गये । मन्त्री को कहा कि 'हम तो मन के दास हैं । जैसे मन नचा रहा है, वैसे नाच रहे हैं ।' मन्त्री ने जाकर सन्त को यह संदेश दिया ।
सन्त ने सुनकर तत्काल चिल्लाकर कहा कि 'हाँ, यह क्या तुम्हारा राजा मेरे नौकर का भी नौकर है । लेकिन मैंने तो अपने मन को मारकर अपने अधीन कर लिया है । मन मेरा दास है ।
मन्त्री ने जाकर राजा से समस्त बात की । राजा बात समझ गया । वह सोचने लगा कि यह तो कोई सच्चा सन्त है । अतः तत्काल सिंहासन से उठकर, जाकर सन्त से क्षमा मांगी । सन्त ने राजा को दुःखी देखकर दया दृष्टि की और उसे आत्मिक बुद्धि देकर दोनों लोक सफल किये ।
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अध्याय 50
23 अप्रैल 1961 को श्रीकृष्ण गौशाला आगरे में किया गया प्रवचन
एक राजा डोली में सवार होकर युद्ध का सामान और सैनिक अपने साथ लेकर अन्य किसी बादशाह पर आक्रमण करने जा रहा था । मार्ग में एक वृक्ष के नीचे किसी सन्त को ईख चूसते हुए देखा । राजा ने मंत्री को आज्ञा दी कि इस दरिद्र को एक मोहर दे दो कि बढ़िया-बढ़िया भोजन लेकर खाए । मन्त्री सन्त को मोहर देने को था तो सन्त ने कहा कि "डोली में बैठे हुए दरिद्र को जाकर यह मोहर दीजिये ।"
मन्त्री ने जाकर राजा को यह बात बताई । इस पर वह डोली से उतर कर सन्त को कहने लगा कि 'महाराज ! मैं दरिद्र कैसे हूँ ? राजा के पास भी मोतियों की कोई कमी ? आशीर्वाद दीजिये कि मैं युद्ध में विजयी बनूँ ।'
सन्त ने राजा को कहा- 'हाथ में ठीकरी और कोयला लेकर आओ ।' राजा लेकर आया । तब ठीकरी पर कुछ लिखकर सन्त ने राजा को कहा कि 'यह लो, आंचल में डाल दो ।'
राजा ने प्रसन्नता के साथ वह ठीकरी ले ली । सन्त ने उसे कहा कि हे राजन ! बताओ कि दरिद्र आप अथवा मैं ? ईख के छीतरों में तो कुछ रस था किन्तु इस ठीकरी में कौन सा रस है, जो तुमने आंचल फैलाया ?'
राजा लज्जित होकर सन्त के चरणों में गिर पड़ा और कहा कि 'स्वामी, कुछ उपदेश दीजिये ।'
सन्त कहने लगे कि 'पीछे लौटो । अपने राज्य पर संतोष कीजिये । दरिद्र मत बनो । इतना धन होते हुए भी हत्यायें करने जा रहे हो । चलो तो जगत के पदार्थों का आपको अन्त दिखाऊँ ।
पहले उन्हें वहाँ ले गया, जहाँ टट्टियाँ थीं । राजा मुँह को कपड़ा देने लगा । तब सन्त ने कहा- 'आप मुंह को कपड़ा क्यों देते हो और क्यों भागता है ? विष्ठा तो आपसे भागती है और कहती है कि कल बाजार में फल और मिठाईयाँ बनकर रखीं थी । रात को एक जीव के संग में मेरा यह बुरा हाल हुआ है । हे राजन् फलों और मिठाईयों का अन्त यह है ।'
फिर उन्हें श्मशान में ले गये और कई हड्डियाँ और खोपड़ियाँ दिखा कर कहा- 'हे राजन् ! कुछ आपकी तरह राजा थे, जो हाथियों और घोड़ों पर चढ़कर बेपरवाह घूमा करते थे । उनके ये मुण्ड आकर देखिये कि कैसे धूल में पड़े हैं और कुत्ते और गीदड़ उनके ऊपर मूत्र छिड़क रहे हैं ।'
राजा यह सब हाल अपनी आँखों से देखकर और सन्त के वचन सुनकर चकित हो गया और सन्त के चरणों में गिर पड़ा और सन्त से उपदेश लेकर पीछे लौटकर अपने राज्य में रहकर विदेह मुक्त हुआ ।
कबीर कौड़ी-कौड़ी छोड़के, जोड़े लख करोड़ ।
चलती बार न कुछ मिलिया, लए लंगोटी तोर ।।
झूठ मां कहा करे, जग सपने जिउजान ।
इनमें कुछ तेरो नहीं, नानक कहियो बखान ।।
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अध्याय 51
3 दिसम्बर 1961 को जेतपुर में किया गया प्रवचन
"वह प्रभु दूर नहीं है, प्रभु तू है ।" बस, बात यह है जो बार-बार करके व्याख्या करनी पड़ती है, जैसे जिस मंजिल की ओर मनुष्य को जाना होता है, वहाँ उसे पहुँच कर, फिर कहीं जाना नहीं पड़ता । वैसे जिसने आत्मज्ञान, आत्मध्यान और आत्म आनन्द ज्ञान की मंजिल को पूरा करके, उस ध्यान और आनन्द में स्वयं को स्थित किया है और पूर्ण रूप से वहाँ पहुँच चुका है, उसे फिर किसी अन्य ओर नहीं जाना होता । उसका उद्देश्य पूरा हुआ । वह वहाँ पहुँच कर पूर्ण नित्य अखण्ड आनन्द में स्थित रहकर आनन्द प्राप्त करके, अपना मनुष्य जन्म सफल कर चुका और जीवित होते ही जीवन मुक्त होकर, विदेह मुक्ति को प्राप्त करेगा । सदैव के लिए जन्म-मृत्यु के दुःखों के चक्र से छूट करके अखण्ड ब्रह्म आनन्द के जाकर लीन होगा । जैसे जिस मनुष्य को बल और साहस है तथा पैसे की सामर्थ्य है, यह हवाई जहाज से यात्रा करके शीघ्र जाकर मंजिल पर पहुँचेगा । किन्तु जिसको धन आदि का बल अथवा साहस नहीं है, वह रेलवे मार्ग से स्टेशनों से होता हुआ, धीरे-धीरे बहुत समय के पश्चात वहाँ पहुँचेगा । वैसे जिसको बल, बुद्धि, साहस है, वह शीघ्र ही ब्रह्मानन्द में जाकर लीन होगा और जिसमें बल, बुद्धि आदि कम हैं, वह धीरे-धीरे उपासना आदि शुभ कार्य करते हुए, बहुत समय पश्चात वहाँ पहुँचेगा । किसी को रोक टोक नहीं है । जितना जिसमें साहस हो, चाहे आज ही ब्रह्मानन्द मोक्ष को प्राप्त करे, चाहे हजार जन्म ले, उसके पश्चात जन्म-मृत्यु से छूटकर मोक्ष पद प्राप्त करे । वह जैसा जिसका साहस होगा, वह उस मंजिल को प्राप्त करेगा । दूसरे से तो प्रत्येक प्यार कर सकता है, परन्तु जब कोई अपने आप से प्रेम करे, उस ज्योति स्वरूप में जलकर आनन्द में लीन हो जाये । जैसे पतंगा शमां पर मोहित होकर जलकर खाक हो जाता है, वैसे अपनी आत्म ज्योति में जलकर खाक है । ऐसे को मेरा नमस्कार है । 'न' अक्षर कोश से निकाल दो कि मोक्ष का यह काम कठिन है आदि । पुरुषार्थ करने से सभी काम पूर्ण हो जायेंगे ।
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अध्याय 52
आनन्द प्राप्ति हेतु कौनसी आवश्यकता
22 मार्च 1962 को बांटवा में किया गया प्रवचन
ये संसार की चीजें आनन्द रूप नहीं हैं । ये जो भी भोग हैं, वे दुःखों के कारण हैं । जिनसे दुःख मिले, उनकी जड़ नाश करनी चाहिए । उन्हें विचारना चाहिए कि दुःख किस कारण से उत्पन्न हुआ और उसके लिए अज्ञान को नाश करके सदैव सुख रूप आनन्द में रहना चाहिए । संसार स्वप्न की भांति है । गहरी नींद में सुषुप्ति में जो प्रतिदिन जाते हैं वह किसके लिए ? इसलिए कि वहां आनन्द मिलता है । जब सुषुप्ति वाली अवस्था जाग्रत में उत्पन्न हो, तब कहा जायेगा कि बराबर तप, दान, पुण्य करना आदि ठीक है और निष्काम शुभ कर्म करते रहना चाहिए । उससे हृदय शुद्ध व पवित्र होता है । दान आदि शुभ कर्म करने से स्वर्ग आदि लोकों के सुख मिलते हैं, परन्तु अन्धकार दूर नहीं होता । उसका एक ही उपाय आत्मज्ञान । प्रकाश के सिवाय अन्धकार नहीं जायेगा । भले ही छोटा बालक अथवा कोई भी दीपक जलाये तो अन्धकार दूर हो जायेगा । जब प्रकाश हुआ तो फिर क्या अन्धकार रहेगा ? कदापि नहीं रहेगा ।
प्रत्येक की दौड़ किस ओर है ? आनन्द की ओर । चाहे सब सुख मिलें, तो भी किसी से पूछोगे कि तुझे आनन्द चाहिए तो क्या कहेगा कि मुझे आनन्द नहीं चाहिए ? नहीं । वह कहेगा कि मुझे आनन्द चाहिए । धनवान भले ही अरबपति हो, उससे यदि पूछोगे, तो क्या कहेगा कि मुझे आनन्द नहीं चाहिए । करोड़पति भी सुखी नहीं है । सुखी वह है जो दो चार रुपये कमाकर, सदैव विश्राम और आनन्द में रहता है । तुम शरीर से कुछ ऊपर होकर देखो । तुम्हारा हृदय जब शुद्ध होगा, तब तुम्हें सब कुछ प्राप्त होगा ।
संसार सपना है, सब नाशवन्त है, ऐसा कहने से कल्याण नहीं होगा; परन्तु जो उसे बराबर जानता और समझता है, वही आनन्द को प्राप्त करता है । 'तब क्या स्वामी जी ! संसार को असत् जानकर छोड़ देना चाहिए ? क्या काम काज आदि व्यवहार न किया जाय ।' भले किया जाय, कर्म करते हुए भी अकर्ता रहना चाहिए । मन में कोई भी फल की इच्छा आदि अभिमान न करना चाहिए । अकर्ता, अभोक्ता होकर रहना चाहिए । पहले भी राजा महाराजा रह चुके हैं, जो राज्य कारोबार आदि सब काम संभालते हुए भी, अपने आनन्द स्वरूप में स्थित होकर मोक्ष को प्राप्त हुए हैं । आत्मज्ञानी कार्य करते हुए भी कुछ नहीं करते, वे सदैव आनन्द स्वरूप में स्थित होकर मोक्ष को प्राप्त हुए हैं । आत्मज्ञानी कार्य करते हुए भी कुछ नहीं करते, वे सदैव आनन्द स्वरूप में ही स्थित रहते हैं । यह जिन्होंने जाना, वही सत्य है । उससे ऊपर और कोई भी पद नहीं है । वह भगवान की बेटी से विवाह करके, भगवान को अपना ससुर बनाकर, सदैव उसकी बेटी से आनन्द का मजा लेकर सुखी हो ।
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अध्याय 53
24 अप्रैल 1961 को ताजमहल, आगरा में किया गया प्रवचन
नियम में बड़ी शक्ति है । अमृत वेला (ऊषा काल) को संत महात्माओं ने ब्रह्म मुहूर्त कहा है । यह समय बड़े भाग्यशाली को प्राप्त होता है । धन्य भाग हैं आप सत्संगियों के, जो नित्य प्रति नियमपूर्वक कई वर्षों से अमृत काल के समय सत्संग करते आ रहे हो, परन्तु आप जो सत्संग में इतनी सारी कथाएं सुन रहे हो, वह किसके लिए ? रामायण, गीता, वेद, शास्त्र सुनने के लिए रचे गये हैं, केवल सुनते रहना और सुनाते रहना और उन पर यदि अमल (आचरण) नहीं किया गया तो कोई लाभ नहीं ।
इलम कहते नहीं, अलफाज के पहचान को ।
इलम कहते हैं, जो बताये जिन्दगी के निशान को ।।
इलम अगर पढ़ लिया, आलम कहलाया तो क्या हुआ ।
जब तक उस पर अमल करना न आया तो क्या हुआ ।।
अमल (आचरण) के सिवाय इलम (विद्या) लूला, लंगड़ा व बेकार है । विद्या बिना अनुकरण के इस प्रकार है, जैसे केवट के बिना नाव । एक महात्मा ने परीक्षा लेने हेतु दो प्रेमियों को मूंग के दाने दे कर कहा कि भाई, यह हमारी अमानत अपने पास रख दो । एक दो वर्षों के बाद जब भी हम आयें, तब आपसे हम अपनी अमानत वापस ले लेंगे । इन दो प्रेमियों में से एक प्रेमी अन्ध श्रद्धालु था । उसने एक छोटी डिबिया में सन्त द्वारा दिये गये दाने डालकर उसे बन्द कर उसके ऊपर रुमाल लपेट कर, पालने में डालकर उसे रोज झुलाता और रोज धूप बत्ती करता रहा ।
परन्तु दूसरे ने उन्हीं मूंग के दानों को अपने खेत में जाकर बो दिया । इस तरह से साल दो साल में तो दो तीन बोरियाँ मूंग की हो गयीं । दो साल बाद जब वे सन्त वापस आये, तो उन्हीं में से जो पहले वाला अन्ध श्रद्धालु था, वह अपने घर मूंग की डिबिया ले आया और हर्ष के साथ संत को कहने लगा कि स्वामी जी ! आपकी अमानत को अपने प्राणों की तरह संभालता रहा हूँ और पालने में झुलाता रहा हूँ । सन्त ने कहा, "बेटा, दिखाओ तो सही मेरी अमानत का क्या हाल है ?" उस अन्ध श्रद्धालु ने रुमाल आदि खोलने के बाद जब उस डिबिया का ढक्कन खोलकर देखा तो उसे अफसोस हुआ कि मूंग तो घुन (कीड़े) खा गये । संत ने कहा कि यह क्या हुआ ? यही हाल तुमने हमारी अमानत का किया ।
इसके बाद दूसरे प्रेमी से संत ने कहा, "भाई तुम भी हमारी अमानत ले आओ ।'' जब वह प्रेमी सत्य वचन कह कर घर गया और ऊँट पर मूंग की बोरियाँ लाकर संत के सामने रखकर कहने लगा कि स्वामी जी ! यह रही आपकी अमानत । संत अमानत देखकर बहुत खुश हुआ और उसे आशीर्वाद देकर कहने लगा कि 'बेटा, कहे हुए वचन की कमाई न की गयी तो वचन किस काम का ।' मिश्री-मिश्री हजार बार कहने से मुँह मीठा होगा क्या ? इस लिए इलम (विद्या) वह, जिस पर आचरण किया जाय । नाना प्रकार के भोजन आगे रखे हों, परन्तु खाया न जाय तो तृप्ति कैसे होगी ?
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अध्याय 54
25 अप्रैल 1961 को श्रीकृष्ण गौशाला आगरे में किया गया प्रवचन
स्वामी जी से किसी जिज्ञासु ने प्रश्न किया कि 'स्वामी जी, भगवान कौन से पुरुषों पर प्रसन्न होते हैं ?' स्वामी जी ने उत्तर दिया कि 'भक्त, दाता, दीन और शूरवीर' इन चार प्रकार के पुरुषों पर भगवान प्रसन्न होते हैं ।
1. भक्त- ऐसा हो जो बालक अवस्था से लेकर जवानी और बुढ़ापे तक समस्त जीवन परमेश्वर की भक्ति में व्यतीत करे ।
2. दाता- ऐसा होना चाहिए, जिसके निर्धन होते हुए भी उसकी धर्म दान में प्रीति हो ।
3. दीन- ऐसा हो, जो बड़ा धनी और कुलीन होते हुए भी नम्रता धारण करे और अपने को सब से कम समझे ।
4. शूरवीर- ऐसा हो जो धर्म और देश सेवा के लिए अपना सर बलिदान करे और इन्द्रिय-जीत हो ।
उपर्युक्त चारों प्रकार के मनुष्यों पर भगवान प्रसन्न होता है ।
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अध्याय 55
26 अप्रैल 1961 के कृष्ण गऊशाला आगरे में किया गया प्रवचन
एक राजकुमार वन में गया तो वहां किसी महात्मा को उसने अत्यन्त शान्त देखा । तब उससे पूछा, "स्वामी जी ! मैं ऐसी शान्ति कैसे प्राप्त करूँ ?"
महात्मा ने कहा- "तुम तो राजा के पुत्र हो, किन्तु मेरा सम्बन्ध है राजाओं के राजा से । यदि उसका दर्शन चाहो तो पहले बताओ कि स्वयं कौन हो ? फिर मैं महाराजा को जाकर कहूँगा कि तुम्हें दर्शन दे ।"
राजकुमार ने अपना विजिटिंग कार्ड नाम व पते सहित निकाल कर उनको दिया ।
महात्मा ने कहा- "यह कार्ड तो कागज का टुकड़ा है । तुम बताओ कि वास्तव में तुम कौन हो ?"
मन्त्री से मन्त्रणा करके राजकुमार ने पहले कहा कि मैं मन हूँ । फिर कहा कि मैं बुद्धि हूँ, मैं प्राण हूँ ।"
महात्मा ने कहा- "मन और बुद्धि मेरे हैं । इसका अर्थ है कि तुम कोई अन्य वस्तु हो ।"
राजकुमार यह सुनकर विचार में पड़ गया । धीरे-धीरे उसे ज्ञात होने लगा कि "मैं आत्मा हूँ ।" फिर तो अधिक प्रश्न करने की उसे आवश्यकता नहीं रही और आत्मा में परमात्मा का दर्शन करके महाशान्ति प्राप्त कर ली ।
मन- मन एक शक्ति है । मन के अतिरिक्त मनुष्य कैसा ? मन को किसी काम में डाला जायेगा, तभी वह काम सफल होगा । भावना के सिवाय कार्य अधूरा रहता है । मन बुद्धि के साथ जुड़ा हो । बुद्धि भी भले बुरे की परीक्षा करने के लिए आत्मा से ज्योति प्राप्त करती है ।
शरीर रथ, मन घोड़ा, बुद्धि लगाम और आत्मा सारथी है । पापी और पुण्य आत्मा में केवल यह भेद है, जो पापी का मन, इन्दियों के स्वादों और बाह्य विषयों में दौड़ कर जाता है, परन्तु ज्ञानी अपने मन रूप घोड़े को बुद्धि रूप लगाम से पकड़ कर चलता है और उसकी बुद्धि आत्मा से प्रकाश प्राप्त करती है । ऋषि मुनि मन पर संयम रखकर, अपने में लीन होकर अपने को आत्मा का स्वरूप करके देखते हैं ।
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अध्याय 56
27 अप्रैल 1961 को श्रीकृष्ण गौशाला आगरे में किया गया प्रवचन
स्वतन्त्रता- स्वतन्त्रता का अर्थ स्वच्छन्दता नहीं है । हमारा भारतवर्ष 1947 ई. में तो स्वतन्त्र हुआ, लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हमें अब पूर्ण अधिकार मिला है कि जैसे चाहें, वैसे चलें । सच्ची स्वतन्त्रता तो यह है कि हम मन पर संयम रखें । ऐसा नहीं कि मन के वश में रहें और जैसे वह कहे, वह बिना विचार के करते रहें । फिर हम में मानवता कैसे रही ? यदि हमारा मन हमारे वश में न रहा तो फिर हमें मनुष्य कहलाने का क्या अधिकार है ? हमारा सौभाग्य है कि हमने पूर्व जन्म में कुछ ऐसे उत्तम कार्य किये हैं कि हमें यह मानव शरीर प्राप्त हुआ है ।
चौरासी लाख योनियों में मानव योनि उत्तम में उत्तम है । देवी देवता भी इस योनि के लिए इच्छुक हैं ।
कवि स्वामी साहब ने सिन्धी में श्लोक लिखे हैं, जिनका अर्थ है – मानव देह उत्तम है और किसी पूर्व पुण्य से प्राप्त की है, उसका रहस्य अपने मन में रखना । एक-एक श्वास अमूल्य है, कल्पित काम छोड़कर, जागकर नाम जपना ।
किन्तु हम उसकी कद्र नहीं करते ।
किन्तु विरले को ही मानव देह की कद्र है । यदि हमने भी आँख न खोली तो फिर कौन कसी योनि में हम अपना उद्धार कर सकेंगे ।
आजादी और गुलामी- तुम अपने कमरे में रहते हो, भीतर बाहर आ जा सकते हो, यह आजादी है । किन्तु जब दूसरों के अधीन रहते हो और बाहर से कोई व्यक्ति तुम्हारे कमरे को ताला लगाकर चाबी अपने हाथ में रखता है और जब उसकी इच्छा हो, तब वह ताला खोले, तुम्हें बाहर निकाल सकता है, तब वह है जेल खाना । तुम जब भीतर हो परन्तु भीतर से वही ताला लगाकर चाबी अपने पास रखते हो, तुम अपनी इच्छानुसार बाहर भीतर जा सकते हो, तब है सच्ची आजादी । उसी प्रकार तुम्हारा मन पर संयम है और सोच समझकर कुछ करते हो तो वह आजादी है, परन्तु यदि तुम मन के दास हो और उसके कहने के अनुसार चलते हो तो गुलाम हो, मन के वश में हो तो फिर आजादी किस की ? फिर तो गुलामी हुई ।
विदेश में देखो तो कितनी आजादी है । उठने बैठने, खाने, फिरने, खर्चने में हर प्रकार की स्वतन्त्रता । बेटी-बाप, बेटा-माता सभी कमा रहे हैं । पता नहीं कि कब जाते हैं, कहाँ जाते हैं । तात्पर्य यह है कि सब आजाद हैं । प्रत्येक अपने स्वार्थ से चल रहा है । ऐसी आजादी के कारण कितना नाश हो रहा है । चरित्र नष्ट हो रहा है । लोग नाना प्रकार के रोगों के शिकार हो रहे हैं ।
टी.बी., कैंसर, जोड़ों के दर्द ये रोग पहले भारत में कहाँ थे ? विदेशों से ही बीमारियाँ भारत वर्ष को उपहार रूप में मिली हैं । सिगरेट, चाय, शराब, लूट व हत्यायें आजकल साधारण चीजें समझी जाती हैं, लेकिन उन्होंने जितने अनर्थ किये हैं, वे किसी से छुपे हुए नहीं हैं । देशों के देश नष्ट हो गये हैं । सोच विचार से काम नहीं लेंगे तो यह आजादी दुःखदायी होगी ।
रजब एक सांस का, तीन लोक नहीं मोल ।
वृथा क्यों गंवाइये, ऐसा सांस अमोल ।।
अतः हमें चाहिए कि सदैव मन पर संयम रखकर संसार में चलें किन्तु संसार में लिप्त न हों . मानव द्वारा मानव की सेवा ही सच्चा धर्म है, वही सच्ची आजादी है
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अध्याय 57
18 जुलाई 1962 को नैनीताल में किया गया प्रवचन
नाम रूप सब मिथ्या है, शेष अस्तित्व है, वह किसका है ! वह अस्तित्व एक तुम्हारा ही सच्चा स्वरूप है । तुम ही सदैव स्थित, अखण्ड, परिपूर्ण, शुद्ध, पवित्र, सच्चिदानन्द स्वरूप हो;, उसके ही ज्ञान, उसके ध्यान, उसके आनन्द में ही सदैव स्थिर रहो, फिर नित्य आराम ही आराम रहेगा ।
अब तुमसे कोई पूछे कि तुम्हारा नाम क्या है, कहोगे कि मेरा अमुक नाम है । चाहे गीता तुम्हारे सिर पर रखकर कोई तुमसे पूछे तो भी कहोगे कि मैं अमुक हूँ । वैसे आत्मा के अभ्यास द्वारा जब स्वयं के दृढ़ निश्चय से सच्चिदानंद परमात्मा समझकर कहोगे कि मैं परमात्मा स्वरूप सच्चिदानंद रूप हूँ और यही मेरी जान है, तब तुम्हारा मानव जन्म सफल होगा । जैसे आत्मा चिदाकाश रूप है, वैसे आत्मा चेतन सर्वव्यापक भी है । सुषुप्ति अथवा गहरी नींद में कोई इच्छाएं, पदार्थ, सुख-दुःख आदि हैं क्या ? नहीं, वहाँ तो केवल शान्ति, आनन्द ही आनन्द है, आनन्द के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं । इसी प्रकार जाग्रत में दुःख-सुख आदि कोई भी कल्पना नहीं है । केवल मनुष्य ख्याल करके अपने को दुःखी सुखी आदि कल्पना करके दुःखी हो रहा है, नहीं तो सच्चिदानंद स्वरूप सदैव सब अवस्थाओं में एक रस है, उसमें रत्ती मात्र भी कलंक नहीं है ।
तुम कौन हो ! तुम शरीर नहीं हो । तुम कहते हो कि मैं लिख रहा हूँ, लेकिन तुम लिख नहीं रहे हो, परन्तु हाथ लिखते हैं । फिर कहते हो कि मैं सुनता हूँ, चलता हूँ, उठता हूँ, काम कर रहा हूँ, सोता हूँ इत्यादि । लेकिन कान सुनते हैं, टांगे चलती हैं, शरीर उठता है, हाथ काम कर रहे हैं, किन्तु तुम तो कुछ भी नहीं करते हो । ये सभी क्रियाकर्म शरीर तथा इन्द्रियाँ कर रही हैं और न तुम ! तो उन सभी इन्द्रियों और शरीर को जानने वाला, उनसे न्यारा, साक्षी स्वरूप, सत् चित् आनन्द रूप हो । आत्मा में किसी प्रकार की क्रियाएं आदि नहीं और अभोक्ता है । आत्मा का जन्म हो नहीं तो शरीर तथा इन्द्रियाँ आदि और उनका भोक्ता आदि धर्म कहाँ से आये । मैं न कुछ करता हूँ, न चलता हूँ, न खाता हूँ, न पढ़ता हूँ, न सुनता हूँ, न दुःखी सुखी होता हूँ । न मुझमें मोह, न अहंकार और न लोभ है । मैं असंग, स्वतन्त्र, शान्त स्वरूप, परम परमात्मा भगवत स्वरूप हूँ । अशान्ति, दुःख सुख आदि मेरे धर्म में नहीं है अर्थात् वे मुझ में हैं ही नहीं ।
ध्यान का अर्थ है आत्म चिन्तन, उसका स्मरण सदैव हर हाल में, हर चाल में, हर समय में स्थित रहना । गुण ही गुणों में वर्तते हैं । मैं तो सब गुणी से भिन्न असंग हूँ । यथा जवान का गुण है रस लेना, कानों का गुण है सुनना अर्थात् शब्द, त्वचा का गुण है स्पर्श अथवा छूना, नेत्रों का गुण है देखना अर्थात् रुप देखना, नाक का गुण है गंध अर्थात् सुगन्ध और दुर्गन्ध को मालूम करना । कर्म इन्द्रियाँ और ज्ञान इन्द्रियाँ ही हैं, जो अपने विभिन्न कार्यों में वर्तती हैं । मैं तो उन सभी को जानता हूँ । मैं ज्ञान स्वरूप, मैं उन सबसे न्यारा और असंग हूँ । मेरा इन गुणों, कर्मों और धर्मों से कोई भी सम्बन्ध नहीं है । मैं तो संसार रूप शरीर, माया, नाम और रूप सबको जानता हूँ । यह शरीर तथा संसार उत्पन्न ही नहीं है । जब पैदा नहीं है तब उसका देखना और होना कहाँ रहा ? मैं ही एक चेतन, आकाश रूप, सच्चिदानंद, शुद्ध, पवित्र, अखण्ड, अजर, अमर, अंगों से रहित परिपूर्ण व्यापक, निर्विकार, असंग, न्यारा, नाम रूप से रहित स्वयं प्रकाश स्वरूप, सुख का सागर, अमृत की धारा, परम आनन्द, परम शान्त स्वरूप हूँ । सबमें अस्तित्व सबमें ज्ञान मेरा है, सबमें आनन्द खुशी, प्रेम का अस्तित्व मेरा है, अन्य सब कुछ मैं ही हूँ । सबमें अस्तित्व, ज्ञान और आनन्द एक है । वही आनन्द स्वरूप ब्रह्म मैं हूँ ।
है एक सच्चिदानन्द, जो नाम रूप की पोशाक पहन कर बैठा हूँ । जैसे शरीर कपड़ों से भिन्न है, वैसे नाम रूप वाली भेष पहनते हुए भी आत्मा उससे भिन्न अर्थात् न्यारा है । हीरे को बचाने का यत्न करो । अब बहुत लीलाएं हुईं । मन को समझा कर वश में करो ।
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अध्याय 58
24 अप्रैल 1961 में श्रीकृष्ण गऊशाला आगरे में किया गया प्रवचन
विद्यार्थियों को चाहिए कि अपने चरित्र पर ध्यान दें । धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ-कुछ गया, किन्तु चरित्र गया तो सब कुछ गया । अतः चरित्र ही है, जो मनुष्य को बनाता है ।
सिनेमाओं के कारण चरित्र बिगड़ता है । सिनेमाएं बन्द हो जायें तो राम राज्य हो जाय । प्राचीन काल में बचपन से ही धार्मिक शिक्षाएं दी जाती थीं । ऐसे भी शूरवीर थे, जो शेरों से लड़ाइयाँ करते थे । रानी मदालसा जैसी माताएं बालकों को त्याग की लोरी देती थीं । जब उसके विरुद्ध छोटे बच्चों को डराया जाता है कि "बकनी आती है, तुझे हाऊ न उठा के ले जाय ।"
माता पिता ही हैं जो बालकों का सुधार करते हैं । वे मानो एक प्रकार के माली हैं । इन दोनों में से माता का प्रभाव अधिक होता है । गर्भ के भीतर बालक पर माता के खाने पीने तथा विचारों का प्रभाव पड़ता है, इसलिए बचपन से ही उन्हें सत्य मार्ग पर चलने की शिक्षा देनी चाहिए । अच्छी-अच्छी तथा स्वास्थ्य और ब्रह्मचर्य के विषय पर उन्हें पुस्तकें पढ़ाई जाये । उन्हें कुश्ती सिखानी चाहिए । उनके खानपान पर ध्यान देना चाहिए, जिससे वे स्वस्थ रहें ।
उन्हें व्यर्थ के जेब खर्च देकर चटोरा नहीं बनाना चाहिए । उनके चरित्र पर अत्यन्त अधिक ध्यान देना चाहिए । देखना चाहिए कि वे व्यर्थ समय तो नहीं गंवाते । कोई बुरी आदत तो धारण नहीं करते । धार्मिक शिक्षा देने से चरित्र का निर्माण होता है । उनके वातावरण पर भी ध्यान देना चाहिए । अक्सर देखना चाहिए कि जैसे कोई भी गंदा शब्द मुख से न निकाले । सबसे मधुर बोलना, बड़ों का आदर करना, आज्ञाकारी बनना, किसी को भी न सताना, झूठ न बोलना, चुगली न मारना, वैर-ईर्ष्या न रखना, सदाचारी होना सीखें, दैवी सम्पदा के गुण उनमें डालने चाहिए । स्मरण रखिये कि बालक सुधरे तो भारत सुधरा ।
दूसरों के दोष न जांचोः- सारा जग सुधरे लेकिन यदि हम न सुधरे तो कुछ भी न हुआ । अतः सर्वदा अपना ख्याल रखना चाहिए । सदैव प्रातःकाल को नींद से उठने के समय परिपूर्ण परमात्मा के समक्ष प्रार्थना करनी चाहिए कि हे दयालु स्वामी ! मुझ पर कृपा कीजिये, जैसे मैं अपने दोष देखूँ और दूसरों की बुराइयों पर दृष्टि न पड़े । सदैव गुण ग्राहक बनूँ ।
राम जैसे पुत्र बनो और न रावण जैसे । प्रत्येक अपने को ठीक बनाये । ऐसा न समझना चाहिए कि मैं अकेला हूँ और अकेला क्या कर सकता हूँ । स्वामी विवेकानन्द अकेले थे । गाँधी महाराज अकेले थे । भक्त कंवरराम अकेले थे । फिर भी कैसे न आज तक उनका नाम अजर अमर है ? आज तक उनकी बरसियाँ मनाई जाती हैं । एक अच्छा आलू बोया जायेगा तो उससे वैसे ही सैंकड़ों मन पैदा हो जायेंगे । एक अच्छे आम की गुठली बोने से हजारों अच्छे आमों के वृक्ष पैदा किये जा सकते हैं ।
अहिंसा परमो धर्मः- यदि अहिंसा का पालन करें तो एक भी जेलखाना न रहे । फोजदारी कोर्ट ही बंद हो जायें । नये-नये कानून नहीं बनते ।
सत्य का पालनः- यदि ब्रह्मचर्य का पालन करें तो हस्पतालें आदि बन्द हो जातीं । फिर कोई बीमार न होता । डॉक्टरों के अधीन ही नहीं बनते । कई वर्ष जो विद्यार्थी अनुत्तीर्ण ही नहीं होते, उनका बल, बुद्धि तेज होने के कारण मस्तिष्क काम करने से थक जाता है । परिणाम यह होता है कि वे कई वर्ष लगातार परीक्षाओं में अनुत्तीर्ण होते रहते हैं और बार-बार चढ़ाइयाँ करते रहते हैं ।
मन को बुद्धि द्वारा ठीक रखोः- बुद्धि द्वारा देखो कि मन में कौन से दोष प्रवेश कर रहे हैं । जैसे बीमार का डॉक्टर ऑपरेशन करते हैं । वैसे बुद्धि द्वारा मन का आपरेशन करके मन को ठीक करो । मन में जो मैल भरा पड़ा है, इतनी सारी जो गंदगियाँ भीतर भरी पड़ी हैं, उन्हें बाहर निकालने का यत्न करो ।
मन ही सुख और मन ही दुःख देता है । किसी वस्तु में सुख नहीं, यदि होता तो फिर ज्वर में हलुवा क्यों नहीं भाता है ? ज्वर में जीभ का स्वाद ही बदल जाता है और स्वादिष्ट वस्तु भी कड़वी लगती है । चेतन आत्मा की शक्ति द्वारा बुद्धि का विकास होता है । दूसरों के दोष न देखकर, एक-एक करके स्वयं से दोष निकाल करके, अपने को दोष रहित बनाओ । जब तक मन में दोष होंगे, तब तक सुख की प्राप्ति कहाँ ! कई वर्ष भी तुम मालाएं फिराओ, जाप जपो, रिद्धियाँ सिद्धियाँ इकट्ठी करें, किन्तु जब तक मन मलीन होगा, तब तक आनन्द किसका ?
मन मैले सब कुछ मैला होय, तन धोय मन अच्छा न होय ।
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अध्याय 59
24 मार्च 1966 को जयपुर में श्री खटणमल अमर दिनेमल के घर में किया गया प्रवचन
संसार में जो वस्तुएँ देख रहे हैं वो क्या हैं ? वे सभी पानी की लहरे हैं, उनको समझना है । यह कहाँ से मालूम होगा ? सत्संग से । हम यदि एक भी पंक्ति सत्संग की सुने, समझें और उस पर आचरण करें तो हमारे बेड़े पार हो जायें ।
गुरु वसिष्ट जी ने उत्तर रामायण में कहा है कि "यह सत्संग महा धर्म है । जिसने धर्म का रूप न देखा हो तो वह सत्संग देखे ।" सत्संग ऐसी चीज है, जो बाल्मीकि जैसा पापी और हत्यारा सत्संग से तर गया और बड़ा ऋषि गिना जाता है । उन्होंने रामायण नामक जो काव्य लिखा है, वह महाभारत काव्य, जो संस्कृत कविता में लिखा हुआ है, उससे उत्तम है, महाभारत को पाँचवाँ वेद कहा जाता है । उसको पढ़कर देखने से जानोगे कि बाल्मीकि रामायण की कविता उससे अधिक अच्छी है ।
रामायण भी कई प्रकार के हैं । महाराज भोज के पास 1100 पंडित थे, उनमें से कालीदास बड़ा विद्वान था । वह राजाओं की प्रशंसा की पुस्तकें लिखकर, उनसे पैसे लेते थे । एक भक्त ने उसे कहा कि व्यर्थ की पुस्तकें लिखकर पैसे लूट रहे हो । इससे तो सत्संग की पुस्तकें लिखो, जिसमें भगवान की स्तुति हो । इस पर कालिदास ने रघुवंश काव्य लिखा, जो एक रामायण है, अन्य रामायण हैं अदीभूत रामायण, हनुमान शटक रामायण इत्यादि ।
एक गांधी सेठ था । गांधी अर्थात् पंसारी । जैसे मोहनदास गांधी के पूर्वज पंसारी थे, इसलिए उनका वंश गांधी कहलाता है । ऐसे सेठ की आदत थी कि वह प्रतिदिन प्रातः सायं नियम से कथा सुनने जाते थे । उसने अपने पुत्र को कहा- "मुझमें तो पिता जी ने कथा सुनने की डाली है । यदि नहीं जाता तो ऐसा नहीं कर सकता, जैसे अन्य आदतें छोड़नी कठिन लगती हैं । परन्तु तू कभी कथा सुनने नहीं जाता, मेरा ही बहुत समय ऐसे ही जाता है । लड़के ने उत्तर दिया 'सत् वचन ।"
एक दिन संयोग से सेठ से उसके पुत्र को दुकान की आवश्यक बात पूछनी थी, अतः दरबार में गया, जहाँ कथा होती थी । वहाँ उसके कान पर आवाज पड़ी कि "देवता की छाया नहीं पड़ती ।" ये शब्द सुनने के पश्चात हटकर बाहर खड़ा हो गया और दिल में कहा कि मुझे तो कथा सुननी नहीं है, जो पिता जी का आदेश है । लेकिन वे शब्द उसके दिल पर अंकित हो गये । फिर भगवान को पुकारा कि पिता जी को बाहर भेजो । उसका पिता भी थूकने के लिए वहाँ बाहर आया । उसे उसके पुत्र ने संकेत दिया, जो आया और उससे वह बात पूछ कर वापस गया । चार पाँच वर्ष के पश्चात सेठ का स्वर्गवास हो गया और उसका पुत्र बुरे संग में फंस कर सब बुरी आदतें सीख गया ।
रामायण में लिखा हुआ है कि बुरे संग से बचो, क्योंकि रानी कैकेयी नेक स्त्री थी, किन्तु मंथरा दासी के बुरे संग में खराब होकर राम को वनवास भेज दिया ।
सेठ का पुत्र भी बुरे संग में आकर सब सम्पत्ति गंवा बैठा, फिर चोरी करने लगा । एक दिन राजा के महल से साढ़े तीन लाख रुपये के जवाहर और स्वर्ण की मुद्राएं चोरी करके एक पुरानी जगह में खड्डा खोद कर गाड़ दिये । राजा ने उसके लिए घोषणा की जो चोर और चोरी हुए माल की सूचना देगा, उसे पचास हजार रुपये पुरस्कार दिया जायेगा ।
यह पुरस्कार किसी ने भी नहीं लिया । किन्तु एक धूर्त स्त्री ने लेकर रखा और राजा को कहा कि मुझे एक हाथी, एक त्रिशूल और वस्त्र दीजिये । वे लेकर, देवी का रूप धारण करके हाथी पर चढ़कर शहर में घूमने लगी । प्रतिदिन 15-20 घरों में जाकर जांच करती थी ।
उधर सेठ का पुत्र चोरी किये गये गाड़े हुए धन की खबर लेता रहता था । एक दिन वह देवी हाथी पर सवार होकर सेठ के पुत्र के घर आई । सेठ के पुत्र ने जो सत्संग में एक वचन सुना था कि देवताओं की परछाई नहीं पड़ती, उस वचन के याद पड़ने पर उसने देवी को जांचा । देखा कि उसकी परछाई पड़ रही है । उसने दिल में सोचा कि यह देवी नहीं है किन्तु यह झूठी है । अतः तलवार निकाल कर नकली देवी को बालों से पकड़कर मारने के लिए तैयार हुआ । इस पर उस देवी ने कहा कि "मुझे मारो नहीं, मैं धूर्त स्त्री हूँ ।" उसने उत्तर में कहा, "तुमने भी कइयों को धोखा दिया है, मैं तुझे नहीं बख्शूँगा ।" सो तलवार से उसे काट दिया और हाथी को डंडे लगाकर दौड़ा कर निकाल दिया ।
तात्पर्य यह है कि एक वचन से उसे तीन लाभ हुए । एक तो उसकी लज्जा शर्म बची और फांसी से छूटा । दूसरा उसका धन बचा और तीसरा उसकी भावना शुद्ध हुई । उसने प्रण किया कि भविष्य में कथा सुनूंगा, सत्य बोलूँगा तथा सच की कमाई करके खाऊँगा, अब उसने समझा, "तुझे क्या गैर से मतलब, तू अपनी तोड़ निभाता जा ।"
उसने निश्चय किया कि गड़ा हुआ धन वापस जाकर उसे दूँगा जिसका चोरी किया है । जिसे बुद्धि से दृढ़ किया जाता है वह है निश्चय । सेठ का पुत्र वह धन लेकर राजा के पास गया । रास्ते में द्वारपाल ने उसे रोका किन्तु उन्हें धन दिखाकर बताया कि राजा को देने वाला हूँ । धन लेकर राजा के सामने जाकर रखा और पूर्ण बात सुनाई । राजा सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुआ ।
फिर मंत्री को आदेश दिया कि इसे एक अच्छा बंगला रहने के लिए दो और इसके लिए एक नौकर रख दो । इसके अतिरिक्त एक विद्वान पंडित भी रख दो, जो इसे प्रतिदिन कथा सुनाये । जैसे तुलसी का पौधा सारे बगीचे के समान है, इसी प्रकार उसके सभी कार्य सिद्ध हुए । आत्म ज्ञानी एवं सतोगुणी पंडित से प्रतिदिन कथा सुनकर सतोगुणी हो गया और मोक्ष प्राप्त किया ।
अपने भले के लिएः- भारत भूषण पंडित मदन मोहन मालवीय कहते थे "ऐ भारतवासी ! यदि अपना भला चाहते हो तो प्रत्येक गांव में व्यायामशाला, कथाशाला, विदयाशाला, सत्संग सभा खोलिये । सत्संग सभा होगी तो उससे सब जानकारी मिलती रहेगी, फिर उस प्रकार आचरण करेंगे ।
चाय बीड़ी और सिनेमा- आदत एक बार पड़ जाती है तो फिर छोड़ना कठिन हो जाती है । जिस प्रकार सेठ को सत्संग में जाने और कथा सुनने की आदत थी तो रुक नहीं सकता था । इस प्रकार सिगरेट एवं बीड़ी पीना, चाय पीना और सिनेमा देखना ये बुरी आदतें हैं, खराब एवं हानिकारक हैं । सिगरेट से, टी.बी. और कैंसर जैसी अनेक दूसरी बीमारियाँ होती हैं । अंग्रेज चाय सिगरेट मुफ्त में देकर लोगों को आदती बनाकर, करोड़ों रुपये भारत के अपने देश ले गये । अतः तुम इनको छोड़ो । पहले टी.बी. किसी राजा अथवा शाहूकार को होती थी, किन्तु अब तो ऐसी बीमारियाँ घर-घर में हो गई हैं ।
डॉक्टर बहुत तो बीमारियाँ भी बहुत । नशा निकला है निकार शब्द से । अतः उन्हें छोड़ो । मेरी रली है कंधे पर और रोटी राज्य पर । देश और पहाड़ घूम रहा है, वे खबरें सुन रहा हूँ और बता रहा हूँ । सिनेमा ने भी सारे मुल्क का सत्यानाश कर दिया है । पैसे भी जायें और बीमारियाँ भी खरीद की जायें । भद्दे-भद्दे गाने और खराब चित्र न देखने चाहिए ।
लीलाशाह जब बीस वर्ष का था तब प्रतिदिन साठ बीड़ी पीता था । एक डॉक्टर ने उसे बताया कि बीड़ी पीने से 35 बीमारियाँ होती हैं । पहले रक्त खराब होता है । तब लीलाशाह ने क्या किया ? बीड़ियाँ पीना बन्द कर दिया । सत्य तो सबको कहना चाहिए । नानी को भी सत्य कहना चाहिए, भले ही वह छिपाकर पेड़ा न खिलायेगी और क्या करेगी ? लीलाशाह ने मन को कहा कि बीड़ियाँ मांगोगे तो तुझे भोजन नहीं दूँगा और यदि भोजन मांगोगे तो तुझे बीड़ियाँ न दूँगा । जाकर लीलाशाह से पूछो । तत्पश्चात उसने बीड़ियाँ पीना छोड़ दीं । आज पच्चीस वर्ष का है, परन्तु उसने फिर बीड़ियाँ न पी हैं ।
सत् दर्शन- तुम इधर क्यों आते हो ? कहोगे कि "स्वामी जी, आपके दर्शन करने के लिए । देखा मुख हुआ सुख । यदि ऐसा है तो तुमने मेरा मुख देखा, अब जाता हूँ । सदैव बचो । ऐसा नहीं है । ध्यान देकर सुनो । यदि किसी को बुरा भला कहो, तो भी उसे कहो कि तेरी नौका तरे" ऐसे बुरा भला कहने से भी आशीर्वाद दो ।
"कबीर दर्शन सन्त का, साहिब आवे याद ।"
सन्तों के दर्शन करने से सच्चा परमेश्वर याद आता है । तुम कहोगे कि स्वामी जी, मन स्थिर नहीं होता । आप हमें याद दिलाते हो तो सन्त के पास जायें तो उन्हें सुनना चाहिए । सन्त बनना कठिन है । तुम कहोगे कि हम तो आपको सन्त समझते हैं । अरे ! मुझ में तो अब तक सन्तपने के थोड़े लक्षण हैं, तो भी तुम सन्त समझते हो; किन्तु यदि सन्तपने के सभी लक्षण आ जायें तो पता नहीं कि कौन सा पद मिले और पता नहीं कि कहाँ होता ? सन्त तुकाराम वाले भी बड़े सन्त हुए हैं । क्षत्रियों में सन्त सेवाराम हुआ है ।
मानव बनो- मानव बनो, मानवता के गुण सीखो और प्राप्त करो । इन्सान वह है, जो सबका भला सुने और करे । मीरा ने कहा है कि "जो निन्दा करे हमारी, नरक पावे सोई, आप जाइये नरक में पाप हमारे धोई ।" आत्म अर्थात् अपना स्वयं । कोई विरला होगा, जिसने अपने आपको पहचाना होगा । प्रत्येक कहेगा कि मैं सही हूँ । तुम कहोगे कि स्वामी जी, यह बात आवश्यक है क्या ? अरे हां । जिसने स्वयं को न पहचाना, वह पशु है ।
आनन्द यह चाह रखो कि सदैव रहने वाले आनन्द में डूबे रहो । आलस्य छोड़ो । भगवान में प्रेम जगाओ । प्रति दिन उठते समय और रात को सोते समय 108 बार 'हरि ॐ तत् सत्' जपो । देखो भगवद् गीता अध्याय 17 श्लोक 23 । कोई भी काम आरम्भ करने पर और भोजन खाने से पहले 30-40 बार भगवत नाम जपो । तात्पर्य यह है कि घूमते-फिरते, काम करते हुए ईश्वर नाम उच्चारण करो । पिछली भूलें सब डाल दो खड्डे में, किन्तु भविष्य में भूल न करो । सिन्धी कवि सामी साहब कहते हैं, जिसका अर्थ है कि बीती वह बीती, शेष सत् रहन सहन रखो । प्रियतम को घुसकर देखो । मनुष्य देही, फिर तुझे नहीं मिलेगी ।
मनुष्य शरीर प्राप्त करके यदि तुमने सद् स्वभाव धारण न किये तो फिर संसार में आकर तुमने क्या किया ? हृदय में ज्ञान के सूर्य को जगाना चाहिए । ये संसार के पदार्थ पानी की लहरें हैं और भगवान एक सागर है । इस सागर को भुलाकर लहरों में बह जाते हैं । भगवत ध्यान में रहो और उसकी स्तुति करो । साधु वासवानी कहते थे कि सब जाकर डूबो ! किस में ? भगवत प्रेम रूप सागर में । यदि भगवान में डूब जाओगे तो जन्म-मृत्यु के दुःखों से छूट जाओगे । मदालसा ने कहा था कि जो मेरी कोख से जन्मे, वह फिर पैदा न हो । इसके लिए उसने लोरी दी थी । चुडाला को भी ज्ञान की बातें बताती थी तो राज्य भी चलाती थी और राजा को ज्ञान देकर, उसका बेड़ा पार कर दिया ।
तुलसीदास को भी उसकी स्त्री ने कहा कि जैसी इस शरीर में प्रीति रखी है, यदि ऐसी भगवान से रखो तो मंजिल पर पहुंच जाओ । इसी प्रकार नारियों ने नर सुधारे और तारे ।
"लाठी चरवाहे की, भाग्य परमात्मा का ।"
माताओं को परामर्श- माताओं को कहूँगा कि पतिव्रत धर्म करने के लिए पति की सेवा सीता की भांति करो । वह राम के साथ महल छोड़कर वन में गई थी ।
दो बढ़ई मित्र एक दूसरे से बिछुड़ गये । कुछ वर्षों के पश्चात एक ने दूसरे को लिखा कि अमुक दिन पर तुम्हारे पास आऊँगा । समय पर उसके पास आया और आकर देखा कि यह मित्र तो जवान और स्वस्थ बैठा है, परन्तु मैं इससे 15 वर्ष छोटा, फिर भी बड़ा एवं बूढ़ा लग रहा हूँ ! उससे हाल पूछा । इस पर उसने उत्तर दिया कि 'यह सब तुम्हारी भौजाई की कृपा है, जो उसने मुझे इस तरह सुखी रखा है, जिस भांति राम को सीता ने । कहो तो प्रत्यक्ष दिखाऊँ ।' उसने भी कहा कि प्रत्यक्ष दिखाओ ।
उसने कहा कि अच्छा देखो । वह भोजन पका रही थी, उसे आवाज देकर कहा हथौड़ा लेकर आओ । सात मास का गर्भ था, तो भी भोजन छोड़कर हथौड़ा ले आई । जैसे ही दरवाजे पर आई तो पति ने उसे कहा कि शीशा तोड़ दे । पत्नी ने वहीं शीशा तोड़ दिया । पति ने उसे कहा कि "तुमने यह क्या कर दिया ? ढाई रुपये नाश कर दिये । फिर मित्र की ओर देखकर कहा- भाई ! ऐसी स्त्री मुझे मिली है, जो मिनट में ढाई रुपये नष्ट कर दिये । सब भाग्य की बात है !" कोई अन्य होती तो उसे उत्तर देती कि तुमने कहा, तभी मैंने शीशा तोड़ा; किन्तु वह अतिथि के सामने डांट सहन करके, जाकर भोजन पकाने लगी । यह दशा देखकर मित्र ने कहा- तुम भाग्यवान हो कि तुम्हें ऐसी गुणवती पतिव्रता स्त्री मिली है । अतः तुम स्वर्ग में हो । तुम्हारे कुछ पुण्य किये हुए हैं । जिस पत्नी को अच्छे स्वभाव वाला व सुशील पति मिला तो समझो कि उसने भी कुछ पुण्य किये हुए हैं ।"
मित्र ने कहा कि "इसके कारण मैं सर्वदा प्रसन्न रहता हूँ, स्वास्थ्य भी अच्छा है । सब तुम्हारी भाभी के कारण है ।
माताओ, तुम भी इस उदाहरण से शिक्षा ग्रहण करो । घर को स्वर्ग बनाओ और पति की सेवा करो । साधारणतः कहा जाता है कि "बालक सुधरे तो जग सुधरा" । लीलाशाह कहता है कि "घर सुधरा तो जग सुधरा ।" जिस घर में झगड़ा है, उसका प्रभाव घर पर, पड़ोस पर, गांव पर और समाज पर पड़ता है, जो पाप उस पर पड़ता है । घर का काम काज करो, चर्खा चलाओ, चक्की पीसो, भोजन बनाओ और कढ़ाई का काम करो । साथ-साथ भगवान का नाम भी लेती रहो । तुम्हें किसी भी समय क्रोध आये तो मौन धारण करो अर्थात् चुप होकर बैठो और बोलो नहीं । घर में झगड़ा न करो । घर की सफाई करो । बच्चों को पालन अच्छी तरह करो और उन्हें शिक्षा दो । जो स्त्रियाँ घर को स्वर्ग बनायेंगी, वे स्वर्ग में जायेंगी । विवाह में दहेज न लो । त्योहारों पर कुछ मांगो नहीं । जो मिले, उस पर प्रसन्न रहो, सहानुभूति करो ।
"कर भला तो होवे भला ।" स्मरण रखो कि तुम्हारे बच्चे को सुलक्षणी साथिन मिली तो तुम्हें सारा दहेज मिला ।"
सेवा- मैं तुम्हें ये वचन सुनाता हूँ, यह भी सेवा है । तुम कहोगे कि "स्वामी जी, सेवा का अभिमान होगा ?" अरे नहीं । क्योंकि मैं समाज का ऋणी हूँ । सेवा करके समाज का ऋण उतार रहा हूँ । परोपकार तब करूँ, जब ऋणी न होता । गृहस्थ आश्रम बड़ा है । गृहस्थ में रहकर सेवा करो । यदि गृहस्थी न होते तो मैं पैदा ही न होता । मेरी बातें पसंद आती हैं अथवा नहीं ? छः वर्षों के पश्चात भी मेरी बातें अच्छी न लगें तो लोटा कर मेरे कर्म में फेंकना ।
आत्मा और वैराग्य- आत्मा अमर है । यह शरीर है जो जन्मता और मरता है । जीव एक शरीर छोड़कर दूसरा धारण करता है । मन को अपना नौकर बनाओ । जो ईश्वर को याद नहीं करता, वह शैतान है । आत्मा है आनन्द स्वरूप और अन्य सब लहरें । अतः संसार के विषयों में उलझो नहीं । ये लहरें जहाँ से आती हैं, उसे देखो । यह घर मुसाफिर खाना (सराय) है । अच्छे कर्म, अच्छे विचार, अच्छा संग और अच्छे संकल्प करो ।
घर मन्दिर तथा कर्म पूजा- एक व्यक्ति को पाँच बेटे थे । जिनमें से चार को पहले ही दहेज लेने के सिवाय विवाह करवाया था, अन्तिम पाँचवें के लिए घर ढूँढने लगा । आखिर एक कन्या का उसे पता लगा कि वह देवी रूप भगवान की भक्त है । घर के सब कार्य भोजन बनाना, सिलाई, कढ़ाई और घर चलाना आदि खूब जानती है । उसी से अपने पुत्र का विवाह करवाया । जब वह कन्या विवाहित होकर ससुराल में आई तो देखती है कि चारों बड़ी देवरानियों में झगड़ा लगा पड़ा है । उसने दिल में कहा कि कैसे घर में आकर फंसी हूँ ।
एक दिन भीतर से आवाज आई कि इस घर ने अच्छे कर्म किये हैं जो तुम्हारे जैसी सुलक्षणी बहू उन्हें मिली है और तुम्हारे यहाँ आने से पास वाले 108 गांवों का भला होगा । यह सुनकर वह धैर्य से काम काज करती थी ।
उसने बड़ी देवरानी से कहा कि तुम काम न करो, मैं तुम्हारा काम करूँगी । इस प्रकार दूसरी को, फिर तीसरी को और अन्त में चौथी का काम भी स्वयं करने लगी । चारों देवरानियों से काम छुड़ाकर, घर का समस्त कार्य स्वयं अकेली करती थी और सायं को उन्हें नियम से रामायण की कथा सुनाती थी । बीच-बीच में उन्हें गीता का ज्ञान और सुखमनी शिक्षा भी सुनाती थी । अतः घर से झगड़ा, द्वेष, ईर्ष्या बिल्कुल चले गये और सभी का आपस में प्रेम बढ़ा और छोटी बहू को प्यार करने लगीं ।
चार पांच मास के पश्चात उसकी सास ने कहा - "हे बहुओ ! कान खोल कर सुन लो, वह छोटी बहू ठगने वाली है, जो तुम्हें ठग रही है ।" सास की बात सुनकर वे आश्चर्य में पड़ीं और आपस में बोलने लगी कि यह तो है । काम काज तो स्वयं करती है, हमें हाथ लगाने भी नहीं देती और प्रेम से कथा वार्ता भी सुनाती है । सास ने फिर कहा - "वह बराबर घर का काम काज कर रही है, परन्तु घर है भगवान का मन्दिर और घर के काम हैं भगवान की पूजा । अतः वह छोटी बहू, सभी काम करके तुम्हारे सब पुण्य ले जाती है । तुम स्वयं को संभालो ।
यह बात सुनते ही चारों बड़ी बहुओं की आँखें खुलीं और उस दिन के पश्चात सभी घर का काम मिलकर करने लगीं और बड़े प्रेम से आपस में चलने लगीं । प्रतिदिन सायं की कथा सुनती रहती थीं । इस प्रकार वह घर नरक से स्वर्ग बन गया ।
मातृ शक्ति- माताओं में शोभा, शक्ति और श्रद्धा पुरुषों से अधिक है । वे सभी काम कर सकती हैं । वे अबलाएं नहीं किन्तु सबलाएं हैं । स्त्री घर की रानी है । गृह स्वामिनी अर्द्धांगिनी है अर्थात् पति का आधा शरीर । "एक सुमति तो तेरा नगर सारा" यह स्मरण रखो ।
दुनिया एक गुलदस्ता- एक सेठ था, उसके एक गुलदस्ता हाथ में था । उसने विचार किया । वह गुलदस्ता उसने एक सन्त को, जो सामने से जा रहा था, उसे भेंट स्वरूप दे दिया । सन्त वह गुलदस्ता देखकर देखने लगा । प्रत्येक फूल को देखकर प्रसन्न होते हुए, उसकी प्रशंसा करते हुए, सुगंधि लेता रहा ।
सेठ ने विचार किया कि सन्त तो मुझे देखता ही नहीं और न मुझसे बोलता है । किन्तु गुलदस्ते के देखने में ही मगन है । उसने सन्त को प्रार्थना करके कहा, "स्वामी जी, गुलदस्ते को छोड़कर, मेरी ओर भी देखिये ।" तब सन्त गुलदस्ते को फेंककर सेठ से बोलने लगा- यह एक दृष्टान्त है । इसका तात्पर्य यह है कि वह सेठ है परमात्मा और गुलदस्ते के फूल हैं सांसारिक पदार्थ । हम उस भगवान को भुलाकर गुलदस्ते रूप संसार के पदार्थों में लीन हो गये हैं । हमें सन्त की भांति गुलदस्ते को छोड़कर सेठ अर्थात् परमात्मा की ओर देखना चाहिए और उनका स्मरण करना चाहिए, तभी बेड़े पार होंगे ।
सिन्धी भाषा- दुनिया में कोई भाषा है तो वह है सिन्धी भाषा । यदि मैं राजा होता तो सभी भाषाएं सिंधी भाषा पर कुर्बान कर देता क्योंकि सिन्धी भाषा एक गुलदस्ता है, जिसमें सभी भाषाओं के शब्द फूल रूप धारण करके आये हैं । संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, पारसी, गुजराती आदि के शब्द सिंधी हैं है । तुम यदि अपनी सिन्धियत को स्थित रखना चाहो तो सिन्धी भाषा को न भुलाओ । सिन्धी में भी असंख्य पुस्तकें छपी हुई हैं, वे पढ़ो ।
सिन्धी भाषा गुलाब के फूल की तरह है । गुलाब के फूलों के 200 प्रकार हैं, जिनमें से 80 मैंने भी देखे हैं, जो सभी विभिन्न प्रकार के थे । सिन्धी भाषा रूप गुलाब फूल की सुगंध लेते चलो ।
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अध्याय 60
17 नवम्बर 1956 को नसीराबाद (राज.) में नेताजी स्कूल में विद्यार्थियों को उपदेश
भलाई कर के भुला दें- हमारे को सदा और लोगों के गुण देखने चाहिए, अवगुण नहीं देखें । औरों की बड़ाई भले की जाय, किन्तु खुद की प्रशंसा नहीं करें और न अपनी बड़ाई सुनें । यदि अपनी बड़ाई हो रही हो तो समझना चाहिए कि हमारी बुराई हो रही है । यदि ऐसा नहीं मानकर चलोगे तो अभिमान बढ़ जायेगा । अभिमान बड़ जाने से स्थिति से नीचे गिर जाओगे । तुम जो भी अच्छे कार्य अथवा लोगों के भले के कार्य करते हो तो उनको भूल जाइये व ऐसा समझ लो कि वे भलाई के कार्य हमने नहीं किये हैं । किन्तु यह समझना चाहिए कि परमात्मा की हम पर दया हुई है, तब हमसे ऐसे भलाई के कार्य करवा रहे हैं ।
अलग रहें- यह संसार एक धर्मशाला है और इसमें रहते हुए अलग रहें । ऐसे रहें, जैसे कमल का फूल जल में रहता है, परन्तु जल की एक बूंद भी उस कमल के फूल पर नहीं रहती । इस संसार में परमात्मा ने जो भी उत्पत्ति की है, उस सबसे हमारे को शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए । इस पर सन्त तुलसीदास ने कहा हैः-
तुलसी इस संसार में, भांति-भांति के लोग ।
सबसे हिल मिल कर रहिये, नदी नाव संयोग ।।
नाव में कई बैठते हैं और कई उतरते हैं, परन्तु कोई भी उस नाव को अपनी नहीं समझता । ठीक इसी प्रकार हम भी संसार में रहें और सभी से हिल मिल कर रहने पर भी अपने को एक यात्री की तरह समझें ।
यह संसार धर्मशाला है । जैसे धर्मशाला में जाने से बर्तन भाण्डे व बिस्तर आदि मिल जाते हैं और हम उन्हीं से अपने कार्य निकालते हैं, परन्तु उनको अपना नहीं मानते । इसी प्रकार संसार के सभी वस्तु पदार्थों से काम लेते रहें, किन्तु इनको अपनी न समझ कर मोह का त्याग करें । शास्त्रों में कहा है कि –
मातृ देवो भवः पितृ देवो भवः ।
आचार्या देवो भवः अतिथि देवो भवः।।
माता, पिता, आचार्य (गुरु) और अतिथि (मेहमान) इन चारों को देवता व पूज्य समझो । उनके साथ अपने कर्तव्य पालन अत्यन्त आवश्यक हैं । यह बहुत बड़ा पुण्य धर्म का काम है ।
संग कुसंग- एक बात पर अवश्य ध्यान रखो कि सत्संग से उन्नति व सुख की प्राप्ति होती है, परन्तु कुसंग (बुरे संग) से नित प्रति गिरावट और उलझनें मिलती हैं ।
बुरे संग व कुसंग से मन में बुरे संकल्पों (सूक्ष्म विचारों) की और अच्छे संग से अच्छे संकल्पों की उत्पत्ति होती है । बुरे संकल्प हमें पापों की ओर ले जाते हैं और अच्छे व शुद्ध संकल्प सुख समृद्धि व सन्तोष दिलाते हैं ।
रानी कैकेयी का राजा दशरथ के साथ बहुत प्रेम था, उसने 'युद्ध भूमि' में भी राजा का साथ नहीं छोड़ा व युद्ध स्थलों पर भी सदैव साथ रहती थी । एक बार रानी कैकेयी ने अपने जीवन को जोखिम में डालकर भी राजा दशरथ के प्राण बचाये थे, इस पर राजा दशरथ ने प्रसन्न होकर वर (वचन) दिया कि आज जो भी मांगोगी वह दे दूँगा । कैकेयी ने उस समय कुछ नहीं मांगा । थोड़े दिनों बाद कुलटा दासी मन्थरा के कुसंग से कैकेयी के मन के संकल्प (मन के सूक्ष्म विचार) बिगड़ गये । उसने रामचन्द्र जी को 'वनवास' भेजने का वचन मांगा, जिससे राजा दशरथ की मृत्यु का कारण कैकयी बन गयी । यह है कुसंग का फल ।
सत्संग करने के साथ अच्छी पुस्तकें भी पढ़ें । सन्त महात्मा सभी अच्छी पुस्तकों से ही बने हैं । महात्मा गांधी व पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी अच्छी पुस्तकों से बहुत कुछ लाभ लिया था ।
सिनेमा से हानि- सिनेमा नहीं देखें, सिनेमा से लाभ से अधिक बुरे प्रभाव मन पर पड़ते हैं और कई प्रकार से अपने में स्थूल व सूक्ष्म बुराइयां आ जाती हैं । सिनेमा से तमोगुण और रजोगुण बड़ जाते हैं और श्रृंगार व फैशन के साथ में चरित्रहीनता जैसे बुरे विचारों की उत्पत्ति हो जाती है और कितने ही रोग भी हो जाते हैं, जैसे आँखों की रोशनी कमजोर व वीर्यपात आदि। इसलिए सिनेमा जाना पाप समझकर नहीं जाना चाहिए ।
सात्विक भोजन- एक और खास बात ध्यान देने योग्य है कि शरीर को ठीक रखने के लिए भोजन सात्विक व सादा, शीघ्र पाचक होना अति आवश्यक है । बद हाजमा 'अपचन' रहने से रोगों के कई कारण बन जाते हैं । भोजन शरीर को ठीक रखने हेतु खाना चाहिए, शरीर भोजन के लिए नहीं है । भोजन शरीर को ठीक रखने के लिए है ऐसा समझकर ही भोजन शान्त चित्त, एकान्त व शुद्ध स्थान पर करना चाहिए । व्यायाम प्रतिदिन करना चाहिए । प्राणायाम, ऊँचे श्वास प्रातः सायं दोनों समय करने से मन प्रसन्न व ताजगी में रहता है । दो समय से अधिक बार भोजन नहीं किया जाय ।
अन्त में मेरा यह कहना है कि माता, पिता और गुरु की सेवा करते रहें, यही धर्म मानें । गरीबों व दीन दुखियों को संभालते रहें व अनाथ बच्चों को पुस्तक व पढ़ाई में सहकार करने के साथ ईश्वर को न भूलें । जिसने हम सभी को पैदा किया है, उस परम पिता परमात्मा का अवश्य ही स्मरण करने से समृद्धि की प्राप्ति होगी ।
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अध्याय 61
श्री दीपचन्द्र जी के घर अजमेर में दिनांक 1-11-1956 को किया गया प्रवचन
स्वामी जी को कोई भाई गले में फूल माला डाल रहा था । वह फूल माला स्वामी जी ने उतार कर, उधर संकेत देकर कहा कि यह फूल माला है, इसमें जितने भी फूल हैं, उन सभी की सुगन्ध लेने की अच्छी कला तो केवल मक्खी भंवर (कीट) में और रस चूसने की कला शहद की मक्खी के मुख में है । ये कलाएं अन्य में नहीं रह सकतीं । ठीक इसी प्रकार से सभी में अलग-अलग कलाएं हैं ।
हम सभी जिन्होंने संसार में जन्म लिया है, उनको अपनी कोई न कोई कला दिखाकर जन्म सफल करना चाहिए । वह संसार आशा रूपी नदी है, उसमें तृष्णा रूपी एक घड़याल (मगरमच्छ) है, वही संसार रूपी नदी से पार करने में बाधक है । वह तृष्णा रूप घड़याल (मगरमच्छ) बहुत ही बुरा है । यदि इस तृष्णा रूप घड़याल से हम बचे रहें तो संसार रूप नदी से पार हो जायेंगे ।
आशा मन को सताती है । आशा जब परिपक्व हो जाती है, तब ही उसका नाम तृष्णा कहा जाता है, यही हमको भुला देती है । हम इसके वशीभूत होकर संसार रूप नदी पार न कर पावें तो हम लोगों के जन्म लेना ही व्यर्थ हो जायेगा ।
चिन्ता बड़ा ही रोग है- इस पर एक दृष्टान्त है कि एक सेठ जी ने अपने मुनीम से पूछा कि मेरे यहाँ तक कितनी पीढ़ी तक खाने को धन है । मुनीम ने हिसाब लगाकर कहा कि ग्यारह पीढ़ी तक खाने को धन मौजूद है । यह सुनकर वह सेठ जी (जो राजसी ठाठ में था) बड़ा ही चिन्तित हो गया कि ग्यारह के बाद वाली बारहवीं पीढ़ी कहाँ से खायेगी और उनका क्या होगा । इस प्रकार व्यर्थ चिन्तन में दिन प्रतिदिन सूखता गया ।
यह दशा देखकर उनके पुत्र बड़े दुःखी हुए और एक महात्मा के पास जाकर नम्रतापूर्वक अपने पिता जी की चिन्ता का सारा हाल सुनाया । महात्मा जी ने उत्तर में कहा कि तुम्हारे पिता जी का दुःख तब ही दूर होगा जब वे ग्यारस का उपवास करें और एक थाली फल फूलों की भरी अमुक ब्रह्मचारी को दान देकर आशीर्वाद लें । पुत्र ने पिता जी से महात्मा का बताया हुआ हाल जाकर कहा । पिता ने पुत्र की यह बात मानकर ग्यारस के दिन उपवास करते हुए एक थाली फल फूलों से भरकर महात्मा के बताये अनुसार ब्रह्मचारी के पास ले गये और बड़ी नम्रता से ब्रह्मचारी को स्वीकार करने का आग्रह किया । किन्तु ब्रह्मचारी ने उत्तर में लेने से इन्कार करते हुए कहा कि आज तो आपसे पहले ही कोई प्रेमी दे गया है और अधिक आवश्यकता नहीं है । इस पर सेठ जी ने कहा कि कृपा करके दूसरे दिन के लिए रख लीजिये । परन्तु ब्रह्मचारी ने कहा कि सेठ जी, कल की चिन्ता मैं क्यों करूँ, मैं तो कल पर भरोसा रखता ही नहीं, जिसने आज भेज दिया है, तो वह कल भी भेजेगा ही । यह सुनकर उस सेठ जी की अज्ञानी आँखें खुल गईं । वह समझ गया कि इस ब्रह्मचारी को तो कल की भी चिन्ता नहीं और मैं मूर्ख बनकर बारहवीं पीढ़ी की चिन्ता अभी से कर रहा हूँ, जबकि ग्यारह पीढ़ियों तक का खर्चा योग्य धन मौजूद है । इस प्रकार से अज्ञान हटने के बाद वह सेठ जी चिन्ता छोड़कर बड़े सुख में रहने लगे ।
आशाएं मन को सताती हैं और जब आशाएं व तृष्णाएं अन्दर से हम हटायेंगे, तब हमारा मन वश में रहेगा और हम हरि भजन कर सकेंगे । और फिर तो संसार के दुःख मिलेंगे ही नहीं ।
काम क्रोध का त्याग- याद रखना चाहिए कि काम व क्रोध से बचने से हम में शक्ति बढ़ती है । जैसे इन्जन में कोयले डालने के बाद उसकी गैस रोक जाने से अतुल शक्ति पाकर उक्त इन्जन से बड़े भारी कार्य किये जाते हैं । यदि ढक्कन खोल कर गैस निकाली जाय तो कुछ भी कार्य नहीं बनते । ठीक इसी प्रकार हमारे शरीर की अवस्था समझी जाय । यदि हम काम क्रोध को रोक सकें तो हमारे भीतर बहुत बड़ी शक्ति आ जायेगी ।
इस संसार में सुख, वैभव आदि सर्व क्षण भंगुर आने जाने वाले हैं । शरीर भी बिगड़कर नाश हो जाता है और बन भी रहे हैं । जैसे एक वृक्ष के कुछ पत्ते सूखकर गिर जाते हैं और नये पत्ते पैदा होते हैं । ठीक उसी प्रकार से ही संसार की दशा है, रात्रि के बाद दिन आता है व जन्म के बाद मृत्यु भी होना अनिवार्य है । परन्तु आत्मा कभी मरते नहीं, सदा अजर अमर (आत्मा) नहीं बुझने वाली ज्योति है । संसार में सुख-दुःख, शीत-उष्ण, मान-अपमान, हानि-लाभ, सभी के साथ चलते रहते हैं । इन सभी में हमें समान रहना चाहिए ।
मृत्यु की याद- हम सदा शरीर के श्रृंगार, पालन पोषण में लगे रहते हैं । हम अज्ञानता के कारण इस शरीर को सत्य मानकर सदा रहने वाला समझकर जलन व वितण्डा वादों में फंसकर अशान्ति की अग्नि जलाते रहते हैं । जबकि हम इस संसार में एक चूहे के समान हैं, जिसके पीछे बिल्ली का शिकारी पंजा मौजूद है । इस प्रकार हमारे जन्म से मौत (मृत्यु) का भय लगा हुआ है, फिर भी हम इस मृत्यु रूप पंजे को भूल बैठे हैं । यदि सदा मृत्यु को याद करते रहें तो फिर कुकर्म व धोखाधड़ी जैसे पाप कर्म हम नहीं करेंगे । हमें सदा मृत्यु की याद रहने पर परम पिता परमात्मा की सदा याद रहेगी, एक क्षण भी उसको भुला नहीं सकेंगे ।
हम लोगों को याद रखना चाहिए कि गर्भ का दुःख, बचपन का दुःख, बुढ़ापे का दुःख व कई प्रकार की परेशानियां एक ही जन्म में आती हैं, तो चौरासी लाख योनियों में भटकने से कितने कष्ट सहने करने पड़ते हैं । यदि इस प्रकार सदा याद करते रहें तो फिर पाप कर्मों व कुकर्मों से बचकर सत्यानन्द को इस जन्म में ही प्राप्त कर सकेंगे । यही हमारा मूल ध्येय (मूल मकसद) पूरा होकर जन्म सफल होगा ।
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अध्याय 62
27 मार्च 1962 को बांटवा में किया गया प्रवचन
शरीर को भुलाने से अखण्ड आनन्द प्राप्त होगा । जैसे रात को गाढ़ निद्रा में आनन्द आता है, वैसी स्थिति जाग्रत में होनी चाहिए अर्थात् शरीर भाव बिल्कुल त्याग देना चाहिए कि मैं शरीर हूँ । जानना चाहिए कि अखण्ड आनन्द ही मेरी जान है । भगवान को खूब याद करो और दर्शन करो । तब प्रश्न उठेगा कि स्वामी, हमें तो भगवान का दर्शन होता ही नहीं । हम भगवान का दर्शन कैसे करें । मैं सौगंध खाकर कहता हूँ कि तुम भगवान के दर्शन प्रतिदिन करते हो जो सबका साक्षी, ज्ञान स्वरूप, प्रकाश स्वरूप, सदैव स्थित एक रस है, किन्तु उसे जान नहीं सकते ।
तृष्णा- बुद्धि न होने के कारण हम काम, क्रोध, मोह, अहंकार और लोभ में डूबे हुए हैं । उपरोक्त विकारों में से एक भी होगा तो सफलता नहीं मिलेगी । तृष्णा ही है, जो मनुष्य को जन्म-जन्म के चक्र में भटकाती हैं । मन को कहना चाहिए कि अब तक मैं बहुत दिनों से तुम्हारा दास होकर रहा था, लेकिन अब मैं तुम्हें अपना दास बनाऊँगा । तृष्णा ऐसी वस्तु है, जो तृप्त होने वाली नहीं है । यह मटका कभी भरने वाला है ही नहीं, चाहे उसमें हजार लाख मन डालो तो भी खाली ही खाली रहेगा ।
जिसमें जैसी शक्ति हो, वह वैसी उपासना करे चाहे निर्गुण की चाहे सगुण की । शास्त्रों में इस प्रकार लिखा हुआ नहीं कि पहले सगुण की, तत्पश्चात निर्गुण निराकार की उपासना की जाय । तुम्हारी जैसी भावना होगी, तुम उसको पहुँच सकोगे । सुषुप्ति अवस्था में जो आनन्द है, वह भगवान का दर्शन है, जो जाग्रत में भी होना चाहिए ।
वैराग्य- शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध से बचना चाहिए और आवश्यकता अनुसार संसार की चीजों से ममता मोह रहित काम निकालना चाहिए । संसार की कोई भी वस्तु और शरीर में तो रुधिर, रोग, मांस, थूक और बलगम से भरा हुआ है । वह नाशवान है । शरीर और संसार की उपरोक्त रूप से ठीक प्रकार समझ करके, किनारा कीजिये । इसको कहा जाता है वैराग्य । संसार एवं शरीर को इस रीति से समझा जाय । उसे न प्रिय और न आनन्द रूप समझा जाय, अपितु उससे घृणा की जाय । यह सोलह आने सपने वत् है, इसमें रत्ती मात्र भी संदेह नहीं । स्वप्न में अनेक रूप रंग दिखते हैं, लेन-देन होता है, जो जाग्रत में सभी झूठे दिखाई पड़ते हैं । वैसे यह जाग्रत अवस्था एवं पदार्थ आदि बिल्कुल झूठे सपने की नाईं हैं और न सच्चे । बिल्कुल झूठे हैं । सदैव यह विचार चलता रहे कि एक आनन्द स्वरूप के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है । संसार की वस्तुओं और दुनिया को मुसाफिर-खाना समझना चाहिए । ये सभी चीजें अपने लिए हैं किन्तु अपनी नहीं हैं, केवल काम निकालने के लिए हैं । यह शरीर न पहले था, न बाद में रहेगा, अपितु आत्मा ही आत्मा, आनन्द ही आनन्द, एक ब्रह्म ही व्यापक, अखण्ड सबका साक्षी, सब में एक समान है । यह देह पांच तत्त्वों की बनी हुई है, जो किराये पर खरीद कर लाये हैं, परन्तु हम अपने को देह समझ बैठे हैं, जो देह पांच तत्त्वों की है, वह न हम स्वयं हैं और न देह हमारी है । यह देह पांच तत्त्वों की बनी हुई है । हम वे तत्त्व नहीं हैं । मैं सत्य स्वरूप, देह से भिन्न, देह और संसार को जानने वाला, उसका साक्षी प्रकाश रूप, नित्य रहने वाला, उससे भिन्न, सबमें एक समान, एक जैसा, एक हूँ । अतः देह तथा संसार, स्वयं अथवा अपना न जानना चाहिए और जिन पांच तत्त्वों से संसार तथा शरीर बना है, ये पांच तत्त्व भी मेरी एक काल्पनिक लहर से उत्पन्न हुए हैं, जो लहर ख्याल भी बिल्कुल झूठे सपने समान है, जो वास्तव में कुछ भी नहीं है । शरीर एवं संसार के पदार्थ सभी जड़ हैं । न वे अपने को पहचान सकते हैं और न दूसरे को । केवल मात्र एक आत्मा ज्ञान स्वरूप सत् हैं । जो हम देखते हैं, शरीर अथवा संसार, वह सब उस ज्ञान स्वरूप सत्ता से प्रतीत हो रहा है । तुम इस संसार में स्वप्न की नाईं सभी काम काज करते रहो, मोह ममता के सिवाय । स्वयं को कभी मत भूलो ।
काल्पनिक बाग- केवल तू ही एक सिरजनहार है । यह सब तुम्हारा काल्पनिक बाग सपने की तरह रच करके और तुम देख रहे हो । तुम व्यापक, सच्चिदानन्द स्वरूप हो । आकाश की तरह तुझमें कोई कमी नहीं आ सकती । केवल शरीर अलग-अलग दिखते हैं, इस लिए आत्मा अलग-अलग नहीं हुआ । यथा घड़े अनेक हजारों हैं, जिन सबमें आकाश है । घड़ो को तोड़ने से आकाश ही आकाश रहेगा, जो पहले भी था और अब भी है । ये नाम रूप अलग-अलग भाषित होते हैं, जो अज्ञान के कारण विदित होते हैं । जब ज्ञान होता है, तब एक आत्मा के अतिरिक्त दूसरा कुछ भी नहीं रहेगा । उस ज्ञान और प्रकाश के अतिरिक्त कुछ भी नहीं देख सकेंगे । उस ज्ञान द्वारा ही मैं सबको जानता हूँ अर्थात् देख सकता हूँ । 'पच्चीकरण' बार-बार पढ़ो और योग वसिष्ठ भी मंगा कर पढ़ो । दुःख सुखों की शोभा है । सदैव धैर्य से और शान्ति से दुःख सहन किया जाय । जो बने, वह वाह-वाह ! सबमें भलाई है ।
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अध्याय 63
14 अप्रैल 1965 को श्रीकृष्ण गऊशाला आगरे में किया गया प्रवचन
युद्ध का क्या ? – स्वामी जी विराजमान थे । किसी प्रेमी ने पूछा कि "स्वामी जी ! चारों और युद्ध के काले बादल दिख रहे हैं । उन्हें देखकर कलेजा कांप रहा है । अन्त में किसकी जय होने वाली है ?"
स्वामी जी ने मुस्करा कर कहा, बाबा यह कोई नई बात नहीं है । युगों से यह पुरानी रीति चलती आ रही है । कौरवों और पाण्डवों के युद्ध को कई सहस्र वर्ष बीत चुके हैं, तो भी पाण्डवों की जय गाई जा रही है । श्री रामचन्द्र की रावण से घोर लड़ाई लगी, जिसमें कितने ही राक्षस मारे गये । अन्त में राम की जय हुई । क्यों ? अत्याचार, अधर्म अनीति और अन्याय के कारण कौरवों और रावण की हार हुई ।
पाप का घड़ा भर कर अन्त में फट जाता है । फोड़ा नहीं देखते कि भरकर अन्त में फट जाता है । जो श्रेय मार्ग पर चलेगा, उसे डर किसका ? आरम्भ में कष्ट अवश्य देखने पड़ते हैं, किन्तु अन्त में सत्य की विजय होती है । भारत की भी जय होने वाली है, क्योंकि भारत धर्म नीति पर है और सत्य मार्ग पर चल रहा है ।
शुभ कर्म करते चलो – कर्म अवश्य करना है, परन्तु सावधान होकर करना है । कुकृत्य से सदैव दूर रहना चाहिए । फल देने वाला वह मेरा परम कृपालु स्वामी है । अन्त में उस कृपालु स्वामी की दया होगी । सत्कर्मों का फल अच्छा ही होने वाला है । अंगूर के पेड़ को पानी दिया जायेगा तो अवश्य अंगूर ही पैदा होगा, परन्तु यदि बबूल के पेड़ को जल दिया जायेगा, तो अवश्य काँटे उत्पन्न होंगे । गीता के दूसरे अध्याय के 47 श्लोक में श्री कृष्णचन्द्र, अर्जुन को उपदेश करते हैं:-
"तेरा कर्म करने मात्र में ही अधिकार होवे, फल में कभी नहीं और तू कर्मों के फल की वासना वाला भी न हो । तुम्हारी कर्म न करने में भी प्रीति न हो ।"
सत्य को शक्ति है । सत्य की कमाई में बरकत (बढ़ोतरी) है । हम बड़ों की कमाई खा रहे हैं । वे सत्य की कमाई करते थे, किसी का बुरा नहीं चाहते थे, सादा खाते थे, सादा पहनते थे तो उनकी वाणी में कितनी न शक्ति होती थी ? उनके पास न था इतना धन और न थी इतनी सम्पत्ति; उनके पास न थी मोटर अथवा स्कूटर, न थे बंगले और न ही इलेक्ट्रिक पंखे, न थे गोले और बिजलियां । इतना न होते हुए भी हमसे अधिक सुखी थे । किस लिए ? सच्चाई के कारण ।
पंचों में परमेश्वर- पंचों में परमेश्वर कहते हैं । पहले न थी इतनी कोर्टें और न इतने वकील । झगड़ा होता था तो चार पंच बैठकर निर्णय करते थे । पंचों को मानते थे । पंच किसी को अपराधी ठहराते थे अथवा चार पैसे दण्ड रखते थे तो वह व्यक्ति मुंह लज्जा से ऊपर नहीं उठा सकता था । सदैव उसे सभा में नीचा दिखाते थे । किस लिये ? सच्चाई के कारण ।
ज्ञान रूप ज्योति- भीतर ज्ञान रूप ज्योति किस प्रकार जगेगी ? अग्नि के पास कम का पौधा उग नहीं सकता । सारा दिन माया के चिन्तन करने से कैसी शान्ति मिलेगी ? "बेटा ! सत्संग में क्यों नहीं आते ?" कहेंगे कि "स्वामी ! समय ही नहीं मिलता । व्यापार को नहीं करेंगे तो बच्चे भूख में मरेंगे । घर की करें अथवा हरि की ?" ठीक ! एक घण्टा सत्संग नहीं करते हो, फिर जन्म जन्मांतरों की अग्नि जो भीतर जल रही है, वह कैसे भुला पाओगे ? यह सरल बात है क्या ?
गुरु नानक देव जब दिन रात मुख से अमोलक वाणी उच्चारण करते थे । उनकी माता ने उनसे पूछा कि "बेटा ! यह दिन रात क्या कह रहे हो ?" इस पर साहबों ने उत्तर दिया - "माता जी ! आखां जीवां – बिसरे मर जाय ।" उस अकाल पुरुष का नाम दिन रात उच्चारण करता हूँ, तब तो जीवित रह सकता हूँ, यदि न कहूँ तो जीवित रह न सकूँ । यह सब नाम की कृपा है ।"
आगे के लिए पूंजी बनाना कोई सरल काम नहीं । हमारे अन्तःकरण से अज्ञान रूप अन्धकार भी तब दूर होगा और बुद्धि सतोगुणी बनती है । गुरुजन फर्माते हैं कि-
"भरीए हथ पेर तन देह, पानी धोते उतरस खेह ।
पलीते कपड़ होइ, दे साबुन लैये आह धोइ ।
भरीए मत पापां के संग उह धोपे नावे के रंग ।"
सब में उसका प्रकाश – परमात्मा सर्वव्यापी है, वह प्रत्येक घर में रहता है । यदि किसी चक्रवर्ती राजा को आप कहेंगे कि एक गांव के स्वामी हो तो उसे कैसा न क्रोध आयेगा ? परमात्मा भी एक जगह नहीं रहता । सबमें उसका प्रकाश है, ऐसी भावना रखनी चाहिए ।
आकाश एक है किन्तु उपाधि के कारण भिन्न-भिन्न दृष्टिगोचर हो रहा है । इनमें आकाश का कौन सा दोष है ? घटाकाश, मठाकाश और महा आकाश कहे जाते हैं । घड़े अथवा जगह के नष्ट होने से कोई घटाकाश अथवा मठाकाश नष्ट नहीं हो जाते । महा आकाश सदैव है । वैसे परमात्मा सर्वान्तर्यामी है । वह सब में व्यापक है तो फिर तुम पाप-कर्म क्यों करते हो ? यह सब न्यूनता तुम्हारी भावना में है । भावना सदैव शुद्ध रखो तो फिर मोक्ष का द्वार सर्वदा तुम्हारे लिये खुला रहेगा ।
किसका ध्यान रखा जाय ? – 1. देश 2. काल 3. वस्तु 4. पात्र । सांसारिक व्यवहार में इन चार बातों का सदैव ख्याल रखने से परिणाम अच्छा होता है ।
पहली बात तो देश या मकान का ख्याल रखना चाहिए कि मैं कहाँ हूँ । भिन्न-भिन्न स्थान पर भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़ता है । जिस देश में हो, उस देश के वायुमण्डल अनुसार काम में हाथ डालना चाहिए । दूसरी बात है समय की । प्रातः को जो कुछ करना हो, वह सायं को कैसे अच्छा लगेगा । बचपन का काम जवानी में और जवानी का बचपन में कैसे शोभा पायेगा ? यदि सफलता प्राप्त करने में अभिलाषी हो तो समय की पाबंदी विशेषतः अनिवार्य है । काल के कानून के विरुद्ध चलना सदैव हानि का कारण होगा । आत्मिक जीवन के आरम्भिक अवस्था में प्रातः सायं दोनों समय अभ्यास करते रहना अत्यंत आवश्यक है । "कर्म करने में तुम्हारा अधिकार है और न कर्मों के फल में । तुम फल की इच्छा न रखो और कार्य करने की इच्छा में प्रीति रखो ।"
हमें शुभ कर्म करते रहना चाहिए, फल की कामना न रखें । फल तो मिलता ही है, जो अवश्य मिलेगा ।
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अध्याय 64
2 व 3 मई 1963 को श्रीकृष्ण गौशाला आगरे में किया गया प्रवचन
चिन्ता एवं चिता – चिन्ता को अपने मन मन्दिर में कदापि आने न दो । चिन्ता एवं चिता दोनों शब्द एक जैसे लग रहे हैं, किन्तु दोनों के बीच में पृथ्वी आकाश का भेद है । चिता तो मुर्दे को जलाकर भस्म करती है, लेकिन चिन्ता तो जीवित रहते ही मनुष्य को चकना चूर करे । चिता तो एक बार मुर्दे को जलाती है, किन्तु चिन्ता तो रात दिन जलाती रहती है ।
चिन्ता वाला मनुष्य कदापि नहीं समझता । चिन्ता करने से हाथ क्या आता है ? व्यर्थ ही स्वयं को हानि में डालना है । सचमुच चिन्ता करने से कुछ प्राप्त होना नहीं है । सूर्य के सामने अंधकार होना ही नहीं चाहिए । हम आनन्द रूप हैं तो फिर दुःख किसका करें ?
दारा और सिकन्दर जैसे महा बलवान योद्धे बादशाह भी दुनिया के तख्ते से जाते रहे । सिकन्दर बादशाह ने अन्तिम समय में घोषणा की थी कि मरने के पश्चात मेरे दोनों हाथ कफन से बाहर निकालना, तो भले दुनिया देखे कि मैं इस फानी (नाशवन्त) दुनिया से कुछ भी साथ नहीं ले जा रहा ।
दुनिया में एक मुसाफिर, दिन चार जिन्दगी है;
कर जीव की भलाई, मकसद फकत यही है ।
दुनिया के ये नजारे, लगते जो तुझको प्यारे;
है छल कपट की रचना, मिथ्या ये जान सारे ।
सदैव भलाई के कार्य कीजिये – दूसरों की भलाई में तुम्हारी भलाई है । किसी की भी बुराई न सोचिये । बबूल के पेड़ को पानी दिया जायेगा तो उस पेड़ से बबूल के कांटे ही उत्पन्न होंगे । किन्तु अंगूर की लता को पानी दिया जायेगा तो अवश्य उस लता से अंगूर उत्पन्न होंगे । जैसा कर्म किया जायेगा, वैसा ही फल उत्पन्न होगा ।
दुनिया अजीब बाजार है, कुछ जिन्स यहाँ की साथ ले,
नेकी का बदला नेक है, बुरे से बुरी बात ले ।
मेवा खिला तो मेवा मिले, आराम दे तो आराम मिले,
कलियुग नहीं, कर युग है, यहाँ दिन को दे और रात को ले ।
क्रोध न कीजिये – भूल कर भी किसी पर क्रोध न कीजिये । सदैव आनन्दित रहो । अपना चेहरा हंसमुख रखो । मन में कोई घबराहट हो तो तत्काल अपने कमरे में जाकर कुंडा लगाकर बड़े ठहाके लगाओ । ऐसा करने से तुम्हारे मन की परेशानी दूर हो जायेगी ।
याद और दया – सर्वदा परिपूर्ण परमात्मा को दिल में याद करते रहो । कदापि उस सच्चिदानंद को हृदय से भुलाओ नहीं । 'याद' शब्द यदि उल्टा लिखेंगे तो 'दया' हो जायेगी । तुम प्रभु को याद करोगे तो फिर स्वतः उस दातार की आपके ऊपर दया की दृष्टि होगी । बिजली के बटन दबाने से क्या होता है ? तत्काल अंधकार नष्ट हो जाता है ।
चेत जाओ, चेत जाओ, रात दिन सजग हो जाओ । श्री गुरु तेग बहादुर गुरु ग्रंथ साहब में फरमाते हैं-
चेतना है तो चेत ले, निश दिन में प्रानी,
छिन-छिन औध जात है, फूटे घर जिउ पानी ।
1. हर गुन काह न गावहु, मूर्ख अज्ञाना,
झूठे लालच लाग के, नहि मरण पछाना ।
2. अजहूं कछु बिगड़ियो नहीं, जो प्रभु गुन गावे,
कह नानक तिह भजन ते, निर्भय पद पावे ।
हे प्राणी ! करना है तो अभी कर लो । चार दिन उस प्रभु का चिन्तन करता रह ।
जिस प्रकार टूटे हुए मटके से पानी बूंद-बूंद कर टपकता रहता है और अन्त में मटका खाली हो जाता है, उसी प्रकार तुम्हारा जीवन भी प्रतिदिन समाप्त हो रहा है । साहब समझाते हैं कि हे मूर्ख मनीराम ! तुम हरि के गुण क्यों नहीं गाते हो ? झूठे विषय भोगों में डूबकर तुमने मौत को ही भुला दिया है । अभी भी समय गया नहीं है, तुम्हारा कुछ बिगड़ा नहीं है । अभी भी तुम हरि के गुण गा सकते हो । यही भजन तुम्हें काम आयेगा । भजन करने से ही तुम्हें निर्भय पद की प्राप्ति होगी ।
अन्त समय- हमें रात दिन मनीराम को समझाना चाहिए, नहीं तो अन्त समय पछताना पड़ेगा । आगे चलकर हाय-हाय करने और आँखों से आँसू बहाने से तो अच्छा है कि अभी ही इस चलते हुए समय में कुछ कर लें, अन्त समय में तो हमारा कोई उपाय चल नहीं सकेगा ।
गुरु साहब भी स्पष्ट वर्णन करते हैं:-
करणी हो सो न कीजो, पड़ियो लोभ के फन्द,
नानक समो रम गयो, अब क्यों रोवत अन्ध ?
अवसर- सब काम अवसर (मौके) पर होता है । 2 बजे रात को चोर चोरी करके भाग सकता है । परन्तु दिन को लोगों के सामने चोरी करके भागना उसके लिए कठिन है । सर्दी में गेहूँ और गर्मी में ज्वार बोई जा सकती है । किन्तु गर्मी में गेहूँ और सर्दी में ज्वार नहीं हो सकती । यदि बोई जायेगी तो अच्छा फल नहीं देगी । सब काम अवसर पर ही होता है । ऋतुएँ किस तरह मौसम बदलती रहती हैं । चौमासा भी यथा अवसर आरम्भ होता है । वृक्ष भी ऋतु के अनुसार फल देते हैं । विद्यार्थी भी आरम्भ में बेपरवाह रहेगा तो वार्षिक परीक्षा में कभी विजय प्राप्त नहीं कर सकेगा । अतः हमें भी अवसर गंवाना न चाहिए ।
यदि अब जवानी में कुछ नहीं करेंगे, तो पीछे बुढ़ापे में जब पराधीन बनेंगे, हड्ड पैर चलने चूकेंगे, हड्डियाँ निर्बल हो जायेंगी, स्वास्थ्य ठीक नहीं रहेगा, तब उस समय हमारा क्या पुरुषार्थ हो सकेगा ? तब तो हाय-हाय करने के अतिरिक्त कुछ न होगा । एक ने कहा है-
1. क्यों न जपा राम, जब देह में आराम था ?
क्यों न किया दान, जब घर में सामान था ?
क्यों न किया व्यापार, जब खुली रुस्तम बाजार ?
जब होवे हरतार, तब सौदा याद पड़ा ।
2. इस जग विच आयके, जे न भजो हरि नाम,
खाना पीना पहनना, होवन सब हराम ।
आश्चर्य का आश्चर्य- "जब जाने तब छूटा झगड़ा, हैरत की हैरानी है"
फूलों में शोभा की झलक है, वह अन्य कुछ नहीं, केवल आंतरिक शांति और प्रिय का ही जलवा है । उनमें आत्मिक तेज की छाया है, इसलिए वे शोभा दे रहे हैं । मिट्टी कैसे भी विभिन्न रूप मटके, घड़े, कुत्ते आदि ग्रहण करे, किन्तु मिट्टी के अतिरिक्त कुछ नहीं है ।
शक्कर (चीनी) से कई नाना प्रकार की मिठाइयाँ बनें परन्तु है शक्कर ही । सोने में से अनेक प्रकार के विभिन्न नामों एवं रूपों वाले आभूषण बनें, परन्तु हैं तो सोना ही । लहरें और बुदबुदे भी तो पानी और समुद्र से भिन्न नहीं हैं । उनके नाम रूप भले ही भिन्न हैं ।
चावलों में चीनी अथवा गुड़ डाला जाता है तो उसे "ताहिरी" नाम दिया जाता है और चावलों में मिठास भी आ जाता है । नाम चीनी अथवा गुड़ के कारण उसका बदलता है । और मिठास भी चीनी अथवा गुड़ के कारण उसमें रहता है, परन्तु वास्तव में तो चावल ही है ।
इन सब बातों में हमने नाम रूपों का खेल देखा, असली वस्तु तो असली ही रही थी । यह हैरत की हैरत समझो । तुम क्या हो इसकी वास्तविकता को जानो । तुम तो नाम रूप परे अस्ति, भाति, प्रिय हो । सत् चित् आनन्द स्वरूप हो । अज्ञान की अवस्था में हो तो द्वैत दिखाई देता है । ज्ञानी को तो एक ही दृष्टिगोचर होता है । दूसरा कुछ नहीं । वह तो अनेकता में भी एक ही का दर्शन करता है ।
एक व्यक्ति के पास दो खिलौने थे । एक गणेश का और चूहे का । दोनों समान वजन के थे । दोनों सोने के बने हुए थे । परन्तु गणेश का सोना अच्छा नहीं था और चूहे का खरा । वह व्यक्ति वे दोनों खिलौने एक सुनार के पास ले आया कि उनका मूल्य बतायें । सुनार ने कसौटी पर लगाकर गणेश का मूल्य 300 रुपये और चूहे का मूल्य 500 रुपये बताया । वह व्यक्ति आश्चर्य में पड़ा और पूछा कि ऐसा क्यों ? चूहा है गणेश की सवारी, उसका अधिक मूल्य कहते हो और गणेश गणपति का कम ! दोनों हैं सोने के और वजन भी समान है । सुनार ने कहा मेरा मूल्य मूर्ति का नहीं अपितु सोने का है । खिलौने वाले की दृष्टि थी रूप पर, परन्तु सुनार की सोने पर । ज्ञानी की दृष्टि भी सदैव सत् चित् आनन्द रूप ब्रह्म पर ही होती है । उसे अन्य सत्ता दृष्टिगोचर नहीं होती ।
भोला बाबा कहते हैं:-
तू एक अव्यय शान्त निर्मल स्वच्छ चिदाकाश है ।
अज्ञान तुझ में है नहीं, नहीं भ्रांति अध्यास है ।
राजस नहीं, तामस नहीं, तुझ में रंचक सत्त्व है ।
निर्गुण, निरामय एक रस अद्वैत है, एक तू ही तू है ।
एकता- एकता में ही आनन्द है । एक-एक कुश-मूंज को आप तोड़ सकते हैं, बकरी खा सकती है, किन्तु 20-25 को मिला कर बटा जाय, वह बटकर रस्सी बकरी को तो क्या परन्तु शेर को भी बाँध सकती है । शहद की मक्खियाँ आपस में मिलकर कितना न शहद इकट्ठा करती हैं । सब्जी में भी देखो कि पालक, धनिया, मिर्च मसाले आदि पड़ते हैं तो कितनी न स्वादिष्ट बनती है । माला में भी कितने मनकों का मेल है, तब तो वह आदमी देवता के गले में पड़कर शोभा देती है । सेना में भी सैनिकों का आपस में मेल है । इस मेल के कारण ही उनमें शक्ति आती है । आटे, घी और चीनी के मेल से हलुआ बनता है । अनेक बूंदों के मेल से वर्षा पड़कर शीतल करती है । मकान में भी ईँटों, मसाले सीमेंट, पत्थर आदि का मेल होता है । अथाह सागर में भी अनेक नदियों के पानी का मेल है । वस्त्र अनेक तागो के मेल हैं । वृक्षों के मेल से वन बनता है । पत्थर बजरी के अनेक जरों का मेल है । पुस्तक पृष्ठों का मेल होता है । मनुष्य भी अनेक इन्द्रियों और अंगों का मेल है । यह सब एकता का खेल है । एकता में रहोगे तो सदैव सुखी रहोगे ।
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अध्याय 65
13 अप्रैल 1965 ई. में आगरे में काला बाग मोहल्ले साधु बेला में किया गया प्रवचन
देखा मुख हुआ सुख- आप वैशाखी जैसे महा पवित्र पर्व पर यहाँ दरबार में किसलिए इकट्ठे हुए हो ? आपको सूचना दी गई है कि आज लीलाशाह यहाँ आयेंगे और कथा करेंगे । आपने भी सोचा कि जाकर लीलाशाह के दर्शन भी करके आयें । देखा मुख, हुआ सुख । दर्शन करने से दुःख ही दूर ! यह कैसी न मूर्खता ।
बराबर स्वीकार किया जाता है कि आपको दर्शन करने की अभिलाषा थी और दर्शन करने से आपके मन की तमन्ना पूरी हुई । किन्तु वह सुख, जिस सुख की आपको आवश्यकता है । वह केवल दर्शन करने से आपको नहीं मिलेगा । चित्त की शांति कोई साधारण बात नहीं है । "बिन कमाई नानका मुझे साधुओं जैसा कर ।" वह होने वाला नहीं है ।
एक मजदूर विचारा देखो कि वह मजदूरी के लिए कितना न परिश्रम करता है ? कितने न कष्ट सहन करता है । भात खाना भी कोई आसान काम नहीं है । भात तैयार करने के लिए क्या नहीं चाहिए ? अग्नि, लकड़ी, पानी, देगची और घी की आवश्यकता होती है । चाहे सब सामान क्यों न हो, तो भी यदि स्वयं हाथ नहीं चलायेंगे, केवल देखते रहेंगे और चाहेंगे कि भात तैयार हो तो कदापि तैयार नहीं हो सकेगा । भात तैयार भी किया जाय, किन्तु असावधानी से यदि केवल नमक उसमें अधिक पड़ गया तो पूरी देगची जहर हो जायेगी, यदि नमक डालना भूल गया तो भोजन ही अस्वादिष्ट हो जायेगा ।
बिजली भी तब जलती है, जब बटन को दबाया जायेगा और विभिन्न प्रकारों के बल्ब लगायेंगे तो समस्त परिश्रम ही निष्फल ? व्यय ही व्यर्थ । वहीं अंधकार लगा रहेगा । ठीक उसी प्रकार साधु-सन्तों के दर्शन करते रहेंगे, कथाएं सुनते रहेंगे । किन्तु उसके अनुसार आचरण नहीं करेंगे तो फिर इतने संघर्ष करने से क्या लाभ ?
भगवान को खूब स्मरण करो – आज कैसा पवित्र दिन है । भगवान को खूब याद कीजिये । भोगों से हटाकर भगवान में लगाओ । भोगों से भगवान कभी नहीं मिलेगा । भोगों को छोड़ दीजिये । भोग में रोग है । आत्मिक, मानसिक और शारीरिक शक्ति भगवान से मांगो ।
भगवान बाहर से नहीं फेंकेगा । केवल भगवान को अपना करो । उसकी शरण में जाओ तो बेड़ा पार । अग्नि के जितना निकट बैठोगे, उतनी अधिक गर्मी आपको लगेगी और आप जितना अग्नि से दूर रहेंगे, उतनी अधिक सर्दी अनुभव होगी । विषय विकारों रूपी अग्नि से अपने को बचाओ, खूब भगवान को याद करो ।
महानता कैसे प्राप्त हो – कष्टों के समय में धैर्य धारण करना चाहिए । दुःख में धैर्य और सुख में शुक्र अन्तःकरण में बहुत शान्ति लाते हैं । सागर की भान्ति गम्भीर होकर रहना चाहिए । सबसे प्यार और मधुरता से, बर्ताव करना चाहिए । हमारे बोलने से मित्र प्रसन्न हुआ तो क्या हुआ, किन्तु शत्रु भी हमारे बोलने से प्रसन्न हो तो ठीक । कोशिश करके नम्र और अभिमान रहित होकर चलना चाहिए । परमात्मा की कृपा से धीरे-धीरे इस महानता के निकट होते जायेंगे ।
उत्तम कौन- स्टेशन पर टिकट पूछा जाता है और न जाति पाति । ईश्वर के पास भी हमारे कार्यों को देखा जाता है और न हमारी जाति पाति को । सोना मिट्टी से, कमल का फूल कीचड़ से, मोती सीप से, शहद मक्खियों से, रेशम कीड़ों से उत्पन्न होते हैं । गुणों से मनुष्य उत्तम होता है और न जाति से ।
आत्म पद- आत्म पद सब पदों में ऊँचा पद है । आत्म पद की प्राप्ति के लिए, केवल चित्त को शान्ति चाहिए ।
जीव की वृत्ति जैसी बदलती है, वैसा-वैसा रूप हो जाता है । जिस पुरुष को संसार के पदार्थों की इच्छाएं नहीं हैं तथा भाव अभाव से छूट गया है, वह उत्तम पद को पाता है ।
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