आरोग्यनिधि


 

निवेदन

प्रत्येक मनुष्य के जीवन में इन तीन बातों की अत्यधिक आवश्यकता होती है स्वस्थ जीवन, सुखी जीवन तथा सम्मानित जीवन। सुख का आधार स्वास्थ्य है तथा सुखी जीवन ही सम्मान के योग्य है।

उत्तम स्वास्थ्य का आधार है यथा योग्य आहार-विहार एवं विवेकपूर्वक व्यवस्थित जीवन। बाह्य चकाचौंध की ओर अधिक आकर्षित होकर हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं इसलिए हमारा शरीर रोगों का घर बनता जा रहा है।

चरक संहिता में कहा गया हैः

आहाराचारचेष्टासु सुखार्थी प्रेत्य चेह च।

परं प्रयत्नमातिष्ठेद् बुद्धिमान हित सेवने।।

'इस संसार में सुखी जीवन की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान व्यक्ति आहार-विहार, आचार और चेष्टाएँ हितकारक रखने का प्रयत्न करें।'

उचित आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य ये तीनों वात, पित्त और कफ को समान रखते हुए शरीर को स्वस्थ व निरोग बनाये रखते हैं, इसीलिए इन तीनों को उपस्तम्भ माना गया है। अतः आरोग्य के लिए इन तीनों का पालन अनिवार्य है।

यह एक सुखद बात है कि आज समग्र विश्व में भारतीय के आयुर्वेद के प्रति श्रद्धा, निष्ठा व जिज्ञासा बढ़ रही है क्योंकि श्रेष्ठ जीवन-पद्धति का जो ज्ञान आयुर्वेद ने इस विश्व को दिया है, वह अद्वितीय है। अन्य चिकित्सा पद्धतियाँ केवल रोग तक ही सीमित हैं लेकिन आयुर्वेद ने जीवन के सभी पहलुओं को छुआ है। धर्म, आत्मा, मन, शरीर, कर्म इत्यादि सभी विषय आयुर्वेद के क्षेत्रान्तर्गत आते हैं।

आयुर्वेद में निर्दिष्ट सिद्धान्तों का पालन कर के हम रोगों से बच सकते हैं, फिर भी यदि रोगग्रस्त हो जावें तो यथासंभव एलोपैथिक दवाइयों का प्रयोग न करें क्योंकि ये रोग को दूर करके 'साइड इफेक्ट' के रूप में अन्य रोगों का कारण बनती हैं।

श्री योग वेदान्त सेवा समिति ने प्रस्तुत पुस्तक में आयुर्वेद के विभिन्न अनुभूत नुस्खों का संकलन कर ऐसी जानकारी देने का प्रयास किया है जिससे आप घर बैठे ही विभिन्न रोगों का प्राथमिक उपचार कर सकें। आशा है आप इसका भरपूर लाभ लेंगे।

विनीत,

श्री योग वेदान्त सेवा समिति,

अमदावाद आश्रम।

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अनुक्रम

 

निवेदन.. 2

ऑपरेशन के अभिशाप से बचिए.. 17

अंग्रेजी दवाइयों की गुलामी कब तक ?.. 18

प्राकृतिक चिकित्सा के मूल तत्त्व... 18

ऋतुचर्या... 21

वसन्त ऋतुः... 21

वर्षा ऋतु में आहार-विहारः.. 23

शरद ऋतु में स्वास्थ्य सुरक्षाः..... 24

हेमन्त और शिशिर की ऋतुचर्याः.... 26

अवश्य पढ़ें-. 28

वेग रोकने से होने वाले रोग.. 30

भूख रोकने से होने वाले रोगः... 30

प्यास रोकने से होने वाले रोगः... 30

खाँसी रोकने से होने वाले रोगः... 30

थकान के कारण फूली हुई साँस को रोकने से होने वाले रोगः... 31

छींक रोकने से होने वाले रोगः... 31

पुस्तक में प्रयुक्त तोल-माप.. 31

आरोग्यनिधि रोग एवं उपचार. 31

आँखों के रोग.. 32

नेत्रज्योति बढ़ाने के लिएः... 32

रतौंधी अर्थात् रात को न दिखना (Night Blindness)-. 32

आँखों का पीलापनः... 32

आँखों की लालिमाः.... 32

आँखों का कालापनः... 33

आँखों की गर्मी या आँख आने परः.. 33

आँख की अंजनी (मुहेरी या बिलनी) (Stye)-. 33

आँख में कचरा जाने परः.. 33

आँख दुखने परः.. 33

आँखों से पानी बहने परः.. 33

मोतियाबिंद (Cataract) एवं झामर (तनाव)-. 33

चश्मा उतारने के लिएः... 34

सर्वप्रकार के नेत्ररोगः... 34

आँखों की सुरक्षाः..... 34

आँखों की सुरक्षा का मंत्रः... 34

नेत्ररोगों के लिए चाक्षोपनिषद्.. 34

चाक्षुषोपनिषद् की पठन-विधिः..... 36

नाक के रोग.. 37

नकसीर (नाक से रक्त गिरना)(Epistaxis)-. 37

घ्राणशक्ति का अभावः... 37

नाक की हड्डी का बढ़ जानाः.... 37

कान के रोग.. 38

कान में पीब(मवाद) होने परः.. 38

बहरापनः... 38

कान का दर्दः... 38

कान में आवाज होने परः.. 39

कान में कीड़े जाने परः.. 39

कान के सामान्य रोगः... 39

दाँत के रोग.. 39

दाँत की सफाई तथा मजबूतीः.... 39

दाढ़ का दर्दः... 39

मसूढ़ों की सूजनः... 40

दाँत खटा जाने परः.. 40

दाँत क्षत-विक्षत अवस्था में-. 40

रक्तस्राव बंद करने हेतुः... 40

पायरियाः.... 40

दाँत-दाढ़ के दर्द पर मंत्र प्रयोगः... 40

दाँतों की सुरक्षा हेतुः... 41

हिचकीः..... 43

आवाज बैठ जाने परः.. 43

पेट के रोग.. 43

मंदाग्नि और अजीर्णः.... 43

अपच.. 44

अरूचि... 44

आफरा व पेटदर्द.. 44

नाभि (गोलाहुटी) के अपने स्थान से खिसकने परः.. 45

यकृत (लीवर) एवं प्लीहा (तिल्ली) (Spleen) के रोगः... 46

सब प्रकार के शूल रोगः... 46

आंत्रपुच्छ शोथ (अपेन्डिसाइटिस)-. 46

अम्लपित्त(Acidity) के रोगः... 47

कब्जियत.. 48

बवासीर (मस्से) (Piles). 49

खूनी बवासीर. 50

बवासीर का मंत्रः... 50

उलटी एवं दस्त.... 50

उलटी होने पर. 50

दस्त होने पर. 51

खूनी दस्त.... 51

अतिसार. 52

पांडुरोग(Anaemia) एवं पीलिया (Jaundice). 52

पांडुरोग.. 52

पीलिया... 53

पीलिया का मंत्र.. 53

अण्डवृद्धि एवं अंत्रवृद्धि (Hernia). 53

सर्दी-जुकाम-खाँसी... 54

खाँसी... 55

श्वास-दमा (Asthama) हाँफ.. 56

क्षय रोग (टी.बी.). 56

रक्तचाप (ब्लडप्रेशर). 57

मूत्र रोग.. 58

पेशाब में मवाद बहने पर. 59

पेशाब में रक्त आना... 59

पथरी (Stones). 59

प्रमेह (पेशाब का रंग बदलना व बहुमूत्रता) (Polyurea). 60

मधुप्रमेह (डायबिटीज). 60

हृदय-रोग.. 61

हृदय की कमजोरी.. 61

वीर्यवृद्धि... 62

वीर्यवृद्धि हेतुः... 62

धातुस्राव होने पर. 62

स्वप्नदोष.. 63

बुखार (Fever). 63

सादा बुखार. 63

सन्निपात ज्वर. 64

जीर्ण ज्वर. 64

मलेरिया... 65

मलेरिया की अक्सीर (रामबा) औषधिः..... 65

टायफाईडः... 66

सर्दी का बुखारः.. 66

पित्तज्वर. 67

न्यूमोनिया... 67

सर्व प्रकार के बुखार की रामबाण दवा... 67

शरीरपुष्टि... 67

असमय आनेवाले वृद्धत्व को रोकने के लिएः... 68

सिर के रोग.. 68

सिरदर्द.. 68

सर्दी का सिरदर्द.. 69

आधासीसी (Migraine)-. 69

अपस्मार (मिर्गी) (Epilepsy)-. 70

चक्कर आना... 70

अनिद्रा... 71

मूर्च्छा..... 71

लौकी का तेल बनाने की विधि... 71

त्वचा के रोग.. 72

गर्मी (त्वचा पर लालिमा व जलन). 72

खुजली (Eczema). 72

घमौरियाँ... 73

शीतपित्त (Urticaria). 73

खाज (Pruritis). 73

दाद (Ringworm). 74

रक्तविकार. 74

शीतला (चेचक). 74

सफेद दाग (कोढ़). 75

वातरक्त (लेप्रसी-कुष्ठ रोग). 75

त्वचा के मस्से.... 76

जलने पर. 76

जलने से होने वाले दागः... 76

त्वचा के सर्वरोगः... 77

रक्तस्राव होने पर. 77

फोड़े-फुन्सी एवं गाँठ.. 77

फोड़े फुन्सी होने पर. 77

गाँठ.. 78

काँखफोड़ा (बगल मे होने वाला फोड़ा)-. 79

घाव और छाले.. 79

चेचक के घावः... 79

भीतरी (अंदरूनी) चोट.. 80

भीतरी चोट.. 80

मोच एवं सूजनः... 80

हाथीपाँव.. 81

वातरोग-गठिया आदि... 81

वातरोग.. 81

संधिवात (Arthritis). 82

कमर का वातरोग.. 82

पैरों का वात (सायटिका). 82

आमवात (गठिया) (Gout)-. 83

कंपवात.. 83

वायु के सर्वरोग.. 83

मांसपेशियों का दर्द.. 84

लकवा (पक्षाघात) (Paralysis). 84

स्त्री-रोग.. 85

श्वेत प्रदर (Leucorrhoea)-. 85

रक्तप्रदर (Menorrhagia)-. 85

मासिक पीड़ा.. 86

मासिक अधिक होने पर. 86

मासिक बंद होने पर. 86

गर्भधारण.. 86

गर्भस्थापक.. 87

गर्भरक्षा... 87

सुन्दर बालक के लिए.. 88

गर्भिणी की उल्टी..... 88

गर्भिणी के पेट की जलन.. 88

प्रसव पीड़ा.. 88

सूतिका रोग.. 89

सौभाग्यसूंठी पाकः.... 89

स्तन रोगः... 90

दुग्धवर्धकः.... 90

तन-मन से निरोग-स्वस्थ व तेजस्वी संतान-प्राप्ति के नियम.. 91

गर्भवती स्त्री द्वारा रखने योग्य सावधानी... 92

गर्भवती स्त्री के लिए पथ्य आहार-विहारः.. 92

शिशु-रोग.. 93

दस्त लगने पर. 93

उदरविकार. 93

अपच.. 94

सर्दी-खाँसी... 94

वराध (बच्चों का एक रोग हब्बा-डब्बा). 94

न्यूमोनिया... 94

फुन्सियाँ होने पर. 94

दाँत निकलने पर. 95

पेट के कृमि... 95

मुँह से लार निकलनाः.... 96

तुतलापनः... 96

शैयामूत्र (Enuresis). 96

बालकों की पुष्टि... 97

स्मरणशक्ति बढ़ाने हेतु.. 97

शिशु को नींद न आने पर. 97

सौन्दर्य.. 97

त्वचा की कान्ति..... 97

त्वचा की ताजगी... 98

शुष्क त्वचा... 98

मुँह की खीलें (Pimples). 99

बिवाई होने पर. 99

होंठ फटने परः.. 99

सौन्दर्य का खजाना... 99

बाल के रोग.. 100

सिर में रूसी (Dandruff) होने परः.. 100

बाल झड़ने पर. 100

गंजापन.. 100

बाल सफेद होने पर. 101

बाल बढ़ाने के लिए.. 101

सिर में जूँ एवं लीख... 101

बालों की मुलायमता... 101

सामान्य रोग.. 102

आंतरिक गर्मी... 102

तलुओं की जलन.. 102

मोटापा... 103

वजन बढ़ाने हेतु.. 103

ऊँचाई बढ़ाने हेतु.. 103

वेदना... 103

काँटा लगने पर. 104

कुछ रोगों से बचाव.. 104

लू लगने पर. 104

शराब का नशा... 104

पैसे अथवा पैसे जैसी चीजें निगल जाने परः.. 104

शरीर ठण्डा एवं नाड़ी की गति मंद होने पर. 104

विषैली वस्तु खाने पर या दवाई की प्रतिकूल असर होने पर. 105

विद्युत का झटका... 105

अल्सरः.. 105

कॉलराः... 105

कैंसर. 105

हिस्टीरिया... 106

विष चिकित्सा..... 106

बिच्छू दंश.. 106

सर्प दंशः... 107

भौंरी, मक्खी, मधुमक्खी के दंश.. 108

लूता (ब्लस्टर-जिसकी पेशाब से फफोले हो जाते हैं) का विष.. 108

स्थावर-जंगम विष.. 109

स्थावर विष.. 109

जंगम विष.. 109

धतूरे का विष.. 109

तमाकू (तम्बाकू). 110

विभिन्न रोगों के लिए औषधियों के नुस्खे..... 110

गेहूँ के ज्वारेः एक अनुपम औषधि... 111

गेहूँ के ज्वारे उगाने की विधि... 112

बनाने की विधि... 113

रामबाण इलाज.. 113

सस्ता और सर्वोत्तमः... 114

रस-प्रयोग.. 114

शक्कर-नमकः कितने खतरनाक! 117

चीनी के संबंध में वैज्ञानिकों के मत.. 118

प्रकृति के कुछ अनमोल उपहार. 120

तुलसी... 120

नींबू का रस.. 121

मधु (शहद). 122

पृथ्वी पर का अमृतः गाय का दूध.. 124

लहसुन.. 125

नवजात शिशु का स्वागत.. 125

प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा उपचार. 126

तीव्र रोग.. 127

जीर्ण रोग.. 127

प्राकृतिक चिकित्सा..... 127

जल से चिकित्सा..... 127

चमत्कारिक 'पानी प्रयोग' 129

सूर्य चिकित्सा..... 130

सूर्यनारायण की विधि... 131

सूर्य किरण चिकित्सा..... 131

सूर्यरश्मियों के रंगः... 132

सूर्य-किरण प्रयोग के माध्यमः... 132

कुछ आवश्यक बातें-. 133

त्रिदोषों का संतुलनः... 133

नीले रंग के गुण.. 134

हरे रंग के गुण.. 134

लाल रंग के गुण.. 135

सफेद रोशनी के गुण.. 136

मिट्टी चिकित्सा..... 136

मिट्टी की पट्टी... 136

पट्टी रखने की विधि... 137

मिट्टी की पट्टी से लाभः... 137

शरीर के भिन्न-भिन्न भागों पर मिट्टी चिकित्सा..... 137

सिर पर ठण्डी मिट्टी का प्रयोगः... 138

आँख पर मिट्टी की पट्टी... 138

पेट पर मिट्टी की पट्टी... 138

मलद्वार (गुदा) पर मिट्टी चिकित्सा..... 138

त्वचा के रोग पर मिट्टी चिकित्सा..... 138

तैलाभ्यंग (मालिश). 139

मालिश की विधि... 140

अभ्यंग काल.. 140

अभ्यंग से लाभः... 141

अभ्यंग किसका न करें-. 142

स्वेदन चिकित्सा (सेंक). 143

वाष्प स्वेद (Steam Bath). 143

प्रस्तर स्वेद.. 144

नाड़ी स्वेद.. 144

अवगाह स्वेद (Tub Bath). 144

पिंड स्वेद या संकर स्वेद.. 144

परिषेक स्वेद.. 144

चुम्बक चिकित्सा..... 145

पानी को चुम्बकांकित करने की विधि... 145

चुम्बकांकित पानी की मात्रा... 145

ऐक्युप्रेशर. 146

दबाव डालने की रीतः... 147

रोगों से बचाव.. 147

हस्त-चिकित्सा..... 148

हथेलियों में सर्वरोगनिवारक और सौन्दर्यवर्धक शक्तिः..... 148

टोपी एवं पगड़ी स्वास्थ्यरक्षक है. 150

पादुका धारण करने के लाभ.. 150

विविध रोगों में आभूषण-चिकित्सा..... 151

कुछ उपयोगी मंत्र.. 153

स्वास्थ्य का मंत्रः... 153

महामृत्युंजय-मंत्र की महिमा और जपविधि... 153

सर्वव्याधिनाश के लिए लघु मृत्युंजय-जप.. 154

भूत-प्रेत भगाने का मंत्र.. 155

बीजमंत्रों के द्वारा स्वास्थ्य-सुरक्षा... 155

पृथ्वी तत्व... 156

जल तत्व... 156

अग्नि तत्व... 156

वायु तत्व... 156

आकाश तत्व... 157

यादशक्तिवर्धक भ्रामरी प्राणायाम.. 157

ऊर्जायी प्राणायाम.. 158

ब्रह्ममुद्रा... 158

कुछ अन्य उपयोगी मुद्राएँ.. 159

अग्निसार क्रिया... 161

पादपश्चिमोत्तानासन.. 162

स्वास्थ्यरक्षक मेथी... 163

वायु के कारण होने वाली हाथ पैर की पीड़ा के लिए.. 163

प्रसूता स्त्री का दूध लाने या बढ़ाने के लिए.. 163

गर्मी में लू लगने पर. 164

आँव के लिए.. 164

बहुमूत्र के लिए.. 164

रक्तातिसार. 164

पायरिया... 164

डायबिटीज.. 164

बेदानाः एक अदभुत औषधि... 164

भस्मासुर क्रोध से बचो... 166

परम स्वास्थ्य के मार्ग पर. 167

आश्रम द्वारा चिकित्सा व्यवस्था..... 167

स्वास्थ्य का सच्चा मार्ग.. 168

 

 

ऑपरेशन के अभिशाप से बचिए

प्रो. एलोंजी क्लार्क (एम.डी.) का कहना हैः

"हमारी सभी दवाइयाँ विष हैं और इसके फलस्वरूप दवाई की हर मात्रा रोगी की जीवनशक्ति का ह्रास करती है।"

आजकल जरा-जरा सी बात में ऑपरेशन की सलाह दे दी जाती है। वाहन का मैकेनिक भी अगर कहे कि क्या पता, यह पार्ट बदलने पर भी आपका वाहन ठीक होगा कि नहीं ? तो हम लोग उसके गैरेज में वाहन रिपेयर नहीं करवाते लेकिन आश्चर्य है कि सर्जन-डॉक्टर के द्वारा गारंटी न देने पर भी ऑपरेशन करवा लेते हैं !

युद्ध में घायल सैनिकों तथा दुर्घटनाग्रस्त रोगियों को ऑपरेशन द्वारा ठीक किया जा सकता है किन्तु हर रोगी को छुरी की तेज धार के घाट उतारकर निर्बल बना देना मानवता के विरुद्ध उपचार है।

ऑपरेशन के द्वारा शरीर के विजातीय द्रव्यों को निकालने की अपेक्षा जल, मिट्टी, सूर्यकिरण और शुद्ध वायु की कुदरती मदद से उन्हें बाहर निकालना एक सुरक्षित और सुविधाजनक उपाय है। किसी अनुभवी वैद्य की सलाह लेकर एवं समुचित विश्राम एवं अनुकूल आहार का सही तरीके से सेवन करके भी पूर्ण स्वास्थ्य-लाभ पाया जा सकता है।

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अनुक्रम

अंग्रेजी दवाइयों की गुलामी कब तक ?

सच्चा स्वास्थ्य यदि दवाइयों से मिलता तो कोई भी डॉक्टर, कैमिस्ट या उनके परिवार का कोई भी व्यक्ति कभी बीमार नहीं पड़ता। स्वास्थ्य खरीदने से मिलता तो संसार में कोई भी धनवान रोगी नहीं रहता। स्वास्थ्य इंजेक्शनों, यंत्रों, चिकित्सालयों के विशाल भवनों और डॉक्टर की डिग्रियों से नहीं मिलता अपितु स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने से एवं संयमी जीवन जीने से मिलता है।

अशुद्ध और अखाद्य भोजन, अनियमित रहन-सहन, संकुचित विचार तथा छल-कपट से भरा व्यवहार ये विविध रोगों के स्रोत हैं। कोई भी दवाई इन बीमारियों का स्थायी इलाज नहीं कर सकती। थोड़े समय के लिए दवाई एक रोग को दबाकर, कुछ ही समय में दूसरा रोग उभार देती है। अतः अगर सर्वसाधारण जन इन दवाइयों की गुलामी से बचकर, अपना आहार शुद्ध, रहन-सहन नियमित, विचार उदार तथा व्यवहार प्रेममय बनायें रखें तो वे सदा स्वस्थ, सुखी, संतुष्ट एवं प्रसन्न बने रहेंगे। आदर्श आहार-विहार और विचार-व्यवहार ये चहुँमुखी सुख-समृद्धि की कुंजियाँ हैं।

सर्दी-गर्मी सहन करने की शक्ति, काम एवं क्रोध को नियंत्रण में रखने की शक्ति, कठिन परिश्रम करने की योग्यता, स्फूर्ति, सहनशीलता, हँसमुखता, भूख बराबर लगना, शौच साफ आना और गहरी नींद ये सच्चे स्वास्थ्य के प्रमुख लक्षण हैं।

डॉक्टरी इलाज के जन्मदाता हेपोक्रेटस ने स्वस्थ जीवन के संबंध में एक सुन्दर बात कही हैः

पेट नरम, पैर गरम, सिर को रखो ठण्डा।

घर में आये रोग तो मारो उसको डण्डा।।

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अनुक्रम

प्राकृतिक चिकित्सा के मूल तत्त्व

अगर मनुष्य कुछ आवश्यक बातों को जान ले तो वह सदैव स्वस्थ रह सकता है।

आजकल बहुत से रोगों का मुख्य कारण स्नायु-दौर्बल्य तथा मानसिक तनाव (Tension) है जिसे दूर करने में प्रार्थना बड़ी सहायक सिद्ध होती है। प्रार्थना से आत्मविश्वास बढ़ता है, निर्भयता आती है, मानसिक शांति मिलती है एवं नसों में ढीलापन (Relaxation) उत्पन्न होता है अतः स्नायविक तथा मानसिक रोगों से बचाव व छुटकारा मिल जाता है। रात्रि-विश्राम के समय प्रार्थना का नियम व अनिद्रा रोग एवं सपनों से बचाता है।

इसी प्रकार शवासन भी मानसिक तनाव के कारण होने वाले रोगों से बचने के लिए लाभदायी है।

प्राणायाम का नियम फेफड़ों को शक्तिशाली रखता है एवं मानसिक तथा शारीरिक रोगों से बचाता है। प्राणायाम दीर्घ जीवन जीने की कुंजी है। प्राणायाम के साथ शुभ चिन्तन किया जाये तो मानसिक एवं शारीरिक दोनों रोगों से बचाव एवं छुटकारा मिलता है। शरीर के जिस अंग में दर्द एवं दुर्बलता तथा रोग हो उसकी ओर अपना ध्यान रखते हुए प्राणायाम करना चाहिए। शुद्ध वायु नाक द्वारा अंदर भरते समय सोचना चाहिए कि प्रकृति से स्वास्थ्यवर्धक वायु रोगवाले स्थान पर पहुँच रही है जहाँ मुझे दर्द हो रहा है। आधा मिनट श्वास रोक रखें व पीड़ित स्थान का चिन्तन कर उस अंग में हल्की-सी हिलचाल करें। श्वास छोड़ते समय यह भावना करनी चाहिए कि 'पीड़ित अंग से गंदी हवा के रूप में रोग के किटाणु बाहर निकल रहे है एवं मैं रोग मुक्त हो रहा हूँ। ॐ....ॐ....ॐ....' इस प्रकार नियमित अभ्यास करने से स्वास्थ्यप्राप्ति में बड़ी सहायता मिलती है।

सावधानीः जितना समय धीरे-धीरे श्वास अन्दर भरने में लगाया जाये, उससे दुगुना समय वायु को धीरे-धीरे बाहर निकालने में लगाना चाहिए। भीतर श्वास रोकने को आभ्यांतर कुंभक व बाहर रोकने को बाह्य कुंभक कहते हैं। रोगी एवं दुर्बल व्यक्ति आभ्यांतर व बाह्य दोनों कुंभक करें। श्वास आधा मिनट न रोक सकें तो दो-पाँच सेकंड ही श्वास रोकें। ऐसे बाह्य व आभ्यांतर कुंभक को पाँच-छः बार करने से नाड़ीशुद्धि व रोगमुक्ति में अदभुत सहायता मिलती है।

स्वाध्याय अर्थात् जीवन में सत्साहित्य के अध्ययन का नियम मन को शांत एवं प्रसन्न रखकर तन को निरोग रहने में सहायक होता है।

स्वास्थ्य का मूल आधार संयम है। रोगी अवस्था में केवल भोजनसुधार द्वारा भी खोया हुआ स्वास्थ्य प्राप्त होता है। बिना संयम के कीमती दवाई भी लाभ नहीं करती है। संयम से रहने वाले व्यक्ति को दवाई की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है। जहाँ संयम है वहाँ स्वास्थ्य है और जहाँ स्वास्थ्य है वहीं आनन्द एवं सफलता है।

बार-बार स्वाद के वशीभूत होकर बिना भूख के खाने को असंयम और नियम से आवश्यकतानुसार स्वास्थ्यवर्धक आहार लेने को संयम कहते हैं। स्वाद की गुलामी स्वास्थ्य का घोर शत्रु है। बार-बार कुछ-न-कुछ खाते रहने के कारण अपच, मन्दाग्नि, कब्ज, पेचिश, जुकाम, खाँसी, सिरदर्द, उदरशूल आदि रोग होते हैं। फिर भी यदि हम संयम का महत्त्व न समझें तो जीवनभर दुर्बलता, बीमारी, निराशा ही प्राप्त होगी।

सदैव स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक है भोजन की आदतों में सुधार।

मैदे के स्थान पर चोकरयुक्त आटा, वनस्पति घी के स्थान पर तिल्ली का तेल, हो सके तो शुद्ध घी, (मूँगफली और मूँगफली का तेल स्वास्थ्य के लिए ज्यादा हितकारी नहीं।) सफेद शक्कर के स्थान पर मिश्री या साधारण गुड़ एवं शहद, अचार के स्थान पर ताजी चटनी, अण्डे-मांसादि के स्थान पर दूध-मक्खन, दाल, सूखे मेवे आदि का प्रयोग शरीर को अनेक रोगों से बचाता है।

इसी प्रकार चाय-कॉफी, शराब, बीड़ी-सिगरेट एवं तम्बाकू जैसी नशीली वस्तुओं के सेवन से बचकर भी आप अनेक रोगों से बच सकते हैं।

बाजारू मिठाइयाँ, सोने-चाँदी के वर्कवाली मिठाइयाँ, पेप्सी-कोला आदि ठण्डे पेय पदार्थ, आईसक्रीम एवं चॉकलेट के सेवन से बचें।

एल्यूमिनियम के बर्तन में पकाने और खाने के स्थान पर मिट्टी, चीनी, काँच, स्टील या कलई किये हुए पीतल के बर्तनों का प्रयोग करें। एल्यूमिनियम के बर्तनों का भोजन टी.बी., दमा आदि कई बीमारियों को आमंत्रित करता है। सावधान !

व्यायाम, सूर्यकिरणों का सेवन, मालिश एवं समुचित विश्राम भी अनेक रोगों से रक्षा करता है।

उपरोक्त कुछ बातों को जीवन में अपनाने से मनुष्य सब रोगों से बचा रहता है और यदि कभी रोगग्रस्त हो भी जाये तो शीघ्र स्वास्थ्य-लाभ कर लेता है।

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अनुक्रम

ऋतुचर्या

मुख्य रूप से तीन ऋतुएँ हैं- शीत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु और वर्षा ऋतु। आयुर्वेद के मतानुसार छः ऋतुएँ मानी गयी हैं- वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त, और शिशिर। महर्षि सुश्रुत ने वर्ष के 12 मास इन ऋतुओं में विभक्त कर दिये हैं।

वर्ष के दो भाग होते हैं जिसमें पहले भाग आदान काल में सूर्य उत्तर की ओर गति करता है, दूसरे भाग विसर्ग काल में सूर्य दक्षिण की ओर गति करता है। आदान काल में शिशिर, वसन्त एवं ग्रीष्म ऋतुएँ और विसर्ग काल में वर्षा एवं हेमन्त ऋतुएँ होती हैं। आदान के समय सूर्य बलवान और चन्द्र क्षीणबल रहता है।

शिशिर ऋतु उत्तम बलवाली, वसन्त ऋतु मध्यम बलवाली और ग्रीष्म ऋतु दौर्बल्यवाली होती है। विसर्ग काल में चन्द्र बलवान और सूर्य क्षीणबल रहता है। चन्द्र पोषण करने वाला होता है। वर्षा ऋतु दौर्बल्यवाली, शरद ऋतु मध्यम बल व हेमन्त ऋतु उत्तम बलवाली होती है।

वसन्त ऋतुः

शीत व ग्रीष्म ऋतु का सन्धिकाल वसन्त ऋतु होता है। इस समय में न अधिक सर्दी होती है न अधिक गर्मी होती है। इस मौसम में सर्वत्र मनमोहक आमों के बौर की सुगन्ध से युक्त सुगन्धित वायु चलती है। वसन्त ऋतु को ऋतुराज भी कहा जाता है।

वसन्त पंचमी के शुभ पर्व पर प्रकृति सरसों के पीले फूलों का परिधान पहनकर मन को लुभाने लगती है। वसन्त ऋतु में रक्तसंचार तीव्र हो जाता है जिससे शरीर में स्फूर्ति रहती है। वसन्त ऋतु में न तो गर्मी की भीषण जलन-तपन होती है और न वर्षा की बाढ़ और न ही शिशिर की ठंडी हवा, हिमपात व कोहरा होता है। इन्ही कारणों से वसन्त ऋतु को 'ऋतुराज' कहा गया है।

(वसन्ते निचितः श्लेष्मा दिनकृभ्दाभिरितः।)

चरक संहिता के अनुसार हेमन्त ऋतु में संचित हुआ कफ वसन्त ऋतु में सूर्य की किरणों से प्रेरित (द्रवीभूत) होकर कुपित होता है जिससे वसन्तकाल में खाँसी, सर्दी-जुकाम, टॉन्सिल्स में सूजन, गले में खराश, शरीर में सुस्ती व भारीपन आदि की शिकायत होने की सम्भावना रहती है। जठराग्नि मन्द हो जाती है अतः इस ऋतु में आहार-विहार के प्रति सावधान रहें।

वसन्त ऋतु में आहार-विहारः

इस ऋतु में कफ को कुपित करने वाले पौष्टिक और गरिष्ठ पदार्थों की मात्रा धीरे-धीरे कम करते हुए गर्मी बढ़ते हुए ही बन्द कर के सादा सुपाच्य आहार लेना शुरु कर देना चाहिए। चरक के सादा सुपाच्य आहार लेना शुरु कर देना चाहिये। चरक के अनुसार इस ऋतु में भारी, चिकनाईवाले, खट्टे और मीठे पदार्थों का सेवन व दिन में सोना वर्जित है। इस ऋतु में कटु, तिक्त, कषारस-प्रधान द्रव्यों का सेवन करना हितकारी है। प्रातः वायुसेवन के लिए घूमते समय 15-20 नीम की नई कोंपलें चबा-चबाकर खायें। इस प्रयोग से वर्षभर चर्मरोग, रक्तविकार और ज्वर आदि रोगों से रक्षा करने की प्रतिरोधक शक्ति पैदा होती है।

यदि वसन्त ऋतु में आहार-विहार के उचित पालन पर पूरा ध्यान दिया जाय और बदपरहेजी न की जाये तो वर्त्तमान काल में स्वास्थ्य की रक्षा होती है। साथ ही ग्रीष्म व वर्षा ऋतु में स्वास्थ्य की रक्षा करने की सुविधा हो जाती है। प्रत्येक ऋतु में स्वास्थ्य की दृष्टि से यदि आहार का महत्व है तो विहार भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।

इस ऋतु में उबटन लगाना, तेलमालिश, धूप का सेवन, हल्के गर्म पानी से स्नान, योगासन व हल्का व्यायाम करना चाहिए। देर रात तक जागने और सुबह देर तक सोने से मल सूखता है, आँख व चेहरे की कान्ति क्षीण होती है अतः इस ऋतु में देर रात तक जागना, सुबह देर तक सोना स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद है। हरड़े के चूर्ण का नियमित सेवन करने वाले इस ऋतु में थोड़े से शहद में यह चूर्ण मिलाकर चाटें।

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ग्रीष्मचर्याः

ग्रीष्मऋतु में हवा लू के रूप में तेज लपट की तरह चलती है जो बड़ी कष्टदायक और स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद होती है। अतः इन दिनों में पथ्य आहार-विहार का पालन करके स्वस्थ रहें।

पथ्य आहारः सूर्य की तेज गर्मी के कारण हवा और पृथ्वी में से सौम्य अंश (जलीय अंश) कम हो जाता है। अतः सौम्य अंश की रखवाली के लिए मधुर, तरल, हल्के, सुपाच्य, ताजे, जलीय, शीतल तथा स्निग्ध गुणवाले पदार्थों का सेवन करना चाहिए। जैसे ठण्डाई, घर का बनाया हुआ सत्तू, ताजे नींबू निचोड़कर बनाई हुई शिकंजी, खीर, दूध, कैरी, अनार, अंगूर, घी, ताजी चपाती, छिलके वाली मूंग की दाल, मौसम्बी,लौकी, गिल्की, चने की भाजी, चौलाई, परवल, केले की सब्जी, तरबूज के छिल्के की सब्जी, हरी ककड़ी, हरा धनिया, पोदीना, कच्चे आम को भूनकर बनाया गया मीठा पना, गुलकन्द, पेठा आदि खाना चाहिए।

इस ऋतु में हरड़े का सेवन गुड़ के साथ समान मात्रा में करना चाहिए जिससे वात या पित्त का प्रकोप नहीं होता है। इस ऋतु में प्रातः 'पानी-प्रयोग' अवश्य करना चाहिए जिसमें सुबह-सुबह खाली पेट सवा लिटर पानी पीना होता है। इससे ब्लडप्रेशर, डायबिटीज, दमा, टी.बी. जैसी भयंकर बीमारियाँ भी नष्ट हो जाती हैं। यह प्रयोग न करते हों तो शुरु करें और लाभ उठायें। घर से बाहर निकलते समय एक गिलास पानी पीकर ही निकालना चाहिए। इससे लू लगने की संभावना नहीं रहेगी। बाहर के गर्मी भरे वातावरण में से आकर तुरन्त पानी नहीं पीना चाहिए। 10-15 मिनट बाद ही पानी पीना चाहिए। इस ऋतु में रात को जल्दी सोकर प्रातः जल्दी जगना चाहिए। रात को जगना पड़े तो एक-एक घण्टे पर ठण्डा पानी पीते रहना चाहिए। इससे उदर में पित्त और कफ के प्रकोफ नहीं रहता।

पथ्य विहारः