
जीवन जीने की कला
भाग-1
जीवन को सुखमय बनाने की पूज्य बापू जी द्वारा बतायी गयी सरल व सचोट युक्तियाँ
विघ्न-बाधाओं और प्रलोभनों से कैसे बचें ?
आधा घंटा ॐकार के गुंजन के साथ एकटक इष्ट या गुरुदेव के श्रीचित्र को देखते रहो तो आपको एक सप्ताह में ऐसी धृति (धैर्य, ग्रहण या धारण क्षमता) प्राप्त होगी कि व्यावहारिक विघ्न-बाधाओं और प्रलोभनों से आप प्रभावित न रहकर अपने आत्मा-परमात्मा के उद्देश्य में टिके रहोगे।
घर के झगड़े मिटाने और सुख-शांति पाने के उपाय
शनिदेव स्वयं कहते हैं कि 'जो शनिवार को पीपल को स्पर्श करता है, उसको जल चढ़ाता है, उसके सब कार्य सिद्ध होंगे तथा मुझसे उसको कोई पीड़ा नहीं होगी।'
ग्रहदोष और ग्रहबाधा जिनको भी लगी हो, वे अपने घर में 9 अंगुल चौड़ा और 9 अंगुल लम्बा कुमकुम का स्वास्तिक बना दें तो ग्रहबाधा की जो भी समस्याएँ, दूर हो जायेंगी।
घर की आर्थिक कमी दर करने के सचोट, सरल उपाय
गाय के दूध के दही में थोड़ा पिसा जौ और तिल मिला दें। फिर उससे रगड़-रगड़कर 'ॐ लक्ष्मीनारायणाय नमः, ॐ लक्ष्मीनारायणाय नमः।....' जप करके स्नान करें।
तनाव व अनिद्रा से पायें छुटकारा
10 मिनट विधिवत् शवासन करने से या जीभ के अग्रभाग को दाँतों से थोड़ा दबाकर 10 मिनट तक ज्ञान मुद्रा लगा के बैठने से शारीरिक-मानसिक तनाव व अनिद्रा आदि की बीमारी दूर होती है।
गुर्दे आदि की बीमारियों से रक्षा
भोजन के बाद तुरंत मूत्र-त्याग करने से गुर्दे, कमर और जिगर के रोग नहीं होते। गठिया आदि अनेक बीमारियों से बचाव होता है।
निवेदन
न हि मनुष्यात् श्रेष्ठतरो हि किंचित्। (महाभारत, शांति पर्व)
समस्त प्राणियों में मनुष्य श्रेष्ठ है। आहार, निद्रा आदि तो पशु भी करते हैं परंतु धर्म-अधर्म अर्थात् कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेक एकमात्र मनुष्य को मिली हुई ईश्वरप्रदत्त सौगात है। इसी का पालन करते हुए वह परमात्मप्राप्तिरूपी ऐसी ऊँचाई को प्राप्त कर सकता है जो दैत्यों और देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।
मनुष्यै क्रियते यत्तु तन्न शक्यं सुरासुरैः। (ब्रह्म पुराण)
परंतु जीवन जीने का श्रेष्ठ तरीका पता न होने से या उसका पालन न करने से आज के मानव ने निरोगता खोकर अंग्रेजी दवाओं की गुलामी पायी, सादगी खो के फैशन पाया, संयम खो के उच्छृंखलता पायी, शांति खो के तनाव पाया, आत्मज्ञान खो के नश्वरता और जड़ता पायी, अखंड को भूलकर खंड-खंड में उलझा।
इस दुरावस्था से मुक्त व ईश्वरीय ज्ञान से युक्त होने के लिए जो अब पुनः वैदिक जीवन पद्धति के मार्गदर्शक पूज्य बापू जी जैसे आत्मानुभवी महापुरुषों की शरण में पहुँचते हैं वे धनभागी हैं! शास्त्रोचित आदर्श दिनचर्या को समझकर जो उसे अपने जीवन में उतारते हैं, उनके माता पिता धनभागी हैं ! इसमें परिश्रम बिल्कुल नहीं अपितु विश्राम समाया है। केवल दिशा बदलने मात्र से जीवन की दशा बदलेगी।
यह जीवनचर्या भगवत्प्राप्ति के पथिकों के लिए तो परम आवश्यक है ही किंतु जिनका लक्ष्य ईश्वरप्राप्ति नहीं है उनके लिए भी भौतिक सफलताप्राप्ति में बहुत मददरूप है। यह देर-सवेर उनके जीवन में भी भगवदीय रस, ज्ञान, शांति के प्रति अभिरूची पैदा करेगी।
इस सत्साहित्य में बतायी गयी दिनचर्या प्राचीन ऋषि मुनियों की वैदिक जीवन पद्धति का ही वर्तमान युग-अनुरूप सरल संस्करण है। इसे हम सहजता से आचरण में ला सकते हैं। इसमें जो भी कुंजियाँ पूज्य बापू जी ने बतायी हैं वे बापू जी ने स्वयं अपने जीवन में आजमायी हैं और लाभ का अनुभव होने पर भक्तों को प्रदान की हैं। असंख्य भक्तों ने इनका प्रयोग करके अनगिनत लाभों का अनुभव किया है। इसलिए इस अनुभूत जीवन-पद्धति को जो कोई जीवन में लाता है, उसे निश्चित ही लाभ होता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
प्रकाशक एवं वितरकः महिला उत्थान ट्रस्ट
संत श्री आशाराम जी आश्रम, साबरमती, अहमदाबाद, 380005 (गुजरात)
मुद्रकः हरि ॐ मैन्युफेक्चरर्स, कुंजा मतरालियों, पौंटा साहिब (हि.प्र.)
संकलकः धर्मेन्द्र गुप्ता प्रथम संस्करणः 20 हजार प्रतियाँ
इसमें ऐसी बातें बतायी हुई हैं जिनमें खर्च कुछ नहीं करना पड़ता या नाममात्र का होता है। ज्यादा चीज-वस्तुओं एवं कठिन विधि-विधान पर अवलम्बिता को घटाकर स्वावलम्बर पर जोर दिया गया है। आज के महँगाई के जमाने में यह सभी के लिए विशेष उपयोगी पहलू है।
पूज्य बापू जी ने सत्संग में प्रातः जागरण से लेकर रात्रि-शयन तक के समग्र क्रियाकलापों का सही एवं उत्तम ढंग बताया है। किंतु पूज्य श्री का सत्संग अथाह महासागर है। अतः सत्संगों से उन सब अमृतकणों का संचय करके उन्हें आश्रम की पत्रिका ऋषि प्रसाद में श्रृंखला के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। धनभागी हैं ऋषि प्रसाद के पाठक, जिन्हें इन कुंजियों का लाभ सर्वप्रथम मिला और मिलता रहेगा ! और वे पुण्यात्मा साधक भी धनभागी हैं जो उऩ तक ऋषि प्रसाद पहुँचाते हैं। अब शेष लोगों एव पत्रिका के सदस्यों को भी संग्रहरूप में इन युक्तियों का लाभ मिले इस हेतु यह संकलन प्रस्तुत है।
इस भाग 1 में रात्रि शयन, प्रातः-जागरण, नित्यकर्म तथा तिलक व प्रणाम की महत्ता दी है। आगामी भागों में आगे की जीवनचर्या दी जायेगी।
यह सत्साहित्य-पुष्प सभी के जीवन को सत्कर्तव्य, सद्ज्ञान एवं पूर्ण सुख से सुशोभित-सुवासित करे, ऐसी गुरु चरणों में प्रार्थना।

बापू जी ने जीने का सही ढंग सिखाया, जीवन का उद्देश्य समझाया
बापू जी ने हमे नींद को योगनिद्रा बनाना सिखाया।
· रात की नींद को योगनिद्रा बनाने की कला।
· अच्छी व गहरी नींद की युक्ति, बुरे व विकारी सपनों से बचाव
· नींद लाने का सरल उपाय, क्षमा-प्रार्थना करके रात्रि को सोयें
· चित्त के दोषों का शमन करने का प्रयोग
· रात्रि-शयन भी परमात्मप्राप्ति की साधना
बापू जी ने प्रातः जागरण को साधनामय बनाना सिखाया
· ब्राह्म मुहूर्त में सोये पड़े रहने के दुष्परिणाम
· ब्राह्ममुहूर्त में उठने का सरल उपाय
· बच्चे-बच्चियों को नींद से उठाने की मधुमय युक्ति
· आत्मशक्ति से शरीर, मन, बुद्धि को पुष्ट करो
· बुद्धि को मजबूत व प्रखर करने की युक्ति
· शशकासन (मत्थाटेक कार्यक्रम) का लाभ लें।
· सुबह उठकर दो बातों को याद करें, ऐसा चिंतन करें
· ऐसा पक्का निर्णय करें, विद्यार्थी ऐसा संकल्प करें
आत्मनिर्भरता की बतायी सुंदर युक्तिः करदर्शन
विघ्न-बाधाओं व दुर्घटना से बचने का उपाय
धरती माता के प्रति कृतज्ञ बनना सिखाया
बापू जी ने दिया पूरे दिन को मंगलमय बनाने का पाठ
प्रातः पानी प्रयोग कर स्वस्थ रहना सिखाया
शौच विज्ञान, प्रातर्विधिसंबंधी लाभकारी बातें
लघुशंका (पेशाब) करने का सही ढंग सिखाया
दातुन व मंजन करके दाँत मजबूत स्वस्थ रखें
तेल मालिश से हृष्ट-पुष्ट बनना सिखाया
· स्नान के प्रकार, स्नान को परमात्म-स्नान बनाने की कला
· स्नान का सही तरीका सिखाया, स्नान किससे करें ?
स्नान के द्वारा आध्यात्मिक व लौकिक लाभ लेना सिखाया
· पापनाशक, बुद्धिवर्धक स्नान, तीर्थोदक स्नान
· बाल काले व मजबूत बनाने की युक्तियाँ बतायीं
· स्नान कब करें, कब न करें ? स्नान के बाद क्या करें ?
बापू जी ने सिखाया स्वावलम्बन का पाठ
बापू जी ने कपड़े पहनने का सही ढंग सिखाया
· ढीले-ढाले सूती वस्त्र पहनो, सादगीपूर्ण जीवन
· भारतीय वेशभूषा की महत्ता समझायी
· कपड़े पहनो अंगों की रक्षा करने के लिए
बापू जी ने तिलक करना सिखाया व उसकी महत्ता बतायी
· किसी उँगली से तिलक करें ? किससे तिलक करें ?
महिलाओं को तिलक करने हेतु प्रेरित किया
· प्लास्टिक की बिंदी से किया सावधान
विद्यार्थियों की बुद्धिशक्ति बढ़ाने की युक्ति सिखायी
बापू जी ने अभिवादन की महिमा बताकर अभिवादन करना सिखाया
· साष्टांग दंडवत् प्रणाम किसलिये ? दंडवत् प्रणाम का रहस्य
जीवन बीमा करने की युक्ति सिखायी
पूज्य बापू जी द्वारा बतायी गयी सुखमय जीवन की अनमोल युक्तियाँ
· वैर को प्रीत में बदलने की युक्ति, स्वभाव सुधारने की सुंदर युक्ति
· घर के झगड़े व चिड़चिड़ा स्वभाव मिटाने की युक्ति
· जीवन सुखमय बनाने हेतु, नेत्रज्योति की रक्षा हेतु प्रयोग
भारतीय गोवंश की अदभुत विशेषताएँ
जीवन जीने की कला (भाग-1)

बापू जी ने जीवन जीने की सही ढंग सिखाया
जीवन का उद्देश्य समझाया
प्राणीमात्र का भला चाहने व करने वाले ब्रह्मज्ञानी महापुरुष पूज्य बापू जी ने अनेक प्रतिकूलताएँ सहते हुए साधना व तपस्या करके एवं अपने सदगुरु साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज की आज्ञा का पूर्ण पालन करके जो परमात्म-अनुभव रूपी खजाना पाया, उसे पिछले 50 वर्षों से संस्कृति एवं मानवमात्र के उत्थान में लुटा रहे हैं। सभी का तन तंदुरुस्त, मन प्रसन्न एवं बुद्धि में बुद्धिदाता का प्रकाश हो इस उद्देश्य से आप श्री ने मानवजीवन की महत्ता बताकर सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक की दिनचर्या के समस्त क्रियाकलापों को बड़े ही सुंदर ढंग से करना सिखाया है। पूज्य बापू जी उन प्रयोगों में से कइयों को करके भी हमारे सामने उदाहरण प्रस्तुत किया है। पूज्य श्री ने समाज व विश्व को जितना दिया है, उसका पूरा वर्णन कर पाना तो असम्भव है परंतु अल्प अंशमात्र वर्णन करने का प्रयास किया जा रहा है।
बापू जी ने हमें नींद को योगनिद्रा बनाना सिखाया
पूज्य
बापू जी ने सोने
की सुंदर कला सिखाते
हुए बताया है - "रात
को थके-मांदे होकर
भरे बोरे की नाँईं
बिस्तर पर मत गिरो।
सोते समय बिस्तर
पर ईश्वर से प्रार्थना
करो कि 'हे
प्रभु! दिनभर
में जो अच्छे काम
हुए वे तेरी कृपा
से हुए।'
गलती हो गई तो कातर
भाव से प्रार्थना
कर लो कि 'प्रभु
! तू क्षमा कर।
बुराई से मुझे
बचा ले। कल से कोई
बुरा कर्म न हो।
हे प्रभु !
मुझे तेरी प्रीति
दे दे....' भगवान
के नाम का उच्चारण
करना बाहर से कर्म
दिखता है लेकिन
भगवान के नाम का
उच्चारण करना,
यह पुकार है।"
रात की नींद को योगनिद्रा बनाने की कला
रात को नींद तमस के प्रभाव से आती है परंतु बापू जी ने नींद को साधना बनाने की युक्ति बतायी हैः "भगवन्नाम का उच्चारण करो और कह दो कि 'हम जैसे-तैसे हैं, तेरे हैं। ॐ शांति.... ॐ शांति... ॐ आनंद....' ऐसा करके लेट गये और श्वास अंदर जाय तो ॐ, बाहर आये तो 1.... श्वास अंदर जाय तो शांति, बाहर आये तो 2..... इस प्रकार श्वासोच्छ्वास की गिनती करते-करते सो जायें। इस प्रकार सोने से रात की निद्रा कुछ सप्ताह में योगनिद्रा बनने लगेगी और परमात्मा में पहुँच जाओगे।" अनुक्रमणिका
पूज्य श्री बताते हैं- "अच्छी नींद के लिए रात्रि का भोजन अल्प तथा सुपाच्य होना चाहिए। सोने से दो घंटे पहले (शाम 5 से 7 के बीच) भोजन करना अत्यंत उत्तम है। धरती पर सोते वक्त नीचे कोई गर्म कम्बल आदि बिछाकर सोयें ताकि आपके शरीर की विद्युतशक्ति भूमि में न उतर जाय। स्वच्छ, पवित्र स्थान में अच्छी, अविषम (ऊँची-नीची नहीं) एवं घुटनों तक की ऊँचाई वाली शय्या पर पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोना चाहिए। इससे जीवनशक्ति का विकास होता है तथा दीर्घायु की प्राप्ति होती है। जबकि उत्तर या पश्चिम दिशा की ओर सिर करके सोने से जीवनशक्ति का ह्रास होता है व रोग उत्तपन्न होते हैं। यथाकाल निद्रा के सेवन से शरीर पुष्ट होता है तथा बल और उत्साह की प्राप्ति होती है। निद्राविषयक उपयोगी नियमः
जिस किसी के बिस्तर पर, तकिय पर सिर न रखना ताकि उसके हलके स्पंदन तुमको नीचे न गिरायें।
जब आप शयन करें तब कमरे की खिड़कियाँ खुली हों और रोशनी न हो। शरीर की जैविक घड़ी को ठीक ढंग से चलाने हेतु रात्रि को बत्ती बंद करके सोयें।
सोने से कुछ समय पहले हाथ पैर धोयें, कुल्ला करें। फिर हाथ पैर अच्छी तरह पौंछकर सोना चाहिए। इससे गहरी नींद आती है तथा स्वप्न नहीं आते।
रात्रि के प्रथम प्रहर में सो जाना और ब्राह्ममुहूर्त में प्रातः 3-4 बजे नींद से उठ जाना अत्यंत उत्तम है। रात्रि 9 बजे से प्रातः 3-4 बजे तक गहरी नींद लेने मात्र से आधे रोग ठीक हो जाते हैं। कहा भी गया हैः अर्धरोगहारी निद्रा......। इससे स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है क्योंकि इस समय में ऋषि-मुनियों के जप-तप एवं शुभ संकल्पों का प्रभाव शांत वातावरण में व्याप्त रहता है। इस समय ध्यान-भजन करने से उनके शुभ संकल्पों का प्रभाव हमारे मनःशरीर में गहरा उतरता है। सूर्योदय के बाद तक बिस्तर पर पड़े रहना अपने स्वास्थ्य की कब्र खोदना है। अनुक्रमणिका
रात्रि को सोने से पूर्व 21 बार 'ॐ अर्यमायै नमः' मंत्र का जप करने से तथा तकिये पर अपनी माँ का नाम लिखने से (स्याही-पेन से नहीं, केवल उँगली से) व्यक्ति बुरे एवं विकारी सपनों से बच जाता है।
नींद लाने
हेतु लोग दवाइयाँ
खाते हैं परंतु
उससे भी लाभ नहीं
होता है। वैदिक
संस्कृति का दोहन
कर पूज्य बापू
जी ने सात्त्विक
व सरल उपाय बताया
हैः "रात्रि
को नींद न आती हो
या बुरे स्वप्न
आते हों तो सोते
समय 15 मिनट हरि ॐऽऽऽऽ.....
इस प्रकार गुंजन
करें। फिर 'शुद्धे-शुद्धे
महायोगिनी महानिद्रे
स्वाहा।'
इस मंत्र का जप
करें।
कब्जियत और पेट संबंधी बीमारी के कारण नींद न आती हो तो सुबह 5 से 7 तुलसी-पत्ते चबाकर ताँबे के बर्तन में रात का रखा आधा से डेढ़ गिलास पानी पियें तो अच्छा है। रविवार को तुलसी नहीं लेनी चाहिए।
वृद्ध लोगों को यदि नींद नहीं आती हो तो रात को बिस्तर पर बैठकर ॐ के केवल ओ का उच्चारण करें। ॐऽऽऽऽऽ..... बोलते-बोलते जितना दीर्घ उच्चारण कर सकें, करें। फिर जितना समय ओ बोलने में लगाया, उतना ही समय चुप हो जायें। ऐसा 10 मिनट करें, फिर सीधे सो जायें। नींद नहीं आती यह भूल जायें। नींद आये चाहे न आये, उसकी फिक्र छोड़ दें। थोड़े ही दिनों में कम नींद आने की शिकायत दूर हो जायेगी और यदि ज्यादा नींद आती होगी तो नपी-तुली हो जायेगी। बुरे स्वप्न दूर हो जायेंगे और रातभर भक्ति करने का फल मिलेगा। अनुक्रमणिका
क्षमा-प्रार्थना करके रात्रि को सोयें
रात्रि को सोते समय और सुबह उठने के बाद अनामिका उँगली से आज्ञाचक्र (भ्रूमध्य) पर रगड़ के 3 मिनट ॐ गुरु, ॐ गुरु.... जप करें और गुरु का ध्यान, गुरु से सम्पर्क करें, फिर शशकासन में दोनों हाथ जोड़कर मन-ही-मन क्षमा प्रार्थना करें- 'हे प्रभु! हे गुरुदेव!! आज जो अच्छे कर्म हुए हैं वे आपकी करूणा-कृपा से हुए हैं। जो बुरे कर्म हुए हैं वे मेरी बेवकूफी, नादानी से हुए है। अब ऐसी कृपा करना कि अच्छे कर्म ही हों, बुरे कर्म न हों। मैं जैसा-तैसा हूँ, आपका हूँ। फिर एक हाथ अपने इष्टदेव या सदगुरु का और एक हाथ अपना मानकर जोर से मिलाओ और मन में बोलो- 'बिन फेरे, हम तेरे....'' अनुक्रमणिका
चित्त के दोषों का शमन करने का प्रयोग
अहंकार, चिंता और व्यर्थ का चिंतन साधक की शक्ति को निगल जाते हैं। इनको मिटाने के लिए एक सुंदर मंत्र योगी गोरखनाथ जी ने बताया है। इसमें कोई विधि-विधान नहीं है। रात को सोते समय इस मंत्र का जप करो, संख्या का कोई आग्रह नहीं है। इस मंत्र से आपके चित्त की चिंता, तनाव, खिंचाव, दिक्कतें जल्दी शांत हो जायेंगी और साधन-भजन में बरकत आयेगी। मंत्र उच्चारण में थोड़ा कठिन जैसा लगेगा लेकिन याद रह जाने पर आसान हो जायेगा। बाहर के रोग तो बाहर की औषधि से मिट सकते हैं लेकिन भीतर के रोग बाहर की औषधि से नहीं मिटेंगे और इस मंत्र से टिकेंगे नहीं। हमारी जो जीवनधारा है, जीवनीशक्ति है, चित्तशक्ति है उसी को उद्देश्य करके यह मंत्र है-
ॐ चित्तात्मिकां महाचित्तिं चित्तस्वरूपिणीं आराधयामि चित्तजान् रोगान् शमय शमय ठं ठं ठं स्वाहा ठं ठं ठं स्वाहा।
इसके जप से आद्य़शक्ति चेतना चित्त के दोषों को दूर कर देती है, चित्त को निर्मल कर देती है।
'हे चित्तात्मिका, महाचित्ती, चित्तस्वरूपिणई ! मैं तेरी आराधना करता हूँ। जगत शक्तिदात्री भगवती ! मेरे चित्त के रोगों का तू शमन कर।'
'ठं' बीजमंत्र है, यह बड़ा प्रभाव करता है। किसी में लोभ, किसी में मोह, किसी में शराब पीने का, किसी में अहंकार का, किसी में शेखी बघारने का दोष होता है। चिंता, भय, क्रोध, अशांति झगड़े, विरोध – ये आतंक चित्त के दोष हैं और इन्हीं से जन्म-मरण होता है।
इसके जप से आद्यशक्ति चेतना चित्त के दोषों को दूर कर देती है, चित्त को निर्मल कर देती है। सीधे लेट गये, यह जप किया। जब तक निद्रा न आये तब तक इसका प्रयोग करें। निद्रा आने पर अपने-आप ही छूट जायेगा। रात को जप करके सोने से सुबह तुम स्वस्थ, निर्भय, प्रसन्न होकर उठोगे।
भगवान के मंत्र हों और भगवान को अपना मानकर प्रीतिपूर्वक जप करें तो चित्त भगवदाकार होकर भगवद् रस से पावन हो जाता। भगवद् रस के बिना दुःख नहीं मिटते, नीरसता नहीं जाती। जीवन की नीरसता मिटाने के लिए विकारों की, छल कपट आदि की धारा में जीवन खप जाता है जीवनदाता के अनुभव के बिना।" अनुक्रमणिका
रात्रि-शयन भी परमात्मप्राप्ति की साधना
पूज्य बापू जी ने रात्रि शयन को परमात्मप्राप्ति का साधन बनाने की सचोट साधना बतायी हैः "रात को सोते समय सीधे लेट गये। फिर श्वास अंदर गया तो 'ॐ', बाहर आये तो एक (गिनती)। पैर से लेकर घुटने तक का भाग पृथ्वी का अंश कहा गया है। घुटने से लेकर गुदा तक का भाग जल का अंश बतलाया गया है। गुदाभाग से ऊपर हृदय-प्रदेश तक क्षेत्र अग्नि-अंश माना गया है। हृदय से ऊपर भौंहों के मध्यभाग तक वायु का अंश निश्चित किया गया है और मस्तक का क्षेत्र आकाश-तत्त्व कहा गया है।
रात को
जब सोयें तो पृथ्वी
को जल में, जल को
तेज में, तेज को
वायु में और वायु
को आकाश में क्रमशः
लीन करो। फिर लीन
करने वाला मन बचता
है। फिर मन जहाँ
से स्फुरित होता
है, मन को अपने उस
मूल स्थान 'मैं'
में लीन करो। 'शांति....'शांति.....'
–ऐसा करते-करते
ईश्वरीय सागर में
शांति का अभ्यास
करते-करते आप सो
गये। 'सब
परमात्मा में विलय
हो गया, अब छः घंटे
मेरे को कुछ भी
नहीं करना है।
पाँच भूतों से
बने एक शरीर को
मैंने पाँच भूतों
में समेटकर अपने
आपको परमात्मा
में विलय कर लिया
है। अब कोई चिंता
नहीं, कुछ कर्तव्य
नहीं, कुछ प्राप्तव्य
नहीं है, आपाधापी
नहीं, संकल्प नहीं।
इस समय तो मैं भगवान
में हूँ, भगवान
मेरे हैं। जैसे
घटाकाश महाकाश
से अभिन्न है, तरंग
सागर से अभिन्न
है है, ऐसे ही मैं
विभु-व्यापक ब्रह्म
से अभिन्न हूँ।
मैं ब्रह्मस्वरूप
हूँ, चिदानंद हूँ,
चैतन्य हूँ। मैं
साक्षी हूँ, द्रष्टा
हूँ, विभु व्याप्त
हूँ ! सभी तरंगों
का अधिष्ठान पानी
है, ऐसे ही चर-अचर
का अधिष्ठान मैं
चैतन्य हूँ। ॐ
आनंद..... ॐ हरि..... मैं
शांत आत्मा हो
रहा हूँ। इस प्रकार
पाँच भूतों के
विलय की प्रक्रिया
से गुजरते हुए,
पाँच भूतों को
जो सत्ता देता
है, उस सत्ता-स्वभाव
में मैं शांत हो
रहा हूँ।'
अथवा तो 'इन
पाँचों भूतों को
समेटते हुए मैं
साक्षी ब्रह्म
में विश्राम कर
रहा हूँ।'
साक्षीभाव में
आप जाग जायेंगे।
अथवा तो इन पाँचों
को समेटकर 'सोऽहम्....
मैं इन पाँचों
भूतों से न्यारा
हूँ, आकाश से भी
व्यापक-चिदाकाश
हूँ, ब्रह्म हूँ।'
ऐसा करके सोओगे
तो यह साधना आपको
पराकाष्ठा की पराकाष्ठा
पर पहुँचा देगी।
बिल्कुल सरल साधना
है। शरणागति, भगवद्भाव,
साक्षीभाव अथवा
ब्रह्मसाक्षात्कार
चाहिए – सभी की सिद्धि
इससे होगी।
और सुबह जब उठें तो विचारें, 'कौन उठा? जैसे रात को समेटा तो (उसको उलटे क्रम से) सुबह जाग्रत करियेः मन जगा, फिर आकाश में आया, आकाश का प्रभाव वायु में आया, वायु का प्रभाव अग्नि में, अग्नि का जल में, जल का पृथ्वी में सारा व्यवहार चला। ' रात को समेटा और सुबह फिर जाग्रत किया, उतर आये। बहुत आसान साधना है और एकदम चमत्कारी फायदा देगी। केवल 180 दिनों में एक दिन भी खाली न जाय, निश्चय कर लो कि 'करनी है, करनी है, बस करनी है !' और आराम से हो सकती है। इससे ईश्वर-साक्षात्कार सहज हो जायेगा। इस साधना का अधिकारी गुरु के अनुभव को झेलने में सफल क्या, सुसफल हो जायेगा!" अनुक्रमणिका
बापू जी ने प्रातः-जागरण को साधनामय बनाना सिखाया
हमारी दिनचर्या का प्रारम्भ प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में जागरण से होता है। शात्रों की आज्ञा हैः
ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्यते। 'प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त में उठना चाहिए।'
ब्राह्ममुहूर्त में उठने की महिमा बताते हुए पूज्य बापू जी कहते हैं- "जो सूर्योदय से पहले (ब्राह्ममुहूर्त में) शय्या त्याग देता है, उसके अंतःकरण में सत्त्व गुण पुष्ट होता है। वह बड़ा तेजस्वी होता है, उसके ओज-वीर्य की रक्षा होती है और बुद्धिशक्ति बढ़ती है।
आध्यात्मिक साधना में आगे बढ़ना है तो सूर्योदय से सवा दो घंटे पहले जब ब्राह्ममुहूर्त शुरु होता है, तब उठो या फिर चाहे एक घंटा पहले उठो।
सुधा सरस
वायु बहे, कलरव
करत विहंग।
अजब अनोखा जगत में, प्रातः काल का रंग।।
जब चन्द्रमा की किरणें शांत हो गयी हों और सूर्य की किरणें अभी धरती पर नहीं पड़ी हों, ऐसी संध्या की वेला में सभी मंत्र जाग्रत अवस्था में रहते हैं। उस समय किया हुआ जप-प्राणायाम अमिट फल देता है। दृढ़ इच्छाशक्ति, रोग मिटाने तथा परमात्माप्राप्ति के लिए 40 दिन का प्रयोग करके देखो। यह अमृतवेला है। जिसे वैज्ञानिक सूर्योदय के पहले के हवामान में ओजोन और ऋण आयनों की विशेष उपस्थिति कहते हैं, इसी को शास्त्रकारों ने सात्त्विक, सामर्थ्यदाता वातावरण कहा है। अतः अमृतवेला का लाभ अवश्य लें। प्रातः 3 से 5 बजे के बीच प्राणायाम करने से बहुत लाभ होते हैं। अनुक्रमणिका
ब्राह्ममुहूर्त में सोये पड़े रहने के दुष्परिणाम
जो सूर्योदय से पूर्व नहीं उठता, उसके स्वभाव में तमस छा जाता है। जीवन की शक्तियाँ ह्रास होने का और स्वप्नदोष व पानी पड़ने की तकलीफ होने का समय प्रायः रात्रि के अंतिम प्रहर में होता है। अतः प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठना चाहिए, जिससे शरीर में रज-वीर्य का ऊर्ध्वगमन हो, बुद्धि प्रखर हो तथा रोगप्रतिकारक शक्ति सुरक्षित रहे।"
ब्राह्ममुहूर्त में उठने का सरल उपाय
बिना किसी की सहायता के प्रति दिन ब्राह्ममुहूर्त में उठ जाने के लिए एक छोटी सी युक्ति पूज्य बापू जी बताते हैं- "अलार्म घंटी बजा सकता है, पत्नी कम्बल हटा सकती है लेकिन नींद से तुम्हें जगाने का काम तो तुम्हारे सच्चिदानंद परमात्मा ही करते हैं। अतः तुम रात्रि में सोते समय उन्हीं की स्मृति में जाओ। उनमें प्रेमभाव करते होना चाहिए। उन्हीं से प्रार्थना करो, दृढ़ संकल्प करो।
यदि
सुबह आपकी नींद
नहीं खुलती है
अथवा अपने आप नहीं
उठ सकते हैं तो
रात को सोते समय
अपनी परछाई को
3 बार बोल दो कि 'मुझे
3 से 5 बजे के बीच प्राणायाम
करने हैं, तुम मुझे
4-4.30 बजे जगा देना।'
है तो तुम्हारी
छाया लेकिन ऐसा
कहोगे तो नींद
खुल जायेगी। फिर
उस समय आलस्य नहीं
करना। अपने कहे
अनुसार संकल्प
फल गया तो उसका
फायदा उठाओ।
यदि आपने इस युक्ति का आश्रय लिया और आलस्य का त्याग किया तो फिर कुछ दिनों में आप बिना किसी की सहायता के स्वयं उठने लगोगे।" अनुक्रमणिका
बच्चे-बच्चियों को नींद से उठाने की मधुमय युक्ति
पूज्य बापू जी बच्चों को सुबह नींद से उठाने की सुंदर युक्ति बताते हैं- "बच्चों को यंत्र के बल से मत जगाओ। अलार्म की ध्वनि 'ऐ उठो, उठो, 6 बज गये, 5 बज गये, 7 बज गये.....' खटखट करके उठाने से ये बच्चे आपके लिए खटपटिये हो जायेंगे, दुःखदायी हो जायेंगे। सुबह बच्चों को उठाओ तो कैसे उठाओ ? पहले आप शांत हो जाओ, आप प्रकाश में जाओ, अमृतमय ईश्वर में आ जाओ। बच्चों की गहराई में जो परमेश्वर है, वह मोहन है, गोविंद है, गोपाल है, राधारमण है। 'राधा', उलटा दो तो 'धारा', वृत्ति की धारा उलटा दो। धारा के द्वारा वह चैतन्य ही तो उल्लसित हो रहा है। बच्चों में भी गहराई में परमात्मा की भावना करो, फिर बोलो-
जागो मोहन प्यारे, जागो नंददुलारे।
जागो गोविंद प्यारे, जागो हरि के दुलारे।।
जागो लाला प्यारे, लाली दुलारी.....
राम-रमैया जागो, गोविंद गोपी जागो।
बच्चे बच्चियाँ उस परमात्मा की स्मृति से मधुमय हो जायेंगे तो तुम्हारे लिए भी सुखद होंगे और समाज के लिए भी।
सामूहिक रूप से लोगों को जगाना हो तो कहें-
जागो लोगो ! मत सुओ, न करो नींद से प्यार।
जैसा सपना रैन का, वैसा ये संसार।।
श्रीराम जय राम जय जय राम।
गोविंद हरे गोपाल हरे, जय जय प्रभु दीनदयाल हरे।
सुखधाम हरे आत्माराम हरे, जय जय प्रभु दीनदयाल हरे।।
हरि ॐ, प्रभु ॐ, प्यारे ॐ, शांति ॐ, आनंद ॐ.... मंगल प्रभात, शुभ प्रभात....
प्रेरणादायी प्रभु की सुखदायी सुबह आयी, जागो भाई ! प्यारे-प्यारे भाई !" अनुक्रमणिका
प्रातः जागरण जैसा होता है, वैसा पूरा दिन गुजरता है। जागरण के समय को भगवन्मय बना लिया तो पूरा दिन आनंदमय बन जायेगा। शरीर को स्वस्थ, मन को प्रसन्न तथा जीवन को रसमय, आनंदमय बनाकर परमात्मप्राप्ति की सुंदर युक्ति पूज्य बापू जी ने बतायी है- "नींद पूरी होती है, उस समय विश्रांति में होते हैं। स्फुरण नहीं होता। फिर धीरे से रसमय स्फुरण होता है, प्रगाढ़ स्फुरण होता है, फिर संकल्प होता है और संसार की दौड़-धूप में हम लगते हैं। अतः सुबह नींद में से चटाक् से मत उठो, पटाक् से घड़ी मत देखो। नींद खुल गयी, आँख न खुले, आँख खुल जाये तो तुरंत बंद कर दो, थोड़ी देर पड़े रहो। फिर जहाँ से हमारी मनः वृत्ति स्फुरित होती है, उस चैतन्यस्वरूप परमात्मा में, उस निःसंकल्प स्थिति में शांत हो जाओ। एक से दो मिनट कोई संकल्प नहीं। फिर जैसे बच्चा माँ की गोद में से उठता है, कैसा शांत ! ऐसे हम परमात्मा की गोद से बाहर आयें- 'ॐ शांति.... प्रभु की गोद में से मैं बाहर आ रहा हूँ। मेरा मन बाहर आये उससे पहले मैं फिर से मन सहित प्रभु के शांतस्वरूप, आनंदस्वरूप में जा रहा हूँ, ॐ शांति, ॐ आनंद.....' ऐसा मन से दोहराओ। आपका हृदय बहुत पवित्र होगा। अनुक्रमणिका
आत्मशक्ति से शरीर, मन, बुद्धि को पुष्ट करो
फिर लेटे-लेटे शरीर को खींचो। 2 मिनट खूब खींच-खींच के 2 मिनट ढीला छोड़ो ताकि आत्मा की शक्ति तुम्हारे शरीर, मन और बुद्धि में ज्यादा से ज्यादा आये। बूढ़े शरीर खींचेंगे तो बुढ़ापे की कमजोरी ज्यादा नहीं रहेगी और बच्चे खींचेंगे तो जीवन उत्साह एवं स्फूर्ति से भर जायेगा। तत्पश्चात बिस्तर में शांत बैठकर आत्मचिंतन करो- "मैं पाँच भूतों से बना हुआ शरीर नहीं हूँ। जो सत् है, चित् है, आनंदस्वरूप है और मेरे हृदय में स्फुरित हो रहा है, जो सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और संहार का कारण है और मेरे शरीर की उत्पत्ति, स्थिति और लय का कारण है, उस सच्चिदानंद का मैं हूँ और वे मेरे हैं। ॐ शांति, ॐ आनंद.....' 2-5 मिनट इस प्रकार तुम नींद में से उठ के शांत रहोगे तो मैं कहूँगा कि 2 दिन की तपस्या से वे 2 मिनट ज्यादा फायदा करेंगे, पक्की बात है !
अथवा आप यदि अपने जीवन में उन्नति चाहते हो तो सुबह नींद से उठकर शांत हो के बैठ जाओ। 'भगवान मैं तुम्हारा हूँ, तुम मेरे हो' ऐसा करके 5-7 मिनट बिस्तर पर ही बैठो। कुछ नहीं करना, सिर्फ इस बात को पकड़ के बैठ जाओ कि मैं भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं। ? शांति, ॐ आनंद....." अनुक्रमणिका
महान बनने की मधुमय युक्ति बताते हुए पूज्य बापू जी कहते हैं- "सुबह जब नींद खुले तो संकल्प करें कि 'आज का दिन तो आनंद में जायेगा। मुझे आत्मविद्या पानी है, योगविद्या सीखनी है।' खुद का नाम लेना। समझ लो मेरा नाम मोहन है। सवेरे उठकर खुद को कहनाः 'मोहन !'
बोलेः "हाँ बापू जी !' मान लो बापू जी अपने साथ बात कर रहे हैं।
'तुझे क्या चाहिए ?'
'मुझे तो आत्मविद्या, योगविद्या और लौकिक विद्या – तीनों को पाना है।' शांति, आनंद.... कुछ न करें। फिर संकल्प करें- 'ॐ .... हरि ॐॐॐ..... हरि ॐ.... शक्ति, भक्ति, योग्यता.... हरि ॐ.... हरि ॐ.... हरि ॐ....' फिर थोड़ा ध्यान करके हथेलियों को देखकर बिस्तर छोड़ें। इससे तीनों विद्याओं में प्रगति होगी। अनुक्रमणिका
बुद्धि को मजबूत व प्रखर करने की युक्ति
बुद्धि को मजबूत करने के लिए सुबह उठो तो विचारो कि परमात्मा में से मैं आया और मेरी मति व मन भी आया, अब इन्द्रियों के साथ हम भटकें नहीं इसलिए
प्रातः
स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं
सच्चित्सुखं परमहंसगकतिं तुरीयम्।
यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं
तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसंघः।।
'मैं प्रातःकाल हृदय में स्फुरित होते हुए आत्मतत्त्व का स्मरण करता हूँ, जो सत्, चित् और आनंदस्वरूप है, परमहंसों का प्राप्य स्थान है और जाग्रत आदि तीनों अवस्थाओं से विलक्षण 'तुरीय' है। जो स्वप्न, सुषुप्ति और जाग्रत अवस्था को नित्य जानता है, वह स्फुरणरहित ब्रह्म ही मैं हूँ, पंचभूतों का संघात (शरीर) मैं नहीं हूँ।'
प्रातः हम उसी परमेश्वर का स्मरण करते हैं जो वासुदेव है। इन्द्रियाँ मन में गयीं, मन बुद्धि में गया, बुद्धि जीवत्व में गयी और जीवत्व मेरे परमात्मा में डूब के आया है। जैसे कोई चीज फ्रिज में रखते हैं तो उसमे शीतलता आती है, ऐसे ही परमात्मा के निकट गये तो मेरे तन, मन, इन्द्रियों को शांति मिली और उसी के स्फुरण से मन स्फुरित हुआ तथा इन्द्रियाँ बहिर्मुख हुई हैं। मैं उस परमात्मा का स्मरण करता हूँ। मेरी बुद्धि में अपना सत्त्व दें परमेश्वर !
असतो मा सद्गमय। मुझे असत्य आसक्तियों, असत्य भोगों से बचाओ। तमसो मा ज्योतिर्गमय। यह करूँगा तो सुखी, यह भोगूँगा तो सुखी... यह अंधकार है। शरीर को मैं मानना, संसार को मेरा मानना – इस अंधकार-अज्ञान से बचाकर मुझे आत्मप्रकाश दो। मृत्योर्मा अमृतं गमय। मुझे बार-बार जन्मना और मरना न पड़े ऐसे अपने अमरस्वरूप की प्रीति और ज्ञान दे दो। ओ सदगुरु ! हे गोविंद ! हे माधव !....' भगवान का कोई भी नाम लो। ऐसे भगवान से सुबह थोड़ी देर प्रार्थना करके शांत हो जाओ। इससे बुद्धि में सत्त्व बढ़ेगा और बुद्धि मजबूत रहेगी, मन की गड़बड़ से मन को बचायेगी और मन इन्द्रियों को नियंत्रित रखेगा।" अनुक्रमणिका
5 क्लेश व्यक्ति को जन्म-मरण के चक्कर में भटकाते हैं, इनको दूर करने का सरल उपाय तत्त्ववेत्ता पूज्य बापू जी बताते हैं- "आपकी नाभि जठराग्नि का केन्द्र है। अग्नि नीचे फैली रहती है और ऊपर लौ होती है। तो जठराग्नि की जगह पर त्रिकोण की भावना करो और चिंतन करो, 'अविद्यमान वस्तुओं को, अविद्यमान परिस्थितियों को सच्चा मानकर जो भटकान कराती है, उस अविद्या को मैं जठराग्नि में स्वाहा करता हूँ। अविद्यां जुहोमि स्वाहा। अस्मिता है देह को मैं मानना। तो अस्मितां जुहोमि स्वाहा। मैं अस्मिता को अर्पित करता हूँ। द्वेषं जुहोमि स्वाहा। द्वेष को भी मैं अर्पित करता हूँ। फिर आखिरी पाँचवाँ क्लेश आता है अभिनिवेश – मृत्यु का भय। मृत्यु का भय रखने से कोई मृत्यु से बचा हो यह मैंने आज तक नहीं देखा-सुना, अपितु ऐसा व्यक्ति जल्दी मरता है। अतः अभिनिवेशं जुहोमि स्वाहा। मृत्यु के भय को मैं स्वाहा करता हूँ। अनुक्रमणिका
शशकासन (मत्थाटेक कार्यक्रम) का लाभ लें
फिर
अपने भगवान या
सदगुरुदेव को मन-ही-मन
प्रेमपूर्वक प्रणाम
करें और उनका मानस-पूजन
करें। तत्पश्चात
शशकासन में भगवान
से प्रार्थना करनी
चाहिएः 'हे
भगवान ! मैं
आपकी शरण में हूँ।
आज के दिन मेरी
पूरी सँभाल रखना।
दिन भर सदबुद्धि
बनी रहे। मैं निष्काम
सेवा और तुझसे
प्रेम करूँ, सदैव
प्रसन्न रहूँ,
आपका चिंतन न छूटे....'
शशकासन सभी को कम-से-कम 2 मिनट और बच्चे बच्चियों व महिलाओं को 3 मिनट करना ही चाहिए। अनुक्रमणिका
भारतीय संस्कृति में मानवमात्र के कल्याण के अद्भुत रहस्य छिपे हैं। शास्त्रों का दोहन कर पूज्य बापू जी ने उन रहस्यों से लाभ उठाने की अनुपम युक्तियाँ बतायी हैं। प्रातः उठकर बिस्तर में ही ध्यान करने के अद्भुत लाभ बताते हुए पूज्य बापू जी कहते हैं-
यदि ब्राह्ममुहूर्त में 5-10 मिनट के लिए आत्मा-परमात्मा का ठीक स्मरण हो जाय तो पूरे दिन के लिए एवं प्रतिदिन ऐसा करने पर पूरे जीवन के लिए काफी शक्ति मिल जाय।
यदि विद्यार्थी ब्राह्ममुहूर्त में उठकर ध्यान करे, सूर्योदय के समय ध्यान करे, ब्रह्मविद्या का अभ्यास करे तो वह शिक्षकों से थोड़ी लौकिक विद्या तो सीखेगा किंतु दूसरी विद्या उसके अंदर से ही प्रकट होने लगेगी। आत्मविद्या, अंतःप्रेरणा, त्रिकालज्ञता, सत्यसंकल्प-सामर्थ्य – ऐसी कई अदभुत योग्यताएँ विकसित होंगी। मैंने एकांत में 40 दिन तक मौन रखा व दूध पर रहकर अनुष्ठान किया तो जो खजाने खुले, वे बाँटते-बाँटते 55 साल हुए लेकिन फिर भी नहीं खूटते। जो योगविद्या और ब्रह्मविद्या में आगे बढ़ते हैं, उनको लौकिक विद्या बड़ी आसानी से प्राप्त होती है। ब्रह्म-परमात्मा को जानने की विद्या को ही ब्रह्मविद्या कहते हैं।
ब्रह्मविद्या
ब्राह्ममुहूर्त
में बड़ी आसानी
से फलती है। उस
समय ध्यान करने
से, ब्रह्मविद्या
का अभ्यास करने
से मनुष्य बड़ी
आसानी से प्रगति
कर सकता है।
अपना शरीर यदि मलिन लगता है तो ऐसा ध्यान कर सकते हैं- "मेरे मस्तक में भगवान शिव विराजमान है। उनकी जटा से गंगाजी की धारा बह रही है और मेरे तन को पवित्र कर रही है। मूलाधार चक्र के नीचे शक्ति एवं ज्ञान का स्रोत निहित है। उसमें से शक्तिशाली धारा ऊपर की ओर बह रही है एवं मेरे ब्रह्मरंध्र तक के समग्र शरीर को पवित्र कर रही है। श्री सदगुरु के चरणारविंद ब्रह्मरंध्र में प्रकट हो रहे हैं, ज्ञान-प्रकाश फैला रहे हैं।'
ऐसा ध्यान न कर सको तो मन से गंगा किनारे के पवित्र तीर्थों पर चले जाओ। बद्री-केदा एवं गंगोत्री तक चले जाओ। उन पवित्र धामों में मन ही मन भावपूर्वक स्नान कर लो। 5-7 मिनट तक पावन तीर्थों में स्नान करने का चिंतन कर लोगे तो जीवन में पवित्रता आ जायेगी। घर-आँगन को स्वच्छ रखने के साथ-साथ इस प्रकार तन-मन को भी स्वस्थ, स्वच्छ एवं भावना के जल से पवित्र करने में जीवन के 5-7 मिनट प्रतिदिन लगा दोगे तो इससे कभी हानि नहीं होगी। इसमें तो लाभ ही लाभ है।
रात्रि को दस मिनट तक ॐ का प्लुत उच्चारण करके सोयें। ऐसे ही सुबह भी ॐ का गुंजन करें तो ॐ का मानसिक जप बढ़ जायेगा। धीरे-धीरे ऐसी आदत पड़ जायेगी कि होंठ, जीभ नहीं हिले और हृदय में जप चलता रहे व मन उसके अर्थ में और रस में उन्नत होता रहे। फिर जप करते-करते उसके अर्थ में ध्यान लगने लगेगा। अनुक्रमणिका
सुबह उठो तब सबसे पहले परमात्मा को और मौत को याद कर लोः 'क्या पता कौन से दिन इस जहाँ से चले जायें ! आज सोमवार है, क्या पता कौन से सोमवार को हम चले जायें ! आज मंगलवार है, क्या पता कौन-से मंगलवार को हम विदा हो जायें !.... इन सात दिनों में से कोई-न-कोई दिन होगा मौत का।'
सुबह उठकर भी यदि सोचते हैं कि 'मैं दुःखी हूँ... मेरा कोई नहीं.... मैं लाचार हूँ....' तो पूरा दिन परेशानी और दुःख में बीतेगा। सुबह उठकर यदि आप यह सोचें कि 'दुःख तो बेवकूफी का फल है। चाहे कुछ भी हो जाय, मैं आज दुःखी होने वाला नहीं। मेरा रब, प्रभु मेरे साथ है। मनुष्य जन्म पाकर भी दुःखी और चिंतित रहना बड़े शर्म की बात है। दुःखी और चिंतित तो वे रहें जिनका आत्मा-परमात्मा मर गया। मेरा आत्मा-परमात्मा तो ऐ रब ! तू मौजूद है न ! प्रभु तेरी जय हो ! ..... आज तो मैं मौज में रहूँगा।' तो फिर देखो, आपका दिन कैसा गुजरता है।
आपका मन कल्पवृक्ष है। आप जैसा दृढ़ चिंतन करते हैं, वैसा होने लगता है। अतः धैर्यपूर्वक चिंतन करें।
रोज सुबह उठो तब पक्का निर्णय करो कि आज अपने चित्त को प्रसन्न रखूँगा। दो चार मनुष्यों के आँसूँ पोंछूँगा, उनके दुःख दूर करने का प्रयत्न करूँगा और चार मनुष्यों को हँसाऊँगा। फिर पता चलेगा कि बिना स्वार्थ के कर्म करने में कितना आनंद आता है, आंतरिक उन्नति होती है। फिर तो तुम्हारा व्यवहार ही साधना बन जायेगा। नियम से प्रतिदिन प्राणायाम-जप-ध्यान करोगे तो तुम्हारा हृदय खिलेगा।
विद्यार्थी ऐसा संकल्प करें
सुबह उठकर संकल्प करोः 'आज के दिन मैं समय का सदुपयोग करूँगा। खेलने के समय मन लगाकर खेलूँगा, पढ़ने के समय मन लगाकर पढूँगा, काम करने के समय दिल लगाकर काम करूँगा और दिल लगाकर दाता (भगवान) का सुमिरन व ध्यान करूँगा।' अनुक्रमणिका
आत्मनिर्भरता की बतायी सुंदर युक्तिः करदर्शन
प्रातः
उठकर करदर्शन करने
का शास्त्रीय विधान
बड़ा ही अर्थपूर्ण
है। इससे मनुष्य
के हृदय में आत्मनिर्भरता
और स्वावलम्बन
की भावना का उदय
होता है। करदर्शन
की सुंदर युक्ति
बताते हुए पूज्य
बापू जी कहते हैं-
"ध्यान के बाद
बिस्तर पर ही तनिक
शांत बैठे रहकर
फिर अपनी दोनों
हथेलियों को देखें
और यह श्लोक बोलें-
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्।।
'हथेली के अग्रभाग में लक्ष्मी देवी का निवास है, मध्यभाग में सरस्वती देवी हैं और मूलभाग में भगवान गोविन्द का वास है इसलिए प्रातःकाल में करदर्शन करना चाहिए।'
इस प्रकार सुबह-सुबह में अपनी हथेलियों को देखकर भगवान लक्ष्मीनारायण का स्मरण करने से अपना भाग्य खुलता है। अनुक्रमणिका
भगवान
को प्रार्थना करके
हाथों की दोनों
हथेलियाँ आपस में
रगड़ें और मन ही
मन भावना करें
ॐॐॐ मेरी आरोग्य
शक्ति जग रही है।
फिर जहाँ भी शरीर
में तकलीफ हो, वहाँ
हथेलियाँ लगाने
से आरोग्य शक्ति
की सूक्ष्म तरँगें
उसे मिटाने में
बड़ी मदद करती
हैं। हथेलियाँ
रगड़ने से उत्पन्न
हुई गर्मी में
आरोग्यदात्री
शक्ति होती है।
जिसको हथेलियों
को रगड़ते हुए
ॐॐॐ.... करके हाथ मुँह
पर घुमाने की युक्ति
आ गयी, उसका चेहरा
प्रभावशाली हो
जाता है। आँखों
पर दोनों हथेलियों
को रखकर संकल्प
करते हैं कि ॐॐॐ
मेरी नेत्रज्योति
बढ़ रही है तो आँखों
की रोशनी बरकरार
रहती है, बढ़ती
है। माथे पर घुमायें,
जहाँ चोटी रखते
हैं वहाँ घुमायें
और चिंतन करें
कि ॐॐॐ मेरी स्मृतिशक्ति,
निर्णयशक्ति का
विकास हो रहा है।
तो इनका विकास
होता है। मानसिक
तनाव दूर होता
है। मानसिक तनाव
का मुख्य कारण
है मलिन चित्तवृत्तियाँ।
भगवान का नाम जपने
से मलिन चित्तवृत्तियाँ
भाग जाती हैं।
घृणा, ईर्ष्या,
मोह, लोभ, काम, अहंकार,
चुगली, लिप्सा
(कामना), परिग्रह
(संग्रह) – इनसे तनाव
होता है और ॐकार
का उच्चारण करने
से ये सारे तनाव
भाग जाते हैं तथा
सारी बीमारियों
की जड़ें उखड़
जाती हैं।
लगता तो साधारण प्रयोग है लेकिन इतने सारे फायदे होते हैं कि डॉक्टरों की पकड़ में नहीं आते हैं। इससे मन की मलिनता भी दूर हो जाती है, अंतर्यामी प्रसन्न होते हैं और दिव्य शक्तियों का संचार होता है। (हस्त चिकित्सा की विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें आश्रम की पुस्तक आरोग्यनिधि, भाग -1 पृष्ठ 177) अनुक्रमणिका
विघ्न-बाधाओं व दुर्घटना से बचने का उपाय बताया
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।
रोज सुबह उठने पर अथवा घर से बाहर जाते समय एक बार इस मंत्र का जप कर लें तो विघ्न-बाधारहित, दुर्घटनारहित गाड़ी अपने रास्ते सफर करती रहेगी। और जीवन की शाम होने से पहले रोज उस त्र्यम्बक (परमात्मा) में थोड़ी देर शांत रहा करो। अनुक्रमणिका
धरती माता के प्रति कृतज्ञ बनना सिखाया
पृथ्वी
मातास्वरूप है।
पृथ्वी से ही शरीर
का जीवन चलता है
और वही शरीर का
सारा भार उठाती
है। पृथ्वी से
अन्न, जल, औषधियाँ
आदि प्राप्त होते
हैं। अतः हममें
अपने को कुछ देने
वाले के प्रति
कृतज्ञता का भाव
बना रहे, हम कृतघ्न
न बनें इसलिए पृथ्वी
से क्षमा-प्रार्थना
करना सन्मति है,
सद्भाव है। पूज्य
बापू जी कहते हैं-
"सुबह बिस्तर
से पृथ्वी पर पैर
रखने से पहले उन्हें
नमस्कार करें।
फिर शांतचित्त
हो के अपने इष्टदेव
का सुमिरन कर मंत्रजप
करके जिस नथुने
से श्वास चल रहा
हो, उसी तरफ का हाथ
चेहरे के उसी तरफ
के भाग पर घुमायें
और उस ओर का पैर
धरती पर पहले रखें
तो मनोरथ सफल होते
हैं। अर्थात् दायाँ
नथुना चलता हो
तो दायाँ पैर और
बायाँ चलता हो
तो बायाँ पैर धरती
पर पहले रखें।
अनुक्रमणिका
बापू
जी ने दिया पूरे
दिन को मंगलमय
बनाने का पाठ
देखो, मैं आपको साधना का एक पाठ बता रहा हूँ। सुबह उठो तो गेहूँ के, चने के, मूँग के, मटर के 4-4 दाने.... मैं ज्यादा बोलूँ और आप कम डालोगे तो सिकुड़गो.... मैं 4 बोलता हूँ, आप चाहे तो 25 लो ईश्वर के लिए, 'लो प्रभु जी ! ये दाने मैं आपको अर्पण करता हूँ।' फिर चाहे गाय को दो, चाहे पक्षियों को दो लेकिन 4 दाने प्रभु जी ! आपके लिए। 4 मिनट प्रभु ! आपके ॐ आनंद.... ॐ शांति....ॐ माधुर्य... में। आज चाहे दुःख आये, सुख आये – सब आने वाला जायेगा लेकिन आत्मा-परमात्मा का सम्बन्ध शाश्वत है यह मैं समझूँगा, याद रखूँगा। इससे आपका पूरा दिन मंगलमय होगा। स्वास्थ्य का रस, औदार्य-स्वभाव बनने लग जायेगा। गलती करने की आदत कम होने लग जायेगी। निस्सार चीजों से आपका मन उपराम हो जायेगा और सार में तुम शुक्रगुजार बनते जाओगे।
कुछ व्यक्ति सुबह उठते हैं तो बिस्तर को यूँ ही पड़ा रहने देते हैं। इससे घर के वातावरण में तमस का प्रभाव बढ़ जाता है। अतः पूज्य बापू जी कहते हैं- "सुबह उठो तब अपना बिस्तर स्वयं उठाकर यथायोग्य स्थान पर ठीक से रख दो। सुबह उठकर ठंडे पानी से मुँह धो डालें। इससे त्वचा का रंग निखर कर झुर्रियाँ कम हो जायेंगी।" अनुक्रमणिका
पूज्यश्री के सत्संग में आता है- शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्। शरीर धर्म का साधन है। शरीर से ही सारी साधनाएँ सम्पन्न होती हैं। यदि शरीर कमजोर है तो उसका प्रभाव मन पर पड़ता है। शरीर को शास्त्रोचित रीति से खिलाओ, पिलाओ, स्वस्थ रखो ताकि ईश्वरप्राप्ति में काम आ जाये। सूर्योदय से पहले उठकर पूजा करने का अर्थ है ज्ञानदाता का आदर करना। पूजा अर्थात् अपने जीवन में सूर्य के, ईश्वर के सत्कार की क्रिया। यह मानव का कर्तव्य है। भगवान भास्कर, ज्ञानदाता सदगुरुदेव एवं देवी-देवताओं का आदर तो करना ही चाहिए परंतु इतना ही नहीं, अपने शरीर का भी ख्याल रखना चाहिए। शरीर का ख्याल कैसे रखें ? नीतिशास्त्र में एक श्लोक आता है-
कुचैलिनं दन्तमलोपसृष्टं बह्वाशिनं निष्ठुरभाषिणं च।
सूर्योदये चास्तमिते शयानं विमुञ्चति श्रीर्यदि चक्रपाणिः।।
'मलिन वस्त्र पहने वाले मलयुक्त दाँतों की सफाई नहीं करने वाले, भोजन के लिए ही जीने वाले, कठोर बोलने वाले तथा सूर्योदय और सूर्यास्त के समय एवं थोड़ी देर बाद तक सोने वाले व्यक्ति को लक्ष्मी त्याग देती है, चाहे वे साक्षात् विष्णु ही क्यों न हों।' (चाणक्य नीति दर्पणः 15.4)
स्वच्छता एवं पवित्रता द्वारा लोगों की प्रीति प्राप्त करना, सुरुचि प्राप्त करना-यह भी पूजा का, धर्म का एक अंग है। अनुक्रमणिका
प्रातः
पानी प्रयोग कर
स्वस्थ रहना सिखाया
जो मानव सूर्योदय से पूर्व रात का रखा हुआ 200 मि.ली. से आधा लीटर पानी बासी मुँह पीने का नियम रखता है, वह स्वस्थ रहता है। रात का रखा हुआ पानी हर रोज सुबह सूर्योदय से पूर्व पीने से कभी कब्जियत नहीं होगी तथा असंख्य रोगों से भी सुरक्षा होगी। पानी भरा हुआ पात्र हमेशा विद्युत के कुचालक (प्लास्टिक, लकड़ी या कम्बल) के ऊपर रखें। किसी गर्म आसन अथवा विद्युत के कुचालक पर बैठकर ही पानी पियें। ताँबे के पात्र में रखा हुआ पानी विशेष लाभदायी होता है। शौच से पहले पानी पियें, शौच करके तुरंत पानी न पियें।
रात्रि का रखा हुआ पानी पीकर घूमना। फिर कमोड पर नहीं, पैर जमाकर बैठ सकें, ऐसे शौचालय में शौच जाना। पहले बायें पैर के बल और फिर दायें पैर के बल हेतु बैठने से छोटी आँत, बड़ी आँत पर हितकारी प्रभाव पड़ता है। पेट की, आँतों की अच्छी सफाई हो जाती है। स्नान, प्राणायाम आदि करना सम्यक् व्यायाम है।
मधुमेह, आँख, नाक, गले की सभी बीमारियों में एक ही प्रयोग से आराम से फायदा होता है और एक पैसे का खर्च नहीं, दुष्प्रभाव (साइड इफेक्ट) का भय नहीं। क्षयरोग (टी.बी.), दमा, जोड़ों में दर्द, गर्भाशय का कैंसर, अजीर्ण, प्रदर-रोग की तकलीफ, पानी पड़ने की बीमारी, स्वप्नदोष, खट्टी डकारें, मोटापा, हृदयरोग, पेट के रोग, मानसिक दुर्बलता अथवा वात, पित्त और कफ संबंधी कोई भी रोग हो, उस पर पानी प्रयोग अक्सीर इलाज है।
पानी-प्रयोग कैसे करें ? रात को दातुन करके सो गये। ब्रश की अपेक्षा दातुन अच्छी है लेकिन दूध पिया है तो फिर नीम की दातुन न करें, फिर मंजन ही कर लो। रात को मंजन करके सो गये और रात का रखा हुआ आधा से डेढ़ गिलास पानी सुबह बासी मुँह पी लो। पौन घंटे तक कुछ खाओ-पियो मत। और दिन में भी जब कुछ खाओ तो तुरंत पानी मत पियो, डेढ़ दो घंटे के बाद पियो हालाँकि भोजन के बीच में घूँट-घूँट थोड़ा पानी पी सकते हैं। बस, बहुत सारी बीमारियों की जड़ें सदा के लिए उखड़ जायेंगी। सुबह पानी पी के फिर शौच जायें तो पेट एकदम अच्छा साफ होगा।" अनुक्रमणिका
प्रातः एवं सायं भ्रमण उत्तम स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभप्रद है। पशुओं का राजा सिंह सुबह 3.30 से 5 बजे के दौरान अपने बच्चों के साथ उठकर गुफा से बाहर निकल के साफ हवा में भ्रमण कर आसपास की किसी ऊँची टेकरी पर सूर्य की ओर मुँह करके बैठ जाता है। सूर्य का दर्शन कर शक्तिशाली कोमल किरणों को अपने शरीर में लेने के पश्चात ही गुफा में वापस आता है। यह उसके बलशाली होने का एक राज है।
भ्रमण पूज्य बापू जी की दिनचर्या का एक अभिन्न अंग है। उत्तम स्वास्थ्य की इस कुंजी के द्वारा आप मानो चरैवेति चरैवेति। आगे बढ़ो, आगे बढ़ो। यह वैदिक संदेश ही जनसाधारण तक पहुँचाना चाहते हैं। पूज्य श्री कहते हैं- "प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में वातावरण में निसर्ग की शुद्ध एवं शक्तियुक्त ओजोन वायु का बाहुल्य होता है, जो स्वास्थ्य के लिए हितकारी है।
प्रातःकाल की वायु को, सेवन करत सुजान।
तातें मुख छवि बढ़त है, बुद्धि होत बलवान।।
भ्रमण नियमित होना चाहिए। अधिक चलने से थकान आ जाती है। थकान से तमोगुण आ जाता है। सर्वथा न चलने से भी मनुष्य आलसी हो जाता है। उससे भी तमोगुण आ जाता है। अतः प्रतिदिन अवश्य भ्रमण करना चाहिए। अनुक्रमणिका
शौच का अर्थ है शुद्धि। शुद्धि दो प्रकार की होती हैः आंतर शुद्धि और बाह्य शुद्धि। बाह्य शुद्धि तो साबुन, उबटन, पानी से होती है और आंतर शुद्धि होती है राग, द्वेष, वासना आदि के अभाव से। जिनकी बाह्य शुद्धि होती है, उनको आंतर शुद्धि करने में सहायता मिलती है। पतंजलि महाराज कहते हैं कि शरीर को शुद्ध रखने से वैराग्य का जन्म होता है। शरीर को शुद्ध रखने से वैराग्य का जन्म कैसे ? जिसमें शारीरिक शुद्धि होती है उसको अपने शरीर की गंदगी का ज्ञान हो जाता है। जैसी गंदगी अपने शरीर में भरी है, ऐसी ही गंदगी दूसरों के शरीर में भी भरी है। अतः अपने शरीर में अहंता और दूसरों के शरीर के साथ विकार भोगने की ममता शिथिल हो जाती है। हृदय में छुपा हुआ आनंदस्वरूप चैतन्य, ईश्वर, परमात्मा हमारा लक्ष्य है – इस ज्ञान में वे लग जाते हैं।
पतंजलि महाराज कहते हैं-
शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः।
शौच से अपने अंगों से घृणा होती है और दूसरों से संसर्ग का अभाव होता है। (पातंजलि योगदर्शन, साधनापादः 40) अनुक्रमणिका
प्रातर्विधिसंबंधी लाभकारी बातें
शौच कब जाना और कैसे जाना यह बहुत महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि जिसका पेट ठीक से साफ नहीं होता, उसका सारा दिन खराब जाता है, मन उलझनों की तानाबूनी करता है, भूख नहीं लगती तथा शरीर में कई बीमारियाँ घर कर लेती हैं। पूज्य बापू जी कहते हैं कि "प्रातः 5 से 7 बजे के समय बड़ी आँत विशेष रूप से क्रियाशील होती है। जो व्यक्ति इस समय भी सोते रहते हैं या मल-विसर्जन नहीं करते, उनकी आँतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं। अतः प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल-त्याग कर देना चाहिए।
सुबह पानी पी के फिर शौच जायें तो पेट एकदम अच्छे से साफ होगा। शौच जाने से पूर्व सिर को ढकना चाहिए। आपका सिर और कान ढक जायें ऐसी कोई टोपी शौचालय के बाहर रख दें और शौच जाते समय उसे पहन लें। इससे रक्त तथा वायु की गति अधोमुखी हो जाती है, जिससे मल त्याग में सहायता मिलती है और अपवित्र मल के परमाणुओं से शरीर के सिर आदि उत्तम तथा पवित्र अंगों की रक्षा होती है। इस समय दाँत भींचकर रखने से दाँत मजबूत बनते हैं।
ऋषियों ने कैसी सूक्ष्म खोज की है ! पहले के जमाने में लोग ऋषियों के इन निर्देशों का पालन करते थे, इसी कारण निरोग, स्वस्थ, सुखी, प्रसन्न रहकर सौ-सौ साल हँसते खेलते बिता देते थे। आज के लोग तो जाँघों के बल, जैसे कुर्सी पर बैठा जाता है, ऐसे ही कमोड (पाश्चात्य पद्धति का शौचालय) पर बैठकर पेट साफ करते हैं। उनका पेट साफ नहीं होता, इससे नुकसान होता है। उनको पता ही नहीं कि शौच के समय आँतों पर दबाव पड़ना चाहिए, तभी पेट अच्छी तरह से साफ होगा। शौचालय सादा अर्थात् जमीन पर पायदान वाला होना चाहिए। शौच के समय सर्वप्रथम शरीर का वज़न बायें पैर पर अधिक रखें, फिर दायें पैर पर वज़न बढ़ाते-बढ़ाते दोनों पैरों पर समान कर दें। इससे आँतों पर दबाव पड़ेगा एवं उनकी कसरत हो जायेगी और पेट व आँतें ठीक से साफ हो जायेंगी।
जिस समय नासिका का जो स्वर चलता हो, उस समय तुम्हारे शरीर पर उसी स्वर का प्रभाव होता है। हमारे ऋषियों ने इस विषय में बहुत सुंदर खोज की है। दायाँ स्वर मल-त्याग करने से एवं बायाँ स्वर चलते समय मूत्र त्याग करने से स्वास्थ्य सुदृढ़ होता है।" अनुक्रमणिका
लघुशंका (पेशाब) करने का सही ढंग सिखाया
अपनी सभ्यता में प्रारम्भ से ही बैठकर लघुशंका करने की रीति थी। परंतु पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से लोग यह भूल गये। पंजों के बल बैठकर मूत्र त्याग करने से मूत्राशय (यूरीनरी ब्लेडर) पूरी तरह रिक्त हो जाता है। जबकि खड़े-खड़े मूत्र-त्याग करने ने मूत्राशय में कुछ मात्रा में मूत्र शेष (residual urine) रह जाता है, इससे मूत्राशय के दूषित होने की और पथरी होने की सम्भावना होती है। पूज्य बापू जी कहते हैं- "लघुशंका पंजों के बल बैठकर ही करनी चाहिए क्योंकि खड़े-खड़े पेशाब करने या पानी पीने अथवा खाली पेट चाय पीने से धातु क्षीण होती है और वीर्यनाश होता है। पाश्चात्य जगत के अंधानुकरण से धातु क्षीण होती है और बच्चे भी कमजोर पैदा होते हैं।
शौच तथा लघुशंका के समय कुछ लोग मुँह से श्वास लेते हैं। इससे श्वासनली और फेफड़ों में बीमारी के जीवाणु घुस जाते हैं एवं तकलीफ सहनी पड़ती है। अतः श्वास सदा नाक से ही लेना चाहिए।" अनुक्रमणिका
दातुन व मंजन करके दाँत मजबूत व स्वस्थ रखें
वर्तमान
समय में दंत रोगों
की समस्या से युवा
व वृद्ध ही नहीं,
बच्चे भी ग्रस्त
हैं। इसका सबसे
बड़ा कारण है कि
दातुन व मंजन छोड़कर
लोग पेस्ट-ब्रश
का उपयोग करने
में लगे हैं। अतः
शौच के बाद नीम
या बबूल की ताजी
या भीगी हुई दातुन
से (कभी-कभी तम्बाकूरहित
आयुर्वेदिक मंजन
से) दाँत अच्छी
तरह साफ करने चाहिए।
पूज्य बापू जी
कहते हैं- "मेरे
गुरुदेव (साँईं
श्री लीलाशाह जी
महाराज) भी बेहद
(असीम) थे.... नित्य
नवीन रस !
नहीं तो 84 साल 90 साल
के बूढ़ों की हालत
देखो ! मेरे
गुरुजी कहीं से
गुजरे और किसी
ने बोला कि "एक
बूढ़े महाराज आये
हैं, ताँगे में
बैठे हैं।"
गुरु जी बोलेः "ऐ ! तेरा बाप बूढ़ा, तेरी माँ बूढ़ी, तेरा काका, तेरा दादा, तेरे गोधरा के फलाने-फलाने बूढ़े। मैं 90 साल का जवान और तेरा बाप 50 साल का बूढ़ा ! मेरे साथ दौड़ के दिखा !" क्या लीलाशाह जी की लीला है !
वे सदा दातुन करते थे। उनके दाँत 93 साल की उम्र में भी बढ़िया और हम सुधरे हुए जमाने के गुलाम बने, पेस्ट ब्रश किया तो हमारे को तो डेंटिस्ट की गुलामी करनी पड़ी, फिर हमने पेस्ट को किनारे कर दिया। अब दातुन या मंजन करता हूँ तो दाँत सब ठीक हैं। पेस्ट और ब्रश करने से आगे चल के दाँतों की हालत खराब हो जाती है, अतः दातुन अथवा मंजन करना चाहिए। अगर ज्यादा दातुन नहीं मिल रही है तो गाँधी के तरीके से दातुन करें। एक दिन में जितनी दातुन उपयोग होती, गाँधी जी उतनी काटकर फेंक देते थे और बची हुई को धो के रख लेते थे, 8 दिन तक चल जाये। दातुन ही करनी चाहिए और नीम की दातुन मिलती है तो सुबह-सुबह चबा के उसका थोड़ा रस ले लें। ब्रह्मचर्य पालने में और पित्त-शमन करने में नीम का रस बड़ा काम करता है।
तो जिनको पित्त की तकलीफ है, गर्मी या चमड़ी की तकलीफें या रक्तस्राव, खुजली बार-बार होती है, वे नीम की दातुन करके उसका रस लें तो नकसीर फूटना या मस्से या अन्य अंग से रक्त बहना कम हो जायेगा।
मसूड़ों की सुरक्षा और दाँतों को मजबूत बनाने में नमक और सरसों के तेल का प्रयोग उपयोगी है। मेरे गुरु जी महीने में एक बार नमक और सरसों के तेल से दाँतों को जरा मल देते। जल्दी दाँत खराब नहीं हों इसलिए मैं भी रात को उँगली (सबसे बड़ी उँगली) से (आश्रम द्वारा निर्मित) दंत सुरक्षा तेल मल देता हूँ। अपने पास ऐसी वैदिक पद्धति है और यह सस्ता भी पड़ता है। हल्दी नमक, सरसों का तेल – इनका मिश्रण, मंजन 100 साल तक दाँतों व मसूड़ों को सुदृढ़ रखता है। ये ब्रश या पेस्ट का उपयोग करना अपने दाँतों के साथ दुश्मनी करना है। मुँह में से बदबू आती है तो नमक और काली मिर्च मिलाकर कभी-कभी मंजन करें तो मुँह में से बदबू चली जायेगी। दातुन को चीरकर उसके दो भाग करके उससे जीभ भी साफ कर सकते हैं। फिर अच्छी तरह कुल्ले करके मुँह साफ कर लें। दाँतों को इस तरह साफ करें कि उन पर मैल न रहे और मुख से दुर्गंध न आये। अनुक्रमणिका
कितने ही लोग तर्जनी (अँगूठी के पास वाली उँगली) से दाँत साफ करते हैं। इससे मसूड़े कमजोर हो जाते हैं तथा दाँत जल्दी गिर जाते हैं क्योंकि तर्जनी में विद्युत शक्ति दूसरी उँगलियों की अपेक्षा अधिक होती है। अतः उससे दाँत नहीं घिसने चाहिए और आँखों को भी नहीं मसलना चाहिए।" अनुक्रमणिका
तेल-मालिश से हृष्ट-पुष्ट बनना सिखाया
तेल मालिश शरीर को निरोग व बलवान बनाने का सस्ता व सरल तरीका है। बापू जी ने तेल-मालिश की महत्ता बताकर मालिश का सही तरीका भी समझाया है। पूज्य श्री कहते हैं- "10 ग्राम तेल की मालिश करने से 80 ग्राम घी खाने की ताकत शरीर को मिलती है। पहले शौच जायें, फिर मालिश व स्नान करें।
कौन से दिन मालिश करने से क्या होता है, उसकी भी खोज कर ली आपके ऋषियों ने। रविवार को अगर तिल के तेल से मालिश करते हैं तो ताप पैदा होता है। सोमवार को मालिश सौंदर्य और स्वास्थ्य देती है। मंगलवार की मालिश मंगल ग्रह के प्रभाव से आयुष्य क्षीण करती है। बुधवार की मालिश बल और धन लाभ कराती है। गुरुवार की मालिश हानि करती है। शुक्रवार की मालिश क्षुब्धता देती है। शनिवार की मालिश बल एवं सुख दायक है। यदि निषिद्ध दिनों में मालिश करनी ही है तो ऋषियों ने उसकी भी व्यवस्था दी है। तेल में रविवार को गुलाब के फूलों की पंखुड़ियाँ तथा गुरुवार को दूर्वा डालो तथा मंगल को मिट्टी और शुक्र को जरा सा गोमय (गाय के गोबर का रस) डाल दिया तो वह दोष चला जायेगा। जो रोज तेल लगाते हैं उन्हें तेल में ये वस्तुएँ मिलाने की आवश्यकता नहीं है। शिव पुराण के अनुसार उनके लिए किसी भी दिन तेल लगाना दूषित नहं है। सरसों के तेल से मालिश ग्रहणकाल छोड़कर रोज की जा सकती है। (तेल-मालिश की विस्तृत जानकारी हेतु पढ़ें पुस्तक 'आरोग्यनिधि', भाग-1)
शरीर की मालिश के लिए अनेक प्रकार के तेल उपयोग में लाये जाते हैं। लौकी का तेल विशेष लाभकारी है।
विधिः सवा किलो लौकी के छिलके उतार दो। मिक्सी में पीस के उसका रस निकाल लो। 250 ग्राम सरसों या तिल का तेल तप जाने के बाद उसे नीचे उतारकर उसमें लौकी का रस डाल दें। फिर लौकी के रस का जलीय अंश वाष्पीभूत हो जाने तक उसे बहुत धीमी आँच पर उबालो। यह तेल बादाम रोगन का भाई हो गया। मालिश करोगे तो यह आपके दिमाग व शरीर को ताकत देगा।
मालिश के आधे घंटे बाद शरीर को रगड़-रगड़ कर स्नान करें। हो सके तो जौ, तिल और आँवले का चूर्ण मिला के बनाया गया उबटन या सप्तधान्य उबटन अथवा तो देशी गाय के गोबर को शरीर पर रगड़ के स्नान करें।" अनुक्रमणिका
शास्त्रों के ज्ञान को लोग भूलते जा रहे हैं अतः आज चिंता, दुःख, परेशानी, अवसाद आदि बढ़ते जा रहे हैं। पूज्य बापू जी ने शास्त्रों का दोहन कर कई जीवनोपयोगी विधियों के ज्ञान से समाज को लाभान्वित किया है। इनमें क्षौर कर्म भी आता है। पूज्य श्री कहते हैं- "हमारे शास्त्रों ने मुंडन कब करना चाहिए, बाल कब कटवाने चाहिए वह भी खोज लिया है। रविवार को जो लोग मुंडन कराते हैं अथवा बाल कटवाते हैं, उनके धन, बुद्धि और धर्म की हानि होती है, ऐसा लिखा है। रविवार आदि के दिन बाल कटवा तो लेते हैं, परवाह नहीं करते हैं लेकिन बेचारों के जीवन में उन ग्रहों का कुप्रभाव तो देखने में आता ही है।
सोमवार को अगर क्षौर कर्म कराते हैं तो शिवभक्त की भक्ति की हानि होती है लेकिन शिवभक्त नहीं हैं तो सोमवार को मुंडन, बाल कटाने से कोई हानि नहीं है। पुत्रवान को भी इस दिन बाल नहीं कटवाने चाहिए। मंगलवार को आयुष्य क्षीण होता है, बुधवार को धन-लाभ होता है। गुरुवार को करायें तो मान और लक्ष्मी अथवा धन-दौलत में बरकत क्षीण होने लगती है। अगर शुक्रवार को क्षौर कर्म कराते हैं तो धन-लाभ व यश-लाभ बढ़ता है और शनिवार को कराते हैं तो आयुष्य क्षीण होता है, अकाल मृत्यु अथवा दुर्घटना का भय रहेगा।" अनुक्रमणिका
पाश्चात्य
अंधानुकरण के प्रभाव
से लोग स्नान की
महत्ता भूलते जा
रहे हैं। इससे
तमोगुण की वृद्धि
हुई है और लड़ाई-झगड़ा,
अशांति आदि समस्याओं
ने घर लिया है।
समस्याओं से निजात
दिलाने हेतु बापू
जी ने स्नान की
महिमा बताते हुए
स्नान का सुंदर
तरीका भी बताया
हैः "शास्त्रों
में महत्त्व की
बात यह भी आयी कि
स्नान सनातन है
और सनातन पुण्य
देता है। सनातन
धर्म ने संयम का,
सदाचरण का, सनानत
सुख का स्नान एक
मुख्य अंग है।
स्कंद पुराण (ब्राह्म
खंड, चा. मा. 1.25)
स्नानेन सत्यमाप्नोति स्नानं धर्मः सनातनः।
धर्मान्मोक्षफलं प्राप्य पुनर्नैवावसीदति।।
'स्नान से मनुष्य सत्य को पाता है। स्नान सनातन धर्म है, धर्म से मोक्षरूप फल पा कर मनुष्य फिर दुःखी नहीं होता।'
वैसे भी देखा जाये तो स्नान सत्वगुण बढ़ाता है और सत्त्वगुण सनातनता की तरफ ले जाता है, यह बिल्कुल सत्य है। किसी भी जोगी, साधक को शास्त्र की यह बात अनुभव में आ सकती है।
स्नान से आपकी सात्त्विकता तो बढ़ेगी तो आप सत्संग, साधऩा, सेवा द्वारा सत्य को, सच्चे सुख को पाने में सफल हो जायेंगे। इसलिए कोई भी शुभ कर्म करते हैं तो भाई ! स्नान करके करो। नींद में से उठ के बिना स्नान किये, ऐसे ही जो काम करते हैं, उनकी अपेक्षा जो स्नान आदि करके काम करते हैं उन्हें सात्त्विक प्रेरणा, स्फूर्ति आदि विशेष मिलते हैं। अगर सूर्योदय से पहले स्नान हो जाय तो वह विशेष रूप से सत्त्वगुण बढ़ाता है।
शास्त्र में आया कि गर्म पानी से नहीं नहाना चाहिए। साधारण पानी (ताजे पानी) से सहज स्नान करना चाहिए। सुबह गर्म पानी की अपेक्षा साधारण पानी से नहाने से स्फूर्ति, ताजगी ज्यादा रहती है।" (अत्यंत शीत प्रदेश में रहने वाले एवं वृद्धावस्था, बीमारी तथा मालिश के बाद के स्नान में गुनगुना पानी उपयोग कर सकते हैं।) अनुक्रमणिका
स्नान के कई प्रकार हैं। पूज्य बापू जी बताते हैं- "पाँच प्रकार के स्नान होते हैं-
ब्रह्म स्नानः ब्रह्म परमात्मा का चिंतन करके, 'जल ब्रह्म, स्थल ब्रह्म, नहाने वाला ब्रह्म.....' ऐसा चिंतन करके ब्राह्ममुहूर्त में नहाना, इसे ब्रह्म स्नान कहते हैं।
ऋषि स्नानः ब्राह्म मुहूर्त में आकाश में तारे दिखते हों और नहा लें, यह ऋषि स्नान है। इसे करने वाले की बुद्धि बड़ी तेजस्वी होती है।
देव स्नानः देव-नदियों में नहाना या देव-नदियों का स्मरण करके सूर्योदय से पूर्व नहाना, यह देव स्नान है।
मानव स्नानः सूर्योदय के थोड़े समय पूर्व का स्नान मानव स्नान है।
दानव स्नानः सूर्योदय के पश्चात चाय पीकर, नाश्ता करके 8 से 12-1 बजे के बीच नहाना, यह दानव स्नान है।
हमेशा ब्रह्म स्नान, ऋषि स्नान करने का ही प्रयास करना चाहिए।
इनके अलावा अन्य 7 प्रकार के स्नानों का भी उल्लेख शास्त्रों में है। उनकी भी महत्ता बापू जी ने बतायी हैः
मंत्र स्नानः गुरुमंत्र जपते हुए अपने को शुद्ध बना लिया।
भौम स्नानः शरीर को पवित्र मिट्टी स्पर्श कराके शुद्धि मान ली।
अग्नि स्नानः मंत्र जपते हुए सारे शरीर को भस्म लगा ली।
वायव्य स्नानः गाय के चरणों की धूलि लगा ली। वह भी पवित्र बना देती है। गाय के पैरों की धूलि से ललाट पर तिलक करके कामक-धंधे पर जाय तो सफलता मिलती है अथवा कोई काम अटका है तो वह अटक-भटक निकल जाती है।
दिव्य स्नानः सूरज निकला हो और बरसात हो रही हो, उस समय सूर्य-किरणों में बरसात की बूँदों से स्नानः
वारूण स्नानः जल में डुबकी लगाकर नहाना इसको वारूण स्नान बोलते हैं। घर में वारूण स्नान माने पानी से स्नान करना।
मानसिक स्नानः 'मैं आत्मा हूँ, चैतन्य हूँ, ॐॐॐ.... पंचभौतिक शरीर मैं नहीं हूँ। बदलने वाले मन को मैं जानता हूँ। बुद्धि के निर्णय बदलते हैं, भाव भी बदलते हैं, ये सब बदलने वाले हैं, उनको जानने वाला में अबदल आत्मा हूँ। ॐ ॐ परमात्मने नमः ॐॐ....' इस प्रकार आत्मचिंतन करने को बोलते हैं मानसिक स्नान। अनुक्रमणिका
स्नान को परमात्म स्नान बनाने की कला
ॐ ह्रीं गंगायै ॐ ह्रीं स्वाहा। यह मंत्र बोलते हुए सिर पर जल डालें तो गंगा स्नान का पुण्य होता है। अगर प्रार्थना करते हुए स्नान करते हो वह आपका परमात्म-स्नान हो जायेगा, 'अंतर्यामी ईश्वर को मैं स्नान करवा रहा हूँ। शरीर को तो स्नान कराता हूँ लेकिन अंतरतम चैतन्य प्रभु ! मैं तुझे भी नहला रहा हूँ।'
ॐ भूधराय नमः। 'जो पृथ्वी को धारिणी शक्ति से धर रहे हैं और हमारे शरीर को धारण करने की शक्ति दे रहे हैं, उनको हम नमन करते हैं।' इस मंत्र से आप स्नान करिये। स्वास्थ्य और मन की प्रसन्नता का लाभ होगा। नाम तो भगवान का होगा और काम तुम्हारे तन-मन का और तुम्हारा होगा। अगर कोई अधिक विशेष मंत्र चाहते हो तो यह मंत्र बोलते हुए स्नान करोः
यथा विशोकां धरणे कृतवांस्त्वां जनार्दनः।
तथा मां सर्वशोकेभ्यो मोचयाशेषधारिणि।।
'अखिल लोक धारण करने वाली देवी ! जिस प्रकार भगवान जनार्दन ने तुम्हें शोकरहित किया है, मुझे भी उसी भाँति समस्त शोकों से रहित करो।' (भविष्य पुराण, उत्तर पर्वः अध्याय 105) अनुक्रमणिका
शरीर की मजबूती और आरोग्यता के लिए रगड़-रगड़कर स्नान करना चाहिए। गर्मियों में दो बार नहाना स्वास्थ्यप्रद है।
स्नान करते समय पैरों में विद्युत-कुचालक (रबड़ आदि की) चप्पल होनी चाहिए। ताजा पानी बाल्टी में भर लें। उसमें सप्त नदियों का आवाहन करें।
ॐ गंङ्गे य यमुने चैव गोदावरी सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।
फिर मुँह में पानी भरकर सिर को बाल्टी में डालें और उसमें पलकें झपकायें। इससे आँखों की शक्ति बढ़ती है तथा गर्मी निकल जाती है। पहले सिर पर पानी डालना चाहिए ताकि गर्मी सिर से नीचे चली जाय। पैरों पर पहले ठंडा पानी नहीं डालना चाहिए। पहले पैर गीले करने से शरीर की गर्मी ऊपर की ओर चढ़ती है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
जहाँ जलाशय है वहाँ पूर्वमुखी होकर स्नान करें और घर में करें तो बाल्टी क पानी में कभी-कभार गोमूत्र (गोझरण, गोझरण अर्क का भी उपयोग कर सकते हैं। यह सभी संत श्री आशाराम जी आश्रमों व समितियों के सेवाकेन्द्रों में उपलब्ध है।) अथवा तीर्थोदक (तीर्थ का जल) पहले डाल के फिर स्नान करें तो घर में भी तीर्थ स्नान माना जायेगा। स्नान करते समय सिर पर जल डालते हुए 3 बार महामृत्युञ्जय मंत्र बोलने से आरोग्यता बढ़ती है तथा अकाल मृत्यु टलती है।" अनुक्रमणिका
आज विज्ञापनों की चकाचौंध में लोग प्राकृतिक वस्तुओं के उपयोग से दूर होते जा रहे हैं। केमिकलयुक्त साबुन-शैम्पू आदि का उपयोग करने से लोग स्वास्थ्य की हानि कर लेते हैं। सभी के तन, मन व मति स्वस्थ रहें इसलिए बापू जी ने हानिकारक केमिकलों से बने साबुन-शैम्पू की हानियाँ बताकर लोगों को प्रकृतिप्रदत्त वस्तुओं के विभिन्न लाभकारी प्रयोगों से अवगत कराया। पूज्य श्री कहते हैं- "प्रायः) साबुन में तो चरबी, सोडा खार एवं रसायनों का मिश्रण होता है, जो हानिकारक होते हैं। शैम्पू से बाल धोना ज्ञानतंतुओं और बालों की जड़ों का सत्यानाश करना है। साबुन और शैम्पू नुकसान करते हैं। जो लोग इससे नहाते हैं, वे अपने दिमाग के साथ अन्याय करते हैं। इनसे मैल तो निकलता है लेकिन इनमें प्रयुक्त रसायनों से बहुत हानि होती है। तो किससे नहायें, यह भी शास्त्रकारों ने, आचार्यों ने खोज निकाला। मुलतानी मिट्टी व गोमूत्र रगड़कर स्नान करने पर रोमकूप खुल जाते हैं। इससे जो लाभ होते हैं, साबुन से उसके एक प्रतिशत भी लाभ नहीं होते। स्फूर्ति और निरोगता चाहने वालों को साबुन से बचकर मुलतानी मिट्टी अथवा सप्तधान्य उबटन से नहाना चाहिए। जिसको भी गर्मी हो, पित्त हो, आँखों में जलन होती हो वह मुलतानी मिट्टी लगा के थोड़ी देर बैठ जाय, फिर नहाये तो शरीर की गर्मी निकल जायेगी, फायदा होगा। मुलतानी मिट्टी और आलू का रस मिलाकर चेहरे को लगाओ, चेहरे पर सौंदर्य और निखार आयेगा।
जापानी लोग हमारी वैदिक और पौराणिक विद्या का लाभ उठा रहे हैं। शरीर में उपस्थित व्यर्थ की गर्मी तथा पित्तदोष का शमन करने के लिए, चमड़ी एवं रक्त संबंधी बिमारियों को ठीक करने के लिए वे लोग मुलतानी मिट्टी के घोल से टब-बाथ करते हैं तथा आधे घंटे के बाद शरीर को रगड़कर नहा लेते हैं। आप भी यह प्रयोग करके या मुलतानी मिट्टी को ऐसे ही शरीर पर लगा के स्नान करके स्फूर्ति और स्वास्थ्य का लाभ ले सकते हैं।" (मुलतानी मिट्टी शीतल होती है, अतः शीत ऋतु में इसका उपयोग न करें, सप्तधान्य उबटन का प्रयोग करें।) अनुक्रमणिका
स्नान के द्वारा आध्यात्मिक व लौकिक लाभ लेना सिखाया
साबुन, शैम्पू आदि से नहाने से फायदे की जगह नुकसान होता है। पूज्य बापू जी ने अपने सत्संगों में प्राकृतिक स्नान के शारीरिक व मानसिक लाभों के साथ ही आर्थिक व आध्यात्मिक लाभों पर भी प्रकाश डाला है। स्नान की ये सरल युक्तियाँ अपनाकर व्यक्ति स्नान के सारे फायदे ले सकता है और अपना जीवन सुखमय बना सकता है। अनुक्रमणिका
पूज्यश्री
कहते हैं- "जो
आप कर सकते हो, जिससे
आपको फायदा होगा,
मैं वही बताता
हूँ। मैं आपको
घरेलु उबटन बनाने
की युक्ति बताता
हूँ। उससे नहाओगे
तो साबुन से नहाने
से सौ गुना ज्यादा
फायदा होगा और
सस्ता भी पड़ेगा।
गेहूँ, चावल, जौ,
तिल, चना, मूँग और
उड़द
–
इन सात चीजों को
समभाग लेकर पीस
लो। यह सप्तधान्य
उबटन बन गया। फिर
कटोरी में इसका
रबड़ी जैसा घोल
बना लो। उसे सबसे
पहले थोड़ा सिर
पर लगाओ, ललाट पर
त्रिपुंड लगाओ,
बाजुओं पर, नाभि
पर लगाओ। बाद में
सारे शरीर पर मलकर
4-5 मिनट तक के सूखने
के बाद रगड़ के
उतारो, फिर स्नान
करो। यह पापनाशक
व पुण्य व स्फूर्ति
वर्धक स्नान होगा,
साथ ही सात्त्विकता,
प्रसन्नता, निरोगता
भी बढ़ायेगा। इससे
आपको उसी दिन फायदा
होगा। आप अनुभव
करेंगे कि 'आहा
! कितना आनंद,
कितनी प्रसन्नता
!' इतना फायदा
होता है !
अनुक्रमणिका
जौ
तिल मिक्सी में
पीसकर रख दो। मग
या कटोरी में थोड़ा-सा
यह मिश्रण ले के
थोड़े पानी में
भिगो दो। फिर उसे
शरीर पर रगड़ के
बाद में स्नान
करो। आपको पापनाशक
तीर्थोदक स्नान
का फल मिलेगा।
जो
कभी-कभार इसमें
गोमूत्र, गौ-गोबर
मिलाकर स्नान करते
हैं, उनकी पापराशि
खत्म हो जाती है,
चित्त प्रसन्न
होता है और बुद्धि
शुद्ध बनने लगती
है। अगर गोमूत्र
से सिर के बालों
को भिगोकर रखें
और थोड़ी देर बाद
धोयें तो बाल रेशम
जैसे मुलायम होते
हैं। अनुक्रमणिका

थोड़े
बिल्वपत्र पानी
में डालकर उनको
रगड़ के नहाने
से शरीर में से
वायु प्रकोप के
दोष दूर होते हैं
और यह पुण्यप्रद
माना गया है। अथवा
तो आँवला चूर्ण
और कुटे हुए तिलों
का पानी का घोल
बनायें। वह रगड़
के स्नान करने
से शरीर के सारे
दोष, पाप-ताप और
रोग निवृत्त होते
हैं। तिल वायुदोष
का हरण करते हैं
और आँवला पित्तदोष
का हरण करता है।
ये दोष चले गये
तो एक दोष की कोई
दाल नहीं गलती।
दो दोष जब मिलते
हैं- वायु व पित्त
साथ मिलते हैं
या वायु व कफ जोर
पकड़ते हैं, तब
हानिकारक बनते
हैं। दो नहीं रहते,
फिर एक और एक ग्यारह
बन जाते हैं। अब
तिल नहीं मिले
तो आँवला चूर्ण
और तिलों के तेल
के उपयोग कर लें।
अनुक्रमणिका
बाल काले व मजबूत बनाने की युक्तियाँ बतायीं
नींबू रस और आँवला रस मिलाकर सिर पर लगा दो अथवा तो केवल आँवले का रस लगा दो। 15-20 मिनट बाद नहाओ तो आँवले का रस सिर की गर्मी खींच लेगा। बाल जल्दी सफेद नहीं होंगे और बालों की जड़े कमजोर नहीं होंगी, बाल बने रहेंगे। यदि आँवले का रस नहीं मिले तो आँवले के चूर्ण को रात को पानी में भिगो दो और सुबह उसी का उपयोग कर लो। अनुक्रमणिका
जो
लोग कभी-कभी गोदुग्ध
से बने दही को शरीर
पर रगड़कर स्नान
करते हैं, उनके
घर में लक्ष्मी
स्थिर होती है।
रुपये-पैसे में
बरकत आती है, अच्छी
रोजी-रोटी का रास्ता
निकलता है। इनमें
से जिसको जो उपलब्ध
हो सके, उसका लाभ
ले। किसी (तीव्र
बुखार आदि) कारणवश
नहीं नहा सकते
तो फिर मानसिक
स्नान कर सकें
तो कर लें, मंत्र
स्नान करना चाहें
तो कर लें, नहीं
तो भस्म का स्नान
भी किया जा सकता
है। अनुक्रमणिका
अपनी संस्कृति का जो विज्ञान है, वह बहुत काम करता है। रात्रि को स्नान नहीं करना चाहिए। संध्या को, सूर्यास्त के बाद स्नान नहीं करना चाहिए। फिर यह भी खोजा कि मासिक धर्म हो गया हो तो रात्रि को स्नान जरूर कर लेना चाहिए क्योंकि शरीर में मासिक धर्म और ताप का वातावरण है तो स्नान करने से मासिक धर्म नियंत्रित रहेगा। यह भी खोजा है कि चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण है तो ग्रहण की समाप्ति पर रात्रि को स्नान कर लेना चाहिए। ऋषियों, आचार्यों ने कितनी सूक्ष्म खोज की है ! अनुक्रमणिका
नहाने के बाद निचोड़े हुए वस्त्र से शरीर को रगड़-रगड़कर पोंछें, जिससे रोमकूपों (त्वचा के छिद्रों) का सारा मैल बाहर निकल जाय और रोमकूप खुल जायें। त्वचा के छिद्र बंद रहन से ही त्वचा की कई बीमारियाँ होती हैं। फिर सूखे कपड़े से शरीर को पोंछकर सूखे, साफ वस्त्र पहन लें।
ज्यादा देर शरीर पर गीले कपड़े होते हैं तो नुकसान होता है क्योंकि शरीर को जो तापमान चाहिए वह नहीं मिल पाता है। गीले कपड़े शरीर का तापमान ठंडा करते हैं तो फिर जठर शरीर को गर्मी भेजता है। इस प्रकार तापमान संतुलित करने के लिए जीवनशक्ति खर्च होती है। इसलिए कभी भी गीले कपड़े ज्यादा देर नहीं पहनने चाहिए और गीला सिर तो कभी नहीं रखना चाहिए। यदि कभी ऐसा हो तो बायाँ नथुना बंद करके दायें नथुने से थोड़ी देर श्वास लेने चाहिए और मुँह में लौंग रख लेनी चाहिए। सर्दी अथवा ठंडी हवा का डर लगे तो 1-2 लौंग मुँह में रख लेनी चाहिए। स्नान के दौरान गीले हुए वस्त्रों का जल अपने को व अन्य लोगों को न लगे इसकी सावधानी रखनी चाहिए। जो उन वस्त्रों को झटकते हैं और वह जल दूसरों को लगता है तो उनका पुण्यनाश होता है। अनुक्रमणिका
बापू जी ने सिखाया स्वावलम्बन का पाठ
अपने कपड़े स्वयं ही धो डालो। सुविधा में डूबना आराम नहीं है, वह तो आलस्य है। आज बड़े आदमी की पहचान है कि बड़ी गुलामी से घिरा रहेगा। सब काम 'यह नौकर कर ले, वह कर ले....' फिर मशीन ला के कसरत करता है। तो अपने दैनिक जीवन की कसरत का गला क्यों घोंटना ?" अनुक्रमणिका
बापू जी ने कपड़े पहनने का सही ढंग सिखाया
भारतीय संस्कृति में मानव को सुसंस्कारित करने की अनेक बातें परम्पराओं के रूप में प्रचलित हैं। उनमें वेशभूषा का भी बड़ा महत्त्व है। इनके निर्धारण के पीछे सदाचार व नैतिकता का ध्यान रखा गया है। पूज्य बापू जी कहते हैं- "तन और मन परस्पर जुड़े हुए हैं। तन गंदा होगा तो मन भी प्रफुल्लित नहीं रह सकता। तन पर तामसी वस्त्र होंगे तो मन पर भी तमस छा जायेगा। अतः जो लोग मैले कपड़े पहनते हैं, रात्रि में पहने हुए कपड़े सुबह नहाने के बाद फिर से पहन लेते हैं उन्हें सावधान हो जाना चाहिए।
'चाणक्यनीतिदर्पण' (15.4) में आता है कि 'मलिन वस्त्र पहनने वाले, मलयुक्त दाँतों की सफाई नहीं करने वाले, भोजन के लिए ही जीने वाले, कठोर बोलने वाले तथा सूर्योदय और सूर्यास्त के समय एवं थोड़ी देर बाद तक सोने वाले व्यक्ति को लक्ष्मी त्याग देती है, चाहे वे साक्षात् विष्णु ही क्यों न हों।'
मुँह जूठा, दाँत मैले और कपड़े गंदे – ये तुम्हारे ओज को कम कर देते हैं। जो वस्त्र पहन कर शौच जाते हो, वे स्नान के बाद कदापी नहीं पहनने चाहिए, चाहे स्नान के साथ बिना साबुन के ही पानी में डुबा दो। वस्त्र चाहे सादे हों लेकिन धोये हुए हों, साफ हों, मैले, गंदे, पसीने वाले नहीं हों। अनुक्रमणिका
कृत्रिम (सिंथेटिक) वस्त्र न पहनें। बहुत कसे हुए, नायलॉन आदि कृत्रिम तंतुओं से बने हुए तथा चटकीले-भड़कीले गहरे रंग के कपड़े तन-मन के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं व जीवनी शक्ति का ह्रास करते हैं। तंग कपड़ों से रोमकूपों को शुद्ध हवा नहीं मिलती व रक्त-संचरण में बाधा पड़ती है। ढीले-ढाले सूती वस्त्र स्वास्थ्य के लिए अति उत्तम होते हैं।
सर्दियों में गर्म कपड़े पहनें लेकिन जो कपड़ों पर कपड़े लादे रहते हैं वे प्रकृति से विरूद्ध जीते हैं, तन-मन से ढीले-ढाले हो जाते हैं। गर्मियों में पहनावा हलका-फुलका, ढीला-ढाला, सूती और सफेद हो।" अनुक्रमणिका
पूज्य बापू जी अपने साधनाकाल से लेकर अभी तक सफेद, सादे व सूती कपड़े ही पहनते हैं। किंतु कभी बापू जी को रंग बिरंगे कपड़ों में देखकर कुछ में मन में प्रश्न उभरता होगा। इस संदर्भ में पूज्यश्री कहते हैं- "मैं तुम्हारी (भक्तों की) हजार-हजार बातें मानता हूँ क्योंकि मुझे तुमसे एक बात मनवानी है। तुम एक बार मेरी बात स्वीकार करके उस परम पद को पा लो बस ! इसलिए हम तुम्हारे रंग-बिरंगे पहनावे स्वीकार कर लेते हैं।" अनुक्रमणिका
भारतीय वेशभूषा की महत्ता समझायी
अपना रहन-सहन, वेशभूषा सादगी से युक्त रखने चाहिए। अभिनेत्रियों था अभिनेताओं के चित्र या नाम छपे हुए वस्त्र कभी मत पहनो। इससे बुरे संस्कारों से रक्षा होगी। विदेशियों की नकल से गुलामी के संस्कार पड़ते हैं। भारतीय पद्धति के कपड़े पहनना स्वास्थ्य व सरलता की दृष्टि से बहुत लाभदायी है। पूज्य बापू जी ने इसकी महत्ता एक प्रेरक प्रसंग के द्वारा बहुत ही सुंदर ढंग से बतायी है- "भारत का एक बाल कान्वेंट स्कूल से अपना नाम खारिज करवाकर भारतीय पद्धति से पढ़ने वाली शाला में भर्ती हो गया। उस बालक की बुद्धि गजब की थी, दृष्टि बड़ी पैनी थी। पहले ही दिन बालक की नजर प्रधानाचार्य के धोती-कुर्ते पर गयी। उस बालक ने विचार किया कि 'हमारे प्रधानाचार्य धोती-कुर्ता पहनते हैं। स्वामी विवेकानंद जी भी धोती-कुर्ता और पगड़ी पहन कर विदेशों में गये और अपने देश की वेशभूषा पहनने पर भी वे विश्वविख्यात हुए तो मैं क्यों गुलामी की वेशभूषा पहनूँगा।!'
दूसरे दिन वह नन्हा बालक अपनी संस्कृति की वेशभूषा पहनकर अपने पिता को प्रणाम करने गया।
पिता
ने कहाः "अरे,
तूने यह क्या पहन
लिया ?"
बालकः "पिताजी ! यह हमारी भारतीय वेशभूषा है। देश तब तक शाद-आबाद नहीं रहता जब तक हम अपनी संस्कृतित और वेशभूषा का आदर नहीं करते। पिताजी ! मैंने कोई गलती तो नहीं की ?"
"बेटा! गलती तो नहीं की लेकिन ऐसा कैसे पहन लिया ?"
"पिता जी ! हमारे प्रधानाचार्य अपनी भारतीय वेशभूषा पहनते हैं। कोट-पैंट, शर्ट और टाई आदि ठंडे मुल्कों की आवश्यकता है। हमारा देश तो गर्म है। यहाँ तो खुली-खुली, ढीली-ढाली वेशभूषा होनी चाहिए। यह स्वास्थ्यप्रद है और हमारी संस्कृति की पहचान है।"
पिता ने उस बालक को गले से लगायाः "बेटा ! तू होनहार लगता है। कोई तुझे अपने विचारों से दबा नहीं सकता। तू अपने विचारों को बुलंद रख। तेरी जय-जयकार होगी बेटा !"
वही लड़का आगे चलकर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के नाम से प्रसिद्ध हुआ और देश को आजाद कराने के कार्य में लगा।
आजकल कई विद्यालयों कड़क इस्तरी किये हुए कपड़े पहनने को कहा जाता है। अरे, बच्चे अभी कड़क इस्तरी किये कपड़े पहनेंगे तो उनकी सरलता मर जायेगी और खर्च बढ़ जायेगा। माँ-बाप के लिए भार बन जायेंगे।
हमने ऐसे-ऐसे लोगों को देखा जो अपने चौके में गाय के गोबर का लीपन किये बिना भोजन नहीं बनाते थे परंतु वे अमेरिका गये, हवाई जहाज में बैठे तो देखा कि "दूसरे लोग यह-वह खा रहे हैं, अपन नहीं खायेंगे तो भगतड़े कहे जायेंगे। चलो, थोड़ा खा लें।' फिर वे अभी क्लबों में नाच रहे हैं, शराब पी रहे हैं और औरतें बदल रहे हैं। अरे, अपनी दृढ़ता होनी चाहिए। कुछ लोग सोचते हैं, 'क्या करें, जरा बाहर जा रहे हैं। घर का तो कुर्ता है लेकिन जरा सफारी....'
अरे, हमने तो विदेश जाकर कभी पहनावा नहीं बदला, अपना भोजन नहीं बदला, हम अपने ढंग से जीते हैं। जो अपने शरीर को ज्यादा सजाता है, ज्यादा टीपटाप करता है, अभिनेताओं जैसी वेशभूषा पहनता है, वह असंयमी हो जाता है, अश्लील होने का रास्ता खोल लेता है।" अनुक्रमणिका
कपड़े पहनो अंगों की रक्षा करने के लिए
पूज्य बापू जी कहते हैं- "शुद्ध, सादे सूती वस्त्र स्वास्थ्य के लिए भी अच्छे हैं और आर्थिक ढंग से भी ठीक हैं। कपड़े पहनो अंगों की रक्षा करने के लिए, अंगों को बीमार करने के लिए नहीं। डॉक्टर डायमंड ने खोज करके घोषणा की कि जो सिंथेटिक कपड़े हैं वे जीवनशक्ति का ह्रास करते हैं। सूती कपड़े और ऊनी कपड़े जीवनीशक्ति का नुकसान नहीं करते।" अनुक्रमणिका
बापू जी ने तिलक करना सिखाया व उसकी महत्ता बतायी
ललाट
पर दोनों भौहों
के बीच विचार शक्ति
का केन्द्र है।
योगी इसे 'आज्ञाचक्र'
कहते हैं। इसे
शिवनेत्र अर्थात्
कल्याणकारी विचारों
का केन्द्र भी
कहा जाता है। ललाट
पर तिलक करने से
आज्ञाचक्र और उसके
नजदीक की शीर्ष
(पीनियल) और पीयूष
(पिट्यूटरी) ग्रंथियों
को पोषण मिलता
है। यह बुद्धिबल
व सत्त्वबलवर्धक
है तथा विचारशक्ति
को भी विकसित करता
है। अतः तिलक लगाना
आध्यात्मिक तथा
वैज्ञानिक – दोनों
दृष्टिकोणों से
बहुत लाभदायक है।
कोई भी शुभ कार्य
करते समय ललाट
पर तिलक करें।
पाश्चात्य कल्चर की चकाचौंध में लोग अपनी संस्कृति व शास्त्रों से विमुख हो इस सूक्ष्म विज्ञान से दूर होते जा रहे थे। अतः लोगों को तिलक लगाने के लिए प्रोत्साहित करने की कई युक्तियाँ अपनाते हुए पूज्य बापू जी ने इस लुप्त होती परम्परा को पुनर्जीवित किया है। पूज्य बापू जी को व्यासपीठ पर चंदन का तिलक लगाते हुए लाखों-करोड़ों लोगों ने देखा है। आप श्री कहते हैं- "मैं यहाँ (सत्संग-पंडाल) में आकर तिलक लगाता हूँ ताकि लोगों को पता चले कि तिलक की बड़ी भारी महिमा है। यह संत का श्रृंगार तुम भी कर सकते हो। हमारे शास्त्रों में तिलक लगाने की बड़ी महिमा गायी गयी है।
ब्रह्मवैवर्त पुराणः (ब्र. खं.- 26.73) में आता है कि
स्नानं दानं तपो होमो देवता पितृकर्म च।
तत्सर्वं निष्फलं यादि ललाटे तिलकं विना।।
'बिना तिलक लगाये स्नान, दान, तप, हवन, देवकर्म, पितृकर्म – सब कुछ निष्फल हो जाता है।'
ललाट पर तिलक करने से शिवनेत्र विकसित होता है। वैज्ञानिक अभी चकित होकर प्रशंसा करते है।
हमारे शरीर में 7 केन्द्र हैं, भ्रूमध्य में छठा केन्द्र है। यह केन्द्र जितना विकसित होता है, उतना पाँचों केन्द्र विकसित होने का फायदा होता है। तिलक करने से सौंदर्य, तेज, सूझबूझ तो बढ़ती ही है, साथ में शरीर के पाँचों केन्द्रों का राजा – आज्ञाचक्र लोक परलोक सँवारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
कोई अच्छा काम, कोई शुभ कर्म करते हैं तो उस समय बुद्धिमान ब्राह्मण 'ॐ गणानां त्वा गणपतिँ हवामहे...' कह के ललाट पर तिलक करते हैं। तिलक क्यों करते हैं, कि मांगलिक कार्य है, कुछ बड़ा कार्य है तो भावना के साथ तुम्हारे विचार विकसित हों तथा तुम्हारे शुभ कर्म तुम्हें सूझबूझ और समता की ऊँचाई पर ले जायें। कितना वैज्ञानिक है हिन्दू धर्म! अनुक्रमणिका
चूना
या नींबू के रस
और हल्दी का मिश्रण
अथवा चंदन आदि
का तिलक करने से
वहाँ जमा जो रक्त
है वह बिखरता है
और नये रक्त के
आने की सुविधा
बनती है। जैसे
ताजा पानी प्रफुल्लितता
देता है, ऐसे नया
रक्त उन्नत विचार
और बढ़िया स्मृति
में मदद करता है।
ललाट पर नियमित रूप से तिलक करते रहने से मस्तिष्क के रसायनों – सेरोटोनिन व बीटा एंडोर्फिन का स्राव संतुलित रहता है, जिससे मनोभावों में सुधार आकर उदासी दूर होती है, सिरदर्द नहीं होता तथा मेधाशक्ति तीव्र होती है।
महिलाओं द्वारा भ्रूमध्य एवं माँग में केमिकलरहित शुद्ध सिंदूर या कुमकुम लगाने से मस्तिष्क संबंधी क्रियाएँ नियंत्रित, संतुलित तथा नियमित रहती हैं एवं मस्तिष्कीय विकार नष्ट होते हैं लेकिन आजकल जो केमिकलयुक्त बिंदियाँ, सिंदूर, कुमकुम चल पड़े हैं वे लाभ के बजाये हानि करते हैं। ये चिड़चिड़ापन लायेंगे, गलत निर्णय लायेंगे। अनुक्रमणिका
'स्कन्द पुराण' में आता है कि
अनामिका शांतिदा प्रोक्ता मध्यमायुष्करी भवेत्।
अंगुष्ठः पुष्टिदः प्रोक्ता तर्जनी मोक्षदायिनी।।
अनामिका से तिलक करने से सुख-शांति, मध्यमा से आयु, अँगूठे स्वास्थ्य और तर्जनी से मोक्ष की प्राप्ति होती है।"
सामान्यतया
चंदन, कुमकुम, हल्दी,
यज्ञ की राख, गोधूलि,
तुलसी या पीपल
की जड़ की मिट्टी
आदि का तिलक लगाया
जाता है। चंदन
का तिलक लगाने
से पापों का नाश
होता है, व्यक्ति
संकटों से बचता
है, उस पर लक्ष्मी
की कृपा हमेशा
बनी रहती है, ज्ञानतंतु
संयमित व सक्रिय
रहते हैं।
कुमकुम में हल्दी व नींबू के रस का संयोजन होने से त्वचा को शुद्ध रखने में सहायता मिलती है और मस्तिष्क के स्नायुओं का संयोजन प्राकृतिक रूप में हो जाता है। संक्रामक कीटाणुओं को नष्ट करने में शुद्ध मिट्टी का तिलक महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। यज्ञ की भस्म का तिलक करने से सौभाग्य की वृद्धि होती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तिलक लगाने से ग्रहों की शांति होती है।
पूज्य श्री कहते हैं- "देशी गाय की चरणरज (गोधूलि) का तिलक करने से भाग्य की रेखायें बदल जाती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंडः 21.94) में आता हैः
गोष्पदाक्तमृदा
यो हि तिलकं कुरुते
नरः।
तीर्थस्नातो भवेत्सद्यो जयस्तस्य पदे पदे।।
'गौ के पैरों की मिट्टी का तिलक जो मनुष्य अपने मस्तक में लगाता है, वह तत्काल तीर्थजल में स्नान करने का पुण्यफल प्राप्त करता है और पग-पग पर उसकी विजय होती है।'
अगर तिलक चंदन का हो जाय तो अच्छा है नहीं तो फिर तुलसी की मिट्टी का भी कर सकते हो। नहीं तो हल्दी और नींबू का रस या चूने का चूर्ण मिलाकर उसका तिलक करें। थोड़ी सनसनाहट होगी लेकिन इससे छठा केन्द्र जल्दी विकसित हो जायेगा। मैंने किया हुआ है। फिर आपके निर्णय भी अच्छे होंगे, सूझबूझ भी अच्छी बन जायेगी। अगर वह नहीं है तो स्नान के बाद जल का ही तिलक कर सकते हो और वह भी भूल गये तो कार्य करते समय तिलक की भावना करके भगवन्नाम सुमिरन करते भृकुटी पर केवल उँगली से तिलक करोगे तब भी कुछ प्राणशक्ति ऊपर को आयेगी, आपके शुभ संकल्प और व्यवहार में सहायक बनेगी।
महिलाओं को तिलक करने हेतु प्रेरित किया
ऋषियों ने
कितना सुंदर खोजा
कि स्त्रियां गर्भधारण
करती हैं, बच्चे
को जन्म देने की
उनमें कुदरती योग्यता
है तो अधिकांश
स्त्रियों का मन
और प्राण स्वाधिष्ठान
और मणिपुर केन्द्र
(नाभि केन्द्र)
में ज्यादा रहते
हैं। इससे पुरुषों
की अपेक्षा माइयों
में श्रद्धा का
सदगुण ज्यादा होता
है, संशय व भय भी
ज्यादा रहता है।
एक जरा सा चूहा
पसार हुआ तो
हड़बड़ायेंगी-
"मैं तो डर गयी
! मैं तो मर गयी,
हाय !....'
स्वाधिष्ठान और मणिपुर केन्द्रों में भय, भावना आदि की अधिकता होती है इसलिए स्त्रियों को हररोज तिलक करने की आज्ञा शास्त्रों ने दी है। मस्तक पर बिंदिया अथवा तिलक लगाने से चित्त की एकाग्रता विकसित होती है तथा मस्तिष्क में पैदा होने वाले विचार असमंजस की स्थिति से मुक्त होते हैं। अनुक्रमणिका
प्लास्टिक की बिंदियों से किया सावधान
आजकल माइयों के साथ अन्याय हो रहा है। छठा केन्द्र विकसित हो इसलिए तिलक करते हैं। इससे तेज, शोभा, प्रसन्नता, बल, उत्साह बढ़ता है लेकिन उसकी जगह पर उत्साह बल, तेज को दबाने वाला, मृत पशुओं के अंगों से बनाया हुआ घोल बिंदी चिपकाने के लिए लगा देते हैं। तेज बढ़ाने की जगह पर तेज को कुंठित कर देना..... यह कैसा है !
गृहिणी आजकल ठगी जाती है। प्लास्टिक की बिंदी लगाती है। ललाट में तिलक करने से शिवनेत्र (आज्ञाचक्र) विकसित होता है जबकि प्लास्टिक की बिंदियों में जानवरों के अंगों से बना सरेस द्रव्य डाला जाता है जो हानि करता है। छी.... छी..... ! मरे हुए, कराहते हुए, तड़पते हुए, बीमार जानवरों के अंगों का उपयोग चिपकाने वाली बिंदी में होता है और उसे अपने भाग्य पर लगाना ! गृहिणियों को बहुत घाटा होता है। अतः इसे दूर से ही त्याग दें।" अधिकांश बाजारू सिंदूर या कुमकुम कृत्रिम हानिकारक रसायनों से बनाये जाते हैं। प्राकृतिक पदार्थों से बनाया गया सिंदूर या कुमकुम ही लाभ करता है। अनुक्रमणिका
पूज्य
श्री कभी भी दक्षिणा
के रूप में फूल
की पँखुड़ी तक
नहीं लेते हैं
परंतु सत्संग में
महिलाओं के हित
के लिए उनसे दक्षिणा
के रूप में अनोखा
वचन लेते हैं।
पूज्य बापू जी
कहते हैं- "जो
प्लास्टिक की बिंदी
नहीं लगाने का
वचन देती हैं और
बाजारू क्रीम नहीं
लगाने का वचन देते
हैं, वे हाथ ऊपर
करें तो मैं समझूँगा
कि मेरे को दक्षिणा
मिल गयी।
विद्यार्थियों को बुद्धिशक्ति बढ़ाने की युक्ति सिखायी
भ्रूमध्य
को अनामिका से
हलका रगड़ते हुए
ॐ गं गणपतये नमः।
ॐ श्री गुरुभ्यो
नमः।' करके
तिलक करें। फिर
2-3 मिनट प्रणाम की
मुद्रा में (शशकासन
करते हुए दोनों
हाथ आगे जोड़कर)
सिर जमीन पर लगा
के रखें। इससे
निर्णयशक्ति, बौद्धिकशक्ति
में जादुई लाभ
होता है। क्रोध,
आवेश, वैर पर नियंत्रण
पाने वाले रसों
का भीतर विकास
होता है।
सूर्योदय के समय ताँबे के पात्र में जल ले के उसमें लाल फूल, कुमकुम डालकर सूर्यनारायण को अर्घ्य दें। जहाँ अर्घ्य का जल गिरे वहाँ की गीली मिट्टी का तिलक करें तो विद्यार्थी की बुद्धि बढ़ने में मदद मिलती है।"
सोते समय ललाट से तिलक का त्याग कर देना चाहिए। अनुक्रमणिका
बापू जी ने अभिवादन की महिमा बताकर अभिवादन करना सिखाया
अभिवादन
सदाचार का मुख्य
अंग है, उत्तम गुण
है। इसमें नम्रता,
आदर, श्रद्धा एवं
सेवा का भाव है।
बड़े आदर के साथ,
हृदयपूर्वक श्रेष्ठजनों
को प्रणाम करना
जीवन को महान बनाने
की कुंजी है। पूज्य
बापू जी भी बचपन
से माता पिता को
प्रणाम करते थे।
पूज्य श्री प्रणाम
की महत्ता का गूढ़
शास्त्रीय रहस्य
उजागर करते हुए
कहते हैं- "प्रतिदिन
सुबह माता-पिता
एवं गुरुजनों के
चरणों में प्रणाम
करना चाहिए। नमस्कार
की बड़ी महिमा
है। मनु महाराज
ने मनुस्मृति
(2.120.121) में कहा हैः
ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति यूनः स्थविर आयति।
प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान्प्रतिपद्यते।।
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धेपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।।
'बड़ों
के आने पर छोटे
के प्रार्ण ऊपर
चढ़ते हैं और जब
वह उठकर प्रणाम
करता है तो पुनः
प्राणों को पूर्ववत्
स्थिति में प्राप्त
कर लेता है। जो
पुरुष नित्य बड़ों
को, वृद्धजनों-गुरुजनों
को प्रणाम करता
है और उनकी सेवा
करता है उसकी आयु,
विद्या, यश और बल
– ये चारों बढ़ते
हैं।'
बड़े बुजुर्गों का, माता-पिता का सम्मान करने से, उनका मार्गदर्शन लेने से अपना जीवन उन्नत होता है। भगवान राम जी अपने माता पिता का सम्मान करते थे। रोज सुबह उठकर अपने गुरुदेव को तथा माता-पिता को प्रणाम करते थे, उनका आशीर्वाद लेते थे तो कितने महान हो गये।
प्रातःकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा।। (श्री रामचरित. बा.कां. 204.4)
रामजी कौसल्या माँ को, दशरथ जी को, सुमित्रा को प्रणाम करते हैं, कैकेयी के चरणों पर मत्था टेकते हैं। फिर गुरु जी को मत्था टेकते हैं और गुरु जी जानते थे कि 'अगर सत्संग के समय सुबह-सुबह हम नहीं गये तो राम जी यहाँ मत्था टेकने के लिए आयेंगे।' तो वसिष्ठ जी महाराज रामजी को कष्ट न हो, बालक हैं, आश्रम दूर है, यहाँ तक आयेंगे और हमें तो सत्संग करने जाना ही है, ऐसा सोचकर करुणावश स्वयं ही आ जाते प्रातःकाल।" अनुक्रमणिका
साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किसलिये ?
अनादि काल से चली आ रही शिष्य द्वारा गुरु को प्रणाम करने की परम्परा का वैज्ञानिक रहस्य बताते हुए पूज्य श्री कहते हैं- "विदेश के बड़े-बड़े विद्वान एवं वैज्ञानिक भारत में प्रचलित गुरु समक्ष शिष्य के साष्टांग दंडवत् प्रणाम की प्रथा को पहले समझ न पाते थे कि भारत में ऐसी प्रथा क्यों है। अब बड़े-बड़े प्रयोगों के द्वारा उनकी समझ में आ रहा है कि यह सब युक्तियुक्त है। इस श्रद्धा-भाव से किये हुए प्रणाम आदि द्वारा ही शिष्य गुरु से लाभ ले सकता है, अन्यथा आध्यात्मिक उत्थान के मार्ग पर वह सद्ज्ञान-सुसम्पन्न नहीं होगा, शब्दजाल के अहंकार में उलझ जायेगा। अनुक्रमणिका
जीवन
अहंकार को सजाने
के लिए नहीं, परमात्मा
से प्रीति करने
के लिए है। धन का
अहंकार, सत्ता
का अहंकार, सौंदर्य
या बुद्धिमत्ता
का अहंकार निरहंकार
नारायण साथ में
होते हुए भी उससे
मिलने नहीं देता।
इसलिए इस अहंकार
को मिटाने के लिए
धर्म ने भगवान
को दंडवत् प्रणाम
करने का विधान
किया है। मनोवैज्ञानिक
बताते हैं कि आदमी
खड़ा रहता है तो
उसका अहंकार भी
खड़ा रहता है और
मन में दबी हुई
बातें बताने में
वह सिकुड़ता है
पर जब उसको टेबल
पर सुलाते हैं
और फिर पूछते हैं
तो वह कुछ-कुछ बताने
लगता है।
एक जापानी युवक घूमता-घामता तिब्बत के एक लामा (बौद्ध आचार्य) के आश्रम में पहुँचा। उस आश्रम में लामा और उनके कई शिष्य रहते थे। युवक ने लामा से कहाः "मैं आपका नाम सुनकर यहाँ आया हूँ और कुछ सीखना चाहता हूँ, कुछ पाना चाहता हूँ।"
लामा ने कहाः "इस आश्रम में सीखने के लिए कुछ नहीं है, पाने के लिए कुछ नहीं है, यह आश्रम तो केवल खोने के लिए है अर्थात् सीखा हुआ भूल जाने के लिए है। अपनी जो कुछ कल्पनाएँ हैं, मान्यताएँ हैं उन्हें खो डालना है। यहाँ कोई रिवाज नहीं है, कोई नियम नहीं है सिवाय एक कड़े नियम के कि प्रत्येक आश्रमवासी अधिष्ठाता अर्थात् सद्गुरु को जब-जब वे दिख जायें तो दंडवत् प्रणाम करे। बैठे हुए दिख जायें तो दंडवत् प्रणाम करे, घूमते हुए दिख जायें तो दंडवत्... दिन में 10 बार, 20 बार, 50 बार, 100 बार, कभी इससे भी अधिक बार ऐसा अवसर आ सकता है।"
उस युवक ने लिखा हैः
हम जापानी लोग किसी के आगे जल्दी झुकते नहीं हैं, अतः दिन में 10, 20 बार दंडवत् करने की बात मेरे लिए बड़ी कठिन थी। फिर भी प्रयोग के लिए मैं वहाँ रहने लगा। पहले 5-10 बार तो बड़ी मेहनत पड़ी, बड़ी तकलीफ हुई किंतु और लोग करते थे तो मैं भी उनके साथ करने लग गया।
2-4 दिन बीते, फिर वह पकड़ और हठ बिखरता गया तथा स्वाभाविक ही दंडवत् होने लगा। फिर कभी गुरुदेव न निकलते तो उनके द्वार पर ही दंडवत् कर लिया करता था। द्वार पर न जाऊँ तो उनकी कुटिया के आसपास के वृक्षों को ही दंडवत् कर लिया करता था। फिर तो मुझे दंडवत् करने में इतना मजा आने लगा कि वृक्ष हो चाहे कुटिया, चाहे कुछ भी न हो, कर दिया दंडवत्... बस, आनंद-आनंद बरसने लगा।
मेरा समर्पण भाव बढ़ता गया और एक दिन गुरुदेव की कृपा मुझ पर छलकी। तब गुरुदेव ने मुझसे कहाः "अब तेरा काम हो गया है। मैंने अपने को दंडवत् कराने के लिए या अपने अहंकार को पुष्ट करने के लिए यह नियम नहीं रखा। प्रणाम करने वाले को तो मजा आता है लेकिन उसे स्वीकार करने वाला बड़े खतरों से गुजरता है। यदि वह सावधान न रहे तो उसमें देहाभिमान आ सकता है और उसके लिए खतरा पैदा हो सकता है।
यहाँ का दंडवत् प्रणाम का नियम व्यक्तिगत धारणाओं, मान्यताओं और अध्यास को बिखेरने की एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में तू उत्तीर्ण हो गया है। अब मेरी हाजिरी के बिना भी तू अपने-आप में परितृप्त रह सकता है। मेरे आश्रम के पेड़-पौधों के बिना भी तू कुछ हद तक आनंदित रह सकता है।"
यह उपासना की छोटी-सी प्रक्रियामात्र है। तत्त्वज्ञान के बिना पूर्ण ज्ञान का कोई पता ही नहीं चलता। जैसे हनुमान जी को श्री सीताराम जी के सत्संग से पूर्णता का पता चला। वसिष्ठ जी के उपदेश से श्रीरामचन्द्र जी अपने पूर्णता के स्वभाव में प्रतिष्ठित रहते थे।
केवल दंडवत् प्रणाम तो ठीक है, अहंकार छोड़ने के लिए सुंदर साधन है दंडवत् लेकिन ब्रह्मज्ञान पाने का उद्देश्य बनाओ। महिलाएँ दंडवत् प्रणाम करेंगी तो उनको हानि होगी। महिलाएँ दंडवत् प्रणाम न करें, ऐसा शास्त्र का आदेश है। दंडवत् से छाती पृथ्वी पर लगेगी तो दोष होता है, हानि होती है। महिलाएँ घुटने टेक के प्रणाम कर सकती हैं।" अनुक्रमणिका
आत्मज्ञानी महापुरुषों को दंडवत् प्रणाम करने की बहुत महिमा है। इस संदर्भ में शास्त्र का एक प्रसंग बताते हुए पूज्य बापू जी कहते हैं- "मृकंडु नामक ऋषि थे। उनके पुत्र थे मार्कण्डेय। वे बाल्यकाल से ही पिता के संस्कार-सिंचन के अनुसार माता-पिता, गुरुजनों एवं संत-महात्माओं को नमस्कार करते थे। एक बार कोई सिद्ध महात्मा उनके यहाँ आये। पिता ने बालक मार्कण्डेय से कहाः "बेटा ! महात्मा जी को प्रणाम करो।"
बालक मार्कण्डेय ने झुककर प्रणाम किया एवं सिद्धपुरुष की चरणरज को सादर मस्तक पर चढ़ाया। महात्मा उस बालक को एकटक देखते रहे मानो उसके भावी जीवन पर दृष्टिपात कर रहे हों। ऋषि ने पूछाः "महाराज ! आप इस प्रकार क्या देख रहे हैं ?"
"बालक तो सुंदर है किंतु इसकी आयु अब बहुत ही कम शेष है।" इतना कहकर उन सिद्धपुरुष ने पुनः विषादपूर्ण नेत्रों से बालक की तरफ निहारा।
ऋषि तो अपने लाडले पुत्र के विषय में यह दुःखद बात सुनकर हक्के-बक्के रह गये ! उन्होंने हाथ जोड़कर महात्मा से विनती कीः "प्रभो ! इसका कोई उपाय ?"
"जो भी संत-महापुरुष आयें, ऋषि मुनि आयें, उनके चरणों में इस बालक से प्रणाम करवाओ।" यह कहकर सिद्धपुरुष चल पड़े। मृकंडु ऋषि ऐसा ही करवाने लगे। एक दिन सप्तर्षि उस मार्ग से पधारे। बालक मार्कण्डेय ने उन्हें खूब भावपूर्वक प्रणाम किया। सत्पर्षियों ने बालक के सिर पर हाथ रखकर दीर्घायु होने का आशीर्वाद दियाः "आयुष्मान भव, सौम्य !"
पिता ने कहाः "महाराज ! इसकी आयु कम है एवं इसको आपके द्वारा दीर्घायु होने का आशीर्वाद मिला है। प्रभो ! अब आपके आशीर्वाद के अनुकूल होने के लिए हमें क्या करना चाहिए ?"
सप्तर्षि बोलेः "इस बालक को भगवान शंकर की सेवा में, पूजा-आराधना-उपासना में लगा दो, सब ठीक होगा।"
मृकंडु ऋषि ने बालक मार्कण्डेय को देवाधिदेव महादेव की उपासना-आराधना में प्रवृत्त कर दिया। निर्दोष बालक मार्कण्डेय शिवजी की सेवा-पूजा में मग्न हो गया। प्रातःकाल जल्दी उठ के, स्नानादि से पवित्र होकर वह शिवलिंग को स्नान कराता, बिल्वपत्र, फल-फूल, धूप-दीप, नैवेद्य आदि चढ़ाता, प्रार्थना करता, आसन पर बैठ के हाथ में माला लेकर 'ॐ नमः शिवाय' का जप करता, ध्यान करता, स्तुति स्तोत्रों का गान करता। इस प्रकार समय बीत रहा था।
मृत्यु
की घड़ियाँ निकट
आ गयीं। लाल-लाल
नेत्रों वाले,
काले वर्णवाले
यमदूत प्रकट हुए।
उन्हें देखकर बालक
डर गया। घबराकर
शिवलिंग को आलिंगन
करके कहने लगाः
"हे भगवान !
ये यमदूत आ गये।
बचाओ... बचाओ !"
भगवान शंकर हाथ में त्रिशूल लेकर प्रगट हो गये और यमदूत की छाती पर लात मारी।
शिवजी यमदूत से बोलेः "इस बालक को कहाँ ले जाते हो ?"
यमदूतः "देवाधिदेव ! इसकी आयु पूरी हो गयी है। सृष्टि के क्रम के अनुसार मैं अपने कर्तव्य का पालन करने आया हूँ।"
"अरे यमदूत ! देखो तो अपने बहीखाते में.... इसकी आयु कहाँ पूरी हुई है ?"
यमदूत ने बहीखाता देखा तो बालक के खाते में लम्बी आयु देखी। सृष्टि का संहार करने वाले देवाधिदेव योगीश्वर पशुपतिनाथ जिसका रक्षण करें उसका कोई बाल तक बाँका कैसे कर सकता है ?
"चलो, भागो यहाँ से !" रूद्र गरज उठे। यमदूत ने विदा ली। बालक मार्कण्डेय जी ने शिवजी की स्तुति की, जिससे शिवजी ने प्रसन्न होकर उसे चिरंजीवी बन दिया। तब से सप्त चिंरंजीवियों के बाद आठवें चिरंजीवी के रूप में इनका नाम आता है। मार्कण्डेय किसके प्रभाव से चिरंजीवि बने ? संत-महापुरुषों, सप्तर्षियों को प्रणाम करने से। ऐसी महिमा है परब्रह्म-परमात्मा को पाये हुए महापुरुषों को प्रणाम करने की !
नमस्कार से रामदास, कर्म सभी कट जाय।
जाय मिले पर्ब्रह्म में, आवगमन मिटाय।।
प्रतिदिन सुबह माता-पिता एवं पूजनीय-आदरणीय गुरुजनों को प्रणाम करो। उनके आशीर्वाद लो। बड़े भाई, बड़ी बहन को प्रणाम करो। घर में यदि बड़े लोग इस नियम को अपनायेंगे तो छोटे बालक स्वयं ही उनका अनुकरण करेंगे। परस्पर नमस्कार करने से कुटुम्ब में दिव्य भावनाएँ प्रबल होंगी तो लड़ाई-झगड़ों एवं कटुता के लिए अवकाश ही नहीं रहेगा। संयोगवशात् यदि कुछ खटपट होगी भी तो लम्बी नहीं टिकेगी। परिवार का जीवन मधुर बन जायेगा। परमार्थ साधना सरल हो जायेगा।" अनुक्रमणिका
जीवन बीमा करने की युक्ति सिखायी
पूज्य
बापू जी के सत्संग
में आता हैः "राम
जी रावण को तीरों
का निशाना बनाते
हैं और रावण का
सिर कटता है, फिर
से लगता है क्योंकि
उसे वरदान मिला
था। लेकिन रावण
दंग रह गया कि जब
वह राम जी पर बाण
छोड़ता है तो बाण
राम जी की तरफ जाते-जाते
उनके सिर में लगता
ही नहीं था। राम
जी के सिर की तरफ
रावण का बाण जाय
ही नहीं !
रावण सोचे-सोचे.....
'आखिर क्या
है, क्या है ?...'
शिवजी ने प्रेरणा
की कि इनके सिर
का बीमा किया हुआ
है। राम जी तो अपने
सिर का बीमा करा
चुके थे और रावण
का बीमा था नहीं
!
राम जी ने बीमा क्या करवाया था, पता है ? शिवाजी ने भी बीमा करवाया था। रामी रामदास का भी बीमा था। मेरे गुरुदेव भगवत्पाद लीलाशाह जी बापू ने भी बीमा कराया था। मैंने भी बीमा कराया है। अब तुम ढूँढते रहो किधर बीमा कराते हैं ? कैसा बीमा होता है ? जरा सोचो। अरे... जैसे राम जी प्रातःकाल उठकर माता-पिता और गुरु को प्रणाम करते, मत्था नवाते तो 'पुत्र ! चिरंजीवी भव। यशस्वी भव।' आशीर्वाद मिलता। माँ-बाप और गुरु के आशीर्वाद से बड़ा कोई बीमा होता है क्या ? तो तुम भी बीमा करा लिया करो और तुम्हारे बच्चों को भी यह बात बताना कि राम जी ने ऐसा बीमा करा लिया था।
माता-पिता व सदगुरुओं के आशीर्वाद और ब्रह्मज्ञानी सदगुरु के सत्संग का आदर करने से मौत मोक्ष में बदल जाती है।" अनुक्रमणिका

पूज्य बापू जी द्वारा बतायी गयीं सुखमय जीवन की अनमोल युक्तियाँ
वैर को प्रीत में बदलने की युक्ति
जिसके साथ आपका वैर है, द्वेष है या तुम पर नाराज है, उसके गुण भी होंगे। हमारे चित्त में जब वैर, द्वेष होता है न, तो उसमें दोष ही दोष दिखेंगे और हमारे चित्त में राग होगा तो गुण दिखेंगे लेकिन गुण-दोष सबमें मिश्रित हैं, किसी में दोष ज्यादा, किसी में गुण ज्यादा। तो जिससे भी तुम्हारी अनबन हो गयी है, उसका कोई-न-कोई गुण याद करके सुबह शाम मन ही मन उसकी प्रदक्षिणा करो और उसको यह बोलो कि 'आप अच्छे हो, भले हो, सज्जन हो। आप में ये गुण भी हैं, ये गुण भी हैं. बाकी थोड़ा बहुत उन्नीस-बीस है तो मेरा नजरिया भी बदल जाय और आपका भी भाव बदल जाय, आपका भी यह दोष है तो निकल जाय।'
उसके अंदर अच्छाई, भलाई सज्जनता छुपी है। इस प्रकार की भावना से आपका वैर मिटेगा और उसकी सज्जनता और अच्छाई जगाने का पुण्य भी आपको मिलेगा।
जैसे गुरु शिष्य का मंगल चाहते हैं फिर डांटते भी हैं, पुचकारते भी हैं, दंडित भी कर देते हैं लेकिन चाहते मंगल हैं। ऐसे ही जिससे आपका विरोध है, आप उसका मंगल चाहकर उसकी प्रदक्षिणा करो, उसको रू-बरू नहीं बोल सकते हो तो मन-ही-मन बोलो। इससे आपका मन निर्मल हो जायेगा और वह कितना भी तुम्हारे प्रति नफरत करता हो पर तुम्हारा कुछ बिगाड़ नहीं सकेगा। कैसा जादू ! जगजीत प्रज्ञा है, यह जगत को जीतने वाली बुद्धि है। अनुक्रमणिका
स्वभाव सुधारने की सुंदर युक्ति
किसी को कितना भी कोसते रहोगे, वह जल्दी नहीं सुधरेगा लेकिन उसका भला चाहते हुए अंदर से सोचोगे तो उसका भला जब होगा तब होगा लेकिन आपका हृदय अभी से ही भला हो जायेगा। और भले हृदय में भले-में-भले भगवान सबका भला चाहते हैं। भगवान की सत्ता आपके द्वारा काम करने लगेगी।
बेटा मानता नहीं अथवा बेटी मानती नहीं या पति मानता नहीं तो मन-ही-मन उनका हाथ भगवान के चरणों में दे दो, 'प्रभु ! अब आप ही इनकी बुद्धि बदल सकते हो। अब मैं तो थक गया... थक गयी....। और इन्हें अपना मानने का मेरा दोष था लेकिन सब आपके हैं। आपने रामायण में कहा हैः सब मम प्रिय सब मम उपजाए। आपका वचन है महाराज ! आपका वचन सत्य होता है। तो मेरे इन पति का हाथ आपके हाथ में देती हूँ। 'ये दारू नहीं छोड़ते, पान-मसाला नहीं छोड़ते, ऐसे हैं..... वैसे हैं....' करके मैं अपनी नींद हराम कर रही हूँ। 'बेटा ऐसा है, फलाना ऐसा है.....' महाराज ! ये जैसे भी हैं आपके उपजाये हुए आपको सौंपता हूँ। हरि.... हरि.....'
इससे आपका स्वभाव भी सुधरेगा, उनका स्वभाव भी सुधर जायेगा। ऐ हे.....! क्या तरकीब है ! ऐसा नहीं कि राम जी आकाश से आयेंगे और आकर उनके अंदर घुसेंगे तब स्वभाव बदलेगा, नहीं। ये ईश्वरीय विधान है, व्यवस्था है। आप निश्चिंत हो जायेंगे, भगवान में शांत हो जायेंगे तो आपके अंतर्यामी आत्माराम से ही उनका सब बदल जायेगा। अनुक्रमणिका
घर के झगड़े व चिड़चिड़ा स्वभाव मिटाने की युक्ति
'हे प्रभु आनंददाता ! ज्ञान हमको दीजिये।.....' घर में इस प्रार्थना का पाठ होना चाहिए। इससे चिड़चिड़ा स्वभाव गायब हो जायेगा, घर से झगड़े गायब हो जायेंगे। काहे को माँ और बहन की लड़ाई हो ? काहे को बेटे और बाप में वैमनस्य हो ? काहे को सासु और बहू में मनमुटाव हो ? यह पाठ घर-घर में करोः
हे प्रभु ! आनंददाता ! ज्ञान हमको दीजिये।
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये।। हे प्रभु....
लीजिये हमको शरण में हम सदाचारी बनें।
ब्रह्मचारी धर्मरक्षक वीर व्रतधारी बनें।। हे प्रभु....
निंदा किसी की हम किसी से भूलकर भी न करें।
ईर्ष्या कभी भी हम किसी से भूलकर भी न करें।। हे प्रभु.....
सत्य बोलें झूठ त्यागें मेल आपस में करें।
दिव्य जीवन हो हमारा यश तेरा गाया करें।। हे प्रभु....
जाय हमारी आयु हे प्रभु ! लोक के उपकार में।
हाथ डालें हम कभी न भूलकर अपकार में।। हे प्रभु....
कीजिये हम पर कृपा अब ऐसी हे परमात्मा।
मोह मद मत्सर रहित होवे हमारी आत्मा।। हे प्रभु....
प्रेम से हम गुरुजनों की नित्य ही सेवा करें।
प्रेम से हम संस्कृति की नित्य ही सेवा करें।। प्रभु....
योगविद्या ब्रह्मविद्या हो अधिक प्यारी हमें।
ब्रह्मनिष्ठा प्राप्त करके सर्वहितकारी बनें।। हे प्रभु.....
पूरी याद नहीं रखी, केवल हे प्रभु !... निंदा किसी की... सत्य बोलें.... ये 4-6 पंक्तियाँ ही गुनगुनायीं तो भी घर की अशांति, झगड़े, वैर-जहर, जिनसे मन-मलिन होता है, तबीयत खराब होती है, कुटुम्ब में विष फैलता है, देश में विष फैलता है, यह सारा विष मिटाने का पुण्यकार्य तुम्हारे द्वारा वातावरण में होने लगेगा। विद्यार्थी हैं तो क्या है ? बालक हैं तो क्या है ? अभी से देश को मजबूत बनाओ, अभी से अपनी संस्कृति के प्रसाद को दुनियाभर के लोगों को देकर सुखी बना सकते हैं ऐसा अपनी संस्कृति के पास खजाना छुपा है। अनुक्रमणिका
जो गृहस्थ फिल्में देखते हैं उनका जीवन सुखमय नहीं होता है। फिल्मों में जैसी पत्नी दिखती है वैसी आपकी नहीं हो सकती, फिल्मों में जैसा पति होता है वैसा आपका नहीं हो सकता है। इसलिए फिल्में देखकर अपने जीवन में जहर मत घोलो, भगवान का प्रेमी हो के मधुमय जीवन बनाओ। पति पत्नी के संयम व साधना में साथ दे, पत्नी पति के संयम और साधना में साथ दे तो सीताराममय, शिव-पार्वती जैसा जीवन हो सकता है। अनुक्रमणिका
नेत्रज्योति की रक्षा हेतु प्रयोग
भोजन करने के बाद आँखों पर पानी छिड़कें तो ठीक है, नहीं तो अपनी गीली हथेलियाँ आँखों पर रखें तो भी नेत्र के रोग मिटते हैं। दोनों हथेलियाँ रगड़कर ॐॐॐ मेरी आरोग्यशक्ति जगह, नेत्रज्योति जगह.....' ऐसा करके आँखों पर रखने से भी आँखों की ज्योति बरकरार रहती है और आँखों के रोग मिटते हैं। रगड़ी हुई गर्म हथेलियाँ आँखों पर रखने से उनमें रोगप्रतिकारक शक्ति का संचार होता है। शरीर के किसी भी अंग पर यह प्रयोग कर सकते हैं। अनुक्रमणिका


भारतीय गोवंश की अदभुत विशेषताएँ
भारतीय गायें विदेशी तथाकथित गायों की तरह बहुत समय तक जंगलों में हिंसक पशु के रूप में घूमते रहने के बाद घरों में आकर नहीं पलीं, वे तो शुरु से ही मनुष्यों द्वारा पाली गयी हैं। भारतीय गायों के लक्षण हैं- उनका गल कम्बल (गले के नीचे झालर सा भाग), पीठ का कूबड़, चौड़ा माथा, सुंदर आँखें तथा बड़े मुड़े हुए सींग। भारतीय गोवंश की कुछ नस्लें हैं, गिर, थारपारकर, साहीवाल, लाल सिंधी आदि।
भारतीय गायों पर करनाल की 'नेशनल ब्यूरो ऑफ जेनेटिक रिसोर्सस' (एनबीएजीआर) संस्था ने अध्ययन कर पाया कि इनमें उन्नत ए-2 एलील जीन पाया जाता है, जो इन्हें स्वास्थ्यवर्धक दूध उत्पन्न करने में मदद करता है। भारतीय नस्लों में इस जीन की आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) 100 प्रतिशत तक पायी जाती है, जबकि विदेशी नस्लों में यह 60 प्रतिशत से भी कम होती है।
भारतीय गायों में सूर्यकेतु नाड़ी होती है। गायें अपने लम्बे सींगों के द्वारा सूर्य की किरणों को इस सूर्यकेतु नाड़ी तक पहुँचाती हैं। इससे सूर्यकेतु नाड़ी स्वर्णक्षार बनाती है, जिसका बड़ा अंश दूध में और अल्पांश में गोमूत्र में आता है।
भारतीय गाय के दूध में ओमेगा-6, फैटी ऐसिड होता है, जिसकी कैंसर नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। विदेशी नस्ल की गायों के दूध में इसका नामोनिशान तक नहीं है। भारतीय गाय के दूध में अनसैचुरेटेड फैट होता है, इससे धमनियों में वसा नहीं जमती और यह हृदय को भी पुष्ट करता है।
भारतीय गाय चरते समय यदि कोई विषैला पदार्थ खा लेती है तो दूसरे प्राणियों की तरह वह विषैला तत्त्व दूध में मिश्रित नहीं होता। भारतीय गाय संसार का एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसके मल-मूत्र का औषधि तथा यज्ञ पूजा आदि में उपयोग होता है।
परमाणु विकिरण से बचने में गाय का गोबर उपयोगी होता है। भारतीय गाय के गोबर-गोमूत्र में रेडियोधर्मिता को सोखने का गुण होता है।
भारतीय गोवंश का पंचगव्य निकट भविष्य में प्रमुख जैव-औषधि बनने की सीमा पर खड़ा है। अमेरिका ने पेटेंट देकर स्वीकार किया है कि कैंसर नियंत्रण में गोमूत्र सहायक है।
पूज्य बापू जी कहते हैं- "कोई बीमार आदमी हो और डॉक्टर, वैद्य बोले, 'यह नहीं बचेगा' तो वह आदमी गाय को अपने हाथ से कुछ खिलाया करे और गाय की पीठ पर हाथ घुमाये तो गाय की प्रसन्नता की तरंगें हाथों की उंगलियों के अग्रभाग से उसके शरीर के भीतर प्रवेश करेगी, रोग-प्रतिकारक शक्ति बढ़ेगी और वह आदमी तंदुरुस्त हो जायेगा, 6 से 12 महीने लगते हैं लेकिन असाध्य रोग भी गाय की प्रसन्नता से मिट जाते हैं।"
भारतीय गाय की पीठ पर, गलमाला पर प्रतिदिन आधा घंटा हाथ फेरने से रक्तचाप नियंत्रण में रहता है। गोबर को शरीर पर मलकर स्नान करने से बहुत से चर्मरोग दूर हो जाते हैं। गोमय स्नान को पवित्रता और स्वास्थ्य की दृष्टि से सर्वोत्तम माना गया है। इस प्रकार भारतीय गाय की अनेक अदभुत विशेषताएँ हैं। धनभागी हैं वे लोग, जिनको भारतीय गाय का दूध, दूध के पदार्थ आदि मिलते हैं और जो उनकी कद्र करते हैं। अनुक्रमणिका






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