रसमय
योगयात्रा
भाग - १



जीवन के व्यापार में से समय निकालकर सत्संग में....
मैंने पूज्य बापू जी के सत्संग को कई स्थानों पर सुना है
वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्य बनी पूज्य बापू जी की आभा
कांधार विमान-अपहरण घटना के दौरान हुआ चमत्कार !
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
प्रस्तावना
आजकल 'योग' शब्द से काफी लोग प्रभावित हैं । केवल योगासन या कुछ क्रियाएँ या कोई कोर्स करके कल्पना कर लेना कि 'मैंने योग कर लिया' यह तो आत्मवंचना कहलायेगी । ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों की दृष्टि में कुछ करने का नाम वास्तविक योग नहीं है । ऐसे महापुरुषों के प्रति श्रद्धा, प्रेम, सेवा-समर्पण से उनकी अहैतुकी करुणा-कृपा द्वारा सहज में ही जो हो जाता है वह वास्तविक योग है । प्राणायाम, आसन आदि क्रियाएँ और कोई भी साधन न करनी पड़े, अपने आप होने लग जाय और आनंद व अनुभूतियाँ ऐसी अलौकिक हों कि उनका पूरा वर्णन शब्दों में न हो सके, ऐसा सहज, रसमय एवं विलक्षण वह 'कुंडलिनी शक्तिपात योग' है एवं ब्रह्मविद्या रूप 'ज्ञानयोग' का तो कहना ही क्या है ! इन दोनों का पूर्ण अऩुभव जिन महापुरुष को हो उनके साधक उन्नति के गगन में ऊँची उड़ाने भरने लगते हैं । ऐसे संत तो कभी-कभी, कहीं-कहीं धरती पर प्रकट होते हैं । उनमें भी परम दुर्लभ महापुरुष हैं कलियुगी माहौल से प्रभावित लाखों-लाखों लोगों पर एक साथ शक्तिपात कर उनके लिए दिव्य अनुभूतियों के अथाह खजाने को खोलने वाले पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू, जिन्होंने वह रसमय योगयात्रा सामान्य जनों के लिए भी परम सुलभ करायी । कुछ अंश में भी उनकी कृपा को झेलने वाले को वे दिव्य अनुभूतियाँ होने लगती हैं जो बड़े-बड़े योगियों को 12-12 वर्ष की कठोर साधनाएँ, तपस्याएँ करने के बाद भी नहीं होतीं ।
साधकों की साधना-यात्रा की ऐसी ही रहस्यमयी, रसमय अनुभूतियों के कुछ अंश इस सत्साहित्य में प्रस्तुत हैं । इसे पढ़ें-पढ़ायें और पूज्य श्री के बताये मार्ग पर चलते हुए 'सब दुःखों की सदा के लिए निवृत्ति और परमानंद की प्राप्ति' की यात्रा को मधुर अनुभूतियों का अमृतपान करते हुए शीघ्र ही सम्पन्न कर लें ।
महापुरुषों के दर्शन का चमत्कार
पहले मैं कामतृप्ति में ही जीवन का आनंद मानता था । मेरी दो शादियाँ हुईं परन्तु दोनों पत्नियों के देहान्त के कारण 55 वर्ष की उम्र में 18 वर्ष की लड़की से शादी करने को तैयार हो गया । शादी से पूर्व मैं पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाह जी महाराज का आशीर्वाद लेने डीसा आश्रम में जा पहुँचा । आश्रम में तो वे नहीं मिले मगर जो महापुरुष मिले उनके दर्शनमात्र से न जाने क्या हुआ कि मेरा सारा भविष्य ही बदल गया । उनके योगयुक्त विशाल नेत्रों में न जाने कैसा तेज चमक रहा था कि मैं अधिक देर तक उनकी ओर देख नहीं सका और मेरी नज़र उनके चरणों की ओर झुक गयी । मेरी कामवासना तिरोहित हो गयी । घर पहुँचते ही शादी से इन्कार कर दिया । भाइयों ने एक कमरे में उस 18 वर्ष की लड़की के साथ मुझे बंद कर दिया ।
मैंने काम विकार को जगाने के कई उपाय किये परन्तु सब निरर्थक सिद्ध हुए । जैसे कामसुख की चाबी उन महापुरुष के पास ही रह गयी हो ! एकांत कमरे में आग और पेट्रोल जैसा कामविकार का संयोग था, फिर भी... ! मैंने निश्चय किया कि अब मैं उनकी छत्रछाया को नहीं छोड़ूँगा, भले कितना ही विरोध सहन करना पड़े । उन महापुरुष को मैंने अपना मार्गदर्शक बनाया । उनके सान्निध्य में रहकर कुछ यौगिक क्रियाएँ सीखीं । उन्होंने मुझसे ऐसी साधना करवायी कि जिससे शरीर की सारी पुरानी व्याधियाँ जैसे मोटापा, दमा, टी.बी., कब्ज और छोटे-मोटे कई रोग आदि निवृत्त हो गये । मुझ पर ऐसी कृपादृष्टि डाली कि मेरी कुंडलिनी जागृत हो गयी । साधना करनी नहीं पड़ी, आसन, साधन, क्रियाएँ, मुद्राएँ होने लगीं ।
मैं बीमारियों का थैला था, टी.बी., दमा, खाँसी, एलर्जी और भी छोटी-मोटी बीमारियों का घर था, बिना छाते के धूप में 5 कदम चलना भी मुश्किल था, धूप नहीं सह सकता था । अब तो कई कि.मी. सुबह शाम युवकों की तरह टहलने जाता हूँ ।
एकांत
में साधना
करता था तो
शरीर से चंदन
की खुखबू आती
थी । एक बार
मैं शौच के
लिए बाहर गया
था । शौच के
समय मुझे चंदन
की तेजतर्रार
सुगंध आने लगी
। मैं चकित
होकर घंटों तक
इधऱ-उधर ढूँढता
रहा कि ऐसी
दिव्य सुगंध
कहाँ से आ रही
है ? बाद
में मुझे पता
चला कि मेरे
मल में से
चंदन की सुगंध
आ रही थी । ऐसा
कई बार हुआ ।
इस
विषय में
पूछने पर उन
महापुरुष ने
योग ग्रन्थों
का उदाहरण
देते हुए कहाः
ये अवस्थाएँ
आती हैं, और
आगे बढ़ो । कफ
और मेद से भरा
शरीर अब फूल
जैसा हलका हो
गया है ।
विषय
विकारों में
लिप्त 55 वर्ष
की उम्रवाला मेरे
जैसा व्यक्ति
कल्पना भी
नहीं कर सकता
कि ऐसा भी
जीवन होता है,
ऐसा भी
नाड़ी-शोधन
होता है ! मैं
धनभागी हूँ कि
तीसरी शादी के
निमित्त आशीर्वाद
लेने के लिए
डीसा के आश्रम
में गया और वहाँ
मुझे ऐसे
महापुरुष के
दर्शन हुए,
उनकी कृपा से
ध्यान का अवसर
मिला ।
जिन
महापुरुष ने
मेरा जीवन बदल
दिया उनका नाम
है परम पूज्य
संत श्री
आशाराम जी
बापू । उनका जो
अनुपम उपकार
मेरे ऊपर हुआ
है उसका बदला
तो मैं अपना
सम्पूर्ण
लौकिक वैभव
समर्पण करके भी
चुकाने में
असमर्थ हूँ । -
महंत चंदीराम
(भूतपूर्व
चंदीराम
कृपालदास)
12 साल
से मुझे कोढ़
की बीमारी थी
। रोग बढ़ता
ही जा रहा था ।
एलोपैथिक,
होमियोपैथिक,
आयुर्वेदिक –
सभी इलाज
कराये परंतु
कोई लाभ नहीं
हुआ । जहाँ-जहाँ
पर कोढ़ के
निशान थे वहाँ
की चमड़ी मोटी
हो गयी थी,
पानी निकलता
था, खुजली भी
होती थी और उस
जगह के बाल
झड़ गये थे ।
पूज्य
बापू जी से
प्राप्त
मंत्र के
नियमित जप और
उनके ध्यान,
प्राणायाम
तथा सत्संग का
श्रवण-मनन
करने से मुझे
एक दिन
कुंडलिनी की
क्रियाएँ हुई
और अपने-आप
अजपाजप चालू
हो गया । सेवा
करते समय भी
मेरा ध्यान
प्राण-अपान की
गति पर ही
रहता । परिणाम
यह आया कि
कोढ़ का रोग 90
प्रतिशत ठीक
हो गया । अभी
उन जगहों पर
बाल आ चुके
हैं ।
जिस
रोग पर कोई
औषधि काम नहीं
कर पायी, वही
रोग गुरुकृपा
से बिना उपचार
के आसानी से
दूर हो गया ।
पूज्य
बापू जी के
श्रीचरणों
में यही
प्रार्थना
करता हूँ कि 'हे
गुरुवर ! जैसे
इस शरीर की
पीड़ा से पार
हुआ हूँ, ऐसे
ही भवबंधन से
भी पार हो
जाऊँ ऐसी
सद्बुद्धि और
सामर्थ्य
प्रदान
कीजिये ।
- ब्रिजेश
तिवारी,
अहमदाबाद, सचल
दूरभाष – 7817844408
गुरुदेव
ने अप्सरा की
माया से बचाया
मेरे
पुण्यों का
उदय तब हुआ जब
मुझे
ब्रह्मवेत्ता
संत पूज्य
बापू जी का
दर्शन-सत्संग
और उनसे
नामदान पाने
का अवसर
प्राप्त हुआ ।
सन् 1974 के उत्तरायण
शिविर में जब
पहली बार मैं
बापू जी के
दर्शन करने
आया तो
सर्वांतर्यामी
पूज्य बापू जी
ने कहाः "नामदान
(मंत्रदीक्षा)
लेना है तो
मांस, दारू सब
खाना पीना
छोड़ना
पड़ेगा ।"
मैंने
कहाः "बापू !
खाता तो सब
कुछ हूँ पर आज
से मांस-दारू
नहीं खाऊँगा-पिऊँगा
।"
फिर
बापू जी ने
उसी दिन
मंत्रदीक्षा
दे दी ।
एक बार
7 दिन के लिए
मैं आश्रम के
मौन मंदिर में
साधना के लिए
रहा था । 7 दिन
तक एक ही
पवित्र और विशाल
कमरे में बंद
रह के साधना
करने का मेरे
जीवन में यह
प्रथम अवसर था
।
मंगलवार
की सुबह 4.30 बजे
मैं ध्यान में
बैठा तब ध्यान
में एक
विचित्र
दृश्य देखा कि
एक स्त्री अर्धनग्न
अवस्था में
मेरे सामने आ
के खड़ी हो गयी
है । मैं चौंक
गया । मुझे
तुरंत ख्याल
आया कि यह
मेरी साधना
में विघ्न
डालने आयी है
। मैंने
गुरुदेव का
स्मरण किया ।
थोड़ी ही देर
में देखा तो
सद्गुरुदेव
भी कमरे के एक
कोने में आकर
खड़े हैं ।
मेरा भय दूर
हो गया ।
सद्गुरुदेव
को देख के वह
स्त्री तुरंत
ही अदृश्य हो
गयी ।
उसी
दिन शाम को मन
में हुआ कि 'अहमदाबाद
में कितने
दिनों से
बारिश नहीं हो
रही है ।
हमारे
सद्गुरुदेव
तो समर्थ हैं,
वे चाहें तो
क्या बारिश
नहीं कर सकते ?'
और
एकाध घंटे के
बाद ही जोर से
हवा चलने लगी
। आकाश में
बादल आ गये और
बारिश होने
लगी । वाह मेरे
सद्गुरुदेव !
इसी
शाम को मैं 7-8
बजे मैं ध्यान
में बैठा था ।
तब ध्यान में
एक अप्सरा
दिखी । उसके
वस्त्र बिल्कुल
पारदर्शी व
सुंदर थे ।
उनमें से उसके
अंग सूर्य की
किरणों की तरह
चमक रहे थे ।
ऐसी अलौकिक
लावण्ययुक्त
स्त्री किसी
ने इस पृथ्वी
पर नहीं देखी
होगी । बहुत
देर तक वह
मुझको मोहित करने
का प्रयत्न
करती रही ।
मैंने वह
दृश्य दूर
करने का
प्रयास किया
लेकिन विफल
रहा । अंत में
खूब करुणभाव
से
सद्गुरुदेव
को प्रार्थना करने
लगा । थोड़ी
देर के बाद
ध्यान टूटा तब
पता चला कि
बाहर से कोई
दरवाजा खटखटा
रहा है । दरवाजा
खोल के देखा
तो पूज्य
गुरुदेव
स्वयं खड़े थे
। मेरी ओर
बहुत ही प्रेमयुक्त
मधुर दृष्टि
डाली । साधना
में उत्साहप्रेरक
शब्दों के साथ
जरूरी
मार्गदर्शन
देकर गुरुदेव
चले गये ।
ध्यान में उस
विचित्र दृश्य
के बाद तुरंत
ही पूज्य श्री
का मार्गदर्शन
पाकर अंतर
पुलकित हो
गया, धन्यता
का अनुभव हुआ
।
पहले
सुना था कि
माया की
शक्तियाँ आ-आ
के ध्यान में
बैठने वाले
तपस्वियों की
परीक्षा लेती हैं
। अब मेरे लिए
यह प्रत्यक्ष
अनुभव बन गया ।
उसके
बाद 3 दिनों तक
निर्विघ्न
रूप से अच्छा
ध्यान होता
रहा । कोई
उपद्रव नहीं
आया । परंतु शनिवार
रात को 9-10 बजे
मैं ध्यान में
बैठा था, तब सामने
वाली कुर्सी
पर एक नवयौवना
आकर बैठ गयी और
अपनी नखरे
वाली
चेष्टाओं से
मुझे आकर्षित
करने लगी । वह
रूप लावण्य
में बेजोड़ थी
। उसने जो
महीन अल्प
वस्त्र पहने
थे उनमें से
उसके अंग
दिखते थे । वह
अपने विविध
आकर्षक अंगों
से कामुक
चेष्टाएँ
करने लगी
किंतु मैं
गुरुदेव का
स्मरण
करते-करते अचल
रहा ।
थोड़ी
ही देर में वह
दृश्य बदला और
उसकी जगह एक
भयंकर रुग्न
शरीर वाली
स्त्री
उपस्थित हुई ।
उसने संकल्प
से अपने शरीर
पर से चमड़ी
हटा ली । उसके
अंदर तो
मांस-मज्जा,
हड्डियाँ,
खून, मल-मूत्र
से भरे हुए
शरीर के दर्शन
हुए । उसके
सभी अंग
वीभत्स रोग से
ग्रस्त थे ।
चेहरा अत्यंत
कुरूप बन गया
था । मुँह में
से खून, लार
आदि टपक रहे
थे । रोग की
पीड़ा से वह
कराह रही थी ।
उसके दर्शनमात्र
से घृणा हो
रही थी । उसके
शरीर की बनावट
देख के अनुमान
होता था कि
पहले वह बहुत
सुन्दर अंगना
होनी चाहिए पर
उसकी यह हालत
देख के किसी
को भी दया आ
जाय । कैसा
करुण दृश्य !
मेरी
ओर एकटक देखते
हुए भारी आवाज
में बोलीः "पहले
के सुंदर
दृश्यों से
अगर तू
प्रभावित हुआ
होता तो तेरी
कैसी हालत
होती पता है ?
मेरे को देख
ले । तेरी भी
ऐसी ही हालत
होती । संसार
में ऐसे भोगों
में रह के लोग
कीड़े-मकोड़ों
की तरह जीवन
बिता के
जिंदगी बरबाद
कर रहे हैं ।
उनकी हालत भी
मेरे जैसे ही
होगी । तू तो
समर्थ गुरु की
शरण में है
इसलिए बच गया
। अब अच्छे से
साधना करना और
परम लक्ष्य
परमात्मप्राप्ति
करके ही रहना
।"
ओह ! वह
दृश्य कैसा
विलक्षण था !
मेरे
सद्गुरुदेव
के प्रति मुझे
खूब अहोभाव जगा
। उनके
श्रीचरणों
में रह के
साधना करने का
अवसर मिला है
यह कैसा परम
सौभाग्य है !
समर्थ
सद्गुरु के
मार्गदर्शन
बिना ही साधना
करने वाले
साधकों की दशा
कैसी होती
होगी ! मेरे
समर्थ
सद्गुरुदेव
हल पल मेरा
ध्यान रखते
हैं । पूज्य
सद्गुरुदेव
का स्मरण आते
ही सिर अहोभाव
से झुक जाता
है ।
रविवार
को मेरा समय
पूरा होने से
मैं मौन मंदिर
से बाहर निकला
और दूसरे
साधकों को उस
आगम-निगम के
ताले खोलने की
प्रयोगशाला
में प्रवेश दिया
गया । इस
स्वप्नमय
सृष्टि में
बाह्य रूप-रंग-आकार
में बह के लोग
इतना अमूल्य
जीवन बरबाद कर
देते हैं और
बाद में
पछताते हैं
लेकिन तब समय
बीत गया होता
है । धन्य हैं
ऐसे साधकों को
जो समय रहते
ही ऐसे समर्थ
सद्गुरु का
सहारा पाकर
जीवन का परम
लक्ष्य
ब्रह्मानुभव
पा लेते हैं ।
-परसराम
दरियानानी,
सेवा निवृत्त
उप तहसीलदार,
सरदार नगर,
अहमदाबाद, सचल
दूरभाषः 9662416171
धन्य
हैं ऐसे
सर्वसमर्थ
सद्गुरुदेव
तथा अद्भुत
हैं उनकी
लीलाएँ
पूज्य
श्री का
आत्मिक दिव्य
प्रेम, सरल,
मधुर वाणी और
योग-सामर्थ्य
ऐसे मोहक हैं
कि वे जहाँ-जहाँ
जाते हैं वहाँ
परायों को
अपना बना लेते
हैं और अपनों
को उत्साहित
करके
परमात्मा के पथ
पर अग्रसर कर
देते हैं ।
डालते हैं कुछ
घटनाओं पर एक
नज़रः
भयंकर
बाढ़ गयी
सन् 1973
में साबरमती
नदी में भयंकर
बाढ़ आयी थी । नदी
खतरे के स्तर
को भी लाँघ कर
निरंकुश बह रही
थी । नदी से 30
फीट ऊपर आश्रम
के प्रांगण
में पहुँचने
की ओर बाढ़ का
पानी तीव्रता
से बढ़ रहा था
। चारों ओर
पानी-ही-पानी
दिखाई दे रहा
था । आश्रम एक
द्वीप जैसा बन
गया था ।
भक्तों
ने कुटिया में
जाकर बापू जी
को सारी स्थिति
बतायी ।
पूज्य
श्री आये और
बोलेः "इसमें
क्या बड़ी बात
है ! लाओ, दही
लाओ । चलो,
एक-दो चम्मच
मेरे अँगूठे
पर डालो ।"
बापूजी
ने दही लगे
अँगूठे से
पानी को
स्पर्श किया,
अपना चरण डाला
और मानो उस
पावन स्पर्श
के लिए ही नदी
ऊपर उठी हो
ऐसे वह
धीरे-धीरे
शांत हो गयी ।
बाढ़ का पानी
नीचे उतर गया
।
रेडियो
पर 30 फीट पानी
बढ़ने की
सम्भावना
प्रसारित हो
रही थी परंतु
पानी 22.5 फीट से
एक इंच भी आगे
नहीं बढ़ा ।
9 मिनट
भी नहीं बैठने
वाला 9 घंटे
ध्यान में बैठा
!
बात उस
समय की है जब
पूज्य श्री
आबू की गुफा
में रहते थे ।
एक दिन मनोहर
नामक एक
तारबाबू, जो माउंट
आबू पोस्ट
आफिस में काम
करते थे,
पूज्य श्री के
पास आये और
बोलेः "आज
सोचा कि आपके
दर्शन करके ही
नौकरी पर जाऊँ
। मुझे 10 बजे
जाना है ।"
पूज्य
श्रीः "अच्छा,
अभी तो 9 ही बजे
हैं । थोड़ी
देर ध्यान में
बैठ जा, फिर
जाना ।"
वे
पासवाली गुफा
में जाकर
ध्यान में बैठ
गये । जब
ध्यान से जागे
तो शाम के 6 बज
चुके थे ।
उनके
आश्चर्य का
ठिकाना न रहा 'अरे
6 बज गये ।
अभी-अभी तो
स्वामी जी की
आज्ञा से मैं
ध्यान में
बैठा था और
शाम हो गयी ! आज
नौकरी पर भी
नहीं जा पाया
। खैर, बाहर की
नौकरी पर नहीं
जा पाया लेकिन
मेरी भीतरी
चिंताएँ,
शंकाएँ और
मुसीबतें दूर
हो गयीं । 9
मिनट भी नहीं
बैठने वाला
मैं आज 9 घंटे
ध्यान में
बैठा ! बापू जी !
आपको
हजार-हजार
वंदन !'
एक ही
समय दो जगह
लिये दो रूप
लगभग
चार दशक पहले
की बात है ।
मोटेरा
(अहमदाबाद)
आश्रम में शाम
के समय पूज्य
बापू जी का
सत्संग चल रहा
था । सबसे आगे
बैठे सरदार
नगर, अहमदाबाद
के मंघनमलजी
को अपनी मृतक
साली का तीसरा
मनाने जाना था
किंतु
उन्होंने
सत्संग के बीच
में उठने का
पाप नहीं किया
। उनके
अंतर्मन में
चल रहा था, 'बापू
जी ! क्या करूँ !'
मन में उधेड़
बुन चलने के
बाद भी वे
भगवान और गुरुदेव
को प्रार्थना
करके शाम के 7
बजे तक सत्संग
सुनते ही रहे
।
उधर
उनकी मृतक
साली के घर
पूज्य बापू जी
मंघनमल का
शरीर धारण कर
तीसरा मनाने
पहुँच गये और
लोगों को
सांत्वना दी ।
मंघनमल जब
सत्संग के बाद
साली के घर
जाकर माफी
माँगने लगे,
तब उन्हें हकीकत
का पता लगा और
उनकी आँखों से
प्रेम के आँसू
बह चले ।
पूज्य
बापू जी के
सत्संग में
आता हैः "हमारी
प्रीति ईश्वर
में हो जाय,
बाकी का सब ठीक
हो जाता है ।
यह कैसी ईश्वर
की सत्ता है
कि जब आप
ईश्वर में
रहते हैं तो
आपके लिए
ईश्वर नाई बनते
हैं (जैसे सेन
नाई के लिए
बने थे), दाल और
चावल देने
वाले
बालकुमार बन
सकते हैं
(जैसे श्रीधर
स्वामी के घर
बालकुमार बन
के गये थे), पेय
का कमंडल और
केला लाने
वाले ग्रामीण
बन सकते हैं (जैसे
पूज्य बापू जी
के जीवन में
देखा गया), नरसिंह
मेहता का रूप
धारण करके काम
कर लेते हैं तो
मंघनमल बने तो
क्या आश्चर्य
है !
ईश्वर में आप
खो जाते हैं
तो फिर दयालु
ईश्वर सँभाल
लेते हैं ।
संतन
के कारज सगल
सवारे ।।
(गुरुवाणी)
ये तो
एक-दो
दृष्टांत
सामने आये
लेकिन आप ईश्वर
में लग जाओ तो
आप सोच भी
नहीं सकते थे
कि ऐसा
कैसे हो गया !
हम प्रयत्न
करते तो भी
इतना बढ़िया
काम नहीं हो
सकता था ।"
दूसरा
रूप धारण कर
की भक्त की
रक्षा
1984 से
पूर्व की बात
है, जब बापू जी
के अहमदाबाद
आश्रम आने के
लिए सड़क नहीं
बनी थी । एक
सज्जन का प्रतिदिन
शाम को बापू
जी के दर्शन
करने का नियम
था । एक दिन
उन्हें आने
में देर हुई
और अँधेरा हो
गया । आश्रम
से कुछ दूरी
पर उनको
कुत्तों ने
बुरी तरह घेर
लिया । अब
अंतर्मन में
एक ही पुकार
उठने लगी, 'बापू
जी ! रक्षा करो,
बापू जी !
रक्षा करो...'
कुछ ही क्षणों
में वे सज्जन
क्या देखते
हैं की सामने
से बापू जी
बड़े जोरों की
'ॐ...ॐ...' की आवाज
करते हुए
टार्च लिए आ
रहे हैं । ॐकार
की गर्जना से
कुत्ते भाग
गये ।
उन
सज्जन ने
झुककर प्रणाम
किया । आश्रम
के पास आकर
बापू जी उनसे
कहाः "तुम
हाथ-पैर धोकर
सत्संग में आ
जाओ ।"
वे
सज्जन
सत्संग-मंडप
में पहुँचे,
बापू जी व्यासपीठ
पर विराजमान
थे । 5 मिनट में
बापू जी उठकर
चल दिये ।
उन्होंने
अन्य
सत्संगियों
से कहाः "भाई !
आज बापू जी
आये और 5 मिनट
में ही चल
दिये !"
लोगों
ने कहाः "क्या ?
5 मिनट... बापू जी
तो 3 घंटे से
सत्संग कर रहे
हैं, तुम अभी
आये !"
"अभी
तो बापू जी
मुझे साथ लेकर
आये !"
सभी ने
कहाः "बापू जी
3 घंटे से कहीं
गये ही नहीं ।"
तब उन
सज्जन को समझ
में आया कि
भक्तवत्सल
बापू जी ने
दूसरा रूप
लेकर उनकी
रक्षा की । वे
भाव-विभोर हो
गये ।
मिला
अक्षयपात्र
कतारगाम,
सूरत (गुजरात)
के भक्तों को
बापू जी ने
गरीबों में
भंडारा करने
हेतु थोड़ा सा
सामान दिया और
कहा कि इसे 10
दिन तक बाँटना
। सामान सिर्फ
दो दिन तक बँट
सके उतना ही
था लेकिन
चमत्कार !
सामान खुले
हाथों 10 दिन तक
बँटता रहा पर
खत्म होने का
नाम नहीं ! इस
आश्चर्य को
देख सामान की
गणना की तो
जितना सामान
बापू जी ने
दिया था, उससे
भी अधिक बचा
था । अंतिम
दिन एक तपेला
चावल बचा था
जो करीब 100 लोगों
में बँट सकता
था । किंतु
आश्चर्य ! उसे
भक्त 5 गाँवों
में बाँटते
रहे परंतु
खत्म नहीं हो
रहा था ! बापू
जी से
प्रार्थना
करने पर वह
खत्म हुआ ।
बापू जी के इस
अक्षयपात्र
की लीला को
सभी ने प्रणाम
किया ।
पूज्य
श्री के
योग-सामर्थ्य
की ऐसी घटनाएँ
अनेक भक्तों
ने अपने जीवन
में
प्रत्यक्ष
देखी हैं ।
धन्य हैं ऐसे
सर्वसमर्थ
सद्गुरुदेव
तथा अद्भुत
हैं उनकी
लीलाएँ, जो
समय-समय पर
अभिव्यक्त
होकर
मानवमात्र को
सत्यपथ पर
चलने की पावन
प्रेरणा देती
रहती हैं ।
जिनको ऐसे
समर्थ संत-सद्गुरुदेव
प्राप्त होते
हैं, ऐसे संत
महापुरुषों
का पावन
सान्निध्य
मिलता है वे
साधक धन्य-धन्य
हैं ।
...और
रूह फिर से
दाखिल हो गयी !
सन् 2009 की
घटना है । मैं
बापू का
सत्संग सुनने
जाने वाला था
किंतु रात को 2
बजे एकाएक
मुझे सीने में
तेज दर्द होने
लगा । घरवाले
मुझे तुरंत अस्पताल
ले गये ।
डॉक्टरों ने
हार्ट-अटैक
बता के आपरेशन
कराने को कहा
और मुझे
आईसीयू में
भर्ती कर दिया
।
'बापू ! मेरे
साथ यह क्या
हो रहा है ? अब
आप ही सँभालना
।' इस प्रकार
मन-ही-मन मैं
बापू से
प्रार्थना कर रहा
था । कुछ समय
बाद मेरी हालत
बिगड़ी और मैं
होश खो बैठा ।
मेरे जिस्म से
मेरी रूह
(अंतरात्मा)
निकल गयी थी ।
डॉक्टरों ने
मेरे मौत की
खबर घरवालों
को दी और मेरी
लाश पर कफन
डाल दिया था ।
उसके बाद जो
हुआ वह कभी
भुलाया नहीं
जा सकेगा ।
मैंने
देखा कि बापू
मुझे कह रहे
हैं- "अरे रहीम
! मरता कौन है ?
उठ !"
मेरे
जिस्म से
निकली हुई रूह
फिर से उसमें
दाखिल हो गयी
। मैंने अपने
ऊपर पड़े
कपड़े को हटाया
और उठकर बैठ
गया । मैं
क्या देखता
हूँ कि बापू
साक्षात्
मेरे सामने
आशीर्वाद की
मुद्रा में
खड़े हैं !
बापू ने
मेरे सिर पर
हाथ रखा और
बोलेः "बेटे !
जीते रहो ।
घबराओ मत ।
आनंद में रहो
। अभी तुम्हें
कुछ नहीं होगा
।" इतना कहकर
वे अदृश्य हो
गये । बापू का
यह अजीब करिश्मा
देख मैं
हैरतजदा
(स्तब्ध) हो
गया ।
अस्पताल
वाले मुझे
बैठा देख के
हैरान हो गये
। थोड़ी देर
में घरवाले
आये तो उनके
चेहरे पर भी
हैरत और खुशी
छा गयी ।
डॉक्टरों
ने कहाः "चाचा !
आप क्या नसीब
लेकर आये हो !
हमने तो सुबह
ही आपके
घरवालों को
आपकी मौत की खबर
दे दी थी ।
हमने जिंदगी
में पहली बार
ऐसा करिश्मा
देखा है ।"
घरवालों
ने बताया कि 10
बजे मेरे
जिस्म को पोस्टमार्टम
के लिए लेकर
जाने वाले थे
। मेरे बेटे
ने मेरी मौत
की बात
रिश्तेदारों
को बता दी थी ।
25-30 रिश्तेदार
विदाई के लिए
पहुँच गये थे
और जनाजा
(अर्थी)
निकालने की
तैयारी कर रहे
थे ।' यह घटना
पूरे गाँव को
पता चली तो
लोगों को बड़ा
ताज्जुब हुआ ।
बापू ने
मुझे नयी
जिंदगी दी है
। आज 11 साल हो
गये, मैं बिना
बायपास
सर्जरी के
पूरी तरह से
स्वस्थ हूँ ।
मुझ पर बापू
की बेमिसाल
मेहरबानी है ।
सैयद
अब्दुल रहीम,
अंबाजोगाई,
जिला – बीड
(महाराष्ट्र)
सचल
दूरभाषः 8390301212
योगलीलाओं
की श्रृंखला
में जुड़ा एक
सुवर्ण अध्याय
29 अगस्त 2012 को
मोरबी से
पूज्य बापू जी
हेलिकाप्टर
से गोधरा के
लिए रवाना हुए
। गोधरा
पहुँचने पर जब
हेलिकाप्टर
धरती से करीब 100
फीट ऊपर था तब पायलट
का
हेलिकाप्टर
से नियंत्रण
छूट गया... और यह
क्या !
हेलिकाप्टर
सीधा जमीन पर
उतरने के
बजाये मुँह के
बल गिरा और
उसके
पुर्जे-पुर्जे
अलग हो गये ।
बापू जी
जिस ओर बैठे
थे उसी ओर से
हेलिकाप्टर धड़ाम-से
गिरकर उलटा हो
गया । पंखे के
टुकड़े-टुकड़े
होकर कई फीट
दूर उछल गये ।
हेलिकाप्टर का
आगे का हिस्सा
जमीन पर जोर
से टकराया और
पीछे का
हिस्सा आकाश
की ओर उछलकर
उसके पुर्जे
हवा में बिखर
गये ।
हेलिकाप्टर
खतरनाक ढंग से
उलट-पुलटकर
बापू जी की
तरफवाला
हिस्सा नीचे
दब गया । उसी
क्षण
हेलिकाप्टर
के पीछे वाले
हिस्से में
(पेट्रोल टैंक
के पास) भीषण
आग लग गयी । पेट्रोल
भी कौनसा ?
व्हाइट
पेट्रोल, अति
ज्वलनशील
होता है । अब पेट्रोल
से बह रहा है
व्हाइट
पेट्रोल...
बिल्कुल एक नल
की धार की तरह !
जहाँ आग की
एक चिंगारी भी
भयंकर
विस्फोट साबित
हो सकती है,
वहीं आग की
लपटों का
पेट्रोल टैंक
के हिस्से से
शांत सुमेल का
दृश्य विश्व
का आठवाँ
अजूबा ही
कहलायेगा !
और अचानक
आग बुझ गयी ।
कैसे बुझी आग ?
किसने बुझायी ?
क्या
हेलिकाप्टर
में ऐसा कोई
सिस्टम है कि
जब
हेलिकाप्टर
दुर्घटनाग्रस्त
हो तब उसमें
लगी अपने आप
बुझ जाय ? ना,
अभी तक ऐसी
कोई तकनीक
खोजी ही नहीं
गयी है ।
फिर यह कौन
सी चमत्कारिक
शक्ति है ?
नज़र के
सामने ही
हेलिकाप्टर
दुर्घटनाग्रस्त
हुआ तब सभी के
मन में एक ही
सवाल था कि
अंदर बैठे
पूज्य बापू जी
की स्थिति
कैसी होगी ?...
क्योंकि बापू
जी जिस ओर
बैठे थे, उस ओर
का हेलिकाप्टर
का हिस्सा
पलटकर
चकनाचूर हो
गया था ।
प्रत्यक्षदर्शियों
ने कहा कि हेलिकाप्टर
क्रैश हुआ
उसके बाद कुछ
ही क्षणों में
पूज्य बापू जी
हेलिकाप्टर
के आगे के हिस्से
से बाहर आये ।
हेलिकाप्टर
के पुर्जों के
बीच में से
आते ही पूज्य
बापू जी ने
आसपास खड़े
भक्तों को
इशारे से कहा
कि मैं ठीक
हूँ । फिर
बापू जी ने
अलमस्त अंदाज
में 'हरि ॐ' की
गर्जना की, तब
उपस्थित सभी
भक्त भी
हर्षित होते
हुए 'हरि ॐ
बापू जी... हरि ॐ बापू
जी...' बोल उठे ।
जैसे
पुराणों में
आता है कि
भगवान
श्रीकृष्ण अघासुर
अजगर के मुख
से
हँसते-खेलते
बाहर आ गये थे,
वैसे ही बापू
जी ने भी
हेलिकाप्टर
दुर्घटना का
रूप ले के आये
अघासुर को
अपने योगबल से
परास्त कर
दिया । इतिहास
साक्षी है कि
ऐसी भीषण
दुर्घटना में
आज तक कोई
नहीं बच पाया
परंतु यहाँ तो
बापू जी सहित
हेलिकाप्टर
में सवार किसी
का बाल भी
बाँका नहीं
हुआ, किसो को
खरोंच तक नहीं
आयी ।
पुराणों
में लिखित
चमत्कारों के
बारे में तो केवल
सुना है लेकिन
वह वास्तविक
दृश्य तो कैमरे
में कैद होकर
इतिहास में
सुवर्ण
अक्षरों से
अंकित हो गया
।
इतनी बड़ी
हेलिकाप्टर
दुर्घटना
होने के बावजूद
बापू जी कुछ
ही समय में
गोधरा के
सत्संग-पंडाल
में
निर्धारित
समय पर पहुँचे
और गोधरा का
कार्यक्रम
सकुशल
सम्पन्न हुआ ।
सुनी-सुनायी
बात जल्दी
मानने में
नहीं आती परंतु
वीडियो में
स्पष्ट दिखने
वाले इस सत्य
को कौन नकार
सकता है ? भारी
भरकम मजबूत
धातु के
पुर्जों से
बने हेलिकाप्टर
का तो बन गया
पूरा कचूमर पर
आगे की ही सीट
पर बैठे बापू
जी का कोमल
शरीर बिल्कुल
स्वस्थ, मस्त,
तंदुरुस्त !
कहते हैं न, कि 'चमत्कार
को नमस्कार है
!' इस घटना को
देखकर
नास्तिकवादी
लोगों से भी
बरबस
संत-भगवंत की
महिमा गाये
बिन नहीं रहा
गया ।
देश-विदेश के
मीडिया ने भी
इस चमत्कारिक
घटना की
भूरि-भूरि
प्रशंसा की ।
इस प्रसंग
ने इन
ब्रह्मज्ञानी
महापुरुष की
योगलीलाओं
में एक एक नया
अध्याय जोड़ दिया
है, जो विश्व
इतिहास में
सुवर्ण
अक्षरों में
अंकित हो गया
है ।
सभी
आश्चर्य के
समुद्र में
गोता
लगाने लगे
देश-विदेश
के कई
संतों-महंतों,
धर्माचार्यों,
राजनेताओं व
उद्योगपतियों
ने बापू जी के
बारे में
जानने के लिए
दूरभाष-पर-दूरभाष
करने शुरु कर
दिये । पूर्व
राष्ट्रपति
श्रीमती
प्रतिभा
पाटील ने
दुर्घटना के
बाद बापू जी
का कुशल समाचार
दूरभाष पर
पूछने के
दौरान बताया
कि एयरफोर्स
के कई आला
अधिकारियों
से इस तरह की
भयंकर
दुर्घटना में
सभी लोगों के
बच जाने का
कारण पूछा तो
सभी ने एक
स्वर से कहा
कि यह एकमात्र
बापू जी का
चमत्कार ही था
वरना ऐसी
दुर्घटना में
किसी के बचने
का कोई प्रश्न
ही नहीं उठता !
अब और कैसा
चमत्कार
चाहिए – विश्व
हिन्दु परिषद
के तत्कालीन
मुख्य संरक्षक
व पूर्व
अंतर्राष्ट्रीय
अध्यक्ष श्री
अशोंक सिंहल
"बड़ी भारी
हेलिकाप्टर
दुर्घटना में
भी बिल्कुल
सुरक्षित
रहने का जो
चमत्कार बापू
जी के साथ हुआ
है, उसे सारी
दुनिया ने देख
लिया है । अब नास्तिकों,
निंदकों को और
कौन-सा पर्चा
चाहिए ? और
कौन-सा
चमत्कार
चाहिए ? अपनी
हरकतों से बाज
आ जाओ ।"
यह
चमत्कारिक
घटना से कम
नहीं है – श्री
सुशीलकुमार
शिंदे,
तत्कालीन
केन्द्रीय
गृहमंत्री
"पूज्य
बापू जी का
हेलिकाप्टर
अनिंयंत्रित
हो जोरदार
धमाके के साथ
जमीन पर गिरकर
कई टुकड़ों
में बिखर गया
। बापू जी आगे
की सीट पर
बैठे थे फिर
भी उन्हें तथा
किसी को भी
खरोंच तक नहीं
आयी । यह
चमत्कारिक
घटना से कम
नहीं है ।
बापू जी की
जनता को
समर्पित सेवा
सर्वविदित है
।"
पूज्य
बापू जी को
दैवी शक्ति
प्राप्त है –
श्री राजनाथ
सिंह,
केन्द्रीय
रक्षामंत्री,
तत्कालीन
वरिष्ठ सांसद,
भा.ज.पा.
"मैं अपना
शीश झुकाकर
परम पूज्य संत
श्री आशाराम
जी बापू के
चरणों में
शत-शत प्रणाम
करता हूँ ।
इतनी बड़ी
हेलिकाप्टर
दुर्घटना हुई
और बापू जी और उनके
सहयोगियों का
बाल भी बाँका
नहीं हो पाया
। हमारे परम
पूज्य बापू जी
को दैवी शक्ति
प्राप्त है ।
परमात्मा ने
उनके अंदर जो
शक्ति समाहित
की है, उसका यह
करिश्मा था ।
उसी का यह
परिणाम था कि
बापू जी और
उनके किसी भी
सहयोगी को
रंचमात्र भी
चोट नहीं लगी
। मैंने ऐसी
दुर्घटना कभी
अपने जीवन में
नहीं देखी थी
। जिसने भी इस
दुर्घटना को
टेलिविज़न पर
देखा, सभी यह
मान चुके थे
कि इसमें कोई
बचा नहीं होगा
परंतु क्षणभर
में ही बिल्कुल
सही-सलामत
हमारे सबके
आस्था व
विश्वास के केन्द्र
परम पूज्य संत
श्री आशाराम
जी बापू अपने
सहयोगियों के
साथ
हेलिकाप्टर
से बाहर आये और
आज हम सभी लोग
अपने चक्षुओं
से उनका
प्रत्यक्ष
दर्शन कर रहे
हैं ।"
दुनिया
में यह ऐसा
पहला चमत्कार
है ! - 'अखिल
भारतीय
आतंकवाद
विरोधी
मोर्चा' के
राष्ट्रीय
अध्यक्ष श्री
मनिन्दरजीत
सिंह बिट्टा
"दुनिया के
अन्दर
करोड़ों
लोगों की
आस्था के प्रतीक
बापू आशाराम
जी हैं ।
बड़े-बड़े
मंत्री,
मुख्यमंत्री
जिनके पास
सत्ता थी,
उनके हेलिकाप्टर
गिरे तो कोई
सलामत नहीं
बचा लेकिन
बापू जी के
साथ इतना बड़ा
हादसा हुआ और
किसी को भी एक
कंकड़ की भी
चोट नहीं आयी !
यह दुनिया में
इस प्रकार का
पहला चमत्कार
है । यह बापू
जी का चमत्कार
है !''
डीसा
(गुजरात) की
रहने वाली
भगवती बहन
पागरानी
(वर्तमान
निवास –
अहमदाबाद),
जिनको 6,7 साल की
उम्र से ही
पूज्य बापू जी
के सत्संग एवं
सेवा का
सौभाग्य मिला
है, वे उन परम
सौभाग्यशाली
क्षणों को याद
करते हुए पूज्य
श्री के मधुर,
प्रेरणादायी
प्रसंग बताते
हुए कहती हैं-
जब पूज्य बापू
जी डीसा के
आश्रम में
एकांत-सेवन
करते थे तब
मुझे और मेरे
भाई को कई बार
पूज्य श्री के
लिए दूध
पहुँचाने का
सौभाग्य मिला
है ।
एकांतवास
के दौरान
पूज्य बापू जी
डीसा में सुबह-शाम
सत्संग करते
थे, खूब ध्यान
कराते थे और
आध्यात्मिक
शक्ति का
सम्प्रेशण करते
थए । उस समय
घंटों की
ध्यान-समाधि
के बाद जब
बापू जी लोगों
के बीच आते थे
तब उनके
मुखमंडल पर
ऐसा अलौकिक
तेज प्रतीत
होता था कि
कोई उनकी
आँखों की ओर
देख नहीं सकता
था ।
एक दिन
बापू जी ने
सुबह-सुबह ऐसा
शक्तिपात किया
कि सबका ध्यान
लग गया । एक
लड़का तो
ईश्वरीय मस्ती
में
नाचता-नाचता
सीढ़ी पर चढ़
गया और तीसरे
चौथे पायदान
पर जाकर बैठ
गया । उसे तब
अपने शरीर का
और बाहरी
दुनिया का भान
ही नहीं था ।
बापू जी ने
लोगों से कहाः
"तुमको जो कुछ
पूछना है वह
इससे पूछ लो ।"
लोग जो भी
प्रश्न करते,
सबका सही
उत्तर वह देता
जा रहा था !
एक भाई ने
प्रश्न कियाः "मेरे
दादा जी, जो मर
गये हैं वे
अभी कहाँ हैं
?"
लड़के ने
बताया कि
सामने चले
जाओ, वहाँ एक
वृक्ष है ।
उसकी अमुक डाल
पर अमुक दिशा
में एक कौआ बैठा
है । वही उनके
दादा जी हैं ।
लोगों ने
वहाँ जाकर
देखा तो सच
में वहाँ एक
कौआ बैठा हुआ
मिला । उस
लड़के की
आँखें बंद थीं
और जहाँ सब
बैठे थे वहाँ
से वह पेड़ भी
नहीं दिख रहा
था । फिर तो
ऐसा वातावरण
बन गया था कि
सब लोग उस
लड़के से
अपने-अपने
प्रश्न पूछने
लगे और वह
सबके उत्तर
देता रहा कि 'यह
बात ऐसी है.... यह
ऐसा-ऐसा है...'
आदि-आदि । ऐसा
लगभग डेढ़
घंटा चला, फिर
वह लड़का
सामान्य
स्थिति में
आया ।
फिर तो सब
नतमस्तक हो
गये कि 'जिनके
शक्तिपात से
एक साधारण सा
लड़का ध्यानस्थ
होकर इस लोक
और परलोक तक
की बातें कर
रहा है, वे
महापुरुष
कितने महान
होंगे !'
साधनाकाल
में जब बापू
जी डीसा में
रहते थे, उस समय
पहली बार जब
पूज्य श्री
मधुकरी
(भिक्षा) करने
गये थे तो एक
सिंधी माई ने
भिक्षा देने
से मना कर
दिया था । यह
प्रसंग तो सभी
ने सुना हो होगा
। उस घर से
चलकर बापू जी
जब दूसरे घर
गये तो वहाँ
जिन्होंने
भिक्षा दी थी
वे हैं मिश्री
बहन । वे उस
दिन को याद
करते हुए कहती
हैं कि
उस दिन
मैंने
खीर-पूड़ी
बनायी थी ।
बापू जी जब हमारे
घर के द्वार
पर आये तो
मैंने वही
भिक्षा के रूप
में अर्पण की
थी ।
बापू जी ने
पूछाः "क्या
नाम है बैटी ?"
मैंने नाम
बताया, फिर
बोलेः "साँईं
लीलाशाहजी
बापू के आश्रम
में सत्संग होता
है, तू जाती है
वहाँ ?"
"नहीं
महाराज !" "जाया
कर ।"
बापू जी ने
सत्संग का समय
भी बताया कि
सुबह-सुबह
होता है ।
उनकी पावन व
हितकारी वाणी
का ऐसा प्रभाव
पड़ा कि दूसरे
दिन तो जो काम
मुझे 8 बजे तक
पूरा करना
होता था वह
सारा 6 बजे ही
निपटाकर मैं
सत्संग शुरु
होने के 15 मिनट
पहले ही आश्रम
में पहुँच गयी
।
वहाँ क्या
विलक्षण
माहौल था ! सब
लोग एकदम शांत
बैठे थे ।
बापू जी शिवजी
की तरह
ध्यानस्थ थे
और लोग उनको
देख-देख कर
ध्यान कर रहे
थे ।
फिर
सत्संग हुआ,
किसी ने श्री
योगवासिष्ठ
महारामायण
ग्रंथ पढ़ा,
बापू जी ने उस
पर व्याख्या
की । बाप जी
वेदांत के ऊपर
ही सत्संग
करते थे । ऐसा
रोज होता था ।
फिर तो मुझे
भक्ति, साधना
का ऐसा रंग
लगा कि वर्णन
करने को शब्द
नहीं हैं ।
श्री
योगवासिष्ठ
के श्रवण का
ऐसा चस्का लगा
कि अगर मैं
योगवासिष्ठ
नहीं सुनूँ तो
नींद ही न आये
। वर्षभर में
कभी बापू जी
एक महीने के
लिए हिमालय
चले जाते थे ।
जब भी बापू जी
हिमालय जाते
तो मुझे बड़ा
रोना आता था
कि 'अब मुझे
योगवासिष्ठ
कौन सुनायेगा ?
मैं तो एकदम
अनपढ़ हूँ ।'
एक बार जब
बापू जी लौटे
तो मैंने
बोलाः "बापू
जी ! आप तो चले
जाते हैं और
मुझे
योगवासिष्ठ
सुनने को नहीं
मिलता, और
दूसरा कोई
सुनाने वाला
है नहीं । आप
ऐसी कृपा
कीजिये कि
मुझे ही पढ़ना
आ जाय ।"
बापू जी
प्रसन्न होकर
बोलेः "क्या
बात है ! तू
पढ़ेगी ?"
"जी, बाप जी !"
पूज्य
श्री बोलेः "स्लेट
और खड़िया ले
के आ ।"
मैं लेकर
आयी तो बापू
जी ने 4 अक्षर
लिख के दिये और
बोलेः "जब तू
ये बिना देखे
लिखना सीख
जायेगी तो
तुझे पढ़ना आ
जायेगा ।"
मैं
अभ्यास करती
रही ।
ब्रह्मवाक्य
सत्य सिद्ध
हुए । जब मैं
उन अक्षरों को
बिना देखे
लिखना सीख गयी
तो मुझे पढ़ना
आ गया । आज मैं
हिन्दी व
गुजराती –
दोनों भाषाएँ
पढ़ लेती हूँ
। योगवासिष्ठ
पढ़ती हूँ,
डीसा के
सत्संगी भी
आते हैं और
सुनते हैं ।"
आश्चर्य
की बात तो यह
है कि जब उन
बहन जी से पूछा
गया कि ''वे 4
अक्षर
वर्णमाला के
कौन-से अक्षर
थे ?" तो
उन्होंने
बताया कि "वे
अक्षर – अ आ इ ई...
पूरी
वर्णमाला में
से कोई थे ही
नहीं, वे अलग
ही अक्षर थे ।
मैं जब से
पढ़ना सीखी तब
से वे अक्षर
भूल गयी ।"
जैसे
शिवजी द्वारा
प्राप्त 14
सूत्रों से
पाणिनी मुनि
ने संस्कृत का
व्याकरण रचा
था, ठीक वैसे
ही बापू जी ने 4
अक्षरों से
पूरी
वर्णमाला सिखा
दी और एक
अनपढ़ को श्री
योगवासिष्ठ
महारामायण
जैसे वेदांत
के गूढ़ ग्रंथ
के पठन-पाठन में
साफल्य
प्रदान कर
दिया ।
मिश्री
बहन आगे बताती
हैं कि एक दिन
मैं ध्यान
करने बैठी थी
तो मेरे ध्यान
में समस्त
देवी देवता
तथा
इन्द्रदेव
आये और बोलेः "चलिये
हमारे स्वर्ग
में, हम आपको
लेने आये हैं
।" मैंने कहाः "मुझे
तो
ब्रह्मज्ञानी
सद्गुरु बापू
जी मिल गये
हैं, मेरे तो
वे ही सब कुछ
हैं ।
तुम्हारा स्वर्ग
तुम्हें
मुबारक हो,
हमको नहीं
चाहिए ।" इतना
सुन
इन्द्रदेव
आशीर्वाद
देकर चले गये
।
पूज्य
बापू जी ने
मुझे आज्ञा दी
थी कि "हर
गुरुवार को
यहाँ (डीसा
में)
बहनों-बहनों
को बुलाकर
सत्संग करना ।"
एक दिन मैं
पूज्य श्री के
दर्शन करने
अहमदाबाद गयी
तो मैंने बापू
जी से
प्रार्थना कीः
"गुरुदेव !
आपकी आज्ञा है
कि 'तू हर
गुरुवार को
सत्संग करना ।'
पर मेरे पास
तो कोई आता ही
नहीं है ।"
बापू जीः "अगर
कोई नहीं आता
है तो मेरी
तस्वीर रख के
सत्संग किया
कर ।"
मिश्री
बहन ने गुरु
आज्ञा मानी तो
आज वे
अनपढ़ बहन
अन्य बहनों को
श्री
योगवासिष्ठ की
व्याख्या
सुना रही है ।
यह गुरुकृपा
का ही चमत्कार
है । धन्य हैं
गुरुदेव,
जिन्होंने 4
अक्षरों में
पूरा भाषा का
ज्ञान कराया,
साथ में परमात्मप्राप्ति
के मार्ग पर
अग्रसर किया ।
जीवन
के व्यापार
में से समय
निकालकर
सत्संग में
आना चाहिए
''मैं पुज्य
बापू जी का
अभिनंदन करने
आया हूँ... उनके
आशीर्वचन
सुनने आया हूँ
। संत
महात्माओं के
दर्शन तभी
होते हैं,
उनका
सान्निध्य
तभी मिलता है
जब कोई पुण्य
जागृत होता है
।
देशभर की
परिक्रमा
करते हुए
जन-जन के मन
में अच्छे
संस्कार
जगाना, यह एक
ऐसा परम
राष्ट्रीय कर्तव्य
है जिसने
हमारे देश को
आज तक जीवित
रखा है और
इसके बल पर हम
उज्जवल
भविष्य का
सपना देख रहे
हैं... इस सपने
को साकार करने
की शक्ति और भक्ति
एकत्र कर रहे
हैं ।
पूज्य
बापू जी सारे
देश में भ्रमण
करके जागरण का
शंखनाद कर रहे
हैं, संस्कार
दे रहे हैं ।
हमारी जो
प्राचीन
धरोहर थी और
जिसे हम लगभग
भूलने का पाप
कर बैठे थे,
बापू जी हमारी
आँखों में ज्ञान
का अंजन लगा
के उसको फिर
से हमारे
सामने रख रहे
है । बापू जी
का प्रवचन सुन
कर बड़ा बल मिला,
बड़ा आनंद आया
। जीवन के
व्यापार में
से थोड़ा समय
निकाल कर
सत्संग में
आना चाहिए ।" –
भारतरत्न
श्री अटल
बिहारी
वाजपेयी,
पूर्व प्रधानमंत्री
मैंने
पूज्य बापू जी
के सत्संग को
कई स्थानों पर
सुना है
''मैं पूज्य
बापू जी के
श्रीचरणों
में प्रणाम करने
आया हूँ ।
भक्ति से बड़ी
दुनिया में
कोई ताकत नहीं
होती और भक्त
हर कोई बन
सकता है । हम सबको
भक्त बनने की
ताकत मिले,
आशीर्वाद
मिलें । संतों
के आशीर्वाद
ही हम सबकी
बड़ी पूँजी
होती हैं ।
मैंने तो
पूज्य बापू जी
को हरियाणा में
बैठकर सुना
है, पंजाब में
भी सुना है,
राजस्थान के
द्वारा एक नयी
चेतना जगी है
और उसका एक नया
प्रभाव शुरु
हुआ है ।
मेरा ऐसा
सौभाग्य रहा
है कि जीवन
में जब कोई नहीं
जानता था, उस
समय से बापू
जी के
आशीर्वाद मुझे
मिलते रहे
हैं, स्नेह
मिलता रहा है
। बापू के
शब्दों में एक
यौगिक शक्ति
रहती है ।
पूज्य
बापू जी ! देश
और दुनिया –
सर्वत्र ऋषि
परम्परा की
संस्कार
धरोहर को पहुँचाने
के लिए अथक
तपश्चर्या कर
रहे हैं । अनेक
युगों से चलते
आये
मानव-कल्याण
के इस तपश्चर्या-यज्ञ
में आप अपने
पल-पल की
आहुति देते
रहते हैं ।
उसमें जो
संस्कार की
दिव्य ज्योति
प्रगट हुई है,
उसके प्रकाश
में मैं और
जनता – सब चलते
रहें । मैं
संतों के
आशीर्वाद से
ही जी रहा हूँ
। मैं यहाँ
इसलिए आया हूँ
कि लाइसेंस
रिन्यू हो जाय
। पूज्य बापू
जी ने
आशीर्वाद दिया
और आप सबको
वंदन करने का
मौका दिया
इसलिए मैं
बापू जी का
ऋणी हूँ ।"
श्री
नरेन्द्र
मोदी,
तत्कालीन
मुख्यमंत्री, गुजरात,
वर्तमान
प्रधानमंत्री,
भारत सरकार ।
आज मैं
धन्य हुआ...
''पूज्य
स्वामी जी के
दिव्य दर्शन
एवं अनुभव-सम्पन्न
वाणी का मुझ
पर काफी गहरा
प्रभाव पड़ा है
। ऐसे संतों
की निगाह से
तन प्रभावित
होता है और
उनके वचनों से
मन भी
पवित्रता का
रास्ता पकड़
लेता है । मैं
आज धन्य हुआ
कि मुझे महाराज
श्री के
प्रत्यक्ष
दर्शन हुए ।" –
श्री गुलजारी
लाल नंदा,
पूर्व
प्रधानमंत्री
वैज्ञानिकों
के लिए
आश्चर्य बनी
पूज्य बापू जी
की आभा
विश्वप्रसिद्ध
आभा विशेषज्ञ
डॉ. हीरा
तापड़िया ने
किर्लियन
फोटोग्राफी
से बापू जी का
आभा चित्र
खींचा तो वे
भी
आश्चर्यचकित
हो गये । उन्होंने
अपना अनुभव
व्यक्त करते
हुए बताया कि ''मैंने
अब तक लगभग
सात लाख से भी
ज्यादा लोगों के
आभा चित्र
लिये हैं,
जिनमें एक
हजार प्रसिद्ध
व प्रभावशाली
व्यक्ति
शामिल हैं,
जैसे – बड़े
संत,
साध्वियाँ,
प्रमुख
व्यक्ति आदि ।
आज तक जितने
भी लोगों की
आभाएँ मैंने
ली हैं, उनमें
सबसे अधिक
प्रभावशाली
एवं उन्नत आभा
संत श्री
आशाराम जी
बापू की पायी
। बापू की आभा
में बेंगनी
रंग है, जो यह
दर्शाता है कि
बापूजी
आध्यात्मिकता
के शिरोमणि
हैं । यह
सिद्ध
ऋषि-मुनियों
में ही पाया
जाता है ।
बापू की
आभा में यह
प्रमुखता
मैंने पायी कि
वे सम्पर्क
में आये
व्यक्ति की
ऋणात्मक
ऊर्जा को
ध्वस्त कर
धनात्मक
ऊर्जा प्रदान
करते हैं । बापू
की आभा देखकर
मुझे सबसे
ज्यादा
आश्चर्य हुआ
क्योंकि
कम-से-कम
पिछले लगातार
10 जन्मों से
समाजसेवा का
यह
आध्यात्मिक
कार्य करते आ
रहे हैं –
लोगों पर
शक्तिपात
करके उन्हें
अध्यात्म में
लगाना, स्वस्थ
करना, समाज की
बुराइयों को
दूर करना,
ज्ञानामृत
बाँटना, आनंद
बरसाना आदि । मुझे
पिछले दस
जन्मों तक का
ही पता चल
पाया, उसके
पहले का पढ़ने
की क्षमता
मशीन में नहीं
थी ।'' वीडियो
देखने हेतु लिंक
http://bit.ly/BapujiAura
ब्रह्मवेत्ता
महापुरुषों
का सामर्थ्य,
उनकी
करुणा-कृपा
अनंत और अगोचर
होती है, भला
उसे हमारी
इन्द्रियों व
मशीनों
द्वारा कैसे
मापा जा सकता
है ।
कांधार विमान-अपहरण घटना के दौरान हुआ एक चमत्कार !
24 दिसम्बर 1999 को इंडियन एयरलाइंस का एक जहाज कुछ अपहरणकर्ताओं द्वारा अपहरण कर कांधार (अफगानिस्तान) ले जाया गया था ।
27 दिसम्बर को अपह्त जहाज में तकनीकी खराबी के कारण अँधेरा हो गया और अपहरणकर्ता पागल से हो गये । उन्होंने तत्काल एलान कर दिया कि 'पहले हमारे जहाज में रोशनी दो, नहीं तो हम यात्रियों को मारना शुरु कर देंगे ।'
एक तो अपहरणकर्ता का डर, दूसरा जहाज में रोशनी नहीं और तीसरा, अपहरणकर्ताओं द्वारा यात्रियों को जान से मारने की धमकी । सुबह से शाम हो गयी । स्थिति काफी तनावपूर्ण हो गयी क्योंकि हमारी टीम का कोई भी व्यक्ति जहाज के अंदर जाकर काम करने को तैयार नहीं था । पर मैंने मन-ही-मन गुरुदेव की आज्ञा लेकर जहाज में काम करने की सम्मति दी, तो मेरे सभी साथी भौचक्के रह गये । मैं गुरुदेव के दिये हुए गुरुमंत्र का जप करते-करते अपने मिशन पर चल दिया । मैं अपह्रत जहाज की सीढ़ियों पर चढने लगा, जैसे ही आखिरी सीढ़ी पर पहुँचा, दो अपहरणकर्ताओं से मेरा सामना हुआ । दोनों के एक हाथ में रिवॉल्वर व दूसरे हाथ में हथगोले थे । उन्होंने मेरी तलाशी ली ।
तलाशी में सबसे पहले उनको मिला गुरुदेव की तस्वीरवाला पेन व चाबी का छल्ला, जिसे देखकर वे चौंके और पूछाः "यह तस्वीर किसकी है ?"
मैंने कहाः "मेरे गुरुदेव की ।" उनका दूसरा सवालः "इनका नाम क्या है ?" मैंने गुरुदेव का नाम बताया । और भी जो उन्होंने पूछा मैंने सब बता दिया । उनका रुख थोड़ा नरम हुआ ।
मैंने उस जहाज में एक घंटे तक काम किया और तकनीकी खराबी को ठीक करके जहाज में रोशनी कर दी । जितनी देर मैं जहाज में रहा ऐसा लगा कि गुरुदेव मेरे साथ हैं और मुझसे काम करवा रहे हैं जबकि अपहरणकर्ता पिस्तौल ताने खड़ा था और मुझे बार-बार कह रहा था कि 'कोई चालाकी की गोली मार दूँगा... लाइट नहीं आयी तो बम से उड़ा दूँगा ।'
जैसे ही काम करके नीचे आया, मेरे सभी साथी मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैं जिंदा भूत हूँ । 1 जनवरी को मैं टीम सहित अपह्रत जहाज लेकर वापस दिल्ली आया । जब तक मैं वापस नहीं आया तब तक मेरी पत्नी व बच्चे गुरुदेव का ही ध्यान करते रहे । मैं अपने गरुवर को पुनः शत-शत प्रणाम करता हूँ ।
राकेश कुमार शर्मा, सेनानिवृत्त प्रबंधक, एयर इंडिया, पालम, नई दिल्ली, सचल दूरभाष 8636014080
मेरी जो भी संतान होती थी वह जीवित नहीं रहती थी । 3 बच्चे मर गये, इस कारण मैं बहुत निराश, व्यथित तथा उत्साहशून्य हो गया था । तीसरी संतान खोये हुए एक माह ही बीता था कि तभी 'ऋषि-प्रसाद' की सेवा-योजना के माध्यम से मुझे अहमदाबाद आश्रम की वाटिका जैसी पूज्य श्री की दिव्य तपःस्थली में एक सप्ताह साधना करने का सुअवसर प्राप्त हुआ । वहाँ का वातावरण बड़ा शांतिमयी व आनंददायी है व आध्यात्मिक स्पंदनों से ओतप्रोत है ।
अनुष्ठान आरम्भ करने से चिंता, शोक, निराशा सब दूर होने लगे । समता, प्रसन्नता व आत्मबल बढ़ने लगा । मुझ पर दुःखों का पहाड़ गिरा था पर ऋषि प्रसाद की सेवा एवं अनुष्ठान से उस सहने तथा सेवा करने की शक्ति मिली । नया उत्साह जगा कि 'परिस्थिति चाहे कैसी भी आ जाय, गुरुदेव के ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने की सेवा के लाभ से वंचित नहीं रहूँगा ।' अगर जीवन में बापू जी का सत्संग ज्ञान न होता, अनुष्ठान-ध्यान न होता तो मैं न जाने क्या कर बैठता ! ऐसी दुःखद परिस्थिति से बाहर निकलने का मार्ग पूज्य श्री की कृपा से ही मिला । और यह समझ भी मिली कि 'ध्यान, जप का फल यह नहीं है कि जीवन में दुःख नहीं आयेंगे, दुःख-सुख तो प्रारब्ध अनुसार आयेंगे पर वे हम पर प्रभाव नहीं डाल सकेंगे, हमें दुःखी-सुखी नहीं कर सकेंगे । हम सुख-दुःख में सम, निर्लिप्त और प्रसन्न रहने में सक्षम बनेंगे ।' कैसी महिमा है गुरुज्ञान की, गुरुसेवा की ! – विनय विश्वकर्मा, सचल दूरभाष 7775088000
दृष्टि पड़ने मात्र से मिली जीवन को सही दिशा
पहले मैं दारू पीना, मांसाहार करना आदि दुर्व्यसनों में बुरी तरह लिप्त था । किसको कैसे मारना, कैसे झगड़ा करना – ऐसे ही विचार दिमाग में घूमते थे । ऑफिस में, घर पर सभी लोग मुझसे बहुत परेशान रहते थे । एक घटना में मुझ पर हॉफ मर्डर का केस भी बन गया था ।
बापू जी का नागपुर में सत्संग था । लोग दर्शन के लिए रास्ते पर खड़े थे । कुतूहलवश मैं भी वहाँ पहुँच गया । मन में चल रहा था कि 'ऐसे संत तो बहुत देखे हैं...' इतने में पूज्य बापू जी की गाड़ी आ गयी और उनकी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी । दृष्टि में न जाने कैसा तेज था कि मैं देखता ही रह गया । मेरे मन के खूँखार विचार अवरुद्ध हो गये और मुझे बापू ही बापू दिखने लगे । बापू जी से अगले ही महीने मैंने दीक्षा ले ली । मेरे दुर्गुण अपने-आप छूटते गये और पूरा जीवन ही बदल गया । 22 साल से मेरे ऊपर चल रहा केस भी खत्म हो गया । पहले मेरे पास रहने के लिए स्वयं का घर तक नहीं था । गुरुकृपा से मेरा घर बन गया और मैंने 17 एकड़ जमीन भी खरीद ली । मुझे ध्यान, जप व सेवा में इतना रस आने लगा कि 1 लाख के ऊपर सैलरीवाली नौकरी को भी मैंने रिटायरमेंट के 6 साल पहले ही छोड़ दिया । आज गुरुकृपा से मेरे हृदय में जो शांति और आनंद है, उसके आगे उतनी सैलरी भी कोई मायने नहीं रखती ।
पूज्य बापू जी की कृपा से जनवरी 2021 में मेरे बेटे का विवाह ऐसे विलक्षण ढंग से हुआ कि निगुरे लोग भी बोल उठे कि 'ऐसी शादी हमने आज तक नहीं देखी !' हमने शादी के एक दिन पहले गाँव में मातृ-पितृ पूजन कार्यक्रम करवाया । शादी के दिन गाड़ी पर पूज्य बापू जी का बड़ा बैनर लगा के भजन-कीर्तन चलाते हुए पूरे गाँव में कीर्तन यात्रा निकाली । कैलेंडर व ऋषि प्रसाद बाँटी । 439 मेहमानों को ऋषि प्रसाद का सदस्य बनाया । विवाह-स्थल पर दो-ढाई हजार लोगों की उपस्थिति में पूज्य बापू जी की आरती बड़े ही धूमधाम से करवायी । इस तरह पूरा माहौल भक्तिमय हो गया था । मेरा जीवन तो नाली के कीड़े की तरह नीचा था लेकिन पूज्य बापू जी कृपा से रसमय और साधनामय हो गया ।
महादेव एकड़े, सचल दूरभाषः 7620155056
।। श्रीमहादेव्युवाच ।।
गुरुर्मन्त्रस्य देवस्य धर्मस्य तस्य एव च ।
विशेषस्तु महादेव ! तद् वदस्व दयानिधे ।।
।। श्री महादेव उवाच ।।
जीवात्मनं परमात्मनं दानं ध्यानं योगो ज्ञानम् ।
उत्कल काशीगङ्गामरणं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।। 1 ।।
प्राणं देहं गेहं राज्यं स्वर्गं भोगं योगं मुक्तिम् ।
भार्यामिष्टं पुत्रं मित्रं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।। 2 ।।
वानप्रस्थं यतिविधधर्मं पारमहंस्यं भिक्षुकचरितम् ।
साधोः सेवां बहुसुखभुक्तिं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।। 3 ।।
विष्णो भक्तिं पूजन रक्तिं वैष्णवसेवां मातरि भक्तिम् ।
विष्णोरिव पितृसेवनयोगं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।। 4 ।।
प्रत्याहारं चेन्द्रिययजनं प्राणायामः न्यासविधानम् ।
इष्टे पूजा जप तपभक्तिः न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।। 5 ।।
काली दुर्गा कमला भुवना त्रिपुरा भीमा बगला पूर्णा ।
श्रीमातङ्गी धूमा तारा न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।। 6 ।।
मात्स्यं कौर्मं श्रीवाराहं नरहरिरूपं वामनचरितम् ।
नरनारायण चरितं योगं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।। 7 ।।
श्रीभृगुदेवं श्री रघुनाथं श्रीयदुनाथं बौद्धं कल्क्यम् ।
अवतारा दश वेदविधानं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।। 8 ।।
गङ्गा काशी काञ्ची द्वारा मायाऽयोध्याऽवन्ती मथुरा ।
यमुना रेवा पुष्करतीर्थं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।। 9 ।।
गोकुलगमनं गोपुररमणं श्रीवृन्दावन-मधुपुर रटनम् ।
एतत्
सर्व सुन्दरि ! मातः
न गुरोरधिकं न
गुरोरधिकम्
।। 10 ।।
तुलसीसेवा
हरिहरभक्तिः
गङ्गासागर-सङ्गममुक्तिः
।
किमपरमधिकं
कृष्णेभक्तिः
न गुरोरधिकं न
गुरोरधिकम्
।। 11 ।।
एतत्
स्तोत्रं
पठति च नित्य
मोक्षज्ञानी
सोऽपि
च धन्यम् ।
ब्रह्माण्डान्तर्यद्-यद्
ध्येयं न
गुरोरधिकं न
गुरोरधिकम्
।। 12 ।।
अर्थः
श्री महादेवी
(पार्वती जी)
ने कहाः हे दयानिधे
शम्भो !
गुरुमन्त्र
के देवता
अर्थात् श्री
गुरुदेव एवं
उनका आचारादि
धर्म क्या है –
इसके बारे में
विशेष वर्णन
करें ।
श्री
महादेव जी
बोलेः
जीवात्मा-परमात्मा
का ज्ञान, दान,
ध्यान, योग
तथा पुरी,
काशी या
गंगा-तट पर
मृत्यु – इन
सबमें से कुछ
भी श्री
गुरुदेव से
बढ़कर नहीं
है, श्री
गुरुदेव से
बढ़कर नहीं है
।। 1 ।।
प्राण,
शरीर, गृह,
राज्य,
स्वर्ग, भोग,
योग, मुक्ति,
पत्नी, इष्ट,
पुत्र, मित्र –
इन सबमें से
कोई भी
श्रीगुरुदेव
से बढ़कर नहीं
है, श्री
गुरुदेव से
बढ़कर नहीं है
।। 2 ।।
वानप्रस्थ
धर्म, यति
धर्म, परमहंस
के धर्म, भिक्षुक
के धर्म,
साधु-सेवारूपी
गृहस्थ धर्म व
बहुत से सुखों
का भोग – इनमें
से कुछ भी
श्री गुरुदेव
से बढ़कर नहीं
है, श्री
गुरुदेव से
बढ़कर नहीं है
।। 3 ।।
भगवान श्री विष्णु की भक्ति, उनके पूजन में अनुरक्ति, विष्णु भक्तों की सेवा, माता की भक्ति, श्रीविष्णु ही पिता रूप में हैं इस प्रकार की पिता की सेवा – इनमें से कुछ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।। 4 ।।
इन्द्रियों का नियमन और दमन, प्राणायाम, न्यास का विधान, इष्टदेव की पूजा, मंत्रजप, तपस्या व भक्ति – इनमें से कुछ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।। 5 ।।
काली, दुर्गा, लक्ष्मी, भुवनेश्वरी, त्रिपुरासुन्दरी, भीमा, बगलामुखी, पूर्णा, मातंगी, धूमावती व तारा – ये सभी मातृशक्तियाँ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं ।। 6 ।।
भगवान के मत्स्य, कूर्म, वाराह, नरसिंह, वामन, नर-नारायण आदि अवतार, उनके जीवन-चरित्र व तप आदि भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं ।। 7 ।।
भगवान के श्री भृगु, श्रीराम, श्री कृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि आदि वेदवर्णित दस अवतार श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं ।। 8 ।।
गंगा, यमुना, रेवा आदि पवित्र नदियाँ एवं काशी, कांची, द्वारिका, हरिद्वार, अयोध्या, उज्जयिनी, मथुरा आदि पवित्र पुरियाँ तथा पुष्करादि तीर्थ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं , श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं ।। 9 ।।
हे सुंदरी ! हे मातेश्वरी ! गोकुल यात्रा, गौशालाओं में भ्रमण व श्री वृंदावन व मधुपुर आदि शुभ नामों का रटन – ये सब भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं ।। 10 ।।
तुलसी-सेवा, विष्णु व शिव भक्ति, गंगासागर संगम पर देह-त्याग और अधिक क्या कहूँ, परात्पर भगवान श्री कृष्ण की भक्ति भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।। 11 ।।
इस स्तोत्र् का जो नित्य पाठ करता है वह आत्मज्ञान व मोक्ष दोनों पाकर धन्य हो जाता है । निश्चय ही समस्त ब्रह्मांड में जिस-जिसका ध्यान किया जाता है, उनमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।। 12 ।।


ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ