सेवा संजीवनी

 

 

 

ऋषि प्रसाद सेवा करने वाले कर्मयोगियों के नाम पूज्य बापू जी का संदेश

"मेरे गुरुदेव 10 महीने तो समाज में सत्संग आदि के द्वारा सद्विचारों के प्रचार-प्रसार की सेवा करते थे और 2 महीने नैनीताल के जंगलों में, आश्रम में एकान्तवास में रहते। वहाँ भी वे महापुरुष 80 साल की उम्र में 'दिव्य प्रेरणा प्रकाश, नारी! तू नारायणी.....' जैसी पुस्तकों की गठरी सिर पर उठाकर निकल पड़ते थे। पहाड़ी से नीचे उतरते, फिर दूसरी पहाड़ी पर चढ़ते। इसमें कितने घंटे लगते ! फिर गाँव के लोगों को इकट्ठा करते, थोड़ा सत्संग सुनाते और किशमिश का प्रसाद देकर पुस्तक पढ़ने की प्रेरणा देते। इतना श्रम करके जिन महापुरुषों ने शास्त्रों का प्रसाद लोगों तक पहुँचाया, उन्हीं महापुरुषों की कृपा-प्रसादी सत्संग के रूप में, 'ऋषि प्रसाद' तथा 'ऋषि दर्शन' के रूप में, घर-घर अभी भी पहुँच रही है।

मुझे तो लगता है कि मेरे गुरुजी के श्रम से आपका श्रम कम है लेकिन आपकी सेवा दूर तक पहुँचती। 20-20 लाख घरों में, कई विद्यालय-महाविद्यालयों, वाचनालयों, कार्यालयों में 'ऋषि प्रसाद' जाती है। एक 'ऋषि प्रसाद' तथा 'ऋषि दर्शन' 10-20 आदमी भी पढ़ते या देखते हैं तो कितने करोड़ लोगों तक सेवा पहुँच गयी ! ऋषियों-संतों की वैदिक संस्कृति का प्रसाद लोगों तक पहुँचाने के दैवी कार्य में जो संलग्न हैं, उन्हें मैं भगवान भोलेनाथ की ओर से बधाई देता हूँ-

धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः।

धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।।

हे पार्वती ! जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।"

"ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन की सेवा गुरुसेवा, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा, संस्कृति सेवा, विश्वसेवा, अपनी और अपने कुल की भी सेवा है।"

पूज्य बापू जी

महिला उत्थान ट्रस्ट

संत श्री आशारामजी आश्रम, साबरमती, अहमदाबाद-5

दूरभाषः 079- 39877788, 32933336

Website: http://www.ashram.org  Email: ashramindia@ashram.org

अनुक्रमणिका

सेवा संजीवनी

प्रस्तावना

आवरण पृष्ठ

यह अपने-आप में बड़ी भारी सेवा है

सुप्रचार करते मेरे प्यारे साधक

सफलता के पदचिह्न

सेवा तो सेवा ही है !

हमारे अनुभव

'ऋषि प्रसाद' सेवा ने भाग्य बदला

'ऋषि प्रसाद' – पारिवारिक, सामाजिक व आध्यात्मिक पत्रिका

एक घंटे में टी.बी. व कैंसर गायब !

नरक से निकाला 'ऋषि प्रसाद' ने

'ऋषि प्रसाद' की सेवा से प्राणदान

'ऋषि प्रसाद' ने ला दी सुख शांति

10 दिन की सेवा, 10 साल का मेवा

बापू जी की तस्वीर ने तकदीर बदली

तुलसी माला बनी रक्षाकवच

'ऋषि प्रसाद' की सेवा का फल

खुशी और आत्मबल का खजाना

'ऋषि प्रसाद' की सेवा से.....

किसकी मजाल है कि...

14 वर्ष का मिटा विषाद, बाँटा जब 'ऋषि प्रसाद'

सफलता की ओर 'ऋषि प्रसाद'

भाग्य के बंद द्वार खुल गये

'ऋषि प्रसाद' की सेवा है मेरा जीवन !

ऋषि प्रसाद व गुरुकृपा का चमत्कार

यश दिलाने वाली 'ऋषि प्रसाद'

कोई दिव्य शक्ति हमारे साथ है

'ऋषि प्रसाद' बाँटने से मिली शीतलता

की सेवा, मिला मेवा

जो है दुर्गुणहारी, भाग्य उद्धारिणी

108 के संकल्प का चमत्कार

आप भी करो ऐसा अनुष्ठान

जीवन-रक्षक बनी 'ऋषि प्रसाद'

सब रोगों की एक दवाई- 'ऋषि प्रसाद'

संकल्पमात्र से अदभुत लाभ

आप कहते हैं

बुराइयों को मिटाने वाला दर्पण

'ऋषि प्रसाद' महान सत्साहित्य है

'ऋषि प्रसाद' की सेवा में संलग्न सभी को हार्दिक बधाइयाँ – श्री अटल बिहारी वाजपेयी

तत्कालीन राष्ट्रपति जी का संदेश

ऋषि प्रसाद के अनमोल रत्न

कालसर्पयोग से मुक्ति का उपाय

प्राणशक्ति व ज्ञानशक्ति कैसे बढ़ायें

आर्थिक कमी दूर करने के लिए

सुबह जल्दी उठने की युक्ति

प्रेरक गीत व भजन

सुरभि सुवास सत्कर्मों की.....

'ऋषि प्रसाद' है ऐसी प्यारे....

गुरु ज्ञान की मिठाई

आओ मिल मंगल गान करें....

यदि आज गुरुजनों का अवतार न होता.....

ऋषि प्रसाद सेवा मार्गदर्शिका

सर्वार्थ-सिद्धि का मूलः सेवा

ऋषि प्रसाद सेवा में सफलता के लिए

सेवामंडल गठन व अभियान

आपकी उत्तम सेवा के लिए

ऋषि प्रसाद व ऋषि दर्शन कार्यालय का प्रारूप

ऋषि प्रसाद कार्यालय आपकी सेवा में

सेवाधारी परिचय-पत्र

सेवाधारियों के लिए विशेष निर्देश

ऋषि प्रसाद कार्यालयों के पते

सेवक को मधुरभाषी होना चाहिए। मधुर भाषण स्वयं ही एक सेवा है।

प्रस्तावना

संत श्री आशाराम जी आश्रम द्वारा प्रकाशित मासिक पत्रिका 'ऋषि प्रसाद' तथा विडियो डीवीडी मैगजीन 'ऋषि दर्शन' पूज्य बापू जी एवं संतों-महापुरुषों-ऋषियों के सत्संग-अमृत के चुने हुए पुष्पों के गुलदस्ते हैं, जो सभी मत-पंथ, जाति सम्प्रदाय के लोगों के जीवन को अपनी सुमधुर सुवास से सुवासित करने की क्षमता रखते हैं। दस भाषाओं में प्रकाशित ऋषि प्रसाद करोड़ों पाठकों के जीवन को उन्नत और सुखमय बना रही है। ऋषि दर्शन को वे लोग भी पसंद करते व देखते हैं जो पढ़ने में रुचि नहीं रखते अथवा सक्षम नहीं हैं।

आज यह पत्रिका समाज के हर वर्ग का एक सच्चे मार्गदर्शक की तरह उच्च पथ-प्रदर्शन कर रही है, साथ ही साथ पथ पर चलने की हिम्मत भी दे रही है। ऋषि प्रसाद के वाचन से तथा ऋषि दर्शन को देखने से करोड़ों नास्तिकों के हृदय में भी ईश्वर के प्रति सच्ची समझ और श्रद्धा की ज्योति प्रज्वलित हुई है। एक जगमगाता हुआ दीया कई बुझे हुए दीयों को जगमगाहट दे सकता है और पूज्य बापू जी इतने समर्थ हैं कि कोई कितना भी दुःखी, निराश, हताश क्यों न हो, उनके सत्संग की शीतल फुहार पड़ते ही उसके सारे दुःख एवं तपन दूर हो जाते हैं।

हमारी सनातन संस्कृति एवं हमारे ऋषि-मुनियों के शाश्वत ज्ञान से आज समाज का एक बड़ा हिस्सा अनभिज्ञ है। उन तक ऋषियों का यह संदेश पहुँचाना और सबको उनकी वास्तविक पहचान करवाना, अधिक से अधिक लोगों को उनके मार्गदर्शन में लाना, यही हमारी वास्तविक सेवा है। यह सेवा ऋषि प्रसाद तथा ऋषि दर्शन के माध्यम से हो रही है।

आज समाज को आवश्यकता है ऐसे पुण्यात्माओं की जो हमारी संस्कृति व ऋषियों के सुखी, स्वस्थ, सम्मानित और पूर्ण जीवन का संदेश देने वाली इस ज्ञान की गंगा को घर-घर तक पहुँचायें। घर-घर जाकर ऋषि प्रसाद तथा ऋषि दर्शन के माध्यम से ज्ञान का अलख जगाने के पुण्यमय कर्म का जिन्होंने बीड़ा उठाया है, वे कर्मयोगी पुण्यात्मा जो भगवत्प्राप्त संत और समाज के बीच सेतु बने हैं, उनकी अनुभव-गाथा आपके करकमलों में प्रदान करते हुए हमें अत्यंत कृतार्थता का अनुभव हो रहा है। जैसे मेहँदी बाँटने वालों के हाथ बिना किसी प्रयास के रंग जाते हैं, वैसे ही समाज में खुशियाँ बाँटते-बाँटते जिनके जीवन खुशियों से भर गये हैं ऐसे ही कुछ परोपकारी पुण्यात्माओं के जीवन-अनुभव एवं उद्गार इस पुस्तक में हैं। सब तो हम यहाँ नहीं दे पा रहे हैं किंतु उनमें से कुछ आपके हाथों तक पहुँचाने में भी हम आनंद का अनुभव कर रहे हैं। आशा है कि इससे आप भी कुछ प्रेरणा लेंगे और अपना जीवन धन्य करेंगे।

श्री योग वेदान्त सेवा समिति, अहमदाबाद

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गुरुसेवा ऐसा अमोघ साधन है जिससे वर्तमान जीवन आनंदमय बनता है और शाश्वत सुख के द्वार खुलते हैं।

....यह अपने-आपमें बड़ी भारी सेवा है

पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू

लोगों को भगवान और संत वाणी से जोड़ना यह अपने-आप में बड़ी भारी सेवा है। वाहवाही, चाटुकारी के लिए तो कोई भी सेवा कर लेता है, रोटी का टुकड़ा देखकर तो कुत्ता भी पूँछ हिला देता है परंतु मान-अपमान, ठंडी-गर्मी, आँधी-तूफान सहकर बिना स्वार्थ, प्रभु-प्रीत्यर्थ, लोक-मांगल्य की भावना से, अहं के नाते नहीं प्रभु के नाते, सत्ता-वाहवाही के नाते नहीं मानवता के नाते सेवा करना कितनी ऊँची बात है !

केवल समाज की सेवा के लिए ही इनका जन्म हुआ है – ऐसा समझ के मेरे साधक-साधिकाएँ घर-घर में जाते हैं और लोगों को सदस्य बनाते हैं। इनको सामने वाले की तरफ से शाबाशी, धन्यवाद भी नहीं चाहिए। इनका अंतरात्मा ही इनको जो कुछ देता है, उससे मेरे ऋषि प्रसाद और ऋषि दर्शन के कर्मयोगी साधक पूर्ण संतुष्ट हैं।

महात्मा बुद्ध के सेवकों के नाम सुनकर लोग पत्थर मारते थे फिर भी बुद्ध के सेवकों ने बुद्ध के विचारों का प्रचार किया। ऐसे ही मेरे ऋषि प्रसाद के लाड़ले-लाड़लियाँ, शिष्य-शिष्याएँ हैं कि घर-घर जाकर ऋषि प्रसाद तथा ऋषि दर्शन के सदस्य बनाते हैं। आपको भी किसी को सदस्य बनाने का अवसर मिले तो चूकना नहीं। लोगों को भगवान से जोड़ना और संत वाणी से जोड़ना यह अपने आप में बड़ी भारी सेवा है। अरे ! चार पैसे की नौकरी के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते ? जान हथेली पर लेकर चलते हैं ! तो फिर ये तो ईश्वर का रसामृत पान करने वाले, ऋषि प्रसाद तथा ऋषि दर्शन के सदस्य बनाने वाले मेरे साधक-साधिकाएँ दृढ़ संकल्पवान, दृढ़ निष्ठावान है। जैसे बापू अपने गुरुकार्य में दृढ़ रहे थे, ऐसे ही बापू के बच्चे नहीं रहते कच्चे !

जब तुम लोग ऋषि प्रसाद के सदस्य बनाने जाओ और लोग बोलें कि 'हम नहीं बनते सदस्य।' तब आप लोग बोलना कि 'नहीं बनो तो कोई बात नहीं, जरा पढ़ के तो देख लो। लो यह हमारे पते वाला पोस्टकार्ड, इसको रखो। आपको कोई फायदा हो तो मत लिखना, घाटा पड़े तो हमको लिख देना'। नहीं बनते सदस्य तो ऐसे ही ऋषि प्रसाद और एक पोस्टकार्ड दे आना। अपने-आप मन पिघलता है। मुसलमानों और ईसाइयों का मन भी पिघलता है तो हिन्दुओं का मन मेरे साधक-साधिकाओं के मधुर व्यवहार और सूझबूझ से क्यों नहीं पिघलेगा ? पिघलेगा, पिघलता ही है।

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जो गुरु की सेवा करता है वह वास्तव में अपनी ही सेवा करता है।

ऋषि प्रसाद की सेवा ने भाग्य बदल दिया

मैं छिंदवाड़ा जिले के आदिवासी क्षेत्र अमरवाड़ा का रहने  वाला हूँ। मैंने पूज्य बापू जी से 1997 में दीक्षा ली थी। मैं एक साधारण किसान हूँ। मैं ग्राम पंचायत में सचिव के पद पर कार्य करता था और छिंदवाड़ा आश्रम में दर्शन हेतु जाता था। वहाँ सन् 2000 में मुझे ऋषि प्रसाद की सेवा करने का सौभाग्य मिला। मैंने गुरुदेव के इस दिव्य ज्ञान ऋषि प्रसाद को घर-घर पहुँचाने का संकल्प लिया और सेवा में तत्परता से लग गया। शुरु में मुझे 25 सदस्य भी कठिन लग रहा था क्योंकि यह पूरा आदिवासी क्षेत्र है, फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी। पूज्य गुरुदेव की ऐसी कृपा बरसी कि 25-50 तो क्या 2000 से भी अधिक सदस्य बना चुका हूँ।

एक बार मेरे ऊपर किसी ने झूठा मुकद्दमा कर दिया। मैंने हिम्मत नहीं हारी, पहले की तरह अपनी सेवा में लगा रह। मैंने आश्रम जाकर बड़दादा की परिक्रमा की, पूज्य गुरुदेव से प्रार्थना की और पूज्य गुरुदेव के सत्संग में मुझे मुकद्दमा जीतने की युक्ति मिल गयी। ऋषि प्रसाद की सेवा और सत्संग के प्रताप से मैं मुकद्दमा जीत गया।

मेरा राजनीति से कोई संबंध नहीं था। मैं तो केवल बापू जी का सेवक हूँ और उनकी ऋषि प्रसाद की सेवा करता था  लेकिन एक दिन गुरुदेव की मुझ पर ऐसी कृपा बरसी कि जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। जिस पद को पाने के लिए बड़े-बड़े राजनेता प्रयासरत थे, उस पर मुझे गुरुदेव ने सहज में पहुँचा दिया। बिना चुनाव लड़े मुझे राज्यमंत्री का दर्जा दिला दिया। 26 अप्रैल 2008 को बापू जी की कृपा से मुझे समाजसेवा करने का यह सुअवसर प्राप्त हुआ। मैं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पिछले कार्यकाल में भी इस पद पर था और दूसरे कार्यकाल में कई लोगों का पद-परिवर्तन हुआ पर मैं आज भी पूज्य गुरुदेव की कृपा से इस पद पर रहते हुए समाज सेवा कर रहा हूँ। आज भी मुझे आश्रम से जो भी सेवा करने का अवसर प्राप्त होता है, मैं प्रत्येक सेवा को अपना सौभाग्य समझकर करने का पूरा प्रयास करता हूँ।

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में यही प्रार्थना है कि 'मुझे इसी प्रकार सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त होता रहे। मन में कभी भी अहंकार न आये और पूज्य बापू जी के श्रीचरणों में श्रद्धा, भक्ति बनी रहे।'

नारायण सिंह बंजारा, अध्यक्ष (राज्यमंत्री दर्जा), म.प्र. राज्य विमुक्त, घुमक्कड़ एवं अर्द्धघुमक्कड़ जाति विकास अभिकरण

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भारत के प्राचीन मंत्र-विज्ञान का अनुपम खजाना पायें 'ऋषि प्रसाद' में।

ऋषि प्रसाद एक पारिवारिक, सामाजिक व आध्यात्मिक पत्रिका है

मैं आनंदीबाई डिग्री कालेज, बोरीवली (मुंबई) में डायरेक्टर हूँ। सन् 2003 में पूज्य बापू जी से मंत्रदीक्षा लेने के बाद मुझे बौद्धिक, मानसिक व आध्यात्मिक हर प्रकार के लाभ हुए।

आज पश्चिमी अंधानुकरण के कारण बढ़ते अश्लीलतापूर्ण पतनवाले वातावरण में युवाओं का सही मार्गदर्शन संत-महापुरुषों के अलावा और कोई नहीं दे सकता। इसलिए मैंने सोचा कि 'हर माह पूज्य बापू जी का सत्संग मेरे कालेज के विद्यार्थियों को मिलना चाहिए ताकि वे संयमी, संस्कृति-प्रेमी, चरित्रवान, बुद्धिमान बन अपने माता-पिता व देश का नाम रोशन करें।

तभी मैंने सोचा कि यदि संत श्री आशाराम जी आश्रम द्वारा प्रकाशित मासिक पत्रिका ऋषि प्रसाद हर माह उन तक पहुँच जाय तो विद्यार्थियों के साथ उनके पूरे परिवार को भी सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शन मिलेगा।

विद्यार्थियों की उन्नति का राजमार्गः ऋषि प्रसाद

बापू जी की सत्प्रेरणा से मैं पिछले 9 वर्षों से कालेज में प्रवेश लेने वाले सभी विद्यार्थियों से प्रवेश शुल्क के साथ ऋषि प्रसाद का वार्षिक शुल्क 60 रूपये लेकर उन्हें एक साल का सदस्य बनाती हूँ। इससे परीक्षाफल बहुत अच्छा आ रहा है। विद्यार्थियों की खान-पान की आदतों में, शिष्टाचार व आचार-व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन देखे जा रहे हैं। मैं सबकी राय-सम्मति से यह कार्य कर रही हूँ और इससे सभी प्रसन्न हैं। बापू जी की कृपा से मुझे प्राध्यापक से डायरेक्टर बना दिया गया है। अब मेरे अंतर्गत 7 बड़े-बड़े कालेज व जूनियर कालेज हैं।

मैं सभी अध्यापक-प्राध्यापक वर्ग से अनुरोध करती हूँ कि हम लोग विद्यार्थियों के परीक्षा परिणाम पर तो ध्यान दें परंतु साथ ही उनके चारित्रिक, मानसिक, बौद्धिक व आध्यात्मिक विकास पर भी ध्यान दें क्योंकि जो लौकिक शिक्षा स्कूल कालेज में दी जाती है, उससे विद्यार्थी आगे चलकर केवल भौतिक सुविधाएँ एकत्रित कर सकते हैं परंतु जीवन में समता, शांति और सच्चा आनंद पाने की कला नहीं सीख पाते। फलस्वरूप अपनी सारी जिंदगी तनाव, चिंता में बिताकर हताश-निराश हो संसार से चले जाते हैं। कई युवक-युवतियाँ तो आपराधिक प्रवृत्तियों में लग जाते हैं तो कई आत्महत्या जैसा महापाप भी कर डालते हैं।

आज देश में जो घोटाले, भ्रष्टाचार, महँगाई, बेरोजगारी, अश्लीलता मौजूद है, यह अशिक्षित व्यक्तियों का काम नहीं वरन् देश-विदेश से उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों का काम है। विद्यार्थीकाल में इन लोगों ने भी रात भर जागकर पढ़ाई की होगी, उनके माँ-बाप ने भी उनको पैसा खर्च कर पढ़ाया-लिखाया होगा। लेकिन आखिर परिणाम क्या निकला ? अच्छी डिग्री पा ली परंतु पूज्य बापू जी जैसे संतों का उचित मार्गदर्शन नहीं है तो जिस शिक्षा को समाज व देश के उत्थान में लगाना चाहिए उसी को देश को खोखला करने में लगा रहे हैं। परंतु इसके बावजूद भी भारतवासी पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा सुखी, स्वस्थ व संयमी जीवन जी रहे हैं। यह सब बापू जी की तपस्या का फल है जो भारतवासियों को मिल रहा है।

भारत का यह परम सौभाग्य है कि ब्रह्मज्ञानी संत श्री आशाराम जी बापू 75 वर्ष की आयु में भी अपने एकांतिक, समाधिजन्य सुख को एक तरफ कर पूरे देश में सत्संग-कार्यक्रमों द्वारा ज्ञानवर्षा करके घर-घर में आध्यात्मिक क्रांति का उद्घोष करते रहे हैं और उनकी इसी ज्ञानवर्षा को अपने में सँजोये हुए है मासिक पत्रिका ऋषि प्रसाद।

ऋषि प्रसाद एक पारिवारिक, सामाजिक व आध्यात्मिक पत्रिका है, जिससे न केवल विद्यार्थियों को बल्कि उनके पूरे परिवार को भी सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शन मिलता है। इस पत्रिका द्वारा विद्यार्थियों को स्मरणशक्ति, बुद्धिशक्ति व एकाग्रता बढ़ाने के यौगिक प्रयोग, प्राणायाम, योगासन व मंत्रों द्वारा आंतरिक शक्ति बढ़ाकर सफलता के उच्च शिखरों तक पहुँचने का राजमार्ग मिलता है। साथ ही उनके अंदर संस्कृति-प्रेम, सदाचार, शिष्टाचार के संस्कार भी पड़ते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि उनका एसक्यू, एसआई बहुत बढ़ जाता है। आज लगभग हर बड़े इंटरव्यू हर बड़े इंटरव्यू में इसके अतिरिक्त अंक दिये जाते हैं क्योंकि धार्मिक व्यक्ति अधार्मिक की अपेक्षा ज्यादा ईमानदार, सहनशील, चरित्रवान, संयमी, सदाचारी व सदगुणसम्पन्न होता है, जिसका पूरा लाभ उस कम्पनी को मिलता है जिसमें वह काम करता है।

आज के आपाधापी वाले समय और स्वार्थी वातावरण में भी वे व्यक्ति स्वस्थ, सुखी व सम्मानित जीवन जी रहे हैं जिनके जीवन में पूज्य बापू जी जैसे ब्रह्मज्ञानी संतों का सत्संग-सान्निध्य व मार्गदर्शन है। ऋषि प्रसाद मासिक पत्रिका पूज्य बापू जी का आशीर्वाद व मार्गदर्शन प्राप्त करने का एक बहुत ही सुन्दर और सुगम साधन है।

अतः मैं सभी प्राध्यापकों, विशेषकर बापू जी द्वारा दीक्षित प्राध्यापकों से अनुरोध करती हूँ कि आप भी अपने स्कूल, कालेज, इंस्टीच्यूट में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का ऋषि प्रसाद का सदस्य बनायें व समाज के हर वर्ग तक बापू जी जैसे महापुरुष का संदेश पहुँचाकर अपने पद व योग्यता का सदुपयोग करें। पूज्य बापू जी के श्रीचरणों में मेरे कोटि-कोटि नमन !

शांतिलता मिश्रा (डायरेक्टर) आनंदी बाई कालेज ट्रस्ट, बोरीवली (मुंबई)

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गुरुसेवा आपको बिल्कुल स्वस्थ और तन्दुरुस्त रखती है।

एक घंटे में टी.बी. व कैंसर गायब !

मैंने पहले कुलगुरु से दीक्षा ली थी। मेरे परिचित कहतेः "आप बापू जी से दीक्षा ले लो।" मैं उन्हें कहतीः "मैं गुरु नहीं बदल सकती।"

एक बार उन्होंने समझाया कि "पहले से आपके गुरु हैं तो एक कदम आगे बढ़कर सदगुरु बनाने में कोई हर्ज नहीं अपितु सौभाग्य की बात है।" पर मैं दीक्षा लेने का निश्चय नहीं कर सकी। एक रात मुझे भगवान शिव के रूप में पूज्य बापू जी के दर्शन हुए। मैंने तुरंत निश्चय कर लिया कि 'अब तो मैं बापू जी से मंत्रदीक्षा जरूर लूँगी।' दीक्षा के बाद मैंने ऋषि प्रसाद की सेवा शुरु कर दी। जीवन को नयी दिशा देने वाली इस पत्रिका की सेवा से जो संतोष, आनंद, शांति मिली, उसका शब्दों में बयान नहीं हो सकता।

प्रारब्धवश 2006 में मुझे टी.बी. और हड्डियों का कैंसर दोनों हो गये। मैंने बापू जी से आर्तभाव से प्रार्थना कीः 'बापू जी ! आपका सत्संग सुनकर मुझे मौत का डर तो नहीं रहा है पर आप इतनी कृपा बनाये रखना कि अस्वास्थ्य के कारण मेरी ऋषि प्रसाद की सेवा न छूटे।' अगले ही दिन बापू जी ने सपने में दर्शन देकर कहाः "क्यों सो रही है ? उठ ! मंत्रजप कर।" मैंने बापू जी के सत्संग में असाध्य रोगों को मिटाने वाला मंत्र सुना था, उसका पानी निहारते हुए श्रद्धापूर्वक जप करके वह जल पी लिया। एक घंटे बाद में जाँच करवाने गयी तो दोनों रिपोर्टें एकदम सामान्य आयीं। दोनों बीमारियाँ एक ही घंटे में खत्म ! आज मैं पूर्णरूप से स्वस्थ हूँ।

जो लोग बापू जी को सुनते हैं, मानते हैं लेकिन दीक्षा नहीं ली है, उनसे मेरा अनुरोध है कि बापू जी से दीक्षा ले के साधना और सेवा के पथ पर आगे बढ़िये। आपका जीवन खुशियों से भर जायेगा।

रीना डोडवानी, मुंबई।

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ऋषि प्रसाद के अनमोल रत्न

कालसर्पयोग से मुक्ति के सरल उपाय

किसी पर कालसर्पयोग होता है तो बेचारा मुसीबतों में आ जाता है लेकिन जो मेरे शिष्य हैं उन्हें कालसर्पयोग की विदाई करने के लिए कोई पूजा-पाठ या लम्बा-चौड़ा विधि-विधान नहीं कराना है केवल 'कालसर्पयोग निवृत्ति अर्थे जपे विनियोगः।' ऐसा विनियोग करके अपने गुरुमंत्र की माला जपो और गुरु जी को देखो। 7 दिन रोज 11-11 माला जप करो। कालसर्पयोग कट जाता है।

पूज्य बापू जी, संदर्भः ऋषि प्रसाद, जून 2014

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जो शिष्य अपने गुरु की आज्ञा मानता है, वही अपनी स्थूल प्रकृति पर नियंत्रण पा सकता है।

नरक से निकाला ऋषि प्रसाद ने

पूज्य बापू जी की शरण में आने से पूर्व मेरा जीवन नारकीय था। मैं पूरी रात शराब पीता और सुबह 5 बजे सोने जाता, ऐसे कुसंग के कीचड़ में लथपथ था।

एक रात एक सेवाधारी ने मुझे कार्यालय में ऋषि प्रसाद लाकर दी। मैं शराब पीते-पीते ही उसे पढ़ने लगा। ऋषि प्रसाद पढ़ने से धीरे-धीरे मेरे विचार बदलने लगे। मैं पूज्य श्री का साहित्य पढ़ता, सत्संग देखता। पूज्य बापू जी की मधुर, हितकर अमृतवाणी व उनका अलौकिक, तेजस्वी आभामंडल मुझे अपनी ओर दिनों दिन खींचने लगा।

मैंने पूज्य बापू जी से गुरुमंत्र की दीक्षा ले ली। उस दिन से तो मेरा कायाकल्प ही हो गया। सारी गंदी आदतें छूट गयीं और जीवन ईमानदारी, सच्चरित्रता जैसे सदगुणों से भर गया। जिस कमरे में शराब पीता था, उसी कमरे को गंगाजल से शुद्ध करके मैंने उसमें 40 दिन का अनुष्ठान किया। मेरा छोटा सा व्यवसाय अब बापू जी की कृपा से पहले से बहुत अच्छा चल रहा है।

ऋषि प्रसाद की सेवा करके बापू जी के करकमलों से प्रसाद पाऊँगा और बापू जी से रूबरू मिलने का अवसर भी प्राप्त कर लूँगा – यह लालच मन में रखकर ऋषि प्रसाद की सेवा शुरु कर दी। परंतु गुरु दर्शन की लालसा और इस सेवा ने मुझे परमात्म-शांति की ओर मोड़ दिया। आज मैं केवल आत्मशांति के लिए ही सेवा कर रहा हूँ। जब भी प्रमादवश सेवा से मुँह मोड़ता हूँ तो अंतरात्मा में बापू जी की डाँट मिलती है और अशांति हो जाती है।

समयाभाव के कारण अब मैं घर-घर जा कर सदस्य नहीं बना पाता हूँ, अतः विद्यालय के विद्यार्थियों को उपहारस्वरूप निशुल्क सदस्य बनाकर ही सेवा करता हूँ। मुझे बहुत ही प्रसन्नता है कि सेवा के माध्यम से मेरे धन का सदुपयोग हो रहा है। मैंने वर्ष 2012 में 'घर-घर अलख जगाओ' अभियान के अंतर्गत कुल 11025 सदस्य बनाकर राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त किया।

ऋषि प्रसाद ने करोड़ों परिवारों तक सुखी, स्वस्थ, सम्मानित व प्रभु-प्रेम से परिपूर्ण दिव्य जीवन जीने के बापू जी के संदेश व कुंजियाँ पहुँचायी हैं। इस पत्रिका ने भारतीय संस्कृति के विरुद्ध चल रहे षड्यंत्रों का भी पर्दाफाश किया है। बापू जी से प्रार्थना है कि जब तक यह जीवन रहे, इसी प्रकार से यह सेवा करने का सौभाग्य मुझे मिलता रहे। परमात्मस्वरूप पूज्य बापू जी को मेरे कोटि-कोटि नमन !

उमेश शशिकांत कोठारी, कांदीवली (प.), मुंबई

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गुरु के आशीर्वाद का खजाना खोलने के लिए गुरुसेवा गुरुचाबी है।

ऋषि प्रसाद की सेवा से प्राणदान

संत आशाराम जी बापू अवतारी महापुरुष हैं। सन् 2011 में हार्ट-अटैक से मैं बहुत कमजोर हो गया था। शरीर की कमजोरी दिमाग पर भी असर कर गयी। डॉक्टर, वैद्य सभी ने हाथ खड़े कर दिये। मैंने मौत को कई बार बेहद करीब से महसूस किया। मैं ऋषि प्रसाद पत्रिका सेवाधारियों तक पहुँचाने की सेवा करता था। मुझे लगा अब यह सेवा छूट जायेगी। डॉक्टरों के बाद ज्योतिषियों ने भी कह दिया कि "तुम अल्पायु हो, 32 साल में मर जाओगे।" मैंने सोचा, 'मरने से पहले एक बार बापू जी तक पहुँच जाऊँ।'

रायपुर में गुरुपूनम महोत्सव पर बापू जी से मिलने हेतु मैं लाइन में खड़ा हुआ। परंतु बापू जी मुझ तक आते उसके पहले मेरे हाथ पैर सुन्न हो गये। मैं चिल्लायाः "बापू जी, बचा लो ! मैं कुछ समय का मेहमान हूँ।" इतना सुनते ही बिजली की फुर्ती से पूज्य श्री मेरे पास पहुँचे और मेरा कॉलर पकड़कर बोलेः "मेरे सेवाधारी को मेरी इजाजत के बिना मौत कैसे ले जा सकती है !"

मैंने कहाः "बापू जी ! ज्योतिषी कहते हैं कि तुम जल्दी मरोगे।" बापू जी ने अपने चरणों से कैंसल का चिन्ह बनाते हुए आदेशित स्वर में कहाः "मौत नहीं होगी, मैं कैंसल करता हूँ।"

बापू जी का इतना कहना था कि मेरे शरीर में नयी जान आ गयी फिर बापू जी ने 'संजीवनी गोली' मेरे मुँह में डाल दी। आज पूज्य बापू जी की कृपा से मैं जिंदा हूँ। पहले ठीक से चल फिर नहीं पाता था, अब दौड़ता हूँ। सचमुच, ब्रह्मज्ञानी महापुरुष कालों के काल, साक्षात् महाकाल हैं।

बी. आर. सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार

जिला पत्रकार संघ, राजनांदगाँव, (छ.ग.)

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प्राणशक्ति और ज्ञानशक्ति बढ़ाने के उपाय

भगवान को एकटक देखकर का जप करने से प्राणशक्ति और ज्ञानशक्ति दोनों निखरती हैं। ये दोनों शक्तियाँ जितने अंश में विकसित होती हैं, उतने अंश में जीवन सुख, सम्पदा, आयु, आरोग्य और पुष्टि से भर जाता है। ईश्वर, गुरु, कार का भ्रूमध्य में थोड़ी देर ध्यान एवं शास्त्र-अध्ययन करने से विचारशक्ति, बुद्धिशक्ति, प्राणशक्ति का खजाना खिलने लगता है। यह हमें सही सूझबूझ का धनी बना देता है।

पूज्य बापू जी, संदर्भः ऋषि प्रसाद, मार्च 2014

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संसार के सारे सुलगते सवालों का सही समाधानः 'ऋषि प्रसाद'

ऋषि प्रसाद ने ला दी घर में सुख-शांति

10 जुलाई 2012 को आवश्यक काम के लिए मुझे कहीं जाना था। मैं ऑटो रिक्शा में बैठा तो मुझे शराब की दुर्गंध आयी। मैं समझ गया कि ऑटो चालक ने शराब पी रखी है पर मैं उस तरफ ध्यान न देते हुए ऋषि प्रसाद पढ़ता रहा। गंतव्य स्थान पर पहुँचकर जब मैं पैसे देने लगा तो मेरे पास 5 रूपये छुट्टे नहीं थे। ऑटो चालक ने बोला किः "जो तुम्हारे पास पत्रिका है, वह दे दो।" मैंने उसको ऋषि प्रसाद पत्रिका का वह अंक दे दिया।

वह ऑटो वाला 20-21 दिन के बाद सुबह मुझे मिला तो वह मेरे पास आकर बोलाः "भाई साहब ! आपने जो पत्रिका आशाराम जी बापू वाली दी थी, मैंने वह जैसे ही पूरी पढ़ी वैसे ही मेरी शराब पीने की आदत छूट गयी। अब तो मेरा ऑटो भी कभी खाली नहीं रहता है। आज सुबह 8 बजे मैंने ऑटो चालू कर दिया था, अभी 10 बजे और 800 रुपये का धंधा हो गया है।"

मैं चकित रह गया। मैंने देखा कि ऋषि प्रसाद का जो अंक मैंने उसे दिया था, उसके रंगीन आवरण पृष्ठ वाली गुरुदेव की तस्वीर को उसने फ्रेम में लगाकर ऑटो रिक्शा में लगाया हुआ है। फिर उसने 501 रुपये मुझे दिये और बोला कि "मुझे यह पत्रिका हर महीने चाहिए। मैं 15 साल से ऑटो चलाता हूँ, मेरी दो बेटियाँ हैं। 18 तारीख से पहले मैं 10 रुपये भी घर में नहीं देता था लेकिन इस पत्रिका को पढ़ने के बाद हर रोज ऑटो खर्चा छोड़ के 1000 रुपये घर में देता हूँ और अब मैंने बैंक में खाता भी खोल लिया है। उसमें हर रोज 300-400 रुपये जमा कर रहा हूँ।" उसने मुझे अपनी पासबुक भी दिखायी।

यह गुरुदेव के सत्संग के प्रवचनों का ही प्रताप था, जिन्हें ऋषि प्रसाद पत्रिका में पढ़कर तथा उनके श्रीचित्र का दर्शन कर 15 दिन में शराबी आदमी का पूरा जीवन ही बदल गया।

सुनील गड़कर, अहमदनगर, महाराष्ट्र

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घर में आर्थिक कमी हो तो उसे दूर करने के लिए

गाय के दूध के दही में थोड़ा पिसा जौ और तिल मिला दें। फिर उससे रगड़-रगड़कर ' लक्ष्मीनारायणाय नमः।' जप करके स्नान करें। पूज्य बापू जी। संदर्भः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2014.

गुरु की आज्ञा का पालन सब कार्यों में सफलता की जननी है।

10 दिन की सेवा, 10 साल का मेवा

विश्ववंदनीय मेरी पूज्य गुरुमाउली के चरणकमलों में सादर सप्रेम नमन ! मैं प्राइवेट स्कूल में शिक्षक था। मेरा वेतन मात्र 2500 रुपये था। घर  का खर्च बड़ी परेशानी से चलता था। मेरी पत्नी ने ऋषि प्रसाद में कई अनुभव पढ़े थे कि ऋषि प्रसाद की सेवा करने से बड़े-बड़े संकट दूर हो जाते हैं। पूज्य बापू जी ने एक बार स्वयं अपने श्रीमुख से कहा था किः

ऋषि प्रसाद के दैवी कार्य में जो साधक लग जाते हैं।

होती उनकी सदा दीवाली, दुःख के पहाड़ हट जाते हैं।।

मेरी पत्नी ने अपने छोटे बच्चे को गोद में लिया और कुछ बहनों के साथ घर-घर जाकर लगातार 10 दिन तक ऋषि प्रसाद का अभियान किया। 10 दिन में उसने 350 सदस्य बनाये।

गुरुपूनम दर्शन के निमित्त हम आलंदी (पूना) गये थे। जब लौटे तो दरवाजे पर ही मेरा प्रमोशन लैटर मिला। 25-7-2010 को गुरुपूनम के दिन ही मेरा इंटरव्यू हुआ और उसी समय चयन हो गया। आज मैं कोपरगाँव में कालेज में प्रोफेसर हूँ और मेरा वेतन 25000 रुपये हो गया है।

रक्षाबंधन पर मेरी पत्नी मायके चली गयी थी। रात को चोर ताला तोड़कर घर में घुस गये और अलमारी खोलकर देखी। सब सामान बाहर फेंक दिया मगर उनको सोना न मिला, न पैसा जबकि ऊपर ही बैग में आभूषण, कीमती साड़ियाँ और कम्पयूटर आदि लगभग डेढ़ लाख रुपये का सामान रखा था।

सुखी जीवन के इच्छुक सभी भाइयों से मेरा हाथ जोड़कर निवेदन है कि वे ऋषि प्रसाद के दैवी कार्य में लग जायें, जिससे उनका भी जीवन खुशियों से भर जाय और सबका मंगल हो। कर भला सो हो भला। मैं और मेरी पत्नी ऋषि प्रसाद के सेवाधारी हैं। हमने 2700 सदस्य बनाने का संकल्प लिया था, वह भी गुरुकृपा से पूरा हो गया है।

मदन महादेव मुंडे, कोपरगाँव, जि. अहमदनगर (महाराष्ट्र)

तिल सेंककर गुड़ व घी मिला के लड्डू बना लें। एक लड्डू सुबह चबाकर खाने से मस्तिष्क व शरीर की दुर्बलता दूर होती है। संदर्भः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2013

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संत की सेवा, ऋषि प्रसाद की सेवा करने वालों को गुरु, भगवान अपने ढंग की प्रसादी देते हैं।

पूज्य बापू जी की तस्वीर ने तकदीर बदल दी

मेरी शादी को दस साल हो गये, मुझे कोई संतान नहीं थी। बहुत दवा करवायी, जगह-जगह जा के दुआएँ लीं, भगवान की प्रार्थना-पर-प्रार्थना की, मन्नतें माँगीं, प्रेयरें की लेकिन मेरी कोख खाली ही रही। एक दिन मैं उल्हासनगर आश्रम में गयी। वहाँ ऋषि प्रसाद कार्यालय में मैंने पूज्य बापू जी की काफी बड़ी एवं मनमोहक तस्वीर देखी। तस्वीर देखते ही पता नहीं कैसे मेरे मन में एक नयी उमंग जगी। "मुझे यह तस्वीर चाहिए"- ऐसा मैंने वहाँ खड़े एक साधक भाई से कहा तो उन्होंने कहाः "मैं कार्यालय वालों से प्रार्थना करके यह तस्वीर रूपी प्रसाद आपको दिला दूँगा लेकिन पहले आप भी मेरी तरह ऋषि प्रसाद रूपी प्रसाद घर-घर पहुँचाकर समाज की सेवा करने का कुछ तो संकल्प लीजिये !"

मैंने तुरंत उन साधक भाई के सामने संकल्प लिया कि "मैं दो सौ घरों तक यह प्रसाद पहुँचाऊँगी।"

पूज्य बापू जी की कृपा से मैंने केवल एक ही महीने में दो सौ सदस्य बना लिये और मुझे पूज्य बापू जी की तस्वीर मिल गयी। ऋषि प्रसाद की सेवा करने से मुझे संतान की प्राप्ति हुई। धन्य हैं हम ऐसे गुरुदेव को पाकर जिनकी तस्वीर पाने की लालसा में ऋषि प्रसाद की सेवा की तो बापू जी की तस्वीर ने हमारी तकदीर बदल दी ! उसके बाद मैंने ऋषि प्रसाद सेवा मंडल चलाने की तथा ऋषि दर्शन के सदस्य बनाने की सेवा खोज ली और अभी मेरे साथ 40 पुण्यात्मा ऋषि प्रसाद की पावन सेवा में संलग्न हैं। इस सेवा से जीवन में निष्कामता के रस का भी अनुभव होने लगा है।

पूज्य बापू जी की इस अहैतुकी कृपा के लिए मैं सदैव ऋणी हूँ। मेरे अनुभव को जानकर हमारे एक परिचित, जो बापू जी को पहले नहीं मानते थे, वे भी कहने लगेः वाह ! वाह !!

मेरी सभी सज्जनों से विनम्र प्रार्थना है कि आप दो सौ परिवारों को नहीं तो कम-से-कम अपने रिश्तेदारों एवं परिचितों को तो ऋषियों के इस प्रसाद का लाभ दिलाइये, घर बैठे उन्हें ऐसे महान ऋषि का दर्शन कराइये तो आप पर भी गुरुकृपा बरसेगी इसमें कोई संदेह नहीं।

किरण तिवारी, अम्बरनाथ, जि. ठाणे (महा.)

दमे में प्रतिदिन खाली पेट 1-2 ग्राम दालचीनी का चूर्ण गुड़ या शहद मिलाकर गरम पानी के साथ लेना हितकारी है। संदर्भः ऋषि प्रसाद, मार्च 2014

गुरु की कृपा अखूट, असीम और अवर्णनीय है।

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तुलसी माला बनी रक्षाकवच

हम पति-पत्नी दोनों ने पूज्य बापू जी से मंत्र दीक्षा ली है। एक बार मैं गोरेगाँव (मुंबई) आश्रम में बड़दादा की परिक्रमा कर रही थी। वहाँ एक भाई पूछ रहे थे कि "कौन-कौन ऋषि प्रसाद की सेवा करने के इच्छुक हैं ?" मुझे किसी अदृश्य शक्ति ने प्रेरणा दी कि 'तू हाँ कर दे।' मैंने भी सौ सदस्य बनाने का संकल्प किया। संकल्प पूरा होने पर मुझे गुरुदेव के प्रसादरूप में तुलसी की माला मिली। घर आने पर माला देखते ही मेरे पतिदेव बोले, "मुझे लगता है बापू जी ने यह माला मेरे लिए ही दी है।" मैंने वह माला उनको दे दी। अगले दिन वे स्कूटर से ऑफिस जा रहे थे। अचानक सामने से तेल का एक टैंकर अनियंत्रित दशा में आता नज़र आया। उनका स्कूटर नियंत्रण के बाहर हो गया और वे टैंकर से टकराकर गिर गये। उनका हाथ उस तुलसी की माला पर गया। वे प्रार्थना करने लगे, 'हे प्रभु ! यह क्या हो रहा है ? मेरी रक्षा करो।' उसी क्षण पूज्य बापू जी सामने प्रकट हो उन्हें सड़क के किनारे करके अदृश्य हो गये। आसपास खड़े लोगों ने देखते ही कहा, 'यह तो गया !' पतिदेव के कपड़े पैट्रोल में भरकर गीले हो गये और फट गये किंतु शरीर पर एक भी चोट नहीं थी। पूज्य बापू जी कृपा से मेरे पतिदेव के प्राणों की रक्षा हुई, और वे बाल-बाल बचे।

तब से मैंने निश्चय कर लिया कि जिस सेवा से मेरे पतिदेव की रक्षा हुई, वह सेवा और ज्यादा करूँगी और लोगों तक पूज्य बापू जी का कृपा प्रसाद यह ऋषि प्रसाद पत्रिका पहुँचाऊँगी।

रुचि सिंह, कोलाबा, नेवी नगर, मुंबई

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सुरभि सुवास सत्कर्मों की सारे जग में छायी है

सुरभि सुवास सत्कर्मों की सारे जग में छायी है।

गुरुज्ञान की पावन गंगा मेरे घर तक आयी है।।

ऋषि प्रसाद को पाकर पढ़कर सबका मन हरषाया है।

घर बैठे ही हम दीनों को मोहनिशा से जगाया है।।

काली दुष्ट कालिमा कलि की देख रवि को है भागी।

बापू जी की आप्तवाणी सुन सोई स्मृति अब जागी।।

ऋषि प्रसाद की छवि देख-देख नयनों में सुरुर छा जाता है।

इसका हर वचनामृत घूँट जन-जन की प्यास बुझाता है।।

अति बड़भागी ऋषि प्रसाद सेवाधारी जो सेवा में सर्वस्व लुटाये हैं।

फल की कोई चाह नहीं है, उस प्रियतम से प्रीत लगाये हैं।।

ऋषि प्रसाद के दैवी कार्य में आओ हम सब जुट जायें।

गुरु-ज्ञान घर-घर पहुँचाकर मानव-जीवन सफल बनायें।

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जीवन में आरोग्य के साम्राज्य का सर्जन करने वाली पत्रिका है ऋषि प्रसाद

'ऋषि प्रसाद' की सेवा का फल

मैं पिछले छः महीने से बीमारी के कारण बहुत परेशान था। क्योंकि मलद्वार से रक्तस्राव के कारण शरीर में कमजोरी आ गयी थी। मैंने कई अंग्रेजी व आयुर्वेदिक दवाइयाँ लीं पर कोई लाभ नहीं हुआ।

एक दिन आश्रम के एक भाई ने कहा कि आप ऋषि प्रसाद की सेवा में जुट जाइये। मुझे याद आया कि बापू जी भी कहते हैं कि "जो दूसरों की सेवा में लग जाते हैं उनके अपने दुःख टिकते नहीं।" मैंने भी दुःखियों के दुःख रोगियों के रोग, शोकग्रस्तों के शोक, चिंतितों की चिंता दूर करने वाली, भक्तों की भक्ति तथा जिज्ञासुओं का ज्ञान बढ़ाने वाली, आत्मा-परमात्मा को छूकर आने वाली गुरुदेव की अमृतवाणी को अपने में समाने वाली ऋषि प्रसाद के 100 सदस्य बनाने का संकल्प ले लिया और सेवा में जुट गया। आश्रम जाकर बड़दादा की 21 परिक्रमा की और पूज्य बापू जी से प्रार्थना की। 50 सदस्य ही बने थे कि मेरी बीमारी अपने-आप ठीक हो गयी। यह चमत्कार ऋषि प्रसाद की सेवा के कारण ही हुआ है।

अब मैं अपने सम्पर्क में आने वाले बच्चों को दिव्य प्रेरणा प्रकाश तथा ऋषि प्रसाद पढ़ने को देता हूँ ताकि वे भी तन-मन के रोगों से बचें और भवरोग से छूट जायें। क्योंकि मेरे बापू जी की शरण में जो आते हैं....

उनका योग क्षेम वे रखते, वे न तीन तापों से तपते।।

धर्म कामार्थ मोक्ष वे पाते, आप रोगों से बच जाते।

ओम प्रकाश चौहान, बिलाड़ा, जि. जोधपुर (राज.)

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खुशी और आत्मबल का खजाना 'ऋषि प्रसाद'

जबसे ऋषि प्रसाद बाँटने की सेवा शुरु की तबसे खुशी बढ़ने लगी, आत्मबल जगने लगा, हिम्मत बढ़ गयी और सदगुण आने लगे। ऋषि प्रसाद बाँटूँ नहीं तब तक मुझे चैन नहीं पड़ता।

थानाराम, नयी बस्ती, जि. जोधपुर (राज.)

ऋषि प्रसाद पढ़ने से अनेक लोगों के गुटखा, सिगरेट, शराब आदि व्यसन तथा मांसाहार आदि बुरे खानपान छूट गये और घर-घर खुशहाली छा रही है। जो काम व्यसनमुक्ति के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने से नहीं होता वह बापू जी की दुआ पलभर में कर देती है। आज ऋषि प्रसाद पढ़कर बापू जी से दीक्षा व संकल्प ले के लाखों-लाखों व्यसनी व्यसनमुक्त हो गये हैं। ऋषि प्रसाद बाँटने की सेवा से हमें सुंदर समाज के निर्माण का संतोष मिल रहा है।

प्रेमानंद सिंह व मिथिलेश कुमार, पटना (बिहार)

प्रेम और नम्रता के साथ सेवा करोगे तो उन्नति करोगे।

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ऋषि प्रसाद की सेवा से.....

मैं पहले एक छोटी सी कंपनी में काम करता था, कुछ समय बाद पार्टनरशिप में एक फर्म खोली जिसमें बहुत घाटा हुआ। आर्थिक स्थिति इतनी खराब हुई कि मकान का किराया देने तक के पैसे नहीं थे। मैं बहुत चिंतित व परेशान रहता था।

एक साधक भाई मुझे पूज्य बापू जी के सत्संग में ले गये। सत्संग सुनने से ऐसा आनंद आया कि सारी चिंताएँ दूर हो गयीं। 'भगवन्नाम ही जीव का एकमात्र सहारा है, रक्षक है।' यह सोचकर मैंने बापू जी से दीक्षा ले ली और मंत्रजप करने लगा। साझेदारी का व्यवसाय छोड़कर निजी व्यवसाय शुरु किया। धीरे-धीरे काम मिलने लगा, स्थिति सुधरने लगी। एक गुरुभाई ने कहा कि "यदि तुम सुखमय जीवन जीना चाहते हो तो ऋषि प्रसाद की सेवा में लग जाओ।" मैंने तुरंत संकल्प लिया और सेवा में जुट गया। उसके बाद मेरे जीवन में उन्नति ही उन्नति होती गयी।

मेरी आर्थिक अवदशा पूर्णतया दूर हो गयी। शादी के 10 साल बाद भी मुझे कोई संतान नहीं थी। मेरी पत्नी ने ऋषि प्रसाद की सदस्य बनाने शुरु किये, जिसके प्रभाव से उसने एक बालिका को जन्म दिया।

पूज्य बापू जी की कृपा से आज मेरे पास सब कुछ है। अभी मैं ऋषि प्रसाद सेवा मंडल चलाता हूँ और खुद को बड़भागी मानता हूँ कि ऋषि प्रसाद तथा ऋषि दर्शन के द्वारा लोगों तक बापू जी का सत्संग पहुँचाने की सेवा करने का सौभाग्य मुझे मिल रहा है। मुझे बड़ा
आनंद आता है जब लोगों को पूज्य बापू जी की महिमा सुनाता हूँ। ब्रह्मस्वरूप पूज्य सदगुरुदेव भगवान के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन
!

कृष्णानंद तिवारी, अम्बरनाथ, जि. ठाणे (महा.)

किसकी मजाल है कि गुरुसेवा में बाधा बन सके ?

पाँच साल पहले मुझे ऋषि प्रसाद पत्रिका बाँटने की सेवा का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैं 70 वर्ष का सेवानिवृत्त कर्मचारी हूँ और आँखों की रोशनी कम होने के कारण मुझे नजदीक से दिखायी भी नहीं देता। लेकिन बापू जी की कृपा से मैं सुबह नित्यकर्म करके साइकिल लेकर यह संकल्प लेकर निकलता था कि पाँच-छः सदस्य बनाकर ही नाश्ता करूँगा और गुरुकृपा से दोपहर तक लक्ष्य पूरा करके ही लौटता था। मेरे सेवाधारी भाई-बहनों ! आयु व स्वास्थ्य की क्या मजाल कि वह गुरुसेवा के दैवी कार्य में बाधा बन सके ?

राममूर्ति शर्मा, संगरूर (पंजाब)

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गुरुकृपा के परिणाम अदभुत होते हैं।

14 वर्ष का मिटा विषाद, बाँटा जब 'ऋषि प्रसाद

मैंने 1996 में पूज्य बापू जी से मंत्रदीक्षा ली थी। मेरी उम्र 65 साल है। मुझे एक साधिका बहन ने ऋषि प्रसाद की सेवा के लिए प्रेरित किया और मैं सेवा करने लगी।

फरवरी 2010 में नागपुर के सत्संग-कार्यक्रम में जब पूज्य बापू जी का आगमन हुआ था, तब मैंने उनके समक्ष मन-ही-मन प्रार्थना की थी कि 'हे गुरुदेव ! मेरे बेटे की शादी को 14 साल हो गये पर उसे अभी तक कोई संतान नहीं है। प्रभु ! मेरी बहू की गोद भर दो।' और मैंने भक्तवत्सल, करुणासिंधु, सर्वसमर्थ पूज्य बापू जी के सामने संकल्प लिया कि मैं 'ऋषि प्रसाद के एक हजार एक सौ एक सदस्य बनाकर इस आध्यात्मिक पत्रिका को लोगों तक पहुँचाऊँगी।'

ऐसा निश्चय करके मैंने सदस्य  बनाने शुरु किये। अभी 300 सदस्य ही बने थे कि पूज्य बापू जी की कृपा से ऋषि प्रसाद की सेवा का फल, प्रसादस्वरूप मेरे घर में एक कन्या ने जन्म लिया। संकल्प पूरा होने के पहले ही प्रसाद से झोली भर दी। कुछ समय बाद उसे बापू जी के दर्शन कराने ले गये तो बापू जी ने उसका नाम 'वैभव' रखा। मैंने सत्संग में सुना था कि पानी तो भगवान की सम्पदा है पर गन्ने का रस भगवान का वैभव है। ऐसे ही ऋषि प्रसाद और उससे प्राप्त होने वाला कृपा-प्रसाद तो गुरुवर की सम्पदा और वैभव है।

कितने महिमावंत हैं मेरे बापू जी जिनकी अमृतवाणी पर आधारित पत्रिका को लोगों तक पहुँचाने से 14 साल से सूनी गोद खुशियों से भर गयी !

उन बापू जी के श्रीचरणों में मेरी यही  प्रार्थना है कि 'अब मेरे हृदय में भगवत्प्राप्ति के अलावा कोई माँग न रहे।'

श्रीमती विमल दुमणवार, वणी, जि. यवतमाल (महा.)

सुदृढ़ अचल संकल्पशक्ति के आगे मुसीबतें इस प्रकार भागती हैं से आँधी तूफान से बादल बिखर जाते हैं।

हम यदि निर्भय होंगे तो शेर को भी जीतकर उसे पाल सकेंगे। यदि डरेंगे तो कुत्ते भी हमें फाड़ खायेंगे। संदर्भः ऋषि प्रसाद, मई 2014

बलवर्धक प्रयोगः सफेद तिल भिगोकर पीस लें। फिर छान के उनका दूध बना लें। 50 से 100 ग्राम इस दूध में 25 से 50 ग्राम पुराना गुड़ मिलाकर नियमित लेने व 12 सूर्यनमस्कार करने से शरीर बलवान होता है। संदर्भः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2013

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जन-जन को सुख-शांति पहुँचाने वाली शांतिदूत है 'ऋषि प्रसाद'

सफलता की ओर सतत अग्रसर 'ऋषि प्रसाद'

आप सबकी चहेती ऋषि प्रसाद पत्रिका ने अपना जनकल्याणकारी सफर सन् 1990 से प्रारम्भ किया था और वर्तमान में यह गौरवपूर्ण सफर सफलतापूर्वक जारी है। श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष परम पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू एवं अन्य महापुरुषों की अनुभवसम्पन्न वाणी को आप तक पहुँचाने वाली इस पावन पत्रिका को आप लोगों ने अत्यंत आदर-सम्मान देते हुए खूब प्रेम से पढ़ा और अनेक लोगों ने इसमें व्यक्त विचारों को अपने आचरण में उतारकर अपना जीवन धन्य किया है यह हमारे लिए गर्व की बात है।

अनेक परोपकारी पुण्यात्मा भक्तों ने इस पत्रिका में दिये भक्तियोग व ज्ञानयोग के साथ निष्काम कर्मयोग से भी लाभान्वित होने हेतु घर-घर ऋषि प्रसाद पहुँचाने की सेवा खोज ली और गीता ज्ञान को, गुरु ज्ञान को समाज के कोने-कोने तक फैलाने का श्रेय प्राप्त किया है।

हमें इस बात का अत्यधिक आनंद है कि हम इस पत्रिका के द्वारा प्रातःस्मरणीय परम पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू के प्रवचनों के माध्यम से भारतीय संस्कृति के गीता, रामायण, भागवत एवं उपनिषदों के सार अमृत को तथा संतों-महापुरुषों की वाणी को अत्यंत सरल तथा बोधगम्य भाषा में देश-विदेश के पाठकों तक पहुँचाने में कल्पनातीत सफलता पा रहे हैं। वर्षों पहले अंकुरित हुआ ऋषि प्रसाद रूपी यह पौधा बहुत ही तीव्र गति से विकसित होते हुए आज एक विशाल वटवृक्ष के रूप में समाज के सभी वर्गों, सभी जातियों के त्रिविध तापों से तप्त असंख्य दिलों को समान भाव से शीतलता प्रदान कर रहा है। देश के सभी भागों के विभिन्न भाषियों को लाभान्वित करने हेतु आपकी प्रिय पत्रिका आज हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी, उड़िया, कन्नड़, तेलुगू, सिंधी, सिंधी (देवनागरी) व बंगाली इन दस भाषाओं में प्रकाशित हो रही है तथा प्रेमी पाठकों की माँग के अनुसार भविष्य में कुछ और भाषाओं में इसके  प्रकाशित होने की सम्भावना है।

आत्मज्ञानी महापुरुषों के पावन प्रसाद को ऋषि प्रसाद पत्रिका के माध्यम से बाँटने में जो भी साझीदार हो रहे हैं, उन सभी भक्तों तथा नामी-अनामी सज्जनों को भगवान और अधिक उत्साह दें तथा वे दीर्घायु हों। साहस, सच्चाई और स्नेह से वे भविष्य में भी इस दैवी कार्य में तत्परता से लगे रहें। ऋषि प्रसाद पत्रिका भविष्य में भी आप सबके जीवन को भगवत्प्रसाद, भगवन्माधुर्य से संतृप्त करती रहे, ऐसा हमारा सतत प्रयत्न रहेगा।

विनोद- ऋषि प्रसाद परिवार

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लोगों को भगवान और संत वाणी से जोड़ना यह अपने-आप में बड़ी भारी सेवा है।

सुप्रचार करते मेरे प्यारे साधक

पूज्य बापू जी

तीरथ नहाये एक फल, संत मिले फल चार।

सदगुरु मिले अनंत फल, कहत कबीर विचार।।

महापुरुष का संदेशा देकर कई पतित आत्माओं को पुण्यात्मा बनाते-बनाते निंदा भी हो गयी तो क्या है ! वैसे ही एक दिन सब कुछ चले जाने वाला है।

जिसका कर्मयोग सफल हो गया तो भक्ति तो उसके घर की ही चीज है, ज्ञान तो उसका स्वाभाविक हो गया, देह का अभिमान तो चला ही गया। आद्य शंकराचार्य भगवान कहते हैं-

देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि। यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः।।

'देहाभिमाने गलिते' जिसका देह का अध्यास गलित हो गया, 'विज्ञाते परमात्मनि' शरीर को मैं मानने का अध्यास चला गया तो उसने परमात्मा-आत्मा को 'मैं' जान लिया न ! 'यत्र यत्र मनो याति' उसका तो जहाँ-जहाँ मन जायेगा, 'तत्र तत्र समाधयः', उसे समाधान मिलेगा, संतोष मिलेगा कि संसार स्वप्न है, उसको जानने वाला सत्-चित्-आनंद मेरा अपना स्वभाव है।

यह बात तो शिवजी ने भी पार्वती को कहीः

उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब अपना।।

(श्री रामचरित. अर. कां. 38.6)

अगर स्वप्न जैसे संसार में स्वप्न जैसे शरीर से भगवान और समाज को जोड़ते-जोड़ते हमारा पैसा जला जाय या अहं चला जाय तो भी सौदा सस्ता है।

महात्मा बुद्ध के लिए दुष्ट लोगों ने कितनी साजिशें गढ़ीं, कितना कुप्रचार किया ! बुद्ध के जो लल्लू पंजू सेवक थे वे तो भाग गये लेकिन ऐसे भी सेवक रहे कि 'भंते ! मैं जाऊँगा आपका संदेश ले के।' कोई चीन पहुँचा तो कोई जापान पहुँचा तो कोई हिन्दुस्तान घूमा। हमारे पास भी ऐसे पुण्यात्मा हैं। जैसे बुद्ध के पास भिक्षुक थे ऐसे हमारे पास ऋषि प्रसाद और ऋषि दर्शन के पुण्यात्मा है, इनकी सदस्यता बढ़ती जायेगी।

संत और संत के सेवकों को सताने वालों को प्रकृति अपने ढंग से यातना देती है और संत की सेवा, समाज की सेवा करने वाले ऋषि प्रसाद वालों को गुरु और भगवान अपने ढंग की प्रसादी देते हैं।

वाहवाही व चाटुकारी के लिए तो कोई भी सेवा कर लेता है। रोटी का टुकड़ा देखकर तो कुत्ता भी पूँछ हिला देता है लेकिन मान-अपमान, गर्मी-ठंडी, आँधी तूफान सहकर तो सदगुरु के पुण्यात्मा शिष्य ही सेवा कर पाते हैं।

ऋषि प्रसाद और ऋषि दर्शन के सदस्य बनाने वाले मेरे साधक-साधिकाएँ दृढ़ संकल्पवान, दृढ़ निष्ठावान हैं। जैसे बापू अपने गुरुकार्य में दृढ़ रहे ऐसे ही बापू के बच्चे, नहीं रहते कच्चे।

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गुरुभक्त के लिए प्रकृति भी अनुकूल हो जाती है !

भाग्य के बंद द्वार खुल गये

मेरी शादी हुए 13 साल हो चुके थे पर संतान नहीं थी। एक दिन मैं पूज्य बापू जी के गोरेगाँव स्थित आश्रम में गया। वहाँ ऋषि प्रसाद कार्यालय से सेवा का मार्गदर्शन पाया। उसके बाद प्रतिमाह ऋषि प्रसाद पत्रिका के कम-से-कम 75 सदस्य बनाने का संकल्प लिया। नौ माह बाद मुझे एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। स्वयं बापू जी ने मेरे बेटे का नाम जगदीश रखा। इसे मैं स्पष्ट रूप से गुरु सेवा के संकल्प का परिणाम ही कहूँगा।

किन्हीं महापुरुष ने सच ही कहा है कि 'गुरु सेवा भाग्य के बंद दरवाजों को खोल देती है।' बापू जी की कृपा से अब तक मैंने 1500 सदस्य बना लिये हैं। जब तक यह जीवन रहेगा, तब तक मैं यह सेवा करता रहूँगा।

ऋषि प्रसाद व ऋषि दर्शन के द्वारा घर बैठे संतों का वह सत्संग-ज्ञान व जीवन जीने की युक्तियाँ मिलती हैं, जिन्हें हम संसार की किसी भी दौलत या परिश्रम से प्राप्त नहीं कर सकते। ऋषि प्रसाद का हर पाठक कुछ नहीं तो अपने सम्पर्क में आने वाले पड़ोसी, रिश्तेदार, गाँव वाले को इसका सदस्य बनाकर सेवा में सहभागी बने। आपके पास अगर समय का अभाव हो तो इन्हें उपहार स्वरूप देकर भी आप इतनी सेवा कर सकते हैं। मिठाई, कपड़े या अन्य कोई नश्वर वस्तु उपहार में देने से लाख गुना अच्छा होगा कि बापू जी के सत्संग रूपी कुंजी ऋषि प्रसाद व ऋषि दर्शन उन्हें दें ताकि उनका भी भाग्य खुल जाय।

जगदीप खन्ना, सांताक्रुज, मुंबई

गाय की सेवा करने से सब कामनाएँ सिद्ध होती हैं। गाय को सहलाने से, उसकी पीठ आदि पर हाथ फेरने से वह प्रसन्न होती है। उसके प्रसन्न होने पर असाध्य रोगों में लगभग 6 से 12 महीने तक प्रयोग करना चाहिए।

मरणासन्न व्यक्ति के सिरहाने गीता जी रखें। दाह-संस्कार के समय उस ग्रंथ को गंगा जी में बहा दें, जलाये नहीं। मृतक के अग्नि-संस्कार की शुरुआत तुलसी की लकड़ियों से करें, अथवा उसके शरीर पर थोड़ी सी तुलसी की लकड़ियाँ बिछा दें,  इससे दुर्गति से रक्षा होती है।।

संदर्भः ऋषि प्रसाद, मई 2013

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जो संतों के दैवी कार्य में भागीदार होते हैं वे ईश्वर के वैभव में भी भागीदार हो जाते हैं।

ऋषि प्रसाद की सेवा है मेरा जीवन !

मुझे सन् 2001 में पूज्य बापू जी से मंत्रदीक्षा लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ। मैं मानता हूँ कि बापू जी किसी मजहब-पंथ-समुदाय विशेष के नहीं हैं अपितु सभी के प्यारे, लोकलाड़ले संत, औलिया, फकीर हैं, जिनसे आज केवल हिन्दू ही नहीं अपितु समाज का हर वर्ग लाभ उठा रहा है। पूज्य बापू जी की शरण में आने के बाद मुझे ऐसा लगता ह  जैसे साक्षात् परब्रह्म परमात्मा ही मुझे सदगुरु के रूप में मिल गये हों। दीक्षा से मेरे जीवन में बहुत परिवर्तन आये हैं। मेरे कठिन-से-कठिन कार्य आसान हो जाते हैं।

दीक्षा के पहले मैंने संकल्प लिया कि मैं ऋषि प्रसाद के 108 सदस्य बनाकर बापू जी के श्रीचरणों में अपनी सेवा के सुमन गुरु दक्षिणा के रूप में अर्पित करूँगा।' संकल्प पूर्ण होने पर अंतर में बहुत ही शांति, शीतलता का अनुभव हुआ तो मैंने 1008 सदस्य बनाने का संकल्प किया। इसके पूरा होने के बाद मैंने निश्चय किया कि जिस पत्रिका ने करोड़ों-करोड़ों व्यक्तियों के जीवन में समता-सूझबूझ देकर व और भी न जाने किस-किस ढंग से परिवर्तन लाकर उन्हें एक नयी दिशा दी है, मैं उस ऋषि प्रसाद का रोज 1 सदस्य बनाने की सेवा आजीवन करता रहूँगा। गुरु पूर्णिमा 2011 से तो मैंने रोज 2 सदस्य बनाने  का संकल्प ले लिया। अब तक कुल 7000 सदस्य बनाने की सेवा का सौभाग्य प्राप्त किया है।

पूज्य बापू जी ने मुझे मौत के मुँह में से दो बार बाहर निकाला। एक दिन घर से दुकान जाने के लिए तैयार हुआ तो मुझे ठोकर लगी, जिसे बापू जी का संकेत समझकर मैं रुक गया। जब दुबारा फिर जाने को तैयार हुआ तो फिर ऐसा ही हुआ। इस प्रकार पूज्य बापू जी की प्रेरणा से उस दिन मैं दुकान नहीं जा पाया। बाद में मालूम हुआ कि जिस रेलगाड़ी से मैं जाने वाला था उसमें बम ब्लास्टिंग हो गयी और बहुत लोगों की जान गयी। पूज्य बापू जी ने मुझे अनहोनी से बचा लिया।

ऋषि प्रसाद के पाठकों से मेरा निवेदन है कि आप भी प्रतिदिन एक सदस्य नहीं तो माह में 25 सदस्य बनाने की सेवा का संकल्प कर ऋषि प्रसाद की पत्रिका जन-जन तक पहुँचाने का महान दैवी कार्य अवश्य करें।

धनपाल भँवरलाल जैन, जोगेश्वरी, मुंबई

अच्छी नींद लाने तथा खर्राटे बंद करने के लिएः रात को गाय का घी हलका-सा गरम करके 1 से 4 बूँदें दोनों नथुनों में डालें।

संदर्भः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2013

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गुरु और शिष्य के बीच का मजबूत पुल है ऋषि प्रसाद

ऋषि प्रसाद की सेवा और गुरु कृपा का चमत्कार

किसी ने मेरे पति पर हमला किया और उन्हें अधमरा करके सड़क पर फेंक दिया। अस्पताल ले गये तो डॉक्टर ने बताया कि "बाजू, पैर व जबड़े में फ्रैक्चर हैं।" कंधे व पैर का तो ऑपरेशन हो गया पर जब तीसरा ऑपरेशन किया तो उनकी हालत इतनी गम्भीर हो गयी कि उन्हें साँस लेने में तकलीफ होने लगी। डॉक्टरों ने वेंटीलेटर लगा दिया।

मेरे गले में पूज्य बापू जी की स्पर्श की हुई तुलसी माला थी, जो पिछले वर्ष ऋषि प्रसाद पत्रिका की सेवा में मुझे पूज्य बापू जी के पावन करकमलों से प्राप्त हुई थी। मेरी बहन ने वह माला मेरे पति को स्पर्श कराने के लिए मुझसे ले ली और जब वह अंदर गयी तो देखा कि मेरे पति लगभग प्राणहीन हो चुके थे। फिर भी उसने गुरुदेव का ध्यान करके वह माला उनके माथे पर स्पर्श करायी और बापू जी से प्रार्थना कीः 'अब आप ही इन प्राणों को  वापस ला सकते हैं।' आँखों में आँसू लेकर वह वापस आयी और बोलीः "उनमें कुछ नहीं  बचा है, अब बापू जी ही कुछ कर सकते हैं।" मुझे गुरुदेव पर विश्वास था, मैं हिम्मत नहीं हारी। मैंने सब रिश्तेदारों को 'श्री आशारामायण' का पाठ करने के लिए कहा और मैंने भी पाठ आरम्भ कर दिया। अभी चौथा ही पाठ चल रहा था कि तभी डॉक्टर ने फिर से बहन को अंदर बुलाया तो मेरे पति सजग होकर बोलने लगे।

धन्य हैं मेरे गुरुदेव जिन्होंने मेरे  पति के प्राण वापस ला दिये ! ऐसे गुरुदेव के उपकारों का बदला हम कभी नहीं चुका सकते हैं।

श्रीमती दर्शना शर्मा, अम्बाला (हरि.)

यश दिलाने वाली ऋषि प्रसाद

मेरे विद्यालय के ग्रामीण परिवेश के चार छात्र जो गत सत्र में ऋषि प्रसाद के सदस्य बने, वे चारों इस पत्रिका से मिलने वाली उद्यम व पुरुषार्थ की प्रेरणा के कारण राजस्थान बोर्ड की 12वीं कक्षा की परीक्षा में उत्तम अंक प्राप्त कर यशस्वी हुए और अन्य छात्रों के लिए प्रेरणास्रोत बने।

लक्ष्मण सिंह पँवार, प्रधानाचार्य, लोटीयाना, जि. अजमेर (राज.)

उच्च रक्तचाप में- रात को गुनगुने पानी में 5 से 15 ग्राम मेथीदाना भिगा दें, सुबह छान के पानी पी लें। गाजर, सेब, केला, अमरूद, अनार, पालक आदि खायें तथा कच्ची दूधी (लौकी) का 15 से मि.ली. रस पियें।

संदर्भः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2013

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सच्चा सेवक तो सेवा को इतना महत्त्व देगा कि सेवा के रस से वह तृप्त रहेगा।

...कोई दिव्य शक्ति हमारे साथ है

सन् 1985 में मेरी पत्नी ने पूज्य बापू जी से दीक्षा ली थी। दीक्षा लेते समय उसने सोचा कि 'मेरे पति तो बापू जी को नहीं मानते।' अंतर्यामी बापू जी ने उस पर कृपापूर्ण नज़र डालते हुए कहाः "तू तो क्या तेरा पता (पति) भी मानने लग जायेगा और वह तो ऐसा लगेगा कि देखती रहना।"

थोड़े दिनों के बाद उनकी कृपा से मुझे भी भक्ति का रंग लगने लगा और मैंने भी दीक्षा ले ली। पूज्य बापू जी श्रीवचन अक्षरशः सत्य हुए।

पहले मेरे पास एक छोटी सी पान की दुकान थी और किराये के घर में रहता था। जब से मैं बापू जी के श्रीचरणों में आया और ऋषि प्रसाद पत्रिका के वितरण की सेवा करने लगा, तब से दिन दूनी, रात चौगुनी सुख-शांति, समृद्धि बढ़ रही है। मैं बहुत सुखी व आनंदित हूँ। जहाँ कोई भी उम्मीद नहीं होती, वहाँ भी सफलता मिल जाती है। गुरुकृपा से लौकिक लाभों के साथ मुझे अनेकों अलौकिक लाभ भी हुए हैं। हम 16 लोगों ने लगभग 15000 सदस्य बनाये और हमें पूज्य बापू जी के करकमलों द्वारा स्वर्ण पदक प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। अभी भी मैं ऋषि प्रसाद पत्रिका बाँटने की सेवा करता हूँ। सेवा के दौरान हम लोगों को महसूस होता है कि कोई दिव्य शक्ति हमारे साथ है।

ऋषि प्रसाद की सेवा में, जो साधक डट जाते हैं।

होती उनकी सदा दीवाली, दुःख के पहाड़ हट जाते हैं।।

दिनेश भाई जोशी, अहमदाबाद

ऋषि प्रसाद बाँटने से शीतलता मिलती है

मैं ऋषि प्रसाद बाँटते समय मन में गुरुमंत्र जपता रहता हूँ। इसे बाँटते समय मुझे बहुत शीतलता मिलती है। पहाड़ जितना ऊँचा धन मिलने से भी उतनी प्रसन्नता नहीं मिलती। उस समय मुझे न सर्दी लगती, न गर्मी, न भूख, न प्यास। बहुत से साधक जिनके घर जाता हूँ वे कहते हैं कि "भाई ! थोड़ा आराम कर लो।" पर गुरु जी की कृपा से मन में इतनी शांति होती है कि आराम की जरूरत ही नहीं पड़ती। एक दिन में 260 पत्रिकाएँ बाँटकर आता हूँ। सेवा के माध्यम से ही हम गुरु जी से जुड़े रहकर उस परमानंद को पा सकते हैं।

अमरजीत अरोरा

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प्रकृति प्रसन्नचित्त एवं उद्योगी सेवक को हर प्रकार से सहायता करती है।

की सेवा, मिला मेवा

मैं कुछ समय से आर्थिक रूप से बहुत परेशान था। कर्जा हो गया था और वह दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। ऐसी दशा में एक बार मैं भोपाल आश्रम गया। वहाँ एक गुरुभाई ने ऋषि प्रसाद की सेवा करने वाले एक भाई का अनुभव मुझे बताया और कहा कि "सत्संग-ज्ञान के प्रचार की ऐसी सेवा से दूसरों का जीवन उन्नत होने लगता है और दूसरों का दुःख, शोक, परेशानियाँ जो मिटाता है उसका अपना दुःख और परेशानियाँ टिकती नहीं।" मुझे यह बात जँच गयी और मैंने बड़ बादशाह की परिक्रमा करके संकल्प किया कि मैं प्रतिदिन यह सेवा करूँगा। इसी से मैंने ऋषि प्रसाद की सेवा शुरु कर दी।

कुछ ही दिनों में गुरुकृपा से हमारी सारी परेशानियाँ दूर होने लगीं। आज मैं पूरी तरह कर्जे से मुक्त हूँ। आर्थिक, मानसिक व पारिवारिक परेशानियाँ भी दूर हो गयीं। यह सब ऋषि प्रसाद की सेवा का मेवा है। सदगुरुदेव की कृपा से मेरे सभी कार्य अपने-आप ही सुचारु रूप से चलने लगे हैं। ऐसे अनेकों सेवाकार्यों के प्रेरणास्रोत पूज्य बापू जी के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन !

संतोष जाटव, भोपाल

'ऋषि प्रसाद' है ऐसी प्यारे

ऋषि प्रसाद है ऐसी प्यारे, जो घर-घर अलख जगाये।

गुरु, संत, शास्त्र-वचनों से, ज्ञान-प्रकाश फैलाये।।

सत्य सनातन एक बताये, सनातन संस्कृति महिमा गाये।

निःस्वार्थ, निष्काम बनाये, राग-द्वेष का भाव मिटाये।।

सम्पूर्ण वेदों का सार है ये, सदगुरु जोगी का प्यार है ये।

द्वैत-अद्वैत का भेट मिटाकर, ब्रह्मभाव जगाये।।

जो सार न निकला सागर में, वो ज्ञान भरा इस गागर में।

सदगुरु वैद्य सुजान हैं जिसमें, तन-मन का आरोग्य बढ़ाये।।

ऋषि प्रसाद के सेवाधारी, धनभागी हैं वे नर-नारी।

घर-घर अलख जगाते ये, इस सेवा की महिमा भारी।।

मानव को देव बनाये, सबकी अँखियाँ यही पुकारें।

कब आयेगी ये घर हमारे, प्यारी छवि को देख प्यारे।।

आनंद-आनंद छाये रे, गुरु वचनों को जो भी विचारे।

सहज ही अपना जीवन तारे, अज्ञानता के मिटे अँधियारे।।

ज्ञान-प्रकाश के हो उजियारे, हम पढ़ें औरों को पढ़ायें।

ऋषि प्रसाद है ऐसी प्यारे, जो घर-घर अलख जगाये।।

जयशंकर

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मानव से महामानव की ओर यात्रा कराने वाली पत्रिका है ऋषि प्रसाद

वह समाजसेवा, जो है दुर्गुणहारी, भाग्य उद्धारिणी

पहले मैं इतना कामी था कि एक दिन भी पत्नी के बिना नहीं रह सकता था। अत्यधिक क्रोधी होने के कारण जरा-जरा बात में गुस्से की आग में जलता रहता था। चाय, पान, बीड़ी, तम्बाकू आदि व्यसनों में डूबा हुआ था, जिससे शरीर दुर्बल एवं कई रोगों से ग्रस्त था। मन दुःखी व उद्विग्न रहता था।

पूज्य बापू जी की कृपा से एक दिन जिस विद्यालय में मैं प्रधान अध्यापक हूँ वहाँ ऋषि प्रसाद के सेवाधारी ने सभी कर्मचारियों को ऋषि प्रसाद पत्रिका का सदस्य बना दिया। ऋषि प्रसाद पढ़ने से बापू जी के दर्शन की लालसा जगी। कुछ दिनों बाद पूज्य बापू जी से दीक्षा भी मिल गयी। मंत्रदीक्षा के प्रभाव से मेरे सारे दुर्गुण छूट गये। आज मेरा पूरा जीवन ही बदल गया है।

मैंने सोचा जिस पत्रिका ने मेरे सारे दुर्गुणों को दूर कर दिया, उसे क्यों न मैं दूसरों तक पहुँचाऊँ ! अतः मैंने ऋषि प्रसाद की सेवा शुरु कर दी। साथ ही दिव्य प्रेरणा प्रकाश प्रतियोगिता की भी सेवा का सौभाग्य भी मुझे मिला। मेरे ऊपर करीब 1.5 लाख का कर्जा था। ऋषि प्रसाद की सेवा शुरु करने के एक साल के अंदर मुझे पता भी नहीं चला कि कब, कैसे मेरे ऊपर से कर्जा उतर गया। गुरुकृपा के इतने लाभ हुए कि वर्णन करने का मेरी वाणी में सामर्थ्य नहीं है।

परम कृपालु, भक्तवत्सल सदगुरु भगवान के चरणों अनंत प्रणाम !

राजाराम चढ़ार, राहतगढ़, जि. सागर (म.प्र.)

108 सदस्य बनाने के संकल्प का चमत्कार

18 अक्तूबर 2010 की बात है। मेरी बेटी वर्षा को प्रसूति की पीड़ा हो रही थी। स्थिति बड़ी गम्भीर हो गयी थी। उसे दमन (गुज.) के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया। डॉक्टरों ने कहा कि "बिना ऑपरेशन डिलीवरी नहीं हो सकती। ऑपरेशन कराना ही पड़ेगा।" इसके लिए तीन विशेषज्ञों को बुलाया गया। मैंने उसी समय अपने गुरुदेव से मन-ही-मन प्रार्थना की और लाखों करोड़ों लोगों को स्वस्थ, सुखी और सम्मानित जीवन की राह दिखाने वाली, पूज्य बापू जी की सत्संग-अमृत छलकाने वाली आध्यात्मिक मासिक पत्रिका ऋषि प्रसाद के 108 सदस्य बनाकर उन्हें सत्संग से जोड़ने का संकल्प लिया। संकल्प करने के कुछ ही मिनटों बाद मेरी बेटी को प्राकृतिक ढंग से सहज में प्रसूति हो गयी। अभी माँ और उसकी बच्ची दोनों स्वस्थ हैं। तीनों विशेषज्ञ जब तक पहुँचे, तब तक तो प्रसूति हो चुकी थी। वे डॉक्टर पूज्य बापू जी की कृपा व ऋषि प्रसाद की सेवा के चमत्कार को देखकर आश्चर्य से भर गये और मेरा हृदय भर गुरुप्रेम व श्रद्धा से।

रमण वाडवी, कलई, जि. वलसाड़ (गुजरात)

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समदर्शी संतों की सेवा खोज लेना चाहिए।

आप भी करो ऐसा अनुष्ठान

मैंने यह सोचकर दो महीने की छुट्टी ली थी कि अहमदाबाद आश्रम में चालीस दिन का अनुष्ठान करूँगी। किंतु भगवान मेरे द्वारा और ही कुछ कराना चाहते थे, इस कारण ऐसा निमित्त बना कि मुझे उत्तरायण शिविर के बाद वापस लौटना पड़ा। आने से पूर्व 17 जनवरी 2011 को मैंने ऋषि प्रसाद सम्मेलन में भाग लिया। वहीं मुझे प्रेरणा हुई  कि जब चालीस दिन हाथ में हैं तो क्यों न चालीस दिनों का ऋषि प्रसाद सेवा का अनुष्ठान कर लें। ऐसा सोचकर मैंने 1108 सदस्य बनाने का संकल्प ले लिया। घर आकर अगले दिन से सेवा शुरु कर दी। मैंने सोचा, 'शहर से दूर जाकर भी अपने गुरु का प्रसाद ऋषि प्रसाद बाँटू ताकि उन्हें भी सुखी, स्वस्थ व सम्मानित जीवन की राह मिले, उनके जीवन में भी खुशियों के फूल खिलें।'

हम जहाँ भी गये, सहयोग मिलता गया। एक बार तो हम लोगों ने मात्र एक घंटे में 40 सदस्य बनाये। 10 दिन में 411 सदस्य बने। किंतु एक बार भगवान ने मानो मेरी परीक्षा लेनी चाही। 22-23 फरवरी को हैदराबाद बंद के कारण कर्फ्यू जैसी तनावपूर्ण स्थिति थी, जिसमें कहीं आना-जाना सम्भव नहीं था लेकिन

बापू के दीवाने, झुठलाये नहीं जाते। कदम रखते हैं आगे तो लौटाये नहीं जाते।।

चाहे जितने तूफान आयें या चलें फिर आँधियाँ। इरादे हैं मजबूत तो छू लेंगे बुलंदियाँ।।

मैंने तो बापू जी का स्मरण करके उन्हीं का नाम लेकर अपना सेवाकार्य जारी रखा और परिणामस्वरूप चालीस दिन में 1108 तो क्या 1250 सदस्य बन गये। मेरे लिए यह एक रोमांचक अनुभव है। अभी तक केवल ध्यान में बैठने पर रोमांचक अनुभूतियाँ होती थीं किंतु इस बार वैसी ही अनुभूतियां चालीस दिन की इस सेवा में हुई। गुरुदेव से प्रार्थना है कि सेवा की यह यात्रा यूँ ही चलती रहे ताकि हम घर-घर में ऋषि प्रसाद पहुँचा सकें।

बीना खन्ना, अष्टलक्ष्मी मंदिर, हैदराबाद (आं.प्र.)

बाँटना अच्छा लगता है, ऋषि प्रसाद

ऋषि प्रसाद पत्रिका बाँटकर घर बैठे सेवा का लाभ मिल रहा है, यह सोचकर आनंद होता है।

किशनभाई कटकिया, बोरसद (गुज.)

आज 5 रुपये में एक खाली लिफ़ाफ़ा आता है। उतनी ही कीमत में 32 पृष्ठ की ज्ञान से ओत-प्रोत से भरी पत्रिका घर-घर पहुँचाना कितनी बड़ी सेवा है। - साँईं किरण जी

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गुरुकृपा अणुशक्ति से अधिक शक्तिशाली है।

जीवन-रक्षक बनी ऋषि प्रसाद

12 सितम्बर 1999 को मैं वे मेरा बेटा कार से पठानकोट जा रहे थे। बेटा कार चला रहा था व मैं पीछे की सीट पर बैठे ऋषि प्रसाद पढ़ रहा था। कपूरथला से 47-48 किलोमीटर दूर भोगपुर के आगे रेलवे ब्रिज है। जब कार वह पुल पार कर रही थी उस समय लड़के की आँखों के सामने अँधेरा छा गया और कार ब्रिज की रेलिंग से टकराकर 8-10 पलटियाँ खाते हुए पुल से 30-35 फुट नीचे गिर गयी। मैं उस समय ऋषि प्रसाद के आखिरी पेज की अंतिम लाइन पढ़ रहा था। जैसे ही कार नीचे गिली, मेरी आँखों के आगे अँधेरा सा छाने लगा। उस समय मैंने क्या देखा कि एक सफेद कपड़ों वाले बाबा हमारे सामने खड़े हैं। वे थे हमारे प्यारे पूज्य बापू जी, संकट की घड़ी में बचाने वाले हमारे तारणहार गुरुदेव ! मैंने इसके पहले कभी उनके प्रत्यक्ष दर्शन भी नहीं किये थे। केवल ऋषि प्रसाद के माध्यम से ही पहचानता था। अगर बापू जी ने उस समय हमारी रक्षा न की होती तो हमारा क्या हाल होता !

मदद करने हेतु कुछ लोग आये और उन्होंने गाड़ी का काँच तोड़कर हमें बाहर निकाला। कार की ऐसी हालत हो गयी थी कि उसका कुछ रहा नहीं और हमको हुआ कुछ नहीं। हम घर आये, हमने न कोई इंजेक्शन लगवाया न कोई दवाई ली।

तब से मैं आश्रम की कपूरथला की सेवा समिति में जाने लगा। पूज्य बापू जी से दीक्षा भी ली। मैंने सोचा, 'जब इस पत्रिका ने मुझे नया जीवन दिया है तो मैं इसे औरों तक क्यों न पहुँचाऊँ ?' और आज मैं ऋषि प्रसाद तथा ऋषि दर्शन बाँटने की सेवा करने लगा। मेरे लिए जीवन रक्षक बनी ऋषि प्रसाद आज लाखों-करोड़ों लोगों के लिए भी सद्विचारों के माध्यम से जीवन-रक्षक एवं जीवन-प्रेरक बनी हुई है। हे ऋषि प्रसाद ! कितना दूँ तुझे धन्यवाद !

अमरजीत अरोरा

अमरजीत अरोरा एंड कम्पनी, न्यू दाना मंडी, कपूरथला (पंजाब)

सब रोगों की एक दवाईः ऋषि प्रसाद

मुझे एपेंडिक्स की तकलीफ हुई तब डॉक्टरों ने तत्काल ऑपरेशन की सलाह दी और कहा कि ऑपरेशन न कराने पर 15 दिन के अंदर कुछ भी हो सकता है। परंतु तभी अक्तूबर 2005 की ऋषि प्रसाद में इसे दूर करने हेतु 7 दिन का एक प्रयोग छपा, जिसे करने से मैं पूर्णतः व्याधिमुक्त हुआ। ऋषि प्रसाद कैसी-कैसी युक्तियाँ हमारे लिए ले आती है ! व्याधिमुक्त होने के बाद मेरा सेवा का उत्साह दुगना हो गया है।

राधेश्याम निर्मलकर, धर्मपुरा, रायपुर (छ.ग.)

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भवसागर से तारने वाली पत्रिका है ऋषि प्रसाद।

बुराइयों को मिटाने वाला एक दर्पणः ऋषि प्रसाद

महामंडलेश्वर प्रेमानंद जी महाराज

मुझे ऋषि प्रसाद में दी गयी छोटी-छोटी बातें भी बड़ी अच्छी लगती हैं। इसमें जो उदाहरण, कथा, कहानियाँ आदि होती हैं उन्हें हम अपने प्रवचनों में हमेशा बताते हैं। ऋषि प्रसाद से महात्माओं को प्रवचन करने में बड़ी सुविधा रहती है। उसमें जो अच्छी-अच्छी बातें बतायी जाती हैं, उनको वे अपने प्रवचनों के माध्यम से लोगों तक पहुँचाते हैं।

ऋषि प्रसाद वाकई में ऋषियों का प्रसाद है। यह जनता को परमात्मा-विषयक ज्ञान और  परमात्मा की अनुभूति का आस्वादन कराता है।

ऋषि प्रसाद एक दर्पण है। दर्पण में समाज अपना सच्चा चेहरा देख सकता है। समाज में जो धर्मांतरण या कुसंग की प्रवृत्तियाँ होती हैं, उनको ऋषि प्रसाद एक दर्पण की तरह हमें दिखाता है और उनको सत्संग के माध्यम से कैसे हम दूर कर सकते हैं उसका एक सुंदर रास्ता भी बताता है।

ऋषि प्रसाद घर का वैद्य है। इसे अगर घर में रखोगे तो यह आपके पूरे परिवार के रोग, शोक, विकार, मन की मलिनताएँ दूर करेगा। घर में जो मेहमान आयेंगे, वे भी इसे देखेंगे-पढ़ेंगे तो उनके भी विकार दूर करेगा।

यह एक ऐसी पत्रिका है जिसके द्वारा स्वयं के भले के साथ पूरे संसार का भला चाहने का काम होता है। आने वाला समय ऋषि प्रसाद का समय होगा। भारतीय संस्कृति का जो व्यापक प्रचार-प्रसार करना है, वह आशाराम जी बापू के माध्यम से, उनकी अमृतमयी वाणी से ही तो होगा।

सबसे उत्तम टॉनिक ऋषि प्रसाद

हम घोर आर्थिक संकट की परिस्थिति से गुजर रहे थे। ऐसे समय में ऋषि प्रसाद ने मुझे उन समस्याओं से जूझने का बल प्रदान किया, हिम्मत न हारने की प्रेरणा दी। वास्तव में ऋषि प्रसाद जीवन में बल एवं नवचेतना का संचार कराने वाला रसायन (टॉनिक) ही है। मैं ऋषि प्रसाद पत्रिका को साक्षात् गुरुदेव का स्वरूप मानती हूँ और ऋषि प्रसाद सेवाधारी बनकर अत्यधिक आनंद का अनुभव करती हूँ।

किरण बहन, पटना (बिहार)

बवासीर में- पलाश के पत्तों की सब्जी घी व तेल में बनाकर दही के साथ खायें।

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जिस घर में सत्साहित्य नहीं, वह घर नहीं वरन् श्मशान है। - स्वामी विवेकानंद

ऋषि प्रसाद महान सत्साहित्य है

अवधूत महामंडलेश्वर श्री स्वात्मबोधानंद पुरी जी, निरंजनी अखाड़ा

ऋषि प्रसाद कोई साधारण पुस्तक नहीं अपितु एक महान सत्साहित्य है। मैकाले की शिक्षा पद्धति ने इस पवित्र देश के इतिहास को कलंकित कर दिया, हमारी सभ्यता और संस्कृति को मलिन करने का दुष्प्रयास किया। इस कुटिल चाल को यदि किसी महापुरुष ने पहचाना तो वे हैं पूज्य आशाराम जी बापू। उनके हृदय में यह संकल्प हुआ कि पवित्र ऋषि प्रसाद के माध्यम से हमारी सभ्यता और संस्कृति पर छायी हुई मलिनता, कलंकित हुआ इतिहास बदला जा सकता है।

आज लाखों करोड़ों लोगों तक यह ऋषि प्रसाद जा रहा है तो मैं चाहूँगा कि करोड़ों-करोड़ों घरों में यह पहुँचे ताकि हमारे देश की पीढ़ियाँ, देश की जनता हमारे गौरवशाली इतिहास, संस्कृति व सभ्यता और पर्वों के महत्व को समझ सकें। आज हजारों साधक इसके माध्यम से सुप्रचार में लगे हैं।

हम संत समाज जो किसी कोने में भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं, हमारे हृदय में यह पीड़ा है, यह कसक है कि हमारी संस्कृति सबल हो। लेकिन अब हमारे हृदय में अत्यंत प्रसन्नता हो गयी है कि हमारी इस पीड़ा को, हमारे संकल्प को बापू जी समझ चुके थे और बापू जी ने हमारे जैसे हजारों संतों के संकल्प को ऋषि प्रसाद के माध्यम से पूर्ण कर दिया है। जो महानुभाव ऋषि प्रसाद जन-जन तक पहुँचाने की सेवा कर रहे हैं, उनके बच्चे, नाती-पोते आगे बोल उठेंगे कि 'वाह ! हमारे पिता जी, दादा जी इतने महान थे और महान हैं कि जब पूज्य गुरुदेव को विधर्मियों व राष्ट्रद्रोहियों ने बदनाम किया और देश विडम्बनाओं में फँस रहा था, उस समय हमारे पिता जी, दादा जी, नाना जी ने ऋषि प्रसाद वितरण के माध्यम से देश और समाज की इतनी सेवा की और करते रहे हैं !'

नेत्रज्योतिवर्धक- पीपल के कोमल पत्तों का रस 2 बूँद और शुद्ध शहद 2 बूँद दोनों को मिलाकर प्रतिदिन आँखों में आँजने से आँखों की लाली व फूली नष्ट होती है। नियमित प्रयोग करने से नेत्रज्योति बढ़ती है।

बलवर्धक- 2 से 4 ग्राम शतावरी का चूर्ण गर्म दूध के साथ 3 माह तक सेवन करें। इससे शरीर में बल आता है, साथ ही नेत्रज्योति बढ़ती है।

संदर्भः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2012

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दैवी गुणों का विकास करने वाला महान रहस्य गुरुभक्ति में निहित है।

गुरु ज्ञान की मिठाई

स्वास्थ्य चाहिए, सुख चाहिए, सम्मान चाहिए ?

ऋषि प्रसाद को मित्रो ! आदरसहित अपनाइये।

ऋषि प्रसाद है आपके कमलों में सुशोभित,

अरे मिल गयी यह जानकर, अब मुस्कराइये।।

यह दिव्य ज्ञान है, इसे पढ़िये-पढ़ाइये,

इसके सूत्र आजमाइये, परमानंद पाइये।

ले जाइये तोहफा मित्रो ! औरों तक पहुँचाइये,

सौगात है यह दिव्य, औरों को भिजवाइये।।

है यह श्रेष्ठ, पवित्र, मधुर और अति सुन्दर,

बगिया में मुस्करा रहे, मौलिक गुलाब की तरह।

तन-धन-धर्म के खजाने, इसमें ही पाइये,

यदि है देश को बढ़ाना, इसे ही लिये जाइये।।

सरोवर यह सदा है शीतल, डुबकी लगाइये,

श्रद्धासहित इसी में, त्रय तापों को धोइये।

होकर गली-गली में, मुहल्लों में जाइये,

ले गुरुज्ञान का यह दीपक, ज्योति जगाइये।।

खुद होकर प्रभु के प्यारे, प्यारे बनाइये,

डटकर सदा-सदा ही, धर्म देश जगमगाइये।

यह है गुरुज्ञान की मिठाई, जरूर खाइये,

सबको खिलाइये और आनंद पाइये।।

पढ़ने को मुझको मिली,  पत्रिका ऋषि प्रसाद।

सुखद शांति मन को मिली, है पढ़ने के बाद।।

है पढ़ने के बाद, सुंदरतम लेख मिले हैं।

पृष्ठ-पृष्ठ पर मानो, सुरभित सुमन खिले हैं।।

ऋषि प्रसाद पढ़ो, शुभ शिक्षा हृदय में धारो।

अपना जीवन तपे हुए, सोने की भाँति निखारो।

आश्रम आशाराम जी का, शहर अहमदाबाद।

दरिया साबरमती का, रखो मित्रवर याद।।

भेज सदस्यता शुल्क, ऋषि प्रसाद मँगाना।

पढ़ो पढ़ाओ सारे, विषय विकार मिटाना।।

ऋषि दर्शन भी अब आ गयी, उसका आनंद उठाइये।

इसमें हर माह बापू जी के सत्संगों का सार पाइये।।

शुभेच्छु, स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती

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आध्यात्मिक क्रान्ति का शंखनाद – ऋषि प्रसाद।

ऋषि प्रसाद की सेवा में संलग्न सभी को हार्दिक बधाइयाँ

मैं यह जानकर अति प्रसन्न हूँ कि संत श्री आशाराम जी बापू के अनुयायीगण गुरुपूर्णिमा पर्व के उपलक्ष्य में ऋषि प्रसाद का विशेषांक प्रकाशित करने का आयोजन कर रहे हैं। संत श्री आशारामजी बापू समकालीन भारत के अग्रगण्य आध्यात्मिक विभूतियों में से एक हैं। हमारी आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत के प्रचार-प्रसार में उनका योगदान उनकी विलक्षण विद्वता एवं आकर्षक सत्संग-शैली दोनों को प्रमाणित करता है।

ऋषि प्रसाद पत्रिका करोड़ों पाठकों तक आध्यात्मिक ज्ञान पहुँचाने की सेवा कर रही है। मैं उन सभी को हार्दिक बधाइयाँ देता हूँ जो इस सत्प्रयास में संलग्न हैं।

श्री अटल बिहारी बाजपेयी

तत्कालीन राष्ट्रपति का संदेश

राष्ट्रपति सचिवालय

राष्ट्रपति भवन

नई दिल्ली – 110004

संदेश

भारत की राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटील को यह जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई है कि श्री आशाराम जी बापू का 72वाँ अवतरण दिवस 11 अप्रैल 2012 को सेवा दिवस के रूप में मनाया जा रहा है तथा इस अवसर पर ऋषि प्रसाद पत्रिका के  विशेषांक का प्रकाशन भी किया जा रहा है। आशा है पत्रिका में दिये गये लेख भक्तों एवं पाठकों का मार्गदर्शन करेंगे।

राष्ट्रपति जी इस पत्रिका के विशेषांक के सफल प्रकाशन के लिए अपनी शुभकामनाएँ प्रेषित करती हैं।

अर्चना दत्ता (मुखोपाध्याय)

राष्ट्रपति के विशेष कार्याधिकारी (जनसम्पर्क)

वीर्यवान बालक की प्राप्ति- एक पलाश-पुष्प पीसकर, उसे दूध में मिला के गर्भवती माता को रोज पिलाने से बल-वीर्यवान संतान की प्राप्ति होती है।

संदर्भः ऋषि प्रसाद, मार्च 2013

अनुक्रमणिका

विज्ञान सम्मत आध्यात्मिक ज्ञान की महानता का परिचय देती है ऋषि प्रसाद

पत्रिका नहीं, प्रभु का रसमय प्रसाद है ऋषि प्रसाद

पहले मेरी रुचि हमेशा गंदे, अश्लील साहित्य व पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने में रहती थी। मन में सदा बुरे विचार आते रहते थे। एक दिन मेरा छोटा भाई, जो पहले से ही बापू जी का भक्त था, ऋषि प्रसाद लेकर आया। मैंने पढ़ी तो बहुत अच्छा लगा, मन को शांति मिली। रस आने लगा तो हर माह पढ़ने लगा। इसके  पठन से अश्लील साहित्य पढ़ने की गंदी आदत छूट गयी। अश्लील आकर्षण, विकार छूटते गये और भगवच्चिंतन स्वतः होने लगा। कुछ ही दिनों में मेरे जीवन में अनोखा परिवर्तन आ गया। पूज्य बापू जी के श्रीचरणों में मेरी प्रीति हो गयी। फिर तो मैंने इसकी आजीवन सदस्यता ले ली। अब तो हर माह ऋषि प्रसाद को सँभालकर रखता हूँ। पूज्य बापू जी के कृपा-प्रसाद से मेरा जीवन बरबाद होने से बच गया। उनके श्रीचरणों में मेरे कोटि-कोटि दंडवत् प्रणाम !

सूरजलाल गौड़, बुरहानपुर (म.प्र.)

आओ मिल मंगल गान करें

आओ मिल मंगल गान करें, ऋषि प्रसाद अभियान करें।

आओ मिल मंगल गान करें, ऋषि दर्शन अभियान करें।

गुरुवर के इस दैवी कार्य का, गाँव-गाँव में प्रचार करें।।1।।

गुरुज्ञान का दीप हाथ में, समता का ध्वज लिये साथ में।

अज्ञान तिमिर का नाश करें, आओ मिल मंगल गान  कें।।2।।

उठो उठो रे जागो लोगों, दीन-हीनता त्यागो लोगों।

प्रणव का निर्भय नाद करें, आओ मिल मंगल गान करें।।3।।

ऋषि प्रसाद है ये सिखलाता, हम सबका है एक विधाता।

उसका हम नित ध्यान करें, आओ मिल मंगल गान करें।।4।।

वेदों का अमृत बरसाता, सर्व में एक ब्रह्म दिखलाता।

भेद-भाव को दूर करें, आओ मिल मंगल गान करें।।5।।

ऋषियों के उस दिव्य ज्ञान का, भारत की संस्कृति महान का।

हम सब मिल गुणगान करें, आओ मिल मंगल गान करें।।6।।

प्रदीप काशीकर

अनुक्रमणिका

गुरुसेवा सब भाग्यों की जन्मभूमि है। - संत ज्ञानेश्वर जी

सेवा के संकल्पमात्र से अदभुत लाभ

मेरी पुत्री अनुराधा की तबीयत 4-5 साल से खराब थी। उसे पूरे शरीर में दर्द रहता था और चलने-फिरने मैं लाचार थी। बहुत इलाज कराया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। फरवरी 2010 को मैंने संकल्प लिया कि मैं 108 ऋषि प्रसाद निःशुल्क वितरित करूँगा। जुलाई 2010 में 108 का संकल्प पूरा हुआ और 6 माह पूरे होने के पूर्व ही मेरी पुत्री एकदम ठीक हो गयी।

यह हमारे पूज्य गुरुदेव की करुणा कृपा का ही चमत्कार है। गुरुसेवा परम सौभाग्य की जननी है। यह अक्षरशः सत्य है।

संतोष श्रीवास्तव, रीवा (म.प्र.)

परम हितैषी सदगुरु

यदि आज गुरुजनों का अवतार न होता। सद्धर्म धरा धाम मैं विस्तार न होता।।

अपने को त्याग तप में यदि ये न तपाते। जीवों का किसी भाँति भी निस्तार न होता।।

सद्ज्ञान का प्रकाश भी मिलता नहीं कहीं। गुरुदेव का खुला जो दया-द्वार न होता।।

कितने अधःपतित हम सबके लिए यहाँ। यदि ये न उतरते तो उद्धार न होता।।

निर्द्वन्द्व साधक (पथिक) हो रहे गुरुदेव शरण में। जिनकी कृपा बिना है कोई पार न होता।।

मालारूपी साधन साथ में रखना चाहिए

सत्कर्म जितने गुप्त होते हैं उतना उनका गहरा फल होता है। अगर हमने सेवा की या भजन किया यश के लिए, तो हमने उसको यश में खर्च कर दिया। जब तक आत्मसाक्षात्कार नहीं हुआ, अंतरात्मा प्रभु की आध्यात्मिक साधना शुरु नहीं हुई तब तक मालारूपी साधन साथ में रखना चाहिए, नहीं तो मन धोखा देता है।

पूज्य बापू जी

अनुक्रमणिका

सुबह जल्दी उठने की युक्ति

यदि सुबह आपकी नींद नहीं खुलती है अथवा अपने से नहीं उठ सकते हैं तो रात को सोते समय अपनी परछाई को तीन बार बोल दो कि मुझे 3 से 5 बजे के बीच प्राणायाम करने हैं, तुम मुझे 4 बजे जगा देना। है तो तुम्हारी छाया लेकिन कहोगे तो नींद खुल जायेगी। फिर उस समय आलस्य नहीं करना।

संदर्भः ऋषि प्रसाद, जून 2013

बुद्धि, विवेक और तत्परतापूर्वक की गयी सेवा आपके जीवन में चार चाँद लगा देगी।

सफलता के पदचिह्न

तत्परता संसार की सेवा के लिए, निवृत्ति, शांति अपने लिए तथा शरणागति प्रभु के लिए है। प्यार प्रभु के लिए, ध्यान अपने लिए और  सेवा समाज के लिए करोगे तो तुम जहाँ भी कदम रखोगे, तुम्हारे वे कदम सफलता के पदचिह्न बन जायेंगे।

पूज्य बापू जी

ऋषि प्रसाद/ऋषि दर्शन कार्यालय

संत श्री आशाराम जी आश्रम, साबरमती, अहमदाबाद (गुज.)

परिचय-पत्र

सेवाधारी क्रमांक (यदि है तो)......................................... दिनांक.......................

श्री/श्रीमती/सुश्री..............................................................................................

पिता/पति का नाम.........................................................................................

पूरा पता.......................................................................................................

गाँव................................शहर...........................तहसील..................................

जिला.............................राज्य...........................पिन.......................................

सम्पर्क..................................................ई-मेल................................................

संकल्प-पत्र

पूज्य सदगुरुदेव के पावन आशीर्वाद से मैं संकल्प करता/करती हूँ कि जन-जन तक ऋषियों के ज्ञान को पहुँचाने वाली पत्रिका ऋषि प्रसाद व पूज्य बापू जी के सत्संग व योगलीलाओं पर आधारित मासिक विडियो मैगजीन ऋषि दर्शन के कम-से-कम 25, 50, 75, 100, ............. सदस्य बनाने की पुण्यदायी सेवा करूँगा/करूँगी तथा यथासम्भव स्वयं वितरण भी करूँगा/करूँगी।

रसीद बुक क्रमांक................................. सेवाधारी के हस्ताक्षर...............................

अनुक्रमणिका

जो धर्म की रक्षा करता है, भगवान उसे सद्बुद्धि देते हैं और उसकी रक्षा होती है

ऋषि प्रसाद सेवा मार्गदर्शिका

प्रस्तावना

भारत देश को आजादी दिलाने में उस समय के क्रान्तिकारी, स्वतंत्रता सेनानी, देशभक्तों और उनके द्वारा प्रकाशित होने वाली छोटी-छोटी समाचार पत्रिकाओं और लघु अखबारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। उसी प्रकार वर्तमान समय में वैचारिक प्रदूषण और अज्ञानरूपी गुलामी से छुटकारा दिलाने में ऋषि प्रसाद पत्रिका महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

भगवान के अवतारों तथा भगवत्प्राप्त संतों-महापुरुषों ने गुरु की सेवा में तत्पर होकर एवं उनकी आज्ञा मान के मानव-जन्म के सर्वोच्च ज्ञान-आत्मज्ञान को समर्पण के मार्ग से पाया और फिर गुरुज्ञान को समाज में जन-जन तक पहुँचाया। भगवान श्रीरामचन्द्रजी, श्रीकृष्णजी, श्रीमद् आद्य शंकराचार्य जी, भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज और उनके सत्शिष्य एवं करोड़ों लोगों के सदगुरु पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू सनातन संस्कृति के दिव्य ज्ञान को समाज तक पहुँचा रहे हैं। उस दिव्य ज्ञान को औरों तक पहुँचाने में जो भागीदार होते हैं, ऐसे परोपकारी पुण्यात्माओं के लिए भगवान शिवजी ने कहा हैः

धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः।

धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।।

स्वामी शिवानंदजी कहते हैं कि 'गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा के फलस्वरूप आखिर आत्मसाक्षात्कार होता है। गुरुभक्ति और गुरुसेवा साधनारूपी नौका की दो पतवारें हैं, जो शिष्य को संसार सरिता के उस पार ले जाती हैं। सद्गुरु शिष्य परम्परा द्वारा ही समाज में ज्ञान का प्रचार-प्रसार हुआ है। हमारा परम सौभाग्य है कि पूज्य गुरुदेव ने हमको समाज में ज्ञान बाँटकर स्वयंसहित शीघ्र उन्नत करने की ऋषि प्रसाद की सेवा का अवसर प्रदान किया है।

आइये, इस महान दैवी कार्य को अपने जीवन का एक हिस्सा बनायें और इसके लिए कुछ समय निश्चित करें। सप्ताह में रोज कुछ घंटे या दो दिन, तीन दिन या एक दिन.....

जैसे निशदिन होत हैं शयन, स्नान, जलपान।

वैसे जो सेवा करे, शीघ्र होवे कल्याण।।

ऋषि प्रसाद की सेवा का सौभाग्य प्राप्त करने के इच्छुक बड़भागी, सद्भागी पुण्यात्माओं को यह सेवा करने में सुगमता रहे और योग्य मार्गदर्शन और प्रेरणा मिल सके, इसलिए यह छोटी पुस्तिका प्रकाशित करते हुए हम आनंद की अनुभूति कर रहे हैं। आशा रखते हैं कि यह मार्गदर्शक पुस्तिका उनके लिए उपयोगी साबित होगी और उनके जीवन को ऋषियों के कृपा-प्रसाद से स्वस्थ, सुखी, सम्मानित जीवन की राह दिखाकर पूर्णता के पथ का पाथेय सिद्ध होगी। पूज्य सद्गुरुदेव की असीम कृपा से आप आध्यात्मिक पथ पर निरंतर उन्नतिशील हों, ऐसी गुरुचरणों में शुभ प्रार्थना के साथ यह पुस्तिका पूज्यश्री के चरणारविंदों में सादर समर्पित है।

अनुक्रमणिका

तुम किसी का भला करना चाहो तो उसका भला हो चाहे न हो लेकिन तुम्हारा हृदय तो भला हो ही जाता है।

सर्वार्थ सिद्धि का मूलः सेवा

हमेशा सजग रहो। 'मेरा कुछ नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिए। जो है वह इष्ट का है, इष्ट के लिए है।' ऐसे भाव रखने वाले सेवक को स्वामी सहज में मिल जाते हैं। जैसे सांदीपक गुरु की सेवा में लग गया तो शिवजी बिन बुलाये आये, भगवान नारायण के दर्शन बिन बुलाये हो गये।

सेवा में माँग नहीं होती है, स्वार्थ नहीं होता है। सेवा हृदय से जुड़ी होती है। सेवा करने वाले में अपने अधिकार की परवाह नहीं होती है। प्रीति है, सेवा है तो अधिकार उसका दास है। जैसे सेठ की कोई सेवा करता है तो क्या उसे सेठ के बँगले में रहने-खाने-बैठने को नहीं मिलता क्या ? ऐसे ही सेठों का सेठ जो गुरु तत्त्व है अथवा भगवान हैं, उनकी प्रसन्नता के लिए, उनकी प्रीति के लिए जब सेवा की जाती है तो उस सेवा में स्वार्थ नहीं समर्पण होता है। सेवा करते-करते सेवक सच्ची आध्यात्मिक कमाई का धनी बन जाता है। सेवा का बदला वह कुछ नहीं चाहता है फिर भी उसे उसका फल मिले बिना नहीं रहता। उसके चित्त की शांति, आनंद, विवेक सेवा में उसकी सफलता की निशानी है।

सेवक का विवेक यही है कि सेवा करते समय जो भूल हुई वह दुबारा न हो, सावधान हो जाये। इससे उसकी कार्य करने की योग्यता और भी बढ़ जाती है। वह इन्द्रियों का, मन का, बुद्धि का स्वामी बन जाता है। सेवा करते-करते सेवक स्वामी के अनुभव से तदाकार हो जाता है। उसकी शरीर, मन, इन्द्रियों को 'मैं' मानने की गलती निकल जाती है। वह मन, इन्द्रियों और शरीर से पार हो जाता है, फिर चाहे वे तोटकाचार्य जी हों, पूरणपोड़ा हों अथवा एकनाथ जी महाराज हों। प्रेम का आरम्भ है निष्काम सेवा।

अनुक्रमणिका

अपने सुख के लिए प्रयत्न न कर, दूसरे के दुःख मिटाने के लिए प्रयत्न कर तो निश्चिंत जीवन आयेगा।

सेवा तो सेवा ही है !

पूज्य बापू जी की अमृतवाणी

सेवक को जो मिलता है वह बड़े-बड़े तपस्वियों को भी नहीं मिलता। हिरण्यकशिपु तपस्वी था, सोने का हिरण्यपुर मिला लेकिन सेविका शबरी को जो साकार राम का दर्शन और निराकार राम का सुख मिला वह हिरण्यकशिपु ने कहाँ देखा, रावण ने कहाँ पाया ! मुझे मेरे गुरुदेव और उनके दैवी कार्य की सेवा से जो मिला है, वह ऐसों को कहाँ था ! सेवक को जो मिलता है उसका कोई बयान नहीं कर सकता लेकिन सेवक ईमानदारी से सेवा करे, दिखावटी सेवक तो कई आये, कई गये। सेवा में बड़ी सावधानी चाहिए। जो प्रेमी होता है, जिसके जीवन में सद्गुरुओं का सत्संग होता है, मंत्रदीक्षा होती है। जो भगवान का और मनुष्य-जीवन का महत्व समझता है वही सेवा से लाभ उठाता है।

जिसमें जितनी वाहवाही का स्वार्थ होता है उतना ही वह विफल होता है और जितना दूसरे की भलाई का उद्देश्य होता है उतना ही वह सफल होता है। अपनी चाह छोड़ दे और दूसरों की भलाई में ईमानदारी लग जाय तो उसके दोनों हाथों में लड्डू ! यहाँ भी मौज, वहाँ भी मौज (लोक परलोक दोनों आनंदमय) ! माँ की, पति, पत्नी की, समाज की सेवा करे लेकिन बदला न चाहे तो उसका कर्मयोग हो जायेगा, उसकी भक्ति में योग आ जायेगा, उसके ज्ञान में भगवान का योग आ जायेगा। उसके जीवन में सभी क्षेत्रों में आनंद है।

सेवा तो शबरी की है, सेवा तो राम जी की है, सेवा तो श्रीकृष्ण की है, सेवा तो कबीर जी की है और सेवा तो ऋषि प्रसाद वालों की है, अन्य सेवकों की है। सेवक को किसी पद की जरूरत नहीं है। सारे पद सच्चे सेवक के आगे-पीछे घूमते हैं। सेवा में जो अधिकार चाहता है, वाहवाही चाहता है वह वासनावान होकर जगत का मोही हो जायेगा। लेकिन सेवा में जो अपना अहं मिटाकर तन से, मन से, विचारों से दूसरों की भलाई, दूसरों का मंगल करता है और मान मिले चाहे अपमान मिले, उसकी परवाह नहीं करता, ऐसे हनुमानजी जैसे सेवक की हनुमान जयंती मनायी जाती है। हनुमान जी को देखो तो जहाँ छोटा बनना है वहाँ छोटे और जहाँ बड़ा बनना है वहाँ बड़े बन जाते हैं। सेवक अपने स्वामी का, गुरु का, संस्कृति का काम करे तो उसमें लज्जा किस बात की ! सफलता का अहंकार क्यों करे, मान-अपमान का महत्व क्या है !

ऋषि प्रसाद बाँटने वाले को मान मिला वहाँ ऋषि प्रसाद का सदस्य बनाने गया, मान नहीं मिला तो नहीं गया तो वह सेवक नहीं है, वह तो मान का भोगी है। चाहे मान मिले या अपमान मिले, यश मिले या अपयश मिले, सेवा तो सेवा ही है !

अनुक्रमणिका

सदगुरु के सान्निध्य में अमर आत्मा का अनुभव कर लेना ही मनुष्य जीवन का वास्तविक कर्तव्य है।

ऋषि प्रसाद की सेवा में सफलता के लिए

उचित मार्गदर्शन के अभाव में सेवाधारी अभियान में अपनी क्षमता से बहुत कम सदस्य ही बना पाते हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए कुछ महत्वपूर्ण बातें यहाँ बतायी गयी हैं। इन पर अमल करने से प्रत्येक सेवाधारी ऋषि प्रसाद का अधिक संख्या में सदस्य बनाकर अपने सेवा में सफल हो सकता है।

व्यक्तित्व- आप जब प्रचार अभियान में जाते हैं तो आपके कपड़े स्वच्छ हों, बालों तेल व कंघी किये हुए हों, नाखून कटे हों। मस्तक पर तिलक एवं यथासम्भव ऋषि प्रसाद की टोपी आदि लगाकर जायें।

आत्मविश्वास- आप पूरे मनोबल के साथ अपनी बात को सामने वाले व्यक्ति को बतायें और दृढ़ विश्वास रखें कि उसके हर  प्रश्न का उत्तर मेरे पास है। बापू जी की कृपा व आशीर्वाद सदैव मेरे साथ हैं, फिर हिचकिचाहट कैसी ? शर्म कैसी ?

वक्तृत्व कला- अच्छे शब्दों का प्रयोग करें, विनम्रतापूर्वक बात करें। कम-से-कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा बात समझाने का प्रयास करें।

जिस भी क्षेत्र में आप अभियान हेतु जायें वहाँ के किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति या उस क्षेत्र की जानकारी रखने वाले किसी व्यक्ति को अपने साथ सेवा में रख सकें तो उत्तम होगा।

कुछ महत्वपूर्ण बातें-

रसीद पुस्तिका थैले में रखें और चालू माह या किसी विशेष अंक की ऋषि प्रसाद पत्रिका अपने हाथ में रखें।

व्यक्ति से मिलती ही विनम्रतापूर्वक नमस्कार/हरि /जय श्री कृष्ण/जय श्री राम.... आदि कहें।

पत्रिका दिखाते हुए बतायें कि यह ऋषि प्रसाद पत्रिका है।

यह एक सर्वसमावेशक पत्रिका (ऑल इन वन मैगजीन) है। बहुत ही अच्छी-अच्छी बातें, जैसे योग, अध्यात्म, स्वास्थ्य आदि की जानकारी इसमें दी जाती है।

आप कौन सी भाषा पढ़ते हैं ? तब उसकी मातृभाषा वाली ऋषि प्रसाद निकालकर उसे दिखायें और उसकी मातृभाषा में समझा सके तो अच्छा रहेगा।

इसमें बच्चों की स्मृतिशक्ति (मेमोरी पॉवर) व एकाग्रता बढ़ाने की अच्छी-अच्छी कुंजियाँ (टिप्स)(योगासन-प्राणायाम आदि) छपती रहती हैं।

हर माह बदलते मौसम में क्या खाना और क्या नहीं खाना चाहिए आदि बातें छपती हैं।

मधुमेह (डायबिटीज), मोटापा, कैंसर, पीलिया, अनिद्रा, तनाव जैसी बड़ी-बड़ी बीमारियों को खत्म करने के सरल उपाय भी इसमें छपते हैं।

फिर आप स्वयं बड़ी-बड़ी बीमारियों के नुस्खे बताना शुरु कर दें।

हर माह आने वाली एकादशी एवं त्यौहारों को कैसे मनाना चाहिए, कौन से मंत्र का जप करना चाहिए, उसका पुण्य फल क्या है आदि बातें छपती हैं और हर महीने घर बैठे पोस्ट या सेवाधारी द्वारा आपको मिलेंगी। अख़बार का हर महीने का खर्च 90-100 रूपये बैठता है और इसका मासिक खर्च 3-4 रूपये ही बैठता है। आप 100 रूपये जमा करेंगे तो 2 साल (24 महीने) तक आपको यह पत्रिका मिलती रहेगी। आप पढ़ें, अपने बच्चों को भी पढ़ायें। इससे घर परिवार में सुख-शांति रहेगी एवं परिवार के सब लोग स्वस्थ भी रहेंगे।

टिप्पणी- मना करे तो एक साल का सदस्य बनाने का प्रयास करें कि कम-से-कम एक साल के लिए लगाकर देखिये मात्र 60 रूपये में ! अच्छी नहीं लगे तो फिर मत लगाना। फिर भी मना करें तो चालू माह की एक पत्रिका 6 रूपये में बेच दें कि इसे पढ़िये, अच्छी लगे तो फोन कीजिये, आपको सदस्य बना देंगे। एक पत्रिका खरीदने के लिए भी मना करे तो एक पूर्वांक पत्रिका देते हुए कहें कि यह एक  पूर्वांक पत्रिका मुफ्त में ले लीजिये, अच्छी लगे तो फोन कीजिये।

अगर आपके पास वास्तुदोष निवारक स्वस्तिक एवं नेत्रबिंदु उपलब्ध हैं तो इन दोनों चीजों की उपयोगिता बताकर भी सदस्य बना सकते हैं।

ऋषि प्रसाद/ऋषि दर्शन की सदस्यता प्राप्त करने के लिए

रसीद पुस्तिका- रसीद पुस्तिका अहमदाबाद मुख्यालय, क्षेत्रीय कार्यालय, क्षेत्रीय आश्रमों या स्थानीय श्री योग वेदांत सेवा समितियों से प्राप्त करके आप सदस्यता शुल्क लेकर लोगों तक पहुँचा सकते हैं।

डिमांड ड्राफ्ट- देखिये इसी पुस्तक का सेवाधारियों के लिए विशेष निर्देश खंड। पृष्ठ क्रमांक 59)

मनीआर्डर- यदि सदस्य आश्रम, समितियों या क्षेत्रीय कार्यालय की पहुँच से दूर है तो आप पोस्ट से मनीआर्डर द्वारा सदस्यता के लिए भेज सकते हैं। मनीआर्डर में सदस्य का पता साफ शब्दों में एवं किस भाषा में चाहिए पिन कोड सहित लिखें।

ऑनलाइन इंटरनेट- वर्तमान कम्पयूटर युग में इंटरनेट का उपयोग एक आम बात हो गयी है। इसी इंटरनेट के माध्यम से अब ऋषि प्रसाद और ऋषि दर्शन के सदस्य घर बैठे बन सकते हैं। इस हेतु ऋषि प्रसाद की वेबसाइट http://www.rishiprasad.org पर जायें एवं सबस्क्राइब टैब पर क्लिक करके आवश्यक जानकारी भरें तथा देय राशि का भुगतान इंटरनेट बैंकिंग डेबिट या क्रेडिट कार्ड द्वारा करें।

ई-मैगजीन- आकर्षक एवं बहुरंगी ई-मैगजीन जिन्होंने भी देखी, प्रभावित हुए बिना नहीं रहे।

इसकी विशेषताएँ – अति शीघ्र प्राप्ति- मुद्रित प्रति की तरह इसे डाक या अन्य माध्यम से प्रेषित करने की जरूरत नहीं, जिसके चलते जैसे ही ई-मैगजीन को वेबसाइट पर अपलोड किया जाता है तुरंत ही सभी सदस्यों के घर पर हाजिर !

अपलोड होते ही सभी सदस्यों को ई-मेल द्वारा सूचना भेजी जाती है।

जो 'मैं साक्षी हूँ, चैतन्य हूँ, आनंदस्वरूप हूँ, मैं ब्रह्म हूँ – ऐसा चिंतन करता है, वह मुक्त हो जाता है।

सेवा व साधना में शीघ्र उन्नति के लिए एकाग्रता, अनासक्ति एवं परहित की भावना इऩ तीन बातों को अपनायें।

अनुक्रमणिका

सेवामंडल गठन व अभियान

संघे शक्तिः कलियुगे। इस युग में शक्ति संगठन में रहती है। संगठित होकर आपसी समझ-बूझ और तालमेल से किया गया कोई भी कार्य सफल होता है। फिर वह कोई भी क्षेत्र हो, राजनीति हो या खेलकूद हो या ऋषि प्रसाद का दैवी सेवाकार्य। सेवामंडल गठन के पीछे यही मुख्य उद्देश्य है। आज ऋषि प्रसाद का विस्तार जितने बड़े पैमाने पर हुआ है तथा आने वाले दिनों में हम इसे जितना व्यापक बनाना चाहते हैं, उसके लिए सेवामंडलों के रूप में संगठित होकर कार्य करना यह समय की माँग है। इससे कार्यालय से पत्रिका, रसीद पुस्तिका सामग्री आदि के आदान-प्रदान में होने वाले खर्चे की बचत होगी। जिससे हमारी पत्रिका सस्ती दर पर लोगों तक पहुँचाने के आश्रम के उद्देश्य को सफल बनाने में हमारा योगदान रहेगा। सेवामंडल का प्रारूप आपके क्षेत्र के विस्तार पर निर्भर रहेगा। छोटे गाँव-कस्बे आदि में आठ दस सेवाधारी मिलकर एक सेवामंडल गठित करते हैं तो उसमें एक सेवामंडल प्रमुख रहेगा, जो अभियान, पत्रिका वितरण तथा सदस्यों की शिकायतों के निवारण का पूरा-पूरा ध्यान रखेगा। यदि बड़े शहर या क्षेत्र तक आपको आपके सेवामंडल का कार्य विस्तार करना है तो इसका प्रारूप और कार्य-विभाजन इस तरह रहेगा-

सेवामंडल प्रमुख, उप-सेवामंडल प्रमुख, अभियान प्रमुख, वितरण व्यवस्था एवं शिकायत निवारण प्रमुख

सेवामंडल प्रमुख

सेवामंडल प्रमुख कम-से-कम 10 % समय दे सके।

सेवामंडल के प्रमुख कार्य

नये सेवाधारियों का निर्धारण एवं सेवाधारी क्रमांक देना।

प्रत्येक सप्ताह के अभियान का पूर्वनिर्धारण एवं सामूहिक घोषणा।

अपने क्षेत्र में सेवा के विस्तार एवं सुधार हेतु योजनाएँ बनाना।

आवश्यक कारणवश सेवामंडल-कार्यकारिणी के किसी भी सदस्य की अनुपस्थिति में उनके सेवाकार्यों हेतु वैकल्पिक व्यवस्था करना।

सेवामंडल-कार्यकारिणी के सदस्य अपने-अपने सेवाकार्यों में सुचारूरुप से संलग्न रहें, इसकी देख-रेख रखना।

सेवाधारियों की शिकायतों का समाधान करना। प्रत्येक समस्या की अपने स्थानीय (क्षेत्रीय कार्यालय) या अहमदाबाद में सही समय पर शिकायत करना, फोन या लिखित पत्र व्यवहार जो भी उचित हो वह करें।

सेवामंडल में प्रत्येक सदस्य के सक्रिय बने रहने हेतु आवश्यक है कि प्रत्येक सदस्य के पास एक रसीद पुस्तिका अवश्य हो।

सेवाधारियों के पत्रिका-वितरण क्षेत्र का निर्धारण करके सेवाधारियों की वितरण सूची में आवश्यक सुधार करना।

यदि अपने पास एस.एम.एस. की सुविधा हो तो सेवाधारियों को उचित समय पर जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं।

अपने क्षेत्र के निष्क्रिय सेवाधारियों से सम्पर्क करके सेवा में सक्रिय करना।

अपने क्षेत्र का कोई मकान, दुकान, कार्यालय आदि अभियान से वंचित न रहे।

आपके क्षेत्र में अभियान के दौरान भरी गयी रसीद के वितरण माध्यम में अपने क्षेत्र के सेवाधारियों का सेवाधारी क्रमांक स्थानानुसार भरवाना।

जिस क्षेत्र में अभियान करना है वहाँ के सेवाधारियों में से किसी के यहाँ एकत्रित होकर प्रार्थना, गुरु-वंदना, हरि गुंजन इत्यादि करके ही अभियान में निकलें।

अभियान के समय जो सेवाधारी रसीद बना रहे हैं, वे रसीद में अपने हस्ताक्षर करते जायें एवं अभियान की समाप्ति तक सदस्यता शुल्क अपने पास रखें ताकि अभियान के अंत में हिसाब आसानी से हो सके।

उप-सेवामंडल प्रमुख

मंडल प्रमुख की अनुपस्थिति में सेवा की सारी जिम्मेदारी उप-सेवामंडल प्रमुख की रहेगी।

अभियान प्रमुख

अभियान प्रमुख के कार्य

अभियानों का आयोजन और क्रियान्वन करनाः अभियान की योजना बनाकर सेवाधारियों को एकत्र करना और योजना अनुसार बाजार, सोसायटी, स्कूल, गाँव, दफ्तरों आदि में अभियान करवाना। इससे सेवाधारियों के समय और योग्यताओं का उत्तम उपयोग हो सकेगा।

अभियान हेतु आवश्यक सामग्री का प्रबंध करना।

ऋषि प्रसाद के पाठकों एवं साधकों में से सेवा के इच्छुक, उत्साही लोगों को खोजकर उन्हें इस सेवा के लिए प्रेरित करना।

किसी कार्यक्रम या अपने क्षेत्र में होने वाले श्री आशारामायण पाठ, सामूहिक हवन, संकीर्तन यात्रा, भंडारे आदि के निमित्त एकत्र हुए साधकों को ऋषि प्रसाद सेवा की महिमा बताकर अधिक से अधिक लोगों को जोड़ने का प्रयास करना।

किस क्षेत्र में प्रचार का अभाव है तथा कहाँ कितने विस्तार की सम्भावना है, इसका सर्वेक्षण करना तथा उसके अनुरूप उन क्षेत्रों में अभियान की योजना बनाना।

वितरण व्यवस्था एवं शिकायत निवारण प्रमुख

पत्रिका प्राप्त होने के बाद चौबीस घंटे के अंदर वितरण करने वाले सेवाधारियों तक पत्रिका पहुँचाना।

सेवाधारियों द्वारा पत्रिकाओं का समय से वितरण सुनिश्चित करना।

सदस्यों की शिकायतें, पता परिवर्तन, वितरण व्यवस्था परिवर्तन, डाक वाले सदस्यों को पत्रिका न मिलने तथा विलम्ब से मिलने की शिकायत निवारण हेतु उस क्षेत्र के सेवाधारी की सूची में नाम जोड़ना।

किसी सेवाधारी को कोई पत्रिका पहुँचाने में कठिनाई हो तो उसका विकल्प ढूँढकर आवश्यक परिवर्तन कराना। शिकायतें एवं परिवर्तन सूची अपने संबंधित ऋषि प्रसाद कार्यालय तक पहुँचाना।

सेवाधारियों को सेवामंडल द्वारा निर्देश

नये सेवाधारियों को रसीद पुस्तिका देते समय रसीद पुस्तिका भरने का प्रशिक्षण दिया जाय ताकि कम्पयूटर एंट्री में कठिनाई न आये एवं सेवाधारियों का हिसाब संतोषप्रद ढंग से निपटाया जा सके तथा सदस्यों को पत्रिका समय पर मिले।

रसीद पुस्तिका के साथ दी जाने वाली पत्रिकाओं का हिसाब-किताब सेवाधारियों को ही देना होगा। इसकी पूरी जानकारी सेवाधारियों को दी जाय ताकि हिसाब निपटाते समय उनकी भावनाओं को ठेस न पहुँचे।

सेवाधारियों को दी गयी रसीद पुस्तिकाएँ अधिकतम डेढ़ माह में जमा हो जानी चाहिए ताकि सदस्यों को पत्रिका मिलने में विलम्ब न हो तथा सेवाधारियों के पास की राशि सही समय पर संस्था में जमा हो जाय ताकि संस्था को किसी भी प्रकार की आर्थिक हानि उठानी न पड़े।

अभियान क्या है ?

सुनियोजित ढंग से सामूहिक रूप में आम नागरिकों (जनता) तक पहुँचकर ऋषि प्रसाद की महिमा बता के उन्हें सदस्य बनने हेतु प्रेरित करना, यह ऋषि प्रसाद अभियान का प्रारूप है। ऋषि प्रसाद अभियान का मूल उद्देश्य समाज में सत्संग एवं सत्साहित्य के प्रति लोक-रूचि एवं जागरण पैदा करना है। ऋषि प्रसाद भारत की सर्वाधिक संख्या में प्रकाशित होने वाली आध्यात्मिक पत्रिका है। फिर भी अधिकांश लोग अभी भी ऋषि प्रसाद से अपरिचित हैं। उन्हें इसकी महिमा एवं उपयोगिता से अवगत कराना यह अभियान का मुख्य उद्देश्य है।

अभियान की पूर्व तैयारी

सामूहिक रूप से किसी को समझाने से एक तरफ हमारे चार-पाँच लोगों के सकारात्मक संकल्प होते हैं जो सामने वाले के नकारात्मक अथवा अर्ध-नकारात्मक विचारों (दुविधाजनक स्थिति) को सकारात्मक बनाने में सहायक होते हैं।

सदस्यता के नवीनीकरण व नये सदस्य बनाने में अभियान प्रमुख की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

अभियान हेतु उचित स्थान का चयन करना, सेवाधारियों को दो दिन पहले ही स्थान की सूचना देना, अभियान का महत्व समझाकर अधिक-से-अधिक साधकों व सेवाधारियों को अभियान में जोड़ना, अभियान हेतु नयी/पुरानी पत्रिकाएँ, रसीद पुस्तिकाएँ, कार्बन पेपर, पेन आदि सामग्री दो दिन  पहले ही तैयार रखें।

कुछ सेवाधारी विशेषतः सेवानिवृत्त (रिटायर्ड) लोग एवं घरेलू काम-काज करने वाली बहनें अभियान के लिए अधिक-से-अधिक समय दे सकते हैं। जबकि नौकरी अथवा व्यवसाय करने वाले लोग शाम के छः से नौ तथा छुट्टी के दिनों में या रविवार को अभियान कर सकते हैं। कई जगह लोग महीने में एक दिन नौकरी-व्यवसाय से छुट्टी लेकर भी अभियान करते हैं तथा कहीं-कहीं यह भी देखा गया है कि सन्निष्ठ सेवाधारी वर्ष में एक-एक सप्ताह तक नौकरी व्यवसाय से छुट्टी लेकर अभियान करते हैं।

ऋषि प्रसाद अभियान की कार्य योजना

ऋषि प्रसाद अभियान हेतु कुछ साधकों को एकत्र किया जाय।

स्थानीय श्री योग वेदांत सेवा समिति तथा साधकों के सहयोग से अभियान को व्यापक रूप दें एवं सफल बनायें।

अभियान को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए कार्यक्रम निर्धारित किया जाय तथा कार्यक्रम के हर पहलू के ऊपर गम्भीरतापूर्वक विचार-विमर्श के लिए नियमित बैठक रखी जाय। यदि सम्भव हो तो बैठक का समय प्रातःकाल रखा जाय।

समिति के सदस्यों को अभियान की पूर्व तैयारी हेतु प्रारम्भिक सेवाकार्यों का वितरण उनकी योग्यता अनुसार किया जाय। जैसे-

ऋषि प्रसाद के सेवाधारियों से नियमित एवं जीवंत सम्पर्क स्थापित करने हेतु पोस्टकार्ड, एस.एम.एस., फोन आदि से उन्हें अभियान की योजना तथा प्रगति कार्यों से अवगत कराते रहना।

सभी स्थानीय साधकों को प्रचार-सामग्री का वितरण अभियान की उद्घाटन-विधि से पहले कर दिया जाय। प्रत्येक अभियान के बाद आगामी अभियान की रूपरेखा उसी वक्त तय करके सभी संबंधितों को अवगत करा दिया जाय।

नगर के सभी क्षेत्रों का सर्वेक्षण करें तथा ज्यादा सफलता की सम्भावना वाले क्षेत्रों के प्रभावशाली लोगों से सम्पर्क सूत्र स्थापित करें ताकि अभियान की अवधि में परिणाम लाया जा सके।

पूरा समय अभियान करने का इच्छुक एक ही समूह बाजार या दुकानों में इस प्रकार से समय का महत्तम उपयोग करके अधिक-से-अधिक सदस्य बना सकता हैः

सुबह 10.30 से 12.30 तक बाजार या दुकानों में।

दोपहर 12.30 से 2 बजे तक भोजन अवकाश।

दोपहर 3 से 6 बजे बाजार या दुकानों में।

शाम 7 से रात के 9 बजे तक गाँव अथवा सोसायटी में।

अनुक्रमणिका

जिसके जीवन में साधना है उसमें सेवा का सदगुण आ जाता है।

भगवान और समाज को जोड़ने वाली सेवा, संत व समाज को जोड़ने वाली सेवा तो परम सेवा है।

जो सेवा तत्परता से करता है उसको साधना का रस सेवा से ही मिलता है और साधना में भी मन लगता है।

मधुर भाषण स्वयं ही एक सेवा है।

ईश्वरप्राप्ति का उद्देश्य होने से बेईमानी, कर्म से पलायनवादिता, लापरवाही छूट जायेगी

उद्देश्य अगर भगवान का कार्य है तो फिर सेवा में ईमानदारी होगी।

आपकी उत्तम सेवा के लिए

रसीद पुस्तिका के मुख्य आवरण-पृष्ठ (कवर) पर प्रमुख सेवाधारी क्रमांक और उपसेवाधारी क्रमांक के अतिरिक्त अन्य कुछ भी न लिखें एवं न ही कुछ चिपकायें।

रसीद पुस्तिका पूरी होने पर रसीद पुस्तिका के दूसरे नम्बर के पृष्ठ पर दी हुई तालिका (टेबल) के रिक्त स्थानों में जो-जो बातें आपसे संबंधित हों उन्हें लिखकर ही रसीद पुस्तिका वापस लौटायें, जैसेः सेवाधारी का नाम, सेवाधारी क्रमांक व पूरा पता, अंक का वितरण पोस्ट द्वारा या सेवाधारी द्वारा है, किस भाषा में है तथा वार्षिक, पंचवार्षिक व आजीवन कितने हैं, सभी रिक्त स्थान साफ अक्षरों में व पूर्ण रूप से भरकर ही कार्यालय में जमा करवायें।

सदस्य का पता लिखते समय निम्न बातों का ध्यान रखें।

पता साफ लिखा होना चाहिए ताकि ठीक से पढ़ा जा सके।

पता पूरा लिख होना चाहिए। भले सेवाधारी स्वयं पत्रिका वितरित करने वाला हो, फिर भी रसीद में पूरा पता, जैसेः मकान नं., गली, मुहल्ला, ग्राम, पोस्ट, तहसील, तालुका, जिला, राज्य आदि ठीक प्रकार से भरे होने चाहिए।

पते में पिनकोड अवश्य लिखें। इससे पत्रिका के शीघ्र व यथास्थान पहुँचने की सम्भावनाएँ बहुत बढ़ जाती हैं।

छोटे-छोटे गाँवों में जाने वाली पत्रिकाओं के पते में पिता/पति का नाम अवश्य होना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात, शुरुआत के अंक क्रमांक और दिये गये अंकों के क्रमांक के संबंध में है। 'शुरुआत का अंक क्रमांक' के रिक्त स्थान (कॉलम) में आप जिस माह से व्यक्ति की सदस्यता शुरु कर रहे हैं, उस माह के ऋषि प्रसाद का निरंतर क्रमांक लिखना है। यदि वह अंक आपने सदस्य को दे दिया है तो दिये गये अंकों के क्रमांक के रिक्त स्थान में भी वही क्रमांक लिखा जायेगा। उसके बाद जब तक रसीद पुस्तिका कार्यालय में जमा होगी तब तक उसके हर महीने के अंक संबंधित मंडल/कार्यालय से मँगवाकर उस सदस्य को देने का दायित्व सेवाधारी का होगा और दिये गये अंकों के क्रमांक के रिक्त स्थान में उन सभी अंकों का क्रमांक लिखा जायेगा। रसीद पुस्तिका जमा होने के बाद उसके आगे के अंक भेजने का दायित्व अहमदाबाद कार्यालय का होगा। अगर आपने कोई अंक सदस्य को दिया और रसीद में उसे नहीं लिखा तो उस स्थिति में आपके द्वारा मँगवाये गये अतिरिक्त अंकों की राशि आपके खाते में बकाया बतायी जायेगी क्योंकि रसीद में भरे अंकों के आधार पर ही खाते में उतने अंकों की राशि जमा की जाती है तथा उस स्थिति में अव्यवस्था होकर सदस्यों को भी दो बार पत्रिका आती है।

ऋषि प्रसाद/ऋषि दर्शन सदस्यता शुल्क रसीद पुस्तिका एवं ऋषि प्रसाद पत्रिका के  पहले पृष्ठ पर लिखा होता है।

रसीद पुस्तिका भरने के लिए निम्न बिन्दुओं को ध्यान में रखें-

 

रसीद क्रमांक- रसीद पुस्तिका की दायीं तरफ आठ या छः अंकों का होता है।

वायाः रसीद पुस्तिका में पोस्ट के आगे वाया का कॉलम होता है। वाया का अर्थ है पोस्ट ऑफिस।

सदस्यता की शुरुआत अंक के कॉलम में आप जिस माह से व्यक्ति की सदस्यता शुरु कर रहे है, उस माह की ऋषि प्रसाद/ऋषि दर्शन का क्रमांक लिखना है।

सदस्यता की शुरुआत का क्रमांकः 260

रसीद पुस्तिका जमा कराने तक दिये गये अंकों के क्रमांकः 260, 261

नमूना रसीद में यह दर्शाया गया है कि सदस्य को 260 एवं 261 ये दो अंक दिये गये हैं। इसी तरह दिये गये अंकों का विवरण उस-उस सदस्य की रसीद पर लिखा जाना चाहिए। रसीद पुस्तिका पूरी होने तक मुख्यालय/क्षेत्रीय कार्यालय से अतिरिक्त पत्रिकाएँ मँगवाकर सदस्य को पत्रिकाओं की आपूर्ति करनी चाहिए तथा दिये गये अंकों के कॉलम में उन अंकों का क्रमांक लिखते जाना चाहिए।

कवर/लिस्ट में भेजा जाने वाला लेबल-

H 17061261 अंतिम – 259         256/50910

कन्हैया लाल मुनीलाल पारीक

बोयल (ग्राम), बसना (पोस्ट), चंडावल नगर (वाया), पाली (जिला)

राजस्थान – 306306

ग्राहक क्रमांक (कस्टमर नम्बर) यह क्रमांक लिस्ट या कवर पर हर माह भेजा जाता है। H (हिन्दी, M (मराठी), G (गुजराती), T  (तेलुगू), O (ओड़िया), E (अंग्रेजी), K (कन्नड़) S (सिंधी), D (सिंधी देवनागरी), B (बंगाली) – यह भाषा का संकेत है। इसके आगे वाला क्रमांक 'ग्राहक क्रमांक' या कस्टमर नम्बर होता है।

H – 17061261

H – हिन्दी भाषा में पत्रिका

17061261 – ग्राहक क्रमांक या कस्टमर नम्बर

अंतिम – 259 का अर्थ है सदस्यता की समाप्ति 259 अंक में होगी।

256/50910 में 256 चालू माह का निरंतर अंक क्रमांक है।

रसीद पुस्तिका एक डेढ़ माह की निर्धारित अवधि में जमा करायेंगे तो इस पेचीदा हिसाब से भी राहत रहेगी एवं सदस्यों को पत्रिका भी समय से एवं सुचारू रूप से मिलेगी।

कभी-कभी सदस्यों को अंक वितरित नहीं किये जाते हैं, फिर भी उन्हें रसीद पुस्तिका में लिख दिया जाता है। ऐसा नहीं होना चाहिए क्योंकि वह अंक कार्यालय द्वारा दुबारा नहीं भेजा जाता और इससे सेवाधारी व कार्यालय की विश्वसनीयता पर अकारण प्रश्नचिह्न लगता है।

यदि सदस्य स्वयं आश्रम से अंक ले जायेगा तो अंक वितरण में आश्रम लिखें तथा आश्रम का कोड नं. लिखें। यदि पोस्ट द्वारा अंक को भेजना है तो पोस्ट लिखें और यदि सेवाधारी वितरण (वितरित) करने वाला हो तो सेवाधारी क्रमांक लिखें।

सभी सेवाधारियों को अपनी आवश्यकता के अतिरिक्त अंकों की संख्या की सूचना अपने संबंधित कार्यालय/मंडल को हर माह 20 तारीख तक फोन द्वारा अवश्य दे देनी चाहिए। जिससे समय रहते पत्रिका की प्रकाशन संख्या का सही अनुमान लगाया जा सके तथा आवश्यक हो तो पत्रिका का पुनर्मुद्रण किया जा सके एवं आवश्यक रूप से अतिरिक्त पत्रिकाएँ प्रकाशित करने से बचा जा सके।

हमारे द्वारा सेवाधारी से पूरी भरी हुई रसीद पुस्तिका स्वीकार की जाती है। रसीद पुस्तिका की फाड़ी हुई अधूरी पर्चियाँ लेना सम्भव नहीं है। रसीद पुस्तिका की रसीदें फाड़कर अथवा उसके गत्ते निकाल कर कभी न भेजें। रसीद पुस्तिका में मजबूत जिल्द इसलिए चढ़ायी जाती है ताकि आपके द्वारा बनाये गये सदस्यों का रिकार्ड लम्बे समय तक सुरक्षित एवं व्यवस्थित रखा जा सके। कृपया रसीद पुस्तिका पूरी भरकर एक से डेढ़ माह के अंदर भेजने का आग्रह रखें ताकि आगामी माह की पत्रिकाएँ आपके द्वारा बनाये गये सभी समय पर जमा नहीं की जाती है तो आप चालू माह की पत्रिका जहाँ से रसीद पुस्तिका ली है, वहाँ से मँगवाकर सदस्यों को पहुँचायें ताकि उनकी पत्रिका प्राप्ति खंडित न हो। रसीद पुस्तिका जमा होने पर इन पत्रिकाओं के लिए स्वतः क्रेडिट मिल जायेगा।

प्रत्येक सेवाधारी को जमा करायी जाने वाली रसीद पुस्तिकाओं के साथ पूरी राशि जमा कराना अनिवार्य है।

सेवाधारियों को कम्पयूटर सूची के अनुसार ही पत्रिकाएँ वितरित करनी चाहिए।

गुलाबी रसीद जो सेवाधारियों के लिए है, उसे कम-से-कम एक वर्ष तक सेवाधारी अवश्य सम्भाल कर रखें।

सदस्य बनाते समय सेवाधारी निम्न बातों पर ध्यान दें-

सफेद रसीद कार्यालय के उपयोग के लिए है। इसे रसीद पुस्तिका में ही रखें फाड़ें नहीं।

यदि सदस्य स्वयं आश्रम से अंक ले जाने वाला हो तो अंक वितरण में आश्रम का वितरण क्रमांक लिखें। यदि पोस्ट द्वारा अंक भेजना है तो पोस्ट लिखें। यदि सेवाधारी वितरित करने वाले हों तो वितरित करने वाले सेवाधारी का क्रमांक लिखें।

यदि किसी कारण से आपको कोई रसीद रद्द करनी पड़े तो सफेद, पीली और गुलाबी तीनों को एक साथ रद्द करें।

जो लोग ऋषि दर्शन प्राप्त करना चाहते, वे भाषा की जगह पर ऋषि दर्शन लिखें। प्राप्त रुपये की जगह ऋषि दर्शन की सदस्यता लिखें।

अनुक्रमणिका

बुद्धि, विवेक और तत्परतापूर्वक की गयी सेवा आपके जीवन में चार चाँद लगा देगी।

उन्नति हेतु सेवा व साधना दोनों आवश्यक हैं।

प्रभु को अर्पित करके प्रभु की प्रसन्नता के लिए काम करो, तब ही अहंकार का खतरा नहीं जायेगा।

ऋषि प्रसाद व ऋषि दर्शन कार्यालय का प्रारूप

ऋषि प्रसाद व ऋषि दर्शन कार्यालय में विभिन्न उप विभाग हैं, जिनके कार्य इस प्रकार हैं-

इनवर्ड- सेवाधारियों से प्राप्त रसीद बुक, डी.डी. आदि का इनवर्ड लेना।

प्रविष्टी (एंट्री) विभाग- रसीद पुस्तिका का पूरा विवरण (पता आदि) कम्पयूटर में एंट्री करना।

जाँच (चेकिंग) विभाग- पता एवं तकनीकी जानकारी (भाषा, शुल्क, अवधि) आदि का बारीकी से चेकिंग करना।

प्रेषण (डिस्पैच) विभाग- सेवाधारियों से प्राप्त ऑर्डर तथा सदस्यों के डाटा के अनुरूप सदस्यों के नाम-पते की सूची/लेबल प्रिंटिंग तथा उसके अनुरूप डाक, कुरियर, ट्रेन, ट्रांसपोर्ट आदि माध्यमों से शीघ्रातिशीघ्र पत्रिका डिस्पैच करना।

शिकायत (कम्पलेंट) विभाग- सदस्यों की शिकायतों का निवारण, सदस्यों के पते एवं वितरण-सेवा परिवर्तन तथा अवितरित पत्रिकाओं के वितरित न होने के कारणों का विश्लेषण शिकायत विभाग के जिम्मे है।

लेखा (एकाउंट) विभाग- रसीद पुस्तिका की लेखा अनुलक्षित एंट्री, कैश, डी.डी. आदि की प्राप्ति एवं सेवाधारियों के लेखा विवरण का मिलान।

मुद्रण (प्रिंटिंग) विभाग- प्राप्त ऑर्डर के आधार पर पत्रिकाओं का मुद्रण।

लेखन, शोधन एव सम्पादन विभाग (राइटिंग, प्रूफ रीडिंग एवं एडिटिंग)- माह, काल, परिस्थिति, पाठक अभिरुचि आदि विभिन्न आयामों का ख्याल रखते हुए स्वस्थ, सुखी, सम्मानित जीवन की प्राप्ति कराने वाले तथा दुःख, चिंता एवं विपत्तियों के सिर पर पैर रखकर सदैव सम व प्रसन्न रहते हुए परमात्मप्राप्ति कराने वाले सत्संग और सत्शास्त्रों के लेखों का लेखन, शोधन व सम्पादन।

अनुक्रमणिका

इस दुनिया में आत्मशक्ति से सब कुछ सम्भव है।

कामना निवृत्ति में जो लग जाता है, वह देर-सवेर बुद्धत्व (परमात्मज्ञान) को पा लेता है।

हजार बार भगवान का नाम अर्थसहित जपने से अनर्थ से रक्षा होती है।

प्रयत्नपूर्वक सेवाकार्य कर लेकिन चिंता छोड़ दे।

'मैं दुःखी हूँ, यह मुश्किल है, मैं परेशान हूँ....' इन कल्पनाओं की अपेक्षा 'मैं ब्रह्म हूँ' यह कल्पना करो।

प्रतिदिन कम-से-कम हजार बार भगवान का नाम अवश्य लेना चाहिए।

वासनापूर्ति की चाह को अचाह करने वाले ईश्वर की भक्ति में रंग दे।

अकर्म ते स्वपसो अभूम। 'हे ज्ञानस्वरूप प्रभो ! हम धर्म संबंधी उत्तम कर्म करें और तेरे मित्र होकर रहें।' (ऋग्वेद)

जब अपना पुरुषार्थ होता है और सदगुरु की कृपा पचती है, तब जीवत्व की भ्रांति टूटती है।

ईश्वर के सिवाय सब बदलने वाला है।

ऋषि प्रसाद कार्यालय आपकी सेवा में

अहमदाबाद आश्रम में ऋषि प्रसाद कार्यालय का समस्त कार्य कम्पयूटरीकृत प्रणाली से किया जाता है। इस संदर्भ में सेवाधारियों की जानकारी के लिए नीचे महत्वपूर्ण तथ्य दिये जा रहे हैं-

आपके द्वारा प्राप्त ऑर्डर सर्वप्रथम कम्पयूटर में प्रविष्ट किये जाते हैं और कम्पयूटरीकृत विवरण-पत्रक (मेमो) के साथ उक्त वस्तुएँ कुरियर अथवा पंजीकृत डाक द्वारा यथाशीघ्र भेज दी जाती हैं। कोई वस्तु यदि उस समय अनुपलब्ध है तो उस वस्तु का नाम कम्पयूटर में चिह्नित करके रखा जाता है, जिसकी सूचना कम्पयूटर द्वारा हर रोज ऑर्डर पूरा होने तक हमें दी जाती रहती है। कम्पयूटर इस बात का ध्यान रखता है कि एक ही नम्बर की रसीद पुस्तिका दो बार जारी (इश्यू) नहीं की जाय।

इस प्रकार कार्यालय से भेजी गयी रसीद पुस्तिकाएँ जब सेवाधारियों द्वारा भरकर वापस आती हैं तबः

सर्वप्रथम संबंधित सेवाधारी क्रमांक के साथ रसीद क्रमांक की कम्पयूटर में प्रविष्ट की जाती है। फिर प्रत्येक रसीद पुस्तिका की सामान्य जाँच (अंक वितरण, सदस्यता शुल्क, कुल योग, भाषा, माध्यम इत्यादि) की जाती है। अगर किसी जानकारी में शंका होती है तो संबंधित सेवाधारी को फोन करके उसका समाधान किया जाता है।

इसके बाद प्रत्येक रसीद पुस्तिका का कम्पयूटर में पुस्तिका क्रमांक, कुल राशि आदि प्रविष्ट किया जाता है। कम्पयूटर किसी एक सेवाधारी को जारी की गयी रसीद पुस्तिका दूसरे सेवाधारी के नाम पर जमा नहीं लेता तथा इस त्रुटि/विसंगति की सूचना तुरंत देता है। इस स्थिति में कम्पयूटर वह रसीद पुस्तिका पहले सेवाधारी के नाम पर कोरी जमा लेकर जमाकर्ता सेवाधारी को जारी उससे जमा कर लेता है। किंतु किसी प्रकार का संदेह होने पर वह रसीद पुस्तिका पुनः निरीक्षण हेतु रोक दी जाती है। इस प्रकार की जटिलता उत्पन्न न हो, इस हेतु ऐसे सेवाधारियों से अनुरोध है कि वे स्वयं ही स्पष्ट कर दें कि उन्होंने अमुक रसीद पुस्तिका किस सेवाधारी से प्राप्त की है।

इसके बाद 12-12 रसीद पुस्तिकाओं के मास्टर वाइज बंडल बनाये जाते हैं। प्रत्येक बंडल को एक नम्बर दिया जाता है, जिसे लॉट नम्बर कहते हैं। जिन रसीद पुस्तिकाओं में पोस्ट की पत्रिकाएँ सदस्य को देनी बाकी होती हैं, उनका लॉट नम्बर 9 से शुरु होता है तथा उनकी प्रविष्टि (एंट्री) इत्यादि प्राथमिकता पर की जाती है ताकि उनको जल्दी से जल्दी पत्रिका मिल सके।

इसके बाद मास्टर वाइज रसीद  पुस्तिकाओं की प्रविष्टि की जाती है। प्रविष्टी विभाग में  रसीद पुस्तिकाओं की प्रत्येक रसीद का पूरा तकनीकी विवरण जैसे सदस्यता की अवधि, पत्रिका का भाषा, अंक वितरण का माध्यम (पोस्ट/सेवाधारी) शुरुआत का अंक क्रमांक, दिये गये कुल अंकों के क्रमांक, सदस्यता शुल्क, सदस्यता पुरानी है या नयी तथा सदस्य का नाम-पता व मनीऑर्डर नम्बर की प्रविष्टि की जाती है।

इस समय कम्पयूटर इस तकनीकी विवरण का एकाउन्ट के साथ मिलान करे ऐसी प्रोग्रामिंग की गयी है, जिससे यदि कोई भी विसंगति हो तो वह तुरंत पकड़ में आ जाती है। मनीऑर्डर द्वारा बने सदस्य का तकनीकी विवरण कम्पयूटर में डालते समय  का मनीऑर्डर नम्बर भी लिखा जाता है, जिससे तत्संबंधी किसी भी जाँच का शीघ्र जवाब दिया जा सके। नाम-पते की प्रविष्टि में कम्पयूटर इस बात का ध्यान रखता है कि किसी भी सदस्य के डाक, शहर, जिला एवं राज्य में विसंगति न हो।

यदि रसीद में पुराना क्रमांक लिखा हो तो प्रोग्राम में क्रमांक डालने पर अपने आप नाम-पता ले लेता है। अतः सेवाधारियों से अनुरोध है कि यदि पुराना सदस्यता क्रमांक उपलब्ध हो तो उसे अवश्य लिखें।

इसके बाद कम्पयूटर से लॉट वाइज जाँच सूची (Check List) निकाली जाती है, जिसमें रसीद की पूरी जानकारी (तकनीकी विवरण, नाम, पते आदि) छपी होती है। इसको जाँच हेतु जाँच विभाग में भेजते हैं, जहाँ पर रसीद में लिखे हुए विवरण के साथ उसका मिलान किया जाता है। जाँच के समय भी मास्टर वाइज लॉट जाँच किये जाते हैं। इस मास्टर वाइज बंडलिंग, एंट्री, चेकिंग व्यवस्था द्वारा हम सदस्य की पत्रिका जल्दी-से-जल्दी भेजने में सक्षम हो पाते हैं।

इस जाँच के बाद रसीद पुस्तिकाओं का जाँच सूची को कम्पयूटर द्वारा अंतिम  रूप दिया जाता है। कम्पयूटर विभाग सम्भावित विसंगतियों की पुनः जाँच करता है और नये सदस्यों को स्थायी सदस्यता क्रमांक भी देता है एवं इसी समय जिन सदस्यों को पोस्ट द्वारा पत्रिका भेजनी है उन सदस्यों का लेबल भी स्वयं निकाल देता है। इसके अलावा कम्पयूटर सेवाधारियों द्वारा सदस्यों को दिये गये अंकों को भी सेवाधारी के खाते में जमा कर लेता है।

पिनकोड, नगर, जिला राज्य एवं भाषा के अनुसार कम्पयूटर द्वारा छँटनी (Computerized Sorting) करके लेबल (नाम-पता) मुद्रित (प्रिंट) किये जाते हैं।

डाक द्वारा जिन सदस्यों की पत्रिका वितरित होनी है, उन सदस्यों के पते पिन कोड अनुसार सभी सदस्यों के पतों की छँटनी कम्पयूटर द्वारा होती है एवं तदनुसार बंडल बनाकर प्रेषण के लिए तैयार किया जाता है।

पत्रिका वितरण सेवा

पत्रिका छपने के बाद सदस्यों तक शीघ्रता से पहुँचाना यह वितरण सेवा-प्रणाली का मुख्य उद्देश्य है। पत्रिका वितरण तीन प्रकार से होता है।

सदस्य स्वयं अपने नजदीकी आश्रम से पत्रिका ले जाते हैं।

डाक द्वारा सदस्य के पते पर पत्रिका भेजी जाती है।

सेवा-मंडलों एवं सेवाधारियों की विशाल श्रृंखला के द्वारा पत्रिकाओं का वितरण। इस माध्यम से वर्तमान में सर्वाधिक पत्रिकाओं का वितरण हो रहा है। इस प्रणाली में मुख्यालय द्वारा वितरण हेतु सेवाधारी तक पत्रिकाएँ सदस्यों की सूची के साथ विभिन्न माध्यमों से भेजी जाती है।

कुछ सेवाधारी स्वयं आश्रम जाकर पत्रिकाओं का बंडल प्राप्त करते हैं।

मुख्यालय द्वारा विभिन्न क्षेत्रीय कार्यालयों को पत्रिकाएँ ट्रेन अथवा ट्रांसपोर्ट द्वारा भेजी जाती है फिर क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा अपने अंतर्गत आने वाले सेवा मंडलों तक पत्रिकाएँ भिजवायी जाती हैं। कुछ सेवाधारी सीधे अपने क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा पत्रिका प्राप्त करते हैं तथा बाकी सेवाधारी अपने सेवामंडल से पत्रिका प्राप्त करते हैं।

कुछ सेवाधारी जो दूर दराज के क्षेत्रों में बसे हुए हैं अथवा किसी भी क्षेत्रीय कार्यालय अथवा सेवा मंडल के दायरे से बाहर हैं, उन्हें डाक द्वारा पार्सल से (पोस्ट पार्सल से) पत्रिकाएँ पहुँचाने की व्यवस्था मुख्यालय द्वारा की गयी है।

पत्रिका वितरण के सेवाकार्य को तत्परता एवं उत्तम ढंग से करने हेतु निम्न बिन्दुओं पर ध्यान दीजियेः

वितरण हेतु आपको प्राप्त पत्रिकाओं का सदस्यों की सूची के अनुसार मिलान कर लें।

नये सदस्य बनाने हेतु अथवा आपके पास कोई अधूरी रसीद पुस्तिका हो तो उसमें बने सदस्यों की पूर्ति हेतु अथवा फुटकर बिक्री हेतु यदि आप कम्पयूटर लिस्ट के अतिरिक्त पत्रिका प्राप्त करते हैं तो उसका पूरी हिसाब सेवाधारी को रखना होगा।

पत्रिका प्राप्त होने से 3 दिन के अंदर-अंदर ही कम्पयूटर सूची के अनुसार पत्रिका वितरण पूरा करें।

आपकी सदस्यता सूची (कम्पयूटर लिस्ट) में यदि नये पते सम्मिलित किये गये हैं और उन तक पत्रिका पहुँचाने में आप असमर्थ हैं तो कृपया तुरंत ही अपने संबंधित कार्यालय को सूचित करके परिवर्तन करवा लें।

यदि आप किसी माह में किसी अनिवार्य परिस्थिति में पत्रिका वितरण नहीं कर सकते हैं तो किसी विश्वसनीय व्यक्ति द्वारा पत्रिकाओं का वितरण करवायें अथवा अपने संबंधित कार्यालय को पर्याप्त समय रहते सूचना देकर वैकल्पिक व्यवस्था करवायें। ऐसी अनिवार्य परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए सदस्य बनाते समय पूरा पता लिखना अनिवार्य है।

यदि आप किसी कारणवश पत्रिका वितरण के सेवाकार्य से निवृत्ति लेना चाहते हैं तो कम-से-कम तीन माह पूर्व लिखित रूप में यह सूचना क्षेत्रीय कार्यालय अथवा स्थानीय सेवामंडल तक पहुँचा दें।

नये सदस्यों की सदस्यता जिस माह में पूरी होनी है, उसके एक माह पूर्व ही उस सदस्य का नवीनीकरण करने का पूरा प्रयास करें।

आप प्रति माह सदस्यों से यह पूछते रहें कि पत्रिका में क्या पढ़ रहे हैं। यदि उनकी रूचि में कमी दिखायी देती है तो उन्हें अनुकूल विषय पढ़ने के लिए प्रेरित करें। जैसे – स्वास्थ्य संबंधित, विद्यार्थियों संबंधित विषय इत्यादि। ऐसे सदस्यों का नवीनीकरण करते समय यह बात आपके लिए मददगार होगी।

आपके अथवा आपके किसी सदस्य के पते में अथवा फोन नम्बर आदि में परिवर्तन हो तो क्षेत्रीय कार्यालय में इसकी जानकारी तुरंत देकर आवश्यक परिवर्तन करवा लें।

ऋषि प्रसाद पत्रिका एक साधारण पत्रिका न होकर एक आध्यात्मिक पत्रिका है, जिसमें ऋषियों व महापुरुषों का सत्संग-प्रवचन है। इसलिए इसे अख़बार वाले के समान फेंककर देने के बजाय सदस्य या उसके परिवारजनों के हाथ में दें अथवा आदर सहित लेटर बॉक्स आदि स्थान में रखें।

यदि गलत व अधूरे पते के कारण आप सदस्य तक पत्रिका पहुँचाने में असमर्थ हों तो अंतिम प्रयास के रूप में आप अपना पता और फोन नम्बर लिखा हुआ एक पोस्टकार्ड सदस्य को लिखें। यदि पोस्टकार्ड सदस्य को मिलता है तो वह निश्चित ही आपसे सम्पर्क करेगा और यदि पोस्टकार्ड वापस आता है तो इसकी सूचना आप क्षेत्रीय कार्यालय में लिखित रूप में दें।

सेवाधारियों को पत्रिका सौंपे जाने की तिथि तथा वितरण पूरा होने की तिथि का रिकॉर्ड ग्राम/शहर/मंडल प्रमुख स्तर पर रखें ताकि समय पर पत्रिकाओं का वितरण सुनिश्चित किया जा सके तथा शिकायतों का निराकरण अधिक दक्षतापूर्वक किया जा सके।

एक ही मुहल्ले/सोसायटी में यथासम्भव एक ही सेवाधारी पत्रिका का वितरण करें ताकि सेवाधारी के समय, शक्ति एवं धन का अपव्यय रोका जा सके तथा उन्हें और रचनात्मक कार्यों में लगाया जा सके।

डाक द्वारा वितरित की जाने वाली पत्रिकाओं को सेवाधारी द्वार वितरित करवाने का प्रयास करें ताकि पाठकों को पत्रिका वितरण की सुव्यवस्था के संबंध में विश्वास दिलाया जा सके।

यदि किसी गाँव/कॉलोनी/मुहल्ले में 25 या अधिक सदस्य हैं तो वर्तमान सेवाधारी पत्रिका वितरण के लिए उस क्षेत्र के किसी सेवाभावी व्यक्ति को नये सेवाधारी के रूप में नियुक्त करने का प्रयास करे ताकि नये सदस्यों के नवीनीकरण के समय कठिनाई न आये तथा उन्हें ऋषि प्रसाद परिवार का स्थायी सदस्य बनाया जा सके।

नकद (कैश) भुगतान

ऋषि प्रसाद/ऋषि दर्शन के सेवाधारियों के लिए नकद-भुगतान सेवा का एक महत्वपूर्ण अंग है। क्योंकि हिसाब (लेखा-जोखा) संतोषप्रद नहीं होगा तो सदस्यों को समय पर पत्रिका उपलब्ध कराने में अवरोध उत्पन्न हो सकता है। अतः सेवाधारी उत्तम हिसाब के लिए निम्न बातें ध्यान में रखें-

सेवाधारी को दी गयी रसीद पुस्तिकाएँ अधिकतम डेढ़ माह के अंदर जमा हो जानी चाहिए ताकि सदस्यों को पत्रिका मिलने में विलम्ब न हो तथा सेवाधारियों के पास जमा राशि सही समय पर संस्था में जमा हो जाय और संस्था को किसी प्रकार की आर्थिक हानि नहीं उठानी पड़े।

रसीद पुस्तिका जमा करते समय साथ में पूरी राशि अवश्य जमा करें।

आपके पास ऋषि प्रसाद, ऋषि दर्शन से संबंधित जो धनराशि (सदस्यता शुल्क, पत्रिका विक्रय, प्रचार सामग्री विक्रय) एकत्रित होती है, वह अतिशीघ्र ऋषि प्रसाद मुख्यालय/क्षेत्रीय कार्यालय में भिजवाने का ध्यान रखें। (लम्बे समय तक धनराशि सेवाधारियों/सेवाप्रमुखों के पास पड़ी रहने से संस्था को अनावश्यक आर्थिक हानि उठानी पड़ती है।)

ऋषि प्रसाद, ऋषि दर्शन का पैसा भूलकर भी दूसरे किसी सेवाकार्य या घरेलू कार्य में खर्च न करें।

डाक या कुरियर द्वारा आप कभी भी किसी भी प्रकार की नकद राशि न भेजें।

सेवाधारी जिस क्षेत्रीय कार्यालय या सेवा-मंडल से जुड़कर सेवा कर रहे हों वही रसीद पुस्तिका एवं राशि जमा करें।

सेवाधारी स्वयं पहुँचकर रसीद पुस्तिका एवं राशि नहीं जमा करा सकें तो ऋषि प्रसाद के नाम से डी.डी. बना के कवर में डी.डी. और रसीद पुस्तिका डालकर रजिस्टर्ड डाक द्वारा संबंधित कार्यालय को भेज दें।

आप जहाँ भी रसीद पुस्तिका एवं उसकी जमा राशि जमा करवायेंगे वहाँ से उसकी प्राप्ति रसीद अवश्य लें एवं रसीद अपने पास सुरक्षित रखें ताकि भविष्य में कार्यालय से हिसाब मिलान करने में आसानी रहे।

रसीद पुस्तिका के साथ दी जाने वाली पत्रिकाओं का हिसाब सेवाधारी को ही देना होगा। क्योंकि रसीद में भरे अंकों के आधार पर ही सेवाधारी को उतने अंकों की राशि का क्रेडिट (जमा) दिया जाता है। अगर आपने कोई अंक सदस्य को दिये और रसीद में नहीं लिखे तो उस स्थिति में आपके द्वारा मँगवाये गये अतिरिक्त अंकों की राशि आपके खाते में बकाया बतायी जायेगी।

रसीद पुस्तिका के पहले पृष्ठ के पीछे अन्य जानकारी के साथ कैश कॉलम पूर्ण रूप से सही-सही भरें।

अतिरिक्त पत्रिका क्यों ?

सेवाधारियों द्वारा रसीद पुस्तिका जमा कराये जाने के बाद उसमें दर्ज जानकारी के आधार पर सदस्य की पत्रिका का डाक अथवा सेवाधारी द्वारा वितरण सुनिश्चित किया जाता है। सेवाधारियों को उस विवरण के आधार पर सदस्यों की सूची तथा उतनी ही पत्रिकाएँ दी जाती हैं। इसके अलावा सेवाधारी को रुपये 5 (अंग्रेजी – रुपये 6) के दर से माँग के आधार पर अतिरिक्त पत्रिकाएँ दी जाती हैं। जितनी पत्रिकाएँ नये सदस्यों को वितरित करके रसीद पुस्तिका में उचित स्थान पर दर्शायी जाती हैं, उतनी पत्रिकाएँ रसीद पुस्तिका जमा होने पर सेवाधारी के खाते में जमा दर्शायी जाती हैं, उसके अलावा बाकी पत्रिकाओं की राशि जमा करानी होती है। अतिरिक्त पत्रिकाओं की आवश्यकता निम्न कारणों से पड़ती हैः

नये सदस्य बनाते समय उन्हें देने हेतु (इससे सदस्य बनाना आसान होता है तथा सदस्य को भी तुरंत एक पत्रिका पाकर संतोष होता है।)

किसी कारणवश रसीद पुस्तिका एक माह में पूरी न होने की स्थिति में रसीद पुस्तिका कार्यालय में जमा नहीं हो पायेगी, परिणामतः सदस्यों के नाम सेवाधारी सूची/डाक सूची में शामिल नहीं होंगे। ऐसी स्थिति में भी सदस्य को पत्रिका प्राप्ति में व्यवधान न पड़े इस हेतु।

फुटकर बिक्री हेतु।

सेवाधारी द्वारा अपनी ओर से वितरण हेतु।

पूज्य गुरुदेव की प्रेरणा से उन्हीं के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में ऋषि प्रसाद पत्रिका का प्रकाशन किया जा रहा है। ऋषि प्रसाद पत्रिका को नाममात्र सदस्यता शुल्क लेकर पाठकों को उपलब्ध कराया जा रहा है ताकि साधनहीन तथा आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग भी हमारी सनातन संस्कृति तथा आध्यात्मिक ज्ञान के लाभ से वंचित न रहे। विज्ञापन रहित पत्रिका को इतनी कम कीमत पर उपलब्ध कराना किसी भी व्यावसायिक/धार्मिक/सामाजिक संस्था के लिए व्यावहारिक नहीं है।

हमारे लिए भी इस कम कीमत को तभी तक बनाये रखा जा सकता है जब तक हम आवश्यकता से अधिक पत्रिकाएँ मुद्रण करने से बचें तथा छपी हुई पत्रिकाओं का पूरी तरह से वितरण कर दें। पुरानी पत्रिकाएँ हमारे स्टॉक में बिल्कुल भी न बचें। अपने प्रत्येक सेवाकार्य में पैनी दृष्टि रखें।

उपरोक्त लक्ष्य को पार करने के लिए हमें आपके सहयोग की आवश्यकता है। अतः अतिरिक्त पत्रिकाएँ मँगवाने के समय आप कृपया ध्यान दें-

यदि आपको प्रतिमाह एक निश्चित संख्या में ही अतिरिक्त पत्रिकाएँ चाहिए तो स्थायी माँग की सूचना भेज दें। आपकी आगामी सूचना प्राप्त न होने तक इसी निश्चित मात्रा में पत्रिकाएँ भेजी जाती रहेंगी।

यदि आप किसी माह में अथवा स्थायी रूप से अतिरिक्त पत्रिकाएँ नहीं चाहते हों तो कृपया इसकी सूचना भी हमें अवश्य दें। अन्यथा आपकी पूर्व की आवश्यकता के आधार पर अतिरिक्त पत्रिकाएँ भेजे जाने की सम्भावना बनी रहती है। आपके स्पष्ट मना कर देने पर आपको पत्रिकाएँ नहीं भेजी जायेंगी तथा आप असुविधा से बचे रहेंगे।

किसी भी सेवाधारी को उसकी आवश्यकता से अधिक पत्रिकाएँ नहीं भेजी जायेंगी।

कुछ सेवाधारी अति उत्साह में आकर बहुत अधिक पत्रिकाएँ नहीं भेजी जायेंगी।

कुछ सेवाधारी अति उत्साह में आकर बहुत अधिक पत्रिकाएँ मँगा लेते हैं और फिर वापस करते हैं। उनके इस योजनाविहीन सेवाकार्य के कारण वापस की गयी पुरानी पत्रिकाओं को निकालना हमारे लिए एक समस्या बना हुआ है। इसका निदान तभी सम्भव है, जब हम निम्न बिंदुओं को ऋषि प्रसाद सेवाकार्य के लिए आत्मसात कर लें-

अतिरिक्त पत्रिकाओं की माँग भेजने के पूर्व सेवाधारी अपनी आवश्यकता का सही आकलन (अनुमान) करें। आवश्यकता के अनुसार आपके साथ जुड़े हुए अन्य सेवाधारी बंधुओं से भी उनकी वास्तविक आवश्यकता की जाँच कर लें ताकि बाद में आपके पास अप्रयुक्त पत्रिकाएँ नहीं बची रहें।

जो सेवाधारी अपन आवश्यकता से अधिक पत्रिकाएँ मँगाते हैं तथा जिनके पास अप्रयुक्त अतिरिक्त पत्रिकाएँ पड़ी रहती हैं, उन्हें प्रेरित करके 2 माह से अधिक पुरानी पत्रिकाओं को 5 रूपये की दर से बेच दिया जाय तथा इन सेवाधारियों से प्रतिमाह राशि जमा करा ली जाये।

सामान्यतया आपके स्टॉक में भी दो माह से अधिक पुरानी पत्रिकाएँ नहीं बचनी चाहिए।

जिन सेवाधारियों के पास पुरानी पत्रिकाएँ बची रहती हैं, वे सदस्य को उपलब्ध स्टॉक के आधार पर 2-2 पत्रिकाएँ सदस्य बनाते समय ही दे देंगे।

इस युक्ति से अतिरिक्त पत्रिकाएँ अधिक संख्या में एकत्र ही नहीं हो सकेंगी तथा सेवाधारी चिंतामुक्त रहेंगे। आपसे अनुरोध है कि भविष्य में आप उपरोक्त योजना के आधार पर अपने सेवाकार्य को सुनियोजित करें।

शिकायत का निवारण

किसी सदस्य को पत्रिका समय से न मिलने में निम्न कारण हो सकते हैं-

मुख्यालय से डाक द्वारा पत्रिका भेजे जाने के बावजूद डाक की गड़बड़ी के कारण।

सदस्य द्वारा रसीद में अधूरा अथवा अस्पष्ट पता लिखने के कारण।

सेवाधारी द्वारा समय से रसीद पुस्तिका जमा न कराये जाने तथा रसीद पुस्तिका जमा होने तक सदस्य को पत्रिका पहुँचाने का प्रबंध न करने के कारण।

सदस्य का पता बदल गया हो और उसकी सूचना कार्यालय को न दी गयी हो।

सेवाधारी द्वारा समय से वितरण न करने के कारण।

सेवाधारी यदि लिस्ट में पत्रिका मँगाकर स्वयं वितरण न करके पोस्ट द्वारा भेजते हों तो कई बार अधूरा पता लिखने के कारण पत्रिका सदस्य को प्राप्त नहीं होती है।

इसके निवारण हेतु निम्न बातें अवश्य ध्यान में रखें-

जो कारण आपके नियंत्रण में हैं, जैसे रसीद पुस्तिका समय से जमा कराना एवं प्राप्त होने पर पत्रिकाओं का तुरंत वितरण, उन्हें तो तुरंत ही दूर करके कार्यालय को सूचित करें। आपके दायरे से बाहर की शिकायत नोट करके शीघ्र कार्यालय को प्रेषित करें। आवश्यकता पड़ने पर फोन से बात करके तुरंत जाँच भी करवा सकते हैं।

अन्य कारणों हेतु शिकायत का विवरण-पत्र अथवा ई-मेल के माध्यम से निम्न बातों को ध्यान में रखकर भेजें-

सदस्य द्वारा आपके पास दर्ज की गयी शिकायत की तारीख अवश्य लिखें।

सदस्य का रसीद क्रमांक/सदस्य क्रमांक, पूरा नाम, पता (पिनकोड सहित) स्पष्ट अक्षरों में लिखें। यदि फोन नं. हो तो अवश्य लिखें।

शिकायत का स्वरूप अर्थात् पत्रिका किस माह की अथवा कब से अप्राप्त है यह अवश्य लिखें।

यदि वितरण सेवा अथवा पते में परिवर्तन हो तो नयी वितरण व्यवस्था लिखें।

रसीद की फोटोकॉपी भेजते समय रसीद क्रमांक, सदस्य का पूरा नाम पता (पिनकोड के साथ) अलग से अवश्य लिखें क्योंकि कभी-कभी फोटोकॉपी में जानकारी अस्पष्ट होती है।

शिकायतः सदस्य एवं सेवाधारियों के लिए

डाक द्वारा पत्रिका न मिलने के संबंध में-

डाक द्वारा पत्रिका न मिलने के से संबंधित प्राप्त शिकायत का निवारण करते समय प्रथम सदस्य द्वारा पत्र में लिखा पता तथा कम्पयूटर रिकॉर्ड में दर्ज पते का मिलान करते हैं। दोनों पतों का मिलान करते समय यदि कम्पयूटर रिकॉर्ड में दर्ज पता अधूरा अथवा त्रुटियुक्त जान पड़ता हो तो उसमें सदस्य की सूचना के अनुसार सुधार करते हैं। सदस्य को पत्रिकाएँ भेजे जाने की तारीख सहित पूरी जानकारी उपलब्ध करायी जाती है। यदि किसी सदस्य को 2 माह की पत्रिकाएँ अप्राप्त हों तो उसे एक पत्रिका दुबारा भेजते हैं।

सेवाधारी द्वारा पत्रिका न मिलने के संबंध में-

जिन सदस्यों को सेवाधारी द्वारा पत्रिका प्राप्त नहीं होती है, उन सदस्यों को सेवाधारी का नाम, पता, फोन नम्बर अवगत कराते हैं। जहाँ आवश्यक हो वहाँ सदस्य को कुछ पत्रिकाएँ दुबारा भेजते हैं। परिस्थिति अनुसार सदस्य की पत्रिका सेवाधारी सूची से निकालकर डाक द्वारा भेजे जाने की व्यवस्था की जाती है।

सेवाधारी तथा उपमुख्य सेवाधारी को इस शिकायत से अवगत कराते हैं। सेवाधारी द्वारा उसकी सूची में भेजी जा रही अन्य सदस्यों की भी पत्रिकाएँ प्राप्त हो रही हैं या नहीं – यह जानने हेतु उसकी सूची के किसी अन्य सदस्य से इस विषय में पत्राचार करके जानकारी ली जाती है।

रसीद पुस्तिका जमा न होने के कारण प्राप्त शिकायत-

रसीद पुस्तिका जमा न होने के कारण किसी सदस्य की शिकायत प्राप्त होने पर प्रथम तो उस सदस्य की रसीद की फोटोकॉपी मँगवाकर उस सदस्य की पत्रिका तुरंत शुरु की जाती है एवं जिस सेवाधारी ने वहाँ रसीद पुस्तिका जमा नहीं की उससे आग्रहपूर्वक रसीद पुस्तिका शीघ्र मँगवायी जाती है। सेवाधारी अधिक-से-अधिक एक डेढ़ महीने के अंदर रसीद पुस्तिका जमा करायें ताकि ऐसी समस्या न आये।

पता परिवर्तन संबंधी सूचना-

पता-परिवर्तन सूची में रसीद क्रमांक/सदस्य क्रमांक एवं नया पता साफ अक्षरों में पिनकोड तथा फोन नम्बर के साथ अवश्य लिखें। यदि क्रमांक न हो तो पुराना एवं नया पता लिखें।

यदि पते में परिवर्तन के साथ वितरण सेवा में भी परिवर्तन कराना हो तो उसे नये पते के साथ ही सूचित करें अथवा पुराना सेवाधारी क्रमांक अवश्य लिखें।

पोस्ट से सेवाधारी द्वारा वितरण (पोस्ट से एजेंट) तथा पते में परिवर्तन करवाना चाहते हों तो कृपया परिवर्तन सूची एक माह पूर्व प्राप्त हो, इस प्रकार भेजें।

अनुक्रमणिका

जिस कार्य में स्वार्थ, वाहवाही का उद्देश्य न हो उसका नाम है सेवा। वह कर्मयोग है। कर्मयोग भी एक साधना है।

सेवाधारी परिचय पत्र

सभी क्षेत्रीय कार्यालयों द्वारा अलग-अलग डिजाइन में परिचय-पत्र छपवाकर स्थानीय स्तर पर सेवाधारियों में बाँटे जाते रहे हैं।

जो सेवाधारी प्रत्येक तिमाही में कम-से-कम तीन रसीद पुस्तिकाएँ भरकर अपने खाते में जमा करवा रहे हैं, उन्हें गत वर्ष में उनके द्वारा किये गये सेवाकार्य के आधार पर परिचय-पत्र दिया जा सकेगा।

नये सेवाधारी जिन्होंने विगत तीन माह में कम-से-कम तीन रसीद पुस्तिकाएँ जमा कर दी हैं तथा भविष्य में वे प्रत्येक तिमाही में कम-से-कम तीन रसीद पुस्तिकाएँ भरने का संकल्प करते हैं तो उन्हें भी क्षेत्रीय कार्यालय प्रभारी के विवेक पर परिचय-पत्र जारी किये जा सकेंगे।

जो सेवाधारी न्यूनतम एक सौ पत्रिकाओं का वितरण स्वयं ही कर रहे हैं। यदि वे लिखित रूप से यह संकल्प करते हैं कि ऋषि प्रसाद कार्यालय से पत्रिका प्राप्त होने से तीन दिन के अंदर सभी पत्रिकाओं का वितरण कर देंगे तो उन्हें भी यह परिचय पत्र जारी किया जा सकेगा।

सभी परिचय पत्रों में ऋषि प्रसाद के क्षेत्रीय प्रभारी के हस्ताक्षर एवं क्षेत्रीय कार्यालय की मुहर अनिवार्य है।

किसी भी क्षेत्रीय कार्यालय से जारी किया गया यह परिचय पत्र इस बात का प्रमाण होगा कि धारक सेवाधारी न्यूनतम 12 रसीद पुस्तिकाएँ जमा करवा रहे हैं अथवा 100 पत्रिकाओं का वितरण नियत अवधि में स्वयं ही कर रहे हैं।

ऋषि प्रसाद सम्मेलन में इन परिचय पत्र धारकों को विशेष प्राथमिकता दी जायेगी।

यह परिचय-पत्र एक वर्ष के लिए वैध रहेगा तथा प्रतिवर्ष इसका नवीनीकरण करना अनिवार्य होगा।

अनुक्रमणिका

ज्यों-ज्यों इच्छारहित होते हैं, त्यों-त्यों आत्मपद में विश्रांति मिलती जाती है और उसमें फिर सामर्थ्य प्रकट होता है।

जिनकी साधना में रुचि है वे सेवा भी ईमानदारी से करते हैं।

प्रयत्न कर तो प्रभु का होने का कर, प्रभु के निमित्त सेवा का कर, बाकी सारे प्रयत्न उसके हवाले कर दे।

सभी के लिए सद्भाव रखो और संग्रह छोड़कर त्याग का मार्ग अपनाओ तो निश्चिंत जीवन आयेगा।

'अशुभ का चिंतन करने वाले और अमंगलकारी लोग हमारे समीप न आयें।' (सामवेद)

सेवाधारियों के लिए विशेष निर्देश

हमें अपने सेवाकार्य को इस तरह की पूर्णता प्रदान करनी है, जिससे ऋषि प्रसाद के सदस्यों को पूरी संतुष्टि मिले, साथ-ही-साथ पूज्य गुरुदेव के सत्संग-अमृत का लाभ अधिक-से-अधिक लोगों को मिल सके। इस निमित्त कुछ निम्न सुझाव हैं-

सेवामंडल प्रमुख या सेवाधारी

आप अपने शहर एवं आस-पास के सभी पुस्तकालयों में व्यक्तिगत स्तर पर ऋषि प्रसाद के 2-3 पूर्वांक (पूर्व के महीनों के अंक) निःशुल्क देकर उन्हें वार्षिक/पंचवार्षिक सदस्य बनाने हेतु प्रोत्साहित कर सकते हैं। समिति के सदस्य साधकगण यदि चाहें तो व्यक्तिगत स्तर पर भी कुछ पुस्तकालयों को वार्षिक सदस्यता भेंटस्वरूप दे सकते हैं।

ऋषि प्रसाद के पूर्वांक घर, दुकान, ऑफिसेस, दवाखाने, सैलून आदि में पहुँचाकर लोगों को ऋषि प्रसाद से खूब अच्छी तरह परिचित करा सकते हैं। पत्रिका-वितरण के कुछ समय पश्चात सेवाधारी उपरोक्त सभी स्थानों में मुख्य व्यक्ति से सम्पर्क कर उन्हें सदस्यता-प्राप्ति के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इस योजना को क्रियान्वित करने पर अनेक स्थानों पर सेवाधारियों/समितियों को आशातीत सफलता मिली है।

विद्यार्थियों में अच्छे संस्कारों के सिंचन एवं सत्साहित्य के प्रति रुझान पैदा करने हेतु पत्रिका की विषय-वस्तु पर आधारित निबंध-प्रतियोगिता, प्रश्न-मंच आदि प्रतियोगिताओं का आयोजन विद्यालय स्तर पर किया जा सकता है। चूँकि पत्रिका छात्रों के घर पर ही रहेगी, अतः उनका पूरा परिवार पत्रिका से परिचित हो सकेगा। इस तरह की प्रतियोगिता का आयोजन सेवाधारी या सेवाधारी मंडल के आधार पर कर सकते हैं।

पब्लिक/कॉन्वेंट स्कूलों जैसी शिक्षण संस्थाओं के छात्रों को ऋषि प्रसाद के अंग्रेजी संस्करण का वितरण किया जाना अंग्रेजी संस्करण के प्रचार-प्रसार के लिए एक ठोस कदम होगा।

एक बार पत्रिका वितरण के पश्चात इन्हीं विद्यालयों में पुनः सम्पर्क करके छात्रों/शिक्षकवर्ग को अथवा पूरे विद्यालय को ही ऋषि प्रसाद का सदस्य बनाने हेतु प्रयास किया जा सकता है। टॉइम्स ऑफ इंडिया एवं हिन्दुस्तान टॉइम्स जैसे अख़बार पब्लिक स्कूलों के सभी छात्रों से इकट्ठा चंदा लेकर वर्षों से अपनी प्रसार संख्या बढ़ाने के लिए इस तरह के सफल अभियान के लिए स्थानीय श्री योग वेदांत सेवा समिति से सहयोग प्राप्त कर सकते हैं।

यदि आप किसी सेवा से जुड़े हों और आपको अपने उप सेवाधारी प्रमुख से किसी भी परिस्थिति में अलग होना हो तो उससे (उप सेवाधारी प्रमुख या सेवामंडल) सहमति लेकर ही अलग से सेवाधारी क्रमांक ले सकते हैं।

सेवामंडल या किसी उप सेवाधारी से, आप जहाँ रसीद पुस्तिका और पत्रिकाएँ लेते हैं, वहाँ के स्थान पर यदि किसी परिस्थिति में कहीं अन्यत्र रसीद पुस्तिका जमा करवानी पड़ रही हो तो अपने सेवामंडल या प्रमुख से उसकी सहमति ले लें।

अभियान स्कूल, सरकारी ऑफिस या किसी गैर सरकारी क्षेत्र में सदस्य बना सकते हैं। सदस्य बनाते समय यदि कहीं भी सदस्य बनते हैं तो वहाँ पोस्ट की भी व्यवस्था अहमदाबाद कार्यालय द्वारा होगी।

नये सेवाधारियों के लिए निर्देश

आपसे नम्र निवेदन है कि निम्न बातों को ध्यान में रखकर ऋषि प्रसाद के उत्तम सेवक बन सकते हैं-

कृपया आवेदन-पत्र भरने के पूर्व इस पुस्तक का अध्ययन कर लें ताकि सेवा-प्रणाली को ठीक से समझकर आप उत्तम प्रकार से सेवा कर सकें। उपरोक्त किसी भी बिन्दु पर आपको किसी प्रकार की दुविधा हो तो कृपया आवेदन-पत्र भरने से पहले अहमदाबाद/क्षेत्रीय कार्यालय से जानकारी अवश्य ही प्राप्त करें।

सदस्य बनाते समय सेवाधारी निम्न बातों पर ध्यान दें-

रसीद में सदस्य का पूरा नाम, पता, गाँव, पोस्ट, वाया, तहसील, जिला, भाषा, फोन नम्बर आदि सही व स्पष्ट अक्षरों में लिखें।

पिन कोड लिखने से सदस्य को पत्रिका सरलता एवं शीघ्रता से प्राप्त हो सकेगी, अतः पिन कोड अवश्य लिखें

शुरुआती अंक क्रमांक तथा सदस्य बनाते समय जितने अंक दिये गये उनके क्रमांक सही लिखे हैं या नहीं, इसका ध्यान रखें।

रसीद में सदस्यता की अवधि एवं राशि शब्दों तथा अक्षरों में स्पष्ट रूप से लिखें, उसमें विसंगति न हो।

रसीद में किसी प्रकार की काट-छाँट न हो इसका ध्यान रखें। अनिवार्य परिस्थिति में किसी प्रकार का परिवर्तन करना पड़े तो कार्यालय प्रति/सदस्य प्रति तथा सेवाधारी प्रति पर समान रूप से करें।

किसी भी सेवाधारी द्वारा एक से अधिक सेवाधारी क्रमांक से एवं एक से अधिक क्षेत्रीय कार्यालयों के साथ व्यवहार करना उचित नहीं है। आप अपनी सुविधानुसार एक ही जगह से व्यवहार करें।

कृपया भविष्य में रसीद  बुक, पत्रिकाओं की लेन-देन एवं पत्र व्यवहार इत्यादि सभी कार्यों हेतु अपना सेवाधारी क्रमांक एवं फोन नम्बर तथा पूरा पता अवश्य लिखें।

ऋषि प्रसाद के दैवी कार्य की प्रगति के लिए उत्तरायण के पावन अवसर पर आप जैसे कर्मनिष्ठ सेवाधारियों का वार्षिक सम्मेलन संपन्न होता है। भविष्य में आप इस अवसर का लाभ जरूर प्राप्त करें।

डाक द्वारा वितरित की जाने वाली पत्रिकाओं को आप अपने हाथों से बाँटने (वितरित करने) का प्रयास करें ताकि पाठकों को पत्रिका-वितरण की सुव्यवस्था के संबंध में विश्वास दिलाया जा सके। इसके लिए आप अपने नजदीकी कार्यालय (क्षेत्रीय/अहमदाबाद) से अपने क्षेत्र की पोस्ट लिस्ट प्राप्त कर सकते हैं।

पत्रिका वितरण आप 2-3 दिन में ही पूरा करें।

रसीद पुस्तिका अधिकतम डेढ़ माह में जमा होनी चाहिए ताकि सदस्यों को पत्रिका मिलने में विलम्ब न हो।

रसीद पुस्तिका जमा करते समय रसीद पुस्तिका का पूरा पेमेंट अवश्य भेजें परंतु नकद राशि डाक/कुरियर में न भेजकर, डाक/कुरियर से रसीद पुस्तिका भेजनी हो तो साथ में डी.डी. (ऋषि प्रसाद के नाम अहमदाबाद में देय) भेज सकते हैं।

ऋषि प्रसाद के पाठकों को किसी भी तरह की शिकायत का मौका न मिले ऐसा हर सम्भव प्रयास करें।

अनुक्रमणिका

ऋषि प्रसाद क्षेत्रीय कार्यालयों के पते

क्षेत्रीय कार्यालय दिल्ली

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

करोलबाग, रविन्द्र रंगशाला के सामने,

हनुमान मंदिर के पास

वन्दे मातरम् मार्ग

नई दिल्ली 110060

सम्पर्कः 011-25863532, 25764161, 9311596598

क्षेत्रीय कार्यालय सूरत

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

जहाँगीरपुरा, सूरत 395005

सम्पर्कः 0261-2772201, 9376099043, 9409369843

क्षेत्रीय कार्यालय बड़ौदा

पताः C/o श्री योग वेदान्त सेवा समिति

यू-7/8, अंतरिक्ष कॉम्पलेक्स,

पहली मंजिल, सयाजी गंज,

वर्ल्ड ट्रेड सेंट के सामने,

बड़ौदा 390005

सम्पर्कः 0265-2363433, 2680844, 9428066177

क्षेत्रीय कार्यालय, गोधरा

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

कनेलाव तालाब के पास, जाफराबाद,

गोधरा, जिला – पंचमहाल

गुजरात – 389001

सम्पर्कः 9429451694

क्षेत्रीय कार्यालय, भोपाल

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

बायपास रोड, गांधीनगर, पेट्रोल पंप के पीछे,

बैरागढ़, भोपाल – 462036

सम्पर्कः 9302275116

क्षेत्रीय कार्यालय, इंदौर

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

खंडवा रोड, बिलावली तालाब के पास,

इंदौर, मध्य प्रदेश 452020

सम्पर्कः 9300040024, 9303474448

क्षेत्रीय कार्यालय, ग्वालियर

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

शिवपुरी लिंक रोड, केदारपुर,

कोठीगाँव के सामने,

ग्वालियर, मध्यप्रदेश

474001

सम्पर्कः 0751-2334888, 9300723816

क्षेत्रीय कार्यालय, मुंबई

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

पेरू बाग़, अनुपम सिनेमा के पीछे,

आरे रोड, गोरेगाँव (पूर्व), मुंबई – 400063

सम्पर्कः 9320540095

क्षेत्रीय कार्यालय, नागपुर

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

कलमेश्वर रोड, बोरगाँव फाटा,

फेटरी, नागपुर, महाराष्ट्र – 441501

सम्पर्कः 0712-2667267/68

8055599934, 8087805176

क्षेत्रीय कार्यालय, औरंगाबाद

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

सर्वे नं. – 32, बेगमपुरा, औरंगाबाद

महाराष्ट्र – 431001

सम्पर्कः 9028062626, 9371457900

क्षेत्रीय कार्यालय, नासिक

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

गंगापुर रोड, सावरकर नगर, नासिक

सम्पर्कः 0253-2345440, 2342340, 9373321703

9225065577

क्षेत्रीय कार्यालय, पुणे

पताः C/o श्री योग वेदांत समिति,

डिपार्टमेंटल स्टोर, 345, रास्तापेठ,

के.ई.एम. हॉस्पिटल के सामने,

पाहुणचार होटल के पास,

पुणे (महाराष्ट्र) – 411011

सम्पर्कः 9325641284

क्षेत्रीय कार्यालय, प्रकाशा

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

केदारेश्वर रोड, प्रकाशा, ता.शहादा,

जिला नंदुरबार (महाराष्ट्र) – 425422

सम्पर्कः 02565-240274

9324503650, 9404429443

क्षेत्रीय कार्यालय, उल्हासनगर

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

ओ.टी. सेक्शन, खेमानी, जिला – ठाणे

महाराष्ट्र – 421002

सम्पर्कः 0251 – 3196116, 9323946116, 7738179809

क्षेत्रीय कार्यालय, नांदेड़

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

पिपलगाँव महादेव, ता. अर्धापुर,

जिला नांदेड़ महाराष्ट्र – 431602

सम्पर्कः 02462-322211, 9370571586

क्षेत्रीय कार्यालय, जयपुर

पताः संत श्री आशाराम जी साहित्य केन्द्र

पहली मंजिल, जनाना हॉस्पिटल के सामने, स्टेशन रोड

चांदपोल, जयपुर (राजस्थान) 303012

सम्पर्कः 0141-3271911,

क्षेत्रीय कार्यालय, जोधपुर

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

पालगाँव, जोधपुर (राजस्थान) – 342001

सम्पर्कः 0291-2742500, 8104431365

क्षेत्रीय कार्यालय, कोटा

पताः कोटा ऋषि प्रसाद कार्यालय

C/o सुरेश गौतम (एडवोकेट)

भाग्यलक्ष्मी कॉम्पलेक्स,

कोटरी रोड,

गुमानपुरा, कोटा (राजस्थान) – 324007

सम्पर्कः 0744-3296001, 9352995449

क्षेत्रीय कार्यालय, मोहाली (चंडीगढ़)

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

जयंती माता मंदिर रोड, सी.जी.आई. से 4 कि. मी. आगे,

गाँव स्यूँक, डाकघर – जयंती देवी जिला – मोहाली,

पंजाब – 140901

सम्पर्कः 9317847846, 0172-2785878

क्षेत्रीय कार्यालय, लुधियाना

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

डेहलों रोड, टिब्बा गाँव साहनेवाल,

लुधियाना (पंजाब) – 141120

सम्पर्कः 0161-2847846,

9356540240, 9356673946

क्षेत्रीय कार्यालय, लखनऊ

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

32 पी.ए.सी. बटालियन के पीछे,

कानपुर रोड, लखनऊ – 226023

सम्पर्कः 9335952231, 8604963399

7499382257

क्षेत्रीय कार्यालय, वाराणसी

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

ग्राम – अनौरा, पोस्ट – भरौआ

वाराणसी, उत्तर प्रदेश – 221001

सम्पर्कः 0542-3209666, 9335002638

क्षेत्रीय कार्यालय, आगरा

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

आगरा-मथुरा रोड, सिकंदरा,

आगरा (उ.प्र.) – 282007

सम्पर्कः 0562-2641770, 2642016-7,

9152428933

क्षेत्रीय कार्यालय, पटना

पताः संत श्री आशाराम जी सत्संग केन्द्र,

 दूसरी मंजिल लक्ष्मेश्वरी कॉम्पलेक्स,

भारतीय भवन गली, ठाकुरवाड़ी रोड,

कदमकुआँ, पटना, बिहार 800003

सम्पर्कः 9334959509. 9304545496

क्षेत्रीय कार्यालय, जम्मू

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

भगवती नगर, अमरनाथ यात्री भवन के पास,

जम्मू (जम्मू-कश्मीर) – 180001

सम्पर्कः 9419182720

क्षेत्रीय कार्यालय, रायपुर

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

लवकुश वाटिका, वी.आई.पी. रोड,

रायपुर (छ.ग.) – 492001

सम्पर्कः 0771-3299248

9424259621

क्षेत्रीय कार्यालय, भुवनेश्वर

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

तपोवन, खंडागिरी,

भुवनेश्वर – 751030

सम्पर्कः 9438734952, 9338702920

क्षेत्रीय कार्यालय, कोलकाता

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

पाँच रोड, पोलिस पाडा,

नेताजी सुभाष इंजीनियरिंग कॉलेज के पास

गारिया, कोलकाता,

पश्चिम बंगाल – 700152

सम्पर्कः 9331553679

क्षेत्रीय कार्यालय, हैदराबाद

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

तेलुगू एकेडमी के सामने

3-6-217/2, हिमायत नगर,

हैदराबाद (आंध्र प्रदेश) – 500029

सम्पर्कः 9390192462

क्षेत्रीय कार्यालय, बैंगलूरु

पताः संत श्री आशाराम जी आश्रम,

नं. – 15B 26th Cross, 17th main,

बनशंकरी, सेकंड स्टेज,

पुलिस स्टेशन के पीछे, बैंगलूरु

(कर्नाटक) – 560070

सम्पर्कः 9343318599

9342347311, 9342347322

संदेश

"मेरे गुरुदेव की कृपा प्रसादी ऋषि प्रसाद के रूप में ऋषि प्रसाद के सेवकों द्वारा घर-घर अभी पहुँच रही है। फर्क इतना है कि मेरे गुरुदेव सिर पर सत्साहित्य की गठरी बाँध के ले जाते थे और अभी उनके पोते.... मैं बापू जी (साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज) का शिष्य हूँ तो बेटा हुआ और ये मेरे शिष्य तो उनके पोते, वही काम अपने ढंग से कर रहे हैं। कोई साईकिल पर ले जाते हैं तो कोई बस में ले जाते हैं, कोई पैदल थैले में ले  जाते हैं लेकिन काम वही कर रहे हैं।

मेरे गुरुदेव की सेवा तो बीज था, मैंने उसका पौधा लगाया पर तुमने तो उसको वटवृक्ष बनाने का जो बीड़ा उठाया है यह कोई अभागे आत्माओं का काम नहीं है। ऋषियों की, संतों की, वैदिक संस्कृति की प्रसादी लोगों तक पहुँचाना यह स्वार्थी आदमी के बस का नहीं है।

सेवा करके जो वाहवाही चाहता है वह अपनी सेवा का धन खर्च डालता है। ऋषि प्रसाद देने जाते हो या जिनको सदस्य बनाते हो उनकी तरफ से तुमको आदर भी मिलता होगा। यह आदर हमारा हो रहा है यह गलती मत करना। यह आदर भगवान का हो रहा है। भगवान ने ही हमको सत्प्रेरणा दी है। 'भगवान यह आपका आदर है। मेरे शरीर का आदर नहीं है। यह मरने वाले शरीर का आदर नहीं है।' - इस प्रकार उसकी याद डाल दोगे न, तो भगवान तुमको और आदरणीय बना लेंगे। 'मेरा आदर होता है' ऐसा मत मानो और जहाँ आदर होता है उधर पत्रिका दें, जिधर अनादर होता है उधर पत्रिका न दें – ऐसा नहीं करना। जहाँ अनादर होता है वहाँ खास जाओ।

आदर तथा अनादर, वचन बुरे त्यों भले। निंदा स्तुति जगत की, धर जूते के तले।।

वह आदमी ईश्वर को पा लेगा। वह दुनिया को बहुत कुछ दे सकता है। आदर को भी अपने शरीर का आदर नहीं मानेगा। अनादर भी मेरा नहीं। अपना उद्देश्य तो सेवा का है।" – पूज्य बापू जी।

विश्व के 246 देशों में, दस भाषाओं में प्रकाशित होने वाली ऋषि प्रसाद करोड़ों पाठकों की चहेती व विश्वसनीय आध्यात्मिक पत्रिका है। इसकी सेवा करने वालों को हमारा हार्दिक अभिनंदन !

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