सुख-समृद्धि
का आधार –
गाय

पूज्य बापू जी का राष्ट्र-हितकारी संदेश
गौपालक और गौप्रेमी धन्य हो जायेंगे...
देशी
गाय के दूध,
छाछ, झरण
(मूत्र), गोबर
आदि से अनेक
बीमारियों से
रक्षा होती है
और गौ-चिकित्सा
के अंतर्गत
इनके प्रयोग
से विभिन्न
बीमारियाँ
मिटायी भी जाती
हैं । पंचगव्य
से तो कई
असाध्य रोग भी
मिटाये जाते
हैं ।
गौ-चिकित्सा
एवं
आयुर्वेदिक, प्राकृतिक
आदि
चिकित्सा-पद्धतियों
को बढ़ावा
दिया जाय ताकि
विदेशी दवाओं
के लिए होने
वाले हजारों
करोड़ रूपयों
के खर्च और
उनके दुष्प्रभावों
(साईड
इफेक्ट्स) से
बचा जा सके ।
केमिकल
के फिनायल व
उसकी
दुर्गन्ध से
हवामान दूषित
होता है ।
गौ-फिनायल से
आपकी
सात्त्विकता,
सुवासितता
बढ़ेगी ही ।
गौ-गोबर
के कंडे से जो
धूआँ निकलता
है, उससे हानिकारक
कीटाणु नष्ट
होते हैं । शव
के साथ श्मशान
तक की यात्रा
में मटके में
गौ-गोबर के
कंडे जलाकर ले
जाने की प्रथा
के पीछे हमारे
दूरद्रष्टा
ऋषियों की शव
के हानिकारक
कीटाणुओं से
समाज की सुरक्षा
लक्षित है ।
गोमूत्र
अर्क बनाने
वाली
संस्थाएँ एवं
जो लोग
गोमूत्र से
फिनायल व
खेतों के लिए
जंतुनाशक दवाइयाँ
बनाते हैं, वे 8
रूपये प्रति
लीटर के मूल्य
से गोमूत्र ले
जाते हैं ।
गाय 24 घंटे में 7
लीटर मूत्र
देती है तो 56 रूपये
होते हैं ।
उसके मूत्र से
ही उसका खर्चा
आराम से चल
सकता है ।
अपने
खेतों में
गायों का होना
पुण्यदायी,
परलोक
सुधारने वाला
और यहाँ
सुख-समृद्धि
देने वाला
साबित होगा ।
अगर गोमूत्र,
गौ-गोबर का
खेत-खलिहान
में उपयोग हो
जाय तो उनसे
उत्पन्न अन्न,
फल, सब्जियाँ
प्रजा का
कितना हित
करेंगी,
कल्पना नहीं कर
सकते !
भारत
को भूकम्प की
आपदाओं से
बचाने के लिए
मददगार है
गौ-सेवा ।
हे
देशवासियो !
सुज्ञ सरकारो ! इस
बात पर आप
सकारात्मक
ढंग से सोचने
की कृपा करें
।
निवेदन
गाय
ईश्वर की
अनमोल कृति है
। गाय का
प्राकृतिक, आर्थिक,
धार्मिक,
सांस्कृतिक,
आध्यात्मिक –
सभी
दृष्टियों से
महत्त्व है ।
जैसे ब्रह्मनिष्ठ
संतों के बिना
जीवन में
आध्यात्मिक
उन्नति
असम्भव है ।
गाय का केवल
दूध ही नहीं
बल्कि पाँचों
गव्य (दूध, दही,
घी, गोबर व
गोमूत्र) और
इनका मिश्रण
पृथ्वी पर
अमृततुल्य
हैं । उसके
अलावा गौ की
सेवा और गौओं
से बनने वाला
वातावरण,
गो-रज, गायों
के रँभाने की
ध्वनि और
गायों की आभा –
ये सभी
अपना-अपना
महत्त्व रखते
हैं, अपने-अपने
लाभ देते हैं
। गाय
स्वास्थ्य,
सात्त्विकता,
आध्यात्मिकता,
पर्यावरण-सुरक्षा,
राष्ट्रीय
समृद्धि – सभी
में लाभदायी
एवं
महत्त्वपूर्ण
है । गायों का
महत्त्व केवल
इन्हीं बातों
पर नहीं है, वे
दुःख-दरिद्रता
को भी दूर
करने वाली हैं
।

पूर्वकाल
में लोग गौ की
महिमा को
जानते थे और उसका
खूब लाभ भी
लेते थे इसलिए
गोहत्या नहीं
होती थी । दूध,
घी आदि से लोग
परिपुष्ट थे ।
ब्रह्मवेत्ता
महापुरुषों
का
सत्संग-श्रवण
व गव्यों का
सेवन
विशेषरूप से
होता था ।
गौ-आधारित
अर्थतंत्र के
बल पर भारत
में आर्थिक
समृद्धि बहुत
थी ।
यदि
हम सोचते हैं
कि 'हम गौ-सेवा
क्यों करें ?
गोदुग्ध आदि
का सेवन क्यों
करें ?.... ' तो
जरा विचार
करें कि आज हम
अपने
स्वास्थ्य पर
इतना खर्च
करते हैं फिर
भी स्वास्थ्य
की क्या
स्थिति है ?
यदि देशी गाय
व उससे
प्राप्त
होने
वाले गव्यों
की उपयोगिता
को समझकर उनका
लाभ लिया जाय
तो अनेक
प्रकार की
बीमारियों से
तो सहज ही
बचेंगे, साथ
ही प्रसन्न मन
व सात्त्विक
बुद्धि रूपी
धन भी हमें
प्राप्त होगा
। और यही धन है
जो हमारी
सर्वांगीण
उन्नति करेगा
।
इस
पुस्तक में
सामान्य
व्यक्ति सुखी
व स्वस्थ जीवन
के लिए गाय से
कैसे लाभ ले,
उसकी आर्थिक स्थिति
कैसे सुधरे –
इनके लिए
सुंदर प्रयोग
दिये गये हैं,
साथ ही साथ
अर्थतंत्र की
रीढ़ कैसे है
इस पर भी
प्रकाश डाला
गया है । आज
जबकि विदेशी
लोग भी भारतीय
नस्ल की गायों
पर आया कर रहे
हैं और 'ए – 2
दूध' ('ए-1
दूध' जो
जहरीला रसायन 'बीटा
केसोमॉर्फीन--7'
होता है उससे
रहित अर्थात्
भारतीय नस्ल
की गाय का दूध)
का प्रचार कर
रहे हैं ऐसे
में
भारतवासियों
को जरूरी है
कि वे भारतीय
नस्ल की गाय
की महत्ता
समझें तथा
जर्सी,
होल्सटीन आदि
विदेशी पशु,
जिन्हें 'गाय' का
नाम दिया गया
है, उनसे होने वाली
हानियों के
बारे में
जानकर जागरूक
हों ।
यह
पुस्तक बताती
है कि गौरक्षा
एवं गौ-पालन
केवल किन्हीं
धार्मिक संगठनों
का धार्मिक
मुद्दा नहीं
है अपितु मानवमात्र
एवं
प्राणिमात्र
के जीवन से जुड़ा
महत्त्वपूर्ण
पहलू है और हम
व्यक्तिगत स्तर
पर गौरक्षा
में किस
प्रकार
योगदान देकर अपना
जीवन स्वस्थ,
समृद्ध और
उन्नत कर सकते
हैं ।
संतों
ने गौरक्षा के
लिए पूरा जीवन
लगाया और आज
भी लगा रहे
हैं । इस
पुस्तक को
पढ़कर उन संतों
की एवं गाय की
महिमा हम समझ
लें तथा गौ से
विभिन्न
प्रकार से
लाभान्वित हो
के अपना सर्वांगीण
विकास साध लें
– इसी सद्भाव
से यह पुस्तक
समाजरूपी
भगवान के करकमलों
में अर्पित है
।
इस पुस्तक
को स्वयं
पढ़ना और अन्य
लोगों तक
पहुँचाना
बहुत बड़ी
राष्ट्रसेवा
है, संस्कृति
सेवा है ।

2 शास्त्रों
में वर्णित गौ-महिमा
5 देशी
गाय की इतनी
महिमा क्यों ?
6 भारतीय
गाय की अदभुत
विशेषताएँ
7 बाँसुरी
की मधुर ध्वनि
है प्रिय
8 गाय के
रंग का उसके
दूध पर प्रभाव
9 भारत
में गाय क्यों
पूजी जाती है ?
10 असाध्य
रोगों का
रामबाण इलाज
11 ग्रहबाधा
व वास्तुदोष
दूर करने का
अचूक उपाय
12 मेधावी
व निरोगी
संतान हेतु
अनुभूत प्रयोग
14 जर्सी,
होल्सटीन आदि
विदेशी पशुओं से
सावधान !
15 देशी
गाय व जर्सी,
होल्सटीन आदि पशुओं
का तुलनात्मक
अध्ययन
16 गाय की
सेवा स्वयं की
सेवा है
18 फिर
गोदुग्ध के
सिवा अन्य दूध
का सेवन क्यों
?
19 बालकों
के लिए वरदान
गोदुग्ध
20 गौर
वर्ण व ओजस्वी-तेजस्वी
संतान हेतु
21 गोदुग्ध-सेवन
करने वाले
ध्यान दें !
22 कहीं
आप धीमा जहर
तो नहीं पी
रहे हैं !
23 बलवर्धक
मलाई
25 जठराग्निवर्धक
गोतक्र (मट्ठा)
26 ब्रह्म
ऊर्जा से
भरपूर मक्खन
27 सात्त्विक,
बल-बुद्धिवर्धक
गोघृत
29 रोगाणुनाशक
गोबरः देशी
गाय के गोबर
के लाभ
30 नार्मल
डिलीवरी हेतु
रामबाण
प्रयोग
32 गाय के
गोबर ने बनाया
सुखी व समृद्ध
33 गोहत्या
के पक्ष में
दिये जाने
वाले कुछ कुतर्क
34 स्वास्थ्य,
मानवता व
संस्कृति की
रक्षा चाहते
हैं तो जरूरी
है....
35 स्व-रोजगार
का उत्तम
मार्गः
गौ-पालन
36 जानिये
संतों
महापुरुषों
के उद्गार....
37 गौरक्षा
में कैसे दें
अपना योगदान ?
38 गौरक्षण
व संवर्धन के
प्रेरणास्रोतः
संत
परमात्मा
की अनुपम कृति
व सनातन
संस्कृति की
अनमोल धरोहर
है देशी गाय,
जो मनुष्य को
सभी प्रकार से
पोषण देने व
उन्नत करने
में महत्त्वपूर्ण
भूमिका
निभाती है ।
जहाँ एक ओर
गाय का दूध,
दही, घी,
गोमूत्र व
गोबर व्यक्ति
को स्वस्थ, बुद्धिमान
व बलवान बनाते
हैं तथा गाय
का दर्शन,
स्पर्श,
परिक्रमा
मनुष्य के
पाप-ताप का
नाश करते हैं,
वहीं दूसरी ओर
गाय व गौ-उत्पाद
समाज के लिए
वरदानस्वरूप
हैं एवं
किसानों व
बेरोजगारों
के लिए रोजगार
के द्वार खोल
देते हैं ।
कहावत हैः
जननी
जनकर दूध
पिलाती, केवल
साल-छःमाही भर
।
गोमाता
पय सुधा1
पिलाती, रक्षा
करती जीवनभर
।।
1
दूधरूपी अमृत
गाय
माँ के समान
जीवनभर हमारा
पालन-पोषण
करती है ।
जीवन की लगभग
सम्पूर्ण
दैनंदिन
आवश्यकता गाय
से पूरी हो
जाती है ।
इसीलिए हमारी
संस्कृति में
गाय को माता
का दर्जा दिया
गया है । विष्णुधर्मोत्तर
पुराण में आता
हैः गावो
विश्वस्य
मातरः । गाय
सम्पूर्ण
विश्व की माता
है ।
महाभारत
(अनुशासन
पर्वः 69.7 )
मातरः
सर्वभूतानां
गावः
सर्वसुखप्रदाः
।
'गौएँ
सम्पूर्ण
प्राणियों की
माता कहलाती
हैं । वे सबको
सुख देने वाली
हैं ।'
गाय
प्रेम, दया,
त्याग, संतोष,
सहिष्णुता
एवं वात्सल्य
की साक्षात
मूर्ति है ।
स्वामी रामसुखदास
जी ने कहा हैः "गाय
की छाया भी
बड़ी शुभ होती
है । उसके
दर्शन से
यात्रा सफल हो
जाती है । दूध
पिलाती गाय का
दर्शन बहुत
शुभ माना जाता
है ।
सुरभि
सनमुख सिसुहि
पिआवा ।......
.....मंगल गन जनु
दीन्हि देखाई
।।
'गायें
सामने खड़ी
बछड़ों को दूध
पिलाती हैं ।....
.....मानो सभी
मंगलों का
समूह दिखाई
दिया ।'
(श्रीरामचरित.
बा.कां 302.3)
गाय
महापवित्र
होती है ।
उसके शरीर का
स्पर्श करने
वाली हवा भी
पवित्र होती
है । गाय की
सेवा करने से
अंतःकरण
निर्मल होता
है ।"
पूज्य
संत श्री
आशाराम जी
बापू कहते हैं
कि "गौ और गीता
ईश्वरप्रदत्त
अमूल्य निधि
हैं । इन
दोनों का
आश्रय लेकर
मनुष्यमात्र
स्वस्थ, सुखी
व सम्मानित
जीवन की
प्राप्ति और
परमात्मप्राप्ति
भी कर सकता है
।"
गाय
के रोमकूपों
में तैंतीस
करोड़
देवी-देवताओं
का अर्थात्
सात्त्विक
कणों,
सात्त्विक तरंगों
का वास है ।
श्रद्धा-भक्ति
से गौ को प्रणाम
करने से इन
सभी
देवी-देवताओं
को एक साथ
प्रणाम हो
जाता है । इन
सबको एक साथ
प्रसन्न करना
हो तो सरल व उत्तम
साधन है
गौ-सेवा । आप
गौ को एक
ग्रास खिला दीजिये,
उपरोक्त सारे
देवी-देवताओं
को पहुँच जायेगा
और उससे आपको
उन सभी की
प्रसन्नता
प्राप्त हो
जायेगी ।
'गौरूपी
तीर्थ में
गंगा आदि
नदियों तथा
तीर्थों का
वास है, उसकी
परम पावन धूलि
में पुष्टि
विद्यमान है,
उसके गोबर में
साक्षात् लक्ष्मी
विराजमान हैं
और उसे प्रणाम
करने से व्यक्ति
धर्म-सम्पन्न
हो जाता है ।
अतः गौ
सदा-सर्वदा
प्रणाम करने
योग्य है ।'
(विष्णुधर्मोत्तर
पुराणः 2.42.58)
'जो
प्रतिदिन
स्नान करके गौ
का स्पर्श
करता है, वह
मनुष्य सब
प्रकार के
स्थूल पापों
से भी मुक्त
हो जाता है ।
जो गौओं के
खुर से उड़ी
हुई धूल को
सिर पर धारण
करता है, वह
मानो तीर्थ के
जल में स्नान
कर लेता है और
सभी पापों से
छुटकारा पा
जाता है ।' (
पद्म पुराण,
सृष्टि खंड,
अध्याय 57)
'गौ
का स्पर्श
करने,
सात्त्विक-सदाचारी
ब्राह्मण को
नमस्कार करने
और सद्गुरु,
देवता का भलीभाँति
पूजन करने से
गृहस्थ सारे
पापों से छूट जाते
हैं ।' (स्कन्द
पुराण, प्रभास
खंड)
'स्पर्श
कर लेने मात्र
से ही गौएँ
मनुष्य के समस्त
पापों को नष्ट
कर देती हैं
और आदरपूर्वक
सेवन
(सेवा-पूजन)
किये जाने पर
अपार
सम्पत्ति प्रदान
करती है । वे
गायें दान
दिये जाने पर
सीधे स्वर्ग
ले जाती हैं ।
ऐसी गौओं के
समान और कोई
भी धन नहीं है
।'
(बृहस्तपराशर
स्मृति)
'जो
प्यास से
व्याकुल हुई
गौओं को पानी
पीने में
विघ्न डालता
है, उसे
ब्रह्मघाती
समझना चाहिए ।'
(महाभारत,
अनुशासन
पर्वः 24.7)
'जो
एक वर्ष तक
प्रतिदिन
स्वयं भोजन के
पहले दूसरे की
गाय को एक
मुठ्ठी घास
खिलाता है,
उसका वह व्रत
समस्त
कामनाओं को
पूर्ण करने वाला
होता है ।
(महाभारत, अनुशासन
पर्वः 69.12)
महाभारत
में आता हैः गावः
सर्वसुखप्रदाः
। 'गौएँ
सबको सुख देने
वाली हैं ।'
गाय समस्त
सुखों की जननी
है । गाय के
अभाव में दुःख,
व्याधि, संकट
आदि अनेक
प्रकार की
समस्याएँ
उपस्थित हो
जाती हैं ।
इसीलिए हमारे
पूर्वज घर-घर
गाय रखते थे ।
रामायण के बाल
कांड में आता
है कि 'अयोध्या
में सभी
गृहस्थ
गाय-बैल से
समृद्ध थे ।'
राजा
जनक की मिथिला
नगरी भी गौओं
से परिपूर्ण थी
। युधिष्ठिर
का
इन्द्रप्रस्थ
गौओं से भरा
हुआ था ।
वैदिक काल से
लेकर भगवान
श्रीकृष्ण के
समय तक
प्रत्येक
व्यक्ति के
पास एक से
अधिक गाय होती
थी । सब लोग
सुखी थे ।
सुबह
उठो तो गेहूँ
के, चने के,
मूँग के, मटर
के 4-4 दाने... मैं
ज्यादा बोलूँ
और आप कम
डालोगे तो
सिकुड़ोगे....
मैं 4
बोलता हूँ,
आप चाहे 25 लो
ईश्वर के लिए, 'लो
प्रभु जी ! ये
दाने मैं आपको
अर्पण करता
हूँ ।' फिर
चाहे गाय को
दो, चाहे
पक्षियों को
दो लेकिन '4
दाने प्रभु जी
! आपके लिए । 4
मिनट प्रभु !
आपके ॐ आनन्द.... ॐ
शांति.... ॐ
माधुर्य... में
। आज चाहे
दुःख आये, सुख
आये – सब आने
वाला जायेगा
लेकिन
आत्मा-परमात्मा
का संबंध
शाश्वत है यह
मैं समझूँगा,
याद रखूँगा ।'
इससे आपका
पूरा दिन
मंगलमय होगा ।
स्वास्थ्य का
रस,
औदार्य-स्वभाव
बनने लग
जायेगा । गलती
करने की आदत
कम होने लग
जायेगी ।
निस्सार
चीजों से आपका
मन उपराम हो जायेगा
। - पूज्य बापू
जी
देशी
गाय की इतनी
महिमा क्यों ?
सनातन
संस्कृति का
अभिन्न अंग
भारतीय देशी गाय
अनादि काल से
मानव को
स्वस्थ,
बुद्धिमान, बलवान
व
ओजस्वी-तेजस्वी
बनाती रही है
। देशी गायों
में ककुद स
लेकर रीढ़ के
समानांतर 'सूर्यकेतु'
नाड़ी रहती
है, जिसमें
सूर्य की 'गौ'
नामक किरण
प्रविष्ट
होती है ।
जैसे मनुष्य
में सुषुम्ना
नाड़ी होती
है, वैसी ही
गाय में सूर्यकेतु
नाड़ी होती है
।
देशी
गाय के दूध,
दही, मक्खन, घी,
गोमूत्र एवं
गोबर में भी
स्वर्णांश
पाया जाता है
। स्वर्ण
सर्वरोगहर,
आरोग्य एवं
दीर्घायु
प्रदायक होता
है । हमारे
वेदों में भी
गायों की महिमा
आती है ।
अथर्ववेद
(कांड 1 सूक्त 22,
मंत्र 1) में
भगवान ब्रह्मा
जी कहते हैं-
गो
रोहितस्य
वर्णेन तेन
त्वा परि
दध्मसि ।।
रोहित
यानि लाल वर्ण
की गाय (गीर
गाय) मनुष्य
के हृदयरोग
एवं पांडुरोग
का निवारण
करती है ।
हृदयरोग के
उपचार के लिए
जितना लाभ
सूर्य-सेवन
(सूर्य-स्नान
आदि) से होता
है उतना ही
लाभ लाल रंग
की गाय के
गो-रस (गाय का
दूध, छाछ आदि)
के सेवन से
होता है ।
वैदिक
काल में युद्ध
के समय सेना
के साथ लाल
रंग की गायें
रखी जाती थीं,
जिनका दूध
पीकर
योद्धाओं की
शौर्यशक्ति संवर्धित
होती थी ।
इससे युद्ध
में लड़ते समय
वे सैनिक थकते
नहीं थे ।
श्वेत
(सफेद) वर्ण की
गाय को 'धवला'
कहते हैं ।
बुद्धिसंवर्धन
हेतु श्वेत
गाय का गो-रस
सर्वश्रेष्ठ
माना गया है ।
आदि गौ सुरभि
श्वेत वर्ण की
है । कामधेनु
भी श्वेत वर्ण
की है ।
समुद्र मंथन
से निकलने
वाली
पाँचों-की-पाँचों
गायें श्वेत
वर्ण की हैं ।
गो
रसपान के लिए
वेद भगवान
हमें आज्ञा
देते हैं-
वर्चो
गोषु
प्रविष्टम् ।
(अथर्ववेदः
कांड 14, सूक्त 2,
मंत्र 53-55, 58)
'वर्च'
कहते हैं
प्रताप को ।
प्रताप गौ में
प्रविष्ट
होता रहता है
। गाय से
संयुक्त होकर,
उसके गो-रस का
सेवन करके हम
प्रतापवान
बनें ।
तेजो
गोषु
प्रविष्टम् ।
'तेज'
गाय में
प्रविष्ट हुआ
है । गाय से संयुक्त
हो के हम
तेजस्वी बनें
।
भगो
गोषु
प्रविष्टो । 'भग'
कहते हैं
ऐश्वर्य को ।
ऐश्वर्य गौ
में प्रविष्ट
होकर रहता है
। गौ से
संयुक्त हो
के, उसके गो-रस
का सेवन करके
हम
ऐश्वर्यवान
बनें । गोदान
से भी हम
ऐश्वर्यसिद्धि
को प्राप्त
करें ।
रसो
गोषु
प्रविष्टो । 'रस'
कहते हैं
वीर्य को ।
वीर्य गाय में
प्रतिष्ठित
होकर रहता है
। गाय से
संयुक्त होकर
हम वीर्यवान
बनें ।
आज
वैज्ञानिक भी
गाय के दूध,
दही आदि गो-रस
की महिमा गाते
हैं । उनका
कहना है कि
गो-रस में गामा-ग्लोब्युलीन
की उपस्थिति
होती है जो
आरोग्य-आयुष्यप्रद
एवं
रोगप्रतिकारक
शक्तिवर्धक
है ।
गाय
जिस घर में
जाती है उसका
कल्याण करती
है । गाय का
प्रेमपूर्वक
रँभाना
कल्याणकारी
है ।
प्रातःकाल
एवं
यात्राकाल
में, यहाँ तक
कि स्वप्न में
भी यदि
गौ-दर्शन हो
जाय तो वह शुभ
व कल्याणकारी
माना जाता है
। गाय के
प्रत्येक
पदार्थ
कल्याणकारी
एवं मंगलमय
हैं । मनुष्य
की आजीविका,
आरोग्य एवं
उसके सब प्रकार
से कल्याण के
लिए परमात्मा
ने गाय का सृजन
किया है । गाय
केवल मनुष्य
का नहीं,
सम्पूर्ण
जीव-जगत का
कल्याण करती
है । वह अपने
गोबर, गोमूत्र
से भूमि की
जीवनीशक्ति
बढ़ाकर उसका
भी कल्याण
करती है ।
इस
तरह गाय में
असंख्य दिव्य
गुण विद्यमान
है । पुराणों
के अनुसार गाय
में 33 कोटि
देवताओं का
वास होता है ।
कोटि का अर्थ
प्रकार भी
होता है ।
अर्थात् गाय
में 33 प्रकार
के दिव्य
गुणों अथवा
शक्तियों का
वास होता है ।
गाय के
सेवा-सान्निध्य
से ये गुण अपने
भी आने लगते
हैं ।
भारतीय
गाय की अद्भुत
विशेषताएँ
गाय
दिन में सौर
ऊर्जा ग्रहण
करती हैं और
रात्रि में
चन्द्रमा की
सौम्य ऊर्जा
एवं ग्रह-नक्षत्रों
की विद्यु
चुम्बकीय
तरंगों को
ग्रहण करती
हैं । इसीलिए
खुली गायें
रात्रि में
खुले आकाश में
बैठना पसंद
करती है ।
दिल्ली
विश्वविद्यालय
के वैज्ञानिक
डॉ. बजाज,
इब्राहीम और
विजयराज सिंह
ने अपने शोध 'बी.
आई. एस. थ्योरी
ऑफ
अर्थक्वेक्स'
में सिद्ध
किया कि 'जहाँ
भारतीय नस्ल
की गायों की
गौशाला होती
है वहाँ
सकारात्मक
ऊर्जा
उत्पन्न होती
है जबकि कत्लखानों
से नकारात्मक,
भयंकर आपदाओं
को लाने वाली
तरंगें पैदा होती
हैं ।
गाय
की गंध-ज्ञान
क्षमता
कुत्ते, चींटी
और घोड़े से
भी बढ़कर है ।
गौ अपने
प्यारे सेवक
की गंध पहचान
के रँभाकर
उसका स्वागत
करती है ।
उसकी
दर्शनशक्ति
भी अद्वितीय
है । प्रतिपदा
का चन्द्र-दर्शन
केवल गाय की
कर पाती है ।
यमदूतों पर
प्रेतात्माओं
को देख लेने
में गाय सक्षम
है । उनके
दिखने पर वह
विशिष्ट
प्रकार की
आवाजें
निकालने लगती
है । गाय के
रँभाने की
तरंगें जहाँ
तक पहँचती हैं
वहाँ तक आसुरी
शक्तियों का
प्रभाव नष्ट
हो जाता है ।
वत्सतर्यः
सारस्वत्यः । (यजुर्वेदः
24.14) अर्थात्
छोटी उम्र की
बछिया माँ
सरस्वती को
अत्यंत प्रिय
है ।
श्रीकृष्ण
छोटे-छोटे गौ-वत्सों
के साथ सदा खेला
करते थे ।
इसीलिये
सरस्वतीजी
बालगोपाल श्रीकृष्ण
पर अत्यंत
प्रसन्न रहती
थीं । सांदीपनी
ऋषि के आश्रम
में
विद्याध्ययन
के दौरान
श्रीकृष्ण ने
केवल कुछ
दिनों में ही
वेदों, समस्त
शास्त्रों का
अध्ययन पूरा
कर लिया था ।
महाभारत
में उपमन्यु
की गौ-सेवा का
वर्णन आता है
। उनके गुरु
आयोद धौम्य ने
उन्हें
गौ-सेवा सौंपी
थी । छांदोग्य
उपनिषद् में
सत्यकाम जाबाल
की गौ-सेवा का
उल्लेख मिलता
है । वे गौतम ऋषि
के शिष्य थे ।
अपने गुरुदेव
के
आज्ञानुसार गौओं
की सेवा करते-करते
सत्यकाम
जाबाल को
ब्रह्मज्ञान
की अनुभूति हो
गयी ।
आधुनिक
वैज्ञानिकों
ने अपनी खोजों
से यह सिद्ध
कर दिया है कि
भारतीय नस्ल
की गाय के शरीर
के रोम-रोम से
दैवी ऊर्जा का
प्रसारण होता
है जो वातावरण
को विशुद्ध
बनाती है ।
भगवान
श्रीकृष्ण को
गायें बहुत
प्यारी थीं । वे
उन्हें चराने
ले जाते थे और
उनके साथ पूरा
दिन बिताते थे
। श्रीकृष्ण
की बाँसुरी की
आवाज सुनकर
सभी गायें
दौड़ी चली आती
थीं । इसीलिए
आज भी बाँसुरी
की आवाज गायों
में प्रेम,
मधुरता व
वात्सल्य भर
देती है ।
गो-दोहन बेला
के पूर्व
प्रातःकाल
बाँसुरी की
ध्वनि में राग
ललित, राग
बिभास, भैरवी,
आसावरी के
स्वर निकलने
पर अल्प समय
में अतिशीघ्र
दूध निकल आता
है । यह गुण
देशी गाय में
होता है ।
गाय के
रंग का उसके
दूध पर प्रभाव
काली
गाय का दूध
अग्निमांद्यजनित
रोगों का नाशक,
उत्तम
वातशामक तथा
अधिक गुणवान
होता है ।
पीली गाय का
दूध
वात-पित्तशामक
होता है । श्वेत
गाय का दूध
कफकारक तथा
पचने में भारी
होता है परंतु
उसमें सोंठ,
काली मिर्च,
पिप्पली, पिप्पलीमूल,
हल्दी आदि
डालकर पीने से
व
त्रिदोषशामक
पर सुपाच्य हो
जाता है । लाल
एवं चितकबरी
गाय का दूध वातशामक
होता है ।
गाय
का दूध
प्राणप्रद
(जीवनशक्तिदायी),
रक्तपित्तशामक
व पौष्टिक
रसायन है और
उसमें भी काली
गाय का दूध
सर्वोत्तम,
विशेष
शक्तिवर्धक
तथा
त्रिदोषशामक
है । गौ अन्य
प्राणियों की
अपेक्षा
सत्त्वगुणी
और दैवी शक्ति
का केन्द्र है
। दैवी शक्ति
के प्रभाव से
गाय के दूध
में
सात्त्विक बल
आता है । गोदुग्ध
पीने से भोजन
का पाचन उत्तम
रूप से होता है
। यह रोगों से
रक्षा करता है
।
गोदुग्ध-सेवन
संबंधी
सावधानीः गोदुग्ध
हमेशा छानकर ही
पीना चाहिए,
अन्यथा उसमें
आया गाय का
रोम पेट में
जा सकता है जो
बहुत ही
हानिकारक है ।
इससे रोग हो
सकते हैं और
पुण्यों का
नाश होता है ।
भारत
में गाय क्यों
पूजी जाती है ?
'ब्राह्मण,
देवता और
असुरों को भी
गौ की पूजा
करनी चाहिए
क्योंकि गौ सब
कार्यों में
उदार तथा
वास्तव में
समस्त गुणों
की खान है ।'
(पद्म पुराण)
समस्त
दुधारू
चतुष्पाद
प्राणियों
में गाय ही एक
ऐसा प्राणी
है, जिसकी आँत 180
फील लम्बी
होती है ।
इसकी विशेषता
यह है कि गाय
जो चारा चरती
है, उससे दूध
में जो कैरोटीन
नामक पदार्थ
बनता है, वह
भैंस के दूध
से 10 गुना अधिक
होता है ।
जर्मन
वैज्ञानिक डॉ.
जोसिस वेल्ट
ने अपनी पुस्तक
में लिखा है
कि 'भारत में
गाय क्यों
पूजी जाती है ?' वे
लगभग 3 महीने
भारत के
गाँवों में
रहे । उन्होंने
यहाँ भ्रमण
किया और एक
पुस्तक लिखी ।
उसमें
उन्होंने
बहुत से
आँकड़े दिये
हैं, जिनसे यह सिद्ध
होता है कि
भारतीय गायें
देश के लिए
बहुत आर्थिक
योगदान कर रही
हैं । एक
महत्त्वपूर्ण
बात उन्होंने
अपनी पुस्तक
में लिखी है
कि 'जब यह
पशुधन गाँव
में नहीं
रहेगा तब कम-से-कम
10 से 20 करोड़
जनता गाँव से
शहरों की ओर
पलायन करेगी ।'
आज
भारत में यह
प्रत्यक्ष
देखने को मिल
रहा है । लोग
बेरोजगार
होकर शहरों
में नौकरी के
लिए दर-दर की
ठोकरें खा रहे
हैं । यह सब
गाय से दूरी
के दुष्परिणाम
हैं ।
कोई
बीमार व्यक्ति
हो और डॉक्टर,
वैद्य बोले, 'यह
नहीं बचेगा' तो
वह व्यक्ति
गाय को अपने
हाथ से कछ
खिलाया करे और
गाय की पीठ पर
हाथ घुमाये तो
गाय की प्रसन्नता
की तरंगें
हाथों की
उँगलियों के
अग्रभाग से
उसके शरीर के
भीतर प्रवेश
करेंगी, रोगप्रतिकारक
शक्ति बढ़ेगी
और वह व्यक्ति
तंदुरुस्त हो
जायेगाः 4 से 6
महीने लगते
हैं लेकिन
असाध्य रोग भी
गाय की
प्रसन्नता से
ठीक हो सकता
है । - पूज्य
संत श्री
आशाराम जी
बापू
ग्रहबाधा
व वास्तुदोष
दूर करने का
अचूक उपाय
आजकल
वास्तुदोष के
नाम पर तीन
टाँग के कछुआ,
मेंढक की
मूर्ति घरों
में रखने का
रिवाज चल पड़ा
है । यह
तथाकथित
फेंगशुई चीनी
गृहसज्जा
करना है । यदि
भवन में किसी
भी प्रकार का
वास्तुदोष है
तो उसमें एक
देशी गाय रख
लें, समस्त
वास्तुदोष
दूर हो
जायेंगे । यदि
गाय पालना
सम्भव न हो तो
डयोढ़ी (दहलीज
या द्वार के
पास की भूमि)
अथवा आँगन में
सवत्सा (बछड़े
वाली) गाय का
चित्र लगा लें
और घर में
गोमूत्र या
गोमूत्र अर्क
का छिड़काव
करें ।
(गोमूत्र अर्क
संत श्री
आशाराम जी
आश्रम में व
समितियों के
सेवाकेन्द्रों
से प्राप्त कर
सकते हैं ।)
शनि,
राहू-केतु आदि
ग्रहों के दोष
निवारण के लिए
प्रत्येक
मंगलवार या
शनिवार को
अपने हाथ से
आटे की लोई
गुड़सहित
प्रेमपूर्वक
किसी नंदी
अथवा गाय को
खिलायें ।
कैसी भी ग्रहबाधा
हो, दूर हो
जायेगी ।
मेधावी
व निरोगी
संतान हेतु
अनुभूत
प्रयोग
गर्भवती
महिला रोज
श्रद्धापूर्वक
गाय का पूजन
कर उसकी कम-से-कम
एक परिक्रमा
करे, उसे अपने
हाथ से रोटी तथा
गुड़ खिलाये
और सुबह-शाम
गोदुग्ध का
पान करे तो
निश्चित ही
आने वाली
संतान
फुर्तीली, सशक्त,
मेधावी एवं
निरोगी होगी
और प्रसव भी
सहज ढंग से
होगा ।
प्रसव-पीड़ा
कम होगी । उपरोक्त
लाभों के लिए
यह प्रयोग
प्रतिदिन करना
अनिवार्य है ।
प्रतिदिन
सम्भव न हो तो
जितने दिन
सम्भव हो करे,
तब भी लाभ
होगा ।
गोवध = विनाश
को आमंत्रण
गाय
कदापि वध के
योग्य नहीं है
। वेद भगवान आज्ञा
हैः
मा
गामनागामदितिं
वधिष्ट । 'गोऔं
को न मारें ।'
(ऋग्वेदः मंडल
8, सूक्त 101, मंत्र
15)
पूजनीय
भारतीय गायों
का वध किया
जाय तो उसके बहुत
भयंकर
दुष्परिणाम
होते हैं ।
दिल्ली
विश्वविद्यालय
के
वैज्ञानिकों
ने शोध कर यह
घोषित किया कि
गाय-बैल आदि
के कत्ल से भूकम्प
का सर्जन होता
है ।'
उन्होंने यह
बात रशिया के
पुशिना शहर
में 1994 में हुई
खगोल-भौतिक
वज्ञान की
अंतर्राष्ट्रीय
परिषद में
प्रस्थापित
की थी, जिसको
दुनिया के अधिकांश
वैज्ञानिकों
ने मान्य किया
था । केवल
भूकम्प ही
नहीं, अनेक
प्रकार की
प्राकृतिक आपदाओं
जैसे –
अतिवृष्टि,
अनावृष्टि,
चक्रवात,
सुनामी,
महामारी आदि
के लिए गोवध
सबसे ज्यादा
जिम्मेदार
कारण है ।
इस बात का
किसी को
विश्वास न हो
तो केरल में
आयी बाढ़ को
देख सकते हैं
। सन् 2017 में
केरल में बीच
सड़क पर
निर्दयी
गोमांसभक्षियों
द्वारा गाय के
बछड़ों का
कत्लेआम किया
गया था । प्रशासन
तो देखता रहा,
मीडिया
दिखाता रहा
परंतु प्रकृति
को सहन नहीं
हुआ । प्रकृति
ने ठीक अगले
साल यानी 2018 में
भयानक बाढ़ के
रूप में तांडव
किया ।
गोमांस
खाने से 'मैड
काऊ डिसीज'
जैसी
महाव्याधियाँ
होती है ।
गोमांस-भक्षण
से मस्तिष्क
एवं
चेतातंत्र
में कम्पन
पैदा होते
हैं,
परिणामस्वरूप
अनेक मानसिक
रोग एवं विकृतियाँ
पैदा होती हैं
।
हजरत
मोहम्मद साहब
बताते हैं कि "गाय
का दूध और घी
तंदुरुस्ती
बढ़ाने का
बड़ा जरिया है
।
गोमांस-भक्षण
में बीमारी
है, गाय का गोश्त
नुकसानदेह है
।"
जर्सी,
होल्सटीन आदि
विदेशी पशुओं
से सावधान !
वर्तमान
समय में
सत्त्वगुण-प्रधान
देशी गाय को
छोड़कर लोग
रजोगुण,
तमोगुण
प्रधान
कुत्ते, बिल्ली,
भैंस, बकरी,
भेड़ आदि
प्राणियों को
पालने लगे हैं
। इतना ही
नहीं, आजकल तो
लोग सुअर से
संकरित जर्सी,
होल्सटीन आदि
विदेशी पशुओं
(तथाकथित
गायों) को
पालने और उनका
दूध व दूध से
बने पदार्थों
का उपयोग करने
लगे हैं । उन
पशुओं के
संसर्ग में
रहने वालों
में भी उनके
गुण आ जाते
हैं ।
भारतीय
नस्ल की गाय
के दूध, घी,
गोमूत्र और
गोबर में जो
सात्त्विकता,
पवित्रता व
विशिष्ट गुण
होते हैं,
उनका जर्सी,
होल्सटीन आदि
विदेशी पशुओं
के दूध, घी, मूत्र
आदि में
नामोनिशान भी
नहीं होता ।
और विदेशी
पशुओं के साथ
वर्णसंकरित
भारतीय प्रजाति
का गायों में
भी वे गुण उस
मात्रा में
नहीं पाये
जाते हैं ।
भारतीय नस्ल
की गायों को
समाप्त कर
विदेशी पशुओं
का
प्रचार-प्रसार
करना
भारतीयों को
शारीरिक,
मानसिक,
आर्थिक व आध्यात्मिक
रूप से कमजोर
बना के गुलाम
बनाने की
घिनौनी
विदेशी साजिश
है । देशी गाय
की तुलना में
जर्सी,
होल्सटीन आदि
विदेशी पशु
ज्यादा दूध
देते हैं यह
झूठा प्रचार
कर देश के
लोगों को
भ्रमित किया
गया है जबकि
सच्चाई इसके
विपरीत है ।
गुजरात में
अनेक स्थानों
पर 30 लिटर दूध
देने वाली
भारतीय गायें
सुलभ हैं ।
भारतीय गायों
पर विदेशों
में भी शोध
विस्तृत रूप से
प्रगति पर है
। इजराइल ने
गीर नस्ल की
गाय से 120 लिटर
दूध प्रतिदिन
उत्पादन करके
दुनिया को दिखा
दिया कि
भारतीय गाय आज
दुग्धोपादन
की
सर्वश्रेष्ठ
गाय है, यह गाय
गिनीज़ बुक ऑफ
वर्ल्ड
रिकॉर्ड्स
में दर्ज है ।
सरकार
समर्थ
गौशालाओं को
गीर, साहीवाल,
थारपारकर,
राठी,
हरियाणवी
जैसी स्वदेशी
दुधारु नस्लों
के साँड व
गायें उपलब्ध
कराये तथा
साँड उत्पादन
केन्द्र के
लिए अनुदान दे
तो गौशालाएँ भारतीय
गायों में ही
नस्ल सुधार कर
सकती हैं । इससे
4-5 साल बाद सूखे
चारे, खली,
बिनौले, दाने
से 4-5 लिटर दूध
प्रतिदिन दूध
देने वाली नयी
नस्ल की गायों
से किसान का
जीवन-स्तर
सुधारा जा
सकता है । हरी
घास व उत्तम
पोषण-आहार
मिलने पर ये
ही गायें
प्रतिदिन 10 से 15
लिटर दूध दे
सकती हैं ।
हरियाणा,
गुजरात,
इजराइल में
इसके असंख्य
उदाहरण हैं ।
देशी
गाय व जर्सी,
होल्टीन आदि
विदेशी पशुओं
का तुलनात्मक
अध्ययन
|
क्र. |
विवरण |
देशी
गायें |
जर्सी
आदि विदेशी
पशु |
|
1 |
विलक्षण
चित्र |
ककुद
(पीठ के ऊपर का
उभार),
गलकम्बल |
इनमें
ये लक्षण
नहीं होते
हैं । |
|
2 |
जठर
(आमाशय) |
4 जठर
होते हैं जो
सामान्य विष
का पाचन कर
सकते हैं । |
3 जठर
होते हैं । |
|
3 |
गोबर |
बँधा
हुआ,
छल्लेदार,
चिपचिपा व
झिल्ली लिए
हुए होता है । |
इनका
मल पतला होता
है । |
|
4 |
गोबर
के गुण |
इनके
गोबर में चर्मरोग
निवारण की
क्षमता होती
है । |
इनके
मल से चर्म
रोग बढ़ते
हैं । |
|
5 |
मूत्र |
गोमूत्र
पवित्र,
अमृततुल्य,
सर्व
रोगनिवारक, सर्व
विष-शोषक है । |
ये
गुण नहीं
होते हैं ।
साथ ही यह
रोगकारक व अपवित्र
है । |
|
6 |
स्वर्णांश |
ककुद
में स्थित
सूर्यकेतु
नामक नाड़ी
सूर्यकिरणों
से स्वर्ण-क्षार
निर्मित कर
दूध, घी,
गोमूत्र को स्वर्णांशयुक्त
बना देती है । |
ककुद
नहीं होता है
इसलिए
स्वर्णांश
होने का सवाल
ही पैदा नहीं
होता है । |
|
7 |
दूध |
पीलापन
लिये हुए,
गुणों की खान,
अमृततुल्य
तथा रोग
प्रतिरोधक
क्षमतावर्धक
विशिष्ट
पोषक तत्त्व
युक्त । इनका
दूध पेप्टिक
अल्सर,
मोटापा,
जोड़ों का
दर्द, दमा, स्तन
व त्वचा के
कैंसर आदि
अनेक रोगों
से रक्षा
करता है । |
इनका
दूध सफेद
होता है । यह
मानव-शरीर
में 'बीटा
केसोमॉर्फिन'
नामक
विषाक्त
तत्त्व
छोड़ता है ।
इससे मधुमेह,
रक्त
वाहिनियों
में खून जमना,
ऑटिज़्म, स्किजफ्रेनिया
(मानसिक रोग),
हृदयाघात
जैसी घातक
बीमारियाँ
होती हैं । |
|
8 |
दही |
अनेक
रोगों का
नाशक |
इनके
दही में वे
गुण नहीं हैं
। |
|
9 |
तक्र
(छाछ) |
दही
से भी ज्यादा
लाभप्रद, पेट
के अनेक
रोगों की दवा
। |
इनके
तक्र में वह
क्षमता नहीं
होती । |
|
10 |
घी |
सुगन्धयुक्त,
पीला-सोने के
समान रंगवाला,
जमने के बाद
नरम रहता है ।
हमारे शरीर
के तापमान पर
पिघल जाता है
। |
सुगन्धहीन,
सफेद-सा एवं
अपेक्षाकृ
कड़ा होता है
। |
|
11 |
सुपाच्यता |
इनका
दूध, घी
तुलनात्म
रूप से
सुपाच्य
होता है । |
इनका
दूध, दही, घी
सुपाच्य
नहीं एवं
रोगकारक है । |
|
12 |
नस्यक्रिया |
घृत
की नस्यक्रिया
से अनेक रोग
नष्ट हो जाते
हैं । |
इनके
घृत की
नस्यक्रिया
हानिकारक हो
सकती है । |
|
13 |
पौष्टिकता |
दूध
व घी में
अदभुत
पौष्टिकता
होती है । |
उतनी
पौष्टिकता
नहीं होती । |
|
14 |
पूर्णता |
देशी
गाय का दूध एक
सम्पूर्ण
आहार है,
जिसमें कॉर्बोहाड्रेट,
खनिज आदि सभी
आवश्यक
तत्त्व पाये
जाते हैं । |
देखने
में एक जैसा
होते हुए भी
गुणहीन है । |
|
15 |
रोगप्रतिरोधक
क्षमता |
रोगप्रतिरोधक
क्षमता अधिक
होने से इनको
बीमारियाँ
कम होती हैं ।
बीमार होने
पर जल्दी स्वस्थ
हो जाती हैं । |
रोगप्रतिरोधक
क्षमता कम
होने से
इनमें थनैला,
मुँहपका,
पशु-प्लेग
आदि अनेक
रोगों का
भयंकर
प्रकोप होता
है । |
|
16 |
आहार |
कम
खाती हैं । |
ज्यादा
खाती हैं । |
|
17 |
बछड़ा-बछड़ी |
बछड़ा
जन्म लेने का
साथ खड़ा हो
जाता है और 2-3 घंटे
में दौड़ने
लगता है । |
बछड़ा
इतनी जल्दी
अपने पैरों
पर खड़ा नहीं
होता, न ही
इतना चपल
होता है । |
मानव और
गाय का ऐसा
संबंध है जैसे
शरीर और प्राणों
का । यह एक
आत्मीय संबंध
है । विश्व
में गाय है तो
सात्त्विक
प्राण,
सात्त्विक
मति और दीर्घ
आयु भी सुलभ
है । गाय
मानवीय
प्रकृति से जितनी
मिलजुल जाती
है, उतना और
कोई पशु नहीं
मिल पाता ।
गाय जितनी
प्रसन्न होती
है, उतनी ही
अधिक मात्रा
में उसके दूध
में विटामिन
उत्पन्न होते
हैं और वह
जितनी दुःखी
होती है, उतना
ही उसका दूध
कम गुणों वाला
होता है ।
गाय
ने
मानव-बुद्धि
की रक्षा की
है । आज भ्रष्टाचार,
बेईमानी
बढ़ती जा रही
है । इसका
कारण है समाज
में बुद्धि की
सात्त्विकता
का अभाव । और
बुद्धि
सात्त्विक
क्यों नहीं है
? क्योंकि
तन-मन
सात्त्विक
नहीं हैं और
तन-मन की
सात्त्विकता
के अभाव का
बड़ा कारण है
तुलसी,
गंगाजल,
सात्त्विक
आहार-विहार व
गौ के सात्त्विक
दूध का अभाव ।
आहार में
सात्त्विकता
का अभाव गो-रस
का त्याग करने
से हुआ है ।
गाय का दूध, घी,
मक्खन, छाछ
आदि विशेष
सात्त्विक
आहार है ।
गौरक्षा
के लिए समाज व
राज्य क्या
करता है, लोग
मदद करते हैं
कि नहीं..... ये
गौण बाते हैं
। मुख्य बात
यह है कि 'गाय
की दयनीय अवस्था
देखकर अपने
दिल में पीड़ा
होती है कि
नहीं ?'
स्वामी
शरणानंद कहते
हैं- "गाय की
रक्षा होती है
तभी प्रकृति
भी अनुकूल होती
है, भूमि भी
अनुकूल होती
है ।"
जैसे-जैसे
आप गौ-सेवा
करते जायेंगे,
वैसे-वैसे
आपको यह अनुभव
होता जायेगा
कि आप गाय की
सेवा नहीं
बल्कि गाय
आपकी सेवा कर
रही है –
स्वास्थ्य की
दृष्टि से,
बौद्धिक
दृष्टि से... हर
एक दृष्टि से
। गायें हमारी
कितने-कितने
प्रकार से
सेवा कर सकती
हैं, इसका
प्रमाण है यह
सत्य घटनाः
सन्
1944 में
राजस्थान के
सवाई माधोपुर
जिले के मझेवला
गाँव में
गुमानसिंह
नाम का एक
युवक गायें
चराता था ।
एक
दिन वह पहाड़ी
पर बैठा हुआ
शिखर की तरफ
पीठ करके
गायों को चरा
रहा था ।
अचानक एक
नरभक्षी लकड़बग्घे
ने शिखर से
छलाँग लगा के
गुमानसिंह पर
आक्रमण कर
दिया ।
गुमानसिंह
उसे देखकर भयभीत
हो गया । तभी
घास चर रही
गायों में से
लगभग 10-15 गायों
ने अपने
रखवाले
गुमानसिंह के
चारों और घेरा
बना के उसको
बीच में कर
लिया । वे
पूँछ ऊपर कर
हूँकार भरने
लगीं, अपने
पैने सींगों
से लकड़बग्घे
को मारने
दौड़ने लगीं ।
इससे वह डर कर
भाग गया ।
जब
ग्वाला गायों
को गाँव ले के
चलने लग तो उस
दिन वह गायों
को गाँव ले के
चलने लगा तो
उस दिन वह
गायों का
रखवाला नहीं
था बल्कि गायें
ही उसके रक्षक
के रूप में
साथ चल रही
थीं ।
गुमानसिंह ने
जब इस घटना की
जानकारी
गाँववालों की
दी तो वे
सुनकर दंग रह
गये । गायों
के प्रति उनका
प्रेम उमड़
पड़ा । 'कैसी
समझदारी है और
कैसा अपनापन
है !' – यह सोचकर
उनका दिल भर
आया ।
पं.
मदनमोहन
मालवीय जी कहते
हैं- "यदि हम
गौओं की रक्षा
करेंगे तो
गौएँ हमारी रक्षा
करेंगी ।"
पूज्य
संत श्री
आशाराम जी
बापू कहते
हैं- "आप गाय की
सेवा करते हैं
तो सचमुच आप
बड़े पुण्यात्मा
हैं । गौ-सेवा
से आपके घर
में जो सात्त्विकता
होगी, जो खुशी
होगी वह
करोड़पतयों
के घर में भी
दुर्लभ होती
है । गाय की
सेवा तो
पुण्यात्मा
बनाती है, अकाल
मृत्यु टालती
है ।"
गाय के
दूध को पृथ्वी
का अमृत कहा
गया है । यह बुद्धि,
बल, रक्त,
ओज-तेज व नेत्रज्योति
वर्धक है ।
एलौपैथी की
दवाओं, रासायनिक
खादों,
प्रदूषण आदि
के कारण हवा,
पानी एवं आहार
के द्वारा
शरीर में जो
विष एकत्र होते
हैं उन्हें
नष्ट करने की
शक्ति देशी
गाय के दूध
में है । इसका
धारोष्ण
(आयुर्वेद में
गाय के ताजे
निकले दूध
अर्थात् 'धारोष्ण
दूध' को
अमृततुल्य
गुणकारी माना
गया है परंतु
आजकल बहुत
स्थानों पर
गायों का दूध
बढ़ाने के लिए
उन्हें
केमिकलयुक्त
टॉनिक व दवाएँ
खिलायी जाती
हैं एवं
इंजेक्शन
दिये जाते हैं
इसलिए इनके
दुष्प्रभावों
से बचने हेतु
आजकल उबला हुआ
दूध पीना ही
हितकर है ।)
अमृत के समान,
बलकारक, शीतल,
जठराग्निवर्धक,
त्रिदोषशामक
तथा शारीरिक,
मानसिक एवं
आध्यात्मिक
विकास विशेषरूप
से करने वाला
है ।
देशी
गोदुग्ध
मस्तिष्क का
संतुलन बनाने
वाले एवं
कैंसर-नियंत्रक
तथा
कोलेस्ट्रॉल
को सामान्य
रखने वाली
फैटी एसिड्स 'ओमेगा-3' व 'ओमेगा-6' से
भरपूर है । विदेशी
पशुओं के दूध
में इनका
नामोनिशान तक
नहीं है ।
पद्म
पुराण में
भगवान
ब्रह्माजी
देवर्षि नारदजी
से कहते हैं- "गौ
का मूत्र,
गोबर, दूध, दही,
और घी – इन पंच
गव्यों का पान
कर लेने पर
शरीर के भीतर पाप
नहीं ठहरता है
। इसलिए
धार्मिक
पुरुष प्रतिदिन
गौ के दूध, दही
(तक्र आदि के
रूप में) और घी
का सेवन करते
हैं । गव्य
पदार्थ
सम्पूर्ण
द्रव्यों में
श्रेष्ठ, शुभ
और प्रिय हैं
। जिसको गाय
का दूध, दही और
घी खाने का
सौभाग्य
प्राप्त नहीं
होता, उसका
शरीर मल के
समान है ।
अन्न आदि पाँच
रात्रि तक,
दूध 7 रात्रि
तक, दही 20
रात्रि तक और
घी एक मास तक
शरीर में अपना
प्रभाव रखता है
। जो लगातार
एक मास तक
बिना गव्य का
भोजन करता है,
उस मनुष्य के
भोजन में
प्रेतों को
भाग मिलता है
।"
गाय
के सिवा अन्य
दूध
श्राद्धकर्म
में निषिद्ध
है ।
ब्रह्मज्ञानी
रानी मदालसा
श्राद्धकर्म
का उपदेश करते
समय अपने पुत्र
अलर्क से कहती
हैं- "बेटा ! गौ
का दूध एवं
उससे बनी हुई
खीर पितरों को
एक वर्ष तक
तृप्त रखती है
।"
(मार्कण्डेय
पुराण)
वैज्ञानिकों
के अनुसार
देशी गाय के
दूध में 8 प्रकार
के प्रोटीन, 6
प्रकार के
विटामिन, 21
प्रकार के
अमिनो अम्ल, 11
प्रकार के
वसीय अम्ल, 25
प्रकार के
खनिज तत्त्व, 16
प्रकार के
नाइट्रोजन
यौगिक, 4
प्रकार के
फॉसफोरस
यौगिक, 2
प्रकार की
शर्करा तथा
इनके अलावा
मुख्य खनिज
सोना, ताँबा,
लोहा,
कैल्शियम,
आयोडीन, फ्लोरिन,
सिलिकॉन आदि
भी पाये जाते
हैं ।
गाय
का दूध ही
एकमात्र ऐसा
पदार्थ है जो
सब पौष्टिक
द्रव्यों से
परिपूर्ण है,
जिसे हम सम्पूर्ण
भोजन कह सकते
हैं । (प्रो. एम.
जे. रोसेनो, हार्वर्ड
चिकित्सा-विद्यालय)
यदि
गाय कोई विषैला
पदार्थ खा
जाती है तो
उसका प्रभाव
उसके दूध में
नहीं आता ।
गाय के शरीर
में सामान्य विषों
को पचाने की
अद्भुत
क्षमता है ।
फिर
गोदुग्ध के
सिवा अन्य दूध
का सेवन क्यों
?
वर्तमान
में लोग गाय
के दूध की
महत्ता को भूल
गये हैं,
जिससे
अधिकांश लोग
विविध प्रकार के
शारीरिक एवं
मानसिक रोगों
से ग्रस्त हैं
। पहले
सैनिकों के
घोड़ों को गाय
का दूध पिलाया
जाता था,
जिससे वे
घोड़े बहुत
तेज होते थे ।
एक बार
सैनिकों ने
परीक्षा के
लिए घोड़ों को
भैंस का दूध
पिलाया, जिससे
घोड़े खूब मोटे
हो गये ।
लेकिन जब नदी
पार करने का
काम करना पड़ा
तो वे घोड़े
पानी में बैठ
गये । भैंस पानी
में बैठती है
अतः वही
स्वभाव
घोड़ों में भी
आ गया ।
महाभारत
(अनुशासन
पर्वः 84.47) में
महर्षि
वसिष्ठ जी
परशुराम जी से
कहते हैं -
महिषाश्चासुरा
इति । 'भैंसे
असुरों के अंश
हैं ।'
खान-पान का
प्रतिबिम्ब
सबके तन-मन पर प्रतिभासित
होता है । अतः
भैंस के दूध
का सेवन करने
वाले लोगों
में क्रोध,
दोषदृष्टि,
दयाशून्यता
आदि दोष आ
जाते हैं ।
बकरी का दूध
रजोगुणवर्धक
होता है ।
गीता (14.12) में
आता है कि 'रजोगुण
बढ़ने पर लोभ,
प्रवृत्ति,
स्वार्थबुद्धि
से कर्मों का
सकामभाव से
आरम्भ, अशांति
और विषयभोगों
की लालसा – ये
सब उत्पन्न
होते हैं ।'
बकरी का
दूध निरोग
करने वाला एवं
पचने में हलका
होता है पर वह
गाय के दूध की
तरह
बुद्धिवर्धक
और सात्त्विक
नहीं होता ।
ऊँटनी का दूध
भी निकलता है
पर उसका दही,
मक्खन होता ही
नहीं । उसका
दूध तामसी
होने से
दुर्गति
दिलाने वाला
होता है ।
स्मृतियों में
ऊँट, कुत्ते,
गधे आदि को
अस्पृश्य
बताया गया है
। भेड़ का दूध
तमोगुणवर्धक
है । उसके दूध का
सेवन करने से
अज्ञानता
(मूढ़ता,
मतिहीनता), प्रमाद,
आलस्य, मोह,
अतिनिद्रा,
हृदयरोगादि
बढ़ते जाते
हैं । नेशनल
इंस्टीच्यूट
ऑफ अमेरिका की
रिपोर्ट के
अनुसार जर्सी,
होल्सटीन आदि
विदेशी पशुओं
के दूध के
सेवन से शारीरिक
व मानसिक
बीमारियाँ
बढ़ती हैं तथा
कैंसर का खतरा
30 प्रतिशत बढ़
जाता है ।
भगवान धन्वंतरि
ने बासी दूध
को आरोग्य के
लिए हानिकारक
बताया है ।
अतः बहुत
दिनों के
बासी, परिरक्षक
(preservative)
युक्त,
पास्तुरीकरण (pasteurization)
जैसी अनेक
प्रक्रियाओं
में पसारित
विभिन्न पशुओं
के मिश्रित
डेयरी के मृत
दूध के बारे
में
रामचन्द्रपुर
मठ के
शंकराचार्य
श्री राघवेश्वर
भारती जी कहते
हैं - "मतिभ्रष्ट लोग
पशुओं को मार
के खाते हैं
लेकिन अब दूध
को भी मार के
खाने लगे हैं
।"
बालकों
के लिए गाय का
दूध वरदान है
। जो बच्चे बचपन
से ही गाय का
दूध पीते हैं,
उनकी बुद्धि तो
कुशाग्र होती
ही है, साथ ही
उनका ओज-तेज
भी बढ़ता है ।
इससे उनके
अंदर 'ब्रह्मचर्य'
साधने की
शक्ति आ जाती
है, उनका
आभामंडल (ओरा)
बढ़ जाता है ।
उनके भीतर
सात्त्विक
गुणों की अधिकता
पायी जाती है
। जन्म से ही
गाय का दूध
पीने वाले
बालक तीव्र
बुद्धिवाले
एवं मेधावी होते
हैं । उनका
आई.क्यू. बहुत
ऊँचा होता है
। आजकल लोग बाजारू
सॉफ्ट
ड्रिंक्स
पीने लगे हैं,
जो स्मरणशक्ति
को कमजोर करती
हैं तथा
चिड़चिड़ेपन
का शिकार
बनाती हैं ।
पूज्य
संत श्री
आशाराम जी
बापू कहते हैं
- "यदि आप
चाहते हो कि
आपके बच्चे
आगे चलकर अति
स्वार्थी,
सम्पदा के कारण
न लड़ें तो
बच्चों को
भैंस का दूध न
पिलायें, गाय
का दूध
पिलायें ।"
वैज्ञानिकों
ने नई दिल्ली
और शिमला में
विद्यालय के
बच्चों को
भारतीय गाय के
दूध का सेवन कराया
तो उनका
वृद्धि-विकास
एवं ऊँचाई
अन्य बच्चों
की अपेक्षा
अधिक थी ।
भारत में
अंग्रेजों की
गुलामी के पूर्व
तक सभी
गुरुकुलों के
साथ गौशालाएँ
होती थीं ।
विद्यार्थी
गाय का दूध
पीते थे,
जिससे उनकी
बुद्धि वेद,
शास्त्र व
विज्ञान के
रहस्यों को
समझने में
समर्थ होती थी
। अब विज्ञान
ने भी यह बात
स्वीकार कर ली
हैः
कृषि
महाविद्यालय,
पुणे के प्रो.
जे. एल. सहस्रबुद्धे
ने शोध करके
बताया क "गाय
के दूध में
बुद्धि में
प्रखरता लाने
का विशेष गुण
है । मैंने
इसका प्रयोग
छोटे बच्चों पर
करके देखा ।
जिन बच्चों को
गोदुग्ध
पिलाना आरम्भ
किया, उनकी
प्रतिभा एवं
मेधाशक्ति का
विकास स्पष्ट
दिखाई दिया और
जिन बच्चों को
भैंस का दूध
पिलाना आरम्भ
किया वे
मंदबुद्धि
एवं आलसी होने
लगे ।"
कारनेल
विश्वविद्यालय
के
पशुविज्ञान
विशेषज्ञ
प्रो. रोनाल्ड
गोरायटे कहते
हैं - "गोदुग्ध
में विद्यमान
सेरिब्रोसाइड्स
मस्तिष्क और
स्मरणशक्ति
के विकास में
सहायक होते
हैं तथा
स्ट्रॉन्शियम
अणु-विकिरणों
का प्रतिरोधक
भी होता है ।
गोदुग्ध के
एम.डी.जी.आई.
प्रोटीन के
कारण
रक्त-कोशिकाओं
में कैंसर
प्रवेश नहीं
कर सकता ।"
वैज्ञानिकों
ने ढूँढ
निकाला कि गाय
के दूध में
केप्रेलिक
एसिड होता है,
जो ऊँचाई
बढ़ाने में
उपयोगी है ।
इसीलिए गो-रस
का अधिक सेवन
करने वाली
रबारी,
भरवाड़, चारण
जातियों,
अहीर, यादव
आदि गोचर
जातियों के
लोगों की ऊँचाई
अधिक होती है
।
पूर्वकाल
में जब अतिथि
थककर आते थे
तो आतिथ्य-सत्कार
में उन्हें
दूध पिलाया
जाता था ।
आजकल चाय
पिलायी जाती
है, जिसमें
टेनिक एसिड
होता है ।
यूनेस्को के
अनुसार यह
कैंसर का एक
कारण है ।
परमाणु ऊर्जा
आयोग के पूर्व
अध्यक्ष
विक्रम
साराभाई ने भी
बताया कि चाय
पीने से
मनुष्य
नपुंसक एवं निर्वीय
हो जाता है ।
अतः प्राचीन
काल में प्राणशक्ति
व
बुद्धिशक्तिवर्धक
दूध पिलाया
जाना शास्त्रोक्त
व वैज्ञानिक
था ।
गौर
वर्ण व
ओजस्वी-तेजस्वी
संतान हेतु
काश्यप
ऋषि ने कहा
हैः
श्वेतायाः
श्वेत पुं
वत्साया गोः
क्षीरणे । (का.
शा. 19)
यदि
गर्भवती
माताएँ श्वेत
रंग के बछड़े
वाली श्वेत
गाय के दूध का
चाँदी के
पात्र में
सेवन करें तो
उनको
दीर्घायु,
गोरे तथा
ओजस्वी, तेजस्वी
व स्वस्थ
पुत्र की
प्राप्ति
होती है ।
राजस्थान
की एक गोपालक
संस्था
द्वारा यह प्रयोग
2500 महिलाओं पर
किया गया ।
सभी की सही
समय पर प्रसूति
हुई किसी भी
महिला को
सिजेरियन
डिलीवरी
(शल्यक्रिया
द्वारा
प्रसूति) नहीं
करवानी पड़ी ।
सभी के शिशु
ओजस्वी,
तेजस्वी व
स्वस्थ पैदा
हुए ।
गोदुग्ध-सेवन
करने वाले
ध्यान दें –
शोधकर्ता
संस्थान एवं
विज्ञानी
क्या
है 'ए-1' व 'ए-2'
दूध ?
गोदुग्ध
में पाये गये
प्रोटीन में
लगभग एक तिहाई
'बीटा
कैसीन' नामक
प्रोटीन है ।
बीटा कैसीन के
12 प्रकार ज्ञात
हैं, जिनमें 'ए-1' और 'ए-2'
प्रमुख हैं ।
जर्सी,
होल्सटीन आदि
विदेशी तथाकथित
गायों के दूध
में 'ए-1'
प्रोटीन होता
है, जिसकी
एमिनो एसिड
श्रृंखला में
67वें स्थान पर
हिस्टीडीन
होने के कारण
इसकी
पाचनक्रिया
में
बीटा-केसोमॉर्फीन-7
(BCM-7) का
निर्माण होता
है, जो
विभिन्न
प्रकार के
स्वास्थ्य
विकारों को
निमंत्रण
देता है । 'इंटरनेशनल
जर्नल ऑफ
साइंस एंड
नेचर' में
छपे एक शोध के
अनुसार 'ए-1'
प्रोटीन से
मानसिक रोग,
टाइप-1 मधुमेह
(डायबिटीज़),
हृदयरोग आदि
हो सकते हैं ।
परंतु भारतीय
नस्ल की गायों
के दूध में 'ए-2'
प्रकार का
विषरहित
प्रोटीन पाया
जाता है, जो
ऐसे किन्हीं
रोगों को
उत्पन्न नहीं
करता । अतः
भारतीय नस्ल
की गायों का
दूध पीना
हितकारी है ।
कहीं
आप धीमा जहर
तो नहीं पी
रहे हैं !
कंज्यूमर
गाइडेंस
सोसायटी ऑफ
इंडिया के महाराष्ट्र
में हुए
हालिया अध्ययन
में पाया गया
कि बेचे जा
रहे 78.12 प्रतिशत
दूध FSSAI के
आवश्यक
मानकों को
पूरा नहीं
करते हैं ।
देश
में अन्यत्र
भी दूध में
मिलावटें
होती हैं ।
शोधकर्ताओं
के अनुसार दूध
में अधिक
मात्रा में
हाइड्रोजन
परॉक्साइड व
अमोनियम
सल्फेट की
मिलावट
हृदयरोग, पेट
व आँतों में
जलन, उलटी,
दस्त जैसी
समस्याएँ
पैदा कर सकती
है । हमारे
स्वास्थ्य से
खिलवाड़ करते
हुए
डिटर्जेंट,
यूरिया,
स्टार्च,
शर्करा,
न्यूट्रालाइजर
आदि अनेक
पदार्थ मिला
के कृत्रम दूध
तैयार कर बेचा
जाता है
डेयरियों आदि
के द्वारा,
जिसे पीने से
पेटदर्द,
आँखों व त्वचा
की जलन, कैंसर,
शुक्राणुओं
की कमी आदि
रोग होते हैं
तथा यकृत
(लिवर) व
गुर्दों
(किडनी) को
हानि होती है
। अतः सावधान !
अपनी
स्वास्थ्य-रक्षा
हेतु देशी गाय
का शुद्ध दूध
ही पियें एवं
विदेशी तथा
संकरित पशुओं
के दूध एवं
कृत्रिम दूध
के सेवन से
बचें और बचायें
।
(संत
श्री आशाराम
जी गौशालाओं
की देशी नस्ल
की गायों के 'ए-2'
प्रोटीनयुक्त,
शुद्ध,
सात्त्विक व
पौष्टिक दूध
का लाभ अनेक
स्थानीय एवं
क्षेत्रीय
लोग उठा रहे
हैं । अधिक
जानकारी हेतु
सम्पर्क करें –
079-61210888)
दूध
की मलाई बहुत
पौष्टिक और
शक्तिवर्धक
होती है ।
आयुर्वेद के
प्रसिद्ध
ग्रंथ 'भावप्रकाश
निघंटु' के
अनुसार 'मलाई
भारी, शीतल,
तृप्तिकारक,
वीर्यवर्धक
तथा पित्त-रक्तविकार
और वात को दूर
करने वाली,
पुष्टिदायी,
स्निग्ध तथा
कफ, बल, शुक्र
एवं रस-रक्तादि
वर्धक होती है
।
मलाई
में पिसी
मिश्री
मिलाकर सुबह
खाली पेट खाने
से शरीर
पुष्ट, सुडौल
और शक्तिशाली
होता है ।
इसके सेवन से
पेट की जलन,
वायु-प्रकोप
(गैस), पित्त-प्रकोप,
प्यास और पेट
में बढ़ी हुई
गर्मी का शमन
होता है ।
चेहरे की
त्वचा पर मलाई
का लेप लगाने
से त्वचा कांतिपूर्ण,
चिकनी, मुलायम
और स्वस्थ
रहती है । दूध
पीते समय मलाई
हटानी नहीं
चाहिए । सोने
के दो घंटे
पहले मलाई के
साथ ही दूध
पीना चाहिए ।
दूध और मलाई
मिलकर बहुत
पौष्टिक और
शक्तिवर्धक
आहार बन जाता
है ।
डॉ.
एन. एन. गोडवेल
कहते हैं कि "गाय
के दूध की
मलाई पूर्ण
सुपाच्य और
मानव-शरीर के
अनुकूल है, जो
तुरंत पचकर शक्ति
उत्पन्न करती
है ।"
सावधानीः
कफ, खाँसी, अपच
व कब्ज के
रोगी को मलाई
का सेवन नहीं
करना चाहिए ।
सब
प्रकार के
दहियों में
गाय के दूध से
बना दही
श्रेष्ठ और
अधिक गुणकारी
है । आयुर्वेद
शास्त्र 'भावप्रकाश
निघंटु'
में आता है कि 'गाय
के दूध से बना
दही सब प्रकार
के दहियों में
श्रेष्ठ,
विशिष्ट
गुणों वाला,
रुचि एवं भूख वर्धक,
हृदय को बल
देने वाला,
पुष्टिकारक व
वातशामक है ।'
रूसी जीव
वैज्ञानिक
एली मेचनीकोफ
ने दही पर
अनेक प्रयोग
करने पर पाया
कि दही में
दूध के अम्ल से
उत्पन्न
सूक्ष्म
जीवाणु आँतों
में विषाणुओं
की उत्पत्ति को
रोकते हैं ।
दही भूख तथा
पाचनशक्ति को
बढ़ाता है ।
अतिसार का
उपचार दही से
तत्काल होता
है । दही से
कैंसर की भी
चिकित्सा
होती है ।
ध्यान
दें – उपरोक्त
गुण पूरी तरह
जमे हुए, ताजे
व खटासरहित
दही में होते
हैं ।
सेवन-विधिः
दिन में जब भी
दही खाना हो
तो गाय का घी,
मिश्री, मूँग,
शहद, आँवला –
इनमें से किसी
के साथ खायें
। दही में नमक
नहीं मिलायें
। रात्रि में
दही नहीं खाना
चाहिए ।
यथा
सुराणाममृतं
सुखाय तथा
नराणां भुवि
तक्रमाहुः ।।
'जिस
प्रकार
देवताओं के
लिए सुखकारी
अमृत है, उसी
प्रकार
पृथ्वी पर
मनुष्यों को
सुखकारी तक्र
है ।'
(भावप्रकाश
निघंटु)
दही
में चौथाई भाग
पानी मिलाकर
मथने से तक्र
तैयार होता है
। इसे मट्ठा
भी कहते हैं ।
ताजा मट्ठा
सात्त्विक
आहार की
दृष्टि से
श्रेष्ठ
द्रव्य है ।
यह जठराग्नि
प्रदीप्त कर
पाचन-तंत्र
कार्यक्षम
बनाता है ।
अतः भोजन के
साथ तथा
पश्चात्
मट्ठा पीने से
आहार का ठीक
से पाचन हो
जाता है ।
जिन्हें भूख न
लगती हो,
खट्टी डकारें
आती हों और
पेट फूलने –
अफरा चढ़ने से
छाती में
घबराहट होती
हो, ठीक से
पाचन न होता
हो उनके लिए
मट्ठा अमृत के
समान है ।
मक्खन
निकाला हुआ
तक्र पथ्य
अर्थात्
रोगियों के
लिए हितकर तथा
पचने में हलका
होता है । मक्खन
नहीं निकाला
हुआ तक्र
भारी, पुष्टिकारक
एवं कफजनक
होता है ।
वातदोष
की अधिकता में
सोंठ व सेंधा
नमक मिला के,
कफ की अधिकता
में सोंठ,
काली मिर्च व
पीपल मिलाकर
तथा
पित्तजन्य
विकारों से
मिश्री मिला
के तक्र का
सेवन करना
लाभदायी है ।
दही
को मथकर मक्खन
निकाल लिया
जाय और अधिक
मात्रा में
पानी मिला के
उसे पुनः मथा
जाय तो छाछ
बनती है । यह
शीतल, हलकी
तथा वात-पित्त
एवं प्यास का
शमन करने वाली
और कफ बढ़ाने
वाली होती है
।
ताजे
दही को मथकर
उसी समय मट्ठे
का सेवन करें ।
ऐसा मट्ठा दही
से कई गुना
अधिक गुणकारी
होता है । देर
तक रखा हुआ
खट्टा व बासी
मट्ठा हितकर नहीं
है । ताजे दही
का अर्थ है –
रात को जमाया
हुआ दही,
जिसका उपयोग
सुबह किया जाय
एवं सुबह
जमाया हुआ
दही, जिसका
सेवन मध्याह्नकाल
में अथवा
सूर्यास्त के
पहले किया जाय
। सायंकाल के
बाद दही या
छाछ का सेवन
नहीं करना
चाहिए ।
सावधानीः
दही या मट्ठा
ताँबें,
काँसे, पीतल
एवं
एल्यूमीनियम
के बर्तन में
न रखें । दही
बनाने के लिए
मिट्टी अथवा
चाँदी के
बर्तन विशेष
उपयुक्त हैं,
स्टील के
बर्तन भी चल
सकते हैं ।
अति
दुर्बल
व्यक्तियों
को तथा
क्षयरोग, मूर्च्छा,
भ्रम, दाह व
रक्तपित्त
में तक्र का
उपयोग नहीं
करना चाहिए ।
उष्णकाल
अर्थात् शरद
और ग्रीष्म
ऋतुओं में
तक्र का सेवन
निषिद्ध है ।
इन दिनों यदि
तक्र पीना हो
तो जीरा व मिश्री
मिला के ताजा
व कम मात्रा
में लें ।
भावप्रकाश
निघंटु के
अनुसार गाय का
नवनीत (मक्खन)
हितकारी, वीर्यवर्धक, वर्ण-निखारक, बलप्रद, पुष्टिदायक, जठराग्नि
प्रदीपक, तथा वात, वित्त, रक्त-विकार, क्षय,, बवासीर, लकवा
(पैरालिसिस) व
खाँसी को दूर
भगाने वाला
है।
भगवान
श्री कृष्ण को
मक्खन
सर्वाधिक
प्रिय है।
इसमें भरपूर
ब्रह्म ऊर्जा
होती है। ब्रह्म
ऊर्जा से मानव
के अन्दर सत्त्वगुण
आता है। बिना
सत्त्वगुण के
संवेदनशीलता
शून्य हो जाती
है।
आज बाजार
में बटर ऑयल
का प्रचलन
बढ़ता जा रहा
है। बटर
ऑयल यानि दूध
से निकाली
गयी मलाई
(क्रीम) का ऑयल, जिसके
सेवन से
व्यक्ति के
हृदय की संवेदनशीलता
खत्म होने
लगती है।
दर्शी, होल्सटीन
आदि विदेशी
पशुओं और भैंस
के दूध का
मक्खन नुक्सानदायक
होता है जबकि
देशी गोदुग्ध
का मक्खन अनेक
बीमारियों को
ठीक करने वाला
एवं
अमृततुल्य
होता है।
मक्खन एक, लाभ अनेक
1.
मक्खन
मस्तिष्क के
विकास और
याददाश्त बनाये
रखने हेतु
बहुत उपयोगी
है । यह दिमाग
को ठंडक
पहुँचाता है
तथा क्रोध को
शांत करता है
।
2.
मेडिकल
रिसर्च
काउंसिल के
शोधानुसार जो
लोग देशी गाय
के मक्खन का
सेवन करते हैं
उन्हें हृदयरोगों
का खतरा आधा
हो जाता है ।
इसमें विटामिन
ए, डी, के-2 और ई के
अलावा लेसिथिन,
आयोडीन और
सेलेनियम
जैसे तत्त्व
प्रचुर मात्रा
में होते हैं
जो हृदय के
लिए लाभदायी
हैं ।
3.
बच्चों के लिए
मक्खन अमृत की
तरह है ।
इसमें
विटामिन्स,
मिरल्स और
कैल्शियम की
मात्रा भरपूर
होने से यह
हड्डियों को
मजबूत बनाता
है ।
4.
दुबले पतले
बच्चे,
युवक-युवतियाँ
1-1 चम्मच मक्खन
रोज सुबह खाली
पेट खायें तो
वे बलवान,
बुद्धिमान व
हृष्ट-पुष्ट
बनते हैं ।
5.
बच्चों के
मसूड़ों पर
मक्खन मलने से
दाँत आसानी से
निकल आते हैं
।
सावधानीः
हमेशा ताजे
मक्खन का ही
प्रयोग करें ।
अधिक देर तक
रखा रहने पर
इसमें से
दुर्गन्ध आने
लगती है ।
बासी मक्खन
खारा, चटपटा
और खट्टा हो
जाने से उलटी,
बवासीर,
चर्मरोग,
कफ-प्रकोप
करने वाला, पचने
में भारी और
मोटापा
बढ़ाने वाला
होता है ।
बाजार में
बिकने वाले कई
दिन पुराने
मक्खन में
रसायन मिलाकर
उसे सड़ने से
बचाया जाता है
अतः ऐसे मक्खन
से परहेज करना
चाहिए ।
मेरी
पुत्रवधू जब
गर्भवती थी और
7 मास का गर्भ था
उस समय बच्चे
का पूर्ण
विकास नहीं
हुआ था । डॉक्टरों
ने कहा कि ''बच्चे
की वृद्धि रुक
गयी है,
सामान्य
प्रसव नहीं
होगा तथा
बच्चे को
इन्क्यूबेटर
मशीन में रखना
पड़ेगा ।"
बचे हुए दो
महीनों में
हमने बहू के
हाथ से गाय को
गुड़-रोटी
दिलवायी तथा
नित्य
गौ-परिक्रमा करायी,
जिसके
परिणामस्वरूप
सामान्य
प्रसूति हुई
और जो बच्ची
हुई वह बहुत
होशियार है ।
यह गौ माता का
आशीर्वाद है ।
सात्त्विक,
बल-बुद्धिवर्धक
गोघृत
देशी
गो से निकला
घी 'अमृत'
कहलाता है ।
स्वर्ग की
अप्सरा
उर्वशी राजा
पुरुरवा के
पास गयी तो
उसने अमृत की
जगह गाय का घी
पीना ही
स्वीकार किया-
'घृतं मे
वीर भक्ष्यं
स्यात् ।'
(श्रीमद्भागवतः
9.14.22)
गोघृत
देवताओं का
अन्न है तथा
प्राणिमात्र
का जीवन है ।
घी तमोगुण
हरने वाला व
सात्त्विक
होता है ।
आयुर्वेद
शास्त्र
भावप्रकाश
निघंटु के अनुसार
देशी गाय का
शुद्ध घी
आँखों के लिए
विशेष लाभकारी,
जठराग्नि तथा
बल-वीर्य
वर्धक, मधुर रसयुक्त,
शीतल,
त्रिदोषशामक,
मेधाशक्तिवर्धक,
लावण्य, कांति
व ओज-तेज की
अत्यंत
वृद्धि करने
वाला तथा
अलक्ष्मी
(निर्धनता,
दुर्भाग्य),
पाप आदि को
दूर करने वाला,
मंगलदायक,
सुगंधयुक्त,
रसायन, रोचक,
दीर्घ
जीवन-प्रदायक
एवं समस्त
घृतों में
उत्तम तथा
अधिक गुणकारी
है ।
छोटे
बच्चे को
जातकर्म
संस्कार के
समय सोने की
शलाका से मधु
व गोघृत का
विमिश्रण
(दोनों की
असमान मात्रा
का मिश्रण)
चटाया जाता है
। इससे उसका
स्वर मधुर व
मेधा का विशेष
विकास होता है
। अन्न-दोष को
दूर करने के
लिए भोजन
सामग्री में
घी डालने का
विधान है । घी
से पका अन्न
बासी होने पर
भी पवित्र
माना जाता है
। घी विष का भी
नाश करता है ।
मनु
महाराज ने कहा
है कि "शुद्ध
भोजन (जो जूठा,
अपवित्र न हो)
में ही घी लेना
चाहिए ।"
गोघृत
में एक अलौकिक
शक्ति है । यह
हृदय को हानि
न पहुँचाकर
विशेष शक्ति
प्रदान करता
है ।
गाय
के घी का दीपक
जलाने से
वातावरण
पवित्र, विशुद्ध
व मंगलकारी
होता है ।
इसके निकट
बैठकर की गयी
उपासना विशेष
फलदायी होती
है । मृतक के
शरीर पर घी का
लेप करने से
शरीर से
निकलने वाले
कीटाणु नष्ट
हो जाते हैं ।
शुद्ध
गोघृत से यज्ञ
करने पर
वैज्ञानिकों
ने पाया कि
इससे
प्रोपिलीन
ऑक्साइड गैस
उत्पन्न होती
ह जो कृत्रिम
वर्षा कराने
के लिए भी
प्रयोग की
जाती है । इसी कारण
भारतीयों में
घर-घर हवन की
परम्परा रही है,
जिससे अकाल या
अनावृष्टि का
संकट देश में
न आये ।
गोघृत
में
मनुष्य-शरीर
में पहुँचे
रेडियोधर्मी
विकिरणों का
दुष्प्रभाव
नष्ट करने की
असीम क्षमता
है । अग्नि
में गोघृत की
आहूति देने से
उसका धूआँ
जहाँ तक फैलता
है, वहाँ तक का
सारा वातावरण
प्रदूषण एवं
आणविक विकिरणों
से मुक्त हो
जाता है ।
सबसे
आश्चर्यजनक बात
तो यह है कि 10
ग्राम गोघृत
की अंगारों पर
या गौ-कंडों
पर कुछ बूँदें
डालते रहने से
पवित्र,
ऊर्जावान एक
टन प्राणवायु
(ऑक्सीजन)
बनती है जो
अन्य किसी भी
उपाय से सम्भव
नहीं है । -
रूसी
वैज्ञानिक
शिरोविच
गोमूत्र
सभी रोगों,
विशेषकर
गुर्दों
(किडनीयों),
यकृत (लिवर),
पेट के रोग,
कुष्ठ रोग,
हृदयरोग, दमा,
पीलिया,
प्रमेह, मधुमेह
(डायबिटीज़),
अजीर्ण तथा
जलोदर के लिए रामबाण
औषधि है ।
इसमें 24
प्रकार के
रसायन जैसे –
पोटैशियम,
कैल्शियम,
मैग्नेशियम,
फ्लोराइड, यूरिया,
अमोनिया, लौह
तत्त्व, ताम्र
तत्त्व, सल्फर,
लैक्टोज आदि
पाये जाते हैं
। 25 जून 2002 को भारत
को गोमूत्र का
पेटेंट मिला ।
आज सम्पूर्ण
विश्व में
एंटी-कैंसर
ड्रग तथा
सर्वोत्तम
कीटनाशक
गोमूत्र है ।
यह महौषधि है
।
भावप्रकाश
के अनुसार 'गोमूत्र
तीखा, तेज,
उष्ण, क्षार
(खारा) कड़वा,
कसैला, लघु
(पचने में
हलका),
जठराग्नि-प्रदीपक,
मेधा के लिए
हितकर,
पित्तकारक
तथा कफ-शामक
है । यह शूल
(दर्द), गुल्म
(उदरस्थ गाँठ),
उदररोग, कब्ज,
खुजली, कृमि,
अतिसार, अफरा,
नेत्ररोग,
वस्ति-संबंधी रोग,
मुख के रोग,
कुष्ठ,
वातरोग, आम,
मूत्र-संबंधी
रोग, त्वचा
विकार, खाँसी,
श्वास (दमा), सूजन,
पीलिया तथा
पांडुरोग
(एनीमिया) को
नष्ट करता है
।'
गोमूत्र
विषनाशक (एंटी
टॉक्सिन) है ।
यह विषाक्त
भोजन या औषधि
के विष को
अथवा मानसिक
विषादजन्य
विष को समाप्त
करता है, घाव
में पैदा होने
वाले मवाद को
सुखाता है ।
यह सड़नरोधी
(एंटीसैप्टिक)
व रोगाणुरोधक
(एंटीबायोटिक)
है तथा
रोगप्रतिरोधक
शक्ति को
बढ़ाता है ।
गोमूत्र में
विटामिन बी
तथा
कॉर्बोलिक
एसिड होता है
जो रोगाणुओं
का नाश करता
है । ताजा
गोमूत्र
सर्वोत्तम है
। इसे रखना हो
तो काँच के
बर्तन में 8
पर्तवाले सूती
कपड़े से
छानकर रखना
चाहिए । यदि
गोमूत्र नहीं
मिले तो
गोमूत्र अर्क
का सेवन करें
। (गोमूत्र
अर्क संत श्री
आशारामजी
आश्रम व समितियों
के
सेवाकेन्द्रों
से प्राप्त कर
सकते हैं ।
बृहत्पराशर
स्मृति (5.38) के
अनुसार
गोमूत्र में गंगाजल
का निवास है ।
अनेक प्रकार
से गंगाजल का
परीक्षण करने
के बाद यह
सिद्ध हुआ है
कि गंगाजल
महामारी आदि
के कीटाणुओं
को दूर
करता है व
उदर-रोगों को
दूर कर स्वास्थ्यवृद्धि
करता है ।
गोमूत्र में
गंगाजल का
निवास होने से
ये सारे गुण
गोमूत्र में
भी विद्यमान
हैं ।
गोमूत्र
से आँखों को
धोने से उनकी
ज्योति वृद्धावस्था
तक बनी रहती
है । इसके
सेवन से पेट के
कीड़े मर जाते
हैं । इसलिए
प्रसूता
स्त्री के लिए
इसका सेवन
महत्त्वपूर्ण
बताया गया है
। गोमूत्र को
गुनगुना करके
कान में डालने
से कान का
बहना बंद हो
जाता है । काली
गाय के मूत्र
को 15 दिन तक
पीने से गले
में सुन्दर
स्वर उत्पन्न
होता है ।
ब्रिटेन
के डॉ. सिमर्स
कहते हैं - "गोमूत्र
रक्त में बहने
वाले दूषित
कीटाणुओँ को
नष्ट करता है
।"
अमेरिकन
डॉ. क्रॉफोर्ड
हैमिल्टन का
कहना है कि "कुछ
दिनों तक
गोमूत्र के
सेवन से
धमनियों में रक्त
का दबाव
सामान्य होने
से हृदयरोग
दूर होता है ।
इसके सेवन से
भूख बढ़ती है
तथा पेशाब खुलकर
होता है । यह
गुर्दे की
विफलता (किडनी
फेल्युर) की
उत्तम औषधि है
।
ध्यान
दें- गोमूत्र
देशी गाय का
ही होना
चाहिए, बैल
आदि या जर्सी,
होल्सटीन आदि
विदेशी पशुओं
का नहीं ।
84
लाख योनियों
के प्राणियों
में गाय ही एक
ऐसा प्राणि है
जिसका पूरीष
(गोबर) मल नहीं
है बल्कि
उत्कृष्ट
कोटि का
मलशोधक,
रोगाणु-विषाणुनाशक
तथा लाभकारी
जीवाणुओं का
पोषक है ।
इटली के
प्रसिद्ध
वैज्ञानिक
प्रो. जी. ई.
ब्रीगेड ने
गोबर के अनेक
प्रयोग कर
सिद्ध कर दिया
है कि गाय के
ताजे गोबर से
क्षय (टी.बी.) व
मलेरिया के
रोगाणु मर
जाते हैं ।
आरम्भिक
अवस्था के रोगाणु
तो गोबर की
गंध से ही मर
जाते हैं ।
गोब
की इस
आश्चर्यजनक
रोगाणुनाशक
शक्ति के कारण
इटली के
अधिकांश
स्वास्थ्यालयों
(सेनेटोरियमज़)
में रोगियों
के उपचार में
गोबर का प्रयोग
किया जाता है
।
देशी
गाय के गोबर
के लाभ
1.
गोबर व
गोमूत्र से
पृथ्वी की
उत्पादन
क्षमता बढ़ती
है ।
2.
गोबर सभी
प्रकार के
चर्मरोगों की
श्रेष्ठ औषधि
है ।
3.
जले हुए भाग
पर स्वस्थ गाय
के गोबर का रस
लगाना
लाभकारी है ।
4.
गोबर में
परमाणु
विकिरण व
आकाशीय
विद्युत को
रोकने की
क्षमता है ।
5.
दीवारों,
आँगन, चूल्हे
पर इसका लेप
करने से सभी
प्रकार के कीटाणुओं
व
रेडियोधर्मिता
के प्रभाव से
बचा जा सकता
है ।
6.
गोबर में ऐसी
क्षमता है कि
यदि
कूड़े-कचरे के
ढेर में इसका
घोल डाला जाय
तो 3-4 महीने में
उसकी उपयोगी
खाद बन जाती
है ।
7.
इसके कंडों को
ईंधन के रूप
में जलाने के
बाद बची हुई
राख एक उत्तम
कीटनाश व खाद
है । खेतों
में राख पड़ने
से दीमक आदि
कीड़े नहीं
पनपते तथा फसल
अच्छी होती है
।
8.
गोबर के कंडों
की राख
बर्तनों की
सफाई में उपयोगी
है । क्लीनिंग
पाउडर से
बर्तन साफ
करने पर हाथों
में चर्मरोग
होने का खतरा
रहेगा और यदि
थोड़ी भी
मात्रा में
पाउडर
बर्तनों में
लगा रह जाता
है तो शरीर को
हानि पहँचेगी
। गोबर के
कंडे की राख
से बर्तनों को
जो पवित्रता
मिलती है वह
क्लीनिंग पाउडर
आदि से नहीं
मिलती है ।
नॉर्मल
डिलीवरी हेतु
रामबाण
प्रयोग
ब्रह्मज्ञानी
संत श्री
आशाराम जी
बापू अपने
सत्संगों में
सामान्य
प्रसूति के
लिए रामबाण
प्रयोग बताते
हैं- "सामान्य
प्रसूति में
यदि कहीं बाधा
जैसी लगे तो
देशी गाय के
गोबर का 10-12
ग्राम ताजा रस
निकालें,
गुरुमंत्र का
जप करके अथवा 'नारायण...
नारायण...' जप
करके गर्भवती
महिला को पिला
दें । एक घंटे
में प्रसूति नहीं
हो तो वापस
पिला दें ।
सहजता से
प्रसूति होगी
। अगर
प्रसव-पीड़ा
समय पर शुरु
नहीं हो रही
हो तो गर्भिणी
'जम्भला...
जम्भला....'
मंत्र का जप
करे और पीड़ा
शुरु होने पर
उसे गोबर का
रस पिलायें तो
सुखपूर्वक
प्रसव होगा ।"
गोबर
किसानों के
लिए वरदान है
। इससे भूमि
की उर्वरा
शक्ति में
वृद्धि होकर
पौष्टिक एवं स्वादिष्ट
अन्न, फल,
सब्जी आदि की
उत्पत्ति होती
है ।
रासायनिक
खाद का केवल 30
प्रतिशत भाग
ही मिट्टी में
घुलमिल पाता
है, शेष भाग
पत्थर की
भाँति वहीं बना
रहता है, जो
भूमि को बंजर
बनाता है ।
जब
से भारतीय
कृषि में
रासायनिक खाद
का चलन हुआ है
तब से
खाद्यान्नों
की गुणवत्ता,
पौष्टिकता
एवं स्वाद में
भारी कमी आयी
है और वे लगभग
सारहीन हो गये
हैं । जिन
खेतों में
रासायनिक खाद
का प्रयोग
हुआ, उनमें
पानी की खपत
दुगनी हो गयी
तथा उनकी
फसलों में
रोगों से
लड़ने की प्रतिरोधक
शक्ति न होने
पर रोगाणुओं
और कीटाणुओं
ने उन पर
आक्रमण कर
दिया ।
फलस्वरूप
कीटनाशकों की
आवश्यकता हुई
। इसके कारण
खाद्यान्न तो
विषैला हुआ
ही, साथ ही साथ
पशु के उपयोग
का चारा और भी
अधिक विषैला
हो गया ।
कीटनाशकों
का विष भूमि
में व्याप्त
होकर अपना
प्रभाव कई
वर्षों तक
रखता है । यह
विष पानी के
साथ मिलकर
पृथ्वी तल के
नीचे जल के
स्रोतों तक
पहुँच जाता
है, जिससे
पेयजल भी
विषयुक्त मिल
रहा है ।
एनसाइक्लोपीडिया
ब्रिटेनिका
में भी
चेतावनी दी
गयी है कि 'शहरी
औद्योगिक
अवशिष्ट एवं
रासायनिक
उर्वरक के
कारण पृथ्वी
के सम्पूर्ण
जलाशय
प्रदूषित हो
रहे हैं, जो
मानव-जाति के
अस्तित्व के
लिए एक गम्भीर
खतरा है ।'
अतः
इन गम्भीर
परिणामों से
बचने का
अत्यंत उत्तम
उपाय है गाय
का का गोबर ।
यह श्रेष्ठतम
उर्वरक एवं
मलशोधक तो है
ही, इसकी
ऊर्जा के
अविरल स्रोत
के रूप में भी
उपयोगिता
सिद्ध हो चुकी
है ।
विश्वविख्यात
वैज्ञानिक
अल्बर्ट
आइंस्टीन ने
कहा थाः "ट्रैक्टर
व रासायनिक
खाद के उपयोग
से 400 वर्षों
में अमेरिका
जैसे देशों की
उपजाऊ भूमि
नष्ट हो
जायेगी जबकि
जमीन का
उपजाऊपन भारत
में, जहाँ
कृषि गौ-आधारित
है, बिल्कुल
भी कम नहीं
हुआ ।"
गाय के
गोबर ने बनाया
सुखी व समृद्ध
कर्नाटक
में बांदीपुर
राष्ट्रीय
उद्यान के इर्दगिर्द
74 गाँव हैं ।
वहाँ कॉफी के
बगीचे हैं ।
गोबर-खाद से
उगायी गयी
कॉफी की खुशबू
विशेष होती
है, जिससे
भारत की कॉफी
विश्व-बाजार
में अच्छी
मानी जाती है
। अतः इन
गाँवों में
कॉफी बागानों
के लोग गोबर
खाद खरीदने
लगे । कुछ
गाँवों में तो
95 प्रतिशत लोग
गोबर के धंधे
से ही अपना
गुजारा करते
हैं । गोबर
खाद से पोषित
फसलों से बने
उत्पादों की
कीमतें
विश्व-बाजार
में बहुत
ज्यादा हैं ।
इस
उदाहरण से
स्पष्ट है कि
यदि पूरे देश
की नीति
पशु-आधारित
अर्थतंत्र की
ओर विशेष
गतिशील हो तो
किसानों को
आत्महत्या
करने या शहरों
की तरफ पलायन
करने की नौबत
नहीं आयेगी और
गोवंश की भी रक्षा
होगी । किसानों
की समस्याओं
का अंत वास्तव
में गोवंश-पालन
से ही सम्भव
है ।
गोहत्या
के पक्ष में
दिये जाने
वाले कुछ कुतर्क
जो
खाद्य
वस्तुएँ आपके
लिए अनुपयोगी
हैं उन्हें
खाकर गाय आपको
श्रेष्ठतम
आहार गोदुग्ध
देती है और
बैल कृषि-कार्य
व भारवाहन
करते हैं ।
गोवंश से
खेतों को
गोबर-खाद
मिलती है,
जिससे अन्न,
सब्जी, फल, तिलहन
– सब कुछ पैदा
होता है
जिन्हें खा के
आप जीवित रहते
हैं ।
गाय,
जो सड़कों पर
बेसहारा सी
घूमती है,
कूड़ा-कचरा
खाती है उसकी
ऐसी दशा का
उत्तरदायी
कौन है ? आज
से 50-100 वर्ष पहले
ऐसा नहीं था ।
गोचर भूमि में
आज बड़ी-बड़ी
इमारतें व
मकान बन गये
और उसके बदले
में नगर के
बाहर गोचर
भूमि की
व्यवस्था
नहीं हुई । जब
गोचर भूमि थी
तब ग्वाले
प्रातःकाल
गायों को
चराने ले जाते
और शाम को
वापस ले आते ।
इससे गाय का
व्यायाम हो
जाता और उसे घास
भी मिल जाती
थी ।
कई
लोग कुतर्क
देते हैं कि 'दूध
न देने वाली
गायें और
बूढ़े, अपंग
बैल व बेकार
साँडों को
रखने से क्या
लाभ ? वे तो
देश की
अर्थव्यवस्था
पर भार हैं ।' तो
ऐसे लोगों के
लिए पहली बात
तो यह है कि
जिस प्राणी ने
आपके साथ
रिश्ता
जोड़कर आपको
अपना सर्वस्व
मान के किसी
भी रूप में
आपकी सेवा की
है, क्या आप
उसके प्रति
इतने कृतघ्न,
निर्दयी और क्रूर
हो जायेंगे कि
आप उसे
कत्लखाने भेज
देंगे ? आपके
साथ यदि आपकी
संतान भविष्य
में ऐसा व्यवहार
करे तो आपको
कैसा लगेगा ?
दूसरी
बात यह है कि
गोवंश, गोबर,
गोमूत्र और आशीष
तो
जीवनपर्यन्त
देता ही रहता
है, फिर वह
आपके लिए
अनुपयोगी
कैसे हो गया ?
पूज्य
संत श्री
आशारामजी
बापू कहते
हैं- "गौमूत्र
अर्क बनाने
वाली
संस्थाएँ एवं
जो लोग
गोमूत्र से
फिनायल व
खेतों के लिए
जंतुनाशक दवाइयाँ
बनाते हैं, वे 8
रूपये प्रति
लिटर के मूल्य
से गोमूत्र ले
जाते हैं ।
गाय 24 घंटे में 7
लिटर मूत्र
देती है तो 56
रूपये होते
हैं । उसके
मूत्र से ही
उसका खर्चा
आराम से चल
सकता है । गाय
के गोबर, दूध
और उसकी
उपस्थिति का
फायदा तो
मिलेगा ही ।"
यदि
आप गायों को
अपने साथ रखना
चाहें तो वे
आपके
आवास-स्थल पर
एक छोटे से कोने
में रह सकती
हैं । बड़ी
संख्या में
रखना हो तो
खुले मैदान
में भी रह
सकती हैं ।
सर्दियों में
गायें इस
प्रकार आपस
में सटकर बैठ
जाती हैं कि
सर्दी से उन
पर कोई
प्रतिकूल
प्रभाव नहीं
पड़ता । भगवान
ने उन्हें
इतनी
प्रतिरोधक
शक्ति दी है कि
किसी भी मौसम
में वे अपने
को स्वस्थ रख
सकें ।
स्वास्थ्य,
मानवता व
संस्कृति की
रक्षा चाहते
हैं तो जरूरी
है....
गौ
के चरणों की
धूल भी पवित्र
होती है और कई
बीमारियों का
निवारण करती
है । वह जहाँ
बैठती है वह
स्थान भी
पवित्र हो
जाता है । उसके
गोबर व
गोमूत्र भी
पवित्र होते
हैं । गाय के श्वास
से बहुत से
जीवाणु नष्ट
हो जाते हैं ।
उसके रोम-रोम
में
मनुष्यमात्र
की आरोग्यता,
सुरक्षा एवं
कल्याण निहित
है । यात्रा
के समय गाय
आपकी दायीं ओर
से जाय तो शुभ
माना जाता है
। गौ-सेवा
मनोकामनाएँ
पूर्ण करती है
। गाय को आने
वाली
विपत्तियों
का पहले ही
भान हो जाता
है । संकट या
अनिष्ट का
पूर्वाभास
होने पर वह
अपने ऊपर कष्ट
झेलकर भी
गौ-सेवक की
रक्षा करती है
। गौरक्षा के
बिना हमारी
हरित क्रांति
अधूरी ही
रहेगी । यदि
गौरक्षा हुई
तो मानव की
रक्षा हो
सकेगी अन्यथा
मानवता को भी
प्रश्नचिह्न
लग सकता है ।
स्वरोजगार
का उत्तम
मार्गः
गौ-पालन
गोवंश
रोजगार का एक
बहुत उत्तम
साधन है ।
इसके पालन से
कई लघु उद्योग
चलाये जा सकते
हैं ।
गौ
पालन से मिलने
वाले आजीविका
के साधन अथवा
बनाये जाने
वाले उत्पादः
1. गोमूत्र
अर्क निर्माण
2. गोमूत्र व
गोब से
सात्त्विक
साबुन व
शैम्पू का
निर्माण 3. गोबर
से खाद,
उर्वरक,
धूपबत्ती
बनाना 4.
गोमूत्र से
केमिकल रहित
सात्त्विक
फिनायल आदि
कीटनाशक
बनाना 5.
गोबर-गैस 6.
मच्छर भगाने
का तेल व
अगरबत्ती आदि
बनाना 7.
दंतमंजन, चर्मरोगनाशक
महलम,
नेत्ररोगहर
अंजन, उबटन
एवं विभिन्न
औषधियों का
निर्माण ।
इनके अलावा और
भी अनेक
उत्पाद बनाये
जा सकते हैं ।

जानिये
संतों-महापुरुषों
के उद्गार....
जब
तक गौ माता का
रुधिर भूमि पर
गिरता रहेगा,
कोई भी धार्मिक
तथा सामाजिक
अनुष्ठान सफल
नहीं होगा । -
ब्रह्मर्षि
देवराहा बाबा
आज
गोवंश का हनन
हो रहा है ।
गौरक्षण आज का
सर्वोत्तम
राष्ट्रहित
है । - स्वामी
श्री अखंडानंद
जी सरस्वती
एक
गाय अपने
जन्मभर के दूध
से 4,10, 440
मनुष्यों का एक
एक समय के लिए
भोजन जुटाती
है । - महर्षि
दयानंद
सरस्वती
जैसे
माता-पिता,
भाई-बहन और
दूसरे
बंधु-बांधव आत्मीय
हैं, वैसे ही
गाय हमारी परम
मित्र और हितैषी
है । गाय अन्न,
रूप (सौंदर्य),
बल व सुख देने
वाली है – इन
बातों
(गौ-महिमा) को
जानकर ही पहले
के लोग गौ की
रक्षा करते थे
। - महात्मा
बुद्ध, महावीर
स्वामी
गौरक्षा
बिना
मानव-रक्षा
सम्भव नहीं ।
भारत
में गौ-पालन
सनातन धर्म है
। - भारत के प्रथम
राष्ट्रपति
डॉ. राजेन्द्र
प्रसाद
गौरक्षा
का प्रश्न स्वराज्य
के प्रश्न से
भी अधिक
महत्त्वपूर्ण
है । गोवंश की
रक्षा ईश्वर
की सारी मूक
सृष्टि की
रक्षा करना है
। भारत की
सुख-समृद्धि
गाय के साथ
जुड़ी हुई है
। - महात्मा
गांधी
देशी
गाय का दूध
स्वास्थ्य का
रक्षक और पोषक
है । गाय की
रक्षा में
स्वास्थ्य,
मानवता और संस्कृति
की रक्षा है । -
संत श्री
आशाराम जी बापू
गौरक्षा
में कैसे दें
अपना योगदान ?
यदि
हम मानव को
ईश्वर द्वारा
प्रदत्त
वरदान 'गौ' के
आशीर्वाद से
स्वस्थ व सुखी
रहना चाहते
हैं तो गाय के
दूध, घी आदि का
ही खाने-पीने
तथा हवन-पूजन
आदि में
प्रयोग करें
और डेयरियों
आदि स्थानों
पर गौ-उत्पाद
की माँग करें
। एलोपैथिक दवाओं
की गुलामी
छोड़कर
गौ-चिकित्सा
का लाभ लें ।
निरोग रहने के
लिए गोमूत्र व
गोमय (गोबर के
रस) से बनी औषधियों
का सेवन करें
।
गायों
की रक्षा के
लिए जिनके पास
गाय रखने की जगह
हो व कम से कम
एक देशी गाय
अवश्य पालें ।
जो गाय नहीं
पाल सकते हों
वे देशी गाय
को रोज गोग्रास
खिलायें ।
जिन्हें
सम्भव हो वे
गौरक्षा हेतु
गौशालाओं का
निर्माण करें
। गोचर भूमि
की रक्षा करें
।
खेती
में रासायनिक
खाद व कीटनाशक
के स्थान पर गोबर-खाद
व गोमूत्र से
बने कीटनाशक
का ही प्रयोग
करें । खेती
करने वाले
सज्जनों को
चाहिए कि वे
गाय, बछड़ा,
बैल आदि को
निकम्मा
जानकर बेचें
नहीं । गायें
और माँएँ बेचनी
नहीं होती हैं
। जब तक गाय
दूध और बछड़ा
देती है एवं
बैल काम करता
है तब तक उनको
रखते हैं तथा
जब वे बूढ़े
हो जाते हैं
तब उनको बेच
देते हैं – यह
कितनी
कृतघ्नता की,
पाप की बात है !
महात्मा
गांधी ने लिखा
था कि 'बूढ़ा
बैल (या गाय)
जितनी घास
(चारा) खाता है,
उतना अपना खर्चा
गोबर व
गोमूत्र से आप
ही चुका देता
है ।'
गाय
से इतने लाभ
होने के
बावजूद बहुत
सी गौशालाएँ
बंद होने के
कगार पर हैं ।
अतः हम स्वयं
गाय से
प्राप्त
उत्पादों का
उपयोग करें और
गाय की महत्ता
व आवश्यकता के
बारे में
ज्ञापन आदि के
द्वारा
गौरक्षा की
माँग करें
क्योंकि गाय
है तो
स्वास्थ्य,
सुख-शांति और
देश की उन्नति
है ।
यदि
हम अपना
परिवार का तथा
राष्ट्र का
भला चाहते
हैं, अपने
धर्म का पालन
करना चाहते
हैं तो हमें
भारतीय
संस्कृति के
अभिन्न अंग 'गौ' की
रक्षा करनी
होगी ।
उसका पोषण,
संवर्धन व
सम्मान करना
होगा ।
गौ
रक्षण व
संवर्धन के
प्रेरणास्रोतः
संत
हमारी
संस्कृति में
गायों का अनेक
दृष्टियों से
अत्यंत
महत्त्वपूर्ण
स्थान है और
उनके प्रति
समाज में जो
भी
महत्त्वबुद्धि
है, आदर भाव है
वह हमारे
संतों-महापुरुषों
के कारण ही है ।
वर्तमान समय
में पूज्य संत
श्री
आशारामजी बापू
का गौरक्षण व
संवर्धन में उल्लेखनीय
योगदान है ।
आपने न केवल
इसके लिए समाज
को प्रेरित
किया बल्कि इस
हेतु अनेक
महत्त्वपूर्ण
कार्य भी किये
।
आपने
कत्लखाने
भेजी जा रहीं
हजारों गायों
को बचाकर उनके
लिए गौशालाएँ
बनवायीं । देश
के अनेक
राज्यों में
आपके मार्गदर्शन
में चल रही
गौशालाओं में
वर्तमान में
करीब 9000 गायों
का संरक्षण,
संवर्धन व
गौ-सेवा हो रही
है । आपने गाय
के गोबर,
गोमूत्र आदि
से गौ-चंदन
धूपबत्ती,
गोमूत्र अर्क,
गौ शुद्धि
सुगंध
(फिनायल),
गौ-सेवा
केंचुआ खाद
आदि बनवाकर
गौशालाओं को
आत्मनिर्भर
बनाने के आदर्श
प्रकल्प
प्रस्तुत
किये तथा
गौ-पालकों को
आर्थिक तंगी
से निपटने का
मार्ग दिखाया
। इन प्रकल्पों
से लोगों को
रोजगार भी
मिला ।
एक
ओर जहाँ पूज्य
बापू जी
सत्संगों व
संदेशों के माध्यम
से पिछले 50
वर्षों से
गौ-महिमा
जन-जन तक पहुँचा
रहे हैं, वहीं
दूसरी ओर
आपश्री की
प्रेरणा से 'ऋषि
प्रसाद', 'लोक
कल्याण सेतु', 'ऋषि
दर्शन' – इन
मासिक
प्रकाशनों
द्वारा गायों
के प्रति समाज
में जागृति
लाने का कार्य
सतत जारी है ।
आपकी प्रेरणा
से गौरक्षा यात्राओं
आदि के माध्यम
से जनजागृति
का कार्य आपके
शिष्यों
द्वारा देशभर
में समय-समय
पर किया जाता
है ।
पूज्य
बापू जी ने न
केवल गौ से
प्राप्त
पदार्थों का
प्रयोग कर
स्वस्थ, सबल व
सम्पन्न रहने
की अनेक
युक्तियाँ
बतायीं बल्कि
सस्ते मूल्य में
गौ-उत्पाद
तैयार कराके
समाज को सुलभ
कराये, जिनका
प्रयोग करके
लोग दैनिक
जीवन में
गायों की
अनिवार्यता
प्रत्यक्ष अनुभव
करने लगे हैं
।
आपश्री
ने गोपाष्टमी
आदि पर्वों का
व्यापक प्रचार-प्रसार
करके गौ-सेवा,
गौ-पूजन आदि
से होने वाले
लाभों से समाज
को अवगत कराया
। आपके देश-विदेश
के भक्तों द्वारा
गोपाष्टमी
पर्व बहुत
व्यापक स्तर
पर मनाया जाता
है ।
जन
समाज को ऐसे
संतों-महापुरुषों
के द्वारा ही
गौ, गीता, गंगा
जैसे भारतीय
संस्कृति के
गौरवशाली
प्रतीकों की
बहुआयामी एवं
रहस्यमयी महत्ता
ज्ञात होती है
। अतः यदि हम
इन प्रतीकों
और समस्त
भारतीय
संस्कृति की
रक्षा चाहते
हैं तो इनके
रक्षक एवं
पोषक ऐसे
संतों-महापुरुषों
की रक्षा,
उनका आदर,
उनके सत्संग-सान्निध्य
का सेवन एवं
उनकी सेवा
हमारा
व्यक्तिगत,
सामाजिक और
राष्ट्रीय
कर्तव्य है ।


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