प्रस्तावना

क्या आपः

1. जीवन में बुलन्दियों को छूना चाहती हैं ?

2. प्रतिस्पर्धा के दौर में विजय पाना चाहती हैं ?

3. अपनी महिमा को जानना चाहती हैं ?

4. कभी-कभी स्वयं को निराश महसूस करती हैं ?

5. जीवन की परीक्षाओं से हार मान चुकी हैं ?

6. घोर अन्धकार में आशा की किरण तलाश रही हैं ?

7. अपना वास्तविक सौन्दर्य जगाना चाहती हैं ?

यदि आपके जीवन में इनमें से एक या अधिक प्रश्नों का उत्तर 'हाँ' में है तो यह छोटी सी पुस्तिका आपके लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी । यह आपके अंदर एक क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने का सामर्थ्य रखती है ।

यह पुस्तिका संत श्री आशाराम जी बापू के प्रेरक वचनों एवं सत्शास्त्रों पर आधारित है । इसका एकाग्रतापूर्वक पठन-मनन, चिंतन देदीप्यमान सूरज की तरह आपके जीवन के सारे अंधकार को हरकर आपको परम उज्जवल, ज्योतिर्मय महामंगलमय मार्ग पर अग्रसर करेगा ।

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अनुक्रमणिका

1. हे नारी तू नारायणी है ।

2. जीवन को दिव्यता की सुवास के सुवासित करने वाले कुछ मूलभूत सिद्धान्त

3. महानता के 8 दिव्य सूत्र और 7 हानिकारक बातें ।

4. तबाही करने वाली गंदगी से बचें ।

5. यदि आप वास्तविक सौन्दर्य जगाना चाहती हैं तो....

6. आदर्श चरित्र का निर्माण

7. निर्भय बनो

8. स्वयं पर विश्वास करें

9. लक्ष्य प्रति दृढ़ता

10. आत्मबल कैसे जगायें ?

11. सकारात्मक दृष्टिकोण

12. नेतृत्व की प्रतिभा

13. तुम्हारे हाथ की बात !

14. इन 5 से अपने के बचायें

15. समय का सदुपयोग

16. ऐसी महान संस्कृति से च्युत होना कितनी शर्मजनक बात है !

17. ब्रह्मचर्यः जीवन की अनिवार्यता

18. जीवन को सफल बनाने वाले सीता जी के 12 दिव्य गुण

19. एकाग्रता, स्वास्थ्य, बल-बुद्धि व पुष्टिदायक विभिन्न प्रयोग

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हे नारी तू नारायणी है ।

स्त्री वर्ग का बहुत बड़ा योगदान परिवार व समाज निर्माण में हो सकता है यदि यह वर्ग संयमी, संस्कारी, सत्संगी व ईश्वरपरायण हो । और यदि इस वर्ग को जीवन की आरम्भावस्था (बाल्यकाल) अथवा मध्यावस्था तक भी ऐसे संस्कार मिलना प्रारम्भ हो जाय तब तो कहना ही क्या !

पुत्रि पवित्र किये कुल दोऊ... एक कन्या के हाथों में उसके जीवनकाल में दो-दो कुलों की शान व सम्मान रहते हैं । यदि उस कन्या को किन्हीं ब्रह्मवेत्ता संत का मार्गदर्शन मिल जाय, शिक्षा-दीक्षा मिल जाय तो वह इन कुलों के लिए ही नहीं अपितु पूरे राष्ट्र के लिए मीरा, मदालसा, गार्गी, सहजोबाई बनकर गौरव का कारण बनती है ।

जो चीज जितनी महत्त्वपूर्ण होती है वह उतनी ही अधिक सावधानी, सम्मान और संरक्षण के साथ रखी जाती है । इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि 'स्त्री जब कन्या होती है तब पिता द्वारा, युवावस्था में पति द्वारा और वृद्धावस्था में पुत्र द्वारा रक्षणीय है ।'

धर्म-मर्यादा में रहकर बड़े-बड़े संत-महात्माओं का अवतरण कराने वाली, धरा पर भगवान को लाने वाली, ब्रह्मा-विष्णु-महेश को शिशु बनाने का सामर्थ्य रखने वाली नारी आज विदेशी ताकतों के षड्यंत्र के शिकंजे में फँसती जा रही है । नारी-स्वातन्त्र्य के नाम पर आज उसे गुलाम बनाया जा रहा है ।

ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों के सत्संग से विमुख होकर, अपनी श्रेष्ठ संस्कृति, शास्त्र-मर्यादाओं को छोड़ के, अपने माता-पिता से मुँह मोड़ के, अपने पवित्र एवं जाज्वल्यमान महिमा को भूल के आज नारी-वर्ग अपने-आपको स्वतंत्र सिद्ध करने की चाह में पाश्चात्य देशों का अंधानुकरण कर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की भूल कर रहा है ।

हे नारी ! तू नारायणी है । भारत की महान नारियों की याद ताजी करके अपनी खोयी हुई गरिमा को प्राप्त कर । पाश्चात्य कल्चर के शिकंजे से बाहर निकल । तुझमें पूर्ण सामर्थ्य छुपा है । ॐॐॐ शक्ति... ॐॐॐ भक्ति... ॐॐॐ सच्ची मुक्ति ! ॐ आनन्द !

अपने जीवन को महानता के शिखर पर पहुँचा दो � पूज्य बापू जी

हे भारत की देवियो ! तुममें अथाह शौर्य व सामर्थ्य छुपा है । अपनी सुषुप्त शक्तियों को जगाओ । गार्गी, मदालसा, मीरा भी इसी भारतभूमि की नारी रत्न थीं । तुम भी ब्रह्मवेत्ता संतों-महात्माओं और सत्शास्त्रों के मंगलमय उपदेशों का लाभ लेकर अपनीदिव्यता को जगाओ और अपने जीवन को महानता-पूर्णता के शिखर पर पहुँचा दो । तुच्छ चीजों में जीवन बरबाद न करते हुए उसे भगवान की आराधना उपासना, जप-तप-साधना में लगाओ तो तुम भी आत्मपद में आरूढ़ हो सकती हो ।

अनुक्रमणिका

जीवन को दिव्यता की सुवास से सुवासित करने वाले मूलभूत सिद्धान्त � पूज्य बापू जी

सदैव अच्छा संग करें

बड़े-बड़े अपराधी भी सत्संग के द्वारा सुधर के महान हो गये और अच्छे-अच्छे भक्त भी कुसंग के द्वारा दुष्ट हो गये । इसलिए अच्छा संग (सत्शास्त्रों व सत्पुरुषों का संग) करना चाहिए । अच्छा संग नहीं मिले तो अच्छे सत्संग सुनने देखने चाहिए । यदि यह सम्भव न हो तो अच्छे शास्त्र पढ़ने चाहिए और यह भी नहीं कर सकते तो अच्छे में अच्छा जो भगवान का नाम है, गुरुमंत्र है, उसका जप करना चाहिए आदि-आदि । अपने हृदय को परिवर्तित करते-करते उसमें भगवान प्रकट हों, ऐसा उसे योग्य बनाना चाहिए ।

मानव-जीवन का उद्देश्य यह है कि मनुष्य आसुरी सम्पदा से बचे और अपने आत्मदेव की शक्तियों को, ज्ञान को पाकर मुक्त हो जाय । बंधनों से छूटे और मुक्ति सहज में उसकी मुठ्ठी में आ जाय ।

संयमी, निर्भीक, दृढ़ और पवित्र बनाने वाली 3 बातें

1. पहली बात, जिस काम से तुम्हारा चित्त भयभीत होता हो और दूसरों को खुश करने में लगता हो उसको छोड़ दो, तुम अपने अंतर्यामी को प्रसन्न करने की कोशिश करो ।

घर में बढ़िया फर्नीचर या पफ-पाउडर आदि सौंदर्य-प्रसाधन नहीं होंगे तो लोग क्या कहेंगे इसकी परवाह मत करो । अपनी जीवन सादा, संयमी, दृढ़ और पवित्र बनाना चाहिए ।

अभयं सत्त्वसंशुद्धिः... जीवन में निर्भयता लाओ । विलासी-व्यसनी अपने को विलास-विकार में खींचते हैं । उनकी हाँ में हाँ नहीं करो तो नाराज होते हैं व हाँ में हाँ करके फिसलो तो बरबादी होती है । अतः दृढ़ता से तुम तो बचो, युक्ति से उनको भी अच्छे संस्कारों में ले आओ । माता-पिता, गुरुजन, शास्त्र और भगवान क्या कहेंगे इस बात का डर रखने से चित्त पवित्र होता हैः

हरि डर गुरु डर जगत डर, डर करनी में सार ।

रज्जब डरिया सो उबारिया, गाफिल खायी मार ।।

निर्भय और सत्त्वगुणी बनो, तमोगुणी, रजोगुणी, कायर मत बनो । अपने जीवन में निर्भयतापूर्वक अच्छे संस्कारोँ को पकड़े रखना चाहिए ।

2. दैवी सम्पदा में दूसरी बात हैः हृदय शुद्ध हो ऐसा आहार-व्यवहार और चिंतन करना ।

3. तीसरी बात है तप । अपने जीवन में थोड़ी तपस्या होनी चाहिए । सुबह ठंड पड़ती है लेकिन सूरज उगने के पहले उठकर नहा लो, देखो फिर हृदय में कितनी प्रसन्नता और सत्त्वगुण बढ़ता है ।

सत्संग में अथवा सत्कर्म में जाते समय थोड़ा तन-मन-धन लगाना पड़ता है किंतु वह तप, दान हो जाता है । सुबह जल्दी उठकर भगवान (अंतरात्मा) का थोड़ा ध्यान करो, यह तप हो जाता है । हर रोज एकाध घंटा, दो घंटा मौन व्रत रखो, तुम्हारी शक्ति बढ़ेगी, तुम्हारी वाणी सूझबूझ-सम्पन्न व प्रभावशाली होगी, उसमें आकर्षण होगा । जो तितली की भांति इधर से उधर भटकते रहते हैऔर व्यर्थ का बोल-बोल करते रहते हैं उनके चित्त में न शांति होती है न क्षमा होती है, न सद्विचार होता है न अनुमान शक्ति होती है, वेबिखर जाते हैं ।

दिखावटी नहीं, दिव्य जीवन जियो

खाना-पीना और इन्द्रिय लोलुपता का सुख तो पशु-पक्षी, घोड़े-गधे, कुत्ते-बिल्ले भी पा लेते हैं, आपको ऊँचे में ऊँचा परमात्मसुख पाना है । ऊँचा जीवन जीने के लिए बाहर का आडम्बर नहीं, आंतरिक विकास करो । दिखावटी जीवन की अपेक्षा सात्त्विक और दिव्य जीवन जियो । दूसरों के अधिकार की रक्षा और अपने बल का सदुपयोग करो ।

ब्रह्मज्ञान का सत्संग सुनो । घर परिवार में आत्मज्ञान की चर्चा करो । सुख-दुःख आये तो आत्मज्ञान की दृष्टि से निहारो । इस परिवर्तनशील संसार व उसकी परिस्थितियों से कभी प्रभावित मत होओ । अपने परमात्मा की मस्ती में मस्त रहो । अपने आत्मगौरव में जागो ।

सबका चहेता बनने का राज

आप जहाँ भी रहें, कहीं भी जायें तो अपनी अक्ल से, तन से, मन से, धन से दूसरों की सेवा हो जाय, ज्ञान बढ़े, संयम बढ़े, स्वास्थ्य अच्छा रहे ऐसा प्रयास करें । 'मैं बड़ी बाई हूँ, बड़ी सेठानी हूँ...' यह अभिमान न करें और अपना व्यक्तिगत खर्च कम रखें । तो आप बिल्कुल प्रभावशाली हो जायेंगे, आपकी माँग बनी रहेगी ।

ये 6 सद्गुण आपको सफल बना देंगे

शास्त्र का वचन हैः

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः ।

षड़ेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत् ।।

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम � ये 6 सद्गुण आ गये तो पद-पद पर परमात्मदेव सहायता करते हैं । ये 6 गुण जिसमें भी हैं उसके डिग्रियाँ हैं तो भी ठीक है और कोई डिग्री नहीं है तो भी ठीक है । ये 6 गुण बिना डिग्रीवाले को भी सफल बना देंगे ।

तो अपनी योग्यता डिग्रियों से जो कुछ होती है, वह होती है लेकिन वास्तव में इन सद्गुणों से ही योग्यता का सीधा संबंध आत्मशक्तियों से जुड़ जाता है । फिर डिग्री है तो ठीक है और नहीं है तो भी उस व्यक्ति का महत्त्व कम नहीं है । महानता का वास्तविक मापदंड ये आंतरिक सद्गुण ही हैं, बाह्य डिग्रियाँ नहीं ।

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महानता के 8 दिव्य सूत्र और 7 हानिकारक बातें � पूज्य बापू जी

8 दिव्य सूत्र

जीवन को महान बनाने के 8 दिव्य सूत्र जीवन में आने ही चाहिएः

1. शांत स्वभावः शांत रहना सीखो मेरे बच्चे बच्चियो ! 'ओऽऽम्ऽऽ...' उच्चारण किया और जितनी देर उच्चारण किया उतनी देर शांत हो गये । ऐसा 10 से 15 मिनट ध्यान करो । फिर देखो आप समय पाकर कैसे सद्गुणों व सद्विचारों की प्रेरणा पाते हैं व फैलाते हैं ! शांत रहने का जो दिव्य गुण है उससे स्मरणशक्ति, सामर्थ्य बढ़ेगा और दूसरे भी कई लाभ होंगे । इसलिए शांत व एकाग्र रहने का गुण विकसित करो । तपःसु सर्वेषु एकाग्रतां परं तपः ।

2. सत्यनिष्ठाः सत्य बोलना बड़ा हितकारी है । झूठ-कपट और बेईमानी से थोड़ी देरके लिए लाभ दिखता है किंतु अंत में दुःख ही दुःख होता है । सत्य के आचरण से भगवान जल्दी रीझते हैं, भक्ति, ज्ञान और योग में बरकत आती है एवं अंतःकरण जल्दी शुद्ध होता है ।

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।

जाके हिरदै साँच है, ताके हिरदै आप ।।

गांधी जी की सत्यता की सुवास अभी भी महक रही है ।

3. उत्साहः जो काम करें उत्साह व तत्परता से करें, लापरवाही न बरतें । उत्साह से काम करने से योग्यता बढ़ती है, आनंद आता है । उत्साहहीन हो के काम करने से कार्य बोझ बन जाता है ।

4. धैर्यः जिसका हृदय धैर्य और सही विचार से सराबोर रहता है वह छोटी-मोटी बातों से, बड़े-बड़े उतार-चढ़ावों से प्रभावित नहीं होता ।

5. समताः समता सबसे बड़ा सद्गुण है । ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि विपरीत परिस्थिति में भी समता बनी रहे । सुख-दुःख में सम रहने का अभ्यास करो ।

6. साहसः साहसी बनो । जीवन में तुम सब कुछ कर सकते हो । नकारात्मक विचारों को छोड़ दो । एक लक्ष्य (परमात्मप्राप्ति) से जुड़े रहो । फिर देखो, सफलता तुम्हारी दासी बनने को तैयार हो जायेगी ।

7. नम्रताः नम्र व्यक्ति बड़े-बड़े कष्टों और क्लेशों से छूट जाता है और दूसरों के हृदय में भी अपना प्रभाव छोड़ जाता है । नम्रता व्यक्ति को महान बनाती है किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि जहाँ-तहाँ बदमाश, लुच्चे और ठगों को भी प्रणाम करते रहें । नहीं, वहाँ ईश्वर से प्रेरणा पाकर युक्तिपूर्वक कार्य करें ।

8. सहनशक्तिः जीवन में सहनशक्ति बढ़ायें । माँ ने कुछ कह दिया तो कोई बात नहीं, माँ है न ! पिता ने या शिक्षक ने कुछ कह दिया तो रूठना नहीं चाहिए । उद्विग्न न हों, धैर्य रखें ।

7 बड़ी हानिकारक बातें

1. अधिक बोलनाः अधिक न बोलें अपितु सारगर्भित और कम बोलें ।

2. व्यर्थ का भटकनाः जो अधिक भटकता है, अधिक हँसी मजाक करता है उसको हानि होती है ।

3. अधिक शयनः जो अधिक सोता है, दिन में सोता है उसको भी बड़ी हानि होती है ।

4. अधिक भोजनः जो ठूँस-ठूँसकर खाता है, बार-बार खाता है और स्वाद के लिए भोजन करता है उसका पाचन तंत्र खराब हो जाता है और वह आलसी बन जाता है ।

5. श्रृंगारः जो शरीर को ज्यादा सजाते हैं, ज्यादा टिप-टॉप रखते हैं, अश्लील चलचित्र, चित्र या वेबसाईटें देखते हैं, अश्लील साहित्य पढ़ते हैं व ऐसे शोक रखने वाले लोगों का संग करते हैं व असंयमी हो जाते हैं, अपना बड़ा घाटा करते हैं ।

6. हीन भावनाः जो अपने को कोसता है कि 'मैं गरीब हूँ, मेरा कोई नहीं है, मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ...' ऐसा व्यक्ति विकास में पीछे रह जाता है । अनंतशक्ति-नायक अंतरात्मा-परमात्मा तुम्हारे साथ है । उसको पुकारे, प्रयत्न करे तो व्यक्ति महान बन जाता है ।

7. अहंकारः जो धन, बुद्धि, योग्यता का घमंड करता है वह भी जीवन में विशेष उन्नति नहीं कर पाता । वह रावण की नाईं करा कराया चौपट कर देता है ।

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तबाही करने वाली गंदगी से बचें � पूज्य बापू जी

ऐसे 'डे' बनाते विकारों के शिकार

मुंबई और दूसरे बड़े शहरों में आजकल लड़का-लड़की आपस में दोस्ती का दिन (फ्रैंडशिप डे) मनाते हैं, रिबन बाँधते हैं । किसी कन्या को कोई लड़का अथवा किसी लड़के को कोई कन्या अगर दोस्ती का रिबन बाँधती है तो उस रिबन के पीछे राखी या भाई दूज जैसा पवित्र भाव रहता है क्या ? नहीं । राखी का एक छोटा सा धागा भावों को उन्नत करके हमारे जीवन के कीमती ओज-तेज की सुरक्षा करता है जबकि रिबन बाँधकर 'डे' मनाने वाले इन्द्रियों के विकारों का शिकार हो जाते हैं ।

यह बड़ा गम्भीर विषय है

विदेशों की गंदगी के बारे में तो मैंने सुना था लेकिन इस देश में इतनी बड़ी भारी गंदगी प्रविष्ट होकर बढ़ रही है, क्या यह शोभनीय है ? यदि लड़का दारू पीकर पड़ा रहे तो उसकी माँ कितनी दुःखी होगी ! और वह लड़की क्या उम्मीद कर सकती है जिसका उस शराबी से विवाह होगा ? विद्यालय में जाने वाली लड़की दारू पिये और विद्यालय में भी जाय तो उस लड़की से क्या उम्मीद कर सकती है उसकी माँ और वह क्या उम्मीद कर सकता है जो उससे विवाह करेगा ? यह बड़ा गम्भीर विषय है । किसी को फिक्र नहीं है तो संत को तो फिक्र होती है बाबा ! कम से कम संत की आवाज मानकर ही सुनो और अपने-आपको बचाओ ।

'मातृ-पितृ पूजन दिवस' मनाओ

'वेलेंटाइन डे' यह पाश्चात्य गंदगी हमारे हिन्दुस्तान को तोड़ रही है तो मैं उसका विरोध नहीं करता हूँ बल्कि उनका भी भला चाहता हूँ कि वेलेंटाइन डे के बदले 14 फरवरी को मातृ-पितृ पूजन दिवस � शुद्ध प्रेम दिवस मनाओ । गणेश जी ने माँ-बाप का पूजन किया था और माँ-बाप ने गणेश जी के ललाट पर स्पर्श करके उन्हें त्रिलोचन बना दिया । तो हर माँ-बाप चाहते हैं कि हमारा बेटा ऊँचा हो ।

अतः अपने बेटे-बेटी अच्छे बनें, चरित्रवान बनें इसलिए बच्चों को सिखाओ कि बेटी ! किसी लड़के को काम-विकार की दृष्टि से मित्र मत बनाना । अपने अंतर्यामी प्रभु को तथा संयमी-सदाचारियों व सज्जनों को मित्र बनाना । लड़के लड़कों के दोस्त हों, लड़कियाँ लड़कियों की सहेलियाँ हों । लड़का लड़की को दोस्त बनाये, लड़की लड़के को दोस्त बनाये यह पाश्चात्य उच्छृंखलता की गंदगी हमारे देश में तबाही कर रही है । भविष्य उज्जवल नहीं है उन लड़के लड़कियों का । लड़का लड़की परस्पर कहें - 'आई लव यू' तो यह बहुत बदतर है । और पाश्चात्य फिल्में यही सिखाती हैं तो मैं उनका विरोध करके क्यों अपनी शक्ति गँवाऊँ ! अतः मैंने खोज लिया उपाय । बेटे-बेटी जब माँ-बाप को आदर से सिर नँवाते हैं तो माँ-बाप की खुशी का कोई पार नहीं रहता । माँ-बाप तो ऐसे ही बच्चों पर रहमदिल होते हैं फिर बच्चे अगर उनका आदर-सत्कार भी करते हैं तो माँ-बाप न चाहें तो भी उनके अंतरात्मा का आशीर्वाद बरस पड़ता है । माता-पिता तो चाहते ही हैं कि हमारे बच्चे ओजस्वी हों, तेजस्वी हों । अतः बच्चे-बच्चियों ! 14 फरवरी को वेलेंटाइन डे के बदले मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाओ ।

संग ऐसा हो जिससे मोक्षप्राप्ति हो � संत बहिणाबाई

हींग का संग करने से सुगन्धयुक्त कपूर भी बिगड़ जाता है, दूध में नमक मिल जाय तो दूध नष्ट हो जाता है, केसर और काजल का संग हो गया तो केसर में काजल के गुण आ ही जाते हैं । इसलिए संग ऐसा करना चाहिए जो जीवों के लिए सुखकारी हो और जिससे सहज ही मोक्ष की प्राप्ति हो ।

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यदि आप वास्तविक सौन्दर्य जगाना चाहती हैं तो....

1. सुन्दर दिखने की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है सुन्दर होना और यह वास्तविक सौन्दर्य आँखों का नहीं बल्कि अनुभव का विषय है ।

2. सुन्दरता का अर्थ यह नहीं है कि आप दूसरों के द्वारा सराहे जायें बल्कि यह है कि आप खुद के वास्तविक स्वरूप को ज्यों-का-त्यों स्वीकार करें ।

3. वास्तविक सुन्दरता प्राप्त करने की सफल कुंजीः अपने आप से प्रश्न करो कि 'मैं कौन हूँ ?' आपकी स्वयं की पहचान ही आपको सबसे सुन्दर बनाती है ।

4. वास्तविक सौन्दर्य के आधार हैं � स्वस्थ शरीर, निर्विकारी मन और पवित्र आचरण ।

5. फैशनेबल वस्त्र पहनने से वास्तविक सुख-सौन्दर्य का कोई संबंध नहीं है, सच्ची सुन्दरता तो व्यक्ति का उजजवल चरित्र है ।

6. ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु का आदर, इऩ्द्रियों का संयम, मधुर भाषण, ब्रह्मचर्य, उच्च विचार, सदाचार, प्रभुप्रीति जैसे सद्गुणों से सुशोभित व्यक्ति ही सच्चा सौन्दर्यवान है ।

7. बाहरी रूप-रंग, वेषभूषा, साज-श्रृंगार के चक्कर में न पड़ के विचारों, भावों और गुणों को सुन्दर बनाओ तथा उन्हीं के अऩुसार अपनी क्रिया को सुन्दर बनाओ । यही वास्तविक सौन्दर्य है ।

8. श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार जी कहते हैं � जिस सुन्दरता के साथ हमारे चरित्र की पवित्रता, भावों की विशुद्धि और आचरण की शुचिता है वही सुन्दरता वास्तविक है, शेष समस्त सौन्दर्य यथार्थतः वैसा ही है जैसा जहर से भरा चमकता हुआ स्वर्ण-कलश । इस भयानक सुन्दरता से अपने को बचाओ ।

9. पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग में आता हैः "जिससे हाड़-मांस का शरीर सुन्दर दिखता है ऐसे परम सुन्दर परमात्मा को छोड़कर जो शरीर की सुन्दरता के पीछे लगा है उस जैसा अभागा और कौन हो सकता है ? मेरे लाला-लालियो ! हे ऋषियों की संतानों ! तुम ऐसे अभागे कभी नहीं हो सकते हो । तुम अपने आत्मा-परमात्मा के आंतरिक सौन्दर्य को जगाओ, मेरा शुभाशीष सदैव तुम्हारे साथ है । ॐ शुचिता... ॐ पवित्रता... ॐ आत्म-सौन्दर्य की जागृति...'

10. सौन्दर्य प्रसाधन सौन्दर्य के शत्रु हैं । इनसे बचें ।

11. वामभाजः स्याम । हे देव ! हम प्रशंसनीय कर्म करने वाले बनें ।(हम दिव्य गुणों से समलंकृत होकर आत्मसौन्दर्य से सुभूषित रहें ।) (यजुर्वेदः अध्याय 8, मंत्र 6)

12. हर परिस्थिति में सम रहना � यह अपना ( अपने वास्तविक स्वरूप का) सौन्दर्य है ।

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आदर्श चरित्र का निर्माण

'महाभारत' (उद्योग पर्वः 36.30) में आता हैः

वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च ।

अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ।।

'चरित्र की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए, धन तो आता जाता रहता है । जो धन से क्षीण है वह क्षीण नहीं है अपितु जिसका चरित्र नष्ट हो गया है वही क्षीण है ।'

चरित्र मानव की श्रेष्ठ सम्पत्ति है, दुनिया की समस्त सम्पदाओं में महान सम्पदा है । मनुष्य जीवन का सारांश है चरित्र । यही सदा जीवित रहता है और मनुष्य को जीवित रखता है ।

यदि जीवन में सफलता की कामना है, आध्यात्मिक मार्ग पर बढ़ने की अभिलाषा है और आत्मज्ञान प्राप्त करने की लगन है तो निष्कलंक चरित्र का उपार्जन करो । यही मनुष्य में वास्तविक शक्ति और शौर्य का स्फुरण भरता है ।

व्यक्तित्व का निर्माण चरित्र से ही होता है । इसका अर्जन नहीं किया गया तो ज्ञान का अर्जन भी नहीं किया जा सकता । अपने चरित्र का निर्माण करो । इससे ही जीवन में सच्ची सफलता मिल सकती है ।

चरित्रवान व्यक्ति ही समाज, राष्ट्र व विश्व-समुदाय का सही नेतृत्व और मार्गदर्शन कर सकता है । अपने सच्चारित्र्य व सत्कर्मों से ही मानव चिरआदरणीय हो जाता है । यदि तुम्हें चरित्र निर्माण में कठिनाई मालूम होती है तो ब्रह्मवेत्ता संतों और महात्माओं के सम्पर्क में रहो । महात्माओं के सम्पर्क में रहने से उनकी आध्यात्मिक विचारधारा तुम्हारे जीवन में अद्भुत परिवर्तन का श्रीगणेश करेगी ।

सच्चरित्रता मनुष्य-जीवन का प्राण है, उसके बिना मनुष्य मृतक के समान है । गंदी, चरित्रभ्रष्ट करने वाली फिल्मों के द्वारा चरित्र बिगड़ना है । गंदे विज्ञापन, उपन्नयास, चरित्र भ्रष्ट करने वाले साहित्य और संग से अपने को प्रयत्नपूर्वक बचायें ।

जिसके पास धन, सत्ता कम है परंतु सच्चारित्र्य-बल है उसे अभी चाहे कोई नहीं जानता, पहचानता या मानता न हो परंतु उसके हृदय में जो शांति रहेगी, आनंद रहेगा, ज्ञान रहेगा वह अद्भुत होगा और उसका भविष्य परब्रह्म-परमात्मा के साक्षात्कार से उज्जवल होगा ।

स्वास्थ्य, चरित्र और संयम-ब्रह्मचर्य पर आधारित 'निरोगता का साधन', नारी ! तू नारायणी, दिव्य प्रेरणा प्रकाश जैसी पुस्तकें पढ़े-पढ़ायें । यह पुस्तकें संत श्री आशाराम जी के आश्रमों के सत्साहित्य स्टाल पर सरलता से उपलब्ध हैं ।

चरित्रवान के लक्षण

मनुष्य के जीवन की नींव है चरित्र । चरित्र के गुण व्यवहार में प्रकट होते हैं, शब्दों में नहीं । चरित्रवान मनुष्य धैर्यवान तथा सहनशील होता है । वह दूसरों के मत को ध्यान एवं धैर्य से सुनता है तथा सुख और दुःख में सम रहता है ।

पूज्य बापू जी कहते हैं- परमात्मा से दूर ले जाने वाली जो दुष्ट वासनाएँ हैं वे सब दुश्चरित्र हैं । सच्चरित्रता से पुण्य होते हैं और पुण्य से हमको सत्संग, संत के दर्शन और परमात्मा में रुचि होती है ।

पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता । (संत तुलसीदास जी)

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निर्भय बनो � पूज्य बापू जी

1. प्रतिकूलता से भय मत करो । सदा शांत और निर्भय रहो । भयानक दृश्य (द्वैत) केवल स्वप्नमात्र है, डरो मत ।

2. दुःख एवं मुसीबतें डरपोक मनुष्य का ही पीछा करती है जबकि निर्भय व्यक्ति के सामने उनकी पूँछ दब जाती है ।

3. भय और संदेह से ही तुम अपने को मुसीबतों में डालते हो ।

4. ऐसा कोई सद्गुण नहीं है जो परम निर्भयता से पैदा न होता हो और ऐसा कोई दुर्गुण नहीं है जो भय से पैदा न होता हो ।

5. समस्य भय एवं चिंताएँ आपकी इच्छाओँ का परिणाम हैं ।

6. मन में यदि भय न हो तो बाहर चाहे कैसी भी भय की सामग्री उपस्थित हो जाय, आपका कुछ बिगाड़ नहीं सकती ।

7. जो समय बीत गया उसको याद करके अपने को कमजोर मत बनाओ । अब दृढ़ संकल्प करो कि इतना जप करूँगी, ऐसे रहूँगी ! 'निर्भय नाद' पुस्तक पढ़ूँगी, हिम्मत देने वाले शास्त्रों को पढूँगी । जो हमारी हिम्मत तोड़ें ऐसे व्यक्तियों की बातों को सुना-अनसुना कर दूँगी ।

जो बीत गयी सो बीत गयी, तकदीर का शिकवा कौन करे ।

जो तीर कमान से निकल गया, उस तीर का पीछा कौन करे ?

बीती हुई कमजोरियों को याद मत करो, बीते हुए गुनाह को याद मत करो । हिम्मत करो, दृढ़ता लाओ तो तुम्हारे लिए कठिनाई नहीं होगी ।

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स्वयं पर विश्वास करें

'आत्मविश्वास' यानि अपने आप पर विश्वास । जीवन में सफलता पाने के लिए आत्मविश्वास का होना अति आवश्यक है ।

हमें रोक सके ये जमाने में दम नहीं ।

हमसे है जमाना जमाने से हम नहीं ।।

सफलता का मूल

आत्मबल में अचल श्रद्धा यह विजय प्राप्त करने की सर्वोत्तम कुंजी है । आत्मबल में श्रद्धा रखने वाले मनुष्यों ने ही इस जगत में सामान्य मनुष्यों के लिए असम्भव दिखते कार्यों को सम्भव कर दिखाया है ।

आत्मश्रद्धा से सम्पूर्ण जीवन में परिवर्तन आ जाता है । असफलता के बादल बिखरकर सफलता का सूर्य चमकने लगता है । आत्मविश्वास का मुख्य उद्देश्य है हृदय की क्षुद्रता का निराकरण ।

आत्मविश्वास मनुष्य की बिखरी हुई शक्तियों को संगठित करके उसे दिशा प्रदान करता है । इससे मनुष्य की शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक शक्तियों का मात्र विकास ही नहीं होता बल्कि ये सम्पूर्ण शक्तियाँ उसके इशारे पर नाचती हैं ।

कैसी भी विषम परिस्थिति आये, घबरायें नहीं बल्कि आत्मविश्वास जगाकर आत्मबल, उद्यम, साहस, बुद्धि व धैर्यपूर्वक उसका सामना करें और अपने असली लक्ष्य � ईश्वरप्राप्ति को, आत्मसाक्षात्कार को पाने का संकल्प दृढ़ रखें । महान कार्य करने के लिए आत्मविश्वास पहली अनिवार्यता है । किसी भी कार्य की नींव का मजबूत पत्थऱ आपका आत्मविश्वास है ।

आत्मविश्वास बढ़ाने के उपाय

1. प्रातःकाल जल्दी उठने व 4 से 5 बजे के बीच प्राणायाम कनरे से जीवनीशक्ति, बौद्धिक शक्ति और स्मरणशक्ति का विकास होता है । आत्मविश्वास भी बढ़ता है ।

2. प्रार्थना से आत्मविश्वास बढ़ता है, निर्भयता जाती है, मानसिक शांति मिलती है ।

3. दिन की शुरुआत में भगवन्नाम-उच्चारण करके सात्त्विक हास्य (देव-मानव हास्य प्रयोग) करने आप दिन भर तरोताजा एवं ऊर्जा से भरपूर रहते हैं । हास्य आपका आत्मविश्वास भी बढ़ाता है ।

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लक्ष्य के प्रति दृढ़ता

1. सर्वप्रथम जीवन का लक्ष्य निर्धारित करें । फिर अपने लक्ष्य के अनुसार प्रतिदिन का नियम निश्चित करें । अगर एक बार संकल्प ले लें तो फिर उसे पूर्ण करके ही रहें । आप अपने लक्ष्य पर अडिग रहने की प्रतिज्ञा कीजिये और एकांत में उसे जोर से दोहराइये । इससे आपका मनोबल बढ़ेगा ।

2. आलस्य हम पर तभी आक्रमण करता है जब हमारे सामने कोई ऊँचा लक्ष्य नहीं होता, आत्मा-परमात्मा को पाना यह होना चाहिए लक्ष्य ! कोई भी महान कार्य एक दिन में तो पूर्ण नहीं होता, उसके लिए सच्ची लगन के साथ भरपूर परिश्रम आवश्यक है ।

3. जो असफलता मिलने से निराश या हतोत्साहित नहीं हता वही अपने लक्ष्य को पाता है । लक्ष्य की ओर तत्परता से चलने वाले व्यक्ति के जीवन में निराशा के लिए कोई स्थान ही नहीं होता

4. मनुष्य के मन में यदि कार्य के प्रति आस्था और लक्ष्यप्राप्ति के लिए सच्ची लगन जग जाय तो प्रतिकूल परिस्थितियाँ, सब बाधाएँ अपने-आप ही समाप्त हो जायें ।

5. अपने दिव्य लक्ष्य को, शुभ संकल्पों को, सुबह, दोपहर, शाम दोहराओ... जैसे तुम बनना चाहो । हे अमर आत्मा ! दुःखों, क्लेशों, तनावों से अभी-अभी, यहीं सदा के लिए मुक्त हो जाओ ।

6. आज आपके (नवयुवतियों के) सामने कोई स्पष्ट दिशा नहीं है । जब कोई अच्छा वक्ता आपके सामने जोशीला वक्तव्य देता है तो आपके मन में अच्छा वक्ता बनने की भावना आ जाती है । जब कोई आकर्षक चलचित्र देखते हैं तो आपके मन में अभिनेता-अभिनेत्री बनने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हो जाती है । परंतु आपके जीवन का कोई पवित्र और सच्चा लक्ष्य निर्धारित नहीं होता । जीवन का वास्तविक और परम लक्ष्य है 'आत्मसाक्षात्कार' । उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य न प्राप्त हो जाय ।

लक्ष्य न ओझल होने पाये, कदम मिलाकर चल ।

सफलता तेरे कदम चूमेगी आज नहीं तो कल ।। (शास्त्र, ब्रह्मवेत्ता संत के सिद्धांत से )

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आत्मबल कैसे जगायें ?

1. बल ही जीवन है । निर्बलता ही मौत है ।

2. उपनिषदों की घोषणा हैः नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः । बलहीन को आत्मा-परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती । अतः बलवान बनो, ओज तेजवान बनो । परिस्थिति चाहे कितनी ही विषम क्यों न आ जाय, निर्भयता के साथ अपने कर्तव्य मार्ग पर आगे बढ़ते जाओ । दुर्बलता छोड़ो, हीन विचारों को तिलांजली दो । उठो... जागो... बनो तेजस्विनी !

3. हररोज़ प्रातःकाल जल्दी उठकर सूर्योदय से पूर्व स्नानादि से निवृत्त हो जाओ । स्वच्छ, पवित्र स्थान में आसन बिछाकर पूर्वाभिमुख हो के पद्मासन या सुखासन में बैठ जाओ । शांत और प्रसन्नवृत्ति धारण करो । आँखें आधी खुलीं आधी बन्द रखो । अब फेफड़ों में खूब श्वास भरो और भावना करो कि 'श्वास के साथ मैं सूर्य का दिव्य ओज भीतर भर रही हूँ ।' श्वास को यथाशक्ति अंदर टिकाये रखो । फिर 'ॐ' का लम्बा उच्चारण करते हुए श्वास को धीरे-धीरे छोड़ो । श्वास के खाली होने के बाद तुरन्त श्वास न लो । यथाशक्ति बिना श्वास रहो और भीतर ही भीतर 'हरि ॐ... हरि ॐ... ' का मानसिक जप करो । फिर से फेफड़ों में खूब श्वास भरो । पूर्वोक्त रीति से श्वास यथाशक्ति अंदर रोककर बाद में धीरे-धीरे छोड़ते हुए 'ॐ' का गुंजन करो । 10-15 मिनट ऐसे प्राणायाम सहित उच्च स्वर से ॐ का उच्चारण करके शांत हो जाओ । अपने विचारों को देखती रहो ।

4. आत्मनिष्ठा में जगह हुए महापुरुषों के सत्संग और सत्साहित्य से जीवन को भक्ति एवं वेदांत से पुष्ट व पुलकित करो । जिनको ब्रह्मज्ञानी महापुरुष का सत्संग और आत्मविद्या का लाभ मिल जाता है उनके जीवन से दुःख, अहंकार, भय, शोक, चिंता क्षीण होने लगते हैं । ॐ आनंद ! ठीक है न ? करोगी न हिम्मत ? शाबाश बेटी... ! शाबाश... !!

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सकारात्मत्क दृष्टिकोण

1. जो नकारात्मक जीवन जीता है, फरियाद करता रहता है, उसकी सब जगर फजीहत होती रहती है । जो धन्यवादात्मक जीवन जीता है वह आनंद से, मस्ती से जीवन बिता सकता है ।

2. वेदांत का सिद्धान्त है � जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि, एकमात्र सकारात्मक दृष्टि से आप सारी सृष्टि को बदला हुआ महसूस करेंगी ।

3. दृष्टिकोण एक ऐसा अदृश्य तत्त्व है जो व्यक्ति को सफलता या असफलता � किसी भी तरफ धकेल सकता है । वस्तुतः कोई भी परिस्थिति अथवा व्यक्ति अच्छा या बुरा नहीं होता, हमारा नजरिया ही उसे अच्छा या बुरा बनाता है ।

सामने वाला कैसा है यह सवाल नहीं है, सवाल यह है कि हमारी दृष्टि कैसी है । दो तरह की दृष्टियाँ हैं � एक कीचड़ में कमल देखने वाली और दूसरी चाँद में दाग ! आपके पास इनमें से कौन सी दृष्टि है ?

4. सफलता और असफलता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । जिस प्रकार सूर्यास्त के बाद सूर्योदय होना तय है उसी प्रकार असफलता के पश्चात सफलता मिलना निश्चित है परंतु यह तभी सम्भव है जब व्यक्ति अपने पवित्र व उत्तम लक्ष्य के प्रति पूरे सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ बढ़ता रहे ।

5. नकारात्मक सोच रखने वाले मनुष्य के पास किसी भी काम को न करने के सैंकड़ों बहाने होते हैं और सकारात्मक सोच रखने वाले के पास काम को अधूरा न छोड़ने के ढेरों कारण व करने के अनेकों मार्ग होते हैं ।

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नेतृत्व की प्रतिभा

1. जीवन के लिए अति आवश्यक है कि पहले स्वयं दूसरों के अनुकूल बनना सीखें, तब औरों को स्वतः अपने अनुकूल बना हुआ पाओगे । लेकिन ध्यान रखें, दूसरे अपने प्रति अनुकूल बनें ऐसी अपेक्षा का त्याग करने पर ही सच्चा सुख मिलता है । स्वयं दूसरों के अनुकूल बनने में शास्त्र-मर्यादा का उल्लंघन नहीं हो इसका ध्यान रखना भी खूब आवश्यक है ।

2. साथवालों से जाने-अनजाने कोई गलती हो जाय तो उनको क्षमा कर दें और अपने से हुई भूलों के लिए क्षमा माँग लें ।

3. अपने साथियों के प्रति सहानुभूति रखकर उनकी व्यक्तिगत या घरेलू समस्याओं में यथाशक्ति उनकी सहायता करना दक्ष नेतृत्व का चिह्न है ।

4. अपने साथ काम करने वालों के साथ मैत्री और अपनत्व का सम्बन्ध कार्य में दक्षता लाता है ।

5. बात करने में दूसरों को मान देना, आप अमानी रहना यह सफलता की कुंजी है ।

6. कहने के ढंग में मामूली फर्क कर देने से कार्यदक्षता पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता ह । अगर किसी से काम करवाना हो तो उससे यह कहें कि "अगर आपके लिए अनुकूल हो तो यह काम करने की कृपा करें ।"

7. यदि शांतिपूर्वक एवं प्रसन्नचित्त से किसी को काम करने के लिए कहते हैं तो वह प्रसन्नतापूर्वक उस कार्य को सम्पन्न करता है ।

8. सबके साथ सहानुभूति और नम्रता से युक्त मित्रता का बर्ताव करो । किसी के साथ अनादर एवं द्वेष का व्यवहार न करके विशेष प्रेम का व्यवहार करो ।

9. दूसरों की भलाई में तुम जितना ही अपने अहंकार को और स्वार्थ को भूलोगे उतना ही तुम्हारा वास्तविक हित अधिक होगा ।

10. किसी का अहित हो ऐसी बात न सोचना, न कहना और न कभी करना ।

11. बहुओं को चाहिए के वे देवरानी-जेठानी का सम्मान करें । उनके बच्चों को अपने बच्चों से अधिक आदर-स्नेह दें । पति को ऐसी सलाह देनी चाहिए जिससे घर में कभी कलह न हो तथा परस्पर प्रेम बढ़े । सास और ससुर की सेवा व सम्मान करना चाहिए । सबसे नम्र तथा विनयी होकर रहना चाहिए । भाभी को ननद से तथा ननद को भाभी से सम्मान तथा प्रेम का बर्ताव करना चाहिए ।

12. जब कठिनाइयाँ आयें तब ऐसा मानना कि मुझमें सहनशक्ति बढ़ाने के लिए ईश्वर ने ये संयोग भेजे हैं । कठिन संयोंगों में हिम्मत रहेगी तो संयोग बदलने लगेंगे ।

13. ऐसे लोगों से संबंध रखो, जिनके संग से आपकी सहनशक्ति बढ़े, समझ की शक्ति बढ़े, जीवन में आने वाली सुख-दुःख की तरंगों का अपने भीतर-शमन करने की ताकत आये, समता बढ़े, जीवन तेज्सवी बने ।

 

गृहस्थियों के लिए सुंदरउपहार 'दिव्य शिशु संस्कार'

दिव्य एवं संस्कारी संतान चाहने वाले दम्पत्तियों के लिए एक सुंदर उपहार है 'दिव्य शिशु संस्कार' पुस्तक ।

यह पुस्तक संत श्री आशाराम जी आश्रमों में सत्साहित्य सेवा केन्द्रों व समितियों से प्राप्त हो सकती है ।

सम्पर्कः 079-61210730/827

 

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तुम्हारे हाथ की बात ! � भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज

स्त्रियाँ घर का श्रृंगार होती हैं । वे घर को स्वर्ग अथवा नरक बना सकती हैं । यदि घर में शांति, प्रेम, आनंद होगा तो घर स्वर्ग की भाँति बन जायेगा परंतु यदि वाद-विवाद, झगड़े, अशांति होंगे तो वह नरक के समान बन जायेगा । बेचारा मर्द सारा दिन काम करके थक-हारकर जब घर में पहुँचे उस समय धर्मपत्नी उसके सामने अपने दुःखड़े रोने लगे तो उसे जिंदगी से भला कैसा आनंद आयेगा ? फुरसत के समय में यदि दो चार औरतें आपस में मिलती हैं तो किसी न किसी की निंदा करती रहती हैं तथा एक दूसरे को घर की बातें बताकर अपना रोना रोती हैं । अपना अमूल्य जीवन ऐसे ही व्यर्थ कर देती हैं ।

आप एक दूसरे की बातें इधर-उधर करके अपने दिल को बेचैन म करो ।

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सदैव सावधान रहो

वेद भगवान कहते हैं-

अग्ने त्वँ सु जागृहि । ' हे तेजस्विन ! तू सदा जागरूक, सावधान रह ।' (यजुर्वेदः अध्याय 4. मंत्र 14)

अपने जीवनकाल में अपने संयम-नियम के प्रति, धर्म के प्रति, अपने कर्तव्य के प्रति सदैव सावधान रहना चाहिए ।

जीवन में भाव भले रहे, प्रेम रहे, भक्ति रहे परंतु कोरी भावुकता एवं पक्षपात न हो कि जिससे विवेक ही छूट जाय ।

पुरुषों में उठने बैठने, उनसे बिना काम मिलने-जुलने, हँसी-मजाक करने से बचें ।

किसी के साथ भी अनजान जगहों पर जाने से बचें ।

किसी की भी गलत और अमर्यादित माँग को स्वीकार न करें ।

किसी को भी प्रभावित करने के चक्कर में खुद को भ्रमित न करें ।

फिल्मी दुनिया या सिनेमा जगत से प्रभावित होकर अपने को किसी अभिनय में ढालने का प्रयास न करें ।

फेसबुक फ्रैंडस के माध्यम से जीवनसाथी खोजने की भूल न करें ।

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जीवनभर दुःखी, परेशान, अपयश का शिकार व लाचार बनाने वाले

इन 5 से अपने को बचायें

1. चलचित्र एवं मोबाइलः चलचित्र देखना एवं मोबाइल का अधिक उपयोग जीवनीशक्ति को क्षीण कर देता है । आँखों की रोशनी कम करने के साथ ही मन और दिमाग को भी कुप्रभावित करने वाले चलचित्रों, अमर्यादित दृश्यों से सदैव सावधान रहना चाहिए ।

आजकल पत्र-पत्रिकाओं, टी.वी. चैनलों व इंटनैट के माध्यम से परोसी जाने वाली अश्लीलता, स्वच्छंदता आदि विकारों की आग को भड़काने का कार्य कर रही है ।

किशोर-युवावस्था, जो कि जीवन की दिशा तय करने का और उसे संयम सदाचार की सुवास से महकाने का समय होता है, इसमें मोबाइल फोन में गंदे गाने, गंदी शायरियाँ, गंदी फिल्मों के दृश्य, प्रेमी-प्रेमिकाओं की बातें देखने-सुनने से आज के किशोर-किशोरियों, युवक-युवतियों की दुर्दशा हो रही है ।

2.व्यसनः व्यसनों से स्वास्थ्य पर, स्मरणशक्ति पर बड़ा खराब प्रभाव पड़ता है ।

पिछले कुछ वर्षों से महिलाओं में शराब, धूम्रपान आदि व्यसनों का चल बढ़ रहा है । दुनिया में लगभग 25 करोड़ महिलाएँ रोजाना धूम्रपान कर रही हैं और रोग व अशांति की तरफ बढ़ रही हैं ।

3. गलत मित्रताः लड़का लड़की आपस में दोस्त न बनें । लड़के-लड़कों के दोस्त हों, लड़कियाँ-लड़कियों की सहेलियाँ हों ।

4. स्वच्छंद (मनमाना) आचरण व विवाहः क्षणिक आवेश में आ के वेलेंटाइनडे मनाकर कुछ प्रेमी-प्रेमिका प्रेम विवाह करते हैं, माँ-बाप की बातों को ठुकरा देते हैं, कुल परम्परा एवं धर्म-मर्यादाओं को भूल जाते हैं और बाद में झगड़ते हैं, तलाकर भी देते हैं ।

अपने माता-पिता की स्वीकृति लेकर, अपनी कुल परम्परा के अनुरूप, धर्म-मर्यादापूर्वक शादि-विवाह करने वाले मनमाने ढंगसे विवाह करने वालों की अपेक्षा ज्यादा सुखी रहते हैं । उनके कुल खानदान में संतानें भी अच्छी व संस्कारी आती हैं ।

कोई भी कार्य सोच-समझकर करना ही बुद्धिमानी है । हर इच्छापूर्ति के बाद अपने-आप से प्रश्न करें कि 'आखिर इच्छापूर्ति में क्या मिला ?'

5. कठपुतली बननाः आज समाज में झूठे आरोप-प्रत्यारोप का प्रचलन बढ़ता जा रहा है । बच्चियों को, नारियों को मोहरा बनाकर स्वार्थी, लोभी धर्मभ्रष्ट लोग न जाने क्या-क्या कार्य कराते रहते हैं । इससे नारी शक्ति की पवित्रता व गरिमा गिरती जा रही है । नारियों को चाहिए कि ऐसे किसी भी कार्य में सहयोग न दें, दृढ़ रहें । धर्मसम्मत कार्य न होने पर अपने कहलाने वाले परिजनों की भी बातों में न आयें ।

जा के प्रिय न राम-वैदेही ।

तजिये ताहि कोई बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ।। (विनय पत्रिका)

पूज्य बापू जी के सत्संग में आता हैः "नारी अबला नहीं, सबला है । भारत की नारी भोग्या, कठपुतली नहीं है, वह तो भगवान की सुपुत्री है । नारी तो नारायणी है । हिन्दुस्तान की बेटियो ! संयमी, साहसी बनो । तुम भोग्या नहीं हो, योग्या (परमात्मा से योग करने वाली) हो । तुच्छ चीजों में जीवन बरबाद न करते हुए उसे ब्रह्मज्ञान के सत्संग तथा भगवान की आराधना-उपासना, जप-तप, साधना में लगाओ तो तुम भी आत्मपद में आरूढ़ हो सकती हो ।"

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समय का सदुपयोग

1. सुबह से रात तक की समय-सारणी बनाकर रोज अपनी दिनचर्या दैनंदिनी (डायरी) में लिखो ।

2. समय बीता जा रहा है । एक क्षण का समय भी लाखों रुपये खर्च करने से, स्तुति-प्रार्थनापूर्वक रुदन करने से अथवा अन्य किसी भी उपाय से मिलना सम्भव नहीं है ।

3. टिक-टिक करती हुई घड़ी आपको यही संदेश देती है, सावधान करती है कि उद्यम और पुरुषार्थ ही जीवन है ।

4. एक भारतीय सज्जन ने जापान में देखा कि स्टेशन पर ट्रेन रुकने के बाद ड्राइवर नोटबुक में कुछ लिख रहा है । पूछने पर ड्राइवर ने बतायाः "मैं स्टेशन पर पहुँचने का समय लिख रहा हूँ । गाड़ी पहुँचाने में अगर एक मिनट भी देर करूँगा तो इसमें सफर करने वाले 3000 यात्रियों के उतने ही मिनट बरबाद होंगे और इस प्रकार मुझसे देशद्रोह का अपराध हो जायेगा ।

5. बड़े धनभागी हैं वे विद्यार्थी, जो मिली हुई समय-शक्ति का सदुपयोग कर अपने जीवन को महानता के पथ पर अग्रसर कर लेते हैं ।

6. प्रतिदिन सुबह उठकर संकल्प करोः 'आज के दिन के समय का सदुपयोग करूँगी । पढ़ने के समय मन लगा के पढूँगी, काम करने के समय दिल लगा के करूँगी और दिल लगाकर दाता (भगवान) का सुमिरन व ध्यान करूँगी ।'

7. कल कभी नहीं आता, जब आता है आज होकर ही आता है ।

8. समय कभी किसी की प्रतीक्षा नहीं करता ।

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ऐसी महान संस्कृति से च्युत होना कितनी शर्मनाक बात है !

1. किसी भी देश की संस्कृति उसकी आत्मा होती है । भारतीय संस्कृति की गरिमा अपार है । इस संस्कृति में आदिकाल से ऐसी परम्पराएँ चली आ रही हैं जिनके पीछे तात्त्विक महत्त्व एवं वैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ है ।

2. ''गीता, गंगा और गाय � ये तीनों भारत की संस्कृति के प्रतीक हैं । इन्हें महत्त्व देने से ही देश का सर्वांगीण विकास होगा ।'' � पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू ।

3. विश्व की चार प्राचीन संस्कृतियाँ हैं � युनान, मिस्र, रोम और भारत की । इनमें अभी अगर देखा जाये तो युनान, मिस्र और रोम की � ये तीनों संस्कृतियाँ आपको अजायबघरों (संग्रहालयों) में मिलेंगी पर भारत की संस्कृति आज भी गाँव-गाँव में दिखाई पड़ेगी ।

4. सन 1893 में शिकागो में जब विश्व धर्म संसद का आयोजन हुआ था तब भारत के धर्म-प्रतिनिधि के रूप में स्वामी विवेकानंद वहाँ गये थे । वहाँ के लोगों ने विवेकानंद जी के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया और उनका मखौल उड़ाते हुए कहाः "सब धर्मग्रन्थों में आपका ग्रंथ सबसे नीचे हैं, अतः आप शून्य पर बोलें ।"

स्वामी विवेकानंद ने सिंह-गर्जना करते हुए कहाः

"हमारा धर्मग्रन्थ सबसे नीचे है इसका अर्थ यह नहीं है कि वह सबसे छोटा है अपितु सबकी संस्कृति का मूलरूप, सब धर्मों का आधार है । यदि मैं इस धर्मग्रन्थ को हटा लूँ तो आपके सभी धर्म ग्रंथ गिर जायेंगे । भारतीय संस्कृति ही महान है तथा सर्व संस्कृतियों का आधार है ।

ऐसी महान संस्कृति एवं धर्म की सुरक्षा करने के बजाय हम पश्चिम के कल्चर के अंधानुकरण से मुक्त नहीं हो रहे हैं यह हमारे समाज और देश के लिए कितनी शर्मनाक बात है !

5. विश्व की तमाम नदियों के जल का विश्लेषण करने वाले बर्लिन के डॉ. जे. ओ. लीवर ने सन् 1924 में ही गंगाजल को विश्व का सर्वाधिक स्वच्छ और कीटाणु-रोगाणुनाशक जल घोषित कर दिया था ।

6. सनातन संस्कृति की अनमोल धरोहर है देशी गाय, जो मनुष्य को सभी प्रकार से पोषण देने व उन्नत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है ।

7. गाय माँ के समान जीवनभर हमारा पालन-पोषण करती है । महाभारत (अनुशासन पर्वः 69.7) में भी आता हैः

मातरः सर्वभूतानां गावः सर्वसुखप्रदाः ।

'गौएँ सम्पूर्ण प्राणियों की माता कहलाती हैं । वे सबको सुख देने वाली हैं ।'

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ब्रह्मचर्यः जीवन की अनिवार्यता

'ब्रह्मचर्य' शब्द बड़ा चित्ताकर्षक और पवित्र है । स्थूल अर्थ में केवल वीर्यरक्षण ही ब्रह्मचर्य है । इस अर्थ में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ व्रत है, श्रेष्ठ तप है, श्रेष्ठ साधना है और इस साधना का फल है आत्मज्ञान, आत्मसाक्षात्कार । इस फलप्राप्ति के साथ ही ब्रह्मचर्य का पूर्ण अर्थ प्रकट हो जाता है ।

ब्रह्मचर्य के पालन से बुद्धि कुशाग्र बनती है, रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है तथा महान से महान लक्ष्य निर्धारित करने एवं उसे सम्पादित करने का उत्साह उभरता है, संकल्प में दृढ़ता आती है, मनोबल पुष्ट होता है । - पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू ।

12 वर्ष तक वीर्य को अस्खलित रखने से (अर्थात् 13 से 25 वर्ष की उम्र तक भक्ति, ज्ञान व कर्म योग द्वारा ब्रह्मचर्य के पालन से) जो शक्ति पैदा होती है उससे उस व्यक्ति की स्मरणशक्ति अतीव तीव्र हो जाती है । - श्री रामकृष्ण परमहंस ।

ब्रह्मचर्य जीवन वृक्ष का पुष्प है और प्रतिभा, पवित्रता, वीरता आदि गुण उसके कुछ फल हैं । - महात्मा थोरो ।

ब्रह्मचारी का शरीर सुदृढ़ होता है । उसका मुख तेजस्वी होता है । - डॉ. एक्सन ।

ब्रह्मचर्य बुद्धि में प्रकाश लाता है, जीवन में ओज-तेज, ऊँची समझ लाता है ।

ब्रह्मचर्य का दृढ़ता से अधिकाधिक पालन करें । ब्रह्मचर्य का व्रत वह रत्न है, वह अमृत की खान है जो जीवात्मा को परमात्मा से मिलाने का सामर्थ्य रखती है ।

ब्रह्मचर्य-रक्षा का मंत्र

नमो भगवते महाबले पराक्रमाये मनोभिलाषितं मनः स्तम्भ कुरु कुरु स्वाहा ।

रोज दूध में निहारकर 21 बार इस मंत्र का जप करें और दूध पी लें । इससे ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है ।

संयम की अनुपम कुंजी

अर्यमायै नमः � भगवान अर्यमा का यह मंत्र श्रद्धा से जपने वाला विकारी वातावरण व विकारी लोगों के बीच से भी बचकर निकल सकता है ।

80 ग्राम आँवला चूर्ण और 20 ग्राम हल्दी व मिश्री चूर्ण का मिश्रण बना लो । सुबह शाम 3-3 ग्राम यह मिश्रण फाँकने से 8-10 दिन में ही चमत्कारिक लाभ होगा । इसके सेवन से 2 घंटे पूर्व व पश्चात दूध न लें ।

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माताओं-बहनों के लिए विशेष उपयोगी जानकारी से परिपूर्ण 'दिव्य शिशु संस्कार', माँ ! तू कितनी महान..., नारी ! तू नारायणी पुस्तकों का स्वयं लाभ लें औरों तक पहुँचायें ।

 

जीवन को सफल बनाने वाले सीता जी के 12 दिव्य गुण � पूज्य बापू जी

पद्म पुराण (भूमि खंड, अध्याय 34) में स्त्री के जिन 12 दिव्य गुणों का वर्णन आता है, वे सारे के सारे सद्गुण सीता जी में थे ।

पहला सद्गुण है रूप । अपने रूप को साफ-सुथरा रखें और प्रसन्नवदन रहना चाहिए, कृत्रिमता (फैशन) की गुलामी नहीं करनी चाहिए ।

दूसरा गुण � शील, माने लज्जा । स्त्री का आभूषण है लज्जा । पुरुषों के बीच लज्जा और संकोच करके बात करने का सद्गुण ।

तीसरा सद्गुण � सत्य वचन । सीता जी सारगर्भित, सत्य दूसरों को मान देने वाला बोलतीं और आप अमानी रहती थीं ।

चौथा सद्गुणः � आर्षता (सदाचार) । अपना स्वभाव छल-छिद्र, कपट का न बने, हृदय में सदाचार की भावनाबढ़ती रहे ।

पाँचवाँ सद्गुण � धर्मपालन । सीता जी वार-त्योहार, तिथि के अनुरूप आचरण करतीं ।

छठा सद्गुण � सतीत्व (पातिव्रत्य) । श्रीरामचन्द्रजी के सिवाय उनको और जो भी पुरुष दिखते थे वे अपने सपूतों जैसे दिखते या बड़ी उम्र के हों तो पिता की नाईं दिखते ।

सातवाँ सद्गुणः दृढ़ता । सीताजी महीनों भर लंका में रहीं, रावण ने उन्हें समझाने का बहुत प्रयास किया लेकिन सीता जी अपने धर्म पर दृढ़ रहीं ।

आठवाँ सद्गुण � साहस । सीता जी जब अशोक वाटिका में रहती थीं तब राक्षस-राक्षसियाँ उन्हें डराने आते थे किन्तु वे डरती नहीं थीं ।

नौवां सद्गुण � मंगल गान । सीता जी ने कष्ट, प्रतिकूलताएँ सब सहा फिर भी कभी फरियाद नहीं की । रामजी का यश ही गाती रहीं ।

दसवाँ सद्गुण � कार्य-कुशलता ।सीता जी सब कार्य पूरी सावधानी, उत्साह और कुशलता से करतीं ।

ग्यारहवाँ सद्गुण � पति के प्रति प्रेमभाव, अनुराग । सीता जी राम जी के चिंतन से राममय हो गयीं ।

बारहवाँ सद्गुण � मीठे, नम्र वचन । माँ सीता की नाईँ सद्भावपूर्ण सस्नेह बर्ताव करने का सद्गुण अपने में लाना चाहिए ।

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एकाग्रता, स्वास्थ्य, बल-बुद्धि व पुष्टिदायक विभिन्न प्रयोग

1. पढ़ने से पहले जीभ को तालू में लगाकर थोड़ी देर शांत बैठें । इससे मन एकाग्र व पढ़ा हुआ जल्दी याद होता है ।

2. सुबह खाली पेट तुलसी के 5-7 पत्ते चबाकर ऊपर से पानी पीने से अथवा तुलसी के पत्तों का 5 से 20 मि.ली. रस (या तुलसी अर्क) पीने से स्मरणशक्ति बढ़ती है । तुलसी सेवन व दूध में 2 घंटे का अंतर रखें । (रविवार को न लें )

3. पढ़ने के बाद भी याद न रहता हो तो सुबह एवं रात्रि को दो तीन महीने तक 1 से 2 ग्रामब्राह्मी तथा शंखपुष्पी चूर्ण लेने से लाभ होता है । शंखपुष्पी सिरप व ब्राह्मी शरबत भी ले सकते हैं ।

4. प्रातःकाल सूर्य को अर्घ्य दान, सूर्यस्नान (सर्दियों में सिर ढककर 8 मिनट सूर्य की ओर मुख व 10 मिनट पीठ करके बैठें । गर्मियों में आगे-पीछे की ओर से कुल 8 मिनट ही काफी हैं ।) और सूर्यनमस्कार करने से शरीर हृष्ट-पुष्ट व बलवान बनता है ।

5. श्वासोच्छवास की भगवन्नाम-जपसहित मानसिक गिनती (बिना बीच में भूले 54 या 108 तक) यह अजपाजप करें ।

6. नीम और ग्वारपाठे (घृतकुमारी) की कड़वाहट बहुत सारी बीमारियों को भगाती है । ग्वारपाठा जीवाणुरोधी व विषनाशक भी है । यह रोगप्रतिरोधक प्रणाली को मजबूत करने में अति उपयोगी है । नीम अर्क व घृतकुमारी रस का भी उपयोग कर सकते हैं ।)

7. शुद्ध च्यवनप्राश मिले तो उसका एक चम्मच (10 ग्राम) अथवा आँवला पाउडर एक चम्मच सेवन करने से पाचनशक्ति में मजबूती आयेगी और बढ़ोतरी होगी । रोगप्रतिरोधक शक्ति भी बढ़ेगी । (मधुमेह वाले शर्करामुक्त च्यवनप्राश लें ।)

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सारा संसार छोड़ना पड़े तो छोड़ देना लेकिन... पूज्य बापू जी

ईश्वर के लिए सब कुछ छोड़ना पड़े, सारा संसार छोड़ना पड़े तो छोड़ देना लेकिन संसार के इस मायाजाल काँटों की झाड़ी के लिए ईश्वर का त्याग नहीं करना । ईश्वर के सिवाय किसी भी वस्तु-व्यक्ति-परिस्थिति में मन लगाना अपने साथ धोखा करना है ।

 

 

महिला उत्थान मंडल, अखिल भारतीय श्री योग वेदांत सेवा समिति,

संत श्री आशाराम जी आश्रम अहमदाबाद � 5

09157306313, mahila.ashram.org

mum.prachar@gmail.com

 

 

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