Thought of the day

ब्रह्मज्ञान के आराधकों को उस वास्तविक ज्ञान का आदर करना चाहिए । उसका जितना आदर होगा उतना ही उनकी बुद्धि उधर के लिए समय लगायेगी और उतना ही उनकी इन्द्रियों और मन पर बुद्धि का अधिकार जमता जायेगा । ज्यों-ज्यों इन्द्रियों और मन पर बुद्धि का अधिकार जमता जायेगा त्यों-त्यों बुद्धि ‘ऋत’ आत्मा में विश्रांति पाती जायेगी । ‘ऋत’ माने सत्य और सत्य में विश्रांति पाते ही बुद्धि को सत्यस्वरूप परब्रह्म-परमात्मा का साक्षात्कार होगा । तब वह बुद्धि ऋतम्भरा प्रज्ञा कही जाती है ।

पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

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Somvati Amavasya : 30th May

Somvati Amavasya
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