Thought of the day

चित्त की समता हमारी आंतरिक शक्तियों को बढ़ाती है जबकि विषमता हमारे बल और ओज को क्षीण कर देती है।
हमारा चित्त यदि अपवित्र होता हो तो उसके दो कारण हैं। वे दो कारण यदि समझ में आ जायें तो चित्त की अपवित्रता दूर हो जाये। एक है सुख की लालसा और दूसरा है दुःख का भय। सुख के दुष्परिणामों से हमारा चित्त अपवित्र होता है। सुख के दुष्परिणामों को जानते हुए भी हम उसकी तीव्रता से प्रभावित होने के कारण उसके प्रति अज्ञानी हो जाते हैं।

पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

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Mangalwari Chaturthi : 7th Dec

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