श्री आशारामायण

पूज्य संत श्री आशारामजी बापू की संक्षिप्त पद्यमय जीवन गाथा

गुरु चरण रज शीष धरि, हृदय रूप विचार ।
श्री आशारामायण कहौं, वेदांत को सार ।।
धर्म कामार्थ मोक्ष दे, रोग शोक संहार ।
भजे जो भक्ति भाव से, शीघ्र हो बेड़ा पार ।।

भारत सिंधु नदी बखानी, नवाब जिले में गाँव बेराणी ।
रहते एक सेठ गुण खानि, नाम थाऊमल सिरुमलानी ।।
आज्ञा में रहती मंगीबा, पतिपरायण नाम मंगीबा ।
चैत वद छः* उन्नीस चौरानवे, आसुमल अवतरित आँगने ।।
माँ मन में उमड़ा सुख सागर, द्वार पै आया एक सौदागर ।
लाया एक अति सुंदर झूला, देख पिता मन हर्ष से फूला ।।
सभी चकित ईश्वर की माया, उचित समय पर कैसे आया ।
ईश्वर की ये लीला भारी, बालक है कोई चमत्कारी ।।

हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ ।

संत सेवा औ’ श्रुति श्रवण, मात पिता उपकारी ।
धर्म पुरुष जन्मा कोई, पुण्यों का फल भारी ||

सूरत थी बालक की सलोनी, आते ही कर दी अनहोनी ।
समाज में थी मान्यता जैसी, प्रचलित एक कहावत ऐसी ।।
तीन बहन के बाद जो आता, पुत्र वह त्रेखण कहलाता ।
होता अशुभ अमंगलकारी, दरिद्रता लाता है भारी ।।
विपरीत किंतु दिया दिखायी, घर में जैसे लक्ष्मी आयी ।
तिरलोकी का आसन डोला, कुबेर ने भंडार ही खोला ।
मान प्रतिष्ठा और बढ़ायी, सबके मन सुख शांति छायी ।।

हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ ।

तेजोमय बालक बढ़ा, आनंद बढ़ा अपार ।
शील शांति का आत्मधन, करने लगा विस्तार ।।

एक दिना थाऊमल द्वारे, कुलगुरु परशुराम पधारे ।
ज्यूँ ही वे बालक को निहारे, अनायास ही सहसा पुकारे ।।
यह नहीं बालक साधारण, दैवी लक्षण तेज है कारण ।
नेत्रों में है सात्त्विक लक्षण, इसके कार्य बड़े विलक्षण ।।
यह तो महान संत बनेगा, लोगों का उद्धार करेगा ।
सुनी गुरु की भविष्यवाणी, गदगद हो गये सिरुमलानी ।
माता ने भी माथा चूमा, हर कोई लेकर के घूमा ।।

हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ ।

ज्ञानी वैरागी पूर्व का, तेरे घर में आय ।
जन्म लिया है योगी ने, पुत्र तेरा कहलाय ।।
पावन तेरा कुल हुआ, जननी कोख कृतार्थ ।
नाम अमर तेरा हुआ, पूर्ण चार पुरुषार्थ ।।

सैंतालीस में देश विभाजन, सिंध में छोड़ा भू पशु औ’ धन ।
भारत अमदावाद में आये, मणिनगर में शिक्षा पाये ।।
बड़ी विलक्षण स्मरण शक्ति, आसुमल की आशु युक्ति ।
तीव्र बुद्धि एकाग्र नम्रता, त्वरित कार्य औ’ सहनशीलता ।।
आसुमल प्रसन्नमुख रहते, शिक्षक हँसमुखभाई कहते ।
दे दे मक्खन मिश्री कूजा, माँ ने सिखाया ध्यान औ’ पूजा ।।
ध्यान का स्वाद लगा तब ऐसे, रहे न मछली जल बिन जैसे ।
हुए ब्रह्मविद्या से युक्त वे, वही है विद्या या विमुक्तये ।
बहुत देर तक पैर दबाते, भरे कंठ पितु आशिष पाते ।।

हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ ।

पुत्र तुम्हारा जगत में, सदा रहेगा नाम ।
लोगों के तुमसे सदा, पूरण होंगे काम ।।

सिर से हटी पिता की छाया, तब माया ने जाल फैलाया ।
बड़े भाई का हुआ कुशासन, व्यर्थ हुए माँ के आश्वासन ।।
गये सिद्धपुर साधना करने, कृष्ण के आगे बहाये झरने ।
सेवक सखा भाव से भीजे, गोविंद माधव तब हैं रीझे ।।
एक दिना एक माई आयी, बोली हे भगवन सुखदायी ।
पड़े पुत्र दुःख मुझे झेलने, खून केस दो बेटे जेल में ।।
बोले आसु सुख पावेंगे, निर्दोष छूट जल्दी आवेंगे ।
बेटे घर आये माँ भागी, आसुमल के पाँवों लागी ।।

हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ ।

आसुमल का पुष्ट हुआ, अलौकिक प्रभाव ।
वाकसिद्धि की शक्ति का, हो गया प्रादुर्भाव ।।

बरस सिद्धपुर तीन बिताये, लौट अमदावाद में आये ।
करने लगी लक्ष्मी नर्तन, किया भाई का दिल परिवर्तन ।।
सिनेमा उन्हें कभी न भाये, बलात् ले गये रोते आये ।
जिस माँ ने था ध्यान सिखाया, उसको ही अब रोना आया ।।
माँ करना चाहती थी शादी, आसुमल का मन वैरागी ।
फिर भी सबने शक्ति लगाई, जबरन कर दी उनकी सगाई ।।
शादी को जब हुआ उनका मन, आसुमल कर गये पलायन ।
करत खोज में निकल गया दम, मिले भरूच में अशोक आश्रम ।।
कठिनाई से मिला रास्ता, प्रतिष्ठा का दिया वास्ता ।
घर में लाये आजमाये गुर, बारात ले पहुँचे आदिपुर ।।
विवाह हुआ पर मन दृढ़ाया, भगत ने पत्नी को समझाया ।
सांसारिक व्यौहार तब होगा, जब मुझे साक्षात्कार होगा ।
साथ रहे ज्यूँ आत्मा-काया, साथ रहे वैरागी माया ।।

हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ ।

अनश्वर हूँ मैं जानता, सत चित हूँ आनंद ।
स्थिति में जीने लगूँ, होवे परमानंद ।।

मूल ग्रंथ अध्ययन के हेतु, संस्कृत भाषा है एक सेतु ।
संस्कृत की शिक्षा पायी, गति और साधना बढ़ायी ।।
एक श्लोक हृदय में पैठा, वैराग्य सोया उठ बैठा ।
आशा छोड़ नैराश्यवलम्बित, उसकी शिक्षा पूर्ण अनुष्ठित ।।
लक्ष्मी देवी को समझाया, ईशप्राप्ति ध्येय बताया ।
छोड़ के घर मैं अब जाऊँगा, लक्ष्य प्राप्त कर लौट आऊँगा ।।
केदारनाथ के दर्शन पाये, गुरु खोजत पग आगे बढ़ाये ।
आये कृष्ण लीलास्थली में, वृंदावन की कुंज गलिन में ।
कृष्ण ने मन में ऐसा ढाला, वे जा पहुँचे नैनिताला ।।
वहाँ थे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठित, स्वामी लीलाशाह प्रतिष्ठित ।
भीतर तरल थे बाहर कठोरा, निर्विकल्प ज्यूँ कागज कोरा ।
पूर्ण स्वतंत्र परम उपकारी, ब्रह्मस्थित आत्मसाक्षात्कारी ।।

हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ ।

ईशकृपा बिन गुरु नहीं, गुरु बिना नहीं ज्ञान ।
ज्ञान बिना आत्मा नहीं, गावहिं वेद पुरान ।।

जानने को साधक की कोटि, सत्तर दिन तक हुई कसौटी ।
कंचन को अग्नि में तपाया, गुरु ने आसुमल बुलवाया ।।
कहा गृहस्थ हो कर्म करना, ध्यान भजन घर पर ही करना ।
आज्ञा मानी घर पर आये, पक्ष में मोटी कोरल धाये ।।
नर्मदा तट पर ध्यान लगाये, लालजी महाराज अति हरषाये ।
भगवत्प्रीति देख मन भाये, दत्त-कुटीर में सादर लाये ।।
उमड़ा प्रभु प्रेम का चसका, अनुष्ठान चालीस दिवस का ।
मरे छः शत्रु स्थिति पायी, ब्रह्मनिष्ठता सहज समायी ।।
शुभाशुभ सम रोना गाना, ग्रीष्म ठंड मान औ’ अपमाना ।
तृप्त हो खाना भूख अरु प्यास, महल औ’ कुटिया आसनिरास ।
भक्तियोग ज्ञान अभ्यासी, हुए समान मगहर औ’ कासी ।।

हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ ।

भाव ही कारण ईश है, न स्वर्ण काठ पाषान ।
सत चित आनंदरूप है, व्यापक है भगवान ।।
ब्रह्मेशान जनार्दन, सारद सेस गणेश ।
निराकार साकार है, है सर्वत्र भवेश ।।

हुए आसुमल ब्रह्माभ्यासी, जन्म अनेकों लागे बासी ।
दूर हो गयी आधि व्याधि, सिद्ध हो गयी सहज समाधि ।।
इक रात नदी तट मन आकर्षा, आयी जोर से आँधी वर्षा ।
बंद मकान बरामदा खाली, बैठे वहीं समाधि लगा ली ।।
देखा किसीने सोचा डाकू, लाये लाठी भाला चाकू ।
दौड़े चीखे शोर मच गया, टूटी समाधि ध्यान खिंच गया ।।
साधक उठा थे बिखरे केशा, राग द्वेष ना किंचित् लेशा ।
सरल लोगों ने साधु माना, हत्यारों ने काल ही जाना ।।
भैरव देख दुष्ट घबराये, पहलवान ज्यूँ मल्ल ही पाये ।
कामीजनों ने आशिक माना, साधुजन कीन्हें परनामा ।।

हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ ।

एक दृष्टि देखे सभी, चले शांत गम्भीर ।
सशस्त्रों की भीड़ को, सहज गये वे चीर ।।

माता आयी धर्म की सेवी, साथ में पत्नी लक्ष्मी देवी ।
दोनों फूट फूट के रोयी, रुदन देख करुणा भी रोयी ।।
संत लालजी हृदय पसीजा, हर दर्शक आँसू में भीजा ।
कहा सभीने आप जाइयो, आसुमल बोले कि भाइयों ।।
चालीस दिवस हुआ न पूरा, अनुष्ठान है मेरा अधूरा ।
आसुमल की तीव्र तितिक्षा, माँ पत्नी ने की परतीक्षा ।।
जिस दिन गाँव से हुई विदाई, जार जार रोये लोग-लुगाई ।
अमदावाद को हुए रवाना, मियाँगाँव से किया पयाना ।।
मुंबई गये गुरु की चाह, मिले वहीं पै लीलाशाह ।
परम पिता ने पुत्र को देखा, सूर्य ने घटजल में पेखा ।।
घटक तोड़ जल जल में मिलाया, जल प्रकाश आकाश समाया ।
निज स्वरूप का ज्ञान दृढ़ाया, ढाई दिवस ब्रह्मानंद छाया ।।

हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ ।

आसोज सुद दो दिवस, संवत् बीस इक्कीस ।
मध्याह्न ढाई बजे, मिला ईस से ईस ।।
देह सभी मिथ्या हुई, जगत हुआ निस्सार ।
हुआ आत्मा से तभी, अपना साक्षात्कार ।।

परम स्वतंत्र पुरुष दर्शाया, जीव गया और शिव को पाया ।
जान लिया हूँ शांत निरंजन, लागू मुझे न कोई बंधन ।।
यह जगत सारा है नश्वर, मैं ही शाश्वत एक अनश्वर ।
नयन हैं दो पर दृष्टि एक है, लघु गुरु में वही एक है ।।
सर्वत्र एक किसे बतलाये, सर्वव्याप्त कहाँ आये जाये ।
अनंत शक्तिवाला अविनाशी, रिद्धि सिद्धि उसकी दासी ।
यदि वह संकल्प चलाये, मुर्दा भी जीवित हो जाये ।।

हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ ।

ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर, कार्य रहे ना शेष ।
मोह कभी ना ठग सके, इच्छा नहीं लवलेश ।।
पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान ।
आसुमल से हो गये, साँईं आशाराम ।।

जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति चेते, ब्रह्मानंद का आनंद लेते ।
खाते पीते मौन या कहते, ब्रह्मानंद मस्ती में रहते ।।
रहो गृहस्थ गुरु का आदेश, गृहस्थ साधु करो उपदेश ।
किये गुरु ने वारे न्यारे, गुजरात डीसा गाँव पधारे ।।
मृत गाय दिया जीवन दाना, तब से लोगों ने पहचाना ।
द्वार पै कहते नारायण हरि, लेने जाते कभी मधुकरी ।।
तब से वे सत्संग सुनाते, सभी आर्ती शांति पाते ।
जो आया उद्धार कर दिया, भक्त का बेड़ा पार कर दिया ।
कितने मरणासन्न जिलाये, व्यसन मांस और मद्य छुड़ाये ।।

हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ ।

एक दिन मन उकता गया, किया डीसा से कूच ।
आयी मौज फकीर की, दिया झोंपड़ा फूँक ।।

वे नारेश्वर धाम पधारे, जा पहुँचे नर्मदा किनारे ।
मीलों पीछे छोड़ा मंदर, गये घोर जंगल के अंदर ।।
घने वृक्ष तले पत्थर पर, बैठे ध्यान निरंजन का धर ।
रात गयी प्रभात हो आयी, बाल रवि ने सूरत दिखायी ।।
प्रातः पक्षी कोयल कूकंता, छूटा ध्यान उठे तब संता ।
प्रातर्विधि निवृत्त हो आये, तब आभास क्षुधा का पाये ।
सोचा मैं न कहीं जाऊँगा, यहीं बैठकर अब खाऊँगा ।
जिसको गरज होगी आयेगा, सृष्टिकर्ता खुद लायेगा ।।
ज्यूँ ही मन विचार वे लाये, त्यूँ ही दो किसान वहाँ आये ।
दोनों सिर पर बाँधे साफा, खाद्य-पेय लिये दोनों हाथा ।।
बोले जीवन सफल है आज, अर्घ्य स्वीकारो महाराज ।
बोले संत और पै जाओ, जो है तुम्हारा उसे खिलाओ ।।
बोले किसान आपको देखा, स्वप्न में मार्ग रात को देखा ।
हमारा न कोई संत है दूजा, आओ गाँव करें तुम्हरी पूजा ।।
आशारामजी मन में धारे, निराकार आधार हमारे ।
पिया पेय थोड़ा फल खाया, नदी किनारे जोगी धाया ।।
इक दिन साबरमती तट आये, ऋषि-भूमि के स्पंदन पाये ।
बन गया मोक्ष कुटीर वहाँ पर, तीरथ बना संत को पाकर ।।

हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ ।

अमदावाद गुजरात में, है मोटेरा ग्राम ।
ब्रह्मनिष्ठ श्री संत का, यहीं है पावन धाम ।।
आत्मानंद में मस्त हैं, करें वेदांती खेल ।
भक्ति योग और ज्ञान का, सद्गुरु करते मेल ।।
साधिकाओं का अलग, आश्रम नारी उत्थान ।
नारी शक्ति जागृत सदा, जिसका नहीं बयान ।।

वटवृक्ष पर डाली दृष्टि, कर दी अपनी कृपा की वृष्टि ।
परिक्रमा इसकी जो करते, मनोकामना कारज फलते ।।
गुरुदर पर है सब कुछ मिलता, श्रद्धा से जीवन है खिलता ।
ब्रह्मज्ञानी की महिमा भारी, शरण पड़े उनकी बलिहारी ।।
गैस कांड विकराल घटा जब, काँप उठा भोपाल नगर तब ।
जहरी गैस की फैली हवाएँ, हजारों ने प्राण गँवाए ।।
आशारामजी के जो साधक, बचे सभी सद्गुरु थे रक्षक ।
गुरुमंत्र जो निशदिन जपते, वे न अकाल मृत्यु से मरते ।।
कहर सुनामी ने हो ढाया, बाढ़ अकाल भूकम्प हो आया ।
जब भी कोई आपदा आयी, गुरुवर ने सेवा पहुँचायी ।।
आशाओं के राम हमारे, कहलाते हैं ‘बापू’ प्यारे ।
बापू हैं योगी ब्रह्मवेत्ता, कृपाभिलाषी जन गण नेता ।।
अटलजी ने जब आशीष पाया, प्रधानमंत्री पद शोभाया ।
विपतकाल में अर्जी लगायी, सत्ता पूर्ण काल तक पायी ।।
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई, बापू चाहें सबकी भलाई ।
कितनों को सन्मार्ग दिखाया, प्रभुप्रेम आनंद बरसाया ।।

हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ ।

गुरुनिंदक के संग से, होता सत्यानाश ।
गुरुनिंदा जो करै सुनै, पड़े वो यम की फाँस ।।
गुरुआज्ञा पालन करे, अन्य भावना त्याग ।
ब्रह्मज्ञान का लक्ष्य रहे, शिष्य वही बड़भाग ।।
गुरुमंत्र जपता रहे, करता जो नित ध्यान ।
गुरुसेवा में लगा रहे, निश्चित हो कल्याण ।। 

घटना है गोधरा की न्यारी, दुनिया में चर्चित हुई भारी ।
आशारामजी का हेलिकॉप्टर, गिरा गोधरा की धरती पर ।।
पुर्जे चकनाचूर हो गये, और गगन में दूर उड़ गये ।
हजारों की भीड़ थी आयी, फिर भी किसीको खरोंच न आयी ।।
श्वेत ईंधन की फूटी टंकी, लगी आग बुझ गयी स्वयं ही ।
हादसा जब भी ऐसा हुआ है, ना कोई जीवित स्वस्थ बचा है ।।
बापू तुरत पंडाल पधारे, किया नृत्य हर्षित हुए सारे ।
चमत्कार था अजब अनोखा, दुनिया ने घर बैठे देखा ।।

हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ ।

लोगों ने यशगान किया, लख-लख किया बखान ।
दस सेकंड का हादसा, चमत्कार ये महान ।।
महाकाल को काल ने, शत शत किया प्रणाम ।
सर्वसमर्थ हैं सद्गुरु, समरथ है प्रभुनाम ।।

बालक वृद्ध और नर-नारी, सभी प्रेरणा पायें भारी ।
एक बार जो दर्शन पाये, शांति का अनुभव हो जाये ।।
नित्य विविध प्रयोग करायें, नादानुसंधान बतायें ।
नाभि से वे ओम कहलायें, हृदय से वे राम कहलायें ।।
सामान्य ध्यान जो लगायें, उन्हें वे गहरे में ले जायें ।
सबको निर्भय योग सिखायें, सबका आत्मोत्थान करायें ।।
लाखों के हैं रोग मिटाये, शोक करोड़ों के हैं छुड़ाये ।
अमृतमय प्रसाद जब देते, भक्त का रोग शोक हर लेते ।।
जिसने नाम का दान लिया है, गुरु अमृत का पान किया है ।
उनका योगक्षेम वे रखते, वे न तीन तापों से तपते ।।
धर्म कामार्थ मोक्ष वे पाते, आपद रोगों से बच जाते ।
सभी शिष्य रक्षा हैं पाते, सर्वव्याप्त सद्गुरु बचाते ।।
सचमुच गुरु हैं दीनदयाल, सहज ही कर देते हैं निहाल ।
वे चाहते सब झोली भर लें, निज आत्मा का दर्शन कर लें ।।
एक सौ आठ जो पाठ करेंगे, उनके सारे काज सरेंगे ।
रहें न चिंता दुःख निराशा, होंगी पूर्ण सभी अभिलाषा ।।

हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ हरिॐ ।

वराभयदाता सद्गुरु, परम हि भक्त कृपाल ।
निश्छल प्रेम से जो भजे, साँईं करें निहाल ।।
मन में नाम तेरा रहे, मुख पे रहे सुगीत ।
हमको इतना दीजिये, रहे चरण में प्रीत ।।

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

श्री गुरु-महिमा

गुरु बिन ज्ञान न उपजे, गुरु बिन मिटे न भेद।
गुरु बिन संशय न मिटे, जय जय जय गुरुदेव।।
तीरथ का है एक फल, संत मिले फल चार।
सदगुरु मिले अनंत फल, कहत कबीर विचार।।
भव भ्रमण संसार दुःख, ता का वार ना पार।
निर्लोभी सदगुरु बिना, कौन उतारे पार।।
पूरा सदगुरु सेवतां, अंतर प्रगटे आप।
मनसा वाचा कर्मणा, मिटें जन्म के ताप।।
समदृष्टि सदगुरु किया, मेटा भरम विकार।
जहँ देखो तहँ एक ही, साहिब का दीदार।।
आत्मभ्रांति सम रोग नहीं, सदगुरु वैद्य सुजान।
गुरु आज्ञा सम पथ्य नहीं, औषध विचार ध्यान।।
सदगुरु पद में समात हैं, अरिहंतादि पद सब।
तातैं सदगुरु चरण को, उपासौ तजि गर्व।।
बिना नयन पावे नहीं, बिना नयन की बात।
सेवे सदगुरु के चरण, सो पावे साक्षात्।।

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

(गुजराती)

जेह स्वरूप समज्या विना, पाम्यो दुःख अनंत।
समजाव्युं ते पद नमुं, श्री सदगुरु भगवंत।।
देह छतां जेनी दशा, वर्ते देहातीत।
ते ज्ञानीना चरणमां, हो वन्दन अगणित।।
गुरु दीवो गुरु देवता, गुरु विण घोर अँधार।
जे गुरुवाणी वेगळा, रडवड़िया संसार।।
परम पुरुष प्रभु सदगुरु, परम ज्ञान सुखधाम।
जेणे आप्युं भान निज, तेने सदा प्रणाम।।

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

Books

Shri Asharamayan Language Book
श्री आशारामायण Hindi
Shri Asharamayan English
શ્રી આશારામાયણ Gujarati
ಶ್ರೀ ಆಶಾರಾಮಯಣ Kannada
ଶ୍ରୀ ଆଶାରାମାୟଣ Odia

Anushthan

श्री आशारामायण अनुष्ठान विधि

जहाँ पर अनुष्ठान करना हो, वहाँ ईशान कोण ( पूर्व व उत्तर के बीच की दिशा) में तुलसी का पौधा रखें । पाँच चीजों (गोमूत्र , हल्दी, कुमकुम, गंगाजल, शुद्ध इत्र या शुद्ध गुलाबजल) से पूर्व या उत्तर की दीवार पर समान लम्बाई - चौड़ाई का स्वस्तिक चिन्ह बनाये तथा उसके बाजू में पूज्य बापू जी की तस्वीर रख दें। फिर जमीन पर सफ़ेद या केसरी रंग का नया , पतला कपड़ा बिछाकर उसके ऊपर गेहूँ के दानों से स्वस्तिक बना कर उस पर पानी का लोटा रख दें । लोटे के ऊपरी भाग में आम के पत्ते रखें व उन पर नारियल रख दें । उसके बाद तिलक करके ' ॐ गं गणपतये नमः ' मंत्र बोलते हुए , जिस उद्देश्य से अनुष्ठान करना है उसका संकल्प करें । फिर श्वास भरकर रोकें और महा मृत्युंजय मंत्र या गायत्री मंत्र का तीन बार जप करें तथा मन में संकल्प दोहराएँ कि 'मेरा अमुक कार्य अवश्य पूर्ण होगा ।' ऐसा तीन बार करें । अनुष्ठान जितने भी दिन में पूर्ण करना हो उनमें प्रत्येक सत्र (बैठक) में यह मंत्र व संकल्प दोहराना है । प्रतिदिन निश्चित संख्या में पाठ करें । अनुष्ठान के समय धूप करें तथा दीपक जलता रहे ।अनुष्ठान की समाप्ति पर लोटे का जल तुलसी की जड़ में डाल दें । गेहूँ के दाने पक्षियों कोे डालें , नारियल प्रसाद रूप में बाँट दें या बहती जल में प्रवाहित कर दें । गुरुमंत्र के जप से १०८ आहुतियाँ दे कर हवन कर लें तथा एक या तीन अथवा पाँच -सात कन्याओं को भोजन करायें । दृढ श्रद्धा -विश्वास , संयम तथा तत्परता पूर्वक इस विधि से अनुष्ठान करने वालो की मनोकामना पूर्ण होने में मदद मिलती है ।

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