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षड्यंत्र का पर्दाफ़ाश लिखनेवाले गद्दारों का पर्दाफाश-10


➡ बापूजी कहते है कौन आज्ञा दिया इनको व्यासपीठ पर बैठने का ? सत्संग करने क‍ा,, मेरे नाम का दुरुपयोग करने का !!

उपरोक्त वचन दीदी (प्रभुजी) के बारे में कहे गए थे. संचालक अगर दीदी को भी गुरुकी आज्ञा के बिना आश्रम में व्यासपीठ पर बैठकर प्रवचन करने देते है तो वे गुरु आज्ञा का उल्लंघन करते है. अभी भी दीदी के भक्त दीदीके सत्संग कराने के लिए मेरे गुरुदेव के भक्तों से दान मांगते है और कोई समझदार साधक मना करे तो उनसे जबरदस्ती करके भी दान लेते है इस बात का मेरे पास प्रमाण है. यह गुरुदेव के नाम का दुरुपयोग नहीं तो और क्या है? 

षड्यंत्र का पर्दाफ़ाश लिखनेवाले गद्दारों का पर्दाफाश-9


➡ अगर कोई एक व्यक्ति आवाज उठाता भी है, तब संचालकों के चेले लोग उस पर दबाव बनाते है ।।

➡ ,और आश्रम के अंदर एक साधक, दूसरे साधक को समझाता है कि :- जब कोई नही बोलता, तब तुम क्यू अकेले बोलते हो ? अकेले बोलने वाले का हाल तो देख चुके हो !! कहीं तुम्हारा भी वही हाल ना हो जाये ??

➡ ऐसी स्थिति में कोई भी साधक अाश्रम मैनेजमेंट के बारे में कुछ भी बोलने से डरता है,,

➡ अतः कृपया बाहर के साधक हमारी मदद करें ।। कोई भी आश्रमवासी साधक अाश्रम में रहते हुए मैनेजमेंट के विरुद्ध बोलने की स्थिति में नहीं है ।।

➡ ‘,,आप सभी साधकों से कर-बद्ध विनती है कि अाप लोग संगठित होकर

मैनेजमेंट के विरुद्ध आवाज उठाईये ।।

➡ हम गिनती के कुछ अच्छे अाश्रमवासी इतने ताकतवर मैनेजमेंट के साथ लड़ने

में असमर्थ है ।।

श्री गुरुदेव के द्वारा नियुक्त किये गए संचालक को क्या करना चाहिए यह सिखाने का अधिकार गुरुदेव किसी शिष्य को देते नहीं है. जैसे सेनापति के आदेश में सब सैनिकों को चलना ही पड़ता है वैसे ही संचालकों के आदेश का पालन सब आश्रमवासियों को करना पड़ता है. अगर वे कोई गलती करे तो उसकी सुचना गुरुदेव को दे सकते हो पर उनको सजा नहीं दे सकते. अभी के संचालक तो कुछ पढ़े लिखे भी है. मैं जब आश्रम में आया तब एक ऐसे संचालक थे जो गालियाँ भी बोलते थे और कभी किसी साधक को मार भी देते थे फिर भी हम सब साधक उनके व्यवहार को सहन कर लेते थे सिर्फ इसलिए कि उनको श्री गुरुदेव ने नियुक्त किये थे. कभी कभी वे संचालक श्री गुरुदेव को भी गुस्से में आकर खरी खोटी सूना देते थे. पर दयालु गुरुदेव सह लेते थे. जब गुरुदेव ऐसे संचालक का सह लेते हो तब दुसरे शिष्यों को भी सहना पड़ेगा. जब गुरुदेव उस संचालक को हटाते नहीं थे, हटाना चाहते नहीं थे तब हम कैसे हटा सकते है? गुरु के आश्रम में संचालक और साधक का सम्बन्ध किसी कंपनीके मेनेजर और कामदार जैसा नहीं होता. इस षड्यंत्र में अनेक नेताओं का हाथ है, अनेक विधर्मियों का हाथ है. इस षड्यंत्र में बाहर के अनेक साधकों का हाथ है, (फ़रियाद करनेवाली लड़की आर उसका बाप दोनों बाहर के साधक थे), फिर भी हम नहीं कहते के बाहर के साधकों ने यह षड्यंत्र किया है. हम कहते है कि षड्यंत्र करनेवालोंने षड्यंत्र किया. उनमें बाहर के साधक और असाधक थे और भीतर के लोग थे जो पहले कभी साधक या संचालक थे. षड्यंत्र करते समय वे न साधक थे न संचालक थे. इसलिए संचालकों या आश्रमवालों ने ने षड्यंत्र किया है यह बात झूठी है. सिर्फ आश्रमवालों ने यह सब किया है यह कहनेवाले गुरुदेव के शिष्यों में फूट डालना चाहते है. इसलिए उनसे बाहर के और भीतर के साधकों को सावधान रहना चाहिए और आपस में भिड़कर गुरुदेव के दैवी कार्यों में विघ्न नहीं डालना चाहिए. अपने गुरु के द्वारा नियुक्त संचालकों के आदेश में चलना, चाहे वे कैसे भी क्यों न होयह गुरु के आदेश में चलने के समान है. हमारे गुरुदेव और दुसरे अनेक संतों ने भी ऐसा ही किया है. हमारे गुरुदेव ने उनके गुरुदेव के आश्रम में रहते समय वहां के संचालक वीरभान की कभी फ़रियाद नहीं की. वह मेरे गुरुदेव को आश्रम से भगाने के लिए अनेक षड्यंत्र रचता था. वह अनेक बार झूठी फरियादें करके मेरे गुरुदेव को दोषी सिद्ध करता था फिर भी उनके अनुशासन में रहकर मेरे गुरुदेव ने गुरुसेवा की और वीरभान को हटाने का प्रयास नहीं किया. क्योंकि वीरभान को उनके गुरुदेव ने नियुक्त किया था. आप भी अगर कभी किसी ब्रह्मज्ञानी गुरुके आश्रममें रहोगे तो आपको भी वैसा ही करना पड़ेगा. अगर सब आश्रमवासी शिष्य अपने अपने ढंग से गुरु केद्वारा नियुक्त किये गए संचालकों को सजा देते रहेंगे तो आश्रम एक राजनीति का अखाड़ा बन जाएगा, आश्रम नहीं रहेगा.

षड्यंत्र का पर्दाफ़ाश लिखनेवाले गद्दारों का पर्दाफाश-8


➡ सालों पहले घर-परिवार छोड़कर आश्रम में रहने लगे साधकों का,, फिर संसार में वापस अाने का रास्ता बंद हो जाने पर,, आश्रम में मजबूरी वश रहकर सच्चाई को जानते हुए,, मुंह और कान को बंद करके,, गद्दार संचालकों के कारनामे देखते हुए,, गुरु परिवार को मुसीबत में देखते हुए,, सबकुछ चुपचाप सहन कर रहें है ।।

जिस में तितिक्षा का गुण नहीं है वही ऐसा सोच सकते है. साधक अपना कल्याण करने के लिए स्वेच्छा से आश्रम में रहते है. इस में मजबूरी जैसी कोई बात नहीं है. कई पलायनवादी आश्रम छोड़कर चले गए. जिसको जाना हो वह जा सकता है. कायर लोगों का यह मार्ग नहीं है. संचालकों को गद्दार कहनेवाले खुद ही गद्दार है यह मैंने पहले ही कह दिया है. गुरु परिवार की मुसीबत का कारण आश्रम नहीं है.