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महान संकट की ओर बढ़ रहें थे कदम और बुल्लेशाह अनजान था (भाग-10)


कल हमने सुना कि बुल्लेशाह आपा के साथ बुरखा पहनकर दरगाह की तरफ चल पड़े।

एक ऐसा चमन है ,जिसकी खुशबू
साँसों से बसाये फिर रहा हूँ।
एक ऐसी जमीं है, जिसको छूकर
तकदिशे हरम से आसना हूँ।
एक ऐसी गली है, जिसकी खातिर
हर गली में भटक रहा हूँ।
ए मुझको सुकूँ देनेवाले मसीहा!
तुझको ही ढूँढ रहा हूँ।

बुल्लेशाह का तरसता हुआ वजूद अपनी जड़ों में लौटना चाहता था। वही चमन, वही गली, वही जमीं, वही मसीह ! उसकी साँसे इनायत की पाक सोहगत की खुशबू पाने के लिए बेकरार थी, उसकी रूहानी राहत के जाम माँग रही थी। जो बुल्लेशाह को इनायत के करीब बैठकर, उनकी झरने सी हँसी सुनकर, उनकी भोली अदाएँ, उनकी लीलाएँ देखकर मिलता था।

कितना सस्ता होता है ना उस समय यह सब, जब गुरु हमारे पास होते हैं। तब साधक शायद उसका मोल नहीं जानता। बुल्लेशाह के लिए भी कितना सस्ता था उस समय ये सब। मगर आज इन नियामतों को पाने के लिए बुल्लेशाह अपना सबकुछ दाँव पर लगा बैठा है। अपना मान -ईमान, लियाकते, अपना सईदी रुतबा, यहाँ तक की मर्द होने का गुरुर भी। आज वह लहँगा-चोली पहनकर, हाथों में चूड़ियाँ डालकर एक नाचनेवाली तवायफ़ के साथ मजार पर पहुँचा है।

हे मन ! आज हम सभी साधको के साथ भी कुछ ऐसी ही परिस्थिति है। हमने भी अपने बापू को पुनः प्राप्त करने के लिए सबकुछ तो दाँव पर लगाने का दावा किया है। परन्तु हे मन! क्या सचमें हमने दाँव पर कुछ भी लगाया है, यह विचारणीय है। हे मेरे प्यारे मन! परिस्थितियाँ तो हम सभी साधको की भी बुल्लेशाह जैसी ही है। परन्तु क्या वो तड़प मुझमें है,जो बुल्लेशाह को अपने गुरु के लिए थी? क्या मेरी धड़कने, मेरी श्वासें सच में उनको पुकारती है?

हे मेरे प्यारे मन! काश तूने अपनी तड़प भी बुल्लेशाह जैसी बापू को पाने के लिए की होती तो शायद आज तेरे खुदा तेरे पास होते।कहते तो है कि परिस्थितियाँ जरूर बुल्लेशाह जैसी है,कि गुरुदेव हमारे पास अभी नहीं है, रूठे है। परन्तु यहाँ तो मेरे सद्गुरु बादशाह स्वयं तन से कष्ट और पीड़ा झेल रहे हैं और मुझे सुरक्षित कर इस आश्रम में रखा है।

खैर, आज बुल्लेशाह अपना सबकुछ दाँव पर लगा बैठा है, अपने गुरु के लिए। यहाँ मज़ार पर दुनिया का मेला सजा था। हजारों कद्रदान पीरों की महफिले याद में शरीक होने आई थी। दरगाह का कोना-2 आबाद था। मजारों पर चमचम सितारोवाली चादरें चढ़ रही थी। ताजे फूलों से बिंधी चुनरियाँ चढ़ाई जा रही थी। सैकड़ों लोग नियाज़ अर्थात लंगर में पंगत में बैठकर रूहानी दावत खा रहे थे।

दूसरी तरफ दरगाह से सटे हुए बड़े से मैदान में फ़नकार और इल्मी जुड़ने लगे थे। वहाँ सुल्तानी फ़कीरो और पीरों के लिए ऊँचे-2 तख्त सजे थे। इसी मैदान में बुल्लेशाह छम-2 करता हुआ आपा के साथ पहुँचा। उसके चेहरे पर बुरखे का चिलमन था और हाथ में सारंगी। साथ में थी फ़नकारों की पूरी मण्डली। सभी तख्तों से थोड़ी दूरी पर गोलाई में बैठ गए।

बुल्लेशाह के ठीक पीछे गुसल की रस्म निभाई जा रही थी। गुसल में लोग गुलाबजल और चंदन से पिरि मकबरों को धोते है। हवा में गुलाब की रूमानी महक घुलि थी।कुछ उस्तादों ने कहा कि अभी तो महफ़िल सजने में वक्त है, चलो हम भी गुसल कर आये।परन्तु इधर बुल्लेशाह तो एक अनोखा गुसल करने को बेताब था। उसकी साँसे अपने सद्गुरु, अपने मुरीद की खुशबू को तलाश रही थी। अपने मुर्शिद की खुशबू को तलाश रही थी। वो आये और बुल्लेशाह अपने आँसुओं से उनके जाविंदा कदमो को धो पाएँ। इसी गुसल के लिए उसकी मुरीदी मचल रही थी।

धीरे-2 मैदान पर गहमागहमी बढ़ने लगी। खुदापरस्तो और नमाज़ियों की बारात चली आई। उम्दा पीर भी अपने शागिर्दों के साथ तशरीफ़ ले आये। बुल्लेशाह बुरखे की जाली से टुकुर-2 सब निहार रहा था। ज्यो ही कोई पीर आते, आपा घूमकर बुल्लेशाह की आँखों में झाँकती। मानो पूंछती, क्या यही तुम्हारे इनायत है? मगर बुल्लेशाह की बेजार नजरें बिना कहे ही कह देती, नही आपा!

अब तो महफ़िल ने रौनक़ का पूरा जामा ओढ़ लिया था। सभी पीरी तख्तों पर ऊँचे दरवेश मौजूद थे। बस एक तख्त खाली था। न इनायत आये थे, न ही आश्रम का कोई मुरीद ही रूबरू हुआ था। यह मंजर देख बुल्लेशाह की श्वासें भारी हो गई।बुल्लेशाह अब निराश हुआ जा रहा था।

वो आये नहीं बहार की खुशबू लिए हुए -2
बैठा है प्यार आंखों में आँसू लिए हुए।

इनायत-3! बुल्लेशाह की एक-2 धड़कन, पुलकन-2 तस्बीह फेरने लगी थी। दिल में लगातार हुक उठ रही थी कि –

आ भी जा सोनिया! -2
वा जा दिल मेरा हुन मारदा, आ भी जा!
सुन ले मेरी सदा, देख ले हाल बीमार दा,
आ भी जा सोनिया, आ भी जा!

किनारे पर खड़ा कोई इंसान बवंडर में घिरे बदनसीब की हालत का अंदाज नहीं लगा सकता। हम और आप भी आज इतिहास के ऐसे ही साहिल पर बिल्कुल रूखे-सूखे खड़े हैं। सद्गुरु की जुदाई में सतशिष्य की क्या हालत होती है, वो तो वो ही जाने जिसने यह महसूस किया है। बाकी मैं यहाँ से बुल्लेशाह की बेताबी की हालत आप लोगों को पढ़कर नहीं सुना सकता। आप स्वयं अपने गुरु के लिए भाव लाकर बुल्लेशाह की भावनाओं को महसूस करे।

गूँजी नहीं तेरे कदमों की आहट अबतक,
बरसी नहीं बरखाएँ नगमात अबतक।
आ जा कि तेरी बोलती सूरत के बग़ैर,
चुप है मेरे ख्वाबों की तस्वीर अबतक।

अभी यह कुक पूरी भी न हुई थी कि ईलाही कदमों की आहट गूँज उठी। एक रूहानी काफिला मौसमे शबाब लेकर मैदान के आखिरी सिरे पर दाखिल हुआ। सबसे आगे थे ‘हुजुरे आलम हजरत शाह इनायत।’ खुदा की हूबहू तस्वीर, आफताब जैसा नूरानी चेहरा’। लीजिए नदी के सूखने से पहले सागर उसे बाहों में समेटने के लिए आ ही गया। कहते है ना कि-

अश्को की एक नहर थी,
जो खुश्क होने लगी थी।
आग का गोला सूखा रहा था
उसकी छाप को,
पर कितना ही बेकिनार समंदर हो,
रहता है बेकरार नदी के मिलाप को।

सद्गुरु चाहे कैसा भी बेकिनार अमीर समुद्र हो, मगर अपनी हर नदी के लौटने का इंतजार करते ही हैं। इनायत भी बर्दाश्त करने की आखिरी कगार पर आ खड़े हुए। यह ऐन मौका था, इसके आगे बुल्लेशाह ही नहीं रहता। अगर वे एक और लम्हा भी गुजारकर आते तो फिर बुल्लेशाह से उसके उसी जिस्म में कभी न मिल पाते।

सच! सद्गुरु तो हम सबकी हदे जानते है परन्तु बस इस हद तक पहुँचाने के लिए ही वह पीछे छुपे रहते हैं। अब बुल्लेशाह हद की रेखापर आ खड़ा था तो देखिये सामने इनायत भी खड़े थे। उनके तशरीफ़ रखते ही तमाम महफ़िल का सिर सिजदे से झुक गया। ‘पीरों के पीर, क़ामिल मुर्शिद है इनायत’ यह कस्बे की हर रूह मानती थी। इसलिए उनके कदमों में रेशमी रुमाल और फूल बिछाये जाने लगे।

उधर एक अकेले से कोने में बैठे एक गरीब की सूखी, तरेड़ खाई पथराई आँखों के सामने अचानक से जैसे रसराज सावन आ गया हो। जिन्हें तजुर्बा है वे ही जानते है , इस रसराज सावन को।

अब मान लीजिए, हमारे समक्ष बिना किसी को खबर किये अभी इसी वक्त व्यासपीठ पर बापूजी आकर बैठ जाये, तो अचानक गुरुदेव को देखकर हमारी क्या प्रतिक्रिया होगी…? हम उनको कैसे निहारेंगे…? इतने वर्षों बाद क्या हमारी आंखे अपनी पलकें झपकाने को तैयार होगी…? क्या हम अपनी भावधारा को रोक पाएँगे…? अरे! उस समय तो ऐसा लगेगा कि बापूजी आप बस व्यासपीठ से उतरिये तो आपको मैं आज लिपट ही जाऊँ। बिना लिपटे आज आपको जाने ही ना दूँ।

सद्गुरु की प्यारी सी सूरत को आंखे कभी देखती नहीं है। सतशिष्य की आँखे सद्गुरु को पीती है। और जो पीया जाता है, उसमे रस तो होता ही है।बुल्लेशाह की प्यासी आँखों के सामने भी जैसे ही इनायत का खुदाई चेहरा आया, वही पुरानीवाली रूहानी सी चाशनी उसके अंग-2 में घुल गई। दीद का वही जाम घोट-2 कर हस्ती पर छा गया। बुल्लेशाह ने कसके दिल थाम लिया, लम्बी-2 साँसे भरने लगा। इनायत बादशाही चाल में चलते हुए आगे बढ़ने लगे। बुल्लेशाह के बेहद करीब से गुजरे। उसकी तरफ बिना देखे ही अपनी मुस्कुराती तिरछी नजरों से निशाना गए।

खैर, ये सद्गुरु के तिरछी दृष्टि का निशाना ही तो है कि हम सभी घायल होकर उनके कदमों में पड़े है । इस आश्रम में है। बुल्लेशाह भी इन्हीं तिरछी निगाहों से घायल हो पंख कटे पँछी की तरह छटपटा उठा। वह घायल, पागल सा हो गया।

नजर चुराके वह गुजरा करीब से लेकिन,
नजर बचाके मुझे देखता भी गया।
गजल के लहजे में हो गई गुफ्तगू उससे,
खाँ के दिल का हर जर्रा रौशन कर गया।

इनायत चलकर अपने पीरी तख्त पर जा बैठे। फिर हाथ उठाकर महफ़िल को रवानगी दी। इशारा मिलते ही कव्वालों न चुप्पी के ताल खोले। तान साधकर एक ऊँचा सुरीला आलाप उठाया। ढोलचियों ने अपनी ढोलकी सँभाली। मीठी-2 थाप उठनी शुरू हो गई। सारंगियों की तारे भी झूम-झननकर झनक उठी। सारा आलम मस्ताना हो चला। इस मस्त लहर में हर दिल बहने लगा। पाँव थिरके बिना न रह सके। सिर होले-2 झूमने लगे।

उधर इनायत भी अपनी रूहानी हुस्न का जादू बिखेर रहे थे। पता नहीं क्या बात थी, शायद मैदान के सारे ठंडे झोंके उन्हीं की इबादत में जुट गए थे। उनके बालो को सहला-2 कर उड़ा रहे थे। उनका पाक दामन भी लहराने लगा था। यूँ ही या फिर उसकी यह मचल किसीको अपने मे समेटने को बेताब थी।

वे खूब मुस्कुरा-2 कर ईलाही जलवा भी लूटा रहे थे। यूँ ही या फिर मुस्कान भी किसी के गिरे हौसले को उठाने का जरियाँ थी। ये तो वे ही जाने। मगर बुल्लेशाह पत्थर का चकोर बन गया था।उसकी निगाहें एकटक इनायत पर रुकी थी। बिना सुर्खियों के ही इनसे एक धार आँसू बहे जा रहे थे। होठों पर सूखी पपड़ी जमी थी। हाँ, वह प्यासा था, बेहद प्यासा।

बापूजी मेरे तरफ देखे, एक दृष्टि मिल जाये बस। मुझसे बात हो जाये। एकबार, सिर्फ एकबार बात हो जाये। पूज्यश्री जब कोर्ट की तरफ जाते हैं गाड़ी में। लोग दर्शनों के लिए खड़े रहते हैं। कुछ लोग तो ऐसे होते हैं कि, उनसे पूँछो कि भाई दर्शन हुए? तो कहते हैं कि हाँ हो गये। गुरुदेव के दर्शन हुए तो कहते है गुरुदेव के दर्शन तो हो गये, परन्तु ठीक से नहीं हुए। तो दर्शन तो दर्शन होता है। इसमें ठीक – बेठीक क्या? तो वे कहते हैं, मुझे दर्शन तो हुए परन्तु बापूजी की दृष्टि नहीं मिली। इसे प्यास कहते हैं।

आज दरिया खुद चलकर बुल्लेशाह के सामने आ गया था। मगर अभी तक उसका एक कतरा भी उसे पीने को नहीं मिला था। दरिया को देखकर बुल्लेशाह की प्यास तो और भी बढ़ गई।

सामने तख्त पर तमाम क़ायनात का मालिक था रूहानी इश्क की छलकती सुराही हाथ लिये। नीचे झूमते हुजूम के बीच बुरखे की जाली के आड़ में थे दो प्यासे प्याले। बड़ी शिद्दत से जो साकी की दरवाजा-ए-दिल पर अलख जगा रहे थे। उसकी रजा, उसके मोहब्बत के दो घूँट जाम माँग रहे थे।

आज मैखाने में साकी के कदम आये हैं,
इसलिए सिर को झुकाये हुए हम आये हैं।
चरणों में साकी के जवी रखके कहेंगे,
प्यासे हम जन्मों के खाली जाम लाएँ है।

बाकी सबके लिए तो महफ़िल खूब रंगीली, खूब नशीली हो चुकी थी। कंधे मस्ती से हिचकोले खाने लगे थे। धुनें बहने लगी थी, कव्वाले गा रहे थे। आपा ने भी नाचने का इशारा पाया ,तो फिर वह भी खुदा की इबादत में नाचने और फिरकने लगी।

बुल्लेशाह वही बैठा रहा गया। उसके हाथ-पाँव सुन्न थे, एकदम जाम! इनायत तो थे ही नृत्य के शौकीन।इसलिए जैसे ही आपा और दूसरे फ़नकारों ने थिरकना शुरू किया, इनायत शाह की निगाहें उन्हीं की तरफ घूम गई।

बस! अब तो बुल्लेशाह बैचैन हो उठा। मेरे सारे दर्दों का दरमा है एक निगाह! लेकिन वो एक निगाहें मोहब्बत कब मिलेगी…? यही मुस्कुराती निगाहें पाने के लिए तो उसने अपने जिस्म को रियाज़ की रस्सियों से कस-2 कर साधा था। आज यह साधना, यह तालीम परवाना चढ़नी थी। इंतहा का वक़्त आ खड़ा था।

बुल्लेशाह के कतरे-2 में गजब की मचल लहराने लगी। सुन्न कदम अंगड़ाइयाँ ले उठे। वो मुठ्ठियाँ भींचकर सारी ताकद बटोरने लगा। उसकी बौराई आँखे इनायत की रूहानी मूरत पर अपलक टिकी थी। अपने सरताज़ से रास्ता और हिम्मत माँग रही थी।

तभी एक बड़ी नाज़ुक सी-बारिक सी घटना घटी। इतनी ईलाही थी वह कि सिर्फ सद्गुरु और सतशिष्य के बीच में घट गई और दुनिया को भनक भी नहीं लगी। हुआ क्या?…कि सुरूर से गीली इनायत की नजरें आहिस्ते से मैदान के उस कोने की तरफ सरक गई, जहाँ बुल्लेशाह अकेले जज्बातों के तूफ़ान से जुझ रहा था। उनकी आँखे सीधे जाली के पीछे से झाँकती बुल्लेशाह की आंखों से जा मिली। फिर होले से उनकी पलकें गिरी और उठी। फिर वापस नाचने-गाने की तरफ घूम गई।

मानो इस चुटकीभर लम्हें में बुल्लेशाह को हौसलों का चप्पू थमा गई। चुपचाप गुनगुना गई कि मेरे लखते जिगर उठ खड़ा हो। यह आखिरी तूफानी लहर है। आजमाइश का आखिरी पड़ाव है। तारीख़ बनाकर दिखा दे इसे भी। इसके ठीक आगे हाथ भर की दूरी पर ही मैं खड़ा हूँ। हाँ, मैं खड़ा हूँ बाँहे पसारे तेरे लिए बुल्ले! तुझसे मिलने को बेकरार!

सच! दुनिया कह देती है कि इश्क की राहे बड़ी पेचीदा है। इंतिहानों के खौफनाक घाटियों से अटी हुई। मगर इन घाटियों में चप्पे-2 पर अपना दामन थामनेवाले मसीह को कोई देख नहीं पाता।दुनिया ने यह तो देखा कि बुल्लेशाह इनायत की याद में गल गया। बुल्लेशाह रोया-खोया, परवाना बनकर ख़ाक हो गया। लेकिन एक हकीकत दुनियावी नजरें नहीं देख पाई।

अरे भाई! अगर शिष्य गला तो सद्गुरु ही उसकी आँखों से आँसू बनकर बहे। अगर शिष्य याद में याद के चिराग जला पाया तो इसलिए क्योंकि मुर्शिद ने, सद्गुरु ने उसकी मुक़ामे दिल पर अपनी पाक दरगाह आबाद रखी। बुल्लेशाह परवाना बना तो इसलिए क्योंकि इनायत ने शमा जलाये रखी।

माना कि इश्क की घाटी
खतरों से है अटी हुई,
मगर ए दिल! रसाई होगी मंजिल,
गुरु तेरा निगहबाँ है।
न घबरा इश्क की
पुरपेच राहों से तू!
पुकारेगी तुझे मंजिल,
मुर्शिद तेरा निगहबाँ है।

बुल्लेशाह को भी इस दौरे इंतहा में अपने गुरु, अपने निगहबाँ का इशारा मिल गया था। बस अब कौन रोके इश्क की पुरजोर रफ़्तार को? दीवानगी की मलंग झूम को बेबसी की सारी जंजीरें चटककर गिर गई। सरसारी सिर तक चढ़ आई। बुल्लेशाह उठ खड़ा हुआ और…

महान संकट की ओर बढ़ रहें थे कदम और बुल्लेशाह अनजान था (भाग-9)


कभी यूँ ही आओ मेरी आँखों में,कि मेरी नजर को खबर ना हो।मुझे एक रात नवाज दे,मगर उसके बाद सुबह ना हो।बुल्लेशाह को उर्स की उस एक रात का शिद्दत से इंतजार था। धड़कनो की सारी इबादत दाँव पर लगी थी। एक-2 श्वास शबरी बन चुकी थी। अगले दिन की सुबह खिल आई। रोजाना सुबह तो रोशनी की चटकते ही बुल्लेशाह गम के कड़वे घोट पीता था। मगर आज, आज सीने में जरा भी दर्द नहीं उठा। बल्कि अंदर एक खुशी की फुदक पड़ी। बुल्लेशाह ने झट कलाई पर बँधे रेशमी धागे को टटोला। बेसब्री से पहली गाँठ खोली। फिर राहत की श्वास ली और खुद से कहा, “40 में से एक दिन कम , 39 दिन।” लेकिन अगले ही पल बैचेनी की फुरेरी सिर से पाँव तलक दौड़ गई। बुल्लेशाह घबरा सा गया । उसमें कैसा एहसास जागा, यह उसने बड़े ही शायराना अंदाज में अपने पहले गंढ़े में दर्ज किया है -*गंढ़ पहलि नु खोल के मैं बैठी बरलावा,**ओढ़त जावन जावना होण में दाज रंगावा।*”जब मैंने पहली गाँठ खोली तो मेरी रूह बिलख उठी। बुल्लेशाह तुझे पी के देश जाना है। चल फौरन कुछ दहेज़ तो जोड़ ले। चुनरियाँ रंगाले , तैयारियाँ करले।”दरअसल सूफ़ी मुरीदों का हमेशा से यही कायदा रहा है- “उन्होंने रूह को एक कुँवारी कन्या माना और क़ाबिल मुर्शिद अर्थात सद्गुरु को इस रूह का ख़सम मतलब पति कहा।”आज बुल्लेशाह भी इसी तालपर गाँठे खोल रहा है। दूसरी और तिसरी गाँठे खोलते हुए उसने इसी काफ़िये को आगे सरकाया। बताया कि वह किस दहेज़ का ज़िक्र कर रहा है। कैसी चुनरियाँ उसको जोड़नी और रँगनी हैं।*दुजी खोलो क्या कहूँ दिन थोड़े रहेन दे,**झल्लवल्ली मैं होई तुम्ब कत्त न जाना।*मैं तो उतावली वे! ऐसी झल्लीवाली सी हो गई हूँ, कि मुझसे चरखे पर धागा तक नहीं काता जा रहा।”कैसा चरखा? कौनसा धागा?””शरीररूपी चरखा और श्वासों की धागा, सोहम की धागा।”श्वासों का धागा कातोगे तभी तो सुमिरन की चुनरी बनेगी। बड़ा ही गहरा इशारा है बुल्लेशाह का। देखिए ये सद्गुरु से मिलने की पूर्व की तैयारी बता रहे हैं बुल्लेशाह। सुमिरन ही नहीं इस अलबेले निक़ाह में, दूसरे तरह के दहेज़ भी जरूरी है। *तीजे खोलहु दुख से रौंदे नैन ना हटदे*अर्थात गुणों-सगुणों की सौगात भी इकठ्ठी होनी चाहिए। तीसरी गाँठ खोलते हुए बुल्लेशाह को यही चिंता है कि दूसरे सतशिष्यों की रूहें तो गुणों का श्रृंगार कर प्यारी-2 दुल्हनें बन गई। सिर्फ़ मेरी रूह बेगुण-बदसूरत रह गई।बुल्लेशाह नाम-सुमिरन और गुणों का दहेज़ जोड़ने में जी-जान से जुट गया। पल-2, छीन-2, साँस-2 में श्रृंगार। दिनों पे दिन गुजरते गये। मगर बुल्लेशाह के लिए हर घड़ी रिस रही थी।*हँसते-2, चलते-2 पूँछा पाँव के छालों ने।* -2*दुनिया कितनी दूर बसाली दिल मे रहनेवालों ने।**चंगी लगदी न ढोला तेरी दूरी,**तैनू तकना है मेरी मज़बूरी।**तेरे बिन जिंद है अधूरी,**ता अँखियों दी ज़िद्द कर पूरी।*आखिर बुल्लेशाह की तपस्या रँग लायी।उसकी तैयारियाँ पूरी हुई।सारा दहेज़ जुड़ गया। 40 वे दिन उसने रूह को दुल्हन सा सजा लिया।*कर बिस्मिल्लाह खोलियाँ मैं गंडा चाली,**जिस आपना आप बजया सो सुर्जनवाली।*ख़ुदा का नाम लेकर उसने 40 वी गाँठ खोली, तब पाया कि अपना आपा अर्थात मैं भाव रहा ही नहीं। आत्मा सुर्जन यानी फ़रिश्ते जैसी रौशन हो चली। *पिया ही सब हो गया अब्दुल्लाह नही!*अब तो इनायत ही इनायत रह गए, सद्गुरु ही सद्गुरु रह गए। बुल्लेशाह का 40 वे दिन खुद का अस्तित्व खो गया। बुल्लेशाह की हस्ती पूरी तरह से खत्म हो चुकी। बस यही मिलन का सबब है। मैं ही की तो दीवार थी। एक शायर ने ख़ूब कहा -*ये कसक दिल की दिल में चुभी रह गई,**जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई।**एक मैं, एक तुम, यही दीवार थी,**जिंदगी आधी-अधूरी बटी रह गई।*सद्गुरु इसी दीवार की ईंट से ईंट बजा देना चाहते हैं। तनकर खड़ी इस दीवार को निस्तानाबूद कर मलबे का ढेर बनाने का मनसूबा रखते हैं सद्गुरु।बुल्लेशाह की दुनिया में इस दीवार की ईंट तो क्या, अब मलबा तक भी न बचा था। वो अन्दुरुनी तौर पर सद्गुरु से इकमिक हो चुका था। फिर बाहरी दूरी भी कबतक बनी रहती। इसलिए आज वे ख़ुशगवार मिलन के लम्हें, उर्स का दिन आ ही गया।आज सुबह से ही कोठे पर खाँसी चहल-पहल थी। लाहौर के कुछ पखावज, सारंगी बजानेवाले गायक और शायर टोलियाँ बना-2 कर तवायफ़खाने पहुँच गए थे। सभी को इकठ्ठे होकर शाम के वक़्त आपा के साथ मज़ार पर जाना था।फ़नकारों ने बुल्लेशाह को देखा तो आदाब फ़रमाते हुए वे उन्हें पहचान गए। सभी फ़नकारों ने मिलकर बुल्लेशाह को काफ़िया सुनाने के लिए जोर दिया। इसीके साथ आपा ने भी सभी फ़नकारों के मुखातिब होकर कहा कि जानते हैं, आज भाईजाँ भी हमारे साथ महफिले उर्स में शरीक होने के लिए जा रहे हैं। क्योंकि वहाँ हजरत शाह इनायत भी मौजूद होंगे।यह सुनते ही एक उस्ताद ने कहा कि , “ख़ुशामुदिद! फिर आज क्या करने की हसरत रखते हैं बुल्लेशाह मियाँ?दूसरे ने कहा, “हाँ-2, कहिये ना मियाँ! उधर इनायत आपके रूबरू होंगे, इधर आपकी तरसती मुरीदी। आहाहा! क्या करेंगे आप?”तीसरे ने तीखे मिजाज से कहा कि, “अरे, क्या ख़ाक करेंगे? सुना है, हजरत ने इन्हें अपनी नजरों से दूर रखने का सख्त हुक़्म दे रखा है।”किसी ने कमान सँभालते हुए कहा, “अरे!मोहब्बत में बेरुखी भी एक मौसम है! मगर यह बारहो महीने थोड़े न रहता है, इनायत रूठे हैं तो मन भी जायेंगे। बुल्ले मियाँ ने जरूर कुछ तरक़ीब सोची होंगी। क्यों मियाँ! बताईये ना, क्या हौसले रखते हैं आप?”इधर -उधर से भी आवाजें आई, “हाँ -2! कहिये ना। चलिए इसी बातपर एक काफ़ी हो जाय।”बुल्लेशाह की आँखे बंद हो गई। बुल्लेशाह काफ़ी गाने लगे कि-*उनके दर पे पहुँचने तो पाए,**ये ना पूछो कि हम क्या करेंगे?**सर झुकाना अगर ज़ुल्म होगा,**हम निगाहों से सिजदा करेंगे।**बात भी तेरी रखनी हैं साकी,**सर्फ़ को भी न रुसवा करेंगे।**जाम दे या न दे आज हमको,**हम मैकदे में सबेरा करेंगे।**इस तरफ अपना दामन जलेगा,**उस तरफ उनकी महफ़िल सजेगी।**हम अँधेरे को घर में बुलाकर,**उनके घर में उजाला करेंगे।**आख़िरी साँस भी हम उनसे,**बेरुखी का न शिक़वा करेंगे।**उनके दर पे पहुँचने तो पाएँ,**ये न पूछो कि हम क्या करेंगे?*खैर! शाम ढल आई। सूरज पश्चिम की घाटी में डूब तो रहा था, मगर बड़ा मन मसोसकर। आँखे तो उसकी उर्स की दरगाह पर ही टिकी थी। तारे और चाँद भी उजाले में ही प्रकट हो आये। भला कौन इस तारीख़ी मंजर का नजारा चखने को बेताब नहीं था? आखिर तनहाइयों के आलम में यह तमाम क़ायनात ही तो बुल्लेशाह की हमदम थी। उन्होंने खुद बुल्लेशाह को कहते सुना था कि-*तरस रहा हूँ मैं एक लम्हाएँ सुकून के लिए,**ये जिंदगी तो नहीं, जिंदगी का मातम है।**तमाम आलमे फ़ानी ने साथ छोड़ दिए,**बस अब सूरज-चाँद ही मेरे हमदम हैं।*इधर ढलते सूरज के साथ आपा के कोठे पर जिंदगी ने रफ़्तार पकड़ ली। तमाम फ़नकार सजने-धजने में मशरूफ़ हो गए। लेकिन यहाँ एक शख़्स ऐसा था, जिसकी महफिले दुनिया फ़क़त उसका पीर, उसका मुर्शिद था। उसीकी निगाहें करम पाने की कोशिश में वह था।*आप की एक मोहब्बत की नज़र है दरकार,**इश्क़ हर दर्द, हर सर्द का इलाज होता है।**फ़क़त आपकी उल्फ़त का मैं दम भरता हूँ,**आप खुश हो तो रजामंद ख़ुदा होता है।*इसलिए बुल्लेशाह सिर्फ अपने हबीब इनायत की नज़रे मोहब्बत पाने के लिए सज रहा था। परन्तु कैसे? कोई नहीं जानता था।बाहर तमाम मण्डली रुख़सत होने की इंतजार में थी। अपने-2 साजो की तारे कस रही थी। आपा भी तैयार हो गई थी। मगर उधर बुल्लेशाह का दरवाजा अब भी चुप्पी साधे बन्द था। सभी बुल्लेशाह के लिए खड़े थे।अब आपा ने धीरे से दरवाजा खटखटाया, अंदर गई। सामने जो नजारा था, उसका चित्र तो कभी उसके सपनों की कलम ने भी नहीं उकेरा था।बुल्लेशाह की आँखों में सुरमा, होठों पे लाली, माथे पे बिंदियाँ और हाथों में चूड़ियाँ सजी थीं। बदन पर सुनहरे सलमे-सितारों से जड़ा गाढ़े हरे रंग का लहँगा था। वह सजा-धजा कमरे के कोने में सिमटासा खड़ा रहा।आपा तो उसे घूरती ही रह गई। इतनी अवाक थी, मानो चेहरे पर लकवा मार गया हो। फिर कुछ देर बाद आपा जोर-2 से हँसने लगी। ख़ूब हँसती ही रही। “भाईजाँ यह क्या हुलिया बना रखा है आपने? आप इस जनाना रँग-ढँग में?”पर सामने बुल्लेशाह गर्दन झुकाया खड़ा रहा। *आँखो में नमी , साँसों में रूमानी नाले,**वो क्या हँसे जिसके लबो पे लगाये इश्क़ ने ताले।*बुल्लेशाह सिलिसी मायूस आवाज में आपा से बोला, “आपा! मैं भी इनायत के लिए नाचूँगा, इसलिए ये सब। क्योंकि मर्दों की पोशाक में वहाँ कोई नाचने की इजाजत तो नहीं देगा।”यह सुनते ही आपा की हँसी बर्फ सी जम गई। हँसती पर बिल्कुल अलग हावभाव के काफिले छा गए। चेहरे पर नए जज्बात आ बिखरे।*सिर यार दे दवारे उत्ते धर लैन दे,**होवे यार जिवें राजी, ओय कर लैन दे।**मेरी शान विच फरक नई पैंदा,**जे नच के मनावा यार नु,**मन्ने यार नत्थी कुछवी नई या रहेंदा।**ते केवे मैं भुलावा यार नु।*बुल्लेशाह काँपती आवाज में फ़रयाद कर उठा, ” आपा! आज मत रोकना मुझे। जिस रस्म से मेरे इनायत रीझ जाए, उसे निभाने दो मुझे। मेरी आन, मेरी शान, मेरी जान , मेरा सबकुछ मेरे सद्गुरु की रज़ा है। अगर आज मैं अपनी शख्सियत को चूर-2 करके उनकी रज़ा को जीत सका, तो यह सौदा भी सस्ता होगा आपा।”यह बात आपा की रूह को छू गई। “माफ करदो भाईजाँ, माफ कर दो। मेरी जैसी बेअक्ल तवायफ़ रूहानी सतशिष्य की रिवायतें क्या जाने? आप तो फ़रिश्ते हैं भाईजाँ, जो इस नापाक दुनिया में पाक मुरीदी की मिसाल कायम करने आये हैं। जमाने को पाकीजा आशिक़ी का सबक सिखाने के लिए खुदा ने आपको चुना है।”*हे खुदा! बज़्म के हर शख्स को दे ऐसा जुनून!**अपने सद्गुरु की इश्क़ में सदा बेखुद, शरसार रहे।* *उसके पैग़ामों,रूहानियत को न कोई भूल पाए,**उसके इशारे से पहले बसर मरने को तैयार रहे।*सच्ची भाईजाँ! मेरी रूह कह रही है। आज अगर मुरीदी हारी, आप की भक्ति हारी तो मेरा ऐतबार सद्गुरु, मुर्शिद और उनकी मुर्शिदगी से उठ जाएगा।”नहीं-2, आपा ! सद्गुरु पर शक करने का कुफ़्र मत करो। उसकी राहे- इश्क़ बड़ी अलबेली होती है। *अगर वह सितम करता है, तो उसका सिला भी देता है।**रूठता है तो मुस्कुराकर अपना भी लेता है।* *अगर ग़मो से नवाज़ता है मुझे, तो ग़मो को सहने का हौसला भी सद्गुरु ही देता है।* *मुझीसे छुपाता है राजे-ग़म सरेशाम, मुझीको आख़िरी शब भी वही सद्गुरु तो बता देता है।”*”अच्छा! अब चलिए। वक़्त गुजर रहा है।”आपा कमरे में से एक बुरखा उठाकर बुल्लेशाह के पास लौटी। “भाईजाँ! आपकी इस मुरीदी के लिबास को दुनियावी आँखे नहीं समझ सकती। दुनिया तो बस मख़ौल कर हौसले गिराना जानती है। बेहतर होगा कि आप अपने इस रूहानी हुस्न को उन्हीं पाक निगाहों के आगे बेपर्दा होने दे, जिसके लिए यह आबाद हुआ है।जो इसकी क़दर जानती हो। अभी फ़िलहाल जमाने के नजरो के सामने तो आप बुरखापोश होकर चले।”बुल्लेशाह आपा का सादिक इशारा और खैरख्वाही समझ रहा था, इसलिए भूरे रँग का वह बुरखा पहन लिया। आपा खुद काले बुरखे में थी। दोनों साथ-2 कोठे से उतरे और बग्गी में बैठ गए।उन्हें देख कुछ फ़नकारों ने टोका, “क्या हुआ? बुल्लेशाह मियाँ नहीं आ रहे?””नहीं, उनकी तबियत नासाज़ है।” कड़े रुख़ में इतना कहकर आपा ने मुँह सील लिये। बग्गियों का कारवाँ अब मज़ार की तरफ कूच करने लगा।

महान संकट की ओर बढ़ रहे थे कदम और बुल्लेशाह अनजान था (भाग- 8)


कल हमने पढ़ा कि किस प्रकार आश्रम मे मुर्शीद इनायत शाह अपने मुरीद बुल्लेशाह के हर एक तड़प पर तड़प रहे है आज हम फिर से बुल्लेशाह के पास वापस आते है आज बुल्लेशाह को अपने कमरे के बाहर खूब चहल पहल सुनाई दी आंसू पोछकर वह बाहर आया देखा कि आज तवायफ खाने मे संगीत के उस्तादों और नाचने वालो की बारात आयी हुई है बजाने वाले नए नए वाद्य यंत्र भी बंद पेटियो मे एक कोने मे रखे हुए आपा मेहमान नवाजी करती हुई फिरकी की तरह इधर से उधर घूम रही है इसी बीच उसकी आंखे बुल्लेशाह की सवालिया नज़रों से जा मिली आपा खुद करीब आई और बुल्लेशाह को बताया कि भाईजान पूरे लाहौर और उसके आसपास के इलाकों के फनकार इक्कठे होकर हर साल हमारे दौलत खाने पर तशरीफ लाते है।उर्स से पहले (उर्स एक त्योहार है) उर्स से पहले क्यों कि उर्स की रात हम सब मिलकर पीरो की महफ़िल मे रंग जमाते है इसलिए एक मर्तबा पहले मिलकर अपनी अपनी कव्वाली,नाच, गाना और ताफिया तय कर लेते है ताकि उर्स तक उनका रियाज कर सके इतना कहकर आपा फिर से शरबत का थाल घुमाने मे मशरूफ हो गई उर्स यह लब्ज सुनते ही बुल्लेशाह के जिस्म का तार तार झन्ना उठा उर्स पर तो शाहजी हर साल मौजूद होते है।ऊंचे तख्त पर बैठकर रातभर उस पीरी महफ़िल को रूहानियत बख्शते है बुल्लेशाह बेकाबू सा हो गया बेकरार नज़रों से आपा को ढूंढने लगा बड़ी मुश्किल से उसने दौड़ती भागती आपा को रोका धीरे से पूछा क्या मे भी आपके साथ उर्स मे शरीक हो सकता हूं क्यों नहीं भाईजान जरूर आपकी तालीम भी पूरी हो चुकी है क्यो न वहीं दिन इम्तिहान का दिन भी हो जाए बस यह सुनना था कि बुल्लेशाह थिरक उठा हर तरफ से रोशनी की धार धार किरने उसके अंधेरे को चीरने लगी मानो खुशनसीबी के आफताब ने उसके दरवाजे पर ज़ोरदार दस्तक दी बुल्लेशाह अपने कमरे मे बैठकर गाने लगा मेरे ढोलन माही आजा अपनी सोहनिया शक्ल दिखा दिखा जा अखिया तरस गई कोठे चड़के वाजा मारिया कदी सज्जड़ नज़रिया आजा की अखियां तरस गई मेरी उजड़ी जींद बसा जा तेरे सुतड़े लेख बुझा जा कि अखियां तरस गई आज बुल्लेशाह के इल्तज़ा मे कसक के साथ एक छनन छनन खनक भी थी।यह खनक उम्मीद की उन छोटी छोटी घंटियों से उठी थी जो उसके दिल के मंदिर मे उर्स के जिक्र पर बंधी थी अब तक आपा मेहमान नवाजी से फारिक हो गई थी बुल्लेशाह फौरन अपने कमरे से निकल कर बीच के बड़े कमरे मे दाखिल हुआ था बेसब्री से आपा को पुकारा आपा। आपा आप मुझे एक रेशमी धागा देंगी? हा क्यो नहीं आपा फीते ले आयी बुल्लेशाह ने लपककर एक फीता लिया और उस पर गांठे लगाने लगा आपा अब और हैरानगी नहीं समेट सकी भाई जान अब इबादत का कौन सा नया ढंग इजात कर रहे है आप? यह गांठे यह गांठे किसलिए? गांठे उसके इश्क़ की मार बैठा हूं सब कुछ उस पर वार बैठा हूं खुलेगी ये गांठे जिस रोज़ जिस पल मे ले जाएगी उसके पास उसकी महफ़िल उर्स मे। जिसको पाने मे बेकरार बैठा हूं जिसकी गांठे मार बैठा हूं बुल्लेशाह किसी पागल जुनूनी की तरह फिर से गांठे मारने लगा आपा की हैरानगी पर भी गांठे पड़ गई इश्क़ की गांठे। गांठे खुलेगी उर्स मे। भाईजान खुदा के वास्ते खुलासा कीजिए बुल्लेशाह खुशी से ठिठुरती आवाज़ मे बोला आप जानती है उसी के पाक मौके पर मेरे मोल्लाह का मेरे शाहजी मेरे हज़रत शाह इनायत का इलाही तख्त भी सजता है इनायत अपने पूरे नूरो जलाल मे वहां मौजूद होते है हा क्या कहा? वहां हज़रत इनायत के भी कदम बोसी होते है आपा भी गुलाब सी खिल गई दिल के रास्ते से अरमानों क की बाड़ उसकी आंखो से चड़ आये।वह अक्सर सोचा करती थी कि जिस आफताब के एक कतरे भर मे उसके जिंदगी की बदनुमा रात को चीरकर सवेरा कर दिया या खुदा वह आफताब खुद कैसा होगा? जिसे जुड़े अल्फाजों और अफसानों मे जिसके वास्ते निकली अश्क और आंहो मे इतनी कशिश है कि मुझ जैसी तवायाफ तक मुरीदी के मायने सीख़ गई वह मुर्शीद वह सतगुरु खुद कैसा होगा वह जरूर इस ज़मीन इस सारी कायनात का मालिक पाक परवरदीगार खुदा ही होगा हा खुदा ही होगा। आपा चहकती हुई कह उठी सच भाईजान इसका मतलब हम उर्स पर हज़रत शाहजी का रूहानी दीद नाजिल होगा हा आपा हा बुल्लेशाह कांपते हुए उंगलियों से दुबारा गांठे मारने लगा मगर भाईजान उर्स पर इनायत की दीद से इस रेशमी गांठे और धागो का क्या वास्ता? कैसी तुक? बुल्लेशाह ने कहा देखिए आपा उर्स पर हम गुज़रे जमाने के उन शाही फकीरों कि याद मे कलमा पड़ते है कि जिन्होंने अल्लाह से मिलाप किया उर्स के लफाजी मायने भी यही है कि वस्ल अर्थात मिलाप,निकाह। एक रूह का माशूक हकिकी से मिलाप आपा पता नहीं क्यों मगर उर्स का जिक्र आते ही मेरी रूह मे भी शहनाइयां बज उठी है में यह सब लफ्जो मे तो बया नहीं कर सकता लेकिन ऐसा लगता है जैसे मुकामे हक से नवाजिशे गिरी है जो मुझमें यकीन की रोशनी भर रही है वे मेरे माथे को चूमकर मानो कह रही है कि सुन बुल्लेशाह जुदाई की काली रात करने वाली है अब तेरी जिंदगी मे जश्न की सुबह खिलेगी उर्स तेरी रूह की निकाह का दिन है तेरे साहू इनायत तेरी तड़पती शागिर्दी पर उस दिन कर्म बख्शेंगे मुझपे नज़र होगी मंजिले कि हवा के रुख बदले से लगते है वस्ल के चलेंगे सिलसिले कि रूह मे चिराग जलते से लगते है अच्छा भाईजान तो इसलिए आप ये रेशमी गांठे बांध रहे है पुराने समय मे पंजाब और आसपास के इलाकों मे शादी से पहले गांठे बांधने का रिवाज था मुहूर्त निकालने के बाद लग्न पक्का करने के लिए निशानी के तौर पर लड़के वालो की तरफ से लड़की के घर एक रेशमी धागा भेजा जाता था उस धागे पर उतनी ही गांठे बांधी जाती थी जितने दिन अभी शादी मे बचे है फिर जैसे जैसे दिन घटते थे लड़की गांठे खोलती जाती थी इस हिसाब से बुल्लेशाह ने भी गांठे बांधनी शुरू की थी बुल्लेशाह ने कहा हा आपा पूरी चालीस गांठे बांधुगा वस्ल की रातें जश्न ए उर्स चालीस दिन दूर है ना भाई जान।आनेवाली तारीख अपनी सुनहरी कलम से जरूर आपकी दास्तानें लिखेंगे दास्तान ए इश्क़ जिसे पढ़कर जमाना नूर हासिल करेगा आपा ने बा अदब बुल्लेशाह की मुरिदी को सिजदा किया और चली गई इधर बुल्लेशाह अब भी रेशमी धागे पर चालीस गांठ लगाने मे मशरूफ था।चालीस गांठे लग तो गई बुल्लेशाह ने धागे को आंखो से चूम लिया लेकिन अचानक धड़कनों ने बेसब्र रफ्तार पकड़ ली एक अनजाने से डर ने दिल की आवाज़ ने दस्तक दी क्या अब भी मुझे शाहजी ने कबूल नहीं किया तो? अब कायदे से तो बुल्लेशाह को फिर से अश्कों के समंदर मे डूब जाना चाहिए था मगर नहीं थी अब नहीं मुर्शीद के देश से आए एक अलग पैग़ाम ने उसकी रूह को दुबारा थपथपाया नहीं उस दिन वे तुझे जरूर अपनाएंगे यही तो होता है कि मुर्शीद हंसाता है तो मुरीद खिलखिलाता है अर्थात सतगुरु हंसाता है तो सतशिष्य खिलखिलाता है मुर्शीद रुलाता है तो मुरीद अश्क बहाता है मुर्शीद के हाथ मे डोर है जैसे नचाता है वैसे मुरीद नाचता है आज इनायत ने ही हवाओं के रुख कुछ ऐसे बदले थे कि बुल्लेशाह मे उम्मीद और हौसलों की ठंडी ठंडी ताज़गी भर अाई थी वह यक़ीन की जमीं पर कुछ इस अदा मे तनकर खड़ा हुआ कि मुरिदि का एक और शौख जलवा देखने को मिला।बुल्लेशाह ने घुंघरू बांधकर नाचना शुरू कर दिया और गाने लगा इक टोना अचंभा गवांगी में रूठा यार मनावंगी इक टोना मे पड़ पड़कर फूंका सूरज अगन जलावांगी में कर मती टोना फूकुंगी अपने रूठे यार को मनाऊंगी ऐसा तिलिस्मी टोना जिसकी आग सूरज तक को जलाकर राख कर देगी।आंखी काजल काले बादल भवा से आंधी लावांगी सात समुंदर दिल के अंदर दिल से लहर उठावांगी मेरी आंख की काजल से काले बादल उमड़ घुमड़ आएंगे। भवे उठेंगी तो आंधी कोंध जाएगी क्या कहूं मेरे दिल में जज्बातों के सात समुंदर लहलहा रहे है।मैं उन्हें हिला कल इश्क़ की ऐसी लहर उठाऊंगी कि मेरे सतगुरु उसके तेज बहाव में बह जायेंगे बिजली होकर चमक डरावा बादल हो गिर जावांगी तो हो मकान की पटरी ऊपर बह के नाद बजावांगी मोहब्बत की ऐसी बिजली चमकाउंगी मेरा यार डर जायेगा अंतर जगत की दहलीज पर बैठकर ऐसा अनहद नाद बजाऊंगी सतगुरु को राजी होकर मुझे अपने गले लगाना ही पड़ेगा।देखें आपने मूरिदी के बेबाक हौंसले यह तीखा जायका है मुरीदि का बुल्लेशाह ने इस काफी से जता दी कि मुरिडी फक़्त मिमियाना नहीं जानती वह दहाड़ भी सकती है क्योंकि उसे यकीन है अपने हुस्न पर अपने ईमान और बंदगी पर अपने इश्क़ की खालिस चमक पर और सबसे बढ़कर अपने रहमान की इंसाफ पसंद सल्तनत पर।