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Sharir Swasthya

चश्‍मा उतारने के लिए


(शरद पूर्णिमा की चांदनी में करे यह प्रयोग)

(परम पूज्य संत श्री आशारामजी महाराज के सत्संग से)

गाय का घी + शहद + त्रिफला (समान मात्रा में) मिश्रण करके शरद पूर्णिमा को चंद्रमा की चांदनी में रात भर रखो…. |

सुबह कांच की बरनी में रखो | दस ग्राम सुबह और दस ग्राम शाम को चालीस दिन तक दिन खाओ…. । मैंने तो साठ दिन खाया, चश्‍मा उतर गया | 

रोगप्रतिकारक शक्ति (Immunity) बढ़ाने हेतु पूज्य बापू जी द्वारा बताये सशक्त उपाय


वातावरण में उपस्थित रोगाणु हमेशा शरीर पर आक्रमण करते रहते हैं । जब शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता कम होती है तब रोग-बीमारियाँ घेर लेते हैं । यदि आप पूज्य बापू जी द्वारा बताये गये निम्नलिखित सशक्त उपाय करें तो आपका शरीर, मन व प्राण बलवान होंगे और आपकी रोगप्रतिकारक शक्ति मजबूत रहेगी ।

1. जो लोग सुबह की शुद्ध हवा में प्राणायाम करते हैं उनमें प्राणबल बढ़ने से रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है और इससे कई रोगकारी जीवाणु मर जाते हैं । जो प्राणायाम के समय एवं उसके अलावा भी गहरे श्वास लेते हैं उनके फेफड़ों के निष्क्रिय पड़े वायुकोशों को प्राणवायु मिलने लगती है और वे सक्रिय हो उठते हैं । फलतः शरीर की कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है तथा रक्त शुद्ध होता है नाड़ियाँ शुद्ध रहती हैं, जिससे मन प्रसन्न रहता है ।

अगर गौ-गोबर के कंडों या अंगारों पर एक चम्मच अर्थात् 8-10 मि.ली. घी की बूँदें डालकर धूप करते हैं तो एक टन शक्तिशाली वायु बनती है । ऐसे  वातावरण में अगर प्राणायाम करें तो कितना फायदा उठाया जा सकता है इसका वर्णन नहीं हो सकता । वायु जितनी बलवान होगी, उतना बुद्धि, मन, स्वास्थ्य बलवान होंगे ।

2. सूर्यकिरणों में अदभुत रोगप्रतिकारक शक्ति है । संसार का कोई वैद्य अथवा कोई मानवी उपचार उतना दिव्य स्वास्थ्य और बुद्धि की दृढ़ता नहीं दे सकता है जितना सुबह की कोमल सूर्य-रश्मियों में छुपे ओज-तेज से मिलता है ।  प्रातःकाल सूर्य को अर्घ्य-दान, सूर्यस्नान (सिर को कपड़े से ढककर 8 मिनट सूर्य की ओर मुख व 10 मिनट पीठ करके बैठना ) और सूर्यनमस्कार करने से शरीर हृष्ट-पुष्ट व बलवान बनता है ।

डॉक्टर सोले कहते हैं- “सूर्य में जितनी रोगनाशक शक्ति है उतनी संसार की किसी अन्य चीज में नहीं है ।”

3. तुलसी के 1-2 पौधे घर में जरूर होने चाहिए । दूसरी दवाएँ कीटाणु नष्ट करती हैं लेकिन तुलसी की हवा तो कीटाणु पैदा ही नहीं होने देती । तुलसी के पौधे का चहुँओर 200 मीटर तक प्रभाव रहता है । जो व्यक्ति तुलसी के 5-7 पत्ते चबाकर सुबह पानी पीता है उसकी स्मरणशक्ति बढ़ती है, ब्रह्मचर्य मजबूत होता है । सैंकड़ों बीमारियाँ दूर करने की शक्ति तुलसी के पत्तों में है । तुलसी के एक चुटकी बीज रात को पानी में भिगोकर सुबह पीने से आप दीर्घजीवी रहेंगे और बहुत सारी बीमारियों को भगाने में आपकी जीवनीशक्ति सक्षम एवं सबल रहेगी ।

4. श्वासोच्छवास की भगवन्नाम जपसहित मानसिक गिनती (बिना  बीच में भूले 54 या 108 तक) या अजपाजप करें ।

5. खुशी जैसी खुराक नहीं, चिंता जैसा मर्ज नहीं । सभी रोगों पर हास्य का औषधि की नाईं उत्तम प्रभाव पड़ता है । हास्य के साथ भगवन्नाम का उच्चारण एवं भगवद्भाव होने से विकार क्षीण होते हैं, चित्त का प्रसाद बढ़ता है एवं  आवश्यक योग्यताओं का विकास होता है । हरिनाम, रामनाम एवं ॐकार के उच्चारण से बहुत सारी बीमारियाँ मिटती हैं और रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है । दिन की शुरुआत में भगवन्नाम-उच्चारण करके सात्त्विक हास्य से (देव-मानव हास्य प्रयोग करने से) आप दिन भर तरोताजा एवं ऊर्जा से भरपूर रहते हैं, प्रसन्नचित्त रहते हैं । हास्य आपका आत्म विश्वास भी बढ़ाता है ।

(रोगप्रतिकारक प्रणाली पर प्रसन्न एवं खिन्न चित्तवृत्ति का प्रभाव देखने हेतु स्टेट युनिवर्सिटी ऑफ न्यूयार्क एट स्टोनी ब्रूक में प्रतिष्ठित प्रोफेसर रह चुके ए. ए. स्टोन ने  परीक्षण किया । उन्होंने पाया कि प्रसन्न चित्तवृत्ति के समय में व्यक्ति की प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया (antibody response) क्षमता अधिक होती है । खिन्न मनोवृत्ति होने पर यह क्षमता कम पायी गयी ।)

6. नीम के पत्ते, फल, फूल, डाली, जड़-इन पाँचों चीजों को देशी घी के साथ मिश्रित करके घर में धूप किया जाय तो रोगी को तत्काल आराम मिलता है, रोगप्रतिकारक शक्तिवर्धक वातावरण सर्जित हो जाता है ।

7. नीम और ग्वारपाठे (घृतकुमारी) की कड़वाहट बहुत सारी बीमारीयों को भगाती है । ग्वारपाठा जीवाणुरोधी (antibiotic) व विषनाशक भी है । यह रोगप्रतिकारक प्रणाली को मजबूत करने में अति उपयोगी है । (नीम अर्क व घृतकुमारी रस (aloe vera juice) का भी उपयोग कर सकते हैं ।)

8. शुद्ध च्वयवप्राश मिले तो उसका एक चम्मच 10 ग्राम अथवा आँवला पाउडर एक चम्मच सेवन करने से पाचनशक्ति की मजबूती और बढ़ोतरी होगी । रोगप्रतिकारक शक्ति भी बढ़ेगी । (मधुमेह वाले शूगर फ्री च्यवनप्राश लें ।)

रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के कुछ अन्य उपाय

1. ध्यान व जप अनेक रोगों में लाभदायी होता है । इससे औषधीय उपचारों की आवश्यकता कम पड़ती है । ध्यान के समय अनेक प्रकार के सुखानुभूतिकारक मस्तिष्क-रसायन आपकी तंत्रिका-कोशिकाओं (neurons) को सराबोर करते हैं । सेरोटोनिन, गाबा, मेलाटोनिन आदि महत्त्वपूर्ण रसायन में बढ़ोतरी हो जाती है । इससे तनाव, अवसाद, अनिद्रा दूर भाग जाते है व मन में आह्लाद, प्रसन्नता आदि सहज में उभरते हैं ।

स्टगर्स विश्वविद्यालय, न्यूजर्सी के शोधकर्ताओं ने पाया कि ध्यान के अभ्यासकों में मेलाटोनिन का स्तर 98 % बढ़ जाता है । किसी-किसी में इसकी 300 % से अधिक की वृद्धि हुई । मेलाटोनिन के कार्य हैं तनाव कम करना, स्वस्थ निद्रा, रोगप्रतिरोधक प्रणाली को सक्रिय करना, कैंसर तथा अन्य शारीरिक-मानसिक रोगों से रक्षा करना ।

2. टमाटर, फूलगोभी, अजवायन व संतरा रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ाते हैं अतः भोजन में इनका उपयोग करें । हल्दी, जीरा, दालचीनी एवं धनिया का उपयोग करें । परिस्थितियों को देखते हुए अल्प मात्रा में लहसुन भी डाल सकते हैं ।

3. 150 मि.ली. दूध में आधा छोटा चम्मच हल्दी डाल के उबालकर दिन में 1-2 बार लें ।

4. रोगप्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने हेतु प्राणदा टेबलेट, ब्रह्म रसायन, होमियो तुलसी गोलियाँ, तुलसी अर्क (100 मि.ली. पानी में 1 से 5 बूँद आयु व प्रकृति अनुसार), होमियो पॉवर केअर आदि का सेवन लाभदायी है । संकलकः धर्मेन्द्र गुप्ता)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल-मई 2020, पृष्ठ संख्या 46,47 अंक 328-329

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संक्रामक बीमारियों से कैसे हो सुरक्षा ?


आयुर्वेद में संक्रामक बीमारियों का वर्णन आगंतुक ज्वर (अर्थात् बाह्य कारणों से उत्पन्न बुखार या रोग) के अंतर्गत आया है । यह किसी को होता है और किसी को नहीं, ऐसा क्यों ?

(चरक संहिता (चिकित्सा स्थानः 3.11.12) में आचार्य पुनर्वसु कहते हैं- “एक ही ज्वररूपी अर्थ को ज्वर, विकार, रोग, व्याधि और आतंक – इन नामबोधक पर्याप्त शब्दों से कहा जाता है । शारीरिक व मानसिक दोषों के प्रकोप के बिना शारीरिक व मानसिक दोषों के प्रकोप के बिना शरीरधारियों को ज्वर (रोग) नहीं होता अतः शारीरिक वात, पित्त, कफ तथा मानसिक रजो-तमोगुणरूप दोष ज्वर के मूल कारण कहे गये हैं ।”

तात्पर्य, यदि शारीरिक व मानसिक दोष विकृत नहीं होंगे तो कोई रोगाणु शरीर में प्रवेश करने पर रोग को उत्पन्न नहीं कर पायेगा, कुछ हलके-फुलके लक्षण दिखा सकता है ।

इसका अर्थ यह नहीं है कि असावधानी बरती जाय । रोगाणु शरीर में प्रवेश ही न करें इसकी सावधानी एवं नियम-पालन तो परम आवश्यक है किंतु साथ ही अनजाने में कोई रोगाणु शरीर में प्रवेश कर ले तो उसे अपना प्रभाव जमाने का मौका न मिले ऐसी सुरक्षात्मक सावधानी रखने के प्रति सजग करने का यहाँ उद्देश्य है ।

दोष विकृति के कारण

1. जठराग्नि की विकृतिः चरक संहिता (चि. स्था. 15.42-44) के अनुसार ‘भूख लगने पर भोजन न करने से, पहले खाया हुआ भोजन नहीं पचने पर भी बिना भूख के भोजन करने से, कभी ज्यादा-कभी कम, कभी समय पर तो कभी असमय भोजन करने से, पचने में भारी, ठंडे, अति रूखे, दूषित व प्रकृति-विपरीत पदार्थों के सेवन से, मल-मूत्रादि के वेगों को रोकने से, देश-काल-ऋतु के विपरीत आहार होने से दूषित हुई जठराग्नि पचने में हलके अन्न को उचितरूप में नहीं पचा पाती । नहीं पचा अन्न विष के समान हानिकर हो जाता है ।’

चरक संहिता (विमान स्थानः 2.9) में आता है कि ‘चिंता, शोक, भय, क्रोध, दुःख, शय्या (दिन में सोना) और देर रात तक (11-12 बजे के बाद) जागरण के कारण मात्रा से भी खाये हुए पथ्य अन्न का ठीक से पाचन नहीं होता है ।’

अतः स्वस्थ रहने की इच्छा वालों को उपरोक्त असावधानियों से बचना चाहिए ।

2. उचित आहार निद्रा और ब्रह्मचर्य का अभावः उचित आहार, उचित निद्रा एवं ब्रह्मचर्य-पालन – ये वात, पित्त और कफ को संतुलित रखते हुए शरीर को स्वस्थ व निरोग बनाये रखते हैं इसीलिए इन तीनों को आयुर्वेद ने शरीर के ‘उपस्तम्भ’ माना है । अतः उत्तम स्वास्थ्य के लिए इन तींनों का ध्यान रखना अनिवार्य है ।

3. हितकारक सेवन, आचार, कर्मों का अभावः मनुस्मृति (1.108) में आता है कि ‘सभी धर्मों (कर्तव्यों कर्मों) में ‘सदाचार’ सर्वोत्तम है ।’ इसका आचरण करने से जीवन सफल होता है व न करने से मनुष्य का विनाश हो जाता है ।

चरक संहिता (सूत्र स्थानः 7.60) में कहा गया हैः ‘इस संसार में और मरने के बाद सुख की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह आहार, आचार और सभी प्रकार की चेष्टाओं में हितकारक वस्तु के सेवन का परम प्रयत्न करे ।’ यहाँ आहार से तात्पर्य केवल स्थूल भोजन से नहीं लें । पाँच इन्द्रियों द्वारा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध – यह जो भी सेवन किया जाता है वह महापुरुषों व शास्त्रों द्वारा ‘आहार’ ही कहा गया है । इन सभी के सेवन में असावधानी रोग-बीमारियों को जन्म देती है ।

रोगाणुजन्य आगंतुक रोगों से बचने एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है कि दोष-विकृति करने वाले कारणों से बचा जाय ।

आगंतुक रोगों की उत्पत्ति रोकने का उपाय

रोगों की उत्पत्ति के बाद उनका उपचार करना, इससे भी अच्छा यह माना गया है कि रोग पैदा ही न हों, इसकी पहले से सावधानी रखी जाय, स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा की जाय – स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं…. (च.सं, सू.स्था. 30.26)

चरक संहिता (सू. स्था. 7.53-54) में आता है ‘प्रज्ञापराधों (बुद्धि की नासमझी से उत्पन्न अपराधों) का त्याग करना, इन्द्रियों का उपशम अर्थात् इन्द्रियों को अपने वश में रखना, स्मरणशक्ति उत्तम रखना, देशज्ञान, कालज्ञान (देश व काल के अनुरूप आहार-विहार का ज्ञान) और आत्मज्ञान का चिंतन करके उनको स्वभाव में आत्मसात् करना और सद्वृत्त (शास्त्र व संत सम्मत सदाचार) का पालन करना – यह आगंतुक रोगों के उत्पन्न न होने देने का मार्ग है । बुद्धिमान व्यक्ति को रोगोत्पत्ति होने से पहले ही ऐसा कार्य करने चाहिए जिनसे अपना हित हो सके ।’

आप्तोपदेश-पालन से लाभ

आप्तपुरुषों (ब्रह्मवेत्ता महापुरुषो) के उपदेशों को विशेषरूप से प्राप्त करना और ठीक प्रकार से उनका पालन करना – ये दो कारण मनुष्यों को रोगों की उत्पत्ति से रक्षा करते हैं और उत्पन्न रोगों को शीघ्र ही शांत करते हैं ।’ (चं.सं. सू.स्थाः 7.55)

हमारे शास्त्रों-महापुरुषों द्वारा बताये गये ऐसे निर्देशों की जिस व्यक्ति, समाज, देश द्वारा जितनी उपेक्षा की जाती है, उसे उसका उतना ही अधिक दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है और इन निर्देशों का जितना आदरपूर्वक पालन किया जाता है उतना ही ऊँचा लाभ उसे होता है ।

रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ायें

चिकित्सा विज्ञान कहता है कि जीवाणु या विषाणु (bacteria or virus) रोग प्रतिकारक शक्ति कम होने पर संक्रमित करते हैं । देशवासी सजग एवं विशेष तत्पर होकर ब्रह्मनिष्ठ संतों एवं सत्शास्त्रों द्वारा बताये गये जीवन को निरोगी, स्वस्थ, रोगप्रतिकारक शक्ति से सम्पन्न बनाने वाले निर्देशों का पालन करें तो बीमारियों एवं महामारियों से रक्षित होने में मदद मिलेगी ।

कैसा हो आहार-विहार ?

महामारियाँ मानव-समाज को बहुत कुछ सीख देती जा रही हैं, जैसेः-

1. व्यक्तिगत व सामाजिक स्वच्छता ।

2. कार्य के समय दूरी बनाये रखते हुए अपने स्वास्थ्य एवं आभा की रक्षा करना ।

3. दूसरों से हाथ न मिलाना एवं प्राणियों के स्पर्श व श्वासोच्छवास से बचना ।

4. अंडा, मांसाहार एवं व्यसनों से दूर रहकर शुद्ध, सात्त्विक, शाकाहारी आहार लेना ।

5. बिगड़ी हुई दिनचर्या को सुधारना ।

स्वास्थ्य रक्षा हेतु इनका भी ध्यान रखें-

1. पीने के लिए उबालकर ठंडे किये पानी का उपयोग करें ।

2. यदि उपलब्ध एवं अनुकूल हों तो सुबह तुलसी व नीम के पत्ते लें । (अथवा तुलसी अर्क व नीम अर्क पानी मिला के ले सकते हैं ।)

3. फ्रिज में रखी चीजों का सेवन जठराग्नि मंद करने के साथ अन्य हानियाँ भी करता है ।

4. बाजारू खान-पान से बचें ।

5. प्राणायाम, योगासन, सूर्यनमस्कार आदि यथाशक्ति करें ।

6. गुनगुने पानी में थोड़ी हल्दी व सेंधा नमक डाल के रोज 1-2 बार गरारे कर सकते हैं ।

करें रोगाणुरहित वातावरण निर्माण

घर में नित्य कपूर जलाने से  वातावरण के रोगाणु नष्ट होते हैं तथा शरीर पर बीमारियों का आक्रमण आसानी से नहीं होता ।

अथर्ववेद (कांड 19, सूक्त 38, मंत्र 1) में आता है कि ‘जिस मनुष्य के आसपास औषधिरूप गूगल की श्रेष्ठ सुगंध व्याप्त रहती है, उसे कोई रोग पीड़ित नहीं करता ।’ पूज्य बापू जी के सत्संग में आता है कि “जैसे बिल्ली को देखकर चूहे और शेर को देख के जंगली पशु भाग जाते हैं, ऐसे ही गूगल का धूप जहाँ होता है वहाँ से रोग के कीटाणु भाग जाते हैं । गोबर के कंडों (या गौ-चंदन धूपबत्ती के टुकड़ों) पर घी की बूँदें, चावल, कपूर, गूगल आदि धप सामग्री डालकर धुआँ करें या नीम के पत्तों का भी धुआँ कर सकते हैं ।

थोड़ा गोमूत्र पानी में डालकर घर में पोंछा आदि लगाया जाय । केमिकल वाला फिनायल तो रोगाणुओं को मारता है, पवित्रता नहीं लाता परंतु गोमूत्र तो रोगाणुरहति करते हुए पवित्रता भी लाता है । “(गोमूत्र से निर्मित पवित्रता लाने वाले गौ शुद्धि सुगंध (फिनायल) का भी उपयोग कर सकते हैं ।)”

डर नहीं, सावधानी है जरूरी

डर से तनाव बढ़ता है और तनाव से रोगप्रतिरोधक शक्ति का ह्रास होता है । अत) महामारी से भयभीत होने के बजाय इससे संबंधित सावधानियों और उपचार  सजग रहें । विश्व के लिए विषम काल में जनता तक सही, शास्त्रीय जनाकारी पहुँचाने वालों को साधुवाद है और भ्रामक बातें फैलाने वालों से सावधान रहना जरूरी है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल-मई 2020, पृष्ठ संख्या 8-10 अंक 328-329

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