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Tatva Gyan

आओ विचार करें कि ईश्वर कैसा है !


यह परमात्मा क्या है ? ज्ञान के सिवाय और कुछ की कल्पना छोड़ दो, बिल्कुल साक्षात् अपरोक्ष है । ज्ञान के सिवाय बाहर कोई विषय है या भीतर विषय है, यह कल्पना छोड़ दो । बाहर भीतर तो कल्पित है ज्ञान में । ज्ञान में बाहर-भीतर की एक आकृति समायी हुई है, वह तो ज्ञान में फुरनामात्र है ।

अब देखो बाहर क्या हो और भीतर क्या हो, भीतर समाधि लगे और बाहर ब्याह हो, इस कल्पना को छोड़कर जो ज्ञान है वह परमात्मा का स्वरूप है । और कल यह हो गया और आगे यह होने वाला है – इस कल्पना को छोड़ दो तो ज्ञान है । यह शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध है – इस कल्पना को छोड़ दो तो ज्ञान है । यह आँख, कान, नाक, जीभ है – इस कल्पना को छोड़ दो तो ज्ञान है । यह संकल्प है यह विकल्प है, यह निश्चय है, यह अहंक्रिया है – अंतःकरण की इन वृत्तियों को छोड़ दो तो ज्ञान है । यह अपवाद की प्रक्रिया है । विक्षेप और समाधि को छोड़ दो तो ज्ञानम् है । संतोष-असंतोष को छोड़ दो ज्ञानम् है । ज्ञान में ज्ञान का विषय कुछ न हो और ज्ञान में ज्ञातापने का अभिमानी कोई न हो । और विषय में देश-काल-वस्तु सब, देश में दूर और निकट, बाहर और अंतर – यह भेद मत करो और काल में भूत-भविष्य-वर्तमान का भेद मत करो और अपने में ज्ञाता-ज्ञेय का भेद मत करो । ये सब ज्ञान के विलास हैं, ज्ञान से ही सिद्ध होते हैं । ज्ञान में ही स्थित हैं, ज्ञान में ही लीन होते हैं और ज्ञानस्वरूप तुम हो । देखो, यह तो बिल्कुल हाजरा-हुजूर है । यह भगवान कैसा ? बोले हाजरा-हुजूर । यह तो बिल्कुल हाजिर-नाजिर है माने साक्षात् अपरोक्ष है । नाजिर माने ‘साक्षात्’ । ईश्वर कैसा ? बोले हाजिर-नाजिर । ज्ञानम्

आप इसको फिर-फिर विचार करें । आप एक चित्र देख रहे हैं, जिसमें भगवान कृष्ण अर्जुन के रथ पर बैठ के घोड़ों का संचालन कर रहे हैं । यह रूप है, यह दृश्य है । इसका प्रतिबिम्ब जब आँख में पड़ता है, तब वह दिखाई पड़ता है ।

रूपं दृश्यं लोचनं दृक्…

चित्र दृश्य और आँख ज्ञान है । और आँख दृश्य है, मन ज्ञान है । मन दृश्य है, मैं ज्ञान हूँ । और देश-काल-वस्तु का जो भेद या द्वैत भासता है, वह मन में भासता है कारण कि सुषुप्ति (प्रगाढ़ नींद) की अवस्था में मन शांत हो जाता है तो वह द्वैत नहीं भासता । तो अद्वय, अमिट, शुद्ध, सच्चा ज्ञान कौन हुआ ? कि मैं । तो मैं से ही मन, इन्द्रिय और विषय की सिद्धि है और मैं के रहते ही इनका प्रलय है । यह अशुद्ध अद्वय ज्ञान है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2021, पृष्ठ संख्या 5 अंक 337

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परिप्रश्नेन….


साधकः गुरुदेव ! मन को मारना चाहिए या मन से दोस्ती करनी चाहिए ?

पूज्य बापू जीः मन से दोस्ती करेंगे तो ले जायेगा पिक्चर में, ले जायेगा ललना के पास, कहीं भी ले जायेगा मन तो । मन को मारोगे तो और उद्दंड होगा । मन से दोस्ती भी न करो, मन को मारो भी नहीं, मन को मन जानो और अपने को उसका साक्षी मानो । ठीक है ?

साधकः कितना भी प्रयत्न करने पर सुख आने पर उसमें सुखी हो जाते हैं और जब दुःख आता है तो प्रयत्न करने पर भी उसमें दुःखी हो जाते हैं । इससे कैसे बचें ?

पूज्य श्रीः प्रयत्न करने पर भी सुख का प्रभाव पड़ता है, दुःख का प्रभाव पडता है और परमात्मा में विश्रांति नहीं मिलेगी । आईना हिलता रहेगा तो चेहरा ठीक से नहीं दिखेगा । तो जब भी प्रभाव पड़ता है तब वह जानते हैं न अपन ? ‘सुखद अवस्था आयी, यह प्रभाव पड़ रहा है । प्रभाव पड़ रहा है मन, चित्त पर । उसको जानने वाला मैं कौन ?’ यह प्रश्न ला के खड़ा कर दो । दुःख का प्रभाव पड़ता है… गुस्सा आया… तो गुस्सा आया उसको मैं जान रहा हूँ ऐसा सजग रहकर फिर मैं गुस्सा करूँ तो मेरे नियंत्रण में रहेगा । सुख का प्रभाव न पड़े…. सुखी तो हम भी होते दिखते हैं और अभी (चालू सत्संग) में कोई उठ के खड़ा हो जाय तो ‘ऐ ! बैठ जा ।’ ऐसा डाँटकर बोलूँगा । तो दुःखी तो हम भी दिखेंगे लेकिन हम दुःख और सुख – दोनों को जानते हुए सब करते हैं ।

जैसा बाप ऐसा बेटा, जैसा गुरु ऐसा चेला । हमने जैसे युक्ति से पा लिया, अभ्यास कर लिया ऐसे तुम भी अभ्यास करो । यह एक दिन का काम नहीं है – सतर्क रहें, सावधान रहें । सुख में भी सावधान रहें, दुःख में भी सावधान रहें । तो सावधानी, सजगता – एक बड़ी महासाधना होती है ।

साधिकाः हम सभी साधक अनेक व्यक्तियों से मिलते हैं, अनेक परिस्थितियों से, अनेक व्यवहारों से गुजरते हैं । सबकी तरफ से हमें कुछ भी मिले लेकिन हमारी आंतरिक स्थिति मजबूत हो, हम उद्विग्न न हों, हमरे चित्त की रक्षा हो – ऐसा कैसे हो ? कभी-कभी हम फिसल जाते हैं इसमें ।

पूज्य बापू जीः ‘हम फिसले नहीं’ यह भाव बहुत तुच्छ है । फिसलें नहीं तो अच्छा है लेकिन फिसल गये तो फिर उठें । फिसलते-फिसलते भी जो उठने का यत्न करता है वह उठकर अच्छी तरह से पहुँच भी जाता है । फिसलने के डर से चले ही नहीं अथवा फिसले तो फिसल के पड़ा ही रहे, नहीं । फिसलाहट है तो उठ  के भी फिर गिरना हुआ तो पड़े रहे, नहीं । फिसले नहीं तो अच्छा है लेकिन फिसले तब भी ‘हम नहीं फिसलते हैं, मन फिसला है……ॐॐॐ इन्द्रियाँ फिसली हैं, अभी सावधान रहेंगे, मन को बचायेंगे ।’ – इस प्रकार विचार करे । अपने को फिसला हुआ मानने से फिर बल मर जाता है । इन्द्रियाँ, मन फिसलते हैं, उनको फिर उठाओ । ठीक है ?

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2021, पृष्ठ संख्या 34, अंक 337

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नारी और नर में एकत्व


प्रश्नः महात्माओं की दृष्टि में नारी क्या है ?

स्वामी अखंडानंद जीः जो नर है । अभिप्राय यह है कि महात्माओं की दृष्टि में नारी और नर का भेद नहीं होता । जो ज्ञानमार्ग द्वारा सिद्ध हैं उनकी दृष्टि में ब्रह्म के सिवा और सब नाम-रूप-क्रियात्मक प्रपंच मिथ्या है अर्थात् केव ब्रह्म ही, प्रत्यगात्मा (अंतरात्मा) ही एक तत्त्व है । श्रीमद्भागवत (1.4.5) में एक संकेत है । स्नान करते समय अवधूत शुकदेव जी को देख के देवियों ने वस्त्र धारण नहीं किया, व्यास जी के आते ही दौड़ के धारण कर लिया । यह आश्चर्यचर्या देख व्यास जी ने पूछाः “ऐसा क्यों ?” देवियों ने उत्तर दियाः “आपकी दृष्टि में स्त्री  पुरुष का भेद बना हुआ है परंतु आपके पुत्र की एकांत और निर्मल दृष्टि में वह नहीं है । तवास्ति स्त्रीपुम्भिदा न तु सुतस्य विविक्तदृष्टेः ।।

जो भक्तिमार्ग द्वारा सिद्ध हैं उनकी दृष्टि में प्रभु के सिवा और कुछ नहीं है । वे श्रुति भगवती के शब्दों में कहते रहते हैं- त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी । ‘तुम स्त्री हो, तुम पुरुष हो, तुम कुमार हो या कुमारी हो ।’ (अथर्ववेदः कांड 10, सूक्त 7, मंत्र 27)

महात्माओं की दृष्टि में नारी और नर का साम्य नहीं – एकत्व है, नारी-नर का ही नहीं, सम्पूर्ण ।

प्रश्नः क्या नारी को प्रकृति और नर को पुरुष समझना उचित है ?

उत्तरः नितांत अनुचित । जीव चाहे नर के शरीर में हो अथवा नारी के, वह चेतन पुरुष ही है । शरीर नारी का हो अथवा नर का, वह प्रकृति ही है । इसलिए नारी को प्रकृति मानकर जो उसे भोग्य समझते हैं उनकी दृष्टि अविवेकपूर्ण है । भगवान श्रीकृष्ण ने शरीर को क्षेत्र और जीव को क्षेत्रज्ञ – चेतन कहा है, भले ही वह किसी भी योनि में हो । (क्रमशः)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2021, पृष्ठ संख्या 21, अंक 337

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