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Tatva Gyan

सतशिष्य के लक्षण


जो सतशिष्य है वह मान और मत्सर से रहित अपने कार्य में दक्ष,ममता रहित , गुरू में दृढ़ प्रीतिवाला, निश्चल चित्त और परमार्थ का जिज्ञासु, ईर्ष्या से रहित और सत्यवादी होता है। इस प्रकार के नौ सद्गुणों से सुसज्जित जो होता है वो सतशिष्य सद्गुरु के थोड़े उपदेश मात्र से साक्षात्कार करके जीवनमुक्त पद में आरुढ़ हो जाता है।
गुरू के लक्षण बताए शास्त्रों में.. जो प्राणीमात्र का हित चाहता हो , ‘सर्वभूत हितेरता’  जिसकी बुद्धि हो,जो अपने स्वरूप में जगा हो, जिसको जगत मिथ्या भासता हो , स्वप्नतुल्य लगता हो अथवा त्रिकाल में जगत की उत्पत्ति ही न दिखती हो, इस प्रकार की जिनकी दृढ़ अनुभूति है, जो अपनी वृत्तियों से और अपने स्वरूप में ही जगे है ..इस प्रकार के कई ज्ञानवान महापुरुषों के लक्षण कहे गए है। उनमें मुख्य लक्षण ये है कि जिनके चरणों में बैठने से हमारे चित्त में शांति आती हो , वो बढिया से बढिया ज्ञानियों का लक्षण है।
ज्ञानवान के चरणों में बैठने से शांति का एहसास होता हो तो ये बढिया से बढिया उनका लक्षण है।कुछ ऐसे लक्षण होते है स्व संवेद्य और कुछ पर संवेद्य होते है। यज्ञ करना, तप करना, तीर्थ करना, कीर्तन करना, होम करना, हवन करना ये ‘स्व’ – करनेवाले को भी पता होता है और दूसरे लोग भी देखते है। ये पर संवेद्य भी है। लेकिन आत्मज्ञान पर संवेद्य नहीं वो स्व संवेद्य है। वो दूसरों को नहीं दिखेगा। आत्मज्ञान तुम्हें हो जाए तो तुम्हारे ज्ञान का अनुभव दूसरों को नहीं दिखेगा। दूसरों को तुम्हारा बाह्य व्यवहार दिखेगा लेकिन तुम अपने स्वरूप में जगे हो वो तो तुम्हें ही अनुभव होगा! इसलिए ज्ञान का अनुभव स्वसंवेद्य है।


फिर भी शास्त्रकारों ने बड़ा साहस किया । स्वसंवेद्य अनुभव होते हुए भी साधक को कैसे पता चले ? जिनके नजरों में, जिनके वातावरण में आनेसे शांति आती हो..क्योंकि ज्ञानी की परम शांति का अनुभव ज्ञानी का स्वसंवेद्य अनुभव होता है। वो क्रिया कलाप व्यवहार करते हुए भी अपने ह्रदय में परम शांत अवस्था का अनुभव करता है। और परम् शांत अवस्था से बढ़कर व  शांति के अनुभव से बढ़कर और कोई जगत में श्रेष्ठ अनुभव नहीं माना गया। देवी- देवताओं का दर्शन या रिद्धि सिद्धियों की उपलब्धि  उसका बुद्धिमानों ने इतना महत्व नहीं गिना जितना शांति का महत्व है। और वह शांति आत्मज्ञान से होती है- लब्धवा ज्ञानं परां शान्तिम…श्रीकृष्ण ने देखा कि अर्जुन रथ तो लेकर आया है युद्ध करने के लिए और अब पलायनवादी की बात कर रहा है कि ‘मैं सन्यासी हो जाऊँगा, भिक्षा माँगकर खाऊँगा, इन स्व हृदयों को, मित्रों को कैसे मारूं? पृथ्वी का राज्य मुझे नहीं चाहिए, मैं साधु हो जाऊँगा।’… तो अंदर में तो भोग की वासना है, इर्ष्‍या है, लालच है और अब बाहर से पलायनवाद करता हैं। इसलिए अर्जुन जाएगा तो भी ठीकसे संन्यासी के धर्म  को नहीं निभा सकेगा । इसलिए भगवान ने उनको निष्काम कर्म मार्ग का उपदेश दिया, योग का उपदेश दिया और अगर तू उसमें नहीं आ सकता तो सब कर्म मुझे अर्पण करके तू साक्षी मात्र होकर चलता रहे ! ऐसा करके श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपने स्वभाव में, अपने आत्म स्वभाव में जगाया। ‘मैं क्षत्रिय हूँ’ उस स्वभाव को त्यागने का उपदेश दिया।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।

‘मैं क्षत्रिय हूँ’, मेरा ये कर्तव्य है, मेरा वो कर्तव्य है, ये सबकुछ छोड़कर तू मेरी शरण आ जा । ‘मेरी शरण आ जा’ माना ये सारे भाव जहाँ से उठते है उस भाव के आधार में तू आ जा तो तुझे बोध हो जाएगा, फिर तुझे कर्म बाँध नहीं सकेंगे।

तो बोध होने के लिए ब्रह्मवेत्ता का सानिध्य नितांत जरूरी है। लेकिन ब्रह्मवेत्ता का सानिध्य मिले, हममें बोध पाने के यह नौ गुण न हो तो ब्रह्मवेत्ता के सानिध्य से छोटा-मोटा ऐहिक लाभ होगा लेकिन आत्मसाक्षात्कार के लाभ से हम वंचित हो जाएँगे । तो आत्मसाक्षात्कार का लाभ हो इसलिए आज के इस श्लोक को हम अच्छी तरह से समझेंगे कि जो सतशिष्य है मान और मत्सर से रहित होता है। जैसे धनवान के पीछे कोई गठिये पड़े तो धनवान कैसे संभल जाता है  अथवा धनवान के पीछे  इनकम टैक्स की इन्क्वायरी निकले तो वो कैसा अपना सेटिंग कर लेता है …जय रामजी की…ऐसे ही जिसमें सद्गुण है उसकी वाहवाह होने लगती है तो वाहवाह की जगह से अपने को बचाकर निर्मान की जगह पर जाता है। और यही कारण था कि राजे महाराजे जब गुरुओं के द्वार पर जाते थे तो भिक्षा पात्र लेकर मधुकरी करने जाते। राजा बनके गुरूजी को एक महल में  रखकर ब्रह्मविद्या ले सकते थे लेकिन वो ब्रह्मविद्या पचती नहीं।

‘मैं राजा हूँ ‘  और  ‘मैं राजगुरू हूँ ‘ …उनको भी  ‘मैं राजगुरू हूँ ‘ और उनको भी लगे ‘मैं राजा हूँ ‘ …तो वो पंडित हो सकते है लेकिन ब्रह्मवेत्ता नहीं।

उपनिषदों के ज्ञान में जो महापुरुष सन्यासियों को पढ़ाने का संकल्प करते थे तो फिर उनको कणाद आदि मुनि‍ की कथा सुना देते थे।

कणाद मुनि‍ हो गए दर्शन शास्त्र के अच्छे विचारक। वे एकांत अरण्य में रहते थे और अपनी आजीविका खेतों में जो कण गिर जाते थे उसको चुन कर उसीसे गुजारा करते थे और छठा भाग राज्य को कर में दे देते थे । उनकी बुद्धि इतनी शुद्ध थी कि तत्वज्ञान का, उपनिषदों का दर्शन शास्त्र के जो उनके विचार थे उन विचारों को पढ़कर दूर दूर से अच्छे अच्छे विद्वान संत उनका दर्शन करने आते थे। आखिर राजा को पता चला कि कणाद मुनि इतने पवित्र है कि उनके जो दर्शन शास्त्र के सिद्धांत और अनुभव के वचन है उनसे बड़े अच्छे अच्छे बुद्धिमान लोग आकर्षित होकर आ रहे है। जाँच करो वो क्या खाते है, कैसे रहते है ? मेरे राज्य में रहते है और मैंने उस साधू पुरूष का दर्शन नहीं किया, उनकी सेवा नहीं की।

पता चला कि वो मुनि तो कण ढूँढ के खाते है। वे शर्मिंदा हुए, पश्चाताप से भर गए। गये मुनीश्वर की कुटिया पर और अपना ताज-वाज उतारकर लंबे दंडवत प्रणाम किये कि ‘हे मुनीश्वर ! मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ। आप मेरे राज्य के अरण्य में रहते है और राजा का फर्ज है कि साधु , ब्राह्मण, अपंग आदि उन लोगों की संभाल रखें और आप जैसे महान विद्वानों की मैंने सेवा नहीं की और आपको कण ढूँढकर गुजारा करना पड़ा। मैंने आपकी सेवा नहीं की, मैंने खबर तक नहीं ली आपकी, इसलिए मैं बड़ा शर्मिंदा हूँ । आप मुझे क्षमा करें, अभयदान दें । मुझ अभागे का नाम फ़लाना-फ़लाना है और मैं यहाँ इस नगर की व्यवस्था करता हूँ, मुझे राजा कहते है लोग… मैं राजा हूँ, ऐसा नहीं कहा.. मुझे लोग राजा कहते है ।

बोले- ‘ठीक है, सुखी भव,निर्भय रहो।’


बोले- ‘महाराज! अब इस दास की प्रार्थना स्वीकार करो कि आप ये कुटिया-वुटिया छोड़ो। आप चलो मेरे महल में । आपको महल का एक खंड पूरे का पूरा अर्पण कर देता हूँ । सेवक होंगे, नौकर होंगे, दास होंगे, दासियाँ होंगी। कोई पैर चंपी करेगा तो कोई बादाम का रोगन घिसेगा ताकि आप ठीक-से बुद्धिमत्ता का और कोई तत्व-चिंतन कर सकें  और खाने-पीने के लिए केसर-कस्तुरी, पिस्ता-बादाम डले हुए , बासुंदी, खीर होगी। महाराज ! आपकी पूरी सेवा होगी ताकि आप पूरा तत्व-चिंतन करके और बढ़िया दर्शन, शास्त्र लिख सकें ।’


महाराज ने कहा- सीधा चला जा और मुड़कर दुबारा इधर मत आना ! जय रामजी की!
कणाद मुनि ने कहा दुबारा नहीं आना । अगर तेरे महल में रहूँगा तो राज्य का अन्न कैसा होता है? उस राज्य के अन्न को खाकर मैं तत्व-चिंतन करूँगा कि तेरी सेवा लेकर तेरे गुण-गान लिखूंगा? जैसा अन्न होता है वैसा मन हो जाता है ।

तो उपनिषदों का ज्ञान उस वक्त प्रचलित था जो लोग अपनी बुद्धि को दूषित होने से बचाते थे। परिश्रम सहकर, परिश्रम करके जीवन को सुदृढ़ करते थे और बुद्धि का विकास करते थे। शारीरिक और मानसिक जब विकास था ठीक-से, उस समय उपनिषदों का प्रचार-प्रसार हुआ होगा।

चीन में आज से तीन हजार वर्ष पहले कंफ्यूशियस जा रहे थे । एकाएक वो चकित हुए कि एक किसान अपने बेटे के साथ कुएँ में से पानी खींच रहे है। खेत को पिला रहे है। चमड़े के कोट को खींच रहे हैं । कंफ्यूशियस को हुआ कि इन बेचारों को अभी तक पता नहीं चला कि बैल की खोज हुई है, बैल के द्वारा कुएँ में से पानी खींचा जाता है। इतना मैन पावर खर्च रहे है! जहाँ बैल पॉवर की जरूरत है या मोटर की । एक-दो हार्सपावर मोटर की जरूरत है वहाँ मैन पॉवर बेचारे बिगाड़ रहे है! मैन पॉवर की रक्षा करने को इनको सीखाऊँ, जरा उपदेश दूँ । जय श्रीकृष्ण!


कंफ्यूशियस रूके और उस बूढ़े के कंधे पर हाथ रखके कहा -‘हे किसान! तुम्हें पता है?
बैल की खोज हुई है, बैल के द्वारा कुँए में से निकाला जाता है और खेत में  सींचा जाता है ।

बूढ़े ने कहा चुप रहो मेरा लड़का सुन लेगा। बाद में बात करते हैं ।

अकेले में जाकर कंफ्यूशियस से उसने बात की । मुझे पता  है, बैल के द्वारा कुएँ में से पानी खींचा जाता है लेकिन मैं क्यों खींच रहा हूँ अपने बेटे के साथ? कि वो स्वावलम्बी हो और कुछ शरीर से  परिश्रम होगा । परिश्रम होगा तब उसका मन खिलेगा, बुद्धि का विकास होगा । जो शरीर से परिश्रम नहीं करते है, मैनपावर बचा-बचाकर शरीर को लाड़ लड़ाते है वे बेचारे थोड़ी तितिक्षा नहीं सह सकेंगे। तो आप कृपा करके आपका उपदेश और किसी जगह पर आजमाना, मेरा लड़का कहीं आलसी न हो जाए। जय..जय…

मि. सोलन से पूछा गया कि आप इतने बुद्धिमान और इतना उच्च, भारी उपदेश देते है और शरीर का बाँधा भी बढ़ि‍या है, क्या कारण है? जहाँ बुद्धि-अकल होती है वहाँ शरीर लथड़ा हुआ होता है और जहां शरीर पाड़े जैसा होता है वहां उपला मात्र नहीं होता लेकिन आपका शरीर का बाँधा भी बढ़िया है और बुद्धि का भी विकास इतना है। इसका कारण क्या है ?

सोलन ने कहा कि कुछ न कुछ परिश्रम मैं खोज लेता हुँ इसलिए शरीर का बाँधा मजबूत है। और मैं संसार मे विद्यार्थी होकर रहता हूँ, कुछ-न-कुछ नया विचारता रहता हूँ, खोजता रहता हूँ । इसलिए बुद्धि‍ का भी विकास है।

तो बुद्धि‍ का विकास और शरीर का बाँधा मजबूत, ऐसा जो जमाना था उस जमाने में उपनिषदों का ज्ञान का प्रचार-प्रसार अच्छी तरह से हुआ । आज क्या है कि अंदर में वासना है 20 वीं सदी की, और ज्ञान लेना चाहते है, ईसवी सन पूर्व, तीन हजार वर्ष पहले का! इसलिए क्या होता है कि ज्ञान का ओढ़ना ओढ़कर, भक्ति का, कथाकार का ओढ़ना ओढ़कर काम वही करते है जो 20 वी सदी के लोग करते है, जेबकतरे लोग । जय श्री कृष्‍ण…  

तो बुद्धि को शुद्ध करे और बुद्धि किन साधनों से शुद्ध होती है? कि अमानित्व ! मान की इच्छा से आदमी कुछ का कुछ करने लगता है । मान की इच्छा ही छोड़ दो तो तमाम प्रपंच से आदमी बच जाता है । अदंभित्व, इर्ष्या का अभाव, मत्सर का अभाव,  ये अगर सदगुण आने लग जाते हैं तो आदमी तमाम-तमाम दोषों से बच जाता है और तमाम तमाम व्यर्थ के परिश्रमों से बच जाता है तो उसका तन और मन जो है आत्म विश्रांति के काबिल होता है।

हम सँवित मात्र है


वामन- विष्णु, जीव-शिव, परिछिन्न-व्यापक, कार्य-कारण

रुई कारण है और धागा कार्य है लेकिन कपड़े को देखो तो कपड़ा कार्य है और धागा कारण है । ठीक है न? धागा निकाल दो तो कपड़ा नहीं रहेगा । कार्य को पकड़ो तो कारण समझ में आ जायेगा और कारण को पकड़ो तो कार्य की पोल खुल जायेगी ।

कारण को पकड़ा तो कार्य उसकी सत्ता के बिना नहीं है । धागे को समझ गए तो कपड़ा उसकी सत्ता के बिना नहीं है । तो ये शरीर कार्य है और उसका मूल कारण वामन-विभु… और शरीर को पकड़ते-पकड़ते गये तो भी वही दिखेगा ।

आँख किससे देखती है? कान किससे सुनते है? मन किससे सोचता है? तो भी कारण में पहुँच जायेगा और कारण को पकड़ा तो कार्य का पता चल जायेगा ।

तो कार्य है खेल-लीला और कारण है सार । कारण है आत्मा…  जहाँ से  ‘मैं-मैं’ फुरता है लेकिन फिर गंदगी भर देते है.. ‘मैं सेठ हूँ, मैं दुःखी हूँ , मैं सुखी हूँ… गंदगी भर दी । सुखी-दुःखी मन होता है । लोभ की अधिकता से, प्रेम धन में होता है तो लोभी बनता है, शरीर में होता है तो अहंकारी बनता है, परिवार में होता है तो मोही बनता है, चिंता में होता है तो चिंतित होता है, रिश्ते-नाते-दोस्त में होता है तो मित्र-शत्रु बनता है लेकिन वो प्रेम मूल में जाये तो परमात्मा ही है । कितना सरल ज्ञान, कितना ऊँचा ज्ञान! ये पहली बार सुन रहे हो तुम लोग ।


कुछ लोग मंदिरों में, कुछ लोग तीर्थों में, कुछ लोग समाज को बदलने में, कुछ सुधारने में… अरे भाई! मूल में आओ न ! बाद में सब करना ! बेटे के विवाह-शादी के चक्कर में पड़े हैं कोई, कोई बहू लाने के चक्कर में तो कोई बेटा लाने के चक्कर में, कोई दुश्मन को ठीक करने के चक्‍कर में, कोई समाज को सुधारने के चक्कर में । वे चक्कर खाते ही रह जाते है । पहला काम यही है, उस वामन-विभु को पाओ ! जिससे सब होता है, जो सबमें बैठा है, जो सभी रूप में है।

मैं ये व्यक्ति हूँ, फलाना… ये भी बँधन है । ये मेरा समाज है, समाज को ठीक करूँ… ये भी फँसते है । जाति को ठीक करूँ, भूतकाल ऐसा था, भविष्य ऐसा बनाऊँ, संस्कृति का निर्माण करूँ, अपनी पार्टी को ऊँचा ले जाऊँ… सारी पार्टियाँ जिससे होती है उधर आजा न! हे हरि……

तू सोने की लंका भी बना लेगा न, तो भी रोना पड़ेगा ! दुःखी होकर जाना पड़ेगा । रावण का इतिहास देख ले । ये सुधार कर लेंगे, ये प्रगति कर लेंगे… नेताओं को तो… अपना उल्लू सीधा करने के लिए पब्लिक को उल्लू बनाते रहेंगे लेकिन सयाने आदमी समझ जाते है कि क्या कर लेगा नेता… ये कर देगा… वो कर देगा… अरे ! बिजली का बिल भी कम नहीं कर सकता,  हाऊस टैक्स भी माफ नहीं कर सकता तो सोने का हाऊस कहाँ-से बना के देगा? और
सोने का हाऊस बनाने के बाद भी रावण की प्रजा दुःखी थी तो तुम कौन-से सुखी हो जाओगे? ऐसा प्राइम मिनिस्टर आ जाये कि सबको सोने का घर दे देवे… हालाँकि संभव ही नहीं है फिर भी उस व्यापक विभु को जाने बिना दुःख का अंत नहीं होता और उसको जान लिया तो मौज हो गई । शबरी भीलण के पास सोने की लंका नहीं थी, मतँग गुरू के चरणों में सत्संग सुना… रामजी उसके जूठे बेर खा रहे हैं और सोने की लंका वालों को तीरों का निशाना बनाकर भेज दिया । इतनी समझ हो तो बस… सत्संग में आदमी सब छोड़कर लग जावें ।

तो ‘व्यक्तित्व’ का बँधन, ‘समाज’ का बँधन, ये ‘बनने’ का बँधन, ‘मिटाने’ का बँधन… ये सारे बंधन… कोई बोले फलाना धर्म श्रेष्ठ है, कोई बोले फलाना मजहब श्रेष्ठ है… उनको करने दो दिमाग की कसरत, तुम तो आ जाओ अपने दिलबर में बस!

तो वो क्या है? …सँवित मात्र है ।  पंचदशी ग्रँथ है, उसमें आरम्भ में उसका वर्णन किया है… परमात्मा क्या है? …सँवित मात्र । जहाँ से फुरना होता है, विचार उठते हैं । फिर जैसा गुण, जैसा रंग । उठ-उठ के बदल जाते है फिर भी ज्यों-का-त्यों है वो, सँवित-मात्र आत्मा है । वास्तव में हम वो ही है सँवित लेकिन मान बैठे हैं अपने को शरीर । सँवित का संबंध टूटे तो शरीर को जलाने ले जाएँगे, दफनाने ले जाएँगे! और सँवित फिर दूसरे शरीर में आयेगा या स्वर्ग में जायेगा… ॐ… ॐ… ॐ… । समय की धारा में तो सब बड़े-बड़े पीर-पैगम्बर भी आ-आकर चले जाते है फिर भी सदा रहता है वो ही सँवित-चैतन्य ।

मूसा के समय ईसा नहीं थे, ईसा के समय मोहम्‍मद कहाँ थे? बुद्ध के समय ईसा-मूसा दोनों नहीं थे और महावीर के समय बुद्ध नहीं थे लेकिन वो सँवित चलानेवाला तो सदा था, सभी में था, है, रहेगा।

जब सतयुग का आदि था तो उपदेशक भगवान ब्रम्हाजी थे आचार्य । कल्प के 
आदि में भगवान विष्णु आचार्य बन गये और महाप्रलय के समय भगवान शँकर जगद्गुरू बने थे लेकिन अभी उन पोस्टों (पदों) पर नहीं है लेकिन ‘ये’ पोस्ट (पद) वाला तो सभी में अभी भी है । जो बड़े प्रचारक बुद्ध, शँकर आदि हुए, उनकी आकृतियाँ भी नहीं है लेकिन उनको प्रेरणा देनेवाला, चलानेवाला अभी भी सबके हृदय में है ।

ऋषिकेश में चँद्रभागा नदी बहती है, चँद्रभागा गँगा में मिलती है । चँद्रभागा के तट पर एक महात्मा की कुटिया थी । अखण्डानन्द मिलने गये, प्रणाम किया, श्रद्धा से बैठे ।

बोले – ‘महाराज! मैं जीवात्मा हूँ।’

…अरे!, बोले- जीवात्‍मा हूँ – ये सुनकर मानता है, जीवात्मा हूँ -ये भाव जहाँ से आते है उसके मूल में देखो, कौन है? मैं बनिया हूँ, मैं फलाना हूँ , मैं साधु हूँ… अरे! सब विष्णुस्वरूप हो, सँवित हो! आनंद रूप हो, ज्ञानस्वरूप हो, चैतन्यरूप हो ।

बोले- ‘महाराज! मैं नहीं जानता हूँ ।’

बोले- ‘नहीं जानने के भी साक्षी हो, नहीं जानने को भी तो जान रहे हो, ऐसे चैतन्य हो । अंतःकरण की शुद्धि हो जाती है, कर्मों की शुद्धि, भावों की शुद्धि, ज्ञान की परम शुद्धि… ऐसा ज्ञान है । ॐ ॐ प्रभुजी ॐ… प्यारेजी ॐ… अंतर्मात्‍मा ॐ… ये आधारशिला है, जप करते-करते रात को सो जाये तो फिर नींद में भी जप होने लगता है ।

रात के दो बजे थे, चारों तरफ सन्नाटा था और ध्वनि सुनाई पड़ी । देखा, ध्वनि कहाँ से आ रही है? धीरे-धीरे देखा कि महाराज के शरीर से ही गुँजन हो रहा है और महाराज गहरी नींद में है । उनके श्वाँस नहीं चल रहे है । आधारशिला जैसा चिंतन करके जाओ तो फिर वैसे ही चला देती है तो सोते समय कभी चिंता लेकर नहीं सोना चाहिये । कभी बीमारी का भाव लेकर नहीं सोना चाहिये ।

ॐ आनंद… ॐ शांति… ॐ प्रभुजी… ॐ प्यारेजी… ॐ… ॐ…आज से ही शुरू करो । ऐसा बड़ा भारी लाभ होगा कि सारे जन्मों की कमाई एक तरफ और ये दस हफ्ते की कमाई तुमको आगे ले जायेगी, सारे जन्मों की कमाई से आगे ! खाली दस हफ्ता । सत्तर दिन हुए और क्या हुआ? फायदा हो तो बढ़ा देना, नहीं हो तो सत्तर दिन जितना टाइम लगाया उतना मेरेको घर पे बुला लेना, मैं आपके बर्तन माँजूंगा, घर का काम करूँगा, दुकान का काम करूँगा, जहाँ भी बिठाओगे वहाँ सफल होकर दिखाऊँगा । ईमानदारी से करोगे तो मुझे आना नहीं पड़ेगा और झूठ-मूठ लिखोगे तो भी नहीं आऊँगा । हम शर्त ऐसी रखते है, फँसें नहीं ।

ईमानदारी से करोगे तो फायदा होगा और बेईमानी से लिखोगे तो मैं आऊँगा ही नहीं । ईमानदारी से करोगे तो फायदा होगा कि नहीं होगा? हाँ, बोले -हमने किया, कोई फायदा नहीं हुआ… तो हम समझेंगे कि आपने तो ऐसे ही मेरे को बबलू बनाने को लिखा है । हरि…. नारायण हरि… ॐ… ॐ…

ॐ प्रभु…  ॐ आधारशिला… ॐ वामन-विभु… । वामन जो सुंदर बना दे, वामन जो छोटा दिखे और पूर्ण हो, बड़ा भी हो, छोटा भी दिख सके वो वामन, विभु भी है और सुंदर बना दे । खाद को कितना सुंदर बना देता है – ‘लीची’ बन गया, ‘आम’ बन गया । सूरज में ऐसा सामर्थ्य भरा है, एक सेकंड में 50 लाख टन कार्बन खींच लेता है धरती से अपना खुराक, फिर धधकती आग देता है और खारे और गटरें जो समुद्र में चली जाती है उसमें से गंगा जल बना रहा है, कैसा है विभु ! ‘गंगाजल’ वहीं से आता है, समुद्र से नहीं आता । ‘बर्फ’ भी पड़ती है तो समुद्र से उठाके । अजब-गजब का खेल है और यहाँ खेल रहा है । यहाँ ‘खून’ बनाता है, वहाँ तू ‘जल’ में से ‘गंगाजल’ बना देता है लेकिन यहाँ तो ‘रोटी’ में से ‘बच्चा’ बना देता है, ‘बापू’ बना देता है । रोटी में से ही तो बनाया ! ‘सेठ’ बना देता है कैसा विभु है! हे हरि.. ‘हरि’ इसीलिए तेरा नाम है, तू हर जगह है, हर दिल में है, हमेशा है, इसलिए तेरा नाम ‘हरि’ भी है और तेरा ही नाम ‘राम’ है कि रोम-रोम में रम रहा है, तेरा नाम ‘राम’ है । ‘शिव’ भी तेरा नाम है, तू ‘कल्याण’ करता है, ‘अकल्याण’ तू सोचता ही नहीं, इसीलिये तेरा नाम ‘शिव’ भी है । ‘अच्युत’ नाम है.. तू अपनी महिमा और सत्ता से कभी ‘च्युत’ नहीं होता। मिनिस्टर-प्राइम मिनिस्टर, राष्ट्रपति सब कुर्सी से ‘च्युत’ हो जाते है, ‘इन्द्र’ भी च्युत हो जाता है ‘इन्‍द्रपद’ से लेकिन हे हृदयेश्वर! तू ‘च्युत’ नहीं होता, तू ‘अच्युत’ है और तेरा ही नाम ‘केशव’ है… ‘क’ माना ‘ब्रह्मा’ में भी ‘तू’ ही है, ‘श’ माना ‘शिव’ में भी ‘तू’, ‘व’ माना ‘विष्णु’ में भी ‘तू’ ।  ‘ब्रह्मा-विष्णु-महेश’ तुझी-से दैदीप्यमान हो रहे है । हे अच्युत, हे केशव, हे हरि !

ये आज का सत्संग पकड़ लो न बस हो गए सारे तीरथ!

परमात्मा की प्रतिष्ठा नहीं करनी है


वन में एक विशाल और सुंदर शिव-मंदिर था । उस निर्जन मंदिर में बहुत से जंगली कबूतर बसेरा लेते थे । उन कबूतरों की बीट धीरे-धीरे इतनी वहाँ भर गयी कि उस बीट से मंदिर में स्थापित शिवलिंग ढककर छिप गया । घूमते हुए एक महात्मा उधर से निकले । उतना विशाल और सुंदर मंदिर किंतु मूर्ति उसमें दिखती नहीं थी । महात्मा के मन में आया कि ‘इसमें शिवलिंग स्थापित करवा दूँ ।’ जब वे इसका उद्योग करने लगे तो किसी वनवासी ने बतायाः “मंदिर में शिवलिंग तो पहले से स्थापित है । वह कबूतरों की बीट से ढक गया है । बीट हटाकर स्वच्छ करवा दीजिये ।”

महात्मा ने मंदिर स्वच्छ कराया । बीट हटाते ही बड़ा सुंदर शिवलिंग प्रकट हो गया । इसी प्रकार तुम्हारे अंतःकरण में जो अविद्या-कल्पित मल है, उसके कारण वहाँ पहले से ही विद्यमान ‘स्व’ (अपने आत्मशिव) का दर्शन नहीं होता है । उस परमात्मा की प्रतिष्ठा नहीं करनी है । कहीं से उसे लाना नहीं है । केवल अंतःकरण में जो कूड़ा-मल भरा है, उसे स्वच्छ करना है ।

पूज्य बापू जी कहते हैं- “सत्संग के साथ-साथ यदि साधक के जीवन में सेवा का समन्वय हो तो फिर ज्यादा परिश्रम की आवश्यकता भी नहीं होती । सेवा से अंतःकरण शुद्ध होता है और शुद्ध अंतःकरण में परमात्मा का प्रकाश शीघ्र होता है ।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2020, पृष्ठ संख्या 6 अंक 335

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