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दिव्य श्रद्धा – 2


ध्रुव को, प्रह्लाद को पिता ने भजन करने से रोका था, लेकिन प्रह्लाद की भगवान में प्रीति थी, सत्संग सुना था।  कयाधू के गर्भ में थे, 5 महीने का प्रह्लाद था माँ के गर्भ में, तो उसकी मॉं नारदजी के आश्रम में रही थी, माँ तो सत्संग सुनते झोंका खा लेती थी लेकिन वह माँ के अंदर बैठा हुआ जो प्रह्लाद था, उसको सत्संग के संस्कार पड़े।  11 वर्ष का हुआ तो पिता ने उसे रात को निगरानी करने के लिए सिपाहियों के साथ भेजा तो देखा किसी कुंभार ने निंभाडा.. आग लगाई थी.. घड़े पका रहा था.. मटके ..। अग्नि देखकर वहां गये कि क्‍या हुआ? आग लगी है  क्‍या? देखा तो कुम्‍हार प्रार्थना किये जा रहा है कि ‘है परमात्मा! अब मेरे हाथ की बात नहीं और तू चाहे तो तेरे लिए कठिन नहीं, भगवान मैं तो नादान हूँ। मैंने तो भूल की लेकिन उस भूल को तू सुधार दे, तू दया कर, मैं जैसा हूँ, तैसा हूँ लेकिन तेरा हूँ, तू अगर चाहे तो सब हो सकता है, उन निर्दोष बच्चों को तू ही बचा सकता है।’   

प्रह्लाद ने कहा: क्या बात है? क्या बोल रहे है?

बोले: हमने मटके बनाए थे, उन मटको में बिल्ली ने बच्चे दे रखे थे, सोचा कि जब मटके पकायेंगे तो ये बिल्ली के बच्चों को निकाल देंगे, उचित जगह पर रख देंगे, लेकिन भूल गये और बीच निंभाडे के बिल्ली के बच्चे रह गए और निंभाड़े को आग लगा दी गई। अब याद आया है कि अरे! वो बिचारे नन्हे-मुन्ने मासूम जल के मर जायेंगे, अब हमारे हाथ की तो बात नहीं। चारों तरफ आग ने  लपटें ले ली लेकिन वह अगर चाहे तो हमारी गलती को सुधार सकता है, बचा सकता है उन बच्चों को।

प्रह्लाद ने कहा: यह क्या पागलपन की बात है? चारों तरफ आग और बिल्ली के बच्चे बच सकते हैं?

बोले: वह परमात्मा ‘‘कर्तुं शक्‍यं अकर्तुं शक्‍यं अन्‍यथा कर्तुं शक्‍यं’’।  वह जो चाहे वह कर सकता है, उससे अलग भी कर सकता है और नहीं भी कर सकता है, किसी वस्‍तु को थाम भी सकता है।

एक जरा सा बीज देखो कैसे हरा-भरा कर देता है और कैले कैसे लगा देता है ये कैल में । एक पानी की बूँद में से कैसे राजा- महाराजा खड़ा कर देता है, वही पानी की बूँद मनुष्य बनकर रोती है, हँसती है, गाती है, आती है । और बॉयकट होता है, लेडि‍जकट बनता है, क्या-क्या कट बनता है। वही मनुष्य और वही कभी अच्छा-कभी बुरा, कभी अपना-कभी पराया, ऐसे करके मेरा-तेरा करके ढंगले लगा करके राख की मुट्ठी छोड़ कर भाग जाता है, यह क्या उसकी लीला का परिचय नहीं है? उसका चमत्कार नहीं है? समुद्र में बड़़वानल रहती है, वह पानी से बुझती नहीं और पेट में जठरााग्नि रहती है, वह शरीर को जलाती नहीं। गाय सूखा घाँस खाती है और चिकना-चिकना मक्खन, घी-दूध और दही बन जाता है, उसी घाँस का रूपांतरण होकर…। सर्प दूध पीता है, जहर बना देता है, मॉं रोटी खाती है और बच्चे के लिए दूध बन जाता है और जब बच्चा बड़ा हो जाता है तो दूध बंद हो जाता है,  क्या यह ऑटोमेटिक सिस्टम…  उसकी कितनी लीला अपरंपार है, उसकी महिमा अपरंपार है!

‘वह अगर रहमत कर दे तो यह बालक, बिल्ली के बच्चे बच सकते हैं।’

बोले : कैसे बचते हैं जरा? जब यह निंभाडा खोलो ना तब मुझे बुलाना। 

कुम्‍हार ने कहा कि ‘राजकुमार निंभाड़ा खोलूँ तब क्या तुम्हे बुलाऊँ, मेरा तो मटके का निंभाड़ा है, कोई ईंट का ईंटवाडा नहीं कि तीन दिन चाहिए। आप सुबह आना, आप आऍंगें फिर मैं खोलूँगा।

सुबह को प्रहलाद आये और उसने भगवान का स्मरण करके अन्‍तर्मुख होकर अन्‍तर्यामी परमात्मा को प्रार्थना करते हुए निंभाड़े के चहुँ ओर से मटके हटाये और जब बीच के मटके तक पहुंचा तो देखा कि चार मटके कच्चे रह गये और उनमें से बच्चे म्याऊँ-म्याऊँ करके छलाँग मारते जिंदे बाहर निकले।

प्रहलाद ने सत्संग तो सुन रखा था, अब स्मृति आ गई। सार तो वही है। प्रहलाद का मन भगवान में लग गया, संसार से वैराग्य हो गया, मन भजन में लग गया।  मन भजन में लग गया तो महाराज, विरोध हुआ लेकिन विरोध होते हुए भी भजन करता है, फिर पिता हिरण्यकश्यप ने उसे धमकाया, डाँटा, जल्लादों से धमकवाया, पर्वतों से धकेलवाया फिर भी प्रहलाद की श्रद्धा नहीं टूटी।

श्रद्धा होना कठिन है लेकिन श्रद्धा हो जाए तो टिकना कठिन है और श्रद्धा टिक गई तभी भी तत्वज्ञान होना कठिन है, जय…जय…।  बिना तत्वज्ञानी गुरुओं के, महाराज प्रहलाद को पिता ने पानी में फिं‍कवाया तब भी देखा कि जो हरि बिल्ली के बच्चों को बचा सकता है, क्या मैं उसका बच्चा नहीं हूँ? भगवान के शरण हो गये। पानी में फिंकवाया, डूबा नहीं। पहाड़ों से गिरवाया लेकिन मरा नहीं।

आखिर लोहे के खंबे को तपाकर हिरण्यकश्यप ने कहा कि ‘तू बोलता है वो मेरा भगवान सर्वसमर्थ है, सर्वत्र है’ तो कहॉं है तेरा भगवान, दिखा? सब जगह है सर्वत्र है और चाहे जहाँ से भी प्रकट हो जाये तो जा यह लोहे के खंबे में तेरा भगवान् है तो इसको आलिंगन कर ।

और प्रह्लाद ने सच्ची भावना से तीव्र भावना से आलिंगन किया और बड़ा घोष करके खंबा फाड़ निकला और उसमें से नृसिंह अवतार का प्राकट्य हुआ। ‘यदा यदा ही धर्मस्य…’

जब भोगी का प्रभाव भक्त के प्रभाव को दबाता है और भोगियों का प्रभाव बढ़ जाता है.. जोर-जुलम बढ़ जाता है तब-तब भगवान चाहे कहीं से, किसी भी रूप में से प्रकट होने को समर्थ है। भगवान तो प्रकट हो गए लेकिन भगवान के तत्व को जानना कठिन है महाराज! जय-जय… ।

नृसिंह भगवान का अवतार हुआ, नृसिंह भगवान प्रकट हुए और हिरण्यकश्यप को गोद में लेकर बोले: बोल दिन है कि रात है? सुबह है कि शाम? न दिन है न रात है, न सुबह है न शाम है, संध्या है। मनुष्य हूँ कि राक्षस हूँ? न मनुष्य न पशु।

जो भी वरदान माँग रखे थे, इससे ना मरूँ उससे ना मरूँ, सब के सब वरदान के बावजूद भी ऐसा रूप भगवान ने धारण कर लिया कि नखों से.. न अस्‍त्र से शस्त्र से मरूँ,  न पुरुष से मरूँ न स्त्री से मरूँ, न पुरुष न स्त्री, न नर न नारी, एकदम नृसिंह अवतार। एकदम एक्स्ट्रा वीआईपी कोटा का अवतार वह प्रगट कर सकते हैं । ऐसा जिस भक्तों के लिए भगवान अवतार धारण कर सकते हैं, ऐसे भक्त पहलाद को देखो। तत्वज्ञान नहीं हुआ तो देखो उसकी श्रद्धा कैसे डाऊन हो जाती है अब देखना…

आध्यात्मिक विष्णु पुराण की कथा में से मैं तुम्हें सुना रहा हूँ। हिरण्यकश्यप को फाड़कर भगवान ने सद्गति दे दी, राज प्रहलाद को मिला। भगवान अंतर्धान हो गए।

समय जाने के बाद शुक्राचार्य, असुरों के जो आचार्य थे, उन्होंने प्रहलाद को बोला कि ‘अरे प्रहलाद, क्‍या तूने बोला था विष्णु को, कि मेरे पिता को मार डालो।’

बोले: मैंने पिताजी को मारने के लिए तो नहीं कहा था, वह तो उनके जैसे वरदान दिये गये थे..

बोले: तूने तो कहा नहीं, फिर तेरे बाप को क्यों मारा उन्होंने? अगर उनकी तुम्हारे में पूरी प्रीति थी तो तेरे बाप की बुद्धि सुधार देते, तेरे बाप को मारा क्यों?

देखो श्रद्धा तो है प्रहलाद की तीव्र लेकिन श्रद्धा को हिलानेवाले लोग जब मिल जाते हैं ना तो श्रद्धा छू हो जाती है और ऐसे हजारों-हजारों मिलते ही रहते हैं। यह दुर्भाग्य है हम लोगों का कि ऐसे हमको हिलानेवाले मिलते ही रहते हैं। साधन में से श्रद्धा हिलाना, भगवान में से, गुरुमंत्र में से, गुरु में से श्रद्धा हिलाने का कोई ना कोई अभागा आदमी हमको मिलता ही रहेगा नहीं तो हमारा मन ही विरोध करेगा, तर्क-वितर्क करेगा, श्रद्धा को हि‍लायेगा। इसलिए श्रद्धा टिकना कठिन है ‌।

प्रहलाद को, जो दैत्यों का गुरु कहता है, वह तत्वज्ञानी नहीं है लेकिन व्यवहार कुशल है, संजीवनी विद्या जानता हैं। प्रभाव तो है लेकिन ब्रह्मज्ञान के सिवाय का प्रभाव किस काम का?

‘तूने जब कहा नहीं तो तेरे बाप को मार डाला और फिर भी तू उसको पूजता है, कैसा मूर्ख है? कितनी श्रद्धा, अंधश्रद्धा।’  

किसी को कह दो- ‘कितनी श्रद्धा, अंधश्रद्धा’ । वो बोलेगा- ‘नहीं अंधश्रद्धा नहीं, मेरी सच्ची श्रद्धा है।’

सच्ची श्रद्धा तो बोलेगा लेकिन तुम्हारा अंधश्रद्धा बोलना भी उसकी श्रद्धा की नींव को तो जरा झकझोर देगा। शब्द असर करते हैं, देर-सवेर असर करते हैं ।

फिर  दो दिन बीते, फिर बातचीत में.. ‘अच्छा तेरी श्रद्धा है? विष्णु भगवान ने मार डाला पिता को तो पिता की मृत्यु होने के बाद भी तेरे को ऐसा नहीं होता है कि उन्होंने ठीक नहीं किया? इतनी भी तेरे पास अकल नहीं, हें? इतनी भी तेरी समझ नहीं है।’

देखो, कैसे-कैसे उलट रहे हैं खोपड़ी को।  

बोले- ‘हाँ, ठीक तो नहीं हुआ लेकिन अब क्या करें…।’ 

हिला, भीतर से हिला, जय रामजी की..

 ‘हॉं ठीक तो नहीं किया लेकिन अब क्या करें भगवान हैं, अच्छा तो नहीं हुआ लेकिन अब क्या करें भगवान है।’

समझो श्रद्धा के परसेंटेज डाऊन हो गये।  

‘क्या करें अब भगवान छे ,गुरु छे ने चाले छे…।  चाले है, गुरु है, शूँ करे बापू छे………… शूँ करे,  आपणा गुरु छे जावा दो, जावा  दो’  तो क्या तुम बड़ी कृपा कर रहे हो। अपने अहम के दायरे को मजबूत करके क्षमा कर रहे हो गुरु को, तुम मिट नहीं रहे हो गुरु की दृष्टि में, भगवान की दृष्टि में तुम अपने मैं को मिटा नहीं रहे हो लेकिन तुम ‘मैं’ को सुरक्षित रखकर भगवान या गुरु को माफ कर रहे हो। जय रामजी की !

ध्यान देना, यह सूक्ष्म बातें हैं । तत्वज्ञान में, साक्षात्कार में कौन सी बातें आकर हमारे… । जैसे घुन लग जाती है ना, लगती जरूर बारीक है लेकिन कितनी भी मजबूत लक्कड़ को मिट्टी में मिला देती है, ऐसे ही यह जो बातें हैं ना हिलाने वाली, लगती तो है छोटी-छोटी लेकिन परब्रह्म परमात्मा के साक्षात्कार करने के सामर्थ्य को खा कर नष्ट कर देती है । ये बेवकुफी ऐसी होती है इसलिए साक्षात्कारी महापुरुष जल्दी से तैयार नहीं हो पाते हैं क्‍योंकि साधक है बेचारा बाज पक्षी और लोग हैं शिकारी।  किसी ना किसी भाव से, किसी ना किसी वातावरण से उसको गिरा देते हैं। 

महाराज! फिर एक-दो दिन बीता कि ‘अच्छा विष्णु ने ठीक नहीं किया, कि अभी भी तेरे को लगता है कि विष्णु ने बाप को मार डाला तो ठीक हो गया । मेरा बाप मर गया विष्णु के हाथ से तो अच्छा हुआ, ऐसा लगता है क्या तेरे को ।

…कि नहीं, यह तो ठीक नहीं हुआ… उनकी बुद्धि बदल देते तो ठीक था। मार डाला, यह ठीक नहीं था। 

तो अब देखा शुक्र ने कि हूँ, अब हिला है तो और थोड़ी कटु बात। श्रद्धा हिलाने वाले पहले तो गोल-गोल थोड़ी सी हिलाएंगे फिर जितने तुम हिलते जाओगे ना… बोधु होय न त्‍यां वाग्‍ये.. जे श्रद्धा हाँलवा नी वातो सांभणे ऐने ज बीजा संभावें पण जो सुनने को तैयार नहीं वो तो बोले कि हूँ अमज तो केतो थो कि बापू  महारे आगण फलाणो तमारी बहु निंदा करतो थो पण मैं एने डाँट नाख्‍यों… हाउ हाउ केतो थो, हाउ हाउ केतो थो पण साभणवा नी थारा में योग्‍यता हती ऐटले तु सांभली गयो । ऐटलु बोधु हतु ने मुंडामां हलवावता तने…। गुरु महाराज यह तो आपके लिए ऐसा-ऐसा कहता था पर मेरे को बड़ा दुःख हुआ, ऐसा-ऐसा बोला,  ऐसा बोला-ऐसा बोला कि सुनने में तो तेरे में कचास थी इसलिए वह सुना सका।

 रामकृष्ण परमहंस के दर्शन करने कोई साधक गया, उसका चेहरा सुकड़ा हुआ था । रामकृष्ण देव उसी समय समाधि  से उठे थे, निर्विकल्‍प समाधि से । पूछा कि क्यों मुरझाया हुआ है? क्या बात है?

…कि गुरु महाराज, मैं नाव में बैठकर आ रहा था न तो कुछ लफँगे लोग आपके लिए बुरा-बुरा बोलते थे।

बोले:  क्या बोले?

सब बोलते थे कि लगन किया, बाल-बच्चा नहीं है, पत्नी से बात नहीं करते । नान्‍यतर जाति में… ऐसा-ऐसा गंदा-गंदा बोलते तो मेरे को बड़ा दुख हुआ ।

रामकृष्ण ने कहा कि धिक्कार है तेरे को।  शास्त्रों ने कहा कि गुरु की, माता-पिता की जो निंदा करे तो उसकी जीभ काट लेना । या तो सुनना नहीं चाहिए, कान में उँगलियाँ डाल देना चाहिए और तू मेरी निंदा सुन कर फिर मेरे दर्शन करने को आया! तेरे को धिक्कार है! तेरे को क्या लाभ होगा!

अब रामाकृष्‍णदेव जैसे निर्विकल्प समाधि से उतरे हैं, उन महापुरुषों को क्या अपनी निंदा-प्रशंसा की परवाह लेकिन साधक का तो अहित हो जाता है। उन महापुरुषों कों निंदा और प्रशंसा की परवाह नहीं होती वह अपनी निंदा से डरते नहीं, डरते हैं तो महापुरुष बन नहीं पाते।

तो साधक अवस्था में कितने हिलाने वाले प्रसंग सहे, मान-अपमान सहा, साधक अवस्था में मान-अपमान, विरोध आप नहीं चाहते। ऐसे सब प्रक्रियाओं से जब आदमी गुजरता है तब साधक में से सिद्ध बनता है। मैं नहीं चाहता हूँ कि दाढ़ी-मूँछ रखूँ, गुरुदेव कहेंगे- दाढ़ी-मूँछ रखो। मैं चाहता हूँ कि दाढ़ी-मूँछ रखुँ, गुरुदेव कहेंगे- काटो… जय रामजी की!  जिसमें हमारी ममता होगी वो तो तोड़ेंगे। मैं नहीं चाहता हूँ कि पेंट और शर्ट पहनना छोड़ दॅँ लेकिन गुरुदेव बोलेंगे- छोडो, बदलो और मैं चाहूँगा कि‍ नहीं पहरूँ, गुरूदेव कहेंगे कि इसी में रहो…जय रामजी की! जो-जो मेरी पकड़ होगी, गुरुदेव अगर कृपा करेंगे तो जहाँ-जहाँ मेरी पकड़ होगी वहाँ ठोकर लगाएँगे। अगर श्रद्धा सात्विक होगी तो मैं अहोभाव से स्वीकार करुँगा लेकिन श्रद्धा अगर तामसी या राजसी है तो मैं विरोध करूँगा। अंदर से विरोध करूँगा, इसमें क्या? पेंट और शर्ट बदल के धोती पहनने से भगवान का दर्शन होता होगा? नहीं… धोती पहनने से भगवान का दर्शन तो नहीं होता लेकिन पकड़ छोड़ने से भगवान के दर्शन में सहाय मिलती है। श्रीराम !  

उड़िया बाबा बड़े अच्छे महापुरुष हो गए । अभी तो ब्रह्मलीन हो गए, आनंदमयी माँ, उड़िया बाबा और हरि बाबा तीनों मित्र संत थे, समकालीन और वर्षों तक साथ में रहे। आनंदमयी  माँ इंदिरा की गुरु। नेहरूजी भी उनको मानते थे। तो महाराज! उड़िया बाबा जो थे, एक साधक ध्यानमग्न था, जाकर उसको हिला दिया, बेवकूफ कहीं का… आश्रम में आया, चुपचाप बैठा रहता है, ध्‍यान करके, आँखें बंद करके भगवान के ध्यान में बैठा रहता है, क्या आँख खोलने से तेरा भगवान भाग जाता है? आश्रम की सेवा करने से क्या तेरा भगवान भाग जाता है क्या? जा, जरा खेती-वेती कर। और दूसरा हल चला रहा था तो उसको बुलाया, जब हल ही चलाना था तो घर में क्यों नहीं रहा? आश्रम में आया और फिर हलविद्या चालू कर दी, हल ही चलाना था तो घर में तेरा हल था कि?

बोला-  हॉं, था।

बोले- फिर घर छोड़कर इधर आया और इधर हल चला रहा है। बैठ आंख बंद करके भजन कर।

जो हल चला रहा था उसको धमकाकर हल छुड़ा दिया और जो ध्यान में था उसको धमकाकर ध्यान छुड़ा दिया। अब हल वाला ध्यान में सफल नहीं हो रहा और ध्यान वाला हल में सफल नहीं हो रहा।

मित्र संतो ने कहा कि स्वामी जी उसका विषय था हल चलाना तो सेवा मिलती तो वह करता और इसको ध्‍यान में रुचि थी तो ध्यान करता।

बोले- रुचि तो बाँधती है, मैं रुचियों से पार करके जहाँ से रुचियाँ अरुचियाँ सब फीकी लगती है वहाँ पहुँचाना चाहता हूँ। मुझे हल चलाना या बिठाना लक्ष्य नहीं है, मेरा तो जीव को जगाना लक्ष्य है।

अब बताओ वो ध्यान में मग्न हो रहा है उसको हिला दिया, ध्यान छुड़ा दिया और वो हल चलाने में मग्न है लेकिन मगन महाराज एक देश में, एक वस्तु में हुआ तो ध्यान में, तत्वज्ञान में, ध्यान में एक जगह की स्थिति भी तत्वज्ञान के साक्षत्‍कार में बाधा है। जो  ध्यान नहीं करते उनके लिए ध्यान जरूरी है लेकिन जो ध्यान की किसी स्थिति में पड़े रहते हैं तो जिंदगी पूरी हो जाएगी, साक्षात्कार नहीं होगा। इसलिए गुरुओं की बड़ी ऊँची कृपा है, गुरुओं को बड़ी ऊँची निगाहें रखनी पड़ती है, गुरुओं को ना जाने कितना-कितना ख्याल रखना पड़ता है। आप लोग जब गुरुतत्व में पहुँचेंगे ना तो पता चलेगा कि गुरु का कितना उत्तरदायित्व हो जाता है। गुरु बनना कोई बच्चों का खेल नहीं है, जैसा-तैसा आकर गुरु बन गया, कान्‍या मान्‍या कुर्र, तुम हमारे चेले हम तुम्हारे गुर्र…  श्री राम।

स्वामी विवेकानंद बोलते थे कि गुरु बनना माने अपने तपस्या के कोष में से कुछ ना कुछ दान करना। आज हर भिखारी सहस्‍त्र (हजारों) अशर्फियाँ दान करना चाहता है, उसकी साधना का कोष तो होता नहीं, उसके पास अध्यात्मिक कोष का खजाना पूरा भरा हुआ होता नहीं, कुछ थोड़ी बहुत सूचनाएँ सुनकर, थोड़ी बहुत कथाएँ-वार्ताएँ सुनकर सब गुरु बनने लग जाते हैं।

महाराज, शुक्र ने हिलाया, किसको…  प्रहलाद को । पर्वतों से गिराने पर जिसकी श्रद्धा नहीं गिरी, भगवान के प्रति श्रद्धा नहीं गि‍री, पानी में फिंकवाने से जिसके जीवन की रक्षा कर दी जीवनदाता ने, उस जीवनदाता के प्रति प्रहलाद को थोड़ा हुआ कि इन्होंने यह ठीक नहीं किया! जब ईष्‍ट में लग जाता है कि यह ठीक नहीं किया तो तुम्हारी श्रद्धा का यह प्रदर्शन है कि नहीं? मेरी भगवान में इतनी श्रद्धा फिर भी मेरे बाप को मार डाला, यह तो अच्छा नहीं किया।

बोले- जब अच्छा नहीं किया तो ऐसे आदमी को जरा खबर पड़नी चाहिए कि…क्या किया उन्‍होने?

बोले कि‍ खबर मैं कैसे पाडुं? वो भगवान है, विष्णु है!  

बोले- विष्णु किसको बोलते हैं? व्‍हाट आर द मीनिंग आफ विष्‍णु? विष्णु भगवान का मतलब क्या होता है?

बोले- “वासं करोति इति वासुदेव” जो सब में बस रहा है वह वासुदेव है ।

बोले- जो सब में बस रहा है वह वासुदेव है तो वैकुण्‍ठ वाले को ही वासुदेव मानना बेवकूफी है कि नहीं, तेरे हृदय में भी तो वासुदेव हैं, तो हृदय के वासुदेव को मानना है कि वैकुण्‍ठ के वासुदेव को मानना है?

यह बात भी सच्ची है।

बोले- सच्ची बात है, तो शास्त्र में तो यहां तक लिखा है कि जब तक पिता के हत्यारे को ठीक नहीं किया जाए तब तक पुत्र को खाना, पानी पीना भी विष है, हराम है और तू मजे से राज्य कर रहा है। ऐ प्रहलाद! तेरे जैसा…  ऐ, ऐ… इतनी अकल नहीं।  हिप्नोटाईज कर दिया बेचारे को।

बोले- गुरु महाराज, ऐसे तो मैं ठीक करना तो चाहता हूँ लेकिन अब क्या करूँ उनकी तो बड़ी पहुँच है।

श्रद्धा तो मरी परवारी ने, ‘ठीक करना तो चाहता हूँ लेकिन अब ठीक नहीं कर सकता’ श्रद्धा हिल गई कि नहीं? महाराज! प्रहलाद को जब राज मिल गया, इंद्रियों को छुटी छोड़ दी, रजोगुण बढ़ गया, तमोगुण-रजोगुण बढ़ गया। अब वह श्रद्धा की सात्विकता से नीचे उतर आए और बहकाने वाले मिल गए।  

बोले- ऐसे तो मैं विष्णु को ठीक करना चाहता हूं लेकिन वह तो है वैकुण्‍ठाधिपति।

बोले- क्या है? आवाहन करो। पहले तो तेरे पास कुछ था नहीं, तू अनाथ था तो उसका सहारा ले लिया, अब तो तू राजा बन गया है, इतनी फौज तेरे पास है, हिम्मत रख! अपने शास्त्रों में तो लिखा है- निर्भय बनो!

और वह निर्भय… जिन्होंने बनाया है उन्हीं के साथ वो निभर्य …. फाइटिंग के लिए तैयारी हो रही है ऐसे लोग बड़े अभागे होते हैं। 

ऐसे एक महिला थी, जो सब कुछ छोड़कर घाटवाले बाबा के चरणों में पहुँच गयी थी, दिल्ली में वह शिक्षिका थी, आचार्य थी। उसका नाम था पुष्पा बहन। उसने हरिद्वार में अपना मकान खरीदा क्योंकि गुरु महाराज के रोज दर्शन करना है। ऐसे ज्ञानी के दर्शन… सारे तीर्थो का फल, सारे यज्ञों का फल, सारे तपों का फल सहज में मिल जाए ऐसे ज्ञानवान के दर्शन छोड़कर मैं दिल्ली में कब तक रहूँगी। मकान ले लिया, धीरे-धीरे वह दिल्ली से छुट्टियाँ लेकर आती रहती थी और रिटायरमेंट जल्दी लेना था उसको। मैंने एक बार देखा कि वह खट्टी आम होती है ना… केरी, कच्ची केरी। खट्टे आम के पकौड़े बनाकर घाट वाले बाबा को बोलती है- स्वामीजी मैंने बड़े प्यार से, बड़ी मेहनत से पकोड़े बनाये हैं आपके लिए, खाओ।

उन्होंने कहा- मैंने अभी दूध पिया है, दूध के ऊपर पकौड़े नहीं खाये जाते।

‘मैंने मेहनत करके बनाया है उसका क्या?’

ये श्रद्धा है? श्रद्धेय की चाहे मर्जी हो या ना हो लेकिन तुम जैसा चाहो वैसा श्रद्धेय करे तो तुम्हारी श्रद्धा है या तुम्हारी नालायकी है?

दिव्य श्रद्धा -1


हरि ॐ… श्‍वांस रोकेंगे और धीरे-धीरे छोड़ेंगे, छोडा हुआ श्‍वांस जल्दी नहीं लेंगे । साधन बढ़ने से शरीर में विद्युत का तापमान बढ़ता है । शरीर तब तक भारी रहता है जब तक उसमें कफ और वायु की विपरीतता रहती है । कफ और वायु अधिक होता है तो शरीर आलसी और भारी रहता है, शरीर भारी तब तक रहता है जब तक कफ और वायु का प्रमाण अधिक है, वात प्रकृति और कफ प्रकृति । आसन स्थिर करने से, एक ही आसन पर बैठने से शरीर में विद्युत प्रकट होती है जो कफ को और वायु को कंट्रोल करके शरीर को आरोग्यता देती है। शरीर में बिजली पैदा होती है वह आरोग्यता की रक्षा करती है, शरीर हल्का लगता है फुर्तीवाला लगता है। क्रिया करने से विद्युत खर्च होती है और स्थिर आसन पर बैठ कर धारणा करने से, ध्यान करने से विद्युत बढ़ती है, बिजली बढ़ती है और विद्युत तत्व बढ़ने से शरीर निरोग रहता है, मन फूर्ती में रहता है।

संसार से वैराग्य होना कठिन है, वैराग्य हो भी जाए तो कर्मकांड से मन उठना कठिन है, कर्मकांड से उठ भी गए तो ध्यान में लगना मन का कठिन है, ध्यान में लग गए तो तत्वज्ञानी गुरु मिलना कठिन है, तत्वज्ञानी गुरु मिल भी गए तो उनमें श्रद्धा होना कठिन है, श्रद्धा हो भी गई तो उनमें श्रद्धा टिकना कठिन है।

तामसी श्रद्धा होती है तो कदम-कदम पर फरियाद करती है, तामसी श्रद्धा में समर्पण नहीं होता, भ्रांति होती है समर्पण की। तामसी श्रद्धा विरोध करती है, राजसी श्रद्धा हिलती रहती है और भाग जाती है, किनारे लग जाती है और सात्विक श्रद्धा होती है तो चाहे गुरु की तरफ से कैसी भी कसौटी हो, किसी भी प्रकार की परीक्षा हो तो सात्विक श्रद्धा वाला धन्यवाद से अहोभाव से भर कर स्वीकृति दे देगा।

संसार से वैराग्य होना कठिन, वैराग्य हो गया तो कर्मकांड छूटना कठिन, कर्मकांड छूट गया तो उपासना में मन लगना भी कठिन, उपासना में मन लग गया तो तत्वज्ञानी, ब्रह्मज्ञानी गुरुओं का मिलना कठिन और तत्वज्ञानी गुरुओं का मिलना हो गया तो उनमें श्रद्धा टिकना कठिन क्योंकि प्राय: राजसी और तामसी श्रद्धा वाले लोग बहुत होते हैं।

तामसी श्रद्धा कदम-कदम पर इनकार करेगी, विरोध करेगी, अपना अहं नहीं छोड़ेगी और श्रद्धेय के साथ, ईष्‍ट के साथ, गुरु के साथ विरोध करेगी, तामसी श्रद्धा होगी तो। राजसी श्रद्धा होगी तो जरा-सा परीक्षा हुई या थोड़ा-सा खडखडाया तो राजसी श्रद्धा वाला किनारे हो जाएगा, भाग जाएगा और सात्विक श्रद्धा होगी तो श्रद्धेय के तरफ से हमारे उत्थान के लिए चाहे कैसी भी कसौटी हो, चाहे कैसी भी साधन-भजन की पद्धतियां हो, प्रयोग हो, व्यवहार हो, अगर सात्विक श्रद्धा है तो वह तत्ववेत्‍ता गुरुओं के तरफ से और तमाम साधना पद्धति अथवा विचार व्यवहार जो भी… वह अहोभाव से धन्यवाद ! उसे फरियाद नहीं होगी, उसे प्रतिक्रिया नहीं होगी।  

सात्विक श्रद्धा हो गया तो फिर तत्व-विचार में मन लग जाता है नहीं तो तत्वज्ञानी गुरु मिलने के बाद भी तत्व-ज्ञान में मन लगना कठिन है। आत्म-साक्षात्कारी गुरु मिल जाए और उसमें श्रद्धा हो जाए तो यह जरूरी नहीं कि सब लोग आत्मज्ञान की तरफ चल पड़ें- नहीं, राजसी श्रद्धा-तामसी श्रद्धा वाला आत्मज्ञान की तरफ नहीं चल सकता, वह तत्वज्ञानी गुरुओं का सानिध्य पाकर अपनी इच्छाओं के अनुसार फायदा लेना चाहेगा लेकिन जो वास्तविक फायदा है जो तत्वज्ञानी गुरु देना चाहते हैं उससे वह वंचित रह जाएगा ।

सात्विक श्रद्धा वाला होता है उसको ही तत्वज्ञान का अधिकारी माना जाता है और वही तत्वज्ञानपर्यंत गुरु में अडिग श्रद्धा, जैसे सांदीपक की थी, भगवान विष्णु आये वरदान देने के लिए-नहीं लिया, भगवान शिव आये-वरदान नहीं लिया। गुरु ने कोढ़ी का रूप धारण कर लिया, बुरी तरह परीक्षाएँ की, पीट देता था, मार देते थे चांटा, फिर भी वह गुरू के शरीर से निकलने वाला गंदा खून, कोढ़ की बीमारी से आने वाली बदबू, मवाद, फिर भी सांदीपक का चित्त कभी सूग नहीं करता था, ऊबता नहीं था । ऐसे ही विवेकानंद की सात्विक श्रद्धा थी तो रामकृष्णदेव में अहोभाव बना रहा और जब राजसी श्रद्धा हो जाती तो कभी हिल जाती है, ऐसे छह बार नरेंद्र की श्रद्धा हिली थी।

तो आत्म ज्ञानी गुरु मिल जाना कठिन है.. आत्म ज्ञानी गुरु मिल जाए तो उसमें श्रद्धा टिकना सतत कठिन है, क्योंकि श्रद्धा राजस और तमस गुण से प्रभावित होती है तो हिलती जाती है या विरोध कर लेती है। इसलिए जीवन में सत्व गुण बढ़ना चाहिए। आहार की शुद्धि से ,चिंतन की शुद्धि से ,सत्वगुण की रक्षा की जाती है । अशुद्ध आहार, अशुद्ध व्यक्तियों विचारों वाले व्यक्तियों का संग, जीवन के तरफ लापरवाही रखने से श्रद्धा का घटना-बढ़ना, टूटना-फूटना होता रहता है, इसलिए साधक साध्य तक पहुंचने में उससे बरसो गुजर जाते हैं, कभी-कभी तो पूरा जन्म गुजर जाता है फिर भी साक्षात्कार नहीं कर पाते हैं। हकीकत में छह महीना अगर ठीक से साधना की जाए, खाली छह महीना, फकत छह महीना ठीक से साधना की जाए तो संसार की वस्तुएं और संसार आकर्षित होने लगता है.. सूक्ष्म जगत की कुँजियां हाथ में आने लगती है ..छह महीना अगर सात्विक श्रद्धा से ठीक साधन किया जाए तो बहुत आदमी ऊंचा उठ जाता है।  रजोगुण-तमोगुण से बचकर जब सत्वगुण बढ़ता है तो तत्व ज्ञानी गुरुओं के ज्ञान में आदमी प्रविष्ट होता है। तत्वज्ञान का अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं रहती, अभ्यास तो भजन करने का है और अभ्यास तो श्रद्धा को सात्विक बनाने का है। अभ्यास… भजन का अभ्यास बढ़ने से, सत्व गुण का अभ्यास बढ़ने से विचार अपने आप उत्पन्न होता है । महाराज! ऐसा विचार उत्पन्न करने के लिए भी साधन भजन में सातत्‍य होना चाहिए और श्रद्धा की सुरक्षा में सतर्क होना चाहिए, ईष्‍ट में, गुरु में, भगवान में श्रद्धा।  श्रद्धा हो गई तो तत्वज्ञान में गति करना.. तत्वज्ञान तो कईयों को मिल जाता है लेकिन उस तत्वज्ञान में स्थिति नहीं करते.. और स्थिति करते हैं तो ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न करने की खबर हम नहीं रख पाते …और ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न हो जाए तो साक्षात्कार होता है.. साक्षात्कार करने के बाद भी अगर उपासना तगड़ी नहीं की और गुरुकृपा से जल्दी हो गया साक्षात्कार तभी भी विक्षेप रहेगा.. मनोराज आने की संभावना है ..यह साक्षात्कार के बाद भी ब्रह्म अभ्यास करने में लगे रहते हैं बुद्धिमान, उच्च कोटि के साधक।

साक्षात्कार करने के बाद भी भजन में, अथवा ब्रह्म अभ्यास में, ब्रह्मानंद में लगे रहना यह साक्षात्कारी की शोभा है । जिन महापुरुषों को परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है… वे भी ध्यान भजन में और शुद्धि में ध्यान रखते हैं, तो हम लोग अगर लापरवाही कर दें.. तो हमने तो अपनी पुण्‍यों की कबर ही खोद दी। जीवन में जितना पुरुषार्थ होगा, सतर्कता होगी और जीवनदाता का मूल्य समझेंगे उतना ही यात्रा उच्च कोटि की होगी। ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न होना यह भी ईश्वर की कृपा है। सात्विक श्रद्धा होगी तब आदमी ईमानदारी से अपने अहं को परमात्मा में अर्पित होगा।

तुलसीदासजी ने कहा : ‘यह फल साधन ते न होई’  । यह जो ब्रह्मज्ञान का फल है वह साधन से प्रगट नहीं होगा । साधन करते-करते सात्विक श्रद्धा तैयार होती है और सात्विक श्रद्धा ही अपने तत्व में, ईष्‍ट में अपने आप को अर्पित करने को तैयार हो जाती है। जैसे लोहा अग्नि की वाह-वाही तो करें, अग्नि की बखान तो करें, अग्नि को नमस्कार तो करें ..लेकिन तब तक लोहा अग्नि नहीं होता है जब तक लोहा अपने आप को अग्नि में अर्पित नहीं कर देता।  लोहा अग्नि के भट्टे में अर्पित होते ही उसके रग-रग में अग्नि प्रविष्ट हो जाती है और वह लोहा अग्नि का ही एक पुँज दिखता है । ऐसे ही जीव उस ब्रह्म स्वरूप में अपने आप को जब तक अर्पित नहीं करता तब तक भगवान के भले गीत गाए जाए ,गुरु के गीत गाए जाए, गुणानुवाद किए जाए.. लाभ तो होगा लेकिन गुरुमय,  भगवतमय तब तक नहीं होगा जब तक अपने “मैं” को ईश्वर में, गुरु में अर्पित नहीं कर देता । ईश्वर और गुरु शब्द दो हैं बाकी एक ही तत्व होता है।  ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्तिभेदविभागिने’।  मूर्ति से दो दिखते हैं, मूर्तियां अलग-अलग हैं, आकृति अलग-अलग दिखती हैं, बाकी ईश्वर और गुरु एक ही चीज है, गुरु के ह्रदय में जो चैतन्य चमका है वही ईश्वर के ह्रदय में प्रकट हुआ है। ईश्वर भी अगर परम कल्याण करना चाहते हैं, तो गुरु का रूप लेकर.. उपदेशक का रूप लेकर.. भगवान कल्याण करेंगे, परम कल्याण… संसार का आशीर्वाद तो भगवान ऐसे दे देंगे लेकिन जब साक्षात्कार करना होगा तो भगवान को भी आचार्य की गाड़ी में बैठना पड़ेगा , आचार्य पद के ढंग से उपदेश देंगे भगवान । जैसे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया, श्री रामचंद्रजी ने हनुमानजी को ब्रह्म ज्ञान का उपदेश दिया और साधक भजन करते हैं, भजन की तीव्रता से भाव मजबूत हो जाता है और भाव के बल से अपने भाव के अनुसार संसार में चमत्कार भी कर लेता है, भाव की दृढ़ता से लेकिन भाव पराकाष्ठा नहीं है,भाव बदलते रहते हैं ,पराकाष्ठा है ब्रह्मकार वृत्ति उत्पन्न करके साक्षात्कार करना। तो साधन-भजन में उत्साह और जगत में नश्वर बुद्धि और लक्ष्य की, ऊंचे लक्ष्य की हमेशा स्मृति, यह साधक को महान बना देगी।  अगर ऊँचे लक्ष्य का पता ही नहीं, आत्मसाक्षात्कार के लक्ष्य का पता ही नहीं, ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न करके आवरण भंग करना और साक्षात्कार करके जीवन मुक्त होने का अगर जीवन में लक्ष्य नहीं है तो छोटी-मोटी साधना में, छोटी-मोटी पद्धतियों में आदमी रुका ही रहेगा ,कोल्हू के बैल जैसा वही जिंदगी पूरी कर देगा। मैंने अर्ज किया था न कि संसार से वैराग्य होना कठिन है, वैराग्य हो गया तो फिर कर्मकांड से मन उठना कठिन है, कर्मकांड से मन उठ गया तो फिर उपासना में लगना कठिन है,  उपासना में लग गया तब भी तत्वज्ञानी गुरुओं को खोजना कठिन है, तत्वज्ञानी गुरुओं का मिलाप भी हो गया तो उनमें श्रद्धा टिकना कठिन है,  उनमें श्रद्धा, महाराज! हो भी गई …श्रद्धा तो हो जाती है लेकिन टिकी रहे यह बड़ा कठिन है और श्रद्धा टिक् गई तब भी तत्वज्ञान के प्रति प्रीति होना कठिन है, तत्वज्ञान हो गया तो उसमें स्थिति होना कठिन है, स्थिति हो गई… महाराज !! तो ब्रह्माकार वृत्ति कर के आवरण भंग करके जीवनमुक्त पद में पहुंचना परम पुरुषार्थ है। अगर सावधानी से छह महीने तक आदमी ठीक ढंग से ईश उपासना करें, ठीक ढंग से तत्व ज्ञानी गुरुओं के ज्ञान को विचारे तो उसके मन का संकल्प-विकल्प कम होने लगता है ,संसार का आकर्षण कम होने लगता है और उसके चित्त में विश्रांति आने लगती है, उससे संसार की सफलताएं आकर्षित होने लगती है, संसार आकर्षित होने लगता है। संसार माना क्या?? जो सरकने वाली चीजें हैं ये.. संसार की जो भी चीजें हैं वह सरकने वाली वह आकर्षित होने लगती है ,फिर उसे रोजी रोटी …यह वह ..कुटुंबी, सम्‍बंधी, समाज के दूसरे लोगों को रिझाने के लिए नाक रगड़ना नहीं पड़ेगा.. वह लोग तो ऐसे ही रीझने को तैयार हो जाएंगे। खाली छह महीने ठीक ढंग से साधन में लग गये तो सारी जिंदगी की मजदूरी से जो नहीं पाया है वह छह महीने से तो पाएगा लेकिन वह साधक के लिए तो वह भी तूच्छ हो जाता है.. उसका लक्ष्य साध्‍य है ऊँचे में ऊँचा “आत्मसाक्षात्कार करना”।

दो के पीछे तीन और तीन के पीछे आते ये छः सद्गुण-पूज्य बापू जी


श्रद्धा और सेवा – ये दो सद्गुण ऐसे हैं कि चित्त में आनंद प्रकटा देते हैं शांति प्रकटा देते हैं । श्रद्धा और सेवा से ये और भी तीन गुण आ जायेंगे – उद्योगी, उपयोगी और सहयोगी पन ।

जो भी व्यक्ति उद्योगी, उपयोगी और सहयोगी बनकर रहता है, वह यदि नहीं है तो उसका अभाव खटकेगा । आलसी, अनुपयोगी, असहयोगी व्यक्ति आता है तो मुसीबत होती है और जाता है तो बोले, ‘हाऽऽश….! बला गयी ।’ और उद्योगी, उपयोगी, सहयोगी व्यक्ति आता है तो आनंद होता है और जाता है तो बोलते हैं कि ‘अरे राम !…. क्यों जा रहे हो ! कब आओगे ? फिर आइये ।’ तो जीवन अपना ऐसा होना चाहिए । इन तीन गुणों में वह ताकत है कि इनके होने से 6 दूसरे गुण बिन बुलाये आ जायेंगे । उद्यम आ जायेगा, साहस और धैर्य आयेगा, बुद्धि विकसित हो जायेगी, शक्ति का एहसास होगा और जीवन पराक्रमी बन जायेगा ।

तो शास्त्र का वचन हैः

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः ।

षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत ।।

ये 6 सद्गुण आ गये तो पद-पद पर परमात्मादेव सहायता करते हैं । ये 6 गुण जिसमे भी हैं उसके पास डिग्रियाँ हैं तो भी ठीक है और कोई डिग्री नहीं है तो भी ठीक है । ये गुण बिना डिग्री वाले को भी सफल बना देंगे ।

तो अपनी योग्यता डिग्रियों से जो कुछ होती है, वह होती है लेकिन वास्तव में इन सद्गुणों से ही योग्यता का सीधा संबंध आत्मशक्तियों से जुड़ जाता है । फिर डिग्री है तो ठीक है और नहीं है तो उस व्यक्ति का महत्त्व कम नहीं है ।

तो जीवन उद्यमी, उपयोगी और सहयोगी होना चाहिए । ऐसा परहितकारी व्यक्ति हर क्षेत्र में सफल हो जायेगा । और फिर उसमें ईश्वर का, धर्म का और सद्गुरु का सम्पुट मिल जाय तो जीवन सफल हो जाय । फिर तो वह तारणहार, जन्म-मरण से पार करावनहार महापुरुष बन जायेगा ।

उद्योग तो रावण भी करता था, हिटलर, सिकंदर ने भी उद्योग किया लेकिन वह दूसरों को अशांति देने वाला, स्वयं का पतन करने वाला उद्योग था । उद्योग ऐसा हो कि जिसका बहुजनहिताय उपयोग हो और सहयोग हो, जिससे आत्मशांति के, सत्यस्वरूप आत्मा के ज्ञान के करीब व्यक्ति आये । व्यक्ति जितना सत्यस्वरूप आत्मा के ज्ञान के करीब आयेगा उतना संसार का आकर्षण कम होता जायेगा ।

सत्संग से ऐसे सदगुण मिल जाते हैं कि बड़ी-बड़ी डिग्रियों वालों से भी सत्संगी आगे निकल सकते हैं । रामकृष्ण परमहंस के पास संत तुकाराम महाराज के पास कोई खास पढ़ाई की डिग्री नहीं थी, संत कबीर जी के पास कोई डिग्री नहीं थी लेकिन कबीर जी पर शोध-प्रबंध लिखने वाले अनेक लोगों ने डॉक्टर की उपाधि पा ली है । तुकाराम जी के अभंग, रामकृष्णजी के वचनामृत एम. ए. की पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाये जाते हैं….. तो उनमें कितना बुद्धिमत्ता आ गयी !

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम ये सदगुण विकसित करो लाला-लालियाँ ! पद-पद पर अंतरात्मा-परमात्मा का सहयोग मिलेगा ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2020, पृष्ठ संख्या 20 अंक 325

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