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सनातन धर्म ही राष्ट्रीयता है


योगी अरविन्द जयन्तीः 15 अगस्त 2019

हिन्दू धर्म क्या है ?

दुनिया के सामने हिन्दू धर्म का संरक्षण और उत्थान – यही कार्य हमारे सामने हैं । परन्तु हिंदू धर्म क्या है ? वह धर्म क्या है जिसे हम सनातन धर्म कहते हैं ? वह धर्म हिन्दू धर्म इसी नाते है कि हिन्दू जाति ने इसको रखा (संरक्षित किया) है । समुद्र और हिमालय से घिरे हुए इस प्रायद्वीप (स्थल का वह भाग जो तीनों ओर से जल से घिरा हो) के एकांतवास में यह फला फूला है । युगों तक इसकी रक्षा करने का भार आर्य जाति को सौंपा गया था । परंतु यह धर्म किसी एक देश की सीमा से घिरा नहीं है । जिसे हम हिन्दू धर्म कहते हैं, वह वास्तव में सनातन धर्म है क्योंकि यही वह विश्वव्यापी धर्म है जो दूसरे सभी धर्मों का आलिंगन करता है । यदि कोई धर्म विश्वव्यापी न हो तो वह सनातन भी नहीं हो सकता । कोई संकुचित धर्म, साम्प्रदायिक धर्म, अनुदार धर्म कुछ काल और किसी मर्यादित हेतु के लिए ही रह सकता है । यह हिन्दू धर्म ही एक ऐसा धर्म है जो अपने अंदर विज्ञान के आविष्कारों और दर्शनशास्त्र के चिंतनों का पूर्वाभास (पूर्वज्ञान) देकर और उन्हें अपने अंदर मिला के जड़वाद (चेतन आत्मा का अस्तित्व न मानने वाला दार्शनिक मत) पर विजय प्राप्त कर सकता है । यही एक धर्म है जो मानव-जाति के दिल में यह बात बैठा देता है कि ‘भगवान हमारे निकट हैं’ । यह उन सभी साधनों को अपने अंदर ले लेता है जिनके द्वारा मनुष्य भगवान के पास पहुँच सकते हैं । यही एक धर्म है जो संसार को दिखा देता है कि संसार क्या है – वासुदेव की लीला । यही बताता है कि इस लीला में हम अपनी भूमिका अच्छी से अच्छी तरह कैसे निभा सकते हैं और यह दिखाता है कि इसके सूक्ष्म से सूक्ष्म नियम क्या हैं, इसके महान से महान विधान कौन से हैं ।

सच्ची राष्ट्रीयता

राष्ट्रीयता राजनीति नहीं बल्कि एक धर्म है, एक विश्वास है, एक निष्ठा है । सनातन धर्म ही हमारे लिए राष्ट्रीयता है । यह हिन्दू जाति सनातन धर्म को लेकर पैदा हुई है, उसी को ले के चलती है और पनपती है । जब सनातन धर्म की हानि होती है तब इस जाति की भी अवनति होती है और यदि सनातन धर्म का विनाश सम्भव होता तो सनातन धर्म के साथ-साथ इस जाति का विनाश हो जाता । सनातन धर्म ही राष्ट्रीयता है । यही वह (दैवी) संदेश है जो मैंने आपको सुनाया है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2019, पृष्ठ संख्या 10, अंक 319

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परम उन्नति के शिखर पर पहुँचाने वाली महान सीढ़ीः विश्वगुरु भारत प्रकल्प


विश्वगुरु भारत कार्यक्रमः 25 दिसम्बर से 1 जनवरी पर विशेष

भारत ही विश्वगुरु पद का अधिकारी क्यों ?

किसी भी व्यक्ति, जाति, राज्य. देश को जितने ऊँचे स्तर पर पहुँचना हो, उसके लिए उसे अपना दृष्टिकोण, कार्य, सिद्धान्त और हृदय भी उतना ही व्यापक रखना आवश्यक होता है । उसको व्यापक मांगल्य का भाव रखने के साथ-साथ संकीर्णता को दूर रखना जरूरी होता है । ऐसे उच्चातिउच्च सिद्धांत, भाव एवं कार्य भारतीय संस्कृति के मुख्य अंग हैं और ऐसे सिद्धान्तों को हृदय के अनुभव से प्रकट करने वाले, जीवन में उतारने वाले, लोगों के जीवन में भी उन सिद्धांतों को सुदृढ़ करने की क्षमता रखने वाले महापुरुष भी भारत में ही अधिक हुए हैं, हो रहे हैं और भविष्य में भी होते रहेंगे । भगवान के अवतार भी भारत में ही होते रहे हैं और आगे भी होंगे । इस कारण भारत विश्वगुरु पहले भी था और फिर से उस पद पर आसान होने का अधिकारी भी है ।

प्रकल्प का उद्देश्य व नींव

अन्य देशों पर अपना आधिपत्य जमाना यह औपनिवेशिक सभ्यताका उद्देश्य व्यवहार करना, सबकी आध्यात्मिक उऩ्नति, सर्वांगीण उन्नति को महत्त्व देना तथा हर व्यक्ति अपने  वर्तमान जीवन के हरेक पल को आनंदमय, रसमय व प्रेममय बनाये, सबका वर्तमान में एवं भविष्य में भी मंगल हो, सम्पूर्ण विश्व एक सूत्र में, आत्मिक सूत्र में बँधे और सबका मंगल, सबका भला हो – यह भारतीय संस्कृति का उद्देश्य है और इसको जन-जन के जीवन में प्रत्यक्ष करना, साकार करना यह ‘विश्वगुरु भारत प्रकल्प’ का उद्देश्य है ।

इस प्रकल्प की नींव क्या है ? इसकी नींव है आध्यात्मिकता, ब्रह्मविद्या, योगविद्या, वेदांत-ज्ञान, वेदांत के अनुभवनिष्ठ महापुरुषों की अमृतवाणी, उनके अमिट एवं अकाट्य सिद्धांत, उनका जीवन, दर्शन और मंगलमय पवित्र प्रेम-प्रवाह, जो समस्त संसार को एक सूत्र में बाँधने में पूर्ण सक्षम है, हर दिल पर राज करने में सक्षम है । इसके अलावा दूसरी किसी भी नींव पर विश्व को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास करना बालू की नींव पर विशाल बहुमंजिला इमारत बनाने के समान निरर्थक एवं बालिश प्रयास है ।

इस प्रकल्प की आवश्यकता क्यों ?

भारत विश्वगुरु होते हुए भी कुछ सदियों से अपनी आत्ममहिमा को ही भूल गया ।

अधिकांश समाज अपना आत्मविश्वास एवं आत्मबल का धन खो बैठा । क्यों ? इसलिए कि वह अपने ब्रह्मवेत्ता संतों के सान्निध्य के महत्त्व व उनसे मिलने वाले वेदांतपरक सत्शास्त्रों के ज्ञान और सिद्धांतों को भूल गया । इससे वह अपनी सुषुप्त शक्तियों को जगाने की सर्वसुलभ पद्धति से विमुख हो गया । फलतः पाश्चात्य सभ्यता के बहिर्मुखतापोषक, भौतिकवादी संस्कारों व चकाचौंध की ओर आकर्षित हो गया ।

भारत को अपनी आत्ममहिमा पुनः जगाने हेतु भारत की एकता और परम उन्नति के प्रबल पक्षधर ब्रह्मनिष्ठ संत श्री आशाराम जी बापू ने ब्रह्मसंकल्प किया कि ‘भारत विश्वगुरु था और फिर से विश्वगुरु का प्रकाश भारत से फैलेगा ।’ और इसे साकार रूप देने हेतु संत श्री द्वारा व्यापक स्तर पर अनेक प्रकल्प शुरु हुए ।

दो परिवर्तन एक साथ

आज देश व विश्व में दो परिवर्तन एक साथ देखे जा रहे हैं । जहाँ एक और निर्दोष, पवित्र, राष्ट्रसेवी, विश्वसेवी ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष पूज्य बापू जी कारावास में हैं, बाल व युवा पीढ़ी का पतन करने वाले साधनों को बढ़ावा मिल रहा है – महा पतन का युग चल रहा है, वहीं दूसरी ओर इन्हीं महापुरुष एवं उनके शिष्यों के अथक प्रयासों से भारत को पुनः विश्वगुरु पद पर आसीन करने के प्रकल्प में लोगों की सहभागिता तेजी से बढ़ रही है । देश में हो रही आध्यात्मिक क्रान्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है – पूज्य बापू जी द्वारा आरम्भ किये गये मातृ-पितृ पूजन दिवस, तुलसी पूजन दिवस, विश्वगुरु भारत कार्यक्रम आदि संस्कृतिरक्षक पर्वों में लोगों की  प्रतिवषर्ष बढ़ती जा रही सहभागिता तथा जन्मदिवस, होली, दीवाली, नूतन वर्ष व अन्य अनेक पर्वों को बापू जी के मार्गदर्शन अऩुसार प्राकृतिक, वैदिक रीति से मनाने की ओर समाज का मुड़ना, दीपावली अनुष्ठान शिविर में प्रतिवर्ष शिविरार्थियों की संख्या लगातार बढ़ना, इतने कुप्रचार के बाद भी गुरुपूर्णिमा पर प्रतिवर्ष आश्रमों में लोगों का हुजूम उमड़ना आदि ।

विश्वगुरु भारत कार्यक्रम

पूज्य बापू जी प्रणीत ‘विश्वगुरु भारत कार्यक्रम’ विश्वगुरु भारत प्रकल्प का ही एक भाग है । इसके अन्तर्गत ‘तुलसी पूजन दिवस, जप माला पूजन, सहज स्वास्थ्य एवं योग प्रशिक्षण शिविर, गौ-पूजन, गौ-गीता गंगा जागृति यात्राएँ, राष्ट्र जागृति यात्राएँ, व्यसनमुक्ति अभियान, सत्संग, कीर्तन, पाठ आदि कार्यक्रम 25 दिसम्बर से 1 जनवरी के बीच किये जाते हैं ।

यह कार्यक्रम इसी समय क्यों ?

यही वह समय है जब विश्व में सबसे ज्यादा नशाखोरी, आत्महत्याएँ, प्राणी-हत्याएँ होती हैं, तथा लोग डिप्रेशन में आ जाते हैं । यह झंझावात भारत के लोगों को पतनोन्मुख कर रहा था ।

भगवान और भगवत्प्राप्त महापुरुषों की यह एक बहुत बड़ी कला है कि वे पतन की सम्भावनाओं को धराशायी करके उसी पर  उत्थान की सीढ़ी बना देते हैं, विषाद को भी भगवत्प्रसाद पाने का विषादयोग बना देते हैं । पूज्य बापू जी कहते हैं- “हिम्मत, दृढ़ संकल्प और प्रबल पुरुषार्थ से ऐसा कोई ध्येय नहीं जो सिद्ध न हो सके । बाधाएँ पैरों तले कुचलने की चीज है । प्रेम और आनंद दिल से छलकाने की चीज है ।”

वैसे तो यह महापतन का युग है किंतु इऩ महापुरुष का पवित्र आत्मबल एवं दृढ़ संकल्प तो देखिये कि वे इस निकृष्ट काल को ही भारत को पुनः विश्वगुरु के पद पर आसीन करने के सुकाल के रूप में बदलने का भगीरथ प्रयास कर रहे हैं । देश को कुसंस्कारों की धारा व विकारी प्रेम में बहाने वाले वेलेंटाइन डे के ही काल को पूज्य बापू जी निष्काम, निर्विकारी, सच्चे प्रेम के आँसुओं से पवित्र करने वाले ‘मातृ-पितृ पूजन दिवस’ जैसे सुकाल के रूप में बदल रहे हैं ।

क्या चाहते हैं बापू आशाराम जी ?

बापू जी किसी एक जाति, धर्म, देश का ही उत्थान नहीं चाहते बल्कि ‘हिन्दु मुस्लिम सिक्ख ईसाई, बापू चाहें सबकी भलाई ।’ (श्री आशारामायण)

इसलिए ‘सबका मंगल, सबका भला ।’ यह दैवी सिद्धांत ब्रह्मवाणी के रूप में पूज्य बापू जी के श्रीमुख से और संकल्परूप में हृदय से प्रायः स्फुरित होता रहता है । बापू जी चाहते हैं कि ‘सबके बेटे-बेटियाँ संस्कारी हों, सब दुर्व्यसनों, अवसाद व आत्महत्याएँ से बचें । अपने जीवन में गीता-ज्ञान लायें, गौ-महिमा जानें, भगवन्नाम-जप का लाभ लें व संकीर्तन यात्रा निकालकर वैचारिक प्रदूषण को मिटा के वैचारिक क्रांति लायें । भगवन्नाम, भगवत्प्रेम व संकीर्तन से वातावरण में फैली नकारात्मकता को धो डालें और पूरे देश में एक ऐसा वातावरण बना दें कि जिसकी आभा में आने मात्र से, इस भारतभूमि पर कदम रखने मात्र से व्यक्ति के विचार बदलने लगें ।’

क्या होगा इस प्रकल्प का परिणाम ?

पूज्य बापू जी का यह दैवी प्रकल्प आज देशभर में सराहा जा रहा है और वैश्विक स्तर पर व्यापक होता जा रहा है । अनेक लोग इससे जुड़कर अपने जीवन को उन्नत बना रहे हैं और जो थोड़े बहुत लोग पाश्चात्य अंधानुकरण के मार्ग पर जा रहे थे, पूज्य श्री उनको फिर से अपनी सस्कृति और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करा रहे हैं ।

आप यदि पूज्य बापू जी के आश्रम में तो क्या, उस ओर जाने वाली निकट की सड़क पर भी कदम रखते हैं तो भी आप अपने विचारों में दिव्यता का अनुभव कर सकते हैं । असंख्य लोगों का यह प्रत्यक्ष अनुभव है । जब बापू जी के आश्रम की आभा में आने मात्र से ऐसा वैचारिक परिवर्तन होता है तो हम सब भारतवासी इन महापुरुष के इस ईश्वरीय प्रकल्प में जुड़कर एकजुट हो जायें तो वह दिन भी दूर नहीं जब भारत की पुण्यभूमि पर कदम रखने मात्र से पतित-से-पतित विचारों वाले के विचार भी पुण्यमय बनने लगें । उनके हृदय में बसा विकारी आकर्षण, स्वार्थ, अपराध-वृत्ति – यह सब मटियामेट हो के भगवत्प्रेम हिलोरे लेने लगे ।

प्रकल्प का विशेष लाभ लेना हो तो…..

पूज्य बापू जी का यह अकाट्य संकल्प पूरा होकर ही रहेगा पर हमें विशेष लाभ, आत्मसंतोष एवं रस तो तब मिलेगा जब हम भी इसमें निमित्त बनने का लाभ लेते हुए वर्तमान में भी रसमय आनंदमय होते जायें ।

पूज्य बापू जी द्वारा ‘विश्वगुरु भारत प्रकल्प’ के अंतर्गत चलाये जा रहे विभिन्न सेवा-प्रकल्पों से जुड़ के व औरों को जोड़ के आप भी परम लाभ के मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं, स्वर्णिम इतिहास में अपनी भूमिका निभा सकते हैं ।

अधिक जानकारी हेतु सम्पर्कः

079 – 39877788, 27505010-11

ईमेलः ashramindia@ashram.org  – मनोज मेहेर

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2018, पृष्ठ संख्या 2, 28,29 अंक 312

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समाजोत्थान में संतों की महती भूमिका


सच्चे संत जाति, धर्म, मत, पंथ, सम्प्रदाय आदि दायरों से परे होते हैं। ऐसे करुणावान संत ही अज्ञान-निद्रा में सोये हुए समाज के बीच आकर लोगों में भगवद्भक्ति, भगवद्ज्ञान, निष्काम कर्म की प्रेरणा जगा के समाज को सही मार्ग दिखाते हैं, जिस पर चल के हर वर्ग के लोग आध्यात्मिकता की ऊँचाईयों को छूने के साथ-साथ अपना सर्वांगीण विकास सहज में ही कर लेते हैं। सभी में भगवद्-दर्शन करने की प्रेरणा देने वाले ऐसे संतों के द्वारा ही धार्मिक अहिष्णुता, छुआछूत, जातिगत भेदभाव, राग-द्वेष आदि अनेक दोष दूर होकर समाज का व्यापक हित होता है।

ऐसे संतों का जहाँ भी अवतरण हुआ है वहाँ भारतीय संस्कृति के वैदिक ज्ञान का प्रचार-प्रसार होकर समाज में व्यापक परिवर्तन हुए हैं।

जब समाज में कई विकृतियाँ फैलने लगीं तब आद्य गुरु शंकराचार्य जी ने अपने शिष्यों के साथ भारत के कोने-कोने में घूम-घूमकर सनातन धर्म व अद्वैत ज्ञान का प्रचार किया।

यवनों के आक्रमण से जब सम्पूर्ण हिन्दू समाज त्रस्त था तब योगी गोरखनाथ जी व नाथ-परम्परा के योगियों ने समाज में धर्मनिष्ठा व अध्यात्म का प्रचार-प्रसार किया।

राजस्थान में राजर्षि संत पीपा जी ने काशी के स्वामी रामानंद जी से दीक्षा ले के प्रजा को धर्म-मार्ग पर लगाया तो भक्तिमती मीराबाई ने गुरु रैदास जी का शिष्त्व स्वीकार कर सारे राजस्थान और गुजरात में भगवद्भक्ति की गंगा बहायी।

तमिलनाडू के आलवारों (वैष्णव भक्त), नायनारों (शैव भक्त) तथा संत तिरुवल्लुवर जैसे संतों से बड़ी संख्या में लोग लाभान्वित हुए। 11वीं-12वीं शताब्दी में श्री रामानुजाचार्यजी ने ‘वेदांत भक्ति’ का भारतभर में प्रचार किया। आँध्र प्रदेश के संत वेमना के उपदेशों का समाज पर बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा।

गुजरात के संत नरसिंह मेहता जी, संत प्रीतमदास जी आदि ने भी प्रभुभक्ति का प्रचार किया और समाज को सही दिशा दी।

संत तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस तथा अन्य कई ग्रंथों की प्रचलित भाषा में रचना करके सामान्य जनों को आदर्श जीवन जीने की रीति बतायी और उनके जीवन को भक्ति रस से सराबोर कर दिया।

महाराष्ट्र के संतजन – ज्ञानेश्वरजी, नामदेव जी, एकनाथ जी, तुकाराम जी, चोखामेला, राँका, बाँका, जनाबाई, नरहरि जी आदि ने और वारकरी सम्प्रदाय के अन्य संतों ने जब घूम-घूम के भगवन्नाम-संकीर्तन के माध्यम से समाज को जगाना शुरु किया तो लाखों लोग उनके अनुयायी बन भगवद्भक्ति के रास्ते चल पड़े।

सम्पूर्ण महाराष्ट्र संकीर्तन क्रांति में उल्लसित होने लगा। समर्थ रामदास जी के शिष्य शिवाजी महाराज ने विधर्मी आक्रांताओं से पीड़ित समाज में प्राण फूँककर हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना की।

पंजाब के संत गुरुनानक देव जी से गुरु गोविन्दसिंह जी तक दस गुरुओं की परम्परा द्वारा पंजाब एवं देश के अन्य भागों के भी लोग लाभान्वित हुए। गुरु हरगोविन्दसिंह, गुरु तेगबहादुर, गुरु गोविन्दसिंह और उनके शिष्यों ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर देशवासियों की धर्मांतरण से रक्षा की।

कर्नाटक के श्री अल्लमप्रभुजी, अक्का महादेवी जी, श्री मध्वाचार्य जी तथा संत पुरंदरदास जी, कनकदास जी आदि ने ज्ञान व भक्ति के माध्यम से समाज की आध्यात्मिक उन्नति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। स्वामी विद्यारण्यजी ने विजयनगर साम्राज्य की स्थापना करके हिन्दू संस्कृति व धर्मशास्त्रों की यवनों से रक्षा की।

ओड़िशा की ‘वैष्णव-पंचसखा परम्परा’ के भक्तों एवं भक्त भीम भोई, दासिया बाउरी, रघु केवट आदि ने लोगों के भक्तिभाव को पुष्ट किया। बलरामदास जी के ‘रामायण’, शारलादास जी के ‘महाभारत’ व जगन्नाथदास जी के ‘भागवत’ ओड़िशावासियों के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला।

बंगाल के श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने शिष्यों के साथ सम्पूर्ण देश में संकीर्तन यात्राओं द्वारा भगवन्नाम का प्रचार किया। उन यात्राओं में मुसलमान भी शामिल होते थे। आक्रांताओं द्वारा नष्ट व लुप्त हुए कई तीर्थस्थलों को गौरांग व उनके शिष्यों ने पुनः खोज निकाला। रामकृष्ण परमंहस जी के सत्शिष्य स्वामी विवेकानंद जी ने विदेशों में भी वेदांत का प्रचार किया और स्वदेश में जवानों को राष्ट्रभक्ति के संदेशों के माध्यम से अंग्रेज शासन से स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए प्रेरित किया।

असम में श्रीमंत शंकरदेव जी, श्री माधवदेव जी आदि ने धार्मिक-सामाजिक उत्थान में अहम भूमिका निभायी।

संत उड़िया बाबा जी, स्वामी अखंडानंद जी, आनंदमयी माँ, हरि बाबा जी, रमण महर्षि, स्वामी रामतीर्थ, स्वामी शिवानंद सरस्वती आदि संतों ने भारतीय संस्कृति का अध्यात्म-ज्ञान सरल भाषा में समाज तक पहुँचाया।

काशी के स्वामी रामानंद जी ने हर वर्ग के लोगों में आध्यात्मिक प्रसाद बाँटा। उस समय का सूत्र हो गयाः ‘जाति पांति पूछै नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।’ उनके शिष्य संत कबीर जी, रैदास जी, धन्ना जी आदि अनेक संतों ने लोगों में परमात्मप्राप्ति का अलख जगाया।

इस परम्परा के दादूपंथी संतों ने अपने गुरु की वाणियों के साथ पूर्व के संतों की वाणियों का भी संरक्षण किया, जिनसे बड़ी संख्या में जनता लाभान्वित हुई। संत दादू दयाल जी की परम्परा के संत निश्चलदास जी ने ‘विचारसागर’ ग्रंथ की रचना कर वेदांत का गूढ़ ज्ञान लोगों को प्राकृत भाषा में सुलभ करा दिया।

इसी संत-परम्परा में स्वामी केशवानंद जी महाराज के सत्शिष्य भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाह जी ने समाज में वेदांत-ज्ञान, भक्ति व कर्मयोग का प्रचार किया एवं बाल, युवा, नर-नारी – सभी को संयम-सदाचार की शिक्षा देकर उनका आत्मोत्थान किया। आपने भारत के अलावा विदेशों में भी सत्संगों द्वारा लोगों में सामाजिक, धार्मिक व आध्यात्मिक जागृति की।

समाज की आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग को प्रशस्त करने वाली इस दिव्य ज्योति को जागृत रखने के लिए पूज्यपाद स्वामी लीलाशाह जी के सत्शिष्य संत श्री आशाराम जी बापू गाँव-गाँव, नगरों-महानगरों में घूम-घूमकर कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग के साथ कुंडलिनी योग आदि का समन्वय करते हुए जीवन को सुखी स्वस्थ व सम्मानित बनाने वाला सत्संग एवं ध्यान का प्रसाद बाँटने लगे। वर्तमान में भी देश-विदेश के करोड़ों लोग आपके मार्गदर्शन में परम ध्येय ईश्वरप्राप्ति की ओर अग्रसर हो रहे हैं।

आपने समाज के पिछड़े, अभावग्रस्त लोगों को भोजन, भजन, कीर्तन, सत्संग लाभ एवं जीवनोपयोगी वस्तुएँ व आर्थिक सहायता देकर उन्हें स्वधर्म के प्रति निष्ठावान बनाया व धर्मांतरण से बचाया। कत्लखाने भेजी जा रही हजारों गायों की रक्षा की और उनके लिए गौशालाएँ बनवायीं।

पूज्य श्री ने खान-पान, पहनावा, जन्मदिवस मनाने, बच्चों का नामकरण करने तथा पर्वों को मनाने की पद्धतियों में आयी विकृतियों से समाज को सावधान किया तथा इन सबके हितकारी तौर-तरीके बताकर उनके पीछे छुपे आध्यात्मिक रहस्यों को भी समझाया। आपने संयम-सदाचार प्रेरक ‘युवाधन सुरक्षा अभियान’ चलाया तथा मातृ-पितृ पूजन दिवस (14  फरवरी) व तुलसी पूजन दिवस (25 दिसम्बर) जैसे संस्कृतिरक्षक पर्वों का शुभारम्भ किया।

जब-जब संतों व संस्कृति पर कोई आँच आयी तब-तब पूज्य बापू जी ने मजबूत ढाल बनकर उसका सामना किया। काँची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वती पर जब झूठा आरोप लगा तब आप दिल्ली में धरना देने के लिए पहुँच गये। इसी प्रकार सत्य साँईं बाबा, कृपालु जी महाराज, साध्वी प्रज्ञा, रामदेव बाबा, आचार्य बालकृष्ण आदि के खिलाफ जब कीचड़ उछाला गया तब भी आपने उसके खिलाफ आवाज उठायी। आपकी प्रेरणा से समय-समय पर प्रेरणा सभाएँ, संत सम्मेलन आदि आयोजित किये जाते रहे हैं। आपने भारत को विश्वगुरु पद पर देखने के लिए अपना पूरा जीवन लगाया है।

आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, भौतिक तथा अन्य सभी दृष्टियों से समाज का उत्थान हमारे संतों-महापुरुषों के द्वारा ही हुआ है। संतों ने ही परस्परं भावयन्तु – एक दूसरे को उन्नत करने का भाव तथा मानव को महामना बनाने वाला धर्म, संस्कृति के सिद्धान्तों को समाज में स्थापित किया। समाज सदैव उनका ऋणी रहेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2018, पृष्ठ संख्या 2,7,8 अंक 305

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