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हरिया ने संत को सुंदरी की सारी व्यथा सुनाई… कौन थी सुंदरी और क्या थी व्यथा पढ़िये…


गुरूभक्तियोग दिव्य सुख के द्वार खोलने के लिए गुरुचाबी है। गुरूभक्तियोग के अभ्यास से सर्वोच्च शांति के राजमार्ग का मार्ग प्रारंभ होता है। गुरूभक्तियोग का अभ्यास किये बिना साधक के लिए ईश्वर साक्षात्कार की ओर ले जानेवाले अध्यात्मिक मार्ग में प्रविष्ट होना संभव नहीं है। सद्गुरु के पवित्र चरणों में आत्मसमर्पण करना ही गुरुभक्तियोग की नींव है।

विष और विषयों में गहरा अंतर है। एक को खाने से व्यक्ति मरता है और दूसरे का स्मरण करने मात्र से ही मर जाता है। सद्गुरु की ज्ञानरूपी रथ ऐसी सवारी है जो अपने सवार को कभी गिरने नहीं देती न किसी के कदमों में न किसी की नजरों में।

एक कल्पित कथा है। एक गांव में कुछ किसान चौपाल पर बैठकर बातचीत कर रहे थे। तभी उनका एक साथी हरिया दौड़ते हुए उनके पास आया। सभी साथियों ने पूछा, “हरिया! का बात हुई गई? इतना परेशान काहे हो?”

तब हरिया बोला, “का बताये भैय्या! रोज के जैसे आज सुबह भी हम अपनी गाय सुंदरी को चारा खिला रहे थे। पर पता नहीं कब और कैसे हमार मोबइलवा जेब से चारे में गिर गया।”

सभी ने पूछा, “फिर?”

हरिया बोला, ” फिर का? हमार उठावे से पहले ही हमार सुंदरी चारे के साथ मोबइलवा को निगल गई।”

“इका गजब हुई गया!” सभी किसान एकसाथ बोले।

अब का बताये। तब से अब तक हमार सुंदरी बहुत परेशान है।

हरिया रोते हुए स्वर में बोला, पता नहीं का हो गया है। ना खात है, ना पिवत है, न ही दूध देत है। बस एको जगह खड़ी रहती है। बड़ी तकलीफ में है बेचारी!… और जैसे ही हमार फोन बजत है, तब तो उसका दर्दभरा रंभाना हमसे तनिक न देख जात है। का करे भैय्या! हमार तो समझ में कछु नहीं आत है।

समस्या का हल ढूंढने के लिए सभी गांव वालों ने अपनी दिमाग की बत्तियां जलानी शुरू कर दी। परन्तु सुझाव का दीया तो दूर एक चिंगारी भी नहीं जली। अब करते भी तो क्या? डॉक्टर के पास जाने के लिए तो शहर जाना पड़ता और शहर जाने का खर्चा उठाते तो किसीसे उधार लेना पड़ता। उधार लेते तो चुकाते-2 उम्र निकल जाती। हरिया के सिर पर तो पहले से ही उसकी दो बेटियों की शादी का भारी कर्ज था।

आखिरकार सबने कहा, “अब ईश्वर की ही मर्जी है तो हम सब भी का कर सकत है?” उसी वक्त गांव के रास्ते से एक संत गुजर रहे थे। संत को देखकर सबने सोचा कि ये कोई ज्ञानी महापुरुष जान पड़ते हैं। चलो इन्हींसे पूछ लेते हैं। शायद कोई परामर्श मिल सके। जिससे सुंदरी की तकलीफ कम हो जाय।

सभी ने संत के पास जाकर उनको प्रणाम किया। हरिया ने झट अपनी सारी व्यथा उनको सुनाई। संत उसकी व्यथा सुनकर कुछ देर के लिए मौन हो गये। फिर हरिया को बोले कि, पहाड़ी के नीचे जो कुंआ है, सुंदरी को वह उसके पास ले आये।

पहाड़ी के नीचे पहुंचकर संत ने एक किसान से कहा कि अब हरिया के मोबाइल पर फोन कर। ऐसा करने पर इस किसान को सुनने में आया कि जो नम्बर आप डायल कर रहे हैं वह अभी पहुंच से बाहर है, कृपया थोड़ी देर बाद डायल करे। उधर सुंदरी के पेट से फोन की घण्टी भी नहीं सुनाई दी।

हरिया खुशी से उछल पड़ा। संत के चरणों में गिरकर बालकवत पूछने लगा कि हे संत महाराज! इह कैसन हुवत?

संत बोले, गांव के इस भाग में मोबाइल नेटवर्क नहीं पहुँचता है, इसलिए फोन की घण्टी नहीं बजी और सुंदरी को कोई तकलीफ भी नहीं हुई।

अरे वाह! हरिया चहक उठा। सामने देखता है कि सुंदरी घास खा रही है और कुछ घंटों बाद हरिया को अपना मोबाइल भी सुंदरी के ताजे गोबर के साथ मिल गया।

ऊपर लिखित कल्पित कहानी हमें दिक्कतों से जुड़ने का गोपनीय संकेत देते हुए कहती है कि जब कभी हमें मुश्किल परिस्थितियों में कोई सुमार्ग न दिखे, हमारा मन द्वंद्वों के जाल में फंस जाये और हम इस मन के विषय-विकारों के तूफान से बाहर निकलने में असमर्थ महसूस कर रहे हो, तब सद्गुरु की शरण में जाये।

सद्गुरु ही हमें चिंता, शोक और भय की चोटी से वहां ले जायेंगे जहां समग्र मुसीबतों का नेटवर्क फेल हो जाता है। जहां हमारी मन की अटकलें अपना नेटवर्क पकड़ ही नहीं पाते। करना बस इतना है कि सच्चे समर्पण भाव से सद्गुरु को शरणागत हो जाये। इस संपूर्ण विश्व में सद्गुरु ही एक ऐसे सूर्य हैं, जिनके प्रत्यक्ष होने पर मन की समस्त कालिमा और अंधकार अयत्न ही नाश हो जाता है।

सद्गुरु प्राप्ति के पश्चात भी कई साधक दुःखातुर, चिंतातुर और शोकातुर रहते हैं तो उनको अपना निरीक्षण स्वयं करना चाहिए। सद्गुरु से विमुखता ही अर्थात सद्गुरु के सीख से विमुखता ही साधक को दुःख, शोक और चिंता उत्पन्न कराती है। सद्गुरु से विमुखता ही साधक के पतन का कारण बनती है।

अंतर मन में उठते उन प्रश्नों का गुरुजी ने किया समाधान…आप भी पढि़ये….


जो संपूर्ण भाव से अपनी गुरु की अथक सेवा करता है, उसे दुनियादारी के विचार नहीं आते। इस दुनिया में वह सबसे अधिक भाग्यवान है। बस अपने गुरु की सेवा करो! सेवा करो! सेवा करो! गुरुभक्ति विकसित करने का यह राजमार्ग है।

गुरु माने सच्चिदानंद परमात्मा! पूज्य आचार्य की सेवा जैसी हितकारी और आत्मोन्नति करनेवाली और कोई सेवा नहीं है।सच्चा आराम दैवी गुरु की सेवा में ही निहित है। ऐसा दूसरा कोई सच्चा आराम नहीं है। किसी भी प्रकार के स्वार्थ हेतु के बिना आचार्य की पवित्र सेवा जीवन को निश्चित आकार देती है।

शिष्य ने पूछा कि गुरुदेव! क्या सेवा एक प्रकार की मजदूरी है जो एक शिष्य को करनी जरूरी है।

गुरुदेव ने कहा कि मजदूरी मजबूरी में की जाती है, परन्तु सेवा प्रेम में और प्रेम से की जाती है। फिर दोनों में क्या बराबरी?… एक और बात मजदूरी करके मजदूर मालिक से कुछ लेना चाहता है, परन्तु मालिक देने से कतराता है लेकिन सेवा का तो दस्तूर ही अलग है। गुरु अपने सेवक को देना और देना ही चाहते हैं, परन्तु शिष्य है कि जी-जान से सेवा करके भी कुछ लेने की चाह नहीं रखता।

गुरुदेव! आपकी समीपता पाने के लिए हम क्या करें?

गुरुदेव ने कहा कि पहले तो समीपता की परिभाषा जान लो। गुरु के शारिरीक रूप से निकटता, गुरु से निकटता का मापदंड नहीं है। जो दास जीसस के पास रहकर भी जीसस से दूर रहा, लेकिन शबरी दूर रहकर भी श्रीराम के निकट से निकट रही। इसलिए गुरुदेव की समीपता को पाना है तो उनसे भावतरंगो का रिश्ता स्थापित करो, हृदय से हृदय की तारों को जोड़ो।

गुरुदेव! मुझे कभी-2 अपनी योग्यताओं पर अभिमान हो जाता है।

गुरुदेव ने कहा कि, जो साधक, जो शिष्य अपने गुरु को ही सर्वस्व मानता हो, अपने अस्तित्व को गुरु में विलीन कर दिया हो, ऐसे शिष्य में अभिमान किस बात का?…और अभिमान तभी आता है जब गुरु और शिष्य में निकटता ना होकर दूरी ही बनी रहे। उस दूरी में अभिमान का जन्म होता है। गुरु और अभिमान ये दोनों एक तरह से विपरीत शब्द है, जैसे कि अंधकार और प्रकाश।

एकबार अंधकार ब्रह्माजी के पास शिकायत लेकर पहुंचा। उसने कहा, भगवंत! प्रकाश मेरा जन्म से बैरी है। मैंने उसे कभी कोई हानि नहीं पहुंचाई, लेकिन वह है कि हमेशा मेरे अस्तित्व को खत्म करने पर उतालु रहता है। आप ही उसे समझाये।

ब्रह्माजी ने कहा, तुम चिंता मत करो। मैं अभी उसे बुलाकर दंडित करता हूँ।

प्रकाश को तुरंत उपस्थित होने का आदेश दिया गया। प्रकाश के आने पर जब ब्रम्हाजी ने उसे अंधकार की शिकायत बताई, तो प्रकाश ने कहा कि भगवंत! मैं और अंधकार का बैरी! यह कैसे हो सकता है? मैं तो आजतक उससे मिला ही नहीं।

ब्रह्माजी ने कहा, अभी तुम दोनों का आमना सामना करा देते हैं। अंधकार को बुलाया गया, परन्तु वह आया ही नहीं या यूं कहे की आ ही नहीं पाया।

ठीक ऐसे ही जिस साधक के जीवन में मात्र गुरु और उनकी कृपा की स्मृति रहती है, उसके जीवन में अहंकार आ ही नहीं सकता। अपनी योग्यताओं पर गर्वित ना होकर गुरु की कृपा पर आश्रित रहे,उनकी कृपा की स्मृति सदैव बनी रहे। फिर आप अपने योग्यताओं पर अभिमान नही करेंगे, बल्कि गुरु की कृपा पर स्वाभिमानी बने रहेंगे।

गुरुजी! मोक्ष श्रेष्ठ है या भक्तात्मा बनकर अनेकानेक जन्मों तक गुरु की चरणों की सेवा श्रेष्ठ है।

गुरुदेव ने कहा, यह तो आप पर निर्भर करता है। यदि आप मोक्ष के अभिलाषी है तो आपके लिए मोक्ष श्रेष्ठ है, परन्तु यदि आपकी प्रीति गुरुदेव से है तो उनकी सेवा से बढ़कर आपके लिए और क्या हो सकता है?

मोक्ष प्राप्त कर लेना या गुरुसेवा का अवसर पाना दोनों में अंतर ऐसा है, जैसे कि चीनी बन जाना और चीनी के स्वाद का आनंद उठाना। मोक्ष अर्थात जन्म-मरण के आवागमन से मुक्ति! ईश्वर से मिलन! प्रभु के निराकार रूप से एकाकार होना यानी स्वयं ईश्वररूप हो जाना… और वही दिव्यता जब साकार रूप में गुरु बनकर इस धरती पर उतरती है, तो उनके सान्निध्य का, उनसे स्फुरित होती स्पंदनों का ,उनकी चरणों की सेवा का आनंद लेना चीनी की स्वाद का आनंद लेने जैसा है। अब आप स्वयं ही निर्णय लीजिए कि आप मोक्ष की उपाधि चाहते हैं या साकार का सान्निध्य चाहते हैं।

लेहज्जो की पूर्णता तक पहुंचने की यात्रा आपको उत्साहित कर देगी


लेहज्जो की पूर्णता तक पहुंचने की यात्रा आपको उत्साहित कर देगी …

गुरुभक्ति योग के अभ्यास से अमरत्व, सर्वोत्तम शांति और शाश्वत आनंद प्राप्त होता है।

गुरू प्रेम और करुणा की मूर्ति है। आपको अगर उनके आशीर्वाद प्राप्त करने हो तो आपको भी प्रेम और करुणा की मूर्ति बनना चाहिए। धन्य है, विनम्र लोगों को धन्यवाद है, विनम्र लोगों को क्योंकि उन्हें तुरंत गुरुकृपा मिल जाती है। जिन्होंने गुरु की शरण ली है ऐसे पवित्र आत्माओं को धन्यवाद है, क्योंकि उनको परमसुख अवश्य प्राप्त होता है।

संत कबीर साहब कहते हैं कि,

*कर्ता करी न कर सके गुरु करे सो होय। गुरु समान दाता नहीं जाचक शिष्य समान । तीन लोक की संपदा सो गुरू दीन्हा दान।*

गुरु के जैसा देने वाला कोई नहीं है । गुरु का अर्थ ही है जो दिए चले जाएं । परंतु वह जो दे रहे हैं वह बड़ा सुक्ष्म है,अगर तुम शूद्र चीजों को मांगने गए हो तो वहां से खाली हाथ लौटोगे,अगर तुम विराट को मांगने गए हो तो भरपूर मिलेगा।

गुरु समान दाता नहीं, लेकिन उनका दान तभी संभव हो सकता है जब शिष्य भिखारी की तरह आए। तुम अगर अकड़े हुए आए तुम अगर ऐसे आए जैसे कि तुम कोई हकदार हो, कि मैंने इतनी साधना की है, इतने अनुष्ठान किए हैं और तुम्हें कुछ मिलना चाहिए, तो तुम चूक जाओगे।

याचक शिष्य समान और शिष्य तो ऐसा हो कि परम भिखारी। शिष्य तो ऐसा हो जैसे उसका हृदय सिर्फ भिक्षा का पात्र हो। परम याचक तो गुरु से मेल बनता है, क्योंकि परम दाता से परम याचक का ही मेल बन सकता है। गुरु उड़ेलते हो और तुम उल्टे घड़े की भांति हो तो सब व्यर्थ चला जाएगा। भिक्षुक का अर्थ है जिसका घड़ा सीधा हो।

चीन में एक ज्ञानी संत हुए लिहज्जो।

लिहज्जो के पास एक शिष्य आया और कुछ पूछा, जिज्ञासा प्रकट की।

लिहज्जो ने कहा, “समय आने पर जवाब देंगे। पूछते तो हो लेकिन लेने की हिम्मत है, दे तो दूंगा, दब तो ना जाओगे उसमें ? और तुम्हें पता भी है, तुम क्या मांगते हो?”

इतना सुनते ही शिष्य थोड़ा डर गया। वो साल भर चुप ही रहा लेकिन शिष्य ने देखा कि, गुरू तो इस प्रश्न का उत्तर ही नहीं दे रहे। सोचा कि शायद इस व्यक्ति को कुछ पता ही नहीं। सालभर बाद गुरु को छोड़कर चला गया। दूसरे गुरू के पास पहुंचा और वहां जाकर कहा कि,

” मैं साल भर लिहज्जो के पास था, कुछ मिला नहीं और इसलिए यहां आया हूं। “

महात्मा ने कहा, “तू अभी यहां से चला जा ,क्योंकि तेरे पास पात्र ही नहीं है। जब लिहज्जो ना भर सके तो मैं तो गरीब आदमी हूं ,मैं तुझे क्या दूंगा लिहज्जो के पास से खाली हाथ लौट आया, पागल तो मेरे पास तो कुछ भी नहीं है।”

ऐसी बातें सुनकर शिष्य फिर लिहज्जो के पास वापस लौटा। उसने कहा कि, “गुरुदेव बड़ी हैरानी की बात है अब मैं क्या करूं? एक दो जगह गया, उन्होंने कहा जब लिहज्जो के पास गए जब उस विराट सरोवर के पास से प्यासे लौट आए, तो हम तो छोटे डबरे है। हम तुम्हारे काम ना पड़ेंगे । इसलिए मैं वापस आया हूं।”

लिहज्जो ने कहा, “सुन जब मैं अपने गुरु के पास आया तो 3 साल तो मेरे गुरु ने मेरी तरफ देखा ही नहीं, तो और कुछ पूछने का सवाल ही न उठा। क्योंकि वह मेरे तरफ देखे ही नहीं वो सबकी तरफ देखें और मुझे छोड़ दे। और वो इस तरह छोड़ दें जैसे वह खाली जगह है। गुरु कृपा से गुरु का संकेत मैं समझ गया कि मुझे खाली जगह की भांति हो जाना चाहिए। इसलिए शायद गुरुदेव मुझे देखते ही नहीं।और यदि तुम होते तो तुम भाग गए होते, तुम्हारे अहंकार को चोट लगती कि मैं आया हूं और मुझे देखा नहीं जा रहा है। 3 साल जब मैं बैठा रहा और धीरे-धीरे राजी हो गया कि ठीक जो गुरुदेव की मर्जी तो एक दिन गुरु जी ने मेरी तरफ देखा, मानो आनंद की वर्षा हो गई , इतना पुलकित हो गया जैसे मैं कभी नहीं था। क्योंकि 3 साल चुपचाप बैठे रहना ऐसे जैसे हूं ही नहीं,वो देखे ही नहीं औरों से बातचीत करें ,पूछे परंतु मेरी तरफ देखे ही नहीं और एक-दो दिन की बात नहीं 3 साल का लंबा वक्त है। परंतु गुरुदेव की उस दृष्टि से मैं पर्याप्त हो गया मैं भर गया। फिर तो फिक्र ही नहीं फिर 3 साल और बीत गए पहले तो उनसे मुझे शून्य होने का संकेत मिला और जब उनकी दृष्टि मेरी तरफ पड़ी तो मैं समझ गया कि उनका इशारा क्या है कि मुझे देखने वाला दृष्टा हो जाना चाहिए। जैसे उन्होंने देखा ऐसे ही अब मैं अपने को देखूं, 3 साल मै अपने को देखता ही रहा।तब फिर एक दिन गुरूजी फिर एक दिन गुरुजी ने नजर मेरी तरफ की और पहली दफा गुरुदेव मुस्कुराए, धन्य मेरे भाग, अब मैं समझ गया उनका इशारा ।

पहले परम शून्य हो जाओ,

दूसरा इशारा दृष्टा हो जाओ, साक्षी हो जाओ,

और अब आनंदित हो जाओ।

यह संकेत मिलते ही मैं अकारण मुस्कुराने लगा और अकारण हंसने लगा और अकारण उत्सव मनाने लगा। अकारण प्रसन्न होने लगा।

समस्त जगत मेरे लिए आनंद स्वरूप हो गया, गुरुमय हो गया। लोग मुझे पागल समझने लगे। फिर गुरुदेव 3 साल बाद मेरे पास आए उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा उन्होंने कहा, “अब तेरी साधना पूरी हो गई। अब मुझ में और तुझ में कुछ भेद न रहा अब तू जा दूसरों को जगा, तुझे मिल गया अब औरो को दे।”

लिहज्जो ने कहा कि, “और एक तू है जो साल भर यहां बैठा तो जरूर रहा लेकिन क्षण भर को भी शांत ना हुआ , अपने गुरुदेव को निहार न सका और तेरे मन में वही प्रश्न गूंजता रहा कि कब उत्तर मिलेगा? जैसे उत्तर ज्यादा महत्वपूर्ण था और गुरु कम महत्वपूर्ण थे। तुम्हारे प्रश्न तुम्हें बहुत महत्वपूर्ण मालूम पड़ते हैं ,क्यों ? क्योंकि अहंकार के कारण उत्तर चाहिए वो भी अहंकार की ही मांग है। अपने अहंकार को गुरू के स्वरूप में विलय कर दो गुरु के चरणों में विलय कर दो, फिर गुरु से कुछ पूछना ना पड़ेगा। कोई भ्रांति शेष न रह जाएगी, जैसे सूर्य के समक्ष प्रकाश के लिए पूछना नहीं पड़ता। सरोवर के समक्ष शीतलता के लिए… और जल के लिए पूछना नहीं पड़ता।