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Prerak Prasang

जोंक नहीं, बछड़ा बन !


वासनावान लोगों की स्थिति समझाने के लिए महात्मा आनंद स्वामी अपने जीवन का एक प्रसंग बताते हुए कहते हैं- मैं छोटा सा था । एक गाय थी हमारे घर में । पिता जी ने कहाः “जा, उसे घुमा ला, पानी पिला ला ।”

हमारे गाँव के पास एक तालाब था । गाय उसके किनारे-किनारे घूमने लगी । मैं थोड़ा परे जाकर खेलता रहा । कुछ देर बाद गाय को लेने आय तो देखा कि उसके थनों से चार-पाँच जोंकें चिपटी थीं – बहुत फूली हूई, मोटी-माटी । मैं घबराया कि अब पिताजी मारेंगे । रोता-रोता उनके पास पहुँचा ।

उन्होंने पूछाः “रोता क्यों है ?”

मैंने बतायाः “ये जोंकें सारा दूध पी गयीं । अब गाय दूध कैसे देगी ?”

पिताजी हँसते हुए बोलेः “घबराओ नहीं । ये दूध नहीं पीतीं, केवल लहू पीती हैं ।”

हाय रे दुर्भाग्य ! दूध जैसी अमृत-वस्तु के पास पहुँचकर भी अभागी जोंकों को दूध पीने की नहीं सूझती, केवल लहू पीती हैं । किंतु केवल जोंकें ही तो अभागी नहीं हैं । वासनाओं का रक्त मुँह में लग जाय तो मनुष्य भी जोंकों से कम नहीं । ऐसे मनुष्यों से मेरा यही निवेदन है कि “हे मानव ! अपने लिए दुर्भाग्य पैदा मत कर ! बछड़ा बन, जोंक न बन ! परमात्म-ज्ञान, परमात्म-शांति रूपी अमृतभरा दूध पी, वासनारूपी रक्त-पान न कर !”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2021, पृष्ठ संख्या 25, अंक 337

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मन का नाश करना है तो……


स्वामी शरणानंदजी के एक भक्त थे प्राध्यापक केशरी कुमार । वे अपने जीवन की एक घटित घटना का उल्लेख करते हुए लिखते हैं-

राँची की घटना है । एक वृद्ध वकील साहब स्वामी जी (शरणानंदजी) के पास आये, जो राँची में गाँधी जी के मेजबान थे और जिन्हें राँची वाले प्यार से नगरपिता कहते थे । आते ही बोलेः ″स्वामी जी ! मन अब तक न मरा । कोई ऐसा चाबुक बताइये जिससे मार-मारकर इसे खत्म कर दें ।″

स्वामी जी ने कहाः ″गाँधी जी के मेजबान होकर भी आप मारने की बात करते हैं । बलपूर्वक मारने की जितनी चेष्टा करेंगे, मन उतना ही प्रबल होगा । आप ही की सत्ता से सत्ता पाकर मन आप पर शासन करता है । मन आपका है, आप मन नहीं हैं । अंतः न तो उसे बलपूर्वक मारने की चेष्टा करो, न सहयोग करो । गाँधी जी का अमोघ अस्त्र है ‘असहयोग’ । मन से असहयोग करो । मन के जलूस को देखते रहिये, उसमें शामिल न होइये । बस, मजा आ जायेगा । मुश्किल यह है कि आप चाहते हैं क्रांति और करते हैं आन्दोलन ।″

वकील साहब बोलेः ″महाराज ! आंदोलन और क्रांति तो एक ही चीज है । आंदोलन न करेंगे तो क्रांति होगी कैसे ?″

स्वामी जीः ″नहीं महाराज ! आंदोलन है बलपूर्वक अपनी बात दूसरों से मनवाना और क्रांति है हर्षपूर्वक कष्ट सहकर तपना व स्वयं को बदलना और दूसरे पर प्रभाव होने देना । आप करते हैं आंदोलन और चाहते हैं कि क्रांति हो जाय । आप बदलते नहीं, दूसरों को बदलना चाहते हैं । यह नहीं होगा । मन आप नहीं हैं, मन है ‘पर’ (अन्य), मिला हुआ । आप बदल जाओगे तो मन अपने आप बदल जायेगा । जीवन में क्रांति आ जायेगी ।″

थोड़ी देर सन्नाटा रहा, जिसे भंग करते हुए स्वामी जी आगे बोलेः ‘पर भाई ! आप हैं पढ़े-लिखे और मैं ठहरा पाँचवी तक पढ़ा, बेपढ़ा अंधा (स्वामी जी बचपन में ही दृष्टिहीन हो गये थे । ) बात न रूचे तो स्वीकार न कीजिये ।″

बात निशाने पर लगी और वकील साहब ने कुछ आजिजी से पूछाः ″महाराजः यह मन है क्या ?″

स्वामी जीः ″यह मन है भोगे हुए का और जो भोगना चाहते हैं उसका प्रभाव । भुक्त (जिसका भोग किया गया हो) – अभुक्त के प्रभाव के अतिरिक्त मन कुछ नहीं है । भोग के प्रभाव का नाम मन, भोग के परिणाम का नाम शोक तथा भोग की रूचि का नाम बुराई है । अब आप ही सोचिये कि जब तक कारण का नाश नहीं होगा अर्थात् भोग की रूचि का नाश नहीं होगा तब तक कार्य अर्थात् मन का नाश  होगा क्या  ?″

फिर मेरा नाम लेते हुए बोलेः ″केशरी भाई ! तुम तो साहित्य के प्रोफेसर हो । भक्ति साहित्य में पढ़ा होगा कि राधा जी बेमन हो गयी थीं । क्यों ? क्योंकि उनका अपना कोई संकल्प नहीं रह गया था । उन्होंने मन के अपने सारे संकल्प श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिये थे । और हमारा हाल है कि हम सारे संकल्प अपने लिए रखते हैं उनका भार ढोते रहना चाहते हैं और चाहते यह है कि मन का नाश हो जाय । यह असम्भव है ।″

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2020, पृष्ठ संख्या 24 अंक 336

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निरंतर प्रयास की आवश्यकता


परमहंस योगानंद जी ने अपने एक शिष्य को कोई कार्य करने को कहा पर ‘यह कार्य मेरी क्षमता से परे है’ ऐसा सोचकर उसने उस कार्य को करने से मना कर दिया ।

परमहंस जी ने तुरंत दृढ़ स्वर में कहाः “इसे मैं कर सकता हूँ !”

शिष्यः “परंतु गुरुदेव ! आप योगानंद हैं । आप ईश्वर के साथ एक हैं ।”

शिष्य ने आशा की थी कि गुरुदेव कहेंगेः ‘हाँ ! तुम ठीक कहते हो । तुम जितना चाहो समय लो । अंत में सफल हो ही जाओगे ।’

योगानंद जीः “तुममें और योगानंद में केवल इतना ही अंतर है कि मैंने प्रयास किया, अब तुम्हें प्रयास करना है !”

जिन शिष्यों को योगानंद जी प्रशिक्षित करते थे उनसे दो उत्तर वे कभी भी स्वीकार नहीं करते थेः

1 ‘मैं नहीं कर सकता ।’ 2 ‘मैं नहीं करूँगा ।’

वे कहते थे कि “साधक को प्रयास करने का इच्छुक होना ही चाहिए ।”

परमहंस जी प्रायः कहते थेः “जीवन एक वेगवती नदी की भाँति है । जब  आप ईश्वर की खोज करने लगते हैं तब आप उन सांसारिक प्रवृत्तियों के बलशाली प्रवाह की विपरीत दिशा में तैरने का प्रयास करते हैं जो आपके मन को सीमित सांसारिक इन्द्रिय-चेतना की ओर खींचती रहती हैं । आपको प्रतिपल प्रवाह के विरुद्ध तैरते रहने का प्रयास करना ही होगा । यदि आप प्रयास का को ढीला छोड़ देंगे तो माया का बलशाली प्रवाह आपको बहा ले जायेगा । आपका प्रयास निरंतर होना चाहिए ।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2020, पृष्ठ संख्या 20 अंक 336

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