Gurubhaktiyog

परमहंस योगानंद जी को इंतजार था उनके शिष्य के दुबारा जन्म लेने का और वह समय आ गया..


कई समर्पित शिष्यों को रांची के किसी आश्रम में सद्गुरु परमहंस योगानंदजी अपने सानिध्य से सींच रहे थे । एक दिन काशी नाम का समर्पित युवान शिष्य के अंतर्मन में एक विचित्र जिज्ञासा उठी। हे गुरुवर! आप तो सर्वज्ञ है सर्वान्तर्यामी है। किसी की कोई भी बात भला आपसे कहां छिपी है। आप तो भुत …

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मस्त फकीर सिवली और जिज्ञासु की कथा


गुरु की महिमा गाने से उनका ईश्वरत्व हमारे हृदय में स्वयं प्रकट हो जाता है क्योंकि गुरु का स्वभाव स्वयं ईश्वर का स्वभाव होता है उसी स्वभाव के प्राप्ति हेतु ही मनीषियों ने ईश्वरोपासना का विधान किया है परन्तु वे लोग मेरे मत में अभागे ही रह जाते है जो साक्षात ईश्वर के चलते-फिरते स्वरूप …

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अजामिल का पतन (भाग-5)…


बाहर.. कुटिया के बाहर एक अलख जगी भिक्षाम देहि! भिक्षाम देहि! कलावती ने सुना तो हैरान सी हुई कि हम तो स्वयं भिखारियों से बदत्तर है फिर हमसे भिक्षा कौन मांग रहा है? बाहर आकर देखा तो वही साधुजन उसकी दहलीज़ पर खड़े अलख जगा रहे थे। कलावती की सब कलाएं तो रूप ढलने के …

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