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संत महापुरुषों की जयंती मनाने का उद्देश्य


पूज्य बापू जी का 84वाँ अवतरण दिवसः 13 अप्रैल 2020

मेरा जन्मदिवस-उत्सव आप मनाते हैं लेकिन यह समझना भी आवश्यक है कि मेरा और आपका अनादि काल से कई बार जन्म हुआ है । भगवान अपने प्रिय अर्जुन को कहते हैं-

बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ।।

‘हे परन्तप अर्जुन ! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं । उन सबको तू नहीं जानता किंतु मैं जानता हूँ ।’ (गीताः 4.5)

जीव क्यों नहीं जानता है ? क्योंकि जीव नश्वर वस्तुओं का संग्रह करने और उनसे सुख लेने के लिए जो चिंतन करता है उससे उसकी मति व वृत्ति स्थूल हो गयी है । इसलिए वह अपने जन्मों को नहीं जानता है और ईश्वर अपने अवतारों को जानते हैं क्योंकि ईश्वर में विषय-विलास से सुख लेने की मति व वृत्ति नहीं है । ईश्वर को अपने आत्मस्वरूप का भान रहता है । ‘जो जन्मता है, बढ़ता है, बूढ़ा होता है और मर जाता है वह मेरा शरीर है ।’ – ऐसा जिन सत्पुरुषों को अनुभव होता है वे भी अपने शरीर के जन्म को एक निमित्तमात्र बनाते हैं, अपने वास्तविक स्वरूप को जानते हैं । ऐसे पुरुष भगवान के उस रहस्य को समझकर अपने अखंड स्वभाव में जगे रहते हैं ।

जयंतियाँ क्यों मनायी जाती हैं ?

व्रत, उपवास तन-मन के शोधन के लिए किये जाते हैं । पर्व और उत्सव अपनी सूक्ष्म क्षमताओं-निराशाओं को दूर हटाने और अपनी दिव्यता के संकेत को पाने के लिए मनाये जाते हैं । जयंतियाँ मनाने के पीछे यह उद्देश्य है कि इनके द्वारा  वांछनीय उमंगों, भावनाओं, आत्मविश्रांति व उन्नत ज्ञान का प्रचार-प्रसार हो, वांछनीय दृष्टि प्राप्त हो और अवांछनीय दृष्टि बदल जाय । फिर चाहे भगवान श्रीराम जी की, भगवान श्रीकृष्ण की, महात्मा बुद्ध की, गुरु नानक जी की, साँईं लीलाशाह जी की या चाहे किन्हीं सत्पुरुष की जयंती मनाओ ।

जो शुद्ध-बुद्ध, निरंजन-निराकार परमात्मा है उसको अवतरित करने के लिए वातावरण बनाना पड़ता है । हजारों-हजारों चित्त जब शुभकामना करते हैं और मार्गदर्शन चाहते हैं तब वह सच्चिदानंद जिस अंतःकरण में विशेषरूप से अवतरित होता है उसे अवतार कहते हैं । बाकी तो परमात्मा राम बनकर आये, कृष्ण बन के आये तो श्रोता या पाठक बन के भी वही परमात्मा बैठा है, यह बात भी उतनी ही सच्ची ।

कीड़ी में नानो बन बेठो हाथी में तू मोटो क्यूँ ?

बन महावत ने माथे बेठो हांकणवाळो तू को तू ।।….

ऐसा खेल रच्यो मेरे दाता ज्याँ देखूं वाँ तू को तू ।।

अनादि काल से सृष्टि चली आ रही है, राम थे तब भी तुम थे, कृष्ण थे तब भी तुम थे, सृष्टि के आदि में तुम थे, मध्य में तुम थे, अब भी तुम हो और प्रलय हो जायेगा तब भी तुम्हारा नाश नहीं होता है, वास्तव में तुम वह परब्रह्म-परमात्मा का सनातन स्वरूप हो । इस समझ को उभारने का अवसर मिले, इसका अनुभव करने का साधन मिले इसलिए जयंतियाँ मनायी जाती हैं ।

वे देर-सवेर विजयी हो जाते हैं

इन जयंतियों, सत्संगों, पर्व-उत्सवों के द्वारा साहसी आगे बढ़ते हैं । पराक्रमी सफल होते हैं । अकेला साहस जगाकर बैठें नहीं, पुरुषार्थ भी करें, पराक्रम करें । जो प्रतिकूलताओं से दबते नहीं, उनके साथ समझौता नहीं करते और उन्हें देखकर अपने चित्त को परेशान नहीं करते हैं बल्कि ‘महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, झूलेलाल जी, साँईं लीलाशाह जी महाराज, श्रीकृष्ण और श्रीराम में जो चैतन्य रम रहा था वही चैतन्य मेरा आत्मा है’ – ऐसा सोच के पग आगे रखते हैं वे देर-सवेर विजयी हो जाते हैं ।

यह विवेक करने का दिवस है

जन्मदिवस बधाई हो !…. वास्तव में यह दिवस विवेक करने का दिवस है । किसी की 70 वर्ष उम्र हो गयी तो सोचे कि ’70 साल  कैसे गये, उनमें क्या गलती हो गयी अथवा क्या अहंता आ गयी ?…. अब 71वाँ साल आता है, उसमें यह गलती और अहंता न आये ।’ इस प्रकार सोचते हैं तो दिव्यता की तरफ यात्रा होती है लेकिन ‘मैं इतना धन कमाऊँगा, ऐसा करूँगा, ऐसा बन के दिखाऊँगा…..’ ऐसा सोचते हैं तो यह न जन्म दिव्य है न कर्म दिव्य है । ये अपने को उलझाने वाली योजनाएँ हैं । श्रीकृष्ण के दृष्टिकोण से आप तत्परता से कर्म करें लेकिन कर्तृत्व भाव, भोक्तृत्व भाव, फल-लोलुपता, फलाकांक्षा आदि नहीं रखें तो अनुभव हो जायेगा कि

असङ्गो ह्ययं पुरुषः

‘मैं इन सब परिस्थितियों से असंग, ज्ञानस्वरूप, प्रकाशमात्र, चैतन्यस्वरूप, आनंदस्वरूप हूँ….’ – इस प्रकार भगवान अपने स्वतःस्फुरित, स्वतः सिद्ध स्वभाव को जानते हैं, ऐसे ही आप भी अपने स्वतः सिद्ध स्वभाव को जान लें तो आपका जन्म और कर्म दिव्य हो जायेंगे ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2020, पृष्ठ संख्या 12, 13 अंक 327

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कोरोना वायरस पर विशेष


विपदा से पहले लौटें अपनी जड़ों की ओर

मांसाहार व अभक्ष्य आहार का त्याग जैसे भारतीय संस्कृति के सिद्धांतों की अवहेलना के घातक दुष्परिणाम क्या हो सकते हैं यह अब सभी को खूब प्रत्यक्ष हो रहा है । विश्वभर में आतंक मचाकर तबाही कर रहा कोरोना विषाणु (वायरस) इसका एक ताजा उदाहरण है । कोरोना वायरस रोग ने एक महामारी का रूप धारण कर लिया है । केवल 2 महीने में चीन में कोरोनावायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 77770 के ऊपर पहुँच गयी है, जिसमें 2666 से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है । अब तक यह वायरस ईरान, अफगानिस्तान, ईराक, ओमान आदि 33 से अधिक देशों में फैल चुका है और पूरे विश्व में संक्रमित लोगों की संख्या 80239 से अधिक है । भारत में भी इसने प्रवेश किया था लेकिन फिलहाल स्थिति नियंत्रण में बतायी गयी है । इसके पहले सार्स रोग ने खूब तबाही मचायी थी जो पशुओं से मनुष्य-शरीर में आया था ।

कहाँ से आये ये कोरोना जैसे वायरस ?

वैज्ञानिकों के अनुसार कोरोनावायरस प्राणी से मनुष्य में संक्रमित हुआ वायरस है । मांसाहार करने के लिए जानवरों को प्राप्त करने और मांस तैयार करने की प्रक्रिया में लिप्त मांसाहार के व्यापारी और उसे खाने के शौकीन लोग जानवर के स्पर्श, श्वासोच्छवास, सेवन आदि द्वारा अपने जीवन को जानलेवा बीमारियों एवं अकाल मौत के मुँह में धकेल देते हैं । शाकाहारी जीवन जियें तो क्यों ऐसी महामारियाँ होंगी ? मांसाहारी व्यक्ति केवल अपने लिए प्राणघातक नहीं है अपितु शाकाहारियों के लिए भी खतरा है क्योंकि ऐसे वायरस से रोग फिर मनुष्यों से मनुष्यों में फैलते हैं ।

अब चीन ने जंगली पशुओं के व्यापार और उनके उपभोग पर रोक लगा दी है ।

मांसाहार और पशु-संक्रमण से मनुष्य में प्रविष्ट वायरस व रोग

वायरस का नाम कौन सा रोग फैलाया
नॉवेल कोरोनावायरस कोरोनावायरस रोग 2019
एच.आई.वी. एडस
एच5एन1 एच5एन1 ऐवियन इन्फ्लुएंजा अथवा बर्ड फ्लू
ईबोला ईबोला वायरस रोग
निपाह निपाह वायरस संक्रमण
सार्स कोरोनावायरस सार्स
एच1एन1 स्वाइन फ्लू

कैसे करें रोकथाम ?

1. शाकाहार ऐसे वायरसों से रक्षा करता है ।

2. ये वायरस उन्हीं पर हमला करते हैं जिनकी रोगप्रतिकारक शक्ति कमजोर होती है अतः इसकी रोकथाम का सबसे अच्छा और सरल तरीका है कि देशी गाय के गोबर के कंडे अथवा ‘गौ-चंदन धूपबत्ती’ को जलाकर उस पर देशी घी या नारियल तेल की बूँदें, गूगल, कपूर डाल के धूप करें । इसमें वायरस पनप नहीं सकता । इससे सभी जगह उसकी रोकथाम की जा सकती है । साथ ही इससे विभिन्न बीमारियों के विषाणु, जीवाणु नष्ट होकर आरोग्यप्रद, सुखमय वातावरण का निर्माण होगा । दूरद्रष्टा महापुरुष पूज्य बापू जी ने उपरोक्त प्रकार के गोबर के कंडे के धूप का पिछले कई दशकों से व्यापक प्रचार-प्रसार किया है और स्वास्थ्य, रोगप्रतिरोधक शक्ति वर्धक ‘गौचंदन धूपबत्ती’ एवं इसी के साथ स्मृतिवर्धन का लाभ भी दिलाने हेतु ‘स्पेशल गौ-चंदन धूपबत्ती’ की खोज की । वही तथ्य आज चिकित्सा-ऩिष्णातों की समझ में आ रहा है कि गाय के गोबर के कंडे पर किया गया धूप वातावरण को ऐसे खतरनाक विषाणुओं से भी मुक्त रखने में कारगर है !

3. पूज्य बापू जी के सत्संग में आने वाले एवं ‘ऋषि प्रसाद’ में छपने वाले रोगप्रतिकारक शक्तिवर्धक अन्य उपायों का अवलम्बन लेते रहना चाहिए ।

ठोकर खाने से पहले ही सँभल जायें

कोरोनावायरस रोग की भीषण महामारी से त्रस्त होकर आज विश्व  को शाकाहार और भारत के महापुरुषों के सिद्धान्तों की ओर तो आखिर में मुड़ना ही पड़ रहा है । लेकिन कितना अच्छा होता कि पहले से ही मांस भक्ष्ण न करने की महापुरुषों की उत्तम सीख को मानकर निर्दोष मूक प्राणियों की हिंसा से और इस रोग से बचा जाता !

जब-जब शास्त्रों व महापुरुषों की दूरदृष्टिसम्पन्न हित व करूणाभरी सलाह को ठुकराया जाता है तब-तब देर-सवेर उसके घातक परिणाम भुगतने ही पड़ते हैं और मजबूर होकर शास्त्रों-महापुरुषों के सिद्धान्तों को मानना पड़ता है । ऐसे कई उदाहरण हमारे सामने हैं-

संयम-ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए ।  हमारे ऋषियों-मुनियों के इस सिद्धान्त को अनदेखा करके जो देश ‘फ्री-सेक्स’ की विचारधारा अपनाने की ओर चले वहाँ एड्स जैसी जानलेवा बीमारियाँ आ धमकीं, वहाँ से दूर-दूर तक फैलीं और उन देशों को अरबों डॉलर खर्च करके संयम की शिक्षा देनी पड़ रही है और फिर भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं । अंतर्राष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ द्वारा प्रकाशित इऩ्नसेंटी रिपोर्ट कार्ड नम्बर 3 के अनुसार ‘अमेरिका के स्कूलों में यौन-संयम की शिक्षा देने के लिए 1996 से 2001 के बीच सरकार ने 40 करोड़ से अधिक डॉलर (आज के 28 अरब 65 करोड़ रूपये) केवल संयम की शिक्षा के अभियान में खर्च किये ।’ वे ‘दिव्य प्रेरणा-प्रकाश – युवाधन सुरक्षा’ अभियान का लाभ लें तो नाममात्र के खर्च में कितने उत्तम परिणाम उन्हें मिल सकते हैं !

ब्रह्मचर्य या ऋतुचर्या के पालन की बात हो, ॐकार चिकित्सा, मंत्र चिकित्सा हो या ध्यान-प्रार्थना हो – तन मन-मति को स्वस्थ, प्रसन्न, सुविकसित और प्रभावशाली बनाने और बनाये रखने का ज्ञान खजाना पूज्य बापू जी जैसे भारत के महापुरुषों के पास है । इस ज्ञान का महत्त्व न जानने वालों ने स्वास्थ्य और सुविधा के लिए बड़ी-बड़ी महँगी-महँगी दवाइयाँ व मशीनें खोजीं लेकिन समस्याएँ कम न हुईं बल्कि और भी बढ़ीं । आखिर थक-हारकर आज पुनः स्वास्थ्य व शांति के लिए विश्ववासियों को भारत की ऋषिप्रणीत इन प्रणालियों की शरण स्वीकारनी पड़ रही है । इसी प्रकार हमारी गौ-चिकित्सा की ओर भी ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ सहित सारा विश्व आज आशाभरी दृष्टि से टकटकी लगाये देख रहा है ।

विश्व को उपरोक्त जैसी विभिन्न तबाहियों से बचना हो तो भारत के ऋषि-मुनियों और ब्रह्मवेत्ता सत्पुरुषों के ज्ञान की ओर ही मुड़ना होगा… स्नेहपूर्वक न मुड़े तो ठोकरें खाकर भी मुड़ना होगा…. इसके सिवा कोई चारा ही नहीं है । फिर हे प्यारे प्रबुद्धजनो ! हे विश्वमानव ! व्यर्थ में ठोकरें क्यों खाना ?

विदेशी लोग तो चलो, हमारी संस्कृति की महानता से अपरिचित हैं इसलिए वे ठोकर खाकर सँभल रहे हैं पर हमारा जन्म तो भारतभूमि में हुआ है । ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के सुसंस्कारों की सरिताएँ आज भी हमारे देश में बह रही हैं । व्यापक ब्रह्मस्वरूप में जगह ऐसे संयममूर्ति महापुरुष, जिनके दर्शनमात्र से लोगों की भोग-वासना छूटने लगती है और वे परमानंद पाने के रास्ते चल पड़ते हैं, जिनके आवाहनमात्र से 14 फरवरी के काम-विकार पोषक, विनाशकारक ‘वेलेंटाइन डे’ को मनाना छोड़कर करोड़ों लोग उऩ्नतिकारक निर्विकार, पवित्र प्रेम दिस अर्थात् ‘मातृ-पितृ पूजन दिवस’ मनाने लगते हैं, जिन सदाचार के मूर्तिमंत स्वरूप महापुरुष ने शाकाहार पर जोर देकर असंख्य लोगों के शराब, कबाब और व्यसन छुड़ाये और इसीलिए जिनके लिए ‘श्री आशारामायण’ कार ने लिखा हैः ‘कितने मरणासन्न जिलाये, व्यसन मांस और मद्य छुड़ाये ।।’ उन पूज्य बापू जी के सत्संग-मार्गदर्शन की आज समाज को अत्यंत आवश्यकता है… ऐसी समस्त विपदाओं से केवल सुरक्षा के लिए ही नहीं अपितु व्यक्ति, परिवार, देश और विश्व के सर्वांगीण विकास के लिए भी !

एक-एक ठोकर खाकर हमारे महापुरुषों का एक-एक सिद्धान्त स्वीकारने के बजाय अगर हम उन सिद्धान्तों के उद्गमस्वरूप महापुरुष का ही महत्त्व समझें, उनका सत्संग, आदर-सम्मान करें और उनके बताये मार्ग पर चलें तो इन रोग-बीमारियों से मुक्ति तो बहुत छोटी बात है, तनाव चिंता, दुःख, शोक, उद्वेग एवं बड़ी भारी मुसीबतों से भी मुक्ति और अमिट परम आनंद, परम शांति की प्राप्ति करके मनुष्य जन्म का पूर्ण सुफल भी प्राप्त किया जा सकता है । हम इस बात को कब समझेंगे ? कब जागेंगे ? (संकलकः धर्मेन्द्र गुप्ता)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2020, पृष्ठ संख्या 7-9 अंक 327

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ध्यान-जप के अभ्यास से हुआ निर्भय खुले परम जीत के द्वार-पूज्य बापू जी


महात्मा बुद्ध के जमाने की बात है । दो बच्चे आपस में खेलते थे । एक बच्चा सदैव जीतता था और दूसरा सदैव हारता था । एक दिन हारने वाले ने जीतने वाले से पूछा कि “तुम आखिर क्या करते हो कि रोज जीत जाते हो ?”

जीतने वाले ने कहाः “मैं रोज भगवान सदगुरु की शरण जाता हूँ, ध्यान करता हूँ । ‘बुद्धं (अपना शुद्ध-बुद्ध सर्वव्यापी आत्म-परमात्म स्वरूप) शरणं गच्छामि…. गुरु शरणं गच्छामि…. सत्यं शरणं गच्छामि….’ ऐसा बोलते-बोलते मैं शान्त हो जाता हूँ फिर मुझे पता नहीं क्या होता है । बाद में मेरे में बड़ी स्फूर्ति होती है, शक्ति होती है ।”

गुरुमंत्र जपे अथवा कीर्तन करे, ध्यान करे फिर अनजाने में ही व्यक्ति जितने अंश में उस आत्मा-परमात्मा में स्थित होता है, शांत होता है, उतनी ही उसकी योग्यता विकसित होती है । अगर देह को ‘मैं’ मानेगा तो संसार और विकारों का आकर्षण होगा लेकिन आत्मा को ‘मैं’ और भगवान को, सदगुरु को ‘मेरा’ मानेगा तो विकार कम होंगे और आत्मसुख आयेगा ।

वह लड़का अनजाने में आत्मसुख, आत्मशांति का प्रसाद लेता था । हारने वाला लड़का था भोला-भाला, साफ-हृदय । उसने सफलता की कुंजी क्या है समझ ली और प्रतिदिन ध्यान करने लगा । एकाग्रता से हिम्मत बढ़ जाती है । वह कभी-कभार जीतने लगा तो उसकी ध्यान में, ज में और श्रद्धा हो गयी । वह और करने लगा । अब हारने की जगह पर वह जीतने लग गया लेकिन उसके साथ-साथ उसको जो अंतरंग सुख मिलने लगा उसके आगे उसकी जीत और हार जब खिलवाड़ हो गये । अब खेल में उसे इतना आनंद, रस नहीं आता था, इतना महत्त्व नहीं दिखता था क्योंकि वह अंतरंग साधना में चला गया था । अब तो उसको शांत बैठे रहने में, जप करने में, मौन रहने में रस आने लग गया । ऐसा करते-करते उसकी मनःशक्ति, निर्णयशक्ति, निर्भीकता आदि गुण खिल गये । उसकी मति-गति कुछ अनूठी होने लगी ।

एक बार वह अपने पिता के साथ खेत में गया । खेत के आसपास के पेड़-वेड़ थोड़े बढ़ गये थे, उनकी डालियाँ-वालियाँ काट-कूट के बैलगाड़ी भरी । देर हो गयी, सूरज डूबने लगा । दोनों चल पड़े । दिनभर मेहनत की थी तो बीच में थकान हुई । बैलगाड़ी रोकी, बैलों को खोला । सोचा, ‘जरा आराम करें, बैल भी जरा चर लें ।’ बैल चरने के बहाने खिसक गये और गाँव में पहुँच गये ।

जब बाप की नींद खुली तो उसने बेटे को कहा कि “देख, हम लोगों को जरा झोंका आ गया तो इतने में बैल भाग गये । तुम यहाँ बैठो, मैं बैलों को खोज के लाता हूँ । डरोगे तो नहीं ?”

वह पहले एकदम छोटे-से जंतु से भी डरता था लेकिन अब पास में ही गाँव का मरघट है फिर भी वह लड़का बोलता है कि “मैं नहीं डरता । पिता जी ! आप बैलों को खोजने जाइये ।”

बाप बैलों के पदचिन्हों को खोजते-खोजते गाँव में पहुँच गया । बैल तो मिले, घर पर पहुँच गये थे, अब बैलों को वापस लाकर बैलगाड़ी खींचने के लिए गाड़ी से जोड़ना था लेकिन गाँव का दरवाजा बंद हो गया । बाप गाँव में और बेटा बाहर जंगल में और श्मशान के पास । बेटा बैठ गया, उसको वही चस्का था – गुरु शरणं गच्छामि…. शुद्ध-बुद्धं शरणं गच्छामि… सत्यं शरणं गच्छामि… ऐसा करते-करते उसको तो ध्यान का रस आ गया, वह तो अंतर्मुख हो गया । अब रात्रि के 8 बजे हों चाहे 9 बजे हों, 10 बजे हों चाहे 12 बजे…. उसके चित्त में कुछ बजने का प्रभाव नहीं है क्योंकि अनजाने में वह आत्मा की शरण है । नहीं तो खाली सन्नाटे में डरने वाला बच्चा….. मरघट पास में है लेकिन उसको कोई फिक्र नहीं ।

मध्यरात्रि हुई तो निशाचर निकले । रात्रि को उनका प्रभाव होता है । कथा कहती है कि उनके मन में हुआ कि यह अच्छा शिकार मिल गया, खूब भंडारा करेंगे । इस लड़के को डरा के अब तो इसी को खायेंगे । भूत उत्सव करने लगे । लड़का तो बैलगाड़ी के नीचे गुरु शरणं गच्छामि… सत्यं शरणं गच्छामि….’ करते-करते लेट गया था । अचेतन मन में जप चल रहा था । भूतों ने डरावने, लुभावने सारे दृश्य दिखाये, चीखे लेकिन बच्चे को गहरी नींद थी, जगा नहीं और जब जगा तो भी डरता नहीं । बच्चे के इर्द-गिर्द से सात्त्विक, श्वेत तरंगें निकल रही थीं, प्रकाश निकल रहा था ।

हमारी चित्तवृत्ति जब ऊपर उठती है तो सत्त्वगुण बढ़ता है, एकाग्रता बढ़ती है तो आत्मचेतना की वह आभा पड़ती है । उस लड़के के दिव्य प्रकाश के प्रभाव से भूत डरे और उन्होंने देखा कि ‘यह कोई साधारण बालक नहीं है । यह कोई फरिश्ता है, देवता है, कोई महान आत्मा है ।’

जब महान आत्मा होता है तो फिर लोग झुककर उसको रिझाने का प्रयास करते हैं । प्रेत ने उस बच्चे का अभिवादन करने के लिए राजा के महल में से एक रत्नजड़ित थाल लाकर उसमें भोजन परोस के दिया । लड़का अनजाने में वेदांती हो गया था, अनजाने में आत्मसुख में पहुँचा था । अभिवादन से वह आकर्षित नहीं हुआ और डराने से वह डरा नहीं क्योंकि वह देह को ‘मैं’ देर के संबंधों को ‘मेरा’ मानने की गलती में नहीं था । अनजाने में वह अंतर्यामी आत्मा के करीब था ।

सुबह हुई, भूतों ने वह रत्नजड़ित स्वर्ण-थाल बैलगाड़ी में लक्कड़ों के बीच धर दिया । गाँव का दरवाजा खुला, बाप बैलों को लेकर आने लगा । ‘रात को राजा का स्वर्ण थाल चोरी हो गया है’ यह खबर फैल गयी । राजा के सिपाही खोज में निकले । खोजते-खोजते वहीं आ गये, बोलेः “अरे कौन लड़का है ? कहाँ से आया ? यह क्या है ?”

देखा तो थाल मिल गया । बोलेः “चोर रंगे हाथ पकड़ा गया । बैलगाड़ी में तूने ही रखा होगा ।”

लड़का बोलाः “मुझे पता नहीं ।”

“पता नहीं, तेरे बाप का है ! चल ।”

इतने में तो बाप भी आया । उस लड़के को तो अपराधी समझकर ले गये राजा के पास । थाल भी रख लिया, लड़के को भी रख लिया । लड़का अपने-आप में निर्दोष था । पूछा कि “थाल कहाँ से आया ?”

बोलाः “कोई पता नहीं ।”

“तुम्हारी बैलगाड़ी में से निकला ।”

“मुझे खबर नहीं ।”

“सब बताओ !…..” धाक, धमकी, साम, दाम, दंड, भेद – सब किया । दंड का भय दिखाया लेकिन चित्त में अनजाने में वह आत्मशरण में था, निर्भीक था । शरीर को ‘मैं’ मानोगे, शरीर की वस्तुओं को ‘मेरी’ मानोगे तो भय, चिंता और दुःख बने ही रहते हैं । आत्मा को ‘मैं’ और परमात्मा को अपना स्वरूप जानोगे तो दुःख के समय, भय के समय भी दुःख और भय नहीं टिकेंगे ।

राजा ने भय दिखाया लेकिन लड़का निर्भीक रहा । प्रलोभन दिया तो प्रभावित नहीं हुआ । राजा उसको लेकर महात्मा बुद्ध के पास श्रावस्ती नगरी गये कि ‘भंते ! चोरी के माल सहित यह लड़का पकड़ा गया और फिर भी इसे कोई डर नहीं, कोई भय नहीं । और यह लड़का चोर हो ऐसा दिखता हीं और माल इसके यहाँ से मिला है । तो क्या यह भूत ले गये थे क्या ? यह इतना शांत कैसे ?”

बुद्ध ने कहाः “हो सकता है । इस निर्दोष बालक का मन इस थाल में नहीं है, इस लक्कड़ में नहीं है । जहाँ होना चाहिए वहाँ (अंतर्यामी में) है ।”

राजा ने बालक को ससम्मान छोड़ दिया ।

तो शुद्ध हृदय था । उसमें संसार का कचरा ज्यादा घुसा नहीं था । सुन ली मित्र से बात कि ‘मैं रोज़ ध्यान करता हूँ, जप करता हूँ इसीलिए जीतता हूँ ।’ करने लगा ध्यान, होने लगा जप, होने लगी थोड़ी-थोड़ी जीत और फिर उस जीत ने परम जीत के द्वार खोल दिये ।

जितना मन निर्मल होता है उतना आसानी से आत्मा में लगता है और जितना आत्मा में लगता है उतना ही निर्मल जल्दी होता है । जितना बाहर की वस्तुओं में सुख ढूँढता है उतना ही मन मलिन होता है । जितना यह मलिन होता है उतना ही आत्मा से विमुख होता है । जितना भोग का आकर्षण है, उतना व्यक्ति भीतर से छोटा है और जितना भोग के प्रति बेपरवाही है, उपरामता है और अंतर्मुखता का सुख लेने का सौभाग्य है उतना ही व्यक्ति ऊँचा होता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2020, पृष्ठ संख्या 5-7 अंक 327

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