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क्षमा माँगने का सही ढंग – पूज्य बापू जी


लोग बोलते हैं- ‘जाने-अनजाने में मुझसे कुछ गलती या भूलचूक हो गयी हो तो माफ कर देना ! ‘

यह माफी लेने की सच्चाई नहीं है, बेईमान है । यह माफी माँगता है कि मजाक उड़ाता है ? ‘भूलचूक हो गयी हो तो….’ नहीं कहना चाहिएः ‘भूल हो गयी है, क्षमा माँगने योग्य नहीं हूँ लेकिन आपकी उदारता पर भरोसा है, आप मुझे क्षमा कर दीजिये ! यह सज्जनता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2020, पृष्ठ संख्या 25 अंक 331

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हर हृदय में कृष्णावतार सम्भव है और जरूरी भी है


(श्रीकृष्ण जन्माष्टमीः 11 व 12 अगस्त) – पूज्य बापू जी

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म बुझे दीयों को फिर से जगाने का संदेश देता है, मुरझाये दिलों को अपना ओज का दान करता है । श्रीकृष्ण के जीवन में एक और महत्त्वपूर्ण बात छलकती, झलकती दिखती है कि बुझे दिलों में प्रकाश देने का कार्य कृष्ण करते हैं । उलझे दिलों को सुलझाने का कार्य करते हैं और उस कार्य के बीच जो अड़चनें आती हैं, वे चाहे मामा कंस हो चाहे पूतना हो, उनको वे किनारे लगा देते हैं । अर्थात् साधक साधना करे, मित्र व्यवहार, खान-पान, रंग-ढंग… जो साधना या ईश्वरप्राप्ति में मददरूप हो अथवा जो हमारी घड़ीभर के लिए थकान उतारने के काम में आ जाय उसका उपयोग करके फिर साधक का लक्ष्य यही होना चाहिए – परमात्म-तत्त्व की प्राप्ति ! जिस हृदय को आनंद आता है और जहाँ से आनंद आता है  वहाँ पहुँचने का ढंग साधक को पा लेना चाहिए ।

साधक को अपने स्वरूप में स्वस्थ होने के लिए इस बात पर खूब ध्यान देना चाहिए कि तुम्हारी साधना की यात्रा में, ईश्वर के रास्ते में यदि तुम्हारे को कोई नीचे गिराता है तो कितना भी निकट का हो फिर भी वह तुम्हारा नहीं है । और ईश्वर के रास्ते में यदि तुम्हें कोई मदद देता है तो वह कितना भी दूर का हो, वह तुम्हारा है । वे तुम्हारे गुरुभाई हैं । परमात्मा से जो तुम्हें दूर रखना चाहते हैं उनके लिए संत तुलसीदास जी कहते हैं-

जाके प्रिय न राम-बैदेही

तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ।।

वह परम स्नेही भी हो फिर भी उसे करोड़ों वैरियों की नाईं समझ के उसका त्याग कर देना । त्याग न कर सको तो उसकी बातों में न आना क्योंकि जो स्वयं को मौत से, विकारों से बचा न सका, अपने जीवन के धन्य न कर सका उसकी बातों में आकर हम कहाँ धन्यता अनुभव करेंगे ! इसलिए कौरवों की बातों में नहीं, कृष्ण की बातों में आना हमारा कर्तव्य होता है ।

आप भी ऐसी समझ बढ़ाओ

संसारी कोई भी बात आयी तो यह आयी, वह आयी…. उसको देखने वाला ‘मैं’ नित्य है – ऐसा श्रीकृष्ण जानते थे । आप भी इस प्रकार की समझ बढ़ाओ । यह आयी, वह आयी… यह हुआ, वह हुआ…. यह सब हो-हो के मिटने वाला होता है, अमिट ‘मैं’ स्वरूप चैतन्य का कुछ नहीं बिगड़ता है । ऐसी सूझबूझ के धनी श्रीकृष्ण सदा बंसी बजाते रहते हैं, सदा माधुर्य का दान करते रहते हैं और प्रेमरस का, नित्य नवीन रस का पान करते-कराते रहते हैं । तो यह जन्माष्टमी का उत्सव श्रीकृष्ण की जीवनलीला की स्मृति करते हुए आप अपने कर्म और जन्म को भी दिव्य बना लें ऐसी सुंदर व्यवस्था है ।

यह तुम कर सकते हो

अपने आपको छोड़ नहीं सकते । जिसको कभी छोड़ नहीं सकते, ॐकार का गुंजन करके उसमें विश्रांति पा लो । संत्संग सुन के उसका ज्ञान पा लो । भगवान साकार होकर आ गये तो भी अर्जुन का दुःख नहीं मिटा लेकिन भगवान के तत्त्वज्ञान का आश्रय लिया तो अर्जुन का दुःख टिका नहीं ।

श्रीकृष्ण की दिनचर्या अपने जीवन में ले आओ । श्रीकृष्ण थोड़ी देर कुछ भी चिंतन नहीं करते और समत्व में आ जाते थे । आप भी कुछ भी चिंतन न करके समता में आने का अभ्यास करो – सुबह करो, दोपहर करो, कार्य या बातचीत में भी बीच-बीच में करो ।

कंस, काल और अज्ञान से समाज दुःखी है । इसलिए समाज में कृष्णावतार होना चाहिए । हर हृदय में कृष्णावतार सम्भव  है और जरूरी भी है । श्रीकृष्ण ने कंस को मारा, काल के गाल पर थप्पड़ ठोक दिया और अज्ञान मिटाकर अर्जुन व अपने प्यारों को ज्ञान दिया । शुद्ध अंतःकरण ‘वसुदेव’ है, समवान मति ‘देवकी’ है, हर परिस्थिति में यश देने वाली बुद्धि ‘यशोदा’ है । भगवान बार-बार यशोदा के हृदय से लगते हैं । ऐसे ही बार-बार भगवद्-स्मृति करके आप अपने भगवद्-तत्त्व को अपने हृदय में लगाओ । बाहर से हृदय से लगाना कोई जरूरी नहीं, उसकी स्मृति करके हृदय भगवादाकार कर लो ! और यह तुम कर सकते हो बेटे !

संस्कृति के लिए संकोच नहीं

कोई बड़ा शूरवीर रण छोड़कर भाग जाय तो उसे कायर कहते हैं किंतु हजारों की सुरक्षा और संस्कृति की रक्षा में रण का मैदान छोड़ के कायरों का नाटक करने वाले का नाम हम लोग श्रद्धा-भक्ति, उत्साह से लेते हैं- ‘रणछोड़राय की जय !’ यह कैसा अद्भुत अवतार है ! भक्तों के लिए, संस्कृति, समाज व लोक-मांगल्य के लिए पुरानी चप्पल पीताम्बर में उठाने में श्रीकृष्ण को संकोच नहीं होता । अर्जुन के घोड़ों की मालिश और उनके घावों में मलहम पट्टी करना और अर्जुन की घोड़ा-गाड़ी चलाना उन्हें नन्हा काम नहीं लगता । इसी में तो ईश्वर का ऐश्वर्य है लाला ! इसी में उनकी महानता का दर्शन हो रहा है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2020, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 331

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परिप्रश्नेन….


प्रश्नः मंत्रदीक्षा लेने से जीवन में परिवर्तन किस प्रकार होता है ?

पूज्य बापू जीः मंत्रदीक्षा का अर्थ है कि हमारी दिशा बदले, हमारा सोचने का ढंग बदले । मंत्रदीक्षा मिलते ही छूमंतर हो जायेगा ऐसा नहीं है । मंत्रदीक्षा मिलने से आपको धड़ाक-धूम हो के बस ढेर अशर्फियाँ गिर जायेंगी…. नहीं । मंत्रदीक्षा लेने से तुरंत ही आपके रोग भाग जायेंगे, आपका दुःख भाग जायेगा, आपके पाप भाग जायेंगे, आपको भगवान मिल जायेंगे….. ऐसा नहीं बल्कि मंत्रदीक्षा लेने से दिशा बदलेगी । बेवकूफी बदलने के बाद सारा बदला हुआ प्रतीत होगा । अज्ञान मिटता चला जायेगा, रस बढ़ता चला जायेगा । ज्यों-ज्यों भोजन करते हैं त्यों-त्यों भूख मिटती जाती है, पुष्टि आती जाती है ऐसे ही मंत्र का, ध्यान का अभ्यास करते-करते सुख की भूख मिटती जायेगी, सुख भीतर प्रकट होता जायेगा । और जो भीतर सुख हुआ तो बाहर किस बात का दुःख ! इससे बड़ा लाभ और हो क्या सकता है ! छूमंतर करके लॉटरी से जो रातों रात मालदार होते हैं वे भी अशांत हैं । हम न तुम्हें मालदान बनाना चाहते हैं, न कंगाल बनाना चाहते हैं, न मध्यम रखना चाहते हैं । हम तो चाहते हैं कि तुम्हारा जिसके साथ सच्चा संबंध है उस सत्यस्वरूप परमात्मा में तुम्हारी प्रीति हो जाय, उस सत्यस्वरूप का तुम्हें बोध हो जाय, आनंद आ जाय तो असत्य परिस्थितियों का आकर्षण ही न रहे । यह मिथ्या संसार तुम्हारे लिए खेल हो जाय, खिलौना हो जाय । मुक्ति और स्वर्ग भी तुम्हारे लिए नन्हें हो जायें ऐसे आत्मस्वर्ग का द्वार तुम खोल दो बस । मंत्र बड़ी मदद करता है मन-बुद्धि को बदलने में । और मन-बुद्धि बदल गये तो महाराज ! शरीर के कण तो वैसे भी सात्विक हो ही जाते हैं । और शरीर के कण सात्विक हुए तो रोग दूर रहते हैं । सुमति के प्रभाव से रोजी-रोटी में बरकत आती है, अपयश दूर होता है, यश तो बढ़ता है किंतु यश का अभिमान नहीं होता, भगवान की कथा और भगवान का दैवी कार्य प्यारा लगने लगता है – इस प्रकार के 33 से भी अधिक फायदे होते हैं ।

प्रश्नः पापी और पुण्यात्मा मनुष्य की पहचान क्या है ?

पूज्य बापू जीः पापी मनुष्य की पहचान है कि आत्मा का ख्याल नहीं, नश्वर शरीर के भोग विलास में जीवन को खपा दे, जीवन की शाम के पहले जीवनदाता को पाने का पता न पाये । किये हुए गलत निर्णय, गलत आकर्षण, गलत कर्म का पश्चाताप नहीं करे और जीवनभर उसी में लगा रहे यह पापी मनुष्य की पहचान है ।

आत्मशक्ति का, अंतर की प्रेरणा का नश्वर शरीर के लिए, उसके ऐश के लिए खर्च करना यह पापी मनुष्य की पहचान है और शाश्वत आत्मा के लिए शरीर का उपयोग करना यह पुण्यात्मा मनुष्य की पहचान है । भाई ! शरीर है तो चलो, इससे ज्ञान-ध्यान होगा इसलिए इसे जरा खिला दिया । ऐसा नहीं कि ऐश-आराम चाहिए, सुविधा चाहिए । सुविधा लेने में जो पड़ता है वह आत्मा का उपयोग करके शरीर को महत्त्व देता है और जो भगवान की तरफ चलता है वह शरीर का उपयोग करके भगवद्भाव, भगवद्ज्ञान को महत्त्व देता है ।

सही कर्म क्या है, सही निर्णय क्या है ? आत्मा की उन्नति, आत्मा की प्राप्ति…. और देह उसका साधन है – यह सही निर्णय है और इसके अनुरूप कर्म सही कर्म हैं । देहें कई मिलीं और कई चली गयीं फिर भी जो नहीं जाता उस अंतर्यामी परमात्मा को पहचानने की दृष्टि आये तो यह पुण्यात्मा की दृष्टि है और देह की सुख-सुविधाओं में अपने को गरकाब करते रहना, दुष्कर्म, दुराचार में लगे रहना यह पापी चित्त की पहचान है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2020, पृष्ठ संख्या 34 अंक 331

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