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Anmol Yuktiyan

यह सुंदर व सरल साधना सभी का कल्याण करेगी – पूज्य बापू जी


सुबह नींद से उठो तो थोड़ी देर शांत हो जाओ । नींद में से उठते हैं तो वैसे ही शांति रहती है । उसके बाद चिंतन करो कि ‘जो सत्, चित् है, आनंदस्वरूप है और मेरे हृदय में फुरफुरा रहा है, जो सृष्टि की उत्पत्ति,  स्थिति और संहार का कारण है और मेरे शरीर की उत्पत्ति, स्थिति और लय का कारण है, उस सच्चिदानंद का मैं हूँ और वह मेरा है । ॐ शांति… ॐ आनंद… इस प्रकार तुम नींद में से उठ के लेटे-लेटे अथवा बैठ के शांत रहोगे तो मैं कहता हूं कि दो दिन की तपस्या से वह 2 मिनट की विश्रांति ज्यादा फायदा करेगी, पक्की बात है ! ऐसे ही रात्रि को सोते समय दिन में जो कुछ अच्छे भले काम हुए हों उनका फल ईश्वर को सौंप दो और गलती हो गयी हो तो कातर भाव से प्रार्थना कर लो । फिर लेट गये और श्वास अंदर जाय तो ॐ, बाहर आय तो 1… श्वास अंदर जाय तो शांति, बाहर आये तो 2… इस प्रकार श्वासोच्छ्वास की गिनती करते-करते सो जायें । इस प्रकार सोने से रात की निद्रा कुछ सप्ताह में योगनिद्रा बनने लगेगी । यह साधना दुःख निवृत्ति, परमात्मप्राप्ति में बड़ी सहायक है । ऐसी सुंदर और सरल साधना सभी जातियों का, सभी लोगों का जल्दी कल्याण करेगी ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2022, पृष्ठ संख्या 23 अंक 352

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परिप्रश्नेन


प्रश्नः मन एकाग्र नहीं होता है तो क्या करें ?

पूज्य बापू जीः तुम्हारा मन एकाग्र नहीं होता है तो सबका हो गया क्या ? मन एकाग्र नहीं होता तो अभ्यास करना चाहिए । भगवान के, सद्गुरु, स्वस्तिक अथवा ॐकार के सामने बैठकर एकटक देखने का अभ्यास करो । मन इधर-उधर जाय तो फिर से उसे मोड़कर वहीं लगाओ । कभी-कभी चन्द्रमा की ओर देखते हुए आँखें मिचकाओ, उसको एकटक देखो । कभी श्वासोच्छ्वास को गिनो । श्वास अंदर जाता है तो ‘शांति’, बाहर आता है तो ‘1’… अंदर जाता है तो ‘ॐ’, बाहर आता है तो ‘2’… अंदर जाता है तो ‘आनंद’, बाहर आता है तो ‘3’… ऐसे 54 या 108 तक गिनती तक करो । मन कुछ अंश में एकाग्र होगा, मजा भी आयेगा और शरीर की थकान भी मिटेगी ।

प्रश्नः कर्तव्य क्या है ?

पूज्य बापू जीः ईश्वर में स्थिर होना और औरों को स्थिर करना – यह कर्तव्य है । बाकी का सब बेवकूफी है । आप ईश्वर में स्थिर हो जाओ फिर दूसरों को करा दो – यह कर्तव्य है । तो सब तो सत्संग नहीं करेंगे । नहीं-नहीं, आप जो भी काम करें वह ईश्वर में स्थिर होने के लिए करें तो उससे आप भी स्थिर होते जायेंगे और दूसरे को भी सहायक हो जायेंगे न ! कर्तव्य से चूका कि धड़ाक… दुःख चालू । ईश्वर के विचार से, आत्मविचार से जरा-सा नीचे हटे कि मन पटक देगा । जो अपनी शांति सँभाल नहीं सकता, अपनी प्रसन्नता सँभाल नहीं सकता, अपना कर्तव्य सँभाल नहीं सकता वह तो जीते-जी मरा हुआ है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2022, पृष्ठ संख्या 34 अंक 350

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स्वस्थ जीवन व ध्यान-भजन में उन्नति हेतु


एक व्यक्ति एक संत के पास आया और बोलाः ″महाराज ! मैं भगवान का भजन ठीक से नहीं कर पाता ।″ संत ने कहाः ″पेट पर ध्यान दो ।″ फिर दूसरा व्यक्ति आया और बोलाः ″मेरा अपने मन पर काबू नहीं है ।″ संत बोलेः ″पेट पर ध्यान दो ।″ तीसरा व्यक्ति आया और बोलाः ″मैं प्रायः बीमार रहता हूँ ।″ तब भी संत ने यही कहा कि ″पेट पर ध्यान दो ।″

जिह्वा के गुलाम न बनकर सात्त्विक, ताजा आहार ही लेना, भूख से थोड़ा कम खाना, तथा पेट साफ रखना – यह स्वस्थ जीवन के लिए तो जरूरी है ही, साथ ही ध्यान-भजन में मन लगने व शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी अत्यावश्यक है । कहा भी गया हैः

पेट सही तो सब सही, पेट खराब तो सब खराब ।

कम खाओ, गम खाओ ( धैर्य रखो )। पेट पर ध्यान दो ।

लंघन अर्थात् उपवास स्वास्थ्य का परम हितैषी एवं रोगी का परम मित्र है । वाग्भट्ट जी ने इसे परम औषध कहा हैः ‘लङ्घनं परमऔषधम् ।’

अष्टांगहृदय ( सूत्रस्थानः 2.19 ) में आता हैः जीर्णे मितं चाद्यान्न । पहले किये हुए भोजन के पच जाने के पश्चात जो हितकर भोजन हो उसे भूख से थोड़ी कम मात्रा में खायें ।’ यह स्वास्थ्य का मूल मंत्र है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2022, पृष्ठ संख्या 29 अंक 349

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