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Anmol Yuktiyan

चश्‍मा उतारने के लिए


(शरद पूर्णिमा की चांदनी में करे यह प्रयोग)

(परम पूज्य संत श्री आशारामजी महाराज के सत्संग से)

गाय का घी + शहद + त्रिफला (समान मात्रा में) मिश्रण करके शरद पूर्णिमा को चंद्रमा की चांदनी में रात भर रखो…. |

सुबह कांच की बरनी में रखो | दस ग्राम सुबह और दस ग्राम शाम को चालीस दिन तक दिन खाओ…. । मैंने तो साठ दिन खाया, चश्‍मा उतर गया | 

दोषों को नष्ट करने हेतु – पूज्य बापू जी


अपने में जो कमजोरी है, जो भी दोष है उनको इस मंत्र द्वारा स्वाहा कर दो । दोषों को याद करके मंत्र के द्वारा मन-ही-मन उनकी आहुति दे डालो, स्वाहा कर दो ।

मंत्रः ॐ अहं ‘तं’ जुहोमि स्वाहा । ‘तं’ की जगर पर विकार या दोष का नाम लें ।

जैसेः ॐ अहं ‘वृथावाणीं’ जुहोमि स्वाहा ।

ॐ अहं ‘कामविकारं’ जुहोमि स्वाहा ।

ॐ अहं ‘चिंतादोषं’ जुहोमि स्वाहा ।

जो विकार तुम्हें आकर्षित करता है उसका नाम लेकर मन में ऐसी भावना करो कि मैं अमुक विकार को भगवत्कृपा में स्वाहा कर रहा हूँ ।’

इस प्रकार अपने दोषों को नष्ट करने लिए मानसिक यज्ञ अथवा वस्तुजन्य (यज्ञ सामग्री से) यज्ञ करो । इससे थोड़े ही समय में अंतःकरण पवित्र होने लगेगा, चरित्र निर्मल होगा, बुद्धि फूल जैसी हलकी व निर्मल हो जायेगी, निर्णय ऊँचे होंगे । इस थोड़े से श्रम से ही बहुत लाभ होगा । आपका मन निर्दोषता में प्रवेश पायेगा और ध्यान-भजन में बरकत आयेगी ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2020, पृष्ठ संख्या 32 अंक 333

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पाचनतंत्र ठीक करने की रहस्यमय कुंजी


पाचनतंत्र कमजोर है और खाना पचाना है तो यह मंत्र हैः

अगस्त्यं कुम्भकर्णं च शनिं च वडवानलम् ।

आहारपरिपाकार्थं स्मरेद् भीमं च पञ्चमम् ।।

ढाई चुल्लू में समुद्र-पान कर जाने वाले महर्षि अगस्त्य, बहुभोजी महाकाय कुम्भकर्म, जिनकी एक नजर पड़ने से ही अकाल पड़ जाता है ऐसे शनिदेव, सब कुछ भस्मसात् कर देने वाली समुद्र के अंदर की प्रबल बड़वाग्नि और अत्यंत तीव्र जठराग्निवाले भीमसेन – इन पाँचों का भोजन के सम्यक् परिपाक के लिए स्मरण करना चाहिए ।

उपरोक्त मंत्र जपते हुए पेट पर बायाँ हाथ घुमाना चाहिए । कहीं-कहीं घड़ी के काँटे घूमने की दिशा में हाथ घुमाने की बात आती है, कहीं-कहीं उसके विपरीत दिशा में हाथ घुमाने की बात आती है । अंतःप्रेरणा से बायें से दायें घुमायें या दायें से बायें, फायदा होगा । इससे आमाशय में पहुँचे भोजन को मलाशय की ओर गतिशील होने में मदद मिलती है ।

उपरोक्त प्रयोग के बारे में पूज्य बापू जी के सत्संग में आता हैः “किसी को भोजन नहीं पचता है मानो अजीर्ण है तो दवाईयाँ, टेबलेट लेते हैं अथवा और कुछ उपचार करते हैं, फाँकी मारते हैं अथवा हाजमा-हजम खाते हैं । उसकी अपेक्षा यह (उपरोक्त) मंत्र है हाजमा-हजम का । यह प्रयोग रहस्यमय है ।

अगस्त्य ऋषि, कुम्भकर्म, शनिदेव, बड़वानल और भीम – इन पाँचों का भोजन पचाने मे हम सुमिरन करते हैं । देशी भाषा में ऐसा भी कहोगे तो चल सकता है ।

जब भी खायें, थोड़ा खायें, संभल के खायें । खाने के बाद मंत्र पढ़ के हाथ पेट पर घुमायें तो पेट का भारीपन ठीक हो जायेगा क्योंकि जठराग्नि प्रदीप्त होगी इस मंत्र के प्रभाव से । अब ठाँस-ठाँस के खाओगे और यह मंत्र-प्रयोग करते रहोगे तो काम नहीं करेगा । कायदे से खाओगे और कभी-कभीर इसका फायदा लोगे तो ठीक है ।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2020, पृष्ठ संख्या 31 अंक 332

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